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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

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जगदीशप्रसाद मण्डल

 

आमक गाछी (धारावाहिक उपन्यास- पहिल खेप)

1.

बीस जून। माइक संग दुनू बहिन जगमोही प्रेमनगर पहुँचल। ओना, बीस जून गोटे साल शुरू जेठमे पड़ैए तँ गोटे साल उतार जेठमे, तैसंग कोनो-कोनो साल अखाढ़क शुरूमे सेहो पड़िते अछिमुदा से नहि, ऐ साल बीस जून उतार जेठमे पड़ल। सप्ताहसँ बेसी बैरसाइत[i]केँ सेहो भइये गेल छल...।

दस कट्ठाक जीबेन्द्रक गाछी-कलममे तीनटा आमक गाछ भरखैर पकैत, बॉंकी सात-गाछमे गोटि-पङ्गरा आ शेषमे कोनो-कोनोमे बोनाइत तँ कोनो-कोनोमे अखन खिच्चे सुआदक रंग पकड़ने। ओना, प्रेमनगरक किसान आन गामक किसानसँ कनी बुधिगरो आ श्रमगरो[ii] नइ छैथ सेहो केना नइ कहल जाए। प्रेमनगरक चारूकातक जे गाम सभ अछि, जेना- रामपुर, कृष्णपुर, महमदपुर आ रूद्रपुरइत्यादिगामक किसान सभ जे कलम-गाछी लगबै छैथ, तइमे कलमी आम हुअ कि सरही, जामुन हुअ कि बैर, बेल हुअ कि बरहर, शीशो हुअ कि गमहाइर, सभ कियो सहरगंजा रोपै छैथ, मुदा प्रेमनगरक  किसान सभ जे गाछी-कलम लगौने छैथ आकि लगबै छैथ ओ एकदम कतारबन्दी रूपमे। कतारबन्दीकमाने ई जे कलमी आमक कलममे जहिना कलमी आम छोड़िदोसर ने कोनो आमे गाछ आ ने बेखे-बुनियादिक। बेख-बुनायादि भेल लकड़ी उपयोगी वृक्ष। ओना, कलमियो आम सइयो रंगक अपन गुण-धर्मबला अछिए, तँए एक गुणक मिलान आ एक धर्मक मिलान ओहूमे बेसी नीक होइत अछि। किएक तँ ओकर सभ किछु एक रूपे चलैए आ से नइ रहने जहिना बहुधर्मीकेँ एकठाम भेने होइएजेकेतौ नहाइकाल झगड़ा तँ केतौ खाइकाल झगड़ा, केतौ चाहकझगड़ा तँ केतौ अनचाहक झगड़ा होइतो अछि आ अरबेधलो रहिते अछि। अरबेधब भेल- आगियो आ खढ़-पातसँ लऽ कऽ ठहुरी-चेरा धरिक सुखाएल जरनोकेँ एकठाम राखि देब, भलेँ किए ने कनी-कनी हटाइये कऽ रखलौं आ पूरबा-पछबा हवामे ऊड़ि-पुरि एकठाम भऽ सुनैगकऽ पजैर जाइते अछि। खाएर.., प्रेमनगरक किसान श्रेष्ठ किसान छथियो आ मानलो जाइते छैथ। इलाकामे जखन कखनो आमक गाछी-कलम वा बेख-बुनियादिक चर्च केतौहोइए तँ प्रेमनगरक चर्च जहिना होइए तहिना रामपुरोक चर्च होइतेअछि मुदा से प्रेमनगरक विपरीत दिशामे। विपरीत दिशा भेल-जहिना भगवान रामक नाम शुभ रहितो गन्दा-सँ-गन्दा वस्तु देख राम-रामकहि गबाही रखि दइ छिऐन, जहिना मृत्युक बरियातीमे राम-नाम सत् छीकहैत असमसानक पार लगबै छी तहिना ने जुआन-जहानक बरियातीमे रसगुल्ला खाइत-खाइत राम-धाम सेहो पार लगबैबते छी। खाएर जे छी से छी, सभ नीके छी आ सभ अधले छीमुदा सभ कियोतँ छीहे किने।

पनरह जूनकेँ कौलेजमे गरमी छुट्टी भेल, ओना किछु गोरे एकरा अमैया छुट्टी आ किछु गोरे ग्रीष्मावकाश सेहो कहिते छैथ मुदा जाए दियौ ऐ बातकेँ, बात तँ बाते छी, अपना मनक मौजी बहुकेँ कहलौं भौजीआ लोको लग अपन निर्लजताक नाच नचैत रहलौं। भाय, पत्नी पत्नी छैथ किने, ओ तँ जहिना जीवन संगिनीभेली, अर्द्धांगिनी भेलीतहिनाप्रेमिका सेहो भेबे केली, मुदा तैठाम जँ कियो दिन-राति टी.भी.मे खेले वा सिनेमे देखती तँ देखौथ आ अपन कर्मक समय विधाताक हाथमे दऽ दौथ..!

