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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

डॉ. वीणा कर्ण

मैथिलीक धरोहर 'सीता-शील' (खड्गबल्लभ दास ‘स्वजन’ जीक ‘सीता-शील’ मैथिली काव्यक साहित्यिक विवेचना)

मानवीय आदर्श ओ अध्यात्म चिन्तनक अभिव्यक्तिक लेल काव्य अमृत्वक काज करैत अछि। भक्तिक भावुकतासँ भरल मोनकें काव्य सृजक प्रेरणा स्रोत कहब अनुपयुक्त नहि होएत। एहि काव्यक शब्दार्थ होइत अछि कवि-कर्म जकर काव्य सम्पादनमे रचनाकारक काव्य रचनाक प्रवृत्ति ओ अभ्यास कार्यरत होइत अछि आ अहि व्युत्पत्ति ओ अभ्यासक बलपर ओ जे रचना पाठककें समर्पित करैत छथि से काव्य कहबैत अछि। वस्तुत: काव्यक रसानुभूतिसँ हमर हृतंत्रीमे जे तरंग उत्पन्न लेइत अछि ओकर लय ओ छन्दमे बान्हल रहब आवश्यक होइत अछि जे शैलीक आधारपर क्रमश: तीन कोटिमे बाँटल रहैछ, यथा- गद्य, पद्य ओ मिश्र। मिश्रकेँ चम्पू काव्य सेहो कहल जाइत अछि। छन्दरहित काव्य विधानकें जँ गद्य तँ छन्द्युक्त रचनाकेँ पद्य कहल जाइत अछि। पुन: गद्यमे अनेकानेक विधा अछि, जेना- कथा, उपन्यास, संस्मरण, यात्रावृत्तांत , रिपोर्टाज, नाटक ,एकांकी आदि-आदि। ओहिना पद्यक सेहो दू भेद होइत अछि: प्रबंध ओ मुक्तक। प्रबन्ध काव्यक सेहो दू भेद होइत अछि – महाकाव्य ओ खण्डकाव्य। महाकाव्यमे जँ इतिहास प्रसिद्ध महापुरुष अथवा महीयशी नारीक सम्पूर्ण जीवनक गतिविधिक चारित्रिक लीला-गान रहैत अछि तँ खण्डकाव्यक विषयवस्तु होइत अछि एहने महापुरुष अथवा महीयशी नारीक जीवनकप्रसिद्ध खण्डविशेषक घटनाक्रमक चित्रांकन।

प्रस्तुत कसौटीक आधारपर ‘सीता-शील’ केँ प्रबन्धकाव्यक कोटिमे राखल जा सकैत अछि सेहो महाकाव्यक कोटिमे। हँ, महाकाव्यक संज्ञासँ अभिहित करबाक क्रममे एहि रचनाक सन्दर्भमे किछु नियमकें शिथिल करए पड़त। एहि रचनाक महाकाव्यत्व सिद्ध करएमे मात्र दू टा तत्व,विविध छन्दक प्रयोग ओ सर्गवद्धताक अभावकें शिथिल करए पड़त। ‘सीता-शील’क रचनाकार स्वयं एकटा साहित्यिक विधाक कोनो कोटिमे नहि राखि पद्य-रचना कहैत छथि “सामान्य जन कें ओ सुग्रन्थक अर्थ समझ पड़नि जें स्पष्ट सुन्दर भाव समझै मे कठिनता होनि तें से जानि रचलहुँ मधुर भाषा मैथिली कें पद्यमे लागत पड़ै मे पढ़ि रहल छी जाहि तरहें गद्य मे”

वस्तुत: रचना कोन कोटिक अछि से परिभाषित करब रचनाकारक नहि अपितु आलोचकक काज होइत छन्हि। ई हमर सभक दायित्व अछि जे एहन महानतम रचनाक प्रति संवेदनशील भए एकर उपयोगिताकें देखैत एकरा प्रति न्याय कए सकी। एकरा अहू लेल खण्डकाव्य नहि कहल जा सकैत अछि जे खण्डकाव्य तँ महाकाव्यक शैलीमे प्रधान पात्रक जीवनक कोनो एक खण्ड विशेष के लए कए लिखल जाइत अछि, किन्तु एहि रचनामे भगवती सीताक जन्मसँ लए कए जीवनक अन्तमे धरती प्रवेश धरिक घटना निबद्ध अछि। वास्तवमे देखबाक ई अछि जे प्रबन्धकाव्य लेल जे आवश्यक अर्हता होइत अछि तकर समाहार एहि महाकाव्य मे भेल अछि अथवा नहि।

