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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

                     

राम विलास साहु- दू दर्जन कविता

 

अनमोल जिनगी

 

तूँ अमरुख अज्ञानी अभिमानी

किए घुमै छँह डेगे-डेग

ठक बैसल छौ गली-गलीमे

लेतौ प्राण क्षणेमे अमती खेत

बड़ी कठिनसँ मिलल छौ जिनगी

धने देने छौ बनैले दानी

सेवा खातिर जग मिलल छौ

किए बैसल छँए बनि नदानी

ज्ञान-विज्ञानकेँ अलख जगबैले

कुकर्म छोड़ि सद्कर्म करैले

जग बनतै अद्भुत कल्‍याणी

सहए कहै छैथ पण्‍डितज्ञानी

रे मुरख तूँ धीरज धरिहेँ

कर्म पथ सत्‍यकेँ पकड़िहेँ

तीनूलेाकमे नाम करिहेँ

कर्मक फल उत्तम मिलतौ

नाओं अमर अमृतरस पीब

यमराजो तोरासँ दूरे रहतो

स्‍वर्गक बाट खुजले भेटतौ

हरि नाम हरि कथा अनन्‍ता

जे जपत से अमरत्‍व पाबत

अममोल जिनगी किए ठकाएत

जीवन-मरणसं मुक्‍ति पाएत।

मिथिलाक गुमान

 

कोसी कमलाक रेठान

तैपर बनल बलानक दलान

बालुक बुर्जा बनल

गाए महींसक बथान

दूध-दहीक पेमौज होइए

छाल्‍ही घीकेँ कियो ने पुछैए

डारहीकेँ कुकुरो ने खाइए

अल्‍हुआ होइए प्रात जलपान

तिलकोरक पातक तरुआ प्रधान

मरूआ रखने गरीबक मान

मकइ गहुमक अछि छिगरीतान

खा सुतैए ऊँचगर मचान

गामे-गाम चाहक दोकान

निठुर दूधमे चाह बनैए

फिका पड़ैए मेबा मिष्‍ठान

माछ-मखान महग भेल-ए

मधु भेल-ए अमृत समान

अपन खेती छोड़ि किसान

परा रहल-ए जान-बेजान

बेवस्‍था अछि अखनो बेइमान

रावण कंसक राज चलैए

केना भेटत ऐसँ त्राण

ई छी मिथिलाक गुमान। 

हम किछ नै कहै छी

 

हम किछ नै कहै छी

तैयो कीए हमरे पुछै छी

की कहब कहैत जलाइ छी

सभ जनै छी सभ देखै छी

बजैले कोइ ने चाहै छी

नेता अभिनेतासँ सभ तवाह छी

बेटाक नजैरबाप अपराधी छी

नेता अभिनेता यार बनल-ए

चोर सिपाहीपर भारी पड़ल-ए

देशक खजाना अधिकारी लूटैए

साधनक अभावमे खेत पड़ल-ए

बेरोजगारीसँ लोक भूखे मरैए

जन्‍मेसँ देशमे गरीबी भेटल-ए

पुरुखा लगसँ शौगात मिलल-ए

असन्‍तोषक बोखारमे सभ वौआइए

दिन-राति सुनि अचरज लगैए

की कहब ई दुखक बात

जहरक घोँट पीब मरै छी

हम किद नै कहै छी...।

हमर टोल

 