गरमी छुट्टी होइते धीरेन्द्र सोझे गाम आबि गेल। बीस जूनकेँ जगमोही सेहो आम खाइक बहन्ने अपन मातृक पहुँचल।

धीरेन्द्र आ जगमोही पटनेमे रहि पटने कौलेजमे बी.ए. फाइनल इयरमे पढ़ितो अछि आ एक्के विषय दुनूक रहने संग-संग किलासोमे आ ट्यूटोरियलमे सेहो एक-दोसरकेँ देखतो अछिए। मुदा जहिना जेनरल क्लासमे तहिना ट्यूटोरियल क्लासमे सेहो दुनूक बैइसैक ब्रेंच अलग-अगल अछिए। जइसँ लगक गपो-सप्प कहियो किए हएत। ओना, अखन तक ने धीरेन्द्र अपन अंगीत जगमोहीकेँ बुझैत आ ने जगमोहीएधीरेन्द्रकेँ बुझैए। तेहेन जुग-जमाना आबि गेल अछि जे ने कियो नामक टाइटिलसँ केकरो परेख सकैए आ ने जाति-पाँजिसँ, केकरा एते छुट्टी छै जे अनेरेक रमझौआमे लागल रहत। नव पीढ़ीक लोक खेलाड़ी आ सिनेमा-कलाकार सबहक नामधुन करत आकि अपन बाप-पुरुखाक..! कोन मतलब ओकरा छै जे अपन बाप-पुरुखाक वंश आ जीवनकेँबिटिया अपन वंशक इतिहासक संग देश-दुनियाँक इतिहासकेँ बुझत। मुदा ईहो तँ बात सबहक सोझेमे अछि जे जे जेते जिनगीक रस पीबए चाहैए ओ ओते बेचैन सेहो भेले जाइए।

ओना, समाजशास्त्र विषयक जेनरल क्लासमे पचाससँ ऊपर विद्यार्थी अछि, मुदा शनियेँ-शनि जे ट्यूटोरियल क्लास चलैए ओ उनटा पाठक, तँए ओ क्लास मात्र पान-सातटा विद्यार्थी करैए बॉंकी अधिकांश मैटिनी शो सिनेमा देखैए वा किछु गोरे घुमि-फिर शहरे-बजार देखैए। मैटिनी शो सिनेमा देखैक कारण टिकटक कन्शेसन सेहो अछिए। उनटा पाठ जे ट्यूटोरियल क्लासमे होइए ओ ई होइए जे आन दिन– माने सोमसँ शुक्र धरि शिक्षक जे पढ़बै छैथ ओकर उत्तर ओइ क्लासमे विद्यार्थीसँ लेल जाइए। आइक परिवेशमेमाने शिक्षण संस्थानक परिवेशमे,ट्यूटोरियल क्लासक नामो भरिसक छात्र सभ नइ बुझैत हएत–जखन कौलेजमे पढ़ाइये नहि भऽ रहल अछि तखन ओकर उत्तर की भेटत।

