logo logo  

वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

Home ]

 

India Flag Nepal Flag

(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

 डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

 मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज सं: सीता दाई केर वेदना

 

 

राम जगतपुज्य छथि। राम के हिन्दू सब आराध्यदेव बुझि पूजा करैत छथि। मिथिला में राम सर्वाधिक पूज्य छथि। पूज्य होबाक कारण रामक देवता भेनाई त अछिए ओ मिथिला केर दुलहा छथि ताहू लेल। कारण मिथिला में जमाय के विष्णुक अवतार मानल जैत अछि। सर्वश्रेस्ट पाहून जमाय होइत छथि। हुनकर मान-दान, आतिथ्य, भोजनक सचार, रंग-रंगक बिध-बेभार, गीत-नाद आ सब किछु अपूर्व। मुदा मिथिला के लोक के अदौं सं ई होइत रह्लनि अछि जे सीता संग रामक व्यवहार उचित नहि रह्लनि।

आइयो मैथिलानी बात-बात में सीता के दुखक स्मरण करैत नोरायल आँखि सँ आ बझल कंठ सँ अनायास बाजि उठैत छथि:

राम बियाहने कुन फल भेल।

सीता जन्म अकारथ गेल।

एकर अर्थ ई नहि जे राम मर्यादापुरुषोत्तम नहि रहला। एकर अर्थ इहो नहि जे मिथिलाक लोक अर्थात मैथिल विधर्मी भ गेलनि। ई त हिन्दू धर्म आ संस्कार के स्वभाव अछि जे जकरा लोक पसिन करैत अछि ओकर गलत निर्णय, अनुचित डेग, आदि पर ओकरा उपराग सेहो दैत अछि। यैह गुण सनातन धर्म के एखन धरि साश्वत रखने अछि। ताहि एहि लेख में जे भाव अछि ओकरा एक मैथिल, मैथिल सं अधिक मैथिलानी के अपन किशोरी केर दुलहा रामक प्रति विभिन्न ग्रन्थ आ लोककथा केर मादे कैल गेल स्नेहपूर्ण उपराग बुझल जा सकैत अछि। कुनो विद्वेष नहि, घृणा नहि, धर्मक प्रति असंवेदनशीलता नहि।

रामायण के प्रारंभ एखन धरि प्राप्त जानकारी के आधार पर महाकवि वाल्मीकि सँ होईत अछि। तकर बाद अनेक स्थानीय विद्वान, सन्त, भक्त, कवि एकर कुनो प्रसंग, अथवा सम्पूर्ण कथा पर शास्त्रीय आ स्थानीय मान्यता के आधार पर काव्यमय रचना करैत रहलनि। रचनाशीलता आइयो चलि रहल अछि। खंड अथवा संदर्भ विशेष में अंतर कुनो बहुत पैघ बात नहि अछि। तुलसीदास त राम के अपन आराध्य देव मनैत राम के मर्यादापुरुषोत्तम बनबैत रामचरितमानस केर निर्माण करैत छथि। तुलसी के लेखनी अतेक प्रभावोत्पादक अछि जे समस्त उत्तर भारत, पूर्व भारत, उत्तर-पूर्व भारत, मध्य भारत धरि रामचरितमानस जन-जन के कण्ठहार बनि जाइत अछि।

मिथिला में सेहो एखन धरि हमर ज्ञात जानकारी के हिसाबे 4 प्रकार केर रामायण मैथिली में लिखल जा चुकल अछि। मूल कथा के ध्यान में रखैत महाकाव्य रचनाकार किछु प्रसंग स्थानीय मान्यताक सँग जोड़ि दैत छथि। एकर अतिरिक्त लोककथा में, गीत में,लोक व्यवहार में सीता आ रामक भाँति-भाँति के चर्चा अबैत अछि।

ई लेख रामायण के अतिरिक्त लोककथा, लोकमान्यता, गीत नाद आदि के आधार मानि लिखल गेल अछि। लोककथा सेहो साक्ष्य सँ कम नहि।

आब चलु हमरा सङ्गे मिथिला आ रामकथा सँग रामक भाव के मैथिलानी आ सामान्य जनता के बीच मान्यता केर आधार पर, ग्रंथ आ लोककथा के आधार पर , गीत नाद पर शुद्ध मोन सँ सीताक प्रति रामक व्यवहार के समीक्षा करी। सिनेह राम सँ अछि त उपराग ककर? निश्चित रूप सँ रामक।

मिथिलाक सब गाम, घर में सीता छथि आ घरे-घरे राम सेहो छथि। जेना राम संग विवाहक बादो सीता दाई के सुख नहि भेटलनि तहिना आइओ सुख कहाँ छनि? दहेज़क उत्पीडन, बेटा आ बेटी में अंतर, भ्रूणहत्या, शारीरक उत्पीडन, मानसिक दोहन इत्यादि अनंत समस्या स ग्रसित छथि घर-घर केर सीता। आ की नहि? कनि विचार करू ने?

