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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

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जगदीशप्रसाद मण्डल

सघन बन

भोरमे अनचोके नीन टुटिते लाल भाइक मुहसँ अनायासे निकललैन- “बाप रे! जीब कठिन अछि..!”

ओना, नीक जकाँ लाल भाइक भक् टुटल नइ रहैन, भकुआएलमे मुहसँ निकललैन। ओछाइनपर सँ उठि ठाढ़ भेल रहैथ। तइसँ किछुए पहिने पत्नी उठि घर बहारि रहल छेलखिन।

पतिक बात सुनि सुचित्रा भौजी मने-मन विचारि लेली जे भरिसक सपनाएल मन छैन तँए मुहसँ एहेन बोल निकललैन। एहनो भऽ सकैए जे सपना देखते समय नीन टुटि गेल हेतैन, तहूसँ एना बजला अछि। ..मुँहक बातकेँ, सपनेक बात बुझि सुचित्रा भौजी झुठियाबए लगली। ओना, मनमे ईहो उठैत रहैन जे सुतैकाल, ओछाइनपर अबैसँ पहिने नीक जकाँ हाथ-पएर नइ धोने हेता तँए सपनेला अछि। फेर भेलैन जे जँ हाथ-पएर धोनौं होथि आ ओछाइनकेँ नीक जकाँ झाड़ि कऽ नहि ओछौने होइथ? मुदा अपने मन रोकैत कहलकैन जे ओछाइन तँ अपनेसँ झाड़ि कऽ ओछौने रही..! लगले फेर दोसर विचार जगलैन, एहनो तँ भइये सकैए जे पैशाव करि कऽ नहि सुतल होइथ।

अनिसचित विचार सुचित्रा भौजीक मनमे उठने निसचित विचार जगबे ने केलैन।

घर बाहरब छोड़ि सुचित्रा भौजी लाल भाइक चेहरापर नजैर देलैन। बसियाएल फूल जकाँ लाल भाइक चेहरा मौलाएल सन बुझि पड़लैन। पतिक चेहरा देख सुचित्रा भौजी किछु पुछैसँ पहिने परहेज करैत सोचली जे दिनक वा खाइ-पीबै राति तकक जँ बात रहैत तँ निर्भिक भऽ पुछलो जा सकइ छल मुदा लगले बिछानपर सँ निनाएल उठबे केला हेन। ई तँ ओहन अवस्था छी जखन कियो समाधि सम्पन्न करैत उठै छैथ। ई अवस्था दुनियाँ-दारीसँ हटल रहैक होइए, तइ बीच दुनियाँ-दारीक ओहन विषये किए सोझामे औत जे एना चौंक कऽ बजला..? ...किछु बजैसँ परहेज करैत सुचित्रा भौजी अपन मुँह बन्ने रखली।

लाल भायकेँ ओछाइनपर सँ उठिते पत्नीपर, माने घर बहारैत सुचित्रापर नजैर पड़ि गेने चेत एते चेतनशील भइये गेल रहैन जइसँ मनमे उठैत अनेको दृश्यकेँ मनेमे दाबि अनमनस्क भेल विचारि लेलैन जे मनक देखल दृश्यकेँ मने-मन किए ने मँथली जे आखिर एहेन दृश्य मनमे आएल केना? देखल दृश्य जँ दोहरा कऽ अबैए तँ ओ उचित भेल मुदा बिनु देखल ओहन दृश्य जँ अबैए तँ ओहन दृश्यक रूप मनमे बनल केना? तँए अनमनस्क ठाढ़ भेल लाल भाय विचारए लगला। भोरक सपना। भोरक सपना तँ सत् होइते अछि, की दृश्य देखलौं? यएह ने देखलौं जे जीवन विचड़नक बीच सघन बन पहुँच गेलौं, जइमे सुन्दर-सुन्दर गाछो-बिरीछ, झड़नो-पहाड़ आ बाघ-सिंह आ भालु सन जानवरो अछि। तइ बीच जीब केना सकै छी? जी-बन माने जिनगी बना जीब कठिन अछिए। मुदा लगले मन ठोस गबाही दैत कहलकैन जे कठिन जरूर अछि मुदा असम्भव अछि, सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। जँ से रहैत तँ फेर जीवक जीवन अछि की नहि..!