ट्यूटोरियल क्लासक पान-सातटा विद्यार्थीमे जहिना धीरेन्द्रक तहिना जगमोहीक उपस्थिति अनिवार्य रूपसँ रहैए। बॉंकी पान-सातक बीच नव-पुरान होइत रहैए। सभ शिक्षकक अलग-अलग सप्ताहमे ट्यूटोरियल क्लास होइ छैन, तँए ऐ बातकेँ शिक्षक सभ नहि बुझिपबै छैथ। ओना, छात्रो सभमे किछु गोरेक सम्बन्ध शिक्षको सभ संग छैन्हे, तँए अपन-अपन ट्यूटोरियलमे अपन-अपन परिचित छात्र रहिते छैन जइसँ नव-पुरान हएब सोभाविके अछि। जहिना धीरेन्द्र अपनाकेँ ओते सक्कत बना क्लास पहुँचै छल जे जे किछु शिक्षक पुछतातइमे जे पढ़ौने छैथ ओकर अतिरिक्त अपनो विचार राखब, तहिना जगमोही सेहो अपन तैयारीक संग क्लास पहुँचै छल। ओना, ट्यूटोरियल क्लासमे कम विद्यार्थी रहने आगूक जे दुनू ब्रेंच बैसैक अछि, तहीपर दहिना भागक ब्रेंचपर धीरेन्द्र बैसैत आ बामा भागक ब्रेंचपर जगमोही। समैयक मिलानी दुनूकेँ रस्तोक मिलानी करबैत आ ट्यूटोरियल क्लासक सेहो। माने भेल एक गाड़ी पकड़ैले जहिना दूटा यात्री अपन निर्धारित समयपर घरसँविदाहोइ छैथ जइसँ रस्तामे गप-सप्प भलेँ नहियोँ होइत हौनु मुदा मुँह-मिलानी तँ होइते छैन। कहैकालमे भलेँ सभ कहि दइ छिऐ जे शरीरक पाँच इन्द्रीमे जहिना मुँह भेल, आँखि भेल तहिना कानो भेल। मुदा की तीनूक जीवन क्रिया एक्केरंग अछि? मुँहमे मुंगबाक सुआदसँ लऽ कऽ तेतैरक खट-मीठ आ नीमक तीतपन तकक रस भेटते अछि, जखन कि आँखि सोझे देखैबला भेल। नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधला देख-देख आँखि कखनो कानि-कानि नोरो चुबबैए तँ कखनो मिरचाइक कड़ुपनसँ पानियोँ तँ बहैबते अछि। मुदा कान तँ काने छी, खा-पीब कऽ रस चुसैक कोन बात जे आँखि जकाँ ने देखिये सकैए आ ने मुँह जकाँ सुआदे पाबि सकैए,लऽ दऽ कऽ हवामे उड़ल नीक-बेजाएकेँ खालीसुनिटा सकैए। जइसँ, जहिना बहिरा अपने ताले नचैए तहिना नाच करत। मुदा ऐ सभसँ कोन मतलब धीरेन्द्रेकेँ आकि जगमोहीए-केँ छइ। दुनू गोरे कौलेजमे पढ़ैए, कौलेजिया संगी कहियौ आकि क्लासक संगी, एक-दोसरक छी। अट्ठारह बर्खक उमेर सेहो दुनू टपिये गेल अछि, किए ने खुलि कऽ खेलाएत। मुदा से नहि, दुनू अपन-अपन सीमाक बीच अनुबन्ध अछि। ओना, दुनूक प्रश्नोत्तर दुनू तँ सुनिते अछि,तैसंग शिक्षक सेहो ट्यूटोरियल क्लासमे सुनै छथिन जइसँ एक-दोसरक अध्ययनक गहराइ सेहो एक-दोसर बुझिये रहल अछि। ओना, क्लासमे शिक्षक निर्धारित पाठ्यक्रममे जे पोथी निर्धारित अछि ओकरे आधार बना पढ़बै छैथ मुदा शिक्षको तँ शिक्षके ने भेला। कियो जेतबो सिलेबशमे अछि तेतबो ने पढ़बै छैथ आ कियो कियो एहनो तँ छथिए जे ओरिकासँ घी परसै छैथ। ओरिकासँ घी परसबक माने भेल सिलेबशसँ अतिरिक्तो पढ़ाएब, हुनका कोन मतलब छैन जे दालिक सुआद रहल कि मेटाएल। ओ तँ सिलेबशक कोन बात जे दुनियॉंक सिलेबश आगूमे रखिये दइ छैथ। शिक्षकेक अनुकरण ने शिक्षार्थी करत। ओहो ने वएह बुझत। भलेँ किए ने ओ शिक्षककपठनकेँ निर्णित करए जे जहिना शिक्षक जुग-स्रष्टा छैथ तहिना जुग-द्रष्टो तँ होइते छैथ। तँएशिक्षार्थियोकेँ तहिना ने जिनगीक बाट भेटत।