प्रबंन्ध-काव्यमे सर्वप्रथम कथानकक अनिवार्यता होइछ आ तकर प्रयोजन ओहि पात्र विशेषक क्रियाकलापक कथा होइत अछि जाहि कथासँ प्रभाव ग्रहण कए भावक अपन स्वच्छ चरित्रक निर्माणक दिशामे अग्रसर भए लोक-कल्याणक भावनाकें सबलता प्रदान करैत छथि। एहि महाकाव्यक कथानक सेहो एकटा महत् उद्देशयकें लए कए सृजित भेल अछि जाहिसँ समाज सुधारक मार्ग प्रशस्त भए सकए। भगवती जानकीक जीवन-चरितक प्रसंगमे रचनाकारक जे भावोक्ति छन्हि ताहीसँ एकर कथानकक चयनक औचित्य प्रतिपादित भए जाइत अछि। देखू जे महाकवि स्वयँ की कहैत छथि – “ओहिठाम प्रातिज्ञाबद्ध भ गेलहुँ जे रामायण मे वर्णित जगत जननी जानकीक आदर्श चरित्रक वर्णन अपन मातृभाषा मैथिली मे पद्य रचना कए पुस्तक प्रकाशित कराबी, तें – 

“आदर्श पुरुषक प्रेमिका कें चरित शुभ लीखैत छी

उपदेश नारी लेल ‘सीता-शील’ मध्य पबैत छी

अछि धारणा सीताक प्रति उर-मध्य श्रद्धा-भक्ति जे

पद रचि प्रकट कs रहल छी अछि योग्यता आ शक्ति जे”

एकरा संगहि एहि महाकाव्यक कथानकक चयनमे रचनाकार जे एहन सफलता प्राप्त कएलन्हि अछि से अहू कारणें जे ग्रामीण निष्कलुष वातावरणमे रहि कऽ महाकवि खड्गबल्लभ दास अपन एकान्त साधनासँ सुन्दर कथानकक चयन कएलन्हि अछि जाहिमे प्रेमक मधुर संगीत अछि तँ उद्दाम उत्साह सेहो। मानवताक व्याकुल आह्वाहन अछि तँ प्रकृतिक मधुर सौंदर्य अछि। सीताक वैभवक संग आदर्शक आकर्षण सेहो सशक्तता सँ चित्रित भेल अछि।

कहल जा सकैत अछि जे एकर कथानक संयमित भावात्मकता ओ संयमित कलात्मकताक संग सामंजस्य सँ अत्यन्त प्रभावोत्पादक भए उठल अछि। वास्तवमे एहि महत् काव्यक कथानकक माध्यम सँ मानवीय मूल्यक अवमूल्यन कएनिहार लोककें मर्यादा रक्षाक पाठ पढ़एबाक आवशयकता बूझि एहन कथानक प्रस्तुत कएल गेल अछि जकर कथानक चयनक मादें पटना विश्वविद्यालयक अवकाशप्राप्त मैथिली विभागाध्यक्ष प्रो। आनन्द मिश्र लिखैत छथि -“एहि पुस्तक द्वारा कवि साधारणों व्यक्ति कें ओहि उदात्त चरित्र सँ परिचय कराय नैतिकता एवं शालीनताक पाठ दए रहल छथि। लोकक चारित्रिक उत्थानहि सँ समाज एवं देशक उत्थान भए सकैछ। सम्प्रति लोक आधुनिक चाकचिक्यक जाल मे फँसल अपन संस्कृति एवं सभ्यता सँ हँटल जा रहल अछि। मानवीय मूल्यक अवमूल्यन भए गेल अछि। लोक अपन आदर्श चरित्र सँ अनभिज्ञ भए रहल अछि। बिना संस्कृतिक उत्थानहि आन प्रगति अकर्मिक भए जाएत।”  वस्तुत: एहि कारणसँ एहन आदर्श कथानकक चयन कएल गेल अछि।

