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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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प्रीतम कुमार निषादक

किछु कविता

 

 

आहत अगस्त

भारत देशक धरती करुणित

शहीदाञ्जली दऽ प्रणमए हस्त।

धुजातिरंगा दुलरैत बाजए

अछि एखनो आहत अगस्त।।

 

चहुँदिशि गूंजए पन्द्रह अगस्त

नेना-भुटका संग-लोक व्यस्त

आजाद हिन्द भए रहल त्रस्त

स्वारथ सह-सह देखैछ मस्त

तैं अछि आहत पन्द्रहअगस्त

आहत अगस्त आहत अगस्त...।। 0।।

 

अछि जन प्रतिनिधि मौका परस्त।

भारत मिथिला अछि अस्त-व्यस्त।।

सत्ता सेवक खुशहाल मस्त।

कोन भष्ट पतिक अछि वरद हस्त।।

आहत अगस्त आहत अगस्त...।। 0।।

 

किछु संविधान सुख अछि निरस्त

मर्यादित अछि-फिरका परस्त

किए, आतंकी दिन-दिन प्रशस्त

राष्ट्रीयताकेँ देवए शिकस्त...।। 0।।

 

आशाक तिरंगा कोटि हस्त

झण्डोत्तोलन भए रहल सस्त

, सर्व धर्म समभाव पस्त

हाय, राष्ट्र पर्व केर उदय-अस्त

आहत अगस्त आहत अगस्त...।। 0।।

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अधपेड़ियाक अखराहा

सतजुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग

सन जेकर नाम लेल

संसार वा जगतीक

संभार पर सवार भेल।

सृष्टिक अखराहापर

सभ्यता, संस्कृति केर बदलैत परिवेश संग

एक्खन धरि सवारी कसने अछि।

तैयो, तऽड़ पड़ल अछि मनुक्खक महत्त्वाकांक्षा

जुम्मुस बान्हि, कोनो ने कोनो दांवकेँ जुगतमे

कच्छ मच्छ करैत, घुसकुनियाँ मारैत अपस्याँत भेल

प्रत्यक्षदर्शी केँ उत्साह लऽ

कलजुगक क्रूरता सँ लड़ि रहल अछि

दोसर दिश, गब्दी मारने मूकदर्शी मण्डली,

असमर्थ.., अधमरू भेल जा रहल अछि

संस्कारक संवेदना...

दम्भीक दुर्भावी...

लङ्गड़पेंचमे हुकहुकाइत...

हारऽकेँ नाम नहि लऽ रहल अछि।

मुदा पछिमाही...

अंगरेजिया सेहन्ताकेँ पजियौने

शौक औ स्वादकेँ संगोरैत

हां हां, हीं हीं, मे रमैत...

अधपेड़ियाक गुनधुनी संग...

घरमुहाँ भेल जा रहल अछि।

धड़ामक गूंज सूनि... देखल,

कि अखराहापर लंगड़क धकेलसँ...

फेंकाएल अछि दुर्काल!

मुदा फेरसँ टलबाहि गूंजल,

दुन्नु दिशि, शुरू भेल फेरसँ कालयुद्ध’,

आओर मुँहदेखुआ सभकेँ, गुफरा-गुफरी...

जाइत-जाइत, घुरि-घुरि देखए

कायर कापूत सभ, देखैत जाइत...

अधपेड़ियाक अखराहा...।।

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यश-अपयश

केओ नाम कऽ गेलाह, केओ काम कऽ गेलाह

केओ धरना दऽ चक्कोकेँ जाम कऽ गेलाह

केओ क्रान्ति शमन लऽए फुसराहैट कऽए

चुप्पा चोर जकाँ दुर्काल दऽ गेलाह

ओ के छलाह...।। 0।।

 

हमहूँ टुघरैत रही दु:खे कुहरैत रही

कोनो बैसाखी धऽ केहुना सम्हरैत रही

दैव जानए कोनो गौंआँ अनगौंआँ सन

कन्हा-कोतरा छलाह, गुम्मा भोतरा छलाह

से जानब अछि च्योट्टहि ओ के छलाह

ओ के छलाह...।। 1।।

 

केओ छड़ैपि आवि, हमरा सम्हारैत रहल

केओ सुधरलहा जिनगी केँ बिगारैत रहल

नेंगड़ा-लुल्हा जकाँ भाग्य भोगे मरी

आलसी-इर्ष्या-अपमान-रोगे मरी

जानवर आचरण केर गुम्हरैनीपर

आन रहितो मुदा ओ अप्पन भऽ गेलाह

ओ के छलाह ओ के छलाह...।। 2।।

 

गाम घरमे सदति लोक चरचा करए

गौंआँ-घरुआक पुरखौंती दिन-दिन मरए

नीक-बेजाए घड़ी केर हर हाल मे

लोक अपनेहि पड़ोसियोसँ सदिखन जरए

लोकक मनमे केहन लागल अगराही जे

हमरा धुकधुक्की छातीकेँ बढ़वैत गेलाह

ओ के छला...।। 3।।

 

बाट औ घाट केओ बिगाड़ैत रहल

ज्ञानी बाउर जकाँ बमकी दैत कहल

किछुयो सूझए कहाँ आब देखब कथी

अगवे दुर्दिन हँसए सुन्न कोठा महल

भाव-भाषाक अकबक्की कोनटा धएने

देखि कलजुग कहए काल पुरखा छलाह

गाम केर भलमानुष जकाँ ओ छलाह

काल पुरखा छलाह, गाम पुरखा छलाह।। 4।।

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भक्तिक ढोंग

ज्ञान धरम घेंट जोड़ि कऽ कानए

बकुआएल भगवान यौ...

सगरो श्रद्धा भक्ति कनैए

मठ-मस्जिद संस्थान यौ...

ज्ञानी-पण्डित मुल्ला-साधु

बना रहल शैतान यौ...

सगरो श्रद्धा...।। 0।।

 

केना दाव-दावा चन्दासँ

मन्दिर मस्जिद बनए विशाल

जन मानसमे छल-बल बढ़बैत

भक्त संचालक करए कमाल

पूजा-पाठकेँ भाव-प्रभावो

अगवे दुखनहुत भऽ गेल

मेला-उत्सव-समारोह सभ

दिनो-दिन अपयशिया भेल

मूर्ति भसानक बाऊर बमकी

डीजे डिस्को केर शान यौ

सगरो श्रद्धा...।। 0।।

 

देश औ लोक धरमसँ हटि कऽ

जेहादीक फतवा फरमान

सनक मिजाजी सतालोलुप

निरमावै आतंकी शान

इसकुलो-मकतबसँ कानैत

भागैए आब ज्ञान-विज्ञान

लवलाइटिस रोगियाहा लवगुरु

कएल कलंकित ज्ञान बथान

प्रार्थना आओर नमाज वृत्ति संग

हत्या-घृणा बखान यौ, सगरो श्रद्धा...।। 0।।

 

अहोश्री युगपति बुझनुक प्रियजन

आगत श्री युग देखैत कहू

सार्थक ज्ञान-विज्ञान सहारे

नाश बुद्धिकेँ फेकैत रहू

शुभचिन्तक होऊ नव पीढ़ीकेँ

पथ निर्देशक बनि बढ़ियौ

लोक समाजक श्रम-विधान संग

प्रीतम उपदेशक गढ़ियौ

जगत लोक मंगल पथ जोहए

खुखदा सांझ-विहान यौ, सगरो श्रद्धा...।। 0।।

 

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