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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

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डॉ. चित्रलेखा

मिथिलाक प्रसिद्ध लोक पर्वसामा-चकेबा

मिथिलाक स्त्रीसमाजक अनुपम आ आदर्शक एकटा अद्भुत आ अत्यन्त मनोरंजक पावनि थिक सामा-चकेबा। स्कन्दपुराणक निम्नलिखित श्लोकक आधार मैथिल ललना लोकनि आदिकालहिंसँ परम्परानुसार सामा-चकेबाक पावनि करैत आबि रहल छथि-

द्वारकायाञ्चकृष्णस्य पुत्री सामाऽतिसुन्दरी।

साम्बस्य भगिनी सामामाता जाम्बवती शुभा।।

इतिकृष्णेन संशप्ता सामाऽभूतक्षितिपक्षिणी।

चक्रबाक इति ख्यात: प्रियया सहितो वने।।[1]

मिथिलाक स्त्रीसमाज ई पावनि अखण्ड भातृ सुख, सर्वभौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादिक अर्थात् सन्तानक कल्याणार्थक अतिरिक्त खास कऽ अपन पति आ भाइकेँ दीर्घायु, यशस्वी आ समृद्ध होएबाक कामनासँ करैत छथि। सम्पूर्ण मिथिलामे स्त्रीगण लोकनिक पावनिमे इएह एकटा एहन पावनि अछि जे लगातार पन्द्रह दिन तक चलैत अछि। ई पावनि प्रतिवर्ष कार्तिक मासक द्वितीया शुक्लसँ प्रारम्भ भए पूर्णिमा धरि चलैत अछि। प्राय: एकर कारण ई अछि जे शास्त्रानुसार कार्तिक मास सभ पापक नाश करएबला आ भगवान विष्णुक सभसँ प्रिय मास थिक। एहि पावनिमे मैथिलानी लोकनि खास कऽ अपन भाईक कल्याणार्थ चुगिलाक मुँह जरबैत छथि। शायंकाल गीत गाबि नवका धानक शीशसँ हिनक पूजा कएल जाइत अछि। भातृद्वितीया दिनसँ ई पूजा प्रारम्भ होइत अछि आ कार्तिक पूर्णिमा दिन नवका चूड़ा-दही, गुड़ भोग लगा कऽ परिचारिका एवं धियापूता सभमे प्रसाद बॉंटल जाइत अछि। वाटो बहिनोकेँ चौबटियापर अवस्थित कएल जाइत छन्हि। पन्द्रह दिन धरि मुन्हारि सॉंझ कऽ समा-चकेबाक डालाक अदला-बदली मैथिलीएमे मन्त्र पढ़ि-पढ़ि कएल जाइत अछि। डाला फेरलाक बाद कार्तिक पूर्णिमा दिन नानाप्रकारक पकमान बना कऽ बहीन, भाईकेँ भोजन करओलाक बाद भाईक द्वारा ठेहुन लगा कऽ मूर्ति सभ तोड़लाक बाद भाईक फाँड़ भरल जाइत अछि आ सामा-चकेबाकेँ अगिला वर्ष पुन: अएलाक नोत देलाक बाद विसर्जन कऽ देल जाइत अछि। ध्यातव्य जे ई पावनि अबितहिं मैथिल ललना लोकनिमे हर्षोल्लासक संग आनन्दक लहरि हिलकोर मारऽ लगैत छन्हि। कारण हुनका लोकनिकेँ अपन-अपन गीतक प्रदर्शन करबाक पूर्ण अवसर भेटि जाइत छन्हि। ई गीत गएबाक क्रम सायंकालसँ प्रारम्भ भए चारि-पाँच घन्टा तक चलैत रहैत अछि।