महाकाव्यक दोसर तत्व होइत अछि नायक। जें कि पात्रक माध्यम सँ कविकें समाजकल्याणकारी महत् उद्देशयक प्रतिपादन करबए पड़ैत छैन्हि तें महाकाव्यक पात्रमे लोकनायकत्व क्षमता रहब अत्यन्त आवश्यक होइत अछि। संगहि कथानकक प्रतिपादनमे एहि लोकनायकक उद्देशयक पूर्तिक लेल अन्य सहयोगी पात्र सभक अनिवार्यता सेहो छैक। ‘सीता-शील’मे पात्रक सुन्दर प्रयोगसँ एकर सफलता सिद्ध भेल अछि। भगवत् भक्तिक प्रति अनुरक्तिसँ मनुष्यकें जाहि ब्रह्मानन्द सहोदरक प्राप्ति होइत अछि सएह जीवनक चरम उत्कर्ष बूझल जा सकैत अछि। परमात्माक असीम सत्त ओ हुनक लोककल्याणक भावनाक अजस्र धारमे सराबोर करबाक करुण चित्रण मैथिली सीताराम विषय महाकाव्यक विषय वस्तु बनल अछि। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ओ अयोनिजा भगवती सीताक चरित्रक स्मरण मात्रसँ एहि भावक बोध होइछ जे संसारमे जे किछु अछि से अही महत् चरित्र परमेश्वर ओ परमेश्वरीसँ ओत प्रोत अछि आ अही परमात्मा सीता-रामक लीला-गानकें प्रस्तुत रचनामे स्थान देल गेल अछि।

भौतिकताक सीमासँ ऊपर उठि कए ‘सीता-शील’क रचनाकार ओहि परम सत्ताक संग अपन चेतनाकें एकाकार करैत अपन ‘स्व’ केर उत्सर्ग कए देने छथि। परमात्माक चारित्रिक उत्कर्षक प्रकाश एहि रचनामे सर्वत्र परिव्याप्त अछि जे ‘यावच्चंद्र दिवाकरौ’ हमरा सभक आचार विचारकें अनुशासित करैत रहत। मानवीय मूल्य संरक्षणक जेहन व्यवस्था, ओहि व्यवस्थाक प्रति व्यक्तिक उत्तरदायित्व निर्वहन जेहन दिशा-निर्देश जाहि रूपें एहि रचना सँ प्राप्त होइत अछि तकर समाजकल्याणक मार्ग प्रशस्त करएमे अत्यन्त पैघ भूमिका छैक तें एकर रचनाकार एहन पात्रक चयन कएलन्हि जिनक आदर्शक आलोकसँ समाजक मानसिकताकें प्रकाशित करबाक सद्प्रयासमे ओ कहैत छथि :-

“आदर्श पूरुषक प्रेमिका कें चरित शुभ लीखैत छी

उपदेश नारी लेल ‘सीता-शील’ मध्य पबैत छी”

 

XXXXXXXXXX

 

आ पुन: -

 

“ई चरित पढ़ि आदर्श जीवन कें बनौती नारि जे

बनतीह जग मे परम पूज्या पतिक परम पियारि से”

 

महाकाव्यक लेल सर्गबद्धता अनिवायता कें स्वीकारल गेल अछि किन्तु एकर कथानककें विषयवस्तुक अनुरूप शीर्षक दए विषयकें विश्लेषित कएल गेल अछि। सर्गक अनिवार्यताक स्थानपर एहन प्रयोग महाकविक भावुक मानसिकताक परिचायक तँ अछिए संगहि एहि दिशा मे सक्रिय रचनाकारक लेल ई पोथी एकटा नव दृष्टिकोण सेहो प्रदान करैत अछि।

महाकाव्यमे विविध छन्दक प्रयोग हएब सेहो आवश्यक अछि। अगिला विषयक विश्लेषण लेल पछिले सर्गक अन्तमे छन्द परिवर्तित कए देल जाइत अछि किन्तु एहि वृहत् रचनाक विषयवस्तुकें एकहि छ्न्दमे नियोजित कए कवि प्रवर चमत्कार उत्पन्न कए देने छथि। महाकाव्यमे अनेक छन्दक प्रयोगसँ ओकर अनेक तरहक रसास्वादनक स्थानपर एकहि छन्द मे एकर नियोजनसँ कोनो अन्तर नहि आएल अछि किएक तँ रसास्वादनक प्रवाहक गतिशीलता कखनहु अवरोध उत्पन्न नहि करैछ। एहन छन्द प्रयोगक मादें कवि स्वयं कहैत छथि :-

