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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

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जगदीश प्रसाद मण्‍डलजीक

दूटा लघु कथा कोढ़िया सरधुआ त्रिकालदर्शी

कोढ़िया सरधुआ

राधेश्‍याम बाबा घरक बगलेक पोखैरमे स्‍नान करि एक हाथमे धोती आ दोसर हाथमे अछींजल पानिसँ भरल लोटा नेने डेढ़ियापर पहुँचबे केला कि पाछूसँ रस्‍तापर सँ लखन टोकलकैन-

बाबा, अहींसँ कनी काज अछि।

जहिना राधेश्‍याम बाबा लखनक बात सुनलैन तहिना आगूक डेग रोकि ठाढ़ होइत बजला-

केहेन काज छह हौ लखन?”

अनका जकाँ बिटंडी राधेश्‍याम काका नहि छैथ जे पाछूसँ टोकने टोकानि लगितैन। अपन विचार छैन जइ अनुकूल अपन जिनगीक धार बहै छैन। जे गामे नहि आनो गामक लोक जनैए। लखनकेँ सेहो बुझल छइहे, तँए भरि राधोपुरमे जँ केकरो बिसवास पात्र मानैए तँ ओ मात्र राधेश्‍याम बाबाकेँ।

बिसवासक संग लखन बाजल-

बाबा, एकटा नालिस अछि।

लखनक बात सुनि राधेश्‍याम बाबा ठकुआएल ठाढ़ रहैथ। ओना लखनकेँ सेहो चिन्‍हते छैथ जे मिरचाइ, धनियाँ, हरदी, लसुन, आदीक वेपार लखन आइये नहि, तीसो-चालीस बर्खसँ राधोपुर सहित आनो-आन गाममे करैत आबि रहल अछि। गामक उपकारी लोक तँ छीहे तँए जँ कोनो विघ्‍न-बाधा रस्‍तामे एलै तँ ओकर निमरजना हेबेक चाही। मुदा लगले फेर भेलैन जे स्‍नान केने आबि रहल छी, भीजल धोतियो आ पूजाक अछींजल सेहो हाथेमे अछि, तैबीच लखनक नालिस सेहो अछिए।

थकमकाएल ठाढ़ राधेश्‍याम बाबाक मनमे उठलैन जे अपनो आगूक काज अछि जे पहिने अँगनाक ओसारपर अछींजलक लोटा रखि घरक चारपर धोती पसारब, पूजा करब, भोजन आ अराम करब तेकर पछाइत ने दुनियाँ-दारीक काजमे जुटब। मुदा लगले भेलैन जे अपने अपन काजमे जखने जुटि जाएब, तखने दरबज्‍जापर आएल भूखल-दुखल बेकतीक उपकार केना हएत। तहूमे लखन सन लोक, जे तीन बजे भोरे उठि अपन भोरका कर्म–पर-पाखाना, कुर्रा-आचमन–सँ निवृति होइत चारिये बजेसँ अपना संग अनको दुख-धन्‍धाक पाछू लगि जाइए।

राधेश्‍याम बाबाक मनमे उठलैन जे उपकारो तँ उपकार छी। ओहो तँ एक्के रंगक नहियेँ अछि। एक उपकार भेल जे केकरो कएल जाइए आ दोसर भेल जे उपकारीकेँ उपकार करब। जहिना कोनो गाछ जड़िसँ लऽ कऽ छीप तक एक पुरखियाह होइए आ कोनो जड़ियेसँ सघन बनैत जाइए, जड़ियेसँ अनेको डारि-पात हुअ लगै छै तहिना लखनो सघन लोक अछिए...।

राधेश्‍याम बाबाक मन मानए लगलैन जे पहिने लखनक जे नालिस अछि तेकरे बुझी। अपन जे काज अछि ओ तँ अपना जुतिमे अछि, कनी देरिये ने हएत। तहूमे लखन दस-दुआरी अछि तेँ दस रंगक काजो हेतइ...। 

ऐठाम अबैत-अबैत राधेश्‍याम बाबाक मन मानि गेलैन जे पहिने लखनेक काज करब पछाइत अपन करब। मुदा लगले फेर मनमे उठि गेलैन जे कोनो वस्‍तुक लेन-देन तँ छी नहि जे ओ मंगलक आ अपने घरसँ निकालि दए देलिऐ। वा आगूक समए लऽ लेलौं। नालिस छी, नालिसो-नालिसमे अन्‍तर अछिए। दू गोरेक बीचक जँ कोनो छोट-छीन बात रहल तँ ओरा लगले निपटा लेब। मुदा जँ नमहर माने एकसँ अधिकक बीचक रहल तँ ओ लगले थोड़े फरिछौल जा सकैए। ओइमे तँ बेसी समए लगबे करत। तँए जँ आगू बढ़ि लखनकेँ पुछिऐ जे की नालिस छह, तखन तँ जड़िसँ छीप धरि बुझै पड़त। तइमे समए केते लगत तेकर कोनो ठेकान अछि...।

तइ बिच्‍चेमे लखन बाजल-

बाबा, अहूँकेँ बहुत काज पछुआएल अछि आ हमहूँ चारि बजे भोरेसँ घुमैत-घुमैत थाकि गेल छी। मन गरमा गेल अछि। घरपर जाएब, साइकिल रखि कनी ठंढ़ाएब पछाइत नहाएब-सोनाएब तखन ने खाएब आ अराम करब।

लखनक बात सुनि राधेश्‍याम बाबाक मनमे जेना नव विचार लगलैन। नव विचार ई जगलैन जे जे आदमी चारि बजे भोरसँ काजमे जुटल अछि, अखन एगारह बजि रहल छै, ओइ आदमीक भूख-पियास आ अपने जे छह बजेमे ओछाइनपर सँ उठि पर-पाखाना होइत मुँह-कानमे पानि लइत चाह-पान करैत आठ बजेमे काज दिस बढ़लौं, दुनूक भूख-पियास एके रंग थोड़े भेल।

मनमे अबिते दोसर विचार जेना राधेश्‍याम बाबाक मनकेँ पकैड़ लेलकैन। दोसर विचार ई पकैड़ लेलकैन जे कियो आदमी ओहन अछि जे एक साँझक भूखल अछि आ कियो तीन साँझक भूखल अछि, दुनूक भूख की एक्के रंग भेल। तैठाम पहिने केकरा खाइले भेटौ..?

