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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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आभा झा, दिल्ली

प्रेमक अद्वैतक अद्भुत आख्यान -हीना

आइ व्यावसायिकताक एहि युगमे जखन सभ मानवीय भावना लेन-देनक बटखरा पर जोखल जा रहल अछि,

रक्त-सम्बन्धोक पवित्रता धोखरिक' बेदरंग भए गेल अछि, वैवाहिक संबंध प्रेमक नहिॅं, आर्थिक- सामाजिक- समृद्धिक नेओं(नींव) पर ठाढ़ कएल जा रहल अछि,निष्काम मैत्री आ निःस्वार्थ सम्बन्धक गप मात्र पोथीक शोभा बनिक' रहि  गेल छैक, ओहेन समयमे श्री केदारनाथ चौधरीजीक 'हीना' नामक उपन्यास पढ़ब हृदयकेँ एकटा सुखद अनुभूति आओर आत्मिक आनन्दसँ भरि दैत अछि।

वस्तुत: साहित्यकार समाजक सृष्टि आ स्रष्टा दूहू होइत अछि।ओकरा जेहन दुनियां रुचै छै,ओहने दुनियांक सृजन ओ साहित्यक माध्यमसॅं करैत अछि आ एहि तरहेँ ओ समाजक सोझां एकटा उदाहरण सेहो रखैत अछि। संभवतः लेखकक हृदयकेँ समंधक नाम पर भ' रहल वणिग् वृत्ति औंटैत होनि,प्रेमक नाम पर मांसलताक प्रसार विरक्त करैत होनि अथवा जाति-धर्मक सिक्कड़िमे कुहरैत घाहिल प्रेमक पीड़ा विह्वल बनबैत होनि, फलस्वरूप ओ कल्पनाक यान पर चढ़ि सात्विक, निर्मल, परस्पर नितान्त समर्पित सिनेहक यात्रा करबा आ करयबा लेल प्रस्तुत भेल होथि।अस्तु!

'हीना'(हिना) शाब्दिक अर्थ होइत छैक मेंहदी। मेंहदी आ प्रेमक तुलना अत्यन्त स्वाभाविक- पीसैत कालहुमे मेंहदीक सुगन्धि वातावरणमे पसरि जाइत छैक,मेंहदी जकाँ प्रेमोक रंग धीरे धीरे चढ़ैत प्रगाढ़  होइत छैक। ओएह मेंहदी जखन हाथ पर रचाओल जाइत छैक,हाथक शोभा अद्वितीय भए जाइत छैक ,तहिना प्रेमक अनुभूति आ आस्वाद जीवनकेँ सुन्दर बनबैत छैक,परमानन्दक भूमिमे ल' जाइत छैक।

        केदारनाथ चौधरीजीक एहि उपन्यासक भावभूमि शाश्वत, निर्मल, निष्काम प्रेम  थिक जे भौगोलिक- सांस्कृतिक - धार्मिक परिधिसॅं मुक्त पल्लवित- पुष्पित  होइत अछि आओर अपन सौंदर्य आ सुवाससॅं समाजमे सकारात्मक परिवर्तन अनबामे सफल होइत अछि ।किन्तु प्रेमक बाट कतौ आसान भेलै अछि? बिनु तपस्यें जखन पार्वतीओकेँ शिव नहिॅं भेटलखिन, तखन सामान्य जनक त कथे की?

प्रेमानुभूतिक प्रबल वेगसॅं उद्दीपित शिव कुमार आ हिना वैवाहिक बंधनमे बन्हा त' जाइत छथि, मुदा ओ दुन्नू बिसरि गेल छलाह सामाजिक अनुशासन, जाति- धर्मक सुदृढ़ प्राचीर, उचित- अनुचितक समाज- स्वीकृत मापदंड! परिणामो स्वाभाविके! जाही क्षण धर्मक बाह्य आवरणकेँ चरम-परम कृत्य माननिहार  शिबूक पिताकेँ सत्यक पता चललनि,पुश्त दर पुस्तक संचित संस्कार आ  विश्वाससॅं उपार्जित अहंकार पर वज्रपात भेलनि ।ओ तत्क्षण पुत्रकेँ शरीर- स्पर्शक अधिकारसॅं वंचित कए प्राण त्यागि दैत छथि।आब संगीतक मधुर- मोहक- कोमल दुनियांमे रहनिहार सामाजिक- व्यवहार- ज्ञान-शून्य शिबूकेँ अचक्के लागल यथार्थक कठोर आघात सहि नहिॅं  होइत छनि , ओ विधनाक निर्मम निष्करुण निर्णय देखि   हतबुद्धि भए  कतौ निरुद्देश्य बहरा जाइत छथि!

