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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

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राम विलास साहुक

किछु कविता

 

 

मनक मोलि

तन-मनकेँ केतबो धोलौं

छुटल नहि कहियो मनक मोलि

तीर्थक पूण्य बहुत कमेलौं

नदी, कुण्डमे स्नानो भेल

तन रंगेलौं मन रमेलौं

तैयो ने छुटल मनक मोलि

तन-मनक मोलि रहए खरकटल

कुपित मन जे छेलाए बेकल

तखने एकटा युक्ति भेटल

गोंता लगा साहित्य पढ़लौं

ज्ञान रूपी गंगामे डुमकी लगेलौं

मिथिला धामक तीरपेखन केलौं

गामे-गाम भरल छला विद्वान

जे करै छला जगतकेँ ज्ञानवान

दूर कऽ देलैन मनक कलेश

बिनु जप-तप केनहि हमरा

तन-मन निर्मल भऽ गेल

तखने छुटि गेल मनक मोलि। q

 


 

 

तृष्णा

तृष्णाक तृप्ति जलसँ होइए

अन्नसँ मिटैए पेटक भूख

दूध फल मेवा काया पोसैए

औषधि करैए दुख दूर

हीरा-मोती छी धनक भूख

मनक तृष्णा कहियो ने मिटैए

मरने जाइए संगे क्रिया-कलाप

सत्यक सौरि पतालमे होइए

यश स्वर्ग धरि पसरैए

सभ किछु छोड़ि सुरधाम जाइए

मुदा कर्म-कुकर्म दुनू संगे रहैए

नहि बाँटैए अपनो कियो

अधर्मी फलहीन वृक्ष सन

सुकर्मी अमृत सभ दिन पीबैए

अज्ञान अन्हरिया राति होइए

ज्ञान पूनमक चान कहबैए

लोभ पापक असली खान छी

सत्य जीवनक प्राण होइए

धनक तृष्णा जंजाल बनैए

तृष्णा मृगतृष्णा बनि कऽ

लोभीकेँ लइए क्षणमे प्राण

तृष्णाक तृप्ति स्वर्गोमे नै होइए

भटैक जीव नरक भोगैए

संतोखसँ परमानन्दक सुख भेटैए। q

बेटी

बेटी देख किए झखै छी

नै छी बेटी अभिशाप यौ

दिन बहुड़लै सभ बेटीकेँ

घरमे हेतै लक्ष्मी समान यौ

माइयो बापक मति सुधरलै

सरकारो दइ छै धियान यौ

बेटा-बेटीमे फर्क नै रहतै

अधिकार लेतै समान यौ

शिक्षा पाबि दहेज मिटतै

बढ़तै समाजक मान यौ

बेटी बचाउ केर नारा लगै छै

हेतै सरस्वतीक घरमे बास यौ

जनक नन्दनी सीता बनि कऽ

देशक रखती मान यौ

एक्कैसम सदी बेटीक युग एलै

बनतै देशक नव इतिहास यौ

देशक बेटी देवी स्वरूपा

जगत केर करत कल्याण यौ

उपेक्षित भऽ बेटी जान गमेती

केना हेतै सृष्टिक निर्माण यौ

दुखित भऽ कवि कहै छैथ

बचाउ बेटीक जान-मान यौ

बेटी देख किए झखै छी

नै छी बेटी अभिशाप यौ।q

 

वसंतक गीत

आएल वसन्त कोइली कुहकैए

मधु बरसैए चहुओर हे

मह-मह महुआ रस टपकैए

आमक मज्जरसँ मधु बरसैए हे

पूरबा-पछिया मस्ती मारैए

गुंजैत भ्रमरा मन भरमाबैए हे

खग कलख वसन्त गीत गाबए

तोड़ीक फूलसँ खेत करैए सृंगार हे

आएल वसन्त कोइली कुहकैए

मधु बरसैए चहुओर हे...।

 

सखी-सहेली बगिया घुमैए

कली खिल करैए सृंगार हे

मातल मधुकर तांडव करैए

रितुराज बाँटैए पुष्प पराग हे

मनक पियाससँ करेज जरैए

पिया बिनु मन तरसैए हे

वसन्त बनल अछि चित्तचोर जखन

केकरापर करब सृंगार हे

आएल वसन्त कोइली कुहकैए

मधु बरसैए चहुओर हे। q

 

केकरा लेल

महगी घूसखोरीसँ चैन उड़ल

दहेजसँ समाज दबल टुटल

भेद-भावक बीच जिनगी मरल

लूट हत्या अपहरण होइत रहल

ई देश केकरा लेल बनल।

 

