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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

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जगदीश प्रसाद मण्डल

 

दहिबरी (लघुकथा)

तीन-चारि घन्टासँ गाममे हरविर्ड़ो उठल छल मुदा अपने कोनो भनक नहि बुझि पेलौं। हरविर्ड़ो ई उठल छल जे जसमन्त बाबा अब-तबमे छैथ!’तँए अन्तिम दर्शनक लेल सौंसे गाम गलो-गुल आ दौड़ो-बरहा लगि गेल छल। घटना तीन बजे बेरुका समैयक छी। भेल ई जे जसमन्त बाबाक पेटमे वायुक बढ़वाड़ि भऽ गेलैन जइसँ मन तेना औल-बौल करए लगलैन जे लोकक बीच मरैक डर सबहक मनमे पैस गेल। जसमन्त बाबाक देहक शक्ति सेहो जेना कमि गेलैन तहिना ठाढ़ भेलमे खसि पड़ला। एक तँ पेटक जनमारा गैस्टिकक प्रकोप,तैपर बेधड़क खसने देहमे तेना चोट लगि गेलैन जे चेतन शक्तिमे क्षीणता सेहो आबि गेलैन जइसँ एकाएकआँखि-मुँह दुनू बन्न भऽ गेलैन।

 

तीन रंगक अवाज गाममे उठि रहल छल। किछु गोरे जसमन्त बाबाकेँ मृत्यु घोषित करैत बजै छला जे बाबा धोपचटेमे मरि गेला!’एकर पूरक विचार सेहो जोड़ा रहल छल जे बाबा सन धर्मात्माकेँ अहिना मृत्यु होइए। मरैबेर सेवा-ले केकरो मुँहतक्की नहि केलैन!’आकिछु गोरे जसमन्त बाबाकेँ अब-तबमे रखि बजै छला जे बाबा अब-तबमे छैथ, माने कखन छैथ आ कखन नहि छैथ तेकर कोनो ठेकान नहि!’ मुदा किछु गोरे अड़ि-अड़ि बजै छला जे बाबा जीवित छैथ आ जीबे करता!’

अही तरहक विचारक बीच रखवारीवाली आ दीपवालीक बीच अपन-अपन विचारक चलैत कहा-कही सेहो शुरू भेल। रखवारीवाली बाजल- बाबाकअखन मरैबला उमेर थोड़े भेलैन अछि जे मरता। देहमे रोग भेने मनमे बेचैनी आबि गेल छैन।

रखवारीवालीक बात सुनि दीपवाली बाजल- बाबाकेँ आब लोकक कोन बात जे भगवानो नहि बँचा सकतैन!”

ओना, मरै-जीबैक बात जेते रखवारीवाली बुझै छैथ तेते दीपवाली नहि बुझै छैथ। जइसँ अपन-अपन धरणा मरै-जीबैक मनमे बनियेँ गेल छैन। ने रखवारीवाली अपना आँखिये बाबाकेँ लगसँ देखने छेली आ ने दीपेवाली, मुदा लोकक मुँहक सुनल बातसँ दुनूक कान तँ भरियेगेल छेलैन जइसँ दुनूक मनमे अपन-अपन बिसवास सेहो बनि गेल छैन। जीवन-मृत्युक किरदानी देख रखवारीवालीक मनमे एहेन धारणा बनले छैन जे कुम्हारक बरतन जकाँ लोककाँच माटिक बनल अछि जे कनियोँ धक्का-धुक्की लगने फुटि जाइए! तैपर केतेको गोरेक मुहसँ सेहो सुनि चुकल छैली जे बाबा अब-तबमे छैथ। तहिना दीपवालीकेँ सेहो अपन विचारक धारणा मनमे बनल छैन। विचारक धारणा ई जे जहिना बच्चा जन्म लइए, धीरे-धीरे समैयक संग बढ़ैत-बढ़ैत बुढ़ होइए आ बुढ़सँ जखन झुनकुट बुढ़ होइए तखन पाकल कोनो अन्ने वा फले जकाँ झुना कऽ अपने खसि पड़ैए; से तँ अखन जसमन्त बाबा नहि भेल छैथ। जेकरा-जेकरा मुहेँ जसमन्त बाबाक समाचार दीपवाली सुनने छेली, ओ वएह सुनने छेली जे हवा-बसात लगने अहिना समैया रोग पकड़ैए आ समय पुरला पछाइत अपने छुटियो जाइए। ओना,जसमन्त बाबाक मरैक सम्भावना दीपवालीक मनसँ सोल्होअना मेटाएलो नहियेँ छेलैन, तखनमेटाएले जकाँ घँसा जरूर गेल छेलैन जइसँ रखवारीए-वाली जकाँदीपोवालीक मनमेअपन जीवित वाण छेलैन्हे।

