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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

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श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक

सतभैंया पोखैर (तेसर संस्‍करणसँ)

सँ सात गोट कथा-


 

 

बिहरन

जहिना बैशाख-जेठक लहकैत धरतीपर, अगियाएल वायु- मण्‍डलक बीच हवाकेँ खसने अनासुरती मेघक छोट-छोट चद्दैर सुरूज ओढ़ए लगैत, रेलगाड़ीक हूमड़ैत अवाज दौड़ए लगैत, रहि-रहि कऽ गुलाबी इजोत छिटकए लगैत जइसँ अनुमानित मन मानैले बेबस भऽ जाइत जे‍ पानि-पाथर आ ठनकाक संग बिहाड़ि आबि रहल अछि तहिना रघुनन्दन-सुलक्षणीक परिवारमे ज्‍योति कुमारीक जन्‍मसँ भेलैन‍।

भलेँ आइ-काल्हि‍ बेटी जनमने माए-बाप अपन सुभाग्‍यकेँ दुर्भाग्‍य मानि मनकेँ केतबो किए ने कोसैत रहै छैथ जे परिवारमे बेटीक आगमन, हिमालयसँ समुद्र दिस निच्‍चाँ मुहेँ ससरब छी। मुदा से दुनू बेकती सुलक्षणी आ रघुनन्‍दनकेँ नै भेलैन‍। जहिना गद्दा पाबि कुरसी गदगर होइत तहिना खुशीसँ दुनू परानीक मन गदगद रहैन। से खाली परिवारे धरि नहि, सर-समाजसँ लऽ कऽ कुटुम-परिवार धरि सेहो छेलैन‍। ओना, आन संगी जकाँ रघुनन्‍दन नै छला जे तीनियेँ मासक पेटक बच्‍चाक दुश्‍मन बनि पुरुषार्थक मोँछ पिजैबतैथ, आ ने अपन रसगर जुआनी छोलनी धीपा-धीपा दगितैथ। दुनू परानी बेहद खुशी छला! किए नै खुशी रहितैथ‍? मन जे मधुमाछी सदृश मधुक संग मधुर मुस्‍कान दइ छेलैन‍। पुरुष अपन वंश बढ़बै पाछू बेहाल आ नारीकेँ हाथ-पएर बान्‍हि बौगली भरि रौदमे ओंघरा देब ई केते उचित छी? मुदा से नहि, दुनू परानीक वंश बढ़ैत देख दुनू बेहाल। मन तिरपित भऽ तरैप-तरैप नचैत रहैन।

ओना तीन भाँइक पछाइत‍‍ ज्‍योतिक जन्‍म भेल, मुदा तइसँ पहिने बेटीक आगमनो नै भेल छेलैन‍ जे सुलक्षणी दोखियो बनितैथ‍। भगवानोक किरदानी की नीक छैन? नीको केना रहतैन‍, काजक तेते भार कपारपर रखने छैथ‍ जे जखन टनकी धड़ै छैन तखन खिसिया कऽ किछु-सँ-किछु कऽ दइ छथिन‍। मुदा से कियो मानतैन‍ थोड़े? जखन लोक अपने-अपने हाथ-पएर लाड़ि-चाड़ि जीबैए तखन अनेरे अनका दिस मुँहतक्कीक कोन जरूरत? किए ने कहतैन‍ जे जखन अहाँ निर्माता छी तँ तराजूक पलरा एक रंग राखू, किए केकरो जेरक-जेर बेटा दइ छिऐ आ केकरो जेरक-जेर बेटी! आ जँ देबे करै छिऐ तँ बुधि किए भंगठा दइ छिऐ जे बेटासँ धन अबै छै‍ आ बेटीसँ जाइ छइ। जइसँ नीको घरमे चोंगराक खगता‍ पड़ि जाइ छइ।

उच्‍च अफसरक परिवार तँए परिवारिक स्‍तर सेहो उच्‍च। भलेँ माए-बापकेँ छाँटियेँ क‍ऽ किए ने परिवार होइन। खगल परिवार जकाँ सदैत गरजू नहि। परिवारक खर्च समटल, तइसँ खुलल बजारक कोनो असर नहि। सरकारी दरपर सभ सुविधा उपलब्‍ध, जइसँ खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ मनोरंजनक ओसार चकमकाइत। भलेँ जेकर अफसर तेकर बात बुझैमे फेर होनि, जइसँ महगी-सस्‍ती बुझैमे सेहो फेड़ भऽ जाइत होइन। मुदा परोछक बात छी चारू बच्‍चाक प्रति रघुनन्‍दनक सिनेह समान रहलैन‍।

परिवारमे सभसँ छोट बच्‍चा रहने ज्‍योति सबहक मनोरंजनक वस्‍तु। मुदा गुरुआइ तँ ओहिना नै होइ छै, तँए सभ अपन-अपन महिक्का मनक टेमीसँ सदैत देखैथ, जप करैथ‍। आखिर के एहेन छैथ‍ जे ऐ धरतीपर ज्ञानदानी नै छैथ। भलेँ ओ अधखिजुए वा अधपकुए किए ने होथि। जहिना कोनो माइलिक बच्‍चा पिताक संग जामन्‍तो रंगक फूलक फुलवाड़ीमे जिनगीक अनेको अवस्‍था देख चमकैत तहिना भरल-पूरल परिवारमे ज्‍योतियोकेँ भेल‍। देखलैन‍ कलीमे जहिना अबैत-अबैत रंगो, सौन्‍दर्यो आ महको अबैए तहिना ने जिनगी छी। जँ मनुखकेँ डोरीसँ बान्‍हल जाए तँ डोरी तोड़ैक उपाइयो तँ हुनके करए पड़तैन‍।

समुचित वातावरण रहने ज्‍योति कुमारी अपन संगी-साथीक बीच नीक श्रेणीमे आबि गेली। जहिना संगीक सिनेह तहिना शि‍क्षकोक सिनेह भेटए लगलैन‍। टिकट कटौल यात्री जहिना निश्चि‍न्‍तसँ गाड़ीमे सफर करैत तहिना समतल जिनगी पाबि ज्‍योति सेहो आगू बढ़ए लगली‍। जिनगीमे बाधा सेहो अबै छै मुदा तइसँ पूर्ण अनभिज्ञ ज्‍योति। जेना कर्मकेँ धर्म बना‍ जिनगीक बाट बनौने हुअए तहिना...।

थम्‍हसँ निकलैत केराक कोसा जहिना अपन घौरक संग हत्‍थो आ छीमियोँक अनुमानित परिचए दैत, फूलक कोढ़ी फूलक दैत तहिना बच्‍चेसँ कुमारि ज्‍योति सुफल जिनगीक अनुमानित परिचए दिअ लगल। जेना-जेना बौद्धि‍क विकास होइत गेलैन‍ तेना-तेना तीनू भाँइयो बुझए लगला जे ज्‍योति तेहेन चन्‍सगर‍ अछि जे आगू किछु जरूर करत। जइसँ भैयारीए जकाँ ज्‍योतिक संग बेवहार करए लगला। ओना, लैंगिक प्रभाव ओतए ओतेक अधिक देख पड़ैत जेतए भाए-बहिन‍क बीच जेतेक बेसी दूरी रहल। मुदा से रघुनन्‍दनक परिवारमे नै छेलैन‍। दोसर कारण ईहो छल जे वैचारिक दूरी जेना आन-आन परिवारमे रहैत तेना सेहो नहियेँ जकाँ छेलैन‍। परिवारक सभ अपन-अपन दायित्‍व बुझि अपन-अपन काजमे दिन-राति लागल रहै छला। ज्‍योतिकेँ सभ अपना-अपना नजरिये देखबो करैथ।

गुरुक रूप रघुनन्‍दन देखैथ तँ जगत-जननी जानकीक सुनैनापुर रूप सुलक्षणी देखैत रहथिन। जइसँ रघुनन्‍दन दुनू परानी एक-एक लूरि-बुधिकेँ धरोहर जकाँ ज्‍योति बेटीक बेवहारमे सजबैत रहलैथ। तहिना भाइक मन सामा-चकेबाक सम्‍बन्‍धमे ओझराएल रहैन। केना नइ ओझरैतैन? आइ धरिक इतिहासक दूरी जे मेटाइत देखैथ। केतेक प्रतिशत परिवार अखन धरि इतिहासक पन्नामे लिखाएल अछि जइमे भाए-बहिन‍क शि‍क्षाक दूरी समतल हुअए? तँए सबहक सिनेहक अपन-अपन कारण छल...। जनकपुरमे जहिना रामकेँ आ मथुरामे कृष्‍णकेँ देख‍ देख‍‍निहारकेँ भेलैन‍ तहिना रघुनन्‍दनोक परिवारमे ज्‍योतिकेँ देखते भेल।

बाल-बोध जहिना अपन मनोनुकूल वस्‍तु पाबि छाती लगबैत, हृदैसँ खुशी होइत तहिना विज्ञान विषयसँ ज्‍योति सटि गेली। विज्ञान विषयमे नीक नम्‍बर आनि बिजलोका जकाँ ज्‍योति संगियो-साथी, शि‍क्षको आ मातो-पिताक नजैरमे चमकए लगली। हाइ स्‍कूलमे पएर दैते जेना अपन आँट-पेट बुझि कोनो विद्यार्थी साइंस तँ कोनो कामर्स तँ कोनो आर्ट विषय चुनि आगू बढ़ैत तहिना ज्‍योतियो साइंस चुनि नेने छेली। घरसँ बाहर धरि सर्वत्र बहारे-बहार बुझि पड़ैन। ऋृषि-मुनिकेँ जहिना दुनियाँ समतल बुझि पड़ैत तहिना स्कूलक शिक्षकक संग दू-दूटा भाए पाबि ज्‍योतियोकेँ दुनियाँ समतल बुझि पड़ैत। जइसँ कोनो तरहक असोकर्ज घर-सँ-बाहर धरि कखनो नहि बुझि पड़ैन। असोकर्ज तँ ओइठाम होइत जेतए एकपेरिया-चरिपेरियाक मिलन-भौक रहैए। आ भौक निर्भर करैए चलनिहारपर, जेतए जेहेन चलनिहार तेतए तेहेन भौक। ओना जैठाम बेसी चलनिहार रहैत ओतए कच्‍चियो सड़क पकी‍ए जकाँ सक्कत आ पकियो कच्‍चीए जकाँ बनि जाइत अछि।  

साइंस कौलेजमे सभसँ नीक नम्‍बरक संग ज्‍योति फिजिक्‍स विषयसँ नीक नम्‍वर पाबि एम.एस-सी. केली। जहिना अखराहापर लपटैत-लपटैत पहलवानक कश बनि जाइत तहिना ज्‍योतियोकेँ भेल‍।

‘नारी मुक्‍ति‍ संघ’क स्‍थापित अध्‍यक्ष होइक नाते पिताक– रघुनन्‍दनक–सिनेह ज्‍योतिपर आरो बेसी रहैन। ज्‍योतिकेँ कौलेज पहुँचैत-पहुँचैत तेसरो भाए नोकरी पकैड़‍ लेलैन‍, जइसँ आरो बेसी सुविधा ज्‍योतिकेँ प्राप्‍त हुअ लगल। ओना काजकेँ कर्म बना करैक अभ्‍यास सुलक्षणी बच्‍चेसँ लगबैत आएल रहैन। जइसँ घरक काजक जहैन‍ ज्‍योतिक जेहन तक पकैड़‍‍ नेने तँए जहिनगर। सदैत कर्मकेँ सहयोगी-प्रेमी जकाँ दुलरबैत, प्रेम करैत। तँए की‍ ज्‍योति सुलक्षणीक बेटी नहि?, परिवारक सभसँ बेसी सिनेही बेटी छिऐन।

मुदा सुलक्षनीक मनमे सदैत एकटा कचोट कचोटिते रहैन जे कुल कन्‍याँ की? कुल तँ अनेको अछि जेना- गुरुकुल, पितृकुल, मातृकुल इत्‍यादि, जे प्रश्‍न अखनो धरि नै सोझरेलैन‍।

एम.एस-सी. करिते दुनू बेकती–रघुनन्‍दन–केँ जहिना बिनु हवोक पीपरक पात‍ डोलए लगैत तहिना ज्‍योतिक प्रति सिनेह डोलए लगलैन‍। अनासुरती दुनू परानीक मनमे प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठए लगलैन‍। बीस बर्खक बेटी भऽ गेल‍, बिआह करब माए-बापक कर्तव्‍य कर्म छी। कौलेजक अन्‍तिम सीढ़ीक आगू टपि चुकल‍ अछि इत्‍यादि। तैसंग ईहो जे पारदर्शी सीसा जकाँ ज्‍योतिक शरीर सेहो देखैथ जे जुआनीक रंग सगतैर‍‍ चमैक‍ रहल छइ...।

ओना कौलेजक आन छात्रा जकाँ नहि, मिथिलाक धरोहैर‍ कुल-कन्‍याँ जकाँ। जे गुरुकुलमे विद्याध्‍ययन करैत। दुनू परानीक दायित्व बुझि रघुनन्‍दन पत्नीकेँ पुछलखिन-

ज्‍योति बिआहै-जोकर भेल जाइए से की विचार?”

संयासिनी जकाँ सुलक्षणी उत्तर देलकैन-

अपन कोनो काज पछुआ कऽ नै रखने छी, जे बाँकी अछि ओ अहाँक छी। तैबीच हम की विचार देब?”

पत्नीक उत्तर सुनि रघुनन्‍दन तिलमिला लगला। मनमे उठलैन- एहेन उटपटांग उत्तर किए देलैन‍? मुदा सोल्‍होअना अनुमानोसँ कोनो बात नै बुझल जा सकैए‍। नीक हएत जे पुन: प्रश्‍न उठा आगू बजबाबी। ई बात निसचित जे एको परिवारमे काजक हिसाबे सबहक सोचै-विचारै आ बुझैक ढंग फुट-फुट भऽ जाइ छइ। भलेँ सासुसँ ऊपर किए ने जेठ-सासु मानल जाए, मुदा सासु तँ सासु होइत।

जहिना देवालयक कपाट लग ठाढ़ भक्‍त हाथ जोड़ि अपन दुखरा भगवानकेँ सुनबैत तहिना तरपैत रघुनन्‍दन पत्नीकेँ पुछलखिन-

संयासिनी जकाँ किए घरसँ पड़ाए चाहै छी! बिसैर रहल छी जे घरनी सेहो छी?”

पतिक गंभीर विचारकेँ अँकिते सुलक्षणीक करेज कलैप‍ उठलैन‍। मुदा पानिक बहैत बेगमे जहिना गोरसँ गोरिया-गोरिया‍ गोर उठौल जाइत तहिना सुलक्षणी ज्‍योतिक जिनगीक धारामे ठाढ़ होइत बजली-

अहूँ कोनो हूसल नै छी, सभ माए-बाप बेटा-बेटीकेँ बच्‍चे बुझैए। मुदा एतए से बात नहि अछि। अहाँ लिए भलेँ ज्‍योति बच्‍चा हुअए मुदा ओ ओइ सीढ़ीपर पहुँच गेल अछि, जेतए मनुख अपन जिनगीक बाट चुनैक गुण प्राप्‍त कऽ लइए। तँए दुइए परानी नहि, बेटो-पुतोहुसँ विचारि लिअ।

सेन्‍ट्रल बैंकक ब्रांच मनेजर–भोगेश्वर–क संग ज्‍योतिक बिआहक बात पक्का भऽ गेल। जहिना ज्‍योति तहिना भोगेश्वर। दुनूक अद्भुत मिलानी। विषुवत रेखाक समान दूरीपर जहिना उत्तरो आ दच्‍छिनो समान मौसम, समान उपजा-वाड़ी होइत अछि तहिना।

अलेल कमाइ तँए छिड़ियाएल जिनगी भोगेश्वरक। हजारो कोस हटि भोगेश्वर अपन परिवारसँ रहैत। नव-नव वस्‍तुसँ भरल बजार, जे दुनियाँक एक कोणसँ दोसर कोण पहुँचैत, भोगेश्वर चकाचौंधमे हेरा अपन माइयो-बाप आ भाइयो-भौजाइसँ दूर भऽ गेल। किए ने हएत? जखन सभकेँ अपन कर्मक फल भोगैक अधिकार छै तँ भोगेश्वरो किए ने भोगत। एक तँ दिन राति रूपैआक पेँच-पाँचक गुत्‍थी खोलैक क्षमता तैपर जेकरे माए मरै तेकरे पात भात नहि?

नीक बर पाबि रघुनन्‍दन चन्‍दाक तिजोरी माने नारी मुक्‍ति‍ संघक कोष खोलि देलैन‍। कोनो अनचितो तँ नहियेँ केलैन‍। चन्‍दो तँ मुक्‍तीए लेल अछि।

एक तँ मनी-ग्रुप अर्थशास्‍त्रसँ पी.चए-डी. तैपर सँ सेन्‍ट्रल बैकक शाखा-प्रबन्‍धक, किए नै भोगेश्वर अपन अधिकारक उपयोग करत। बिआहक दिन तँइ भऽ गेल। तैबीच ज्‍योतिकेँ, मास दिन पूर्व देल आवेदनक इन्‍टरभ्यूक चिट्ठी भेटलैन‍। तहूमे बिआहक दिनसँ तीन दिन पूर्वक दोहरी काज परिवारमे बजैर गेलैन‍। छोड़ैबला कोनो नहि। तैपर ज्‍योति सेहो बिआहकेँ माइनस आ इन्‍टरभ्यूकेँ पलसमे हिसाब लगबैत।

एमहर बिआहक ओरियानक धुमसाही परिवारमे। मुदा ज्‍योति विपरीत दिशामे मुड़ि इन्‍टरभ्यू दइले अड़ि गेली। इन्‍टरभ्यू सेहो तँ लगमे नहियेँ जे दू-चारि घन्‍टा समए लगा पुरौल जा सकैए। दच्‍छिन भारत, जे लगमे नहि अछि। केतबो तेज दौड़ैबला गाड़ी भेल तैयो चौबीस घन्‍टासँ पहिने नै पहुँच‍ सकैए। तहूमे बिआह सन शुभ काजमे बर-कन्‍याँकेँ सुरक्षित रहब जरूरी अछि। तँए सीमा केना पार कएल जाएत। गाड़ी-सवारीक कोन ठेकान...।

ज्‍योतिक प्रश्‍न परिवारकेँ स्‍तब्‍ध केने। जेठ भायप्रेम कुमार–क सिनेह ज्‍योतिपर उमैड़ पड़लैन‍। हिसाब लगबैत पिताकेँ कहलखिन-

बिआहक दिनसँ चौबीस घन्‍टा पहिने अबस्‍स पहुँच‍‍ जाएब। अहाँ सभ बिआहक ओरियान करू ज्‍योतिक संग अपने जाइ छी।

प्रेम कुमारक विचारसँ रघुनन्‍दन दुनू काज होइत देख खुशी भेला। मुदा सुलक्षणीक मन आरो बेसी करुआए लगलैन‍। मुदा खोलि कऽ बजती केना? एक तँ पुरुष-प्रधान परिवार तैपर सभ बापूतक एक विचार। स्‍त्रीगणक कोनो ठेकाने नहि। कहैले ने चारि गोरे परिवारमे छी मुदा ननैद‍-भौजाइक सम्‍बन्‍ध केहेन होइ छै से की‍ केकरोसँ छिपल अछि। नीक हएत जे पोल्हा कऽ बेटीए-सँ पुछि ली। मुदा विध-बेवहारपर नजैर‍ पड़िते सबहक मन भँगैठ गेलैन‍। बिनु विधि-बेवहारक बिआह केहेन हएत। रस्‍ते-पेरे तँ सेहो लोक बिआह कऽ लइए मुदा परिवार केहेन बनै छइ। आठो दिन तँ कम-सँ-कम विध-बेवहारमे लगबे करत। खाएर जे से...।

