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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१.शिवशंकर:लघुकथा- कंबल २.रबीन्द नारायण मिश्र:२ टा आलेख ; २ टा लघुकथा आ एकटा यात्रा वृत्तान्त

शिवशंकर

लघुकथा

कंबल

उमाकांत बाबू बैंकक अधिकारी छथि, गरीब घरसँ। मुदा श्रीमतीजी पैघ घरक बेटी छथिन्ह। अपने मिथिलाक संस्कृतिक पोषक मुदा श्रीमतीजी विदेशी संस्कृतिक अनुगामी। श्रीमतीजी फैशनेबल, हवामे उड़ए बाली तितली, विदेशी जकाँ ओहिरन पहिरन, जींस पैंट, हाफ शर्ट, हेयर कट, कटिंग, आइ ब्रो, करिक्का चश्मा, फेशियल चेहरा, हील बला चप्पल, टच स्क्रीन मोबाइल, ई थिक श्रीमतीजीक परिभाषा। देशी मुर्गी बिलायती बोल। एहि सभक विपरीप उमाकामत बाबू सिंपल पैंट शर्टमे नजरि आबथि। दूनू गोटेमे आकाश पतालक फर्क।

उमाकांत बाबूकेँ एकटा कंबल रहनि. सिंगल बेडक, धरि रहैक नीमन। जे हुनका भाइजी बहुत पहिने देने रहथिन्ह। ओ कंबल बड बेसी पुरान भ' गेल रहै। फाटल नै रहैक परंच आउट आफ फैशन जरूर भ' गेल रहै। हुनका घरमे आर कंबल रहै मुदा ओहिमे खास बात रहै। उमाकांत बाबू आबथि आ छतपर ओकरा सुखाबथि आ कहियो काल खीचथि। ओहि कंबलसँ हुनका बड़ सिनेह रहनि।

हमरा मोनमे कतेक बेर जिज्ञासा भेल जे ओहि कंबलमे कोन बात छै। एक दिन हुनकासँ पुछिए देलियनि। ओ अपन कथा बतबए लगलाह...."ई बात ओहि समयक अछि जखन कि बेरोजगारीमे परीक्षा देबए लेल एक शहरसँ दोसर शहर जाइत रही तखन हम एहि कंबलकेँ संगमे लेने जाइ। ई हमर परमानेंट साथी छल। खास क' सर्दीमे ई हमर रक्षा कवच छल। ई खाली कंबल नै हमर अभिन्न अंग अछि। एकर की महत्व अछि से हमरा छोड़ि कियो नै बूझि सकैए।

उमाकांत बाबूक छत आ हमर छत सटले अछि। शहरी सेक्टर बला मोहल्लामे जमीनक कमी रहै छै तँइ छत सटब स्वाभाविक। ई बुझाइत अछि जेना बिंल्डिंग सभ आदमीक उपहास करैत हो जे हम अपना कोरामे कतेक परिवारकेँ आश्रय देने छियै। मुदा मनुख हमरा कतेक वर्गमे विभाजित क' देने अछि। फर्स्ट फ्लोर जेठक, सेकेंड फ्लोर मँझिला भाइजीक, थर्ड फ्लोर देवरक, आ ग्रांउड फ्लोर माँ बाबू जीक। कतेक भेद अछि मनुखमे।

ओहि कंबलसँ श्रीमतीजीकेँ घिन्न छलै। फैशनक दौरमे ओ कंबल बूढ़ भ' गेल छल। पछुआ गेल छल आ अपन किस्मतपर कानि रहल छल। एहि मायावी संसारमे कत्तौ भुतला गेल छल। ओकर भविष्य गेल छलै। समाज हेय दृष्टिकोणसँ ओहि कंबलकेँ परिभाषित क' देने छल। मनुख अपन इतिहास कतेक जल्दी बिसरि जाइत अछि एकर कल्पना करब कठिन अछि। एहि कंबलसँ मुक्ति पेबाक उपाय श्रीमतीजी कतेक दिनसँ ताकि रहल छलीह। आइ उमाकांत बाबू दू दिन लेल शहरसँ बाहर जा रहल छलाह, ओ घरसँ निकलि चुकल छलाह। कबाड़ी बला गलीमे अवाज लगा रहल छल। श्रीमतीजी लेल सुअवसर छल। ओ ओहि कंबलकेँ बेचि देलखिन। कंबल नहि उमाकांत बाबूक आत्मा आइ घरसँ विदा भ' गेल।

 

शिवशंकर

बल्लभगढ़, फरीदाबाद, हरियाणा

 

रबीन्द नारायण मिश्र

२ टा आलेख ; २ टा लघुकथा आ एकटा यात्रा वृत्तान्त

रबीन्द नारायण मिश्र

२ टा आलेख

बिधवा विवाह

समाजक मान्यता, विधि-विधान एवम् लोक व्यवहार समय साक्षेप अछि। जे बात-विचार पचास सय साल पहिने अनिवार्य चलैत छल से आइ-काल्हि जँ लोक करय तऽ हस्यास्पद भय जायत। पहिने बाल विवाह आम बात छल। बेटीकेँ जनमिते जँ माय-बापकेँ कथुक चिन्ता होइक तऽ ओकर विवाहक। कहुना कऽ विवाह भऽ जाइक आ माय-बाप गंगा नहा लेथि। सोचल जा सकैत अछि जे समाजमे बेटीक स्थिति कतेक दायनीय छल..!

ई बात सभ जनैत छैथ जे स्त्रीक बिना पुरुष कतयसँ आयत। जे आइ ककरो बेटी छैक सैह काल्हि ककरो स्त्री, केकरो माय बनतै। तथपि लोकमे अखनहुँ बेटाक प्रति मोह कम नहि भय रहल अछि। पहिने कतेको गोटा बेटाक चक्करमे आठ-नौ सन्तान कय लैत छलाह। लिंग आधारित एहि भेद-भावकेँ कम करबाक किंवा जड़िसँ दुरुस्त करबाक निरन्तर प्रयास होइत रहल।

एक समय छल जखन पतिकेँ मरलाक बाद ओकर पत्नीकेँ ओकरे संगे जरा देल जाइत छल किंवा वो स्वयं जरि जाइत छल। समाज ओकरा सतीक रूपमे महिमा मण्डित करैत छल। ओकर चितापर सती मन्दिर बना देल जाइ छल। सोचल जा सकैत अछि जे वो कतेक क्रूड़ प्रथा छल। एकटा स्वस्थ जीबन्त व्यक्तिकेँ जरा कऽ एहि लेल मारि देल जाइत छल वा वो स्वयं मरि जाइत छल जे ओकर पतिक देहावसान भय गेल, जाहि लेल वो कोनो प्रकारसँ दोषी नहि छल। मरनाइ, जिलाइ ककरो हाथमे नहि छैक। ई एकटा संयोग होइत अछि मुदा तकर एतेक दुखद् परिणाम होइत छल से सोचियो कऽ रोंआ ठाढ़ भय जाइत अछि।

एकटा विदेशी पर्यटक जखन अपन देश घुमैत रहथि तऽ संयोगसँ श्मसान घाटपर एकटा मुर्दाकेँ लऽ जाइत देखलथि। मुर्दा संगे ओकर पत्नी चिकरैत-भोकरैत श्मसान धरि संगे गेल। लोक सभ तमासा देखैत रहल आर वो पतिक लाशक संगे जारनिसँ लादि देल गेल। जोर-जोरसँ ढोल बजा-बजा कीर्तन करय लागल जाहिमे ओहि जीवित महिलाक करूण क्रंदन दबि कऽ गुम रहि गेलैक आ थोड़बेकालमे ओहो पतिक लाशक संगे छाउर भय गेल। (ई सैंकड़ो साल पूर्वक थिक एवम् एकर वर्णन Beyond the seas–माइकल एच. फीसर द्वारा सम्पादित–पुस्तकमे अछि) एहि तरहक घटना ओहि समयमे आम बात छल। स्त्रीगण सभ अपन नियति बुझि एकरा स्वीकार करैत छलीह। प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम मोहन रायक एहिपर ध्यान गेल आ वो ब्रिटिश सरकारसँ गोहार कय एहि सामाजिक कुरुतिकेँ बन्द करौलाह।

समाजमे विधवाक स्थिति बेटीक स्थितिसँ जुड़ल अछि। जँ बेटी पढ़तै, लिखतै, बेटा जकाँ ओकरो अवसर भेटतै तऽ ओहो ककरोसँ पाछा नहि रहत। आइ-काल्हि एहिमे किछु परिवर्तन भेल अछि। लोक बेटीकेँ स्कूल-कालेज पठा रहल अछि। डाक्टर, इन्जिनीयर, अफसर सभ किछु बेटीओ बनि रहल अछि। कानूनमे परिबर्तन भेल अछि। पैत्रिक सम्पत्तिमे बेटा ओ बेटीक हक बरोबरि भय गेल अछि। घरेलू हिंसा कानूनक तहक कोनो महिलाकेँ शारीरिक, मानसिक यातना नहि देल जाय सकैत अछि। दहेज लेब देब गैर कानूनी भय गेल अछि। प्रश्न ई उठैत अछि जे एतेक रास कानूनसँ लैस भारतीय महिला की सभ तरहेँ अधिकार सम्पन्न, सुरक्षित ओ प्रतिष्ठिापूर्ण जीवन-यापन करबाक स्थितिमे आबि गेल छैथ? ई सोचिये कऽ कलम ठाढ़ भय जाइत अछि।

समाजमे बेटीक स्थितिमे सुधारसँ मूलत: शहरी क्षेत्रटाक सीमित अछि। गाम-घरक हालक मोटा-मोटी ओहने अछि। अपना ओहिठाम शिक्षाक स्तर तेहन गड़बड़ायल अछि जे जँ क्यो स्कूल-कालेज जाइतो छथि, किंवा डिग्रीओ हासिल कऽ लैत छथि तैयो हुनका कोनो रोजगार भेटि सकत नहि से संदेहास्पद। जँ आर्थिक निर्भरता बनल रहत, सम्पत्तिक अधिकार मात्र कानूनक किताबे तक सीमित रहि गेल तऽ बेटी कोना बढ़त?

