वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।
१.
प्रो. वीणा
ठाकुर-महाकवि मार्कण्डेय
प्रवासी श्रद्धांजलि
२.
किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा-
मुन्नाजी ३.
कपिलेश्वर
राउत-मिथिलाक विकास
बाधा
१
प्रो. वीणा
ठाकुर
अध्यक्ष, मैथिली विभाग,
ल.ना.मि. विश्व िवद्यालय, दरभंगा
महाकवि मार्कण्डेय प्रवासी श्रद्धांजलि-
राजसी स्वभाव, सौम्य मुख-मुद्रा, शिष्ट व्यवहार शालीनताक प्रतिमूर्ति प्रवासी जीक जीवन सन् संवतसँ बान्हल समए नहि थिक, अपितु ओहि रचनाकार कलाकारक जीवन थिक जे वर वृक्ष सदृश्य होइत अछि। वस्तुत: प्रवासी जी कवि-महाकवि, निवंधकार, पत्रकार, साहित्यकार-उपन्यासकार, कथाकार-व्यंग्यकार छलाह। जखन हम प्रवासी जीक विषएमे कल्पना करैत छी तँ मोनमे एकहिटा बात अबैत अछि जे प्रवासी जी काव्यक स्तरपर, साहित्यक स्तरपर विचार आैर जीवनक स्तरपर समस्त संकीर्णताकेँ तोड़ैत आधुनिक सांस्कृति चेतनाक संवाहक छलाह। प्रवासी जी समएक तालकेँ चिन्हलनि, समस्त प्रभावकेँ ग्रहन केलनि, और अव्यानात कएलनि और ताहि करण्ो हिनक जीवनक समएक सीमा -सीमा हीन- भऽ गेल अछि।
प्रवासी जीकेँ बुझवा लेल दू स्तरपर विचार करव आवश्यक भऽ जाइत अछि- पत्रकारक रूपमे तथ्यात्मक समएक प्रतीति और सृजनशील रचनाकारक रूपमे हुनक शाश्वत काल बोध। पत्रकारक समए ठोस तथ्यक समए होइत अछि और जाहि ठाम सामयिक घटना ओकर चेतनाकेँ निरन्तर मथैत रहैत अछि। तात्कालीन समस्त विभत्स घटनासँ हिनका प्रत्यक्षीकरण भेल और समयक एहि धारकेँ हिनक पत्रकार उजागर कएलक, और ई प्रगट भेल आर्यावर्तक सम्पादकक रूपमे अक्षर जगतक सम्पादक रूपमे मिथिला मिहिरमे झामलालक झामा, माटि-पानिमे कहलनि। गोनू झा ‘व्यग्य-स्तम्भ रूपमे प्रवासी जीक पत्रकारक और समयक विषम प्ररिस्थिति ओकरा सामाजिक चेतनासँ युक्त नव यर्थाथ परक दृष्टि प्रदान कएलक और जाहिमे हिनक पत्रकार देशक राजनीतिक आर्थिक एवं सामाजिक विसंगतिसँ उत्पन्न संकटसँ समंजनक प्रयास कएलक।
दोसर दिश हिनक रचनाकार शाश्वत समयक धारासँ जुड़ल रहल। शाश्वत समयसँ जुड़वाक भाव हिनका अन्तर्दृष्टि प्रदान कएलक और कवि प्रवासी जी आत्योलष्जिक प्रक्रियासँ स्थापित भऽ शाश्वत मूल्यक प्रतिष्ठा करए लगलाह, संगहि अपन रचना द्वारा ओहि मूल्यकेँ सार्थकता प्रदान करए लगलाह। प्रवासी जी मानव वघटनक ओहि कालमे मानव जिजीविषाकेँ स्थापित करए लगलाह।
प्रवासी जी आइ हमरा लोकनिक बीच नहि छथि, आव एकटा दूरी बना कऽ हुनक रचना और जीवनकेँ देखल जा सकैत अछि। तथापि एतेक धरि सत्य जे ओ काव्यसँ मात्र प्रेमेटा नहि करैत छलाह अपितु जीवनसँ थाकि कऽ काव्येमे शांति प्राप्त करैत छलाह। काव्यहुँमे गीत काव्यसँ प्रेम हिनक सभठाम उजागर होइत रहल। किएक तँ आदिम मानव-मनक आदिम उद्गार थिक गीत काव्य। आदिम आर्यन्मक प्रथम चेतना, सौर्न्दय बोधक प्रथम उन्मेष तथा आदिम हृदयक प्रथम स्पन्दन थिक गीत काव्य, और ई सुरक्षित अछि उषा गीतक रूपमे, उर्वशी-पुस्रंबाक सम्वेदना-सम्वादमे तथा इन्द्र-वरूरणक वन्दना-अर्चनामे और एहि प्राचीन परम्पराक प्रथम लििप-बन्धन थिक वेद, विशेषत: सामवेद। काव्य जौं गीतकेँ भिन्न अस्तित्व प्रदान कएनिहार प्रधान तत्व थिक स्वानुभूति, जाहिसँ ई विषयी प्रधान (subjective) भऽ जाइत अछि और एकरहि अभावमे काव्य विषय (objective) भऽ जाइत