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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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राम विलास साहुक

किछु कविता

ठेँस

बाट चलैत लगल ठेँस

फुटि गेल पएर

ठेंगा ठेँगहैत

बाट चलै छी देख-देख

केना पहुँचब एतेक दूर

गाम-घर अछि दूर

पेटमे एगो दाना नहि

पियाससँ सुखि गेल

कण्ठ, मुँह-ठोर

ऊपरसँ चैतक रौद

गरम हवा लू चलैए

तबधल धरती फूटल पएर

बाटपर चलब केना

कोसक-कोस दूर

मन घबड़ाइत रहए

देह दइए जवाब

मुदा हमर कोन कसूर

ई तँ ठेँसक छी दोष

मुदा हम छी लचार

ई बाट बनल अछि

दुर्गम अगम अपार

ठेंगासँ ठेँगहैत चलै छी

तैयो लगैए बेर-बेर ठेँस

गीरैत पड़ैत भेलौं बेजान

बीच बाटपर तेजलौं प्राण। q

 

आजुक दिन- 2

आजुक दिन मनुख

कर्त्तव्यसँ चुकल अछि

अपनाकेँ बीरान आ

बीरानकेँ अपना बुझैए

तइसँ नीक तँ

जानवर अछि जे

जीवित आ मुइलोपर

सभक उपकार करैए

मुदा मनुख

एक दोसरकेँ

जानक दुश्मन बनल-ए

उचित अनुचित नै बुझि

आफदे-आफद कीनैए

आजुक दिन...।

 

आइसँ पहिने नीक

काल्हि की हएत

से के जनैए

अखनो विचार करू

वर्त्तमान किए बिगड़ल-ए

विज्ञानेटा नहि

इतिहासोकेँ देखियौ

दुनू मिला कऽ

अमृत बना कऽ

दुनियाँ लेल बाँटियौ

जरूरत अछि मानवकेँ सुधारियौ

देश समाज लेल

आजुक दिन...। q

 

धनक खातिर

धन कमेबाक लेल

सभक मनसा अछि

मुदा, ज्ञान कमेबाक

नहि जनैए कियो

माए-बाप परिवार छोड़ि

दिन-राति एक बनौने

परदेशमे खटैए

धनक खातिर।

 

ज्ञानक महत् जेना भूलि गेल

की उचित की अनुचित

नइ रहल कोनो ठेकान

धिया-पुताक जिनगी

बिगैड़ चौपट्ट भेल

परिवार-समाज सेहो छुटल

नइ रहल साविकक पहचान

सभ टुटि छिड़ियाए गेल

धनक खातिर।। q

 

शिवक नचारी

भोला अहॉं छी बड़ रूसना

कोठा महलमे मनो ने लगैए

वन-जंगल छी अहॉंक अँगना

बाघ बघम्बर ओढ़ना-बिछौना

मृगछल्ला छी अहॉंक पहिरना

भोला अहॉं छी बड़ रूसना।

 

दूध-मलाइ अहॉंकेँ मनहु ने भाबैए

मेवा मिठाइ छोड़ि कऽघरसँ भागै छी

भरि दिन घोटबै छी भंग घोंटना

फूलक सुगन्धसँ दूरे रहै छी

आक-धूथूर भांग छी चखना

भोला अहॉं छी बड़ रूसना।

 

भरि दिन रहै छी धुनी रमौने

नाग साँपसँ भरल घर-अँगना

देह बनौने रहै छी भूतना

भरि दिन खाइ छी भांगक गोला

केना रहब हम एहि घर अँगना

भोला अहॉं छी बड़ रूसना।

 

सखी-सहेली मिलि हमरा लजबैए

पिया छौ तोहर केहेन भूतना

तोड़ासँ घोंटबै छौ भंग घोंटना

केना दिन काटब हे भोलेनाथ

केतेक दुख सहब तोरे संगे-ना

भोला अहॉं छी बड़ रूसना। q

 

दिनक दोख

दिनक कोन दोख?

दोख तँ लोकक छी 

जे हरदम बदलैत रहैए

रीति-रिवाज विचारसँ

मौसम बदलैए

हवा-पानि-रौदसँ

रितु बदलैए समयसँ

ऐमे दिनक कोन दोख?

चान-सुरुज धरती नै बदलैए

कीए बदलैए लोकक इमान-धर्म

जँ दिनक दोख होइए

तँ पानि, दूध, खून

किए ने बदलैए

माए-बाप छोड़ि कऽ

जाति-धर्म बदलैए

ऐमे दिनक कोन दोख?

हँ, दिनक नाओं बदलैए

दिन-राति बितलापर

भोर-साँझ सभ दिन होइए

जे हेबाक छै होइत रहैए

ऐ अद्भुत प्रकृतिमे

सभ दिन एक समान

सत्य छी की झूठ

ऐमे दिनक कोन दोख?

ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।