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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक 

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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रबीन्द्र नारायण मिश्र

लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)

२५म खेप 

ओहिदिनका बैसारमे क्रमशः बहुतरास लोक आबि गेल। मंचपर नीरजक अतिरिक्त चारिगोटे आओर बैसल छलाह । सभ पाग पहिरने छलाह । दिल्लीमे प्रवासी लोकनिमे आपसी मेलजोलक अभाव आ तकर समाधान चर्चाक मूल विषय छल । गप्प-सप्प भइए रहल छल कि कोनपरसँ केओ हल्ला केलक ।

" मंचपर विराजमानलोकसभ एकहि जातिविशेषक किएक छथि? की आन जातिमे पढ़ल-लिखल लोक नहि छैक ?"

"बेसी कबिलपनी नहि करह । ई तोहर गाम नहि छह जे -जे चाहबह सएह हेतैक।-दोसरदिससँ केओ बाजल।

"लफंगासभकेँ पैसा दए कए भीड़ कए लेलहुँ अछि आ मोन तर-ऊपर भेल अछि ।-तेसर आदमी बाजल । बात बढ़िते गेल । लोक जातिक हिसाबे गोलबंद भए गेल । केओ किछु,केओ किछु बाजएलागल। बात बढ़िते गेल । के ककरा सम्हारैत? हालत काबूसँ बाहर  भेल जा रहल छल । औ बाबू ! देखिते-देखिते  ओ परिसर कुरुक्षेत्रमे बदलि गेल । मारि-पीट शुरुभए गेल ।कैकगोटेक कुरता फाटल। कैकगोटेक हाथ टुटि गेल । केओ लथपथ भेलभूलंठित छलाह। बात बढ़ैत देखिपुलिस ओहि परिसरकेँ घेरि लेलक । किछुगोटेकेँ थुड़बो केलक। बाहर मे यत्र-तत्र लोकसभक चप्पल -जूता ,चीज-वस्तु पसरल छल। आयोजकसभ इएह-ले ओएह-ले कहुनाकए जान बचा कए घसकलाह ।देखिते-देखिते हौलमे भम्म पड़ि रहल छल । रचनाकेँ ओहि आदमी संगे गेटपर ठाढ़ देखलिऐक ।ओकरासभकेँ अपसिआँत देखि हम अपने कारमे बैसा कए ओतएसँ घसकलहुँ।

बैसारमेलफड़ा बढ़ैत देखि नीरजमंचसँ उतरि लोकसभकेँ बुझाबक प्रयास करए लगलाह। मुदा भेल उल्टे। हौलमे भगदर भए गेलाक बाद जकरा जेम्हरे रस्ता भेटलैकभागल। कैकगोटा हिनका ऊपर चढ़ैत आगा बढ़ैत गेल । धन कही विजयकेँ जे हिनकर जान बँचि गेलनि । ओ जानपर खेलि गेल। कहुना कए लगपासक लोककेँ धकिआ कए हुनका घिचलक । ताबेतँ नीरज लस्त पड़ि गेल छलाह । जौँ कनीक काल एहिना पड़ल रहितथि तँ गेल घर छलाह । मुदा हाथक हड्डीतँ टुटिए गेलनि। पुलिस घायल व्यक्तिसभकेँ इलाज हेतु सरकारी अस्पतालमे  लए गेल ।

 विजयअपना भरि बचाबक प्रयास केलक । मुदा के ककरा सुनैत ? किछुगोटे  विजयकेँ घेरि कए अंट-बंट कहए लागल। कोनो कुन्नह रहल हेतैक।किछु कहासुनी भेल । ओहोकिछु बजलाह कि दे- दनादन दे -दनादन तत मारि मारलकनि जे ओ ओहीठाम पड़ि गेलाह । चोट भितरिआ छल । बाहर नहि बुझाइक मुदा हुनकर हालत गड़बड़ाइते गेलनि ।अस्पतालेमे हुनका छातीमे बड़ी जोरसँ दर्द उठल। जाबे केओ किछु बुझैत,किछु करैत ताबे ओ धराम दए खसलाह आ ठामहि रहि गेलाह । लोकसभ ओहिठामसँ उठापुठाकए हुनका आपत्तिकालीनविभागमे लए गेल । डाक्टर नारी देखितहि कहि देलाह-" ई तँ आब नहि छथि"।

लोकसभ आश्चर्यचकित छल जे आखिरएना भेलैक किएक?। पुलिसकेँ सक रहैक जे किछु षड़यंत्र कएल गेल अछि। जौँ से सही अछि तँ तकर सूत्रधारके छथि? एहि प्रश्नक जबाबनहि भेटि रहल छल ।

ओहि बैसारसँ बाँचि कए  निकलि गेलहुँसएह बहुत। बहुतथाकि गेल रही,  किछु आओर करबाक स्थितिमे नहि रही। रचनाकेँ ओहि आदमी संगे लगीचक बसस्टापपर छोड़ि हम ठोकले अपन डेराआबि गेलहुँ । लगैत चल जेना ठाढ़े खसि पड़ब । खाटपर पड़ि गेलहुँ । कखन सुतलहुँ किछु नहि बुझलिऐक । भोरे सुतले रही कि फोनक घंटी बाजल । लताक फोन छल ।ओकरा ई सभ किछु नहि बूझल रहैक । ओ तँ भोर भेने अखबारमे अपन पिताक हाथमे पलास्टर लागल फोटो देखलक । समाचार पत्रसँ ओकरा जानकारी भेलैक जे ओकर पिता सेहो अस्पतालेमे छथि । हुनकर हाथक हड्डी टुटि गेल छनि ।

 “समाचार पत्र तँ पढ़नहि होएब ।"

"हम तँ ओतहि रही ।"

"! कोना की भेलैक?"