अबैत-अबैत राधेश्‍याम बाबाक मनमे थोड़ेक चैन एलैन। चैन अबिते बजला-

लखन, जखन तूँ नालिस डायर केलह तखन ओ ठाढ़े-ठाढ़ थोड़े हएत। हमहूँ अछींजल ओसारपर रखि, धोती चारपर पसारि अँगनासँ अबै छी आ तोहूँ ताबे साइकिल लगा चौकीपर बैसह।

राधेश्‍याम बाबाक बात सुनि लखनक मनमे सवुरक मेवा खसल। जहिना कोनो आम वा आने फलक गाछक पीपही-पौध रोपैकाल ओ फल मनमे नचैत अपन सुआद छिटकाबए लगैए तहिना लखनोक मनमे भेल जे पनचैती हेबे करत।

ओना सुधिया दादी सेहो अँगनाक मुँहथैर लग ठाढ़ भऽ दुनू गोरेक गप-सप्‍प सुनैत रहैथ। मुदा बजैथ किछु ने। किछु नहि बजैक कारण रहैन जे जखन मरदा-मरदी गप भऽ रहल अछि तखन बीचमे अनेरे बाजब नीक नहि। मुदा तँए मनमे खौंझ नहि उठैन सेहो बात नहियेँ अछि। खौंझ तँ उठबे करैन। भेल जअमे पाथर खसब एकरे ने लोक कहै छइ। भरि दिन नीक-अधला वृत्ति लोक अपन खाइये-पीबैक जोगार-ले ने करैए, सेहो जँ तुकपर नइ भेल तँ की भेल। मुदा दुआरपर आएल केकरो अकची-दोकची कहब सेहो नीक नहियेँ छी।

आँगनक पछबरिया ओसारपर अछींजलक लोटा रखि चारपर धोती पसारि राधेश्‍याम बाबा दरबज्‍जापर आबि चौकीपर बैसला। लखन पहिनेसँ चौकीपर बैसल छल। राधेश्‍याम बाबाकेँ किछु पुछैसँ पहिने लखन बाजल-

बाबा, अहूँ देखै छी आ दादी सेहो देखैत आबि रहल छैथ, जे ई साल 2017 ईस्‍वी हमर चालिसम बरीस रोजगारक छी।

बिच्‍चेमे राधेश्‍याम काका बजला-

हँ, से तँ भेले हेतह।

राधेश्‍याम बाबाक समर्थित बात सुनि लखनक मनमे आरो उत्‍साह बढ़ल। अपन विचारकेँ पसारैत आगू बाजल-

बाबा, अहीं कहू जे आइ धरि कोनो शिकबा-शिकाइत लऽ कऽ कहियो किछु कहलौं?”

समर्थन करैत राधेश्‍याम बाबा बजला-

हँ, से तँ कहियो ने किछु कहलह।

राधेश्‍याम बाबाक बात सुनि लखनक मनमे आरो मजगूती आएल। बाजल-

बाबा, जहिना अपन गाम आ परिवार अछि तहिना पँचकोसीक गामो आ परिवारोकेँ, आइये नहि सभ दिन अपन बुझैत आबियो रहल छी आ कारोबार सेहो करिते छी। नगद-उधार सभ चलिते अछि। धरमागती कहै छी जे ने अपने कहियो केकरोसँ एक पाइ झूठ बाजि बेइमानी केलिऐ आ ने आने कियो एको पाइ बेइमानी केलक।

लखनक बात सुनि राधेश्‍याम बाबाक मन कनी घुरियेलैन। घुरियाइक कारण भेलैन जे वेपारी छी तखन झूठ बाजि नइ ठकने हेतइ से सम्‍भव अछि। तँए कनी मिरमिराइत बजला-

तइले कहियो किछु कहलियह?”

लखन बाजल-

बाबा, अहूँ देखै छी आ अपनो-आन देखते छैथ जे झंझारपुर हाटपर समस्‍तीपुरबला वेपारीसँ समान कीनै छी आ तीस प्रतिशत लाभ लऽ कऽ बेचै छी।

तीस प्रतिशत सुनि राधेश्‍याम बाबाक मन कनी ठमकलैन। ठमैकते बजला-

तीस प्रतिशत!”

राधेश्‍याम बाबाक बातकेँ स्‍वीकारैत लखन बाजल-

हँ बाबा, तीस प्रतिशतसँ कमपर काज करब तखन पेट भरत।

राधेश्‍याम बाबा लखनक कारोबारक तहियाएल बात नहि बुझै छला। रेडियो-अखबारसँ बड़का वेपारी सबहक बात बुझै छला। जे एक प्रतिशत, दू प्रतिशत वा पाँच-दस प्रतिशत लाभपर कारोबार करै छैथ। तैठाम लखन तीस प्रतिशत लाभपर कारोबार करैए, ई तँ सोझे गरदैनकट्टी करैए किने..!

बजला-

एक प्रतिशत, दू प्रतिशत लाभपर काज करैबला वेपारीकेँ उना-सँ-दूना होइ छै आ तोरा पेटो ने भरतह?”

राधेश्‍याम बाबाक बात सुनि लखनक मनमे भेल जे राधेश्‍याम बाबा सुधंग लोक छैथ। सभ दिन खेती-गिरहस्‍तीपर जीबैत आबि रहला अछि तँए बनियाँ-बेकालक वेपारक बात नइ बुझै छैथ। मुदा जाबे धरि नइ बुझता ताबे धरि हिनका नजैरमे ठक-फुसिआह बनले रहब। जेकरा अपन बजार बनौने छी आ ओइ बजारक बीच कारोबार करै छी जइसँ परिवारो चलैए आ समाजिकता सेहो बनले अछि, तँए पहिने ई बुझाएब जरूरी अछि।

लखन बाजल-

बाबा, पाँच हजार अपन पूजी अछि आ पाँच हजार वेपारीक– माने जेकरासँ समान कीनै छी–उधार छइ। दुनू मिला दस हजारक कारोबार भेल। सभ दिन गाम सभ घुमि बेचै छी, जइसँ कहियो पाँच साए आ कहियो दुइयो साइक लाभ होइए। हराहरी बुझू तँ तीन-साढ़े तीन साइक कमाइ होइए। अहाँकेँ अपनो परिवार अछि, सभ किछु मिला खर्च जोड़बै तँ बुझि पड़त जे लखनक कमाइ केते भेल।

सोल्‍होअना राधेश्‍याम बाबाक मन लखनक विचारपर नइ जमलैन मुदा आधा-छिधा नइ जमलैन सेहो नहियेँ कहल जा सकैए।

राधेश्‍याम बाबा बजला-

तोरा हिसाबे तँ केतौ गड़बड़ नइ बुझि पेब रहल छी मुदा...।

मुदा सुनि लखनक मनमे भेल जे बाबा सिमरियामे बहैत गंगा वा झंझारपुरमे बहैत कमला वा सुपौलमे बहैत कोसी वा दरभंगामे बहैत बागमतीक बात तँ बुझि रहला अछि मुदा जैठामसँ धार सभ निकलल अछि वा दोसरमे जा-जा मिलल अछि से नहि बुझि पेब रहला अछि। तँए जाबे ओ नइ बुझता ताबे असल बात नहि बुझता।

