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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

नारायण यादवजीक

चारिटा लघु कथा-

चौदह नम्‍बर कोर्ट

रमेशक पढ़ाइ चलि रहल छल। बी.ए. पास कए बी-एड. कऽ रहल छला। बी-एड.क परीक्षा दऽ घर आएल छला। आगू पढ़ैक जिज्ञासा सेहो छैन्‍हें। रमेशक पिता किसान छैथ। हुनक आमदनी न्‍यून छैन। जेना-तेना घर-परिवारक काम-काज चलै छैन। पैघ खर्चा लेल जमीन-जाल बेचए पड़ै छैन। रमेशकेँ देखते पिता कहलखिन-

बौआ, परीक्षा केहेन भेलह। आब हम आगाँक पढ़ाइ हेतु खर्च केतए-सँ देबह। औरो धिया-पुता अछि। बेटीक बिआह आ दिनेशक पढ़ाइ कपारपर अछि। आब अहाँ केतौ नोकरी-चाकरी आकि कोनो नीक धन्‍धा करू जइसँ घरमे खुशहाली बनल रहत। घरक काम-काजमे आब अहाँक माए नइ सकै छैथ। तँए आब बिआहो कए लिअ जइसँ माइयोकेँ सुख भेटत आ हमहूँ प्रसन्न रहब। अही साल अखाढ़मे सभा गाछी चलू।

पिताक बात सुनि रमेशजी मौन छला। मौन स्‍वीकार लक्षणम्‍।

रमेशक बाबूजी रमेशक सहमति पाबि सौराठक सभा गाछी जाइक तैयारी करए लगला। सौराठ मधुबनीसँ पाँच-छह किलोमीटर उत्तर-पच्‍छिम कोणमे अछि। मिथिलाक पौराणिक परम्‍परा विचित्र अछि। मिथिला छोड़ि एहेन परम्‍परा केतौ नइ छइ। माल-जालक हाट जकाँ बरक हाट लगै छइ। बिआहक लेल बनि-ठनि कऽ बर सभा गाछी अबै छैथ।

कनियाँबला सेहो बरक खोजमे सभा गाछी पहुँचै छैथ। कनियागत बरक नाम, ठेकान, मूल, गोत्र आ योग्‍यतासँ अवगत भऽ पंजिकारसँ सम्‍पर्क करै छैथ। बर-कनियाँक मेल आ बरक सोभावसँ कनियागत आश्वास्‍त भेला बाद बिआहक चर्च करै छैथ। ई केतेक नीक बेवस्‍था मैथिली ब्राह्मण समाजक बीच अछि जे कनियागतकेँ बरक खोजमे घरे-घर, द्वारे-द्वार नहि जाए पड़ै छैन। ओना, किछु कनियागत दलालक फेरामे पड़ि ठकाइयो जाइत अछि।

 सभा गाछीमे एकटा पीपरक गाछ अछि, सुनै छिऐ जे जइ दिन एक लाख ब्राह्मणक जुटान सभा गाछीमे भऽ जाइत अछि ओइ दिन ओ पीपरक गाछ मौला जाइत अछि।

जे कनियागत स्‍थिर मने, धैर्यसँ छानबीन कए बरक चयन करै छैथ हुनका सफलता हाँसिल होइ छैन। शादी-बिआह बड़ सोचि-समैझ कऽ करक चाही। बुढ़-पुरानक कथन छैन जे हाड़-बियाही मांस नहि। परिवारक स्‍तम्‍भ नारीए होइ छइ। कुशल गृहणी घरकेँ स्‍वर्ग बना दैत अछि। बिनु घरनी घर भूतक डेरा आ अछि घरनी तँ लागत फेरा। तँए कन्‍याँक शील-सोभावक संग खनदान देखिए कऽ कथा-कुटुमैती ठीक करक चाही।

रमेशक बाबूजी गामक दू-चारि भल मानुषकेँ संग कए सभा गाछी पहुँचला। एक-दू दिन केतेक कन्‍यागतकेँ आपस केलैन। बर, पाँच-सात फीट नमगर, छरहरा बदन, गोर वर्ण बड़ सुन्‍दर भव्‍य शरीर। बरक अनुरूप कनिया चाही आ बरातीक स्‍वागत सत्‍कार सेहो खूब नीक जकाँ हेबाक चाही। तैसंग किछु दानो-दहेज गुप्‍त रूपे हेबाके चाही। ओना, ई बरक पिताक इच्‍छा रहिते अछि। तँए बुढ़-पुरान कहै छैथ जे सभ वरयाती कए मन? तँ ओकर जवाब होइत अछि- तीन मन। तीन मन ओजनमे नहि, तीनटा मन, एकटा लड़काक मन जे खूब नीक कनियाँ हुअए,दोसरमन बरक पिताक होइ छैन जे हमरा खूब दहेज भेटए आ तेसर मन बरियातीक होइ छैन जे बरियाती लोकैनकेँ खूब स्‍वागत-सत्‍कार हेबाक चाही।

एकटा पच्‍छिम तरफक कन्‍यागत हिनका लग जे बरक बापक दूरक सरोकारिये छेलैन- टकरेला। बर-कन्‍याँक विषयमे दुनू पक्षकेँ पहिनहिसँ जानकारी छेबे केलैन। बिआहक दिन-ठेकान तय भेल।

मैथिल लोकैन बड़ बुधियार होइ छैथ। बिआहक अन्‍तिम लग्‍नक आस-पास सभा गाछीमे सभा लगबै छैथ। आ धड़फड़मे एक्के-आध दिनक बीच बिआह ठीक करै छैथ। जइसँ ने कार्ड छपबए पड़ै छैन आ ने गाड़ी-घोड़ाक बेवस्‍था करए पड़ै छैन। पाँच-दसटा बराती लए कम खर्चमे बिआह कए लइ छैथ।

हमरा गाममे एकटा पण्‍डीजीक बेटीक शादी ठीक भेलैन। कनियागत पुछलकैन-

समैध बराती केतेक एबइ?”

बरक पिता कहलखिन-

बरियाती न्‍यूनतम तीन अंकमे रहत।

तैपर कन्‍यागत बजला-

हम नहि समैझ सकलौं!”

ताबत शीबू काका बजला-

नहि बुझलहक, तीन अंकक सभसँ छोट अंक भेल- 100 यानी एक साए बरियाती औता।

कन्‍यागत साए गोट बरियातीक बेवस्‍था केने छला। जखन बरियाती दरबज्‍जापर पहुँचला तँ मात्र एकटा मोटर गाड़ीमे बर लगा पाँचटा आदमी छल। ओना, बरक गिनती बरियातीमे नहि होइ छइ। तँए घरवारी पुछलखिन-

समैध, आरो गाड़ी सभ अछि किने?”

