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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

कविप्रीतम कुमार निषादक

किछु कविता

हाय भूकम्प

माऽए गै बाप रौ सुनैत देखलौं

मचैत छल हड़कम्प

थड़ थड़ गूंजैत धरती हिलल

चिकरल जन भूकम्प

तन मन थड़ थड़ हमरो काँपल

डँरल दिल दिमाग।

नेना भुटका जनि पुरुखकेँ

देखल भागम-भाग।।

 

हमहूँ थकमक करैत सोची

हेहरि कत्त जाऊ।

जाँघो काँपैत थिर नहि होअए

कोन सहारा पाऊ।।

 

किछु मिनटेपर लोक हकमितें

सकपक्की संग बाजल

केक्कर घर गिड़लै बाजै ने

कालचक्र छल साजल।।

 

केओ कहथि जे हम्मर औरदा

नहिं छल एक्खन पूरल।

मृत्युकालकेँ मुँहसँ जेना

देह प्राण अछि धूड़ल।।

 

आइ शनिचरा ग्रह खेलैछल

देश विदेशमे सगरो।

अपने हाल व्यथामे हकमैत

सुइध कहाँ छल केकरो।।

 

बेरा-बेरी देखैत रहलौं

सभ मोबाइलमे भींड़ल।

घर-कुटुमैताक जिज्ञासामे

अपस्याँत टहलल फिड़ल।।

 

केओ बाजए सन चौंतीस ईस्वीसँ

भूकम्प छल बड़का।

कहए केओ फेर हिललै धरती

लगतै कत्तहुँ दड़क्का।।

 

बूढ़ पुरान कहथि हे बौआ

भागि कऽ कत्तऽ जएबह।

सभतरि एहनेहालबनल छै

नव बुइध कोन लएबह।।

 

दिन भरि गुनधुन भय आशंका

जनमन भेल हेहरू।

किछु नहिं फूरए अल्लाह ईश्वर

हे दैबा किछु करू।।

 

टीभी रेडियोक समाचार संग

जनजीवन भऽ गेल बेहाल।

अखबारोक सुर्खीमे दारूण

तहस-नहस देखल नेपाल।।

 

हिलल हिमालय केर हिम खण्डो

काठमाण्डूकेँ फूटल कपार।

तिब्बत चीन भूटान औ यूपी

काँपल रहि-रहि बंग-बिहार।।

 

एवरेस्टक पर्वत आरोही

बेस कैम्पमे चिकरि मरल।

हिम खण्डक चट्टान पिघलिते

पैघ प्रलयसँ रहय अड़ल।।

 

धरहारा मीनार नौ मंजिला

काठमाण्डूकेँ कुतुब मीनार।

गिरल धड़ाम ओ जमीन्दोज भऽ

झहुड़ा होइते लागल किनार।।

 

मन्दिर-मण्डप कोठा-सोफा

दरकैत गिरैत मलवा भेल।

मलवा संगे सैंकड़ो मुर्दा

प्रलय कालकेँ बलवा भेल।।

 

एहि घटना केर हाल बखानै

नासा केर वैज्ञानिकगण।

सात दशमलव नौ रिक्टर संग

घटना चक्रसँ सिसकए मन।।

 

भेल चौकन्ना विश्व मित्रजन

भारत अमरीका चीन सकल

रैस्क्यू ऑपरेशन रत भारत

देखा देलक सहयोग अकल।।

 

भू-वैज्ञानिक आंकि बतौलक

विमुख प्रकृतिकेँ देखल कोप।

मानव अपनेहि प्रलय पुकारल

तैं धमकए भूकम्प प्रकोप।।

 

प्रीतम गोहरए विश्वमान्यवर

ग्लोबल वॉर्मिंग हड़पैए।

आपदा-विपदा धरती कोइखसँ

भू-तापीय द्रव तड़पैए।।

¦

 

विकासक दम्भ

हम विकास कऽ रहल छी

मुदा ह्रास भऽ रहल अछि।

, विसंगतिकेँ मानय केँ

यश-अपयश के लऽ रहल अछि।

की..! हम अहिना विकास कऽ रहल छी?

सभ देखैछ कालचक्र

युग चापक प्रभावसँ

प्राकृतिक पराभव औ प्रभाव सेहो

आजुक पिछलग्गू जकाँ

सदिखन चटपटाएल, धड़फड़ाएल...

कखनों अलसाएल, तँ कखनो महुराएल...

हम्मर स्वार्थक बलैया लऽ रहल अछि।

, विसंगतिकेँ जानय के..?

यश-अपयश के? लऽ रहल अछि

की..? अहिना हम विकास कऽ रहल छी?

 

हम,  उसास कऽ रहल छी

मुदा खटास भऽ रहल अछि।

, विसंगतिकेँ मानय के?

उपकार-जनसेवा सिनेह आ मम्मत जानए के

आई-माई, मित्तिन सासुक, सम्मत मानए के

गोतनी सौतिन ननदि नटिनियाँ

देखि पड़ोसिन जरए डकिनियाँ

गौरवे आन्हर गृहिणी कनियाँ

उकटा पैंची सभ कऽ रहल अछि

की..? एहने हम विकास कऽ रहल छी..?

हम, उसास कऽ रहल छी

मुदा खग्रास भऽ रहल अछि..!

जहिना, चान-सुरुजक ग्रहणसँ

पसरल अन्हार

तहिना, अन्धविश्वासक चौपाइरमे

कहाली बनल परिवार

सरकारी संग्रहणक पंजीमे अछि दर्ज

ढोवैत, रोवैत रहए लोग जिनगी भरि कर्ज...

जाहिसँ फलय-फूलय...

छल-प्रपंचक राजनीति...

फूइस, पेंच, गलबैहिया धेने

गाम-घरमे रीत-कुरीति

ज्ञानक मन्दिर इसकुल जर्जर

दसगरजा घर सभटा गड़बर

जत्तय अन्हरा डिठरा बमकै

चतुर चलाको चुगला चमकै

दाँव-पेँच दोगलई केँ दलाली

औनी पथारी सभ दऽ रहल अछि

तैँ नेँ हम विकासक प्रयास कऽ रहल छी

मुदा सर्वग्रास भऽ रहल अछि

ई विसंगति केँ मानए के?

ई विसगतिकेँ जानए के?

कीऽऽऽ एहने हम विकास कऽ रहल छी?

जे सर्वग्रास औ ह्रास भऽ रहल अछि?

 

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