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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१. मिथिलेश सिन्हा "दाथवासी" (मिसिदा)- दू टा बीहनि कथा २. आशीष अनचिन्हार- "इश्क को दिल में दे जगह अकबर" आ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल ३.कैलाश कुमार मिश्र- लघुकथा- बुरिराज

मिथिलेश सिन्हा "दाथवासी" (मिसिदा)

दू टा बीहनि कथा

(1)

                       जश्न

पलंग पर मृत्यु-सज्जया  पर पड़ल बाबूजी'क गोरथारि मे हुनक पाएर रसे-रसे दाबि रहल छलहुँ. बाबूजी, कैंसर सं पीड़ित छलाह. डागदर जवाब द' देलकै.  इलाज मे कोनो कसरि नहि छूटल. जतेक औकात छल, कएल. 

बाबूजी, आँखि मुनि दुर्गाशप्तशती'क पाठ क' रहल छथि आओर सभ'क आँखि सं नोर वहि रहल छल.

मां त' जखन हम सभ बच्चे रही, स्वर्ग सिधारि गेल छलखिन्ह.

दिमाग मे बाबूजी'क संग बिताओल सभटा पावैन  चलचित्र'क भांति चलि रहल छल. होली हो वा जुड़शीतल, सरस्वती पूजा हो वा दुर्गा पूजा, दिवाली हो वा छठि, सभटा पावैन-त्योहारि मे बाबूजी मां'क रोल मे आबि, सम्पन्न करैथ.

आई, दिवाली आब' बाला छै.... बाबूजी,बीमार.

राति भ' गेलैए. 

"बाबूजी, किछु भोजन क' लिअ ने !" हम पाएर दबौबैत पुछलियैन्ह.

ओ चुपचाप टुकुर-टुकुर हमरा सभ दीस नजरि घुमा क' देख' लगलाह. हमर त' करेज फाट' लागल,मुदा मोन थीर कएल.

"किछु खा लिअ बाबूजी." हम पुनः बजलौंह.

"हौ, देखह बत्ती पर फतिंगा सभ कोना क' घुमि रहल छै ?" बाबूजी बजलाह.

"की बत्ती मुझा दौं ?"

"नहि, नहि... देखह ओ फतिंगा सभ कें.... ओ सभ अपन परिवार संगे कतेक खुश भ' नाचि रहल छै !" बाबूजी बात कटैत बजलाह," फतिंगा सभ'क परिवार कें पता छै, जे कार्तिक मास'क आमावस्या दिन तक ओकर सभ'क मृत्यु निश्चित छै.... कोनो विषाद नहि, अपन मृत्युक कतेक खुशी सं जश्न मना रहल छै.... आ तों सभ हमर मृत्यु लगीच देखि कानि रहल छह..... मृत्यु त' सत्य छै ओकर सम्मान केनाइ हमर धर्म....."

बाबूजी संगहि हमहुं सभ फतिंगा के बत्ती पर नचैत देख' लगलहुँ.

बाबूजी सेहो ठोर पर मुस्कान पसौरने, एक्के टक्के फतिंगा कें देखैत ओकर जश्न मे शामिल भ' गेलाह.

                          (2)

                            द्वंद

काल्हि साँझ मे अपन बेटा-बेटी संग छत पर बैसल छलहुं. बेटा, अन्तरस्नातक क' प्रतियोगिता आओर बेटी अंग्रेजी सं स्नातकोत्तर'क परीक्षा केर तैयारी क' रहल छथि.

चर्चा'क दौरान, हम अपन किछु मित्र आओर संबंधी'क परिवार'क चर्चा क' कहलियैन्ह जे, 

"देखू, हुनकर बाल-बुच्ची  सभ  घर-परिवार'क नाम पुरे परोपट्टा मे रोशन क' देलैथ.... हमहुं अपने सभ सं इएह आस लगौने छी....."

लगले बेटा बाजल, "की हई छै, एतेक पढ़ला-लिखला सं....? एतेक पढ़ि-लिखि, आईआईटी आओर अन्य कोनो पढ़ाई केलहुँ आ नोकरी भेटैछ बारह-तेरह हज़ार सं ...."

"जे दिन-राति लगा, मेहनत करतै ओकरा सफलता अवस्से भेंटतै. अहां सभ कें पढबा मे मोने नहि लगैए, तखन एहने बात फुरवे करत.... दिन-राति मोबाइल आओर फेसबुक....व्हाट्सएप्प केर सिवाय कहियो किताबो केर दरस होइबो करैया....? खाली दिमाग शैतान केर.... "

हम दमसाइत बजलहुँ.

"पापा,अहां बात बुझलहुँ ने, लागलहुँ डांट', ओ की कह' चाहैए.... बुझु त' ?"

बेटी बाजलिह.

"की बाजत, ओ घमन्डे फूलल अहि. परीक्षा मे एतेक नंबर मे पास ने कै गेल की बुझैए, की ओ राजेन्द्रे प्रसाद भे गेल...." हमर तामस बढ़' लागल.

"पापा, अहां सभ कें खाली पढ़ाई.... पढ़ाई.... पढ़ाई.... की एकरो अलावे आओर कोनो रस्ता नहि अहि, जेकरा सं घर-परिवार आओर समाज'क नाम बढ़ि सकै ?" 

बेटी बाजलिह. हम कनेक शांत भ' ओकर बात सुन' लागलहुँ, "पापा, अहां सब पुरना जमाना मे जीवि रहल छी आओर नवका सोंच पालने छी. हमर रुचि डांस मे छल.... अहां बाज' लागलहुँ जे आई धरि हमर परिवार मे ई नहि भेलै,हम मोन मारि पढ़' लागलहुँ मुदा पढ़' मे एक्को रत्ती मोन नहि लागल,फेल क' गेलहूं.... अहां'क डरें, आई हम पीजी त' क' रहल छी, मुदा आगू की हेतै नहि कहि.....?" बजैत-बजैत ओ कान' लगलीह.

"हमरा कोन आज़ादी भेंटल.... ?

मैट्रिक धरि टीसन सं ओहि पार जेनाइ पर रोक.... 

बाजार जेनाइ पर रोक....

दोस्त बनाव' सं रोक....

हमर मोन क्रिकेट सं छल,खेल' सं रोक....

खाली,रोके-रोक.... अप्पन कोनो मर्ज़ी नहि !" बेटा बाजल.

"हम त' अहीं सभ'क कैरियरे वास्ते ने केलहुँ. पढ़ि-लिखि ऑफिसर बनब,त' अहीं सभ'क प्रतिष्ठा ने बढ़त ?"

"पापा,अहां हमर नहि, अपन प्रतिष्ठा देखि रहल छी. हमर कोनो इच्छा नहि, अहीं सभ'क थोपल इच्छा कें पूर्ण कर'क वास्ते अपन इच्छा केर पूर्णाहुति दैत आवि रहल छी.... ! अहां सभ'क इच्छा पूर्ण अवस्से  करब,मुदा आव' वाला भविष्य केर संग हम एना नहि करब,ई हमर प्रण अहि." बेटा बाजल आओर हुनक विचार सं हमर बेटी सेहो सहमति छलीह.