ज्‍योतिक इन्‍टरभ्यूओ आ बिआहो भऽ गेलैन‍। अद्भुत बिआह तँए समाजमे चर्चाक विषय बनल। चर्चो मुँह देख मुंगबा परसैबला। जेहेन मुँह तेहेन मुंगबा। कियो बर-कन्‍याँक शिक्षाक चर्च करैत, तँ कियो युगक अनुकूल बर-कन्‍याँक जोड़ाक। कियो विध-बेवहारक लहासक चर्च करैत तँ कियो समाजक अगुआएल नारी जातिक चर्च करैत। तहिना केतौ भोज-भातक चर्च चलए लगल, तँ केतौ गमैया बरियातीक संग बजरूआ बरियातीक चर्च चलए लगल। मेल-पाँच बरियाती तँए सबहक बात दमगर। इनार पोखैरक घाटसँ लऽ कऽ दुआर-दरबज्‍जा धरि सौंसे गाममे जेना संसद चलए लगल। मुदा सबहक मन भोगेश्वर आ ज्‍योतिक वैवाहिक बन्‍धनपर जा कऽ अँटैक‍ जाइन।

बिआहक तीन दिन पछाइत‍‍ भोगेश्वर दुरागमनक प्रस्‍ताव रखलैन। प्रस्‍ताव सुनि परिवारक सबहक मनमे सभ रंगक विचारक संग उत्तरो उठलैन‍। मुदा आगू बढ़ि कियो बजैले तैयार नहि। मने-मन सुलक्षणी सोचैथ जे बिआहक साल तँ बर-कनियाँक विध-बेवहार होइ छइ। जँ विधि-बेवहारक कारण नै होइ छै तँ किए सौन-भादो आ पूस-माघ बेटीक विदागरी नै होइए। बिनु विधि-बेवहारक बिआह तँ ओहने हएत जेहेन बिनु मसल्‍लाक तरकारी। कहैले ने लोक बजैए‍ जे फल्‍लां चीजक तरकारी खेलौं मुदा की‍ बिनु मसल्‍लेक बनल छेलइ? जँ मसल्‍लोक सागिरदीसँ तरकारी बनल तँ ओकर चर्च किए ने होइ छइ? तर-ऊपर मनकेँ होइतो कण्‍ठसँ निच्‍चे सुलक्षणी अपन विचारकेँ अँटका रखली।

रघुनन्‍दनक मनमे भिन्ने विचार औंढ़ मारैत रहैन। मुदा गारजनक हैसियतसँ औगता कऽ बाजब उचित नै बुझि, सुरखुराइत मनकेँ रोकने रहला। मुदा तैयो होनि जे बिनु कहने बुझता केना? भीतरे-भीतर मन बजैत रहैन जे जहिना बीजू[1] गाछ कलमी डारिमे छीलि कऽ डोरीसँ बान्‍हि किछु मास जुटैले छोड़ि देल जाइत तहिना ने बिआहो छी। फागुनक कनियाँ जँ फागुनेमे सासुर चलि जाथि तँ समन जरैत देखब सासुरमे नीक हेतैन‍? चैताबरक टाँहि सासुरमे नव-कनियाँकेँ देब उचित हएत?

तेतबे नहि, जँ से हएत तखन आमक गाछीक मचकीक बरहमासा आ सौनक राधा-कृष्‍णक कदमक गाछक झूलाक अर्थे की रहत? तहीले ने बिआह-दुरागमनक बीच समयक फाँक रहैए‍। भलेँ नै बनैबला रहत तँ पान साल आकि तीन साल नै निमहौ, मुदा सालो तँ टपबए पड़त। जँ से नै टपत तँ केना सासु-ससुर, सारि-सरहोजि, सार-बहनोइ आकि सर-समाजक बीच सम्‍बन्‍ध बनत? परिवारक बीच कम्‍मो दिनमे सम्‍बन्‍ध स्‍थापित भऽ सकैए, मुदा समाज तँ नम्‍हरो आ गहींरगरो होइ छइ। कोनो धारक पानिक पैमाना तँ तखन ने नीकसँ नपाएत जखन भादोक बढ़ल आ जेठक सटकल पेटक पानि नापल जाएत। तहिना ने समाजो छी। अपना गरजे लोक थोड़े जुड़शीतल आ फगुआ आन मासमे कऽ लेत। जँ से करत तँ चरि-टँगा आ दू-टँगामे अन्‍तरे कथी भेलइ? एतबे ने, जे बिनु सिंह-नाँगैरक रहत..? रघुनन्‍दन मन ममोड़ि कऽ चुप छला। अनेको कारण अनेको समस्‍या मनकेँ घेर‍ लेलकैन‍।

ज्‍योतिक भाए-भौजाइ‍ अखन धरि धर्मसूत्र आ गृहसूत्र पढ़नहि ने छैथ, तँए हुनका सभकेँ कोनो चिन्‍ता मनमे रहबे ने करैन‍। नोकरिया रहने मनमे उठैत रहैन जे जेते जल्‍दी काज फरिया जाएत ओते जल्‍दी जान हल्‍लुक हएत। अनेरे सी.एल. दुइर भऽ रहल अछि।

मुदा से सारे-सरहोजिक मनमे नै रहैन‍, भोगेश्वरक मनमे सेहो सएह रहैन। बैंकमे घन्‍टाक कोन बात जे मिनटोक महत अछि। हरिदम पाइयेक बर्खा, पाइयेक हिसाब-वारी। अनेरे पाभैर‍ खाइले दिन-राति सासुर ओगरब, कोन कबिल्‍ती हएत। स्‍त्रीए लऽ कऽ ने सासुर, आ जे संगे रहत तँ सभदिना सासुर नै भेल? जरूर भेल। अपना परिवारकेँ जँ सासुर बना सौंसे गाम जे ओझहे बनि जाएत तँ केकरा सोझहा जाइक आँखि-मुँह रहत?

मुदा तीनू भाँइ प्रेम कुमार चुप्‍पी लादि लेलैन‍ जे अखन घरक गारजन माए-बाबू छैथ,‍ तँए किछु बाजब उचित नहि। मुदा तीनू भाँइक मनमे ई शंका जरूर होनि जे स्‍त्रीगणक सोभाव होइत अछि जे पुरुखक टीकपर चढ़ि कऽ मुरगीक बाँग देब। तैसंग समाजोक डर। समाज तँ ओहन शक्‍ति‍ छी जे बिनु डोरी‍-पगहाक रहनौं, चपरासीसँ लाट साहैब धरि सजौने अछि। हाकिम-हुकुम आ रिनियाँ-महाजन रहै वा नहि। भलेँ बिलाइ बाझकेँ खाए वा बिलाइकेँ बाझ...।

जखनसँ जमाइबाबूक दुरागमनक प्रस्‍ताव परिवारमे आएल तखनसँ सभ सकदम! चुप्‍पा-चुप, धुप्‍पा-धुप परिवारमे पसैर गेल। जइसँ धारक पानि जकाँ बहैत बोल ठमैक कऽ‍ भौर लिअ लगल। ओना, सबहक बन्न मुँह रहितो आँखिक नाच जोर पकड़नहि छेलैन, मुदा सिरिफ मूक नाच। जेठुआ गरेक सूर-सार देखते जहिना सचेत लोक पहिने बाल-बच्‍चा आ माल-जालक उपाय सोचि आगू डेग उठबैए‍ तहिना रघुनन्‍दनकेँ अपन भार परिवारक बीच उठबैक विचार भेलैन‍। फुरलैन‍, ‘संग मिल करी काज हारने-जीतने कोनो ने लाज।’ जाधैर‍‍ नीक-अधलाक बीचक सीमा-सरहद नै बुझल जाएत ताधैर‍‍ हारि-जीतक चर्चे बचकानी। मुदा समाजो आ परिवारोक तँ चलैक रस्‍ता अछिए...।

रघुनन्‍दनक मनमे खुशी उपकलैन‍, खुशी उपैकते मुँह कलशलैन‍। मुदा सुलक्षणीक मन महुराएले रहैन! किए ने महुराएल रहतैन‍? जेकरा मुँहमे ने थाल-कादो लगल अछि आ ने पसेनाक सुखाएल टघार अछि, ओ किए ने रूमालेसँ काज-चला लेत। मुदा जेकरा मुँहमे थालो आ तह-दर-तह सूखल पसेनोक टघार छै, ओ केना बिनु पानियेँ धोनौं चिक्कन हएत! की अपनो मन मानत?

सहमत भऽ परिवारक सभ सदस्‍य सुलक्षणीकेँ बजैक भार देलकैन‍। सुलक्षणी बजली-

ओना तँ साल भरि, नइ तँ छह मास, जँ सेहो नहि, तँ तीनियोँ मास आ जँ सेहो नै तँ एको पनरहिया नै रूकता तँ केना हेतैन‍। जँ से नै मानता तँ हमहूँ नै मानबैन‍।

सासुक निर्णए सुनि अपन शक्‍ति‍क प्रयोग करैत भोगेश्वर बजला-

अपन अधिकार क्षेत्रसँ अनचिन्‍ह भऽ बाजि रहल छैथ। तँए..?”

भोगेश्वरक बात सुनि ज्‍योतिक हृदैमे तरंग उठलैन‍। तरंगित होइते मुँह तोड़ि उत्तर दिअ चाहली। मुदा इन्‍टरभ्यू मन पड़िते ठमैक गेली। मुँह तँ बन्न रहलैन‍ मुदा मनमे तीन परिवारक टक्कर उठलैन‍- रूइया सदृश वादलक टक्करसँ जखन ठनका बनि सकैए, तँ तीन परिवारक तीन जिनगीक रग्‍गर केते शक्‍ति‍शाली भऽ सकैए! दिन-रातिक सीमा-सरहद तोड़ि ज्‍योति पतिकेँ कहलैन‍-

अधिकार आ कर्तव्‍य हर मनुखक धरोहर‍ सम्‍पैत‍ छिऐ, नै कि खास बेकती‍क खास।

ज्‍योतिक विचार सुनि भोगेश्वरक देह सिहैर‍ उठलैन। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत बजला-

साते दिनक छुट्टी अछि। एक तँ अहुना आन-आन विभागसँ कम छुट्टी बैंकमे होइ छै, तहूमे एते सुविधा भेटै छै जे काज केनिहार ओहो छुट्टी काजेमे लगबए चाहैए।

तैबीच ज्‍योतिक मोबाइलिक घन्‍टी टुनटुनाएल। अनभुआर नम्‍बर देख सावधानीसँ ज्‍योति रिसीभ करैत बजली-

हेलो।

हेलो।

अपने केतए-सँ बजै छी?”

विज्ञान शोध संस्‍थानसँ। सात दिनक भीतर आबि ज्‍वाइन कऽ लिअ। ओना, चिट्ठियो पठा देने छी।

ज्‍वाइनिंग-दे सुनि ज्‍योतिक मन ओहिना खिल उठलैन‍ जहिना कोनो कली कोनो वस्‍तुक तर दबाएल रहैए आ समए पाबि एकाएक फुरफुरा कऽ खिलैत फूलक रूपमे आबि जाइए...।

अखन धरिक विचार ज्‍योतिक तर पड़ि गेलैन‍ आ नव दुनियाँक नव विचार मनक ऊपर चढ़ि एलैन‍। सभसँ पहिने पिता दिस तकैत बजली-  

बाबूजी, अपन कर्तव्‍य जइ रूपे अहाँ निमाहलौं तेना बहुत कम लोक निमाहि पबैए। अपने महान छी। आग्रह करब जे केकरो जिनगीक रस्‍ताक बाधक नै बनिऐ।

ज्‍योतिक बात नै बुझि‍ जिज्ञासा करैत प्रेम कुमार प्रश्‍न उठौलैन‍-

की रस्‍ताक बाधा?”

भाय साहैब, अखन जवाबक उचित समए नै अछि। अखन एतबे कहब जे काल्हि‍ चलि कऽ हमरा शोध संस्‍थान धरि पहुँचा दिअ।

बेटीक बात सुनि सुलक्षणी बजली-

आइ तीनियेँ दिन बिआहक भेलह हेन, बहुत विध-बेवहार पछुआएल छह।

जे पछुआएल अछि ओ पाछू हएत। मुदा कोनो हालतमे काल्हि जेबे करब, चाहे..!”

ज्‍योतिक संकल्‍पि‍त विचार सुनि भोगेश्वर बजला-  

भाय-साहैब, काल्हि‍ये हमहूँ चलि जाएब। सभ संगे चलब, हम हाबड़ामे उतैर जाएब आ अपने सभ आगू बढ़ि जाएब।

सएह भेल। ज्‍योतिकेँ शोध संस्‍थान पहुँचा तीनू भाँइ घुमि कऽ घर आबि गेला।  

उर्वर भूमिक बनल परतीमे जहिना जोत-कोर आ नमीक संग बीआ पड़िते, किछुए दिन पछाइत‍‍ हरिया उठैत तहिना ज्‍योतिक उर्वर शक्‍ति‍मे अनुसन्‍धानक नव-नव अँकुर पानिक हिलकोर जकाँ उठए लगल। तहूमे एक नहि, अनेक अँकुर। जहिना पोखैरमे झि‍झरी जकाँ पानिक हिलकोर चलैत तहिना ज्‍योतिक मनमे चलए लगलैन‍। जहिना भूखल बेकती‍केँ अपन अन्नक भण्‍डार भेने, वस्‍त्रहीनकेँ वस्‍त्र भेने, गृह विहीनकेँ गृह भेने विशाल जल-राशिक‍‍ नदी सदृश मन उफैन‍ जाइत तहिना ज्‍योतिक मन उफनए लगल। आइ धरिक दुनियाँ। नव दुनियाँ, नव-नव सुरूज-चान, ग्रह-नक्षत्र, नव-नव वस्‍तुसँ सजल दुनियाँ ज्‍योतिक आँखिक आगू नाचए लगल। ओ दुनियाँ जैठाम पहुँच‍‍ मनुख सृजन शक्‍ति‍ प्राप्‍त कऽ सृजक बनि सृजन करए लगैत...।

ज्‍योति ज्‍योति नै सृजक बनि गेली। नन्‍दन बोनक माली जहिना अपन जिनगी ओइ बोनकेँ उत्‍सर्ग कऽ नव-नव फूल-फलक गाछ आन-आन जगहसँ जोहि आनि फुलवाड़ी सृजैत, जेकरा देख माली पुत्र अपन भविस बुझि एक संग छिड़ियाएल जामन्‍तो जिनगी लोढ़ि, फुलडाली सजा, देव मन्‍दिर लेल रखए चाहैत तहिना ज्‍योतियोकेँ श्रृंगी ऋृषि‍क विशाल उपवन भेट गेलैन‍। भेटिते ओइ माली पुत्र जकाँ अपन भविस देखए लगली। दू धारक बीच महारपर ठाढ़ भऽ, एक दिस तरा-ऊपरी गिरल मनुख तँ दोसर दिस जिनगीक खेलौना हाथमे नेने समुद्र दिस पीह-पाह करैत धारमे उधियाएल जाइत। उगैत-डुमैत ज्‍योति देखली जे कियो मात्र पति-पत्नीक जीवन लीलाकेँ जिनगी बुझि, तँ कियो अमरलत्ती सदृश वंश-वृक्षपर लतरबकेँ, कियो धार-समुद्रक बीच धरतीकेँ, तँ कियो अकास-पतालक बीचक विशाल वसुदेवकेँ...।

देखैत-देखैत ज्‍योतिक मन बेसम्‍हार भऽ गेलैन‍। अपन जुआनीक खिलैत कलीक संग चढ़ैत तन, उफनैत मनकेँ सम्‍हारि धारमे कुदए चाहली। मुदा मनमे नचलैन‍ माए-बाप, धरतीक प्रथम गुरु। जहिना शि‍क्षक सिलेटपर खाँत लिखि शि‍ष्‍यकेँ सिखबैत तहिना शिष्‍य सेहो ने लिखि-लिखि शि‍क्षकसँ शुद्ध करबैत। शुद्ध होइते ओहो खाँत ने खाँत बनि जाइत...।

सिनेमाक रील जकाँ ज्‍योति कुमारीक नजैर माता-पिताक सटले पतिपर पड़लैन‍। मुदा ओ किछुए क्षण धरि मनमे अँटकलैन‍। मनमे उठि गेलैन- बिआहक विधो तँ पछुआएले अछि..! लगले फेर माता-पिता आबि आगूमे ठाढ़ भऽ गेलैन।

राति-दिन ज्‍योतिक मन सौनक मेघ जकाँ उमड़ए-घुमड़ए लगल। धारमे चलैत नाह जकाँ डोलि-पत्ता हुअ लगल। आँखि उठा तकली‍ तँ देखलैन‍ जे माता-पिता छोड़ि कहाँ कियो छैथ। फेर लगले मन घुमलैन‍ तँ सभ किछु देखली। की नै अछि? मातृभूमिक संग पितृभूमि सेहो अछि। मनमे खुशी एलैन‍। होइत भोर कागत-कलम निकालि ज्‍योति पिताकेँ पत्र लिखए लगली-

माता-पिता, सहस्‍त्र कोटि प्रणाम!

एक जिनगीक आखरी आ दोसरक पहिल पत्र लिखैत मन उमैक‍ रहल अछि। तँए केतौ शुद्ध-अशुद्ध लिखा जाए, से माफ करैत सुधारि कऽ पढ़ि लेब। अपने लोकनिक सेवा, शि‍खर सदृश शि‍ष्‍य जकाँ शि‍रोधार्य केने रहब। जहिना वादलक बून धरतीपर अबिते धरिया धार होइत समुद्र दिस बढ़ैत तहिना अपने लोकनि धरिया देलौं। कुल-कन्‍याँ वा कुल-कलंकिनी बनब हमर कर्म छी। मुदा बेटी तँ अहींक छी। हमहूँ तँ एतै बसब। तँए ताधैर‍‍क छुट्टी असीरवादक संग दिअ जे बास बना बसए लगी।

अहींक ज्‍योति

पत्र पहुँचते अह्लादसँ दुनू बेकती रघुनन्‍दन-सुलक्षणी अपन ज्‍योति बेटीक पत्र पढ़ैक सुर-सार केलैन‍। पत्रपर नजैर‍ दौड़ैबते दुनू बेकती अलिसा गेला। आगूमे अन्‍हार पसैर गेलैन‍। मुदा लगले मनक भक्क् खोलि रघुनन्‍दन पत्नीकेँ कहलखिन-

पत्रक उत्तर देब जरूरी अछि, मुदा की लिखब से फुरबे ने करैए।

गर्म-ठंढक बीच जेहने सीमा असथिर रहैत तेहने चित्ते सुलक्षणी पतिकेँ विचार देलखिन-

कोन लपौड़ीमे पड़ल छी। माए-बाप केकरो जन्‍म दइ छइ। जीबैले अपने ने रौद-वसात सहए पड़तै। आब अहीं कहू जे एहनो बात पत्रमे लिखि वेचारीकेँ पढ़ैक समए बरदेबै? रहल असीरवादक तँ एतैसँ दुनू परानी मिल दऽ दियौ।

शब्‍द संख्‍या : 3300

(ई कथा, युवा साहित्‍यकार- श्री आशीष अनचिन्‍हार लेल)

 


 

 

मायराम

अमावस्‍याक राति, बारहसँ ऊपर भऽ गेल छल मुदा एक नै बाजल रहइ। डन्‍डी-तराजू माथसँ निच्‍चाँ उतैर गेल छल। सन-सन करैत अन्‍हार...।

नित्‍य नअ बजेमे निन्न पड़ैवाली मायरामकेँ आइ आँखिक नीन निपत्ता छैन, रातिक एक बजैबला अछि।

कछमछ करैत मायराम ओछाइनपर एक करसँ दोसर कर उनटैत-पुनटैत समय बीता रहल छैथ, अकैछ कऽ केबाड़ खोलि बाहर निकलली तँ काजर घोराएल रातिमे अपनो हाथ-पएर नै सुझि रहल छैन‍। जहिना करिछौंह दुनियाँकेँ आँखिसँ देखब कठिन होइत तहिना दसो दुआरि बन्न, मन खलियाएल बुझि पड़लैन‍। पुन: घुमि कऽ ओछाइनपर आबि ओंघरा गेली! दिन-रातिक बोध-विहीन मायरामक मन तड़ैप‍ उठलैन‍-

नैहर!”

