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राम चैतन्य धीरज (संपर्क- 6203681693)

भारोपीय भाषा परिवारवाद भाषा दर्शन

मैथिली भाषा विज्ञान धरि ओही भारोपीय भाषा परिवारसँ संगठित निर्धारित अछि जे हमर भाषाकेँ गुलामीक जंजीरमे तेना जकड़ि देलक जे आइयो रहरहाँ हिंदी मैथिलीकेँ अपन बोली कहि धकियाबैत रहैत अछि। भारत सरकार एकरा संविधानक अष्टम अनुसूचीमे स्थान देलक, तकर बादो हिंदी भाषाक राजनीति मैथिलीकेँ अपन बोली कहबासँ बाज नहि अबैत अछि। मानल जे संस्कृतसँ मैथिलीक विकास भेल अछि, जखन कि तथ्य यथार्थ नहि छैक, तथापि मैथिलीक तद्भव संस्कृतसँ विकसित अछि से मानैत छी। विश्वक कोनो एहन भाषा नहि जकरामे किछु ने किछु ध्वनि साम्य नहि हो, तँ एहि दृष्टिसँ कोनो राष्ट्र वा क्षेत्र विशेषक स्वाधीन भाषा अस्मिताकेँ नकारि नहि सकैत छी। तेँ भाषा चिंतनक जे आयाम निर्धारित होइछ, टूटैत रहल अछि।

 संरचनावादी दृष्टिकोणक मानब छल जे जँ एहि दृष्टिकेँ विश्व मानव ग्रहण कऽ लिअए तँ भेदक समस्या समाप्त भऽ जाएत। सर्वविदित अछि जे प्रयोग साम्राज्यवादी शक्ति अंग्रजी तंत्र प्रारंभ केलक एहि दृष्टिकोणसँ विश्वमे दू टा विश्व युद्ध भेल अंततः प्रत्येक राष्ट्र साम्राज्यवादी शक्तिसँ संघर्ष कऽ स्वयंकेँ स्वाधीन केलक। अपन भाषा-संस्कृति, विचार व्यवहारकेँ समृद्ध केलक। आइ राष्ट्र भाषा तथा एकर विवेक स्वाधीन अछि तथा पैघ माछ छोटकेँ खाइत अछि, मान्यता क्षेत्रीय भाषाक समक्ष बनल अछि। हिंदीक मानसिकता जे भारोपीय भाषा-परिवारसँ निर्धारित छल, एखनो धरि अपन स्वभावसँ मुक्त नहि भेल अछि। माने हिंदी अंग्रेजियतक शिकार अछि।

की मैथिली एहि परिवारक संग जीवित रहि सकत? हमरा जनैत आब मैथिली साम्राज्यवादी मानसिकताक गुलामी खटबाक लेल तैयार नहि अछि। एकर स्वतंत्र इतिहास दृष्टि छैक तथा अवधारणा विचारक आयाम छैक, जाहिसँ एकर ऐतिहासिक संस्कृति लोकभाषा वेदभाषाक व्यवहार सामंजस्यमे सुरक्षित अछि। वेद भाषक समानान्तर लोक भाषा चल जकरा ॠगवेदमे मानुषी भाषा कहल गेल अछि। कालक्रममे इएह मैथिली भाषाक नामसँ प्रसिद्ध भेल। साम्राज्यवादी सोचक जंजीर टूटि रहल अछि एकरा समग्र रूपें तोड़ि देबाक हम आग्रही छी। ताहि लेल निरपेक्ष अनुसंधानक आवश्यकता छै। संरचनावादी तोता रटंतसँ संभव नहि। हम तुलनात्मक भाषा विज्ञानकेँ समीचीन मानैत छी मुदा एकरा अंग्रेजियतसँ मुक्त होबऽ पड़तै।