हमर टोल

सभ दिन करैत रहल किलोल

कोइ ने सुनलक

आइ धरि हाकीम-हुकुम

नै देखक दिन दुखियाकेँ

ईश्‍वार सेहो बेमुखे रहल

के करत हमर सहयोग

बाढ़ि पानिसँ घेराएल

लगैए नै बँचत हमर टोल

छाती पीट-पीट

बहबैए आँखिक नोर

भँसिया गेल माल-जाल

किदु नै बँचल अन्न-पानि

धिया पुत्ताक के कहैए

बुढ़बो बुढ़िया

उगडुम करैए

नवतुरियासँ जवनका धरि

हिम्‍मत जुटा कऽ

माल-जालकेँ बँचबैमे भीरल-ए

पुरबा-पछिया झाँटि-बिहाड़ि

हमरे टोलकेँ सतबैए

जेना सभ दुख सहैले

हमर टोल अगुआएल-ए

नै कोनो रक्षा, अनुदान

तखन केना हएत

हमर ओलक उत्‍थान

सभ मिलि संकल्‍प लेलौं

अपन जन श्रमदानसँ

टोलक करब ऊंच नाम

सा मिलि दुखकेँ भगाएब

टोलकेँ समृद्ध बनाएब

अपन काजसँ आत्‍मनिर्भर हएब।

खेतीक काज

 

फाड़ पीट खेत जोति

बैसाखक रौदमे हाड़ सुखाए

जेठ मास मरूआ रोपि करैए कमठौन

अखारमे धानक बीहैन पाड़ि

सौन-भादो करैए कादो

बिीहैन उपाड़ि रोपैए धान

आसीन मास धानक कमौनी

कातितमे करैए खेतक रखबारि

अगहन-पुसमेकटनी-दौनी

उपजल अन्न तैयार करैए

साल भरिक उपजाकेँ

भरैए कोठी-बखारी

अपनो खाइए आनोकेँ खीबैए

दाही-रौदी-ले बँचा राखैए

समय पाबि अन्नदान कऽ

खुशीमनसँ भण्‍ज्ञार करैए

अपन परिश्रमपर भरोष रखि

नै केकरोसँ आश करैए

चास-बासपर करैए राज

खेतीसँ सबहक पेट भरैए

सभ दिन तियाग श्रम करैए

देशक बढ़बैए मान-सम्‍मान

सोचि चलु हे देशक इंसान

खेतीक काज छी सभसँ महान

किसान छी देशक असल सन्‍तान।

मोह-माया

 

सगरो माह-माया पसरल-ए

मायाक बजार सजल-ए

ठगिनियाँ माया-जाल पसाइर

सभकेँ बान्‍हि-फँसा रहल-ए

ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस

सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए

सभकेँ ठकि...।

 

सभ सज्‍जनदुर्जन नहि कोइ

साधु सन्‍त महंथ कहबैए

सज्‍जन साधु सन्‍त महंथ

माया फँसि घुरिया रहल-ए

ठो-ठाम ठगिनियाँ बैस

सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए

सभकेँ ठकि...।

 

लोभी सभ निरलोभी नै कोइ

इमान बेचि इंसान कहबैए

कुकर्मकेँ धरम-करम बुझि

मोह-मायामे सभ घेराएल-ए

ठामिे-ठाम ठगिनियाँ बैस

सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए

सभकेँ ठकि...।

 

ई जगत केना कऽ चलतै

के नेकी इंसान कहेतै

केना सभकेँ भेटतै त्राण

माया देख कवि नोर बहबैए

ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस

ठामे-ठाम ठगिनियाँ बैस

सभकेँ ठकि-ठकि खा रहल-ए

सभकेँ ठकि...।

सतघटिया बाट

 

सात घाट सात बाट

पकैड़ किए चलै छी

सात समुद्र जकाँ किए

उनैट उधियाइ रहै छी

जिनगीक असल बाट छोड़ि किए

सतरंगी बनि जीबै छी

सात घाट सात बाट

पकैउ़ किए चलै छी।

 

जिनगी केना सजि चलत

से नै बान्‍हि चलै छी

पानि वाणि छानि कऽ

जिनगी किए ने जीबै छी

झूठ-फुसक खेल खेला

हानि नकिहानि करै छी

सात घाट सात बाट

पकैड़ किए चलै छी।

 

सुलभकेँ दुरलभ बुझि-बुझि

उनटे नजैर सदिखन रखै छी

पथ्‍य, कुपथ्‍य खा-खा कऽ

नव-नव रोग सृजैत रहै छी

सात घाट सात बाट

पकैड़ किए चलै छी।

 

