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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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अरुण लाल

3 टा कविता

1

अहीं तं प्राण छी...

हरियर काँच कली
रूप रुचिर मोहिनी

हे  सुंदर सुकुमारी !
अहाँक निश्छल हँसी

चिर  परिचित मुद्रा मे
मुस्की दय मुहथरि पर

एना किए ठाढ छी
के  छी अहाँ !
किए ने  बजैत छी

डारि डारि पात पात
पीत वस्त्र  विभूषित

सिहराबय तन मन
ठुमकय नाचय उमंग

कन्हैयाक बाँसुरीक
मधुर सुमधुर तान छी

कि राधाक आँखि केर
बिरह मिलन गान छी

जे छी अहाँ ! से भेद
आब फोलि  दिअह

कहीं अहाँ बसंतक
सुकोमल तं ने प्राण छी

आउ आउ घर आउ
कोनटा किए धयने छी

अहीं हमर प्रियतमा
अहीं त प्राण छी .



2.

खेलब चैन सँ' होली

फेर सँ अहाँक देह
बसंती बयार  लागि
गमकि उठल हैत सोन्हगर
माटिक खुशबू जकाँ
उड़ैत हैत आँचर
हवा मे  लहराइत हैत
हारैत हारैत जीत जाइलए
आकुल हैत

सब बात बुझै छी
लागि गेल अछि
अहाँक आँचर कें फगुनहटि
टुह टुह लाल होइलए
आतुर अछि

फुर्सति कहाँ अछि
सीमा पर बहुत गोलीबारी
पटकम पटका उठापटक
छै जारी
जवान सब टेसूक फूल
जकाँ  टेसुआएल
लाल भेल अछि

एमकी होली फिच फिच छै
पिचकारी मे रंगक बदला
बारूदी  धमक आओर गोली छै
मार काट ,कटमारि मे
होली गीत कहाँ मोन परैए
डम्फाक  थाप रडार सऽ बाहर
मन सिनुरिया आम
जाँकित  रंगैए
अहाँ बला होली कहाँ सजैए

एमरीदा सीमा कें साजब
बारूदी गुलाल सऽ
अपन लहू कें गर्म करब
दुश्मन कें गाॅजब
चुनि चुनि मारब गोली
अगिला साल हम फेर
खेलब चैन सँ होली



3.

गरम गरम गोनरि

गुड़कि  गेलै  गुड़का
अनन्त काल लए
गोनरि मे

मिसी मिसी
दुनू अगिलका दांत
बाहर केने
कनी हँसैत
कनी सकुचाइत
हँसै केर अनवरत
कोशिश करैत
सरकि गेल नुआ कें
माथ पर लैत
उघार भेल देह कें
फेर फेर झंपैत
गुड़का केर गामबाली
उनटाबैए पुनटाबैए
मोने मोन बतियाबैए
झाड़ि झाड़ि गोनरि कें
उलटि  पुलटि ,
सैंत सैंत सुखाबैए

बरख  तेसरे जाड़ मे
बहुत मेहनति स'
केने छलै तैयार
बहुत सोचि क'
जे आब भागि जेतै
ओकर दूनू  प्राणीक  जाड़
चाहे होइ माघक कनकनी
या होइ पूसक ठाड़

एकमहले लागल छै
भूख पिआस
तिआगल छै
जाड़क ठिठुरन मे
ठिठुरले हाथे
तीन दिन स
गोनरि बनाबै छै
सब काम बरदिएलै
माल जाल
खुट्टा पर  सरदिएलै
बतकही मे गामबाली
रूसि  क' भेलै उदास
ओइ राति टुक टुक
तकैत रहलै  गुड़का
गरम गरम निन्न लै
काछर कटैत रहलै
नै भेटलै ओकरा गामबालिक
नरम नरम एहसास
गुरैक गेलै गुड़का
अनन्त काल लै गोनरि  मे

एखिन्तो ओकर  बनाओल
गोनरि मे गमीॅ बाँचल छै
ओकर गामबाली
सुखा सुखा सैंतय छै
डबडबायल आँखिये
मोन के पतियबए छै
ई गोनरि एखिनतो
ओकरा  ठिठुरैत जाड़ मे
गरम गरम  एहसास
दियबै छै

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