लखन बाजल-

बाबा, हमसब खुदरा वेपारी छी। कम आँट-पेटक कारोबार अछि। मुदा अहाँक नजैरमे थौक वेपारी सभ छैथ, हुनका सबहक कारोबार करोड़ो-अरबोमे छैन, तँए हुनकर एक-दू प्रतिशत करोड़ो-अरबो आमदनीक भेल आ हमरा सबहक हजार-बजारक कारोबार अछि तँए सौ-सैंकड़ आमदनीक भेल।

ओना अपना जनैत लखन नीक जकाँ अपन विचार बुझौलकैन मुदा राधेश्‍याम बाबाक मन नीक जकाँ नइ बुझि पेलकैन। तँए असमनजस करैत राधेश्‍याम बाबा बजला-

हमरा ते होइए जे सभ वेपारीक चालि-ढालि एके रंग अछि, मुदा तोहर विचार तँ...।

राधेश्‍याम बाबाक पेटक बात लखन बुझि गेल। बाजल-

बाबा, केना कोन वौसक दाम बनैए ओ बड़ भारी अछि। ओकरा कहैमे बड़ देरी लागत मुदा एकटा बात नजैरपर-के दइ छी।

लखनक बात सुनि राधेश्‍याम बाबा ठमकला। पाछू हटैत बजला-

खाइ-पीबैक बेर अछि, तँए अनेरे गप-सप्‍पमे नइ गमाबह। जइ काजे रूकलह तेकरा अगुआबह।

गप-सप्‍पक क्रममे लखनक मन जेना भरि गेल होइ तहिना बाजल-

बाबा, जखन दुनू गोरे बैस विचारिये रहल छी तखन काजो हेबे करत। मुदा एकटा बात पछुआएल अछि से पहिने सुनि लिअ।

राधेश्‍याम बाबाक मनमे भेलैन जे भने पहिने वएह सुनि ली। जखने मनक बात मनसँ निकलतै तखने ने मन खाली हेतइ। जइमे कोनो बात आकि नव विचार रखैयोमे बेसी गरगर हएत। बजला-

पहिने डोरियेलहे विचार सम्‍पन्न करह। पछाइत नवका काजक गरे करब।

लखन बाजल-

बाबा, सड़कक काते-काते पेट्रोल-डीजलक दोकान सभ देखते छिऐ। दस लाख-बीस लाख लीटर पेटरौलो आ डीजलोक स्‍टॉक ओकरा सबहक अछि। अखन तक वेपारी सभ मुनाफा लइत जइ दरमे बिकरी कऽ रहल अछि, ओ बारह बजे रातिमे अन्‍हारे-अन्‍हारमे दू-रूपिया, तीन रूपिया प्रति लीटर बढ़ि जाए, जइसँ हजारक कोन बात जे लाखो-करोड़ो अपने चलि अबैए। से हमरा सभकेँ थोड़े औत। चालीस बर्खसँ धनियाँ-मिरचाइ-हरदी-आदी साइकिलपर लादि गामे-गाम घुमि-घुमि बेचै छी तखन सौ-सैकड़ मुँह आँखि देखै छी।

एकाएक राधेश्‍याम बाबा जेना निर्णायक दौड़मे पहुँच गेला तहिना बजला-

परिवार चलै छह किने?”

परिवारक बात सुनिते लखन बाजल-

से ने किए चलत। धिया-पुताकेँ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ, बिआह-दान जेते भेल से तँ करिते आबि रहल छी। अखनो सात गोरेक परिवार चलैबते छी।

लखनक बात सुनि बगलमे ठाढ़ सुधनी दादी बजली-

लखन कि कोनो आइए-सँ भौरी करैए, पाबैन-तिहारमे केते गोरेक ऐठाम खेबो करैए आ अपनो खुऐबते अछि कि।

सुधनी दादीक समर्थन पेब लखन समरथित होइत (समथारति स्‍वरुप) बाजल-

दादी, कमसँ कम एक साए परिवारसँ खाएनो-पीन रखने छी आ बेटा-बिआहमे बरियाती आ बेटी-बिआहमे समाजिक सम्‍बन्‍ध सेहो ऐछे। केकरो बेटीक बिआह होइ छै ते मास दिन पहिनहि कहि दइ छिऐ जे मर-मसल्‍लाक चिन्‍ता छोड़ि आन चिन्‍ता करब। तहिना माइयो-बापक श्राद्धमे करिते छी।

लखनक बात सुनि राधेश्‍याम बाबाक मन जेना भरि गेल होनि तहिना नरमाइत बजला-

अखन खाइ-पीबैक बेर अछि लखन। पर-पनचैती तँ निचेनीक काज छी, मुदा तैयो जइ काजे तोहूँ अन-पानि तियागने छह आ हमहूँ तियागने छी से पहिने करह।

अपन सभ विचारकेँ मनमे कतियबैत लखन बाजल-

बाबा, पहिने रसियारीवाली कनियाँकेँ बजा लिअ। सोझा-सोझी गप नीक होइए।

बगले परिवारक रसियारीवाली, तँए सुधनी दादी दरबज्‍जेपर सँ शोर पाड़ैत बजली-

हइ रसियारीवाली, कनी एमहर आबह।

अखन तक रसियारीवालीकेँ ई नइ बुझल जे पनचैती अपने ऊपर अछि। मनो निरविकार। निरविकार ऐ दुआरे जे कोनो गलती केने नहि छेली। रसियारीवाली आबि सुधनी दादीक पँजरा लगि ठाढ़ भेली।

रसियारीवालीकेँ देखते लखन बाजल-

बाबा, भोरे-भोर बोहनियेँ-काल रसियारीवाली गारिसँ उकैट देलैन। मुदा हम किछु बजलौं नहि। बोहनी-पहर छल। जँ भोरे जतरा कुजतरा भऽ जइतए ते भरि दिन गारिये-फज्‍झैत ने सुनैत रहितौं। मुदा जखैनसँ सुनलौं तखैनसँ मनमे काँट जकाँ नइ गड़ल अछि सेहो थोड़े नहि...।

राधेश्‍याम बाबा बजला-

लखन तोहर बात नीक जकाँ नइ बुझलौं किए तँ जहिना सौंसे रामायण एकटा छप्‍पयमे सेहो कहल गेल अछि, मुदा रामायणिक विचारधाराकेँ जँ जिनगीक नजरिये बुझब तँ ओ सौंसे जिनगीक छी, तहिना तोहूँ एक्के सूरेमे सभ बात बाजि गेलह। जइसँ नीक जकाँ नहि बुझि पेलौं। पहिने रसियारीए-वालीक गप सुनह।