एक बाट एक उदेस

पकैड़ चलैत जीबैत रहब

मातृभूमिकेँ कर्मभूमि बुझि

कर्मक पथपर चलैत बढ़ब

सही ज्ञानक ज्‍योति जरा

जगतकेँ जगमग करैत रहब

सात घाट सात बाट

पकैड़ किए चलैत रहब।

मिथिला महान पावन धाम

 

मिथिला महान पावन धाम

हमर छी असल पहिचान

धान, पान, मखानक खान

पान बढ़बैए सबहक सम्‍मान

फूल-फड़केँ के पुछैए

माछक होइए नीत खान पान

पोखैर, खन्‍ता डेग-डेगपर

नदी बहैए गामे गाम

जगतमे होइए अमर गुनगान

मिथिला महान पावन धाम।

 

स्‍वर्गसँ सुन्‍दर जगतक मनोरम

माटि-पानि हवा अमृत सन

बाग-बगीचा फलवाड़ीमे

फूल-फड़ लुभधल रहैए

बाड़ी-झाड़ी फड़ल भरल-ए

सभसँ गुणगर फड़ लताम

चिड़ै-चुनमुन चहैक-चहैक

कोइली बजैए मधुरतान

जगतमे अछि बड़ नाम

मिथिला महान पावन धाम।

 

जड़ी-बुटीसँ भरल ई धरती

औषधीक खान अदौसँ अछि

घरे-घर पैघ-पैघ वैद्य

बना रहल-ए उत्त दवाइ

ऋृषि मुनीकेँ पहिलपपसीन

रहल मिथिलाक पावन भूमि

जैठाम मनुज अछि देव समान

अपन ज्ञान बाँटि बाँटि

जगतकेँ करैए कल्‍याण

मिथिला महान पावन धाम।

 

सरस्‍वती, लक्ष्‍मी, अन्नपूर्णा देवी

सबरी सीता भारती सन नारी

घर-घर, गामे-गाम बसैए

ज्ञानी सन्‍त विद्वान भरल-ए

दुनियाँकेँ दइए ज्ञज्ञन-विज्ञान

जेतए जनता करैए श्रमदान

घर-दलानमे भरल-ए धान

अतिथिक सेवा देव समान

जगतमेअछि अमर नाम

मिथिला महान पावन धाम।

चरण पूजव

 

चरण पूजव हे जननी जन्‍मभूमि

सुति-उठि चढ़ाएब चरणमे फूल

जनम-करम तँ अहीं देलौं

पालि-पोसि सपुत बनेलौं

अहाँक सेवा बढ़ अनमोल 

केना साधाएब हम अहाँक कर्जा

मनक भूल नै करैए कबुल

ज्ञान विज्ञान दइ छी अद्भुत

साए जनम सेवा करब हम

नै करब जिनगीमे कहियो भूल

चरण पूजव हे जननी जन्‍मभूमि

सुति उठि चढ़ाएब चरणमे फूल।

 

जननी जन्‍मभूमि हमर छी दाता

दोसर नै अछि कोनो विधाता

अहाँ छोड़1ि हम केकरा पूजब

सभसँ पैघ माता अन्नदाता

अहाँक ऋृण केना चुकाएब हम

कोनो कसैर रहत हे माता

साए बेर हम सिर झुकाएब

अपन वलिदान दऽ ऋृण चुकाएब

सभ कसूर माफ करब हे माता

हम छी अहाँक नदान सन्‍तान

चरण पूजव हे जननी जन्‍मभूमि

सुति उठि चढ़ाएब चरणमे फूल।

भजन

 

हरि दर्शन बिनु

अँखिया तरसैए मोर

जन्‍मेसँ सागरमे सीप

पियासल बहबैए नोर

स्‍वातीक बून लेल विभोर

हरि दर्शन बिनु

अँखिया...।

 