जाहि समाजमे बेटीकेँ शिक्षाक समान अवसर भेटल, पैत्रिक सम्पत्तिमे अधिकार भेटल ओहिठामक महिला निश्चित रूपसँ सभ तरहें आगा भऽ गेलीह। एहिमे केरल राज्यक चर्चा कयल जा सकैत अछि। पुरना समयमे (आ किछु हद तक अखनहुँ) विधवा होइते जेना ओकरापर विपत्तिक पहाड़ टुटि जाइत छल। तत्कालीन समाजक समस्त मान्यता, बिध, व्यवहार ओकरा अपमानिते नहि करैत छल, अपितु अशुभ बुझैत छल। केस कटा लिय, नीक नीकुत खाउ नहि, साधारण कपड़ा पहिरू, उपास-पर-उपास करैत रहू। तेतबे नहि, कोनो शुभकाजमे आगा नहि रहू। आखिर ओकर की दोष रहैक जकर दण्ड ओकरा समाज दैत छलैक? 

लगैत अछि, समाजक पुरोधा सभ असुरक्षा भावसँ ततेक ग्रस्त रहथि जे हुनका आगा-पाछा किछु आओर सोचेबे नहि करन्हि। कतेको ठाम तऽ नवलिग बिधवा भय जाइत छलि आ आजीवन धोर कष्ट एवम् विपत्तिमे जीवन-यापन करैत छलीह। गरीबी, सामाजिक प्रताड़नासँ तंग भय कतेको बिधवा गाम-घर छोड़ि वृन्दावन किंवा आन-आन तीर्थ शरण धय लैत छलीह। अखनो हजारोक संख्यामे वृन्दावनमे बिधवा सभ पड़ल छथि। भारतक उच्चतम न्यायालय हुनका सभक स्थितिपर विचार केने छल। सुलभ इन्टरनेशनल द्वारा हुनका सभ लेल किछु कल्याणकारी योजना सभ सुनबामे आयल छल। मुदा ई सभ ऊँटक मुँहमे जीरक फोरन थिक। जरूरी तऽ ई अछि जे समस्याक जड़िमे जाय ओकरा समूल नष्ट कयल जाय। आखिर पुरुषबिधुर भेलापर विवाह करैत छथि की नहि? तहिना महिलोकेँ ई अधिकार समाज स्वीकृत हेबाक चाही।

यद्यपि यत्र, तत्र सर्वत्र महिला सशक्तीकरणक चर्च होइत रहैत अछि, तथापि व्यवहारिकतामे संकट अछिए। जँ दुर्भाग्यवस क्यो बिधवा भय जाइत छथि तऽ अखनो हुनका नाना प्रकारक यातना सामाजिक प्रताड़नासँ गुजरय पड़ैछ। अस्तु ई विचारणीय थिक जे बिधवा लोकनिक स्थितिमे गुणात्मक सुधार हेतु हुनकर पुनर्विवाहक व्यवस्था हो। एहिमे सभसँ बाधक विवाहसँ जुड़ल खर्चा एवम् जातीय स्वाभिमान अछि। मुदा ई विचारणीय प्रश्न थिक जे समाजक कोनो व्यवस्था जँ एक विदो्रष जीवनकेँ कष्टमय केने रहैत अछि तऽ ओकरामे संशोधन किएक नहि हेबाक चाही?

ओना, कतेको जातिमे बिधवा विवाह पहिनहिसँ चलनमे अछि। कतेको महिला एहिसँ एकटा नूतन जीवन जीबाक अवसर प्राप्त करैत छथि। मुदा किछु जाति विशेषमे अखनो एकरा पारिवारिक प्रतिष्ठासँ जोड़ि कय देखल जाइत अछि। आखिर, ओ प्रतिष्ठाक जे गति होइत अछि, ताहिपर चर्चाक आवश्यकता नहि अछि। एहन बिधवा जकरा सन्तानो नहि छैक, एकरा व्यर्थ निष्ठाक नामपर लगातार कष्ट सहैत रहय, जीवनक समस्त सुख, सम्पदासँ वंचित रहय से कहाँ तक जायज अछि?

कतेको समाजमे ई व्यवस्था अछि जे बिधवाकेँ ओही परिवारक अविवाहित भाए किंवा समव्यस्क सम्बन्धीसँ विवाह कय देल जाइत अछि। निश्चित रूपसँ वो सभ बेसी व्यवहारिक एवम् वुधिआर लोक छथि। मुदा जँ सेहो सम्भव नहि होइक तखन तऽ परिवारक वयस्क सदस्यकेँ सव्यं आगा आबि ओहि महिलाक जीवनमे पुन: स्थापित करबामे सहयोग करथि आ सुयोग्य, सही व्यक्तिसँ विवाह करबामे सहयोग करथि।

जँ बिधवाकेँ सन्तान छैक तखन पुनर्विवाहसँ दिक्कति भय सकैत छैक मुदा एहनो परिस्थितिमे ओहि बच्चा सभक संगे बिधवाकेँ स्वीकार करब सर्वोत्तम समाधान भय सकैत अछि। हम एकबेर यूरोप गेल रही तऽ हमर सभक ड्राइभर अपन परिवारक चर्चा करैत कहय लगलाह जे हुनकर स्त्रीक ई दोसर विवाह छन्हि। पहिल विवाहसँ दूटा सन्तान छन्हि। हुनकासँ विवादक बाद एकटा सन्तान छन्हि। एवम् प्रकारेण वो तीनटा सन्तानक पिता छथि आ सभक भरण-पोषण सहर्ष एवम् समान्य रूपसँ करैत छथि। विदेशमे ई आम बात अछि। ओहिठाम विवाह विच्छेद जहिना होइत अछि तहिना पुनर्विवाह सेहो भय जाइत अछि। फेर अधिकांश महिला पुरुष ओहि स्थिति हेतु तैयारो एहि मानेमे रहैत छथि जे आर्थिक निर्भरता सामान्यत: नहि रहैत अछि। ईहो बुझय जोगर गप्प अछि जे ओकर सभक सामाजक मूल्य अछि जे ओकर सभक समाजक एवम् पारिवारिक संरचना अलग अछि।

अपन भारतीय मूल्यक रक्षा करैत एवम् परिवारक संरचनाकेँ कोनो तरहें बिना दूबर केने विशेष परिस्थितिमे सामाजिक सामंजस्यक व्यबस्था जरूरी अछि जाहिसँ संयोगवश जँ क्यो बिधवा भय जाइत अछि तऽ हुनका तरह तरहक कष्टसँ बचाऔल जा सकय आ हुनक भावी जीवनकेँ सुखद कयल जा सकय।

ओना अपने देशक कतेको राज्यमे बिधवा विवाह आम बात भय गेल अछि। अपनो समाजमे किछु जाति विशेषमे एकरा लोक अखनो ढो रहल अछि जखन कि कतेको जातिमे पहिनहुँसँ ई व्यबस्था रहल अछि। अस्तु एहि कुप्रथाक कोनो मजगूत धार्मिक पक्ष नहि लगैत अछि। ई एकटा जाति विशेषक किंवा वर्ग विशेषक अहंसँ पोषित सामाजिक अभिशाप थिक जकर सुधारपर सभक ध्यान जा रहल अछि, मुदा व्यबहारमे अखनो स्वीकार्य नहि अछि। एहन नहि अछि जे बिधवा विवाह होइते नहि अछि, गाहे-वगाहे उच्च वर्गीय मैथिलोमे ई भय जाइत अछि मुदा अखनो ई एकटा स्वभाविक, सर्वमान्य चलनक रूप नहि लेने अछि, जाहि कारणें कतेको कम व्यसक कन्या जीवनक समस्त सुख, सुबिधासँ वंचित रहि दुखमय जीवन बीतेबाक हेतु विवस छथि।

किछु एहन घटना सभ देखयमे आयल जतय परिस्थितिवश पतिक देहान्त भय गेलाक बाद हुनके परिवारक लोक विवाहक व्यबस्था केलाह आ आइ वो एकटा सुखी परिवारिक जीवन जीबि रहल छथि। पूर्व पतिसँ जे सन्तान छलैक ओकरो नीकसँ पालन-पोषण भय रहल अछि। नव विवाहमे सेहो सन्तान भेलैक। हमर कहबाक तात्पर्य अछि जे सभ किछुकेँ हठाते धर्म-कर्मसँ जोड़ि कय मनुक्खक जीबन नर्क कऽ देब कतहुँसँ उचित नहि अछि।

गाम-गाममे एहन दृश्य देखयमे अबैत रहल अछि जे अपने लोक बिधवाक शोषण करैत छथि। कतेकठाम तऽ ओकर हत्या तक भऽ गेल। ओकर सम्पत्ति अपने लोक लूटि लेलक वा ठगि लेलक आ जखन ओकरा प्रयोजन भेलैक तऽ सभ कात भऽ गेल। तथाकथित मर्यादाक उल्लंघन जखन आम बात भऽ गेल हो, ताहि मर्यादाकेँ व्यर्थ होइत रहब सर्वथा अनुचित।

पारिवारिक जीवन हेतु, भारतीय मूल्यक रक्षा हेतु, वैवाहिक जीवनक महत्वकेँ कमतर नहि आँकल जाय सकैत अछि। परन्तु ओकर आधार मजगूत बनल रहैक ताहि हेतु सोचमे परिवर्तन जरूरी अछि। पूरा दुनियाँ बदलि रहल अछि। इन्टरनेट, मोबाइल, टेलीवीजन, फूसबुक, ह्वाट्सअप सौंसे दुनियाँकेँ एक आँगन (Global Village) मे परिवर्तित कय देलक अछि। एहि परिवर्तनसँ क्यो बाँचल नहि रहि सकैत अछि। गाम-गाम वैह टेलीवीजन, वैह गीत नाद, वैह सीनेमा चलैत अछि। स्वाभाविक अछि जे गामोक धिया-पुतामे आधुनिकताक मानसिकता उत्पन्न होइक। एकरा एकदमसँ छोड़लो नहि जा सकैत अछि। अस्तु आधुनिकताक बिहाड़िमे सभटा उड़िया जाय ओहिसँ पूर्वे हमरा लोकनि स्वत: स्वभाविक रूपसँ परिस्थितिजन्य कारणसँ बिधवा भेल महिलाकेँ पुनर्वास हेतु ओकर सम्मानपूर्ण जीवन-यापन हेतु सोचबाक चाही।

समाज जे गतिशील होइत अछि, जे बदलैत परिवेशसँ सामंजस्य स्थापित करबाक हेतु प्रयत्नशील रहैत अछि, सैह टिकैत अछि। ओकरे विकास होइत अछि। जँ से नहि भेल तऽ अपने बनाओल नियम, कानून वो मर्यादाक बोझसँ स्वत: चरमरा जाइत अछि। तँए जरूरी अछि जे समयक संग तादाम्य स्थापित कय हम सभ नूतन विचारकेँ सहर्ष स्वीकार करी ओ प्रगतिक पथपर आगा बढ़ी।


 

 

आगाँ के देखलक अछि?