धर्मक नामपर कट्टरपंथी लड़ल

जाति-पातिमे समाज बँटल

धनीक-गरीबक बीच खाधि बढ़ल

काज बिनु मजदुर मरि रहल

ई देश केकरा लेल बनल।

 

देशक मालिक नेता, अधिकारी बनल

काला धनमे बेहाल नेहाल रहल

खान खजाना कारखाना हुनके सटल

गरीबक बेटा शहीद होइत रहल

ई देश केकरा लेल बनल।

 

पानि बिनु खेत परती पड़ल

घर छोड़ि किसान परदेश खटल

सुखले नहर टुटले पड़ल

सुभाष, भगत, चन्द्रशेखर, गाँधी

केकरा ले बलिदान पड़ल।

गरीबक नाओंपर योजना बनल

शिक्षा स्वास्थमे घुन लगल

माटि-पानि दवाइमे जहर घोरल

धरासँ अम्बर धरि इंसान बदलल

ई देश केकरा लेल बनल। q

 

धर्मक उपदेश की भेल

जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए

तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए

विवेक अविवेकक द्वन्दमे फँसल-ए

सूर तुलसी कबीर मीराकेँ बिसैर गेल

नीति उपदेश वेद पुराण शास्त्र

जेना कलियुगमे तर पड़ि गेल-ए

जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए

तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए।

 

सज्जन संत महंथ तपसी बनि कऽ

वन पर्वतमे नुकाएल फिरैए

रावण रामपाल, गुरमित सिंह राम रहीम

नारी संग अत्याचारक रास नचैए

चारू युगमे कलियुग भारी पडल-ए

धर्मक आड़िक पाछू इंसानो शैतान

जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए

तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए।

 

जेतए माय मातृभाषा पछुआएल-ए

दहेजक खातिर बेटी जीबिते जरैए

अपन कलंक लोक गंगामे धोइए

देवी देवताक पूजा सभ दिन करैए

वल धन ज्ञानक वरदान मंगैए

तेतए इंसानक इंसान किए मरल-ए

जेतए इंसानक इमान इंसाने होइए

तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए। q

 


 

 

जीबिते जी मरै छी

की कहूँ सखी

पियाक वियोगमे

जुआनी जरबै छी

जीबिते जी मरै छी।

 

चढ़ल यौवन

ढरल जाइए

जेना सौन भादोमे

मेघो ने देखाइए।

 

नहि पड़ल बून्न

झिसियो ने पड़ैए

धरती पियासे

धधैक जरैए।

 

बून्न-बून्न लेल बेकल

प्राण तियागने जाइए

तहिना हमर मन पियासे

पिया बिनु जरैए।

 

आशक बाट तकै छी

आँखि ताकि निरारि

हिया हारि बैसल छी

आँखिसँ नोर झरैए।

 

उमरल यौवन

मनमे लहैर मारैए

तन मनक आगि

सहजे सहल नै जाइए।

 

दुनियाँक नजैर

बदलल लगैए

लोक देख-देख कऽ

नजैर-मे-नजैर लड़बैए।

 

मजधारमे जिनगी

दलदलमे फँसल-ए

भविष्यक बाट

अन्हाराएले सन लगैए।

 

पियाक सनेस

बाटे हेराएल-ए

केना कटत दिन-राति

सौंसे देह आगि लगल-ए।

 

केकरा देख जीअब

दुनियाँ अन्हार लगैए

की कहूँ सखी

कहल नहि जाइए

जुआनी जरबै छी

जीबिते जी मरै छी।। q

 

माघक जाड़- 2

बाप रौ बाप

माघक जाड़

गलेलक हाड़

छुबैए प्राण

लेत जान

ओस-कुहेसमे

धरती डुमल

चिड़ै चुनमुन

खोंतामे सुटकल

कहुना बँचबैए

अपन जान

बिलसँ निकैल

फणधारी सभ

मुँह पटैक-पटैक

तेजैए प्राण

जीब जन्तु सभ

ठिठुर रहल-ए

सुटकल पड़ल-ए

अवग्रहमे अछि

सभक जान

कनकनी चलैए

काल समान

सुरुज-चानक

दर्शनो ने होइए

दिन-राति अछि

एक्के समान

पानि छुबै छी

देह सिहरैए

कान ठरि

गलि कटैए

देहक रूईयॉं

काँटो-काँट होइए

संकटमे अछि जान

केना बँचाएब प्राण

एहेन जाड़

जिनगीमे देखलौं

बुढ़ो-पुरान सभ

अद्भुते कहैए

केतेकोकेँ लेलक

क्षणेमे प्राण

कलपैत मुहेँ

सभ कियो कहैए

भगवानो दुख दइए

बाप रौ बाप

माघक जाड़। q

 