विचार सभमे होइत अछि, मुदा सृष्टि वा उत्पति संदर्भें विचार वा जिज्ञासा सभमे नहि होइत अछि। जँ होइतो अछि तँ जिज्ञासाक समाधान स्वयंमे सभ नहि होइत अछि। ओकरा लेल कोनो शिक्षक वा विशेषज्ञसँ ज्ञान लिअ पड़ैत छैक। स्वयंमे जिज्ञासा स्वयंमे समाधान विरले मानवमे होइत अछि। वस्तुतः विचारक प्रक्रिया जिज्ञासा वा प्रश्न तथा समाधान वा उत्तरमे निहित होइत अछि। तेँ विचारक वा वैज्ञानिक प्रकृति रूपसँ विरले होइत छथि। माने दर्शन वा विज्ञान विरले होइत अछि। दर्शन कोनो प्रकारक जिज्ञासाक समाधान चेतना वा प्रकृति संदर्भमे अपन चेतन विवेकसँ करैत अछि, तँ विज्ञान दर्शनक ज्ञानकेँ निरीक्षण-परीक्षण तथा अनुसंधानसँ व्यवहारिक बनबैत अछि। तें विचारक प्रक्रियामे संसार अछि एकर क्रिया-प्रतिक्रिया अछि।

चेतना स्वयं विचार प्रक्रियामे आबि दार्शनिक वैज्ञानिक होइत अछि तथा अपन-अपन ज्ञानसँ संसारकेँ सहज पारदर्शी बनबैत अछि। विशेषज्ञ तथा विचारकमे अंतर होइत अछि। विशेषज्ञ अपन विषय तकर सीमित होइत छथि तँ विचारक दर्शन विज्ञान तक विस्तृत। हमरा जनैत मैथिली भाषामे भाषोत्पति सन गूढ़ रहस्यात्मक विषयकेँ कियो नै सोझड़ौलनि अपितु एहि विषयपर हमहीं नव रूपसँ विचार केलहुँ। एहि संदर्भकेँ  'मन भाषोत्पति' मे देखल जा सकैत अछि।1 हमरा जनैत भाषाक उत्पति विचार प्रक्रियाक स्फोट थिक। पहिने आकस्मिक रूपें भाषाक विचार मनमे आएल तत्पश्चात क्रमिक रूपें स्वरयंत्रसँ अभिव्यक्त भऽ अनुसंधानक क्रममे आकृति-प्रकृति ग्रहण करैत, संसारकेँ नाम रूप प्रकृतिमे बदलि देलक। पहिने- हे, हो, हेयो, हेय आदि संबोधनक उ्चारण भेल हएत।2

मात्र मूँहसँ उच्चरित शब्द भाषा नहि थिक, अपितु शरीरक ऐन्द्रिक क्रियासँ कएल गेल व्यवहार-विचार भाषा थिक। तेँ भाषाक दू रूप होइत अछि- वाचिक तथा कायिक। उच्चारण नियम कायिक भाषाक परिणाम थिक। चेतना सभ क्रिया भाषिक होइछ। भाषा अपन अव्यक्तावस्थामे कायिक रहैछ, मुदा व्यकतावस्थामे भाषिक भऽ जाइत अछि। अर्थात चेतनाक कार्य भाषा रूपमे व्यक्त होइत वाचिक भऽ जाइत अछि। वाचिक भाषामे ध्वनिक महत्ता सभसँ बेसी भऽ जाइत अछि। किएक तँ ध्वनिएँ वर्ण-स्वर तथा अक्षर समूहसँ भाषामे आकृत भऽ जाइत अछि। तें ध्वनिक आकार-प्रकार, जे प्राणवायुसँ निर्धारित होइत अछि- मात्राबलक संग स्वरूपक निर्माण करैत शब्दमे रूपांतरित भऽ जाइत अछि। एहिसँ ध्वनि शास्त्र एवं व्याकरण निर्मित होइत अछि। अर्थात ध्वनि प्रभाग एवं वाक्य प्रभागक निर्माण होइत अछि। अस्तु भाषा विज्ञान एही प्रभागमे अभिव्यक्त होइत चलि जाइत अछि।

प्रो. डा. रामावतार यादव वस्तुतः विचारक नहि अपितु विचार कएल गेल भाषा संरचनाक वैज्ञानिक उपस्थापन दऽ मैथिली भाषाकेँ विश्वपटलपर अनबाक प्रयास केलनि जाहिसँ विश्व संरचनावादी भाषाक निकट मैथिली सेहो विस्तार पौलक। अंग्रेजीमे मैथिली ध्वनिक निरीक्षण-परीक्षण कऽ ओही परंपरामे एकर संदर्भित विश्लेषण करैत समग्र मैथिली व्याकरण एकर अवधारणाकेँ आयाम देलनि।