रसियारीवालीकेँ पँचवेदीमे ठाढ़ होइत देख लखनक मनक अदहा दर्द मनक मेटा गेल। बाजल-

भने अहाँ कहलिऐ, बाबा।

तैबीच सुधनी दादी रसियारीवालीकेँ चरियबैत बजली-

निधोखसँ बाजह। कोनो झूठ-फूस नइ बजिहह। पंचवेदीमे ठाढ़ छह।

रसियारीवाली बजली-

लखनकेँ किछु नहि कहलौं से बात नइ अछि। बजलौं जरूर मुदा गारि नहि पढ़लिऐ।

ओना लखनक मनमे ईहो उठैत रहै जे परिवारोमे जखन कनी-मनी भाइए जाइ छै एना समाज तँ ओइसँ नमहर अछिए। तैसंग ईहो तँ ऐछे जे अही समाजक बीच ने जीबो करै छी आ सुख-दुखक गपो-सप्‍प करै छी। ओना, ईहो विचार लखनक मनमे नचिते रहै जे भोरका समए रहै बेसी लोक सुतले छल, तँए कियो सुननौं ने हएत। आ जँ सुननौं हएत तँ मने-मन विचारिये नेने हएत जे भोरका समैमे कियो अनका थोड़े कहने हएत। तँए लखनोक मनक चितपन कनी निच्‍चाँ भेले जाइत रहइ। मुदा पँचवेदीमे जँ फुसियाह बनि जाइ सेहो केहेन हएत। बाजल-

कनियाँ, अहीं अपना छातीपर हाथ रखि कऽ बाजू जे कोढ़िया-सरधुआ नइ कहने छेलौं?”

रंग-रंगक परिस्‍थिति राधेश्‍याम बाबाक आँखिक सोझमे उपस्‍थित भऽ गेलैन। तैसंग ईहो होनि जे दुइए गोरेक बीचक बात छी, तेसर कियो अछि नहि जे तीनमे दू-एकक अधारपर निर्णय करब...।

मुदा लगले मनमे एलैन जे मुद्दा ने बेकतीगत भेल। मुदा समाजेक लोक ने दुनू छी तँए मुद्दाक संग समाधानोक विचार किए ने दुनू गोरेसँ पहिने लऽ ली...। राधेश्‍याम बाबा बजला-

लखन, तोहूँ कि सोझे भौरीए करैबला वेपारी छह सेहो बात नहियेँ अछि। कहुना ते पचास-पचपनक उमेर भाइए गेल हेतह। तोंही पहिने अपन विचार बाजह।

लखन बाजल-

बाबा, माए जखन जीबै छल तखन ओहो कोढ़िया कहै छल आ घरवाली सेहो केता दिन कोढ़िया कहने हएत तेकर ठेकान नहि। तँए कोढ़ियाकेँ छोड़ि दइ छी मुदा सरधुआ जे रसियारीवाली कहली से जँ हमर सराधे भऽ जाएत तखन सात गोरेक परिवारक खरचा वएह देती।

अधियाएल पनचैती होइत देख राधेश्‍याम बाबा रसियारीवालीकेँ पुछलैन-

आब, कनियाँ अहाँ बाजू।

रसियारीवाली बजली-

बाबा, खूब भोरे-के लखन आबि दरबज्‍जापर सँ चिचियाए लगै छैथ जे मिरचाइ, धनियाँ, हरदी लेब अइ ऐ ऐ ऐ...। से यैह कहथु जे भोरका ओहन कड़कड़ाएल नीनकेँ जे दुइर करत तेकरा कोढ़िया-सरधुआ कहिलिऐ ते कोनो बेसी कहलिऐ जे ओ गारि बुझै छैथ।

रसियारीवालीक विचार सुनि लखनकेँ बुझबैत सुधिया दादी बजली-

लखन, कोढ़िया-सरधुआ गारि नइ छी। ओहुना स्‍त्रीगण सभ एक-दोसरकेँ कहै छैथ। तँए ऐ बातक जँ कुवाथ भेल हुअए तँ ओकरा मनसँ निकालि लिअ।

सुधनी दादीक चेहरापर सँ नजैर उठा राधेश्‍याम बाबाक दिस तकैत लखन बाजल-

जाइ छी बाबा।

शब्‍द संख्‍या : 2285, तिथि : 06 अगस्‍त 2017

 

 

 

 

त्रिकालदर्शी

मौसम बदैलते मौनसुनक मन बगैद गेल। ओना अछैते आमक बगिया रहितो भूखले रहल। मुदा भूखो तँ भूख छी, जखने पेटमे लहैर पैसत कि बकबकी शुरू हएत। भलेँ बकैमे कियो बकैन जाइए आ कियो बक्ता बनि जाइए। बकनाइक माने भेल ऐ साल[1] आम नइ फड़ल। हजारो बीघाक उपज मारल गेल। उत्‍पादनक संग ओहन वस्‍तुक ह्रास भेल जेकरा फल कहै छिऐ आ ओ शरीरक मात्र पेटभरा भोजनेटा नहि, पौष्‍टिक आहार सेहो छी। मुदा तँए कि ओ फल नइ फड़ैक कारण कहत? नहि, ओ कहत जे लोक तेते ने पपीयाह भऽ गेल अछि जे सभटा अमृत फल नर्क दिस जा रहल अछि...। ओना, विचारकेँ रहस्‍यपूर्ण मानलो जा सकैए मुदा जखन लोक रहस्‍य गढ़ैक लूरि सीख लेत तखन ने रहस्‍यक रहस्‍य बुझत। से तँ अछि नहि, अछि तँ ओहन लोक बेसी जे खेत रहितो पड़ा कऽ नोकरी करए चलि गेल आ खेत रहि गेलै गाममे। जखन खेत छोड़ि पड़ा गेल तखन ओइ खेतक जे भवितव्‍य छै सहए ने हएत। तँए जिनगी भरिक एक्के बेर खेती करैक खियालसँ आम-कटहरक खेती कऽ लेलक। आम खाइले आ मचानपर बैस बरहमासा गबैले दस दिन गाम अबैए। मुदा गाममे ओहन लोकक कमियोँ तँ नहियेँ अछि जे गामक उन्नैत नइ चाहैए। भलेँ ओ ऐ बातकेँ बुझैत हुअए वा नहि बुझैत हुअए जे बेकतीक विकास मात्रसँ देश वा गामक विकास नहियेँ हएत, जाबे कि ओकरा सामुहिक-समाजिक रूपमे नइ आनल जाएत।