-मिथिलेश कुमार सिन्हा

अधिवक्ता,

मोहल्ला/पोस्ट : लक्ष्मीसागर, जिला : दड़िभंगा

आशीष अनचिन्हार

"इश्क को दिल में दे जगह अकबर" आ जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल
 

गजलमे बहर ओ व्याकरण विरोधी लोक सभ अधिकतर एहि शेरक बेसी उदाहरण दै छथि (एहि शेरक बहुत पाठांतर छै)


 

इश्क को दिल में दे जगह अकबर

इल्म से शायरी नहीं आती


 

मने ओहन लोक सभकेँ कहनाम जे गजलमे खाली इल्म नै हेबाक चाही मुदा ई कतेक बड़का विडंबना छै जे एहू शेरमे पूरा पूरी बहरक पालन भेल छै मने ईहो शेर इल्मक उपज अछि। आब ई बात अलग जे विरोधी सभकेँ बहर अबिते नै छनि तँ ओ एकरा गानि कोना सकताह। वास्तविकता तँ ई छै जे हमर मैथिल "महान" गजलकार सभ अभिधामे बेसी बूझै छथि आ तँइ एहि शेरक अर्थकेँ अभिधामे ल' लेने हेताह। जँ एहि शेरक तहमे जेबै तँ एकर अभिधा बला अर्थक अलावे अन्य अर्थ सेहो छै जकरा एना व्यक्त कएल जा सकैए


 

इल्म को दिल में दे जगह अकबर

इश्क से शायरी नहीं आती


 

मने जँ खाली इल्मसँ शाइरी नै हेतै तँ खाली इश्कोसँ शाइरी नै भ' सकैए। इएह एहि शेरक मूल बात छै। हरेक चीजमे संतुलन हेबाक चाही तखने ओ नीक काव्य हएत। ई बात इल्म बला आ इश्क बला दूनूकेँ नीक जकाँ बूझए पड़तनि अन्यथा दूनूक काव्य बौके टा रहत। निच्चा एहि शेरक बहर देखा रहल छी


 

इश्क को 212 दिल में दे 212 जगह अकबर 1222

इल्म से 212 शायरी 212 नहीं आती 1222


 

आब एक बेर कने जगदीश चंद्र ठाकुरजीक एहि शेरकेँ देखू


 

बहरक बन्धन अछि,हमरा आजाद करू

हम त गजल छी, हमरा नै बरबाद करू


 

एहि शेरकेँ पढ़िते बहुतों बहर पीड़ित लोकक आह निकलि गेल। मुदा ओहि पीड़ित लोक लग दृष्टि छैने नहि जे ओ देखता जे अनिल जीक एहि शेरमे सेहो बहर छै (22222222222)। गजलक सौंदर्ये इएह छै जे ओ अपन तत्वक विरोध नियमक भीतर करैत छै। से चाहे इल्मक प्रसंग हो कि बहर बंधनक प्रसंग। दूनू शेरक मंतव्य इएह जे ने बेसी इल्मसँ शाइरी हएत आ ने बेसी इश्कसँ। हमरा जतेक अनुभव अछि ताहि हिसाबसँ बेसी इल्म बला आ बेसी इश्क बला लोक अनुपयोगी भ' जाइत छै। बेसी इल्म बलाकेँ पागल हेबाक खतरा बेसी रहैत छै तँ बेसी इश्क बलाकेँ आवारा आ बदचलन होइत देरी नै लागै छै। आब अहाँ सभहँक अनुभव जे हो।

 

कैलाश कुमार मिश्र

लघुकथा

बुरिराज

राघब विश्वविद्यालय केर छात्रावासमे रहैत पीएचडी करैत छलाह।सँयोगसँ राघबक ममियौत भाईक लड़का मुदा उमेरमे मित्रवत सोहन राघब लग कॉम्पिटिटिव परीक्षा सबहक तैयारी लेल आयल छलनि। चारिएवर्षक अंतर होबाक कारणे दूनूक बीच काका-भातिजक कम आ सँगतुरिया वर्ताव अधिकछलनि। सोहन राघबक होस्टलमे पाइल ऑन गेस्टक रूपमे रहैतछलाह। सोहनयूनिवर्सिटीमे टुटपुंजिया नेता सब सँग घुमय लगलाह। राघबक भतीजा बुईझ लोककनि भाव जरूर दैत छलनि।

 

एकदिनसोहन सङ्गेनिर्भय राघब लग एलाह। निर्भयबिहारककोनोयूनिवर्सिटीसँ इतिहासमे बी ए केलाक बाद राघबक यूनिवर्सिटीमे प्राचीनइतिहाससँ एम ए’मे नामांकन लेने छलाह। निर्भय  राघब लग विनम्रतासँबैसलाह।

 

निर्भय बीच-बीचमे राघब लग अबैत रहलनि। निर्भय यूनिवर्सिटी केर एम ए प्रीवियस केर परीक्षामे बहुत खराप अंक अनलाह। हिनकमाता-पिता दूनू कोनो यूनिवर्सिटीमे प्रोफेसर छलथिन। तकर फायदा उठबैतनिर्भय ओहि यूनिवर्सिटीसँ प्राचीन इतिहाससँ एम ए कऽ लेलाह।मुम्बईमे कोना ने कोना निर्भय एक सँस्थानमेकला इतिहास सँ एम ए’मे नामांकन लऽ लेलाह। दू वर्षक कोर्स निर्भयपाँच वर्षमे पूरा कएलाह।

 

निर्भय छलाह भाग्यक सांढ़।माता पिताक असगरुआ बेटा। दू बहिन पर एक भाई। जखन हिनक एम ए केर रिजल्ट निकलएबला छलनि ताहि समय एक कला संस्थानमे एक लाला जी लोचन लाल दासकेँ पकड़लाह।  दासजी हिनके शहरकछलथिन जिनका निर्भयक माय राखी बनहैत छलथिन। निर्भय दास जीकेँ मामा कहैत हुनकर शरणमे नतमस्तक छलाह। दास जी धुरफन्दी लगानिर्भय केँ कला संस्थानकक अभिलेखागारमे नौकरी लगा देलथिन।

 

एक वर्षमे राघब सेहो कला संसथानमे आबि गेलाह। सँयोग एहेन जेनिर्भय  आ राघबक विवाह एकै साल, एकै मास आ एकै दिन भेलनि। अंतर अतबे जे राघबकविवाह माता-पिता द्वारे निर्धारित आ निर्भयक विवाह प्रेम नामक रोगक अंतिमपरिणाम जाहिमे अनेक भाभट, नाटक आदिक भूमिका प्रबल।

 

निर्भय केर जेठ बहिनक ननदि हेमा निर्भयसँ नौ वरखक छोट मुदा पोखगर छलीह। हेमादूधिया गोड़ाईसँ गज्जब सुन्नरि लगैत छलीह। दुबर पातर चमकैत चेहरा छलनि हेमाक। बड़की-बड़की आँखि, तेहने सुन्दर ठोड़, घुरमल-घुरमल केश, छोट मुदा गस्सल-गस्सलविकसित आ प्रस्फुटित होइत वक्ष। नितम्ब यद्यपि ओतेक विकसित नहि छलनि। नितम्बक विकसित नहि भेनाईक अर्थ ई नहिं जे हेमा आकर्षण, सौन्दर्यमे कोनो तरहेँ कम छलीह।