मुदा एहि विश्लेषणक आधार रहल संरचनात्मक भाषाक (structured language) स्वरूप विकास, जकरा अंग्रजीक विद्वान अपन कल्पनाक विधि-नियममे पारंपरिक स्वरूप देलनि। अंग्रजी विद्वान भारोपीय भाषा परिवारक संरचनावादी दृष्टिकोणकेँ स्थापित केलनि एही परंपरामे कथित आधुनिक भारतीय भाषाक विकास देखौलनि मानलनि जे एहि भाषा परिवारक जननी कोनो एकटा भाषा हएत। प्रायः मानि लेलनि जे जननी भाषा संस्कृत अछि एही भाषासँ भारोपीय भाषा परिवारक विकास भेल अछि। आधुनिक भारतीय भाषाक विकासक संदर्भमे एहि विचारक मान्यता अछि जे वैदिक संस्कृतसँ लौकिक संस्कृत क्रमशः प्राकृत तथा अपभ्रंश होइत आधुनिक भारतीय भाषाक विकास भेल अछि। एहिमे मैथिली भाषाक संदर्भ संस्कृत, मागधी प्राकृत अपभ्रंशसँ जुड़ल अछि। एकर उपलब्ध साक्ष्य लोक व्यवहार तथा विचार नहि अपितु ओहि पुस्तक सभसँ लेल गेल अछि जे पुस्तक कोनो व्यक्ति वा व्यक्ति-परंपरामे लिखल गेल अछि। जन व्यवहार विचारक आधारपर भाषोत्पति एवं एकर विकासकेँ मोजर नहि भेटल। जर्मन भाषा दार्शनिक लुडविग विटजेन्सटीन (Ludwig Wittgenstein) लिखैत छथि जे “if we had to name anything which is the life of the sign, we should have to say that it was its use” 3 उपयोगितावादी विचार, संरचनावादी विचारक एकमात्र चुनौती छल, जे शब्दक प्रयोग व्यवहार एवं उपयोगितापर आधारित होइछ, कहैत अछि। ताहि कारणे कोनो प्रकारक अमूर्त विधि-नियममे विकासकेँ देखेबाक नव-नव क्षमता नहि होइत अछि। एकटा नियममे मूर्त स्वरूप नहि रहि जाइत अछि। संगहि परंपराक रूपमे नव चिंतन, मनन नव चेतनाक आधार नहि बनि पबैत अछि तेँ Ludwig Wittgenstein परंपरासँ स्थापित नियमकेँ अमूर्त विधान मात्र कहैत छथि। "A rule is an abstract entity—" 4 एकरे अध्ययनमे मनुष्य अपन ऊर्जाकेँ नष्ट कऽ लैत अछि। नव दृष्टिक विकास वा मूर्त विचार जे व्यवहार सिद्ध होइत अछि, तकर विकास संभव नहि। ईहो लिखैत छथि जे "the scientific framework is not appropriate everywhere, and certainly not for philosophical investigations." 5 तें नव अवधारणा वा कोनो नव खोज कोनो खास नियमसँ प्रतिबंधित नहि होइत अछि अपितु नव परिकल्पनाक संग एकटा मार्ग बनबैत अछि, जकर विचार व्यवहार जन-समूहक भाषा व्यवहार होइत अछि।

वस्तुतः प्रो. डा. रामावतार यादव संरचनावादी भाषा परंपरामे हमर विचार दर्शनकेँ देखलनि तेँ हिनका हमर तर्क प्रमाण प्रतिकूल बुझा पड़लनि-"Dhiraj's claim may tend to tacitly imply that the grammatical system of the New Indo-Aryan language Maithili had indeed intruded and/or influenced the structure of the grammar of the Old Indo-Aryan Vedic. Sanskrit of the Rgveda. Lately, in contradistinction to contemporary knowledge on the probable time of the origins of the New Indo-Aryan languages, including Maithili, Dhiraj (2019: 127) has unabashedly reiterated his earlier untenable position and additionally erred into claiming about the existence of Maithili" 6