पहिल सन्‍तान होइते सुदामा (मायराम) बाइसे बर्खमे विधवा भऽ गेली। गत्र-गत्रसँ जुआनी, फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ छिटकैत रहैन। ओना सरकारी रजिष्टरमे जुआन भऽ गेल छेली मुदा बत्तीसीक अन्‍तिम दाना नै उगल रहैन‍।

साँपक बीखसँ पतिक करियाएल देह देख अपनो मरनासन भऽ गेली। पथराएल आँखि टक-टक टकैत मुदा अन्‍हारसँ अन्‍हराएल। बगलमे डेढ़ बर्खक बेटा उठैत-खसैत अँगना-घर घुमैत-फि‍ड़ैत। तैबीच हहाएल-फुहाएल शंकरदेव आँखिमे यमुनाक धार नेने पहुँचला। बहिन-बहनोइक रूप देख शंकरदेव अपन आँखिक नोर पोछि भागिनकेँ उठा छाती सटा सुदामाकेँ कहलखिन-

बुच्‍ची, होश करू। दुनियाँक यएह खेल छिऐ। अहीं जकाँ नानियोँकेँ भेल रहैन। मुदा आइ केहेन भरल-पूरल परिवार छैन‍। एक-ने-एक दिन, ओहिना अहूँक परिवार दुनियाँक फुलवाड़ीमे फुलाएत।

शंकरदेवक बात सुनि सुदामाक आँखि तँ खुजलैन मुदा बकार नइ फुटलैन‍। नर-नारीक करेजो तँ दू धारक दू माटि सदृश होइत अछि।

बहनोइक पार्थिव शरीरकेँ जरबैक ओरियानमे आँगनसँ निकैल शंकरदेव समाज दिस बढ़ला।

पनरहम दिन बहिनकेँ संग नेने अपना गाम विदा भेला। गामक सीमानपर अबिते कन्नारोहट शुरू भेल। बच्‍चासँ बुढ़‍ धरि सुदामाकेँ छाती लगबए आगू बढ़ल।

वेचारी निसहाय भेल ओहिना पड़ल छेली जहिना चोंगरा परहक घर खसल-पड़ल रहैए। मुदा ताधैर‍‍ गामक धरोहिक ऐगला अंक पहुँच‍‍ गेल। एक्के-दुइए ढेरो छाती सुदामाक छातीमे सटि, चारू दिससँ पकैड़‍‍ टोल दिस बढ़ल। सुदामाक मनमे उठलैन‍ जँ अपने कानब तँ समाजक कानब केना सुनबै? से नइ तँ समाजेक कानब सुनी‍‍ जे आगूक जिनगी केना जीब...।

जहिना बीच आँगनमे माए ओंघरनियाँ दैत तहिना दरबज्‍जापर पिता भुइयेँमे पेटकान देने! अपन-अपन अथाह समुद्रमे सभ डुमल। के केकर नोर पोछत। दुनू पएर धोइ भतीजी गाराजोरी केने आँगन बढ़ली। दुरखापर पएर दैतै सुदामाक रूदनसँ बहराएल-

हे मइया...।

जहिना धड़सँ कटल अंग छटपटाइत तहिना माइक मन छटपटाइत रहैन। छटपटाइत कामिनीक मनमे प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठए लगलैन‍। मुदा कोनो प्रश्‍नक सोझ रस्‍ता नै देख काँटक ओझरी जकाँ मन ओझराए लगलैन‍। एक ओझरी छोड़बैथ‍ आकि बिच्‍चेमे दोसर लगि जाइन। की‍‍ आगूक जिनगी लेल बेटीकेँ दोसर बिआह कऽ देब? मुदा फेर मन उनैट‍ जानि जे जिनगी लेल सहचर तँ आवश्यक अछि!

की सहचर लेल पति आवश्यक अछि?

मुदा जेते असानीसँ गुंथी खोलए चाहैथ ओते असानीसँ खुजबे ने करैन‍। तैबीच दोसर प्रश्‍न अकुँरि गेलैन- बेटीक संग नातियो अछि। जँ बेटी दोसर घरकेँ अपन घर बनौत तँ नातिक..?

पुत्र हत्‍याक पाप केकर कपार चढ़त? की‍ कुत्ता जकाँ पछिलग्‍गू एहेन सुकुमार फूलकेँ बना देब? अखन ओ दूधमुँह अछि, की‍ बुझत? की अपन भूमि आ आनक भूमिक मर्जादा एक्के रंग होइत? की दोसरो घरमे ओहने ममता माइक भेटतै? मनुक्‍खेक क्रि‍या-कलाप ने कुल-खनदानक जड़िमे पानि ढारैए‍।

कामिनीक घुरियाएल मनकेँ राह भेटलैन‍। सुफल नारी जिनगी तँ वएह ने छी जेकरा आँचरक लाल मातृत्‍व प्रदान करैए‍। जइसँ वीणाक झंकृत मधुर स्‍वर हृदैकेँ कम्‍पि‍त करैत रहै छइ। से तँ भेटिये गेल छइ। मुदा जहिना ठनकैत अकाससँ ठनका खसैत तहिना मनमे खसलैन‍-  

मुदा समाज?

की‍ मनुख-पोनगैक स्‍थिति समाजमे जीवित अछि?

सुदामाक सम्‍पन्न पितृ परिवार। अदौसँ श्रम-संस्‍कृतिक बीच पुष्‍पि‍त-पल्‍लवित परिवार। जइसँ रग-रगमे समाएल अपन संस्‍कृति। ओना सम्‍पन्नताक सीमा असीमित अछि, मुदा परिवार आँट-पेट देख अपन (परिवार) जिनगीक स्‍तर बना चलब सम्‍पन्नताक अनेको कारणमे एक प्रमुख छी। तँए सम्‍पन्न परिवार। ओना आर्थिक दृष्‍टि‍ए सुदामाक बिआह दब परिवारमे भेल छेलैन‍ मुदा बेवहारिक दृष्‍टि‍ए बरबैर‍‍मे छेलैन‍। कम रहितो गोरहा खेत छेलैन‍ जइसँ खाइ-पीबैक कोताही नहि। किछु आगूओ बढ़ि ससरैत। सालक तेरहम मासमे घरक कोठी-भरली झाड़ि इजोरिया दुतियासँ भागवत कथाक संग हरिवंश कथा सुनि, भोज-भनडारा कऽ सामा-चकेबा जकाँ आगू दिस बढ़ैत।

बेटाक पालन आ धर्मक काज देख अपनो गाम आ चौबगलियो गामक लोक सुदामक नाओं मायराम रखि देलकैन‍। बच्‍चासँ बुढ़ धरि मायराम कहए लगलैन‍।

रविशंकरक परिवारमे चूल्हि‍ नै पजड़ल। जखन सुदामा आएल तखन जे कन्नारोहट शुरू भेल, से भरि दिन होइते रहि गेल। कखनो बेसी तँ कखनो कम। चूल्हि‍ नै पजरने टोल-पड़ोसक परिवारसँ थारी-थारी भात, दालि एतेक आएल जे राति धरि चलैत रहल।

सायंकाल रविशंकर आँगनक ओसरपर बैस, सुदामाक भावी जिनगी लेल पत्नियोँ आ बेटो-पुतोहुकेँ बैसा विचार करए लगला।

विचारोत्तर निर्णए भेल जे काल्हिए शंकरदेव सुदामाक सासुर जा खेती गिरहस्‍ती ताधैर‍ सम्‍हारैथ‍ जाधैर‍ सुदामाक बेटा जुआन नै भऽ जाएत। तैसंग ईहो विचार भेल जे छह मास सासुर आ छह मास नैहरमे सुदामा रहत।

अठारह बर्ख पुरिते राहुलक बिआह भऽ गेल। नव परिवार बनि ठाढ़ भेल। शंकरदेव अपना ऐठाम चलि एला।

तीन सालक पछाइत‍ रविशंकर आ पाँच सालक पछाइत कामिनी मरि गेली। मुदा दुनू ठामक परिवारमे कोनो कमी नै रहल। हवाइ-जहाज जकाँ तेज गतिए तँ नहि, मुदा टायरगाड़ी सदृश असथिर सवारी जकाँ परिवार आगू मुहेँ ससरए लगल।

मायरामक प्रति समाजक नजरिया सेहो बदलल। समाजक आन विधवा जकाँ नहि, जे कियो अशुभ बुझि कनछी कटैत तँ कियो पशुवत बेवहार लेल मरड़ाइत रहैत। बल्‍कि तीर्थस्‍थान जकाँ मायरामक परिवार बनि गेलैन‍। भागवत कथाक संग हरिवंश कथा आ भोज-भनडारा कऽ समाजकेँ खुआ सालक विसर्जन साले-साल मायराम करए लगली।

पाँच बर्खक पछाइत‍ मायरामक भरल-पुरल नैहर कोसीक कटनियासँ धार बनि गेल। गामक बीचो-बीच सनमुख धार बहए लगल।

घटनो अजीब घटल। चारि बजे करीब बाढ़िक हल्‍ला गाममे भेल। किरिण डुमैत-डुमैत धारक कटनिया शुरू भेल। गामक सभ बाध नदिया गेल। उत्तर-सँ-दच्‍छिन मुहेँ बहए लगल। बाढ़िक बिकराल रूप देख गामक लोक माल-जाल, बक्‍सा-पेटीक संग ऊँचगर-ऊँचगर जमीनपर पहुँचल। नट-बक्‍खो जकाँ नव बास बनि गेल।

बाढ़िक गुंगुआहैट सुनि-सुनि लोक सभ किछु बिसैर‍ अपन-अपन‍ परान बँचबैक गड़ लगबए लगल। चारू कात बाढ़ि पसरल। जइसँ ईहो डर होइत जे जँ कहीं अहूपर पानि चढ़त तखन की‍ हएत? अन्‍हरिया राति, हाथो-हाथ नै सुझैत। जीवन-मरनक मचकीपर सभ झूलए लगल। सबहक भूख-पियास मेटा गेल। जहिना दुखित नव बिआएल गाए-महींस बेथित आँखिए बच्‍चाकेँ देखैत तहिना सभ माए-बापक आँखि बाल-बच्‍चापर। मुदा मनुख तँ मनुख छी, जानवर तँ छी नहि जे हरियर घास देख बच्‍चो आगूक लूझि कऽ खा लइए‍। एना मनुख थोड़े करत। बाल-बच्‍चा लेल तँ मनुख अपन खूनकेँ पानि बनबैत, अपन सुआदकेँ छोलनी धिपा दगैत, अपन मनोरथ बच्‍चामे देखैए‍। अपन जिनगीकेँ बलिवेदीमे आहूत दइए‍।

भोरहरबामे हल्‍ला भेल जे बीस नमरी पुल कटि कऽ दहा गेल! पुलक समाचार सुनि सबहक छाती डोलए लगल। पूव दिसक रस्‍ता बन्न भऽ गेल।

किछुए कालक पछाइत‍ फेर हल्‍ला भेल जे बेटा संग रोगही पानिमे डुमि‍ गेल। किछु काल धरि तँ हल्‍लामे बाते नै फुटैत मुदा तोड़ मारि हल्‍लामे विहियाति-विहियाति समाचार विहिया गेल। भाँसि कऽ केते दूर गेल हएत तेकर ठेकान नहि, तँए कियो आगू बढ़ैक हूबे ने केलक। जहिना एक टाँग टुटने गनगुआरि नै नेंगराइत तहिना एक गोरेकेँ मुइने समाज थोड़े नेंगराएत। एना सभ दिन होइत एलै आ आगूओ होइत रहतै...।

हल्‍ला शान्‍त होइते शंकरदेव पत्नीकेँ कहलखिन-

आब जान नै बँचत!”

एते अन्‍हारमे केतए जाएब। भने ऐठाम छी।

पत्नीक बात सुनि डेराइत शंकरदेवक मुहसँ निकलल-

जँ अहूपर बाढ़ि चढ़ि जाएत?

सभ तूर संगे कोसीमे डुमि‍ जाएब। कियो बँचब तखन ने दुख हएत। जँ दुख केनिहारे नै रहब तँ दुख केकरा हएत।

पौरुकी घुटकल। आन-आन चिड़ै सुतले रहए। पौरुकीक अवाज सुनि शंकरदेवक मनमे दुबिक नव मुड़ी जकाँ, नव चेतना जगलैन‍। बजला-

भिनसर होइमे देरी नै अछि। जँए एतेकाल तँए कनीकाल आरो। दिन-देखार तँ असगरो लोक अमेरिका‍ चलि जाइए। अपना सभ तँ बाधक थोड़े रस्‍ता काटब।

किरिण उगैसँ पहिने‍ ऊँचकापर पानि चढ़ए लगल। चढ़ैत पानि देख हरविर्ड़ो भेल। गाए-महींस, बक्‍सा-पेटी छोड़ि‍ सभ अपन जान बँचबैक गड़ लगबए लगल। जहिना वैरागी दुनियाँकेँ मायाजाल मानि, छोड़ि‍, आत्‍म चिन्‍तनमे लगि जाइत तहिना माल-असबाव छोड़ि‍ अपन-अपन जान बँचाएब सोचए लगल। तही बीच बाँसक झोंझमे मैना सभमे तेना झौहैर उठल जेना केकरो वोनबिलाड़ि पकैड़‍‍ नेने होइ।

पूब दिस फीक्का गुलावी जकाँ अकासमे पसरए लगल। मुदा बिलटैत जिनगी आ डुमैत सम्‍पैतक सोग एक-एक बेकतीक मनक अन्‍हारकेँ आरो बढ़बैत रहइ। सूखल जमीनपर पहुँचते छोट-छीन आशा शंकरदेवक मनमे जगलैन‍। मुदा चारू बच्‍चो आ पत्नियोँक मनमे दुधाएल चाटल दानाक खखरी जकाँ बेर-बेर शंका खिहारैत जे हो-न-हो, फेर ने कहीं आगूए-सँ बाढ़ि चलि आबए...।

तैबीच मिरमिराइत पत्नी शंकरदेवक मुँह दिस तकैत बजली-  

एते लोकक गाममे एक्कोटा संगी नै देख रहल छी!”

सभ अपने जान बँचबै पाछू अछि तखन के केकरा देखत।

जाबे लोक, भरल-पूरल रहैए ताबे दुनियाँ हरियर बुझि पड़ै छइ। मुदा...।

हँ, से तँ होइते छइ। मुदा...।

हँ, ईहो होइ छइ। अखन माए जीबैए, केतए वौआएब। बच्‍चो सबहक मात्रि‍के भेल, अपनो नैहरे भेल आ अहूँक सासुरे।

पत्नीक बात सुनि शंकरदेव गुम भऽ गेला। मनमे चूल्हि‍पर खौलैत पानि जकाँ विचार तर-ऊपर हुअ लगलैन‍।

बजला-

कहलौं तँ बड़बढ़ियाँ। मुदा सासुरसँ नीक बहिन ऐठाम हएत।

केना?

जइ दिन वेचारीक ऊपर विपैत आएल छेलै तइ दिन यएह देह अपन घर-परिवार छोड़ि‍ ठाढ़ भेल छेलइ। आइ की‍ हमरे गाम-घर मेटा रहल अछि आकि ओकरो नैहर।

अहाँकेँ जे विचार हुअए।

विचारे नहि, विपैतमे लोकक बुधि हेरा जाइ छइ। जइसँ नीक-अधलाक विचार नै कऽ पबैए‍। मुदा अहीं कहूँ जे सासुरमे कान्‍हपर कोदारि लऽ कऽ खेत-पथार जाएब, से केहेन हएत? अपन जे दुरगैत हएत से तँ हेबे करत, मुदा दुनू परिवारक की गति हएत?

बाढ़िक समाचार इलाकामे पसैर गेल। मायरामक कानमे सेहो पड़लैन‍। भाय-भौजाइक आशा-बाट तकैत मायराम बेटाकेँ संग केने आगू बढ़ली। मुदा किछु दूर बढ़लापर सोगसँ पथराएल पएर उठबे ने करैन‍। बाटक बगलक गाछक निच्‍चाँमे बैस बेटाकेँ कहलखिन-

राहुल, पएर तँ उठबे ने करैए। केना आगू जाएब? ता तूँ आगू बढ़ि कऽ देखहक।

छबो तूर शंकरदेव ऐ आशासँ झटकल अबैत जे जेते जल्‍दी पहुँचब ओते जल्‍दी बच्‍चा सभकेँ अन्न-पानिसँ भेँट हेतइ। रतुको सभ भुखाएले अछि।

तैबीच राहुलक नजैर‍ मामपर आ मामक नजैर‍ भागिनपर पड़ल। नजैर‍ पड़िते राहुल दौड़ कऽ ठाढ़े मामाकेँ गोड़ लागि मामीक कोराक बच्‍चाकेँ अपना कोरामे लैत बाजल-

माइयो अबैए, मुदा डेगे ने उठै छेलइ। आगूमे बैसल अछि।

राहुलक बात सुनि मामी बच्‍चा सभकेँ कहलखिन-

भैयाकेँ गोड़ लगहुन।

बच्‍चाकेँ कोरामे नेने आगू-आगू राहुल आ पाछू-पाछू सभ कियो विदा भेला। सभसँ पाछू शंकरदेव अपने। मन पड़लैन‍ रतुका दृश्‍य। केना छनेमे छनाक् भऽ गेल! जिनगी भरिक जोड़ियाएल घरक वस्‍तु-जात आगि लगने आकि बाढ़ि एने केना लगले नास भऽ जाइ छइ! मान-प्रतिष्‍ठा, गुण-अवगुण, केना छनेमे केतए-सँ-केतए चलि जाइ छइ! ठीके लोक बजैए जे दिन धराबे तीन नाम। अपने छी जे एक दिन बहिनक रक्षक बनि ऐ गाममे छेलौं आ आइ..! एक दिन गाड़ीपर नाह आ एक दिन नाहपर गाड़ी! माटि-पानिक खेल छी। गंगा-यमुनाक बीच केतौ माटियो छै आकि खाली पानियेँ-पानि..!

किछु फरिक्केसँ भाय-भौजाइकेँ अबैत देख मायरामक मन ओइ धरतीपर पहुँच‍‍ गेलैन‍ जे सात समुद्रक बीच अछि। एक ओद्रक रहितो एक भिखारी दोसर राजा! मनमे उठलैन- परोपट्टाक लोक सिनेहसँ मायराम कहै छैथ‍ मुदा भैयाकेँ की कहतैन‍? की भैयाक कर्म बिगड़ल छैन? एक परिवारक बँचौल कर्म छैन‍। चान, सुरूज, धरती, ग्रह-नक्षत्र इत्‍यादि तँ अपना गतिए करोड़ो बर्खसँ नियमित चलि रहल अछि आ चलैत रहत, की मनुखोक गति ओहन भऽ सकैए, आकि चाने-सुरूज जकाँ मनुखोक चलैक एकबटीए अछि? ब्रह्मक अंश जीव‍ रहितो की फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ नै अछि? जेतए जेहेन जलवायु तेतए तेहेन उपजा-वारी! जँ केतौ वायु परानक रूपमे घट-घटकेँ आगू बढ़ैक प्रेरणा दैतो अछि, तँ वएह विषाक्‍त बनि परान नै लैत अछि?

