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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

 

१. कविप्रीतम कुमार निषादक किछु कविता २. मिसिदा- "स्मृति शेष"

 

कविप्रीतम कुमार निषादक

किछु कविता

 

सुत्थड़ समाज

पुरखा धरम माऽए-बापक पुन यौ

सुत्थर समाज देल आशिष सगुन यौ

पुरजन-परिजन चेतबए त्यागु अवगुन यौ

पुरखा धरम...।। 0।।

 

ब्रह्मा विधाता केर रचना-विधान सभ

सृष्टि-प्रकृति संग युगचक्र काल नभ

हमरे जकाँ आओर जीव जन्तु जन्मल

ब्रह्माण्डक घटनासँ तारा-ग्रह हलचल

धरती-आकाश देलक रीत-गीत धुन यौ

सुत्थड़ समाज देल आशिष सगुन यौ

पुरखा धरम...।। 1।।

 

जेहन समाज भेटल तहने हम बनलौं

पितृज अग्रज गुण करमो केँ छनलौं

टोलिया-पड़ोसियासँ लुइर-बुइध जनलौं

गौंआँ-संगतिया संग धार-बाँध फनलौं

गुरु ज्ञानी हित लग बनौलक निपुण यौ

सुत्थड़ समाज देल आशिष सगुन यौ

पुरखा धरम...।। 2।।

 

आजुक युग सनकी सँ चिन्ता बढ़बैए

सुख-शौक नवतुर मन दुविधा चढ़बैए

दानव दहेज केर बेटी घटवैए

दारू-तम्बाकू मीत-रोग पटवैए

तैँ प्रीतम बेकल भऽ करए गुनधुन यौ

सुत्थड़ समाज देल आशिष सगुन यौ

पुरखा धरम...।। 3।।

¦

 

सुनबै-गुनबै

कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै

नीक बेजायकेँ कत्तेक गुनबै

देश-राज-गृह लोक लेल केहन

नेता-मुखिया सरपंच चुनबै

कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै...।। 0।।

 

गाम-शहर-नर-नारीक खिस्सा

एखन अजब-गजब भऽ गेल

अच्छे दिन औ सुशासन नारा

जीएसटीक कोनटा धऽ लेल

इसकुलिया या हाकिम-मास्टर सभ

बनियौटी ऑफिस रमि गेल

शिक्षा-समिति संगवे संगे

हिस्सा बखरा कए जमि गेल

कत्तेक दिन धरि शिक्षाक अंचिया

शमशानक घाटहुँ मे खुनबै

कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै।। 1।।

 

जनप्रतिनिधि भऽ अजगुत लीला, बलात्कार कए नाम करय

मीडिया-कर्मी कलम दूतकेँ, गरियैवितेँ बदनाम करय

संगहि गजब करै नव तुरिया

बूढ़ पुरानकेँ दुत्कारए

नव स्टाइलसँ छौंड़ा-छौंड़ी

कलजुग-कपटसँ फुफकारए

मोबाइल-इयर फोनक चलती

बमकैत जीजे-डिस्को सुनबै

कहु श्री मन की पढ़बै-सुनबै...।। 2।।

 

एक्खन ज्ञान-विज्ञान लड़ैए

थ्योरीक चोर बढ़ए दिन-दिन

पैरवी-पाइसँ प्रैक्टिकल हँसए

देखू परीक्षा केर दुर्दिन

कम्प्यूटर-इन्टरनेट उमकए

स्किलइण्डियाक भ्यू-दुरबिन

अलक्ष्ये नवतुर चौंकैए

पूब-पच्छिम-उत्तर दक्षिण

तैं सम्हरैत-सम्हारू युगकेँ

प्रलय काल आँइखेटा मुनबै

कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै...।। 3।।

 

आब सुनू बुधियार श्री मैथिल, लोककेँ बढ़ल-चढ़ल अदिन्ता

मिथिलाक शीलहरण भेल दिन-दिन, कानए युगक नियन्ता

पुरखौंती-संस्कृति-मन्हुआएल, सनकल शौख-सेहन्ता

मिथिला राज्यक सपना सिसकए

ठोहि पारैए बेगरता

आश अगोड़ने प्रीतम हकमए

बज्जर खेतमे की सभ बुनबै

कहु श्रीमन की पढ़बै-सुनबै...।। 4।।

¦

 


 

बुझवाक चाही

एक्खन देखल गाम-गाम

शहर-बजारो सभठाम

मनुक्ख सभ

अपन ऐश्वर्य देखबक फेरमे

भेल जा रहल अछि क्रूर उद्याम...