 

जखन मनुक्खक जन्म होइत अछि तखन ओकरा संग साँसरहैत अछि परन्तु कोनो नाम नहि, मुदा जखन ओकर मृत्यु होइ छै तखन ओकरा संग नामरहैत अछि परन्तु साँस नहि। साँसनामक बीचक एहि यात्राक नाम जीवन थिक। आब सबाल अछि जे एहि जिनगीकेँ अहाँ केना जीबै छी, एकर की उपयोग करै छी...।

कतेको  गोटे स्वनिर्मित अभावमे जीबैत रहै छथि आ ताजन्म ओकर प्राप्‍ति हेतु सफल, असफल  चेष्टा करैत रहै छथि। कतेको  गोटे ककरो चेला भऽ जाइ छथि, ककरो समर्थक किंवा अनुरागी भऽ जाइ छथि, आ आँखि मुनिकऽ पाछाँ-पाछाँ चलैत रहै छथि। जाबे होश होइ छै ताबे बहुत देर भए गेल रहैत अछि ।

समस्त जीव-जन्तुकेँ प्रकृतिक वरदान स्वरूप जीवन भेटैत अछि। छोट वा पैघ जिनगी जकर जे छै से जीवैत अछि आ चलि जाइत अछि। एकटा  मनुक्खे अछि जे नाना प्रकारक फसादमे पड़ि जीवनक आनन्दसँ कएक बेर वञ्चित रहि जाइत अछि।

जीवनक प्रादुर्भाव एवम् ओकर विकास यात्रा एकटा आश्चर्यजनक प्रक्रिया अछि। छोटसँ छोट मच्छर सँ लऽ कऽ हाथी-मगरमच्‍छ सन-सन विशालकाय जीव सब एहि निर्माण एवम् विकासक प्रक्रियामे सहयोगी अछि। नान्‍हिटा चुट्टीकेँ देखियौ- अनवरत चलैत रहैत अछि। ओकर रस्तामे व्यवधान करबै तऽ, रस्ता बदलि लेत मुदा ठाढ़ नहि होएत। पंक्ति वद्ध हजारक हजार चुट्टी चलिते जाइत अछि। कतए जा रहल अछि? प्राय: जीवनक खोजमे निरन्तर प्रयत्नशील रहैत अछि। प्रकृतिमे स्वत: स्वभाविक रूपसँ जीव मात्रक जीवन रक्षा एवम् आवश्यकता पूर्तिक वैज्ञानिक व्यवस्था अछि। जाहि जीवकेँ जेहेन आवश्यकता अछि, ताहि प्रकारक शरीरक रचना भेल अछि। ककरो पैघ दाँत अछि तऽ ककरो पैघ सूढ़। ककरो शरीरपर काँट सन-सन रौंआँ लागल रहैत अछि। प्रकृति माता अपन समस्त सन्तानक जीवन-रक्षाक गजब व्यवस्था केने छथि।

एहि संसारमे निरन्तर किछु-किछु घटित होइत रहैत अछि। सामान्यत: हमरा लोकनि निरपेक्ष रहैत छी। जे होइ छै से होइ छइ। बात तखन बदलि जाइत अछि, जखन ओहि घटनाक सम्बन्ध अपनासँ होइत अछि।

नाना प्रकारक जीव-जन्तु जन्‍मैत अछि, मरैत अछि, मुदा हमरा लेल धन- सन। मुदा जौं परिवारमे खास कऽ अपन लोककेँ सन्तानक जन्म होइछ तऽ लोक उत्साहित भऽ जाइत अछि। आनन्द मनबए लगैत अछि। नाच-गान करैत अछि। वैह हाल मृत्युक संगे होइत अछि। दिन-राति लोक मरैत अछि। कोनो चर्चा नहि होइत अछि। जे मरलै से मरलै, हम थोड़े मरब। सबकेँ मरितो देखि लोककेँ अपन मृत्युक अन्‍दाज नहि भऽ पबैत छइ। ताहि मानसिकताक कारण जँ निकटक व्यक्तिक मृत्यु भऽ जाइत अछि तऽ लोक हतप्रभ भऽ जाइत अछि। लोक भगवानकेँ दोष देबए लगैत अछि।

एकबेर हम डॉ. सुभद्र झाजीक संगे इलाहावाद पएरे कतौ जाइत रही। रस्तामे पुछलियनि-

 अहाँक हिसाबे भगवान छथि कि नहि?”

ओ कहला-

हमरा हिसाबे तऽ भगवान नहि छथि आ जौं छथि तऽ बड़ बइमान छथि।

पुछलियनि-

से किएक?”

ओ आगू कहला-

पेटमे जे बच्चा मरि जाइत अछि, तकर कोन दोष? आ जँ दोष रहिते छै तऽ ओकर जन्म होबए दितथिन आ तखन ओ अपन कर्मक फल भोगैत। पेटेमे मरि जेबाक की औचित्य?”

मुदा मृत्यु तऽ होइते रहै छइ। ओहिपर ककरो बस नहि रहल ।

लोक कतए-सँ आएल, कतए जाएत? ई शाश्वत प्रश्न अछि। लोक नित्य-प्रति उठैत अछि,हि उमीदमे जे ओ अहिना रहत, मुदा सत्य तऽ यएह अछि जे साँझ धरि जीवनक एक दिन कम भऽ गेल रहैत अछि।

मृत्यु एक दुखद प्रसंग अछि।  निकट सम्बन्धीसँ समाजिक, परिबारिक सम्पर्कक एकाएक पूर्ण विराम लागि जाइत अछि। कएक बेर मृत्युक भयसँ चिन्ता, अवषाद वा निराशाक भाव पसरि जाइत अछि। किछु लोककेँ मृत्युक बाद पूर्व कर्मक अनुसार स्वर्ग वा नर्क जेबाक चिन्ता सेहो ग्रसित केने रहैत अछि।

मृत्युक कारण अनेको भऽ सकैत अछि। दुर्घटना, विमारी, हत्‍या, आत्महत्‍या आ से सब नहि तऽ वृद्धावस्था। उम्रक संग-संग जीवन रक्षक तत्व सब घटि  जाइत अछि। विमारीसँ प्रतिरोधक क्षमता क्षीण भऽ जाइत अछि। शरीरक अंग प्रत्‍यंग क्रमश: काज केनाइ छोड़ि दैत अछि, जकर परिणति मृत्युमे भऽ जाइत अछि।

कहबी छै जे टिटही टेकल पर्वत।चिड़ै अपन टाँग उन्टा आकाश दिशि कऽ कऽ सुतैत अछि, जे जँ आकाश खसत तऽ ओ रोकि लेत। यएह हाल मनुक्खक अछि। सौंसे जिनगी अपसियाँत रहैत अछि जे ओकरा बिना दुनियाँक काज नहि चलत ओ रहत तखने कोनो काज होएत अन्यथा दुनियाँ ठामहि धँसि जाएत। मुदा जीवनक सत्य किछु आर अछि।

ककरो लेल ई दुनियाँ ठाढ़ नहि रहैत अछि। जखन जवाहर लाल नेहरू प्रधान मंत्री छलाह तऽ लोकमे चर्चा होइक जे नेहरूजीक बाद देश केना चलत? मुदा ई चिन्ता व्यर्थ साबित भेल। देश चलि रहल अछि।

लोक अबैत अछि, जाइत अछि, परन्तु संसारक चक्र निरन्तर गतिमान रहैत अछि। समय ककरो प्रतीक्षा नहि करैत अछि। भोर, साँझ, इजोरिया, अन्‍हरिया अनवरत होइत रहैत अछि। जीवन-यात्राक अन्त तऽ भेनाइए अछि। कतेक बेर लोक स्वयं थाकि जाइ छथि, ओ विश्रामक निरन्तरता हेतु स्वत: मृत्युकेँ आलिंगन कए लैत छथि। उदाहरण स्वरूप आ. विनोव भावे  अनशन कए प्राणक त्‍याग कए देलनि

स्वामी विवेकानन्द, आदि शंकराचार्य सन-सन महान अध्यात्‍मिक व्यक्ति सब कमे बयसमे चलि जाइत रहलाह। महात्मा गाँधी सन त्‍यागी ओ निष्ठावान व्यक्तिक हत्‍या कऽ देल गेल। तीन-तीन गोली लगलाक बाबजूद ओ राम-राम कहैत प्राणक त्‍याग केलनि। अस्तु मृत्यु कखन, ककरा केना होएत एवम् कोन परिस्थितिमे होएत तकर कोनो ठेकान नहि अछि मुदा ई बात पक्का अछि जे मृत्यु होएत, जखन हो, जेना हो, जतए हो। गीतामे तऽ कहल गेल अछि जे मृत्युक समय ओ स्थान पूर्व निर्धारित अछि।