मिथिलाक सामा-चकेबाक पूजा बड़ प्रख्यात अछि। ई पावनि मिथिलाक प्राय: प्रत्येक घरमे होइत अछि आ मात्र स्त्रीगणे लोकनि द्वारा ई सम्पादित कएल जाइत अछि। एकर मूल कारण अछि सामाक कथा, जे कथाक अवलोकनसँ स्वत: स्पष्ट भऽ जाएत। शोध-अन्वेषणसँ प्राप्त सामग्रीक आधारपर सामाक कथा तीन प्रकारक उपलब्ध होइत अछि-

पहिल कथा :- सामा साम्बक बहिनि छलीह। ई अत्यन्त भव्य रूपलावण्यवतीक संग-संग बुधियारि (गुणवती) सेहो छलीह। ई अधिकांश समय मुनि लोकनिक आश्रम जाहि वनमे छलन्हि ततहि भ्रमणशील रहैत छलीह। वन-भ्रमण विचरणक आदति हिनका नैनेसँ छलन्हि। हिनका बलिप्रदान, होम, यज्ञ, वेद-पुराण पाठ आदि देखबा-सुनबामे खूब मोन लगैत छलन्हि। ओहिठामक होमाग्नि आ स्वच्छ शीतल हवा सेहो अत्यन्त स्वास्थ्यकर छल।

श्यामा जखन नमहर भऽ गेलीह तखनहुँ ई ज्ञान यौवना बालकौतुहलवशात् नेने जकॉं पूर्ववते निश्छलतासँ विचरण करैत रहलीह। एहन अपूर्वसुन्दरि वालाकेँ देखि मुनि लोकनिकेँ पूर्ण आशंका ओ स्नदेह भेलन्हि जे कहीं मुनिकुमार लोकनिक चंचल मोन जे वायुवेगहुँसँ अत्यधिक तीव्र होएबाक कारणेँ डोलि ने जान्हि, तेँ सामाकेँ मना कएलन्हि जे ओ आश्रमणक निकट भोरे-भोर नहिं आबथि। किन्तु निश्छल पवित्र मोन वाली सामा बारम्बार मुनि लोकनिक द्वारा मना कएलहुँ पर ओ नहिं मानलन्हि। तखन क्रोधक आवेश मे आबि ओ मुनि लोकनि शाप दऽ देल जे अहॉं पक्षी भऽ जाउ

मुनि लोकनिक शापक कारणेँ सामा पक्षी बनि एमहर-ओमहर फुर-फुर करैत उड़ए पड़ए लगलीह। अशान्त मोनसँ मुनि आश्रमक निकट केवल चैं-चैं, टैं-टैं करैत ऐ डारिसँ ओइ डारि उड़थि फिरथि। कहाबत छैक जे वृथा न होंहि देव ऋृषि वाणी

कृष्णक पुत्र साम्बकेँ ऋृषि-शापक ई अशुभ समाचार भेटलन्हि। ओ दायार्द्रचित्त भए ठेहुनियॉं दए दस हजार वर्ष धरि विष्णुसहस्रनामक पाठादि तप कए भगवान विष्णुकेँ प्रसन्न कएलन्हि। तत्पश्चात् सामाक पक्षीत्व विमोचन भेलन्हि।[2]

दोसर कथा :- एक समय कोनो सरोवरमे कृष्ण भगवान अपन आठो पटरानी सभक संग नग्न-नग्ना जल-क्रीड़ामे लीन छलाह। चारूकातसँ ओहार आ परदाक पूर्ण प्रबन्ध छल।

