logo   

वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक 

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

Home ]

 

India Flag Nepal Flag

(c)२०००-२०२२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

India Flagकेदारनाथ चौधरी विशेषांक सम्पादकीय-

कथा १-१०

नाइट ड्यूटीमे छलौं, दू बजे राति मे हमर फोन टनटना उठल। हमर गप हमर कलीग, जे तमिल भाषी रहथि, सुनि रहल छली। फोन खतम भेलापर हिन्दीमे पुछलन्हि:

“कोन भाषामे अहाँ एक घण्टा गप कऽ रहल छलौं, बड्ड मीठ भाषा अछि”।

ऐ मिठासक खटास हुनका की बुझबितौं अहाँकेँ बुझायब। मुदा तइ लेल अहाँकेँ तैयार होमय पड़त। से पहिने भाग-१ मे स्टार्टर आ फेर दोसर भागसँ १००, २०० आ ५०० एम.जी. अहिना डोज बढ़ैत रहत।

 

कथा १

केदारनाथ चौधरी (१९३६- ), मैथिलीक पहिल फिल्म 'ममता गाबय गीत' केर निर्माता द्वयमेसँ एकटा निर्माता छथि केदारनाथ चौधरी आ दोसर मदनमोहन दास। बादमे आर्थिक मजबूरीवश तेसर सहनिर्माता भेलखिन उदयभानु सिंह।

माता-स्व. कुसुमपरी देवी, पिता- स्व. किशोरी चौधरी, जन्म: ०३/०१/१९३६

ग्रा.+पत्रा. – नेहरा (दरभंगा), अन्य पारिवारिक सदस्य-पत्नी-श्रीमती कुमुद चौधरी, संतान- प्रथम पुत्री-श्रीमती किरण झा, द्वितीय पुत्री-श्रीमती अर्चना चौधरी, शिक्षा- १९५८ ई.मे अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर, १९५९ ई.मे लॉ। १९६९ ई.मे कैलिफोर्निया वि.वि.सँ अर्थस्थास्त्र मे स्नातकोत्तर, १९७१ ई.मे मार्केटिंग एंड डिस्ट्रीब्यूशन विषयमे गोल्डेन गेट यूनिवर्सिटी, सानफ्रांसिस्को, USA सँ एम.बी.ए., १९७८ मे भारत आगमन। १९८१-८६ क बीच तेहरान आ प्रैंकफुर्तमे। फेर बम्बई, पुणे होइत रिटायरमेंटक बाद २००० सँ लहेरियासराय, दरभंगामे निवास।६ टा उपन्यास- चमेलीरानी २००४, करार २००६, माहुर २००८, अबारा नहितन २०१२, हीना २०१३, अयना २०१८. सम्मान- १) विदेह साहित्य सम्मान, बर्ख-२०१३ (झारखंड मैथिली मंच, राँची द्वारा), २) प्रबोध साहित्य सम्मान, बर्ख-२०१६ आ ३) केदार सम्मान, बर्ख-२०१६,'अबारा नहितन' लेल

कथा २

डॉ कल्पना मणिकान्त मिश्र

पिता डॉ शिव कुमार झा, गाम राटी, सासुर- गजहारा। मेडिकल शिक्षा जे. जे. हॉस्पीटल/ ग्रान्ट हॉस्पीटलसँ सम्पन्न कय स्त्री-रोग विशेषज्ञ। मुम्बइसँ १९८०-८२ मे प्रकाशित होइबला मैथिली पत्रिका "विदेह"क पति डॉ मणिकान्त मिश्र (निर्माता- मैथिली फिल्म- आउ पिया हमर नगरी) संग सम्पादन।

अपन २००९ केर ई-पत्र मे ओ लिखैत छथि:

गजेन्द्र ठाकुर जी केँ हमर नमस्कार! अहाँक पत्रिकाक हम नियमित पाठक छी। अहाँक वेबसाइटक पार्श्व गीत हृदय-स्पर्शी आर मधुर लागल।

आगाँ ओ अपन संस्मरण लिखै छथि जे विदेह सदेह २ मे (http://videha.co.in/new_page_89.htm) मे सेहो संकलित अछि:

मातृभाषा

मातृभाषाक प्रेम, बहुत किछु पढ़ल आ सुनल अछि। अहूँ सभ सुनने होयब, कतेक बेर, मुदा स्वयं अनुभव करबाक अवसर किछुएक लोककेँ भेटैत छन्हि। हम सभ बम्बइ आयले रही। ओना तँ ऐ गप्पक एक युगसँ बेसी भय गेल मुदा बिसरबाक हिम्मत नै कऽ सकैत छी, आर किएक बिसरु? महानगरीक चकाचौन्ध मे हरायल रही, कतौ भटकि नै जाइ से चिन्ता रहय। १९८०क दशक मे संजय गाँधीक एकटा योजना आयल छल, बेरोजगार ग्रेजुएट लेल बैंकसँ किछु सुविधा पर २०,००० रुपया देबय लेल। हमहूँ बेरोजगार डाक्टर रही। आवेदन केलौं तँ लोन तुरत्ते भेट गेल। मुदा आब ओइ पाइक हम की करु? अपन रोजगार जेना दवाइखाना, कोनो छोटसन घर आदि जतऽ भविष्यमे अपन क्लीनिक खोलि सकी, जेकि ओइ समयमे अति सुलभ आर सम्भव छल, आब तँ से ओइ पाइमे सपना भऽ गेल अछि। ओइ पाइसँ निवेश कऽ हम अपन भविष्य सुरक्षित कऽ सकैत छलौं, गहना-गुड़िया बना अपन सख-सेहन्ता पूरा कऽ सकैत छलौं बा भारत भ्रमण कऽ सकैत छलौं। मुदा नै!  हमर पति, डा.मणिकान्त मिश्रक इच्छा छलन्हि जे मैथिली भाषाक पत्रिका निकाली। हम दुनु गोटे मिलि कऽ 'विदेह' नामक मैथिली पत्रिकाक शुरुआत केलौं। पत्रिका तँ छपै, मुदा के कीनत आर के पढ़त? ई बड पैघ समस्या छल। कोनाहु कऽ कय अपन घरक पूँजी लगा कऽ २ बर्ख तँ पत्रिका चलेलौं। फेर हमरा सभकेँ बन्द करय पड़ल किएक तँ दुनु गोटे डाक्टरी व्यवसायमे लागल रही, घर-अस्पताल-पारिवारिक झन्झट सम्हारैत बड मुश्किल छल। बम्बइमे नबे-नबे रही। तहूमे एतेक दुस्साहस कोनो साधारण आदमी नै कऽ सकैत अछि मात्र आर मात्र डा. मणिकान्त मिश्र कऽ सकैत छलाह। किएक तँ मैथिलीक प्रति हुनका जुनूनी लगाव छलन्हि। बम्बइक आपाधापी भरल जीवन एवम् स्वास्थ्यक उतार-चढ़ाव किछुओ हुनकर मैथिली-प्रेमक उत्साहकेँ कम नै कऽ सकलन्हि…