बरसाती मौसमक आगमन होइते बरसा तेना झड़झड़ा गेल जे बाढ़िक रूप पकैड़ लेलक। ओना, बुढ़-बुढ़ानुसक कहब छैन जे जँ अदरे नक्षत्रमे भूमि भरि जाए तँ ओ नीक भेल। मुदा ऐठाम प्रश्‍न उठैए जे भूमि भरैक की रूप। भूमि अनेको किस्‍मक अछि। केतौ पोखरिक रूपमे अछि तँ केतौ डोह-डाबर आ कोचाढ़िक रूपमे। केतौ चौरक रूपमे तँ केतौ नीचरस जमीनक रूपमे अछि। जँ चौर वा नीचरस जमीन अगते पानिसँ भरि जाएत तखन ओइ खेतकेँ अबादि केना सकै छी। जेकर अनेको कारणमे बीआक अभाव सेहो अछिए। ऊपरका भूमि जे खेतीक लेल अछि ओकरा अबादैले जँ भूमि भरत तँ नीचला खेत डुमि जेबे करत। मुदा जे हुअए आइ हम एकैसम सदीक किसान छी। हमरा बीच साइबेरियासँ लऽ कऽ आस्‍ट्रेलियाक सहारा तक आ जापानसँ लऽ कऽ चीन तकक खेतीक जानकारी अछि। तैठाम अपन स्‍थिति देखैत ने अपनो सभ करब।

अधिक बरखा भेने गाममे पानि जबैक गेल। पानिक निकासक समुचित बेवस्‍था नहि। तैसंग धार-धूर बीचक गाम छीहे। ओना हमरा गाममे नामित धार एकोटा ने अछि, खाली एकटा चरिमसिया सुपेन[2] अछि। मुदा ओहो कनियेँ-मनियेँ सीमाक भीतर घुसल अछि। खाएर जे अछि मुदा एते तँ ऐछे जे चारि कोस पूब कोसी आ दू कोस पच्‍छिम कमला बीचक गाम छीहे। तँए दुनूक भीतर जे जटा-जूट भेल भुतही बिहूल, गहुमा, बलान इत्‍यादि धार नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। तँए सोलहन्नी धारक कातक गाम नहियोँ तँ धारक पेटक गाम कहले जा सकैए। ओना गामक बनाबटो आन गामसँ भिन्न अछिए। भिन्न ई अछि जे कोनो गाममे नीचरस जमीन कम अछि आ ऊचरस बेसी अछि। तैसंग उत्तरसँ दच्‍छिनक ढलान जमीनक अछिये जइसँ उत्तरमे नेपाल तकक पानिक बहाव भाइए जाइए। हमर गाम एक तँ सघन अवादीबला गाम छी जइ अनुपातमे जमीन कम अछि। तैसंग गामक जे बनाबट अछि ओ विचित्र अछि। गामक चारूकात चौर जमीन अछि, जे गामक कुल खेती-जोकर जमीनमे आधासँ बेसी अछि। ऐबेर अगते बरखा भेने गामे जलोदीप भऽ गेल। संगे बाहरी पानिक आमदनी सेहो भेबे कएल। जइ अनुपातमे पानिक आमदनी गाममे भेल तइ अनुपातमे निकास नइ अछि जइसँ पनरह दिनसँ गामक समुच्‍चा खेत डुमल अछि।

गामक दशा देख अपन बेथाकेँ सामुहिक बेथा मानि सवुर केनहि छी। ओना गामक खेत-पथार डुमने सबहक बेथा एके रंग नइ अछि। कम-बेसी तँ अछिए। माने ई जे जे परिवारक संग बाहर जा नोकरी करै छैथ हुनकर बेथा, जे गामेमे रहि नोकरी करै छैथ हुनकर बेथा आ जे सोलहन्नी खेतीकेँ जीविका बना जीब रहला अछि हुनकर बेथामे अन्‍तर अछिए। एहने लोक–माने सोलहन्नी खेतीकेँ जीविका बना जीनिहार–देवी काका सेहो छैथ।

ओना हमर घर दोसर टोलमे अछि आ देवी कक्काक घर दोसर टोलमे छैन, मुदा बातो-विचारमे आ जीविको रूपे गढ़गर सम्‍बन्‍ध दुनू गोरेक बीच अछिए। अपने छोट गिरहस्‍त छी तँए नोकसानो कम भेल मुदा देवी काका कम जमीन रहितो नमहर गिरहस्‍त छैथ तँए हुनका बेसी नोकसान भेबे केलैन अछि। कम जमीन रहितो नमहर गिरहस्‍त बनैक कारण देवी कक्काक छैन जे सदिकाल विचारोसँ आ काजोसँ गामक उन्नैतिक पाछू लागल रहै छैथ, तँए अनेको रंगक अन्नक खेतीक संग तीमनो-तरकारी, फलो-फलहरी आ मालो-जाल पोसनहि छैथ। जइसँ सदिकाल अपन जिनगीमे रमल रहै छैथ। मनमे भेल जे खुशहालीक समैमे सभ दिन एक-आध घन्‍टा एकठाम बैस अपनो आ समाजोक विषयमे दुनू गोरे गप-सप्‍प करिते आबि रहल छी, अखन तँ सहजे कष्‍टहालीक समए आबि गेल अछि, तँए भेँट करैले जाइ।

एक तँ खेत-पथार पानिमे डुमने काजो पतराएले अछि जइसँ बेसी बैसारीए रहैए, दोसर बेर-बिपैत पड़ने भेँट करब सेहो जरूरी बुझि पड़ल। घर परक काज सम्‍हारि पत्नीकेँ कहलयैन-

देवी काकासँ भेँट केने अबै छी।

पत्नी कहलैन-

पानि-बुन्नीक समए छी, बेसी देरी नइ लगाएब।

पत्नीक विचार सुनि देवी काकासँ भेँट करए विदा भेलौं। जूत्ता-चप्‍पल नइ पहिरलौं। तेकर कारण छल जे एक तँ रस्‍तामे थाल-खीच बेसी अछि, दोसर तीन ठाम रस्‍ता टुटल छै जइसँ पानिक रेत सेहो चलैए।

