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सुमन मिश्र

प्रेम

हमर नाम थिक अच्युत । विवाहक उपरान्त आइ पहिल बेर हम आ हमर पत्नी मुंबईक नबका घर मे प्रवेश क रहल छी । विवाह सँ दू मास पहिने हम ई घर किराया पर लेने रही, ताकि दुनू गोटेक ऑफिस लग पड़य । हम अपने कार्यरत रही एकटा जर्मन-मूलक कम्पनी मे जेकर ऑटोमोबाइल पार्ट सभक बिक्रीक काज रहै । मुदा ई नोकरी लेबाक पाछू उद्देश्य रहय मायानगरी मे सिनेमाक पटकथा लेखक बनबाक । बूंद-बूंद सँ सागर बनैत अछि, सैह मानसिकता सँ नोकरी पकड़बाक पश्चात छिट-फुट नाटक लिखैत रहलहुँ छुट्टी सभक दिन ।

 

हर्ष सँ कहैत छी जे हमर संगिनी तारा सेहो एकटा लेखक आ पत्रकार छथि । हुनका सँ हमर पहिल भेट भेल छल पछिला बरखक राष्ट्रीय पुस्तक मेला मे, जत हुनकर पहिल कविता संग्रहक विमोचन हेबाक छल । हम त छलहुँ साहित्यप्रेमी, से हम पहिने हुनकर किछु कविता राष्ट्रीय-स्तरक पत्रिका सभ मे पढ़ने रही त बुझल छल जे बहुत क्रांतिकारी लेखिका छथि ।

 

मुंबई विश्वविद्यालय सँ भाषा साहित्य सँ स्नातकोत्तर क अखैन एकटा पैघ पत्रिका मे सह-सम्पादक छलथि । हुनकर कविता सभमे हमरा रुचि त बेस छल मुदा जखन हुनका पुस्तक विमोचनक मंच पर कविता धुरझार पाठ करैत देखलहुँ त थपरी बजबैत-बजबैत कखैन हमरक हृदय मे हिलकोर सेहो उठि गेल, से हमरा एहि आधा घण्टाक क्रम मे पता नहि चलल । एहि घटना सँ पहिने हम विवाह करबाक कखनो सोचने नहि रही, किएक त हमरा सँ जेठ भाइ अरविन्द अखन तक बियाह नहि कयने छलाह । मुदा तारा सँ भेट क हमर एहि ब्रह्मचर्यक प्रतिज्ञा छिन्न-भिन्न भ गेल । हुनका सँ गप्प भेल । हमर नाटक सभ जे हमरा एतेक दिन व्यर्थे बुझाइत छल, से तारा पढने रहथि पत्रिका सभ मे । हुनका नाटकक किरदार सभ सेहो मोन छलनि !

 

हुनकर फोन नम्बर प्राप्त भेल त दैनिक दिनचर्या मे धीरे-धीरे हुनका सँ गप्प-शप्प सेहो जुडि गेल । किछु दिनुक पश्चात पिताजी के कहलियैन पूरा घटना । पिताजी बेरा-बेरी कहलथि,

"धुर ! पत्नी सँ किओ काजक प्रेरणा लैत अछि ? केहन नपुंसक सन्तान सभ भेल हमर तकर बादो, जओं अहाँ ई बजितहुँ जे कन्या सुन्नरि छै आ हमर पौत्र चकचक गोरनार हैत त बियाह करबै मे हमरा कोनो दिक्कत-परेशानी नहि होएत । मुदा साहित्यक धारा पर जओं ल जाएत ई लडिकी अहाँके आ अहाँ अपन नोकरी छोडि देलहुँ त हम एकटा आर संतान घर मे नहि राखब साहित्य सँ अहाँक घर नहि चलत, आ अहाँक कनिया के हम बियाहक पश्चात ई पत्रकार बला काज नहि कर देबैन कहने रही जे नाटक सभ लिखब बन्द करू, किछु ठोस काज पर ध्यान दियौ !"

