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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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अखिला नन्द झा 'रमण'

 

चश्मा

 

    अन्हरोन साँझेमे जे सुलोचना लोटा लय बारी गेली,से घुरि आङन पायर नञि देली।  रातिसँ प्रेम कान्त बाबू एहि खढ़होरिमे बेटी लेल किलहोरि काटि रहलाहै।यै सुलोचना छी यै......, बेटी......, यै सुल्लो.....। फलेरियासं असक पतिकेँ सत्यसँ सोझाँ होमय लेल पत्नी शनैः शनैः तैयार कय रहल छलीह।

-- "आब एहिमे हमर बेटीक कोन दोष।एहि बोन झाँकुरमे दू चारि अधमलोक बलजोरी कय दौक तऽ असगर अबला अपनाकेँ कतेक बचाओत।"

-- "एहन अर्रदर्र जुनि बाजू।क्यो नै किछु कयने हेतैक हमर बेटीसँ।" बाजय लेल प्रेमकान्त बाबू किछु बाजि दौथ,किन्तु हुनको अन्देसा ओहने अनिष्ट टा पर छैन्ह।कुन मुँह लय लोकक सोझाँ हेता।होइन्ह पृथ्वी फाटि जाय आ ओ ओहिमे समाधि लऽ लैथ।कोनो बिषधर पायरकेँ हबैकि लैन्ह।एक्को क्षण एहन अपजस जीवन जीअब मृत्युसं भारी छलैन्ह।ताबैत खढ़ोरि  लग किछु बात सुगबुगेलै।लोक लपकल।जे देखलक सैह सन्न।प्रेम कान्तो बाबू दुहु बेकती ओतय एला। कोनो हिंसक जन्तु हुनक बेटीक लहासकें चिथड़ी कय देने छलैन्ह।से देखि हुनका जानमे जान एलैन्ह।ओत्तै कने हल्लुक भय, बेटीक वियोगमे कानय लगला।

 

       अखिला नन्द झा 'रमण'

 

 

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