हेता राम प्रतापी राजा, महाबलशाली, समुद्र के सोखि लेबाक क्षमता बला, रावणक संहारक, आ की की! मुदा मिथिला में आबि ओ दुल्हा राम भ जाथि छैथ। मिथिला के लोक हुनकर पूजा नहि हुनका सँ नेह लगबैत अछि। निधोख डहकन गाबि हुनका कखनो छगरा गोत्रक कहैत छनि त कखनो शंका करैत छनि जे राजा दशरथ गोर, कौशल्या गोर फेर राम आ भरत कारी कोना? मैथिलानी राम के विवाह के बाद सासुर में रहबाक बेर-बेर निवेदन एहि लेल करैत छथिन जे सब भाई के आ विशेष रूप सँ राम आ भरत के रगड़ि-रगड़ि उबटन लगेती जाहि सँ हिनक श्यामवर्ण देह कनि सुन्नर लागै! भोजनक सिंगार, सचारक की कहब - अपूर्व । भाँति-भांति के सचार प्रेमक भाव सँ कतेक गुना बढ़ल। गान कला, नृत्यकला, वाद्यकला में माहिर मैथिलानी सब गाबि क, वाद्ययन्त्र के बजा, सिनेहक प्रदर्शन सँ, अपन कोइली सन अनमोल बोल सँ दूल्हा राम के स्वागत आ हुनकर मनोरंजन करैत छथि। से राम अगर सीता के लंका सँ अबैत देरी अग्नि परीक्षा, गर्भ क समय मे ककरो कहला सँ सीता के पुनः असगर निट्ठुर भेल जंगल भेजि दैत छथि त मैथिलानी हाक्रोश त करबे ने करती???

बल्कि कहि सकैत छी जे नारीक स्थिति एखनो सीते दाई जकां अछि अपन मिथिला नगर में। पूरा संसार त पुरुष प्रधान अछिये मिथिलो राममय बनल ऐछ। बिना पार्वती के महादेब नहि, बिना राधा के कृष्ण नहि, तहिना बिना सीता के राम नहि तथापि लोक नामों लेबय में राम के अगुआ दैत अछि। लोक अर्थात जन सामान्य, भक्त, विद्वान सभ कियो राम लग जेना सीता के तमाम कैल-धैल त्याग, मेधा, गुण, अनुराग, रामक प्रति समर्पण आदि जेना बिसरि जैत हो! तुसलीदास एक दिस त ई लिखैत छथि:

बंदौ राम लखन बैदेही जे तुलसी के परम सनेही

तुलसीदास रामचरितमानस में 1443 बेर राम के नामक जिक्र करैत छथि। एकर अतिरिक्त राम के आन शब्द जेना, राजीव, अवधकुमार, रघुनाथ, दशरथनंदन, रघुनन्दन, आदिक प्रयोग केने छथि। वैह तुलसी जखन सीताक चर्चा करैत छथि त मात्र 147 पर अटकि जाईत छथि। सीता दाई के आनो नाम जेना की जानकी, बड़भागी के जोडि ली त सब मिलेलाक बाद होइत अछि 325 – 147 बेर सीता, 69 बेर जानकी, 58 बेर बड़भागी आ 51 बेर बैदेही। अहू में एक राजनीति ऐछ। सीता अपने गुने बड़भागी नहि छैथ। ओ बड़भागी अहि द्वारे छैथ जे हुनकर विवाह राम संगे भेल छैन। बाह रे पुरुष भक्त के पुरुष भगबान के प्रति समर्पण! समर्पण नहि अंध समर्पण! आब सीताक दुःख देखू: लंका में राम रहला 111 दिन आ सीता रहली 435 दिन, अर्थात राम स चारिगुना अधिक। ओहो यातनामय जीवन। असगर जीवन। निर्मम जीवन। डर, भय, आक्रोश, हताश भरल जीवन। निरंकार साध्वीक जीवन।

देखू जखन राम अवतरित भेला त स्वर्ग स देवता सब आबि हुनकर दर्शन केलनि। माय कौशिल्या ओहि विराट रूप के देखि घबरा गेली। भगवान स प्रार्थना केली जे नेनाक स्वरुप में आबथि:

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।

कीजै सिसुलीला अति प्रियशीला यह सुख परम अनूपा।

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।।

राम अपन माय केर निवेदन के स्वीकार केलनि। नेना भ गेला आ कानय लगला। माता कौशल्या वात्सल्य प्रेम में बिभोर भ गेली आ अपना के सर्वश्रेस्ट माय मानि लेलनि।