उदास भेल देवी काका दरबज्‍जापर बैसल मने-मन विचारि रहल छला जे बर्खोक मेहनत नष्‍ट भऽ गेल। खाली मेहनतेटा रहैत तखन संतोष होइमे बाधा नइ होइत। किएक तँ बुझितिऐ जे समैक संग मेहनत गेल तँ गेल, आगू समैक संग जिनगी चलबे करत। मुदा तेतबे नइ अछि। जखन घुमै-फिरैक उमेर छल तखन आन-आन गाम आ आन-आन जिलासँ लऽ कऽ आन-आन राज्‍य सभसँ तरकारियो आ फलोक गाछ आनि-आनि संग्रह केने छेलौं, ओ सभटा चल गेल। आब फेरसँ संग्रह करब से संभव नहि अछि। आब घुमै-फिरै-जोकर शरीरमे शक्‍ति कहाँ रहल..! ऐठाम आबि देवी कक्काक मन चहकए लगलैन। चहकए ई लगलैन जे जेकरा संग-संग जिनगी बीतबै छेलौं ओ संग छोड़ि चलि गेल जे पुन: आब नइ औत। संगी जकाँ जहिना ओकरा पाछू–माने फलक गाछ–अपने लगल रहै छेलौं, तहिना ओहो ने सदिकाल–अपन-अपन समयानुसार–पौष्‍टिकक संग स्‍वादिष्‍ट फलो दइ छल। जहिना ओकरा (माने गाछ-बिरीछक) संग अपन जिनगी बीतै छल तहिना ने ओकरो जिनगी अपना संग बीतैत रहइ। सहचर जकाँ दुनू छेलौं, मुदा आब ओहन सहचरी बना पएब? नहि बना पएब! जँ कनी संभव अछियो तँ बेसी नहियेँ अछि। माने संभव ई भेल जे जँ कोनो उपायसँ गाछो आ बीओ भाइयो जाएत तैयो तँ गामक खेत-पथारक जे रूप-रेखा बनि गेल अछि ओ तँ प्रतिकूल भाइए गेल अछि। प्रतिकूल ई जे पूर्ववर्त्ती सोचक जहिना सरकारी महकमा तहिना ने ठरो-ठीकेदार आ गामक कर्तो-धर्तो अछिए। जे गाम-समाजकेँ के कहए जे अपनो नीक-बेजाइक ने काज बुझैए आ ने बात-विचार। जइसँ गाममे जे पानिसँ दुर्दशा हएब शुरू भेल अछि ओ लगले थोड़े मेटा जाएत..! ऐठाम अबैत-अबैत देवी कक्काक मन ठमैक गेलैन। ठमैकतो फुरलैन जे तखन तँ गामक भविस अन्‍हरा जाएत! गामक भविस अन्‍हरा जाएत तखन अन्‍हारमे लोकक जिनगी आ जीवन की हएत? की मनुख विहीन धरती भऽ जाएत आकि धरती विहीन मनुख। जहिना मनुख बिना धरतीक कोनो मोल नहि तहिना ने धरतियोक बिना मनुखक कोनो मोल नहियेँ रहैए। ओना, जिनगीक अनुकूल अपन-अपन धरतियो होइए। मुदा ऐठाम किसानी जिनगीक प्रश्‍न अछि। एकाएक देवी कक्काक मन ठहकलैन। ठहैकते विचार ठहकियेलैन। ठहकियेलैन ई जे जेकरा हम पूर्ववर्ती सोच-विचार कहि अपनाकेँ परवर्ती बुझै छी, ऐमे केतौ-ने-केतौ गुण छीपल अछि जेकरा हम या तँ बिसैर रहल छी वा दृष्‍टिहीन छी..! दृष्‍टिहीन मनमे अबिते देवी कक्काक नजैर त्रिकाल दर्शन दिस बढ़लैन। त्रिकाल दर्शन दिस बढ़िते त्रिकाल जिनगीक इजोत भक-दे मनमे एलैन। अबिते विचार उठलैन जे ने आइये एहेन परिस्‍थितिसँ लोककेँ भेँट भेल अछि आ ने लोक अपन जिनगीक पाछू तकैत रहि गेल बल्कि आगू बढ़ैत गेल। भलेँ जिनगीए किए ने केतौ पछुआ गेल होनि, आकि जिनगी पछुएलासँ विचार-विवेक धकिया गेल होनि मुदा सोलहन्नी मरि गेलैन सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए आ जँ से रहैत तँ हजारो बर्खक जिनगीक रूप-रंग आइ नइ देखतौं। से तँ देख रहल छी। एकाएक देवी कक्काक मनमे जिज्ञासा जगलैन। जिज्ञासा जगिते जिज्ञासु जकाँ पूर्ववर्त्ती जिनगीक जिज्ञासा केलैन। पूर्ववर्त्ती जिनगीक जिज्ञासा करिते मनमे उठलैन- जे धरती साइयो-हजारो त्रिकालदर्शी पैदा केने अछि ओही धरतीपर ने आइ हमहूँ ठाढ़ छी! देवी काकाकेँ जेना हूबा जगलैन। हूबा जगिते त्रिकालदर्शीपर नजैर अँटकलैन। मनमे उठलैन- त्रिकालदर्शी की? भूत, वर्तमान आ भविसकेँ जननिहार। भूत तँ भूत भेल जेकर लिखित-अलिखित इतिहास छै, वर्तमान सोझामे अछि मुदा भविस तँ हेराएल अछि ओकरा केना बिसवासक संग ताकि लेब..! ऐठाम आबि देवी कक्काक विचार महाभारतक साइयम श्‍लोक जकाँ चौमुड़िया गेलैन। चौमुड़ियाइते विचार पनपलैन। पनैपते मन कलशलैन। कलैशते बदलल विचार–माने परिमार्जित विचार–मनमे जगलैन। जगलैन ई जे जीता जिनगीमे त्रिकाल तँ अबिते अछि। माने ई जे कखनो कष्‍टकर समए अबैए तँ कखनो समगम आ कखनो नीकमे नीक। अही तीनू समैक बीच जिनगी चलैए। मुदा छी तँ तीनू जिनगीए, तँए तीनू जिनगी जीबैक लूरि चाही। जखने जीबैक लूरि सीखब तँ नीक-बेजा समए अबैत-जाइत रहतै आ जिनगी अपना गतिये कखनो दौड़ कऽ तँ कखनो डेगे-डेगी तँ कखनो ठाढ़े-ठाढ़ चलबे करत। देवी कक्काक मनमे रसे-रसे उदपन उठए लगलैन...।

तैबीच देवी कक्काक लगमे पहुँच पएर छुबि प्रणाम केलिऐन। ओना मने-मन काका पिताएल जकाँ रहबे करैथ मुदा सभ दिन नीक असिरवाद देनिहार आइ केना अपन दुख हमरेपर झाड़ि देता। हम कि कोनो आन गाम रहै छी जे ओ नइ जनै छैथ। पएर छुबि गोड़ लागि चानिपर हाथ लेलौं मुदा बजलौं किछु ने। ओना प्रणाम करैक तीनू चलैन अछिए। केतौ पएर छुबि गोड़ लागि गोड़ लागब सेहो बाजल जाइए। मुदा क्रियागत जिनगी जननिहार बिनु बजनौं ओते बुझि कऽ मानि लइते छैथ। केतौ दुनू हाथ जोड़ि प्रणाम कहल जाइत आ केतौ खलिये मुहेँ सेहो प्रणाम कहले जाइए। मुदा जे अछि देवी काका हाथ उठा माथकेँ थपथपबैत बजला-

भगवान सभकेँ इष्‍ट करथुन।

कक्काक असिरवाद सुनि मन झुझुआए लगल जे अपना दिससँ काका किछु नहि कहि भगवानपर फेक देलैन। भगवान की इष्‍ट करता! ओ तँ अपने इष्‍ट-अनिष्‍ट दुनू छैथ। मनमे रंग-रंगक खटुका सभ उठए लगल जे देवी काका बुझि गेला। बजला-

गौरी, मन किए खट-मधुर भेल छह?”

