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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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 राम विलास साहुक दर्जन भरि कविता-

दिलक दरद

 

मन पड़ल हे सखी

पिया अधरतिया हे

मनुआँ घबराएल हमर

पिया खटैए परदेश हे...।

 

क्षणकट छगाएल जिनगी

योवन बनल पहाड़ हे

आँखिक नीन हेराएल

राति काटै छी मन महुड़ाएल हे...।

 

बीसम बरस देह विषाएल

मनमे लगल अछि वाण हे

पिया परदेशिया सपनो ने देखै छी

लगैए तनसँ छुटत प्राण हे...।

 

जहिया एतै हमर पिया

चरण पखारि नैन मिलबै हे

पान-मखानसँ सुआगत करबै

प्रेमक बतिया सुनेबै हे...।

 

नयनक नोर केना सुखत

मनक त्रास कहिया मेटत हे

दिलक दरदकेँ के हरत

की पिया बिनु तेजब प्राण हे...।

उत्तम अन्न

 

मरुआक मान अपरमपार

रौदीक समय अमृत समान

सभकेँ बचबैए परान

कनियेँ पानि ऊँच खेत उपजै

कम मेहनत उपजै कठमन

बिपैत समयमे राखे मान

देखैमे कारी बड़ गुणकारी

खाइयोमे सुअदगर पियरगर

सभ अन्नमे बेसी यार एकरे

नोन, तेल, मिरचाइ, चटनी

पियौज, कसौनी, अचारक संग

खाइतो मजेदार अन्नक सुबेदार

अन्नमे उत्तम सुरो ने खाए

गरीबक मान मरुआ रखैए

सागक संगे खाए शान बढ़बैए

कफ-खाँसी जलोदर रक्‍तचाप

मधुमेह रोगकेँ भगबैए

पेटक रोगकेँ करैए कात

जे मरुआकेँ दुखमे सुमिरन करैए

तेकर बचबैए इज्‍जत प्राण

मरुआकेँ नइए कोनो गुमान

सभकेँ देखैए एक समान।

बदलल नजैर

 

सबहक नजैर अछि बदलल

केकरा कहब के पतियाएत

सगरो बैसल-ए बैमाने-शैतान

जेतए जाइ छी तेतइ ठकाइ छी

सगरे पसरल-ए ठकक ठीकेदार

धरतीसँ असमान धरि

बाट लगैए अन्‍हारे-अन्‍हार

के पुछत केना जीबै छी

सबहक सुखल-ए मुँह-गात

खाइ खातिर पेट पीटैए

जान बँचबैले भागल फिरैए

घर छोड़ि परदेश खटैए

समाज टुटि छिड़िया गेल-ए

के सम्‍हारत एहेन समाजकेँ

बदलल नजैरसँ करैए घात

संकटमे अछि आजुक समाज

बेवस्‍थाक छै दूटा आँखि

एकटा अकास दोसर पताल

बीचला केकरापर करत बिसवास

बदलल नजैरसँ करैए विनाश।

मिथिलाक अपमान

 

युग-युगसँ प्रसिद्ध नाम अछि

ऐ धरतीपर मिथिलाक नाम

कोन बियाधि लगल जे ई भेल हाल

स्‍वर्गसन धरती नरक बनल-ए

के करत नव निर्माण, के देत प्राण

भरल धरती मरल पड़ल अछि

बिनु साधन लोक पड़ा रहल-ए

जे मिथिलाकेँ होइए अपमान

धर्म ग्रन्‍थ पुराणमे लिखए

मोटगर अक्षरमे मिथिला महान

सभ किछुसँ समपन्न रहितो

आइ तेज रहल-ए प्राण

मिथि वंशक राजा जनककेँ

घर-घरमे जपैए अमर नाम

जनक नन्‍दनी जानकी नारीमे प्रधान

बड़ दुख सहि सीता जगमे सती महान्‍

मिथिलाक संस्‍कृतिकेँ विश्‍वमे मान

केकर कसुरसँ आइ भेल बदनाम

के करत बलिदान, जे हएत कल्‍यण

की नव सृजनकर्ता रक्‍तहीन बनल-ए

जे मिथिलाक अपमान सहि मरि रहल-ए

उत्‍थानक बात तँ सभ करैए मुदा

नइ भेल अखन धरि कल्‍याण

बेर-बेर मिथिला सहि रहल-ए अपमान।

जागु इंसान

 