…आर बीस-बाइस बर्खक पश्चात ओ अपन सभटा पूँजी, शरीर-समांग समेत मैथिलीक फिल्म "आउ पिया हमर नगरी" बनौलनि। फिल्म बड सुन्दर बनलै, अहाँ सभ देखने होयब। यदि नै तँ एक बेर अवश्य देखी। फिल्म बनबयमे जे कष्ट आर अनुभव भेल से हम एखन वर्णन नै कऽ सकै छी। फेर कखनो....! मुदा ऐ सभ प्रकरणमे माँ मैथिली अपन लायक पुत्रसँ सदा लेल बिछुड़ि गेली। अछि कोनो मातृभाषा भक्त-पुत्र जे अपन माँ-मैथिलीक हृदयक पीड़ाक अनुभुति कऽ हुनका लेल अपन सभ किछु समर्पित कऽ दिअय?


 

1

www.google.com/accounts/o8/id?id=AItOawnfdWWeKghW5vw2SndwaYt0nMuZlEe_-H0 said...

Didi ,
Bahut neek lagal paedh ka ...ahaan neek Doctor aa didi chi se ta bujhal chalaik ......Ati Uttam likhal aich !!!
Ahina likho !!!


Binny

Reply05/29/2009 at 06:24 AM

2

Dr. Dileep Kumar said...

Respected Mam,
I know you because, I am from 'Pilakhwar' and I met you in my villege when you were in pilakhwar for making your film "Aau piya hamar nagari". Very nice film, and more than that, I just inspired by you n your husband (Dr. Manikant mishra)affection & love with mithila culture n language. I am respecting you from my inner heart for doing all such thing to promote mithila culture, tradition, & language.
 
With regard:
Dr. Dileep Kumar ( Sree Chitra Inst., Trivandrum).
dr.dileep08@gmail.com
+91 9633463050.

Reply05/25/2009 at 03:00 PM

3

सुशांत झा said...

मिथिला और मैथिलीके उत्थान के लेल एखनों कतेको लोक लागल छथि। लेकिन दुर्भाग्य के गप्प जे नवका पीढ़ी अपन भाषा सं कटि रहल अछि। आ ई मैथिलिए संगे नहि..बल्कि सब भाषा संगे भ रहल अछि। हमसब अंग्रेजी आ हिंन्दी के भाषाई साम्राज्यवाद के शिकार भ रहल छी। एकर कोनो रास्ता नहि सूझि रहल अछि सिवाय अई बात के जे कम स कम अपन घर में त हमरालोकनि अप्पन भाषा बाजी। नहि त एकटा दिन एहन आयत जे जेना जेना शहरीकरण बढ़ल जायत, हमर भाषा खतम भेल जायत। अपन भाषा बजनाई हीनता नहि, स्वाभिमान के प्रतीक थिक।

Reply05/22/2009 at 01:31 PM

4

vivekanand jha said...

दाय
हम तऽ एतबे कहब जे प्रेम छलन्हि 
आ ओ हम सब एखनॊ देखि सकैत छी
एहिना बहुतॊ लॊक छथि जे 
मैथिली लेल मरैत-जीवैत छथि
एहन लॊकक संख्या ओना हरदम कमे हॊइत छैक
प्रेमक निर्वाह करऽ वला कम आ सतत श्रद्धेय हॊइत छथि

Reply05/17/2009 at 04:12 PM

5

अंशुमाला सिंह said...

विदेह अहाँ आ अहाँक पति शुरू कएने रहथि से देखि नीक लागल। एहि विदेहमे अहाँक संस्मरण आ ई जानि जे आउ पिया हमर नगरी अहाँक पति बनेने छलाह से सुखद, कारण ई फिल्म हम देखने छी। अपन पतिक फोटो सेहो एहि आलेखक संग दी आ हुनकर संग बिताओल अपन स्मरण राखी से आग्रह।

Reply05/15/2009 at 09:22 PM

6

ज्योति वत्स said...

videha 30 sal bad dekhi ahank prasannata ahak photo aa aalekh me dekhai paral,

ahan se sabh ank me rachna aabay aa ham sabh dekhi tahi aasha sang.

Reply05/15/2009 at 09:19 PM

 

 

कथा ३

India Flag१५ अगस्त २०२२ ई.क भारतक ७६म स्वतंत्रता दिवसक शुभकामना। ई संयोग छल जे विदेहक ६४म अंक भारतक ६४ म स्वतंत्रता दिवसक अवसर पर १२ बर्ख पहिने १५ अगस्त २०१० केँ   ई-प्रकाशित भेल छल। ऐ बेर विदेहक ३५२म अंक सद्यः ई-प्रकाशित भेल।

हमर पिताजीक मृत्यु १९९५ ई. मे ५५ बरखमे भेलन्हि। मुदा गाममे १२ बर्ख पहिने हुनकर संगी आ ज्येष्ठ सभ जीवित रहथि। परशुरामजी आ धनेश्वर जीक बहिन झंझारपुरमे मल्लिकजीसँ पढ़ैले जाइत रहथि तँ धनाढ्य लोकनि द्वारा बारि देल गेलाह।  परशुरामजीक बहिनक पढ़ाइमे बाधा पड़लन्हि। मुदा धनेश्वरजी जे कनेक उमेरमे सेहो पैघ रहथि, अड़ल रहलाह। अंग्रेजी पुलिससँ हुनका पकड़बाओल गेल आ जे पकड़बओलन्हि से बादमे स्वाधीनता पेंशन पबैत रहलथि। १९४२ ई.मे धनेश्वरजी सभ थानासँ अंग्रेज पुलिसकेँ भगा देने रहथि आ फेकन मुन्शीकेँ थानेदार बना देने रहथि। हमरा बाबूजीक कहल ओ शब्द मोन पड़ैत अछि जे गामक धनाढ्य एक्स एम.एल.ए. हुनका स्कॉलरशिपबला फॉर्मपर साइन करबासँ मना कऽ देने रहथिन्ह मुदा तैयो ओ एम.आइ.टी. मुजफ्फरपुरसँ १९५९ ई. मे रॉल नं.१ लऽ सर्वोच्च अंकक संग अभियन्त्रणमे नाम लिखबा लेलन्हि।

