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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक संपादकीय संदेश

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(c)२००४-१०. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own scriptRoman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi   
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१. संपादकीय

किछु गप-सरक्का: कोना मुँपर हँसी राखी आ व्यक्तित्वक विकास करी (संगी-साथी, खास कऽ जे सभ विपणन क्षेत्रमे चाकरी करै छथि हुनकासँ होइत वार्तालापक आधारपर):

 

क्षणमे क्षणाक.. अहाँ कोनो एहन काज नै करू जे दोसराकेँ कैक बरख धरि प्रतारित करैत रहए।

सदिखन प्रतिभाक ताकिमे रहू। एहिमे जाति-धर्मकेँ स्थान नै दियौ।से अपन धंधामे होअए वा साहित्यमे।आ ओ प्रतिभाशाली व्यक्ति कतेक प्रतिभाशालीकेँ ताकि कऽ देत। जे जाति धर्मक आधारपर निम्न कोटिक प्रतिभाकेँ अहाँ आश्रय देबै तँ मोन राखू जे ओ अपने सन प्रतिभा अहाँकेँ ताकि कऽ देत। आ एहन हारल व्यक्तित्व अपन हारिक लेल सर्वदा अनका दोष देताह। सदिखन अभाव-भाषण, सदिखन गंभीर समस्यापर वितर्क अहाँक उत्साहकेँ मारत। एहिसँ समस्या बढ़बे करत। गंभीर समस्यापर वितर्क नीक गप छै, मुदा सदिखन नै।

 

क्रोध मनुक्खक सभसँ पैघ शत्रु थिक। क्रोधावस्थामे कोनो निर्णय नै लिअ, जे लेब तँ ओ निर्णय अहाँ लेल गेल खराप निर्णयमे सँ एक होएत।

 

अपन समस्या अपन माए, बेटी, सखा, महिला-सहकर्मी आकि पत्नीसँ अवश्य साझी करू। कारण खराप परिस्थितिमे महिला द्वारा उचित निर्णय लेबाक आ नीक सलाह देबाक अधिक सम्भावना रहैत अछि। कतबो झगड़ हुअए, वा कतबो समस्यामे रही, पत्नीक कोठलीसँ दोसर कोठलीमे सुतैले नै जाउ।

दोसर केहन छै तकर विवेचन छोड़ू, एहिपर ककरोसँ बहस नै करू। ई अहाँकेँ फुसियाहीक भ्रममे राखत।

 

नीक काज करबा काल कोनो तरहक एहन विचार नै आनू जे लोक की कहत। खराप काजक विरोध करबामे निर्दय बनू- खराप काजक प्रति जीरो टोलेरेन्स राखू।

 

कोनो बौस्तु अहाँकेँ सुविधा दैए तँ सएह आनन्द प्रदान कर..नै एहि भ्रममे नै रहू। असुविधाजनक आ कएक बरख धरि कएल कठिन काजक बाद जे आनन्द भेटै छै से सुविधापूर्वक कएल काजसँ भेटल आनन्दसँ कएक गुणा होइ छै।

 

दोसराक प्रति ईर्ष्या अहाँक आनन्दक क्षणकेँ घटाओत।

 

सभकेँ प्रशंसा सुनब नीक लगै छै आ ताहि लेल ओहि व्यक्तिक कएल नीक काज सभक विषयमे जानकारी राखू आ तखन प्रशंसा करू, मिथ्या प्रशंसा नै करू।

 

सर्वदा परिवर्तनक संग आगाँ बढ़बा लेल तत्पर रहू, मुदा सावधान! कोनो एहन परिवर्तन जे नैतिक होअए आ अहाँक विचारसँ मेल नै काए, तकर विरोध करू।

 

अपन समालोचकक संग कहियो नै छोड़ू, वएह अहाँक कठिन बाटक असल संगी सिद्ध होएताह।

 

अपनापर सर्वदा नियंत्रण राखू।

 

नकारात्मक विचार अहाँकेँ दुखी करत।

 

पाइकेँ सफलताक आधार मानैबलाक संख्या कम छै, आ से नै छै तँ होएबाक्ल चाही।

 

