प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर/ विदेह ई-लर्निङ्ग
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१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.विदेह ई-लर्निङ्ग

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय

वैय्याकरणाचार्य, शब्द प्रमाण (न्याय): ज्ञान आ तत्त्व मीमांसा: भाषाविद् रामावतार यादव

वैय्याकरणाचार्य लोकनिक मत अछि जे शब्द-ब्रह्मण बा स्फोट अन्तिम सत्य अछि आ ऐ विश्वक निर्माणक कारण सेहो शब्द-ब्रह्मण अछि। शब्द-ब्रह्मणक ने कोनो आदि अछि ने अन्त, ई सभ ठाम उपस्थित अछि, ई कोनो काज करबामे स्वयं सक्षम अछि आ सभ घटनाक ई द्रष्टा अछि। आत्मा जखन अपनाकेँ ऐ शब्द ब्राह्मणसँ एकीकृत भेनाइ बुझि जाइए, मुक्त भऽ जाइए।

शब्द-ब्रह्मण अछि ध्वनि सिद्धान्त, जे शब्द आ वस्तु दू भागमे बँटि गेल, मुदा दुनू भाग एक दोसराक समानान्तर। शब्द चारि भागमे बँटि गेल, () परा () पश्यन्ति, () मध्यमा आ () वैखारी। परा स्थितिमे शति आ शक्तिमानमे पूर्ण तादात्म्य अछि। पश्यन्तिमे काल जुड़ि गेल आ ई सभ शब्द आ वस्तुक स्रोत अछि। पश्यन्ति अछि प्रणव () जकरा प्रतिभा सेहो कहै छिऐ, पश्यन्ति सभ शब्द स्रोत अछि आ प्रतिभा सभ अर्थक; मुदा पश्यन्ति आ प्रतिभा एक्के अछि, मात्र तर्क लेल फराक अछि। मध्यमा स्तरपर शब्द आ वस्तुक अन्तर चिन्हल जाइत अछि, आ शब्दक क्रम देखबामे अबैत अछि, मुदा अखनो ध्वनि मस्तिष्क धरि सीमित अछि। वैखारी स्तरपर शब्द वस्तुक बोध करबैत अछि आ कण्ठ, दाँत, मूर्धा, जिह्वा आदिसँ चिन्हित होइत अछि आ बहराइत अछि। प्रारम्भमे शब्द ब्रह्म रहैत अछि सत्, जइमे चित, आनन्द, ज्ञान, इच्छा, क्रिया सभ अछि, स्वातंत्र्य शक्ति आ काल सेहो अछि। फेर सत अपनाकेँ काल केर मदति सँ विभाजित करऽ चाहैए आ चित आ आनन्द अलगसँ अबैए, फेर चित् सँ ज्ञान आ आनन्दसँ इच्छा बहराइए। आ सत् बनि जाइए पश्यन्ति, छअ विधिसँ; सत्, चित, आनन्द, ज्ञान, इच्छा आ क्रियासँ। पश्यन्ति स्थितिमे शब्द आ वस्तु बड्ड महीन रहैए, आ एक दोसरामे मिज्झर रहैए। मध्यमामे शब्द आ वस्तु अलग-अलग देखार होइए, मुदा उत्पन्न अखनो नै होइए। मुदा वैखारी मे शब्द आ वस्तु दू अलग-अलग धारामे उत्पन्न होइए।

भाषाक सभसँ छोट भाग कोन अछि? वर्ण, पद (शब्द) बा वाक्य? मीमांसक वर्णकेँ, नैय्यायिक पद केँ आ वैय्याकरणाचार्य वाक्य केँ भाषाक इकाई मानै छथि।

गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ, सादृश्य) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्दसँ अनुभव प्राप्त होइए। गंगेश उपमानकेँ न्यायशास्त्रमे एकटा समुचित स्थान दियेलन्हि, शब्दार्थ तकबाक विधिक रूपमे। 

आ अही भाषाकेँ बान्हबाक प्रयास भेल, व्याकरण द्वारा। मीमांसक कहै छथि जे शब्द आ ओकर अर्थक संग सम्बन्ध आदि-अनन्त कालसँ अछि, ई बहरायल नै अछि आ तटस्थ अछि। प्रारम्भिक मीमांसक ईश्वरमे विश्वास नै करै छला मुदा वेदमे विश्वास करै छला। बौद्ध भाषाकेँ, वेदक भाषाकेँ सेहो, मानवीय काल्पनिक रचना, विकल्प, मानैत छथि। जाक डेरीडा बौद्ध आ मीमांसकक बीच सेतु बनै छथि। ओ भाषाक प्रारम्भ लेखन कलामे मानैत छथि मुदा तइसँ ओ नागार्जुनसँ दूर आ भर्तृहरिक व्याकरण विचारसँ लग आबि जाइ छथि। ओना डेरीडा बौद्ध सन भाषाकेँ आदर्शवादी बनेबाक विरुद्ध छथि, आ विषयनिष्ठताक पक्षधर छथि।

 

पारम्परिक व्याकरण आ आधुनिक भाषाविज्ञानक बीच तुलनात्मक अध्ययनजियान ली आ किंग मिंग ली [मानविकी आ विदेशी भाषा संकाय, शियान प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, शान्सी शियान, चीन] [शिक्षा, प्रबंधन, वाणिज्य आ समाज पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ईएमसीएस २०१५) पृ. २८७-२९१]