चौंकल मन लाल भाइक छेलैन्हे, अपन पूर्वज मोन पड़लैन। राजा हरिश्चन्द्र सपनेमे ने राज-पाट सभ बोहा लेलैन। मुदा ई विचारबे ने केलैन जे राज-पाट राजवासीक छिऐक आकि अपन खतियानी छी..!

लगले लाल भाइक मन मोड़ लेलकैन। मोड़ ई लेलकैन जे भोरमे सपना देखलौं। मुदा भोरक सपना कहब केकरा? जँ समयपर सुतल रहितौ, जइसँ नीन पुरि गेल रहैत आ उठैसँ पहिनहि भोरमे जँ सपना देखने रहितौं तखन, एक बात होइत। मुदा भरि राति आन-आन काजमे बाँझल रही आ भोरमे पलखैत भेलापर अराम करए ओछाइनपर गेलौं कि नीनक संग सपनो चलि आएल, एहेन सपनाकेँ कोन सपना कहब? ई तँ भेल जे विद्यालयमे नाओं लिखौलौं आ स्नातकक सुख मनमे नाचए लगल वा आमक आँठी रोपलौं आ मने-मन आम-चूरा खाए लगलौं..! असल सपना तँ ओ ने हएत जे विद्यालयमे प्रवेश केलौं आ एक-एक अक्षरकेँ सीखि ओकरा जोड़-घटाउ, गुणा-भाग करैत स्नातकक श्रेणीमे पहुँच अपनाकेँ स्नातकक सुख देब। आकि तुलसीकृत रामायणिक एक पाँति- ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज्य कबहुँ नहि व्यापा...।’ रटि लोकक बीच प्रवचन केना दऽ सकै छी। आम-चूरा खाइसँ पहिने, चूरा केना बनैए आ आममे सुअदगर रस वा गुद्दा केना अबै छै; तेकरा जखन मनमे मथि लेब तखन ने मैथिली शब्द बुझबै। तैबीच बुलेट गोलीसँ टिटही मारू आ गुलेतीक गुल्लीसँ सिंहक शिकार खेलै जाउ...। तुलसी बाबा तमसा कऽ रामायणमे ई पाँति लीखि देलैन सेहो बात नहियेँ अछि। ओ देह आ आत्माक स्पष्ट व्याख्या करैत लिखला अछि। खाएर जे अछि ओ रामायणिक बात भेल। किए तँ तुलसी दास सेहो सगुन रूप रामेकेँ पूज्य मानि जीवन भरि पूजन करैत रहला आ कबीरो दास रामेकेँ पूज्य मानि जीवन भरि पूजन करैत रहला मुदा दुनूक राम एके छैथ वा गुण-शीलक हिसाबसँ दू छैथ ओ तँ वएह दुनू गोरे अपन पनचैतियो करता आ कातमे बैस आत्मारामो देखबे करता। तइसँ लाल भायकेँ कोन मतलब छैन। हुनकर मन तँ अपने भोरक चक्रमे भौराएल छैन। तइ बीच सुचित्रा पुन: लगमे आबि बजली-

“घरेक बरेड़ी मने-मन गनैत रहब आकि भोर भेल दुनियोँ गनए जाएब..?”

