प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक

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रबीन्द्र नारायण मिश्र

 

प्रदूषणक प्रहार

हजार साल बाद

जौँ  घुरि आएब एहि पृथ्वीपर

तकैत अपन लोकसभकेँ

तखन के भेटत?

साइत ई दुनिआ

बनि गेल रहत मरुभूमि

नहि रहत कतहु

पानिक एक्को बूंद

धह-धह जरैत धरती

अचानक फुटि गेल

शक्तिशाली आणविक बमसँ

निकलैत अजस्त्र उष्मासँ

छाउर बनि गेल  सभकिछु

समुद्र पर्यन्त सुखाएल  रहत

दरारि फाटि गेल रहत सौंसे

खण्ड-खण्ड भेल धरती

नहि देखाइत रहत सूर्य

सौंसे धुआँ-धुआँ भेल रहत

मनुक्खक तँ बाते कोन

नहि बाँचत कोनो जीव-जन्तु

के करत करुण क्रन्दन

हाकरोस करैत प्रकृति

भष्म भए गेल रहत सभकिछु

पता नहि पृथ्वीक आस्तित्व

रहिओ सकत कि नहि

हमर अहाँक निर्मित

सुंदर-सुंदर महल सभक

नहि रहत नामोनिसान

कतए तकबनि अपन वंशजकेँ?

ओ सभ तँ कहिआ ने

भए गेल रहताह काल कलवित

नहि भोगि सकताह कोनो सुख

नहि देखि सकताह

पृथ्वीपर सहज सुलभ

हरीतिमाक अनुपम सौंदर्य

सोचिऔ, ओ सभ की कहताह

केहन छलाह हमर पूर्वज

जे मिथ्या अहंकारवश

नहि बचा सकलाह किछुओ

नारात्मक सोचसँ आवद्ध

नष्ट कए देलनि सभ किछु

आबो सम्हरि जाउ

छोड़ू दुराग्रह

बचा लिअ पृथ्वीकेँ

प्रदूषणक प्रहारसँ

बहा दिअ समुद्रमे

सभटा आणविक हथियार

जे बनि गेल अछि

शत्रु  मानव समाजकेँ

आब बुझलिऐ

केहन बुद्धिमान छलाह पूर्वज

पोषण करैत रहलाह प्रकृतिक

सर्वत्र रहए शांति  ओ सुख

आबो जागथु, सम्हरि जाथु

करथु त्याग राक्षसी प्रवृतिकेँ

जीबथु संयमित जतबे-ततबेसँ

प्रकृतिक संरक्षण करैत

सोपि जाथु  वसुंधरा

एहिना हरियर कंचन

अगिला पीढ़ीकेँ।

‍१९।२।२०२४ 

 

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