ओना, शिक्षको अपन सिखपनसँ सीखिये नेने छैथ जे ट्यूटोरियल क्लासमे अनेरे जे माथक बोझ बढ़ाएब (माथक बोझ बढ़ाएब भेल- एक-एक छात्रसँ प्रश्न पुछब)तइसँ नीक जे पैंतालीस मिनटक घन्टीमे दस मिनट रीब-रीबेमे गेलबँचल पैंतीस मिनट, से नहि तँ एक-एक छात्र-छात्रासँ प्रश्न पुछि समय ससारि लेब। जे लाभ धीरेन्द्रोकेँ आ जगमोहीकेँ सेहो भेटिये जाए। जहिना कहल जाइए जे करत-करत अभ्याससँ जड़-मति सेहो सुजान भइये जाइए। मनुख तँ सहजे मनुख छी, अन्न-खाइबला आ पानि पीबैबला। घोड़ा घास खाइए तखन तँ एते हिहिआइए, मनुख तँ सहजे मनुख छी जेकर सभ जीव-जन्तुसँ अतिरिक्त गुण भेल हँसब।

ट्यूटोरियल क्लासक शिक्षक भेला प्रश्नकर्त्ता, धीरेन्द्र आ जगमोही भेल उत्तर देनिहार। बाँकी सभ शिक्षकोक भाषण आ विद्यार्थियोक उत्तर-भाषण सुननिहार भेल। तँए खुलल वा झाँपल भेल निर्णयकर्त्ता। किए अनेरे कोनो पक्षमे ठाढ़ हएत। किए ओ प्रश्नकर्त्ताक प्रश्न अङ्गेजत आ किए ओकर जवाबदेह बनत। सभ ने सुविधानुसार जीबए चाहैए। जखन अवसर भेटल तखन वएह सभ किए छोड़ि देत। अपन उत्तरमे जहिना शिक्षकक भाषण सिलेबशकेँ अतिक्रमण करै छेलैन तहिना धीरेन्द्रो आ जगमोहीओ उत्तर दइते छल। तेकरा शिक्षक लोकैन, ट्यूटोरियल क्लासक विषय कहि परीक्षामे लिखैसँ परहेज करैक सलाह दुनूकेँ दैत क्लास अन्त करै छला।

दुनियाँमे प्रेमोक अपन रंग-रूप छइ। सात अरब लोकमे जगमोहीक जेहेन रूप धीरेन्द्र देख रहल छल ओहन रूप धीरेन्द्रक जगमोही नहि देख पेब रहल छल। दुनूक अपन-अपन नजरियो आ दृष्टिकोणो छेलैहे। मुदा ट्यूटोरियल क्लासक जे सिख (अध्ययन)छल ओ दुनूकेँ जरूर नव सिखपन (अध्ययनशीलता) दिस बढ़ौलक, जइसँ एक-दोसरक बीच, भिन्न दृष्टि रहितो आकर्षितकरबे करै छल।

ओना, आकर्षणोक अपन गुण-धर्म अछि। कोनो आकर्षण ओहन होइए जइमे विकर्षणोसमान रूपमे संगे चलैए आ कोनो एहनो आकर्षण अछिए जइमे विकर्षणक मात्रा कम रहने हेराएल-हेराएल सन रहैए। जइसँ आकर्षणे-आकर्षण बुझि पड़ैए। तहिना विकर्षणोक तँ छइहे जे बेसी मात्रामे भेने आकर्षणकेँ दाबि दइए। जखन लोहा सन निर्जीव धातुक चुम्बकीय आकर्षण ओहन होइए जे अपना सन-सन भतलोहोकेँ अपना संगमेरंगि अपन गुण-धर्मसँ भरिये दइए। भलेँ ओ ओतबेकालक किए ने होउजेतेकाल चुमकलोहमे सटि अपनो चुम्बकत्वमे किए ने बदैल गेल हुअए। खाएर जेतए जे होइ से तेतए हुअए। अजगर सन साँपो जखन अपन नजैरककनखी आ मुँहक सूसकारीसँ आन साँपकेँ लगमे आनि भक्षे किए ने कऽ लैत हुअए मुदा तइसँ कोन मतलब धीरेन्द्रकेँ आकि जगमोहीएकेँ अछि। अखन तँ जिनगीक एको टपान दुनूमे सँ एको ने टपि सकल अछि, तखन जिनगीक टपानक बाते केना बुझत।