ओना, रखवारियोवाली आ दीपोवालीकेँगामक लोकबुझिते छैन जेबिनु जड़ि-सिरक झगड़ाऊ मनुख छैथ। तँए हिनका दुनूक बीचकझगड़ाक फरिछौटमे तेसर अपन काज बरदा नहियेँ पड़ए चाहैए। मुदा आजुक माहौल दोसर रंग भेने, दुनू गोरेकबीच कहा-कही भेने अनेको लोक दुनूक बात सुनि जमो भेल आ फरिछबैले तैयार सेहो भेल। ओना, बिनु बजौले सभ छल, किए तँ सभ जसमन्त बाबाक दर्शन करए जा रहल अछि। तइ बीचमे दुनू गोरेक कहा-कहा, बीच सड़केपर भेने, फरिछौटक परिस्थिति बनि गेल। दीपवालीक बात सुनि रखवारीवाली बजली-

भगवानोक ठीकेदारी अहींकेँ अछि..!”

बिना लगामक घोड़ा जकाँ दीपवाली हीनहीनाइत जवाब देलकैन-

भगवान भगवान छैथ, लोकक कहाकहीमे ओ किए औता, लोक बड़ बेसी हएत तँ भक्त बनि सकैए, उपासक बनि सकैए, तैठाम जे ई भगवानक दोख लगबै छथिन से हिनका अपना-सन भेलैन?”

रखवारियोवाली बेलगामक घोड़ा जकाँ हीहीयाइत बाजल-

अपना सन नइ भेल तँ की अहाँ सन भेल?”

अपना सन भेल कि अहाँ सन भेल, तेकर अर्थ दीपवालीकेँ दोसरे लगि गेलैन। किए तँ दीपवालीकेँ बुझल जे अण्डी तेलक दीपक इजोत आँखिकेँ कड़ुअबैए मुदा गोटक तेल वा मटिया तेलक इजोत ओहन प्रकाश दइए जइसँ अन्हार दुनियाँकेँ लोक प्रकाशित देखैए।

रखवारीवाली आ दीपवालीक बीचक जे गप-सप्पक क्रम छल ओ अपने अगरबत्ती जकाँ मसल्ला सठने मिझा गेल।

सात बजे साँझक समय। काल्हिये चैत सम्पन्न भेल आ आइ बैशाख चढ़ल, तँए सात बजे साँझ रहितोमाघक तेसर साँझ सन अन्हार नहि छल, छल पहिल ओहन साँझ जकाँ जे सूर्य तँ पाट लऽ लेने छला मुदा अकासमे लाली दिने जकाँ पसरल छल। बेरुका समैयक काजक बिसरजन करबाक समय देख अपनो खेतसँ दरबज्जापर एबे कएल छेलौं कि कानमे भनक लागल। मुदा तैयो अपन ऐगला प्रक्रियाक भाँजक तैयारीमे जुटले रहलौं। माने एक उखड़ाहा काजक बिसरजन आ दोसर काजक बीचक जे समय होइए तइसँ प्रवेश करैले जे लोक अपन तैयारी करैए, आ तैसंग दिनक बिसरजन आ रातिक आगमन बीच जे अपन नित्य क्रिया अछि, तइमे लागि गेलौं। कलपर (चापाकल) मुँह-हाथ धोइते रही कि पत्नी लगमे आबि बजली-