पत्नीक बात सुनि लाल भायकेँ तामस नहि उठलैन। नइ उठैक कारण भेलैन जे भौराएल शब्द पत्नीक मुहसँ सुनलैन। भौंरे ने दिनक अन्तिम पहरमे कमलक सिनेह पेब, अपने-आपकेँ समरपित करैत बिसरभोर होइत भोरक पहर कमलकेँ छोड़ि दुनियाँ देखए उड़ैए। ओना, लाल भाइक मन कमल आ भ्रमरक बीच जरूर गेलैन मुदा बेसी काल टिकलैन नहि। लगले अपन सपनाक दृश्य सोझहामे फेर आबि गेलैन। अपन मनक सपनाकेँ मनेमे दाबि विचारए लगला। जँ अपन मनक सपनाकेँ पत्नीक सोझमे खोलब आ ओ अँगने-अँगने टहैल-टहैल परसादी बाँटए लगती, माने आन-आनकेँ कहती, अनेरे होत्-सँ-होतान हएत। किए तँ कम आँट-पेटक लोकक कानमे, कोनो गम्भीर विचार वा पैघ विचार, गेने अनेरे कान कुकुअए लगैए आ जेहो विचार लोककेँ कहैबला नहि रहल सेहो विचार लोकक बीच बीआ-वाण (छिटा) भऽ जाइए। पत्नीपर सँ मन हटि लाल भायकेँ अपन सपनापर आबि गेलैन। अबिते मन कहलकैन जे अपने तँ सपनाक अस्सल विचार किछु बुझि नहि रहल छी, आ दोसरकेँ पुछि जँ बुझि नहि लेब तखन अनेरे मनमे बोझ बनल रहत जइसँ ने कोनो काज करैमे मन लागत आ ने असथिरे रहि पएत। जँ बलजोरी किछु करबो करब तँ नीको-अधला बनि सकिते अछि। सघन बोनकँ कातसँ देखते जहिना मन डरेबो करैए आ हेराइक सम्भावना सेहो रहैए तहिना लाल भाइक मनमे भऽ रहल छेलैन। ने किछु करैत बनि रहल छेलैन आ ने किछु नहि करैत बनि रहल छेलैन। गुन-धुनमे पड़ल मनमे उठलैन जे जाबे मनुख अपन गुन-धुनकेँ धुनकीमे धुनि रूइया जकाँ हल-हलका नइ लेत ताबत अकासमे उड़ि केना सकैए। तइले ते कोनो ज्ञानी, जानकारसँ पुछिये कऽ ने ओकर गुणनक्रिया कऽ सकै छी।

 

सौनक मेघ जकाँ लाल भाइक मन उमैड़ कऽ घुमड़लैन। घुमैड़ते विचार उठलैन जे अपन परिवारे नहि, गामोक लोक गुरुकाकाकेँ सपनोक पारखी आ जीवनोक पारखी बुझै छैन तँए हुनकासँ पुछि लेब बेसी नीक हएत...। लाल भाइक मन मानि गेलैन जे गुरुकाकाकेँ अपन पेटोक सभ बात आ सपनोक सभ दृश्य सुनौलासँ किछु-ने-किछु रास्ता भेटबो करबे करत। जँ संतोषप्रद, सवुरगर विचार भेटत तँ ओइपर अमल करब आ जँ से नहि भेटत तँ या तँ आगू बढ़ि दोसरोकेँ पुछबैन वा ताधैर अमलमे नहि आनब जाधैर सपनाक फलाफलक आगमन नहि हएत।

गुरु कक्काक असल नाम ज्ञानदेव छिऐन, जे लाल भाइक पितियौत बाबाक सम्बन्धमे लगै छैन। जहिना आनो-आन लोककेँ माता-पिता वा समाजक देल छठियारीक नाओं तर पड़ि जाइए आ कर्मगत वा बेवसायगत नामक सिरजन भऽ जाइए, तहिना ज्ञानदेव काकाकेँ सेहो भेलैन। ‘ज्ञानदेव’ नाम बुढ़े-पुरान टा जनै छैन, माने छठियारी रातिक देल नाम, बाँकी नवको पीढ़ी आ पुरानो पीढ़ीक ओहन लोक जिनका ज्ञानदेव कक्काक छठियारीक नाम नहि बुझल छैन, गुरुए-कक्काक रूपमे जनै छैन। ओना, तइमे एकटा विशेष बात ईहो भऽ गेल छैन जे अपन छोट भैयारियो आ जे बेटा-भातीजक अंगीतमे छैन सेहो आ जे तेसर पीढ़ीक नाति-पोताक अंगीतमे छैन सेहो, सभ गुरुए काका कहै छैन।

लाल भाय गुरुकाका ऐठाम अपन सपनाक विचार करैक खियालसँ विदा भेला। पत्नीकेँ किछु ने ओइ विषयमे कहलैन। कहलैन खाली एतबे जे कनी गुरुकाका-ऐठाम एकटा काजे जाइ छी।