अछि। तथापि गीत काव्य लेल स्वानुभूतियोसँ महत्वपूर्ण भऽ जाइत अछि रागात्मक वृति। रागक संबध रतिसँ अछि और रति स्थायी भाव थिक, जे भक्ति एवं श्रृंगार दुनूमे पाओल जाइत अछि। यएह कारण थिक जे आदिम उषागीत आधुनिक काल धरिक गीत काव्यक विषय श्रृंगारिक रहल आएल अथवा भक्ति। दुनू प्रकारक भाव वोधमे प्रधान भऽ जाइत अछि स्वानुभूित। उषाक चित्रणमे वैदिक ऋृषिक एहने स्वानुभूति अछि एवं ऋृग्वैदिक वरूणक स्तुतिमे एकान्त तन्मयता। वस्तुत: रागात्मक भावाधारित (रतिभाव) चाहे श्रृंगारिक भावना हो अथवा भक्ति भावना दुनूमे द्रष्टाक स्वानुभूतिक अहम भूिमका रहैत अछि। और यएह स्वानुभूति भेटैत अछि प्रवासी जीक गीतमे।
हुनकासँ भेल वार्ताकेँ जौं स्मरण कएल जाए तँ यएह स्पष्ट होइत अछि जे गीतक प्रतीक्षा हुनका राग विलक्षण छल। इहो सत्य अछि जे अपन काव्यपर चर्चासँ ओ सदैव अपनाकेँ बचबैत रहलाह। एकटा संवादमे संकोचक संग कहने छलाह- “अपन काजक मर्यादाक भीतर और ओहिमे उपलब्ध अवकाशक कारण, हमरा किछु कहवाक अवसर जौं अन्यत्र नहि भेटैत अछि तँ आपद धर्म कारण काव्ये, विशेष कऽ गीते हमरा माध्यम भेटैत अछि, जतय हम अपन बात विना कोनहुँ लाग-लपेटक कहि सकैत छी। कहि सकैत छी जे काव्ये हमरा लेल सभसँ नीक माध्यम रहल अछि।”
एहि छोट-छीन आलेखमे प्रवासी जी रचित समस्त रचनाक मूल्यांकन असंभव, तेँ हम मात्र िहनक काव्य संकल्न ‘हे हम भेटव’क आधारपर, हिनक सान्निध्यकेँ पुन: पुन: स्मरण करैत, हिनक व्यक्तित्व मूल्यांकन जे हमरा लेल असंभव थिक, अपन व्यक्तिगत अनुभवकेँ पाठकक संग वाँटए चाहैत छी। यद्यपि सान्निध्यक व्यक्तिगत सुखकेँ शब्द द्वारा व्यक्त करब असंभव होइत अछि, शब्दक सार्मथ्यक एकटा सीमा होइत अछि। तथापि किछु शब्दमे व्यक्त करवाक संभवत: प्रयास तँ कएले जा सकैत अछि।
प्रवासी जीक प्रथम कविता ‘हम भेटव’ भविष्यक संकेत मात्र नहि थिक अपितु अपन सहज और विवेकशील भाषाक माध्यमसँ प्रवासी जी ई प्रमाणित कऽ देलनि जे एहि ‘स्वान्त: सुखाय’ विधाक माध्यमसँ नहि मात्र अपन अर्न्तपरिष्करण सम्भव अछि अपितु प्रकारान्तरसँ मानवीय दायित्वक निर्वाहण सेहो। ‘हम भेटव’ काव्य संग्रहक बेशी कविता छोट-छोट अछि जाहिमे छोट-छोट मुद्दा सजीव और मार्मिक क्षणकेँ संयोगी कऽ राखल गेल अछि। एतए कविक निजी इच्छा अछि, समयक दवाब अछि, भाषाक गम्भीरता अछि, आस्था अछि और नव बाट ताकवाक बेचैनी सेहो अिछ। कहवाक तात्पर्य जे एहि छोट-छोट काव्यसँ प्रवासी जी काव्यस्वादक एकटा विशाल परिधिक निर्माण कएने छथि। अपन सामाजिक सरोकार और प्रकारान्तरसँ अपन मानवीय दायित्वपर भरोसा करैत प्रवासी जी कहि उठैत छथि- “जहिया-जहिया दृदएहीनता खटकत मोनक वाटपर। हम भेटव-इतिहास-नदीक चिक्कन चुनमुन धाटपर। जहिया-जहिया मैथिलत्व हारल थकियाएल सन लागत। हम भेटव-तिलकोर जकाँ-चतरल साहित्यक वाटपर।” कवि कर्मक यएह दायित्व प्रवासी जी लेल भविष्यक महात्वाकांक्षा थिक। तखनहि तँ शब्दक खिलाड़ी शब्दक शक्ति और सीमाक पड़ताल करैत कहैत छथि- “आइ अर्थ विहीन भाषाण मात्र कविता अछि। आइ मोनक बात कहवामे असुविधा अछि।” मुदा कवि निराश नहि छथि, कहैत छथि- “प्रवासी केर गजलमे कनैए मिथिलाचलक महिमा।” सुवासित साधना अछि नष्ट भऽ रहले, तुरन्त सम्हारू। जीवनक समस्त विडम्बनाकेँ चित्रित करैत प्रवासी जी कहि उठैत छथि- “अपने घरमे आव प्रवासक- अछि विडम्बना प्रवासी अपने दाँत अपन अघरक मुद्रित किताबकेँ कुतरैए।” पुन: कवि आशावादी होइत कामना करैत छथि- “चलह प्रवासी: अषाढ़क आह्वान करी, शीतल जलक कामना मनमे शेष अछि।”