बरक पिता कहलखिन-

नहि समैध, मात्र चारिटा बराती छी।

ई बात सुनिते कन्‍याक पिता आगि-बबूला भऽ गेला। तामसे थरथराइत बजला-

अहाँ हमर सभ भोजनक सामग्रीकेँ बरबाद करेलौं। अहाँ कहनेरही जे हम एक साए बरियाती आएब। मुदा तैठाम चारिटा बरियाती एलौं अछि! कहू तँ हमरा सभकेँ बेइजत करा रहल छी किने।

बरक पिता बजला-

समैध, चारिटा बराती घरपर एला आ एकटा पुरंधर काका पौखैर महारपर उतैर गेला। ओ पर-पैखाना करि कऽ औता।

कन्‍यागत कुदैत बजला-

हमरा अहाँ बुड़िबक बनबै छी किने।

पुन: बरागत बजला-

समैध, बरातीमे निहालू बाबू। देखबू बाबू, शिबू बाबू, हम आ पुरन्‍धर काका छैथ।अहाँक एक्को चुटकी भोजनक कोनो सामग्री बर्बाद नहि होएत। सुनू नौ (9) नेहालू (17) सत्रह देबू, बारह-बारह हम शीबू जखन औता पुरन्‍धर काका लगौता पचासक धक्का। कहू सौ आदमीक पारस सधत कि नहि। अहाँक हम उपकारे केलौं जे 100 आदमीक विदाइक बदला मात्र पाँच आदमीकेँ देबए पड़त।

कन्‍यागत किछु नहि बजला।

रमेशक बिआह साधारणे पूर्वक भेल। आब पति आ पत्नी खुशी पूर्वक दामपत्‍य जीवन बिता रहल छला। किछु दिन सासुरेक रूपैआ-पैसासँ सुख-मौज करैत रहला। मुदा आब पत्नीक फरमाइशक पूर्ति नहि भऽ रहल छैन।

रमेश मने-मन सोचैथ जे केतौ जा कऽ कोनो नौकरी करी। रमेशक एक मित्र सुरेश छेलखिन। दुनू मित्र टाका-पैसा कमेबाक हेतु कलकत्ता जेबाक विचार केलैन। पिताक विचार सेहो छेलैन जे बेटा बाहरसँ किछु टाका-पैसा कमा कऽ घर लाबैथ। प्राय: सभ पिताक ई इच्‍छा रहिते छैन जे बेटा नौकरी करैथ, टाकाक उपार्जान करैथ आ घरकेँ खुशहाल बनाबैथ। 

रमेश आ महेश माए-बापसँ अनुमति लऽ कलकत्ता प्रस्‍थान केलैन। कलकत्ता कलपर अछि से ओ बुझैत छल। सेाहे आइ देख लेत। बरौनी होइत सिमरिया पूलपर पहुँचल। रमेश गंगा मैयाक मने-मन नमस्‍कार केलक। आ जेबीसँ किछु पैसा निकालि दुनू मित्र माँ गंगाकेँ चढ़ा देलक। आ माँ गंगासँ प्रार्थना करैत बाजल-

हे गंगा मैया, हम सभ जइ धारणासँ कलकत्ता जा रहल छी, से पूरा करब।

गाड़ी नियत समयपर कलकत्ता स्‍टेशन पहुँचल। ऐसँ पहिने दुनू मित्र घरसँ कहियो निकलल नहि छल। शुद्ध देहाती जकाँ दुनू गोरेक देह-दशा आ बगे-वाणि रहइ। धोती-कुर्त्ता आ ललाटपर चानन मिथिलाक पहचान छल। कलकत्ता पहुँच ओ सभ अपने गौंआँ-घरूआसँ भेँट केलक। गाम-घरक लोक सभ अपना गौंआँ-घरूआकेँ बड़ आगत-भागत करैत अछि जे भेलैन। खूब स्‍वादिष्‍ट भोजन आ सम्‍पूर्ण कलकत्ताक भ्रमण, महत्‍वपूर्ण स्‍थानक दर्शन करौलकै।

रमेश आ सुरेशक मेहमानी गौंआँ-घरूआक ओइठाम चलए लगलै। ऐ तरहेँ दस-बारह दिन बित गेल। दुनू मित्रकेँ मन लागए लगलै। एक दिन दुनू मित्र सबेरे उठला। स्‍ना-धियान आ भोजन कए बजार दिस विदा भेला। बाट गली जकाँ छल। ई बाट गली होइत आगाँ मेन रोडमे मिलैत छेलइ। जाइतकाल रमेशकेँ लघी लागि गेलैन। लघीक संवेदना विचित्र होइते अछि। जखन एक संगीकेँ लघी लगै छै तँ संगमे जे मित्र रहल हुनको लघी लागिये जाइत अछि। सुरेश सेहो एकटा नालीमे लघी करए लगला। लघी समाप्‍तो ने भेल छल कि पाछूमे दूटा बंगाली पुलिस ठाढ़ देखलक। जी तँ उड़ि गेलइ।

तैबीच पुलिस बाजल-

आप इस गलीमे क्‍यों पेशाव किये हैं। बगलमे पेशावखाना बना हुआ है। वहाँ क्‍यों नहीं पेशाव किये। गली को प्रदूषित करने के जूर्म में आप दोनों को गिरफ्तार किया जाता है।

दुनू मित्र अचम्‍भित भऽ गेला। बंगाली पुलिसक सामने बड़ गिरगिरेलाह। किछु रूपैआ-पैसाक प्रलोभन सेहो देलैन। मुदा बिहार पुलिस जकाँ बंगालक पुलिस नहि छल। ओ रमेशआ सुरेशकेँ डाटि-टपैट देलक।आ बाजल-

बिहार से आये हो?”

दुनू गोरे एक्के बेर बाजल-

जी हुजुर, बिहारसँ आएल छी।

ओ सभ सोचलैन जे घूसखोरीमे बिहार केतेक बदनाम अछि जँ बिहार रहैत तँ जरूर छोड़ि दइत। 

दुनू गोरेकेँ पकड़ने पुलिस थानापर लऽ गेल। दुनूकेँ देखते थाना प्रभारी बजला-

आप लोग पाँच-पाँच रूपैआ जमा कीजिए।

सुनिते दुनू मित्रकेँ मन बड़ खुशी भेलैन। जे पाँचे रूपैआमे जान छुटि गेल।

पँच-पँचटा रूपैआ दुनू मित्र जेबीसँ निकालि दरोगाकेँ देलैन।

दरोगा एकटा रसीदक संग एकटा फार्म सेहो भरि कऽ दैत दुनूकेँ कहलक-

ये सभ कागजात 14 नम्‍बर कोर्टमे मजिस्‍ट्रेट को दे दीजिएगा। वहाँ केश दायर हो जाएगा। आप लोग भागियेगा नहीं। नहीं तो फेरा में पड़ जाइयेगा। और वारण्‍ट हो जाएगा।

थानापर सँ दुनू मित्र उदास मने विदा भेला। कागजात सेरिया कऽ रखलैन। रातिमे डेरापर एला। भरि राति निन्न नहि भेलैन। भोरे उठि स्‍नान-भोजन कए दस बजे कचहरी दिस विदा भेला। लाजे कोनो गौंआँ-घरूआकेँ ई बात नहि कहलखिन। ट्रामसँ कचहरी पहुँचला। कचहरीक दृश्‍य देख आश्चर्यचकित भऽ गेला। एहेन सुन्‍दर आ एतेक मोट-मोट पायाबला मकान कहियो ने देखने। किछु काल धरि रमेश आ सुरेश मकानक भव्‍यता आ लोकक चहल-पहलकेँ देखैत रहला। तेकर बाद चौदह नम्‍बर कोर्टकेँ ताकए लगला। तकैत-तकैत लोगो सभसँ पुछैत-पुछैत आगाँबला मकान तक पहुँचला। ओतए एकटा दफ्तरक आगाँबला मकान तक पहुँचला।

दफ्तरक आगाँ किछु लोक चटाइपर बैसल छल। चटाइपर बैसल बेकती सभसँ पुछलैन-

यौ 14 नम्‍बर कोर्ट यएह छिऐ?”