विज्ञान एवम् तकनीकीक विकाससँ जीवन एवम् मृत्यु सेहो प्रभावित भेल अछि। पहिने मामूली विमारीसँ लोक मरि जाइत छल। सुलबाई, मलेरियाक कोनो इलाज नहि छल। हैजा, तपेदिक सन संक्रामक विमारीसँ गामक-गाम सुडाह भऽ जाइत छल। क्रमश: तरह-तरह केर दबाइक अविष्कार भेल। लोकक आयुमे इजाफा भेल। लेकिन नव-नव आर कतेको  घातक  विमारी सब बाहर भऽ गेल, जकर तोड़ विज्ञानक पास नहि अछि।

अस्पतालक सुविधा एवम् चिकित्साक बेहतर उपलब्‍धिसँ लोक कएबेर स्वस्थ भऽ दीर्घ जीवनकेँ प्राप्त केलक मुदा कतेको  मामलामे विमार व्यक्ति अस्पतालेमे घिसियौर कटैत रहै छथि। अत्यन्त बेमार व्यक्तिकेँ इच्छा मृत्युक मांगक चर्चा होइत रहैत अछि। कहक मतलब जे विज्ञानक पराकाष्ठा मृत्युक पुरुषार्थकेँ कम नहि कऽ सकल।

समयक चपेट तेहन निरन्तर ओ प्रवल अछि जे एकर परिणामक कल्‍पनो नहि कएल जा सकैत अछि। जहिना परमाणु बमसँ विध्‍वंस होइत, आ गामक-गाम लुप्त भऽ जाइत, तहिना समयक अचूक आघात/प्रतिघात कोनो बमसँ कम नहि अछि। सौंसे गामसँ घरे-धरे लोक बिला गेल। गनि कऽ देखल जाए तऽ साइदे क्यो पुरान लोक भेटता, कतए गेलाह सब गोटे? मुदा परमाणु बमक विध्वंस मात्र अनिष्टकारी होइत अछि, बाल-बच्चा, वृद्धमे कोनो विभेद नहि कऽ पबैत अछि। विनाशक बाद दूर दूर धरि श्रृजनक सम्भावना नहि रहि जाइत अछि।

प्रकृति प्रदत्त विनाशक संगे श्रृजन भाए-बहिन जकाँ संगे चलैत अछि। जँ एकटा पात झड़ैत अछि तऽ दसटा हरियर कंचन पल्लवसँ गाछ समृद्ध भऽ जाइत अछि। लोक बीतल बातकेँ बिसरि आगाँक तैयारीमे लागि जाइत अछि।

अद्वैतवादीक अनुसार आस्‍तित्व केवल अनन्तक  अछि, शेष सब माया थिक। कोनो जड़ वस्तुक यथार्थ व्रह्म छथि, एवम् प्रकारेण जीवन रहए नहि रहए, ओकर आस्‍तित्वपर अन्तर नहि होइत अछि। 

समं पश्यन् सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।

न हिनस्‍त्‍यात्मनात्‍यानं ततो याति परांगतिम्।।

 

                (गीता १३/१८)

 

जे सर्वत्र ईश्वरकेँ सब भावसँ सर्वत्र अवस्थित देखि ओ आत्मा द्वारा आत्माक हिंसा नहि करै छथि, से मुक्त भऽ जाइ छथि।

कहक माने जे मोनेक ऊपर सब बात निर्भर करैत अछि। घटनासँ बेसी ओहिपर हमर दृष्टिकोणसँ ओकर महत्व कम बेसी भऽ जाइत अछि। जीवनमे जहिना तरह-तरहक घटना घटित होइत रहैत अछि, तहिना जन्म ओ मृत्यु सेहो होइते रहैत अछि। समस्या घटनासँ नहि अपितु घटना विशेषक लगावसँ होइत अछि।

इहैब तैर्जित सर्गो येषां साम्‍ये स्थितं मन:

निर्दोष हि समं ब्रह्म तस्‍मात्‍ ब्रह्मणि ते स्थित:

गीता ५/१९

जिनकर मन साम्‍यभावमे अवस्थित अछि, ओ एहि ठाम जीवन मृत्युक संसार चक्रकेँ जीत लेलाह अछि, चूँकि ब्रह्म निर्दोष ओ सर्वत्र  सम छथि, अस्तु ओ ब्रह्ममे अवस्थित छथि। कहक माने जे मोनमे नीक भाव होइ तऽ मनुक्खे जीवन-मरणक प्रभावसँ हटि ब्रह्मलीन भऽ जाइत अछि। जीवनमे प्रतिपल परिवर्तन होइत रहैत अछि। लोकक सोच समयक संगे बदलैत रहैत अछि। जाहि बातकेँ लोक बच्चाक समयमे नीक कहैत अछि, मुदा पैघ भऽ ओही बातपर ओकर विचार बदलि जाइत अछि।

वृद्धकेँ युवावस्थाक गप्प-सप्प सोचि हँसी लागि जाइत छइ। कहक माने जे मनुक्खक निरन्तर बदलिते रहैत अछि। जँ कोनो उपायसँ मृत्युपर बस चलितै तऽ कोनो बड़का आदमी नहि मरैत। धन्ना सेठ सब अमर बुटी खा-खा कऽ अमर भऽ जाइत आ गरीब, गुरबा सब नहि जीबैत। मुदा मृत्यु एकटा एहन प्रश्न चिन्‍ह अछि जकर जवाब ककरो लग नहि अछि। राजा, रंक ,फकीर सब हतप्रभ भऽ एकरा स्वीकार करैत अछि, कोनो विकल्‍पो नहि छइ।

हम सब बच्चामे सुनि -पुरान घर खसे, नव घर उठे। ई फकरा जीवन-मरणक चक्रपर पूर्णत: लागू होइत अछि। जहिना बुढ़-पुरान लोक सब चलि जाइ छथि, ओहिना किंवा ओहूसँ बेसी तेजीसँ नव जीवनक सृजन होइत अछि। जहिना पतझड़क बाद नव पल्लवसँ गाछ वृक्ष हरियर भऽ जाइत अछि, ओहिना गाम-घर नवजात शिशुक जन्मसँ हरल-भरल रहैत अछि।

हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ। जे हेबाक छैक से होइत अछि। एहिपर माथा-पच्‍ची व्यर्थ। क्यो जीविते सुसम्पन्न परिवारक अंग भऽ जाइत अछि, तऽ क्यो रस्ता कातमे जन्‍मेसँ समय बितबै लेल मजबूर भऽ जाइत अछि। रामकृष्ण परमहंश सन महात्मा कैंसरसँ पीड़ित भऽ असाध्य कष्ट भोगलथि। महात्मा गाँधी सन शान्‍तिक समर्थक हिंसाक शिकार भऽ गेलाह आ हत्‍याराक गोलीसँ हुनक मृत्यु भेल।

ई सब देखि-सुनि मानए पड़त जे एक्के जन्मक नहि अपितु अनेकानेक जन्मक कर्मफल मनुक्खे पछोर केने रहैत अछि। कतेक मनुक्ख साधारण प्रयास करितहि लक्ष्‍य प्राप्त कए लइ छथि तऽ क्यो जीवन भरि कष्टमे रहि कऽ दुनियासँ चलि जाइ छथि। ई सब केना आ किएक होइत अछि, तकर सटीक उत्तर देब  कठिन अछि। मुदा भाग्‍यक कोनो जवाब नहि ।

भाग्‍यं फलति सर्वत्र, न विद्या न च पौरुष:।

पछिला-अगिला जन्म क्यो देखलक नहि, मात्र अनुमाने लगाओल जा सकैत अछि मुदा वर्तमान जीवनमे जे किछु देखि-सुनि रहल छी से आश्चर्यसँ भरल अछि।

जन्मसँ प्रारम्भ आ मृत्युसँ अन्त होइत एहि जीवन-यात्राक पुनरावृति होएत, नहि होएत...। ताहि पर तरह-तरहक मत अछि। मुदा ई तय अछि जे एहि जीवनमे बहुत किछु देखबा-सुनबामे अबैत अछि, जाहिसँ वर्तमान जीवनकेँ सुखी ओ शान्त कएल जा सकैत अछि। अशान्तस्‍य कुतो सुखम्‍!

अस्तु हमर पूर्वज लोकनि शान्‍तिक हेतु प्रार्थना करैत रहलाह।

जे किछु एहि जीवनमे प्राप्त अछि, से अपना आपमे अद्भुत अछि, अद्वितीय अछि। आगाँ के देखलक अछि?

रबीन्द्र नारायण मिश्र

 

२ टा लघु कथा

एकसरि

पण्डितजी बेश कर्मकाण्डी छलाह। भोरसँ साँझ धरि जतेक काज करितथि सभमे भबानकेँ स्मरण अवश्य करितथि। मंत्रोच्चार करैत उठितथि आ मंत्रेच्चारेक संग सुतितथि। बेश त्रिपुण्ड आ ताहिपर लाल ठोप हुनक ललाटकेँ शुशोभित केने रहैत छल। ताहिपर सँ हरदम मुँहमे पान कचरैत, लाल-लाल पानक पीक फेकैत ओ साक्षात् कालीक अवतार लगैत छलाह। कारी चामपर ललका वस्त्र धारण कय जखन वो भवतीक बन्दना करय पहुँचैत छलाह तँ वातावरणमे एकटा अपूर्व सनसनी पसरि जाइत छल।

पण्डितजीक उम्र करीब ४५ बर्ष होयतन्हि। दूआ बेटी आ एक बेटा छलन्हि। घरवालीक स्वर्गवास आइसँ दस साल पहिने भय गेल छलन्हि। पण्डितजीक दुनू बेटा वेश सुन्नरि आ लुड़िगर छलन्हि। मुदा हुनका पासमे टाकाक अभाव छलन्हि तँ कतहु कन्यादान पटैत नहि छलन्हि। बेटा भिन्न भय गेल छलखिन्ह आ पण्डितजी अपन दुनू बेटीक संग एकठाम छलाह।