काव्यक क्राफ्टक अपेक्षा कथ्यक गम्भीरता और सादगीपर हिनक विशेष ध्यान छन्हि, तखनहि तँ शब्दक चयनमे तत्सम, तदभव अथवा अन्य देशज शब्दक प्रयोग कवि सायास नहि करैत छथि अपितु कथ्यकेँ यांत्रिक होएवाक आयास पाठककेँ नहि होमए दैत छथि। जखन कवि कहैत छथि- ई मैथिलीक नमस्कार छथि : प्रवासी, ई एन-मेन लगै छथि। तत्सम प्रणाम- सन। अथवा सुशब्दमे, सुगंधमे, सुवुद्धिमे बसह प्रवासी, सत्यपर शिव जकाँ ढरि जाइछ सुन्दरता। वस्तुत: हिनक प्रत्येक शब्द प्रत्येक पंक्ति, प्रत्येक रचना पाठकक स्मृतिमे संयोगि कऽ राखल कविता थिक।
हिनक राजनैतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक सोच स्पष्ट अछि, मुदा हिनक काव्य राजनैतिक सामाजिक दस्तावेज नहि थिक। अपन अर्जित सत्य हिनक प्रत्येक काव्यमे मुखर भेल अछि। अनन्त रूपात्मक, अनन्त भावात्मक संसारक सूक्ष्म मुदा ठोस पहचान हिनक काव्यमे चित्रित अछि। समए मनुष्यक अनुभूतिकेँ जाहि मूलवर्ती सम्वन्धसँ दूर कऽ देने अछि हिनक काव्य तकरा जोड़वाक उपक्रम करैत पाठककेँ अपनहि जिज्ञासा मध्य ठाढ़ कऽ दैत अछि। प्रवासी जी अपन काव्यक बीज तत्व समाजक ओहि वर्गसँ लऽ कऽ आएल छथि, जकरा प्रति हिनक प्रतिबद्धता छन्हि। हिनक प्रत्येक कविता एहि वैविध्यमय जीवन जगतक भिन्न-भिन्न धरातल-आएल आशय- उदेश्यक अनुगूँज लेने अछि तथा पाठककेँ अपन समए-संसारमे जोड़वामे सक्षम अछि। पाठक अपन सुख-दुख, त्रास-ताप, ओकर खालीपन भरल हवाइ अनुभूति हिनक काव्य मध्य आकि लैत अछि।
हिनक काव्यमे निहित व्यंग्य हिनक सम्प्रेषण क्षमताकेँ सहज बना दैत अछि। और यएह व्यंग्य हिनक काव्यमे, हिनक हृदएमे सुलगैत आिगकेँ अभिव्यक्त कऽ दैत अछि। प्रवासी जी कोनो ‘वाद’क कवि नहि छथि तथापि एकटा मौन क्रान्ति, एकटा शालीन असहमति, एकटा दृढ़ अस्वीकार भाव हिनक रचनामे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइ अछि। उपरसँ चुप मुदा भीतरसँ क्रन्दन हिनक रचनामे नुकाएल रहैत अछि। यद्यपि उपरका मौन हिनक कमजोरी नहि छन्हि, अपितु यस्व’क निषेध करैत स्वाभाविकताक निकट आबि जाइत अछि। दोसर शब्दमे मानवताकेँ बचाएब और भविष्यक निर्माणक बेचैनी, तड़प और संघर्षक अछि। वस्तुत: हिनक संघर्ष दू धरातलपर मुखर होइत अछि- एक दिश जौं जीवन एवं मानवताकेँ बचाएवा लेल अछि तँ दोसर दिश रचनात्मकताक संघर्ष सेहो दृष्टिगोचर होइत अछि। प्रवासी जीक रचना जौं एकहि संग जटिल और कठिन अछि तँ दोसर दिश सहज और सरल। एहि दू वैपरित्यक मध्य ई अपनाकेँ साधि लेने छथि। जेना मानवताकेँ अपन शब्द-वाहन दऽ हम जगवै छी कोनो सत्यक पहिल कल्पना- कऽ हम कवि कहवै छी। वर्तमानकेँ जे भविष्य’दर्पणमे देखि रहल छी। तेँ अनन्त दिश काव्याध्यात्मिक स्वरकेँ साधि बढ़ल छी।
प्रवासी जीक काव्यमे अनुभव जगत अत्यन्त व्यापक अछि। साहित्यक प्रत्येक दिव्यामे हिनक रूचि अन्त धरि बनल रहलनि। संस्कृति, वेद-पुराणसँ लऽ कऽ संस्कृति कलासिक्स अछि कतेको वेद अछि जाहिमे प्रवासी जी डुवल रहैत छलाह। ताहि कारणें हिनक रचना संसार वैविध्यपूर्ण सम्पन्नतासँ परिपूर्ण अछि। एहि दृष्टिए प्रवासी जीकेँ स्मरण करैत छी तँ जे कविता आँखिक सोझा आबि जाइत अछि ओ थिक- आब चुप रहने चलत नहि काज, लाचार युद्धिष्ठिर छी, बाजू अछि जनतन्त्र कतए। हमरे पिरवेशक रंगीन झूठ, कहवामे असुविधा अछि, परशुराम चाही, मोनक वैशालीमे इत्यादि।