गोलाक चोटसँ जहिना पोखैरक पानिमे हिलकोर उठैत आ आस्‍ते-आस्‍ते असथिर होइत चिक्कन आँगन जकाँ सहीट बनि जाइत तहिना मायरामक मन सहीट हुअ लगलैन‍। मुदा लगले नजैर‍ उड़ि भतीजीपर गेलैन‍। भतीजीपर पहुँचते मन तरपए लगलैन‍। बाप रे बाप! एहेन दुरकालमे भैया केना इज्‍जत बँचौता? अपनो लग जमा किछु तँ नहियेँ अछि। साले-साल हिसाब फरिया लइ छी। हे भगवान! जँ केकरो दुखे दइ छिऐ आकि सुखे दइ छिऐ तँ तुलसी पात आकि दुबिक मुड़ी जकाँ खोंटि-खोंटि किए ने दइ छिऐ जे गुलाब-गेन्‍दा तोड़िए कऽ दऽ दइ छिऐ? लगले नजैर‍ मायराम छिप्‍पा जकाँ छिहैल‍ अपन मातृत्‍वपर पहुँच‍‍ गेलैन‍। केना बेटाकेँ पोसि-पालि ठाढ़ केलौं आ ई सभ...। लुधकी लागल एकटा गाछ फड़बे करत तइसँ गामक सबहक मुँहमे थोड़े जाएत। जेते मनुख अछि ओकरा तँ धरतीसँ अकास धरि चाहिए, तखन ने जीबैक आजादी भेटतै..?

मुदा लगले जहिना पानि ठंढेने बर्फक रूप लिअ लगैत तहिना दूधसँ उपजैत दही जकाँ मायरामक मन सकताए लगलैन‍। साँस सुषुमा गेलैन‍। मनमे खौललैन‍- नैहर मेटा गेल तँए कि सासुरो मेटा गेल? जहिना भैया नैहरमे भैया छला तहिना अहूठाम भैया रहता। भगवान अपन कोखि अगते लऽ लेलैन‍ तँए की भतीजीकेँ अपन कोखिक नै बुझब? ऐठाम जे अछि ओ की भैयाक नइ छिऐन‍? खेत-पथार, घर-दुआरि चलि गेलैन‍ आकि हाथो-पएर चलि गेलैन?

गुमे-गुम, जहिना मृत्‍युक अवसरपर गुम भऽ स्‍मरण कऽ निराकरणक बाट जोहल जाइत तहिना सभ कियो घरपर पहुँचला। ताधैर‍ पुतोहु माने रोहितक पत्नी हाँइ-हाँइ कऽ खिच्‍चैड़ आ अल्‍लूक सन्ना बना, बाट तकैत रहथिन।

सबहक आँखि सभ दिस हुलैक-हुलैक वौआइत रहैन। तैबीच राहुलक कोरक छोटका बच्‍चा, घर देखते, बाजल-

दीदी, बड़ भूख लगल अछि?

बच्‍चाक बात सुनि मायरामक भक्क टुटलैन‍। अनासुरती मन पड़लैन बटोहीकेँ जहिना इनारपर ठाढ़े-ठाढ़ पानि पिऔल जाइत तहिना ने अखन ईहो सभ छैथ। नहाय-धोयमे अनेरे देरी किए लगाएब। बजली-

कनियाँ, भरि रातिक थाकल-ठेहियाएल सभ छैथ,‍ तँए पहिने किछु खुआ कऽ अराम करए दियौन। गप-सप्‍प पछाइतो‍ हेतइ। भोजन बादेक अराम तँ सोग कम करैक उपाय छी।

शब्‍द संख्‍या : 2102


 

 

गोहिक शिकार

बच्‍चासँ सियान धरि जाबे‍ तीनू धाम–सिंहेश्वर, कुशेश्वर आ जनकपुर–नइ देखने छेलौं ताबे‍ अपनो बाबा आ समाजिको काका, बाबासँ सुनैत रहलौं जे तीनू धाम एक्के रंगक दूरीपर अपना सभकेँ अछि। ई भिन्न बात जे जैठाम पृथ्‍वीपुत्री सीता छैथ‍ तैठाम सिंह सदृश सिंहेश्वर बाबा सेहो छैथ। मुदा आब जखन तीनू धाम देखलौं तखन जँ विचारै छी तँ स्‍पष्‍ट दूरी बुझि पड़ैए।

बान्‍ह-सड़कक अभावमे गामसँ गाड़ी-सवारी नहि, तँए नाहसँ कुशेश्वर, सिंहेश्वर आ जनकपुर पएरे गेलौं। भलेँ अकास मार्गसँ एक-रँगाह होइ मुदा जमीनी रस्‍तामे अन्‍तर अछि। कहैले तँ कोसियो धार टपै पड़ैए‍ मुदा सप्‍तकोसियोसँ बिकट रस्‍ता अछि। ओना, जखन जाए लगलौं तखन सात दिनक बटखरचाक संग धानक जुट्टी–चढ़बैले–लऽ नेने रही तँए चिन्‍ता नहियेँ जकाँ रहए। मुदा कोसीक लहैर देख मन डेराएल जरूर।

जनकपुरक ठेही बाट, तँए कच्‍चियो रहने पएरे चलैमे सुगम अछि। जहिना छोट-छीन शब्‍द संगीक संग संयुक्‍त भऽ नमहर बनि ओझरी लगबैत जाइत तहिना कुशेश्‍वरक रस्‍ताक धार सभ केने अछि। कोन धार केतए मिलि अपनो बदैल गेल आ दोसरोकेँ बदैल गंगो-ब्रह्मपुत्रसँ विकराल रूप बना नेने अछि। जइसँ टपब समुद्र जकाँ भऽ गेल अछि। मुदा बिना टपने कुशेश्‍वर पहुँचब केना?

संयोग नीक जे धार सबहक बीच मातृक अछि। कातिक बीतैत ममियौत भाय नाह बनबए गाम पहुँचला। किएक तँ पहिलुका नाह भँसियाएल अबैत एकटा ढेंगमे लगि फुटि गेलैन‍।

हुनका सबहक ने गाछी-बिरछी बाढ़िक पानि एने सूखि गेलैन‍ मुदा अपना सबहक तँ बँचल अछि। अपने जामुन गाछ देखा देलिऐन‍।

सुरेब गाछ देख भाइक मन मुस्‍किया गेलैन‍। हलैस‍ कऽ कहलैन‍-

बौआ, नाहो भऽ जाएत आ हरिस, पालो आ चौकीक संग साल भरिक जारैन सेहो भऽ जेतह।

जारैन सुनि कहलयैन‍-

भैया, माले-जाल तेते अछि जे ने जारैनक दुख होइए आ ने खेत सभमे बजरूआ खादक।

भाय चुप भऽ गेला, पछाइत जलखै करैकाल बजला-

जखन लकड़ीक गड़ लगिए गेल तखन चलह बनौनिहारोकेँ कहि हाथ लगाइए देब।

कहलयैन-

हँ तँ बेजाइए कोन।

पान-सुपारी मुँहमे दैते डेग बढ़ौलैन‍। पाछू-पाछू विदा भेलौं। बरहीक घर लगेमे तँए पहुँचैयोमे देरी नहियेँ लागल। पहुँचते राजिन्‍दर पुछि देलक-

पाहुन कहाँ रहै छैथ‍।

कहि चौकीपर ओछाएल ओछानिकेँ हाथेसँ झाड़ए लगल। दुनू भाँइ बैसलौं। बैसते भाय पुछलखिन-

मिस्‍त्री, एकटा नाह बनाएब।

भैयाक मुँह दिस राजिन्‍दर ठकुआएल टकर-टकर देखए लगल। किछु फुरबे ने करै जे बाजत। ठेही परहक बरही, तँए हर-पालोक संग हँसुए-खुरपीटा बनौनाइ आ फाड़े पिटनाइ खाली बुझैत।

राजिन्‍दरकेँ ठकुआएल देख राजिन्‍दरक पीसा जे दू दिन पहिने आएल छेलखिन, बजला-

केतेटा नाह बनाएब?”

भाय कहलकैन-

तेरह हाथक।

घरैया आकि घटवारिबला?”

घरैये।

मने-मन नाहक पेटक हिसाब जोड़ि पीसा कहलकैन-

पनरहिया लगि जाएत। दू दिन एनो भऽ गेल।  

पीसाक बात सुनि राजिन्‍दक मन हलैस‍‍ गेल। जहिना हँसैत फूलक सुगन्‍धमे भाय वायुक संग वायुमण्‍डलमे विचरण करैथ तहिना हलसल मन राजिन्‍दरक बाजि उठल-

पीसा, एक पंथ दू काज। अहाँक पहुनाइयो सुतैर जाएत आ हमरो एकटा लूरि बढ़ि जाएत, उपकार तँ नफ्फामे हएत।

दुनूक बात सुनि अपनो मन कलैश गेल जे भरि आँखि बनैबतो देखब आ जाबे नाह रहत ताबे भैयौ गुण गबैत रहता, तँए स्‍टेशनक कुल्‍ली जकाँ, जे हैयौ-हैयौ करैत सिमटीक बनल पुलक पायाकेँ ठेलैत तहिना ठेलैत बजलौं-

भैया, अखन ठरपर छी, ऐठीन जे काज हएत से नीक हएत। अनभुआर जगहमे पच्‍चीसटा बिहंगरा होइ छइ?”

तैबीच सह पाबि राजिन्‍दर फुदैक उठल-

पीसा, कमाइ अपन अपने राखब। खेनाइक चिन्‍ता नै करू।

कमाइ देख पीसा बजला-

भाय, जहिना अहाँ धारऽ कातक छी, तहिना हमहूँ छी। हम पूवारि पार रहै छी।

बनाइक गप-सप्‍प भेल। मुदा खेनाइक गप-सप्‍प भेबे ने कएल। किएक तँ हुनका दुनू गोरेकेँ बुझल। दोसर दिन जखन काज शुरू भेल तखन बुझलौं।

दोसर दिन जामुनक गाछ खसा, पाँगि-पुँगि कऽ तेसर दिन चिराइमे हाथ लगि गेल। भरि दिन भैया गमछाक अराम कुरसी बना मिस्‍त्रीए लग बैस अपन देश-कोसक महाभारत सुनबए लगलखिन। आ अपने खन अँगना, खन खेत, खन भैया लग आबि-आबि हाजिरी पुरबए लगलौं।

बारहम दिन नाहक सकल ठाढ़ होइते भैयाक मन जेठुआ बाढ़ि जकाँ फुलाए लगलैन‍। जहिना धार फुलेने चरो-चाँचरमे फूल पकैड़‍‍ लइ छै तहिना अपनो मन फुला गेल। पथिया नेने माए तख्‍ताक छोलैन अनैले पहुँचले छेली, कि पछबारि बाधसँ घुमि पहुँचलौं। मुस्‍की दैत भैया कहलैन-

बौआ, कुशेसर चलह।

भैयाक बात सुनि माए बजली-  

बहू दिन गेना भऽ गेल।

भैयाक मनमे कि रहैन से तँ नीक नहाँति नै बुझलौं। मुदा अपना भेल जे भरिसक रस्‍तामे छीना-छीनी दुआरे बजला, संगीक जरूरत छैन‍। ओना, मनमे ईहो भेल जे जहिना नाहक सभ काज भेलैन‍ तहिना सुहरदेसँ, गामो पहुँचाएब जरूरी अछि। के कहलक रस्‍ता पेरामे नाहक संग जानो चलि जाइन। कहलयैन-  

कए गोरेकेँ लऽ जेबैन‍?”

सभ तूर चलह।

सभ तूर सुनि माए बजली-

बौआ, सभ तूर जे जाएब से बनत। कोनो कि नोकरिया-चकरियाक घर छिऐ जे ताला लगा दियौ आ विदा भऽ जाउ। चारिटा माल अछि, धानक लड़ती-चड़ती अछि, तखन?”

बिच्‍चेमे भैया कहलखिन-

एको गोरे जँ पीठपोहू रहत तैयौ चलि जाएब।

कुशेश्‍वरेक रस्‍तामे मातृक अछि। माने मामाक घरसँ चारिये कोस दच्‍छिन- कुशेश्‍वर अछि। कहलयैन-

भने कुसेसरो बाबाक दर्शन भऽ जाएत आ दू दिन मात्रि‍कोमे रहि जाएब।

नाह बनि गेल। जेते छाँट-छूँट, तख्‍ता उगड़ल, सभ सेरिया कऽ रखि लेलौं। काल्हि‍ भोरमे जाएब। पुछलयैन‍-

भैया, रस्‍ता भँजियाएल अछि किने?”

भाय हँसैत बजला-

तूँ सभ ठेही परहक छह तँए रस्‍ता तकै छहक। हमरा सभ लिए जेहने धार, तेहने डुमल खेत। पहिने सुपेन धार होइत गहुमा पहुँचब। गहुमासँ भुतही कमलामे चलि जाएब! जखने कमला पहुँचलौं तखने बुझह जे धाम पहुँच‍‍ गेलौं। घुमती काल सिरा रहत तँ एक गोरे गुन खिंचब दोसर गोरे नाहपर रहब।

माएकेँ कहलिऐ-

बटखर्चा ओरिया मोटरी बान्‍हि दिहैन। जाइ बेरक आशा नै रखिहेँ, हड़बड़मे कोनो चीज छुटि ने जाए।

माए कहलक-

तीन सालसँ घीओ रखल अछि, ऊहो नेने जैहह।

बड़ बढ़ियाँ। मोटरीए-मे बान्‍हि दिहैन।

हरा-तरा जेतह?”

से की अखन गरमी मास छी। ओ तँ अपने तेहेन जमल हएत जे बिना मुन्नोक काज चलि जाएत।

तैयो माए बजली-

मकैक नेरहाबला मुन्ना अछि। ओ छिछलाह होइए। कहीं नाहक झमारमे छिछैल‍ कऽ खुजि जेतह तखन तँ हेराइए जेतह।

मन खुशी रहबे करए, कहलिऐ-

अच्‍छा, दोसरे मुन्ना लगा दिहैन?”

बड़बढ़ियाँ। नेरहाबला बदैल‍‍ कटकटा कऽ कोढ़िला लगा देब। ओ थोड़े छिछलाह होइए।

जाड़क मास रहने भदबारि जकाँ ने धारे नचैत आ ने चरे-चाँचरक ओ रूतबा। भट्ठा दिस जाएब छल तँए मिसियो भरि भैयाकेँ थकान नै बुझि पड़ैन। जहिना ढलानपर गाड़ी तहिना सिरासँ भट्ठाक नाह। माथपर गोसाँइ देख कहलयैन-

भैया, पानि तँ अछिए, केतौ खा लिअ।

कहलैन‍-

गड़ लगा कऽ ने नाह लगाएब।

किछु दूर आगू बढ़लापर धारेकातमे एकटा पीपरक गाछ रहइ। खूब झमटगर। एक भाग, धार दिसक अदहासँ बेसी सिर अलगल रहइ। नाह बन्‍हैक सुविधा आ छाहैरो तहिना, धारक पेटेमे चहटी जकाँ, जैपर घास जनैम गेल छेलइ।

पवित्र जगह देख भैया चपचपाइत बजला-

बौआ, नीक जगह अछि। थोड़ेकाल अरामो कऽ लेब।

गाछ लग पहुँच भैया कहलैन‍-  

बौआ, तूँ नाहेपर रहह, हम बन्‍है छी।

कहि धाँइ-दे मांगिसँ कूदि रस्‍सी पकड़ने हाँइ-हाँइ कऽ गाछक सिरमे नाहक रस्‍सी लटपटौलैन। नाह ठाढ़ भेल। उतरलौं। ओइठाम धार भकमोड़ नेने। एतेकाल दच्‍छिन-मुहेँ छल, आब पच्‍छिम-मुहेँ भऽ गेल। उतैर कऽ आगू तकलौं तँ बुझि पड़ल जे मरकाठीक डेंगरी सभ छिड़ियाएल अछि। रहि-रहि कऽ गन्‍ह सेहो अबइ। कहलयैन-  

भैया, ई तँ मुर्दघट्टीमे चलि एलौं! ऐठाम कन्ना रहब आ खाएब?”

मुस्‍कियाइत भैया कहलैन‍-

ई सभ अधजरू डेंगरी नहि, गोहि सभ छी। रौद तापैले ऊपर आएल अछि।

भैयाक बात सुनि डरे मन डोलि गेल। आँखि उठा-उठा निहारि-निहारि देखए लगलौं। मन पड़ल कलकत्ताक चिड़िया खानाक गोहि। बाप रे! ई तँ जीविते लोककेँ गीर जाइए! माघक जड़ाएल बच्‍चा जकाँ देह डोलए लगल। मुदा भाय लेल धैनसन।

ओइ भकमोड़पर खूब नमहर मोइन। जेहने नमहर तेहने गहींर। जेठोमे अगम पानि रहैत। तैबीच भुक-दे पारा जकाँ एकटा शोंश उगल आ लगले डुमि गेल। आरो डर बढ़ि गेल। कहलयैन-

भैया, नाह पार केना करब। ई तँ तेहेन-तेहेन पनियाँ जानवर सभकेँ देखै छी जे एक्के हुड़कान मारत तँ नाहे उनटा देत।

मुदा ओ मुस्‍किया कऽ रहि गेला। जेना-जेना डर बढ़ैत जाए तेना-तेना आँखि निड़ारि-निड़ारि देखए लगलौं। करीब पनरह कट्ठासँ बेसीए-रकबामे मोइन, जइमे धारक पानि चकभौर लइत! कखनो-कखनो बुल-बुला सेहो निकलै। तैबीच एकाएक पछिया हवाक संग दुरगन्‍ध पसैर गेल। कहलयैन-

भैया, कोनो जरैत मुरदाक गन्‍ध छी?”

भैया कहलैन‍-

ऊँहू, भरिसक मलेछ छी।

अपन विचारकेँ मजगूत करैत पुछलयैन-

जँ मरचर नै छी, तँ मलेछ केतए-सँ आएल?”  