पारम्परिक व्याकरण

सबसँ प्राचीन व्याकरणक रूपमे, पारम्परिक व्याकरणक उत्पत्ति १५म शताब्दी ईसा पूर्वमे भेल छल, जाहिमे यूनानमे प्लेटो आ अरस्तू आ भारतमे पाणिनी नामक संस्कृत विद्वान छलाह। विभिन्न रोमन आ प्रारम्भिक ईसाई युगक लेखक लोकनि सेहो पारम्परिक व्याकरणमे योगदान देलनि, मुदा पारम्परिक व्याकरणकार सभ १८म शताब्दीमे सबसँ प्रभावशाली रूपेँ लिखब प्रारम्भ कयलनि, समयक जखन अङ्ग्रेजीकेँ एकटा अलग भाषाक रूपमे गम्भीरतासँ लेल जाय लागल छल, ने कि मात्र एकटा आन स्थानीय भाषाक सन। पारम्परिक व्याकरणक विशेषताकेँ एना चित्रित कयल जा सकैत अछि। पहिल, व्याकरणक एकटा मुख्य विशेषता ई अछि जे सामान्यतः अर्थ पर आधारित अछि। पारम्परिक व्याकरणक अनुसार, वाक्य शब्दक एकटा समूह अछि जे पूर्ण विचारकेँ व्यक्त करैत अछि। पारम्परिक व्याकरण प्रायः एकर अर्थ अर्थ सँ रूप धरि विश्लेषण करैत अछिअ। भाषा शिक्षणक दृष्टिकोणसँ पारम्परिक व्याकरण भाषाई घटनाक व्यवस्थित वर्णन नहि दैत अछि। ई प्रायः सतह स्तर पर वर्णन दैत छैक आ प्रायः कोनो वाक्यक विश्लेषण अलग-थलग करैत छैक ने कि प्रवचन स्तर पर । आ कखनो-कखनो ई बिना वर्णन स्तरक सेहो होइत छैक, तेँ ई शिक्षककेँ ओ भाषाक संतोषजनक विवरण नहि दैत छैक जे ओ पढ़ा रहल छथि, आ छात्रकेँ ओहि भाषाक पर्याप्त विवरण नहि दैत छैक जकरा ओकरा सिखबाक आवश्यकता छैक। पारम्परिक व्याकरण सामान्यतः मौखिक भाषापर विचार आ अध्ययन कयने बिना लिखित भाषाक वर्णन करैत अछि। आ संगहि, ई लिखित केँ मौखिक रूपसँ भ्रमित करैत अछि, मुदा जेना कि हम जनैत छी, मौखिक भाषाक प्रणाली लिखित भाषासँ किछु हद धरि भिन्न अछि। तेँ पारम्परिक व्याकरण छात्र सभकेँ मौखिक संचारक तंत्र प्राप्त नहि कऽ सकैत अछि। आ पारम्परिक व्याकरण आकृति विज्ञान आ वाक्यविन्यासकेँ एकटा प्रमुख स्थान दैत अछि, पारम्परिक व्याकरणमे लेक्सिस आ ध्वनिविज्ञानक उपचार बहुधा अपर्याप्त होइत अछि। एकर नुकसानक बावजूद, पारम्परिक व्याकरण भाषा शिक्षण, विद्यालय व्याकरणक लेल बहुत मूल्यवान अछि, आ बहुत रास लोक एखनो मानैत छथि जे जे ई एकटा कार्यात्मक, सुरुचिपूर्ण, समय-सम्मानित तरीका अछि जे लोकसभकेँ भाषाक विषयमे की जानबाक चाही से सिखाबैत अछि|

आधुनिक भाषाविज्ञान

आधुनिक भाषाविज्ञानक आरम्भ स्विस भाषाविद् फर्डिनेल डी सॉसर (१८५७-१९१३) सँ भेल छल, जिनका प्रायः 'आधुनिक भाषाविज्ञानक जनक' 'एकटा एहन अनुशासनक निपुण' कहल जाइत अछि, जकरा 'आधुनिक' बनाओल जाय (कुलर १९७६:७)। आधुनिक भाषाविज्ञान भाषाई अध्ययनक विज्ञान अछि। आधुनिक भाषाविज्ञानक अनुसार, भाषा एकटा प्रणाली अछि आ व्याकरणकेँ कोनो निश्चित भाषाक व्यवस्थित वर्णनक रूपमे मानल जाइत अछि, चाहे ओ लिखित वा मौखिक हो। व्याकरण वितरण मानदंडक अनुसार सतह संरचना तत्वसभक वितरणात्मक विश्लेषणकेँ सेहो संदर्भित करैत अछि। संगहि, आधुनिक व्याकरणमे ध्वन्यात्मक, ध्वन्यात्मक आ शब्दार्थ घटककेँ सेहो ध्यान राखल जाइत अछि। सामान्यतः आधुनिक व्याकरणक मूल्यांकन वर्तमानमे प्रयोज्यता, सरलता, पूर्णता, स्पष्टता, आ विरोधाभासक अभावक आधार पर कयल जाइत अछि। आधुनिक व्याकरण वर्णनात्मक व्याकरण, संरचना व्याकरण, कार्यात्मक व्याकरण, परिवर्तनकारी-जननात्मक व्याकरण (प्रकरण व्याकरण) आ बहुत रास अन्य व्याकरणसँ प्रारम्भ होइत अछि।

वर्णनात्मक व्याकरण: वर्णनात्मक व्याकरण वर्णन करैत अछि जे कोनो भाषा वास्तवमे कोना बाजल आ लिखल जाइत अछि आ ई वर्णन नहि करैत अछि जे कोनो भाषाकेँ कोना बाजल वा लिखल जाय। वर्णनात्मक व्याकरणक अनुसार, एहिमे कहल गेल अछि जे भाषण भाषाक मूल रूप अछि, आ बाजल आ लिखित भाषामे अन्तर अछि। फ्राइज़ एकटा प्रतिष्ठित व्याकरणविद छथि, हुनक कृति 'अमेरिकन इंग्लिश ग्रामर' एकटा प्रसिद्ध कृति अछि। हुनक अनुसार, सभ शब्दकेँ दू भागमे वर्गीकृत कयल गेल अछि: विषयवस्तु शब्द आ कार्यात्मक शब्द, पारम्परिक व्याकरणक जकाँ वाणीक दस अलग-अलग भाग नहि। विषयवस्तु शब्द ओहि शब्दकेँ सन्दर्भित करैत अछि जकर विभक्ति होइत अछि आ जकर शाब्दिक अर्थ होइत अछि, जेना संज्ञा, क्रिया, विशेषण आदि। कार्यात्मक शब्द ओ शब्द छैक जे संरचना, निर्धारित, अधीनस्थ संयोजन, सहायक आ जोरदार शब्द तैयार करबामे महत्वपूर्ण भूमिका निभाबैत छैक।