आब सीता के देखू। ने कुनो देखावा ने कुनो ताम-झाम। जखन समस्त मिथिला में अकाल भ गेल आ राजा जनक स्वयं हर जोतय गेला त धरतीक बेटी धरतीक गर्भ स स्वर्ण कुम्भ में एक बच्ची के स्वरुप लेने प्रगट भेली। नहिये माय सुनयना के निवेदन करय पड़लनि आ ने जनक राजा के जे छोट भ जाऊ, नेनाक स्वरुप में आबि जाऊ, आदि-आदि। ऊपर अर्थात अकास आ स्वर्ग स देवता, परि, गायक-गायिका, वाद्ययंत्र बजाबय बला, नर्तक-नर्तकी, यक्ष, इंद्र सब आनंदित भ गेल। ऊपर स एक अपूर्व आ मनमोहक वाद्ययंत्र संगे ओकरा बजबय बला कलाकार सब सेहो स्वर्ग स आयल। ओ वाद्ययंत्र रहैक रसनचौकी। स्वर्ग स पुष्प वर्षा प्रारंभ भेल। के नहि प्रसन्न भेल? सबहक मोन में उमंग आबि गेलैक। आब झर-झर वर्षा होमय लागल। किसान खेत दिस दौरल। आर की-की ने भेल। की तुलसी बाबा एहि प्रकरण के अतेक विस्तार स लिखला? नहि। कियैक, त सीता बेटी छली ने! अगर राम नारायण के अवतार त सीता कुन कम? ओहो त श्री अथवा लक्ष्मी के अवतारे ने छथि?

सीता के राम संगे विवाह भेलनि। लोक बुझलक जे आब सीता पटरानी भ गेलीह। राम आ सीता केर जोड़ी ककरा नहि शोभनगर लगलैक। दाई माई चिकरि- चिकरि क गीत गेली , बिध वेयब्हार केलनि। जनक राजा अपन सर्वस्व निछाबर क देलाह। मुदा कहि नहि कियैक सीता दाई केर बहिनपा सब के राम पर कनि शंका छलनि। जखन राम धनुष भंग क देलथिन त उमंग स मातलि सिया दाई वरमाला हाथ में लेने रामक दिस बढ़लनि। सिया सुनरि के प्रेम में मातल राम झट दनि अपन गरदनि नीचा केलनि। सीता माला रामक गरदनि में डालय लगली। हठात सीता के हाथ हुनकर बहिनपा सब अपना दिस खीच लेलनि। राम अक्चेकायल रहि गेलाह! ई की भेल? एहेन विचित्र व्यवहार कथी लेल? सखी सब के की भेलनि? पुछलथिन ऐना कियैक? की गलती भेल हमरा स?

सखी सब कहलथिन राम के : “हे यौ पाहून! अहांक परिवार बड्ड नीक नहि अछि। अहाँ सब महिला के भोगक वस्तु मात्र बुझैत छी। मिथिलाक व्यवहार दोसर अछि। अतए महिला सहचरी छथि। अहांक पिता केर तीन पत्नी : कौशिल्या, सुमित्रा आ कैकेई छथिन। जनक राजा के एकहि रानी सुनयना छथिन। यौ पाहून! अहांक पितामह के सेहो अनेक पत्नी छलथिन। फेर अहांक की ठेकान? आई मिथिला नगरिया में धनुष भंग कै सीता के हाथ भेट गेल। काल्हि कतहु दोसर पराक्रम स कुनो आरो लड़की के हाथ अहाँ पत्नी के रूप में ल लेब त हमर सिया धिया के की होयत? हमर मिथिला में एकै पत्नी के नियम चलै छै”।

राम चिंता में आबि गेलाह। कहलथिन: “अहाँ सब बात त ठीके कहैत छी। मुदा हम सीता के कुनो शर्त पर अपन अर्धांगिनी बनेबा लेल तैयार छी।”

सीताक सखी सब आब थोरे आरो भारखमी होइत बजली: “तखन सुनु। अहाँ सप्पथ खाऊ जे कुनो हालत में सीता के सौतिन नहि आनब।”

राम बजलाह : "हमही नहि हम चारू भाई आई समस्त लोकक समक्ष सपथ खैएत छी जे हम सब एक पत्नी धर्म के पालन करब।"

फेर की छल पूरा धूम धाम स सीता चारू बहिन केर विवाह राम केर चारू भाई संग ओही मंडप में भ गेलनि।

विवाहक बाद सीता सासुर गेलीह। राम संगे बने बने घुमली। रावण हरण कै लंका ल गेलनि। अशोकक गाछ लग समय कटली। राम राम कहैत रहली। सुकुमारी सिया के जंगल आ गाछ पात में सेहो पतिक संग जीवन नीक लगलनि। कहिओ कुनो शिकायत नहि। वनवास त राम के भेल छलनि मुदा सीता पत्नी धर्म के पालन केलि आ रामक संगे गेली।