आब, जेना हुनको मनमे डर पैसलैन‍। बजला-

एक बेर सुहतरिया घाटमे मलेछ नाहे उनटा देलकै।

बजैकाल तँ बाजि गेला मुदा लगले बात बदैल‍‍ बजला-

बौआ, कोसि‍कन्‍हाक मलेछ की लोककेँ किछु कहै छइ। देखबहक जे अपियारी सभमे एक दिस लोक माछ बिछैत रहतह आ दोसर दिस मलेछ सभ। तोरा इलाकामे परसौती स्‍त्रीगणकेँ मलेछ बेसी हरान करैए।

अपनो मन मानि गेल, किएक तँ एक खुट्टापर गाए-बरद पटका-पटकी करैए, मुदा दोसर खुट्टापर संगी बनि दूधक धार बहबैए।

तैबीच लोकक सुन‍-गुन पाबि गोहि सभ धाँइ-धाँइ पानिमे कूदल। मोइनसँ कनियेँ हटि एकटा पीरारक गाछ भीतापर रहइ। ओना, ओ गाछ बड़ नमहर तँ नहि, मुदा साहोरे जकाँ पकठाएल रहइ। ओही गाछक निच्‍चाँमे एक गोरे ठाढ़ रहइ। भैया कहलैन‍-

हैवएह मलेछ छी। ओकरे महक अबैए! अखने पीड़ारक गाछपर सँ उतरल।

डरो हुअए मुदा देखैयोक मन हुअए। लोके एतेटा। कहाँ दन लंकाक राक्षस जकाँ मलेछ बड़ी-बड़ी होइए। से कहाँ छइ? ओना भूत-परेतकेँ नै मानै छी। किएक तँ मनुखक आत्‍मा पंचतत्त्वमे विलीन भऽ जाइ छै आ शरीरकेँ या तँ जरा देल जाइ छै वा माटिक भीतर आकि बाहर किड़ी-मकौड़ी, चिड़ै-चुनमुनी खा लइए‍। तखन भूत जन्‍मत कथीक।

दुनू भाँइ हिआसि-हिआसि ओकरा देखए लगलौं। मनमे उठल- लोक रहैत तँ दोसरो संगी रहितै। से कहाँ छइ? भूत-परेत तँ असगरो रहैए। ओकरा कि कोनो चीजक डर होइ छइ। मुदा ओ मोइन दिस बगुला जकाँ धियान लगौने। सहसा ओ मोइनकेँ गोड़ लागि पानिमे पैस गेल। रस्‍सीक एकटा भीड़ी डाँड़मे बन्‍हने आ हाथमे मोटका तारक काँकोर रहइ। रस्‍सीक एकओर गाछमे बान्‍हल छेलइ। मोइनमे डुमल। अनासुरती मनमे उठल जे भरिसक अहिना लंकाक मोती बाहर करैबला पनिडुब्‍बा, उत्तर सागरक सील ह्वेल आ बालरसक शि‍कारी जकाँ ईहो पानिक शि‍कारी छी।

किछु क्षणमे उक्-उक्क अवाज उठलै आ ओ लपैक कऽ डारि पकैड़‍‍ ऊपर आबि गेल। ऊपर आबि दोहरा कऽ गोड़ लगलक। ताबे बिसवास भऽ गेल जे ओ आदमीए छी मलेछ नहि। मुदा एतेक गन्‍हकै कथी छइ! पातर साँस बना लगमे गेलौं तँ देखलिऐ जे ओ आदमी दुनू बाँहिमे गोहियेक खलड़ीक खोल बना पहिरने अछि। जाड़े थरथराइए! बेर-बेर हाँफी होइ छइ। जेना थाकल हुअए। 

ओइ ओ! ओइ ओक अवाज तीन-चारि बेर लगौलक। अवाज सुनि लगले बीस-पच्‍चीस गोरे जमा भऽ गेल। जेना लगेक बोन-झाड़मे सभ नुकाएल रहल रहइ। जमा होइते सभ रस्‍सा पकैड़‍‍ खिंचए लगल आ बाजए लगल-  

ले जवान!”

हइसा।

आगू बढ़ैत!”

हइसा।

रस्‍सा-कस्‍सी शुरू भेल। मोइनमे जेना बिहाड़ि आबि गेल तहिना महजाल लगैबते माछ जकाँ सभटा तरपए लगल।

करीब डेढ़-दू घन्‍टा रस्‍सा-कस्‍सी चलल। कखनो ऊपर दिस खिंचाइ तँ कखनो मोइन दिस। मोइन दिस खिंचाइते भड़भड़ा कऽ सभ खसि पड़इ।

करीब दस-एगारह हाथक गोहि ऊपर भेल। ऊपर होइत तीन-चारिठाम बाँसक टोन दऽ चरि-चरि-पँच-पँच आदमी बैस गेल। गोहिक ठोंठमे रस्‍सा कसाएल रहइ! तरूआरि जकाँ एकटा तेजगर हथियारसँ एक गोरे हाँइ-हाँइ कऽ चीर देलक। मुदा अखनो धरि सभ दबनहि रहल। किछु कालक पछाइत‍ परान छुटि गेलइ। परान छुटिते बाँसक टोन हटा गोहिकेँ काटए लगल। काज अगुआएल देख लग जा पुछलिऐ-

केना-केना गोहि पकड़ै छहक?”

अनभुआर बुझि ओ आदमी हाथक इशारासँ गाछक छाहैरमे चलैक इशारा केलक।

गाछक छाहैरमे बैसते हमर नाओं पुछलक कहलिऐ, हमहूँ पुछलिऐ तँ बाजल-

भोला तीयर।

भोला तीयर कहि गोहि केना पकड़ै छै से कहए लागल-

पानिमे पैस गोहि लग जाइ छिऐ। नमती अन्‍दाजि कऽ ओकर नाँगैरसँ बँचैत अपन केहुनी आगू केने रहलौं। आँखि ने तँ मुँह बौने रहल। जँ मुँह बौने रहल तँ हाँइ-हाँइ कऽ लोहाक काँकोर मुँहमे दऽ दइ छिऐ। लोकक देहक गन्‍ह गोहिकेँ मतिसून बना दइ छइ। खाली नाँगैरसँ अपन बँचाउ केने रहै छी। ओना सभ कमला माइक परतापसँ होइए, लोक बुत्ते थोड़े हएत।

हम पुछलिऐ-

एकरा की करबै?”

भोला तीयर बाजल-

मौस खेबै आ खलड़ी बेचबै।

सुनि गुम्‍म भऽ गेलौं। देशक दृश्‍य आँखिपर लटैक गेल। देशमे कियो भरि दिन भोग करै पाछू बेहाल अछि, तँ कियो जानक कीमतपर दुरगन्‍ध मौसक पाछू बेहाल अछि। हाय रे हाय..!

हमरा गुम्‍म देख ओ बाजल-

कोन गाँ रहै छी?”

कहलिऐ-

बेला रहै छी।

कनी मन पाड़ि पुन: पुछलक-

रौदी तीयरकेँ चिन्‍है छिऐ?”

कहलिऐ-

ममियौत भाइक गामक लोककेँ किए ने चिन्‍हबै। गाम की कोनो शहर-बजार छी जे अपनो समांग देख कऽ मुँह घुमा लेत।

ओ साढ़ू छिआ।

भैयारीए जकाँ अछि।

भैयारी नाओं सुनि बाजल-

तब केना जाए देब। गरीब छी तँए इज्‍जत नै अछि। एहेन शि‍कार केलौं आ अहाँ चलि जाएब। साढ़ू की कहता। हुनका पता लगतैन‍ तँ नै कहता जे खाइ डरे समाजसँ मुँह चोरबै छी। एकर मौस बड़ सुअदगर होइए, जहिना अण्‍डाएल रोहू, तेलाएल खस्‍सी होइए तहिना।

मन तँ होइए, मुदा कुसेसरक घी संगेमे अछि। ओत्तै जाइ छी।

तँ की हेतै काल्हि‍ चलि जाएब।

मने-मन डरो हुअए। तेतबेमे एक गोरे आबि कहलकै-

भोला कक्का, पेटसँ चानीक हँसुली आ पइत निकलल।

मुदा भोला लेल धैनसन। जेना कोनो नव बात नहि। मुदा मन मानलक जे भरिसक लोककेँ गिरने अछि। हमरा मुहसँ अनासुरती निकलल-

आब की करबै, एकरा?”

मौस बना, सोना कमला माइक पवित्र पानिमे धोइ लऽ जाएब। अमैनियासँ साँझू पहर रान्‍हब। झालि-मिरदंग बजा कमला माइकेँ मौस-भात-परसादी चढ़ाएब। सौंसे टोलक बाले-बच्‍चे मिलि-जुलि कऽ खाएब।

हम पुछलिऐ-

आ चमड़ाकेँ?”

कहलक-

सुखा कऽ रखि लेब। जखन बेसी भऽ जाएत तखन वेपारीकेँ खबैर देबइ। गाड़ी नेने औत, गिनती कऽ कऽ सभटा कीनि लेत।

ओहो चलि गेल आ हमहूँ दुनू भाँइ नाहपर चढ़ि विदा भेलौं।

शब्‍द संख्‍या : 2152


 

 

मातृभूमि

जिनगीक अन्‍तिम चरणमे आइ अपन मातृभूमिक दर्शन भेल। ओ भूमि जैठामसँ माए सदिछन नजैर‍ उठा-उठा देखैत रहैत, ओ प्‍यारी, सिनेही, प्रेमी, जीवन दायिनी, जीवन रक्‍छि‍नी भूमि, मातृभूमि। दर्शन पबिते कमल मन कलैप‍ उठल मुदा असीम उत्‍साहक संग उमंग संचारित भेल। काल्हि‍ धरिक जिनगी आँखिसँ छिपए लगल, ओझल हुअ लगल, मुँह नुकबए लगल। जइ दिन अपन जीवन दायिनी भूमिसँ विदा हुअ लगल रही, पूर्ण जुबा रही। नस-नसमे नव खूनक संचार होइत रहए। समुद्री जुआर जकाँ जुआनी उठैत रहए। आशा-अभिलाषाक संग पकड़ैले उत्‍साहित रहए। बाट नै‍ भेटने मातृभूमिक दर्शन लाखो कोस दूर दुर्गमे छिपल रहए। मुदा दर्शन पबिते सत्-चित्त-आनन्‍दसँ खेलैत देख‍‍, नमन केलिऐन‍।

डाक्‍टरीक डि‍ग्री प्राप्‍त करिते बिआह भेल। नीक गाम, नीक कन्‍याँ, नीक कुल-मूलक संग नीक दहेजो भेटल। केना नै भेटैत, जइ डि‍ग्रीक मांग देश-विदेशमे अछि ओइमे बेकारी केतए-सँ औत। मुदा इंजीनियर जकाँ तँ नहि, जे डि‍ग्री पेलोपर काज नहि! तइले तँ साधनक जरूरत अछि से अछि केतए?

जुआनीक उमंग उठिते गेल। संयोगो नीक रहल जे बाइस बर्खक अवस्‍थामे ओइ फ्रान्‍समे जइमे महान्-महान् दार्शनिक, तत्त्व-चिन्‍तक वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्‍यकार, देशभक्‍त जन्‍म नेने छैथ‍, काज करैक अवसर भेटल। रंगीनी दुनियाँक स्‍वर्ग, जेहेन ओतए सड़क तेहेन एतए घर नहि। बिसैर‍‍ गेलौं अपन भूमि, अपन मातृभूमि। ओना सोलहन्नी बिसैर‍‍ नै गेल रही, मुदा विचारक आलमारीक पोथीक जाकमे, तर जरूर पड़ि गेलैं। अखनो मन अछि, गामक विद्यालयक देश वन्‍दना। हृदैमे नइ पहुँचल छल गंगा सन पवित्र जलधाराक सरिता, नै जनै छेलौं माटिक सुगन्‍ध आ गाछी-बिरछीक फल-फूलक महमही...।

अनुकूल हवा पाबि मन मोहित भऽ गेल। जी तोड़ि जिनगीक पाछू पड़ि गेलौं। कर्मेसँ जिनगी तँ हमरा किए नहि। नीक स्‍तरक परिवार बनेलौं, नीक बैंक बैलेन्‍स अछि। अपनोसँ बेसी खुशी परिवारक सभ रहै छैथ। कारणो स्‍पष्‍ट अछि, बाल-बच्‍चाक जन्‍मे भेल, पत्नी अनके घरमे रहैवाली। मुदा आइ मन बेकल किए लगैए। वौराइ किए अछि? एकाग्रचित्त सभ दिन रहलौं तखन बान्‍हल मन पड़ाए केतए चाहैए? की ‘आएल पानि गेल पानि बाटे-बिलाएल पानि!’ जइ मातृभूमिक गुणगान बच्‍चा, वृद्ध सभ करै छैथ,‍ तैठाम केतए छी? बढ़ैत-बढ़ैत जहिना धन बढ़ैए, गाछ-बिरीछ बढ़ैए तहिना ने विचारो बढ़ैए। मुदा एना किए भऽ रहल अछि जे आब ऐठाम, माने पेरिसमे नै‍ रहि अपन मातृभूमिक रजकण बनब?

जहिना बाइस बर्खक वयसमे अपन गाम, समाज, भूमि-मातृभूमि छोड़ि पेरिस आएल रही, तहिना आब सभ किछु छोड़ि अपन प्रेमी मातृभूमि, सिनेही मातृभूमिक कोरामे विश्राम करब। मुदा नहियोँ बुझैत रही तैयौ अबैकाल जहिना सभसँ असीरवाद लऽ नेने रही तहिना तँ एतौसँ असीरवाद लाइए लिअ पड़त। जरूर लिअ पड़त मुदा केकरासँ? केकरोसँ नहि! एतए ने अपन गंगा-यमुनाक जलधारा, ने हिमालय-कैलाश सन पहाड़, ने गंगा-ब्रहमपुत्र सन धरती आ ने समुद्र सदृश हृदए अछि। जहिना पत्नीक संग आएल रही तहिना जाएब। जँ ओ नै जाथि तखन? ओ नै जाए चाहती तेकर कारणो तँ कहती? कहलयैन‍-

आब ऐठाम नै रहब।

पत्नी बजली-

तखन?”

कहलयैन-

अपन मातृभूमिक दर्शन भऽ गेल, ओतए जाएब।

पत्नी उत्तर देलैन‍-

सभ अपन-अपन मालिक होइए। जँ अहाँ जाएब तँ जाउ।

पुछलयैन‍-

अहाँ?”

बजली-

अपन कारोबार अछि। बेटा-पुतोहु दुनू फ्रान्‍सक भऽ गेल। दुनियाँक स्‍वर्गमे रहि रहल छी। तखन की?”

मन पड़ल ओ दिन जइ दिन जिनगीक हिसाब जोड़ि आएल रही। पत्नी संगे छेली। मुदा आइ? जुग बीत गेल। जिनका सभसँ असीरवाद लऽ आएल रही भरिसक मरि-हरि गेल हेता, गेलापर के हृदए लगौता! तखन? तखन की? किछु ने! मुदा जाधैर‍‍ पहुँचब ताधैरक तँ उपाय चाही। विदा भऽ गेलौं।

एक समुद्रसँ मिलैत दोसर समुद्रक विशाल जलराशि‍क बीच जहाजसँ मद्रास पहुँचलौं। मद्रासक बन्‍दरगाहमे उतैर अपन धरती, अपन देश, अपन मातृभूमिकेँ हृदैसँ नमन केलिऐन‍। मन पड़ल रामेश्वरम्। जखन मद्रास आबि गेल छी तखन बिनु दर्शने जाएब बचपना...। विदा भेलौं।

धरती-समुद्रक बीच बनल रामेश्वरमक मन्‍दिर। एक दिस विशाल जल-राशि‍क समुद्र तँ दोसर दिस खिलैत-इठलाइत मातृभूमि आ ऊपर शून्‍य अकास। समुद्रेक लहैरमे स्‍नान कऽ दर्शन केलौं। मन्‍दिरसँ निकैलते खौजरीपर गबैत एकटा साधुक मुहेँ सुनलौं, अवगुण चित्त न धरो। जेना भूखकेँ अन्न, पियासकेँ पानि खिहारि दैत, तहिना मनमे भेल। जलखै कऽ गाम लेल गाड़ी पकड़लौं।

जंगल, पहाड़, नदी, मैदानकेँ चिरैत गाड़ी गाम लग पहुँचल। जे गाम कहियो नन्‍दन वन सदृश सजल छल- लहलहाइत खेत, रस्‍ता-पेरा विद्यालयसँ सजल छल, धारक कटावसँ बीरान बनि गेल अछि। ने एकोटा सतघरिया पोखैर बँचल अछि आ ने पीपरक गाछक निच्‍चाँ विद्यालय। घराड़ी, खेत बनि गेल अछि आ पोखैर-झाँखैर घराड़ी। मुदा तँए की, ने गामक परिवार कमल, ने लोक आ ने गामक नाओं।‍ गामक दछिनवरिया सीमापर पहुँचते एकटा नवयुवककेँ पुछलयैन‍-

बाउ, की नाओं छी, अही गाम रहै छी?”

नवयुवक बाजल-

हँ। रमेश नाम छी।

पुछलयैन‍-

गामक की हाल-चाल अछि?”

प्रश्‍न सुनि रमेश ठमैक गेल। किए नै ठमकैत। नमती भलेँ नै बढ़ल हुअए मुदा रंग आ चौराइ तँ जरूर चतरिये गेल अछि। भरिसक चेहरा देख डरा गेल अछि। मुदा डर तँ ओतए बढ़ैए जेतए डरनिहारकेँ आरो डेराएल जाइत। से तँ नइ अछि। मधुआएल मन मुस्‍कियाइत मुँह खोलि निकलल-

बौआ, चालीस बर्ख पूर्व अही माटि-पानिक बीच डाक्‍टर बनि विदेश गेलौं...।

मधुर बोली सुनि रमेश बाजल-

गाममे के सभ छैथ‍?”

कहलिऐ-

कियो नहि। जेहो हेता, हुनको छोड़ि देलिऐन‍। जखन छोड़ि देलिऐन‍ तँ वएह किए पकड़ता।

रमेश पुछलक-

रहबै केतए..?”

बजलौं-

सएह गुनधुनमे छी।

रमेश कहलक-

हम तँ महींसवारि करै छी, आन किछु जनै नै छी। चलु वस्‍तीपर पहुँचा दइ छी।

वस्‍तीपर पहुँचा रमेश घुमि गेल। हम ठमैक गेलौं। तैबीच नजैर पड़िते पूबारि भागक घरवारी ओत्तैसँ पुछलैन‍-

केतए जाएब?”

कहलयैन-

ब्रह्मपुर।

घरवारी कहलैन‍-

ब्रह्मपुर तँ यएह छी। एमहर आउ।

मनमे सबुर भेल। हूबा बढ़ल। अपन गामक चालि बढ़ल। लफैर कऽ दरबज्‍जापर पहुँचलौं। घरवारी कहलैन‍-

थाकल-ठेहियाएल आएल छी, पहिने पएर धोउ। चाह बनौने अबै छी, ताबत कपड़ा बदैल‍‍ अराम करू। आइ भरिक तँ अभ्‍यागत भेलौं, काल्हि‍क विचार काल्हि‍ करब।

कहि आँगन जा चाह अनलकैन। दुनू गोरे चाह पीबैत रही, कहलयैन-

हमहूँ अही गामक वासी छी। नोकरी करए बाहर गेल रही। अपन घराड़ियो अछि आ दस बीघा चासो।

ओ बजला-

हमहूँ आने गामक वासी छी। नानाक दोखतरीपर छी। तँए, ने गामक आँट-पेट जनै छी आ ने पुरना लोक सभकेँ जनै छिऐन।

कहलयैन‍-

हम डाक्‍टर छी।

ओ बजला-

तखन तँ गामक देवते भेलौं। जाबे अपन ठर नै बनि जाइए ताबे एतै रहू। अतिथि-अभ्‍यागतकेँ खुऔने आरो बढ़ै छइ।

ठौर पाबि मन खुशी भेल। जीबैक आशा देख पत्नीकेँ फोन लगेलौं-

हेलो..

पत्नी उत्तर देलैन‍-

हँ, हँ, हेलो।

कहलयैन‍-

गामसँ बजै छी। पुन: घुमि कऽ पेरिस नै आएब। अहूँ जँ आबए चाही, तँ चलि आउ।

पत्नी कहलैन‍-

चूक भेल जे संगे नै गेलौं। जाधैर‍‍ अहाँ छेलौं ताधैर‍क आ अखनमे जीवन-मृत्‍युक अन्‍तर आबि गेल अछि।

कहलयैन‍-

जखने मन हुअए तखने चलि आएब।

ओ बजली-

फोन रखै छी..?”