साम्बकेँ कौतुहलवशात् परदाक इरोतमे भऽ जल-क्रीड़ा नुका कए देखबाक इच्छा भेलन्हि। ओ नुका कऽ परदामे छेद कए जल-क्रीड़ा देखए गेलाह। क्यो चुगिलाह जा कऽ भगवान कृष्णकेँ चुगली लाड़ि देलक। साम्ब अपन माए लोकनिकेँ वस्त्रहीना देखबाक महापाप कएलन्हि तेँ चुगिलाक चुगिलपनक कारणेँ क्रोधित भए कृष्ण हुनका शाप दऽ देलथिन्ह जे- अहॉं कोढ़ि भऽ जाउ। कृष्णक शापक बाद साम्ब तुरत्ते गलित कुष्टसँ अत्यन्त पीड़ित भऽ गेलाह। गलित कुष्ट रोगक कष्ट देखि सूर्य भगवानकेँ दया लागि गेलन्हि। साम्बकेँ स्वप्नमे ओ अपन 21 टा उग्र नाम कहलन्हि। जाम्बवतीक पुत्र साम्ब, ओही 21 नामक (साम्बपुराणान्तर्गत सूर्यस्तवराजक) पाठ करए लगलाह। पापक फल भोगलाक पश्चात् किछु दिनक बाद ओ रोगमुक्त भऽ गेलाह। हिनक पाठक अवधिमे हिनक बहिनि सामा अग्नि प्रज्वलित कए अपन भाइक जघन्य महापापक चुगली कएनिहार चुगिलाक नूआक मूर्ति बना कऽ जराएल करथि। तेँ मिथिलामे ई कहबी प्रचलित छैक जे- चुगिला करए चुगली बिलाइ करए म्याउँ। सामाक द्वारा अपन भाइक प्रति अगाध प्रेम ओ सहानुभूतियेक कारण कुलाङ्गना लोकनि सामाक पूजा-अर्चना करैत आबि रहल छथि।[3]

तेसर प्रचलित कथा :- इएह कथा मिथिलामे प्राचीन कालहिंसँ परम्परासँ प्रचलित अछि आ एही कथाक अनुरूप ई सामा-चकेबाखेलाएल जाइत अछि। ई कथा एहि प्रकारेँ अछि :-

एक समय ऋषि लोकनि सूत महाराजसँ कहलथिन्ह जे- हे सूत महाराज! हम सब अपनेक मुँह सँ अनेक इतिहास पुराणक कथाक श्रवण करैत आबि रहल छी। आई हमरा लोकनिक मोनमे सामाक सम्बन्धमे जिज्ञासा भेल अछि जे- एहि पृथ्वीपर सामाक पूजा किएक होइत छन्हि? ई सामा के थिकीह? ई किनकर पुत्री आ किनकर बहिन आ किनकर पत्नी छथि? पृथ्वीपर हिनकर पूजाक की विधान अछि? कृपया एहि वृतान्तकेँ सविस्तर सुनएबाक कृपा कएल जाए। ऋषिगणक आग्रहपर सूत महराज एहि सामा-चकेबाक कथा सविस्तार सुनएबासँ पूर्व कहलन्हि जे आइ जे हम सामाक कथा एखन विस्तार सँ सुनबाऽ जा रहल छी ताहि सम्बन्ध ई कहि दी जे एहि कथाक श्रवणसँ स्त्री सौभाग्वती होइत छथि आ सामाक पूजासँ स्त्रीगण कृतकृत्य भऽ जाइत छथि। हे मुनिश्रेष्ठ लोकनि! आब विस्तारसँ ई कथा सुनू-