पण्डितजीक घरक आस-पासमे बेश सम्पन्न परिवार सभ छलैक। पण्डितजीक गुजरो हुनके सभहक माध्यमसँ होइत छलन्हि। बेटा अपन घरवालीक संग दरिभंगामे रहैत छलखिन्ह। ओहिठाम डिस्ट्रीक्ट बोर्डमे कैसियरक काज करैत छलाह। मुदा पण्डितजीकेँ किछु मदति नहि करैत छलखिन्ह। वो अखनो पण्डिताइक बले जीवैत छलाह। दुनू बेटी समर्थ छलखिन्ह। गामेक हाइ स्कूलसँ मैट्रिक धरि सभकेँ पढ़ौलखिन्ह। आगा पढेबाक सामर्थ्य नहि रहन्हि। वियाहक लेल घटपटायल छलाह मुदा कतहु टाका नहि भेटैत छलन्हि। बिना टकाक कोनो लड़का वियाह करय हेतु तैयार नहि छलन्हि। यैह सभ चिन्तामे वो चिन्तित रहैत छलाह।

ओना पण्डितजीक सम्बन्ध पूरा गाममे सँ मधुर छलन्हि। मुदा दू-तीन परिवारक लोक हुनका बेशी आदर करैत छलखिन्ह। हीरा बाबूक ओतय तँ भोर-साँझ दू घन्टा जरूर बैसार होइत छलन्हि। मुदा पण्डितजी ककरो कहियो अपना हेतु किछु कहलखिन्ह नहि। हीरा बाबूकेँ चारिटा बेटा छलखिन्ह। दूटा तँ बाहर रहैत छलखिन्ह मुदा छोटका दुनू पालिमे मैट्रिक पास केने छलखिन्ह आ बससँ रोज मधुबनी जाइत छलैन्ह किलास करय। सरोज ओ मीरा सेहो ओकरे सभहक संगे मैट्रिक पास केने छल। एक दिन सौंसे गाम सुतल आ सुति कऽ उठल तँ गुम्मे रहि गेल। सरोज चुपचाप घरसँ निपत्ता भय गेल छलैक। घरे-घर तका-हेरी भेलैक मुदा कोनो पता नहि। आन्हर हीराबाबूक दोसर बेटा सेहो काल्हियेसँ गायबछलैक। सौंसे गाममे कनाफुसी होमय लगलैक। पण्डितजी गरीब जरूर छलाहमुदा हुनका अपन प्रतिष्ठाक पूरा ख्याल छलन्हि। ओ अहि गम्भीर चोटकेँ नहि सहि सकलाह आ रातिमे सुतलाह से सुतले रहि गेलाह। मीरा एकसर भय गेलीह। गुम्म, सुम्म आश्चर्यचकित ओ सोचि नहि पाबि रहल छलीह जे की करथि।

मीरा आब एकसरिछल। आगू-पाछू क्यो नहि। बापक मरला चारि दिन भय गेल छलै। भातिज आगि देने छलन्हि।

सौंसे गाममे सरोजक भगबाक समाचार बिजली जकाँ पसरि गेल रहैक। मीराक तँ बकारे नहि फुटैत छलैक। की करए। पाँचम दिन सभ दियाद-बादक बैसार भेलन्हि। तय भेल जे गाम लऽ कऽ श्राद्ध भय जाय। पैसा-कौरी हीराबाबू गछलखिन्ह। मीरासँ मात्र एतबा गछबा लेल गेलैक जे काज भेलाक बाद घर-घराड़ी जे पण्डितजीक एक मात्र सम्पत्ति छलन्हि जे हीराबाबूक नाम कय देल जयतन्हि। बैसार खतम भेल मीरा गुमसुम एकचारीदिस देखि रहल छल। पण्डितजीक श्राद्ध नीक जकाँ समपन्न भेल। हीराबाबू रजिष्टारकेँ गामेपर बजा अनलाह। लिखयी सम्पन्नभय गेल। हीराबाबू मीराकेँ कहलखिन्ह-

मीरा, मास दू मास अही घरमे रह। तोरे घर छौक ने।

मीरा चुपचाप सुनैत रहल जेना ठकबिदरो लागि गेल हो।

अपने गाममे, अपने घरमे मीरा बेघर भऽ गेल छल। गामक लोक ओकरा प्रति सहानुभूतितँ देखबैत छलैक मुदा महज फार्मेल्टी। धीरे-धीरे ओहो खतम। पन्द्रह दिन भय गेल छलैक घरक रजिष्ट्रीक। मीराकेँ आब ओहि घरमे एक पल बितायब असम्भव लगैत छलैक। एक दिन सैह सभ सोचि रहल छल कि लगलैक जेना दरबाजापर क्यो ठाढ़ होइक।

हीराबाबू, अपने एतेक रातिमे..?”

हीराबाबू किछु बजबाक हिम्मति नहि कय पाबि रहला छलाह। मीराक तामस अतिपर पहुँच गेलैक। ओ चिचियैल-

चोर! चोर!”

हीराबाबू भगलाह। अगल-बगलक लोकक ओहिठाम भीड़ एकट्ठा भय गेल छलैक। मीरा भोकासि पाड़ि कऽ कानि रहल छल। दाइ-माइ सभ दस रंगक गप-सप्प करैत पहुँचि गेल छलैक। जकरा जे मोन होइक से बजैक। मीरा चुपचाप सभ किछु सुनैत रहल। धीरे-धीरे भीड़ ओहिठामसँ हटैत गेलैक। राति गम्भीर भेल जाइत छलैक। सौंसे गामक लोक सुति रहल छलैक। मीरा चुपचाप गामसँ बाहर भऽ गेल। ओकराकिछु नहि बुझल छलैक जे वो कतय जा रहल अछि मुदा कोनो दोसर बिकल्पो नहि रहि गेल छलैक।

मीरा बड्ड पढ़लो नहि छल। शहरमे कहियो रहल नहि छल। मुदा तकर बादो ओकरा कोनो गम नहि छलैक। टीशनपर गाड़ी आबि गेल छलैक आ आर अधिक सोच-विचार करबाक अवसरो नहि छलैक। ओ तरदय टीकट कीनलक आ गाड़ीपर चढ़ि गेल। ट्रेनमे बेश भी छलैक। किछुकाल तँ वो ठाढ़े रहल मुदा ताबते ओकरा चिर-परिचित अमित सेहो ओकर सामनेक सीटपर बैसल भेटलैक। हीरा बाबूक ज्येष्ठ पुत्र अमित। मीराकेँ ट्रेनमे धक्कम-धुक्की करैत देखि ओ तुरन्त उठि गेलैक। 

मीरा तूँ कतय जा रहल छेँ?”

पुछलकै अमित। मीरा ओकरा देखि कय अवाक् रहि गेल। किछु बजबे नहि करैक। अमित ओकरा अपना सीटपर बैसा देलकै। अगिला टीशनपर किछु यात्री उतरलैक। अमित सेहो ओहिठाम उतरय चाहैत छल मुदा मीराकेँ एकसर छोड़ि देब ओकरा नीक नहि लागि रहल छलैक। ओ मीरासँ ओकर गन्तव्य पुछय चाहलकै। मुदा मीरा किछु बजबे नहि करैक। बड़ मुश्किलसँ मीरा ओकर कहब मानि ओतहि उतैर गेल। आखिर ओकर कोनो गन्तव्य नहि छलैक। गाड़ी सीटी दैत ओहिठामसँ आगा बढ़ि गेलैक।

ट्रेनपर सँ उतरि कय मीरा कानय लागल। अविरल अश्रुक प्रवाह देख अमितक मोन करूणासँ भरि गेलैक। ओ मोनहि मोन निश्चय केलक जे मीराकेँ ओकर घर आपस दिआ कऽ रहत चाहे ओकरा कतबो संघर्ष कियैक नहि करय पड़ैक। ओ बड़ मुश्किलसँ मीराकेँ चुप केलक आ अपना संगे गाम आपस नेने अयलैक।

ओहि दिन पूरा गामक बैसारी भेलैक। सभ हीराबाबूकेँ छिया-छिया कहलकन्हि। ताबतमे अमिकत कतहुसँ आयल आ साफ-साफ घोषणा कय देलक जे वो मकान मीराक छैक ओओकरे रहतैक। सौंसे गौंवा प्रसन्न भय ओकर गुणगाण करय लागल। मुदा हीराबाबूकेँ जेना नअ मोन पानि पानि पड़ि गेलन्हि। बैसारीसँ लौटि ओ छटपटायल रहथि। साँझमे बाप-बेटामे बेश विवाद पसरि गेलन्हि। मुदा अमित हुनकर गप सुनबाक हेतु तैयार नहि छल आ एकबेर फेर साफ-साफ कहि देलकन्हि जे एहि अन्यायमे ओ हिनकर संग नहि देतन्हि। बाद-विवाद बढ़िते गेल। अन्ततोगत्वा हीराबाबू कम्बल, बिछाओन आदि सरिओलन्हि आ गामसँ विदा भय गेलाह। क्यो टोकलकन्हि नहि। अमित मोने-मोन सोचैत रहल- भने ई आफद टरि रहल छथि।  

हीराबाबू तँ गमसँ चलि गेलाह मुदा मीराकेँ तैयो चैन नहि भेटलन्हि। सौंसे गाममे दुष्ट लोक सभ मीरा आ अमितक बारेमे नाना प्रकारक कुप्रचार करय लगलैक। रोज एकटा नव अफवाह गामक एक कोणसँ निकलैत आ दोसर कोण धरि पसरि जाइत। मीराकेँ ई सभ गप्प क्यो-ने-क्यो आबि कय कहि दैक। ओ बड़ संवेदनशील छल, भावुक छल, तँए एहन-एहन गप-सप्प सुनि कय कानय लगैत छल। एक दिन अहिना एसगरे अँगनामे कनैत रहय। अमित कतहुसँ आबि गेलै। ओकरा एना कनैत देखि बड़ तकलीफ भेलै अमितकेँ।

मीरा नहि कान!”

