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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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अशोक जे. दुलार

७ टा कविता

मन काबू रख बाबू

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मन काबू मे रख बाबू

आगू पाछू लख बाबू।

बोली मे गोली भरने

ओल सनक नहि भख बाबू।

बेसी बुधियारी कयने

तीन ठिया नहि मख बाबू।

दुनियादारी घोर बितै

आँखि फुजल तूँ रख बाबू।

गाल बजा नहि काज करै

बेसी नहि चख चख बाबू।

संबंध जुड़ल नहि हिय मे

केश कटा की नख बाबू।

चालि चलन देखल बिगड़ल

फूरै नहि अक-बक बाबू।

बिन बातक अनघोल मचै

छाती कर धक धक बाबू।

भाव अभावे शान कहाँ

नहि रस्ता भरिसक बाबू।

 

योग करू ने मीता

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सब शमित रोग करू ने मीता

भोग कम, योग करू ने मीता

कर्मरत अहि दुनिया मे रहितहुँ

अल्प उपभोग करू ने मीता

दुखहि डूबल नहि रहि कय झामर

नित नियम योग करू ने मीता

अछि बनल काल करोना जग भरि

योग उपयोग करू ने मीता

मानलक आब तऽ दुनिया सगरो

योग मनयोग करू ने मीता

जोड़ि सबके ल'क' संगहि चलि ली

एहने ब्यौंत करू ने मीता

आब संयोग सुखद सुंदर हो

देश हित ध्यान धरू ने मीता

अलहदे चीन भजै'ए गोटी

तोड़ि मुह हाथ धरू ने मीता

 

जाड़ कतेक पड़ै छै यौ

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बंकू बाबू डुग्गू बाबू

औ जाड़ कतेक पड़ै छै यौ।

सुटकल दुबकल रहियौ घर धरि

बड़ शीतलहरि लहरै छै यौ।

स्वेटर पहिरू टोपी पहिरू

से एहि सँ जाड़ टरै छै यौ।

धोन्हीं चादरि सुरुज नुकेला

उफ़!पछबा हाड़ गड़ै छै यौ।

हाँ,हाँ,टोपी नहि ने फेकू

एना मे कान ठरै छै यौ।

खोंता धेने चुनमुनियाँ सब

नहि बकरी घास चरै छै यौ।

कुकुर बिलैया कूँ कूँ म्याऊँ

कंबल सीरक हेरै छै यौ।

गामो घर मे बूढ़-पुरनियाँ

घूरे लग जाय अरै छै यौ।

जाड़क अमरित आगि कहाबय

दुखिया संताप हरै छै यौ।

जाड़ कसैया बड़ निर्दैया

ओ ककरो ने छोड़ै छै यौ।

ठहरू ठहरू थोड़हि दिन बस

जाड़ोक उमेर ढरै छै यौ।

नेना भुटका घर मे बैसल

ई कविता याद करै छै यौ।

हमरा सबहक नेताजी

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रगड़ा झगड़ा ठनने फीरथि

से हमरा सबहक नेताजी।

पूज्य बनल रहता ओ कोना

बेबात फसाद करेता जी।

बतकुट्टनि के खेती सनगर

आ सौंसे आगि लगेता जी।

प्राण बसय हुनकर सत्ता मे

कुर्सी लय ग़दर मचेता जी।

चारि बरस धरि निमुआने सन

पचमे आबि फुसियेता जी।

जाइत-पाइत धर्मास्त्र बल

मरछाउर छीटि सुतेता जी।

आगाँ पाछाँ मोटर पों पों

औ अगबे धूलि फकेता जी।

चलती हुनकर की देखै छी

चलती देखबथि चहेता जी।

केहन अनबुझ बूझथि सबके

पढ़ने बिनु खूब पढ़ेता जी।

 

बेसी हमरा सँ के बुधियार!

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बेसी हमरा सँ के बुधियार!

फूट डारि कऽ राज करै छी,

अपन तिजोरी खूब भरै छी,

टीकमटीक ओझरायल रहौ बस,

तेहने तेहन काज करै छी,

केहेन-केहेन पानि भरै छथि

मानथि हारि बड़-बड़ सुतिहार।

बेसी हमरा सँ के बुधियार!!

बुद्धिजीबी जे वर्ग कहाबथि,

उछलथि कूदथि गाल बजावथि,

रस्ता हम्मर वैह सोझराबथि।

अपन बिरादर आखिर अपने

शान हुनक तऽ हमरे झपने,

हुनकर सिदहा हमरे नपने,

बालि बनि हम कियैक ने गरजी,

बढ़ले जाय हमर अधिकार!