बजलौं-

मन किए खट-मधुर हएत। अपनेक असिरवाद नीक जकाँ नइ बुझि पेलौं।

देवी काका बजला-

बौआ, दुनियाँमे बुझहक आकि गाम-समाजमे दू रंगक लोक अछि। ओना सगपतिया लोक सेहो बहुत रंगक अछि। सगपतिया लोकक माने भेल ओहन लोक जे कनी इष्‍टो केलैन आ कनी अनिष्‍टो केलैन। तहिना कियो अनिष्‍ट कम केलैन आ इष्‍ट बेसी केलैन, आ किछु एहनो लोक छैथ जे इष्‍ट कम आ अनिष्‍टे बेसी करै छैथ।

बिच्‍चेमे बजा गेल-

केना बुझब जे बेसी इष्‍ट करैबला छैथ आकि बेसी अनिष्‍ट करैबला?”

हमर बात सुनिते, जेना चौरीमे केशौरक पन्ना भेटते उखारनिहारकेँ बिसवास जगि जाइए जे आब केशौर भेटबे करत आ उखड़बे करत, तहिना बिसवासक संग देवी काका बजला-

जेकरा मनमे जेहेन अभिष्‍ट रहल से तेहेन इष्‍ट वा अनिष्‍ट करैए।

देवी कक्काक कनी-मनी बात बुझबो केलौं आ कनी-मनी नहियोँ बुझलौं। मुदा मनमे खोंचार पड़ए लगल जे पनरह दिनक जिनगीक गप करए एलौं आ अनेरे कथा-पिहानीमे वौआ रहल छी..!

अपन विचारकेँ मोड़ैत बजलौं-

काका, ऐबेरक समए तँ अजीब भऽ गेल।

अजीब सुनिते देवी कक्काक मन जेना हुरकलैन तहिना हुरकैत बजला-

अजीब भेल कि सजीब से एना नइ बुझबहक।

देवी कक्काक आत्‍मा जहिना परमात्‍म स्‍वरूप छैन तहिना बुधियो प्रवुद्ध छैन आ विचारो परम छैन्‍हें तँए मन सकपका गेल जे हिनका केना कहबैन जे काका अहाँक आगूक जिनगी गरथाहमे पड़ि गेल। जँ से कहबैन आ जँ ई कहि दैथ जे एके गाममे ने दुनू गोरे छी तखन जहिना तोहर चलतह तहिना ने हमरो चलत। तइसँ हुनकर बेथा-कथा थोड़े बुझि पएब। तखन तँ अपने विषयमे किए ने कहिऐन जे जे समस्‍या अपनो अछि सएह ने वृहत्‍ रूपमे हुनको छैन। ऐसँ एते तँ विशेष लाभ हेबे करत जे जखने कोनो समस्‍याक समाधानक वृहद् रूप दृष्‍टिगोचर हएत तखने ओ समस्‍या बिच्‍चेमे दहलाए लगत। जखने दहलाए लगत तखने ओकरा या तँ हाथेसँ वा कोनो मेही वस्‍तुसँ छानि कऽ कातमे फेक देब। विचारमे मजगूती आएल। बजलौं-

काका, आब जीवन कठिन भऽ गेल, तँए जैठाम सुवन भेटत तैठाम चलि जाएब।

जहिना देवी काका कान रोपि सुनलैन तहिना आँखि उठा देखबो केलैन। प्रश्‍नक उत्तर दैत बजला-

बौआ गौरी, जखन अपन एते गेल तैयो जी-रोपि अपनाकेँ ठाढ़ केने गाममे छी, मुदा तोहर तँ बड़ छोट समस्‍या छह, तूँ किए गामसँ पड़ेबह। हँ, सुवनक बात कहलह, ओ गामोमे बनि सकैए वशर्ते जँ जी-जान रोपि जीवनकेँ पकैड़ लेबह।

ओना देवी कक्काक सभ गप सुनलौं मुदा बुझलौं अदहे-छिदहे। अदहा-छिदहा ई जे गामोमे सुवन बनि सकैए, एहेन विचार मनमे आइ धरि उठले ने छल जे एको-आध मिनट ऐ विषयक विषयमे विचारितौं। तँए नइ बुझल छल, जइसँ नीक जकाँ नइ बुझि पेलौं। ओना, कक्को बुझि गेला जे गौरी नीक जकाँ हमर विचार नइ बुझि पौलक। तैबीच बजलौं-

काका सुवन..?”

सुवन बाजि वाणीकेँ ऐ दुआरे रोकलौं जे जँ एहेन बात बजा जाइए जइसँ प्रश्‍ने खण्‍डित भऽ जाइए तखन तँ उत्तरो खण्‍डित हेबे करत। जखने उत्तर खण्‍डित हएत तखने किछु-ने-किछु विचारो आबिये सकैए जे उतारक हुअए। मुदा ऐठाम तँ प्रश्‍नकेँ उतारैक नहि बल्‍कि चढ़बैक अछि। जे विचार देवी कक्काक मनमे पहिनहि जगि चुकल छेलैन। बजला-

बौआ गौरी, जहिना सरयुग नदीक तटपर बसल अयोध्‍या अछि, जे रामक जन्‍मभूमि रहल तहिना यमुना नदीक तटपर वृन्‍दावन सेहो अछि जे कृष्‍णक लीला-धाम रहलैन। तहिना गामोमे जखन सुविचार जगत तखन सुकर्म सेहो जगबे करत। जखने सुकर्म जगत तखने सुकृत्ति रूपक कर्मभूमि बनत। आ जेना-जेना सुकृत्ति सुवृत्ति बनैत जाएत तेना-तेना जीवन सुवन दिस बढ़ैत जाएत।

ओना देवी काका तीन जुगक इतिहास सुना देलैन मुदा अपन मन तँ जबदाह भाइए गेल छल। जबदाहो केना ने होइत, जखन पानिमे डुमल गामे जबदाह भऽ गेल अछि तखन कि अपने गामसँ हटल थोड़े छी जे ओइसँ वंचित रहितौं। जबदाह मन रहने नीक जकाँ देवी कक्काक विचार नइ बुझि पेलौं। मन घुरिया गेल जे अपन जिनगी जे जबदाहसँ जबदी दिस बढ़ि गेल अछि तेकर की उपाय हएत। तँए विचारकेँ मोड़ैत बजलौं-

काका, बड़ सेहन्‍तासँ पाँचटा केराक गाछ केरलसँ अनने छेलौं। पाँचो पानिमे डुमि कऽ नष्‍ट भऽ गेल!”