संरचनात्मक व्याकरण: संरचनात्मक व्याकरण पारम्परिक व्याकरणसँ एकदम भिन्न अछि। एकर बदला जँ व्यक्तिगत शब्द आ ओकर काल्पनिक अर्थ या वाक्यमे एकर वाणीक अंश कार्य पर ध्यान केन्द्रित कयल जाय तँ संरचनात्मक व्याकरण संरचनाक समूह - ध्वनि, रूप, शब्द समूह, वाक्यांश - छोट सँ पैघ इकाइ धरि काज करय पर केन्द्रित अछि। संरचनात्मक व्याकरण शब्दार्थ अर्थकेँ सेहो देखैत अछि (यद्यपि एकर किछु पूर्ववर्ती अधिवक्तालोकनि एकर अनदेखी करबाक प्रयास कयलनि), मुदा ई शब्दार्थ अर्थपर वाक्यविन्यास पर जोर दैत अछि। अर्थात्, संरचनात्मक व्याकरण वाक्यविन्यास पैटर्न द्वारा कल गेल अर्थक विश्लेषण करैत छैक जे मॉर्फीम आ शब्द एक दोसरक संग बनबैत छैक, पैटर्न जेना बहुवचन रूप, संशोधक-क्रिया या संशोधक-विशेषण कनेक्शन, विषय-विधेय कनेक्शन आदिसँ बनैत छैक।

आकृति विज्ञान आ वाक्यविन्यास पर सामान्य जोरक अतिरिक्त, संरचनात्मक व्याकरण तीन विशेष रूपसँ उपयोगी विश्लेषणात्मक तकनीक विकसित कयलक: परीक्षण फ्रेम, तत्काल घटक विश्लेषण, आ वाक्य सूत्र। टेस्ट फ्रेम विशेष रूपसँ स्कूलसभमे व्याकरण पढ़ाबैमे सहायक रहल अछि।

संरचनात्मक व्याकरणक नोकसान निम्नानुसार अछि:-

ई भाषाक व्याकरणिक प्रणालीक अपूर्ण वर्णन प्रस्तुत करैत अछि, आ व्याकरणात्मकताक अनंत श्रृंखलाक निर्माणक लेल आवश्यक नियम प्रदान नहि करैत अछि।

ई रूपात्मक आ रूप-ध्वन्यात्मक नियमसभकेँ अत्यधिक भार दैत अछि, मुदा शब्दार्थ सम्बन्धपर कनेक ध्यान देल गेल, जेना पारम्परिक व्याकरणमे अछि।

ई वाक्यक सतहक संरचना आ कतेको गहींर सामान्यीकरणक गलत निर्माणक वर्णन करैत अछि।

संरचनात्मक व्याकरण वाक्यक व्याकरणिकता आ व्याकरणात्मकताक डिग्री निर्धारित करबाक लेल एकटा मानदण्ड दैत अछि। आ ई स्पष्ट समझ आ सही उपयोगक गारंटी देबाक लेल पर्याप्त स्पष्टीकरण नहि दैत अछि। एहिसँ शिक्षार्थी त्रुटि कऽ सकैत छथि।

एहिमे अर्थक उपचारकेँ शामिल नहि कयल गेल अछि, मुदा यदि अर्थकेँ ध्यान मे नहि राखल जायत तँ कोनो व्याकरणिक विश्लेषणक कोनो उपयोग नहि होयत।

ई आओर दूटा महत्वपूर्ण क्षेत्रक लेल संतोषजनक आधार प्रदान नहि करैत अछि: रचनात्मक विश्लेषण आ व्यावहारिक भाषाविज्ञानमे अनुवाद।

परिवर्तनकारी-जननात्मक व्याकरण Transformational-generative Grammar: परिवर्तनकारी-जननात्मक व्याकरण, टीजी व्याकरण, नॉर्मन, चोम्स्की द्वारा विकसित कयल गेल अछि। ई १९५७ मे प्रकट भेल जखन भाषाविज्ञानमे एकटा क्रांति भेल। किछु भाषाविज्ञानक अनुसार, टीजी व्याकरण [Transformational-generative Grammar] पारम्परिक व्याकरण आ संरचनात्मक व्याकरणक योगदानक संश्लेषण अछि। जतय धरि संरचनात्मक व्याकरणक सवाल अछि, चोम्स्की अपन व्याकरणक पहिल चरणक रूपमे आईसीए (तत्काल घटक विश्लेषण)क पुनर्निर्माण कयलनि, मुदा ओ बहुत आगू बढ़लाह आ अपन कतेको चरणसँ गुजरल औपचारिकतामे सटीकताक माँगकेँ पूरा कयलनि जेना- शास्त्रीय सिद्धांत, मानक सिद्धांत, विस्तारित सिद्धांत, आ संशोधित विस्तारित सिद्धांत।

