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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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आनन्द कुमार झा

मैथिली नाटक आ ग्रामीण रंगमंच

मैथिली नाटकक बासडीह थिक ग्रामीण रंगमंच । हमरा लोकनिक इतिहास कहैत अछि जे प्राचीन समयमे ज्ञान, यज्ञ , तप करैक भूमि रहल अछि मिथिला । एतए सम्पूर्ण भारतक लोक ज्ञान अर्जित करबाक लेल अबैत छल । से कहबाक तात्पर्य हमर ई थिक जे पूर्वमे अहिठाम एतेक नवीनता छल जे एतुका लोक विरक्त भए आन आकर्षण दिश कहिओ आकर्षित नहि होइत छल । तेॅ पलायन नहि होइत छल । मिथिलाक सभसॅ पैघ खूबी छलैक जे जीविकोपार्जनक विधि-विधान आधुनिक रहितहुॅ , तकरा उपरान्तो ग्राम्य जीवनक स्वरूप कहिओ नहि बदलल । तेॅ हमरा ई कहैत कनिको असोकर्ज नहि भए पाबि रहल अछि जे मैथिली रंगमंचक विशुद्धरुपे ओकर जड़ि ग्रामीण रंगमंच थिक । बुझि सकैत छी जे ग्रामीण रंगमंच कतेक सशक्त छल जे विद्यापति जखन मैथिलीमे गोरख विजय नाटक लिखैत छथि तॅ तकर मंचन एकटा सुदूर ग्राम भैरव स्थानमे (वर्त्तमानमे रैयाम पूर्वी पंचायत ) करैत छथि । जकर मुख्य अतिथि महराज शिव सिंह होइत छथि । आब आहाॅ ग्रामीण रंगमंचक उत्कर्षक अन्दाजा लगा सकैत छी । बादमे ग्रामीण रंगमंच पूर्णरूपेण स्वतंत्र सेहो भेल । स्वतंत्र हम अहि अर्थमे कहैत छी । वर्तमान समयमे जे शहरी रंगमंच अछि ओ पूर्वग्रस्त रहैत छथि जे फल्ले नाटककारकेॅ नाटक हमरा करबाक अछि । चाहे ओ नाटक नीक होएक की बेजय होएक । तहिमे नाटककार सेहो अपन साहित्यक अपघात करैत रंगमंच पर कोना हमर नाटक हएत ताहि लेल साहित्यिक चिन्तनसॅ बेसी ओ रंगमंचक चिन्तन करैत देखाइत रहैत छथि । जखनकि रंगमंचक चिन्तन केनिहार रंगकर्मीक समूह अछि । खैर , से कहै लगलहुॅ - ग्रामीण रंगमंच पर जे नाटकक पोथी चयन करैक प्रक्रिया अछि ओ पूर्ण रुपसॅ पारदर्शी पूर्वक होइत अछि । पहिने नाटक होएबाक सुरसार सुरुह होइत अछि । फेर दू - चारि - पाॅच गोटएकेॅ ई भार देल जाइत छन्हि जे नाटकक पोथी कीनि आनथि । ओ लोकनि बजार जाकेॅ किताबक दोकानसॅ तत्कालमे जतेक पढि सकलाह से पढि पोथी कीनि लैत छथि । ओना कतेको गोटए तॅ भिन्सरसॅ साॅझ कए दैत छथिन पोथी पढैत - पढैत । कतेक बेर तॅ किताब दुकानदारसॅ कहा - सुनी सेहो होमए लगैत अछि । एकटा पोथी बिकएबाक हेतु ओ भरि दिन बरदएल नहिने रहत । जे से पोथी साॅझखनधरि आबि गेलैक । बड़का दलान पर पहिनेसॅ रंगकर्मी लोकनिकेॅ जमघट लागल रहैत अछि पोथीक अएबाक प्रतिक्षामे । आब तॅ हम पहिने पढब तॅ हम पहिने पढब । किछुकाल छिनाछिनी होइत अछि । एहन उत्सुकता नहि देखल जएह । कतेक बेर तॅ अहि छिनाछिनीमे पोथी सेहो फाटिचिट जाइत अछि । आब तॅ राति एक बजौ कि दू , भोरो भए जाउ , जाधरि सम्पूर्ण नाटकक पाठ नहि भए जाइत ता धरि केॅ ससरत । ताधरि तॅ सभक आंगनसॅ कतेको समाद आबि गेलैक भोजन करबाक लेल । कएगोटेक आंगनमे तॅ झगड़ा - झंझट सुरुह भए जाइत छैक । कतेक गोटएकेॅ भोजन झाॅपल राखल रहैत छल । घरमे सभ ठीक नहि रहलैक तॅ उपासलो सुतैत देखलियैक अछि । आब नाटकक सलेक्शन भए गेल । रिहर्सल सुरुह भए गेल । नाटककारकेॅ कोनो सूचना नहि छन्हि । जॅ सम्पूर्ण समाजक अगुआ लोकनिकेॅ रिहर्सलसॅ नाटक मंचनक परिणाम नीक बुझाइत छन्हि तहन बिचार होइत अछि जे अहि लेखककेॅ बजाआओल जएह । नाटककार अबै छथि । गामक लोकक संग नाटक देखैत छथि । मंच हुनका यथाशक्ति सम्मान करैत छथि । आब आहाॅ कहू कतेक स्वतंत्र छल हमर ग्रामीण रंगमंच । कतौ भेदभाव नहि चयन प्रक्रियामे । कि वर्तमान समयमे आकि अवैबला समयमे ई पारदर्शिता सम्भव अछि ? नाटककारकेॅ धर्म छी ओ साहित्यिक दृष्टिकोणसॅ समाजक हितमे नाटक लिखबाक चाही । नहि कि रंगमंच पर कोना नीक हएत । रंगमंच पर कोना नीक हएतैक ताहि लेल हमर रंगकर्मी लोकनि सतत प्रयासरत रहैत छथि । आधुनिक रंगमंच पर कोनो चीज देखएब आब असम्भव नहि रहलैक ।

 

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