 

हेमा सत पूछी तऽनिर्भय लग खिच्चा छलीह। ताहिसँ की, सँबंधमे हेमा निर्भयकेँ बहिनकननदि छलीह से निर्भयकेँ परिहासक अवसर दैत छलनि। एकबेर हेमा इंटरमीडिएट केरपरीक्षा देमय निर्भय ओतय एलीह।निर्भय हेमाक समीप आबय लगलाह।सामान्य हास-परिहास नहुँ-नहुँ प्रेममे परिवर्तित होमय लगलनि। बातक प्रेमआब आँखि, भंगिमा आ मुद्रासँ होमय लगलनि। शुरूमेहेमा ओतेक गम्भीर नहिंछलीह लेकिन निर्भय हुनको गम्भीर बना देलथिन। प्रेम शब्दक बाटसँ देहक सीमापर आबि गेल छल। दूनूकेँ बयसक अंतर समाप्त भऽ गेलनि। जाड़क मासमे अपन सीरकमे घुसल हेमा पोथीक सामीप्य कम आ निर्भयक हाथ, मुँह आ ने जानि कोन-कोन अंगकसामीप्य अधिक करय लगलीह। दूनूक जीवनमे एक अपूर्व रस भेटनाई शुरू भेलनि।किताबक पथ हेमाक सँग छोड़ि देलक आ आब प्रेमक बाट हिनका दूनूकेँ अपना लगबजा लेने छ्ल।

 

एक दिनजखन हेमा अपन सीरकमे घुसल छलीह आ निर्भयक हाथ हुनक अंगक विशेष भाग दिस हलचलकऽ रहल छल तखन हेमा प्रेमक रसमे डुबकी लगबैत कनि अपन प्रेमक प्रतिसाकांक्ष होइत बजलीह: "यौ निर्भय ! अहाँ जे अतेक आगा बढ़ल जा रहल छी हमरा सङ्गेसे एक बात बुझल अछि?"

निर्भयक हाथ एकाएक चहलकदमी छोड़ि देलक। कनि चिन्तित होइत बजलाह:"से की?"

हेमा: "यएह जे अहाँ अतेक आगा बढ़ल जा रहल छी। अहाँक माता-पिता आ ओहूसँ आगा हमर भैया-भौजी अहाँ आ हमर विवाह लेल तैयार हेताह?" 

निर्भय : "एक बात कहु।"

हेमा: "पुछू"।

निर्भय : "देखु हेमा, अगर अहाँ तैयार छी तऽ बाँकी काज हमरा पर छोड़ि दिय। हम सबकेँसम्हारि लेब। हमरा बुझल अछि जे एकर सबसँ पैघ विरोध हमर बहिन आर्थत अहाँकबड़की भौजी करतीह। लेकिन देखल जएतैक। हम अपन छोटकी बहिन आरती एवम बहिनोईकेँमना लेब अपना दिस। ओकरे सबहक सहयोगसँ माय सेहो मानि जेतीह। एक बेर मायकहृदय पसिज गेलनि तऽ ओ हमर पिताकेँ सेहो तैयार कऽ लेतीह। हम अहाँकेँकोनो अवस्था मे असगर नहि छोड़ि सकैत छी।" निर्भयक हाथ बात करैत-करैत फेरोहेमाक सीरक दिस घुइस गेलनि आ अपन काज शुरू कऽ देलक। हेमाक शरीर आनंदक स्पर्शसँसिहरय लगलनि। प्रेमक ताप केहेन होइत छैक तकर अनुभव हेमा आ निर्भयसँ बढियाँके बुईझ सकैत छल? निर्भयक हाथ चलैत रहल। कखनो जोर तऽ कखनो कनि हल्लुक मुदाअनवरत। हेमाक पोर-पोर प्रफ़ुल्लित। बिना कोनो व्यवधान केने हेमा बाजि उठलीह:

"जनैत छी, हमर भैया चूंकि हमर बेमातर भाय छथि, तांहि कारणे सेहो ओ आ हमरभौजी हमर अहाँक विवाह लेल तैयार नहिं हेतनि। ओना हम अपन मायकेँ मना सकैतछी।"

निर्भय अपन हाथकेँ गतिमान रखैत बजलाह: "देखूहेमा! अहाँक भैया अहाँक ने बेमातर छथि, हमर तऽ अपन बहिनक पति छथि। हम जनैतछी कोना हुनका सबकेँ मनाबी। अहाँ चिंता नहिं करु।"

आबनिर्भय हेमाक सीरकमे पूरा घुइस गेलाह। दूनू ओहि यात्रामे तल्लीन भऽ गेलनि जाहिमे पति-पत्नी भऽ जाइत अछि।

 

एहि तरहे एहि तइसदिनक प्रवासक अवधिमेहेमा आनिर्भय एक दोसरक देहक आ मोनक प्रीत आ प्रेमक धारमे कतेक बेर डुबकी लगेलनितकर कोनो हिसाबे नहिं। उचितो यएह। प्रेमक कही मात्रा, सँख्या अथवा घनत्वदेखल गेल अछि?

 

जखनहेमा निर्भयक शहरसँ वापस अपन गाम चलि गेलीह तऽनिर्भयकेँ राति काटब मुश्किल। हेमाकेँ सेहो निर्भय बिना अपन जीवन पहाड़ बुझना जाइन। 

 

अन्ततःनिर्भय हिम्मत करैत अपन छोट बहिन आ बहिनोईसँ बात कएलाह। हुनकर छोटकी बहिनतैयार भेलीह। मायकेँ बहुत प्रेमसँ बतेलनि। माय मना कऽ देलथिन तऽ आरतीबजलीह:"अहाँ नहि तैयार हएब तऽ भाईजी किछु कऽ सकैत छथि। घर त्यागि सकैत छथि।"

 

निर्भयकेँ माय आब तैयार भऽ गेलीह। अतबे नहि ओ अपन पतिकेँ सेहो मना लेलनि। निर्भयकपिता एहि लेल मानि गेलाह जे निर्भयसँ एक पैघ भाय सतरह बरखक भेलाक बाद मरिगेल छलथिन। कोनो माता पिताक लेल अहिसँ पैघ दुर्भाग्य की भऽ सकैत छलनि

 

निर्भयकेँ माता-पिता जखनअपन बेटी जमायसँ एहि बारे मे गप्प कएलाह तऽ ओदूनू अग्निश्च वायुश्च। कतबो माय, छोटकी बहिन बहिनोई आ पितामनेलथिन, ओ दूनू नहिए तैयार भेलाह। आब की हो? कोना कऽ मिलन विधना दूनूक़करतै रे की?