घावपर मलहम लगबैत देवी काका मुस्‍कियाइत बजला-

तोरो अपना इलाकामे केराक गाछ नइ भेटलह जे देशक सीमापर सँ आनए गेलह।

एक तँ मन केलहा काजपर–माने केरलसँ केरा गाछ आनि रोपैक प्रक्रिया तकमे–नचैत रहए तैपर तेहेन बात देवी काका कहि देलैन जे विचारे उनैट गेल। बजलौं- काका, सीमा-सुमीक बात नइ अछि, केरासँ सिनेह अछि। रामेश्‍वरम गेल रही। ओइठाम सौंसे बजारमे सभसँ ललिचगर केरे बुझि पड़ल।

बिच्‍चेमे देवी काका टोकला-

तखन तँ रामेश्‍वरम सोल्‍होअना फलहारे केने हेबह।

हमरो मनमे रामेश्‍वरम्‍ स्‍थान नचिते छल, तहूमे केराक बजारक बात, मन मिठाएल रहबे करए, बजलौं-

काका सेहन्‍ते एक हत्‍था कीनलौं। हत्‍थोकेँ लोकक हाथ जकाँ पाँचे आँगुरक छल, बत्तीस छीमीक हत्‍था छल। ओ दन्‍तार छीमी। नीको आ सस्‍तो बुझि पड़ल। खूब खेलौं।

बिच्‍चेमे टोकारा दैत देवी काका बजला-

खेबे टा केलह आकि ओकर सुआदो पौलह?”

हमरो सुतरल। बजलौं-

बिनु सुआद पौनहि एतेक दूरसँ बैजनाथ बाबाक कामौर जकाँ गाड़ीमे केराक गाछ टँगने एलौं।

हमर बात सुनिते देवी काका आगू बढ़ि बजला-

जखन रामेश्‍वरम्-सँ केराक गाछ अनलह तखन जँ कनियेँ आरो आगू बढ़ि लंका पहुँच जइतह तखन तँ हनुमानजी जकाँ आरो फल-फलहरी अनबे करितह किने?”

विचारक धारामे विचड़ैत रहबे करी, अनासुरतीए बजा गेल-

तइमे कोन राहु-केतु बाधा होइत।

तैबीच दुर्गा काकी चाह नेने पहुँचली। चाह देख मन हलैस गेल मुदा उदासीपन छाड़ने छल, जे दुर्गा काकी आँकि लेलैन। जहिना डाक्‍टर ऐठाम आकि अस्‍पतालमे साधारण रोगबला रोगी पैघ रोगसँ रोगाएल रोगीकेँ देख मने-मन खुशी होइत जे जखन एहेन रोगी बँचि सकैए तखन तँ हम बँचले छी, तइले अनेरे मनकेँ खट्टा केने रहब नीक नहि, तहिना आश्वस्‍त करैत दुर्गा काकी बजली-

बच्‍चा गौरी, हमर बड़का काका सदिकाल पोता सभकेँ कहैत रहथिन जे नअ दहार तखनो ने किछु उघार’, तखन एक दहार की बिगार...।

दुर्गा काकीक बातो सुनैत रही आ चाहो पीबैत रही। एक तँ सुअदगर चाह, तैपर दुर्गा काकीक मधुराएल विचार सुनि आरो  मन मीठा

गेल। बजलौं-

काकी, जखन नान्‍हि-नान्‍हिटा चुट्टी घोदा-माली भऽ आड़ि-धुरसँ निकैल बाढ़िक वेगमे हेलैत समुद्र तक पहुँच जाइए, तखन अपना सभ तँ कहुना मनुख भेलौं किने...।

हमरा विचारमे दुर्गा काकीकेँ की भेटलैन से तँ ओ जानैथ मुदा मन हरियरीसँ भरि-पूरि जरूर गेलैन। जेकरा देख देवी काका विचार छिनैत बिच्‍चेमे बजला-

बौआ गौरी, यएह विडम्‍बना अछि!”

देवी कक्काक आगूक विचार सुनैले अपनाकेँ साकांच केलौं। साकांच करैक कारण मनमे उठल जे नीक विचार सुनैले जहिना अपन कानकेँ कनखारऽ पड़ैए तहिना ने धियानकेँ धियानी सेहो बनबए पड़ैए। सएह करैत बजलौं-

की विडम्‍बना काका?”

हमर बात सुनि देवी कक्काक मनक विचार जेना हुमैर कऽ कुदए चाहलकैन तहिना देवी कक्काक मुखड़ामे लौकलैन। लौकते बजला-

बौआ, जहिना पवित्र लोकक देवालपर देवालय ठाढ़ अछि तहिना गुँहचोरा-ले सेहो अछिए ने।

देवी कक्काक विचारकेँ नीक जकाँ नइ बुझि पुछलयैन-

से केना?”

विहुँसैत देवी काका बजला-

ओना, बेकतीकेँ भीतर[3] सेहो सुकृत्ति कुकृत्ति अछि, मुदा ओ बेकतीकेँ प्रभावित करैए। मुदा ऐठाम से नहि, ऐठाम समाजिक प्रश्‍न अछि। समाज सेहो नीक-अधला करैबलाक समूह छी जे किछु अज्ञानतासँ सेहो आ किछु ढीठपनासँ सेहो होइए। जैठाम अज्ञानता होइए ओ क्षम्‍य अछि ओना क्षम्‍योक सजाए चेतौनी रूपमे जरूरी अछिए। मुदा जैठाम ढीठपनासँ होइए तैठाम समूहकेँ जगि कऽ जगबए पड़त। आ जँ से नइ हएत तँ समाज जेते उठए चाहत ओते निच्‍चाँ खसि-खसि पड़त। तँए...।

किछु-किछु विचार देवी कक्काक बुझबो केलौं आ किछु-किछु नहियोँ बुझलौं। मुदा बिच्‍चेमे पत्नीक बात मन पड़ि गेल जे बेसी देरी नइ लगाएब। तँए मन कछमछा लगल। बजलौं-

काका, हरि अनन्‍त हरि कथा अनन्‍ता अछिए। अखन छुट्टी दिअ।

मुस्‍की दैत देवी काका बजला-

छुट्टीए-छुट्टी छह। मुदा छुट्टीए-मे कहीं अपने ने जिनगीक धारमे छुटि जइहह।

देवी कक्काक विचारकेँ जँ नीक जकाँ बुझैत जइतौं तब ने, से तँ बुझिये ने पेब रहल छेलौं। तँए सिनेमाक कटल रील जकाँ विचार कटि-कटि जाइ छल। मुदा तैयो बजलौं-

जीता-जिनगी जँ ई सभ नइ हएत तँ जिनगीक परीक्षा केना हएत।

हमर विचार देवी कक्काक संग दुर्गा काकीकेँ सेहो नीक लगलैन। सह दैत दुर्गा काकी बजली-

दुर्गा दुर्गत हारिणी छथिये किने।

शब्‍द संख्‍या : 2838, तिथि : 25 जुलाइ 2017

 


 

[1] एक्के सीजन आम फड़ैए तँए साल

[2] सुपर्णा

[3] जिनगीक क्रियाक बीच


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।