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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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घनश्याम घनेरो

लैह-लैहे गुलबिया

 

-हे यै माँ! हम कोन साड़ी पहिरि उपनायनक हँकार पूर' जेबै?

-इंजीनियरक बौह आ साड़ीए लेल बेलल्ल! पहिरु ने, जे अनुरधियाक बियाह राति छमकौने रही। ललहोन

 छिछलौआ। केहन तँ ललितगर लगैत छल।

-हूँ, कहकलकै जे! ओइ दिन तँ लोक सभ यैह साड़ीमे देखने छल, फेर वैह पहिरु? लोक लेल तँ ई पुरान भ

 गेलै। जाथु ई अपने हँकार पूरि आबौथ।

-अच्छे! आब' दियौ लाल बच्चा केँ, नहि एक गांठ साड़ी कीना क' रखबा देलहुँ तँ फेर...

-ठिक्के यै माँ?

-ठिक्के नहि तँ की? अहींक संस्कार सन ओकरो  विचार होइक तखन ने?

-से की यै माँ?

-हमरा तँ हाथ-पैर हेरायल अछि जे लाल बच्चा ई नहि कहि दीए जे पुतौह तोहर पुरान भ' गेलौ, आब संगे रखबै तँ लोक की कहत!

 

     # घनश्याम घनेरो #

 

 

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