 

 

किसानक मजबुरी

बाप रौ बाप, केना जीअब आब

रौदे बसाते खेत खटै छी

अदहे पेट खाए सुतै छी

दुखे पकैड़ लेलौं खाट

रौदी-दाहीसँ लड़ैत

महगीक मारि सहैत

शोगमे कुहरैत

माथ ठोकैत रहै छी

कर्जामे डुमल छी

दुखे-दुख सहै छी

जिनगी ढहैत

कोसीक धारमे बहै छी

चौपट्ट भेल खेती

धिया-पुत्ता बिलैट गेल

जीवन तबाह भेल

मजदुरियो ने भेटैए

मजबुरीमे परदेश खटै छी

पढ़लो-लिखल विदेश रहैए

गाम-समाजकेँ के देखत

केना बँचत गामक इज्जत

किसानी जिनगी दुखदायी भेल

के सुधारत किसानक समस्या

सौंगरपर सरकार चलैए

कमीशनपर योजना बनैए

पूजीपतिक खेल होइए

कृषि काज नै सुधरल आइ धरि

ओकरे बिगाड़ैमे सभ भिड़ल-ए

उपजासँ लगता बेसी

नै उचित बजार मिलैए

अधमरू जीवन जीबै छी

आत्महत्या करैले सोचै छी

केतेक दुख सहब जिनगी धरि

की दुखे सहैले जनमल छी

आब आगूक जीवन हारि चुकल छी

डुमि मरैले मजबूर छी। q

 

बैशाखक विष

चैत बितल बैशाख चढ़ल

मुरझल फूल सुखल पात

बाँसक पात सेहो झड़ल

घास सुखि मरल पड़ल

चौर-चॉंचर सुखि फटल

खत्ता-डबरा मरता पड़ल

धार नदी सेहो सुखल

खेतमे दरारि दरकल

चढ़ल गर्मी दुख बढ़ल

तबधल धरती तबा समान

चिड़ै-चुनमुन पानि खोजैले

वौआए रहल-ए कोसक कोस

पोखैर-इनार पहिने सुखल

पतालक पानि तर पड़ल

पानि बिनु जीवन केना चलत

त्राससँ सभक मन तरसैए

बैशाखक विष चढ़ले जाइए

केना बँचत जीवक जान

सभ खोजैए पानिए-पानि

प्रदूषित धरती अपने दुखी अछि

बैशाखक रौद उगलैए विष

सभकेँ लेत अखने प्राण। q

 

कोसीक कहर

आएल कोसीक कहर

पसैर गेल बाढ़िक पानि

विलिन भऽ गेल गाम-घर

नहि बँचल नाम-निशान

मचि रहल कोसीक कोहराम

देखते भॉंसि गेल बच्चा-बेदरू

गाए-महींसक गेल जान

अपन जान बँचबै खातिर

लपैक पकड़लौं मोटका गाछ

तैपर लपटल फणधारी

फुफकार काटैत करैए पहरेदारी

देखते हमर प्राण उड़ि गेल

मुदा दयावान बनेलक शरणधारी

मानवसँ ओ साँप हितकारी

प्राण नै लऽ रक्षा केलक

संगे केतेक दिन-राति बितल

नीचामे अथाह बाढ़िक पानि

ऊपर बहै छल बर्खाक झॉंट

जाड़क मारल भूखक हारल

मौतक मुँहमे फँसल रहूँ

भूखले प्राण टगै छेलौं

केतेक दिनक भूखल कोसी

लाखक लाख जान खाए गेल

हमरो हाथ छुटि गेल गाछसँ

धब दए गीरलौं बाढ़िक पानि

सभ दिनक लेल कोसीमे समाए गेलौं। q

 

केकरापर करब श्रृंगार

अपन घर छोड़ि पिया

किए गेलौं जानि परदेश

मनमे बढ़ेलौं कतेक कलेश

मुदा नै देलौं बोल भरोष

मन हमर अपचंग होइए

रहि-रहि करेज डोलैए

सिनेह बिनु देह हहरैए

जिनगी बनल-ए दुखक पहाड़

की वैरणी केलक अहॉंक शिकार

बिनु अहॉं

केकरापर करब हम श्रृंगार।

 

पात जकाँ तन-मन डोलैए

धीर मन अधीर होइए

सबूरक बान्ह ढहि गीरैए

प्रेम विरहमे जरै-मरै छी

अबगरहमे अछि हमर जान

जगतमे देखै छी शैताने शैतान

आशक बाट लगैए सुनशान

जिनगी बनल अछि बीरान

आब केते करब आओर इंतजार

बिनु अहॉं

केकरापर करब हम श्रृंगार।

 