 

निर्भयकेँ जखन कोनो उपाय नहिं भेटलनि तऽ झटदनि मूसक दबाई आनि लेलाह। ओकरा घोरि पी गेलाह। सौभाग्यसँ छोट बहिनोई देखलेलथिन। घरमे कोहराम मचि गेलनि। तुरत डॉक्टर लग लऽ गेलनि। बहुत उपायसँनिर्भयक प्राण बचाओल गेल। जखन निर्भय ठीक भऽ गेलाह तऽ जेठ बहिन आ बहिनोई हुनकालग अबैत नोरायल मुँहै कहि देलथिन: "अहाँक प्रेम जीतल। हमर जिद हारि गेल।"

हेमाकेँ सेहो निर्भयकेँ देखबा लेल गामसँ शहर बजाएल गेल छल। हेमाक आँखिकनैत-कनैत लाल भऽ गेल रहनि। निर्भय केर माता पिताक चर्च नहि हो तऽ नीक। मुदाआब सब कल्याणक पथ पर आबि गेल छलाह। 

अहि तरहेँ निर्भय आ हेमाक विवाह सामान्य तरहेँ बिना कोनो दहेजक भेलनि। दूनू एक सँग जीवन जीबाक हेतु तैयार भेलाह। विवाहक किछुए दिनक बाद निर्भयकेँ नौकरी लागि गेलनि। घर पर कोनो कमी छलनि नहि – माता-पिता दूनू प्रोफेसर।

निर्भय  अपन जीवन जिब रहल छलाह। सब तरहें सम्पन्न।निर्भय केर एक कमी छलनि। हिनक अंग्रेजी बहुत अधलाह। हिंदी यद्यपि बहुत नीक बजैत छलाह। लिखियो नीक लैत छलाह। मुदा एक कुंठा पोसि लेने छलाह। कुंठा इ जे जँ हिंदीमे लिखता तऽ लोक इलीट, ज्ञानी, मॉडर्न नहि बुझतिन। एहि कुंठाक कोन उत्तर? एक बात आरो, निर्भय अंग्रेजी सिखबाक यत्न कहियो नहि केलनि। ओना विद्वान लोक बुझय ताहि लेल बहुत साकांक्ष रहैत छलाह।नाना तरहक स्वांग रचैत रहैत छलाह। बहुत तरहक पोथी जे कला, इतिहास, हेरिटेज, साहित्य, पुरातत्व, मीमांशा, नाटक, आदि पर होइत छलैक तकरजोगार करैत छलाह आ अपन घर आ ऑफिसक रैकमे सजेने रहैत छलाह। लोक बुझ जे निर्भय  विद्वान छथि। ओहिमेसँ अधिकांश पोथीक पाँचो पन्ना ओ कहियो नहि पढलाह। पोथीक जोगार निर्भय तीन तरहें करैत छलाह; पहिल, किताबक दोकान अथवा पुस्तक मेलासँ कीनकऽ, दोसर, मित्र अथवा ककरो लग गेलाह तऽ पढबाक लाथे मांगि कऽ, जे कहियो वापस नहि करैत छलाह, आ तेसर, चोराकऽ।निर्भय पोथी चोरीकेँ कोनो पाप अथवा दुष्कर्म नहि बुझैत छलाह। हुनका कियोक कहि देने छलनि जे दिल्ली यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी आ कोलकाता यूनिवर्सिटी केरप्रोफेसर सब सेहो पोथी कखनो झोरामे, कखनो छत्तामे तऽ कखनो कोनो आन चीज़मे चुपे चाप राखि पुस्तकालय अथवा सार्वजानिक स्थानसँ लऽ जाइत छलाह। फेर की निर्भय एकरा अपन मौलिक अधिकार मानि लेलनि। पोथी चोरी कतौ चोरी भेलैक अछि! किन्न्हुँ नहि।निर्भय  अहि तीन युक्तिसँ बिपुल पोथीक स्वामी भेल जा रहल छलाह।निर्भय लग कियोक पहिल बेर अबैत छल तऽ ओकरा लगैत छलैक जे कतेक महान पढ़ाकू आ विद्वान लग आबि गेल अछि!

 

निर्भयकेँ कपड़ा पहिरक कोनो ज्ञान नहि छलनि। छलाह लेकिन कला संस्थानमे ताई रंग-विरंगक विचित्र परिधान पहिरैत रहैत छलाह। कहियो हदसँ अधिक पैघ कुरता आ पायजामा, तऽ कखनो किछु।

 

आर जे हो लंगोटक बड़ जोरगर छलाह निर्भय। जखन कला इतिहाससँ एम ए करैत छलाह तऽ एक बेर गोवा, मुंबई, एलोरा, एलीफैंटा आदि स्थान पर समस्त विद्यार्थिक टोली सँग गेल छलाह। हिनक विषय एहेन छल जाहिमे तथाकथित मॉडर्न, इलीट आ नव धनाढ्यक बेटी, पत्नी आदि समय जियान करबा लेल नामाकन लऽ लैत छलीह। हुनका सबलेल शारीरिक अथवा यौन सुख बस ओहिना समय काटक एक युक्ति मात्र छलनि। अगर विवाहसँ पूर्व कोनो लड़की अथवा विवाहित नायिका कोनो पर पुरुख सँग यौन सुखक प्राप्ति कऽ लेलक तऽ एहिकेँ पाप पुन्यसँ जोरिक देखब हिनका सबलेल पाप छलनि। इ क्षणिक सुख छैक। भेल, क्षणिक सुखक आनंद भेटल। दूनू प्रेमक रससँ रसप्लावित भेलनि। बात खत्म। एकरा खिचनाई अथवा एकर इतिहासमे घुसनाई व्यर्थ। एहेन धुरंधर विचारक महिला आ नायिकानिर्भय सँग एम ए शिक्षा लैत छलीह।

 

ओहि महिला मण्डलमेसँ एक महिला सौम्या जे सांवरि, सुंदरि छलीह। अति मॉडर्न छलीह। चिकित्सक माता-पिताक बेटी छलीह। कोनो तरहक फ्रेम अथवा वन्धनसँ मुक्त छलीह।सौम्याक उरोज भरल सुराहीसँ एकौ रत्ती कम नहि छलनि। गाल भरल-भरल, केश ओतेक पैघ नहि किन्तु झमटगर, खूब कारी, कमर बहुत पातर, नितम्ब सुडौल, अतेक कलात्मक जे बुढो प्रोफेसर सब एक बेर ओहि पर आँखि अवश्य गड़ा दैत छलनि।लोक सौम्याकेँ देखिते सपनाक अलौकिक सँसारमे भेर भऽ जाइत छल। नाना तरहक सोच उफान मारए लगैत छलैक। मुदा तुरते अपन अवस्था, पद, प्रतिष्ठाक भान होइते ओ वापस अपन विज्ञक सँसारमे आबि जाइत छलाह।सौम्याक सबसँ पैघ बात हुनकर सांवरि रंग आ वस्त्रसँ अपना आपकेँ सजेबाक कला छल।सौम्याकेँ देखलासँसांवरि नारी कतेक सुन्दरि, कामुक, उत्तेजक भऽ सकैत अछि; कोना दुग्धधवल नायिकाकेँ अपन सौन्दर्य, वस्त्र विन्यास, कनखी-मटकी, आ चामक पानि सँ पछारि सकैत अछि, तकर जिवंत प्रमाण भेटैत छल।