जेना कि सभ बात ओकरा बुझले होइक।

सुन! हमर बात मानि ले। हमरासँ बियाह कऽ ले। बाज सही, जकरा जे मोन होइक।

मीरा आर जोरसँ कानय लगल। अमित ई सभ नहि देखि सकल आ चुप्पे ओतयसँ सरकि गेल।

तकर बाद अमित दोबारा घुरि कय नहि अयलैक ओकरा लग। पूरा गाममे हल्ला भय गेलैक जे अमित कतहु चल गेल। मीरा ओतेकटा गाममे फेर एकसर भय गेल छल। गाममे कोनो थाहपता नहि छलैक।

बच्चा सभकेँ ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कऽ गुजर करैत छल। मुदा अमितक एकदम गामसँ निपात भय गेलाक बाद ओ अत्यधिक दुखी छल। ककरोसँ किछु गप करबाक इच्छा नहि रहैक। एतबेमे ककरो गरजब सुनेलैक। हीराबाबूक पितियौत अगिया बेताल छलाह।

कहाँ गेल पण्डितक बेटी...!” इत्यादि-इत्यादि।

मीराकेँ ई सभ गप नहि सहि भेलैक। मुदा ओ किछु बाजियो नहि सकल। असोरापर करोट भऽ गेल। चारूकातसँ लोक सभ दौड़लै। हल्ला भऽ गेलैक जे मीराक हार्ट फेल कऽ गेलैक। एक बेर फेर ओ घराड़ी सुन्न भय गेलैक।


 

असगुन

गाम-घरमे कतेको प्रकारक असगुन सभ प्रसिद्ध अछि। जेना क्यो यात्रापर विदा हो आ नढ़िया रास्ता वायासँ दायाँ काटि दियै, किंवा क्यो विदा होइतकाल पाछासँ टोकि दियै। बुढ़बा बाबाकेँ एहि सभहक बेश विचार छलन्हि। जँ घरक क्यो विदा होइत आ कतहु क्यो छीक दैत तँ वो चिरंजीवी भव: अवश्य कहितथि। तहिना आर-आर अपशकुन जँ होइतैक तँ ओकर विवारण कय लितथि।

ओहि दिन गाममे हाट लागल रहैक। तीमन-तरकारी सभटा हाटेपर सँ कीनल जाइत छलन्हि। ओहुना हाट दिनक ओ नियमसँ  ओतय पहुँचैत छलाह।

रविक दिन छलैक। हाट जयबाक तैयारी ओ दुइए बजेसँ प्रारम्भ कय देने छलाह। जहाँ चारि डेग आगा बढ़ैत कि एक ने एकटा अपसगुन भय जान्हि। एवम् प्रकारेण चारि बाजि गेल। सूर्यास्त करीब छल। हारि कय वो बेंत घुमबैत विदा भेलाह।

कनिके आगा बढ़लाह कि मुनेसरा सामनेमे पड़ि गेलन्हि।

प्रणाम पंडीतजी!” –बाजल मुनेसरा।

नीके रह”- मुनेसराकेँ आर्शीवाद दैत पडितजी आगा बढ़लाह। मोने-मोन कहि नहि की की घुनघुना रहल छलाह। मुनेसराकेँ एकेटा आँखि छलैक। गाममे दाहाक दिन मारि भय गेल रहैक। बेस फनैत छल ओ। लाठी लेने फानि गेल छल। ताबतमे क्योओकरे निशाना बना कय एकटा सीसाक बोतल फेकलकै। ओकर सौंसे आँखि लहु-लुहाम भय गेल रहैक। ओही घटनाक बाद ओ असगुन भय छल। प्राय: सैह सभ सोचैत पंडितजी आगा बढ़लाह।

हाटपर बेश भीड़ छलैक। तीमन-तरकारीक भरमार छल। मुदा पंडितजीक आदति छलन्हि जे कोनो चीज ओ ठोकि-ठोकि कऽ करितथि। बीच बजारमे सजमनिक दाम मोलबति-मोलबति पहुँचलाह कि चारि गोटेमे एक दिससँ धुक्का मारैक आ चारि गोटे दोसर दिससँ। सामनेसँ दू-तीन गोटे हाँ-हॉं करैत पण्डितजीक रक्षा करय आबि गेलाह। धक्का-धुक्की खतम भेल तँ पण्डितजी आगा बढ़लाह। सजमनिक दाम मोलेलन्हि आ भाव पटि गेलापर जेबीसँ पैसा निकालय लगलाह कि अबाक रहि गेलाह। जेबी नदारद। पण्डितजी ठोह पारि कय कानय लगलाह। सौंसे ई खबरि बिजलौका जकाँ पसरि गेल। पण्डितजी माथा हाथ देने घर आपस अयलाह। तहियासँ वो असगुनक डरे छाँह कटने फिरथि।

पण्डितजीकेँ तीनटा कन्या छलन्हि। प्रथम कन्याक कन्यादान तय भय गेल छलन्हि। नीक कुल-शीलक लड़का रहैक। अगहनक पुर्णिमाक बियाह तय भेलन्हि। बरक हाथ उठयबाक हेतु विदा होइत छलाह कि कियो तराक दय छींकनने। छींक...छींक...छीक...। हुनकर माथामे ई छींक घूमय लगलन्हि। पण्डितजीक टांग एकाएक गतिहीन भय गेलन्हि। ओ आगा बढ़य हेतु एकदम तैयार नहि छलाह। सौंसे गामक लोक करमान लागि गेल छल। पण्डितजी गुम। किछु बजबे नहि करथि। तेहन शुभ मुहुर्त्त छल जे छींकक चर्चो करब असगुन लगन्हि। लोक सभकेँ किछु फुराइक नहि जे आखिर बात की भेल। अखने तँ पण्डितजी टप-टप बजैत छलाह..!

गाम भरिक लोक पण्डितजीकेँ घेरि लेलकन्हि।

पण्डितजी की भेल?”

मुदा ओ तैयो गुम्म। अन्ततोगत्वा लोक हुनका उठा-पुठा कय डाक्टरक ओहिठाम लय गेल। ओतय डाक्टर हुनकरअवस्था देखि बेश सीरियस भय गेलाह आ कहलखिन्ह जे हुनका गम्भीर भावनात्मक अवधात भेलन्हि अछि। तात्कालिक उपचारक हेतु जहाँ  वो सूई देबय लगलाह कि पण्डितजीकेँ नहि रहि भेलन्हि। ओ गरियबैत ओहिठामसँ गामपर भगलाह। ताबत भोरक चारि बाजि गेल छल। आ बरक ओहिठाम जयबाक कार्यक्रम रद्द भय गेल। ठीके असगुन भय गेलन्हि।

ताहि दिनसँ पण्डितजी असगुनसँ बड्ड डराथि। ओहि दिन हुनकर मझिली बेटीक तहिना आँखि बड़ फरकय लगलन्हि। पण्डितजी एकदम अपसियाँत भय गेलाह। अबश्य कोनो गड़बड़ी होमयजा रहल अछि।

ओ अपन अपन बेटीकेँ तुरन्त अपना लग बैसा लेलथि कि ताबतेमे एकटा गिरगिटहुनकर बायॉं हाथपर खसल। पण्डितजी ठामहि फानलाह। पैरमे खराम छलन्हि। दरबज्जा बेस ऊँच छलैक। दलानपर ठामहि चितंग भय गेलाह। बायाँ पैरक हड्डी टुटि गेल छलन्हि। सौंसे गाम!  पण्डितजी बाप-बाप चिचिआय लगलाह। सभ गोटे हुनका लादि कय अस्पताल लय गेल। लाख कोशिशक बाबजूद ओ हड्डी नहि जुटल। पण्डितजी जन्म भरिक हेतु नाँगर भय गेलाह।

तहियासँ पण्डितजी रोज भोरे उठैत देरी भगवानकेँ गुहारि देथि-

हे भगवान! असुगनसँ जान बचायब।

मुदा भावी प्रवल होइत छैक। होइत वैह छैक जे हेबाक रहैत छैक।

एकादशीक दिन छलैक। महादेवक दर्शन करय जाइत छलाह। झलफल होइत छलैक। ताबतमे एकटा नढ़िया वामाकातसँआयल आसामने बाटे दायाँकात जुजरि गेल। पण्डितजी ठामहि खसलाह।

हे महादेव! आब अहीं प्राणक रखा करू।

कहैत-कहैत पण्डितजी वेहोश जकाँ भय गेलाह। तारा सभ एकाएकी हुनकर ई दुर्दशा देखबाक हेतु अपस्याँत छल। बो बेचारे एकहुँ डेग घुसकय हेतु तैयाक नहि छलाह। आ ने घुसकबाक हुनकामे तागति रहि गेल छलन्हि।

पण्डितजीकेँ फेर कहि नहि कहाँसँ हिम्मत अयलन्हि। ओ चोटे पाछा घुमलाह। तैबीच एकबेर फेर वैह नढ़िया वायाँसँ दहिना भेल। पण्डितजी ओहि नढ़ियाकेँ गरियबैत, नाँगर टाँगे दौड़ैत, खसैत-पड़ैत घर दिस बढ़य लगलाह। बीच-बीचमे ओहि नढ़ियाकेँ कहैत-

ई सरबा, नहि जीबय देत। एकर हम की बिगारने छलियैक से नहि जानि!”

ताबतेमे मुखियाजी पोखरि दिसिसँ आपस अबैत छलाह। पुछि बैसलखिन-

की भेल पण्डितजी?”

की कहू की भेल। कहबी छैक जे गेलहुँ नेपाल आ कर्म गेल संगे। सैह परि अछि हमर। एकादशीक दिन छलैक। सोचलहुँ जे महादेवक दर्शन करी। आधा रास्तासँ जहाँ आगा बढ़लहुँ कि औ बाबू! ई चण्डाल नढ़िया रास्ता काटि देलक।

ओहिसँ पहिने की मुखियाजी किछु बजितथि, पण्डितजी धराम दय खसलाह।

मुखियाजी चिकरलाह। पासेमे पण्डितजीक भातिज पनिछोआ करैत छलखिन्ह। ओ दौड़लाह। अगल-बगलसँ सेहो लोक सभ दौड़ल। पण्डितजीकेँ उठा-पुठा कय दरबाजापर राखि देलक। लोक सभ पुछन्हि-

की भेल?”

