प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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विजय कुमार मिश्र "श्री विमल"

कहलन्हि शकुनी मामा (हास्य कविता)

घर-घर युद्ध क बिगुल बजादी ,
ताकी दहिन नहिं बामा ।
कय कनफुसकी पासा सजादी
कहलन्हि शकुनी मामा ।।

हमरे सॅ उपदेश लेल सभ ,
की ? हमरे बिसरि सकैया ।
एखनहुं टी. भी. जखने- तखने
हमरे नाम जपैया -- 2
गाम -- चौबट्टी , शहर--चौराहा
बाॅहि फरकावथि गामा--2
हौ रंगदारीक टैक्स पचावह ,
कहलन्हि शकुनी मामा ।।

रुनझुन काकी गप्प फरिक्षावथि
छलहुं सुनैत महा भारत ।
नहिं जनलहुं जे नवकी कनियाॅ
अंगने कथा पसारत ।
बूढि बेलना ताकथि नवका ,
बहुआसिन फेकथि तामा ।।
धन्य अहिं वीरांगना नारी ,
कहलन्हि शकुनी मामा ।।

युग-युग सॅ अछि कुर्सीक महिमा
बड़-बड़ रुप देखाओल ,
कहियो बेटा बापक दुश्मन,
कहियो भाय फरिक्षाओल -2
हमर समाज क नेता बड़ बुझनुक ,
जहिं- तहिं करथि हंगामा ।
महिमा सदिखन कुर्सीक गावथि
कहलन्हि शकुनी मामा ।।

आदर्श गुरु अखरियल चेला ,
सम्बन्ध एहन नहि पायब ।
ठेका- पट्टी करी पढाई क ,
जे बनि परत बनायब --2
चेला सहजहिं किरकिट खेलय
पिकनिक तास सिनेमा--2
डिग्री सॅ नहि बंचित रहबह ,
कहलन्हि शकुनी मामा ।।

पाण्डव-कौरव पासा फेंकथि ,
तासक नहि तखन व्यवहार ।
आबो जतय केओ जूआ खेलथि ,
शकुनी ओहि मे भेटता ठाढ ।

कहियो कुर्ता- बंडी-धोती ,
कहियो पहिर पैजामा--2
बनलो काज बिगारि रहल छथि
घर - घर शकुनी मामा ।।

 

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