ओना, सुचित्रा भौजी सेहो, जखनसँ लाल भाइ ओछाइनपर सँ उठला आ मनक संग चेहरो मौलाएल-मौलाएल सन बुझि पड़लैन तखनसँ मने-मन हिनके-दे सोचि रहल छेली, मुदा ‘हँ-हूँ’ किछु बाजि नइ रहल छेली।

भिनसरक आठ बजे समय। फागुन मास, तँए समयमे मस्ती आबि गेल छल। गुरुकाका पार्वतीपुरक घटनापर विचार कऽ रहल छला। अजीव घटना पार्वतीपुर महंथानाक अछि..! कहियासँ महंथाना स्थापित भेल से तँ नहि बुझल अछि मुदा पाँच पुस्तसँ, लगभग डेढ़ साए बर्खसँ तँ जरूर बुझल अछि। अखन जे महंथानाक महंथ छैथ हुनकर नाओं शंकरदास छिऐन। हिनकासँ पूर्व शंकरदेव दास छला। शंकरदेव दाससँ पहिने महादेव दास छला। महादेव दाससँ पहिने देवदास छला आ देवदाससँ पहिने शंकरदास छला। अखन जिला-जवारमे सभसँ नमहर पार्वतीए-पुरक महंथाना अछि, जे देशक राजधानी जकाँ अछि। अखन तक पार्वतीपुर स्थानक चलैन रहल अछि जे महंथजी गाइयक दूधसँ दुनू साँझ नहाइ छैथ। घटना ई भेल जे परसू रातिमे महंथजीकेँ अपने चोरी भऽ गेलैन। ऐठाम अष्टघातुक मूर्तिक चोरी नहि, जीवित महंथजीक चोरी भऽ गेलैन। अजीव घटना तँए अछि।

गुरु कक्काक मनमे सिनेमाक रील जकाँ पार्वतीपुरक महंथक घटना चलए लगलैन। ओना, आँखिक देखल घटना छेलैन नहि। किए तँ आँखिक देखल वा कानेक सुनल कोनो वस्तु वा घटना किए ने होउ मुदा देखला पछाइत वा सुनला पछाइत मन तँ मनन करिते अछि। तहिना गुरुकाका सेहो ओकर जोड़-घटाउ-गुणा-भाग कऽ रहल छला। घटना भेल केना? चारिम दिन करीब चालीस-पचासटा दाढ़ी-केश बढ़ौल बबाजीक रूपमे बैग-एटैची नेने अयोध्यासँ जनकपुरक तीर्थयात्री कहि पार्वतीपुर-स्थानपर पहुँचल। एक तँ अयोध्या वासी, एकर माने साकेत नहि बुझब, दोसर जनकपुरक तीर्थयात्री, तँए स्थानमे नीक जकाँ आगत-भागत सभकेँ भेलैन। ने खाइ-पीबैक कमी स्थानमे आ ने खुऔनिहार-पीयौनिहारक कमी। सभकेँ रहैक नीक बेवस्थो भेलैन। साँझक करीब आठ बजे साए-डेढ़ साए यात्री फेर पहुँचल। सबहक आगत-भागत नीक जकाँ भेलैन। निसभेर रातिमे घटना भेल। महंथजी ला-पता भऽ गेला। दिनमे, जे तीर्थयात्रीक समूह छल ओ स्थान पकैड़ लेलक आ जेते पहिलुका सभ छला सभकेँ साए-साए बेर कान पकैड़ उठा-बैसा पुन: स्थानमे रखि लेलकैन। गुरुकक्काक मुहसँ अनायासे फुटलैन- “हद भऽ गेल..!”

ओना, गुरुकाका असगरे छला, दोसर कियो सुननिहार नहियेँ छल, मुदा तहीकाल लाल भाय जे पहुँचला से अझप्पे सुनलैन।

गुरुकक्काक मुहसँ सुनल- ‘हद भऽ गेल!’ सुनि लाल भाइक मन अपनो दिस ठहकलैन जे अपनो तँ हद पार कइये नेने छी...। गुरु कक्काक लगमे लाल भाय पहुँचते बजला-

“गोड़ लगै छी गुरुकाका..!”