वस्तुतः आमलोके जकाँ विद्वानक दृष्टि अपने ज्ञानक अनुशीलनमे होइत अछि, तेँ अपने ज्ञान-विज्ञानसँ दोसरोकेँ देखैत छथि मतखंडन करैत छथि। प्रो. डा. यादव हमरा संदर्भमे जे किछु लिखलनि हिनक संरचनावादी दृष्टिक प्रतिबिंब थिक जखन कि हमर दृष्टि मैथिली भाषाक विकास संदर्भे- 'भाषाक स्वरूप तथा मैथिली भाषाक विकास' मे स्पष्ट अछि जे ॠगवेद कालमे ज्ञान-विज्ञानक भाषा वैदिक संस्कृत छल, जकरा हम लेख्य अवग्राही भाषा कहने छी, तथा बोलचालक भाषा एकर समानान्तर लोक भाषा छल, जकरा हम संभाष्य अवग्राही भाषा कहने छी। ओहि समयमे संभाष्य अवग्राही भाषा लेख्य अवग्राही भाषासँ सर्वथा स्वतंत्र छल।7

हम ' ना मा सी धं' आलेखमे ईहो स्पष्ट केने छी जे ॠगवेदक 'एम सिद्धं' सँ विकसित अछि। 'एम सिद्धं', ' नमः सिद्धम् > ना मा सी धं' इएह वैदिक संस्कृतसँ लोौकिक संस्कृत तथा मैथिली भाषाक विकास थिक। एहि ज्ञानक विकास मिथिलेमे भेल। तेँ सिलेट पकड़ैत काल देवनागरी लिपिक प्रारंभमे ना मा सी धं' सँ होइत छल। हम स्वयं एकर गवाह छी। माने तत्समसँ  मैथिली तद्भवक विकास भेल अछि। ना मा सी धं विशुद्ध दर्शन थिक प्रारंभिक अक्षर ज्ञान थिक। व्याकरणक उत्स थिक। अभिप्राय जे व्याकरणक उत्पति दर्शनसँ भेल अछि, प्रत्येक ध्वनिक अपन दर्शन होइत छै।8 तेँ नव परिकल्पना भाषाक क्षेत्रमे दर्शन थिक एकरासँ अलग व्याकरण कार्यरूप कोनो तरहें अलग सिद्ध नहि अछि। तेँ कोनो टा नव परिकल्पना अपन दार्शनिक अनुसंधान तर्क प्रमाणेक आधारपर करैत अछि। हम ॠगवेदमे व्यवहृत तात्कालीन लोक भाषा (संभाष्य अवग्राही भाषा) पचास टा शब्द जे प्रथमे मण्डलसँ लेल गेल अछि संगहि अही मण्डलमे 'यो संबोधनक प्रयोगक आधारेपर अपन मैथिली भाषा दृष्टिकेँ स्थापित केने छी, जे वैचारिक प्रभावमे भाषा दर्शन थिक, व्याकरण नहि।9 हमर दृष्टि संरचनावादी भाषा विज्ञान नहि, अपितु भाषा दर्शन अछि, जाहिमे नव-नव अनुसंधानक तेवर बनल रहैत अछि। हमरा जनैत भाषा दर्शनकेँ व्याकरणक आवश्यकता अही लेल पड़ैत अछि जे शब्द वा वाक्यक उपास्थापन शुद्धता हो। नहि तऽ भाषा दर्शनकेँ व्याकरणक कोनो आवश्यकता नहि अछि।

सर्वविदित अछि जे ॠगवेद वा अन्यवेदक भाषा व्याकरण सिद्ध नहि अछि व्यवहारक भाषा पुश्त दर पुश्त लोक मूँहसँ हस्तांतरित होइत अछि, ईहो कोनो व्याकरण सिद्ध नहि छल-तखन व्याकरणक संरचनाक आधारपर भाषा दर्शनक कसौटी कोना मानी कोना भारोपीय भाषा परिवारक विकासकेँ समीचीन मानी। वेदकेँ जनबाक लेल व्याकरण बहुत बादमे बनल, मुदा भाषा दर्शनेमे वेद अछि, जकर भावात्मक साक्षात्कार शब्द दर्शनमे निहित अछि। मैथिली भाषाक विकास हमरा जनैत तत्सम > प्राकृत > अपभ्रंश होइत नहि अपितु तत्समसँ सीधे मैथिली तद्भवमे भेल अछि देशजसँ तत्सम सेहो बनल अछि।10 हमरा लेल महत्वपूर्ण भाषा दर्शन अछि, घिसल-पिटल तथाकथित भाषा विज्ञान नहि। बिरिछ, हाथ, काठ, पीठ आदि शब्दक विकास सीधे वृक्ष, हस्त, काष्ठ, पृष्ठ आदि तत्सम शब्दसँ भेल अछि, नहि कि एकरा लेल कोनो प्राकृत वा अपभ्रंश चक्रायल। जहिना तत्समसँ मैथिली तद्भव शब्दक विकास भेल, तहिना विदेशी शब्दसँ मैथिली विदेशज शब्दक विकास सेहो भेल। जेना- दरोगासँ दरोगा, नजरसँ नजरि, पोस्टकार्डसँ पोस्टकाट, स्टेशनसँ टीशन आदि।