हम छी पियासल पंक्षी चकोर

चित चंचल मन अविचल

स्‍वातीक बून लेल छी बेकल

हरि दर्शन लेल

रस्‍ता तकै छी बनि चकोर

हरि दर्शन बिनु

अँखिया तरसैए मोर...।

◌ 

धधकैत धरती

 

धधैक-धधैक धरती

दिन-राति धधकैत

जरि-जरि सुरुज

आगिक ज्‍वाला बनि

धरतीकेँ जरबैत

भीषण गर्मी बढ़ैत

धरतीसँ अम्‍बर धरि

धधराक धाह लगाए

के बुझाएत धधराकेँ

पािन सुखि पतालमे

डरे नुकाएल रहए

अपन दुखकेँ मनुख

अपने सृजन करैए

गाछ वृक्ष काटि-काटि

जंगलकेँ उजारैए

धरतीक स्‍वरूप बिगरल

जन-जीवन बिगैर

वृष्‍टि अनावृष्‍टि भेल

रौदी-दाही बाढ़ि बढ़ैए

मनुखक समस्‍या बढ़ल

बढ़ैत सभ बुरिया रहल

धधकैत धरतीमे

जीव जरि मरि रहल-ए।

अग्निपथ

 

केनए जाएब, केनए छिपाएब

केकरा-ले कानब

के हमर नोर पोछत

जेनइ जाइ छी तेनइ

डेग-डेगपर

रावण कंस देखाइए

सुगम राह कोनो ने

सभ राह काँटसँ भरल-ए

अग्निपथपर चलैत चलैत

मंजिल अतिदूर लगैए

हारि थाकि जौं उठै छी

कुकुर बहुत भुकैए 

मनमे होइए डुमि मरी

कोसी-कमला सुखाएल-ए

गंगासन पवित्र नी

खन्‍ता डबरामे नुकाएल-ए

भागैत पहुँचलौं धाम

सभ धाम दानवसँ भरल

मिथिला धामक धरती

भेद-कुभेदसँ घेरल

मानपर दानव भारी

ऐ दानवसँ मुक्ति लेल

जाधैर जिनगी अछि

हारि केना मानब

जीबैले किछु करए पड़त

अग्निपथपर चलए पड़त।

किसान

 

जिनका सभ कहै छी अन्नदाता

भाग्‍य विधाता मतदाता

वएह छी देशक असल बेटा

हुनके अछि टुटल घर

तनपर नै लत्ता कपड़ा

दुखमे फँसल हरिनाम जपैए

जिनकर करैए सभ गुणगान

हुनके समस्‍या अछि महान्‍

जिनगी सुखल लड़की सन

संघर्ष करैत जाइए श्‍मशान

तैयो सहैए दोसरत तान

आइ धरि ने कियो सुधि लेलक

आ ने दुखमे नोर पोछलक

मुदा ओ करैए सबहक कल्‍याण

अपना भूखल सबहक पेट भरैए

सभ दिन करैत रहल उपकार

हुनके दुख अछि पहाड़

जेहेन दुर्दशा बनल छै

जीवन हारि एक दिन

अन्न नै उपजेतै तखन

सभ लोक भूखले मरतै

ताधैर नै किसानक

दिशा दशा सुधरतै।

दिन भेल बाम

 

खेतमे फटल दराइर

आड़िपर बैसल सोगाएल किसान

छाती पीट बपहारि कटैए

केना कटत सालक दिन राति

की खा जीयब हौ भगवान

खेत की जरल, जरल तकदरीर

सभटा हमर अरमान जरल

धियापता भऽ जाएत बीरान

पेट पीट-पीट देत जान

टुटल धर टटल दलान

केना निमहत मेहमान

खुट्टापर गाए महींस हुकरैए

केना बँचाएब ओकर प्राण

अखड़ा रोटी नून देख

चिलकौर कनैए साँझ बिहान

माथपर टीटही टहकैए

बगल बैसल कुकुर कनैए

बिलाइ छालही ओलि खाइए

सरकार उड़बैए रॉकेट यान

गरीबक जिनगी बनल गुलाम

किसान दइए खेतमे जान

सरकारक कोन ठेकान

कुर्सीकेँ बुझैए भगवान

केना बँचत किसानक प्राण

दिन भेल बाम...।

नशा

 