जसमन्त बाबानहि बँचता।

पत्नीक बात सुनि मन एकाएक हहरए लगल। हहरए ई लगल जे एकाएक जसमन्त बाबाकेँ की भऽ गेलैन जे पत्नी एहेन बात बजली। मुदा लगले फेर अपने मन कहलक जे पहिने जान तखन ने जहान। काजसँ आएले रही तँए देहोक थकान आ मनोक थकान भइये गेल छल। जइसँ ऐगला काज देख, सँझुका उखड़ाहाक काज देख मन असकताइते छल। तैबीच पत्नीक मुँहक समाचार-जसमन्त बाबा आब नहि बँचता’, आरोमनकेँ मथएलगल। ओना, ऐगला काज पकड़ैक जिज्ञासा मनमे ओहिना उत्सुका रहल छल जे जीवन तँ कर्मे–काजे–ले मनुखकेँ प्राप्त भेल अछि। जे (कर्म) जिनगीक संग चलैत-चलैत जीवन मुक्त करैए, तँए कर्म जखने जीवनसँ छुटल कि मृत्यु भेल। माने मुक्तिक अवरोध भेल। जीवन मुक्त तँ तखने ने भेटैए जखन जीवन भरिक काजक अन्तिम सीमाक काज समाप्त होइए...। मनमे नव-नव विचार जगने मनक थकान तँ लगले मेटा गेल, मुदा देहक थकान कनी-मनी कमि जरूर रहल छल मुदा सोल्होअना मेटाएल नहि छल। जेकरा मेटाएब जरूरी छेलए-हे। किए तँ जखने पैछला काजक थकान देहकेँ पकड़ने रहत तखने ऐगला काज करैक ओ उत्साह नहियेँ औत, जइ उत्साहक जरूरत आगूक काज लेल होइत अछि। काजोक अपन-अपन उत्साह होइछै किने। जे कियो उत्साहित भऽ अपन काज करै छैथ हुनका काजक सफलताक जेते आशा रहै छैन तेते अनउत्साहित लोकक काजक नहियेँ होइ छैन। थोड़-थाड़ जे देहक थकान मनसँ छुटि देहकेँ पकड़ने छल, ओकरा मेटबैक खियालसँ पत्नीकेँ कहलयैन- जसमन्त बाबा ऐठाम जाएब, तइ बीचमे अहाँ जलखै-चाहक ओरियान करू।

पत्नी आँगन दिस बढ़ली आ अपने हाँइ-हाँइ मुहोँ-कान धोइत रही आ मने-मन विचारितो रही जे जसमन्त बाबाक समाचार तँ अपना परिवारमे ने सुनलौं, जे सतो भऽ सकैए आ फुसियो भइये सकैए। ओना, कोनो उड़न्ती समाचार ने सोल्होअना सत होइए आ ने सोल्होअना असत्ते होइए। ओइमे किछु-ने-किछु कमी-बेसी होइते अछि। मुदा ई तँ भेल शतप्रतिशत् विचार। मुदा बीचमे, माने एक प्रतिशतसँ लऽ कऽ निनानबे प्रतिशत तकक विचार दुनूक जोड़ुआ चलिते अछि। माने ई जे कोनो विचार–बात वा समाचार–निनानबे प्रतिशत सत् रहल आ एक प्रतिशत फुसि रहल। तहिना कोनो निनानबे प्रतिशत फुसि रहल आ एक प्रतिशत सत् रहल। ओना, तहूमे बुझब कठिन नहि अछि। किए तँ जेकर मात्रा बेसी रहल ओइ अनुकूल लोक अपन विचार बना लइ छैथ। मुदा असल झमेल ओइठाम शुरू होइए जैठाम कम मात्राक दूरी रहैए, माने कोनो एकावन प्रतिशत रहल आ कोनो उनचास प्रतिशत। कहलो जाइए जे लंकामे जे बड़ छोट ओ उनचास हाथ..! भाय, गिनतीमे एक-सँ-उनचास सीढ़ी ऊपर भेल आ भेल सभसँ छोट, से केना भेल? जिनगीक कियो निनानबे सीढ़ी चढ़ि गेला, एक सीढ़ी चढ़ैमे माने शत-प्रतिशत जीवन धारण करैमे जँ कोनो कारणे नहि चढ़ि सकला, तँ हुनका संग की न्याय हेबा चाही..? मुदा लगले मन फुटि बाजल-