पहिल चरण- प्रतिनिधि कृति, 'वाक्यात्मक संरचना'[Syntactic Structure], ई संदर्भ मुक्त संरचना द्वारा उत्पादित वाक्यसभक अनंत समूहसँ सम्बन्धित अछि। मूल परिवर्तनकारी नियम बनबैत अछिए। दोसर चरण- प्रतिनिधि कृति 'वाक्यविन्यासक सिद्धांतक पहलू'[Aspects of the Theory of Syntax ] क सङ्ग, मूल वाक्यविन्यास सिद्धान्तकेँ व्याकरणक एकटा सामान्य सिद्धांत धरि विस्तारित कयल गेल अछि जाहिमे स्वरविज्ञान आ शब्दार्थ सम्मिलित अछि। वाक्यविन्यासक आधार गहींर संरचना छैक, आ सतह संरचना घटना, जेना स्वर, शब्द क्रम आ विषय-छंद। विस्तारित सिद्धांतक चरणमे, ध्यान व्यक्तिगत व्याकरणसँ सार्वभौमिक व्याकरणमे परिवर्तित भऽ गेल अछि। एहि चरणमे, सभ परिवर्तनकारी नियमकेँ मात्र एकटा नियममे घटा देल जाइत छैक। संगहि एहि चरणमे, बाधाक सार्वभौमिक सूत्रीकरण विकसित कयल जाइत अछि। अतः टीजी व्याकरणक लाभ ई अछि : पहिल, ई वास्तवमे वाक्यविन्यास स्वरविज्ञान, शब्दकोश आ शब्दार्थकेँ जोड़ैत अछि। तेँ ई प्रणाली भाषाक समग्र अवधारणा दैत अछि। आओर ई तंत्र कोनो आन व्याकरणिक मॉडलक तुलनामे बेसी सटीक आ बेसी पूर्ण अछि। दोसर, टीजी व्याकरण भाषाक बेसी किफायती आ व्यवस्थित वर्णन दैत छैक, ई नियमक एकटा प्रणाली प्रदान करैत छैक जे अनंत संख्यामे व्याकरणिक वाक्यक निर्माणक अनुमति दैत छैक। पारम्परिक व्याकरणक विपरीत, टीजी व्याकरणमे कहल गेल नियम बहुत स्पष्ट आ औपचारिक रूपसँ स्पष्ट अछि। तेसर, टीजी व्याकरण हमरा सभकेँ बहुत स्पष्ट रूपसँ देखबैत अछि जे ई एकटा पैघ सामान्यीकरण शक्तिकेँ संसाधित करैत अछि। ई अन्तर्निहित संरचना आ नियमितताकेँ सेहो स्पष्ट करबामे सक्षम अछि, जकरा पारम्परिक व्याकरण आ संरचनात्मक व्याकरणक व्याकरणविद अनदेखी कयलनि अछि। चारिम, टीजी व्याकरण गहींर संरचनाक स्तर पर भाषाक बीच भाषाई सार्वभौमिकता आ विश्लेषणक अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत अछि। जतय धरि भाषा सार्वभौमिक बात अछि, पारम्परिक व्याकरण भाषा सार्वभौमिकक अस्तित्वकेँ स्वीकार करैत अछि, मुदा संरचनात्मक व्याकरण एहि दृष्टिकोणक समर्थन करैत अछि। संरचनात्मक व्याकरणक अनुसार, प्रत्येक भाषा एकटा व्यक्तिगत संरचना प्रस्तुत करैत अछि। मुदा टीजी व्याकरण स्वीकार करैत अछि जे सभ भाषाक वर्णनमे समान सामान्य रूप आ एक प्रकारक नियम होइत अछि। ई पूर्व सार्वभौमिकता केँ संदर्भित करैत अछि। आ ओ सभ सामान्य श्रेणी आ गहींर संरचना सेहो प्रस्तुत करैत अछि आ ई मूल सार्वभौमिकताकेँ संदर्भित करैत अछि, आ टीजी व्याकरणक अंतिम लाभ ई अछि जे ई व्याकरणिकता आ व्याकरणात्मकताक स्तरक धारणाकेँ चिह्नित कऽ सकैत अछि जे मूल्यांकन, परीक्षण आ त्रुटि विश्लेषणक क्षेत्रमे अपरिहार्य अछि।

फंक्शनल ग्रामर-कार्यात्मक व्याकरण एम.ए.के. हैलिडे द्वारा बनाओल गेल छल। १९५० मे एकरा व्यवस्थित व्याकरण कहल गेल छल। कार्यात्मक व्याकरणमे, अर्थकेँ एहि उद्देश्यक रूपमे लेल जाइत अछि जे वक्ता चाहैत छथि जे सुननिहार बुझथि। एतय कोनो वाक्यक अर्थ ओकर कार्यक समान होइत अछि। कार्यात्मक व्याकरणक उद्देश्य अर्थ आ शब्दक प्रासंगिक विकल्पक सीमाक अध्ययन करब अछि। आ भाषाक कार्यात्मक दृष्टिकोणक एकटा महत्वपूर्ण निहितार्थ एकर संदर्भ अछि। माने कार्यात्मक व्याकरण संदर्भकेँ ध्यानमे रखैत अछि, आ ई भाषाविज्ञानकेँ समाजशास्त्र दिस लऽ जाइत अछि। ओ संस्कृति आ समाजमे प्रासंगिक विशेषतासभक व्यवस्थित अध्ययन थिक, जे ओहि सन्दर्भक निर्माण करैत अछि जाहिमे भाषाक प्रयोग कयल जाइत अछि। कार्यात्मक व्याकरणक अनुसार, सभटा शब्दकेँ ओपन सेट आ क्लोज्ड सेटमे विभाजित कयल जा सकैत अछि। ओपन सेट संज्ञा, क्रिया विशेषण आ क्रियाविशेषण अछि; ओ शाब्दिक शब्द या सामग्री शब्द अछि। क्लोज सेट व्याकरणिक प्रकार्यित शब्द सेहो अछि जेना प्रोन, कॉन्ज, प्रेप, आर्टिकल। कार्यात्मक व्याकरणमे समूह आ वाक्यांश दूटा अलग-अलग अवधारणा अछि। समूह शब्दक विस्तार अछि, जखन कि वाक्यांश खण्डक संपीड़न अछि। वाक्यांश विशेष रूपसँ पी.पी.केँ संदर्भित करैत अछि; कार्यात्मक व्याकरणमे संरचित आ कार्यात्मक लेबल सेहो अछि। संरचनात्मक लेबल तत्वसभक संरचनाक प्रकृतिकेँ संदर्भित करैत अछि, जखन कि कार्यात्मक लेबल खण्डसभक वाक्यात्मक कार्यकेँ सन्दर्भित करैत अछि।