जे नशा करत

ओकर जिनगी नकर बनत

ओ दिन दुरदिन नहि

जखन बाटीमे भीख मांगए पड़त

देख जगत हँसत

अपन पराया सभ छुटत

जिनगी दुखमे डुमल रहत

जे नशा करत।

 

गाँजा पीब कऽ उड़ाएत

भँग खा भकुआएल रहत

दारू पीब कऽ दुरि भेल

बीड़ी पीते बुड़ियाएल

घर उजरल परिवार बिगड़ल

सभ सम्‍पैत बिलैट गेल

तखनो कोनो कुकर्म नै बँचल

बाटीमे भीख मांगए पड़त

जे नशा करत।

भगवतीक गीत

 

कोन फूल लोढ़ब हे मैया

कोन फूल चढ़ाएब हे

कोन फूलक माला बनाएब

हमरा नै अछि ज्ञज्ञन हे

जगत जननी छी हे मैया

सबहक करै छी पतिवाल हे

कोन कसुरक चुक हमर छी

गे हमरा दइ छी सजा हे

बेली चमेलीक गजरा बनेलौं

चम्पा फूल पैर पूजन हे

गेना फूलक आसन बनेलौं

अरहुल फूलक माला हे

पान, फूल, फल, मधुर, मेबा

सभ दिन चढ़ाएब प्रसाद हे

छागर-पाठी बलि नै देब हम

अहिंसाकेँ होइ छै अत्‍याचार हे

अंजान अवोधकेँ माफ करबै

हम छी अहींक सन्‍तान हे

सभ जीब पर दश करियौ

हेतै जगतक कल्‍याण हे

कवि करैत अछि विनती हे मैया

सभकेँ दियौ सभ ज्ञान हे

जगमग हेतै अन्‍ध जगतक

दियो एहेन वरदान हे...।

केहेन मिथिला

 

हमर मिथिला हम छी मैथिल

किए बदैल गेल काया स्‍वरूप

के अछि एकर जिम्‍मेदार

की नै रहल असल रखबार

दोषी बेवस्‍था बढ़ल समस्‍या

कंकीर्ण सोचसँ बँटल समाज

तखैन मँगै छी मिथिला राज्‍य

की मिथिला मिथ्‍या छल

जे असल मांग करै छी

हमर मिथिला केतए हरा गेल

जे खोजैमे आन्‍हर बनल छी

के दोषी छैथ के जिम्‍मेदार

जे केलैन भेद कुभेद

जोगी कहि योगी बनि गेल

कर्म भूलि पाखण्‍डी भेल

अवसर देख रंगवादी भेल

जाति पाँतिक राजनीतिक खेलमे

मिथिलामैथिली बदैल गेल

जे मिथिला अदौसँ स्‍वर्ग छल

तेकर किएक ई हाल भेल

जाति परजातिक बात करै छी

सभकेँ बुझै छी अखनो अछोप

तैयो ने अछि मनमे सन्‍तोख

गरीब कमा केतौ गुजर करत

तइले लोक किए प्राण गमाएत

उठत एक दिन साए-साए सबाल

केकर मिथिला केहेन स्‍वरूप

किनका मिलत ऐसँ सुख

भूखले पेट जे करतै काज

से किए माँगत मिथिला राज

नै छैथ जनक नै छैथ सीता

के भोगतै ई मिथिला राज। 

दीन हीन

 

