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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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विष्णु कान्त मिश्र

महादेवक कूटनीति

 

कालचक्र(कथा संग्रहसॅ)

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शंकर बाबूक सिरमामे यमदूत ठाढ़ छल ।ओ हिनका कहनि -- 'चल हमरा संग'।

--------- 'हम तोरासंगे किएक जाएब?हम एखन जयबाक मूडमे नहि छी ।तावत दोसरसभके देखहक ।के पठौलकह तोरा'?

------ 'देवाधिदेव महादेव।तोहर समय भ' रहल छह ।हमरा ल'ग आना -कानी नहि चलतहु।हमरा त' तोरा महादेवधरि पहुचयबाक अछि ।तत्पश्चात तोरा जे कोनो गलती बूझि पड़ौ त' हुनकेसॅ गप क' लीह' ।'यमदूत बाजल।

शंकर बाबू प्रश्न कयलनि ----'फेर हमरा हुनका ल'गसॅ घुमा क' पृथ्वी लोक तोॅपहुचाए देबह ने '?

----- हमरा मात्र पहुचयबाक भार अछि ।फेर के संग आबि क' मृत्युलोक पहुचेतहु से महादेवसॅ पूछि लियहुन ।विदा होएबामे आब एक मिनट मात्र बाॅकी छहु ।'

किछु क्षणक पश्चात यमदूत शंकर बाबूके नेने जाय महादेवल'ग सुपुर्द क' देलक ।आब ई महादेवक दायित्व छलनि जे चित्रगुप्तसॅ शंकर बाबूक जीवन भरिक क्रिया - कलापक गोपनीय रिपोर्ट मॅगबाबथु ।

शंकर बाबू महादेवसॅ कहलथिन ---'अहाॅ एहन बेकहल सयदियाके हमरा ओतय किएक पठौलहुॅ ?एकरा जोरगरीक दाबी छैक ।हम कहलियैक जे बादमे भेंट क' लेबनि , जबर्दस्ती अनलक अछि ।'

महादेव चित्रगुप्तके बजाय पुछलनि-----'अहाॅ शंकरक क्रिया-कलापक एकाउन्ट दिअ ।'

---------'सरकार, ई जीवनमे पचहत्तरि परसेन्ट झूठेटा बजलाह ।क्रोध ,गारि,स्वार्थ,इर्ष्या,पराया स्त्रीक शील हरण,मोह आदिमे समय व्यतीत कयलनि ।अपनेक सोंझा सभटा लिखल रिपोर्ट राखि रहल छी ।'ई कहि चित्रगुप्त शंकर बाबूक रिपोर्ट कार्ड महादेवक समक्ष राखि देलनि ।

महादेव शंकर बाबूके कहलथिन ---- 'अएॅ औ, अहाॅक त' पूरा रेकर्डे खराब अछि।'

ई सुनितहि शंकर बाबूक देहमे आगि लेसि देलकनि ।ओ महादेवपर बमकि उठलाह ----' अहाॅ कहियाके न्यायकर्ता भेलहु ।नशामे सदिखन बुत्त रहैत छी ।बेकहल तेहने छी जे वस्त्रक बदला बाघक छाल ठेहुनधरि पहिरैत छी ।मुंडमाल देखि हमरासभके घृणा होइत अछि ,तकरा अहाॅ गरदनिमे लटकौने रहैत छी ।इन्द्रक आंखिमे मरछाउर छीटल रहनि जखन ओ अहाॅक नाम देवाधिदेव महादेव रखलनि ।अहाॅसन बूड़ि न भूतो न भविष्यति।एहन लोक हमर न्याय की क' सकैत अछि ?चलूं पालनकर्ता विष्णु ल'ग ।'

महादेव आ शंकर बाबू दूनू विष्णुक ओतय गेलाह ।महादेव शंकरक सभटा किरदानी विष्णुके सुनाय देलथिन।शंकर बाबू सेहो विष्णुक समक्ष महादेवक पूरा बखिया उधेड़ देलनि।कहलथिन ---'नशाबाज आ बताह कतहु पंचैतिया होअए !' विष्णु शंकरक गपसॅ सहमत भेलाह।मुदा हुनका क्रिया- कलाप के सही ठहरौलनि ।