परीछाक परिणाम सेहो दू-दिसिया होइते अछि, कियो निच्चासँ प्रथम होइए तँ कियो ऊपरसँ। एहनो तँ सम्भव होइते अछि।

मनक थकान हेट भेने आ देहक थकान मेटेने मन सोल्होअना फरहर भऽ गेल। तैबीच पत्नी जलखै नेने दरबज्जापर पहुँच चुकल छेली। अपनौं लोटामे पानि लेलौं आ दरबज्जा दिस बढ़लौं। लग पहुँचते पत्नी जलखै चौकीपर रखि आँगन दिस बढ़ैत बजली-

चाहो लगिचाएले अछि।

पत्नीक सूत्रवद्ध काज देख अपनो मन सुतिया लगल। सुतिया ई लगल जे एक तँ गामक श्रेष्ठजन जसमन्त बाबा छैथ, हुनकर समाचार छिऐन, तैठाम अपन की दायित्व बनैए? झलफलाएलमे ने विचार झलफलाइत अबैए, मुदा अकलवेरा समयमे से तँ नहि होइए। आँखिक सोझमे जसमन्त बाबा छैथ, तखन अपने किए विचारैमे देरी लगैत। सएह भेल। जलखै नीक जकाँ सठलो नइ छल, पत्नी चाह अननौं ने छेलीकितइ बिच्चेमे मन मानि गेल जे अपन पत्नीक मुहेँ अपना घरमे जसमन्त बाबाक सम्बन्धमे सुनलौं, हुनको तँ परिवार छैन्हे, तँए उचित बनैए जे गामक लोकक बातक फेड़मे नहि पड़ि हुनके ऐठाम जा बात बुझिऐ। देरीए सही मुदा ठौरपर तँ पहुँचब।

पहिल साँझक प्रकाश समाप्त भऽदोसर साँझक अन्हार पसैर चुकल छल। घर-घर दीप-बाती जरियो रहल छल आ जरौलो जा रहल छल। चाह पीब पान खा जसमन्त बाबा ऐठाम विदा भेलौं। रास्तामे केते गोरे टोकबो केलैन जे अन्हारमे केतए जाइ छी, मुदा सभकेँ एक्के उत्तर दैत- लगले अबै छी, कहैत रास्तामे केतौ ने रूकलौं। जसमन्त बाबाक दरबज्जापर जाइसँ पहिने जसमन्त बाबाक ममियौत भातीज पहुँच चुकल छलैन। भाय, समृद्ध परिवारमे समृद्धताक जे-जे कारण अछिओइमे अति आवश्यक जे अछि, पहिने ओकर भरपाइक बेवस्था हेबा चाही किने...।

जसमन्त बाबाक ममियौत भातीज किसानी जिनगीसँ सभ दिन जुड़ल रहला तँए कृषि सम्बन्धित जे आवश्यक काज अछि तेकरा सम्हारैत ममियौत भातीज अपन परिवारक भार पत्नीकेँ सुमझा अपने जसमन्त बाबा-ऐठाम आएल छला।परिवारक अधिकांश, खासकऽ पुरुख वर्गबाबाक संग लहेरियासराय गेल रहथिन। हमरा देखतेसुबुधनाथ बजला-आउ-आउ, भाय!”