“मात्रा अठाइस पाँति प्रति लघु-गुरु चरण कें अन्त मे

सुन्दर श्रवण- सुखकर मधुर हरिगीतिका कें छन्द मे”

आश्चर्यक बात तँ ई जे मात्र एकहि छन्दमे प्रयुक्त कथानक भेलोपर एहिमे कतहु रसहीनताक अवसर नहि भेटैछ। काव्यकलाक अन्तरंग ओ बहिरंग नवीनता, भावनाक माधुर्य ओ रसविदग्चताक कारण कविकें अपन अन्तस्थल सांस्कृतिक चेतनाकें सार्वजनिक करबाक सुअवसर प्रप्त भेल छन्हि।

रसकें काव्यक आत्मा मानल गेल अछि। संस्कृतक प्राय: सभ विद्वान रसक महत्ताकें स्वीकार केने छथि। पंडित राज जगन्नाथ रसेकें काव्यक आत्मा स्वीकार करैत चाथि: -"रमणीयार्थ: प्रतिपादक: शबद: काव्यम" रसेमे ई शक्ति छैक जे काव्यक रसास्वादनक सत्य अर्थमे अवसर प्रदान करबैत अछि। सहृदयक ह्रदयमे आह्लाद एवं मनकें तन्मय बना देबाक रसक क्षमतासँ वाणी गद्गद ओ शरीर रोमांचित कए जायत अछि। साहित्यमे एकर सुन्दर प्रयोगसँ ब्रह्मानंदक सहोदरक रूपमे परमात्माक साक्षात्कार होएबाक अनुभूति होइत अछि। आध्यात्मिकताक भावभूमिपर रचल-बसल एकर विषयवस्तुक निर्वहनक लेल 'सीता-शील'मे शान्त रसक प्रयोग तँ भेले अछि, एहिमे शृंगार रसक एहन प्रभावशाली ओ उत्प्रेरक वर्णन भेल अछि जे काव्यमे साधारणीकरणक उपयोगिताकें सार्थक सिद्ध करैत अछि। महाकाव्यमे रसक उपस्थितिक केहन सशक्त प्रभाव पड़ैत अछि, पाठकक भावुकताकें उद्बुद्ध करएमे एकर की भूमिका छैक, एकर समालोचना एकरा कोन रूपें स्वीकार करैत छथि तकरा एहि महाकाव्यक प्रति कहल गेल बिहार विश्वविद्यालयक भूतपूर्व राजनीति विज्ञानक अधयक्ष प्रो.देवनारायण मल्लिकक शब्द मे देखल जा सकैत अछि- "रचनाकारक प्रारम्भिक विनययुक्त पद्य पर दृष्टि परितहिं पढ़बाक उत्सुकता भेल। एके बैसक मे 'सीता-शील' कें आद्योपान्त पढ़ि गेलहुँ। एहि पाठ्यांतर मे कतेको बेर आँखि सँ नोर बहल अछि, कतेको बेर रोमांचित भए उठलहुँ अछि, कतेको बेर देवत्वक परिवेश मे आत्मा कें विचरण करैत पौलहुँ।"

काव्यमे जँ रसास्वादन करएबाक क्षमता नहि हो तँ ओकरा काव्यक कोटि मे राखले नहि जा सकैत अछि। काव्य सृजनक आधार होइत अछि रस। प्रबन्ध काव्यमे एकटा प्रधान रस होइत अछि जकरा अंगी रस कहल जाइत अछि आ अन्य रस सभ ओहि अंगी रसक सफलतामे सहयोगीक काज करैत अछि।