आधुनिक भाषाविज्ञान आ पारम्परिक व्याकरणक बीच अन्तर

भाषाविज्ञान वर्णनात्मक अछि निर्देशात्मक नहि: अधिकांश आधुनिक भाषाविज्ञान वर्णनात्मक अछि, किएक तँ ई वर्णन करबाक प्रयास करैत अछि जे लोक वास्तवमे की कहैत छथि, नहि कि लोककेँ की कहबाक चाही। ई भाषाक वर्णन ओकर सभ पहलूमे करैत अछि, मुदा 'शुद्धता'क नियम निर्धारित नहि करैत अछि। ई पछिला शताब्दीमे भाषाक अध्ययनक विपरीत अछि। ई अधिकांशतः निर्देशात्मक छल। पारम्परिक व्याकरण लोकसभकेँ भाषाक उपयोग केना करब बतबैत छल। स्कूलक शिक्षककेँ रखरखावक लेल अपन कर्तव्यक रूपमे देखबाक चाही। एकर बदला ओ सभ पर्यवेक्षक आ तथ्यक अभिलेखकर्ता बनब पसिन्न करत, मुदा न्यायाधीश नहि। हुनकर मानब छनि जे प्राकृतिक भाषण (संकोच, अपूर्ण उच्चारण, गलतफहमी आदि) मे जे किछु होइत छैक ओकर वर्णन हुनकर विश्लेषणमे कयल जेबाक चाही। ओ सभ बुझि सकैत छथि जे फैशनक प्रभावक कारणेँ एक प्रकारक भाषण दोसरक तुलनामे सामाजिक रूपसँ बेसी स्वीकार्य प्रतीत होइत अछि। मुदा एहिसँ हुनका ई नहि सोचय पड़तनि जे सामाजिक रूपसँ स्वीकार्य विविधता आन सभ किस्मक स्थान लऽ सकैत अछि, अथवा पुरान शब्द हरदम नव वा विपरीत वीजासँ नीक होइत अछि। ओ सभ भाषा आ भाषाक उपयोगमे परिवर्तनकेँ एकटा स्वाभाविक आ निरंतर पूर्वाग्रहक परिणाम मानत, मुदा कोनो एहन चीजक नहि जकरा डरबाक चाही। भाषा परिवर्तनकेँ देखल जेबाक चाही आओर वर्णित कएल जेबाक चाही मुदा, ई एहि बातसँ इनकार नहि करैत अछि जे भाषाक नियम होइत अछि। एना स्पष्ट रूपसँ होइत अछि नहि तँ हम सभ एक दोसरकेँ नहि बुझि/ बुझा सकब। दोसर दिस, कोनो एकल नियम या अभिव्यक्ति आवश्यक रूपसँ सदाक लेल नहि रहैत अछि।

भाषाविज्ञान बाजल जायवला भाषाकेँ प्राथमिक मानैत अछि, लिखितकेँ नहि: अतीतमे, व्याकरणविद लिखित शब्दक महत्वपर बेसी जोर देलनि अछि, आंशिक रूपसँ एकर स्थायित्वक कारण। ध्वनि रिकॉर्डिंगक आविष्कारसँ पहिने क्षणभंगुर उच्चारणक सामना करब कठिन छल। पारम्परिक शास्त्रीय शिक्षा सेहो आंशिक रूपसँ दोषी छल। लोकसभ शास्त्रीय कालक 'सर्वश्रेष्ठ लेखक'क उपयोगक अनुसार भाषाकेँ ढालबा पर जोर देलनि आ ई लेखक मात्र लिखित रूपमे अस्तित्वमे छलाह।

यद्यपि, तथ्यक रूपमे, कि हम सामान्य रूपसँ मानव वाणीक इतिहासक विषयमे सोचैत छी जे व्यक्तिगत वक्ता, बाजल जायवला भाषाक भाषाई अनुभव प्राथमिक घटना थिक, आ लेखन एकर कमोबेश अपूर्ण प्रतिबिम्ब थिक। हम सभ पढ़नाइ सिखबासँ पहिने भाषण बुझनाइ सीखैत छी, आ लिखनाइ सिखबासँ पहिने बजनाइ सीखैत छी। हम सभ जतेक पढ़ैत छी ओहिसँ बेसी भाषा सुनैत छी आ लिखबासँ बेसी बजैत छी। बाजल जायवला भाषा सामान्यतः लिखित भाषासँ बेसी लचीला होइत अछि। ई भाषाई विकासक नेतृत्व करैत अछि, जखन कि लिखित भाषा बेसी बा  कम अंतराल पर ओकर अनुसरण करैत अछि।

बाजल जायवला भाषाकेँ कतेको कारणसँ प्राथमिक माध्यम मानल जाइत अछि। बाजल जायवला भाषा ऐतिहासिक रूपसँ लिखित भाषासँ पहिने होइत अछि। दोसर शब्दमे, ई लिखित प्रणाली अस्तित्वमे अयबासँ बहुत पहिने, बहुत पहिनेसँ अस्तित्वमे छल। आइयो बहुत रास सुविकसित भाषामे एखन धरि लिखित प्रणाली नहि अछि। आनुवंशिक रूपसँ बच्चा सभ लिखब सीखबासँ पहिने सदिखन बाजि सीखैत अछि। आन्हर बच्चासभकेँ बाजि सिखबामे कोनो कठिनाई नहि होइत छैक मुदा बहिर बच्चासभकेँ पढ़नाइ सिखबामे बहुत कठिनाई होइत छैक। एहिसँ पता चलैत अछि जे दृष्टिक चैनल ओतेक महत्वपूर्ण नहि अछि जेना कोनो भाषा सीखबामे ध्वनिक चैनल।