मुंशी जे चटाइपर बैस किछु लिख रहल छला। साकांच भऽ गेला। आ ओइ दुनू मित्रकेँ शोर पाड़लैन।

रमेश आ सुरेश मुंशीक ओतए पहुँचला। मुंशी पुछलखिन-

आप लोग मोर्डन एपार्टमेन्‍ट गली में पेशाव कर दिऐ हैं।

दुनू गोरे एक्के बेर बजला-

हँ यौ।

रमेशजी दरोगाक द्वारा देल कागज निकालि कऽ मुंशीजीक हाथमे थमा देलैन।

मुंशीजी बजला-

तीन-तीन रूपैआ लाइए।

मुंशीजी केँ तीन-तीन गोट टाका निकालि दुनू मित्र देलैन। मुंशीजी दूटा फार्म निकालि दुनूपर किछु लिख रमेश आ सुरेशसँ हस्‍ताक्षर करा कोर्टक अन्‍दर जा कऽ पेशकारकेँ सभ कागजात दए देलखिन। आ बाहर आबि रमेशकेँ कहलैन-

आप लोग यहीं बैठिये। 2 बजे कोर्टकेँ अन्‍दर चले जाइयेगा। यहाँ कोई आप लोगोको बुलाएगा नहीं।

दू बजेक इन्‍तजार करैत दुनू मित्र बैसल रहला। जखन दू बाजल तँ दुनू गोरे कोर्टक अन्‍दर प्रवेश केलक।

कोर्टमे मजिस्‍ट्रेट बैसल छला। पेशकार इजलासक निच्‍चाँ एकटा कुर्सीपर बैसल आगाँ टेबुलपर किछु संचिका सभकेँ उलट-फेर करैत छला। ओही समैमे रमेश मुंशीक द्वारा देल कागजात पेशकारक आगाँमे राखि देलैन।

पेशकार हिनकर कागज साहैबकेँ बढ़ा देलखिन। साहैब कागजकेँ उलटा-पुलटा कऽ पढ़ि बजला-

आप लोग मोर्डन आपार्टमेन्‍ट गलीमे पेशाब कर दिऐ थे?”

दुनू मित्र अपन-अपन हाथ जोड़ि बजला-

जी सरकार! हम लोगों से गलती हो गई। अब से इस तरह की गलती नहीं होगी।

मजिस्‍ट्रेट साहैब सहृदय बेकती छला। ओ पुछलखिन-

आप लोग बिहार से आये हैं?”

रमेशक मुहसँ निकलल-

जी सर।

साहैब बजला-

आप लोग आठवें दिन आइयेगा आपका मुकदमा खत्‍म कर देंगे।

रमेशक मुहसँ एकाएक बजा गेल-

कलका रिजर्भेशन है। घर जाना है।

मजिस्‍ट्रेट साहैब दयालू सोभावक छला। पुछलखिन-

बिहार में आप लोगों का घर कहाँ पड़ता है?”

रमेश कहलखिन-

मधुबनी जिला, सर।

साहैब बजला-

जहाँ सौराठ सभा लगता है?”

रमेश कहलकैन-

जी सर।

मुड़ी डोलबैत मजिस्‍ट्रेट साहैब पेशकारकेँ कहलखिन-

पेशकार साहेब, ऑर्डर सीट तैयार कीजिए।

कहि, मजिस्‍ट्रेट साहैब फाइलपर किछु लिखए लगला। आ पेशकार साहैब ऑडर सीट तैयार कऽ मजिस्‍ट्रेट साहैबक टेबुलपर देलखिन।

साहैब, रमेश आ सुरेशकेँ ऐ मुकदमासँ रिहा करैत बजला-

आप दोनों व्‍यक्‍ति ये ऑर्डर लेकर थानापर दे देंगे तथा पाँच-पाँच रूपये जो जमा किये हैं, ओ ले लेंगे।

रमेश आ सुरेश थानापर आबि दरोगाकेँ मजिस्‍ट्रेट साहैबबला कागज देलकैन।

दरोगा दुनू बेकतीकेँ पँच-पँच टाका जे बॉण्‍डबला छल से आपस दए देलैन।

दुनू गोरे सोचए लगला जे कोन फेरामे भगवान हमरा लोकैनकेँ दऽ देलैन।

शब्‍द संख्‍या : 1723

 

चौरचनक बरतन

अन्‍धराक हाट शुक्र आ सोम दिन लगैत अछि। वरस्‍पैत दिन चौरचन पावैन छिऐ। इलाकाक लोक सभ पावैन-ले माटिक घैला,मटकुरी, लावन, दीप आ छाँछी कीनैक जोगारमे अछि। चौरचनक धार्मिक मान्‍यता जे होइ ई जानकारी दाइ-माइ लोकैनकेँ होनि वा नहि होनि मुदा बहुत ताम-झामक संग ऐ पावैनकेँ मनौल जाइत छइ।

सुवंश बाबू घरसँ बाहर निकलला। हिनका घरक आगॉंमे एकटा यादवजीक घर छैन। सुवंश बाबू यादवजी केँ कहलैन-

यौ जेठरैयति, चलू हाट चौरचनक बरतन आनए।

दुनू गोरे संगतुरिया छैथ। दुनूमे भजार लागल अछि। दुनू भजार हाट दिस विदा भेला। भरि बाट आन घरक जनानी सबहक किरदानीपर गप-सप्‍प करैत ससैर रहल छला। सुवंश बाबू बजला-

यौ भजार, आइ-काल्‍हिक कनियाँ-बहुरिया केकरो लाज-धाक थोड़े मानैत अछि। देखियौ ने हमर पश्‍टनवाली कनियाँ अपन स्‍वामीसँ सबहक सोझेँमे खूब बतियाइत रहैत छइ। कहू! हमरा सबहक बिआह-दुरागमन भेल। दूटा बाल-बच्‍चा भेल तैयो ने दोसरक सामने घरवाली हमरासँ बाजल हेती। बतियाइत अछि ओ सभ आ लाज होइए हमरा।

जेठरैयति बजला-

की करबै! देश दुनियाँक हालत देखिए रहल छी। ऐ समैमे कनी अपने आँखि मुनि लेब नीक। की कहूँ हमर पुतोहु हमरा लग आबि बाबूजी-बाबूजी करैत रहैत अछि आ बेटाक शिकायत करैत रहैत अछि। ने माथपर नुआँ रखैत अछि आ ने बदनपर कपड़ा। हम तँ लाजे कठौत बनल रहै छी। जेना हमर बेटी रहए तहिना करैत रहैत अछि। की कहूँ, बेटो ने एक्को बेर डाँटै-डपटै छइ। आनो बेकतीक लाज-धाक नइ होइ छइ।

दुनू भजार गप-सप्‍प करैत अन्‍हरा हाट पहुँचला।

हाटपर चौरचन पावनिक सभ समान कीनिलैथ। दूटा घैला सुवंश बाबू कीनलैथ आ एकटा जेठरैयति। दुनू भजार बात-चीत करैत पुन: हाटसँ घर दिस विदा भेला। गाम अबैसँ पहिनहि जेठरैयति मजाक करैत सुवंश बाबूकेँ कहलखिन-

यौ भजार, हमरा हाथमे एकटा घैल आ अहाँ हाथमे दूटा। ई अहाँकेँ नीक लगैत अछि?”

ई गप सुनिते सुवंश बाबू एकटा घैलकेँ जोरसँ पटैक देलखिन आ कहलखिन-

लिअ आब दुनू भजारकेँ एक-एकटा घैल रहल ने।

शब्‍द संख्‍या : 301


 

 

 


 

छोटकी पुतोहु

आनन्‍दक बिआह बड़ धूम-धामसँ भेल छल। कनियाँ अति सुन्नैर, तँए दानो-दहेज कमे भेटल छेलैन। आनन्‍दक पिताश्रीक घोषणा छल-

कद ऊँची, नाक लम्‍बी और रंग गोरी तो आओ, नहीं तो बाहर जाओ।

अही अधारपर कनियाँक चुनाव भेल छल। कनियाँक आगत-भागतमे आनन्‍दक माए राधादेवी परेशान छेली। मनमे होइत रहैन जे पुतोहु औत तँ काम-काजमे मदैत करत। सेवा सुश्रुषा करत। भानस-भात करत। माल-जालक नेकरम सेहो करत। बाधसँ आएब तँ एक लोटा पानि लाबत आ बिऐन हौंकैत...। आदि-आदि सभ टहल-टिकोरा करत...। 