एक बेर धनेश्वरजी, परशुरामजी, हमर बाबूजी सभ गोपेशजी अहिठाम जा कऽ खएने छलाह आ ई काज अंडा खएलापर धनाढ्यक नेतृत्वमे हुनका बारल जएबाक विरुद्ध छल। आब ने धनेश्वरजी छथि आ ने गोपेशजी। परशुरामजी सेहो अही बर्ख स्वर्गवासी भऽ गेलथि। परशुरामजी १९९८ ई. मे कोलकातासँ अंग्रेजीक प्रोफेसरशिपसँ सेवानिवृत्त भऽ ओ अंग्रेजीमे “इन्ग्लिश पोएटिक्स”पर दूटा पोथी लिखने छथि। हमर पोथी “कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक समर्पण

"पिताक सत्यकेँ लिबैत देखने रही स्थितप्रज्ञतामे

तहिये बुझने रही जे

त्याग नहि कएल होएत

रस्ता ई अछि जे जिदियाहवला।

-पिताक प्रिय-अप्रिय सभटा स्मृतिकेँ समर्पित"

पढ़ि ओ हमर दुनू गाल अपना हाथमे लऽ अपन नोर नहि रोकि सकलाह। गाममे बहुत गोटे समर्पण पढ़ि कानए लागल रहथि आ कहने रहथि जे ई सभ हमर पिताक पुण्यक परिणाम अछि। स्वतंत्रता दिवसपर नहि जानि कोना ई सभ फेर स्मरण आबि गेल।

कथा ४

साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रसंग

पघलैत हिमखण्ड- डॉ शिव कुमार प्रसाद द्वारा अनूदित कविता संग्रह अछि (मूल हिन्दी - रजनी छाबड़ा- पिघलते हिमखण्ड)। अंतिम रेस धरि ई पहुँचल- ओतऽ हारि गेल। देखी अगिला साल की होइए। विदेहमे ई धारावाहिक रूपें ई- प्रकाशित भेल फेर पुस्तकाकार आयल। ऐ पोथीक कविता सभ संकलित भेल विदेहःसदेह २८ मे जे ऐ लिंक http://www.videha.co.in/new_page_89.htm  पर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। लेखक धोआ- धोती नै वरन कोरा-धोती परम्पराक छथि। ऐ बेर मूल पुरस्कार पहिल बेर कोरा-धोती परंपराक उपन्यासकार श्री जगदीश प्रसाद मण्डलकें हुनकर उपन्यास “पंगु” लेल देल गेलन्हि, आ से साहित्य अकादेमीक इतिहासमे पहिल बेर भेलै। मात्र धोआ-धोती बला लेल ई पुरस्कार रिजर्व रहै। विदेहमे ई धारावाहिक रूपें ई- प्रकाशित भेल फेर पुस्तकाकार आयल। ई पोथी संकलित भेल विदेहःसदेह २१ मे जे ऐ लिंक http://www.videha.co.in/new_page_89.htm  पर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि। साहित्य अकादेमीक टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल श्री जगदीश प्रसाद मण्डल केँ हुनकर लघुकथा संग्रह "गामक जिनगी" लेल देल गेल छल। कार्यक्रम कोच्चिमे १२ जून २०१२केँ भेल रहय। मैथिली लेल विवादक अन्तक कोनो सम्भावना नै देखबामे आबि रहल अछि। ओहू समय रेफरी जखन टैगोर लिटरेचर अवार्ड २०११ मैथिली लेल ७ टा पोथीक नाम पठेलन्हि तखन सेहो एकटा पोथी एहनो रहय जे निर्धारित अवधि २००७-२००९ मे छपले नै छल, तँ की बिनु देखने पोथी अनुशंसित कएल गेल छल? ऐ तरहक पोथी अनुशंसित केनिहारकेँ साहित्य अकादेमी चिन्हित केलक? की तकर नाम सार्वजनिक कयल गेल? की ओकरा स्थायी रूपसँ प्रतिबन्धित कयल गेल? नै कयल गेल आ तखन मैथिलीक प्रतिष्ठा बाँचल कोना रहि सकत।

पुरस्कार शिव कुमार प्रसादकें सेहो देल जेबाक चाही छल मुदा एक्के बरिख दू-दू टा कोरा-धोती परम्पराबला कें ई नै देल जा सकत। एक्के टा कोरा-धोती बलाकें देल गेलै तहीमे अगरा-पिछड़ा दुनूक धोआ-धोतीधारी आ वर्णशंकर साहित्यकार (बायोलॉजिकल वर्णशंकरता सँ एकर कोनो सरोकार नै) कन्नारोहट उठेने छथि।

धोआ-धोती धारी लोकनिकें  साहित्य अकादेमीक अपन-अपन अनुवाद-असाइनमेंट आपस कऽ देबाक चाही आ ओ सभ असाइनमेंट नंद विलास राय, राजदेव मण्डल, रामबिलास साहु, धीरेंद्र कुमार, दुर्गानंद मण्डल, मनोज कुमार मण्डल, शिव कुमार प्रसाद, उमेश पासवान, संदीप कुमार साफी, बेचन ठाकुर, मेघन प्रसाद, किशन कारीगर, लालदेव महतों, उमेश मण्डल, शारदानंन्द सिंह, सुभाष कुमार कामत, मुन्नी कामत आदि कें देल जाय, आ से केलासँ मैथिली लेल अग्निवीरक एकटा फौज तैयार भऽ जायत। मेघन प्रसाद विदेह मे अपन आलेखमे ई इच्छा व्यक्त केने छलाह मुदा तखनो हुनका अनुवाद-असाइनमेंट नै देल गेल। अशोक अविचल कें अदहा बधाइ, कारण दू टा कोरा धोतीक बदला हुनकर कार्यकालमे एक्केटा कोरा-धोतीकें पुरस्कार भेट पेलै। आब अगरा-पिछड़ा दुनू दिसुका धोआ-धोती बला मायावी सभ कोन-कोन बहन्ने की-की उकबा उड़ेतन्हि आ अगिला बर्खसँ फेर सँ एकछाहा धोआ-धोतियाइन साहित्य अकादेमी भऽ जायत बा नै तकर उत्तर तँ भविष्यक कोखिमे अछि।

