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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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जगदीश प्रसाद मण्डल

'बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं'

( 'चितवनक शिकार' संग्रहसँ)

ओछाइनपर सँ उठले रही कि जीबछ भाय दरबज्जाक आँगनमे खसास केलैन। ओना, खखाससँ नहि बुझि पेलौं जे जीबछ भाइक खखास छिऐन मुदा घ्वनिसँ बुझि पड़ल जे अकासक उड़ैत टिटहीक छी, तँए केतौ बिसाएत..! मुदा लगले ईहो भेल जे अकासक टिटहीक अबाज दोसर रंग होइ छै से तँ छी नहि। मने-मन गुनधुनाइतो रही आ डेगे-डेग ससैर कऽ बाहरो एलौं। जीबछ भायपर नजैर पड़िते बजलौं- 

“जीबछ भाय! भोरे-भोर अहाँ दर्शन भेल, औझुका दिन शुभ भेल।” 

जीबछ भाय अपनाकेँ शुभदाता बुझि विचारलैन आकि शुभ घटनाक आबाही बुझि से तँ जीबछ भाय जनता, मुदा एतबे बजला- 

“बौआ, कमरसाइरसँ घुमैतकाल राधेश्याम काका भेँट भेला। दरबज्जेपर बैसल रहैथ, देखते सोर पाड़लैन। असथिरसँ लगमे जा पएर छुबि गोड़ो लगलयैन आ मुहोँसँ बजलौं।” 

तइ समयमे राधेश्याम काकाकेँ ब्लड-पेसरक झोंक एलैन आकि ओहिना अपन मन धधकलैन से राधेश्यामे काका ने जनता। मुदा एतबे बजला- 

“बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं।” 

कहि चुप भऽ गेला। की जवाब दैतिऐन। जिनगी भरि पोथी-पुराणक बीच जिनगी गुजारलैन ओ आ कौल्हुका छौंड़ा भऽ कऽ की जवाब दैतिऐन। मुदा चुल्हिमे जहिना मिझाएल-पझाएल आगिकेँ खोंरनीसँ बाहर निकालि चुल्हिमे जारन देलासँ जहिना आगिक बढ़बारि होइए तहिना बजलौं- 

“काकाजी!” 

‘काकाजी’ सुनि राधेश्याम कक्काक मन जेना ठमकलैन। मुदा व्यग्रताक उग्रता जे मनमे पजैर गेल छेलैन ओ ओहिना लहलहा रहल छेलैन। बजला- 

“बौआ, एकटा विचार पुछै छिअ।” 

राधेश्याम कक्काक विचार सुनि मनमे भेल जे हम कहियाक विचारी हिनकर रहलौं जे हमरासँ विचार पुछता? फेर मनमे भेल जे विचारक माने एतबे नइ ने होइए जे कोनो गम्भीरे विषयक विचार हुअए, ओ तँ साधारण नून-तेलक जे दाम बढ़ैए तेहनो होइए। 

विचार बुझैक मन बना राधेश्याम काका दिस नजैर उठेलौं। नजैर-मे-नजैर मिलिते राधेश्याम काका बजला- 

“हमर की गति हएत?” 

‘हमर की गति हएत’ राधेश्याम काका सन लोकक मुहेँ सुनि मनमे पथराएल चोट जकाँ झाँइ-दे लगल। की रधेश्यामे काकाटा एहेन परिस्थितिमे फँसि गेल छैथ आकि समाजमे हिनका सन-सन आरो लोक छैथ? हमर की गति हएत, गतिक माने समयसँ लगौल जाइए जे दिशा भेल। मुदा दिशाक दशा की अछि सेहो तँ हेबे करत किने। ओना, ई बुझल अछिए जे राधेश्याम काका अढ़ाइ-तीन घन्टा पूजापर सेहो बैसनिहार छथिए। भलेँ पूजाक सामग्री जुटबैमे तबाही किए ने होइत होनु, ई दीगर भेल...। 