आइ आनन्‍दक माए राधा देवी बड़ खुश छैथ। खुश ऐ लेल नहि जे आनन्‍द कनियाँ लए कऽ आबि रहल छैथ, खुश ऐ लेल जे आनन्‍द बिआह करैले तैयारे नहि भऽ रहल छल। बिआहोक उमर होइ छइ। उमर टुटल जा रहल छेलइ। ओ बिआह नइ करबाक हेतु अनेको बहाना बना रहल छल। कहैत छल ऐगला साल करब, आ जब ऐगला साल आएल तँ फेर ऐगला सालक बहाना करैत रहै छल। राधाक आग्रहपर बिआहक लेल तैयार भेल छल।

ओ दिन आबि गेल जखन आनन्‍द अपन पत्नीकेँ अपना घर अनलक। मोटर गाड़ीक अबाज सुनिते अड़ोस-पड़ोसक दाइ-माइ लोकैन सभ अपन काम-काज छोड़ि-छोड़ि कनियाँ देखए आबए लगली। ननौरवाली सागमे सँ अटकी-मटकी बीछि रहल छेली। ओहो सभ किछु छोड़ि दौगल एली।

लौफावाली बच्‍चाकेँ दूध पियाबैत छेलीसे बच्‍चाकेँ नेनहि दौगली। हर्ड़ीवाली आ ठाढ़ीवालीकेँ आमक टुकला लेल झगड़ा होइत रहै, ओहो दुनू गोरे झगड़ा छोड़ि कनियाँ देखए लफरल विदा भेली। राधा बरतन माजै छेली। बरतन माजब छोड़ि कनियाँक परिछण हेतु सामग्री ओरियाबए लगली। सभ दाइ-माइ जमा भऽ गेली। माथपर दौरा जइमे दीप जरैत छेलै, लय भरैत बन्‍हने गीत गबैत मोटर गाड़ी लग, पहुँचली। गीतक बोल छल-

एलै शुभ-के लगनमा शुभे हे शुभे...।

पाँच-सात गोट सधवा मौगी सभ कनियाँक परिछण केलक। तेकर बाद कनियाँक ननैद रूपम दाइ कनियाँ-बरकेँ आँगन लए गेल। जेतेक दाइ-माइ लोकैन आएल छेली ओ सभ अपन-अपन घर दिस विदा भेली।

बाटमे कनियाँक टिका-टिपण्णी हुअ लगल। सिसवारिवाली काकी जे सभसँ बुजुर्ग छेली ओ बजली-

गे दाइ, आइ तक एहेन कनियाँ नइ देखने रही। देखही ने केकरो देख कऽ माथो झँपलकै। हमर पुतोहु एहेन रहैत ने तँ छाउर लगा कऽ जी खींच लैतिऐ। कहू तँ ससुरोक लाज केलकै।

नवानीवाली बजली-

एतेकटा कहीं मौगी होइ छइ..!”

तैपर भेजावाली बजली-

पीठ केहेन चाकर-चौरस छै, जेना सुकदेव पहलमान होइ!”

गुलछर्रा छोड़ैत सभ अपन-अपन घर गेल। राधा भनसा घरमे जा बेटा-पुतोहुक लेल खूब नीक तीमन-तरकारी बनौलक। पापड़, तिलौरी, तिलकोरक तरूआ थारीमे सजा बेटा आनन्‍द आ पुतोहु सुलेखा लेल ओकरा कोठलीमे पहुँचली।

माएकेँ देखते आनन्‍द बाजल-

माए, अखन आठो नहि बाजल अछि आ तूँ खेनाइ लऽ कऽ आबि गेलेँ।

राधा बजली-

हँ बेटा,कनियाँ जे आएल अछि। नहि जानि कनियाँ कखन भोजन केने हेती।

बजैत राधा टेबुलपर थारी राखि चापाकलपर सँ एक लोटा जल आ एकटा गिलास सेहो आनि कऽ टेबुलपर राखि देलक।

आनन्‍द आ ओकर पत्नी सुलेखा दुनू गोरे भोजन करए लागल। सुलेखा बजली-

भोजन के बनौलक अछि।

आनन्‍द कहलकै-

भोजन माँ बनेने हेती।

सुलेखा बजली-

खाना बनबैले नौकरानी नहि रखने छी। हमरा ओतए तँ आँगनक लेल एकटा नौकरानी आ दरबज्‍जा परहक लेल एकटा नौकर अछि।

आनन्‍द आ सुलेखा भोजन करए लागल।

राधा बीच-बीचमे आबि परसन दए दैत रहथिन। भोजन समाप्‍त भेल। राधा आँठि फेरि एक जग पानि आ एकटा गिलास आनि टेबुलपर राखि गेली। 

आनन्‍द आ सुलेखा पूरब-पच्‍छिमक गप-सप्‍प करैत कखन सुतली से राधा नहि बुझि सकली।

राधा भोरे उठि अँगना-दरबज्‍जामे झाड़ू लगौलक। घर आ आँगनमे फिनाइलबला पानिसँ पोछा लगौलक, तेकर बाद रसोइ घरमे जा सभ बरतन सभ साफ केलक। चाह बनौलक। दू कप चाह पहिने सुलेखा आ आनन्‍दक हेतु छनलक। दू कप चाह लऽ कऽ आनन्‍दक कोठरीक दरबज्‍जा खटखटेलक आ बाजल-

बेटा आनन्‍द, उठू। देखू सुरूज भगवान निकैल गेल छैथ। चाह पीब लीअ तखन सुतब।

दरबाजा खुजल राधा चाहक ट्रे टेबुलपर राखि बाहर आबि गेली। एक कप चाह अपन बेटी रूपम लेल आ एक कप चाह अपने वास्‍ते लए पीअ लगली।

आनन्‍द आ सुलेखा सेहो चाह पीबैत रहैथ। सुलेखा रौतुका भोजनक आ अखुनका चाह प्रशंसा करैत बजली-

आनन्‍दजी, अहाँक माए अनमोल रत्न छैथ। हिनका हाथक चाह आ भोजन तँ मुहोँसँ नहि छुटैत अछि।

आनन्‍दजी बजला-

सुलेखा, माएकेँ सभ लूरि छइ। एकटा बेटी छइ। देखियौ ने ओकरो सभ लूरि सिखा देने अछि। हमरा बहिनकेँ कोन लूरि ने अछि। ई सभटा माइक देन अछि।

ताबत चाहक चुस्‍की लैत रूपम भौजीक कोठरीमे प्रवेश केली आ बजली-

भौजी, हमर चर्चा किए करै छी।

सुलेखा ऐंठैत बजली-

हम अहाँक चर्चा किएक करब। अहाँक भाइये अहाँक चर्चा करैत अछि।

आनन्‍दजी बजला-

बहिन, कनी भौजीकेँ अपन लूरि सभ सीखा दहीन।

भौजी चद-दे बजली-

हमरा कोन लूरि नइ अछि।  जे हम अहाँक बहिनसँ लूरि सिखब। ओ अपन लूरि अपने लग रखथु।

रूपम अपन भौजीक हाव-भाव, बात-विचार आ अहंकारकेँ भाँपि चुकल छल। ओ चाह पीबैत अपना कोठरीमे चलि गेली।

आनन्‍द अपन खेती-पथारीकेँ देखैले बाध-बोन जाए लगला। राधा जन-बोनिहारक जलखै लए खेतपर पहुँचाबए लगली। राधा ओमहरसँ माल-मवेशीक लेल एक पथिया घासो नेने अबैत छेली। राधाकेँ मनमे होइत रहैत छल जे पुतोहु खाना बना कऽ रखने हेती। मुदा पुतोहु तँ जलखै कए जे सुतै छेली से सासुकेँ बाधसँ एलाक बाद आ भोजन बनलाक बादे उठै छेली। उठि स्‍नान कए अपनेसँ खाना परैस बिनु केकरो खुऔनहि अपने खा कए पुन: कोठरीमे बन्‍द भऽ जाइत छेली।