"की कहू? हम तँ स्वयं आश्चर्यचकित रहि गेलहुँ । लफड़ा बढैत देखि हम तँ शुरुएमे चलि अएलहुँ । बादमे पता लागल जे झंझट बहुत बढ़ि गेल । पुलिस वलप्रयोग सेहो केलक मुदा बात बढ़िते गेल । विजयक हृदयाघातसँ मृत्यु भए गेलैक । कैकगोटे  अखनहुँ अस्पतालेमे छथि। अहाँक पिता के सेहो चोट लागि गेलनि से नहि बूझल छल ।"

" हम आबि रहल छी । अहाँ तैयार रहब । संगे अस्पताल चलब । "

" ठीक छैक, आउ ।"

हम चाह पिलहुँ । स्नान करिते रही कि घंटी बाजल । बाहर निकलि कए देखैत छी तँ लता ठाढ़ि छलीह।

"आउ, आउ।"

हम स्नान कए भीजले बाहर निकलि गेल रही से देखि ओ हँसए लगली। इसारासँ हुनका बैसए कहि हम स्नानगृहमे वापसगेलहुँ ।धरफरीमे स्नानगृहक फटक खुजले रहि गेल ।हम स्नान करैत रही आ लता फटकक फाटसँ सटल हुलकैत रहथि । हमरा एकर अनुमान जाबे भेल ताबे तँ ओ अंदर रहथि । हम बाहर निकलएलगलहुँ कि ओ हमर गट्टा जोरसँ पकड़ि लेलथि।"

हमरा तँ बकोर लागि गेल ।

किछुकालक बाद दुनू गोटे संगे अस्पताल पहुँचलहुँ । हम लताक संगे आगा बढ़ैत छी तँ स्वागत कक्षमे नीरज भेटि गेलाह।

"हम तँ आबिए रहल छलहुँ । दहिना हाथमे प्लास्टर रहनि। पैरमे कच्चा पट्टी बान्हल छल । कहए लगलाह-" बँचि गेलहुँ । औ बाबू! एहन आफद होएतसे नहि सोचि सकलहुँ ।"

विजयक की हाल छनि?"-नीरज पुछलाह ।

"ओ नहि रहलाह "-हम कहलिअनि । ई सुनितहि नीरज माथपकड़िलेलनि। हमसभ कनीकाल ठामहि रहि गेलहुँ ।फेर सभ गोटे आगा बढलहुँ।ओतए किशुन आ हुनक पत्नी मालती भेटि गेलीह । ओ सभ विजयक आकस्मिक निधनसँ बहुत आहत छलाह । अस्पतालसँ लहास लए जेबाक हेतु परिवारक किछु आओर गोटेक अएबाक प्रतीक्षा कए रहल छलाह ।

नीरज बहुतकालधरि ठाढ़ रहबाक स्थितिमे नहि छलाह। तेँ हमसभ ओहिठामसँ बिदा भए गेलहुँ । एहिघटनाक मासदिन भए गेल । नीरज घरसँ बाहर नहि भेलाह । एकदिन निकलबो केलाह तँ बस अस्पताल धरि । प्लास्टर कटि गेलनि । तकरबाद मासदिन आओर लागत तखने हुनकर हाथ काजक होएत ।एतेकटा घरमे बैसल-बैसल ओ कैकबेर  बहुत दुखी भए जाथि । मुदा कोनो समाधान नहि बुझानि ।लताकेँ बुझेबाक प्रयास करथि तँ उल्टे ओएह बुझबए लागनि ।

एकदिन  लताकेँ प्रशन्न मुद्रामे देखि नीरज कहलकैक -"आगाक की कार्यक्रम अछि?"

"अहाँकेँ ताहिसँ की मतलब?"

एहन जबाबक आशा ओकरा नहि रहैक । तथापि ओ गप्प आगा बढ़बैतबाजल-"बच्चाक हित-अहितक चिंता तँ होइते छैक?"

"मुदा अहाँकेँ ई सभएतेकदिनक बाद किएक सोचारहल अछि?"

"अहाँ एना किएक बजैत छी?"

"सही बात कहि रहल छी तँ खरापलागि रहल अछि।"

"हम कोन परिस्थितिसँ गुजरलहुँ से अहाँ की जाने गेलिऐक?"

"इएह बात हमहु अहाँसँ कहए चाहैत छी । दुनूगोटेमे विवाद बढ़िते गेल ।

नीरज लताकेँ शांत करबाक प्रयास करैत बजलाह -" समय-सालठीक नहि छैक.." ओ एतबे बाजल छलाह की लता लपकि लेलक-

"पापा अहाँ एतेक चिंता जँ पहिने केने रहितहुँ तँ साइत किछु फएदा हेबो करैत । आब ई टंटमंट कए की होएत?अहूँ परेसान होएब आ हम तँ होइते छी।का वर्षा जब कृषि सुखाने। समय चूकि पुनि का पछिताने।

नीरज लताक मुँह तकैत रहि जाइत छथि। मोने-मोने सोचथि-

लता आब कोनो बच्चा नहि छथि । व्यर्थक विवादक परिणाम कहीं आओर  खरापे नहि भए जाए?”

 

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