मुदा, ई लिखित भाषाक महत्वसँ इनकार करबाक लेल नहि अछि, जकर अपन लाभ अछि जे बाजल जायवला भाषाक नहि अछि। पहिल, लिखित भाषाक सङ्ग, सन्देशकेँ अन्तरिक्षमे लऽ जाय सकैत अछि। मानव आवाज मात्र कानक शॉटक भीतर प्रभावी होइत अछि। लिखित भाषाक मद्दति सँ, हम विशाल स्पैकमे संदेश पठा आ प्राप्त कए सकैत छीहम विशाल स्थान पर संदेश भेज आ प्राप्त कए सकैत छी। दोसर जे लिखित भाषाक सङ्ग सन्देशकेँ समयक माध्यमसँ लऽ जायल जा सकैत अछि। बाजल जायवला शब्द 'मरि जाइत अछि', मुदा एकटा लिखित सन्देशकेँ उत्पादनक क्षणसँ बहुत आगू, बहुधा पीढ़ीसँ पीढ़ी आ एक संस्कृतिसँ दोसर संस्कृतिमे प्रेषित कयल जा सकैत अछि। तेसर, मौखिक संदेश विकृतिक अधीन होइत छैक, या तँ अनजानमे (जखन उदाहरणक लेल गलतफहमीक कारण) बा अन्यथा। दोसर दिस, लिखित संदेश ठीक ओहिना रहैत अछि चाहे एक हजार साल बाद पढ़ल जाय या दस हजार मील दूर।

बाजल जायवला उच्चारण लिखित वाक्यक सङ्ग बहुत रास सामान्य विशेषता साझा करैत अछि, मुदा ओ काफी अन्तर सेहो प्रदर्शित करैत अछि। एहि लेल भाषाविदक मानब छनि जे बाजल जायवला रूप आ लिखित रूप अलग-अलग प्रणालीसँ सम्बन्धित अछि यद्यपि ओ ओवरलैप भऽ सकैत अछि। सिस्टमक अलग-अलग विश्लेषण करबाक चाही: पहिने बाजल जाइत अछि, फेर लिखल।

भाषाविज्ञान पारम्परिक व्याकरणसँ एहि लेल भिन्न अछि जे ई भाषासभकेँ लैटिन-आधारित ढाँचामे बाध्य नहि करैत अछि: अतीतमे, बहुत रास पारम्परिक पाठ्यपुस्तकसभ निस्सन्देह ई मानलक अछि जे लैटिन एकटा सार्वभौमिक रूपरेखा प्रदान करैत अछि जाहिमे सभ भाषा फिट होइत अछि, आ अनगिनत स्कूली बच्चा अङ्ग्रेजीकेँ विदेशी पैटर्नमे बाध्य करबाक अर्थहीन प्रयाससँ भ्रमित भऽ गेल अछि। उदाहरणक लेल, कखनो-कखनो ई दावा कयल जाइत अछि जे जॉन लेल सन वाक्यांश 'डेटिव केस'मे अछि। मुदा ई स्पष्ट रूपसँ असत्य अछि, किएक तँ अङ्ग्रेजीमे लैटिन-प्रकारक केस सिस्टम नहि अछि। अन्य समयमे, लैटिन ढाँचाक प्रभाव बेसी सूक्ष्म होइत छैक, आ तेँ बेसी भ्रामक होइत छैक। बहुत रास लोक गलत तरीकासँ किछु लैटिन श्रेणीकेँ 'प्राकृतिक' मानय लगलाह अछि। उदाहरणक लेल, सामान्यतः ई मानल जाइत अछि जे भूत, वर्तमान आ भविष्यक लैटिन कालक विभाजन अपरिहार्य अछि। तैयो बेसीकाल एहन भाषासभसँ भेँट होइत अछि जइमे ई तीन सुव्यवस्थित काल भेदकेँ नहि होइत अछि। किछु भाषामे कोनो क्रियाक अवधिकेँ व्यक्त करब बेसी महत्वपूर्ण अछि, चाहे ओ एकटा फराक काज हुअय बा निरन्तर होइबला काज, नै कि कोनो काजकेँ समयमे ताकब।

एकर अतिरिक्त, किछु संरचनापर निर्णय प्रायः लैटिन मूलक निकलैत छैक। उदाहरणक लेल, लोकसभ बेसीकाल तर्क दैत छथि जे 'नीक अंग्रेजी' स्प्लिट इनफिनिटिव [स्प्लिट इनफिनिटिवमे कोनो क्रिया विशेषण बा क्रिया विशेषण वाक्यांश "टू" आ " इनफिनिटिव " घटकमे फराक कएल जाइत अछि] सँ बचैत अछि जेना to humbly apologize वाक्यांशमे, जतय to apologize केर 'विभाजन' कयल जाइत अछि humbly द्वारा। ई विचार जे स्प्लिट इनफिनिटिव गलत अछि से लैटिन पर आधारित अछि। शुद्धतावादी लोकनि जोर दैत छथि कि, चूँकि लैटिन इनफिनिटि मात्र एकटा शब्द अछि, एकर अंग्रेजी समकक्ष एक शब्दक यथासंभव नजदीक होयबाक चाही। भाषाविद लेल एक भाषाकेँ दोसर भाषाक मानकसँ तुलना कऽ निर्णय करब अकल्पनीय अछि। ओ लोकनि एहि धारणाक विरोध करैत छथि जे कोनो एकटा भाषा आन सभ लेल पर्याप्त रूपरेखा प्रदान कऽ सकैत अछि। ओ सभ एकटा सार्वभौमिक ढाँचा स्थापित करबाक प्रयास कऽ रहल छथि, मुदा ई मानव जाति द्वारा उपयोग कयल जायवला अधिकांश भाषासभ द्वारा साझा कयल गेल विशेषतासभ पर आधारित होयत।