ओना, सुबुधनाथसँ एक-दू बेर भेँट भेल छल मुदा गप-सप्प नहि भेल छल, तँए चेहरासँ चिन्है छेलिऐन मुदा गप-सप्प नहि भेने अनभुआर तँ रहबे करैथ। सुबुधनाथक बात सुनि मन परिवारक बेवहारपर पहुँच गेल। यएह ने परिवारक जीवित संस्कृति भेल जे दोस्त होथि कि दुश्मन, शुभचिन्तक होथि कि अशुभचिन्तक, जँ दरबज्जापर पहुँच गेला तँ हुनका उम्रानुकूल अभिवादन करैत ऐगला गप-सप्पक मुँह आदरपूर्वक बना दिऐन। विचारभेद, काजभेद अपन विचार-बीच वा काजक बीच अछि,तइलेअनोन-बिसनोन हएब नीक थोड़े हएत। ओना, सुबुधनाथक अभिवादन सुनि मनमे दू रंगक विचार उठल। पहिल उठल जे सुबुधनाथक परिचय नीक जकाँ बुझि ली, आ दोसर उठल जे जइ काजे आएल छीपहिने से बुझि ली। असमंजसमे पड़ल मने बजलौं-

जसमन्त बाबाक की समाचार छैन?”

सुबुधनाथ बजला-

एक डेढ़ घन्टा हमरो एना भेल अछि, तइसँ पहिनहि चरिचकिया गाड़ीसँ समांग सभ लहेरियासराय लऽ गेलैन, तँए आँखिक देखल तँ कोनो समाचार नहि अछि मुदा अबिते जे सुनलौं से कहि सकै छी।

सुबुधनाथक बात सुनि मनकेँ मनबए लगलौं जे अखन तँ दूटा मुख्य आधार भेटिये रहल अछि। पहिल, अपन परिवारिक सम्बन्धसँ सुबुधनाथ भातीज छथिन, दोसर, जखन हुनका दरबज्जापर बैस गप-सप्प कऽ रहलौं अछितखन सत् छोड़ि झूठ केना हएत। बजलौं-

हँहँ, अहूँ तँ आने गामसँ आएल छी, तँए जँ घन्टा-दू-घन्टा देरियोसँ एलौं तँ ओ समैयेपर आएब भेल। तइ संग परिवारक लोक भेने परिवारेजन सभसँ ने जे सुनलौं सएह कहब।

सुबुधनाथ बजला-

दुनू भाँइयो आ काकियो संगे गेल छैथ, मुदा दुनू पुतोहुओ आ धियो-पुता सभ अछिए। हुनके सभसँ जे सुनलौं से कहै छी।

परिवारक बात सुनि मन मानि गेल जे परिवारक बात छी, तँए जे हएत से साँचे हएत। भाय, ऐठाम ई नइ बुझब जे परिवारक माने पत्नी आ पत्नियेँक आदेश भेल परिवारक आदेश आ वृद्धजन वा श्रेष्ठजनक कान तक भलेँ ओ विचार पहुँचए वा नहि पहुँचए। ऐठाम परिवारक माने बुझब जे जे परिवारक जे धड़गत धारपकैड़ चलैएओकरा समयानुकूल बनबैत सम्मिलत धार बना चलब...। बजलौं-

हँ, हँ, अहूँ सएह ने कहि सकै छी। जसमन्त बाबाक शरीरमे की भेलैन से आन थोड़े सोल्होअना बुझि सकैए। ओ तँ अपनेटा बुझि सकै छैथ।

सुबुधनाथ बजला-

अखन करीब आठ बजैत हएत। अढ़ाइ-तीन बजे बेरुपहर पेटमे दर्दक प्रकोप भेलैन से तेते उग्र भऽ गेलैन जे वेहोश भऽ खसि पड़ला।