 

खैर निर्भय अपन ग्रुपक लोक सबहक खूब ध्यान रखैत छलाह।हुनकर एहि गुणक ग्राहक सब छल। एक राति लड़का-लड़की सब बोन फायर केलक। सालक अंतिम दिन आ नव वर्षक प्रथम दिन सबकेँ एक संग मनेबाक अवसर भेटलैक। की सब नहि एलैक। मांस-मदिरा-नृत्य-गीत-मस्ती-भयमुक्त वातावरण। ने घरक लोकक धाख ने यूनिवर्सिटी केर प्रोफेसरक चिंता – सर्वतन्त्र स्वतन्त्र। एक मालिनी मात्र जे ओना तऽ बहुत सुन्दर छलीह मुदा बहुत सौम्य आ शालीन बनबाक अभिनय करैत छलीह। प्रेमक बात तऽ सुनैत छलीह मुदा लज्जा भावक अभिनयमे हिनक उत्तर नहि। एकबेर भरत मोगा नामक स्मार्ट, सुंदर आ वैभवशाली युवक हिनक सौन्दर्यसँ आकर्षित भेल हिनका दिस मित्रताक हाथ बढ़बैत कहि देलथिन: “हेलो! यू आर सो एंटरक्टिव एंड ब्यूटीफुल गर्ल!”

 

मालिनी मोने-मोने प्रसन्न भेलीह मुदा भेलनि एकाएक कोना हाँ कहि देथिन।झटदनि उत्तर देलथिन: “हमरा एहि तरहक मजाक नहि पसिन अछि। हम कनि दोसरे तरहक लोक छी।”

 

तावेत धरि भरत एक पेग ढारि नेने छलाह। केजुअल भेल बजलाह: “कम ऑन मालिनी! ज़माना कतऽसँ कतऽ चलि गेल आ अहाँ एखनो पंद्रहवीं शदीक भारतक मानशिकतामे जीब रहलि छी।हमरालोकनि कला जगत केर लोक छी। अतए उन्मुक्तता छैक। लोकक विचार आ व्यवहार ग्लोबल छैक। लिवइन रिलेशनशिप आम बात छैक। आ अहाँ एहेन बात कहैत छी!” इ कहैत भरत बहुत प्रेमसँ अपन हाथ मालिनीक कान्ह पर राखि देलाह। मालिनी झटदनि हुनक हाथ हटबैत बजलीह: “माइंड योर बिज़नस भरत! हम सड़कछाप लड़की नहि छी। जे केलहुँ से केलहुँ। भविष्यमे एहि घटनाक पुनरावृत्ति नहि हो से ध्यान राखब।”

 

भरत बुइझ गेलाह जे मालिनी दोसरे होपलेस स्टफ छथि। इ मिथ्याक अहंकारमे जीबी रहलि छथि।मोगा कोनो दोसर लड़की जे मस्त भेल नृत्य करैत छलीह लग चल गेलाह।

सौम्या टाइट जीन्स आ शर्ट पहिरने छलीह। उत्तेजक-आकर्षक-मादक! ओहिराति निर्भय बहुत उत्साहित छलाह। मुदा ओहि ग्रुपमे दू मनुखझर छल: स्त्रीगनमे मालिनी आ पुरुखमे निर्भय।निर्भय आ मालिनी दूनूमे कियोक मदिरापान नहि करैत छलनि।मालिनी चारि डेग आगा छलीह – मांस भक्षण सेहो नहि करैत छलीह। वेचारा निर्भय शीतल पेय केर दस बोतलक जोगार केने छलाह। जखन लोक हाथमे मदिराक गिलास लेने जाम हेरा रहल छल, निर्भय ओकरे सबहक तालमे ताल शीतल पेय केर गिलाससँ कऽ रहल छलाह। हुनकोसँ अलग सिंगल पीस बनलि मालिनी एक कोनमे दोसरे दुनियाँमे विचरण करैत शीतल पेयक चुसकी आधे मोने लऽ रहलि छलीह।

कार्यक्रम चलैत रहलैक। बिना पीने लोक सबकेँ पिबैत आ झुमैत-गबैत देख निर्भयकेँ शीतल पेयसँ रमक नशा आबए लागि गेलनि।निर्भय मस्त भेल गेलाह। जेना-जेना राति भेल जाइक तेना-तेना लोक स्वतंत्र-उच्चश्रृंखल भेल गेल। स्त्री-पुरुख, छोट-पैघक, स्थानीयता आदिक दूरी खत्म भेल गेलैक।

 

सौम्या बहुत कम चीज़क उपयोग अपन मूँह कानकेँ सुन्दर बनेबाकलेल करैत छलीह। लेकिन काजर, मस्करा, बिंदी, साड़ी, सूट, शर्ट आदिक रँगकअनुकूल अथवा कंट्रास्टक झुमका अवश्य धारण करैत छलीह जे हुनका विशेष सेक्सी आआकर्षक बनबैत छलनि। हिनक देखब आ ककरो निहाराब बहुत मारुक छल। ऊपरसँमुक्तांगी आ मस्त छलीह सौम्या ।

 

सौम्याकेँ देख निर्भय सेहो मादक आ उत्तेजित भऽ गेलाह।सौम्या कनि बेसी मूडमे छलीह। दोसर पैगकेँ बाद सौम्या जेना संतुलन समाप्त करए लगलीह। देहकाँपय लगलनि। ठोड़ लड़खड़ा गेलनि। माथ भारी भऽ गेलनि। कखनो की बाजथि तऽ कखनोकिछु आरो। उन्मुक्तता सेहो अपन रँग देखाबय लागल। सौम्याक मस्ती बढ़लगेलनि। भाषाक व्यर्थ अनुशासनसँ ऊपर उठए लगलीह। बहुत बात सब जे नारीहोबाक कारण आ सामाजिक मर्यादाकेँ कारण अपना पेटमे, आंतमे, माथमे, करेजमे दबेने रहैत छलीह से जोर-जोरसँ भयमुक्त वातावरणमे बाजय लगलीह। सब यएहसोचैत रहल जे सौम्या अपन सम्हारमे नहि छथि, नशामे भेर छथि तांहि जे मोनमेअबैत छथि से सब बजने जा रहलि छथि। ताहि राति सौम्या केँ सात खून माफ़ छलनि।

 

बीच-बीचमे सौम्या  साकांक्ष भऽ जाथि। होनि, ई की कऽ रहलि छथि! कनिकबेकालमे फेरोमत्त। पेग लेकिन नहि थमलनि। जखन पांच भऽ गेलनि तऽ रंग विरंगक विभत्स गारिबजनाई शुरू केलीह। आब हुनका लोक कहि देकलन्हि जे बोतल खाली भऽ गेल छैक। रातिबहुत भऽ गेल छैक। आब मदिराक सब दोकान बन्द भऽ गेल छैक। ई बात सुनि तामसे भेरभेलि सौम्या आयोजककेँ माए-बहिन लगा गारि पढ़ैत रहली। लोक सब मनहि मोन हँसैतरहल। 