ऐ तरहेँ बहुतो दिन बीति गेल मुदा सुलेखामे कोनो सुधार नहि भऽ सकल। कएक बेर आनन्‍दो कहि कऽ थाकि गेल छला। सुलेखा घरक वातावरणकेँ बिगारए लागल। सासु-पुतोहुमे मन-मुटाव बढ़ि गेल। राधाक मनमे भेल छलैन जे पुतोहु औत। सेवा करत। कपड़ा-लत्ता साफ करत। मुदा सभ मनोरथ...। सेवा केनाइ तँ दूर जे प्रेमसँ बातो नहि करैत छेलैन। 

राधा भोरे उठि सभ घर-दुआरकेँ झाड़ूसँ साफ कए पोछा लगा मवेशीक लेल चारा लाबए चल गेल। जखन ओ बाधसँ आबैथ तँ सुलेखाकेँ सुतले देखलैन। मन तँ घोर भऽ गेलैन। मनमे ई आशा लागल रहैत छेलैन जे घर जाएब तँ सुलेखा एक लोटा पानि आनि आगाँमे देती। बिऐन डोलेती। मुदा एकोटा मनोरथ पूर नहि भेल।

पुतोहुकेँ सुतल देख राधा अपनेसँ चापाकलपर जा हाथ-पएर धोलैन। रसोइ घर खोलि नाश्‍ता परोसि कए हवामे बैस नाश्‍ता कए लैत छेली। राधा सुलेखाक खातिरदारी करैत-करैत उबि चुकल छेली। बिना किछु बजनहि। किछु ठंढ़ाइत फेर भनसा घर खोलि भानस करए लगली। मुदा सुलेखा सुतले रहली।

राधा मनमे सोचै छेली जे बेटा खेतसँ आएत आ भोजन समयपर नहि भेटतै तँ सुलेखाकेँ गारि-फज्‍झैत करत। आइ बेटासँ शिकायत करबाक उचित मौका देख रहल छल। तँए सुलेखाकेँ सुतले छोड़ि देलक।

सुलेखाक नीन अचानक टुटि गेल।ओ धड़फड़ाइत भनसा घर गेली। ओतए देखलैन जे सासु भनसा बना रहली अछि। सुलेखा बजली-

चुल्‍हा लगसँ हटथिन ने हम भानस कऽ लइ छी।

राधा चुल्‍हा लगसँ नहि उठली। सुलेखा मुँह बिजकबैत अपना कोठरीमे जा सुति रहली।

आनन्‍द खेतमे काम-काजकेँ सलटिया जखन कलौ बेरमे घर एला तँ देखै छैथ माए खाना बना रहल अछि आ सुलेखा अपना कोठरीमे सुतल अछि। माएसँ पुछलखिन-

माए, भानस तूँ बना रहल छेँ! सुलेखाकेँ किछु भऽ गेलैहेँ की?”

राधा अपन बेटाक मुहसँ ई बात सुनिते तमशाएल मुद्रामे बाजल-

कनियाँकेँ की हेतइ। हम तँ तोरा सबहक नौकरानी छीहे।

आनन्‍द तामसे सुलेखाकेँ उठौलक आ ओकरा गाड़ि-फज्‍झैत करए लागल। सुलेखा मानएवाली नहि। ओहो आनन्‍दक तेरहो-पुरखाकेँ उकटए लगल।

आनन्‍द खेतसँ गरमाएल आएले छल, तमसाएल छलाहे सुलेखाकेँ एक-दू थप्‍पर लगा देलक। आब तँ सुलेखा जोर-जोरसँ कानए लगली।

कानब सुनि अड़ोसिया-पड़ोसिया जमा भऽ गेल। राधो भनसा घरसँ दौगल एली। आ बेटाकेँ डॉंट-फटकार देबए लगली। आनन्‍दकेँ हाथ पकैड़ कोठरीसँ बाहर केली। आ सुलेखाकेँ बोधए लगली।

पुतोहु पैघ बापक बेटी तँए ओ केकरो ताना-बाना सहएवाली नहि छेली। राधोकेँ गाड़ि-फज्‍झैत करए लगली। बात दिनानुदिन तनाव आ अशान्‍तिक तरफ बढ़ए लगल। सुलेखा दू दिनसँ किछु ने खेने छेली।

राधाक काम-काज बढ़ि गेल। आब तँ आनन्‍द आ आनन्‍दक माइयो परेशान रहए लागल। दुनूकेँ डर होमए लगलैन जे कहीं आत्‍महत्‍या ने करि लिअए। केतेक बुझैला-सुझेलासँ आ घटनाक जिम्‍मेदारी अपना ऊपरमे लए दुनू माय-पुत गलती सुलेखासँ मानलक, तखन सुलेखा जे दू दिनसँ भूखल-पियासल छल। दतमैन केलैन आ मुँह धोलैन। आ पछाइत भोजन केली।

राधा हारि मानि सभ कार्य पूर्ववते करैत रहल। धीरे-धीरे दुनू पति-पत्नीमे मिलान भेलइ। आनन्‍द बाजल-

सुलेखा सभ माइ-बापक इच्‍छा होइ छैन जे पुतोहु घरक काम-धन्‍धाकेँ देखैथ आ सासु-ससुरक सेवा करैथ।

आनन्‍दक एतेक बजनाइयो समाप्‍त नहि भेल छल कि बिच्‍चेमे सुलेखा बाजि उठल-

हम अहाँ-सबहक नौकरानी बनि नहि आएल छी। हमर बाप केहेन छला जे हमरा एकटा भिखमंगा ओतए बियाहि देलक।

कहैत सुलेखा कानए लगली।

सुलेखा धनिक घरक बेटी। कहियो भानस केनाइ तँ दूर जे अपन कपड़ो नहि साफ करैत छल। ऐ प्रकारे ओ अपन मर्जीसँ काम-काज करैत छल।

राधाक इच्‍छा छल जे पुतोहु हमरासँ पुछैथ जे खानामे की सभ बनेबाक अछि। केतेक चाउर, केतेक दालि... इत्‍यादि इत्‍यादि। मुदा सुलेखा अपन मर्जीसँ कोनो काज करैत छल। अपना मन मोताबिक रसोइ बनबैत छल। ओ खाना दोसरकेँ पसिन होइ अथबा नहि।

एक दिनक बात छी। सुलेखा तरूआ छानि रहल छल। ई देख राधा बाजल-

छानि कऽ खेबाक छह तँ बापकेँ कहक जे एक टीन तेल भेज देतह।

ऐपर सुलेखा जवाब देलक-

हिनकर बाप कहियो एक किलो तेल भेज देने छेलैन।

राधा सुलेखाक जवाब सुनि तिलमिला कऽ रहि गेली।

ऐ प्रकारे सासु आ पुतोहुमे कोनो-कोनो छोटो-छोटो बातपर कखनो बहसवाजी शुरू भऽ जाइत छल।

राधा अपन मन मसोइस कऽ रहि जाइ छेली। कामकाजु राधा दिन-प्रति-दिन चिड़चिड़ा सोभावक होबए लागल। ओना, एहेन बात नहि छल जे आनन्‍द अपना पत्नी सुलेखाकेँ नहि समझाबैत छल। परन्‍तु सुलेखा अपना सामने केकरो मोजरे ने दैत दल। एवम्‍ प्रकारेण पति-पत्नीमे सेहो मन-मुटाव बढ़ि गेल।

सुलेखा अपना परिवारकेँ नरक बना देने छल। सुलेखा रूपवती छल तँए दहेजोमे छूट भेल छल। ओकरा अपन सुन्‍दरता आ बापक सम्‍पैतपर घमण्‍ड छेलैन। ओ अपनाकेँ घरक मालकिन आ अन्‍य सदस्‍यकेँ नौकर बुझैत छल।

राधा टुटि चुकल छल। एक तँ काम-काजक बोझ, दोसर छोटो-छोटो बातक लेल हर-हर खट-खट होइत छल।