गुरुकक्काक मन पार्वतीपुरमे टहैल रहल छेलैन। तैबीच ‘गोड़ लगै छी’ सुनिते गुरुकाका चौंकैत बजला-

“नीके रहह बौआ! तोरासँ भेँट करैक मन केता दिनसँ होइ छल, मुदा पलखतिक दुआरे जा नहि पबै छेलौं। भने तूँ आबिये गेलह। कहह, की हाल-चाल छह?”

गुरुकक्काक विचार सुनि, ओना लाल भाइक मुहसँ निकैल गेल छेलैन- ‘बड़बढ़ियाँ’, मुदा अखन तक जे मनमे अपन सपना लटैक कऽ झुलिये रहल छेलैन, तइसँ भिन्न गुरुकक्काक मुहसँ ‘हद भऽ गेल’ सुनि दोसरो-तेसरो विचार मनकेँ झुलझुला देलकैन, मुदा बजला नहि।

अपने मनक बातकेँ चालैत गुरुकाका बजला-

“बौआ सहदेव, पार्वतीपुरक घटनो किछु बुझलह अछि?”

ओना, अपन कानसँ एक गोटाक मुँहक बात सुनब एक बात भेल, आ वएह घटना वा कोनो विचार दू-चारि-पाँच-दस बेकतीक मुहसँ सुनब दोसर भेल। जे पहिलुकासँ पक्का भेबे कएल। मुदा ठीक एकर विपरीत, एक गोटाक मुहसँ कोनो अपना संग घटित भेल घटना वा अपना सोझमे घटित घटनाकेँ सुनब आ अपना संग बिनु घटल घटना वा बिनु देखल घटना वा घटित घटनाकारक मुहसँ नहि सुनि आनक मुहसँ सुनल सेहो होइते अछि। मुदा अपन मनक विचारमे नहि ओझरा लाल भाय बजला-

“मौगी-मेहैरिक मुहसँ जरूर किछु-किछु सुनलौं मुदा ओइपर धियान नहि देलिऐ, तँए बुझू जे नहियेँ सुनलौं अछि।”

शास्त्रीय विचारक लोक गुरुकाका छथिए, विचारकेँ छील-बना बजला-

“तखन तोरे समाचार विचारपूर्ण हेतह। की सुनलह से बाजह।”

गुरुकक्काक बात सुनि लाल भाय असमंजसमे पड़ि गेला। असमंजसमे ई पड़ला जे जेकरा हम मौगी-मेहैरिक बात बुझि मोजर नइ दइ छी, तेकरे गुरुकाका अस्सल विचार बुझै छैथ! ..लाल भाइक मनमे जेना उदवेग चढ़लैन तहिना बजला-

“काका, अखन बेटा-भातीजक सम्बन्ध नहि बुझू। हम संवाद वाहक भेलौं आ अहाँ संवाद ग्राहक भेलौं। तँए कहैमे एको रत्ती धकचुक्की नइ अछि।”

लाल भाइक बात सुनि गुरुकक्काक मन जेना चपचपा गेलैन तहिना चपचपीक संग मुहसँ निकललैन -

“बौआ सहदेव! परिवार हुअ कि समाज, सत् बात बजैमे एको पाइ धकचुकाइ नहि।”

गुरुकक्काक बात सुनि लाल भाइक मन फेर ओझरा गेलैन। ओझरा ई गेलैन जे एहनो तँ आँखिक सोझमे अछिए जे आँखि जेकरा देखलक चोरि करैत, न्यायालय ओकरा चोरि करैत नइ देखलक। तखन ओकरा की बुझब? मुदा लगले लाल भाइक मनक विचार आगू बढ़ि गेलैन। आगू बढ़िते मन सुझौलकैन जे केकरो मुँहक सुनले बात ने बाजब, तँए पहिने ओकरे नाओं किए ने अगुआ कऽ बाजी। ..लाल भाय बजला-

“काका, महिनाथपुरवाली भौजी ओही महंथानामे फूल तोड़ैक काज करै छैथ, वएह बाजल छेली जे महंथजी एकटा नअ-दस बर्खक चेलीक संग काशी घुमए गेला हेन। चोरी, माने महंथजीक चोरीक समाचार सोल्होअना अफवाह छी।”