मुदा सीता के शोषण वनवास के रस्ते शुरू भ गेलनि। मिथिला के लोक में विशेष रूप सँ मैथिलीलानी सबहक बीच एक दंतकथा व्याप्त छैक। ई दंतकथा पुरुख समाज द्वारा स्त्रीगण के कोना संस्थागत संरचना के आड़ि में शोषण कैल जाइत रहलैक अछि तकर बहुत सटीक व्यख्या करैत छैक। बात ई भेल रहैक जे जखन राम वनवास लेल सीता आ लक्ष्मण सङ्गे अयोध्या सँ विदा भ गेला त पुत्रशोक में महाराज दशरथ अधीर भ गेलनि। खेनाइ पिनाई सब त्यागि देलनि। लोक कतेक बुझेबाक प्रयत्न केलकनि मुदा हुनकर हृदय प्रतिपल क्षीण भेल गेलनि। दुःख बढ़ल गेलनि। अंततः राम-राम कहैत राजा दशरथ अपन प्राण त्यागि देलनि।

राम के जखन ई जानकारी भेटलनि त ओ बड़ दुखी भेला। फेर सब गोटे बिचारलनि जे गया पहुच फल्गु नदी के कात में पितृ तर्पण करैत अपन पिता दशरथ सहित अन्य पित्र सबके पिण्डदान करता। कहल जाइत छैक जे ओहि समय मे पति सङ्ग पत्नी के सेहो ओतय जएबाक अनुमति रहैक। ताहिं राम आ लक्ष्मण सङ्ग सीता सेहो गया पहुँचली। स्नान ध्यान केलाक बाद राम किछु लेबाक हेतु बाहर गेलनि। सीता रामक बहिन सङ्ग असगरे रहि गेली। अहि बीच एकाएक राजा दशरथ केर आत्मा आबि गेलनि। आबि सीता के कहलथिन: "हम भूखल प्यासल छी। हमरा जल दीय, पिण्ड दीय।"

सीता लजाईत बजली: "ई कोना उचित? राम आबि रहल छथि। अपने कनि इंतज़ार करु। ओ स्वयं अपना हाथे पिण्डदान करता। जल देता। आबिये रहल छथि।"

मुदा दशरथ केर आत्मा रूकबा लेल तैय्यार नहि। झट दनि कहलथिन: "पुत्री सीता! अहाँ राम केर अर्द्धांगिनी छी। हमरा लेल जेहने राम तेहने अहाँ। हमर भूख आ प्यास प्रबल भेल जा रहल अछि। ताहिं अहाँ बिना कुनो बिलंब केने आ रामक पथ हेरने हमरा पिंडदान अर्पित करु। एकर शुभ फल राम आ अहाँ दुनू के सामान्य भाग में भेटत।"

अहि तरहक निर्देश पाबि सीता हृदय सँ प्रफुल्लित होईत झट दनि विधिवत कर्मकाण्ड के तैयारी केलनि। पिण्ड बनेली। आ अपन ननदि, फल्गु धार आ कामधेनु गाय के साक्षी मानि अपन ससुर अर्थात महाराजा दशरथ के आत्मा के पिण्ड अर्पित केलनि। राजा दशरथ केर आत्मा सीताक पिण्ड सँ संतुष्ट आ तृप्त होइत पिण्ड स्वीकार केलनि आ किछु क्षण में ओतय सँ स्वर्गलोक लेल बिना राम आ लक्षमण के बाट तकने विदा भ गेला।

किछु काल बाद राम वापस आबि गेला। पितर के दर्शन के अनेक प्रयत्न केलनि मुदा बेकार। दशरथ आकाश मार्ग सँ कहलथिन: "पुत्र हमरा अहाँक पत्नी पिण्डदान केली। आब अपनके कुनो प्रयोजन नहि।"

एकर बाद राम चिंतित भ गेला। बहुत स्मरण केलनि मुदा दशरथ नहि एलथिन। सीता के पुछलथिन राम: "मैथिली! अहाँ पिण्डदान केलौं तकर की प्रमाण आ की साक्षी?"
सीता उत्तर देलथिन: "हमर साक्षी अहाँक बहिन, कामधेनु गाय आ फल्गु नदी छथि।"

आब राम फल्गु नदी, गाय आ सीता के ननदि सँ पुछलथिन। मुदा ओ तीनू साक्ष्य देमए में असमर्थता व्यक्त केल्थिन। विग्धल सीता श्राप दैत बजली: "है हमर ननदि, अहाँ हमरा झुट्ठी बना रहल छी। अहाँ छुछुनर बनब आ अहाँ हमेशा छुछुआति रहब। अहिना अहाँक प्राण जैत। है गाय! अहाँक पवित्रता त यथावत रहत मुदा अहाँ झूठ बजलों अछि तांहि अहाँक मुह अपवित्र रहत आ विष्ठा धरि अहि मुह सँ अहाँ ग्रहण करब। आ हे फल्गु नदी, अहुँ झूठ बजलों। जाउ, अहाँक धार में कखनो पानि बाहर रहबे नहि करत। ई हमर दग्धल मन के निश्छल श्राप अछि।"

अहि सँ पता चलैत अछि जे सीता सँग अन्याय शुरू सँ भ चुकल छलनि। अनिष्ट हुनका अकारने भोग’ परतनि!