शब्‍द संख्‍या : 1048


 

 

भबडाह

चहकैत चिड़ै सबहक चलमली कानमे पड़िते नित्‍यानन्‍द कक्काक नीन छिटैक गेलैन‍। कोनो काज करैसँ पहिने तर्क-वितर्क ओहने महत रखैत जेहेन निरजन आँखिए दिनमे चलब होइत। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल नजैर‍ आजुक समैपर गेलैन‍। काल्हि‍ शनि, राखी पाबैन छी। परसू रबि, विदेश्‍वर स्‍थानमे ठसम-ठस मेला हएत। हएबो उचित, एक तँ बैद्यनाथ बाबा सौनक पूर्णिमा विदेश्‍वरमे बीतबै छैथ‍, दोसर कमलो उमड़ल अछि, एक संग दुनू काज...।

भैयारी रहितो जहिना भविसद्रष्‍टा युगद्रष्‍टासँ ऊपरक सीढ़ी होइत, तहिना ने औझुकेपर काल्हि‍ ठाढ़ होएत। काल्हुक सुरूज केहेन उगत ई तँ प्रश्‍न अछिए। चारिम दिन पनरह अगस्‍त छी, भारतक स्‍वतंत्रताक चौसैठम वर्षगाँठ। साठि बर्खक उपरान्‍त अनाड़ियो-धुनाड़ी लोक वरिष्‍ठ नागरिकक उपहार पबैत तेहेन ठाम स्‍वतंत्रता की आ देश केतए! मुदा लगले मन घुमि गाम दिस बढ़लैन‍। हिन्‍दु-मुसलमानक गाम। एक पनरहियासँ जहिना हिन्‍दु राधा-कृष्‍णक झूलासँ लऽ कऽ भोला बाबाक जलढरीमे व्‍यस्‍त तहिना मुसलमानो दस दिन ऊपरेसँ रोजा-नवाजमे व्‍यस्‍त...। एको पाइ लोक नै बँचल जे धर्मक काजमे नै लागल हुअए। सभ धर्मक काजमे हृदैसँ जुटल...। जखन सोलहन्नी लोक पवित्र मने धर्मक काजमे जुटले छैथ‍ तखन निसचित गामक कल्‍याण हेबे करत..!

प्रेमिकाक आगू जहिना प्रेमी दुनियाँकेँ निच्‍चाँ देख ऊपर भ्रमण करैत तहिना नित्‍यानन्‍द कक्काक मन कल्‍याणक संग टहलए लगलैन‍। उत्‍साह जगलैन‍! फुरफुरा कऽ ओछाइनसँ उठि कलपर जा माटिये-सँ चारि घूसा दाँतमे लगा, आँगुरेक जीभिया कऽ हाँइ-हाँइ चारि कुर्ड़ा मारि, चारि घोंट पानियोँ पीब लेलैन‍। आ आँखि उठा बाड़ी दिस तकला तँ पत्नीकेँ मचानपर चठैल तोड़ैत देखलैन‍। आँखि उतारि गाम दिस विदा भेला।

दरबज्‍जापर सँ आगू बढ़िते हियौलैन‍ तँ बुझि पड़लैन‍ जे घर-दुआर छोड़ि लोक चौके दिस आबि गेल हेता, तँए नीक हएत जे चौके दिस जाइ। यएह सोचि नित्‍यानन्‍द काका आगू बढ़ैक विचार केलैन‍। डेग उठिते मन सिहरलैन‍। भाए-बहिनक ओहन पर्व काल्हि‍ छी जइमे दुनूक प्रगाढ़ प्रेमक सिनेह-सिक्‍त जलक उदय हएत। आशाक संग जिनगीक बिसवासो जगलैन‍। डेग बढ़ौलैन‍। 

पनरह-बीसटा डम्‍हाएल चठैल खोंइछामे नेने सुचिता काकी मुस्‍की दैत, गदगद होइत जे महिना दिन तँ चलबे करत, तेकर पछाइत‍‍ ने दौंजी हएत। सालमे जँ एक्को पनरहिया चठैलक तरकारी खा लेब तँ की चीनियाँ बिमारी हएत। लफड़ल आबि पछबरिया ओसारपर सूपमे चठैल उझैल पुतोहुकेँ पुछलखिन-

कनियाँ, दोकानोक काज अछि?”

डि‍ब्‍बा-डुब्‍बी हड़बड़बैत पुतोहु कहलकैन-

हँ।

की सभ लेब?”

नोन, हरदी।

पुतोहुक साँस सुचिता काकीकेँ किछु गर्म बुझि पड़लैन‍। मुदा तेकरा अनठा देलखिन। मनमे उठि गेलैन- नोनक पौकेट दस रूपैआमे देत, हरदियो की‍ कोनो सस्‍ता अछि। ओकरो पौकेट दस रूपैआसँ कममे कहाँ दइ छइ। हाथमे तँ पनरहेटा रूपैआ अछि। केना दुनू चीज लेब? मन फुनफुनेलैन‍। बड़बड़ाए लगली-

“केहेन बढ़ियाँ खुदरा-खुदरी नून बिकाइ छेलै, जेतबे जेकरा सकरता रहै छेलै से तेतबे लइ छेलए। आब तँ तेहेन पोलिथिनक पौकेटमे रहैए जे कमो रहत तँ बनियाँ कहत जे घमि गेल हएत। खाएर एक चुटकी नूने ने कम देत। एक-ने-एक दिन सैरियत दिअ पड़तै।”

जहिना बच्‍चा लगले कनैए, लगले हँसैए तहिना सुचिता काकीकेँ मन लहरए लगलैन‍। लहरैत मन कहलकैन- जे नून हाथीकेँ गला दइए ओ प्‍लास्‍टि‍ककेँ की नै गलबैत हएत। आब की कोनो नून खाइ छी आकि प्‍लास्‍टि‍कक रस पीबै छी। हे भगवान! तोरे हाथ-बाठ छह। जेते दिन जीबए दैक हुअ से जीबह दिहह, नै जे लऽ जाइक हुअ तँ लऽ जहिहह। कहू जे प्‍लास्‍टिकेक कलमे पानि पीबै छी, दोकानक चीज-बौस अनै छी, खाइ-पीबैक समान रखै छी। जूत्ता-चप्‍पल, कपड़ा-लत्ता पहिरै छी...।

मुदा लगले मन पुतोहु दिस घुमलैन। कहू जे चारिटा गाछ घरोक दावापर हरदी रोपि लेब तँ साल भरि कीनए पड़त। जाबे माल-जाल नै छेलए ताबे बाड़ी-झाड़ी करै छेलौं। आब तँ मालोक नेकरमसँ नहाइयो-खाइयोक पलखति नै होइत रहैए। कनियाँ सहजे‍ कनियेँ छैथ। कोनो लूरि-ढंग बाप-माए सिखा कऽ पठौलखिन आकि सोल्‍होअना सासुरे भरोसे छोड़ि देलखिन। मुदा गलती बुड़होक छैन‍। कोन दुर्मतिया चढ़ि गेलैन‍ जे चरिकोसी पारक पुतोहु उठा अनलैन‍! एकेटा वस्‍तुक चरि-चरि, पँच-पँच तरहक विन्‍यास बनैए, जरूरतक हिसाबसँ रूप बदैल‍‍ उपयोग होइत। तैकालमे कहती जे खाली अल्‍लूक, तरुआ, भुजुआ, भुजिया टा बनबैक लूरि अछि..!

अपसोच करैत सुचिता काकी बजली-

जा हे भगवान! जे पुत हरवाहि गेल देव-पितर सभसँ गेल! कोनो मनोरथ रहए देलह! जखन मनोरथे नै तखन सतयुग, त्रेता, द्वापरे की‍!”

तैबीच मोख लागल ठाढ़ पुतोहु बजली-

आइ शुकरवारी छिऐ। जखन चौक दिस जाइते छैथ‍ तँ अंगुरो आ केरो फलहार-ले नेने अबिहैथ।

पुतोहुक बात सुनि सुचिता काकी छगुन्तामे पड़ि गेली। मनमे हुअ लगलैन जे एक हजार बात एक्केबेर कहि दिऐन‍ मुदा केतौ-केतौ नहियोँ टोक देब नीक होइत अछि। तँए, किछु बजैसँ काकी परहेज केली। मुदा, जहिना आगिपर चढ़ल पानिक बरतनमे ताउ लगिते तरसँ बुलकारा उठए लगैत तहिना मनमे उठए लगलैन‍। कहू जे अखन पनपिआइक बेर छै, पहिने तेकर ओरियान कऽ पुरुख-पात्रकेँ खुआएब, अपनो खाएब आकि सौझुका फलहारक ओरियान करब। बीचमे कलौ सेहो अछिए। भगवानो टेबिये कऽ पुतोहु देलैन‍। एहेन-एहेन गिरथानि बुते केते दिन घर-परिवार चलत..?

काकीकेँ चुप देख पुतोहु दोहरबैत बजली-

नइ सुनलखिन। जखन चौक दिस जेबे करती तँ अंगुरो आ केरो नेनहि अबिहैथ।

पुतोहुक बात सुनिते काकीक मनमे जेना तरंग उठलैन‍, तहिना तरैंग‍ कऽ बजली-

अहाँ सभ कोन उपास करै छी जे सहैसँ पहिने‍ फलहारेक ओरियान करए लगै छी। कहुना-कहुना तँ सातटा हरिबासय केने छी। कहाँ कहियो पहिने फलहारेक ओरियान करै छेलौं।

शब्‍द-वाण जकाँ सासुक बात पुतोहुक हृदैमे लगलैन‍। तीर बेधल चिड़ै जकाँ छटपटाइत पुतोहु बजली-

अपना जे मन फुरै छैन सएह करै छैथ‍ से बड़बढ़ियाँ मुदा हमरा बेरमे भबडाह हुअ लगै छैन!”

भबडाह सुनि काकियोक मन बेसम्‍हार भऽ गेलैन‍। कहलखिन-

कनियाँ, हम भबडाहि नै छी जे केकरोसँ भबडाह करब। आँखि तकै छी तँए चिन्‍ता अछि। अखने आँखि मूनि देब, घर सम्‍हारए पड़त तखन अहूँ यएह बात बुझबै।

भण्‍डार कोणक जेठुआ गड़े जकाँ दुनूक बीच रसे-रसे अन्‍हर-विहाड़ि उठए लगल। कियो पाछू हटैले तैयार नहि। दुनूक सीमा-सरहद टुटि-एकबट्ट भऽ गेल। एक्के-दुइए धियो-पुतो आ जनीजातियो सभ आबए लगली। आँगन भरि गेल।

चौकसँ किछु पाछूए नित्‍यानन्‍द काका रहैथ‍ कि मनमे उठलैन‍, चौरंगी हवा बहैक समए अछि। कखन कोन हवा केमहरसँ उठत आ घर-दुआर खसबैत केमहर मुहेँ चलि जाएत तेकर ठेकान नहि। ठोर बिदैक गेलैन‍। हुलकी दैत मुस्‍की बहरेलैन‍-

एह, अजीब-अजीब करामाती मनुखो सभ भऽ गेल। कनियेँ गलती विधातोक भेलैन‍ जे सींग-नाँगैर काटि लेलखिन।

तहीकाल लॉडस्‍पीकरक अवाज नित्‍यानन्‍द कक्काक कानमे पड़लैन‍। राधा-कृष्‍ण मन्‍दिरपर झूला चलि रहल अछि। अवाज सुनि मन पसीज गेलैन‍। सौन मास। सुहावन। मन भावन। विशाल वसुन्‍धरा, रंग-रंगक वस्‍त्र पहिर मधुमय वातावरणक बीच, बिहुँसि रहल अछि। कृष्‍णक कदम-सँ-कदम मिलबैत राधा बिहुँसैत झूला झूलए कदमक गाछ दिस जा रहल छैथ। असीम उल्‍लास। अदम्‍य साहस दुनूक बीच। कातेसँ गाछमे गोल-गोल, लाल-पीअर झुमका लगल फल-फूलसँ लदल देख राधा कृष्‍णकेँ पुछलखिन-

डोरी लगा डारिमे झूला लगाएब आकि डारियेपर बैस झूलब?”

राधाक प्रश्‍न सुनि कृष्‍ण आँखियेक इशारासँ उत्तर देलखिन-

जेहेन समए तेहेन काज।

चौकक गनगनाइत अवाज, नित्‍यानन्‍द कक्काक धियान अपना दिस खिंचलकैन‍। तखने एकटा नवयुवककेँ स्‍कूलमे भेटल बहिनक साइकिलपर जाइत मुहसँ- ‘रेशम की डोर’ गुनगुनाइत सुनलैन‍।

चिप्‍पी सजल विदेशी वस्‍त्रमे डुमल युवक। जहिना दिन-रातिक मध्‍य जाड़-गरमीक मध्‍यक संग जिनगियोक मध्‍य मधुआएल होइत तहिना कक्काक मनमे भेलैन‍। युवककेँ पुछि देलखिन-

बाउ, परिवारमे के सभ छैथ‍?”

युवक कहलकैन-

बाबा, हिनका सबहक चरणक दयासँ सभ छैथ। माइयो-बाबू आ दूटा बहिनो अछि। एक बहिन सासुर बसैए, जेतए जा रहल छी आ दोसर पढ़ैए। सोलहम बर्ख छिऐ। दू-तीन साल बाद बिआहो करब।

काका पुछलखिन-

अपने?”

युवक कहलकैन-

बाबा, ई देवतुल्‍य छैथ, झूठ नै बाजब। अपना खेत-पथार नहियेँ जकाँ अछि मुदा खेतबला सभकेँ बाहर गेने बँटाइ खेत पर्याप्‍त अछि। एक जोड़ा बरद रखने छी। बाबू-माए खेते-पथारमे खटै छैथ, अपने बम्‍बइमे रहै छी।

काका पुछलखिन-

राखी पाबैन तँ काल्हि‍ छिऐ, आइए किए जाइ छी?”

युवक कहलकैन-

साल भरिपर बम्‍बइसँ एलौं हेन। एको दिन पहिने जँ बहिनक ऐठाम नै जाएब, से केहेन हएत? भगिनो-भगिनी-ले आ बहिनो-बहनोइ-ले सालो भरिक कपड़ा नेने जाइ छिऐन। काल्हि‍ बेरमे घूमब तखन छोटकी बहिनक हाथे राखी पहिरब। अच्‍छा अखन जाइ छी बाबा। काल्हि‍ फेर घुमती बेर भेँट करब।

काका कहलखिन-

काजे जाइ छी। जाउ?”

जेना-जेना ओ युवक साइकिलसँ आगू बढ़ल जाइत तेना-तेना नित्‍यानन्‍दो कक्काक मन दौड़ए लगलैन‍। मनमे एलैन‍ पैछला सालक मोबाइलिक घटना। कनी मन खुशी भेलैन‍। बुदबुदेलैथ-

अजीब-अजीब मदारी सभ अछि। गड़ लगा-लगा नचबैए।

मन रूकलैन‍। पहिनेसँ ने लोक किए बुझैए जइसँ एहेन-एहेन घटनाकेँ बढ़ैये ने देत। मुदा मन ठमकलैन‍। घटना भेल। राखी पाबैन दिन, दस बजे रातिमे बम्‍बैसँ एक गोरेकेँ मोबाइलसँ समाचार आएल जे बौआ सबहक हाथक राखी जल्‍दी खोलि दियौ नै तँ अनहोनी घटना हएत! एमहर मुहेँ-मुँह समाचार पसरब शुरू भेल, ओम्‍हरसँ मोबाइलिक समाचार दिल्‍ली, कलकत्ता, बंगलोर इत्‍यादिसँ अकासमे गनगनाए लगल। हाँइ-हाँइ राखी हाथसँ उतरए लगल। भरि रातिक हलचल दिनक दस बजे धरि चलिते रहल। राति भरिक नीनो दिनेमे वौआ गेल। मुदा दस बजेक पछातिक तीखर रौद पाबि वातावरण शान्‍त भेल।

नित्‍यानन्‍द काकाकेँ मनमे उठलैन‍ बाल-बच्‍चाक संग माए-बापक सम्‍बन्‍ध? ओतए केना मनुखक वंश आगू मुहेँ ससरत जेतए माइए-बाप दुश्‍मन बनि ठाढ़ भऽ रहल अछि? तहूमे जिनगीक अन्‍तिम बेलामे नहि, उदयक तीनियेँ मासमे हथियार लऽ आगूमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि..!

मन तुरछए लगलैन‍। थूक फेक मन हल्लुक केलैन‍। मन पड़लैन‍ भाए-बहिनक ओ पुरान बात। भाए बहिन ऐठाम पहुँचल तँ बहिन भायकेँ कहलकैन‍- भैया जखन अकासक डगर उत्तरे दछिने हएत तखन आएब। मन पड़िते उठलैन‍ सालो भरि तँ प्राकृतिक संग खेल होइते रहैए‍, जिनगीसँ केतेक लग धरि सम्‍बन्‍ध बनि सकैए, तेतबे ने?

जेना मेघौनमे हवाक सिहकी लगने घुसकैत-फुसकैत तहिना नित्‍यानन्‍द कक्काक मन घुसकलैन‍। देखलैन‍ जे चकेबा कोन तरहेँ बहिन समाकेँ जरैत वृन्‍दावनमे संग दऽ रहल छैथ। जे मनुख चित्ती-कौड़ी फेक नागसँ दोस्‍ती करैत बाघ, सिंह आ भाउल सहित गाए, महींस तथा बकरीक संग मुनियासँ हंस धरि प्रेमसँ एकठाम रहैत ओकरा मनुखसँ एते घृणा किएक छइ। जहिना धी-जमाए-भगिना लेल कहल जाइत, ओइमे कियो अपन नहि। तहिना भाए-बहिनकेँ महींसक सींग सदृश कहल जाइत। एक जातिक संहार कऽ बगीचाक काँट हटाएब कहल जाइत अछि। मन तरैंग गेलैन‍।

तखने एकटा बेदरा आबि कहलकैन‍-

बाबा, अँगनामे बिर्ड़ो उठल अछि।

बेदरासँ किछु पुछब नित्‍यानन्‍द काका उचित नै बुझलैन‍। उड़ैत अकासमे कौआ अपन टाँहि थोड़े दोहरबैए। ओ तँ समैक घड़ी छी।

..मन आँगन पहुँचलैन‍। पत्नीपर नजैर‍ पड़िते विचार उठलैन‍। झगड़ी आकि रगड़ी ओहो छैथ। बुढ़ भेलौं, एतबो होश नै रहै छैन‍। होशो केना रहतैन‍ जइ परिवारकेँ फुलवाड़ी सदृश जिनगीक कमाइसँ बनौने छैथ तेकरा जँ कियो उजाड़ए चाहत से केना उजाड़ए देथिन। मुदा रगड़ी रहितो एकटा गुण तँ छैन्‍हे‍ जे ने रग्‍गड़ ठाढ़ करैमे देरी लगै छैन आ ने सीढ़ीक भीतर फरियबैमे।

..नजैर‍ पुतोहु दिस बढ़लैन‍ अजीब-अजीब लोको सभ फड़ि गेल। कहत जुगे बदैल‍‍ गेल। मुदा की‍ जुग बदलल से कहबे ने करत आ कहत जे जुगे बदैल‍‍ गेल! तहमे तेहेनठाम देखाएत जे अनेरे देहमे झड़क उठत। सासुकेँ उनटा-पुनटा पुतोहु कहथिन तैकाल जुग बदैल‍‍ गेल। मुदा सासुक लगौल फुलवाड़ीकेँ केते समृद्ध बनेलौं तइ काल..? जहिना अपन बाप-माए लगसँ कानि कऽ एलौं तहिना अहू परिवारकेँ कनाएब! अनठा कऽ नित्‍यानन्‍द काका चौकपर पहुँचला।

चौकपर पहुँचते चाहक दोकानमे गदमिशान होइत देखलैन। चाह पीबनिहार अपना धुनिमे आ दोकानदार अपन धुनिमे। चाहबला आगि-अगोंरा होइत जे सभटा फोकटिया आबि बैस पूजी बुड़बै पाछू अछि। गिलासपर गिलास चाह ढारने जाइए आ पाइक कोनो पते नहि!