 

हुनकर गप्प सँ हमरा मोन पड़ल कि हमरा एहि सँ पहिने विवाहक इच्छा किएक नहि भेल । हमर मुँहक स्वाद बिगड़ि गेल ई सभ गप्प सुनि के, मुदा हमरा सुखी वैवाहिक जीवनक विषय सभ मे पिताजीक दृष्टिकोण कखनो उचित नहि बुझाइत छल । कारण जे हम तीनू भाय छोटे सँ बहुत घरेलू हिंसा देखैत-देखैत पैघ भेल रही । हमरासँ चारि बरख पैघ छथि राजीव आ दू बरख पैघ छथि अरविन्द । हम तीनू गोटेक समक्ष पिताजी हमर माँ के बहुत मारथिन्ह । पहिने मारबाक कारण पूछैत छलहुँ भाइ सभ सँ, फेर पैघ होइत-होइत मारबाक बहन्ना  । भोर मे चाह नहि भेटै सँ ल तरकारी मे नून कम-बेसी, सभ दिन हमर माँ के हाथ-पैर-माथ सभटा लहुलूहान रहैत छल। आतंक एतबे जे पिताजी के घर पर उपस्थित रहैत राजीव आ अरविन्द भाइसभ कखनो माँ के घाओ सभ पर मलहम सेहो नहि लगेलखिन्ह । हम तखनो माँ से बेसी प्रेम करैत रही, गरम पानि सँ हुनकर हाथ-पैर सभ सेदि दियैन । माँ बहुत कष्ट मे रहैत छलीह, दहेज अपेक्षा सँ कम भेटइक कारण हमर बाबा-दाइ सभ कखनो हमर माँ के प्रेम-दुलार नहि देलखिन्ह । हमरा त आश्चर्य होइत छल जे तीनू सन्तान पुत्र कोना भ गेलनि - हमरे पडोसी गाम मे दूटा बेटी होइते कनियाँ के जरा देलकै ! एहि सँ हमरा लगैत छल जे माँ जेना-तेना बचि गेलथि !

 

जखन हम पन्द्रह बरखक रहहुँ त एक बेर रोटी गरम नहि भेटला सँ पिताजी माँ के बहुत बजलखिन्ह । पूरा मोहल्ला ठाढ़ छलै तमाशा देखै लेल, मुदा मध्यस्थता करबाक हेतु कियो आगू नहि आयल रहय । कारण जे पिताजी केतबो निर्दयी छलखिन्ह, मुदा पिताजी के पुलिस मे हेबाक कारणे केकरो माँ के ई कष्ट कोनो अनावश्यक कष्ट नहि बुझाइत छलनि । एहि मे मोहल्ला के महिला मंडली सेहो परिस्तिथिक अनुरूप गांधारी बनि गेल छलीह ।

 

ई घटना सँ हमरा बेस तामस चढ़ल, आ सभक सामने हम पिताजी के कहलियैन जे जओं हुनका बुते हमर माँ नहि सम्भरैत छथिन त हम हुनका ल मातृक बिदा भ जायब । पिताजी जे एतेक तमसाएल छलथि से हमरा क्रोध मे बजैत देखि सन्न रहि गेल छलाह । एकर बाद सँ घर मे मारिपीट आ झगडा- झपटी मे कमी अवश्य भेल । मुदा माँ केँ जत एक ठाम गर्व होयत छैलन, ततै हमरा कहैत रहलथि, "पिताजी सँ फेर कखनो एना ऊँच आबाज मे गप्प नहि करब ! क्रोध घर-परिवार किछु नहि देखैत छै, वनक आगि जेकाँ सभटा नाश कय दैत छै..."

हम हुनका आश्चर्य सँ देखलहुँ आ पुछलियैन, "बाबूजी अपन पुलिसक नोकरी आ बाबा-दाइ सभ के एतेक नीक सँ देखलखिन्ह, अहाँ संग एना किएक करैत छथि ?"

 

माँ हमर माथक चंपी करैत बजलथि, "अपन माए के प्रति सभक बहुत प्रेम रहैत छै, बौआ ! अहाँक पिताजी के सेहो रहनि आ हुनकर बाबूजी के सेहो । मुदा अपन माए आ बांकी स्त्रीसभ संग दू प्रकारक व्यवहार होएत छै ! एकटा पुरुख आदर्श सन्तान, आदर्श पिता के संग-संग जखन-तखन हाथ उठबै वला पति सेहो भ सकैत अछि ! समाज स्त्रीक ई स्थिति होएबा मे बहुत योगदान देने अछि । पुरुख अपन परिवार के कोना रखैत अछि से जओं समाज मे इज्जतिक मापदंड हुअय, रामराज्य मे जनक पुत्री सीता के लव-कुशक पालन-पोषण जंगल मे करबाक स्तिथि नहि होयतनि..."