वायुक प्रकोपसँ जसमन्त बाबा अचेत भेला, ई कोनो बड़ भारी रोग नहि भेल। रोगक थाह पेबिते मन थेहगर भेल। बजलौं-

जखनसँ सभकियो लहेरियासराय गेला तइ बीचक तँ कोनो समाचार नइ ने अछि।

सुबुधनाथ बजला- नहि।

नहिसुनिते बजलौं-

अखन जाए दिअ। जँ गर भेटत तँ अखने हमहूँ जा कऽ भेँट करबैन।

उठि कऽ विदा भेलौं। चैतक रान्हल लोक बाइस-तेबाइस बना बैशाखमे खेबे करै छैथ, भरिसक सहए ने असैर केलकैन..? मुदा लगले दोसर विचार उठि गेल जे खाइ-पीबैमे जसमन्त बाबा एकजुत्ती लोक,अपन मनोनुकूलचलैबला लोक छैथ, तखन खाइ-पीबैमे कोनो गड़बड़ भेल हेतैन से सम्भव नहि अछि, तखन की भेलैन? मुदा रोगक तँ सोल्होअना जानकार रोगिये भऽ सकै छैथ। जेना-जेना डेग घरमुहाँ बढ़ि रहल छल तेना-तेना मनमे अन्हार सेहो पसरल जा रहल छल। अपनो उमर आब ओहन नइ रहल जे अमावसिया सनक अन्हार रातिमे भरि-भरि राति ओहन सड़कपर पैडिलबला साइकिलबिना इजोतमे चलबै छेलौं, से आब थोड़े रहल। आब कि ट्रेण्ड ड्राइवरक ओ महत् रहल, आब तँ अनट्रेण्ड पाछूसँ धक्का मारि ट्रेडक दोख लगा अपनाकेँ ट्रेण्ड बनबैक ट्रेण्ड बनियेँ गेल अछि। मुदा डरे जँ रास्ता चलबे छोड़ि देब तखन तँ घरेमे दिन-राति घुरियाएल रहब..! किछु फुरिये ने रहल छल जे की करी वा की नहि करी। रातिक दस बाजि गेल। रंग-बिरंगक विचार मनमे उठिये रहल छल। कखनो-कखनो ईहो उठि जाइ छल जे जँ जसमन्त बाबा मरि गेला तँ अन्तिम जीवित दर्शन नहियेँ भऽ पौत। कखनो ईहो हुअए जे एते रातिमे लहेरियासराय विदा हएब आ रास्तामे किछु अपने भऽ गेल तखन की हएत? असमंजसमे पड़ल मने विचार केलौं जे घन्टा-डेढ़-घन्टाक रास्ता लहेरियासराय अछि, तैबीच जे जेबो करब आ ईहो भाँज नहि बुझल अछि जे प्राइवेटमे केतौ छैथ आकि सरकारी अस्पतालमे छैथ। से नहि तँ साढ़े तीन बजे जे पहिल बस पटना-ले गामसँ खुजैए, तेकरा पकैड़ चलि जाएब। साढ़े चारि-पाँच बजे दरभंगा पहुँचब। दिनक समय रहत कोनो-ने-कोनो भाँज लगिये जाएत।

पाँच बजे भोरमे दरभंगा बस स्टेण्डसँ टेम्पू पकैड़ लहेरियासराय विदा भेलौं। संजोग बनल, जसमन्त बाबाक छोट बेटा- देवकान्त चौकेपर भेँट भऽ गेला। पुछलयैन-

बाबाक की समाचार छैन?”

देवकान्त बजला-

पेटमे गैसक प्रकोप छेलैन। अबिते डॉक्टर साहैब प्रतिकार केलैन। थोड़बे कालक पछाइत मन हल्लुक भऽ गेलैन। अखन नीक छैथ। आइये घुमियो जाएब।

देवकान्तक बात सुनि मन मानि गेल जे एलहा साफल भेल। देवकान्तक संगे गेलौं। जसमन्त बाबाकेँ देखते गोड़ लगलयैन। बैसलौं। तइ बीच देवकान्तचाहो दोकानसँ अनलैन। दुनू गोरे चाहो पीबए लगलौं आ गपो-सप्प करए लगलौं। कहलयैन-

बाबा!अहाँ तँ संयमित लोक छी, तखन एना..?”