-------' यौ विष्णु,हम अहाॅ ल' ग अयलहु जे महादेवक निर्णयके अहाॅ कैंसिल क' देबैक , मुदा अहाॅ त' युग जितलहु।एकटा घरवालीक खर्चा जोड़बामे त' पुनः: प्रात लोकके होइत छै।अहाॅ दू- दूटा विआह कयने छी ।छलसॅ कतेको हत्या केने छी ।एहन पापी हमर पंचैती की करताह ?अहाॅ दूनूगोटे हमरासंग ब्रह्मा ल' ग चलू ।सृष्टिकर्ता त' वैह छथि ने ।' शंकर बाबूक आग्रहपर विष्णु आ महादेव ब्रह्माक समक्ष उपस्थित भेलाह ।अपन- अपन पक्ष तीनूगोटेके रखबाक अवसर प्रदान कयलनि।

महादेव आ विष्णुके जखन अपन पक्ष राखल भ' गेलनि त ' शंकर बाबू सॅ ब्रह्मा आग्रह कयलनि ---- ' अहाॅके अपना प्रसंग की कहबाक अछि से कहू '।

शंकर बाबू ---' औ ब्रह्मा जी ,हम अपनेक ओहिठाम एहि दूनूके इएह सोचि अनलहु जे अपनेल'ग हमरा न्याय भेटत ।विष्णु आ महादेव दूनूगोटे एक पेट क' नेने छथि ।महादेव चित्रगुप्तके कनखी मारि क' हमर पृथ्वीलोकपरक की हिसाब - किताब अछि से मॅगलथिन ।हम ई दाॅव नहि चलय देबनि ।चित्रगुप्त हमरा प्रसंग सभटा झूठक पुलिन्दा आनि क' राखि देलकनि ।महादेवसन कंगाल आ बताह कतहु चौरासी लाख योनिक जीवक मालिक होथि ।नाक उॅच आ कान बुच ।ई त' सतत उनटे - फेरीमे लागल रहैत छथि ।'

 

' अहाॅक सभ गप बुझलहु ।अहाॅ की कहय चाहैत छी?अहाॅक अभिप्राय हम नहि बूझि सकलहु ।' ब्रह्मा शंकर बाबूसॅ कहलथिन ।

------' नहि, नहि, अहाॅ हमर सभ बात बूझियो क' अनठा क ' पूछि रहल छी । अहूॅ विष्णु आ महादेवक पक्ष लेमय चाहैत छियनि । छिलका छोड़ा क' हम सभ किछु अहाॅके कहलहु अछि । तखन त ' चोर - चोर मसियौत भायबला गप अछि ।गलती हमर अछि जे अहाॅ ल'ग पंचैती कराबय अएलहु ।अहाॅक नाम पाॅच मुंह वला'पंचानन' सेहो अछि ।सरिपहु तें अहाॅक ई दशा अछि। पृथ्वी लोकमे त ' एकटा मुहके भरल पार लगिते नहि छैक आ स्वर्गलोकमे अहाॅक पाॅचटा मुंह के के भरत ?एतय अहाॅके सभ नीच बुझैत अछि ।ताहि दुआरे सहरजमीनहिपर लोक अहाॅक पूजा करैत अति ।ओहो विध - विधानसॅ नहि ।एकहिबेरि जल ,फूल, चानन, अक्षत आदि अर्घामे ल' समर्पित क' दैत अति।अहाॅ तीनूगोटे मिलि क' हमरा बापक विआह आ पितियाक सगाइ देखाबय चाहैत छी ।हम अहाॅ तीनूगोटेक कहियो कोनो अधलाह नहि कयलहु तैयो भेंड़ा - महिसिक कानि हमरापर रखने छी।' शंकर बाबू अग्निश्च- वायुश्च होइत बमकि उठलाह।

ब्रह्माबजलाह----'यौ शंकर बाबू, चित्रगुप्तक गोपनीय रिपोर्ट झूठ नहि भ ' सकैत अछि।पृथ्वीलोकपर अहाॅक समय पूरा भ' जयबाक कारणे अहाॅके एतय यमदूतक माध्यमसॅ बजाय लेल गेल अति।एहिमे अधलाह की ?'