जहिना धीरेन्द्रक मनमे जगमोहीक प्रति जिज्ञासा जागल तहिना जगमोहीकेँ सेहो धीरेन्द्रक प्रति जागल। एक रस्ताक राही–माने एक विषयक विद्यार्थी–भेने दुनूक मनमे एते तँ जिज्ञासा जगिये चुकल अछि जे जखन दुनू गोरे एक कौलेजक एक क्लासमे पढ़ै छी तखन बुधियो-ज्ञान ने एकरंग हुअए। एकर माने ईहो नहि जे आनसँ  बेसी नइ हुअए,आ ने यएह माने हएत जे आनसँ कम्मो नइ हुअए। एक स्थानक यात्रीक बीच एहेन कोनो सीमा थोड़े अछि जे सभकेँ एक्केरंग चलए पड़त। कौलेजोमे तँ तहिना होइते छै जे कियो प्रथम श्रेणीमे उतीर्ण होइए, कियो दोसर श्रेणीमे आ कियो तेसर श्रेणीमे। मुदा जिनगीक अध्येता अपन जिनगीक अध्याय ओहीठामसँ शुरू करैक चेष्टा करै छैथ जैठाम मजगूत नीवक जरूरत अछि। औझुके नीवपर ने काल्हि ठाढ़ हएत। तँए, भविसवेत्ता भलेँ जे हुअए मुदा भविसक निर्माता नइ छी सेहो केना नइ कहल जाएत। औझुके रोपल गाछ ने काल्हि फल देत।

धीरेन्द्रो आ जगमोहीयो एक-दोसरक जीवन परिचय गुप्त रूपसँ भॉंज लगबए लगल। मुदा दुनूक प्रतिबन्धित बाट, प्रतिबन्धित ऐ मानेमे जे जानकारी पबैमे कहीं सीमोलंघन ने भऽ जाए,नइ तँ जगहँसी हएत। एक तँ पटनामे ने धीरेन्द्रकेँ बेसी चिन्ह-पहचीनक लोक आ ने जगमोहीएकेँ। ओना, कौलेजो आ हाइयो स्कूल, सइयो-हजारो अपरिचित चेहराक परिचित करबैक गर छीहे, मुदा परिचय-पात करैक जगह तँ छी नहि, छी तँ पढ़ै-लिखैक जगह। जेकर अपन निर्धारित सीमा-सरहद अछि।तँए, एक सिमानक बीच रहि कियो अपनाकेँ पार-घाट लगैबतो अछि आ लगबौ चाहैए।

धीरेन्द्रकेँ पिता-पुत्रक बीच जे सीमा अछि तइमे जहिना पिता जीबेन्द्रछथिन तहिना पुत्र धीरेन्द्रो अछि। माने ई जे अनेको क्रिया-कलापक बीच पिता-पुत्रक जीवन अछिए। मुदा अखन से नहि। अखन एतबे जे जेतेक उचित खर्च विद्यार्थीक छल ओ धीरेन्द्र जहिना निमाहि रहल अछि तहिना जीबेन्द्रसेहो अपन पुत्रक हिसाबसँअपन माहवारी खर्चो आ स्वतंत्रतो देब निमाहि रहल छैथ। मुदा ऐ सीमाक बीच धीरेन्द्र अपन कोर्सक किताब सिलेबशक अनुसार पिताक पाइसँ कीनि नेने छल मुदा शिक्षकक मुहसँ अनेको अन्य किताबक नाओं सुनि मन तँ उछटबे कएल। जइसँ धीरेन्द्र प्रतिदिन एक घन्टा कौलेजक रीडिंग रूममे बैस नव-नव पोथी पढ़ैतरहल अछि। कौलेजक रीडिंग रूम, पुस्तकालय आ कार्यालय तीनू कोठरी एक्के मकानमे जुड़ल अछि। तीनूक बीचक देवालमे शीशा लागल अछि जइसँ एक दोसर कोठरीकेँ नीक जकाँ देखल जाइए।

धीरेन्द्र रीडिंग रूममे कुर्सीपर बैस टेबुलपर तीन-चारिटा किताब रखि एकटाकेँ उनटा रहल छल, तहीकाल जगमोही पुस्तकालयक पैछलाकिताब जमा करैत ऐगला लइले आलमारी देखए लगल। ओना, पुस्तकालयक सभ पोथी रजिष्टरमे अंकितऐछे मुदा ओदोसर विद्यार्थी देख रहल छल।