सामा श्री कृष्णक पुत्री छलीह। हिनक भाइक नाम साम्ब आ माएक नाम जाम्बवती छलन्हि। सामा अपूर्व सुन्दरीक संग-संग उदारता आदि गुणसँ सम्पन्न छलीह। सामा अपन सखी लोकनिक द्वारा सदैव प्रशंसित रहलीह। ओ नित्य ऋषि-मुनिक आश्रम जाए खेलाइत छलीह। एही प्रकारेँ हिनकर समय व्यतीत होइत छल। सामाक विवाह चारूवक्य (चक्रबाक) नामक एकटा समृद्ध युवकसँ भेल छलन्हि। हुनका एकटा डिहुली नामक नोकरनी छलन्हि। एकदिन सामा मुनिक आश्रमसँ घुरल अबैत छलीह कि बाटहिमे ओ डिहुली नामक नोकरनी हिनका देखि लेलकन्हि आ कृष्णक लग जा कऽ सामापर मिथ्या मनगढ़ंत आरोप लगा कऽ चुगली कऽ देलकन्हि जे- ई वृन्दावनमे टहलऽ जाइत छथि तेँ ऋषि सभक संग रमण करैत छथि।श्री कृष्ण सामाक चारित्रिक दोषारोपण सुनि अत्यन्त क्रोधित भए गेलाह आ ओही क्रोधमे सामाकेँ शाप दऽ देलन्हि जे- हे समा! जखन एहन स्वर्गतुलय घर केँ छोड़ि अहॉं मुनिक निकट गेलहुँ, तँ जाउ! हम अहॉंकेँ शाप दैत छी जे पृथ्वीपर जा कऽ वृन्दावनक जंगलेमे चकबी पक्षी बनि निवास करू।श्री कृष्णक शापक कारण सामा चकबी पक्षी भऽ गेलीह। आ ओहो क्रोधमे आबि कऽ चुगिलपनक कारणेँ डिहुलीकेँ शाप दऽ देलन्हि जे जाहि मुँह सँ अहॉं हमरा पर मिथ्या मगनगढ़ंत आरोप लगौलहुँ ओ मुँह अहॉंकेँ आगिसँ झरकाओल जाएत।

शापित सामा चकबी पक्षी बनि वृन्दावनमे रहऽ लगलीह। ओमहर हिनक पति चारूवक्य (चक्रबाक) एहि शापक घटना सुनि अत्यन्त दु:खी भऽ गेलाह आ विरहमे तुरत देवाधिदेव महादेवक अराधनामे लीन भऽ गेलाह। एक दिन महादेव सामाक पति चारूवक्यक तपस्यासँ प्रसन्न भए कहलन्हि जे- माँगू! अहॉं जे वरदान माँगब से हम देब। तखन सामाक पति महादेवसँ कहलथिन्ह जे- हे महादेव! हमर पत्नी सामा अपन पिता श्री कृष्णक शापसँ पक्षी बनि गेलीह। हम आब हुनका वियोगमे नहिं जीवि सकैत छी। तेँ हम जाहि कोनो प्रकारेँ हुनका संग रहि पति-पत्नीक सुख प्राप्त कऽ सकी से वरदान दिअ। तखन महादेव एवमस्तु कहि देलथिन्ह। महादेवक एहि वरदानक पश्चात् सामाक पति चारुवक्य (चक्रबाक) पत्नी सुख प्राप्त करबाक हेतु चकबा  पक्षी बनि गेलाह। तत्पश्चात् सामा आ चारुवक्य (चक्रबाक) दुनू गोटे (पति-पत्नी) पक्षी रूपमे वृन्दावनमे यत्र-तत्र-सर्वत्र संगे घुमि-फिरि दाम्पत्य जीवनबिताबए लगलाह।

सामाक भाई साम्बकेँ जखन अपन बहिन-बहिनोइकेँ शापित भऽ पक्षी बनि जएबाक घटनाक जानकारी भेटलन्हि तखन ओ बहुत दु:खी भऽ गेलाह आ अपन बहिन-बहिनोइक उद्धारक हेतु तत्क्षण एकाग्रचित्त भऽ कऽ भगवान विष्णुक पूजा प्रारम्भ कऽ देलन्हि। विष्णु सहस्त्र नामक विष्णुक स्तुतिसँ शंख-चक्र-गदाधारी भगवान विष्णु साम्बक समक्ष प्रकट भेलाह आ साम्बसँ कहलन्हि जे- हे पुत्र! हम अहॉंक अराधनासँ अति प्रसनन छी। तेँ अहॉं माँगू! जे वर माँगब से हम देब।साम्ब कहलन्हि जे- हे नारायण! यदि अहॉं हमर अराधनासँ प्रसन्न छी तँ हमर एकमात्र शापित बहिन-बहिनोईकेँ जे पक्षीक रूपमे आइ दर-दर जंगले-जंगल भटकि रहल छथि तनिका पुन: वास्तविक मनुष्य रूपमे सुखी दाम्पत्य जीवन व्यतीत करथि से वरदान दिअ।

