प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम. ए., नैहर- खराजपुर, दरभङ्गा, सासुर- गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास- राँची, झारखण्ड। झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभागमे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पदसँ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन।
(अग्नि शिखा मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण)

अग्निशिखा खेप -


पूर्वकथा

राजा पुरूरवा नदी मे बहल जाइत चित्रसेना के निकालि बाहर अनलथि, आ हुनकर पेट के पानि बाहर निकालवाक प्रयास करs लगलथि।
               
आब आगू

पेट पर जोर परितहि नाक-मुंह स s पानिक अजश्र श्रोत फूटि गेल। ओ देखलनि जे आब पेट सामान्य भs गेल अछि मुदा साँस? ओ किएक नहि चलैत अछि! ओ बहुत प्रयत्न सँs हुनकर मुख खोलि अपन मुख हुनकर मुख पर राखि देलथि आ फेर जोर-जोर सँ फुकय लागलथि। किछु प्रयासक बाद श्वसन क्रिया प्रारम्भ भs गेल मुदा आँखि? ओ संभवत: बन्न रहबाक शपथ लेने छल।ओ धीरे-धीरे हुनकर केश,ललाट आ संपूर्ण शरीर पर कपड़ा केँ ऊपर सs अपन हाथ के स्पर्श सs गरमाहट देवाक प्रयास करय लगलाह। किछु समयक बाद हुनकर आँखि सेहो खुजि गेलनि ।
"हम...हम कतय छी...के...अहाँ......के... थिकहुँ..."- ओहि युवतीक मुख सँs क्षीण स्वर प्रस्फुटित भेल।
"अहाँ एहि धरती पर सरस्वती आ नर्मदा के संगम पर छी! आ हम?...हम छी एक अभिशप्त प्रेमी!" - पुरूरवा हुनकर प्रश्नक उत्तर देलथि |
ओ आवाज चिन्हलथि आ ओहि व्यक्ति दिस ध्यान सँs ताकय लगलीह जे हुनकर जीवन दाता बनि आओल छल, फेर हर्ष सँs पुलकित भs गेलीह ।
"अहाँ... अहाँ... पुरूरवा ... थिकहुँ ! ... उर्वशीक प्रेमी!"
"हँ! अहाँ सत्य चिन्हलहुँ" - पुरूरवा खिन्न भाव सँs उदास होइत प्रत्युत्तर देलथि ।
"ओह हम कतेक सौभाग्यशाली छी जे अपन अंतिम क्षण मे अपन प्रियतम के दर्शन प्राप्त कs रहल छी " युवतीक मुखमण्डल प्रसन्नता सँs चमकि गेल ।
"नहि-नहि, हम...हम अहाँ सs प्रेम नहि करैत छी! तखन हम अहाँक प्रेमी कोना बनि सकब"! - पुरूरवा घबराइत बजलाह।
"हम तs करैत छी! नहि!नहि! चिंता जूनि करु! आब हमरा अहाँक प्रति कोनो ग्लानि, आक्षेप अथवा आपत्ति नहि अछि। हम अहाँ केँ कोनो उपालंभ नहि दs रहल छी, हम आब अहाँ सँs प्रणय -याचना नहि करैत छी। मुदा आब हमरा अपन जीवनक लक्ष्य प्राप्त भs गेल अछि । हम आब जीवित रहब! आ हम अपन जीवनक अंत धरि! जा धरि जीवित रहब ता धरि हम अपन एहि शरीर केँ अहाँक धरोहर मानि कs राखब आ एकर देखभाल करब" - युवती दृढ़ स्वर मे बजलीह ।
"ई अहाँ कथि कहि रहल छी! नहि!नहि! एहेन बात सब हमरा सँs नहि कहू" - पुरूरवाक मुँह सँs घबड़ाहट भरल भयभीत आवाज निकलल ।
"अहाँ जौं सुनs नहि चाहैत छी तs नहि सुनू, मुदा आब हम छाया जकाँ अहाँक पाछू रहब, हर संभव सेवा करब! हमरा अहाँक प्रेम एहि जनम में प्राप्त नहि भेल कुनो बात नहि, मुदा अगिला जनम में अहाँक प्रेम अवश्य प्राप्त करब। जँs एहि जीवन में मिलन नहि भेल ओकर पश्चाताप नहि, मुदा अगिला जनम में होयत अपन मिलन!" - चित्रसेना हँसय लगलीह ।
"चित्रसेना, हम...हम अहाँ सँ कहियो प्रेम नहि कs सकैत छी। हम...हम अपन जान सँs बेसी उर्वशी सँs प्रेम करैत छी, ओ हमर प्रियतमा छथि। हमर प्रियतमा! हमर जीवन सहारा!...हा..!हा...! हम... उर्वशी के... प्रेमी... हम उर्वशी के प्रेमी छी...."