नमगर-चौड़गर रीडिंग रूमक कोठरी, दर्जनो आलमारी किताबसँ सजल अछिए। एकसँ दू आलमारी प्रति विषयक किताबसँ सजौल फुटा-फुटा लगौल अछि। बीचमे बइसैले कुरसीक संग टेबुल सेहो लगले अछि। जइसँ बिनु बँटवारा केनहुँ बैइसैक जगह बँटाइये गेल अछि। माने ई जे आलमारीक लगेमे कियो बैस कऽ पढ़बकेँ नीक बुझबे करैए। धीरेन्द्र अपन समयानुसार रीडिंग रूममे किताब सभ टेबुलपर रखि कलमसँ कॉपीमे लिख पुन: किताब उनटबैतरहए। पुस्तकालयक आलमारीमे जगमोही किताब खोजि रहल छल। पुस्तकालयो आ रीडिंगो रूमक आलमारी हाथ-हाथ भरिक दूरीमे सजल अछि। पुस्तकालयक दुनू आलमारी खोलि जगमोही किताब खोजि रहल छल आ दोसर दिस धीरेन्द्र दुनू आलमारी खोलि किताब निकालि टेबुल सजौने छल।

दू आलमारीक बीचक जे जगह अछि ओइ बीच होइत जगमोही धीरेन्द्रकेँ देख रहल छल। तही बीच पुस्तकालयक किछु किताब गड़बड़ भऽ गेल रहै तेकर कहाकही ऑफिसमे उठल। मुदा किताब तँ किताब छी, आगियोमे जरैबला, पानियोमे गलैबला आ दिबारो-दिम्मककेँ खाइबला, तैठाम अनेरेक ने कहा-कही भेल। खाएर..,जेकरा माए-बाप जन्म दइए से तँ माए-बापकेँ बिसैर जाइए,ई तँकौलेजक पुस्तकालयक किताब छी,एकरके माए-बाप छै!अनेरे के एते आलमारीकेँ उधेसत। ओना, देवालक बीच शीशा लगल रहने जहिना जगमोही पुस्तकालयमे बन्न अछि तहिना रीडिंग रूपमे धीरेन्द्रोबन्ने अछि मुदा देख रहल छल दुनू एक-दोसरकेँ।

ओना, अखन तकक तरपेसकी जानकारीमे जहिना जगमोही अपन मामा गामक धीरेन्द्रकेँ बुझैततहिना धीरेन्द्रो अपना गामक भगिनी जगमोहीकेँ बुझैत। मुदा अखन धरि एको दिन बात-चीत नहि भेल।..पुस्तकालयक कार्यालयमे कहा-कही भेने सबहक धियान ओइ दिस भेल आ जगमोहीक धियान धीरेन्द्र दिस भेल। शुरूमे जगमोही मोट-मोट किताब धीरेन्द्रक टेबुलपर राखल देख थोड़ेक सहमल जरूर मुदा एते तँ आत्म-शक्ति जगिये गेल छेलै जे धीरेन्द्र मामा गामक छी। चाहे तँ नाना दाखिलमे हुअए वा मामा दाखिलमे वा भाइक दाखिलमे, मुदा अंगीत तँ छीहे। जँ सेहो नइ छी तैयो एक कौलेजक एक क्लासक आ एक विषयक संगी तँ भेबे कएल। जखन एक्के विषयक संगी छी तखन जीवनक क्रियो-कलाप तँ एक्केरंग ने हएत। केना कोयलाखानक श्रमिक अपनाकेँ लेबर क्लास कहि एकठाम बैसार-उसार करैए। केना खेतक धान रोपनिहार धनरोपनिया कहबैए। कहाँ केतौ मर्द-औरतक भेद छइ। एक दिस मातृकक सम्बन्ध, दोसर दिस कौलेजक सम्बन्ध अछिए, तैसंग एक उमेरक सियान सेहो दुनू गोरेछीहे। तखन गप-सप्प करैमे बाधा की? चोरनुकबा प्रेममे कोनो दम होइए, ओ तँ चोर सबहक क्रियाभेल। प्रेम तँ सार्वभौंम अछि।विचारक प्रेम, बेवहारक प्रेम, जिनगी जीबैक प्रेमइत्यादि, जे लोकचोरा-नुका कऽ किए करत।

दू आलमारीक बीचक रस्ता देने शीशाक देवाल पार करैत जगमोही धीरेन्द्रक अनुकरण करए लगल। धीरेन्द्र जहिना किताबमे आँखि गाड़ि, समुद्री हीरा जकाँ पाँति खोजि कॉपीमे नोट कए रहल छल, तेकर हू-ब-हू फोटोग्राफी जगमोही अपन बुधिक डायरीमे उतारए लगल। दस मिनटक फोटोग्राफीक रील जगमोही मनमे गढ़ि नेने छल।