काव्यमे रसक अनिवार्यता प्राय: सभ विद्वान मानने छथि। हँ,ई बात फराक अछि जे केओ एकरे काव्यक आत्मा मानैत छथि तँ केओ अलंकार कें। केओ काव्यमे ध्वनिक समर्थक छथि तँ केओ छंदपर जोर दैत छथि किन्तु समग्र रूपसँ विद्वान सभक कथानक निचोड़ ई अछि जे रसोत्कर्षक सहायकक रूपमे अलंकार केँ राखल जा सकैत अछि किन्तु एकरा काव्यमे सार्वभौम सत्ताक कारण नहि कहल जा सकैत अछि। अलंकार काव्यक सौंदर्यवृद्धिमे सहायक तँ होइत अछि किन्तु एकरा काव्यक आत्मा मानब अनुपयुक्त होएत। वस्तुत: रसेकेँ काव्यक आत्मा मानब उचित अछि से रस 'सीता-शील'क प्राणवन्तताक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। जेँ कि प्रस्तुत महाकाव्य भगवती सीताक सुशीला स्वभावक दस्तावेज अछि, भारतीय संस्कृतिक प्रति कविक उच्चादर्शक निरूपण अछि आ पोथीक प्रारम्भसँ लए कए अन्त धरि सीताक प्रति करुणाक अजस्र धार बहएबाक अवसर प्रदान करैत अछि तेँ एकरा करुण रस प्रधान महाकाव्य कहि सकैत छी अर्थात् करुण रस एहि महाकाव्यमे अंगी रसक रूपमे उपस्थित अछि आ अंगक रूपमे अन्य रस सभ सहयोगीक काज करैत एकर रसास्वादनक क्षेत्र विस्तार करैत अछि जेना - सीतारामक अपरिमित प्रेम प्रसंगमे संयोग ओ वियोग श्रृंगार, सूर्पनखाक विरूपित रूपमे हास्य रस, जानकीक जन्मक क्रममे वात्सल्य, परशुराम-लक्षमण संवादमे रौद्र, राम-रावण युद्ध, बालि-वध, खरदूषण वध, मारीचवध आदिमे वीर रस, सीताक जनकपुरसँ विदाइ ओ वनगमनक काल सासु सभक उपदेश ओ सीतासँ विछोहमे करुण रस आदिक उपादेयताकेँ देखल जा सकैत अछि।

काव्यमे अलंकारक उपस्थितिसँ एकर सौंदर्यवृद्धि ठीक ओहिना होइत अछि जेना कोनो नारीक सौन्दर्य अलंकारक प्रयोगेँ द्विगुणित भए जाइत अछि। अलंकारसँ काव्यमे जे प्रभावोत्पादकता उत्पन्न होइत अछि से ओकर इएह शक्तिमत्ता अछि जाहिसँ काव्य सुकोमल ओ मधुर रूप ग्रहण कए पाठककेँ भाव-विभोर करैत अछि। एकरामे हृदयग्रह्यता ओ सुषमासृष्टि करबाक क्षमतासँ एकर प्रभावान्वितिक प्रवाह तीव्रतर भए पबैत अछि। अलंकार प्रयोगक दृष्टिएँ 'सीता-शील' अद्भुत उदाहरण अछि। एहिमे उपमा, रूपक, अनुप्रास, अप्रस्तुत प्रशंसा आदिक आधिक्य रहितहुँ यमक उत्प्रेक्षा, वक्रोक्ति आदि अधिकाधिक अलंकारक प्रयोगेँ कविक कथ्यक मार्मिकता पाठककेँ साधारण स्तरसँ ऊपर उठाकए तन्मय कए दैत अछि।

अपन सुकोमल भावनाक अभिव्यक्तिमे कवि प्रकृतिकेँ कखनहुँ बिसरल नहि छथि। काव्यमे प्रकृति चित्रणक कारण होइत अछि कविक सौन्दर्यबोध ओ प्रकृतिसँ हुनक साहचर्य से हिनक सौन्दरोपासनाक प्रति फलक साक्षी तँ प्रस्तुत रचना अछिए तखन ओहि सौन्दर्य के आत्मसात कएनिहार महाकविक वैभवपूर्ण सौंदर्यक वर्णन कोना ने करितथि।

हिनक उच्चस्थ प्रकृति प्रेमकेँ पोथीमे अनेको ठाम देखल जा सकैत अछि जेना मिथिलाक शोभा वर्णनक क्रममे कवि प्रवर कहैत छथि -

"हिमधवल पर्वत-पुञ्ज तल मे बसल मिथिला प्रान्त ई

"सम्पूर्ण विश्वक देश एवं प्रान्त सँ शुभ शान्त ई"