जखन वैदेही के रावण छ्ल सँ हरण क ल जाइत अछि त जे राम समस्त चराचर के नियंता छथि, नियंत्रक छथि तथापि सीता के हरण के बाद जलचर, थलचर, कुंज लता, पक्षी सब किछु सँ बताह जकाँ सीताक वियोग सँ द्रवित पुछैत छथि: "अहाँ सब में कियोक हमर मृगनयनी सीता के देखलौं अछि:

जलचर, थलचर मधुकर श्रेणी। तुम देखी सीता मृगनयनी?"

आ स्थिति विचित्र आ विभत्स त तखन भ जाइत छैक जखन रावणक संहार केलाक बाद जखन राम सीता के लंका सँ मुक्त करैत छथि त राम के सीता जे चरित्र पर शंका होईत छनि। इहो भ सकैत अछि जे जनमानस में पत्नी के अपन पति के प्रति समर्पित भाव के उजागड़ अथवा स्थापित करबा लेल राम सीता दाई के अपन पवित्रता प्रमाणित करबा लेल कहैत छथि अन्यथा स्वीकार करबा सँ मना क दैत छथि। सीतो कुनो कम थोड़े ने छलि? साक्षात लक्ष्मी के अवतार। अपन पवित्र होमाक प्रमाण देबा हेतु सोझे अग्निकुण्ड में कूदि गेली। सीताक सतित्व देखि अग्निदेवता दंग रहि जाइत छथि। सीता के कुशक क्लेश तक नहि होइत छनि। बिना एकौ रत्ती जरल के निशानी के सीता अग्निकुण्ड सँ वापस आबि जाइत छथि। आर त आर स्वर्ग लोक सँ देवता लोकनि सेहो सीताक निश्छल, आ पवित्र होबक प्रमाण दैत छथि तखन जाक राम पुनः सीता के स्वीकार करैत छथि।

किछु लोक अहि में ई तर्क (कुतर्क?) दैत कहैत छथि जे समाज मे उचित व्यवस्था आ आदर्श उत्पन्न करबा लेल राम एहेन कार्य केलनि। मुदा मैथिलानी के ई सोचब छनि जे राम सीता सङ्गे अन्याय केला आ समस्त स्त्री समाज पर बंधन थोपबाक एक अनर्गल परम्परा के प्रारंभ केलनि। की यैह छलनि रामक रघुकुल रीति? ओह!! कहब दुख ककरा सँ!

अग्निपरीक्षा के संबंध में किछु लोक कहबा लेल एहनो बात कहैत छथि जे जाहि सीता के रावण हरण केलक से सीता त सही अर्थ में सीता छेबे कहाँ छलि। ओ त सीता के छाँह छलनि। असली सीता त अग्नि में समाहित भ गेल रहथि आ निश्चिन्त सँ अग्नि में चुपचाप बैसल। ताहिं छाँहक सीता के अग्निकुण्ड में जाइते देरी असली सीता अग्नि सँ बाहर निकलली जिनका राम सहज रूप सँ अर्धांगनी के रूप में स्वीकार करैत छथि।

मुदा एक हाड़-मांस केर सामान्य मनुख होबाक नाते एकटा बात नहि पचा पबैत छी जे रामक ई दुरंगी चरित्र कोना देखी। जे राम ऋषि गौतम के पत्नी अहिल्या के उद्धार स्पर्श मात्र सँ करैत छथि वैह राम अपन पत्नी सीता लेल अतेक निरंकुश?

जे राम बालि के एहि द्वारे बध करैत छथि जे ओ अपन छोट भाई सुग्रीव केर पत्नी के बलपूर्वक अपना लग रखने अछि। जखन बालि राम सँ पुछैत छनि:


"
में बैरी सुग्रीवहिं प्यारा।

कारण कबन नाथ मोहि मारा।।"

त राम उत्तर दैत कहैत छथिन:

"अनुजवधु भगिनी सुतनारी।

सुन सठ कन्या सम ए चारी।।

इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई।

ताहि बधे कछु दोष न होई।।"

बालि के मृत्यु के बाद राम अपन सखा सुग्रीव के फेर सँ अपन पत्नी के स्वीकार करबा लेल प्रेरित करैत छथि जकरा सुग्रीवक जेठ भाय बालि बहुत दिन धरि अपन कब्जा में रखने छ्ल। आ सैह राम सीताक मामला में एहेन कठोर, हृदयहीन कोना???

जखन सीता एलीह आ गर्भ स छली ताहि काल एक धोबी के उपराग स परेशान भए राम सीता के घनघोर जंगल में असगर भेज देलथिन। कहु त कतेक कठोर छलाह राम! धर्मशाश्त्र कहैत अछि जे स्त्रिगन कत्तेक खाराप हो मुदा जखन वो गर्भ स हो त ओकरा सब सुख देबाक चाही आ घर स एकौ क्षण लेल बाहर नहि जाए देमक चाही। बाह रे मर्यादा पुरुषोत्तम राम! कत गेल मर्यादा अहांक?