 

"...से जओं अहाँक हमर चिन्ता भेल त मोन राखब ई दिन कि कोना अहाँक इच्छा होएत अछि जे हमर माँ के नीक सँ रखबाक चाही । सम्बन्ध के हिसाब सँ महिला सभ संग व्यवहार मे अंतर नहि करब ।"

 

परिणामस्वरूप ई भेलै जे राजीव भाइ जे एतेक दिन पिताजीक तरफदार रहलाह, तिनकर बियाह मे पिताजी पंद्रह लाख नगद, एकटा फोर्ड के चरपहिया आ नोएडा मे एकटा दू बेडरूमक फ्लैट लेलखिन्ह । सेहो तखन, जखन भौजी अपनो काज करैत छलथि ! पढ़लि-लिखलि नोकरी करैत पुत्री तकर बादो प्रायः कन्यागत के बोझे बुझाइत छलखिन्ह । सभटा डिमांड कर्जा ल पूरा भेल आ विवाह सेहो सम्पन्न भेल ! पिताजी आ राजीव भाइ दुनू गोटेक मुँह चपचप करैत छलनि ! राजीव भाइ तेकर बाद पिताजीक कार्बन कॉपी बनि गेलाह । पहिने  छओ मासक बाद भौजीक सरकारी नोकरी बंद करौलथि । फेर जखन भौजीक हाथ मे अपन कमायल पाइ समाप्त भ गेलनि त फेर वैह दुर्दशा ! मुदा भौजी आ माँ मे एतेक अन्तर अवश्य छलनि जे नोकरी छोडबाक तीन मास के भीतर राजीव भाइक ई अवस्था देखि भौजी अपन पिताक दहेज़ मे देल अपार्टमेंट सँ राजीव भाइ के निकालि देलखिन्ह आ पुनः नोकरी चालू क लेलथि । तेकर बाद राजीव भाइ हमर सभक घर मे उपहासक पात्र बनि गेलाह जे अपने पत्नी पर हिनकर कोनो जुइत नहि चलैत छनि । तेकर जवाब मे भाइ पिताजीक यैह कहलखिन्ह जे भौजी माँ जेकाँ सहनशील नहि छथि, अलग खाढी सँ छथि !

 

अरविंद भाइ के सेहो घरक माहौल सँ असरि पड़लनि । पिताजीक भय सँ कखनो माँ-पिताजीक झगडा मे मध्यस्थता नहि करैत छलथि, मुदा हुनकर पढाइ बेस प्रभावित भेलनि । एहि हिंसक माहौल मे भविष्य मे जीवन बेस कठिन होएत से सोचि क अरविंद भाइ इन्टर सँ कखनो घर लगहक कोनो डिग्री लेबाक इच्छा नहि रखलथि । की होली आ की दिवाली, कखनो अरविंद भाइ घर नहि एलाह । एक बेर फोन पर गप्प भेल त कहलथि, "अच्युत ! मोन बड्ड पडैत अछि घर मुदा कॉलेज मे शांति बुझाइत अछि । विवाह करबाक सेहो इच्छा नहि अछि, बहुत तनाव छै एहि मे !"

 

कद-काठी मे अरविंद भाइ बेस नम्मा-चौडा भ गेल छलाह, से पिताजी सेहो आब हुनका सँ कने डेराइत छलखिन्ह । अरविंद भाइ पर कखनो पिताजी विवाह हेतु विशेष दबाव नहि देलखिन्ह । अरविंद भाइजी एकांतता मे जिबैत रहलाह ।

 

आ एहने रहतहुँ हम, जओं तारा सँ भेट नहि भेल रहितय !

 

अखैन तारा संग नबका घर मे प्रवेश केलहुँ त पाछू दिस भोतियाएल ध्यान पुनः केन्द्रित भेल वर्तमान पर । तारा अपसिआँत छलथि सामान सभ केँ गर लगबै मे, मुदा हमर मोन कनेक बेचैन छल । हम हुनका हाथ पकडि सोझे सोफा पर ल गेलहुँ आ सँगे बैस रहलहुँ । तारा केँ एहि सँ किछु आनंद भेटलनि, हमरा दिस मुस्किआइत  बजलथि, " किछु गप्प करबाक मोन अछि ?"