 

एहि बातसँ एक बात स्पष्ट होइत अछि जे हम सबसमाजक ठेकेदार बनि रहल छी। नारी स्वतंत्रता एखनो दूरसँ भले जेलगैत हो, यथार्थमे अग्गब सपना जकाँ अछि।

 

सौम्या सन नारी जखन उन्मुक्त नहि तऽ ककरा कहि स्वतंत्रताक अधिकारी। नारी मोनशिक्षा सँग अधिकार मनैत अछि, स्थान मङ्गैत अछि, ओकरो बात पर लोक अमल करैकसे व्यवस्था मङ्गैत अछि, पुरुखक सँग आ समकक्ष चलए चाहैत अछि। सब तरहेँस्वच्छन्द रहए चाहैत अछि। जहिना पुरुख कतऽ जा रहल अछि, की कऽ रहल अछि, कखन खाइत अछि, कतए आ कखन सुतैत अछि से कियोक पुछनाहर नहि, तहिना तऽ स्त्रीकेँ सेहो अपन जीवनक संचालित करबाक सुविधा, स्वतन्त्रता भेटकचाही ने! से नहि भेटलैक तऽ केहेन स्वतंत्रता? तांहितऽ मदिराक नशासँ मातलिसौम्या  चिचिया कऽ कहैत छथि, "फक यू मेन! यूआर बुलशिट! डोंट चीटमी। केवल पाई देनाइ, नीक स्कूलक शिक्षा, सुविधासँ स्वतंत्रता नहि भेटैत छैक। असली स्वतंत्रता अहाँक दिमागमे नुकाएल रहैत अछि। अहाँ कायर छी। घटिया छी।अहाँ डरपोक छी।अगर एक पुरुख कोनो स्त्री संग देह बांटि सकैत अछि तऽ फेर स्त्री कियैक नहि? इ पाप पुण्य सब पुरुखक ढ़कोसला अछि। कोनो महिला कियैक नहि अपन मोनक आनंद अपन मोनक पुरुखक संग उठा सकैत अछि? चुतिया...”

सौम्या  अतहिं नहि थमहली। बहुत बात बजैत रहलनि। बहुत बात लिखब तऽ मर्यादा चकनाचूर भऽ जाएत।

 

सौम्या भोजन मोनसँ नहिं केलीह। थोड़ेक कालमे निर्भय सौम्या केर हाथ पकड़ि हुनक घर दिस लऽगेलाह। सौम्या  घर पहुंच गेलीह। निर्भय सौम्याकेँ हाथसँ पकड़ि हुनक बेड पर सुतेबाकप्रयत्न करए लगलाह। एहि प्रक्रियामे कतेक बेर निर्भयक हाथ सौम्याक उंन्नतभरल पयोधरिसँ टकराएल। जतेक बेर स्पर्श होइक़ ततेक नीक लगैक। निर्भयकेँ आबसेहो नशा लागि गेल छलैक। ई नशा मदिराक नशा नहि, सौम्याक सौन्दर्यक नशा, सौम्याकसेक्सी शरीरक स्पर्शक नशा छलनि। पुरुखक मोन, निर्भय एक आध बेर नशामे धुत भेलसौम्याकेँ सम्हारबाक बहाने जकड़ि कऽ धेलाह। लेकिन अपन नीक लोकक छविक रक्षा करकजोगारमे निर्भय किछु नहि कऽ पेलाह। आब कनि सौम्या साकांक्ष भेलीह। निर्भय केरशरीरक ठोस बनावट हुनका नीक लगलनि। एक क्षण लेल भेलनि, अगर अहि पुरुखक सँगएखन अभिसार होइत अछि तऽ मोन आ तन, आत्मा आ देह दूनू तिरपित-तिरपित भऽ सकैतअछि। एकर बाँहिक जकड़न हमरा बैकुण्ठक आनंद दऽ सकैत अछि! यैह सोचैत तुरत एक्टकेर मूडमे आबि गेलीह सौम्या । 

सौम्या निर्भय केर झमटगर केश हाथमे बकुटैत बजली: "निर्भय! साले एक बात बताओ?"

निर्भय: "की?"

सौम्या : "अहाँ हमरा ताड़ि रहल रही ने? जानि बुईझ कऽ अपन हाथ हमर ब्रा लग अनैत रही ने?"

निर्भय: "बकबास"।

सौम्या : "सार तोरा हम देह तोड़ि देब। सबहक समक्ष चुम्मा लऽ लेब। चुपचाप सत्य स्वीकार करु।"

सौम्या बजैत रहली। निर्भय चुपचाप सुनैत रहला।

 

सौम्या : "कम ऑन निर्भय! अहाँ जुआन छी। हम जुआन छी। अगर अहाँक मोन हमरा पर आबि गेल तऽ अहिमे की खरापी?"

निर्भय: "सौम्या माइंड योर लैंग्वेज! की अँट शंट बजेने जा रहलि छी अहाँ? ई सब बात छोड़ू आ चुपचाप आब आँखि मुईन सुइत रहू।"

सौम्या : "एकर मतलब की भेल? अगर हमर अधखुला वक्ष देखि अहाँक मोन नहिं केलक एकर अर्थ ई भेल जे अहाँ नामर्द छी!"

"स्टॉपदिस नॉनसेंस!", निर्भय चिचिया उठलाह। मुदा सौम्या लेल धन सन। सौम्या निर्भयकेँअंगाककॉलर पकड़ि अपना दिस घिचलनि। आब निर्भय मूडमे आबि गेल छलाह। ताबर तोर चुमाकप्रहार करए लगलाह। कखनो अपना दिस खिंच लेथि तऽ कखनो सौम्याक गर्दनि पकड़ि सौम्याकदूनू ठोरक मध्य अपन जीभ डालि सौम्याक जीभक मधु स्पर्श आ स्वादसँ आनंदित होइतरहलनि। सौम्या सेहो विरोधक बदले और सहयोगे करैत गेलथिन। सौम्याक दैहसँ मदिरा, सेंट, आ प्रकृतिक स्त्रिजन्य सुगन्ध आबि रहल छलनि। ओहि सुगंधक सब कतरा निर्भयकेँ मादक बनेने जा रहल छलनि।

 

निर्भय आवेगक अतिरेकमे सौम्याक सब वस्त्र हटा देलथिन। सौम्या कनि संकोच तऽ केलनि कारणसंकोच आ नारी एक दोसरक पूरक होइत अछि। मुदा सौम्याक मोनमे निर्भय सँग देह बाटकततेक उग्र ज्वाला धधकि रहल छलनि जे कनिकबे कालमे अपना आपकेँ निर्भय लगसमर्पित कऽ देलीह। जखन सौम्या  निर्वस्त्र भऽ गेलीह तऽनिर्भय केर वस्त्र अपने हाथेखोलय लगलीह। निर्भय केर उत्तेजना आ सौम्याक सँग देह बाँटब केर अभिलाषा सेहो उग्रभेल गेलनि।