सारां

यद्यपि आधुनिक भाषाई आ पारम्परिक व्याकरणक बीच बहुत अन्तर छैक, मुदा समकालीन व्याकरणिक विश्लेषणमे निर्देशात्मक रूपसँ नहि बल्कि वर्णनात्मक रूपसँ कयल गेल अधिकांश काज जेना ओटो जेस्परसेन, डब्ल्यू. नेल्सन फ्रांसिस आ हेनरिक पौत्स्मा सन विद्वान द्वारा पारम्परिक व्याकरण भाषामे लिखल गेल छल। कोनो आधुनिक व्याकरणकेँ बुझबाक लेल, आ शैलीगत विश्लेषणक स्तर पर लेखन वा साहित्यक विषयमे वस्तुतः सभटा चर्चाकेँ बुझबाक लेल, पारम्परिक व्याकरणसँ निकालल गेल शब्दावलीक समझ होयबाक चाही, यदि सम्पूर्ण प्रणालीक नहि।

- जियान ली आ किंग मिंग ली

नेपालक मैथिली भाषा पाठ्यपुस्तक लेल रामावतार यादव जीक मैथिली व्याकरणक आधारपर बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण "र् ह"जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ "र् ह"क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे "व"क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु "य"क उच्चारण "ज"जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे "ए"केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ "य"क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो "ए"क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (' / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़' गेलाह, क' लेल, उठ' पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर

सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)

योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन

भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

 

मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली


१. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर, तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन, अखनि, एखेन, अखनी
ठिमा, ठिना, ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर। (वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

२. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैकल्पिकतया अपनाओल जाय: भऽ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर' गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

३. प्राचीन मैथिलीक 'न्ह' ध्वनिक स्थानमे 'न' लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

४. 'ऐ' तथा 'औ' ततय लिखल जाय जत' स्पष्टतः 'अइ' तथा 'अउ' सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

५. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत: जैह, सैह, इएह, ओऐह, लैह तथा दैह।

६. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे 'इ' के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

७. स्वतंत्र ह्रस्व 'ए' वा 'य' प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ 'ए' वा 'य' लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

८. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे 'य' ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

९. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव 'ञ' लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

१०. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:- हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। 'मे' मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। 'क' क वैकल्पिक रूप 'केर' राखल जा सकैत अछि।

११. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद 'कय' वा 'कए' अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

१२. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

१३. अर्द्ध 'न' ओ अर्द्ध 'म' क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध 'ङ' , 'ञ', तथा 'ण' क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

१४. हलंत चिह्न निअमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

१५. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क' लिखल जाय, हटा क' नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

१६. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रापर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

१७. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

१८. समस्त पद सटा क' लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क' , हटा क' नहि।

१९. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

२०. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

२१.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
 

जियान ली आ किंग मिंग ली लिखैत छथि-

अधिकांश आधुनिक भाषाविज्ञान वर्णनात्मक अछि, किएक तँ ई वर्णन करबाक प्रयास करैत अछि जे लोक वास्तवमे की कहैत छथि, नहि कि लोककेँ की कहबाक चाही। ई भाषाक वर्णन ओकर सभ पहलूमे करैत अछि, मुदा 'शुद्धता'क नियम निर्धारित नहि करैत अछि। ई पछिला शताब्दीमे भाषाक अध्ययनक विपरीत अछि। ई अधिकांशतः निर्देशात्मक छल। पारम्परिक व्याकरण लोकसभकेँ भाषाक उपयोग केना करब बतबैत छल। स्कूलक शिक्षककेँ रखरखावक लेल अपन कर्तव्यक रूपमे देखबाक चाही। एकर बदला ओ सभ पर्यवेक्षक आ तथ्यक अभिलेखकर्ता बनब पसिन्न करत, मुदा न्यायाधीश नहि।

मुदा गोविन्द झा, श्रीकान्त ठाकुर सुरेन्द्र झा "सुमन" ग्राह्य-अग्राह्य दऽ कऽ शुद्धता आ अशुद्धताक निर्णय दऽ दै छथि। रामावतार यादव सेहो "अ रेफेरेन्स ग्रामर ऑफ मैथिली" मे सेहो मानकता आदिक आधारपर निर्णय दैत बुझाइत छथि।

गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि

गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि।

खण्ड एक
प्रत्यक्ष

गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।

आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल।
आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत।

आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि।
आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।

आपत्ति: ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि।
आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि।

प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना  केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत?

ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने!

 

(सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१)

स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि:

मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत।

Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time.

[Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ]

गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि।

मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]।

HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?)

I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph.

I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958.

The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way.

Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958)

"The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him.

The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference:

 -

महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल।

So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014].

Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009).

The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800   CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning.

ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW:

DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK

४९.

१८८/२

चर्मकारिणी

माण्डर

वभनियाम

छादन

तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश

छादनगंगेशक

नाँई

रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात)

गंगेश

 

वल्लभा

भवाइ

माहेश्वर

 

 

 

 

जीवे

 

 

२१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश

छादनसँ तत्‍व चिन्‍तामणि कारक

गंगेशक वल्‍लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्‍यतीते तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशोत्‍पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्‍तानक लागिमे छलन्हि

छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōō गंगेश

"तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।।

पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि

देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी

देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम

देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म

Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family.

[Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words'  Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi]

 

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१.२.विदेह ई-लर्निङ्ग

[संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो]

.................

मैथिलीक वर्तनी

मैथिलीक वर्तनी- विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

भाषापाक

मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि|

IGNOU  इग्नू       BMAF-001

...................

Maithili (Compulsory & Optional)

UPSC Maithili Optional Syllabus

BPSC Maithili Optional Syllabus

मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक)

मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य)

मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक)

..................

यू. पी. एस. सी. (मेन्स) ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज

यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २

Test Series-1- गजेन्द्र ठाकुर

Test Series-2- गजेन्द्र ठाकुर

...........................

