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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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प्रभात कुमार कर्ण

 

प्रकृतिक तांडव ।

 

हैलो ---! हैलो -----!!  आस्था छैं---हेलो ---!आस्था फोन उठवैत कहैय छथीह ---"गोर लागैय छियौ  श्रृष्टि दीदी" ---!

श्रृष्टि -खुश रह --! देख तोहर पाहून प्रकृति आई फेर धर मे तांडव कय रहल छथुन ---!

आस्था--गे --तोरो धिया पुता सब तs उडण्डे छोउक , मंदिर कहियो-कदाल आवैय छौक मुदा अप्पन सेल्फी  भागि जेतौ तय एको बेर  उपरको मन सँ प्रणाम नहि करैय छोक ।

श्रृष्टि--सांचे  कहि रहल छै--मुदा  , अखन ई सब ग़प्प छोड़ , पहिने अप्पन 

पाहून प्रकृति केँ तांडव शांत करs !

आस्था---हुनका फोन दिहिन -- ,हेलो --!  हेलो-- ! पाहूना गोर लागैय छी !

प्रकृति --खुश रहूँ , कहु सब नीके !

आस्था- हअ ---, एकटा ग़प्प पुछैय छी--,अहाँ अपने घर मे अपने धियापुता संग किआक तांडव कय रहल छी ?

प्रकृति -इयै , साँस,इजोत, अन्न,पानि सब के सब हमर खून जेना चूसि रहल अछि आ हमरे ढाहैय अछि ,तोड़ैय अछि , अंग -अंग कटैय अछि । अहाँ स्वयं कहूँ जे हमर जड़ल आत्माक कुहेश किआक नइ आफैद बनि झहरतै !

 

प्रभात कुमार कर्ण

 

 

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