कोनो काज करै काल सर्वदा ओकरा सर्वोत्कृष्ट बनेबाक प्रयास करू, अधिकांश कार्यमे मुदा एकर उनटा भेटत। लोक काजकेँ उत्कृष्ट बनेबाक बदला संपूर्ण बनेबाक प्रयास करै छथि, जेना- ईहो रहबाक चाही, ई छुटि गेल। काज सर्वोत्कृष्ट बनेबाक माने भेल ओ काज जे कल्याणकारी होअए।

 

कोनो व्यक्ति आकि काजक लेल भारी आशा राखू, काजसँ- विभिन्न नव-नव काजसँ लोककेँ लादि दियौ; काजमे नव मेथोडोलोजी जोड़ू, वएह काज उत्कृष्ट भऽ जाएत। कोनो समस्या आबए तँ घबड़ाउ नै, गहिंकी नजरि ओहि समस्यापर दौगाबू जे कोन नव काज ई अहाँकेँ देमएबला अछि।

 

सत्य बाजू, एहिसँ अहाँक मस्तिष्कपर कम भार रहत। कोन गप ककरासँ बाजल रही से मोन नै राखऽ पड़त।

 

सृजनक सुख:कला, साहित्य, कृषि-औद्योगिक उत्पादन आकि नव शिशुक जन्म, एहि सभमे सृजनक सुख भेटै छै। कृषक बीआ बाउग करै छथि आ बीआकेँ उचित समएपर रोपै छथि। फसिलक सेवा करै छथि आ फल पबै छथि।साहित्य, संगीत आ कलामे सेहो लोक कतेको अद्भुत वस्त् बनबै छथि, रचै छथि।संगीत सीखि कऽ ओकरा गेबाक/ बजेबाक आनन्द टेप रेकॉर्डरमे सुनबाक आनन्दसँ फराक होइत अछि। साहित्यक कोनो कृतिक सृजनक बाद सृजनात्मक सुखक अनुभव साहित्यकार करै छथि आ ई ओहेन होइत अछि, जेना बच्चाक जन्मक बाद माताक मुँहपर देखबामे अबैत अछि। मुदा आइ-काल्हि एहनो साहित्यकार सभक प्रवेश साहित्यमे भऽ गेल अछि जे अनकर रचना, से गद्य हुअए वा पद्य, तकर पुनर्लेखन (गद्यक गद्यमे वा कखनो काल पद्यमे सेहो) अपना नामसँ कऽ लैत छथि। गलौसीसँ आ मारि तरहक केफा कऽ, दुर्व्यवहार कऽ पाठकविहीन मैथिली साहित्य जगतमे निर्लज्जतासँ अपन एहि कृत्यसँ दोसर साहित्यकारकेँ हतोत्साहित करै छथि। हिनका सभक द्वारे किछु गोटे मैथिली साहित्य छोड़ि कऽ चलियो जाइत छथि, जकर छद्म-चोर साहित्यकार द्वारा पतनुकान दिअएबाक संज्ञा देल जाइत अछि। मैथिलीसँ ककरो जोड़ब नीक आकि पतनुकान दिआएब नीक? रचना पत्रिकाक एहने एकटा अतिथि सम्पादकबहुत रास रचना साहित्यकार सभसँ मँगबा कऽ गीड़ि गेलाह। हमरो लग हुनकर चिट्ठी आएल आ हम रचना पठा देलियन्हि, मैथिलीक नामपर। मुदा आब हुनकर किरदानी देखू। फुकियामाक इतिहासक अन्तक हमर व्याख्या ओ की बुझलन्हि आ तकरा अपन कवितामे चोरा लेलन्हि। फुकियामा रूसक कम्यूनिज्मक अन्तक विषएमे कहने छथि जे सभ्यताक इतिहास दू विचारक द्वन्द्वक इतिहास अछि। अमेरिकाक कैपिटलिज्म आ रूसक कम्यूनिज्मक बीचक द्वन्द्व रूसक कम्यूनिज्मक अन्तक बाद खतम भऽ गेल से एकमात्र सत्ता अमेरिका बचल- यूनीपोलर वर्ल्ड। आ ताहि सन्दर्भमे इतिहास खतम भऽ गेल। मुदा बादमे फुकियामा देखलन्हि जे एक्के विचारधाराक भीतर सेहो कएक तरहक विषमता जन्म लेने अछि- हैव आ हैव नॉट्सक बीचक द्वन्द्व अछिये, से ओ फेर अपन गपमे सुधार करैत कहलन्हि जे इतिहास जारी रहत।तहिना भगवानक मृत्युक सम्बन्धमे स्टीफन हॉकिन्सक विचार पूर्ण वैज्ञानिक आ मौलिक छन्हि। हुनकर कहब छन्हि जे कंट्रैक्शन आ एक्सपैनशन दुनू सिद्धान्त एहि विश्वक निर्माणक अलग-अलग सिद्धान्त अछि। मुदा जँ एकरापर एकर कोनो भगवान रूपी आरम्भकर्ताक नियन्त्रण नै छै तखन ओकर आयु भने बेसी होअए मुदा ओकरो मृत्यु एहि सिद्धान्तक अन्तर्गत होएत। मुदा अतिथि सम्पादक दोसराक रचना जे चोरेताह तँ काँट-छाँट करताह आ तखन अर्थक अनर्थ तँ होएबे करत- इतिहासक अन्तसँ सभ्यताक अन्त बुझताह आ भगवानक मृत्युसँ नहि जानि की?