NTA-UGC/ UPSC/ BPSC Maithili Optional- गजेन्द्र ठाकुर

मैथिली समीक्षाशास्त्र

मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता)

मैथिली समीक्षाशास्त्र (भाग-२, अनुप्रयोग)

मैथिली प्रतियोगिता

[Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)]

(Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates)

(ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।)

(बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली)

(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी)

(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास)

(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार)

(तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास)

अनुलग्नक-१-२-३    अनुलग्नक- ४-५

(मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-'ए', क्रम-५])

[मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल]

मैथिली-हिन्दी वार्तालाप (३ घण्टा)

मैथिली

बांग्ला

असमिया

ओड़िया

हिन्दी

उर्दू

नेपाली

संस्कृत

संथाली

NTA_UGC_NET_Maithili_01

NTA_UGC_NET_Maithili_02

GS (Pre)

Topic 1 

........................

यू.पी.एस.सी. आ आन प्रतियोगिता परीक्षा लेल देखू:

विदेह:सदेह १७

विदेह:सदेह २१

विदेह:सदेह २३

विदेह:सदेह २६

विदेह:सदेह २९

विदेह:सदेह ३०

विदेह:सदेह ३२

विदेह:सदेह ३३

विदेह:सदेह ३४

विदेह:सदेह ३५

.......................

General Studies

NCERT-Environment Class XI-XII

NCERT PDF I-XII

Sansad TV

http://prasarbharati.gov.in/

http://newsonair.com/ 

...................

Other Optionals

IGNOU eGyankosh

...................

पेटार (रिसोर्स सेन्टर)

.................

मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमानाथ मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

डॉ. कमला चौधरी-मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

डॉ योगानन्द झा- मैथिलीक पारम्परिक जातीय व्यवसायक शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

मैथिली शब्द संचय- डॉ श्रीरामदेव झा (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा

परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा

English Maithili Computer Dictionary (Complete)- Gajendra Thakur

Maithili English Dictionary- गोविंद झा

राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature

राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास

जयकान्त मिश्र- A History of Maithili Literature Vol. I

राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) (यू.पी.एस.सी. सिलेबस)

दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस)

प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL Site

सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ

डॉ. रमानन्द झा 'रमण'

दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु

फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:-

रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा

कुमार पवन (साभार अंतिका)

पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा)     

डायरीक खाली पन्ना

केदारनाथ चौधरी

अबारा नहितन

चमेलीरानी

माहुर

करार

अयना

हीना

डॉ. रमण झा

भिन्न-अभिन्न

मैथिली काव्यमे अलङ्कार

अलङ्कार-भास्कर

मैथिली काव्यमे ज्योतिष

अहिरावण-वध

पारिजात-मञ्जरी

योगेन्द्र पाठक 'वियोगी'

विज्ञानक बतकही

विज्ञानक बतकही भाग-

अकटा मिसिया (कथा संग्रह)

नरक विजय (सम्पूर्ण)

नरक विजय (संशोधित)

किछु तीत मधुर (यात्रा वृत्तांत)

हमर गाम

पिरामिडक देशमे

रोबोट (अनूदित साइंस-फिक्शन नाटक)

अनूदित साहित्य (आन भाषासँ)- गजेन्द्र ठाकुर

विदेह:सदेह २७ (गजेन्द्र ठाकुर आ रवि भूषण पाठकक आन भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य- अंक १-३५० सँ)

बाल साहित्य (अनुवाद- द्विभाषिक- मैथिली-अंग्रेजी)- गजेन्द्र ठाकुर

साई केर परिवर्तनकारी रेबेका

शेष ४० टा बाल चित्र-पोथी नीचाँक लिंकपर:-

सुनू घर सभ एकटा नीक दिन चलू हम तँ ठीक छी ने! की अहाँ ऐ चिड़ै सभकेँ देखने छी?

टोस्ट

बड़ीटा! कनियेटा!

एतऽ हम सभ रहै छी

भारतोल्लक राजकुमारी

भारतोल्लक राजकुमारी (बिनु शब्दक)

वुयो

कच-कच कचाक

चुन्नू-मुन्नूक नहेनाइ

नेना जे बैलूनसँ डेराइत छल

अद्भुत फिबोनाची अंक-शृंखल

हारू

अखन नै, अखन नै!

जन्मदिनक उत्सव भोज

मोट राजा पातर-दुब्बड़ कुकुड़

बचिया जे अपन हँसी नै रोकि सकैत छलि

अंग्रेजी

हम सूंघि सकै छी

छोट लाल-टुहटुह डोरी

करू नीक, भोगू नीक

सभटा बिलाड़िक दोख अछि!

चोभा आम!

हमर टोलक बाट

जखन इकड़ू स्कूल गेल

माछी फेर आउ टाटा!

अमाचीक जुलुम मशीन सभ

टिंग टोंग

पाउ-म्याऊ-वाह

कुकुड़क एकटा दिन

हमरा नीक लगैए

रीताक नव-स्कूलमे पहिल दिन

कनी हँसियौ ने!

लाल बरसाती

भूत-प्रेतक नाट्यशाला

 आउ पएर गानी

 कतऽ अछि ई अंक ५?

विदेह मैथिली-अंग्रेजी टॉकिंग रीड-अलाउड ऑडियो बुक

https://bloomlibrary.org/player/Wcf6zr5CoF (मसाई केर परिवर्तनकारी रेबेका)
https://bloomlibrary.org/player/p3sHdYBgiT (चलू हम तँ ठीक छी ने!)
https://bloomlibrary.org/player/f19pSdhGMo (एकटा नीक दिन)

https://bloomlibrary.org/player/b2l5wesxCp (घर सभ)
https://bloomlibrary.org/player/dAzC0Fubt7 (की अहाँ ऐ चिड़ै सभकेँ देखने छी?)

......................

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पं लक्ष्मीपति सिंह (सौजन्य रमानन्द झा "रमण")

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