ओकरा सभकेँ सनकल संकल्प अछि,

संगे, बहुत रास विकल्प अछि,

ताहि लेल किछु सोचवाक चाही,

बुझनुककेँ तँ ई, बेसी बुझवाक चाही...

से.., हमरो सभकेँ बुझवाक चाही...

बुझनुककेँ तँ...।

 

सहठुल सुपातर सभकेँ

सेाहनगर बैसार चाही

बैसारक जग्गहपर

ज्ञान औ इमानक पैसार चाही

एहने सोचकेँ अँगने दुअरे पोसवाक चाही

बुझनुकजन केँ तँ ई भाव पोसवाक चाही।

से हमरो सभकेँ सोचवाक चाही।।

 

बूढ़क अनुभव गुम्म नहि होअए

नवतुरिया बेदम्म नहिं होअए

नारी-सशक्ति वृद्धि वहन्ने...

पुरखौंती संस्कार नहि रोअए...

नव घर उठ्ठए तँ किए खस्सए...

पुरना घर देखि नवतुर हँस्सए...

तैं जुग-जुगकेँ बाट-घाटपर...

सम्हरि-सम्हरि कऽ चलबाक चाही...

से हमरो सभकेँ ई बुझवाक चाही...

बहुजन हिताय वा सुखाय संग

सुख-शान्तिकेँ उपाय चाही...

छोटका-बड़का भावकेँ त्यागैत

सुच्चा मैथिल समुदाय चाही...

कहए प्रीतम कहियो किए!

गाम-घारमे आइ! चाही...

से हमरा सभकेँ ई बुझवाक चाही।।

¦

 

मिसिदा                                 

                           "स्मृति शेष"


 

बुढ़बा पाकरि,

एखनो ठाढ़ अहि,

गामक सीमान पर,

उगि गेलैए आब,

बोन-झार....

सर्पक केचुआ फहिरा रहल,

पाकरिक ठाढ़ि पर !

नहि अबैए आब एत',

किनको पन-पियाय,

नहि मचैए एत',

नेना-भुटका केर किलोल,

नहि करैए विश्राम, 

आब कोनो पथिक,

एहि पाकरि'क छांह तर !!


 

मरर पोखरि पर,

अहि एखनो,

पिपरि गाछ झमटगर,

जाहि त'र बनल छल,

नीक सन चबूतरा,

जेठ मासक दुपहरि मे,

खेलै छलियै ताश !

एखन टूटि-फुटि गेलैए,

बनल ओ चबूतरा,

जत' होइत छल,

सांझ खन बैसार,

गामक पुरोधा,

जानल मानल पंच,

होइत छलाह खास !!


 

घरक कनियां-मनियां,

निकसैत छलीह,

लाब' ल' पानि,

लेकिन,

बुढ़-पुरान लेल,

माथ पर राखि आंचर,

दैत छलीह सम्मान !

आधुनिकता केर,

परिवेश आब,

ओढ़ि लेलक अहि गाम,

बाबू जी,डैडी बनलाह,

माय बनि गेलीह मॉम,

देसी कें कफन ओढ़ा क',

करै छथि अभिमान !!


 

रसगर मीठगर,

पियरगर,

मैथिल बोली,

सोनगर लागै छल कान,

कोयली केर मधुर स्वर सं,

गुंजित होइत छल, 

सगर सकान !!

अंगरेजी केर,

लोभ मे

त्यजल आब,

देशज भाषा,

मैथिली भाषी,

कहब' मे,

कियैक बुझै छथि,

अप्पन अपमान ?


 

बेर-बेर,

नजरिक आगू,

घूम' लगैछ,

गाम परहक,

पाकरिक पेड़,

पीपरि तर'क, 

बनल चबूतरा !

रहि गेल,

आब "स्मृति-शेष" !!

                          -

-"मिसिदा"

(मिथिलेश सिन्हा "दाथवासी")

मोहल्ला/पोस्ट : लक्ष्मीसागर, जिला : दड़िभंगा.

 

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