दीन-हीन जखने भेलौं

सभ दुख सम्‍हिर पड़ल

आपैत-बिपैतमे फँसि

सभ नेकरम करैत एलौं

आब की करब नै फुराइए

तखने केलौं हरिक पुकार

हरिक महिमा अपरमपार

देलैन साहस भेल एहसास

कहलैथ कर्मपर करू बिसवास

कर्म-धर्मसँ बढ़ि किछु नइए

तेकरे दइ छी हमहूँ साथ

दुखक दरिया पार लगा

सुख सागरमे दइ छी पहुँचा

दुख-सुखक बीच जीब जीबैए

से रहस्‍य किया ने जानैए

ऋृषि-मुनी, देवी-देवता

सबहक विधाता हरि अनन्‍ता

हरि हरण दुख हरता

दीन-हीन दुख सहितो

स्‍वर्ग जगतमे सुख पबैए

दुख देखि जे अधिर होइए

से नर सुख कहियो ने पबैए

कर्म प्रधान बिश्‍वक मांग

जे अपनाबए वएह महान्।

हम गरीब

 

हम गरीब

केतेक करीब

सबहक काज

करैत जीबै छी

बहुतो काज

नहि छी बाज

फुरसत पाबि

अपन बीरान

सबहक पुरबै छी

काज लेल

रोब देखा

नजैर बदैल

काज करबैए

प्रेम-भाव नहि

अपमान भरल

बेवहार करैए

तैयो दुखे-भुखे

जरैत5मरैत

करैत रहलौं

सभ दिन काज

बोल भरोसक

नै भेटल शौगात

बुढ़ाड़ी देह

जखन भेलौं बेकाम

नै कियो पुछैए

नाम ठेकान

आब की करब

घरेमे मरब

जपैत हरि नाम

राम-राम।

किरानीक किरदानी

 

देखलौं किरानीक किरदानी

मरदे नहि मौगियाहे बुझि पड़ल

जएह कहता वएह नै करता

तीन पेखन रोज घुमौता

तखन कहता परसू आएब

जँ परसू जाएब तँ ओ नै रहता

बेसी घुमेता फिरिसान करता

तखन कहता खर्चा करए पड़तह

हम कहलौं काज तँ नइए भीरगर

सुनिते कुकुर जकाँ भूमि भगौता

डरि हारि जँ पराए लगलौं

तखन बनर भूलकियो देता

साहस करि कऽ हम डटले रहलौं

जखन निर्भिक हमरा देखलैन

इशारा दऽ लग बजौलैन

कानमे कनफुसकी दैत बजला-

मोटगर रकम खर्च करए पड़तह

जँ नै करब खर्चा-बर्चा तँ

ऑफिस अबैत जाइत पएर टुटि जेतह

हारि थाकि हमहूँ बजलौं-

मोटगर तँ नहि दऽ सकब हम

मुदा पातरेसँ चलाउ काज

निर्जज बनि बढ़ौलक हाथ

तखने मनमे भेल आश

काज भऽ जाएत हाथो-हाथ।

फूलक लचारी

 

मालि पटबैए

कियारी फुलवाड़ी

हँसि फूल कहैए-

भेद कुभेद नै हमरा मनमे

सबहक छी प्रेमी

रंग रूप स्‍वरूप भिन्न रहितो

मिलि रहै छी कियारी

नइए रंगभेद, वर्भेद

केकरोसँ नै छुबाइ छी

एक बेवहार अपन सुवास

सभ मिलि बँटैत रहै छी

राजाहुअए आकि रंग

सबहक छी हम पुजारी

नहि कलेश आ ने उपराग

सबहक दिलमे करै छी बास

प्रकृतिकेँ सुन्‍दर बनबै छी

वातावरणकेँ करै छी साफ

धरती, पवन, गगनकेँ

गमकाबै छी चारूकात

मुदा, मनुख नै करैए

हमरा बीच इंसाफ

जाति भेद, वर्ण भेद रंगभेद

बाँटि करैए बिसवासघात

सृंगार बुझि सजा दइए

बेचैए हमरा हाट बजार

की कसुर अछि हमर

जे करै छी एहेन अत्‍याचार

दया रखि करू विचार

अहाँक बीच हम झूकि

करै छी विनती, छी लचार

के करत हमर इंसाफ?