संजोग भेल, पॉंच बाजि गेल। आब सभ किछु बन्द हएत। जगमोहीकेँ दूटा किताब लेबाक छेलै जे इसू करा चुकल छल।धीरेन्द्र आलमारीमे किताब रखि कॉपी नेने बाहर निकलल। ओना, लोको पतराएले छलइ। मात्र दू गोरे कौलेजक स्टाफ आ चारि-पॉंचटा विद्यार्थी अछि। पुस्तकालयक सीढ़ीसँ निच्चाँ उतैरते जहिना धीरेन्द्रक नजैर खिर जगमोहीपर छिछलल तहिना जगमोहीक नजैर सेहो धीरेन्द्रपर छिछलए लगल। ओना, दुनूकेँ अपन-अपन नैतिक अनुशासनक विचार मनमे दौड़िये रहल छल। अही गुन-धुनमे दुनू बिना किछु बजने-भुकने कौलेजक अन्तिम गेट लग पहुँच गेल। चौबट्टी जगह, तँए के किमहर जाएत तेकर जानकारी दुनूकेँ अपन-अपन।ओना, एहेन कोनो प्रतिकूल मौसम नहियेँ अछि जे दुनूक बीच गप-सप्प नइ भऽ सकैए।मुदा ग्रामीण परिवेशक उपज दुनू, माने दुनूक जन्म गामदेहातमेभेनेदुनूक मनमे गामक गमैया सम्बन्ध सेहो बनियेँ गेल अछि।तँए दुनूक बीच किछु ओझरौठअछिए। जे ने जगमोही बुझि सकल अछि जे धीरेन्द्रक संग कोन तरहक सम्बन्ध मानि बाजल जाए, आ ने धीरेन्द्रे से बुझि रहल अछि।तैसंग दुनूक मनमे ईहो बेवधानछैहे जे अपनासँ उमेरमे जेठ मानल जाए वा छोट। तेकर कारण दुनूक अपन-अपन अछि।

धीरेन्द्रक मनमे नचै छै- जखन दुनू गोरे कौलेजक एक क्लासमे पढ़ै छीतखन ई मानि लेब जे जगमोहीक उम्र हमरासँ कम हेतैई तँ बालबोधक विचार भेल!किएक तँ जेतेक समय हमरा अ-आसँ अबैमे अखन धरि लागल तेते तँ जगमोहीकेँ सेहो लगल हेबे करत, तखन छोट मानल जाए वा पैघ? आइ जँ कौलेजमे एको क्लास आगू-पाछू रहितौं तखन तँ एकटा देखौआ सीमा भेटैत, जहिना कोनो गामक जमीनक नापी लेल पैछला सर्वेक कोनो पहचान भेटला बाद अमीनकेँ कोनो खेतक आड़ि-मेड़ बनबैमे असान होइए तहिना।

मुदा धीरेन्द्रक मनमे एकटा विचार उठल। उठल ई जे जइ गाममे बाढ़िक कारणे वा भुमकमक कारणे सिमानक पहचान मेटा गेल रहैए तँ ओइ सीमाकेँ पकड़ै तँदोसर गामकसिमानकसहारा लेले जाइए।

जगहमोही जखन अपन पैछला इतिहास दिस नजैर खिरौलक तँसाफ-साफ देखए लगल जे जहिया पॉंच बर्खक रही तहिये बाबा लोअर प्राइमरी स्कूलमे नाओं लिखा देलैन, तहियासँ ने कहियो फेल केलौं आ ने कोनो क्लासे फानि कऽ टपलौं।मनमे उठलै- तहिना ने धीरेन्द्रोकेँ भेल हएत। बीचमेमातृकक सम्बन्ध सेहो अछि, जँ नानाक सम्बन्धमे हएत आ तखन जँ भैयारीक सम्बन्धे बाजबईहो तँ नीक नहियेँ हएत। आ तहूमे जँमाए बुझती तखन तँ ओहो गनजन करबे करती..!