कथा ५

एकटा साहित्यिक घटना

एकटा साहित्यिक घटनाक विवरण दै छी। ई घटना भेलै तमिल साहित्यक आधुनिक कालमे।

मूल धारा विश्व भरिसँ विद्वानकेँ बजेलक मारते रास प्रोग्राम-प्रचार। अस्सी-अस्सी हाथक नम्हर-नम्हर साहित्यकार बजाओल गेला, एकसँ एक कार्यक्रम, रेडियो टी.वी. पर प्रचार, टाकाक गुड्डी उड़ा देलक मूल धारा। एक नम्बरक प्रोग्राम समाप्त भेल।

आ समानान्तर धारा की केलक। ओ निकाललक समकालीन समानान्तर गद्य आ पद्यक एकटा संकलन जकर नाम छलै “कुरुक्षेत्रम्”। साधारण कागज पर साधारण डिजाइन पर बहार भेल ई “कुरुक्षेत्रम्” तमिल साहित्यकेँ सिहरा देलकै। आ एकटा बहस शुरू भेलै जे तमिल साहित्यक इतिहासमे एक्के समय मे भेल दू घटनासँ तमिल साहित्यकेँ कोन घटना बेशी फौदेलकै। टाकाक गुड्डी उड़बैबला तमिल साहित्यक विश्व आकि ब्रह्माण्ड सम्मेलन आकि कुरुक्षेत्रम्!

आ बहुमत मानलकै जे साधारण कागज पर साधारण डिजाइन कएल “कुरुक्षेत्रम्” श्रेष्ठ घटना छल।

 

विदेहक जीवित साहित्यकारपर विशेषांक मैथिली साहित्यक “कुरुक्षेत्रम्” बनि गेल अछि। फेसबुकपर बहसमे साहित्यकार लोकनि मानलन्हि जे साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ बेशी महत्त्व विदेहक जीवित साहित्यकारपर विशेषांकक भऽ गेल अछि। लाखक-लाख टाकाक साहित्य अकादेमीमे पसरैत कन्नारोहट घटबाक नामे नै लऽ रहल अछि, मुख्य धारा अपनेमे जालक ओझरी बनि गेल अछि, जकरा असाइनमेण्ट भेटलै से पुरस्कार लेल आ जकरा पुरस्कार भेटलै से असाइनमेण्ट लेल आफन तोड़ने अछि, आ जकरा दुनूमे सँ किछु नै भेटलै तकरा दुनू चाही तइले, आ जकरा दुनू भेटि गेलै तकर हालत तँ सभसँ बेशी खराप छै, ने अकादेमीये ओकरा मोजर दऽ रहल छै आ ओकर रचना सेहो तेहेन नै छै जे समानान्तर धारा लग ठठि सकतै। आ जँ किछु अपवाद अछि तँ ओ डिप्रेशनमे चलि गेल छथि बा अपनाकेँ सेहो कतिआयल माने समानान्तर धारक घोषित करबामे लागल छथि।

 

माने कतिआयल होयब घोषित करब बा समानान्तर धाराक होयब घोषित करब मूलधाराक (अगड़ा-पिछड़ा दुनूक अस्सी-अस्सी हाथक नम्हर-नम्हर साहित्यकार मूलधारामे छथि) एकटा फैशन बनि गेल अछि, मुदा ई फैशन अछि नै……

कथा ६

विद्वान केना बनी?

मैथिली भाषा जगज्जननी सीतायाः भाषा आसीत् - हनुमन्तः उक्तवान- मानुषीमिह संस्कृताम्

अक्खर (अक्षर) खम्भा 

तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ  मञ्चो बन्धि न देइ॥

[कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा।]- माने अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच जँ नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत।

गाम सभमे देखैत हेबै किछु लोक संस्कृत सुभाषितक चोटगर प्रयोग करैत छथि। मैथिली साहित्योमे विदेहक पदार्पणसँ पहिने वएह मैथिली साहित्यकार विद्वानक श्रेणी मे अबैत छल जिनका १० टा सुभाषित कंठस्थ रहैत छलन्हि। उचिते कारण बाशो सेहो कहने छथि, जे जे कियो जीवनमे ३ सँ ५ टा हाइकूक रचना कएलन्हि से छथि हाइकू कवि आ जे दस टा हाइकूक रचना कएने छथि से छथि महाकवि।  

प्रस्तुत अछि अहाँ लेल एहने ३२ टा बीछल संस्कृत सुभाषित ऐमे सँ दसोटा मोन रहि गेल तँ अहूँ भऽ गेलौं मैथिलीक मूल धाराक हिसाबे प्रकाण्ड पण्डित। मुदा समानान्तर धारामे ऐ शॉर्टकटक पलखति कतऽ, एतऽ तँ अढ़बैले कियो नै भेटत, खटना खटऽ पड़त।

सुभाषितम् (सुष्ठि भाषितम् सुभाषितम्)

मातेव रक्षति पितेव हिते नियुङ्कते कान्तेव चाभिरमयत्यपनीयं खेदम्।

लक्ष्मीं तनोति वितनोति च दिक्षुं कीर्ति किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या॥

 

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्?

लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥

 

आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन को न जीवति मानवः।

परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति॥

 

गच्छन् पिपीलको याति योजनानाम् शतान्यपि

अगच्छन् वैनतोयोपि पदमेकम् आगच्छति

 

तृणानि भूमिरूदकं वाक् चतुर्थी च सूंतता।

एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यंते कदाचन॥

 

सुलभाः पुरुषाः लोके सततं प्रियवादिनः।

अप्रियस्यय च पर्थ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥

 

उपर्जितानां वित्तानां त्याग एकहि रक्षणम्।

तडागोदरसंस्थानां परीवाद इताम्भसाम्॥

 

पुस्तकष्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।

कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्दनम्।

 

बहूनाम् अल्पसाराणां संहतिः कार्यसाधिका।

तृणैर्गुणत्वमापन्नेः बध्यंते मत्तदंतिनः॥

 

जलबिन्दु निपातेन् क्रमशः पूर्ण्यते घटः।

स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

 