मुदा खुलि कऽ ऐ दुआरे नै बजैत जे अखन दोकानपर सँ थोड़े चलि गेल जे बुझबै पाइ बुड़ि गेल। तँए दम कसि लिअए। ओना भीतर शंका पुन: उठि जाइ। चेहरा मिलानी करै तँ वएह चेहरा बुझि पड़ै जे अदहासँ बेसी ओहन अछि जे सौ-पचास पीब-पीब कऽ दोसर दोकान पकैड़‍‍ नेने अछि। किछु जे अछि ओकरासँ कोनो नै कोनो काज हेबे करत। तँए पहिलुके उपकार ने पछाइत‍‍ जुआ कऽ नमहर भऽ जाइए। तँए मुस्‍की दऽ दोकानदार मन माड़ि लिअए।

मुदा चाह पीबनिहारक उत्‍साह भिन्ने रहए तँए चाहबला दिस कियो तकबे ने करैत। खाली एतबे कहैत जे दूध जरा कऽ स्‍पेशल बनाएब। गप्‍पोक धारा एहेन रहै जे जहिना जुलुशमे लोक पैरमे लगैत गन्‍दगीकेँ रस्‍तापर आरो चारि बेर रगैड़‍ आगू बढ़ैए तहिना। एक संग अनेको पर्व। लोक भलेँ लोकसँ जेते हटि जाए, मुदा पाबैन थोड़े हटत। कम-बेसी भलेँ भऽ जाए। अजीब-सिनेहक संग राधा-कृष्‍ण बाँहि-मे-बाँहि जोड़ि झूला झुलै छैथ। भाए-बहिनक बीच एहेन पर्व दोसर कहाँ अछि। भरदुतिया तँ भरदुतिये छी। कमलाक जल सेहो बैद्यनाथ बाबाकेँ विदेश्‍वरमे भेटबे करतैन‍। अजीब उमंग-उत्‍साहसँ हँसिते-हँसिते महिना दिनक संकल्‍प निमाहि लइ छैथ।

नित्‍यानन्‍द काकापर नजैर‍ पड़िते प्रेम कुमार चाहेक दोकानपर सँ कहलकैन‍-

काका, एतै आउ। सभकेँ-सभ छैथ।

मुस्‍की दैत नित्‍यानन्‍द काका कहलखिन-

खाली लोकेटा नइ ने, फगुआक रमझौआ होइए। अइमे की सुनब आ की‍ बाजब। तइसँ नीक बाहरेमे आबह। चौसैठम स्‍वतंत्रता दिवसक बरखी छी, नइ पान तँ पानक डण्टियो लऽ कऽ सुआगत करबे करबैन‍।

तहीकाल अँगनाक समाचार नेने बेटा पहुँचलैन‍। हाथसँ आँखि मलि-मलि बल्‍लौसँ ललिया-करिया नोर बहबए चाहैत देख नित्‍यानन्‍द काका बेटाकेँ बजैसँ पहिनहि पुछि देलखिन-

किए मन मन्‍हुआएल छह?”

दुनू गोरे[2] अँगनामे झगड़ा करै छैथ।

झगड़ा शान्‍त करितह आकि कहए एलह?”

हमर बात के सुनत?”

मुस्‍की दैत नित्‍यानन्‍द काका घर दिस विदा भेला। जेते घर लग आएल जानि तेते झगड़ो नरमाएल जाइत रहइ। सुनै दुआरे कक्को छोटकी डेग बनबैत रहैथ‍। मुदा जहिना-जहिना डेग छोट होइत जानि तहिना-तहिना अछियाक मुरदा जकाँ झगड़ा शान्‍त भऽ गेल।

दुआरपर पहुँचते नित्‍यानन्‍द काका देखलैन‍ जे जहिना भारी काज केलापर वा रौदाएल एलापर छाहैरमे ठाढ़ भऽ नमहर-नमहर साँस लैत तहिना अँगना-दलानक कोनचर लग ठाढ़ भऽ पत्नी साँस छोड़ि रहल छैथ।

आगू आँखि उठा देखलैन‍ तँ पुतोहु थारी-लोटा मँजैबला ओचोना लग ठंठाइते साँस छोड़ि रहल छैथ। बजैत कियो नहि।

जहिना मुकदमाक खलीफा मुद्दालह बनि लड़ैमे प्रतिष्‍ठा बुझैत, तहिना दुनू गोरेकेँ देख नित्‍यानन्‍द कक्काक मनमे उठलैन‍ केकरो प्रतिष्‍ठाक सीमामे नइ जेबाक चाहिऐ।

शब्‍द संख्‍या : 2105


 

 

परिवारक प्रतिष्‍ठा

समाजमे सभकेँ छगुन्‍ता लगैत जे होइत भिनसर सौंसे गाम हड़-हड़-खट-खट शुरू भऽ जाइए मुदा कमला कक्काक परिवारमे एको दिन नै सुनै छी, तेकर की कारण? जहिना रंग-बिरंगक लोक समाजमे रहैए तहिना ने रंग-बिरंगक रोगो-बियाधि आ क्रि‍यो-कलाप रहैए। मुदा लंकाक विभीषण जकाँ यमुना काकी-कमला कक्काक परिवार केहेन हलसैत-फुलसैत कलशै छैन..!

बहुत आँट-पेटक परिवार कमला कक्काक नहि। आने परिवार जकाँ अपन दसे कट्ठा जमीन। मुदा पनरह कट्ठा बँटाइयो करै छैथ। जइसँ सहि-मरि कहुना साल लगि जाइ छैन‍। ओना, आन परिवार जकाँ धिया-पुता झमटगर नहि, सिरिफ चारिये गोरेक परिवार छैन। दू परानी अपने आ बेटा-पुतोहु। हँ! मुदा डोरामे गाँथि जहिना फूलक माला बनैत तहिना परिवारोक डोरा सक्कत छैन। अपन-अपन सीमाक बीच चारू गोरे कोल्हुक बरद जकाँ चौबीसो घन्‍टा चलैत रहै छैथ। ओना गामक अदहासँ बेसी परिवारक समांग गाम-सँ-बाहर धरि रहि परिवार चलबैत, मुदा कमला काक्काक परिवारमे के बाहर जाएत तेकर अँटाबेशे ने होइत। कमला कक्काक मनमे रहैन जे एक्केटा समांग अछि जँ ओहो बाहरे चलि जाएत तँ बेर-कुबेरमे एक लोटा पानियोँ के देत? मौका-कुमौकामे कोटो-कचहरी के करत? तेतबे नहि, जँ कहीं किष्‍कारक समए बेमारे पड़ि जाएब तँ खेती-पथारी के सम्‍हारत? जनीजाति तँ जनीजातिये होइत, खेत केना जोताएत? आ जँ खेते नै जोताएत तँ खेती केना हएत? जँ खेतीए नै हएत तँ परिवार केना चलत? अपन की आब ओ समरथाइ रहल जे बलधकेलो किछु कऽ लेब...।

जहिना कमला कक्काक मनमे अपन काजक ओझरी लगैत रहैन तहिना यमुनो काकीक मन ओझराएले रहैन। मनमे होनि जे मुँह झाड़ि पतिकेँ किछु तँ नहियेँ कहि सकै छिऐन मुदा पुतोहु लगा बेटाकेँ तँ कहि सकै छी। जखने बेटाकेँ कहबै तखने ओहो ने सुनता। कोनो की कानमे ठेकी थोड़े रहतैन‍।

रधवाक मनमे तेसरे बात उठइ जे गिरहस्‍तीक काज बेसी वरसातमे होइए। मिरगिसरा-अद्राक पानि तेहेन होइए जे हाथ-पएर सड़ा दइए। एक तँ हाथ-पएर घबाह भऽ जाइए तैपर सँ काजो बढ़ि जाइए। तइसँ नीक जे परदेशे खटब। मुदा विचार लगले रधवाक मनकेँ बदैल‍‍ दइ। बरहम स्‍थानक भागवत कथाक एकटा बात मन पड़ि जाइ। ओना सुनने रहए पनरहो दिन मुदा एक्केटा बात मन रहलै। ओ ई जे ‘माए-बापक सेवा करब बेटाक सभसँ पैघ धर्म छी।’

पुतोहु लेल धैनसन। ‘कोउ नृप हौउ हमे का हानी।’ एकटा गारजनकेँ के कहए जे तीन-तीनटा गारजनक तरमे छी। जेहने दिन तेहने राति..!

पिताक पीठपोहू बनि रधवा कमला कक्काक संग खेती-बाड़ीमे पुरैत। एते बात रधवा बुझि गेल रहए जे खेतीक भरिगर काजमे हरवाहि, कोदरवाहि आ करीनवाहि अछि। ओना, धनरोपनीमे सेहो डाँड़ दुखाइ छै तँए पिताकेँ ऐ सभ काजसँ फारकती दऽ देने रहैन। गिरहस्‍तियो तँ अमरलत्ती जकाँ सघन होइए। काजक इत्ता नहि। कलमसँ कोदारि धरिक काज। जेते समए तेते काज पसारि लिअ। तेतबे नहि, किछु काज एहनो होइत जइमे कम तरद्दुत होइत आ किछु एहनो होइत जे तीन-तीन बेर केलोपर गड़बड़ाएले रहैत। तैपर सँ मेठनियोँ बेसी। भरिगर काज रधवा सम्‍हारियो लैत रहैन तैयो कमला काकाकेँ सोहरी लागल काज रहबे करैन‍। जेते हाथ-पैरसँ करैथ‍ तइसँ कम बुधियोक नहि। महिना, ग्रह, नक्षत्रक काज सेहो रहबे करैन‍। कोन नक्षत्रक धानक बीआ निरोग होइए आ कोनमे पाड़ने कललग्‍गू भऽ जाएत, कोन नक्षत्रमे कोन चीजक बीआ पाड़ल जाएत आ कोन चीज रोपल जाएत इत्‍यादि, बारहो मासक हिसाब कण्‍ठस्‍थ रखने छैथ। जेकर खगता अखन धरि रधवाकेँ भेबे ने कएल। जेतेकाल काजमे लगल रहैत तेतबे बुझैत। बाँकी समए ने मारी माछ ने उपछी खत्ता। बिना धैन-फिकिरक वैरागी जकाँ चैनसँ रहैत। कमेनाइ-खेनाइ आ सुतनाइक जिनगी। तीनूक गतियो एकरंगाहे...।

आँगनसँ बाहरक काज जहिना दुनू बापूत कमला कक्काक बीच अड़ियाएल चलैत रहैन तहिना अँगनाक भीतरक काज दुनू सासु-पुतोहुक बीच चलैत रहैन। चूल्हि‍-चीनमार बहारब-नीपब, घर-अँगना बहारबसँ लऽ कऽ थारी-लोटा धूअब, भनसा-भात करब धरिक भार पुतोहुक ऊपर। जे पुतोहुओ आ साउसो बुझैत, तँए ने केकरो चड़ियबैक जरूरत आ ने कियो अढ़बैक आशा करैत। तहिना यमुनो काकीक काज रहैन। कोठीक अन्न केना सुरक्षित रहत, तैठामसँ लऽ कऽ माल-जालक थैर-गोबर केनाइ, घास लौनाइ धरिक। ओना किष्‍कारोक समैमे आ कटनियोँ-दौनीक समैमे गिरहस्‍ती काजमे सेहो काकी हाथ बँटबैत रहथिन।

चीनी मिलमे जहिना एकठाम कुशि‍यार बोझि‍ते, रेलबे टिकट लेनिहारक धाड़ी जकाँ रसे-रसे आगू बढ़ैत तहिना कमला कक्काक परिवार छैन। परिवारमे ने मुहाँ-ठुठी करैक कोनो जगह छैन आ ने कखनो से होइत।

ओना गाम नीचरस जमीनमे बसल तँए ऊँचरस जमीनक बारहो-बिरहिणीक खेती नै होइत। माने, भीठ जमीन नै रहने भीठक उपजो नहियेँ। जइसँ गाममे बेख-बुनियादि सेहो कम आ गाछियो-खरहोरि तहिना। तीन हीसमे बास आ एक हीसमे खेत-पथारसँ लऽ कऽ वाड़ियो-झाड़ी धरि छैन।

ओना तँ छह ऋृतु होइ छै‍ मुदा गिरहस्‍ती लेल मूलत: तीन मौसम होइत। ऋृतु दुइए मासपर बदलैत, जखन कि फसिल तीन मासक उपरान्‍ते बदलैत। किछु-किछु तीन माससँ कम्मो समैमे होइत मुदा बेसी तीन माससँ बेसीए-मे। तँए मोटा-मोटी जाड़, गरमी आ वरसाती फसिल होइत। तहूमे डन्‍डी-तराजू जकाँ वरसात डन्‍डी पकड़ने अछि आ तराजूक पलरा जकाँ जाड़-गरमी। एक-दोसराक दुश्‍मनो, किएक तँ रहत कोनो एक्केटा। सन्‍यासी जकाँ एक-दोसरकेँ नै सोहाइत। मुदा बीचमे जँ पंच नै रहत तँ झगड़ेमे दुनू लगि जाएत, आगू की बढ़त। सालक वरसाते मौसम एहेन होइत जे सालो-भरिक भाग-तकदीर निर्धारित करैत। जहिना बेसी बर्खा भेने दहार होइए तहिना नै भेने रौदी। जे दुनू, गिरहस्‍तीकेँ जान मारैए। हँ! एहनो होइए जे जइ साल समगम बर्खा भेल तइ साल सुभ्‍यस्‍त समए भेल। जइसँ निच्चाँ-ऊपर एक रंग फसिल उपजल। जहिना कृष्‍ण अर्जुनकेँ कहने रहथिन तहिना मौसमो होइए।

जइ धरतीपर गंगा, सरस्‍वती आ यमुना सन धार एकठाम मिलि कुम्‍भ सजबैए‍ तैठाम दिन-दहार हत्‍या, बलात्‍कार अपहरण हुअए, बिनु बुधिक लोकक भरमार लगल रहए, मनुखकेँ मनुख नै बुझल जाए, तखन तीनूक संगमक कोन उपकार? नमगर-चौड़गर आँट-पेटक तीनू धार जे हँसैत-झि‍लहोरि खेलैत समुद्रमे समाहित होइत, तैठाम..?

हमरा सभकेँ ईहो नै ओझल रखक चाही जे एकैसम सदीक स्‍वतंत्र प्रजातंत्रक बीच बास करै छी। अखन धरिक इतिहासमे एते सक्षम मनुख ऐ धरतीपर नै भेल छल। तँए, दायित्‍व बनैए जे युगक संग पकैड़‍‍ युग-युगान्‍तरक धाराकेँ स्‍वच्‍छ बना चलए दिऐ। काल मनुक्‍खेटा केँ नहि, सभ किछुकेँ प्रभावित करै छइ। जखने सभ किछु प्रभावित हएत तखने जीवन-पद्धतिमे धक्का लगत। ओइ धक्काकेँ निष्‍क्रिय करैले जीवन-शैलीमे बदलाव आनए पड़त। जहिना बीतल युग तहिना बदलल। माने सत्‍युगमे जे क्रि‍या-कलाप छल ओ त्रेतामे आबि सुधरल, जइसँ बदलाव आएल, युग-परिवर्त्तन भेल। तहिना त्रेतासँ द्वापर भेल। तँए जरूरी भऽ गेल अछि जे समयांकन इमानदारीसँ हुअए।

कहैले तँ कमला काका परिवारक गारजन छैथ‍ मुदा अँगनाक सीमासँ अपनाकेँ बाहरे रखने छैथ। खेतक उपजावारी बाधसँ आनि पत्नीकेँ सुमझा दइ छथिन। यमुनो काकी कि आब नव-नौतारि छैथ‍ जे परिवारक धक्का-पंजा नै बुझथिन। जिनगीक धक्का-पंजा जीबैक बहुत किछु लूरि सिखा देने छैन‍।

सुभ्‍यस्‍त समए भेने काकीक मनमे खुशीक कोढ़ी शुरूहे आद्रा नक्षत्रमे जे पकड़लकैन‍ से बढ़ैत-बढ़ैत अगहनमे भकरार भऽ फुला गेलैन‍।

धान दौन होइते, आने साल जकाँ यमुना काकी उसनियाँ करैसँ पहिने‍ उपजाक हिसाब बेटो-पुतोहु आ पतियोक कानमे दऽ देब, आने साल जकाँ नीक बुझलैन‍। मने-मन बुदबुदेली-

केते धान भेल, तेकर केते चाउर हएत आ केते दिन चलत?”

केते दिन चलतमे ओझरी लगि गेलैन‍। लोकक पेटक कोनो हिसाब अछि, देखैमे ने बिते भरिक बुझि पड़ैए मुदा हाथियो खा-पी कऽ पचा लइए‍। फेर मन घुमलैन‍। जखन अपने परिवारक बात अछि तखन एना अग्‍गह-विग्‍गह किए सोचै छी? देखले परिवार नपले सिदहा। मुदा लगले यमुना काकीक मन आगू घुसैक गेलैन‍। आन-आन परिवार जकाँ तँ अपन परिवार नै अछि। आन-आन परिवारमे आनो-आनो उपाय छै मुदा अपना तँ से नइ अछि। लऽ दऽ कऽ खेतियेक आशा अछि। तहूमे एते दिन घटबी पुरबैले गाम-गाम महाजनो छेलै मुदा आब तँ ओहो नइ अछि। ने ओ देवी आ ने ओ कराह। महाजनी मरैक कारणो भेल। राजे रोग जकाँ ने बाढ़ियो-रौदी छी। जे जेहेन अछि तेकरा तही रूपे पकड़ै छइ। माने जे जेते कम आँट-पेटक ओकरा ओते कम आ जे जेते नमहर ओकरा ओते बेसी नोकसान करै छइ। तैसंग ईहो भेल जे गामक लोक बाहरसँ सेहो कमा-कमा आनए लगल। जइसँ महाजनीक बीच रोड़ा अँटकल। ओना बहरबैयो बाहरक बहुत बात तँ नहियेँ बुझैत मुदा जिनगीक किछु बात तँ जरूर बुझए लगल। नै बुझैक कारण रहै जे पढ़ल-लिखल नै रहने एको गोरेकेँ ने बैंकक नोकरी रहै आ ने करखन्नाक ऑडि‍टरी। जैठाम धनक कँकोड़बा बिआन होइत से कियो ने बुझैत। मुदा रिक्‍शा चलौनिहार, ठेला ठेलनिहार, गोदाममे बोरा उठौनिहारकेँ लगक महाजनसँ भेँट जरूर भेलइ। जहिना छोट बच्‍चा हाथक ओंगरी मुँहमे लैत-लैत बाँहियो पकड़ए लगैत तहिना खुदरा महाजन लग एने भेल। ओना छोट महाजनी रहने साले भरिक लेन-देन चलैत मुदा पच्‍चीस हजारक सहयोगी तँ भेटल। बेटा-बेटीक बिआह, घर-घरहट आ बर-बिमारीक आशा तँ भेटल। गामक महाजनीसँ सूदियो छोट। जेतए आसिन-कातिकक कर्ज एक्के-दुइए मासमे सवैया-डेढ़िया वृद्धि‍ करैत तैठाम दस प्रतिशत बियाजक बदला पच्‍चीस प्रतिशत दिअ पड़ैत, तेतबे ने। मुदा तैयो तँ असाने भेल। दोसर ईहो भेल जे आध-मन, एक-मन कर्ज लेल जे भरि-भरि दिन साबेक जौरी खर्ड़ए पड़ै छल सेहो बन्न भेल।

दुनू बापूत–कमलो काका, रधवो–केँ यमुना काकी बुझबैत कहलखिन-

एते धान भेल। एकर एते चाउर हएत आ एते दिनक पछाइत‍‍ फेर ऐगला अन्न हएत। एते दिनमे एते साँझ भेल, एतेटा आश्रम अछि। दिनमे एते सिदहा लगैए।

यमुना काकीक हिसाब सुनि कमला काका विचारक दुनियाँमे वौआ गेला। जेहो सुनलैन‍ सेहो रसे-रसे बिसरए लगला आ जे नै सुनलैन‍ से तँ नहियेँ सुनलैन‍।

अपन प्रस्‍तावक अनुमोदन लेल यमुना काकी आँखि नचबए लगली। नचैत आँखि कखनो पतिपर तँ कखनो बेटापर दैथ। आ उनैट‍ कऽ जखन पाछू तकैथ तँ टाटक अढ़मे बैसल पुतोहुपर नजैर पड़ि जाइन। सभ अपने-अपने दुनियाँमे वौआइत...।

अपन प्रस्‍तावक उत्तर नइ पाबि यमुना काकी फेर दोहरबैत बजली-

अखन सोचै-विचारैक समए अछि, तँ कियो कान-बात नै दइ छिऐ आ जखन बेर पड़त तखन थुक्कम-थुक्का करैत घि‍नमा-घीन करब!”