हमरा जनैत ॠगवेद कालमे वैदिक संस्कृत ज्ञान-विज्ञान तथा राज-काजक भाषा रहल हएत। एकर समानान्तर मानुषी भाषा (जकरा बादमे मैथिली भाषा) कहल गेल, से छल। तेँ मैथिलीक विकास मानुषी भाषासँ भेल, कहल जेबाक चाही। वस्तुतः मैथिली, मिथिला मैथिलक विकास एकर अपन भूगोल संस्कृति, विचार एवं व्यवहारसँ भेल अछि तेँ मैकाले शिक्षाक अनुसार एकर विश्लेषण नहि हेबाक चाही। ईहो सर्वविदित अछि जे संस्कृत संस्कार कएल गेल भाषा थिक जे तात्कालीन लोक भाषाकेँ धातु, उपसर्ग तथा प्रत्ययसँ संस्कार कऽ संस्कृत बनाओल गेल। तेँ कहियो जन-सामान्यक उपयोगक भाषा नहि रहल। विद्यापति स्वयं एकरा स्वीकार करैत कीर्तिलतामे लिखलनि अछि जे-

सक्कयवानी बहुअ भावय, पाउअ रस को मम्म पाबय,
देसिल बयना सभ जन मिट्ठा, तेँ तैसन जम्पओ अवहट्ठा

अर्थात संस्कृत बहुजनकेँ नीक नहि लगैत अछि। प्राकृत मर्मकेँ व्यक्त नहि कऽ पबैत अछि। देसी बाषा सभकेँ मीठ लगैत अछि। तेँ एहने सन अवहट्ठ भाषाकेँ जन्म दऽ रहल छी। स्पष्ट अछि जे संस्कृत अभिजात्यक भाषा रहल अछि। तेँ मैथिली भाषाक संदर्भमे मैकाले शिक्षा यथार्थ नहि अछि।

मानल जे मैथिली भाषाक संदर्भमे अंग्रेजी विद्वान बहुत किछु देलनि, मैथिलीक उद्भव विकासक संदर्भमे प्रो. डा. यादव जाहि भारोपीय भाषा परिवारक आधारपर हमर परिकल्पनासँ असहमति जतौलनि, वस्तुतः हिनक भ्रामक दृष्टिकोण थिकनि। कोनो विज्ञान दर्शनेसँ प्रारंभ होइत अछि तेँ मिथिला, मैथिल मैथिलीकेँ एही आधारपर रेखांकित करबाक चाही। एही रेखांकनसँ नव अवधारणा चेतनाक विकास संभव हएत।

प्रत्यक परिकल्पनामे एकटा विज्ञान निहित होइत अछि। ओना विज्ञानक आधारे परिकल्पना थिक, तेँ विज्ञानकेँ अनदेखा नहि करबाक चाही। उपनिषद् जे विज्ञानकेँ पराभौतिकी मानैत अछि 11 भाषाकेँ ध्वनि एवं विचारसँ संश्लिष्ठ करैत अछि  12 माने विज्ञान भाषा एकटा परा भौतिकी अवधारणा थिक, जे अंततः चेतना एकर भाषिक विशेषताकेँ स्वीकार करैत अछि मानैत अछि जे विज्ञान चेतना थिक एहि चेतनासँ भाषात्मक संसारक उत्पति अछि 13 तेँ एक वा अनंत भाषे दर्शनक प्रतिपाद्य थिक। हमरा जनैत भाषा जँ नहि होइतैक तँ संसार अव्यक्त रहितैक तथा सभ्यता-संस्कृति नामक कोनो अवधारणा नहि होइतैक। तेँ समग्र बौद्धिक आनंद भाषाक अंतर्भावमे निहित अछि, जे कर्म रूपमे रूपांतरित होइत अछि। एकरा व्याकरणसँ नहि भाषे दर्शनसँ बूझल जा सकैत अछि।