जागु-जागु इंसान

सुतलसँ हएत हानि

धरती धधैक रहल-ए

बरैस रहल-ए अग्निवाण

आबि गेल महगी शैतान

नइ करत कियो कल्‍यण

विधि विधाता दुनू बैमान

जागु-जागु इंसान...।

 

दूध बिनु बच्‍चा कनैए

रोगी कानैए इलाजक खातिर

नइए अखनो केकरो धियान

इज्‍जत-आबरूक नै ठेकान

भ्रष्‍ट तंत्र षडयंत्र रचैए

लूट हत्‍या रेप अपहरणक

उद्योग बढ़ल-ए धरती-असमान

जागु-जागु इंसान...।

 

ठकक कोनो कमी नै अछि

ठकि रहल-ए छाती तानि

धर्मक नामपर लूट होइए

मानव बनैए दानव समान

जाति-पातिमे टुटल इंसान

शिष्‍टाचारसँ भ्रष्‍टाचार बेसी

जेना मरि गेल जगसँ इमान

जागु-जागु इंसान...।

जीवन पथ

 

चल रे बटोही चलैत चल

जीवन पथपर बढ़ैत चल

पाछू नहि आगू चलैत चल

राह कठीन राही निर्भिक बनि

अपन पथपर डेगैत चल

जिनगीक नाह डगमग चलैए

सही दिसा खेबैत पार चल

चल रे बटोही चलैत चल

जीवन पथपर बढ़ैत चल…।

 

जग सुन्‍दर जीवन दुर्लभ

प्रकृति जीवक जीवन दाता

अपने करनी भेल वेतरणी

मनुखे बनल-ए मनुखक दुखदाता

लोभ, मोह, मद असन्‍तोषमे फँसि

बाट कुबाट पकैड़ चलैए

नरकक द्वार खोलि रहल-ए

स्‍वर्गक बाट कर्मयोगी चलैए

चल रे बटोही चलैत चल

जीवन पथपर बढ़ैत चल...।

चंचल मन

 

चंचल मन चलैत चल

दुनियाँकेँ परखैत चल

सभकेँ सम नजैरसँ देख

समतल करैत बढ़ैत चल।

 

भेद-भावक विचारि छोड़ि

अभावमे भाव भरैत चल

धीर वीर बनि चलैत चल

ज्ञानक प्रकाश पसारैत चल।

 

पलखैत कम पहचान बेसी

सबहक उपकार करैत चल

दुख-सुख सहैत जगक संग

संजीविनी बुटी बाँटैत चल।

 

सम धारा बनि बहैत चल

राग-विराग खटराग छोड़ि

प्रेमक बाट पकैड़ बढ़ैत चल

कर्मक पूजा करैत चल।

 

मनक गति सभसँ बेसी

सदिखन पकैड़ काबू कर

मायासँ हटि कर्मसँ सटि

दुख-सुख संगे सम्‍हैर चल

चंचल मन चलैत चल

दुनियाँकेँ परखैत चल।

माघक जाड़

 

माघक जाड़ हाड़ छुबैए

थर-थर कँपैए करेज

ठिठुरल हाथ-पएर बेकाम लगैए

शरद भऽ गेल सौंसे देह

जेना छुटि जाएत तनसँ प्राण

कोसी-कमलाक बीच चास-बास

झलफाँफी बनल टटघर

ओश –कुहेससँ डुमल धरती

सौन मेघौन सन पड़ैए फुहार

पुरबा-पछियाक सम्राज्‍य

बिनु साधन हम छी नचार

खाइले फुटहो ने अछि

सुतैले अछि कनियेँ नार-पुआर

सुरुजक दर्शन सेहो ने होइए

दिन-राति लगैए एक्के समान

भसठिया लकड़ी ठेंगक संगे

बनगोइठाक घूर जरा कऽ

कहुना बँचबै छी प्राण

मुदा नै मानत ई माघक जाड़

हाड़पर पीटत लोहाक फाड़

गरीबकेँ नइए कोनो उपाय

बुढ़ लोक जान मालकेँ सताए

खा लेत सुखा अचार-बना

तखने करत जान उबरास

माघक जाड़ माघक जाड़।

हकार

 