समयक शाश्वतमे प्रवासी जी मृत्युकेँ जीवनक विकास मानलनि, मृत्यु बोध हिनका जीवनक प्रति आशावादी बनौने रहलनि, मृत्युकेँ सृष्टिमे जीवनक सतत् प्रक्रिया और ओकर क्रमगत विकासक रूपमे स्वीकार करैत, शाश्वत सत्यक उद्धाटन करैत कहलनि- ‘हमर कैलास हमरेसँ पुछैए जे हम के छी, हमर जिहवका शय्याकपर- हमर शब्दो सुतैए नहि। प्रवासी गीत बन्हकी राखि कऽ ई गजल अनने छी, परीक्षा अछथ् की एकरो- क्यो पढ़ैए वा सुनैए नहि। मुदा हिनक मृत्यु वोध जीवनक प्रेरक वोध थिक, जीवन और समयक शाश्वत श्रृंखलासँ एक होएवाक विजय उद्घोष थिक।
अत्यन्त समृद्ध शिल्पक स्वामी प्रवासी जीक भाषा साधल और तापसँ युक्त छन्हि। ओ भाषाकेँ बहुत सचेत होइत सहज मुदा अनुभव-गम्यएटा प्रदान कएने छथि। भाषाक उपमान एतेक टटका और प्रभावी छन्हि जे पाठककेँ सहजहि बान्हि लैत अछि। वस्तुत: प्रवासी जी बोल-चालमे भाषाक श्लेषात्मक शक्तिक प्रयोग करैत भाषाक सर्वथा एकटा नव मिजाज देलनि अछि और शिल्पमे हिनक प्राकृतिक वातावरणकेँ पूर्त करवाक विशिष्टता सर्वथा अनुपम छन्हि।
वस्तुत: एकटा इमानदार रचनाकारक नियति यएह होइत अछि जे ओ सम्पूर्ण विश्वक काल-कट विष अपन हृदएमे धारण करैत, जीवन मंथनसँ निकलल अमृत रचनाक माध्यमसँ समाजकेँ प्रदान करैत अछि। यएह रचनाकारक आत्मदान होइत अछि। वस्तुत: कलाकार निरन्तर अपन व्यक्तिगत मोनकेँ एक महानतर मोनमे, और अपन क्षणिक अस्तित्वकेँ एक विशालतर अस्तित्वक उपर िनछावर करैत रहैत अछि। अपन निजी व्यक्तित्वकेँ एक वृहत्तर व्यक्तित्वक निर्माण मिटवैत रहैत अछि। यएह मिटनाइ साहित्यक अमरताक मूलाधार होइत अछि, किएक तँ भविष्यक उज्ज्वल वाट एतहिसँ निकलैत अछि। मानव मूल्यक निर्माण एतहि होइत अछि। सपनाक नीव सेहो अछि धरातलपर राखल जाइत अछि। वस्तुत: प्रवासी जी अपन सम्पूर्ण रचनामे एहने मानवीय आस्था और जिजीविषाक इवारत रचि अमर भऽ गेल छथि।
२.

किएक अछोप बनल अछि मैथिली लघुकथा विधा- मुन्नाजी
चलनमे जे आबि जाए वैह परम्परा बनि जाइ छै। आ लोक द्वारा ओतैसँ ओकरा उघबाक प्रक्रिया प्रारम्भ भऽ जाइत अछि। आ आगू पीढ़ी दर पीढ़ी ओ स्वयं हस्तान्तरित होइत आगाँ बढ़ल चलि जाइत अछि। मुदा जे अपन परम्परा ठाढ़ करबा लेल पुरना परम्पराकेँ तोड़ि वा धकेल कऽ अपन अलग रस्ता बनबैत अछि ओकर सर्वग्राही हएब कठिनाहे नै वरन् असम्भव होइत छैक। एहिना मैथिली लघुकथा मैथिलीक आने विधा जकाँ हिन्दी वा अन्यान्य भाषाक देखाउँसे लिखाए तँ लागल मुदा लगभग तीन दशकक स्वतंत्र यात्राक पछातियो अपन स्वतंत्र विधा वास्ते अपने दुरापर अछोप नहाइत ठाढ़ बुझना जाइत अछि।
अपन शैशवावस्थामे सभ भाषाक लघुकथा कथाक छेँट वा आकार मात्रे लघु भऽ सोझाँ आएल। जेना मैथिलियोमे सैह भेल। प्रारम्भिक अवस्थामे कियो लघुकथाक प्रकृति बुझबासँ बेसी एकरा लिखि अपन नामकेँ एकटा आर विधासँ जोड़बाक लौल केलनि। लौल शब्दक प्रयोह ऐ द्वारे जे ओइ विधाक रचनासँ तारतम्यता वा नियमितता नै राखि अपन पारम्परिक विधाक संग सटल रहि गेला। जँ ओ सभ प्रारम्भेसँ ऐ पर ध्यान देने रहितथि तँ शाइत इहो मोकाम पौने रहैत। मैथिलीयो लघुकथा आन भाषाक लघुकथासँ नव नै अछि। मुदा आइ हिन्दी समेत अन्य क्षेत्रीयो भाषाक लघुकथा अपन मोकाम बना लेवामे सक्षम भऽ गेल अछि। यथा ओड़िया, असमिया, मलयालम। मुदा मैथिली लघुकथा आइयो देहरिये-दुरुखे अछोप नहाँइत बौआइत देखाइत अछि।