अछैते औरुदे दुख सहै छी

चढ़ल उमेर ढहल जाइए

केतेक करब अहॉंसँ परहेज

केकरा लगाएब हम करेज

नि:सन्तान छी मन वौआइए

बाट देखैत भेल छी निराश

जेना फूलसँ तूबि गेल पराग

दोसर देख कऽ अबलट जोड़ैए

प्रेम रोगक हम छी शिकार

बिनु अहाँ

केकरापर करब हम श्रृंगार। q

 

करमक खेल

देखू भाइ करमक खेल

कियो बेचए नून तेल

अमीर करैए कठखेल

गरीबसँ नै रहल मेल

केकरो रोटियोपर ने तेल

अखनो बेवस्था अछि गरमेल

कियो खेलैए होरी खेल

देखू भाइ करमक खेल।

 

अखनो धरि खेती नै सुधरल

मजदूर सभटा पलायन भेल

राम भरोसे जनता जीबैए

हिंसक करैए हिंसाक खेल

नीति-कुनीतिक बीचबिचौआमे

गरीब जनता पिसाए गेल

समाजसँ सरकार बेमुख भेल

देखू भाइ करमक खेल।

 

शिक्षाक नाओंपर ठगी होइए

शिक्षालयमे होटल खुजि गेल

पढ़ै बेरमे खेलैए गदहाक खेल

धिया-पुत्ताक करम फुटि गेल

स्वास्थ्य सेवा अछि नाओं लेल

अस्पतालसँ भरोस उठि गेल

देखू भाइ करमक खेल।

 

देखियौ देशमे नोटक खेल

एकरे बलपर भोँट कीनैए

गदहाक माथपर ताज शोभैए

विद्वतजनकेँ राखैए कात

मूर्खासन धृष्ट्रराष्ट सुतल रहैए

जनताक खून बिका रहल-ए

जनतंत्रक परिभाषा बदैल गेल

देखू भाइ करमक खेल।

 

खेत सुखि फाटल पड़ल-ए

पानि बिनु खेतमे फसल जरैए

पेट खातिर पेटबोनिया मरैए

गरीबक समस्या बढ़ले जाइए

समाजक लोक छिड़िया रहल-ए

सरकारी तंत्र जेना फेल भेल-ए

देशक विकास अधूरे रहि गेल

देखू भाइ करमक खेल।। q

 


 

 

भीखमंगनी

भीखमंगनीकेँ देख कऽ

छगुन्तामे पड़ि गेलौं

चिरखल चेथरीमे सुटकल

अंग झलकैत देखलौं

हाड़-पाँजर सुखल

फुरकल केश आँखि धँसल

मुँहपर फुफरी पड़ल

मुदा बत्तीसी चमकैत

ठेंगासँ कुकुर भगबैत

भूख पियाससँ तड़पैत

कुहरैत पथपर बढ़ैत

हाथमे पचकल टीनही बाटी

आशमे हाथ आगू केने

खाइले किछु भीख मांगैत

डेढ़ियापर ठाढ़ भऽ

बेर-बेर जोर-सँ बजैत

कने खाइले किछु दीअ

हमर बेटी बेचनी

रोटी-चटनी दैत बजली

बैस खा कऽ पानि पीब लीअ

दलानमे हम बैसले-बैसल

देखलौं नयन निरारि

भीखमंगनी रहए लचार

बुझि पड़ल नीके घर-खनदानक

पुछलिऐ कियेक भेल ई हाल

भीखमंगनी डबकल आँखिकेँ

ऑंचारसँ पोछैत बजली-

नहि छी कुलक्षणी, छी कमसुतनी

मुदा दहेजक खातिर पीट-पीट

हमरा केलक ई हाल

निष्ठुर पतिकेँ दया-धर्म नइ-ए

सासु-ससुरकेँ नै अछि लाज

सभ दिन मारैए घूसा-लात

के पोछत हमरा नोरकेँ

कखनो निपुत्री-कुलक्षणी कहैए

लाठी मारिसँ देह तोड़ैए

घरसँ भगबैए साँझ-विहान

बड़ गंजन सहैत रहलौं

मुदा मरब तँ नइए असान

जाधैर अछि घटमे प्राण

भिखो मांगि राखै छी मान

सुरुजकेँ हाथ जोड़ि कहै छी

केकरो नइ दिहक एहेन ज्ञान

सासु-ससुर पतिदेवकेँ

दीहक सुमति-सद्ज्ञान

हमरो बँचाबह इज्जत प्राण।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।