अगर अहाँ प्रजा वत्सल छलौं त एक पति सेहो रही ने? अहाँ के त बुझल छल जे सीता निष्कपट आ गंगा जकां पवित्र छथि। अगर अहाँ अयोध्या में एक प्रथा प्रारंभ करै चाहैत रही त फेरो राज चलेबक जिम्मेदारी भरत के द पति धर्म केर पालन करैत सीता संगे वनवास चलि जैतहु जेना सीता अहाँ संगे अपने मोने पत्नी धर्म के पालन करैत गेल छलीह? मुदा से कोना! पुरुष रही ने अहाँ। पुरुष दम्भ के के रोकत! कहीं एहेन त नहि जे पुरुष दंभ सेहो मर्यादा पुरुषोत्तम के लक्षण हो आ अपना के ओहि दंभ में खपा देनाई या दंभ के नीचा जीनाई नारीधर्म?”

खैर, लक्ष्मण जी सीता के जंगल में असगरे छोडि देलथिन। लाचार आ वेवश सीता! हे देव! जाथि त कत आ ककरा लग? के शरण देतनि? आ ताहि क्षण बाबा बाल्मीकि सीता के अपन आश्रम में स्थान देलथिन। एक दिन रास्ता में प्रसव वेदना उठलनि। वनक लोक सब मदति केलकनि। इच्छा भेलनि जे अयोध्या में जानकारी भेजी। मुदा भेलनि जे राम नहि बुझथि त नीक। हजमा के कहलथिन “तों भरत, के सत्रुघन के, लक्ष्मण के, तीनो माता के चुप चाप बता दिहक मुदा राम नहि बुझथि।”

जखन राम अश्वमेध यज्ञ करै लगलाह त पंडित कहलथिन जे बिना पत्नी के राम यज्ञ नहि क सकैत छथि। राम के अपन वचन स्मरण भेलनि। कहलथिन हम दोसर विवाह नहि करब। तखन इ निर्णय भेलैक जे सोनाक सीता बना राम यज्ञ लेल बैसता। सैह भेल।

मुदा बीचे में घोडा के त लव आ कुश बान्हि देलथिन। सब हारि गेलाह। हनुमान बंदी भ गेलाह। अंत में राम एलाह त बाद में सीता सेहो एलीह। सीता रामे के वंशक सन्तति के जंगल मे बहुत नीक जकाँ सब शिक्षा संस्कार में पारंगत करा राम के औकात देखा देलनि। राम एक संग अपन दुनु पुत्र आ सीता सनहक पत्नी पाबि धन्य भ गेलाह। कहलथिन सीता के जे आब अयोध्या चलू। सीता मना क देलथिन। राम बहुत बुझेबाक प्रयास केलथि। मुदा सीता त अप्पन जिद्द पर कैम रहली। अंत में राम कहलथिन : “अहाँ नहि जाएब त हमर अश्वमेध यज्ञ नहि हेत।”

सीता: “से कोना?”

राम: “पत्नी के अछैते असगर पति अश्वमेध यज्ञ नहि क सकैत अछि।”

सीता: “तखन अहाँ कोना करैत रही?”

राम: “हम सब मानि लेने रही जे अहाँ आब अहि दुनिया में नहि छी।”

सीता घोर वेदना स द्रवित भ गेलीह आ कहलथिन : “हे राम! अहाँ मात्र अपन पौरुष आ नामक रक्षा हेतु हमरा अयोध्या ल जाए चाहैत छी? अहि लेल जे अहांक यज्ञ भ जाए? हमही बाधा छी अहांक यज्ञक ?”

ई कहैत सीता धरती माता के दुनु हाथ जोड़ि करुण स्वर में विनती केलीह: “हे माता ! अही हमर माए छी। अहिक कोखि स हम एहि धरा में उत्पन्न भेल छी। आब हमर आत्मा कानि रहल अछि। अहाँ फाटू आ हमरा अपना भीतर में स्थान द दीय!

धरती सीता के गुहार सुनि लेलथिन आ एकाएक धरती में सीता दाई के आगा दू टा दरक्का भ गेले। जाबेत राम रोकथिन ताबेत सीता ओहि धरती में बिलुप्त भ गेलीह।

धरती फटली आ धरतीपुत्री सीता धरती में समा गेलनि। ताहि जखन मैथिलानी सबके कोनो कष्ट होईत छनि त अपना के सीता बुझैत अनायास बाजि उठैत छथि: “फाटू हे धरती”।

ओना आब मिथिला के पुरुष सेहो सीता के सम्मान कहाँ करैत छथि? सीता सब दहेजक ज्वाला में जरैत छथि। अपमानित होईत छथि। बेटी के बेटाक तुलना में कम ध्यान देल जैएत अछि। वेदना अनंत अछि.....”