प्रारम्भमे कथाकार आ कवि सबहक समवेत उद्वेगक परिणामे जनमल मैथिली लघुकथाकेँ अपन शैशव कालक सुखद परिणाम कहल जा सकैछ जे लघुकथाक बीया मैथिलीयोमे बागि देल गेल।
समयान्तरे ई जेना-जेना आन विधासँ विलगल गेल तेना-तेना ऐ रचना प्रक्रियाक घनिष्ठता गद्य रचनाकार संग भेल गेल। मुदा ओहि समयक स्थापित सभ कथाकारक ई उत्कंठा नै छलनि आ नै रहलनि जे कथे जेकाँ लघुकथोपर अपन छाप रखितथि। ओना ई सत्य अछि जे कथाकार जँ लघुकथाक स्वरूप (प्रकृति) वा शिल्प नै पकड़ि सकलाह तँ ओ नीक कथाकार भलहिं होथु मुदा नीक लघु कथाकार किन्नहुँ नै भऽ सकैत छलाह। प्रायः तहू डरे शुरुआतीमे लघु कथा लेखनक पछाति ओ सभ एहि विधासँ अपन हाथ पएर समेटिये लै मे अपन कबिलताइ बुझलनि, जे मैथिली लघुकथाक लेल अशुभ संकेत दैए।
कथाकारक उदासीनताक कारणे सेहो एकरा अछोप सन रहबाक लेल ग्रसित केलकै। पूर्वार्द्धमे जे कथाकार सभ एकरा लिखलनि ओहिमे सँ किछु गीनल, बीछल कथाकार एकरा लिखैत रहि गेलाह जाहिमे शैलेन्द्र आनन्द, तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी, देवशंकर नवीन, परमेश्वर कापड़ि, सुस्मिता पाठक, चण्डेश्वर खाँ, नवीनचन्द्र कर्ण सदृश कथाकारक नाम उल्लेखनीय अछि। समयान्तरे उपरोक्त अधिकांश रचनाकार ऐ सँ विमुख होइत गेलाह। सम्प्रति तीन गोट रचनाकार यथा तारानन्द वियोगी, प्रदीप बिहारी आ चण्डेश्वर खाँ अपन निरन्तरता बनौने छथि, जाहिमे वियोगीजीक ऐ विधाक प्रति कएल काज ऐतिहासिक वा अविस्मरणीय कहल जा सकैत अछि। ऐ पीढ़ीक सशक्त कथाकार श्री विभूति आनन्दक ठाम ठीम लघुकथा देखबा-पढ़बामे आएल। हुनकर लघुकथाक प्रति उदासीनता वा कथाक प्रति आदर्शता की कहि सकैत छी? एकर प्रामाणिकता हुनकासँ भेल दूरभाषिक सामान्य वार्तालापेँ एना सोझाँ आएल। ओ कहलनि- शुरुआतमे किछु लघुकथा लिखलौं, मुदा बादमे जे लघुकथा सभ लिखै छी ओ जहाँ चारि-पाँच गोट लघुकथा होइत छैक तँ एकटा कथा बनि जाइत अछि। एकदम अनसोहाँत लागल। हमरा विचलित केलक हुनक ई वाक्य। मुदा अगिले क्षण ध्यान ओतऽ टिकल- ओ कथा विधाक निस्सन हस्ताक्षर छथि। हुनक सोच कथाक प्रति गम्भीर छनि। तेँ हुनक कोनो छोट-पैघ सोच कथाक प्रतिरूप होइछ।
कारण जे किछु रहौ, हुनका सनक आनो कथाकारक एहि सोचसँ लघुकथाक प्रति उदासीनता स्पष्ट झलकैए। हम बड्ड आह्लादित भेलौं विदेह ई-पाक्षिकक अंक ६१मे अग्रणी पीढ़ीक कथाकारक रूपेँ फराक अस्तित्व राखऽवाली “शेफालिका वर्मा” जीक लघुकथा देखि। जे शिल्पक आ कथानकक दुनू दृष्टियेँ आ संपूर्ण रूपेँ प्रतिनिधि लघुकथाक श्रेणीमे राखऽबला छल।
मैथिली रचनाकार द्वारा प्रारम्भमे एकरा नव चीज बुझि लघुकथा लेखनमे अपन उपस्थिति तँ दर्ज कराओल गेल मुदा समयान्तरे हुनका सभकेँ एहि विधाक रचनाक संग उत्सुकता वा जुड़ाव नै बनल रहबाक प्रमुख कारण रहल जे हुनका सभकेँ एहि विधा मादेँ आगाँ कोनो आर्थिक वा साहित्यिक लाभ दूर-दूर धरि नै देखा पड़ल हेतैन। तकरो ऐ सँ विमुखताक प्रमुख बिन्दु मानि सकैत छी। आर्थिक लाभसँ तात्पर्य जे लघुकथाक माध्यमेँ ओ कोनो मंचपर नै बजाओल जा सकैत छलाह, कारण जे सरकारी तँ दूर निजी रूपेँ सेहो एकर