तखन भगवान विष्णु कहलन्हि जे- हे वत्स! अहॉंक बहिन-बहिनोइ जाहि तरहेँ शाप-मुक्त भऽ मनुष्य योनि प्राप्त करताह से उपाय हम कहैत छी। अहॉं ध्यानसँ सुनू-

कार्तिक मास हमर सभसँ प्रिय मास अछि। ई मास सभ पाक नाश करऽबला होइछ। कार्तिक मासक शुक्ल पक्षक पंचमी तिथिमे घर-घरक स्त्री लोकनिक द्वारा नवीन वस्त्र पहिरि सामा, चुगिला, स्प्तर्षि आ वृन्दावन आ साम्ब आदिक मूर्ति बनाओल जाए। आ रंगल-ढेउरल ओहि सभ मूर्तिकेँ एकटा चँगेरामे राखि विधिवत् पूजा कएल जाए। रातिमे दीप जरा कऽ ओकरा घुमाओल जाए आ चारूकात सँ चुगिलाक मुँह झरकाओल जाए। एहिना करैत जखन पूर्णिमाक तिथि आबए तँ बहिनिक द्वारा विभिन्न पकमान बना कऽ भाइ केँ भोज कराओल जाए तत्पश्चात् भाईक द्वारा ठेहुनसँ ओहि मूर्ति सभकेँ फोड़लाक बाद, हुनका सभकेँ अगिला साल पुन: अएबाक नोत दऽ कऽ श्रद्धापूर्वक विसर्जन कऽ दिअए। एहि तरहेँ जखन ई पूजा कएल जाएत तखन अहॉंक बहिन-बहिनोइ स्वत/ मनुष्यक शरीर प्राप्त कऽ लेताह, आओर जे स्त्री सामाक पूजा करतीह ओ सौभाग्यवती होएतीह।

ई बात कहि शंख-चक्र-गदाधारी भवान विष्णु अन्तर्धान भऽ गेलाह। साम्ब अपन राज्यमे सूचना प्रसारित करौलन्हि जे हमर सम्पूर्ण राज्यक स्त्री लोकनि उपरोक्त विधि-विधानसँ सामा-चकेबा बनाए चुगिलाकेँ जरौतीह आ जे एहि आदेशक पालन नहिं करतीह तनिका एहि राज्यसँ निष्कासित कऽ देल जाएत। साम्बक आदेशनुसार राज्यक महिला लेाकनि तदनुरूप कार्तिक शुक्ल पक्षक प्रथमे दिनसँ एहि कार्यमे लागि जाइत छलीह। साम्बक आज्ञानुसार गाम-गाममे स्त्री लोकनिक द्वारा उपरोक्त विधि-विधानसँ सामाक पूजा भेल आ ओहि पुण्यसँ सामा पुन: अपन मनुष्यक शरीर प्राप्त कएलन्हि। सामा पुन: अपन मूल रूप देखि विस्मित होइत अपन सखीसँ पुछलन्हि जे हमर ई रूप कोना भेल? आ ई काज के कएलक? से कहू। जे हमरा पक्षी रूपसँ मानव रूपमे परिवर्तित कएलन्हि हुनका हम जीवन दान देबन्हि। सखी उत्तर देलथिन्ह जे ई सभटा अहॉंक भाई साम्बक प्रयाससँ सम्भव भेल।