' यमदूत घर छोड़ि घुरमुरिया खेलबाय रहल छथि ।झूठक जालमे फॅसाय धोबिया पाट मारय चाहैत छथि।ई सोचिए शंकर बाबू गम्भीर होइत कहलनि --- 'हम अहाॅ तीनूमेसॅ ककरो फैसला नहि मानैत छी।अहाॅ लोकनि मुंह देखि मुंडवा परसैत छी ।सूनू, इन्द्र त' सभहक राजा छथि ।तीनूगोटे हुनकहि ल'ग चलूं।ओ त' सुप्रिम कोर्ट छियैक कि ने ।औ दूध आ पानि दूनूके बराक क ' देता ।'

अन्ततोगत्वा ब्रह्मा, विष्णुआ महादेव तीनूगोटे शंकर बाबूकसंग देवराज इन्द्र के सभामे पहुचलाह।इन्द्र एहि चारु गोटेकै अएबाक कारण पुछलनि।शंकर बाबू विनतीपूर्वक अपन पक्ष रखैत बाजि उठलाह ---' हुजूर!महादेवा आदेशपर यमदूत हमरा जबर्दस्ती पकड़िके ल' अनलक।हम कतबो कहैत रहि गेलियैक जे एखन हमरा अमाशय उखड़ि गेल अछि, निराल पानि पेटसॅ जाय रहल अछि ।कने मोन ठीक होमय दैह त' हम अबैत छी ,मुदा के मानैत अछि ।चण्ठ हमरा पकड़ने ल' गेल।फल भेल जे भरि बाट धोतिअहिमे ततेक पानि चुरुकि गेलहु जे यत्र- तत्र धोती पीयर भ' गेल अछि।कने पानिक बन्दोबस्त कतहुसॅ करय कहलियै सेहो नहि कयलक।यमदूत त ' साक्षात चंडाल थिक।'

इन्द्र समस्याक गंभीरता देखि कहलनि ----' सूनू,यमदूत अपराध अवश्य कयलक अछि ।ओकरा बाटमे पानिक जोगाड़ क' देबाक चाहैत छलैक ।अहाॅके जाहि समयमे अनबाक आदेश भैटल छलैक ओहि समय पर अहाॅके लाएब आवश्यक छलैक तें अनलक ।शौचकलेल जलक इन्तजाम यमदूत नहि कयलक तें सात बेरयमदूत कान पकड़ि क' उठा-बैसी करथु ।'

शंकर बाबू एहि पंचैतीसं खुश नहि भेलाह।ओ हाथ जोड़ि इन्द्रके कहलनि--' अपने राजा छी जॅ हमर जी- जान बकसि दी त' किछु बाजी ।' इन्द्र हुनका निर्भीक भ' बाजय कहलनि।

----' हजूर, अपनेक न्यायसं हम संतुष्ट नहि भेलहु ।अरे थे हरि भजन को औटन लगे कपास ।हमरा त' अपने मुहे भरे खसाय देलहु।अहाॅ त 'तेहने डाही छी जे सत्यवादी हरिश्चन्द्रके विश्वामित्रक माध्यमसॅ तेहन ने पेंचमे फॅसा देलियनि जे हुनका जीवनभरि रन-बोनक पात तोड़य पड़लनि ।वृन्दावन आ मथुराक इलाकामे तेहन वर्षा क' देलियैक जे बाढ़िक प्रलयसॅ लोकके भगबाक बाट नहि भेटैक।' शंकर बाबू उकटि क' हाथ क' देलनि --' सभ केओ दक्षिणेश्वर काली ल'ग चलूं।ओ जे कहतीह से हम यानि लेब ।'

शंकर बाबू सबके नेने दक्षिणेश्वर कालीकट समक्ष उपस्थित भेलाह ।सभटा वृत्तान्त हुनका सुनाया देलनि।दक्षिणेश्वर काली ब्रह्माके एकान्तमे बजाय कहलथिन ---' अहाॅ घर छोड़िए एतेक घुड़मुड़िया किएक खेलाय रहल छी ।कने दिमागसॅ काज लिंक ।अहाॅ के छी कने सोचूं ।जे किछु पृथ्वीलोकमे हिनकर कृत्य कैल छनि ताहि आधार पर शंकर बाबूक देहपर कुशसॅ जल छींटि हिनका छोटकी चुट्टीमे पृथ्वीलोक पठाय दिअनु ।'

ब्रह्माके अपन प्रभुत्वक भान भेलनि। शंकर बाबू के झट कुशसॅ जल छींटि पृथ्वीलोक विदा क' देलनि । 'ने ओ नगरी, ने ओ ठाॅउ ।'

 

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