 

सौम्या निर्भयकअंतिम वस्त्र हटा रहल छलीह तऽ एकाएक निर्भय केर जेंटलमैन बला चरित्र जागिउठलनि। निर्भय सौम्याकेँ झकझोड़ि देलाह। सौम्याकेँ पते नहि चलि पेलनि कि निर्भय अचानकएहेन बेवहार कथिलेल केलनि। कामक ज्वरसँ धू-धू जड़ि रहलि छलीह सौम्या । तामस तऽअतेक भेलनि जे निर्भय केर खून कऽ देतीह। 

इमहर निर्भय बिना किछु कहने सौम्याक शरीर पर वस्त्र राखि देलथिन।

निर्भयकमर्यादा, लज्जाभाव एकाएक जाग्रत भऽ गेलनि। कहि देलथिन: "नहि सौम्या, हमरासँ ईसंभव नहि अछि। ई चरित्र लंघन हम नहि कऽ सकब। स्टॉप इट। आई एम सॉरी। हम अपनमर्यादा बिसरि गेल रही।"

कामक अग्निसँ जड़ैत सौम्या एकबेर शेरनी जकाँ निर्भय पर गरजैत बजली: "तखन कथिलेल अतेक आगा बढ़लहुँ? अहाँ मर्द नहिं छक्का छी। बहाँ...द एहिसँ पहिने जे हम तोरा गां----- पर लात मारि भगा दी तों अपने तुरत हमर घरसँ भाग ।"

निर्भय देह झारैत भागि गेलाह। राति भरि कोना समय सौम्या व्यतीत केलनि से वैह बुईझ सकैत छलीह।

वैह निर्भय अपन पत्नी हेमा सँग बहुत रोमांटिक छलाह। कामकलाक अनेक आसनकप्रयोग करैत छलाह। कखनो प्रयोगक नाम पर स्थापित सीमाक अतिक्रमण सेहो करैतछलाह।निर्भयकेँ दू बेटा भेलनि। दुनुक मध्य अंतर मात्र सवा बरखक। एक बेरराघबकेँ पता लगलनि जे निर्भय केर कनिया हेमा विमार चलि रहल छथिन। हुनकर डाँरमे दर्द छनि। गम्भीर इलाज चलि रहल छनि। बादमे निर्भय केर दोसर मित्र जेराघबक मित्र सेहो छलथिन आ निर्भय सँग हुनकेँ सोसाइटीमे रहैत छलाह, राघबकेँबतेलखिन जे निर्भय केर पत्नी हेमा हुनकर पत्नीसँ कहलथिन जे निर्भय पृष्ठभागसँसंभोग करबाक जिद ठानि देलथिन। ओहिक क्रममे नश चढ़ि गेलनि। खैर! ई निर्भय केरनिजी मामला छलनि।

निर्भय हमेशा कोनो नीक पढ़य बला केरसंगतिमे रहबाक यत्न करैत छलाह। हुनकर एक मित्र कोनो जोशी नामक छलथिन ।बहुत तेज, सुन्दर। मुदा सबकर्मी आ एक नंबर केर फ्रॉड। चोरीक कलामे प्रवीण।एकबेर जोशी महोदयकेँ लकऽनिर्भय राघब केर होस्टलमे आबि गेल छलाह। राघबकेँ कतौ जेबाक रहनि। निर्भयकेँ अपन घरक चाभी राघब दऽ देलथिन। बादमे जखन राघबअएलाह तऽ पता चललनि जे जोशी जी राघबक अनेक वस्त्र, पोथी आदि चोराकऽ चलिगेल छलाह।

हेमा, अर्थात निर्भय केर पत्नी बहुतसांस्कृतिक आ श्रृंगारिक स्वभावक छलीह। अधिक काल नुआ ब्लाऊज पहिरैत छलीह।दूधिया गोड़ाई। एक तऽनिर्भयसँ नौ वरखक छोट ऊपरसँ बहुत छरहरि, दूभर पातर। कतेकसमय तऽनिर्भय आ हेमाक जोड़ी विपरीत अर्थात पिता पुत्री सँग लगैत छल।

हेमा भोजन, संगीत, मिथिला चित्रकला, योग, नृत्य सबमे प्रयोग करए चाहैत छलीह। ओजीवनक संगीत देखय चाहैत छलीह। वस्त्रकला केर नीक ज्ञान छलनि हिनका। ब्यूटीपार्लर केर ज्ञानमे पारंगत छलीह हेमा।

एक आध बेर हेमा नौकरी करबाक यत्न केलीह मुदा निर्भय तकर अनुमति नहि देलथिन। हेमा ओना ई मनैत छलीह जे निर्भय बहुत प्रवुद्ध लोक छथि।

जाहियासँ राघब कला कला संसथान जॉइन कएलाह निर्भय लेल वरदान भऽ गेलनि। अपन सङ्गी सबकेँपीएचडी उपाधिसँ निर्भय बहुत उत्प्रेरित भेलाह आ पीएचडी लेल कोनो यूनिवर्सिटीसँ पंजीयन लऽ लेलाह। समस्या ई छलनि जे कोना लिखताह? अपने कोनो स्थितिमेनहि लिखताह से बुझल छलनि। कतेक बेर राघबसँ प्रत्यक्ष आ परोक्ष रूपमे कहिदेलथिन मुदा राघब टालैत रहलथिन। 

संयोगसँ निर्भयकेँमाता पिता राघबसँ परिचित छलथिन। एकबेर कोनो प्रयोजनसँ राघब हुनका लगगेलाह। रातिमे ओतए रुकलाह। रातिमे भोजनक बाद निर्भयक पिता राघब लग दूनू हाथजोड़ि ठाढ़ भऽ गेलथिन्ह। राघब घोर आश्चर्यमे परि गेलाह। तखन निर्भयकेँ पिताकहलथिन: "राघब, अहाँ हमर पुत्रतुल्य छी। हम आ निर्भयक माए अहाँमे अपन पुत्रदेखैत छी। हम नौकरीसँ सेवानिवृत भऽ चुकल छी। हृदय रोगक रोगी छी। जीवनक कीभरोसा? ई निर्भय नालायक अछि। एकरा बूते पीएचडी एहि जन्म के कहैत अछि, सातजन्ममे नहि हेतैक। अहाँ हमरा सबपर एक उपकार करु आ एकर पीएचडी लिख दियौक।अहाँक अहि योगदानकेँ हम जीवन पर्यंत नहि बिसरब। "

निर्भयकमाय सेहो मौन भेल अपन आँखिसँ बहुत किछु कहि देने छलथिन। राघब उठि गेलाह।निर्भयक पिताक हाथ अपना हाथमे लैत बजलाह: "हमहुँ अहाँ सबमे अपन माता-पिताकछवि देखैत छी। ओना ई बहुत दुष्कर कार्य अछि। निर्भय किछु तऽ करत नहि, सब काजहमरे करय पड़त। लेकिन हम तीन मासमे पीएचडी थीसिस लिख दैत छी।"