सखीक ई बात सुनितहिं सामाक आँखिसँ अश्रधारा प्रवाहित भऽ गेलन्हि आ गद्-गद् वाणीसँ बजलीह जे- संसारमे सहोदर भाइक समान दोसर नहिं होइत अछि। धन्य थिक ओ स्त्री जकरा सहोदर भाई छैक। सामा अपन भाईक द्वारा एहि तरहक कार्य करबाक हेतु अनका अपन आन्तरिक हृदयसँ दीर्घायु होएबाक आशीर्वादक संगहि संसारक सभ बहिनकेँ हमरे सन भाई हो तकर कामना कएलन्हि। ओकर बाद सामा अपन भाईसँ भेँट कए पुन: अपन माए-बापसँ भेँट कएलन्हि।

सूतजी कहलथिन्ह जे- हे ऋषिगण! जाहि दिन सामा अभिशापसँ मुक्त भेलीह ताही दिनसँ सामाक पूजा पृथ्वीपर होमए लागल। सामाक पूजा अखण्ड भ्रातृ सुख सर्वसौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादि प्रदान करऽवला कहल गेल अछि। जे नारी एहि व्रतकेँ प्रति वर्ष करैत छथि जे भ्रातृविहीना नहिं होइत छथि आ पुत्र-पौत्रादिसँ युक्त होइत छथि।

सम्पूर्ण मिथिलामे भ्रातृद्वितीये दिनसँ सामा बनाएब प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। स्त्रीगण सभ ओहि दिन जाहि माटिसँ सामा बनौतीह तकरा स्पर्श अवश्य कऽ लैत छथि। तत्पश्चात् अधपहरा देखि कऽ छठिक खरना वा रपना दिन सामा बनबैत छथि। सभसँ पहिने सिरी सामा, दोसर दिन चकेबा, तखन एके पाँतीमे बैसल सातटा सतभैंयॉं चिड़ै, खररूचि भैया, बाटो बहिनो दू पक्षीक मुँह दू दिस भाग्य-चक्रसँ भाइ-बहिनक विमुख भेल भाइ-बहिन। नवका खढ़सँ बनल वृन्दावन, भम्हरा तथा सन (पटुआ) सँ मोंछबला अनाओल चुगिला आ चुगिलखोड़ चूड़कक प्रतीक अछि। सामा बनएबामे दिन-नक्षत्रादिक सेहो विचार कएल जाइछ। ई अधपहरा मे नहिं बनाओल जाइछ। सर्वप्रथम स्त्रीलोकनि सामा बनबैत छथि तत्पश्चात् क्रमसँ सामा-चकेबा, सतभइयॉं (सप्तर्षि), वृन्दावन आ साम्ब भैया, पक्षी आ ओकरा हेतु घर आओर चुगिला आदिक मूर्ति बनाओल जाइछ। चुगिला केँ जड़बाक काल स्त्रीगण बड़ गारि पढ़ैत छथिन्ह। एकर मुख्य कारण ई अछि जे सामाक चरित्रपर दोषारोपण लगबएवला चुगिले छल आ चुगिलेक चुगिलपनक कारणेँ सामा शापित भेल छलीह तेँ ओकरा गारि पढ़बाक परम्परा प्रारम्भ भेल।