बिना अध्ययनक, दोसराक मेहनति अपन नाम करबाक प्रवृत्तिसँ स्वास्थ्यक दुष्परिणाम सेहो सोझाँ अबै छै। लोक डराएल सन रहैत अछि जे चोरि ने पकड़ा जाए। आ ताहि डरसँ निन्नमे कमी अबै छै- ओना ई निन्नक कमीक कैकटा मे सँ एक कारण अछि- आ कम्मे उमेरमे निन्नक गोलीक सेवन बिना डाक्टरी सलाह लेबाले बाध्य होमए पड़ै छै।अंग्रेजी आ आन भाषासँ अनुवाद कऽ अपना नामे मैथिलीमे रचना छपबाबैक क्रममे अंग्रेजी-हिन्दी कोषसँ निकालल शब्द कखनो काल हास्यास्पद परिणाम सेहो दैत अछि- कोल्;ड ब्लडक एनिमल लेल नृशंस जानवरक अनुवाद तखन तँ भेटबे करत! गद्यक पद्य बनल रूप देखार भऽ जाइत अछि।पोएट्री डॉट कॉम, अमेरिकन पोएट्री डॉट कॉम पद्य आ ढेर रास अन्त साइट व्गद्य उपलब्ध करबैत अछि। मुदा धन्य अछि गूगलक शक्तिशाली सर्च इंजिन जे एहन चोर सभ पकड़ा जाइत छथि।

मेहनतिक कोनो विकल्प नै। अहाँ दू घंटा प्रतिदिन वा प्रति सप्ताह मैथिली लेल समए निकालू, नै तँ सुच्चा साहित्य सेवी सभकेँ गरियाबू, नै अपने काज करू आ ने करए दियौ, आ नाम कमाउ! विकल्प सभक सोझाँ अछि। मेहनतिक कोनो विकल्प नै।

मुदा आब मैथिलीसँ हिन्दीमे चोरि होएत आ तकरा लेल की करब? मैथिली प्रेमी जे हिन्दी साहित्यमे पेशागत वा अन्य कारणवश रुचि रखै छथि, सँ सादर अनुरोध जे एहि तरहक कोनो घटना हुनका नजरिमे अबन्हि तँ ggajendra@videha.com पर सूचित करथि।

 

विदेहक लघुकथा विशेषांक: विदेहक हाइकू आ गजल विशेषांक प्रकाशित भेल छल आ तकर बाद आब विदेहक ६७म अंक ०१ अक्टूबर २०१० लघुकथा विशेषांक होएत। विदेहक लघुकथा विशेषांक अतिथि सम्पादक छथि मुन्नाजी। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित लघुकथा सम्बन्धी आलेख आ लघुकथा सभ (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे २९ सितम्बर धरि पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि।

 

साहित्य अकादेमीक फेलोशिप अमरजी केँ:

२४ भाषाक साहित्य/ विद्वता/ दर्शनक “अमर साहित्य” लेल देल जाइत अछि। देशक एहि सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कारक स्थापना १९६८ मे कएल गेल छल आ ओहि वर्ष ई सर्वपल्ली राधाकृष्णन, दार्शनिककेँ देल गेल छल। साहित्य अकादेमीक मानद फेलोशिप गएर भारतीयकेँ भारतीय साहित्यमे उल्लेखनीय योगदान लेल सेहो देल जाइत अछि। एक समएमे २१ सँ बेशी गोटे लग ई फेलोशिप नै रहैत अछि। २०१० मे मैथिली साहित्य लेल ई फेलोशिप चन्द्रनाथ मिश्र “अमर”केँ देल गेल छन्हि। पहिने यात्रीजीकेँ ई फेलोशिप १९९४ ई. मे भेटल छन्हि।