चिन्तनीया हि विपदाम् आदावते प्रतिक्रिया।

न कूपखननं युक्तम् प्रदीप्ते वह्णिना गृहे॥

 

मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्

आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः।

 

यस्य कृत्यं न जानन्ति मंत्रं वा मंत्रितं परे।

कृतमेवास्य जानन्ति सर्वै पण्डिते उच्यते।

 

सदयं हृदयं यस्य भाषितं सत्यभूषितम्।

कायः परहिते यस्य कलिस्तस्य करोति किम्॥

 

गतानुगतिकोलोकः न लोकः पारमार्थिकः

गङ्गासैक्त लिङ्गेन नष्टं मे ताम्रभाजनम्।

 

दानेन पाणिः न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिः न तु चन्दनेन।

मानेन तृप्तिः न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिः न तु मुण्डनेन॥

 

आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया।

पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च।

 

यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रिया।

चित्ते वाचि क्रियायां च महता मेकरूपता॥

 

अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्।

अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः।

 

आयत्यां गुणदोषज्ञः तदात्वे क्षिप्रनिश्चयः।

अतीते कार्यशेषज्ञो विपदा नाभिभूयते॥

 

गते शोकं न कुर्वीत भविष्यं नैव चिन्तयेत्।

वर्तमानेषु कालेषु वर्तयन्ति विचक्षणाः।

 

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।

फलान्यापि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषाः इव॥

 

उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः।

आरिषु यः साधुः स सादुरिति कीर्तितः॥

 

उद्यमनैव सिध्यंति कार्याणि न मनोरथैः।

नहि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशंति मुखे मृगा।

 

अयं निजः परोवेत्ति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

 

 

प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।

तस्मात् तदेव वक्त्तव्यं वचने का दरिद्रता।

 

नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने।

विक्रमार्जित सत्त्वस्य स्वयमेव मृगेन्द्रता।

 

वज्रादपि कठोराणि मृदुणि कुसुमादपि।

लोकोत्तराणाम चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति।

 

अन्नदानं परं दानं विद्यादनमतः परम्।

अन्नेन क्षणिका तृप्तिः यवज्जीवं च विद्यया॥

 

 

षड् दोषाः पुरुषेणेह ह्यातव्या भूतिमिच्छिता।

निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्य दीर्घसूत्रता॥

 

अकृत्वा परसन्तापम् अगत्वा खलनमताम्।

अनुत्सृज्य सतां वर्त्म यत् स्वल्पमपि तद् बहु॥

 

अपार भूमि विस्तारम् अगम्य जन संकुलम्

राष्ट्रं संघटनाहीनं प्रभवेन्नात्मरक्षणे॥

 

कथा ७

आब किछु भाषण-भाख

किछु भाषण-भाख जे हम संगी साथी सभकेँ गप-शपमे दैत रहै छियन्हि से हुनका सभक आग्रह कारण आब एतए दऽ रहल छी।

कम वसा बला दूध सदिखन पीबू आ कम नोन खाउ। माउसक सेवन सेहो कम करू, माँछ बेशी खा सकै छी। अपन आस-पड़ोसक लोकक दिनचर्यापर अहाँक ध्यान अवश्य रहबाक चाही नहि तँ घर बदलि लिअ। कोनो व्यक्तिकेँ जे अहाँ प्रशंसा करब तँ ओ ओकरा लेल बड़ उत्साह बढ़बएवला हएत। अपन पड़ोसीकेँ बगिया वा कोनो आन व्यंजन बना कए खुआऊ आ ओकर बनेबाक विधि सेहो लिखाऊ। ककरो प्रति दुर्भावना वा पूर्वाग्रह नहि राखू। कोनो मॉलमे जाऊ तँ कार खूब दुरगर लगाऊ आ परिवार-बच्चा संगे टहलि कए आऊ। दूरदर्शनपर मारि-पीट बला धारावाहिक नहि देखू आ जे-जे कम्पनी ओकर प्रायोजक अछि तकर उत्पादक बहिष्कार करू। सभ लोक, पशु-पक्षीक प्रति आदर राखू। ककरोसँ गाड़ी माँगी तँ घुरबैत काल पेट्रोल वा डीजल पूर्ण रूपसँ भरबा कऽ घुराऊ, लोक किएक तँ एकर उल्टा करैत छथि, भरल पेट्रोल गाड़ी लऽ जाइ छथि आ रिजर्वमे आनि कए घुरबैत छथि। देखब जे ओ व्यक्ति अहाँक चरचा बड्ड दिन धरि करत आ आगाँसँ गाड़ी देबामे बहन्ना नहि करत। दिनमे पाँच-सात गोटेकेँ अभिवादन अवश्ये करू। एक-आधटा माल-जाल राखू, जे दिल्ली-मुम्बैमे रहै छी तँ तकर बदला कुकुड़ पोसू। मासमे एक बेर सुर्योदय अवश्य देखू आ तरेगण सेहो। दोसराक जन्म दिन आ नाम अवश्य मोन राखू। होटलक खेनाइ परसनिहारकेँ टिप अवश्य देल करू। ककरोसँ भेँट भेलापर आह्लादसँ अभिवादन करू, हाथ मिलाऊ आ सर्वदा आँखि मिला कऽ गप करू। धन्यवाद आ आदरसूचक शब्द अवश्य बाजू। कोनो बाजा बजेनाइ अवश्य सीखू, नहि कोनो आर तँ झालि तँ बजाइये सकै छी। नहाइत काल गीत गाऊ।