कोनो भाषाकेँ समग्र रूपेँ ओकर साहित्यसँ नहि बूझल जा सकैत अछि, अपितु जनबोध जनसरोकारसँ बूझल जा सकैत अछि। साहित्यमे व्यक्तिक भाषा, वस्तु तथा भावात्मक दृष्टि होइत अछि, जखन कि जनसरोकारमे समग्र सभ्यता संस्कृति। वैदिक संस्कृत वा लौकिक संस्कृत जन सरोकारक भाषा नहि थिक अपितु ज्ञान-विज्ञानक भाषा थिक तेँ एकर संबंध सीधे विद्वान वर्गसँ भऽ जाइत अछि, जखन कि सामान्य जनक दृष्टि, विचार व्वहार एकर मौलिक धारामे नहि रहैत अछि, तेँ एकरासँ सामान्य जनकेँ कोनो संवाद नहि रहल। अस्तु, व्याकरण जे वेदोक नहि रहल, ओहि आधारपर हम व्याकरण संरचनाक महत्व कतेक दी-विचारणीय अछि। हमर परिकल्पनामे प्रमाण अछि, तर्क अछि जे चेतनाक गुणीभूत भाषा दृष्टिकेँ व्यक्त करैत अछि। अस्तु, व्याकरणक विवशता अछि जे भाषाकेँ शुद्धता दृष्टिसँ सुधारि सकैत अछि, मुदा जन्म नहि दऽ सकैत अछि।

हमरा जनैत व्याकरणोक आधार दर्शन ताकब आवश्यक, जाहिपर व्याकरण संख्या आदेशमे अछि। ओना व्याकरण कथित शुद्धताक साम्राज्य बनेबाक दृष्टि अवश्य राखैत अछि, मुदा प्रकृतिक सापेक्षिक नियम एकर विरुद्ध अछि, तेँ शुद्धताक साम्राज्य नहि बनि पबैत अछि। एना किएक, ताहि लेल व्याकरणकेँ बुझबासँ पूर्व एकर दर्शनकेँ बूझब आवश्यक। व्यक्तिनिष्ठ परंपराक आधारपर कल्पित भारोपीय भाषा परिवार एहन संरचनावादी अवधारणा हमरा जनैत द्वितीय विश्वयुद्धक बादे अप्रासांगिक भऽ गेल। भाषाक नव दृष्टि भाषा दर्शनसँ फरिच्छ होअए लागल, जे विश्वकेँ एकटा नव दृष्टि देलक साम्राज्यवादी हिंसाक विरुद्ध स्वाधीनता शांतिक नव चेतना देलक। प्रो. डा. यादवकेँ एहि दिशामे सोचबाक चाही शांति एवं मुक्तिक संवादकेँ पुनः दासत्वक जंजीर नहि देबाक चाही।

 

संदर्भ-
1.
भाषा विचार मैथिलीक प्राचीन साहित्य (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 11-28)
2.
तत्रैव
3. The Blue and Brown Books (
पृष्ठ-4)
4. Philosophical Investigations (
पृष्ठ 185)
5.
तत्रैव (पृष्ठ 240)
6. Historiography of Maithili Lexicography & Francis Buchanan’s Comparative Vocabularies (Fascimile Edition of the British Library London Manuscript) Edited by Ramawatar Yadav (
पृष्ठ 17-18)
7.
मैथिली भाषाक वैचारिक अस्मिता (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 116-124)
8.
भाषा विचार मैथिलीक प्राचीन साहित्य (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 78-84)
9.
मैथिली भाषाक वैचारिक अस्मिता (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 124)
10.
भाषा विचार मैथिलीक प्राचीन साहित्य (राम चैतन्य धीरज, पृष्ठ 25-28)
11.
तैत्तिरीयोपनिषद् (प्रथम एवं सप्तम अनुवाक)
12.
तत्रैव
13.
तत्रैव

 

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