प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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राज किशोर मिश्र

हम बेटी छलहुँ...

हम अहाॅंक बेटी छलहुँ,
तेँ कोखि मे हमरा मारि देलहुँ,
दुनिओ देखि ने सकलहुँ हम,
पहिनेहे हमरा टारि देलहुँ।

हमहूँ सन्ताने छलहुँ,
तखन किएक ई गति भेल?
कोन हमर अपराध छल ?
एहन किएक कहू मति भेल?

प्रपंच, छल नहि जनैत छलहुँ,
किएक तखन अन्याय?
किए पक्षपात, किए एहन असरधा ?
पूछै छी अए माय !

बूझि नहि सकलहुँ ,शक्तिपुञ्ज हम,
चिन्हि ने हमरा सकलहुँ,
हम चन्द्रकांत मणि, सूर्यकांत मणि,
अहाँ झिटुका बुझि कऽ अँकलहुँ।

लक्ष्मी के हम रूप छलहुँ,
हम सरस्वती के वाणी,
'असुर भयाउनि' हमहूँ बनितहुॅं,
बनितहुँ बिकराड़ भवानी।

बनितहुँ हम गार्गी, मैत्रेयी,
हम झाँसीबाली रानी,
हमर पराक्रम, हमर शौर्य केँ,
दुनिया सुनैत पिहानी।

अंतरिक्ष मे हमहूँ जयतहुँ,
बनितहुँ हम कल्पना चावला,
'इसरो 'के वैज्ञानिक बनितहुँ,
के नहि हमरा चिन्हैत, भला!

हम एस.पी बनितहुँ , कलस्टर बनितहुँ,
बनितहुँ कम्प्यूटर विशेषज्ञ,
चिकित्सिका बनि अस्पताल मे,
जीवन-दानक करितहुँ यज्ञ।

विधनाक लेखनी अपन हाथ लए ,
दऽ देलहुँ हमरा मृत्युदण्ड,
बिनु दोखे मारि देलहुँ हमरा,
मातु-पिता भऽ एहन मोचण्ड ?

छीन लेलहुँ अधिकार जीबऽ के,
की छाती एहि सँ जुड़ाएल?
मातृ -पितृ तॅं देव तुल्य छथि,
अहाँ के कनिको ने कनाएल?

'माता कुमाता न भवति ' ,
तखन कोना ई भेल?
कनिआँ-पुतरा, सामा-चकेबा,
मुदा पहिने मारि देल गेल।

हमरो लेल तऽ पमरिआ नाचैत,
ओ बाजैत रानी-बेटी,
दुरागमन मे सऽख, मनोरथ,
अहाँ सँठितहुँ पेटार-पेटी।

परञ्च हमरा तॅं मारि देलहुँ,
आबऽ सँ पहिने बारि देलहुँ।

हम, सराप तॅं नहि देब अहाँ केँ,
परञ्च पूछब त' प्रश्न कए गोट,
माए-बाबू के एहेन हृदय होइछ?
होइत अछि नहि कोनो कचोट?

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