विचारकेँ सानि-बाटि बजलौं- 

“काका, अपना केने थोड़े किछु होइए, सभ ऊपरकाक हाथमे छैन। जाइ छी। हुनकर जेहेन मरजी रहतैन तेहने ने अरजियो लेता।” 

ओना, हम अपन जान छोड़बैत निकलए छेलौं मुदा राधेश्याम काका गम्भीर भऽ गेला। 

जीबछ भाइक विचारमे डुमए लगलौं। जेते डुमैत जाइ तेते जेना इजोत भेटल जाए..! बजलौं- 

“भाय! भिनसुरका समय छी, अखने सुति कऽ उठलौं हेन। अहाँ बहन्ने हमरो पत्नी बिस्कुटो खुऔती। चाह पीब लिअ।” 

ओना, जीबछ भाइक मनक तनतनीसँ बुझि पड़ि रहल छल जे बजैक इच्छा जोर मारि रहल छैन। चाहक नाओं सुनि जीबछ भाय बजला- 

“पहिने एक गिलास पानि पीआबह, पछाइत चाह पीब।” 

जहिना सबहक पत्नी पतिक गप-सप्पक कनसोह लइए आकि अतिथि-अभ्यागतक आगमन देख खिड़की लग ठाढ़ भऽ सुनैए तहिना पत्नी ‘एक गिलास पानि’ सुनि लगले नेने पहुँचली। हाथमे पानि देखते पत्नीकेँ कहलयैन- 

“एक लोटा हमरो दऽ जाएब। कुर्ड़ो कऽ लेब आ पीबियो लेब।” 

ओना, मने-मन पत्नी कुड़बुड़ेली मुदा मुँह खोलि बजली किछु ने। अपने तँ पत्नीक कुड़कुड़ाएब कनी-मनी बुझियो गेलौं मुदा जीबछ भाय बुझला कि नइ बुझला से तँ वएह जनैथ। अपनाकेँ निर्बल-निश्चल बनबैत जीबछ भाय बजला- 

“बौआ, अपन हारल आ बोहुक मारल बुड़िबकहा तँ बकि लइए मुदा काबिल लोक थोड़े मुँह खोलि बजता। ओ तँ कहबे करता किने जे सभ बात सभठाम नइ ने बाजल जाइए। आ जँ सएह भेल तँ बुड़िबक-काबिलमे अन्तरे की भेल।” 

जीबछ भाइक बात सुनि मनमे जेना उत्कंठ जगल तहिना भेल। बजलौं- 

“से की भाय साहैब?” 

संजोग बनल, पत्नी चाह नेने पहुँचली। जीबछ भाय आ अपनो पानि पीबिये नेने छेलौं। जीबछ भाइक मन जेना उड़-बिड़ाए रहल छेलैन तहिना बुझि पड़ल। मुदा तैबीच चाह हाथमे चलि आएल रहैन। एक घोँट चाह मुँहमे लइते बजला- 

“बौआ, राधेश्याम काका बड़-बड़ लीला राज मोरंगमे केने छैथ..!” 

एक दिस जीबछ भाइक चेहराक उदासी नजैरसँ देख पड़ैत रहए आ दोसर दिस मनचोभिया नाचक साजक संग अबाज दऽ रहला अछि! जरूर किछु रहस्यमय विचारमे छैन। मुदा से टोकचाल केने बुझबामे गड़बड़ा जाएत। किए तँ कोन विचार जीबछ भाइक मनमे रहस्यपूर्ण भरल छैन, से अपने केना बुझब। बकटेँट जकाँ किछु-सँ-किछु बाजि देब जेकरा जबबैमे जीबछ भाय लगि जेता, जइसँ अपन मनक बात मनेमे गराएल रहि जेतैन। पोचारा दैत बजलौं- 

“भाय साहैब। अहॉं सभतरहेँ श्रेष्ठ छी, अखने किए जिनगी भरि अहाँ सोझहामे हम बाले-बोध बनल रहब। अहाँ पढ़लो-लिखल बेसी छी, घुमबो-फीरबो बेसी करै छी आ करबो केनहि छी। तैसंग अपन एते नमहर कारोबार सम्हारिये रहल छी।” 