अपन सफलताक आकलन अनका प्रति कएल सेवासँ नापू नञि की ओहि वस्तुसँ जे अहाँ अनका हानि पहुँचा कऽ प्राप्त केने छी। धोखा देनाइ खराप गप छियै् धोखा खेनाइ नहि। साक्षात्कार केना लेबाक चाही ओहिमे की की आवश्यक बिन्दु छै से अवश्य सीखू। अफवाह सुनू मुदा अपना दिससँ ओहिमे कोनो वृद्धि वा योगदान नहि देल करू। अपन बच्चाक चिन्ता वा भएपर ध्यान देल करू। अपन माएक संग बहस नहि करू। सभटा सुनलाहा चीजपर विश्वास नहि करू। अहाँ लग जतेक पाइ अछि ओहिमेसँ किछु बचा कए खर्च करू। बूढ़-पुरानक संग भद्र व्यवहार करू। बुराइ आ अन्यायकेँ कखनो बर्दास्त नहि करू। प्रशंसात्मक पत्रकेँ सम्हारिकेँ राखू। कोनो सेमीनारमे भाषण देलाक बादे छपल भाषण वितरित करू। बियाहक बादेसँ अपन बच्चाक शिक्षा लेल पाइ बचेनाइ शुरू कऽ दिअ। माता-पिता अपन बच्चाकेँ आत्मनिर्भर रहनाइ सर्वदा सिखाबथु। अहाँ तखने मानसिक रूपसँ स्वतंत्र भऽ सकब जखन अपन समस्याक समाधान लेल दोसराक मुँहतक्की नहि करब। विवाह वा बच्चाक पोषण ओतेक भरिगर चीज नहि छैक। जखन अहाँ हँसब तँ स्वतः अहाँ सुन्दर देखा पड़ब, खूब हँसू।जाधरि अहाँ नव-नव काज नहि करब ताधरि नव-नव चीज कोना सीखब? जे अहाँ कोनो काज बिना त्रुटिक करए चाहब तँ ओ काज कहियो नहि भऽ सकत। कोनो खराप भेल सम्बन्धकेँ सुधारबा लेल कतबो देरी भेलाक बादो प्रयास करबाक चाही। मानवीय भावना कोनो काज करबामे आ कतबो कठिन परिस्थितिकेँ पार पएबामे सफल होएत। कोनो मार्गक,कोनो विचारक आ कोनो कार्यक जानकारी ओहिपर आगाँ बढ़लासँ पता चलत, ओहिपर बहस कएलासँ नहि। एकटा दोस वैह अछि जे अहाँक सभ गुण-दुर्गुणसँ अवगत रहलाक बादो अहाँकेँ पसिन्न करैत अछि।

अपन ज्ञान आ अनुभवकेँ सर्वदा बाँटू आ अपन वाक्, कर्म आ निर्णयमे हरदम नम्र रहू। अहाँक मित्रक लेल जे कियो नीक शब्दक प्रयोग करै छथि तँ तकर जनतब मित्रकेँ अवश्य कराऊ। जे अहाँ बुझने सही काज छैक तकरा अवश्य करू। पहिचान बनबए लेल काज नहि करू वरन् तेहन काज करू जकरा लोक चीन्हि सकए आ मोन राखए। जीवनक पैघ-पैघ परिवर्तन बिना कोनो चेतौनीक अबैत छैक। अपन बच्चाकेँ ई सिखाऊ जे कोनो व्यक्तिक कमीकेँ कम कऽ कए नहि मूल्यांकन करए। जे कोनो काज अहाँ करै छी तकरा मोनसँ करू। कोनो नाटक खतम भेलापर थोपड़ी बजबैमे सर्वदा आगू रहू। सोचू, ओहिपर विश्वास करू, सपना देखू आ ओकरा पूर्ण करबाक साहस राखू।

कथा ८

आब प्रस्तुत अछि हमर २००८-०९ मे लिखल हमर समीक्षा जे विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ फेर हमर पोथी ’कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक’ (२००९) मे संकलित भेल।

केदारनाथ चौधरीक उपन्यास- “चमेली रानी” आ "माहुर"

केदारनाथ चौधरी जीक पहिल उपन्यास चमेली रानी २००४ ई. मे आएल । एहि उपन्यासक अन्त एहि तरहेँ आकर्षक रूपेँ भेल जे एकर दोसर भागक प्रबल माँग भेल आ लेखककेँ एकर दोसर भाग माहुर लिखए पड़लन्हि। धीरेन्द्रनाथ मिश्र चमेली रानीक समीक्षा करैत विद्यापति टाइम्समे लिखने रहथि- “...जेना हास्य-सम्राट हरिमोहन बाबूकेँ “कन्यादान”क पश्चात् “द्विरागमन” लिखए पड़लनि तहिना “चमेलीरानी”क दोसर भाग उपन्यासकारकेँ लिखए पड़तन्हि”। ई दुनू खण्ड कैक तरहेँ मैथिली उपन्यास लेखनमे मोन राखल जएत। एक तँ जेना रामलोचन ठाकुर जी कहैत छथि- “..पारस-प्रतिभाक एहि लेखकक पदार्पण एते विलम्बित किएक?” ई प्रश्न सत्ये अनुत्तरित अछि। लेखक अपन ऊर्जाक संग अमेरिका, ईरान आ आन ठाम पढ़ाइ-लिखाइमे लागल रहथि रोजगारमे रहथि मुदा ममता गाबए गीतक निर्माता घुमि कऽ दरभंगा अएलाह तँ अपन समस्त जीवनानुभव एहि दुनू उपन्यासमे उतारि देलन्हि। राजमोहन झासँ एकटा साक्षात्कारमे हम एहि सम्बन्धमे पुछने रहियन्हि तँ ओ कहने रहथि जे बिना जीवनानुभवक रचना संभव नहि, जिनकर जीवनानुभव जतेक विस्तृत रहतन्हि से ओतेक बेशी विभिन्नता आ नूतनता आनि सकताह। केदारनाथ चौधरीक “चमेली रानी” आ “माहुर” ई सिद्ध करैत अछि। चमेली रानी बिक्रीक एकटा नव कीर्तिमान बनेलक। मात्र जनकपुरमे एकर ५०० प्रति बिका गेल। लेखक “चमेली रानी”क समर्पण - “ओहि समग्र मैथिली प्रेमीकेँ जे अपन सम्पूर्ण जिनगीमे अपन कैंचा खर्च कऽ मैथिली-भाषाक कोनो पोथी-पत्रिका किनने होथि”- केँ करैत छथि, मुदा जखन अपार बिक्रीक बाद एहि पोथीक दोसर संस्करण २००७ मे एकर दोसर खण्ड “माहुर”क २००८ मे आबए सँ पूर्वहि निकालए पड़लन्हि, तखन दोसर भागमे समर्पण स्तंभ छोड़नाइये लेखककेँ श्रेयस्कर बुझेलन्हि। एकर एकटा विशिष्टता हमरा बुझबामे आएल २००८ केर अन्तिम कालमे, जखन हरियाणाक उपमुख्यमंत्री एक मास धरि निपत्ता रहलाह, मुदा राजनयिक विवशताक अन्तर्गत जाधरि ओ घुरि कऽ नहि अएलाह तावत हुनकापर कोनो कार्यवाही नहि कएल जा सकल। अपन गुलाब मिश्रजी तँ सेहो अही राजनीतिक विवशताक कारण निपत्ता रहलोपर गद्दीपर बैसले रहलाह्, क्यो हुनका हँटा नहि सकल। चाहे राज्यक संचालनमे कतेक झंझटि किएक नहि आएल होअए।