जसमन्त बाबाक मन सोल्होअना शान्त रहैन। बजला-

बौआसुरेश, अपने मन धोखा देलक।

अपने मन धोखा देलक सुनि अचम्भित भऽ गेलौं जे ई की बाबा कहलैन..! शंका उठल। शंका ई उठल जे भरिसक जसमन्त बाबाक रोग अखनो ओहिना जीवित छैन। मुदा खनहन मन देख ईहो शंका हुअए जे जँ मन नीक नइ रहितैन तँ एते असथिर केना भेल रहितैथ।कछमछ-कछमछ करबे करितैथ। नीक हएत जे गप-सप्पकेँ आगू बढ़ाबी, अपने सभ भाँज लगि जाएत। पुछलयैन- से की बाबा?”

जसमन्त बाबा बजला-

बुझले छह जे परसुका रान्हल, माने चैतक रान्हलकाल्हियो लोक खेलक आ केते गोरे आइयो बैशाखमे खाएत।

बजलौं-

हँ, से तँ खेबे करत!”

जसमन्त बाबा बजला-

अही बीचमे ने मन धोखा देलक।

मन धोखा देलकजसमन्त बाबाक मुहसँ बेर-बेर निकलै छेलैन, मुदा मन की धोखा देलकैन से बुझिये ने पेब रहल छेलौं। तँए मन औना रहल छलजे जसमन्त बाबा बुझि गेला। बुझिते मुस्कुराइत बजला-

बौआ सुरेश!अरबा चाउरक भात, रोड़गरसँ उलौल राहरिक दालि आ दही दऽ कऽ पुतोहु बरी बनौने छेली। खाइले जखन बैसलौं तँ दहिवरी देख मन अतीतमे वौआ गेल।

बजलौं-

की अतीतमे मन वौआ गेल?”

जसमन्त बाबा बजला-

दहिवरी खेबामे तेतेक स्वादिष्ट छल जे अपन जीवनक बीतल सुआद सभ मोन पड़ि गेल।

पुछलयैन-

की जीवनक बीतल सुआद सभ मोन पड़ि गेल?”

जसमन्त बाबा बजला-

पहिल बेर सासुरमे दुरागमन दिन एहेन खेने रही, दोसर बेर समधियौरमे खेने रही आ तेसर बेर संगीक संग संगी ऐठाम खेने रही।तही सभमे मन वौआ लगल। हाथकेँ मुँह देखले रहै, रसे-रसे तेते खुआ गेल जे बेसम्हार भऽ गेल।

किछु भाँजपर विचार चढ़िये रहल छल। बजलौं-

खेबे एहेन छी जे लोक सभ दिन खाइए, तखन केना..?”

अपन विचार खोलैत जसमन्त बाबा बजला-

खेबेकाल मन वौआ अपन सासुरो, समधियौरो आ दोसोक ऐठाम पहुँच गेल तँए बेठेकान भोजन भऽ गेल। घन्टा एके-डेढ़ेक पछाइत पेट तनए लगल। चीत गरे सुति पेटकेँ केतबो अराम देलिऐ, मुदा ज्वालामुखी जकाँतरसँ गैसक बुमकला पेटमे छुटए लगल। उठि कऽ ठाढ़ भेलौं कि खसि पड़लौं।

बजलौं-

अखन मन केहेन अछि?”

जसमन्त बाबा बजला-

आब सोल्होअना बुलन्द छी। डॉक्टर सहाएबक हिसाब-बारी देवकान्त कऽ लइए, पछाइत सभ संगे चलब।

बजलौं-

बड़बढ़ियाँ।

 

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।