अपन इमनदार-जिनगीक बात सुनि आकि हमरा मुँहक सत् बात सुनि जहिना पहाड़क झरना झहरैत पानि धरतीमे उतैर धीरे-धीरे निर्बल-निश्चल हुअ लगैए तहिना जीबछ भाय निश्चल होइत बजला- 

“बौआ, राधेश्याम काकाकेँ हम तीन पुस्तसँ जनै छिऐन। साधारण किसान गौरी बाबा छला। माने राधेश्याम कक्काक पिता। जहिना सबहक मनमे अपन अपन-अपन अराधक प्रति आराधना होइए तहिना गौरी काका मनमे बेटाकेँ सज्ञान बनबैक आराधना अराधि बेटाकेँ एम.ए. पास करौलैन। कौलेजमे बेटाकेँ पढ़बैत-पढ़बैत बीघा भरि खेतो बिका गेल छेलैन। मनमे आशाक मोटरी बन्हले छेलैन जे बेटा पढ़ि-लिख लेत तँ अपन जिनगी अपना ढंगे जीबैक लूरि-बुधि भइये जेतइ। तइले अनकर आशा थोड़े रहतै। ओ तँ ओतबे काल अछि जेत्तेकाल नइ भेल अछि।” 

बजैत-बजैत जीबछ भाय चुप भऽ गेला। अपना बुझि पड़ल जे भरिसक जीबछ भाय किछु बात बिसैर रहला अछि, जनु तेकरे मन पाड़ैले बीचमे रूकला अछि। बजलौं- 

“भाय साहैब, एकबेर आरो चाह पीब?” 

चाहक नाओं सुनि जीबछ भाय बजला- 

“बौआ, चाहे ने चाह पैदा करैए ओत्ते चाह मनमे बैसले अछि जे कोन रूपे तोरा बुझा सकब, सहए ने मन थीर भऽ रहल अछि।” 

अपनो मन कनी-मनी अकछाए लगल। बजलौं- 

“भाय साहैब, शोर्ट-कटमे कहियौ।” 

जीबछ भाय बजला- 

“राधेश्याम काका प्रगतिशील विचारक लोक छैथ, अपना पाँचो बेटाकेँ अपना जकाँ संस्कृत विद्यालयसँ नहि जोड़ि अंग्रेजी विद्यालयसँ जोड़लैन। अपन उठाइन सेहो भेलैन। विद्यालयक उठाइन भेने, परिवारो आ बालो-बच्चाकेँ पढ़बै-लिखबैमे कहियो कोनो अभाव नइ भेलैन। पाँचो बेटामे एकटा डॉक्टर, दूटा इंजीनियर आ दूटा अफसर बनि जहाँ-तहाँ नोकरी करै छैन। पाँच बरख पहिने विद्यालयसँ रिटायर भेला। अपन कीनल जमीन, तइमे लगौल आमक गाछी, अपन खुनौल दस कट्ठाक पोखैर, तैसंग अपन बनौल दू-मंजिला घर वस्तु-जातसँ सजौनहि छैथ भलेँ समाजक बीच समाजिकता नहियेँ सजौलैन, से छोड़ि बेटाक संग रहैमे असोकर्ज छैन्हे। तँए टिटही जकाँ दुनू परानी रहै छैथ। शरीर घटने रंग-रंगक बिमारीक दाब जहिना पड़ि रहल छैन तहिना करताइतिक अभावे कष्ट सेहो भइये रहल छैन।” 

जीबछ भाय जेत्ते बजला तेते तँ अपने नइ बुझल छल मुदा किछु-किछु देखल-सुनल तँ अछिए। मन थकथका गेल जे की बाजूँ। 

जीबछ भाय दोहरबैत बजला- 

“राधेश्याम काका जे कहला ‘बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं’, से अपने ने जनबो करता जे भागबो करता। बुढ़ भेलौं तँ दुइर गेलौं आकि बुइड़ गेलौं। से तँ अपने मन ने कहैत हेतैन।”

 शब्द संख्या : 1086, तिथि : 04 मार्च 2019

 

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