चन्द्रनाथ मिश्र अमर 1925-

जन्म: खोजपुर, मधुबनी । वरिष्ठ कवि, कथाकार-उपन्यासकार । हास्य-व्यंग्यक कवितामे बेजोड़। मैथिलीक लेल समर्पित व्यक्तित्व । पांच दर्जनसं बेसी कथा आ विदागरी, वीरकन्या (उपन्यास) जल समाधि (कथा संग्रह) प्रकाशित ।१९८३- चन्द्रनाथ मिश्रअमर (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ सम्मानित। एम. एल. एकेडमी, लहेरिरियासरायसं शिक्षकक रूपमे अवकाश प्राप्त। आशा दिशा, गुदगुदी, युगचक्र, उनटा पाल आदि कविता संग्रह प्रकाशित। १९९८- चन्द्रनाथ मिश्रअमर (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला) लेल साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार।

 

नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्री) १९११-१९९८, हिन्दी आ मैथिली कवि। १९९४ ई.मे हिनका साहित्य अकादमीक फेलो नियुक्त कएल गेल।

साहित्य अकादेमीक भाषा सम्मान

डॉ. शशिनाथ झा 1954-केँ साहित्य अकादमीक भाषा सम्मान 2007 मे क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल देल गेल छलन्हि। साहित्य अकादमीक भाषा सम्मान क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्यक अतिरिक्त गएर मान्यताप्राप्त भाषा सभ लेल सेहो देल जाइत अछि।

डॉ. शशिनाथ झा 1954- , गाम-दीप, जिला- मधुबनी। मैथिली, बांग्ला, नेवारी आ देवनागरी पांडुलिपिक विशेषज्ञ।

साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार २०१०

तारानन्द वियोगीकेँ "मैथिली बाल साहित्य लेल पहिल साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०१०",  "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल देल जा रहल अछि। "ई भेटल तँ की भेटल"  मैथिली लोक रंग (मैलोरंग), दिल्ली द्वारा २००८ ई. मे प्रकाशित कएल गेल अछि।  ई पुरस्कार १४ नवम्बर २०१० केँ बाल दिवसक अवसरपर देल जाएत। एहिमे ५१ हजार टाका देल जाएत। तारानन्द वियोगीजीकेँ बधाइ।

पोथी- "ई भेटल तँ की भेटल"

पृष्ठ संख्या: ३२
दाम: पन्द्रह टाका मात्र
ISBN NO.978-81-904941-2-0
पहिल संस्करण: २००८ ई.
प्रकाशक- मैलोरंग, दिल्ली।

तारानन्द वियोगी 1966-

जन्म १५ जनवरी १९६६, बदरिकाश्रम, महिषी, सहरसामे ।पहिल पोथी अपन युद्धक साक्ष्य (गजल संग्रह) १९९१ मे प्रकाशित। अन्य पुस्तक हस्तक्षेप (कविता-संग्रह), अतिक्रमण (कथा-संग्रह), शिलालेख(लघुकथा संग्रह), कर्मधारय, ई भेटल तँ की भेटल। राजकमल चौधरीक कथाकृति एकटा चंपाकली एकटा विषधर संकलन-संपादन।

 

साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार (मैथिली)
 

१९९४- नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्री १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि।
२०१०-
चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- )-
मैथिली साहित्य लेल।


साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल )

२००७- डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल मध्यकालीन साहित्य लेल।)

 

साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली


 

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)

१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)

१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)

१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)

१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)

१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)

१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)

१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)

१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)

१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)

१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)

१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)

१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)

१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)

१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)

१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)

१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)

१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)

१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)

१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)

१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)

१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)

१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)

१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)

१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)

१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)

१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)

१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह)

१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)

१९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य)

१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)

२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)

२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)

२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)

२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)

२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)

२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)

२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)

२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा

२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा)

२००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह)


 

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार


 

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)

१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)

१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)

१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)

१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)

१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)

१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)

१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)