सम्पूर्ण मिथिलांचलक महिला वर्ग (की बूढ़, की बच्चा, की जवान) सभ मिलि कऽ समा-चकेबा खेलाइत छथि। सॉंझ होइते देरी धियापूतासँ लऽ कऽ बूढ़-पुरैनियॉं तक सभक मनमे एकटा नव उमंग, नव जोश हुंकार भरऽ लगैत अछि। कारण धियापूतासँ लऽ कऽ बूढ़ धरिक सभकेँ स्वतन्त्र रूपसँ अपन-अपन गीतक प्रदर्शन करबाक नीक अवसर भेटैत छन्हि। धिया-पूताकेँ बूढ़-पुरैनियॉं सभसँ गीत आ गीत गाबक कला सीखबाक सेहो नीक अवसर भेटैत छन्हि। अँगना-अँगनासँ स्त्रीगण सभ चँगेरामे सामा-चकेबा साजि कऽ धियापूताकेँ माथपर रखने गीत गबैत टोले-टोल एक ठाम जका भऽ कऽ टहाटही इजोरियामे नव-अनव धुनमे गीतक प्रतिस्पर्धा चारि-पाँच घन्टा धरि चलैत रहैत अछि आ नव-पुरान सभ गीतगाइन सभ गीत गाबि-गाबि प्रतिदिन थोड़ेक-थोड़ेक चुगिला के जरा कऽ डाला समेटि अपन-अपन घर चलि जाइत छथि। ई क्रम लगातार कार्तिक शुक्ल पक्षक प्रथम दिनसँ पन्द्रह दिन धरि चलैत अछि आ अन्तिम पन्द्रहम दिन अर्थात् पूर्णिमाक रातिमे आने दिन जकॉं सभसँ पहिने गोसाउनिक गीत गाबि समाकेँ नवका चूड़ा-दही, गुड़, मिष्टान आदिक भोजनोपरान्त सुपारी देल जाइत अछि। आँगनमे स्त्रीगण द्वारा सभ भाईक नामसँ ओकर कल्याणार्थ गीत गाओल जाइछ। तत्पश्चात् समा-चकेबा आ प्रज्वलित दीपसँ साजल चँगेरा माँथपर राखि स्त्रीगण सभ निम्नलिखित गीत गबैत आँगनसँ बहराइत छथि-

डाला लऽ बहार भेली, बहिनो से फल्लाँ बहिनो,

फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनू! राम सजनी।

समुआ बैसल तोहेँ बाबा बड़ैता,

तोर बेटा लेल डाला छीनि, सुनू! राम सजनी।।

कथी केर डलबा गे बेटी! कथी बान्हल चारू खूट,

कोनो रंग डाला लेलकौ छीनि, सुन! राम सजनी।

सोने केर डलबा हौ बाबा, चम्पा, चमेली चारू खूट,

लाले रंग डाला लेल छीनि, सुन! राम सजनी।।

जौं तोरा आहे बहिनी हम डलबा दिया देबऽ

हमरा के की देबऽ दान, सुनू! राम सजनी।

चढ़बाक घोड़ा देब पढ़बाक पोथी देब,

छोटकी ननदिया देब दान, सुनू! राम सजनी।।

उपर्युक्त गीत गबैत गामक सभ घरक महिला लोकनि जोतलाहा खेतमे क्रमश: जमा होमए लगैत छथि। ओतऽ सामा सब के पसारि देल जाइत अछि। तत्पश्चात् सीरी सामाकेँ हाथमे लऽ कऽ लगाएल पान, गोटा सुपारी आओर एक मुट्ठी अरबा चाउर महिला लोकनि अपना-अपना आँचरपर राखि सखी सभक संगे अदला-बदली करैत छथि। अदला-बदली करैत काल स्त्रीगण निम्नलिखित फकड़ा मन्त्र रूपमे पढ़ैत छथि-

जीबजीबहो की मोर पिया जीब

की मोर भैया जीव

जेहन धैबिया के पाट तेहन भैया के पीठ

जेहन करड़िक थम्ह तेहन भैया के जॉंघ

जेहन पोखरिक सेमार तेहन भैया के टीक।

एहि विधिक बाद भईक फाँड़ भरल जाइछ आ सामा फोड़बाक लेल देल जाइत अछि, जकरा ओ लोकनि अपन ठेहुनसँ फोड़ैत छथि। सामा फोड़लाक बाद भाई लोकनिकेँ नवका चूड़ा-दही-गुड़ खुआओल जाइत अछि। तत्पश्चात् सामाक खेल प्रारम्भ होइछ। तकरा बाद चुगिलाक मोँद-दाढ़ी जराओल जाइछ आ सभसँ अन्तमे वृन्दावन जराओल जाइछ। एहि सभ विधिक पश्चात् पुन: गीत गाओल जाइछ-