जड़ि गेल बीआ मरि गेल खेत

सुखल धरती पड़ती पड़ल-ए

खरिहाँन बनल-ए श्‍मशान

माथ ठोकि कनैए किसान

हड्डी-पसलीमे नइए जान

भुखल नेना तेजैए प्राण

रक्षक भक्षक बनि बैसल-ए

नइ छै अखनो केकरो धियान

केना जीब हौ भगवान

काज बिनु हाथ भेल बेकाम

दिन भेल बाम छुटत प्राण

पड़ल अकाल गरीब भेल कंगाल

सुखि गेल देह जेना नर कंकाल

कालक पहड़ा नचैए जोगनी

शोणित पीब रहल-ए सियार

माथपर टीटही चिल्‍होरिया उड़ैए

गीद्ध-कौआ मीलि मांस नोचैए

सुखल हड्डी कुकुर चिबबैए

नइए केकरो गरीबसँ सरोकार

विधि विधाता बनल लचार

भुखल निर्बल दऽ रहल-ए हकार

मचि रहल-ए चहुदिस हहाकार

एके सिरहौने सभ हएब पार

हकार, हकार, हकार...।

कोसीक इतिहास

 

अगम कोसी केर

कोश भरिक पेट

अथाह पानि भरल

भित्तामे दराइर फटल

कटिनियासँ धसना गिरल

सबहक होश उड़ल

बहि गेल गामक-गाम

उजरल खेत-पथार खरिहाँन

उपजा-बारीक थाह नहि

सगरो पसरल बालुक ढेर

चर-चाँचर टपरामे

पटेर, झौआ, कासक बोन

उपैट गेल गाम-समाज

जे बँचल गेल कोसी पेट

तैयो नहि भेल सन्‍तोख

अछैते औरुदे लेलक जान

बँचल बेघर बेठेकान

कखनो जाएत सबहक प्राण

नइए तेकर कोनो ठेकान

केना भेटत ऐसँ त्राण

बेवस्‍था अछि अखनो बेइमान

दू भागमे बँटल समाज

कोसीकेँ नइए कोनो लाज

विकास नहि होइए ह्रास

केना बनत नव इतिहास

कोसीक इतिहास, कोसीक इतिहास।

मुक्‍ति

 

हथिया नक्षत्रक झाँट

सुतल छी टुटल खाट

मठौत उजरल लटकल सोकबा

ठोपे-ठोप चुबैत पानि...।

 

रहि-रहि भिजैए देह

सिहैर उठलौं अकचकाति

सगरो अन्‍हरिया राति

सुझए ने कोनो बाट...।

 

केहेन भेल दिन बाम

झख मारै छी निष्‍काम

पेटमे अन्नो ने अछि

दू दिनसँ उपास पड़ल-ए..।

 

भीखो जे देने रहए

कुकुर खा गेल बाट

कठजीव बनि जे जीबै छी

मरै नइ छी ई खाटपर...।

 

दिनक दोख जे चुकल छी

जीबै छी ने मरै छी

अधमरू पड़ल छी खाट

केतेक सहब केतेक कहब दुखक बात...।

 

हे ईश्वर फाटह धरती

दऽ दाए तीन हाथ परती

केतेक कठ काटि मरब

दऽ दाए ऐ तनसँ छुट्टी...।

 

मृत्‍यु भूवनमे तन तरपैए

करब भक्‍ति दिय शक्‍ति

करम-धरम देख-परेख कऽ

जनम-मरणसँ कऽ दाए मुक्‍ति...।

ऋृतुराज वसन्‍त

 

आएल ऋृतुराज वसन्‍त

सजि गेल चहुओर धरती

पुष्‍पकक पराग छिटैक गेल

मदमातल पवन झिलहैर खेले

मधुआएल महुआ महमह करैए

आमक मंज्जरसँ अमटोकी वौड़ाएल

भन-भन करैए सगरो मधुमाछी

कोइली कुहकैए मिश्री समान

फूलक रस पराग पीब कऽ

भ्रमरा गबैए वसन्‍तक गान

तीसी, सेरसो, मटरक फूलसँ

खेत सजल-ए दुल्‍हिन समान

हँसि चान नजैर लगबैए

छबि छटा धरतीकेँ देख

अचरजमे पड़ि गेल ऋृतुराज

पछिया पवन मस्‍ती मारैए

धूल उड़ि चढ़ि गेल आसमान

फॉगुक रंगमे तनमन रंगाएल

बुढ़बा, नवतुरिया फगुआ गबैए

रंग-अबीरमे सभ नहाएल

सभ साल अबैए नव उमंग लऽ कऽ

हरियर-पीअर मनोरथ पूर्ण

आएल ऋृतुराज वसन्‍त।

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