२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)

२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)

२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)

२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)

२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)

२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)

२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)

२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)

२००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)

२००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी)

साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार
 

२०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल


 

प्रबोध सम्मान


 

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )

प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )

प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )

प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )

प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )

प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )

प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- )


 
यात्री-चेतना पुरस्कार


 २००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा;

२००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा;

२००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया;

२००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा;

२००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना;

२००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी;

२००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी;

२००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी;

२००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी

२००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा


 
कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान

 

२००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झाकेँ कविता संग्रह “एना त नहि जे”

२००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”केँ नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश

विशेष: विदेह आर्काइवक आधारपर बाल चित्रकथा आ कॉमिक्स महिला वर्गमे विशेष लोकप्रिय भेल अछि। महिलावर्ग द्वारा कीनब ओहि पोथीक बच्चा सभक हाथमे जएबाक सूचक अछि। हमरा सभक सफलता अहीमे अछि जे ई बाल-साहित्य “टारगेट ऑडियेन्स” लग पहुँचल अछि।

ई सभ पोथी आ विदेह आर्काइवक आधारपर प्रकाशित आन मैथिली पोथी एहि सभ ठाम उपलब्ध अछि:

पटना: .श्री शिव कुमार ठाकुर: ०९३३४३११४५६

.श्री शरदिन्दु चौधरी: ०९३३४१०२३०५

राँची: श्री सियाराम झा सरस: ०९९३१३४६३३४

भागलपुर: श्री केष्कर ठाकुर: ०९४३०४५७२०४

जमशेदपुर: १.श्री शिव कुमार झा: ०९२०४०५८४०३

२.श्री अशोक अविचल: ०९००६०५६३२४

कोलकाता: श्री रामलोचन ठाकुर: ०९४३३३०३७१६

सहरसा: श्री आशीष झा: ०९८३५४७८८५८

दरभंगा: श्री भीमनाथ झा: ०९४३०८२७९३६

समस्तीपुर: श्री रमाकान्त राय रमा: ०९४३०४४१७०६

सुपौल:श्री आशीष चमन:०७६५४३४४२२७

झंझारपुर: श्री आनन्द कुमार झा: ०९९३९०४१८८१

निर्मली: श्री उमेश मंडल: ०९९३१६५४७४२

जनकपुर: श्री राजेन्द्र कुशवाहा: ००९७७४१५२१७३७

जयनगर: श्री कमलकान्त झा: ०९९३४०९८८४४

दिल्ली: .श्रीमती प्रीति ठाकुर: ०९९११३८२०७८

.श्री मुकेश कर्ण: ०९०१५४५३६३७

मधुबनी: .श्री सतीश चन्द्र झा:०९७०८७१५५३०

.मिश्रा मैगजीन सेन्टर (प्रो. श्री अमरेन्द्र कुमार मिश्र), शंकर चौक, मधुबनी ०९७०९४०३१८८

किछु आर स्थल शीघ्र...


(विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ एखन धरि १०५ देशक १,४८६ ठामसँ ४७,८४८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी. सँ २,५,८५६ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा।)

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com

 

 

 

 

२. संदेश-

[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]

१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।

२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।

३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।

४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।  

५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन  भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी।

६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।

७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।

८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।

१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। विदेह निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।

१५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।

१६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधा। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे।  मुदा अहाँ सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण-  श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)...   अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग।

१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।

१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।

१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।

२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भसकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।

२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।

२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।

२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई। 

२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।

२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधन जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर)

२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।

२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।

२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।

२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।

३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।

३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।

३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।

३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र प्रेम- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।

३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।

३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।

३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।

३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।

३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।

३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।

४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।

४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।

४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।

४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।

४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।

४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।

४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।

४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।

४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।

४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।

५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।

५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।

५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।

५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।

५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल।

५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।

५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।

५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।

५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।

५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।

६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।

६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।

६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।

६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।

६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।

६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।

६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।

६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।

६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।

६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।

७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)

.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि।

७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि।

७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे  समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँ जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि।

७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना।

७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि।

७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि।

७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक काज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि।

७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल।

कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर 

गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७

Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:

Language:Maithili

(Details for purchase available at print-version publishers's site http://www.shruti-publication.com  or you may write to shruti.publication@shruti-publication.com )