एमहर दोसर बेटा सुरेश प्रतियोगिता परीक्षामे दिन-राति लागल रहैत छल। बी.एड. पास कए चुकल छल। टीईटी परीक्षामे सेहो नीक अंक आएल रहइ। तँए ओ शिक्षक भऽ गेल छल। मुदा सुरेश अपना घरमे जेठ भाइक पत्‍नी जे बड़का घरक बेटी छल, ओकर किरदानी देख नेने छल। तँए हेतुए ओ सोचैत छल जे हम कोनो मध्‍यम वर्गक परिवारक लड़कीसँ शादी करब। लड़कीक शील-सोभाव नीक होइ। काजुल होइ। घरक काज-करैमे निपुण होइ। ओहन गुणवाली लड़कीसँ शादी करबाक सोचमे छल।

सुरेशक पिताजी आब बुढ़ भऽ गेल छला। ओ जेठकी पुतोहुक बेवहारसँ एतेक ने आहत भऽ गेल छला जे ब्‍लड-प्रेसरक शिकार भऽ गेला। सुरेशक माएकेँ जेतेक प्रसन्नता जेठका बेटाक बिआह करैमे छल तेतेक सुरेशक बिआहमे नहि। ओ गोनू झाक बिलाड़ि जकॉं पाकि चुकल छेली। तँए छोटका बेटाक बिआहक चर्चो नइ करै छेली। आ राधाकेँ कोनो विशेष जिज्ञासो नहियेँ छल।

संयोगवश भवानी प्रसादजी अपन बेटी रोशनीक रिश्‍ता लऽ कऽ एला। सुरेश पहिनहिसँ ओइ परिवारकेँ जनैत छल। भवानी प्रसादक पुत्र सुरेशक संगी छल। तँए सुरेश भवानी प्रसादक ओइठाम जाइत-अबैत छल। रोशनीक शील-सोभावसँ सुरेश तेतेक ने प्रभावित छल जे एको बेर नाकर-नुकर नहि केलक। रिश्‍ताक मंजूरी दए देलक।

दुनू परिवार स्‍वजातीय  छल। अन्‍तरजातीय विवाहसँ ओ घृणा करैत छल।

एमर राधाकेँ कोनो उत्‍सुकता आ प्रसन्नता नहि छल। ओ मने-मन सोचैत छल बड़की पुतोहु तँ सभ गुर गोबर काइये देलक। आब ई की करत ओ भगवान जानैथ...। 

सुरेशक बिआह भेल। बर-कनियाँ घर आएल। राधाक मन टुटल छल तँए ओ परिछनोमे नहि गेल। लाचार भऽ दियादिनी सुलेखा बर-कनियाँक परिछण कए घर लौलक। राधा तवियत खरापक बहाना केने छेली।

रोशनीकेँ जखन पता लागल जे सासु माँ बीमार छैथ तँ ओ कोहबर घरसँ निकैल सासुक कमरामे गेल आ पहिने राधाक पएर छुबि प्रणाम केलक। आ पुछलक-

माँ, तबियत ठीक अछि की नहि।

एकाएक नबकी पुतोहुकेँ देख राधा लजा गेली। उठि कऽ बैसैत बजली-

कनियाँ, माथमे दर्द भऽ रहल अछि।

रोशनी तुरन्‍ते भिक्‍स लए सासुक माथमे लगौलक। आ किछु काल धरि पएरकेँ सेहो दबलक।

आइ बड़ फुर्तीसँ सुलेखा खूब नीक जकाँ भानस-भात कए रोशनीकेँ भोजन परोसि खेबाक लेल दैत बाजल-

कनियाँ, खाना खा लीअ, कखन खेने हएब कखन नहि।

रोशनी बजली-

जखन सासु माँ भोजन करती तेकर बादे हम भोजन करब।

तैपर सुलेखा बजली-

माँक तबियत खराप छैन, जखन इच्‍छा हेतैन खा लेती।

रोशनी अपन खाना लए खुद सासु माँक कमरामे गेली आ एक कौर भात दालिमे मिला हाथमे लए बजली-

माँ, छोटकी पुतोहुक हाथसँ एक कौर खाना खाथु।

कहैत हाथ सासु माँक मुँहमे देलक।

राधाक एक कौर भातसँ सभ दुख दूर भऽ गेल। भोजन करैत कहलक-

बेटी, जाउ अहूँ भोजन कए लीअ।

नहि माँ जाबत अहाँ नहि खाएब ताबत हमहूँ नहि भोजन करब। 

राधा छोटकी पुतोहुक जिद्दकेँ नहि टारि सकल। राधा भरि पेट भोजन केलक। राधाक खाना खेलाक बाद रोशनी आँठि फेरि कोठरीसँ बाहर भेल।

पछाइत सुलेखा आ रोशनी माने दुनू दियादिनी संग-संग भोजन केलक। भोजन केला बाद सुलेखा सुतबाक लेल अपना कोठरीमे चल गेल। आ रोशनी एक लोटा पानि लए सासु माँक कोठरीमे जा राखि देलक आ सासु-माँक पएर दबाबए लगल।

राधा जखन बाजल-

जाउ कनियाँ, अहाँक आइ पहिल दिन अछि, थाकल ठेहियाएल हएब। अराम करू गे।

तखन रोशनी सासु-माँकेँ बिछौन झारि मशहरी लगा कए अपन कोठरीमे आराम करक लेल चल गेली।

राधा मने-मन रोशनीकेँ असिरवाद दऽ रहल छल। आ सोचैत छल। भविसमे जे हुअए मुदा अखन तँ अबैत देरी एतेक खातिरदारी तँ केलक। राधा छोटकी पुतोहुक परिछणमे नइ गेली तेकर आब पश्चाताप हुअ लागल छैन। रोशनी साक्षात देवी छैथ जे हमरा घरकेँ स्‍वर्ग बनौत...। यएह सभ सोचैत-विचारैत राधा कखन सुति रहली से नहि जाइन। 

रोशनी आ राधाक बीच जे क्रियाकलाप होइत छल से सुलेखा देखैत रहल। सुलेखा अपन सासु-माँक अदखोइ-बदखोइ रोशनीकेँ सुनाबए लगली। रोशनी सुलेखाक कोनो बातक जवाब नहि दइ छेलखिन।

रोशनीकेँ अपन बिआहक पूर्वहिसँ सुलेखाक किरदानी सुरेशक माध्‍यमसँ बुझल रहैन। भोरे रोशनी उठि झाड़ू लऽ कऽ घर-आँगनकेँ बाहरए-सोहरए लगली। फरीच नहि भेलाक कारणे जखन सुलेखा अँगना बहारैत देखलक तँ ओकरा पहिने भेलैन जे राधाआन दिनुका जकाँ आँगनमे झाड़ू लगा रहल अछि। मुदा जखन आगॉं बढ़ल तँ रोशनीकेँ बाढ़ैन लगबैत देखलक तँ आश्चर्यचकित होइत बाजल-

कनियाँ, अहाँ काल्‍हिये एलौं आ आइये बाढ़ैन पकैड़ लेलौं। कहू तँ अहाँक माए-बाप की कहता। एतेक काज केनाइ कोनो जरूरी छइ!”