यमुना काकीक करुआएल बात सुनि कमला कक्काक भक्क खुजलैन‍। मनमे उठलैन‍ जे मुहोँ चोरौनाइ नीक नहि। बजला-

खेतसँ खरिहाँन आनि तैयार कऽ आँगन पहुँचा देलौं, आबो हमरे काज अछि। आकि ओकरा उसनब, रौद लगा कोठीमे राखब। की सेहो पुरुखे भरोसे छी।

कक्काक उत्तरसँ यमुना काकीकेँ घरक लक्ष्‍मी मन पड़लैन‍। खुशीसँ मन नाचि उठलैन‍। मुदा लगले, जेना घुरमी लगैए तहिना लगि गेलैन‍। बजली-

जोड़ भरि धोती आकि जोड़ भरि साड़ी तँ कियो साले भरि ने पहिरत। साल भरिक पछाइत‍‍ ओ थोड़े पहिरै-जोकर रहै छइ। एकर अर्थ ई नइ ने भेल जे वस्‍त्रक जरूरत मेटा गेल, साल भरि लेल मेटाएल, तोहूमे केते बिहंगरा अछि। कहीं चोरिये भऽ जाए आकि हेराइए जाए, आकि कुत्ते-बिलाइ दकैर दइ, आकि आगिए-छाइक प्रकोप भऽ जाइ।

यमुना काकीक बात सुनियोँ कऽ कमला काका अनठा देलैन‍। चुप भऽ गेला। मुदा मनमे ओंढ़ मारए लगलैन‍ जे माए-बापक अछैत बेटा-पुतोहुकेँ परिवारक चिन्‍ताक उत्तरी पहिराएब उचित नहि। ओना, काजक ढंग ओहन सिखा देब नीक, जइसँ जिनगीमे कहियो चिन्‍ता नै सतबै।

आगूमे बैसल रधवा, जेना संस्‍कृत आकि अंग्रेजी सुनि कोनो बच्‍चाकेँ होइत, तहिना सुनबे ने केलक। मुदा तैयो रधवाक मनमे घुरिआइ जे जे-गति सबहक हेतै से हमरो हएत। तइले अनेरे माथ-कपार पीटब आकि धुनब नीक नहि। रमरटियासँ खढ़कटिये नीक..! भरमे-सरम रधवा चुपे रहल।

मुदा अढ़मे बैसल पुतोहुक मन बजैले लुस-फुस करैत। लुस-फुस करैक कारण जे के नै घर आकि गामक मुख्‍यि‍यारी चाहैए? मुदा वेचारीकेँ कोनो एहेन गड़े ने भेटैत जे किछु बजितैथ। एक तँ नव-नौतुक कनियाँ, दोसर नैहरोमे माए भानसे-भात करैक लूरिटा सिखौने। घरक जुति-भाँतिक कोनो लूरि सीखेबे ने केलकैन। केना सीखेबो करितैथ‍? सभ गाम आ सभ परिवारमे किछु-ने-किछु भिन्नता होइते छइ। जहिना कोनो नट ओहने बोल्‍टमे नीकसँ लगैत जे समतुल्‍य रहैए। परिवारो तहिना ने होइ छइ। माइए-बापक परिवार जकाँ साउसो-ससुरक परिवार हएत, से कोनो जरूरी नहि। चाहियो कऽ वेचारी किछु ने बाजि सकल...।

ओना धानक ढेरी देख कमला कक्काक मन उमड़ैत रहैन। जहिना पानिमे भीजने किताबक पन्ना एक-दोसरमे सटि जाइए तहिना कमलो काकाकेँ, परिवारक सभ हृदैमे सटि गेलैन‍। मन उमैड़ आगू बढ़लैन‍। पतिकेँ रहैत जँ पत्नीकेँ वा बाप-माएकेँ रहैत बाल-बच्‍चाकेँ कोनो तरहक चिन्‍ता-फिकिर हुअए, तँ जरूर केतौ-ने-केतौ माए-बापक दोख छिपल अछि। मुदा दोखक कारण मनमे एबे ने करैन‍। ओछाइनपर जहिना नीन नै एने कछमछी लगैत तहिना कमला कक्काक मन कछमछाइत रहैन। मुदा लगले, जहिना सुतली रातिमे ओछाइनपर सूतल माएकेँ देख जागल बच्‍चा सूति रहैत तहिना कमलो काका केलैन‍।

पतिकेँ शान्‍त देख यमुनो काकी असथिर भऽ गेली। मनमे उठलैन‍ जे चारि गोरेक आश्रममे तीन गोरे तँ एक्के परिवारक छी, खाली कनियेँटा ने अखन दस-आना छह-आनामे छैथ। ओहो दू-चारि सालमे रिताइत-रिताइत रिता जेती। मुदा अखन तँ नैहरेक चालि-ढालि छैन‍। अखन थोड़े ऐ घरक तीत-मीठ पचौती। नैहर गेलापर जखन सखी-बहिनपा वा माए-पितियाइन पुछतैन‍ जे बुच्‍ची अन्न-वस्‍त्रक ने तँ दुख-तकलीफ होइ छह, तखन ओ थोड़े आगू-पाछू ताकि बजती। ओ तँ परिवारेक बँचौने बँचत। वएह ने परिवारक प्रतिष्‍ठा छी। जानियेँ कऽ तँ हमरा सबहक घरक छप्‍पर भगवानक डेङ्गेलहा छी, तेहीमे ने बँचि-खुचि कऽ घरक मर्यादाकेँ संगे लऽ कऽ चलैक अछि। अहीमे ने अपन इमान-धर्म बँचबैत परिवार चलाएब तखन ने समाजक संग कुटुमो-परिवारक प्रतिष्‍ठा ठाढ़ रहत।

शब्‍द संख्‍या : 1963


 

 

मनोरथ

जहिना शोभा काका सभ छुट्टी गामेमे बीतबै छैथ तहिना सभ रबियो बीतबै छैथ। सुविधो छैन‍। पाँचे कोसपर विद्यालय छैन, साइकिल छैन्‍हे तँए अबै-जाइमे असोकर्जो नहियेँ होइ छैन‍। शनिकेँ स्‍कूलो अदहे होइ छैन, सेहो सुविधा भाइये जाइ छैन‍।

आने शनि जकाँ सात बजे साँझमे शोभा काका गाम पहुँचला। पछबरिया घरक दाबा लगा साइकिल ठाढ़ कऽ कैरियरपर सँ झोरा उतारि आँगनमे पएर रखिते छला कि पत्नीपर नजैर‍ पड़लैन‍।

जेठ-अखाढ़ मास तँए डि‍बिया नेसैक ओरियान सुगिया काकी करै छेली। ओना, डेढ़ियापर जखने साइकिल खड़खड़ाएब सुनलैन‍ कि बुझि गेली जे एहेन अवाज तँ अपने साइकिलक छी। आ आँखि उठैबते नजरियो पड़िए गेलैन‍।

जेठ-अखाढ़ मास ऐ लेल जे पूर्णिमा भऽ गेल मुदा सकराँइत पछुआएले छल। मुदा काकीक संयोग नीक रहलैन‍ जे नजैर-मे-नजैर‍ नै मिललैन‍। जँ नजैर‍ मिलि जइतैन‍ तँ चूल्हि पजारि डिबिया नेसब बाधित भऽ जइतैन‍। तेकर लाभ सुगिया काकी उठेबो केली। लाभ ई उठौली जे पतिक आगत-भागतकेँ एक नम्‍बर काजक सूचीसँ निच्‍चाँ उतारि दू नम्‍बरमे रखि, कुशल कारीगर-कलाकार जकाँ एक काजकेँ विसर्जन करैसँ पहिने दोसरक संकल्‍प लऽ लेली। मने-मन विचारि लेली जे जाबे जारैनक धुआँ फरिच्‍छ हएत-हएत ताबे साँझो घुमा लेब। काजमे लगल देख शोभो काका बिनु किछु बजने कोनचरे लगसँ झोरा ओसारक चौकीपर रखि पानिक प्रतीक्षा करए लगला। केना ने करितैथ‍, जाधैर‍‍ घरबैया दिससँ पएर धोइले पानि नै पहुँचैत ताधैर‍‍ कारखाना जकाँ उपस्‍थिति केना बनैत। मुदा ईहो तँ भऽ सकैए जे अभ्‍यागतक सेवा योग्‍य परिवार नै हुअए? सुगिया काकीक मनमे ईहो उठैत रहैन‍ जे भाषणक कलाकारी होइत जे एतबे समैमे एतेटा बात बाजि देब मुदा काज तइसँ बहुत दूर होइत। ओना, चलनिहारकेँ पैरक गति रोकिनिहार सेहो बीचमे आबि सकैए। नहियोँ औत, तँए जइमे हँ-नइ दुनूक संभावना होइ ओकर गारंटी शत-प्रतिशत नै कएल जा सकैए। तँए सुगिया काकीकेँ होनि‍ जे जैठाम दुविधा अछि तैठाम सावधानी नै करब तँ रेलबेक ट्रेन जकाँ एकठाम बिलंम भेने गन्‍तव्‍य स्‍थान धरि बिलैमते ससरब। तेतबे नहि, अदहा दिनक चलल छैथ‍, बाटमे केतए आ की देखने हेता, जँ कहीं एहेन समस्‍या देखने आएल होथि आ रस्‍तापर अमती काँटक झाँगैड़ जकाँ रखि दथि, तखन तँ जिनगीए ढंस भऽ जाएत! भोजनकाल जँ पानिक बरतने फुटि जाए तखन पानि केना परसब..?

सभ काज सम्‍हारि सुगिया काकी हाथमे लोटा धरबैत शोभा काकाकेँ पुछलखिन-

हाल-चाल सभ आनन्‍द किने?”

काकीक पुछब जेना शोभा कक्काक मनकेँ हौंर देलकैन‍ तहिना मन सहैम गेलैन‍ जे भरिसक कोनो आक्रोश छैन‍। मुदा अनुकूल समए नै पाबि, उत्तर देखखिन-

पुरबते।

शोभा कक्काक उत्तर सेहो सुगिया काकी तारि लेली। तँए उचित समए नै पाबि सुगिया काकीक मनमे भेलैन जे पएर धोइले दरबज्‍जापर जेबे करता तँ किए ने टिकमे चिड़चिड़ी लगा दिऐन‍ जे जाबे चिड़चिड़ी छोड़ौता-छोड़ौता ताबे चाह बना लेब। काज औगतेने तँ नै होइ छइ। बड़ भूख लागए तँ पातक बदला हाथे नै पसारि दिऐ..!

बजली-

नीमक गाछमे गराड़ लगि गेल अछि से कनी देख लेब?”

सुगिया काकीक बात सुनि शोभा काका बजला किछु नहि, मुदा मनमे उठलैन‍ जे नीमक गाछमे केतौ दिवार लगइ! एहेन बात किए कहलैन‍? गराड़केँ मीठ जड़ि पचै छइ? तीत केना पचत। मुदा फेर मनमे उठलैन‍ जे पुरुखक नाड़ी नारीक नाड़ीसँ भिन्न चलैए‍ तँए समए लगबै दुआरे जँ कहने होथि। मुदा से केना बुझब जे केते समए लगाएब? भऽ सकैए जे जेतबे समए जड़ि खोरि गराड़ देखैमे लगत तेते, मुदा से अपने केना बुझब? तइसँ नीक जे जाबे बजबए नै औती ताबे नै जाएब। पैछलो शनिमे जखन आएल रही तँ पएर धोलाक बाद चाह पिऔने रहैथ‍‍। तहिना चाहे बनबै दुआरे जँ टारने होथि। नीक हएत जे ताबे धरि कड़ची लऽ कऽ जड़ि खोरैत-खारैत रहब जाबे धरि बजबए नै औती।

चाह छानि ओसारक चौकीपर रखि काकी दरबज्‍जा दिस बढ़ैत बजली-

जअ काटए गेलौं तँ सतुआइन केनहि एलौं! चाह सेरा कऽ पानि भऽ गेल। आ झूठे-फूसेमे लटकल छी!”

झूठ-फूस सुनि शोभा काका चौंकला, कहू जे अपने लटकल छी आकि हुनके किरदानीए लटकल छी? मुदा किछु बजला नहि। मनमे उठलैन‍ जे जइ शून्‍यक कोनो मोजर नै छै, सेहो घुमैत-फि‍ड़ैत केतए-सँ-केतए उड़ि जाइत अछि। मुदा ई तँ शब्‍दवाण छी, कागभुशुण्‍डी जकाँ समुच्‍चा दुनियाँ देखौत..! पुछलखिन-

केहेन चाह बनेलौं जे लगले पानि भऽ जाएत‍?”

जहिना मन्‍दिरक बीच भक्‍त भगवानक आगू ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोड़ि अपन मनोरथ मनमे दाबि, पहिने स्‍तुति करैत तहिना मनक बात मनेमे रखि सुगिया काकी बजली-

तबधलमे तपते चाहक ने सुआद होइ छै जँ से नहि, तँ जहिना अधिक बोखारक आगू कम बोखार, बोखार नै रहि जाइत तहिना ने चाहो होइ छइ।

भूखलकेँ पहिल कौर आ पियासलकेँ पहिल घोंट जहिना सुखद होइ छै तहिना चाहक घोंट लगैबते शोभा काका बजला-

गाम-घरक की हाल-चाल अछि?”

गाम-घरक हाल-चाल सुनि सुगिया काकीक मन उड़ए लगलैन‍। बजैसँ पहिने सोचए लगली जे किम्‍हरसँ बाजी। गाम दिससँ आकि परिवार दिससँ। सम्‍हारैत बजली-

गाममे तँ ऐबेर साक्षात् सरोसतिये आबि गेली। एकोटा विद्यार्थी फेल नै भेल।

सभकेँ पास सुनि शोभा कक्काक मन ओझरा गेलैन‍। जखन सभ पास केलक तखन सुशीलक केना बुझब जे केतेसँ नीक केतेसँ अधला केलक। पाशा बदलैत पुछलखिन-

केकरा कोन डि‍बीजन भेल?”

काकीक मन पहिनहिसँ उड़ल रहबे कहैन, जहिना दौड़ैकाल पैरक ठेकान नै रहैत तहिना प्रश्‍नकेँ सुआदने बिना बजली-

सभसँ बेसी नम्‍बर अपने सुशीलकेँ अछि।

सभसँ नीक सुशीलकेँ सुनि शोभा काका बजला-

अपने जे हुअए मुदा सुशीलकेँ आगूओ पढ़ाएब।

आगूक नाओं सुनि सुगिया काकी भकरार फूल जकाँ बजली-

रिजल्‍ट निकललापर जखन सुशील संगी-साथी सभसँ भेँट कऽ आएल तखनेसँ मन खसल देखै छिऐ!”

से किए?”

कहैए जे आगू पढ़ैले सभ बाहर जाएत..?”

सुगिया काकीक विचारकेँ शोभा काका विचारक अलमारीमे चौपेतैत बजला-

नीक हएत जे बौऔकेँ एतै सोर पाड़ि लियौ। परिवारक सभ मिलि कऽ किए ने परिवारक काजक विचार करब। केकरो मनोरथकेँ किए कियो दाबत?”

शोभा कक्काक विचार सुनि सुगिया काकीक मन खापैड़क धान जकाँ ऐ भागसँ ओइ भाग करए लगलैन‍। मुदा पतिक बात बुझि हनछीन नै कऽ कन्‍हलग्‍गू बरद जकाँ जू गेली।

सुशीलक संग आबि काकी अपन घरमे अभ्‍यागत जकाँ बजली-

बौआ, पहिने बाबूकेँ गोड़ लगहुन।

ओना सुशीलक मनमे अपनो रहबे करै जे अपन कर्त्तव्‍यक पालन केना केने छी से तँ पितेक बतौल रस्‍ता छिऐन‍, तँए ओइ पगक पग-सँ-पग टपलौं। तखन किए ने ओकरे हथियार बना जीवन-कर्म करब...।

पिताकेँ गोड़ लागि सुशील मुँह उठा असीरवादक प्रतिक्षा करए लगल।

सुशीलक माथपर हाथ रखैत शोभा काका पुछलखिन-

बाउ! आगूक की विचार होइए?”

सुशील बाजल-

सभ बाहर जा-जा नाओं लिखौत।

शोभा काका कहलखिन-

मनोरथ अपनो अछि, माइयोक मन तेहने देखै छी। चारि-पाँच साल नोकरी रहल अछि। तैबीच देखबे करै छहक चारू भाए-बहिन पढ़ै छह, दिनो-दिन आगूए बढ़बह। जइसँ खरचो बढ़िते जाएत। केते कमाइ छी से केकरोसँ छिपल अछि। तखन तँ आमद-खर्च देख कऽ जँ परिवारक गाड़ी नै खिंचबह तँ केते दिन परिवार ठाढ़ रहतह।

पतिक बातकेँ अनसुन करैत सुगिया काकी बिच्चे‍मे टपैक‍ उठली-

हम केकरासँ थोड़ छी जे अपन मनोरथ पूरा नै करब। जहिना सबहक बेटा पढ़ैले बाहर जाएत तहिना हमरो सुशील जाएत।

पत्नीक विचारसँ शोभा काका सकपकेला नहि। अपनो मनोरथ, पत्नियोँक मनोरथ आ बेटोक मनोरथकेँ पानि-चिन्नी-नेबोक रस जकाँ घोड़ए लगला। मुदा मनक बात कहथिन केकरा। नजैर‍ उठा कखनो पत्नी तँ कखनो पुत्रपर दैत विचारए लगला। विचित्र स्‍थिति बनि गेल अछि। नोकरीक चाहमे लोक केतए-सँ-केतए भागि रहल अछि! किए ने भागत? जे हवा बनि गेल अछि आकि बनल जा रहल अछि तइमे जिनगीक ज्ञान पाछू पड़ि रहल अछि। नव तकनीक संग नव मनुख पैदा लऽ रहल अछि जेकर दूरी एते-बढ़ि रहल अछि जे चिन-पहचिन्‍ह तक समाप्‍त भऽ रहल अछि..!

शब्‍द संख्‍या : 1162

 

 

 


 

[1] आँठी-सँ जनमल साल-दू सालक आमक गाछ

[2] सासु-पुतोहु


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