मुदा ओअपस्याँत आकाश दिसि तकैत रहि गेलाह।

असगुन, असगुने होइत अछि। तेँ ने लोक सगुन करैत फिरैत रहैत अछि। पण्डितजी भोर होइतहि पनिभरनीकेँ बजौलखिन्हि आ आदेश देलखिन्ह जे आइसँ नित्य प्रात: काल ओ एक घैल पानि भरि कय दरबाजापर राखि देल करय, जाहिसँ हुनक दिन नीक जेना कटि जान्हि। पनिभरनी हुनकर आज्ञाकेँ सिरोधार्य कयलक आ रोज हुनकर सामनेमे बेश बड़का घैलमे पानि भरि-भरि राखय लागल।

एक दिन अन्हरोखे पनिभरनी पानि भरि कय राखि गेल। ओकरा गहुँमक कटनी करबाक छलैक।

पण्डितजी उठि जहाँ चारि डेग आगा बढ़लाह कि वोहि घैलसँ टकरा चारूनाल चित्त भय खसि पड़लाह।

चारू कातसँ लोक सभ दौड़ल। मुदा मण्डितजी किछु नहि बजलाह। आब ओ सभ दिन चुप्पे रहबाक सपथ खा लेने छलाह। समय विपरीत भय गेल छलन्हि आ सगुनो असगुन भय गेल छलन्हि।

रबीन्‍द्र नारायण मिश्र

अमृतसर यात्रा

पंजावक पैघ शहरमे अमृतसरक गणना अछि। ऐठाम पहिने तुँग नामक गाम छल। सिखक चारिम गुरु रामदास १५७४ मे ७०० रूपैआमे तुँग गामक लोकसँ जमीन किनलैथ। ओइ साल गुरु रामदास ओतए घर बना कऽ रहए लगला। ओइ समयमे ओकरा गुरु दा चक्क कहल जाइत छल। बादमे एकर नाम चक्क राम दास भऽ गेल।

अमृतसर पहिने गुरुरामदासपुरक नाओंसँ जानल जाइत अछि। पंजावक राजधानी चण्‍डीगढ़सँ ई २१७ किलोमीटर दूरीपर एवम्‍ लाहौरसँ मात्र ५० किलोमीटर दूरीपर अवस्‍थित अछि। भारत-पाकिस्‍तानक वाधा  वोर्डर ऐठामसँ मात्र २८ किलोमीटर अछि।

कहल जाइत अछि वाल्‍मिकी ऋृषिक आश्रम अमृतसरक रामतीर्थमे छल। लवकुश अश्वमेघ यज्ञक घोड़ाकेँ ओतइ पकैड़ लेने छला आ हनुमानकेँ एकटा गाछसँ बान्‍हि देने रहैथ। ओही स्‍थानपर दुर्गिआना मन्‍दिर बनल अछि।

तेसर सिख गुरु अमरदास जीक परामर्शपर चारिम सिख गुरुरामदासजी अमृत सरोवरक खुनाइ प्रारम्‍भ केलाह। ऐमे चारूकात पजेबाक घाटक निर्माण पाँचम सिख गुरु अर्जन देवजी द्वारा १५ दिसम्‍बर १५८८ क पूरा कएल गेल। वएह हरमन्‍दर साहेबक निर्माण प्रारम्‍भ केलैथ। १६ अगस्‍त १६०४ क ओइमे गुरु ग्रन्‍थ साहेबक स्‍थापना भेल। सिख भक्‍त बाबा बुधाजी ओइ मन्‍दरक प्रथम पुजेगरी नियुक्‍त भेल रहैथ।

हरर्मान्‍दर साहेबक निर्माणमे सर्व धर्म सभ भावक विशेष धियान राखल गेल। सिख धर्मक ऐ भावनाक अनुरुप गुरु अर्जन देव मुस्‍लिम सूफी सन्‍त हजरत मिआँ मीरकेँ ऐ मन्‍दिरक शिलान्‍यासक हेतु आमंत्रित केने छला। सन्‍ १७६४ ई.मे जस्‍सा सिंह अहलुवालिया आन-आन लोक सबहक सहयोगसँ एकर जीर्णोद्धार केलाह। उन्‍तीसमी शताब्‍दीमे महाराजा रणजीत सिंह ७५० किलोग्राम सोनासँ ऐ मन्‍दिरक ऊपरी भागकेँ पाटि देलाह जैपर एकर नाओं स्‍वर्ण मन्‍दिर माने गोल्‍डेन टेम्‍पल पड़ि गेल।

हरमन्‍दि साहेबक स्‍वर्ण मन्‍दिरमे पएर रखैत गजब आनन्‍दक अनुभूति भेल। साफ-सुथरा चक-चक करैत परिसर। सुरम्‍य वातावरणमे भजन कीर्तनक संगीतमय मधुर ध्‍वनि। चारूकात पसरल सैंकड़ोक तादादमे सेवादारक जत्‍था सभकेँ देखैत बनैत छल।

समूहमे जीव, सेवा करब ओ समन्‍व्‍य पूर्वक सबहक स्‍वागत करब, ऐ वस्‍तुक प्रत्‍यक्ष उदाहरण हरमन्‍दर साहिवमे भेटैत अछि। मन्‍दरमे प्रवेशसँ पूर्व जूता निकालब आ माथ झाँपब अनिवार्य अछि। माथ झाँपबाक हेतु मन्‍दिर प्रवन्‍धक केर तरफसँ वस्‍त्र देल जाइत अछि।

विशाल तलाव स्‍वच्‍छ जलसँ भरल अछि। ऐ तालावक नाओं अमृत सरोवर अछि। सरोवरक चारूकात लोक परिभ्रमण करैत अछि। सरोवरसँ जुड़ल अछि हरमन्‍दिर साहेब।

मन्‍दिरमे निरन्‍तर गुणवाणीक पाठ होइत रहैत अछि। चारूकातसँ मन्‍दिरक दरबाजा खूजल अछि। तात्‍पर्य जे ओइठाम सबहक स्‍वागत अछि। हरमन्‍दिर साहेबमे कोनो धर्मक लोक जा सकैत अछि। ऐ मामलामे ई अद्भुत अछि। ऐठाम निरन्‍तर लंगर चलैत रहैत अछि। अनुमानत: प्रति दिन एक लाखसँ तीन लाख लोक तककेँ मुफ्तमे लंगर खुआबक बेवस्‍था ऐठाम रहैत अछि।

हरमन्‍दिर साहेब हम दू बेर गेल छी। एकबेर अधिकारीक प्रतिनिधि मण्‍डलक संग आ दोसर बेर श्रीमतीजीक संग। दुनू बेर नीकसँ दर्शन भेल। स्‍थानीय प्रशासनक सहयोग रहबाक कारण मन्‍दिरमे हमरा सभकेँ सरोपा देल गेल। सरोपा देबक माने बहुत इज्‍जत देब भेल।

अमृतसरक प्रसिद्ध स्‍वर्ण मन्‍दिरक दर्शनक बाद हमरा लोकनि ओइठामसँ सटले जालियावाला बाग गेलौं। ओइ वागक इतिहास केकरो नहि बुझल छइ। ब्रिटिश साम्राज्‍यक भारतमे कएल गेल ई क्रुड़तम घटना अछि। १३ अप्रैल १९१९ क ब्रिटिस हुकुमतक विरोधमे स्‍वर उठाबक हेतु जमा भेल हजारो लोकपर १० मिनट धरि धुँआधार गेली चलौल गेल, जइमे एक हजार लोक मारल गेला आ १५ साए लोक घायल भेला। सरकारी आँकड़ामे मृतक एवम्‍ घायलक संख्‍या बहुत कम क्रमश: ३६९ एवम्‍ २०० मात्र देखौल गेल मुदा ओ कोनो हिसावसँ सही नहि लगैत अछि। गोली काण्‍डक बाद ओइ मैदानमे लाश उठौनिहार कियो नहि छल। सैकड़ो आदमी जान बँचेबाक हेतु ओइठाम स्‍थित एकटा इनारमे कुदि गेल। बादमे १२० टा लाश ओइ इनारसँ निकालल गेल। धुँआधार चलल गोली सबहक निशान अखनौं ओइठामक देवाल सभपर देखल जा सकैत अछि।

ओइ दिन बारहे बजेसँ लोक सभ बैसारमे भाग लेबाक हेतु ओइ मैदानमे जमा होमए लागल छल। बहुत  रास निर्दोस लोक उत्‍सुकतावश सेहो ओइठाम जमा भऽ गेल छल। मुदा केकरो ई अन्‍दाज नइ छेलै जे ब्रिटिश हुकुमत एतेक वर्वरतापूर्ण काज करत! मुदा से भेल। ब्रिटिश हुकुमतक खिलाफ केतेको प्रकारक दुर्घटनाक पछाइत राज्‍यमे मार्शल लॉ लागू छल।

१३ अप्रैल १९१९ क भोरे ब्रिटिश हुकुमत घोषणा कए लोककेँ चेतौलक जे पाँच आदमीसँ बेसी लोकक एकठाम जमा होएब गैरकानूनी अछि। मुदा बहुत लोककेँ एकर जानकारी नहि भेलै आ जेकरा भेबो केलै से नहि सोचि सकल जे आदेशक उल्‍लंघनक एहेन विनासकारी हएत!