सनातन धर्म पूर्वजन्म के सिद्धान्त के मनैत अछि। मिथिला के लोक व्यवहार में धोबी के कहला सँ राम द्वारे सीता के पुनः वन भेजबाक एक लोककथा अछि जे कर्म के सिद्धान्त पर टिकल अछि। कनि देखी एकरा:

बसंत ऋतुक समय छल। शीतल, मंद पवन बहैत छल। सीता दाई अपन सखी बहिनपा संग फुलवारी में भ्रमण कऽ रहल छली। सीता के इच्छा झुला झूलबाक भेलनि। एक सखी सऽ अपन इच्छा व्यक्त केलनि। तुरत सखी बहिनपा सब सीता दाई के झुला झुलाबए लगलथिन। बड्ड मनमोहक दृश्य भ गेलैक। सीता हिलोरा लैत आ सखी सब हिलबैत। जतेक प्रशंसा करी से कम।

झुला लागल प्रेमक डाली।i

झुलथि सीता प्यारी ना।।

सब सखी गबथि सिनेह देखाबथि।

बिहुसथि जनकदुलारी ना।।

सोहनगर-रसगर गीत गबैत सखी संग सीता आनंदक सागर में गोता लगा रहल छली। गीतक स्वर हुनकर कान में मधुर झनकार भरैत छल। अहि बीच सीताक दृष्टि एक सुन्दर सुग्गाक़ जोड़ी दिस पडलनि। इ सुग्गाक़ जोड़ी पति-पत्नीक जोड़ी छल। हरियर कचोर पांखि, लाल-लाल ठोर। सुग्गाक भाषाक संग-संग मानुखक भाषा बाज़ऽ में प्रवीण छल दुनू सुग्गा। सुग्गाक़ पत्नी वैह गीत ग़ाबि रहल छल जे गीत सीतादाई अपन सखी बहिनपा संग झुला झुलैत ग़ाबि रहल छली।
सुग्गा के जोड़ी पर सीता दाई के हिक गरि गेलनि। मोन भेलनि जे अहि सुग्गा के राजमहल में आनि पिंजरा में राख़ब आ प्रतिदिन एकर मधुर बोल सुनि उठब त कतेक़ नीक रहत!

राजमहल में अबितहि सीता दाई अपन सेवक के बजेलि आ आज्ञा दैत कहल्थिन: "देखू, फुलवारी में सुग्गाक़ एक जोड़ी बिचरि रहल अछि। बड्ड सुंदर जोड़ी छैक। चीरै चुनचुन के संग-संग इ जोड़ी मनुखक आवाज़ में मधुर गीत सेहो गबैत अछि। अहाँ एखन फ़ुलवारी जाऊ आ ओहि जोड़ी में स एक सुग्गा हमरा लेल पकड़ि क लाउ"।

सेवक सीता दाई केर आज्ञा के पालन क़रैत झट दनि फुलवारी दिस बिदा भेल। थोरेक कालक़ बाद ओहि सुग्गाक़ जोड़ी में स एकटा सुग्गा पकड़ि कऽ लऽ अनलक। आब ओहि सुग्गा के एक सोनाक पिंजरा में बन्द कऽ सीता दाई लग लैल। सुग्गा के अपना सामने सोनाक पिंजरा में देखि सीता दाई आनन्दविभोर भऽ ग़ेली।

ग़लती स ओ सुग्गा महिला सुग्गा छलि आ गर्भ स रहै। ओकर पति सीता दाई के सेवक सँ निवेदन केलक जे ई महिला सुग्गा ओक़र पत्नी छैक आ गर्भ स छैक ताहि ओक़रा पर करुणा देखबैत स्वतंत्र क देल जाय। पुरुष सुग्गा बाजल : "बरु हमर पत्नी के बदला में अहाँ हमरा ल चलु पिंजरा में बन्द कऽ सीता लग"। मुदा सीताक़ सेवक ओक़र अनुनय-विनय के नहि स्वीकार केलक आ महिला सुग्गा के राजमहल लऽ अनलक।

अपन पत्नी के प्रेम में मातल पुरुष सुग्गा हारि नहि मानलक। पाछा-पाछा ओहो राजमहल में आबि गेल। ओक़रा आशा रहैक जे सीता चूकि स्वयं करुणाशील कन्या छथि, ओ निश्चित रूप स ओकर पत्नीक अवस्था पर द्रवित भ पिंजरा स मुक्त कऽ देथिन!

बेचारा सुग्गा सीता दाई लग भरल नोर व्यथित मोन पहुचल। नोर थमक नामे नहि लैक। आर्त भाव स बाजल: "हे करुणामयी राजकुमारी सीता, इ सुग्गा जे आहाँक सेवक पकड़ि अनलक अछि इ हमर पत्नी थिक आ गर्भ सऽ अछि। एकर पेट में हमर सन्तान पलि रहल अछि। हम अहाँ लग ई निवेदन करबाक हेतु आयल छी जे अहाँ एक़रा पर करुणा देखबैत पिंजरा स मुक्त क दियौक़। अगर अहाँ के सुग्गा रख़बाक इच्छा अछि त हमरा राखि लिय!"