एम्हर गामक संस्कार- व्यवहारसॅं अनभिज्ञ हिना अचानक भेल एहि कुकाण्डसॅं  हतबुद्धि अवश्य भेलीह किन्तु कर्तव्य ज्ञानशून्य नहिॅं। ओ धैर्यपूर्वक शिबूक सभ कर्तव्य संपादित करब अपन धर्म बूझि हुनक पिताक श्राद्धादिकर्म  अप्रत्यक्ष रूपेँ  शिबूक मित्र ठक्कन आ कल्लूक सहायतासॅं सम्पादित करबैत छथि।ओ यवन पिता आ ईरानी मायक संतति होइतो हिन्दू धर्मक विवाहक एहि मंत्रक साकार रूप में अनैत छथि -

" मे हृदयं ते हृदये निदधानि' अर्थात् ह'म अपन हृदय अहाँक हृदयमे रखैत छी-जखन मम-परक भेदे तिरोहित ,तखन केहन पार्थक्य?

  कैलिफोर्नियाक  सुविधापूर्ण जिनगीक मोह छाड़ि ओ तपस्विनीक जिनगी जिबैत प्रतीक्षा करए लगलीह अपन प्रियतमक, हुनकहि गाम आ हुनकहि घ'रमे! कहियो त' भक्क टुटतनि शिबूक,कहियो त' मोन पड़थिन पत्नी! एत' प्रेमक पराकाष्ठा अछि,मिलनक अधीरता अछि,धरतीक धैर्य अछि आ अछि  प्रतीक्षाक अनन्त घड़ी! पचास बरख धरि शिबू बताह बनल रहलाह,पत्नीसॅं दूर पड़ाइत रहलाह परञ्च हिनासॅं हीरा मौसी बनलि तपस्विनी हुनकहि गाममे शिक्षाक प्रसारमे,कर्मोन्मुखताक निदर्शनमे,गामक तरक्कीक ब्योंतमे स्वेच्छासॅं अनाम जिनगी जिबैत रहलीह।ओ अपन व्यक्तित्व ग्रामीण संस्कृति आ परिवेशमे मात्र मिज्झरेटा नहिॅं कएलनि, अपितु विलीन क' लेलनि अपन स्वतंत्र सत्ता! हुनक प्रेम कायिक नहिॅं अपितु आत्मिक छलनि आ तैं विकल- विषण्ण होइतो शान्त छलीह,कानि-खीझि नहिॅं, परोपकारमे अपन जिनगी बिता रहल छलीह। करुणरस सम्राट् भवभूति संभवतः प्रेमक एहि अद्वैतक अनुभव करैत लिखलन्हि अछि-

 

अद्वैतं सुखदु:खयोरनुगतं सर्वास्ववस्थासु यत्

विश्रामो हृदयस्य यत्र जरसा यस्मिन्नहार्यो रस:

कालेनावरणात्ययात् परिणते यत् प्रेमसारे स्थितं

धन्यं तस्य सुमानुषस्य कथमप्येकं हि तत् प्राप्यते ।।

 एम्हर सामाजिक व्यवस्थाक भंजनक प्रभावेँ पिताक देहांतक आघातसॅं मतिविशेष भेल शिबू अपराध- बोध आ ग्लानिक भार ढोऐत वैवाहिक संबंध स्वीकार करबाक साहस नहिॅं कए सकलाह, मुदा हृदयमे प्रेमक विशुद्ध भाव गहीरसॅं गहीरतर होइत रहलनि,जमा होइत होइत घनीभूत भ' गेलनि  आ फूटि पड़लनि करुणाक उद्रेकक रूपमे।पहिनहुँ हुनक स्वरमे माधुर्य आओर करुणाक संगम छलनि मुदा आब त' हृदयसॅं बहरायल निछच्छ पीड़ाक उद्गार पाथरकेँ पानि बना रहल छल। बौआइत रहैत छलाह, मुदा घुरि-फिरि अबैत छलाह ओही गाममे,जत' हुनक जड़ि छलनि,जत' मित्र छलनि आ जत' प्राणवल्लभा पत्नी निष्कम्प दीपशिखा जकाँ एसकरि जरि रहल छलीह।

कहल जाइत छैक वेदना संगीतक उत्स होइत छैक।क्रौञ्च युगलमेसॅं एकटाक वध आ दोसरक करुण चीत्कार

आदिकवि वाल्मीकिक कवित्वक प्रस्फुटनक कारण बनल,शोके श्लोक बनि गेल छलै।तहिना करुणासॅं  पोर पोर तीतल शिबूक संगीतक टाहि हिना आ ठक्कन- कल्लूक संग समस्त गामक लोककेँ द्रवित करैत छलै।

प्रेमक पराकाष्ठा आ अनन्त प्रतीक्षाक प्रतीक एहि अनाम अपूर्ण प्रेमक साक्षी छलथि मात्र दू गोट व्यक्ति- ठक्कन- यानी मालिक बाबा आ कल्लू!

प्रेम प्राप्तिक स्थितिमे संकुचित भ' जाइत अछि मुदा विप्रलम्भमे ओएह प्रेमक व्याप्ति सीमाहीन भए जाइत छैक,ओ सभहक भए जाइत छैक,सभहक कल्याणक कारण बनैत छैक।

उपन्यासक मूल विषय- वस्तु हिना ओ शिव कुमारक प्रेम, अनुपम त्याग, सर्वस्व समर्पणक पवित्र आख्यान एवं अर्धनारीश्वरक संकल्पनाक निदर्शन अछि, मुदा प्रेम प्राप्तिक पर्याय नहिॅं बनि सकल ,ओ रहल मौन, पवित्र ,निर्मल- एकदम गंगाजल सन!

 अवश्य उपन्यासक आवश्यकतानुसार घटनाक्रममे आओर आनो आन पात्र सभ छथि,साधूपुरा सन छोट गामक सिमानमे होइत राजनीतिक कदाचारो अछि, छोट- छीन स्वार्थक लेल दोसरक जीवन सुड्डाह करबाक क्षुद्र प्रवृत्तिओ अछि, प्रेम आओर वासनाक घालमेल सेहो अछि (पार्वती- गगन ,कोबी आदि चरित्र में), मुदा मित्रताक निर्मल भावना आ दू प्रेमीकेँ मिलयबा लेल समस्त युवावर्गक एकता ओहि सभ कुत्सित भाव पर भारी पड़ैत अछि। शिबू-हिनाक बाद जखन मंगली आ गंगाक प्रेम जाति- पातिक सिमानकेँ तोड़ैत उत्फाल होइत अछि त' सामाजिक कायदा- कानूनक कारण  आजीवन एकाकीपनक दंश सहबा लेल विवश हीरा मौसीक संग  सामाजिक वर्जना आ दबावक कारण विक्षिप्तताक कगार पर पहुंचल शिवकुमारो डेरा  जाइत छथि आ दूनू प्रेमीकेँ मिलयबा लेल पचास बरखक बाद एकसंग गाम तेजि दैत छथि। एहि तरहेँ लेखक  उपन्यासकेँ सुखान्त बनबैत छथि।

 संक्षेपमे एतबहि जे उपन्यासक शीर्षकक अनुरूप हिनामे सहज प्रेमक रंग, निश्छल त्यागक सुवास, सौंदर्यक विलक्षणता आ सकारात्मकताक तिलिया-फुलिया अछि आ एतेक गुणक कारण सहृदय पाठक लेल सुग्राह्य अछि।

 

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