स्‍थानीय फौजी एवम्‍ असैनिक अधिकारीकेँ जालियावाला बागमे जमा होइत भीड़क जानकारी १२ बजे भऽ चूकल छल। ओ सभ चाहैत तँ ओइ बैसारक शुरूए-मे विरोध कए सकैत छल, मुदा एकटा सुनिश्चित योजनाक तहत भीड़केँ जमा होमए देल गेल आ बिना कोनो पूर्व उद्घोषणाक भीड़पर अन्‍धाधून गोली चलेबाक आदेश जनरल द्वारा दए देल गेल।

सभसँ दुखद तँ ई भेल जे गोलीक बौछारमे घायल लोक सभ तरपैत-तरपैत मरि गेल आ कियो ओकरा सभकेँ असपताल उठा कऽ नहि लऽ गेल। ऐ घटनाक अंजाम देनिहार जेनरल डायरेक्‍टरकेँ जखन हंटर कमीशन पुछलक जे अहॉं  घायल लोक सबहक इलाजक की बन्‍दोवस्‍त केलौं?’ तँ ओ निर्लज्‍ज भऽ कहलक जे अस्‍पताल सभ खूजल छल। सही स्‍थिति तँ ई छल जे बाहरमे कर्फ्यू लागल छल तँए कियो केतौ घुसकियो नहि सकैत छल। जनरल डायर उपरोक्‍त कमीशनक समक्ष स्‍वीकार केलक जे ओ सोचि-समैझ कऽ जालियावाला वागमे गोली चलबौलैथ। ओ चाहितैथ तँ डरा-धमका कऽ भीड़केँ भगा दितैथ, मुदा फेर ओ सभ एकत्र भऽ जाइत, आ ब्रिटिश हुकुमतक वर्चस्‍वपर हँसैत।

एहेन वर्वर घटनाक चश्‍मदीद गवाह देबाल सभपर पड़ल गेली सबहक निशान अखनौं देखल जा सकैत अछि।

हम सभ चारूकात देबाल सभपर पड़ल एहेन निशान सभकेँ सद्य: देखलौं गोलीक निशान सभकेँ चिन्‍हित कए देल गेल अछि। आ जइ इनारमे सैकड़ो आदमी कुदि गेला आ जानसँ हाथ धो लेलैथ, सेहो शहीदी कुआँक नाओंसँ स्‍मारक भऽ गेल अछि। ऐ काण्‍डमे शहीद भेल सैकड़ो लोकक यादगारमे ओतए स्‍मारक बनल अछि जेकर उद्घाटन भारक प्रथम राष्‍ट्रपति स्‍व. डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद सन् १९६३ मे केलाह।

अमृतसरक दर्शनीय स्‍थानमे दुर्गिआना मन्‍दिर प्रमुख स्‍थान रखैत अछि। मूलत: दुर्गामाताक मन्‍दिर हेबाक कारण एकर नाओं दुर्गियाना मन्‍दिर पड़ल मुदा ऐ मन्‍दिरमे आनो-आनो भगवान सबहक भव्‍य मूर्ति विराजित अछि। ई मन्‍दिर अपन भव्‍यता एवम्‍ अध्‍यात्‍मिक वातावरण हेतु सम्‍पूर्ण विश्वमे प्रसिद्ध अछि। देश-विदेशसँ हजारो तीर्थयात्री ऐठाम अबैत रहै छैथ। मन्‍दिर बहुत पुरान अछि। मूल मन्‍दिर सोलहम शताब्‍दीमे बनल छल। तेकर बाद सन्‍ १९२१ ई.मे स्‍थानीय लोकनिक मदैतसँ एकर जीर्णोद्धार कएल गेल। नव निर्मित मन्‍दिरक उद्घाटन सन्‍ १९२५ ई.मे पं. मदन मोहन मालवीय केने रहैथ। मन्‍दिरक द्वार थानीसँ बनल अछि।

पूरा मन्‍दिर चारूकातसँ सिमटल अछि। मूख्‍यत: मन्‍दिरक प्रागणमे पहुँचबाक हेतु पूल बनौल गेल अछि।

मन्‍दिरक बनाबट ओ साज-सज्‍जा स्‍वर्ण मन्‍दिरसँ मिलैत अछि।

मन्‍दिरक प्रागणमे सीतामाता ओ हनुमानजीक मन्‍दिर अछि। सन्‍ २०१३ सँ मन्‍दिर एवम्‍ मन्‍दिरक आसपासक परिसरक जीर्णोद्धारक कार्यक्रम चलि रहल अछि जेकर पूर्णतापर मन्‍दिरक भव्‍यता ओ सौन्‍दर्य पराकाष्‍ठापर पहुँच जाएत।

कहल जाइत अछि जे लवकुश हनुमानजीकेँ अहीठाम बान्‍हि देने रहैथ। अश्वमेध यज्ञक घोड़ाकेँ बान्‍हि देने रहैथ। लक्षमण, भरत, शत्रुध्‍न सभ एतइ पराजित भऽ गेल रहैथ। हुनका सभकेँ जीएबाक हेतु देवता सभ अमृत अनने रहैथ ओ शेष अमृतकेँ माटिमे गाड़ि देल गेल छल। जहूसँ ऐ शहरक नाओं अमृतसर पड़ल।

हम सभ अमृतसरक प्रसिद्ध दुर्गिआना मन्‍दिरमे घन्‍टो घुमैत रहलौं। पूजा-पाठ केलौं ओ एकर भव्‍यताक आनन्‍द उठेलौं। पं. मदन मोहन मालवीयजीक बारम्‍बार धियान अबैत रहल जे ऐ मन्‍दिरकेँ वर्तमान स्‍वरुपक नायक रहैथ।

घुमैत-घुमैत हम सभ थाकि गेल रही। रौद बहुत करगर रहइ। हमर श्रमतीजी सेहो बहुत थाकि गेल छेली। अस्‍तु हम सभ ओइठामसँ सोझे सीपीडब्‍ल्‍यूडी गेष्‍ट हाउस स्‍थित अपन डेरा पहुँच गेलौं।

घर घुमैत काल रस्‍ता भरि सोचैत रहलौं जे एतेक भारी तीर्थ स्‍थानमे जालियावाला वाग सन क्रूड़, वर्वर, नरसंहार केना भेल? सही कहल जाइत अछि जे सत्ताक नशामे मनुख पिशाच भऽ जाइत अछि। ओकर मानवीय संवेदना नष्‍ट भऽ जाइ छइ। मनुख ओकरा लेल मात्र एकटा मशीन रहि जाइत अछि जे आदेशक पालन करैत-करैत अपनहि बन्‍धु-बान्‍धवक खूनक धार बहा सकैत अछि। जेना कि जालियावाला वागमे अंग्रेजी हुकुमत केलक। हिन्‍दू, मुसलमान, सिख आदि सभ धर्मक लोक लोकक खून एक भऽ गेल छल, जालियावाला वाग चिकैर-चिकैर कऽ कहि रहल छल-

ऐ अत्‍याचारी निकृष्‍ट अंग्रेजी हुकुमत, आब बर्दास्‍त जोग नहि रहल। आब आर जुलुम नहि सहल जाएत..!”

जालियावाला वागक काण्‍ड सम्‍पूर्ण देशक आत्‍माकेँ झकझोरि देलक। एकर बदलामे उधम सिंह विलायत जा कऽ माइकल डायरक[1] हत्‍या कऽ देलक आ स्‍वयं फाँसी चढ़ि गेल।

दोसर दिन साँझमे हमरा लोकनि बाधा वोर्डरपर होमएबला झण्डा उतारबाक कार्यक्रम देखए गेलौं। ओइ कार्यक्रमक आकर्षण अमृतसर गेनिहार प्रत्‍येक पर्यटककेँ रहैत छइ।

भारत ओ पाकिस्‍तानक सीमा सुरक्षा बलक जवान सभ नाना प्रकारक करतब करैत आगू-पाछू बढ़ैत रहै छैथ। कखनो टाँगकेँ धराम-दे आगाँ तँ कखनो हाथकेँ फरकबैत पाछाँ करैत ओ सभ एक-दोसरकेँ कखनेा सिनेह करैत तँ कखनो आक्रमण मुद्रामे आबि जाइ छैथ। अपना देशक लोक जेतेक बेर हिन्‍दूस्‍तान जिन्‍दावाद कहैत तेतेक बेर सटले सीमापर सँ ओइ देशक नारा सभ लगैत रहैत अछि। 

कुल मिला कऽ सम्‍पूर्ण वातावरण देश-भक्‍तिसँ भरल रहैत अछि। उत्तेजक ओ भावुक महौलक वावजूद सैनिक सभ संयत रहै छैथ आ क्रमश: अपन-अपन देशक झण्‍डा उतारि कऽ वधा बोर्डरक गेटकेँ बन्‍द कऽ लइ छैथ। 

विशेष अवसर जेना ईद, दिवाली आ दुनू देशक स्‍वतंत्रता दिवस आदिपर एक-दोसरकेँ मिठाइक डिब्‍बाक आदान-प्रदान सेहो होइत अछि। कुल मिला कऽ ई कार्यक्रम दुनू देशक नागरिकक वर्तमान परिस्‍थितिपर सोचबाक हेतु मजबूर कए दैत अछि।

दुनू देशक लोक हजारोक तादादमे आमने-सामने बैसए आ शान्‍तिपूर्ण महौलमे मनोरंजक कार्यक्रम देखए से अपना-आपमे एकटा मिसाल अछि। भऽ सकैए एकर सकारात्‍मक प्रभाव दुनू देशक जनता ओ सरकारपर पड़इ।

एवम्‍ प्रकारेण अमृतसरक संक्षिप्‍त प्रवासक अन्‍त भऽ रहल छल। हमरा लोकनि प्रात भेने अमृतसर दिल्‍ली शताब्‍दी एक्‍सप्रेस पकैड़ कऽ दिल्‍ली विदा भऽ गेल रही। सुविधा सम्‍पन्न द्रुतगामी ई गाड़ी जल्‍दीए घर पहुँच गेल आ हम सभ अपन यात्राक आनन्‍दक चर्च करैत केतेको दिन धरि आनन्‍दमे रहलौं।

तिथि : ०१ अगस्‍त २०१७, शब्‍द संख्‍या : १५१६


 

[1] माइकल डायर जालियावाला वाग काण्‍डक समय पंजावक लेफ्टिनेन्‍ट जेनरल छल।

 

 


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