कोनो मंच आइ धरि स्थापित नै भेल अछि। जेना आन विधामे किछु तथाकथित रचनाकार वरु अस्तित्व नै बना पाओल होथु, मुदा कतौ सरकारी वा गएर सरकारी लाभक बेर अबै यथा रचना प्रकाशन वा रचना पाठ्ज- जतऽ पारिश्रमिक वा किराया भत्ता भेटौ तँ ओतऽ धरि भाइ-भैयारिये वा जी हुजुरिये, पछिलगुआ संस्कृतिक संचरण करैत स्थापितो रचनाकारकेँ धकिया, कात कऽ अपन खुट्टा गारि लैत छथि। ओहोन कोनो प्रकारक लाभक आशा हुनका सभकेँ दूर-दूर धरि दृष्टिगोचर नै भेलनि वा नै भेल हेतैन तेँ अपनाकेँ ऐ विधासँ कात केने रहलाह। ऐ विधासँ साहित्यिक लाभ सेहो भेटैबला नहि। साहित्यिक लाभक अर्थ जे- जे किछु रचनाकार ऐ विधामे निःस्वार्थ भावे लिखैत रहि गेलाह, तिनकर एखन धरि लघुकथाकारक रूपेँ पहिचानक कोनो आशा नै आ ने मैथिली लघुकथा विधाक फराक कोनो जग्गह भेटि सकल।
हँ, दू गोट रचनाकार अप्पन करनीये मैथिली लघुकथाकारक रूपमे देखार तँ भेलाह। श्री तारानन्द वियोगी, जिनकर शिलालेख लघुकथा संग्रह आ कर्मधारय लघुकथाक समीक्षात्मक पोथी एवं प्रदीप बिहारी जिनक खण्ड-खण्ड जिनगी लघुकथाक संग्रह प्रकाशित अछि। मुदा मैथिलीक मठाधीश सभ द्वारा “नै उठलौ तँ भारी तँ लगलौ” बला कहावतकेँ चरितार्थ करैत कहल गेल- दुनू गोटे पाइबला लोक छथि तँ अपन संकलन प्रकाशित कऽ लैत छथि तै सँ की लघुकथाकार कहेता? मुदा हिनक श्रमक महत्व वा संग्रहक महत्वकेँ बुझबाक प्रयास नै कएल गेल। महत्व नै देबाक ऐतिहासिक कारण रहल। उपरोक्त दुनू व्यक्तिक गएर ब्राह्मण हेबाक। “मैथिलीमे बभनौटी (बाभनवाद) अदौसँ चलि आबि रहल अछि। जखनकि प्रारम्भ सँ ई लिखतममे पूर्णतः कायस्थक द्वारा संचालित भाषा छल (जकरा कि बाभान आकि रार ककरोसँ कोनो रागद्वेष नै छलै)। भाभनक भाषा तँ संस्कृत छल (बोली-चालीमे सभ कियो मैथिलीये बजै छल) जकरा ओ पंडिताइक माध्यमे भजबैत छलाह। मुदा जखन मैथिली स्थापित होमऽ लगलै, जखन ऐ मे कमाइक जोगार देखेलै तखन सभ ठाम कुण्डली मारि बैसि गेला ब्राह्मण बभनौटी देखाबऽ लगला। ओइमे ठठल रहल एकमात्र कर्ण कायस्थ। रारकेँ ई सभ ऐ तरहक कोनो गतिविधिमे टपऽ नै देबाक संकल्प लेलनि आ जकर मूल वैचारिक भाषा मैथिली छलै ओएह सभ ऐ सँ दूर कऽ देल गेलाह” (रमानन्द रेणु, मिथिलांगन, अप्रैल-जून २०१०)- सएह दुराग्रह। पक्षपात मैथिली लघुकथाक संग सेहो भेल। ओना आब ई मिथक टूटि गेल अछि।
मैथिलीक भाषा सहित्यिक विकासक मादेँ बहुत रास सरकारी, गएर सरकारी संस्थान काज कऽ रहल अछि। यथा- साहित्य अकादेमी, दिल्ली; मैथिली अकादमी, पटना; भोजपुरी-मैथिली अकादमी, दिल्ली; पूर्व क्षेत्रीय भाषा केन्द्र, भुवनेश्वर; भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.)मैसूरक अतिरिक्त किछु निजी संस्था सभ जे प्रकाशन सेहो करैत अछि। एकर जेकियो प्रतिनिधि बनाओल गेलाह ओ सभपारम्परिक विधा यानी कविता, कथा किछु हद तक निबन्धक वास्ते विभिन्न तरहक कार्य/ गोष्ठी केलनि। हँ ठाम-ठीम नाटकक वास्ते सेहो काज भेल। मुदा लघुकथा मादेँ हिनका सबहक स्वतंत्र सोचब तँ दूर कथा संग्रह प्रकाशनक समय कथा संग्रहमे सतौत या पितियौत भाय नहाँइत संग लगा सकैत छलाह। आ ओहि माध्यमे ई थोड़े आओर जगजियार होइत।जेना कि तमिष वा मलयालम साहित्यिक संस्थाक प्रतिनिधि सभ कऽ रहल छथि आ ई दुनू भाषाक लघुकथा अपना बलेँ देखार भेल अछि। मैथिलीमे तँ दूर-दूर धरि एहेन सोच या काज देखार भऽ सोझाँ नै आबि सकल अछि। ताहिमे प्रमुख दूटा कारण हमरा जनतबेँ प्रमुख अछि- पहिल ओहि प्रतिनिधि सभक लघुकथाक प्रति अज्ञानता, दोसर ओइ प्रतिनिधि सबहक नजरीये लघुकथाक उसराहा खेत।