ई बात सुनि निर्भयक माता-पिताक नेत्र एक दोसरे आभासँ चमकि उठलनि। राघब एक भारसँ दबि गेल छलाह।

राघब कलाकेन्द्र आबि गेलाह। निर्भयकेँ बजा सब सामग्री अपना लग मंगा लेलाह।पीएचडी थीसिस लिखनाई राति-दिन शुरू केलनि।

 

अहि तरहेँ राघब तीन मासमे निर्भय लेल पीएचडी लिख निर्भय केर माता-पिताक भावनात्मक ऋणसँ उऋण भेलाह।

निर्भय पुरा थीसिसमे पूर्ण विराम के कहैत अछि अर्ध विराम तक नहिं लिखलनि। ऊपरसँनिर्भयकेँ राघब कहलथिन जे अपन धन्यवाद ज्ञापन लिख लेथि।निर्भय ओहू लेलतैयार नहिं भेलाह। राघबक आगा अस्त्र राखि देलनि। लाचार अपन माथक केश नोचैतराघब निर्भय केर धन्यवाद ज्ञापन सेहो लिखलनि। ओहिमे राघब जानि बुईझ कऽ अपननाम नहिं लिखलाह। विश्वास छलनि जे निर्भय या तऽ स्वयं लिख लेताह अन्यथा राघबकेँ कहथिन जे अहाँ अपन नाम लिख लीय। मुदा निर्भय कृतघ्न प्राणी छलाह। राघबकयोगदान हुनका लेल अतबे महत्वपूर्ण लगलनि जतेक योगदान एक हरबाहक कृषिकार्यकसंपादन मे। बल्कि ओहू सँ कम। कारण हरबाहकेँ काजक बदला ओकर बोइन भेटैत छैक।

 

लेकिन निर्भय अतबो जरूरी नहि बुझलनि जे राघबक प्रतिकृतज्ञता अर्पित करथि। ऊपरसँ अपन पत्नी मेधा, आ हित मित्र लग अपन प्रशंसकपुल बनहैत रहला निर्भय। 

संयोगसँ कनिकबे दिनक बादनिर्भयक माता पिता निर्भयसँ भेट करक हेतु दिल्ली एलथिन। राघबकेँ जखन पतालगलनि तऽ राघब भेट करऽगेलाह। भेट होइतहिं निर्भयक पिता बाजि उठलनि: "कतेकआशीर्वाद दिय अहाँकेँ राघबजी! अगर अहाँ नहि लिखबा लेल तैयार भेल राहितौं तऽसातो जन्ममे निर्भय बूते पीएचडी थीसिस लिखल नहि होयतैक।" राघब विनम्रतासँसब बात सुनैत रहला।

 

फेर निर्भयकेँ पिता बजलाह: "लेकिन अहाँक नाम कतौ धन्यवादमे नहिं अछि राघबजी?"

राघब: "पता नहि, शायद निर्भय बिसरि गेल हेताह।"

निर्भयकपिता: "ई कोना भऽ सकैत अछि? हमरा बुझल अछि जे सम्पूर्ण थीसिसमे निर्भयक नामसेहो राघबजी लिखने छथि। फेर निर्भय नाम कथिलेल नहि देलाह?"

निर्भय सकपकाईत बजलाह: "हम पूछने रही। राघब जी नहि लिखलाह।"

निर्भयक पिता कहलथिन: “अहाँ अपन अकर्मण्यता अहूमे प्रदर्शित केलहुँ। अहाँक हम पिता छी हमरा अहि बातक घोर दुःख अछि।” निर्भय मुड़ी गोतने बात सुनैत रहला।

किछु मासक बाद निर्भय केर पीएचडी पूर्ण भऽ गेलनि। अवार्ड भेटि गेलनि।निर्भय आब डॉ निर्भय भऽ गेल छलाह।

एकबेर हेमासँ कोनो बात पर गप्प भेलनि तऽ राघबक पत्नी कहि देलथिन जे राघब निर्भय केर पीएचडी थीसिस लिखने छलाह।हेमा निर्भयसँ पुछ्लनि।निर्भय चुप भऽ गेलाह।हेमा मुरझा गेलीह। पहिल बेर हेमाकेँनिर्भयक पत्नी बनबा पर ग्लानि भऽ रहल छलनि।“अहाँ हमरा एखन असगर छोड़ि दिय! बस।” अतेक कहैत हेमा अपन हाथ कपार पर धऽ लेलनि।निर्भय निरर्थक गंभीर बनल ओतएसँ दूर भऽ गेलाह।

दोसर दिन निर्भय एकबेर पुनः राघबसँ पुछि देलथिन: “राघब! अहाँ अपन पत्नीकेँ बता देने छलयनि जे अहाँ हमर पीएचडी थेसिस लिखने रही?”

राघबकेँ इ प्रश्न जेना तामस चढ़ा देलकन्हि –“अहाँ की बुझैत छी! ओ हमर पत्नी छथि हम हुनका नहि सूचित करबनि तऽ ककरा कहबै? अहाँ अतेक निर्लज्ज छी जे हमर नामक कतौ उल्लेख तक नहि केलहुँ। अपन पत्नी हेमा लग अपन वैदुश्यक बखान करैत छी। आ हम ओतेक मदति केलाक बादो चोर जकाँ रही! एहने बात छल तऽ अपनेसँ लिख लितहुँ।” एकर बाद दूनू चुप भऽ गेलाह।

खैर, किछु दिनक बाद राघब नौकरीसँ त्यागपत्र दऽ देलाह।निर्भयसँ मुक्ति भेट गेलनि। समय चलैत रहलैक। पाँच मासक भीतर एकदिन निर्भय दस बजे रातिमे कनैत फोनसँ सूचित केलथिन जे निर्भयक पिताक निधन एकाएक हृदयगति थम्हि गेलासँ भऽ गेलनि। राघब बहुत दुखी भेलाह। जतबे दुःख अपन पिताक मृत्यु पर भेल छलनि ओतबे दर्द तखनो भेलनि। एक बातक संतोष जरुर भेलनि – नीक भेल निर्भय केर पीएचडी भऽ गेलनि अन्यथा हुनक पिताक आत्मा भटकैत रहितनि जे हुनक पुत्र कुमार निर्भयसँ डॉ निर्भय नहि भऽ सकलाह!

समयक चक्र चलैत रहलैक। किछु व्यक्तिगत विवशतासँ राघब नौकरीसँ त्यागपत्र दऽ देलनि। निर्भय संस्थाँकेँ धेने रहलाह।सरकारी तंत्रमे जेना होइत छैक, होइत रहलैक। निर्भयक तरक्की हुनक पीएचडीक कारण होइत रहलनि। कुरता-जीन्स पहिरने निर्भय अपन देहक आ वस्त्रक सम्प्रेषणसँ विद्वान भेल रहैत छथि। भीतरक निर्भयकेँके देखैत अछि? ककरा लग समय छैक?

 

नोट:इ कथा पुर्णतः काल्पनिक अछि। एकर सम्बन्ध कोनो जीवित अथवा मृत व्यक्ति या संस्थानसँ नहि छैक।

 

 


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