पुरूरवा एक उछाल मारि कs ओतह सs भागि गेलथि।चित्रसेना हुनका दिशि विस्मय सँs देखैत रहलीह। हुनकर एहेन दशा देखि दु:ख सs कातर भेल चित्रसेनाक आँखि सँs नोर टपकय लागल। अपन आँखि सँ s नीर वर्षा करैत चित्रसेना ओहि दिशा में प्रस्थान केलथि जाहि दिशा मे पुरूरवा किछु क्षण पहिने विदा भेल छलाह।
किछुए दूर गेला उपरान्त चित्रसेना के दृष्टि पथ में पुरूरवा आबि गेलथि। हुनकर स्थिति देखि चित्रसेना के हृदय पीड़ा सौं विह्वल भs गेल। हुनक समक्ष किछु दूरी पर एकटा पैघ पीपरक गाछ छल।ओकर डाढ़ि नदी के पानि के छूबैत छल।ओहि गाछ के निकट ओ चेतनाहीन भs कs भूमि पर पड़ल छलथि । हुनकर अचेतन शरीर मृत शरीर जकाँ भूमि पर पड़ल छल। वातावरण एकदम नीरव शान्त आ कुनो तरहक स्वर सौंs मुक्त छल।पूर्णिमा के राति हेबाक कारणे वातावरण शुभ्र पूर्ण चन्द्र के चन्द्र-ज्योत्सना के धवल प्रकाश सs प्रकाशित भs रहल छल।रात्रि के प्रथम प्रहर व्यतीत भs गेल छल।एहि कारणे कतहु कोनो जीव के गतिमानताक वा हलचल के कुनो चिन्ह नहि छल। पक्षी गण के कलरव गान तक मौन छल। चिड़ै-चुनमुनी पर्यन्त अपन नीड़ में निद्रा-निमग्न छल ।ओ सभ अपन-अपन नीड़ में निद्रा निमग्न भय स्वप्नलोक में विचरण कs रहल छल। कतहु आन जागृत कुनो मानव के किछुओ चिन्ह नहि छल, कतहु कोनो वन्य प्राणिक हलचल नहि देखाइत अथवा सुनाइत छल।त्रिवेणीक कछाड़ पर पूर्ण नीरवता व्याप्त छल।
प्रथम चित्रसेना के ह्रदय में विचार ऐलनि पुरूरवा के निकट जा कs हुनकर किछु सेवा सुश्रुषा करथि। हुनक मस्तक के अपन अंक में भरि कोड़ के तकिया बनाबथि जाहि सs पुरूरवा निद्रा देवी के सुखद आनंद लs सकथि। ओ अपन ह्रदय के इच्छापूर्ति हेतु आगू जयवाक प्रयास करिते रहथि कि एतबहि में अपने नेत्र के समक्ष उज्जवल चमकदार रोशनी के झमकार देखि थमकि गेलीह।
अचक्के ओहि मौन परिवेश मे चण्द्र-ज्योत्सना केँ चुनौती दैत प्रकाशक तीव्र किरण पुंज क्षण भरि लेल दसो दिशा केँ रोशन कs देलक। तखन ओ प्रकाशक किरण धीरे-धीरे सिकुड़ि कs आश्चर्यजनक रूप सँs अद्भुत सौंदर्य मयी रमणी में परिणत भs गेल। ओ धीरे-धीरे आगू बढ़s लगलीह। ओ रमणी धीरे-धीरे आगू बढ़ैत रहलीह....बढ़ैत रहलीह आ आबि गेलीह पुरूरवा के निकट! हुनकर अत्यंत निकट!
निकट आबि ओ दिव्य सुंदरी पुरूरवा के भूमि पर निश्चेष्ट अवस्था में पड़ल देखि अपन कोमल हाथ सs हुनकर मष्तक, उन्नत ललाट, कपोल आ ओझरायल जटाजूट बनल केश के स्नेह पूर्वक मंद-मंद सोहराबैत रहलीह।हुनकर हाथ पुरूरवा के शरीर के अंग-अंग पर सरकैत रहल, आ दुनू आँखि सs दहो-बहो नोर बहैत रहल। .ओहि मौन परिवेश मे करुण रस सँ भरल ध्वनि तरंग गुंजायमान होबय लागल । ओ करुण स्वर में विरह गीत गाबि रहल छलीह।
किछु क्षणक उपरान्त पुरूरवाक नेत्र स्वयमेव फुजि गेलनि, किछु क्षण धरि आश्चर्यचकित भs ओहि सुन्दरी दिस तकैत रहलाह, फेर बहुत प्रसन्न भs हुनकर मुँह सँ चित्कार निकलि गेलनि

"उर्वशी... अहाँ... अहाँ... आबि गेलहुँ... प्रियतमे!... अहाँ चलि एलहुँ... ओह प्रियतमा..... अहाँ हमर समक्ष छी!.....प्रियतमा अहाँ हमर समक्ष छी! की हम अहाँ केँ देखि रहल छी! हम अहीं केँ देखि रहल छी! अथवा की ई हमर मात्र स्वप्न अछि ! अहाँ सत्ते हमरा निकट छी? अहाँ किछु तs बाजू प्रियतमा!"
उर्वशी उदासी भरल करुण हँसी हँसैत गंभीर भs बजलीह - .
"हँ प्रिय, हम कहने रही जे अगिला साल कुरूक्षेत्र मे अवश्य भेंट करब ! आइ ओ दिन अछि, हम अपन वचन अनुरूप एतय आबि गेल छी। हम वचन भंग नहि केलहुँ।"
कनिक दूर पर एकटा घनगर वृक्ष के पाछू नुकायल चित्रसेना हुनक मिलन के प्रत्यक्षदर्शी छलीह।
क्रमशः
 

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