सीता हरणक पश्चात रामक विलापमे कविक प्रकृतिसँ साहचार्यक एहन अभिव्यक्ति भेल अछि से देखिते बनैत अछि। कखनो ओ अशोककेँ सम्बोधित करैत भगवती सीताक पता ज्ञात होएबाक जिज्ञासा करैत छथि तँ कखनो जामुनसँ पूछैत छथि। कखनहुँ शालसँ पूछैत छथि तँ कखनहुँ आम आ कटहरसँ। कखनो पीपरसँ पूछैत छथि तँ कखनो जूही, कनाओल, गेना, गुलाब, चम्पा, चन्दन, वर, कदम्ब, अनार, गूलरिसँ। कखनो कोमल हरिण, गजराज सिंह, बानर, भालू, सूर्या, वायु, चंद्र, धरती, वरुण, आकाश आदि जड़ हो अथवा चेतन, प्रकृतिक कण-कणसँ पूछैत छथि। कविकेँ प्रकृतिसँ आत्मीय सम्बन्ध छन्हि जे प्रकृतिक लेल रामक सम्बोधनमे देखल जा सकय अछि। प्रकृतिक मानवीकरणसँ कथ्यक विश्वसनीयता द्विगुणित भए जाइत अछि जकरा आलम्बनक रूपमे ग्रहण कए महाकवि 'स्वजन' जी एहि महाकवि 'स्वजन' जी एहि महाकाव्य केँ चिरनूतन सौन्दर्य प्रदान करलन्हि अछि।

चित्ताकर्षक ओ प्रांजल भाषा मन-प्राणकेँ पुलकित कए दैत अछि से 'सीता-शील'क रचनाकार भाषाकेँ बोधगम्य, चित्रोपम एवं सस्वर बनएबाक भावुक प्रयास कएने छथि जाहि कारणें एकरा प्रति उद्दाम चित्ताकर्षण होइत अछि। कोनो साहित्यिक अपन रचनाकेँ चित्ताकर्षक बनएबाक लेल भाषा-प्रयोगक प्रति साकांक्ष रहैत छथि आ कथनकेँ भव्यतर बनएबाक लेल नै मात्र अपनहि मातृभाषाक प्रयोग करैत छथि अपितु तत्सम, तद्भव, देशज ओ विदेशज भाषाक चारू रूपक सानुपातिक प्रयोगसँ रचनाक उत्कृष्ट बनएबाक सत्प्रयास करैत छथि। महाकवि 'स्वजन' जीक एहि रचनामे तत्सम, तद्भए आ देशज शब्द तँ एकर आधार स्तम्भ अछिए विदेशज शब्दल प्रयोगइ सेहो रचनाकार अत्यन्त कुशल आ प्रबुद्ध छथि जाहि कारणें ठाम-ठाम ओकर सुन्दर प्रयोगसँ वाक्य संगठनमे कतहु मोनकेँ अकछा देबाक अवसर नहि देने छथि। जेना औषधिक स्थान पर दवा, उनटि देबाक स्थान पर उलटि देब, घुरबाक स्थान पर वापस, लोकक स्थान पर लोग, पिताक स्थान पर बाप, नमहरक स्थान पर लम्बा, कायरताक स्थान पर कायरपना आदि अनेको शब्दकेँ देखल जा सकैत अछि।

वस्तुत: कवि 'स्वजन' जी जाहि कुशलतासँ एहि रचनामे सीता-शीलक महत्ताक निरूपणमे अपन संवेदना ओ विस्तारकेँ भाषाक कसौटीपर कसि कए भावनाकेँ अभिव्यक्ति देने छथि से निश्चित रूपेँ एहन महाकाव्यक लेल उपयुक्त, सुष्ठु भाषाक अनुरूप अछि जाहिसँ एहन भाषाक भावुकता महाकाव्यमे प्रयुक्त रस ओ अलंकार जकाँ धारदार, तीक्ष्ण ओ प्रभावोत्पादक भए सकल अछि। कवि अपन अतुल शब्द भण्डार सँ सुन्दर, सुकोमल ओ भावाभिव्यंजक शब्दक चयन कएने छथि जाहिमे अपन हृदयक रसरंग रंग टीपि देने छथि।