लोकतंत्रक खून

 

निर्वल जनता, दागी पहलवान

जनता लचार, वदनाक सरकार

जंगल राज,अन्‍धा कानून

बिनु घूस नै काज चलैए

न्‍याय बिकाइए पसेरी भाव

इंसानक इमानकेँ के पुछैए

तरजू तौल बेचैए बेमान

भ्रष्ट तंत्र बीकि गेल

जनता लफड़ामे पड़ि गेल

लोकतंत्रक खून होइए

हंस सुग्‍गा भूखे मरैए

गिद्ध, कौआ चिल्‍होरिया

मासु नोचि खा रहल-ए

शेर, बाघ खा मोटा गेल

नढ़िया खिखिर मंत्री बनल

कुकुर बिलाइ रखबारि करैए

हत्‍या अपहरणक उद्योग बढ़ल

जनताक खूनसँ देश चलैए

जिनगी नकर कंगाल बनल-ए

हिंसक हिंसाक बीच

निर्दोषक फाँसी पड़ि रहल-ए

राम राज्‍यक सपना सपने रहि गेल

बुद्ध गाँधीजीक बाट बिसैर गेल।

सपना

 

सपना कुसपना देख-देख

भ्रममे भरैम भरमैत रहल

अमर अमृत छोड़ि-छोड़ि

विष विषहा लूटैत रहल

भेद-कुभेद वाण-उवाणि देख

हंस कौआ लड़ैत रहल

देश समाज दहि भँसियाइए

बिनु पतवार चलैत रहल

मनुख कुमनुखक बीचमे

अन्‍हारा डीठरा देख रहल-ए

जनताक सुख ऊपरके लूटि-लूटि

धरती अम्‍बर बीच उड़ैत रहल

देश माल खजाना खाली

कालाधनमे बदैल गेल

महगी मारि जनता सहि

पातर बनि पतराइत रहल

नेता अफसर मोट-मोट बनि

भरिगर भारसँ भरिया गेल

भारी भारसँ देा दबि कऽ

चिन्‍तामे शेागा गेल

भेद-कुभेदक बीच भेदिया

लहू पीब जीबैत रहल

राग, ताल, सुर अलाप अलगे

नाच नरखेल करैत रहल

देशक इज्‍जित लूटि-लूटि

बीच बजारमे बेचैत रहल

सुतल छेलौं नीरन भेर की

देख सपना नीन टुटल।

बटिया खेती

 

बड़ी जतनसँ

बटिया खेतीकेलौं

रौदी आबि विषाएल

खेतमे फटल दाराइर

फसल जरि उसैर गेल

गिरत गिरहकट्टा

दू-चारि कथा बेथा

सुनबे साँझ विहान

अपजश माथ चढ़ल

ऊपरसँ भूखमरी बढ़ल

मेहनत लागत दुरि गेल

मँह सुखल पेट धँसल

परिवारक चिन्‍तामे फँसल

की खाएब केना जीयब

भूखे मरत धियापुता

जँ कमाइ-ले जाएब

दिल्‍ली, पंजाब, कलकत्ता

धियापुता बिलैट जाएत

के बनत भाग्‍य विधाता

हारि थाकि ठीकौती खेत

लेलौं दस कट्ठा

खेत जोति कुइयॉं खुनि

तरकारीक खेतीकेलौं 

रंग-बिरंगक बीया रोपि

दिन-राति मेहनत करैत रहलौं

खोपड़ी बान्‍हि केलौं रखवारि

मनसम्‍फे तरकारी उपजल

हाट-बजार बेच भेलौं नेहाल

खा-पीब ठीकौती दऽ

नफा भेल हजारक हजार

पाँच कट्ठा खेत कीनि

जोड़ा भरि हर-बरद संगे

बटिया छोड़ि अपन खेती केलौं

चास-बासपर करै छी राज

ने केकरोसँ अछि आश

बटियो खेती जँ करत रही

पपदेशक काजसँ घरे नीक।

 

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