कहि नहि किएक सीता दाई के सुग्गाक अनुनय दिस धेआन नहि गेलनि। ओ अपना में मस्त रहली। ज़खन सब व्योंत स सुग्गा थाक़ि गेल आ राजमहल में कियोक ओक़र वेदना सुनबा लेल तैयार नहि भेलैक त लाचार सुग्गा दर्द आ क्रोध स खिन्न भ गेल। तामसे घोर होईत सुग्गा सीता दाई के सम्बोधित क़रैत बाजल: “हे जानकी! हम बड्ड आश लऽ कऽ अहाँ लग आयल रही जे न्याय भेटत। न्याय त दूर अहाँ हमर वेदना सुनबाक लेल तैयार नहि छी। आहाँक ज़खन अपन विवाह हैत तख़ने अहाँ अहि वेदना के बुझि सकैत छी। आब हद भ गेल! हम व्यथित मोन वापस जा रहल छी मुदा जैत-जैत अहाँ के श्राप देने जा रहल छी। हम पति-पत्नी अगिला जन्म धोबि-धोबिन बनि जन्म लेब आ हमरा सभक कारण सऽ आहाँक पति अहाँके गर्भावस्था में घर स निकालि देता”।

आब सीता के होश जगलनि। मुदा आव किछु नहि भ सकैत छल। सीता सुग्गा के श्राप के सिरोधार्य कऽ लेलनि। दन्तकथा के अनुसार ओही सुग्गा के श्राप के कारण जखन सीता गर्भ सं छली त राम सनहक पति एक धोबि-धोबिन के कहला पर हुनका घर स निकालि देलथिन।

किछु लोक के मानब छनि जे रामक सीताक प्रति एहेन निष्ठुर व्यवहार सीता के व्यक्तित्व के सबल बनबैत छनि। मुदा ई केहेन व्यवहार। ककरो सबल बनेबाक हेतु, उदाहरण प्रस्तुत करबा हेतु अहाँ डेगे-डेगे प्रताड़ित करबैक? नहि-नहि, ई नहि उचित विचार।

एक मैथिलानी हमरा कहली, "देखू, सीता एक प्रतापी राजा के बेटी आ दोसर प्रतापी राजा के पत्नी। हुनकर जखन ई हाल भेल त सामान्य महिला के की बात?" सीता मिथिला अपन नैहर आ पिता राजा जनक लग कियैक नहि एली? फेर स्मरण अबैत अछि : "बेटी सासुरे नीक की सर्गे नीक"। ताहिं सीता स्वर्गक रास्ता धेलनि।

मोन में एक बात होईत अछि, उमरैत रहैत अछि - अगर राम मर्यादापुरुषोत्तम छथि त फेर ओहि मर्यादा के धोती के तार-तार कथी लेल करैत छथि?

वैदेही के दुःख सँ द्रवित होइत मिथिला के अनेक पुरुख आइयो कनि उत्थर भ जाइत छथि, अधीर भ जाइत छथि, जेना विद्रोहक स्वर रामक प्रति प्रचण्ड भ जाइत होनि! धीरेन्द्र प्रेमर्षि त अतेक तामसे भेर भ जाइत छथि की हुनकर लेखनी बुझू जे क्षण मात्र लेल सब मर्यादा के अतिक्रमण करैत अपन भड़ास निकलैत बाजि उठैत अछि:

"दण्ड-भेदे करू कि अपनाउ साम-दाम

हमर सीते जँ बोन, अहाँ सुथनीक राम?"

जो रे मर्यादा आ पुरुख द्वारा स्त्रीगन के अदृश्यबेड़ी संजकड़ल पैर! बेचारीमैथिलानी से कोना कहती? ई सब त सीता के द्वारा स्थापित मापदंड के एखनो ओही मर्यादा के सँग अक्षर-अक्षर अनुशरण करैत छथि, निर्वहन करैत छथि। पाहुन राम सँ उपराग त ठीक मुदा हुनका लेल अवाच्य कथा - हे भगवान! कथमपि नहि। ऊपर सँ "हम नहि जियब बिनु राम" गाबि-गाबि पाहुन के दिन-राति स्मरण करैत रहैत छथि।

अतेक भेला बादो राम के मिथिला के लोक अपन सब सँ सुन्नर पाहुन मनैत छथि। राम के प्रति जेहिना भक्तिभाव तहिना प्रेमभाव।

एक भाव जे मैथिलानी लोकगीतक मादे गबैत छथि से जरूर मोन के द्रवित क दैत अछि आ सब मैथिलानी में सीता आ सब मे सीताक व्यथा बुझना जाइत अछि:
"
हे भगवान! कुन कसूर विधना भेल बाम कहब दुख ककरा सँ?"

 


ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।