कोनहु रचनाकारक ई दायित्व होइत छन्हि जे ओ अपन एहन रचनामे स्थानीय विशेषताकेँ स्थान अवश्य देथि से 'सीता-शील' मे मिथिलाक सौन्दर्य ओ संस्कृतिक वर्णनक क्रममे महाकवि अपन उदात्त पात्रक मुँहसँ की कहबैत छथि से देखू -

"तिरहुतक तुलना मे कोनो नहि देश-प्रान्त पबैत छी

मिथिला सदृश सौन्दर्य हम संसार मे न सुनैत छी"

तहिना वनक मनोरमताकेँ सीता-रामक वनवासक क्रममे ओ रावणक ऐश्चर्यकेँ लंकाक वैभव सम्पन्न क्षेत्रमे देखल जा सकैत अछि।

प्रबन्ध काव्यक लेल कथोपकथन सेहो अत्यन्त आवशयक तत्व अछि किएक तँ एकर एक पात्र दोसर पात्रसँ जाहि बातक अपेक्षा रखैत छथि से वार्तालापहिसँ सम्भव भए सकैत अछि। रचनाकार कथोपकथनक प्रयोगमे केहन निपुण छथि तकर संगठन 'सीता-शील'मे सर्वत्र देखएमे अबैत अछि खास कए परशुराम-लक्ष्मण संवाद, लंकामे रावण ओ सीताक मध्यक वार्तालाप, अनुसूया-सीताक मध्य वैचारिक आदान-प्रदान आदि प्रसंग मे देखल जा सकैत अछि।

महाकाव्यक महत् उद्देश्य होइत अछि आ रचनाकार द्वारा ओकरा अपन रचनाक बिना आलम्बन बनौने कोनहु रचनाक सार्थकता सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि से अहू रचनाक पाछाँ महत् उद्देश्य छैक आ ओ छैक संसारसँ आसुरी शक्तिक नाश, मानवताक उच्चस्थ भावनाकेँ सम्मानित करब आ भगवती सीताक शील केँ समक्ष राखि नारीक विशुद्धाचरणक माध्यमसँ जन-कल्याणक भावनाकेँ पल्लवित करब। अपन एहि महत् कार्य-सम्पादनमे महाकवि अनेक ठाम सटीक सूक्ति वचनक प्रयोग कए समाजसुधारक कार्य सम्पादन करैत छथि जकरा देखबाक होयए तँ 'सीता-शील'क अनेक प्रसंग एकर गवाही देत। नारीक आदर्शकेँ जीवनक अक्षयनिधि मानि ओकरा सम्मानित करब एहि रचनाक मुख्य उद्देश्य अछि जकरा एकर चरित्र-प्रधान शीर्षकमे देखल जा सकैत अछि। कहाकवि 'स्वजन' जी स्वयं कहैत छथि -

"सीखथु जगत मे नारिगण शिक्षा सियाक चरित्र सँ

स्वामी प्रसन्नक लेल सब किछु करथि हृदय पवित्र सँ"

आ पुन:-

"ई चरित पढि आदर्श नीवन केँ बनौती नारि जे

बनतीह जग मे परमपूज्या पतिक परम पियारि से"

नारीक कर्त्तव्य ओ आदर्शक प्रति समाजकेँ साकांक्ष करबाक एहि उद्देश्य प्रतिपादनमे महाकवि ख्ड्गबल्लभ दास जी अत्यन्त संवेदनशील छथि। भगवती सीताक शिव संकल्पयुक्त कर्त्तव्यपरायणता ओ पातिव्रत्य हिनका अत्यधिक भावुक बनौने छन्हि फलत: कवि कहि उठैत छथि -

"ई जौं पढ़थि सभ व्यक्ति 'सीता-शील' चित्त पवित्र सँ

पढ़ि नारि-नर आचार सीखथि जानकीक चरित्र सँ"

नारी चरित्रक सहिषणुता, सच्चरित्रता, लाग, क्षमाशीलता, ममता आदि गुण स्वस्थ समाज-निर्माणक दिशामे आवश्यक तत्व अछि जे लोककल्याणकारी विचारधाराकेँ सबल बनबैत अछि आ इएह अछि महाकवि खड्गबल्लभ दास 'स्वजन'क लोककल्याणकारी नारी जीवनक आदर्श आ ओहि आदर्शक अक्षरस: पालन करबाक पाठक सँ अपेक्षाक उद्देश्य प्रतिपादन।

 

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