मध्यम पीढ़ीक रचनाकार सभमे सँ किछु लोक अप्पन सर्जनात्मक ऊर्जा स्रोतेँ ऐ विधाक अलग जमीन तैयार करबाक अथक प्रयास केलनि। सत्य कही तँ वैह सभ ऊसर खेतकेँ कोड़ि-पटा कऽ एकर आधार रखबामे सक्षम भेलाह। हँ, ओ आधारकेँ मजगुत करैत एहि जमीनकेँ तीन फसिला सन बनेबाक वा हरल-भरल बनेबाक पूर्ण श्रेय नवका पीढ़ीकेँ जाइत अछि। सत्य! नवका पीढ़ीक किछु रचनाकार सक्रिय आ स्वतंत्र रूपेँ लघुकथाकेँ मोकाम धरि लऽ जेबाक लेल अपन रचना स्रोतक सर्वस्व ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि, जाहिमे सभसँ ऊपर नाम अबैत अछि श्री अनमोल झा जीक, जे लगभग डेढ़ दशक पहिने (११९४-९५ क करीब) अपन लघुकथा लेखन, कथा गोष्ठीक माध्यमे शुरू कऽ लघुकथा माध्यमे अप्पन पहिचान बना पौलाह अछि। ओ एखन धरि लगभग तीन सए लघुकथा रचना कऽ गेल छथि, जाहिमे सँ सए सँ ऊपर लघुकथा विभिन्न पत्र-पत्रिका/ स्मारिकामे बहार भऽ देखार भेल अछि। ओना एखन धरि कोनो संकलन नै बहार भऽ पौलनि अछि। तकर पछाति नवका पीढ़ीक ऊर्जावान आ प्रयोगवादी रचनाकार “अहीं केँ कहै छी” संग्रह लऽ जोरदार उपस्थिति दर्ज करौलनि अछि श्री सत्येन्द्र कुमार झाजी, जे मूलतः लघुकथाक धुरझार लेखन करैत अपन दोसर लघुकथा संग्रहक शीघ्र प्रकाशनक प्रतीक्षारत छथि। अही पीढ़ीक तेजस्वी पत्रकार बहुविधानुरागी श्री गजेन्द्र ठाकुर अपन बहुविधाक संगोर- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक” मे किछु बीछल लघुकथा लऽ जोरगर उपस्थिति देखौलनि अछि।एहने प्रमुख रचनाकारमे नाम अबैछ मुन्नाजीक जे वर्ष १९९४ मे कथागोष्ठीक माध्यमे अपन पहिल रचना “नामरद” जाहिपर सहयात्री मंच, लोहना (मधुबनी) द्वारा “बहस”क आयोजन कएल गेल छल, आ पहिल प्रकाशित रचना लघुकथा- काँद भारती मण्डनक माध्यमे शुरू कऽ एखन धरि मूलतः अही विधाक रचना आ आलेखमे ऊर्जा खर्च कऽ रहल छथि। एकर अतिरिक्त मधुकर भारद्वाज, रघुनाथ मुखिया जीक सेहो रचनात्मक रूपेँ समृद्ध रचना सभ देखएल। गोटा-गोटी कऽ ठाम ठीम आर कतेको गोटे आब अय विधामे सहयोगी छथि।
उपरोक्त नामसँ अलग एकटा महत्वपूर्ण नाम अछि श्री चण्डेश्वर खाँ जीक जे मध्यम पीढ़ीसँ नवका पीढ़ीक बीच लघुकथा रचनाक निरन्तरताक बलेँ एकटा सेतु (पुल)क काज कऽ रहल छथि। ई सत्य अछि जे किछु गीनल वा बीछल रचनाकारक समूहे एकर स्वतंत्र विधामे स्थापित हेबामे अखन किछु भांगठ बुझना जाइत अछि। कोनो एहेन विधा जकर गोटेक दर्जन सक्रिय रचनाकार नै हुअए तँ ओकर स्वतंत्रता आन्दोलन भारतक स्वतंत्रता आन्दोलन १९४२ आ १९४७ क नै वरन् १८५७ क संग्राम सन भऽ कऽ रहि जाएत।
नवका पीढ़ीकेँ एकरा छटपटाहटसँ तँ बाहर आनि लेलक अछि आ आब एकर उग्रास होइत बुझैए। मुदा ऐ नवका पीढ़ीक एहेन रचनाकार सबहक कथालोचक वा समीक्षक द्वारा कोनो नोटिस नै लेल गेल अछि। ओना ई पीढ़ी पक्षपात/ गुटबाजी वा राग-द्वएषसँ दूर निःस्वार्थ भावेँ परिश्रम करैत सीढ़ी दर सीढ़ी आगाँ बढ़ि रहल अछि। मुदा कखनो कऽ ई सभ उपरका पीढ़ीक असहयोगक चलते वा कुटिलचालिये निरुत्साहित (मुदा अनाथ नै) सन अनुभव करैत अछि। एकर अतिरिक्त किछु लोक (रचनाकार) जे मैथिली भाषासँ इतर (यथा हिन्दी, बांग्ला एवं असमिया इत्यादि) पत्र-पत्रिकामे मैथिली कथा साहित्यक मादेँ लिखलनि, ओहो सभ ऐ मे लघुकथाक चर्चासँ अपनाकेँ एगदम दूर रखलनि। एकर दूटा प्रमुख कारण सोझाँ अबैत अछि-१.जे ओहि लेखक/ रचनाकारकेँ लघुकथाक ज्ञाने नहि हेतैन २.लघुकथाकेँ अखन अस्तित्वहीन मानि कऽ अछोप सन विलगा कऽ रखबाक साजिश भऽ सकैए।