उपन्यास-लेखकक जीवनानुभव, एकर सम्भावना चारि साल पहिनहिए लिखि कऽ राखि देलक। भविष्यवक्ता भेनाइ कोनो टोना-टापरसँ संभव नहि होइत अछि वरन् जीवनानुभव एकरा सम्भव बनबैत अछि।

एहि दुनू उपन्यासक पात्र चमत्कारी छथि, आ सफल सेहो । कारण उपन्यासकार एकरा एहि ढंगसँ सृजित करैत छथि जेना सभ वस्तुक हुनका व्यक्तिगत अनुभव होइन्हि।

“चमेली रानी” उपन्यासक प्रारम्भ करैत लेखक एकर पहिल परीक्षामे उत्तीर्ण होइत छथि जखन एकर लयात्मक प्रारम्भ पाठकमे रुचि उत्पन्न करैत अछि। -कीर्तिमुखक पाँच टा बेटाक नामकरणक लेल ओकर जिगरी दोस कन्टीरक विचार जे – “पाँचो पाण्डव बला नाम बेटा सबहक राखि दहक। सुभिता हेतौ”। फेर एक ठाम लेखक कहैत छथि जे जतेक गतिसँ बच्चा होइत रहैक से कौरवक नाम राखए पड़ितैक। नायिका चमेली रानीक आगमन धरि कीर्तिमुखक बेटा सभक वर्णन फेर एहि क्रममे अंग्रेज डेम्सफोर्ड आ रूपकुम्मरिक सन्तान सुनयनाक विवरण अबैत अछि। फेर रूपकुम्मरिक बेटी सुनयनाक बेटी शनिचरी आ नेताजी रामठेंगा सिंह “चिनगारी”क विवाह आ नेताजी द्वारा शनिचरीकेँ कनही मोदियानि लग लोक-लाजक द्वारे राखि पटना जाएब, नेताजीक मृत्यु आ शनिचरी आ कीर्तिमुखक विवाहक वर्णन फेरसँ खिस्साकेँ समेटि लैत अछि।

तकर बाद चमेली रानीक वर्णन अबैत अछि जे बरौनी रिफाइनरीक स्कूलमे बोर्डिंगमे पढ़ैत छथि आ एहि कनही मोदियानिक बेटी छथि। कनही मोदियानिक मृत्युक समय चमेली रानी दसमाक परीक्षा पास कऽ लेने छथि। भूखन सिंह चमेली रानीक धर्म पिता छथि। डकैतीक विवरणक संग उपन्यासक पहिल भाग खतम भऽ जाइत अछि।

दोसर भागमे विधायकजीक पाइ आकि खजाना लुटबाक विवरण, जे कि पूर्व नियोजित छल, एहि तरहेँ देखाओल गेल अछि जेना ई विधायक नांगटनाथ द्वारा एकटा आधुनिक बालापर कएल बलात्कारक परिणामक फल रहए। आब ई नांगटनाथ रहथि मुख्यमंत्री गुलाब मिसिरक खबास जे राजनीतिक दाँवपेंचमे विधायक बनि गेलाह।

ई चरित्र २००८ ई.क अरविन्द अडिगक बुकर पुरस्कारसँ सम्मानित अंग्रेजी उपन्यास “द ह्वाइट टाइगर”क बलराम हलवाइक चरित्र जे चाहक दोकानपर काज करैत दिल्लीमे एकटा धनिकक ड्राइवर बनि फेर ओकरा मारि स्वयं धनिक बनि जाइत अछि, सँ बेश मिलैत अछि आ चारि बरख पूर्व लेखक एहि चरित्रक निर्माण कऽ चुकल छथि। फेर के.जी.बी. एजेन्ट भाटाजीक आगमन होइत अछि जे उपन्यासक दोसर खण्ड “माहुर” धरि अपन उपस्थिति बेश प्रभावी रूपेँ रखबामे सफल होइत छथि।

उपन्यासक तेसर भागमे अहमदुल्ला खाँक अभियान सेहो बेश रमनगर अछि आ वर्तमान राजनीतिक सभ कुरूपताकेँ समेटने अछि। उपन्यासक चारिम भाग गुलाब मिसिरक खेरहा कहैत अछि आ फेरसँ अरविन्द अडिगक बलराम हलवाइ मोन पड़ैत छथि। भुखन सिंहक संगी पन्नाकेँ गुलाब मिसिर बजबैत अछि आ ओकरा भुखन सिंहक नांगटनाथ आ अहमदुल्ला अभियानक विषयमे कहैत अछि। संगहि ओकरा मारबाक लेल कहैत अछि से ओ मना कऽ दैत छै। मुदा गुलाब मिसिर भुखन सिंहकेँ छलसँ मरबा दैत अछि।

पाँचम भागमे भुखन सिंहक ट्रस्टक चरचा अछि, चमेली रानी अपन अड्डा छोड़ि बैद्यनाथ धाम चलि जाइत छथि। आब चमेली रानीक राजनीतिक महत्वाकांक्षा सोझाँ अबैत अछि। स्टिंग ऑपरेशन होइत अछि आ गुलाब मिसिर घेरा जाइत छथि।

उपन्यासक छठम भाग मुख्यमंत्रीक निपत्ता रहलाक उपरान्तो मात्र फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाओल जएबाक चरचा होएबाक अछि, जे कोलिशन पोलिटिक्सक विवशतापर टिप्पणी अछि।

उपन्यासक दोसर खण्ड “माहुर”क पहिल भाग सेहो घुरियाइत-घुरियाइत चमेली रानीक पार्टीक संगठनक चारू कात आबि जाइत अछि। स्त्रीपर अत्याचार, बाल-विधवा आ वैश्यावृत्तिमे ठेलबाक तेहन संगठन सभकेँ लेखक अपन टिप्पणी लेल चुनैत छथि।