बेसी हमरा......!!

जतय जे गऽर ऊँट बैसै बस

गोटी तैखन सैह भजै छी,

बहुरुपिया अछि रूप हमर

हरेक रूप मे बेश छजै छी,

धर्म-अफीम नशा केर पुड़िया

तकरो बाना खूब जनै छी,

पर उपदेश कुशल हम अपने

प्रवचनो दऽ खूब गजै छी ,

चोरी टा सँ मोन भरय नहि

{पेट तऽ बिना चोइरोक भरैए}

ताँय डकैती पर उतरल छी

तैँ की डकैत कहत संसार!

बेसी हमरा सँ के बुधियार!!

 

 

हम मजदूर बिहारी

¤*******¤****¤

हम मजदूर बिहारी

भैया,हम मजदूर बिहारी

घर छोड़ी लाचारी

भैया,हम मजदूर बिहारी।

हमरे बल पर नहर-छहर

आ बनय महल अटारी,

हमरा स्वेदे लहलहाइत फसिल,

पंजाबक खेती-पथारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी।।

आसेतु हिमालय पसरल सगरो,

हमरा काज ने कोनो भारी;

सोझमतिया हम मारल जाइ छी,

नफ्फा लूटय बणिक-व्यापारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

अखरा नोन आ मिर्च हरियरका

संग प्याजु सोहारी,

रुक्खा-सुक्खा खा जीबै छी

के कीनत महग तरकारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

घर बनबितो बेघर रही

भेटय सगरो टिटकारी;

कतहु 'भैया' 'बंदा'कतहु

चलय करेजा आरी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

उपजाओल हमरे भोग ने हमरा,

कखनो कऽ बिचारी;

बैठल ठाँव जे बात बनाबय

आगाँ ओकरे भरि थारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

माया-जाल प्रपंच बनल ई

योजना सब सरकारी;

कोनो दल सरकार बनै छै

लागै एक्के बेमारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

बौआ-बुच्ची किताब ने काँपी,

कनियाँ के ने निम्मन साड़ी;

मेहनतकश के मोल ने एतबो

समय केहेन ई भारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

खन असोम तऽ खन मुंबई मे

हमरे पर गोला-बारी;

मनिआडर के आस मे परिजन

सुनि दै औनी-पथारी।

भैया,हम मजदूर बिहारी॥

 

स्वप्न-परी

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ऐ स्वप्न परी घड़ी दू घड़ी, बिलमि कनेको जाउ ने।

तृषित नयन निहारि रहल,

झलक देखा तरसाउ ने॥

काल कराल केर चक्र चलय अछि,

रस क्षण केर पीबि लियऽ।

जानि ने की अछि अगिला पल मे,

एहि पल के जीबि लियऽ॥

प्रबल प्रतीक्षे पीड़ित छी,

कय मन उन्मन भरमाउ ने!

ऐ स्वप्न परी.......॥

जन जीवन मे उत्ताप बढ़ल,

सब किछु बनल व्यापार अछि।

सब संबंध शिथिल पड़ल,

ससरि रहल संसार अछि॥

तप्त बनल जीवन-मरुथल,

स्नेहामृत बरिसाउ ने!

ऐ स्वप्न परी....॥

खिलल कमल-दल अछि मुख-मण्डल,

मधुरिम हास सुशोभित।

मन भमरा भमि-भमि आबय,

अधर सुधा-रस लोभित॥

दय ग्रिव-हार लवंग-लता भुज,

कुंतल घटा घहराउ ने!

ऐ स्वप्न परी....॥

ई मदिर नयन छलकाबय हाला,

भरय दियऽ थोड़ जीवन-प्याला।

यौवन रस केर धार ने बान्हू,

डूबि मरय दियऽ आइ ने थाम्हू।

दु:ख दर्द केर शव पर नेहक

सिँगरहार झहराउ ने!

ऐ स्वप्न परी......॥

ई चंचळ चितवन चोरी चोरी,

उन्मादक ज्वारि उठाबय अछि।

रुन-झुन खन-खन खिळ-खिळ हासे,

मनक सितार बजाबय अछि॥

कदलि थंभ पर केहरि कटि ई,

ता पर सुमेरु उठाउ ने!

ऐ स्वप्न परी......॥

सुंदर तन आ सुंदर मन अछि,

मंदिर हमर अहीँ छी।

प्राण अहाँ मे ध्यान अहाँ मे

अहीँ आकाश मही छी॥

अटकी भटकी जीवन पथ पर,

गेंठ कने सोझराउ ने!

ऐ स्वप्न परी......॥

 

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