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धीरेन्द्र झा 'मैथिल' (संपर्क- जनकपुर)

भाषा वैज्ञानिक प्रो. डा. रामावतार यादव

जनकपुर उद्योग-वाणिज्य संघक सभा हॉल प्राङ्गन। ओ एकटा प्लास्टिक बला कुर्सीपर बैसल रहथिन। काँख तर जाँतल प्लास्टिक फाइल रहनि। अंतर्राष्ट्रिय मैथिली सम्मेलन ओतऽ आयोजन छलै। कार्यक्रम होबऽसँ पहिनहि ओ उपस्थित छलाह। हमहूँ तहिना सकाले पहुँचि गेल छलहुँ। हम हुनका देखलियनि, मुदा नीक जकाँ परिचय नहि छल तँइ काते-कात ठाढ़ छलहुँ।

ओ किछु बजैत छलखिन। मैथिली शब्द, वाक्य आ भाषा विज्ञान संबंधी विषय-वस्तु ककरो बुझबैत छलखिन। हमरो मन-मस्तिषक हुनके शब्दपर टाङल छल। चीन्हजान नहि रहितो हुनक प्रभाव हमरापर बढ़ैत जा रहल छल। हमरो नहि रहल गेल। हम ससरि कऽ हुनका बगलमे ठाढ़ भऽ गेलहुँ। भाषा आ शब्द जे हुनका मूँहसँ निकलि रहल छलनि से गंभीर ओ भरिगर हमरा अनुभव भेल। हम रुचिपूर्वक हुनकर बात सूनऽ लगलहुँ।

अपन बात रखैत क्रममे ओ कहलखिन जे "लोक हमरा ब्राह्मण बुझैत अछि। छथि, अछि, केलखिन, बजलाह, चलि गेलाह, की कहबाक अछि, आदि-आदि शब्द जँ कोनो अनजान व्यक्ति सुनैत छथि तऽ हमरा 'बाभन छै की?' से प्रश्न कऽ दैत अछि। रामावतार यादव तऽ बाभन भाषापर जोर दैत छथिन। ओ तऽ बाभनकेँ समर्थ करै छथिन। ओ तऽ बाभन प्रभावित व्यक्ति छथि।" अपनेसँ ई बात ओ बजलखिन। तहन हम बुझि गेलहुँ जे इएह व्यक्ति डा. रामावतार यादव। हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। बहुत दिनसँ ई बात मोनमे घुरिआइत छल। बहुत दिनसँ डा. साहेबसँ भेंट करबाक नियार छल। कतऽ भेटताह, कोना भेटताह? एहि तरहक बात हमरा मोनमे बहुत दिनसँ खेलि रहल छल। हमरा मोनमे एकटा अलग प्रकारकेँ खुशीक तरङ्ग उठि बैसल। हिनकासँ किछु बात करबाक चाही आ किछु जिज्ञासा रखबाक चाही-एहि तरहक बात हमरा भीतर उत्पन्न भेल।

प्रो. डा. रामावतार यादव असाधारण व्यक्तिमेसँ एक छथि। अंग्रजीक विद्वान छथि। सुप्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक छथि। मैथिली भाषापर अनेक शोध-अनुसंधान केने छथि। भाषा की छै? कोन ठाम कोना बाजल जाइत छै? शब्द कोना लिखल जाए? शब्दक उच्चारण कोना कएल जाए? मैथिली कतऽ, कोन तरहे बाजल जाइत अछि? एहि सभ परिवर्तनक पाछा कारण की छै? एहि तरहक सभ विषयपर स्वयं लिखल पोथीमे चर्च केने छथिन।ब्राह्मण-कायस्थक भाषा एवं अन्य जातिक भाषामे फरक रहल जकर उल्लेख ओ केने छथिन। हुनका अनुसार भाषामे जगहक अनुसार फरक होइत छैक। बाजब फरक होइत छै। मुदा लीखलमे एकरूपता हेबाक चाही। अंग्रेजी, हिंदी, नेपाली वा अन्य भाषाक व्याकरण जकाँ मैथिलीक सेहो छै। मैथिली समृद्ध भाषा छै। शब्द- व्याकरण आन भाषासँ पैघ छै। नेपालीमे- उहाँ आइसक्नु भयो' आदरसूचक वाक्य जेना होइत छैक तहिना मैथिलीमे 'ओ आबि गेलाह' शुद्ध बाजल जेतै आ तहिना लिखल जेतै। ई नहि जे 'ऊ अलै', 'ऊ आबि गेलै' 'ऊ एलै', 'ऊ एलखिन' इत्यादि कनफ्यूजन बात बिल्कुल नहि हेबाक चाही। एहि तहक बात हुनका मूँहसँ बेर-बेर सुनबाक अवसर भेटल।

ओ स्पष्ट केलखिन- "भाषा ब्राह्मण वा अन्य ककरो खरीदल नै छै। सज्झा संपति छै। भाषोक जाति अनुसार बाँट-बखरा जे केयो करऽ चाहै छथि ओ नीक नहि छथि। ब्राह्मण समुदायमे मैथिलीक शुद्धता देखल गेल अछि। नीक बातकेँ अनुशरण करबाक चाही। जबरदस्ती हम इएह शब्द बाजब वा लिखब जे कियो कहै छथि, नीक नहि भेल। मैथिली शब्दकोश छै, व्याकरण छै, भाषाविज्ञानक शोधपत्र छै, काव्य, निबंध, नाटक, उपन्यास, कथा, इतिहास लगायत अनेक तरहक पोथी छै। हमरा लोकनिकेँ अध्य्यन करबाक चाही।"

ओ ईहो बातपर जोड़ देलखिन जे "मैथिली भाषी फुट-फुटि कऽ मगही-मगही अनाप-सनाप बात केनिहार नीक बात नै भेलकै। ई दुर्भाग्य जे एहि तरहक बात केओ करै छथि वा चेष्टा करै छथि। मैथिलीमे व्यक्ति पाछा आदरसूचक शब्द छै। जेना-

बाबू लेल-- बाबू आबि गेलाह / आउ
माय लेल-- माय आबि गेलीह /
समधि लेल-- समधि आबि गेलाह / आएल जाओ
जमाए लेल-- जमाय आबि गेलथि / आउ
बौआ लेल-- बौआ आबि गेलै / आउ

सभ के लेल एकहि तरहक शब्द-वाक्य नहि होइत छैक। सिखबाक प्रयास करी। नीक-नीके होइत छै। हमरा बाजब नहि भेल तऽ गोबर-माटि मिझरा देबै, से सोच जे केओ करै छथि से नीक नहि भेलै।  प्रो. डा. रामावतार यादवजीकेँ ताहि दिन हम नीक जकाँ चिन्हलियनि। मैथिली भाषाविज्ञानक ओ जननी छथि नेपालक परिप्रेक्षमे।

 

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