लाल भाइक बात सुनि गुरुकाका बजला- “तोरे सुनलाहा विचार सत् भऽ सकैए, सहदेव।”

गुरुकक्काक मुहसँ ‘सत् विचार’ खसिते जेना लाल भाय चौंकैत चकोना होइत बजला-

“काका, हमर नाम अगुआ कऽ नहि बाजब जे सहदेव बाजल छल। महिनाथपुरवाली भौजीक नाओं अगुआ कऽ बाजब।”

गुरुकाका बजला-

“कहलह ते बड़ सुन्नर विचार, मुदा हमर कान तँ तोरे मुँहक बात सुनलक। अच्छा छोड़ह ऐ सभ बातकेँ, ने तूँ किछु महंथानाक समाचार पसारह आ ने हम पसारब। अनेरे दू-तीन घन्टा समय पानिमे चलि गेल।”

लाल भाय बजला-

“काका, आइ भोरमे जखनसँ सपना देखलौं तखनसँ मन डेराएल-डेराएल सन भऽ गेल अछि।”

लाल भाइक मुहसँ सुनल ‘डेराएल-डेराएल सन’ सुनि गुरुकाका लाल भायपर सँ नजैर निच्चाँ उतारि मने-मन विचारि बजला-

“सपना तँ सपना छी, ओइसँ डेरेबाक की अछि। ओना, सपनोक दू रूप अछि। जहिना अनुकूल आसक्ति आ प्रतिकूल आसक्तिक बीच अछि। एकटा जहिना अकास चढ़ा दइए तहिना दोसर, पताल दिस सेहो धकेलिये दइए।”

गुरुकक्काक विचार नीक जकाँ लाल भाय नहि बुझि सकला तँए मन अकबका गेलैन। मुदा लगले अपने मन सुझौलकैन जे जखन गुरुकाकासँ पुछैये-ले आएल छी, आ एक बेरमे नहि बुझि पबै छी, तँ किए ने दोहरा-तेहरा खरिआरि कऽ पुछि खरिआरि ली। ..लाल भाय बजला- “काका, एना झाँपन-तोपन दऽ कऽ बाजब तखन हम थोड़े बुझब। एक तँ अहाँ अपने ओहन लोक छी जे जेहेन लोक देखै छिऐ तेहेन वेष बना लइ छी। माने ई जे जिनकासँ गप करै छी हुनकर भाषो-शैली आ भावो-अभाव आ ओही भावो-अभावमे गप-सप्प करै छी। जे कोनो विषयकेँ जड़ियो-मूलकेँ खोजि निकालि दइए, आ कोनोकेँ झाँपि-तोपि मटिआइये दइते अछि।”

लाल भाइक बात सुनि गुरुकाका बुझि गेला जे सहदेव अपन बात माने सपनाक बात, जड़ि-मूलसँ बुझए चाहि रहल अछि। प्रश्नकर्ताक प्रश्नक भावनाक जेहेन गहराइ वा जेहेन छीछलपन होइए ओइ अनुकूल ओकर उत्तर देबे ने ओकरा-ले समीचीन होइए। अपनकेँ एक स्तरपर, माने जीवनकेँ एक सीढ़ीपर ठाढ़ करैत गुरुकाका बजला-

“बौआ, कनी जड़िसँ बुझा कऽ बाजह।”

गुरुकक्काक जिज्ञासा देख लाल भाय बजला-

“काका, निसभेर नीनमे रही। मनमे सपना जगि गेल। सपनाकेँ जगिते देखलौं जे ओइ सघन बन बीच पहुँच गेलौं अछि, जइ बनमे बाघ-सिंह-भालू इत्यादि खुनपीबा जानवर सभ भरल अछि। डर भेल जे आब जान नहि बाँचत। तही काल डरे नीन टुटि गेल।”

लाल भाइक विचारमे किछु एहेन विचार गुरुकाकाकेँ भेटिये गेलैन जे विचारणीय अछि, मुदा विषयकेँ माने सपनाकेँ हलकबैत गुरुकाका बजला-

“बौआ सहदेव, सपना सपना छी। सभ कि राजा हरिश्चन्द्रे छी जे सपनाक पाछू पड़ि असमसानक ओगरवाही करत।”

लाल भाइक मनकेँ सपना चोटाइये देने छैन जइसँ छाती थरथराइये रहल छेलैन मुदा तैयो विचारमे दृढ़ता अनैत बजला-

“काका, सपना जँ सपने होएत तखन लोककेँ लोक लग अनेरे बजैक कोन खगता छै। जहिना सपना देख सुति कऽ उठल तहिना बिनु देखल जकाँ अपन नित्यकर्ममे लगि जाएत, मुदा तैयो लोककेँ लोक किए कहै छै?”