गाम के अधिकारी भैया हाथ दसं पोखरि।

खुना दिअ’, चम्पा फूल लगा दिअहे।

फलबा लोढ़ैते बहिनो आयल हे।

घमि गेल सिर के सिन्दुर नयन भरू काजर हे।

छत्ता लेने आबथि भैया से फल्लाँ भैया हे।

बैसह बहिनो एहि छॉंह आसीष दहू हे।

पानियो लेने दौड़ल आबथि अइहब भौजो हे।

ननदो पीबि लिअ निरमल पानि से हमरो आसीष देहु हे।

युगे-युगे जीबथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ओ हे।

मिथिलाक स्त्रीगण सामा-चकेबाक गीत सभमे अपन-अपन भाइक नाम जोड़ि गीत गबैत छथि।

मिथिलाक अनुपम आ आदर्शक एहि अद्भुत पावनि सामा-चकेबासँ सम्बन्धित अनेकानेक गीत सभ अछि जे समयानुकूल सामाजिक परिवर्तनक कारणेँ धीरे-धीरे क्रमश: लुप्त भेल जा रहल अछि। हम सामा-चकेबासँ सम्बन्धित किछु गीत सभक संकलन उद्धृत कऽ रहल छी जाहिसँ अध्येता आ शोधार्थी लोकनिकेँ सहयोगक संग-संग ई गीत सभ जीवन्त रहि जाए तँ खास कऽ हमरा काफी आत्मसंतुष्टि होएत।

मिथिलामे परम्परासँ प्रचलित सामा-चकेबाक क्रमश: लुप्त होइत जा रहल किछु गीत सभ यत्र-तत्रसँ संग्रह कए प्रस्तुत कएल जा रहल अछि-

गीत- 1

साम चाको साम चाको अइह हे, अइह हे,

जोतल खेतमे बइसिह हे, बइसिह हे-

सब रंग पटिया ओछइह हे, ओछइह हे-

ओहि पटिया पर कए कए जना, कए कए जना

छोटे बड़े नबो जना, नबो जना।

हमरा भैया के सोनाक छुरी, सोनाक छुरी।[4]

 

गीत- 2

“सामा खेल खेलू हे भौजो। चिर जीवन मोर भाए।

चूड़क मुँह उक फेरब भौजो! चुगली करत न जाए।

बापक शाप बशें वन ऐलौं चारु बदन पति पाए।

पति सुत भाए जिअत सब भौजो! भैया होएत सहाए।।”[5]

 

गीत-  3

“अयलइ काति मास हो भैया, सामा लेल अवतार।

चिट्ठी लजैहें हजमा, नैहर हमरार।

बाबा आगू बजिहें हजमा, गोचर हमार।

भैया आगू बजिहें हजमा मिलन हमार।

सेहो सुनि भेला भैया, घोड़ा पीठि असवार।

सिन्दुर बेसाहताह भैया, बेतिया सन हे बजार।

टिकुली बेसाहिहभैया, पटना सन हे बजार।

सामा बेसाहिहभैया, मनसुर चक हे बजार।

टिकुली झलकि गेल फल्लाँ बहिनि के कपार।

सिन्दुर झलकि गेल भैया अइहब भौजी के कपार।”[6]

 

 

सम्पर्क-

एसोसिएट प्रोफेसर

मैथिली विभाग

यू.भी.के. कॉलेज, कड़ामा- आलमनगर 

बी.एन.मण्डल विश्वविद्यालय, मधेपुरा

 

 

सन्दर्भ सूची-


 

[1]मिथिला की सांस्कृतिक लोक चित्रकला- पं. लक्ष्मीनाथ झा

[2]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र- पृ. 164

[3]मिथिलाक पावनि तिहार- बाबू गङ्गापति सिंह

[4]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र

[5]मैथिलीमे व्यवहारक गीत- डॉ. लोकनाथ मिश्र

[6]मैथिली संस्कार गीत, उर्वशी प्रकाशन, पटना।

 

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