माहुरक दोसर भागमे गुलाब मिसिरक राजधानी पदार्पणक चरचा अछि। चमेली रानी द्वारा अपन अभियानक समर्थनमे नक्सली नेताक अड्डापर जएबाक आ एहि बहन्ने समस्त नक्सली आन्दोलनपर लेखकीय दृष्टिकोण, संगहि बोनक आ आदिवासी लोकनिक सचित्र-जीवन्त विवरण लेखकीय कौशलक प्रतीक अछि। चमेली रानी लग फेर रहस्योद्घाटन भेल जे हुनकर माए कनही मोदियाइन बड्ड पैघ घरक छथि आ हुनकर संग पटेल द्वारा अत्याचार कएल गेल, चमेली रानीक पिताक हत्या कऽ देल गेल आ बेचारी माए अपन जिनगी कनही मोदियाइन बनि निर्वाह कएलन्हि। ई सभ गप उपन्यासमे रोचकता आनि दैत अछि।

माहुरक तेसर भाग फेरसँ पचकौड़ी मियाँ, गुलाब मिसिर, आइ.एस.आइ. आ के.जी.बी.क षडयन्त्रक बीच रहस्य आ रोमांच उत्पन्न करैत अछि।

माहुरक चारिम भाग चमेली रानी द्वारा अपन माए-बापक संग कएल गेल अत्याचारक बदला लेबाक वर्णन दैत अछि, कैक हजार करोड़क सम्पत्ति अएलासँ चमेली रानी सम्पन्न भऽ गेलीह।

माहुरक पाँचम भाग राजनैतिक दाँव-पेंच आ चमेली रानीक दलक विजयसँ खतम होइत अछि।

विवेचन: उपन्यासक बुर्जुआ प्रारम्भक अछैत एहिमे एतेक जटिलता होइत अछि जे एहिमे प्रतिभाक नीक जकाँ परीक्षण होइत अछि। उपन्यास विधाक बुर्जुआ आरम्भक कारण सर्वांतीजक “डॉन क्विक्जोट”, जे सत्रहम शताब्दीक प्रारम्भमे आबि गेल रहए, केर अछैत उपन्यास विधा उन्नैसम शताब्दीक आगमनसँ मात्र किछु समय पूर्व गम्भीर स्वरूप प्राप्त कऽ सकल। उपन्यासमे वाद-विवाद-सम्वादसँ उत्पन्न होइत अछि निबन्ध, युवक-युवतीक चरित्र अनैत अछि प्रेमाख्यान, लोक आ भूगोल दैत अछि वर्णन इतिहासक, आ तखन नीक- खराप चरित्रक कथा सोझाँ अबैत अछि। कखनो पाठककेँ ई हँसबैत अछि, कखनो ओकरा उपदेश दैत अछि। मार्क्सवाद उपन्यासक सामाजिक यथार्थक ओकालति करैत अछि। फ्रायड सभ मनुक्खकेँ रहस्यमयी मानैत छथि। ओ साहित्यिक कृतिकेँ साहित्यकारक विश्लेषण लेल चुनैत छथि तँ नव फ्रायडवाद जैविकक बदला सांस्कृतिक तत्वक प्रधानतापर जोर दैत देखबामे अबैत छथि। नव-समीक्षावाद कृतिक विस्तृत विवरणपर आधारित अछि। एहि सभक संग जीवनानुभव सेहो एक पक्षक होइत अछि आ तखन एतए दबाएल इच्छाक तृप्तिक लेल लेखक एकटा संसारक रचना कएलन्हि जाहिमे पाठक यथार्थ आ काल्पनिकताक बीचक आड़ि-धूरपर चलैत अछि।

 

कथा ९

साकेतानन्द प्रकरण

साकेतानन्दक १२ नवम्बर २००९ केर पोस्ट,

http://saketanands.blogspot.com/2009/11/blog-post_12.html

ओ लिखैत छथि:

“हमरा लगैये जे जेना नेता सब के भीड,मंच आ माइक के देखिते किछु सबसबाय लगैत छै, तहिना किछु लेखको होइ छनि। कहिया कत' दू_चारि टा रचनाक की चर्चा भेलनि, बस भ' गेला स्थापित । तहिया स' जँ कोनो साहित्यिक मंच नज़रि एलनि, कि कुर्सी हथियेबालय वृतोष्मि भेटता। पटना मे मुन्नक़िद पुस्तक मेला मे नामवर संगे आलोकधन्वा के बैसल देखि लागल जे लेखन आ साहित्यक राजनीति, दुनू दू छोरक चीज छैक, जे एक संगे भैये ने सकैत अछि। मैथिलीमे एखन तक अपन मांटिक़ उदारता, अयाचीवृत्तिक छिकार छैके। एखनो बिना विचारने_सिचारने, जे ई के छापत आ कि तहू स' बढि क' जे एकरा के पढत ? लोक लिखैये, लिखिते जारहल अछि।

हमरा जनैत पढैक वस्तु( कोन आ केहेन ?) भेटतै त' लोक पढबे करतै।

तैं कि आब लोक 'चमेली रानी' लिखय ?”

 

कथा १०

ई कोनो कथा नै

साकेतानन्द विद्वान लोक रहथि ईर्ष्यावश लिखि गेला आ से प्रतारणा हरिमोहन झाकेँ सेहो सहऽ पड़ल रहन्हि। ने हरिमोहने झा आ नहिये केदार नाथ चौधरी सुभाषित मात्र रटने छला। दत्त-चटर्जीक “इण्ट्रोडक्शन टू इण्डियन फिलोसोफी”क हिन्दी अनुवाद ओ अनुवाद-पुरस्कार लेल नै वरन् अपन दर्शनशास्त्रक प्रोफेसरशिपकेँ सिद्ध करय लेल केने छला। संस्कृतक श्लोक सभ ओ अपन पात्र खट्टर-ककाकेँ सेहो रटेने छला प्रयोगमे अन्तर मुदा भेटत।

लोक मैथिली लेल अपन सर्वस्व लुटेने अछि, डॉ कल्पना मणिकान्त मिश्र आ केदारनाथ चौधरी मात्र उदाहरण छथि। लोक ठकहरबा सभसँ डेराइत अछि खास कऽ रंगमंच आ फिल्मक नामपर टण्डेली मारि रहल लोक सभसँ। भ्रमरजीक तँ सी.डी.ये लोक अपन नामसँ निकलबा लेलक। सएह हाल साहित्योमे छै।

 

जँ उपरका कथा सभ अहाँकेँ सिहरेलक तँ समानान्तर धाराक संग चलि पड़ू आ जँ से नै तँ हमर प्रयास जारी रहत, आ तइ लेल विशेषांक सभ निकलैत रहत।

 

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।