ओना, धीरेन्द्रोक मन सकताइये रहल छल जे अनजान-सुनजान महाकल्याण। गप-सप्पक पछाइत जखन सम्बन्धक असल परिचय हएत तखन अपन विचारकेँ सुधारि लेब। तहिना जगमोहीक मन सेहो रसे-रसे ओहन सीमापर पहुँच गेल।तँए दुनूकेँ मुँह खोलैक अनुकूल मौसम बनि गेल। एक तँ ओहुना जखन संगे-संग पढ़ै छी तखन बजा-भुकी करैमे कोन एहेन पहाड़े आकि समुद्रे बीचमे बाधक अछि।

गेटपर पहुँच धीरेन्द्र जगमोही दिस तकलक। ओना, जगमोही सेहो धीरेन्द्रे दिस ताकि रहल छल।दुनूक आँखि मीलि गेल। आँखि मिलिते दुनूक मुँह टुस्कियाएल। जहिना पत्ता-कलश वा फूल-फलक टुसी चलिते अपन सुगन्ध निकालए लगैए तहिना दुनूक मनसँ निकलए लगल...। जगमोही बाजल- डेरा केतए रखने छी?”

जहिना जगमोही बाजल तहिना धीरेन्द्र उत्तर देलक- ऐठामसँ साए मीटर हएत।

धीरेन्द्रक बात सुनि जगमोही घड़ी देखलक। पॉंच बाजि कऽ पॉंच मिनट भेल छेलइ। मने-मन अपन समैयक अँटकार लगौलक तँ बुझि पड़लै आधा घन्टा समय बीचमे खाली अछि। जगमोहीक ऐगला समैयकसीमा निर्धारित छेलै, किएक तँ सचिवालयमेजगमोहीक पिता-रामलखन कार्यरत छथिन जे नित्य छअ-पौने छअ बजे तक डेरा अबै छथिन। पिताजीकेँ अबैसँ पहिनहि जगमोही अपन कौलेजक काज निवटा डेरा पहुँच जाइए। तैबीच जगमोहीक माइयो बजारक काज कऽ आबि जाइ छथिन।

जगमोही बाजल-

रस्ते-रस्ते चलि कऽ अपन डेरा देखा दिअ। दोसर दिन समय पेलापर आगूक किछु गप-सप्प करब।

सोल्होअना जगमोहीक बात नहि सुनि धीरेन्द्र बिच्चेमे बाजल-

चलू, संगे-संग चलबो करू आ अहाँ अपनो डेराक जानकारी दिअ।

साइए मीटरपर धीरेन्द्रक डेरा, गपे-सप्पमे दुनू गोरे पहुँच गेल। डेरा लग ठाढ़ होइत धीरेन्द्र असमंजसमे पड़ि गेल। असमंजस ई जे शहर-बजार छी। ऐठाम सभ तरहक प्रतियोगिता अछि! मुदा लगले मनमे उठि गेलै जे अखन विद्यार्थी जीवनमे छी, तँए अखन वर्त्तमानक विचार करब अछि नहि कि भविसक। धीरेन्द्र बाजल-

डेरामे चाह-ताह तँ नइ बनबै छी मुदा जलखैक ओरियान तँ रहिते अछि, चलू पहिने जलखै कऽ लेबतखन जाएब।

ओना, दुनूक मन गवाही दइतेरहै जे कौलेजसँ लऽ कऽ गाम धरिक सम्बन्ध अछिए, तखन खेबे-पीबेमे कोन हर्ज...। जगमोही बाजल-

डेरा तँ भीतर जा कऽ देख लेब मुदा जलखै नइ करब। बेसीसँ बेसी एक गिलास पानि पीब लेब।

दुनू गोरे कोठरीमे पहुँचल। कोठरीमे कुरसी नहि, छोट-क्षीणकोठरीमे धीरेन्द्रक पूर्ण जिनगी समटल अछि। एक्के चौकीपर बैस धीरेन्द्र बाजल-

गाममे ऐबेर आम खूब फड़ल अछि, अमैया छुट्टी हेबे करत...।

जगमोही बाजल-

अहाँक घर प्रेमनगर छी आ हमरो...।

हमरोसँ आगाँ नहि बढ़ि जगमोही चुप भऽ गेल।

अपन गामक नाओं सुनि धीरेन्द्र बाजल-

अहूँक मातृक तँ प्रेमनगरे ने छी?”

जगमोही-

आइ एतबेपर रहए दियौ। पनरह जूनसँ अमैया छुट्टी भऽ रहल अछि, माइयो नैहर जेती, हुनके संग बीस जूनकेँ अहाँक गाम पहुँच जाएब।

मुस्की दैत धीरेन्द्र बाजल-

हमरा गाम पहुँचब आकि अपन मातृक?”

जगमोही-

अहाँ जे बुझिऐ...।


 

[i]बटसावित्री

[ii]मेहनत करैबला

 

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