लाल भाइक विचारक भवलोककेँ देखैत गुरुकाका बजला-

“बौआ, जखन सपनाक विचार करए चाहै छह तखन एक-एक शब्दक एक-एक अक्षरपर विचार करए पड़तह। ‘आगि लागल’ आ ‘अगिलगौन’, अक्षरक हिसाबसँ मोटा-मोटी एक्के अछि। मात्र एक अक्षर आ दू मात्रामे अन्तर अछि। तइमे अक्षरक रूप बदलने ‘न’ आ ‘ल’ सेहो बदैलते रहैए। आब तोहीं कहह जे दुनू- ‘आगि लागल’ आ ‘अगिलगौन’ एक्के भेल?”

विचारक प्रवाहमे लाल भाय बजला-

“से तँ नहि भेल।”

गुरुकाका बजला-

“बौआ, अपना सबहक बाप-दादाक अरजल यएह अमूल्य धन छिऐन।”

गुरुकक्काक मुहसँ, ‘बाप-दादाक अरजल अमूल्य धन’ सुनि लाल भाय चौंकैत बजला-

“की अमूल्य धन, काका?”

लाल भाइक आँखि-मे-आँखि गाड़ि गुरुकाका बजला-

“बौआ, दुनियोँमे आ अपनो ऐठाम विभिन्न सम्प्रदाय सभ अछि, जे अपना-अपना ढंगे दुनियाँक विचार केनौं अछि आ करितो अछि, तही विचारमे सपनो अछि।”

जेना कोनो पोखैरमे एकटा कमल फूल देख लोक बजबे करै छैथ जे ‘फल्लाँ पोखैरमे कमल अछि’, तहिना सम्प्रदायक जे पोखैर अछि ओइमे कमल नइ अछि सेहो बात नहियेँ अछि। सेहो तँ अछिए। तहिना देवी भागवतमे साधना, उपनिषदमे ज्ञान, कुरानमे समाजिकता, बाइबिलमे सेहो समाजिकता वेदमे विद्वतापूर्ण तर्क, हिन्दू धर्ममे व्यक्तिगत साधना आ गीतामे ज्ञान-साधना आ कर्मक समन्वय सेहो अछिए।

ओना, लाल भाइक मन वौआए गेलैन। वौआइक कारण भेलैन जे अपन पढ़ल एकोटा पोथी वा ग्रन्थ नहि छेलैन मुदा कानसँ तँ सुनितो आबिए रहल छैथ आ सुनबो करिते छैथ। बजला-

“गुरुकाका, दुनियाँ-जहानकेँ छोड़ू, अपने जान-जहानकेँ देखब बेसी नीक हएत। तँए अपन जे सपना अछि, तेतबे विचार दिअ।”

लाल भाइक बात सुनि गुरुकाका बिहुसैत बजला-

“बौआ सहदेव, जखन तूँ अकछा रहल छह तखन मोटा-मोटी कहि दइ छिअ।”

बिच्चेमे लाल भाय बजला-

“मारू मुँह ऐ दुनियाँकेँ, अपने केना निश्चलपनगामी बनि जिनगीक गमन करब, तेतबे बुझा कऽ कहू।”

गुरुकाका बजला-

“बौआ! जहिना सघन बनमे बाघ-सिंह-भौल देखलह, तहिना सघन जीवनमे हजारो रंगक हाथो आ हाथक सफाइयो तँ अछिए।”

गुरुकक्काक बात सुनि लाल भाय अकबका गेला मुदा अपनाकेँ संयमित करैत बजला-

“आरो?”

हँसैत गुरुकाका बजला-

“आरो यहए जे तहिना सघन मेघ सेहो सघन बरसा दइते अछि।”

 

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