अम्बालिका कुमारी
वसंत
जखन कोइलीक कूक कान मे पड़ैत अछि /
जखन गाछ सँ पात भूमि सँ मिलैत अछि /
खेत जखन हरियर कचोर भ जाइत अछि /
पीयर-पीयर सरसोकें चादरि ओछा जाइत अछि /
वसंत आबि जाइत अछि।
जाड़ कें टाटा आ बाइ बाइ करैत अछि /
मंद मंद हवा सुगंध भ' बहैत अछि/
नील रंग आकाश मे पंछी उन्मुक्त उडैत अछि /
मोन सँ गीत कोनो सहजे फुटि जाइत अछि /
वसंत आबि जाइत अछि।
गाछी में मंजर मदहोश क' जाइत अछि /
लोकक चेहरा पर अबीर चढि जाइत अछि /
कृष्णक तान राधा कें घीच ल' अबैत अछि /
वसंत आबि जाइत अछि , वसंत आबि जाइत अछि ।
-अम्बालिका कुमारी; शोध छात्रा, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग
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