रोशनी बजली-

बहिन, ई तँ हमर अपन काज अछि। हम नइ करब तँ के करत।

सुलेखा चुपे रहि गेली। राधा भोरे उठि बाधसँ घास आनए गेल छेली। छोटकी पुतोहुक बेवहारसँ राधा गदगद छेली। तँए राति खूब मनसँ सुतलो छेली।

रोशनी घर-दुआरिकेँ बहारि एकटा टोकरीमे बाहरन-सोहरन उठा रहल छेली। ताबत राधा घास लऽ कऽ आँगनमे प्रवेश केलैन। आकि रोशनी देखलक, चटे बाढ़ैन छोड़ि सासुक माथपर सँ घासक छिट्टा लऽ घास रखैक जगहपर जा कऽ राखि आएल।

राधा रोशनीकेँ कहए लगल-

तूँ किएक बढ़नी धेलह। हम अबितौं तँ झाड़ू लगा दितौं।

ई कहैत रोशनीक हाथसँ बाढ़ैन लेबए लगली। मुदा रोशनी बजली-

माए, आब अहाँकेँ काज करैक जमाना नइ अछि। अहाँ बैसू, अराम करू आ हम सभ काज करब।

राधा सुसताए लागल। ताबत रोशनी सासुक लेल एक लोटा पानि आ एकटा दतमैन आनि हाथमे थम्‍हबैत बजली-

सासु-माँ, ई दतमैन करौथ हम ताबत जलखै बना दइ छिऐन।

जलखै तैयार भेल। सुरेशक लेल भोजन आ टिफीन सेहो तैयार केलक। किएक तँ सुरेशकेँ विद्यालय जेबाक छेलैन। आनन्‍द आ राधा जलखै करि अपन-अपन काजमे लागि गेल। एमहर रोशनी अपन जेठ दियादिनीकेँ माने सुलेखाकेँ हुनक कोठरीमे जलखै लऽ कऽ पहुँचली।

सुलेखा रोशनी संगे जलखै केलैन। आ दुनू अपना-अपना काजमे लागि गेली। रोशनी राधाक आधासँ बेसी काजकेँ सम्‍हारि लेलैन। सुलेखा रोशनीक बेवहारसँ आहत होइत रहली आ मने-मन अपनाकेँ अपराधी मानि पश्‍चातापो करैत रहै छेली। रोशनीक ज्ञान, विद्वुता आ चालि-चलन ओकरा घमण्‍डकेँ तोड़ि देलक।

राधा आब सकुन महसूस करए लगली। फेर घरमे खुशहाली आबए लागल। एक दिन रोशनी अपन घरक सभ काम-काज निपटा भोजन कए सुतल छेली।

ताबत रोशनी कोठरीमे चौकीपर सुतल राधाक पएर दबा रहल छेली। ओही समैमे ग्‍लानिसँ मर्माहत सुलेखा कनैत ओइ कमरामे घुसल आ बाजल-

माए, ऐ अभागिनकेँ क्षमा कए दीअ। अहाँ हमरा सबहक सुख-सुविधा लेल एतेक दिन-राति खटैत रहै छी। माए, हमरासँ अहाँकेँ बड़ कष्‍ट भेल। हम अहंकारी भऽ गेल छेलौं। रोशनी हमरा घरक साक्षात लक्ष्‍मी छैथ। एतेक पढ़ल-लिखल भऽ कऽ जे हमरा सबहक सेवा करै छैथ ओहीसँ हमरो रोशनीसँ शिक्षा भेटल जे परिवारक सदस्‍य खास कए सासु-माँ सँ बढ़ि ऐ संसारमे कियो नहि अछि। तँए हमरा सन अभागिनकेँ माफ कए दीअ।

कनैत सासु-माँकेँ पएर दबाबए लगली। राधा बजली-

बेटी भोरक हेराएल जँ साँझमे घर आबि जाए तँ ओकरा हेराएल नहि कहल जाइ छइ।

आनन्‍द पढ़ल-लिखल युवक, सभ तमाशा देख रहल छल। बाजल-

माए, सुलेखाकेँ माफ कए दहीन। कुल आ नीक खनदानक बेटी छोटकी कनियाँ  हमरा घरकेँ साक्षात्‍ लक्ष्‍मी छैथ। मध्‍यम घरक बेटी एहेन होइत अछि जे बिगरल घरकेँ सुधारि दैत अछि।

ई कहैत आनन्‍दोक आँखिसँ नोर झहरए लगल।

शब्‍द संख्‍या : 2636

 

 

गोबर बिछनी

कमली आ मंगली बाल-संगनी छेली। दुनूक घर सटले रहैन। दुनू माए-बाप अमीर किसानक ओतए मजदूरी कए घर चलबैत छेलखिन। घरक धिया-पुता सेहो ऐ काजमे हुनका लोकैनकेँ सहयोग करैत रहैन।

कमली आ मंगली भोरे उठि घरक सभ काम-काज कए जलखै कऽ गोबर बीछैले गाइक पाछू-पाछू चलैत रहै छेली। साँझ-भिनसर गैवार-महींसवार अपन-अपन गाए-महींसकेँ चरबैले खोलै छल। कमली आ मंगली माथपर पथिया लेने महींसक पाछू-पाछू गोबर दिस तेना धियान लगौने रहै छेली जेना पोखरिक कछेरमे बौगला माछ पकड़ै खातिर धियान लगौने रहैत अछि। तपस्‍वी जेना तपस्‍यामे लीन रहै छैथ तहिना कमली आ मंगली गोबर बीछैमे लीन रहैत छल।

चितकबरी गाए गोबर केलक आकि दुनू सहेली दौड़ल आ कमली अगुआ कऽ गोबर उठा लेलक। दुनूमे कम्‍पेटिशन रहै छेलइ। हम अधिक गोबर बिछी तँ हम अधिक गोबर उठाबी।

जखन गोबरसँ पथिया भरि जाइत रहै तखन दुनू सहेली नमहर आरिक कछेरमे ओकरा जमा कऽ लैत छेली। आ फेर गोरब बीछैमे लीन भऽ जाइ छेली।

गोबरक उपयोगिता आ ओकर महत्‍व कमली आ मंगली बुझौ कि नहि मुदा गोबर जमा कए ओकर गोरहा-चिपड़ी बनाएब तँ जनिते छेली। समय-समयपर ओकरा बेच किछु आमदनीक जोगार सेहो कए लैत छेली।

एक दिन गोबर बीछैक क्रममे गामक नेना-भुटकाकेँ सिलेट-पेन्‍सिल लए विद्यालय जाइत देखलक। दुनू अपनामे संकल्‍प केलक जे हमहूँ सभ पढ़ब। ई विचारक भाव दुनूक मनमे जगलै। ई विचार करैत अपन-अपन घर पहुँचल। दुनू अपन-अपन माए लग पढ़बाक इच्‍छा जाहिर केलक। दुनूक उमेर तकरीवन आठ-नअ बर्खक भेल छेलइ।

दुनूक माए अपन बेटीकेँ डॉंट-फटकार देबए लागल। कहलक-

गइ लड़कियो केतौ पढ़लकै हेन। तूँ पढ़ि कऽ हाकीम बनबें की। तो पढ़बें तँ की नौकरी करबेँ? घरक काम-काज के करत? बेटीकेँ पढ़ौला-लिखौलासँ ओ दूरि भऽ जाइ छइ। ओकरामे उदण्‍डता, लोक लज्‍जा, निर्मजता आ आदि-आदि दुर्गुण सभ आबि जाइ छइ। तँए तोरा नइ पढ़ए देबौ।

दुनूक माए एकठाम जमा भऽ अपना-अपना बेटीकेँ समझाबए-बुझाबए लगली।

ओही समैमे कमलीक पिताजी सेहो आँगन आबि गेला। घरवालीकेँ बिगड़बाक कारण पुछलखिन।

घरवाली व्‍यंग पूर्वक बाजल-

अहाँक बेटी पढ़त आ हाकीम बनत। किदैन कहलकै जे हम पटोर पहिरब तँ आँखि कहलकै जे हम संगेमे छियौ।

कमलीक पिताजी बजला-

कमली पढ़त तँ अहाँक देह एना किए जरैत अछि।अहाँकेँ एना ईर्ष्‍या किए भऽ रहल अछि। अहाँक माए-बाप नहि पढ़ौलक सएह एकरो प्रति सोचै छी।