३
कपिलेश्वर
राउत
मिथिलाक विकास बाधा-
मुख्य रूपसँ मिथिलाक जे क्षेत्र अछि से उत्तरमे नेपाल, दक्षिणमे गंगा, पूवमे बंगाल, पश्चिममे उत्तर प्रदेश। जकर जीबक पूख्य आधार कृर्षि अछि। मुदा अपना अहिठाम जाति व्यवस्था, धर्म व्यवस्था, लिंग व्यवस्था तेना ने समाजकेँ जकरने अछि जे एहि क्षेत्रक विकाशमे मूख्य रूपसँ बाधक अछि। एतेक परिवर्तन भेलाक वादो समाजमे रूठिवादिता, सामंतसोच हर व्यक्तिकेँ जकरने अछि। सराध, वियाह, उपनएनमे जरूरतसँ बेसी खर्च कऽ देव किएक तँ अपन रूआवकेँ प्रर्दशित करबाक लेल। हर काजकेँ धर्म आधारित मानव, ई सोलकन अछि, हम उच्च वर्ग छी, स्वर्ग, नरकक फेरा इत्यादि समाजकेँ जकरने अछि। मन गढ़ंत राजा-रजवारक खिस्सा-पिहानी कहि समाजकेँ बरगलेने रहब ई सभ मिथिला विकास आ मिथिलावासीक लेल अभिशाप भऽ गेल अछि।
जावत धरि एहि सभसँ उपर उठि सभकेँ अप्पन भाय-बन्धु बूझि उन्नत वैज्ञानिक आधारित कृर्षि, बाढ़ि रोदीसँ निजातक लेल व्यवस्था, जाति व्यवस्थाक लोप, दान-दहेजक समाप्ति, सामन्ति सोचकेँ नइ बदलव तावत धरि मिथिला वासीकेँ िवकासक कल्पना केनाइये बेकार अछि। मिथिला क्षेत्रक माटि तँ एहेन अछि जे सौंसे संसारमे एहन माटि कतो नै छै। अपना अहिठाम तँ जे फसल, जे तरकारी, जे फल उपजबए चाहब से उपजत आइ जे मिथिलाक मजदूर पंजाव-हरियाना पलायन कए रहल अछि से तुरन्त रूकि जएत। किसानकेँ जे आइ मजदूर नै भेटि रहल छन्हि आ दोसर दिस एहिठामसँ मजदूर दोसर राज्यमे काम करैले जाइत अछि से रूकि जेतै। समाजमे समरसता एते। सबहक दूख अपन दूख, सबहक सूखकेँ अपन सुख बुझए लागत तँ समाज स्वत: बदलि जेतै। एखन जे गौर मौगी गौरबे आन्हर बनल छी। से स्वत: मेटा जएत। जहिना अपना एहिठाम राजा जनक कृषिकेँ अपनाए कऽ राज चलौलनि आ अष्ट्रावककेँ गुरूवार बनौलनि तहिना हमरो सभकेँ करए पड़त। हार-चामक फेरासँ उपर उठए परत। आ तखने सर्वे भवन्ति सुखिना सर्वे सन्तु निरामया भऽ सकैत अछि। अपन मिथिला कोनो राज्यसँ विकसित बनि सकैत अछि।
एकटा भाखरानांगल डेमसँ जँ पंजाब-हरियाणा भारतक सिरताज भऽ सकैत अछि तँ हमर मिथिला किसान ने भऽ सकैत अछि। कोशीमे ब्राहक्षेत्र आ कमलामे शीशा पानी आ वागमतीमे नूनथरमे डेम बना देलासँ मिथिला तँ स्वर्ग बनिए टा जाएत आ हम सभ आनो-आनो राज्यकेँ विजली दऽ सकैत छी। जहिसँ आनो राज्य विकसित हएत। हर खेतकेँ पानि आ हर हाथकेँ काज भेट जएत। तँ जँ मूइलाक वाद जे स्वर्ग जाइत छी से जिवतेमे स्वर्गक भोग करए लागव। एकटा कल्पना सुनैत छिऐ जे मिथिलाकेँ मण्डन मिश्रक सुग्गा आ पानि भरनियो संस्कृतेमे गप्प करैत छल से आइ मिथिलामे ८० प्रतिशत मूर्ख कोना भऽ गेल। जखनि कि आओर आगाँ मुहेँ हेबाक चाही। हमरा समझमे एकटा मूल बात अबैत अछि जे किछु व्यक्ति विशेषमे अहंगक भावना। जहिना संस्कृत भाषा किछु व्यक्ति विशेष अपन खानगी बूझि कोठी कन्हेपर राखल रहि गेल आ आम जनतामे प्रचार-प्रसार नहि भऽ सकल तहिना मििथलाक मैथिलीयो भाषाकेँ ई रूप नै देखए परए।
* * *
