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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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डॉ. शिवकुमार प्रसादक

किछु कविता

 

देख एलौं हम पटना

हलसल-फुलसल बसमे बैस कऽ

पहुँचि गेलौं हम पटना

देख एलौं हम पटना।

 

भरि रस्‍ता हम उड़िते गेलौं

राति‍क नीन भेल सपना

केतबो गुहारि देव-गोसाओनकेँ

मन पड़ैत छल फेकना

देख एलौं हम पटना।

 

बाप जनम नै देखने छलौं

एहेन मनुक्‍खक जंगल

भोजे बेरमे पहुँचि गेल

ओ पपि‍आहा घर-घुसना

देख एलौं हम पटना।

 

चोर-उच्चका डेग-डेगपर

भीड़ देखि कऽ जी उड़ैत छल

बाहर-भीतर जाएब कठिन छल

बेथाक नाओं अछि‍ पटना

देख एलौं हम पटना।

 

हुनकर बात काटि‍ हम एलौं

बाल-बोधकेँ छोड़ि कऽ एलौं

नेताजी की बात बनौता

मोन रहत ई घटना

देख एलौं हम पटना।

 

मन होइत अछि‍ उड़ि कखन हम पहुँची

अपन सोहागक अँगना

मेटा रहल अछि‍ झँपा रहल अछि‍

अपन हुलासक सपना

देख एलौं हम पटना। q

 

 

 


 

 

 

नेह

भोरे भोर जँ आगि उठैत छै कोना मेटत बिनु पानिक मेह

कोना कतहु प्रेम उपजतै किनका लग भेटत ओ नेह।

 

जिनगी भरि सिनेहक आसे गाछे गाछ घुमि एलहुँ

एक-आधकेँ छोड़ि जँ पूछी बाँझे बाँझ बौएलहुँ।

 

निर्मल मनकेँ निर्मल एना ओहिमे रूप सलोना

ओहि रूपकेँ पागल सुगना ताकए कोना कोना। q


 

 

 

किनको क्यो नहि भेल

माया-मोह ममतामे फॉंसल

जिनगी रहल हेराएल

नीत-अनीत ने मानल कहियो

ताहुसँ तोष नहि भेल।

जगतमे किनको कियो नहि भेल।

 

जिनगिक जोंक सदैत लेहु पीलक

दिन दिन मोटगर भेल

देह सुखाएल पएर निह तागैत

किनको कहल नहि गेल

जगत मे किनको...।  

 

नैन रहैत देखल नहि किछुओ

श्रुतिपथ करए ने काम

चर्म रुधिर करए मनमानी

कर्मे बैरी भेल

जगतमे किनको कियो नहि भेल। q


 

 

 

पियास

अपनहि मने

धार उपछै छी

कखनहुँ उड़ी अकाश

ताल तलैया

जंगल पर्वत

उड़ी पवनकेँ लाथ

सगर जनम औनाएते बित गेल

तैयो ने मुइल पियास। q

 


 

 

 

अत्मा केर छोलिका 

छिलैत अछि सभ दिन

अत्मा केर छोलिका

राजनीति कूटनीति

भेल जेना ओरिका।

 

सभटा मलाय खाएत

नितौ मुटाइत अछि

खुरचन आ छोलनीसँ

छिलाएत कोना सभटा

छिलैत अछि...। 

 

बकरी दुहैत छै

पाठी मेमियाइ छै

अपन अपन पठरू लेल

औना रहल सभटा

छिलैत अछि...।

 

माइयेक पेटसँ सभ

सीख एलै राजनीति

राजनीति पढ़ुआ सभ

धेने अछि कोन्टा

छिलैत अछि सभ दिन...।

 

हे जगत गुरु जन

खोंटि कएको टुक

हमरो जँ दैतिऐ

ढ़ल लिखल राजनीति

घुमि अबितै सभटा। 

छिलैत अछि सभ दिन

अत्मा केर छोलिका। q


 

 

 

ओझराहैट

करचिक ओझराहैट सन

जिनगिक अछि झंझैट

एकटासँ छुटैत दोसरामे

ओझराइत छी।

 

देह गेह नेह संग

डूमैत आ थाहैत

कखनहुँ अकाश 

खन बसाते उड़ि जाइत छी।

एकटासँ छूटैत दोसरा...।

 

लोभ मोह सोग केर

महिमोकेँ जानैत

मायाकेर फाँसमे

तैयो बन्हाइत छी

एकटासँ छूटैत दोसरा...।

 

जिनगी उड़ि रहल

बनि कककोहा

तैयो नव खड़ही बनि

जीबैले छटपटाइत छी

एकटासँ छुटैत दोसरामे

ओझराइत छी।

ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।