कमलीकेँ ओकर पिता दुलारसँ गोदमे लैत पुछलखिन-

बेटा, तों पढ़बें तँ हम सिलेट, पेन्‍सिल, किताब-कॉपी सभ कीनि कऽ आनि देबौ।

कमली डेराइत बाजल-

बाबूजी, हम घरक कामो-काज कए देब आ पढ़बो करब।

तैपर कमलीक पिता कहलखिन-

“तों जहाँ धरि पढ़मेँ हम पढ़ेबो।”

कमली बड़ खुश भेली। तुरन्‍त दौग कऽ सभ हाल मंगलीकेँ सुनौलैन। कमली आ मंगली खुश भऽ नाचए लगली आ बजली-

हमहूँ पढ़ब, हमहूँ पढ़ब।

दोसरे दिन दुनूक पिता मजदूरी करि कऽ पैसासँ प्राथमिक विद्यालयमे नाम लिखा देलक। आ ओइ दुनू छात्राक नाम बदैल देल गेलइ।

आब कमलीक नाम राधा आ मंगलीक निकहा नाम कुसुम भऽ गेल। राधा आ कुसुमकेँ सिलेट-पेन्‍सिल आ मनोहर पोथी खरीद देल गेलइ। 

दुनू सहेली मन लगा कऽ पढ़ए लगल। राधा ओ कुसुमक काम बढ़ि गेलइ। गोबर बिछनाइ, घरक बरतन-बासन मँजनाइ आ पढ़नाइ-लिखनाइ इत्‍यादि।

गोबर बीछि गोरहा-चिपड़ी बना ओकरा बेच अपन पढ़ाइक खर्च सेहो निकालि लैत छल। किछुए दिनमे ओकरा सभकेँ किताब पढ़नाइ, लिखनाइ सेहो आबि गेलइ। बाले दण्‍ड आ सियाने पाठक ऐ आधारपर ओ दुनू वर्गमे नीक स्‍थान आनए लागल। शिष्‍ट रहबाक कारणे शिक्षको लोकैन अधिक मानए लगलैन।

सर्व शिक्षा अभियानसँ दुपहरक भोजन आ पोशाकक राशि सेहो भेटए लगलै। दुनूक लगनशीलता, कर्मठता, अनुशासन आ गुरुभक्‍ति देख शिक्षको लोकैन ओकरा प्रति अधिक संवेदनशील रहैत छला। दुनूक हरेक समस्‍याक समाधान शिक्षक लोकैन करैत छला।

ऐ तरहें दुनू सहेली प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कए माध्‍यमिक शिक्षा प्राप्‍त करबाक लेल उच्‍च विद्यालयमे नामांकन करौलैन। सरकारी योजनाक तहत दुनूकेँ साइकिलक आ छात्रवृतिक राशि सेहो भेटलै।

दुनू सहेली मैट्रिकक वोर्ड परीक्षामे प्रथम श्रेणीसँ उत्तीर्ण भेली। सरकारी योजनासँ दस-दस हजार रूपैआक प्रोत्‍साहन राशिक चेक सेहो भेटलै।

आब राधा आ कुसुम गर्ल्‍स कौलेजमे इन्‍टरक पढ़ाइ करए लगली। अपन मेहनतक बलपर दुनू सहेली इन्‍टरमे सेहो प्रथम श्रेणी प्राप्‍त भेलैन। आ पुन: पनरह-पनरह हजारक चेक प्राप्‍त भेलैन। आगॉं पढ़बाक लिलसा बनल छेलइ। माए-बापक सेहो मनोबल बढ़ैत रहलै। दुनू सहेली बी.ए. मे नाम लिखा कौलेज जाए-आबए लगली।

राधा आ कुसुम आब वयस्‍क भऽ गेल छेली। वसन्‍तक मादकता, कोयलीक कूक सावनक फुहार आ कामदेवक प्रहारसँ अवगत होमए लागल छेली। कौलेजक छात्र-छात्रामे एक-दोसरक प्रति आकर्षण बढ़ए लागल छेलइ। ओही क्रममे राधाकेँ एकटा राजेश नामक लड़कासँ दोस्‍ती भऽ गेलइ। राजेशकेँ कपड़ा-दोकान छेलै आ बी.ए.क थर्ड पार्टमे पढ़ैत सेहो छल। कभी-कभार कौलेजमे मौज-मस्‍तीक लेल जाइत छल।

राधा आ राजेशक दोस्‍ती प्रगाढ़ हुअ लगलै। दोस्‍तीक बहाने दुनू एक-दोसरसँ प्रेम करए लागल। राजेश-राधाक लेल नव-नव उपहार लाबए लागल। कुसुमकेँ राधा-राजेशक दोस्‍ती पसिन नहि छेलैन। तथापि ओ दुनूक क्रिया-कलापपर विशेष धियान देमए लगलै।

राजेश चाहैत छल जे राधाकेँ बहला-फुसला कऽ अपना फाँसमे फँसा घरसँ निकैल जाइ। मुदा राधा पढ़ल-लिखल आ होशियार लड़की, तँए घरसँ निकललासँ पहिनहि ओ एक दिन राजेशक घर पहुँचली।

राजेशक माए घरमे छेलखिन। राजेशक माएकेँ प्राणाम करैत राधा अपन परिचए देलैन-

माइजी, हम राजेशक मित्र छी।

राजेशक माए कहलखिन-

आउ बेटी, बैसू। राजेश तँ दोकानपर अछि।

ताबत ओकरा ओइठाम गामक किछु सम्‍भ्रान्‍त परिवारक महिला लोकैन आबि गेलखिन। राजेशक माए ओइ महिला सबहक खातिरदारीमे लागि गेली। राधा आँगनमे असगरे बैसल छेली। तखने छोट बच्‍चाक कनबाक ध्‍वनि सुनाइ पड़लैन। एकटा दुबर-पातर महिलाकेँ एक घरसँ दोसर घरमे जाइत देखलैन। ओ औरत राधा दिस घुरि-घुरि कऽ तकैत छेलखिन।

राधा ओइ औरतकेँ अपना लग बजा पुछलखिन-

अहाँ हमरा दिस एना किए गुम्‍हरै छी? अहाँ के छी?”

ओ अपनाकेँ राजेशक पत्नी बतौलक। छोट-छोट धिया-पुताक कारणे ओ परेशान छेली। राजेशक पत्नी राधासँ पुछलखिन-

की अहींक नाओं राधा छी? अहाँ तँ पढ़ल-लिखल बुझना जाइ छी तखन केना अहाँ हुनका चक्करमे फँसि गेलौं?”

एकाएक राधाकेँ फँसबाक आभास भेलैन। सोचए लगली। हम वास्‍तविकतासँ दूर हटि एक कपटी, क्षली, लम्‍पट आ चरित्रहीनक जालमे फँसि रहल छेलौं।

राधा राजेशक माएसँ विदा लैत अपना घर एली। कुसुमसँ भेँट कए सारा वृतान्‍त सुनौलैन। दुनू सहेली राजेशकेँ सबक सिखेबाक लेल षडयंत्र रचलैन।

साँझमे राजेशसँ भेँट करैले ओ आइ पहिनहिसँ इन्‍तजारमे छेली। साँझ पड़ैत देरी राजेश दोकान बन्न कए घर अबैत छल। नियत समैपर राधासँ भेँट भऽ गेलैन। कुसुम गाछक अढ़मे नुकाएल छेली। राजेश राधासँ प्रेमक वार्ता करए लागल। तइ बिच्‍चेमे राधा जोरसँ हल्‍ला करए लगली।

हल्‍ला सुनि लोक सभ जमा भऽ गेल। कुसुम पुलिसकेँ खबर पहिनहिसँ कए देने छेली। पुलिस राजेशकेँ धारा 376 केर अन्‍तर्गत गिरफ्तार कए जहल भेज देलक।

राधा अपन नजैर कुसुम दिस दैत बाजल-

गोबर बिछनीमे की शक्‍ति छै से देखौ...।

शब्‍द संख्‍या : 1039

 

 

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