 

हम हुनका दिसि तकैत जवाब देलियैन, " हँ, सुनू ने ! अहाँ हमरा सँग रहब आब, ई नहि बूझब जे प्रसन्न रखबाक काज छुच्छे अहींक अछि । अहाँ के सेहो प्रसन्न राखब हमर दायित्व भेलजओं नीक नहि लागत हमर कहल, अवश्य बाजब । हमरा सँ अहाँक किछु अभिलाषा-अपेक्षा बुझै मे कमी हुअय त हमरा अहाँ सोझे बताएब । हम अहाँक भावना के जओं कखनो ठेस पहुंचायब त हमरा सुधारबाक अवसर देब, ठीक ने ?"

 

तारा ध्यान सँ हमरा दिसि देखि केँ हमर गप्प सुनैत छलथि । माथ उपर-निच्चां डोला केँ सहमति दैत रहथि मुदा हमरा टोकलथि नहि, एकटक देखैत रहलथि ।

 

हम आगू बजलहुँ, "अहाँ हमरा कहने रही जे अहाँ के खेनाइ बनबय अबैत अछि, मुदा अहाँ सेहो काज करैत छी । सप्ताह मे छओ दिन औफिसक काज कयलाक बाद मोन नहि लागत भनसाघर मे । अबूह बुझाएत । अहाँक पता अछि कि हमरा खेनाइ बनबय नहि अबैत रहय, मुदा एहि बेर घर गेलहुँ त माँ सँ सीख लेलहुँ दालि, रोटी, भात, भुजिया आ किछु तरकारी बनायब । पहिने जेकाँ मैगी बनेबाक स्थिति नहि रहत । अपना दुनू गोटा संगे खेनाइ बनाएब, बर्तन माजब, घर सजाएब । गप्प-शप्प सेहो भ जाएत आ अहाँ संग कनेक बोनस समय भेटत सभ दिन ।"

 

तारा आब हमर हाथ पकडैत ल गेलथि हमर बियाह कालक परिवार सभ केँ फोटो फ्रेम लग । हमर दिस पुनः तकैत आब तारा बजलथि, "अहाँक माँ हमरा कहलथि बियाह काल मे जे हमर बेटा जेकाँ नोकरी बहुतो लोक करैत अछि, पढ़ाइ मे सेहो ठीक-ठाक छल, मुदा एकरा सँ बढिया हृदय नहि हैत कोनो पुरूख के । यदि प्रेम व्यवहार मे नहि उतरैत अछि त से प्रेम नहि ! अच्युत केँ हमरा बाजय नहि पडल कि किछु भनसाघरक कला सेहो सीखि लेथि, अपने आबि के सीखलथि । अपन बाबूजी सँ झगड़ि केँ अहाँक परिवार सँ बियाह मे कोनो दहेज नहि लेल जाएत से सुनिश्चित केलथि । से हमर आशा अछि जे अच्युत अहाँक विशेष ध्यान रखतथि आ अहाँ सेहो हुनकर नीक सँ ध्यान राखब ।"

 

हम फोटो फ्रेम देखैत छी इ गप्प सुनैत । फोटो मे माँ पिताजी सटल छलथि, संग-संग हंसैत सेहो छलथि, मुदा हुनकर बीच मे कोनो प्रेम नहि बुझाइत छल । हम अनायासे तारा केँ दिस फेर सँ देखैत छियैन, हुनकर आँखि मे जे प्रेम बुझाइत छल से ने हम पहिने कखनो अपन घर मे देखने रही माँ-पिताजीक बीच, ने एहि सँ पहिने कहियो ताराक आँखि मे । अन्दर सँ बेसी पौरुष सेहो बुझाएल । आनन्दित भ हम हुनका अपना दिसि घीचैत बजलहुँ, " चलू, अपना सभ खेनाइ बनबैत छी आब !"

 

-सुमन मिश्र, सीनियर रिसर्च फ़ेलो (आणविक जैवभौतिकी), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), बेंगलुरुसंपर्क- 9100810651 E-mail-  snmishra8320@gmail.com  

 

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