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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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डॉ. शिवकुमार प्रसाद

किछु अनुदित काव्य (मूल हिन्दी रजनी छाबड़ा)- आगाँ

(PAGHALAIT HIMKHAND

Maithili translation of ‘PaighalteHimkhand’

An Anthology of Hindi Poems by Rajni Chhabra from Hindi into Maithili by Dr. Sheo Kumar Prasad.)

 

बन्हकी

हाथ जोड़ने

माथ

झुकौने

सिकुड़ल समटल सन

ठाढ़ छल ओ

खिड़कीसँ

झरैत

किरिण लग

अपन कलाकीर्तिक आगू 

चित्रपट देखबैत छेलइ

क्षितिज छुवाक आसमे 

पेंग भरैत

उन्मुक्त पाखी

आर सोझामे बिनु पाँखिक

चिड़ए सन

आहैत

भाव नेने

ओ चित्रकार

बन्हक राखि चुकल छल

अपन अनुभूतिकेँ

कल्पना

सम्वेदना

अपन कलाकेँ 

संरक्षक लग। q


 

 

 

की जानि

छितराएल छै अकासमे

ऊँन सन

मेघक गोला

की जानि आइ परमतमो

कोन गुण धुनमे लागल छथि! q


 

 

 

परिचय

अन्हारकेँ

अपन छातीमे समेटने

जेना दीप बनबै छै

अपन दीपित परिचय।

 

ओहिना अन्तरमे

अपन नोर नुकेने

संसारकेँ देमए पड़त

मात्र अपन हँसी ।

 

अपन बेनाओं जिनगीकेँ

देमए पड़त अहिना

नव परिचय। q


 

 

 

हमर दियारी

सेहन्ताक बातीसँ

जरेलहुँ

एकटा दियारी

अहाँक नाओं।

 

लाखक लाख दियारी

अहाँक सिनेहक

अपनहि

झिलमिला गेलइ। q


 

 

 

मनक बन्न केबाड़

एहिसँ पहिने की

अपन अधखरुआ कचोट

अहाँकेँ चकनाचूर कऽ दिए

सगर जिनगी हँसबासँ 

कऽ दिए नचार

फोलि दियौ

मनकेर केवाड़

आ निकालि दियौ

अपन मनक विषाद।

 

दरद तँ सभकेँ हृदयमे रहिते छै

दरदकेँ पुरबे पुरुषासँ

सभकेँ सम्बन्ध छै

किछु अपनो कहू किछु हमरो सुनू 

दरदकेँ मिल जुलि सहू।

 

एहिसँ पहिने कि ओ

बहैत बहैत बनि जाए भोकन्नर

सिनेहक मलहमसँ

करू ओकरा फराक

सिनेहक अमृत पटा

सुख दुख लिअ बाँटि

मनक संग जीवन

सिनेहसँ करू पूर

फोलि दियौ मनक बन्न केबार

आ बिषाद करू दूर। q


 

 

 

घा

मन आ आँखिक

बीच

बड़ गहींर

नाता छै 

मनक घा

आँखिक

नोरे बनि ने

बहै छै। q

 


 

 

 

बहुत अछि

एक गोट सपना

निस्तेज आँखिक लेल।

 

एकटा सिसकी

निःशब्द ठोरक लेल।

 

एकटा चिप्पी

फाटल छातीकेँ

सिबाक लेल।

 

बहुत छै 

एतेक समान

हमरा जीबा लेल। q


 

 

 

बौआइत मन

बौआइत मनकेँ

जखन जिनगीक कोनो

अनभुआर रस्तापर

अपन मनक संगी

मिल जाइ छै,

 

तँ ओकर चाह रहै छै

कहियो नहि रूकै

ओ रस्ता

एक एक क्षण बनि जाए

जुग सन

यात्रा अहिना चलैत रहए चलैत रहए

जुग जुगान्तर धरि। q


 

 

 

अहाँ बिनु

अहाँ बिनु 

हिरदे एना

बेकल रहैत अछि

जे दिन उगिते

साँझ बितबाक 

बाट ताकए लगै छी। q


 

 

 

केकरा चिन्ता रहै छै

केकरा चिन्ता रहै छै बिहाड़िक

बड़का अन्हरक पछाइत।

 

सभटा दुख छोट भऽ जाइ छै

कोनो बड़का बिपैत एलाक पछाइत। q


 

 

 

सन्तोषमे ओ सुआद केतऽ!

सन्तोषमे ओ केतऽ पाबी

जे बेकलतामे सुआद छै

सनकल बेकलतेसँ

भेटए सदैत सफलता छै।

 

सन्तोष जँ ठेकान तँ 

रस्ता बेकलता छै। q

 

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