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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१.आशीष अनचिन्हार- नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलक तुलनात्मक विवेचना २.प्रणव कुमार- मैथिली कथामे स्त्री

 

आशीष अनचिन्हार

 

नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलक तुलनात्मक विवेचना
 

एहिठाम समीक्षा लेल हम नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिंदी गजलकेँ चुनलहुँ अछि। ई समीक्षा एकै गजलकारक दू भाषामे लिखल गजलक तुलना अछि। पहिने हम दूनू भाषाक गजल आ ओकर बहरक तक्ती ओ रदीफ-काफियाक समीक्षा करब तकर बाद भाव, कथ्य ओ भाषाक हिसाबसँ।

 

नरेन्द्रजीक चारि टा मैथिली गजल जे कि मिथिला दर्शनक Nov-Dec-16 अंकमे प्रकाशित अछि---

 

1

राज काज भगवान भरोसे

अछि सुराज भगवान भरोसे


 

मूलधनक तँ बाते छोड़ू

सूदि ब्याज भगवान भरोसे


 

खूब सभ्यता आयल अछि ई

लोक लाज भगवान भरोसे


 

देह ठठा कऽ करू किसानी

आ अनाज भगवान भरोसे


 

अपना भरि सब ब्योंत भिराऊ

किंतु भाँज भगवान भरोसे


 

एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु (तँ) अछि। हमरा लगैए शाइर तँ शब्दकेँ दीर्घ मानि लेने छथि जे कि गलत अछि। पं. गोविन्द झाजी अपन व्याकरणक पोथीमे एहन शब्दकेँ लघुए मानने छथि जे कि सर्वथा उचित तँइ एहि गजलमे सेहो ई लघु हएत। कोनो लघुकेँ दीर्घ मानि लेबाक परंपरा गजलमे तँ नै छै मुदा मैथिली गजलमे हमरा लोकनि संस्कृतक नियमक अनुसार अंतिम लघुकेँ दीर्घ मानै छी मुदा एहि गजलमे तँ बीचक लघुकेँ दीर्घ मानल गेल अछि जे दूनू परंपरा (गजल आ संस्कृत) हिसाबें गलत अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक दूनू पाँतिमे आठ-ठ दीर्घ अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि (कऽ) एहिठाम हम दोसर शेरक पहिल पाँति लेल जे हम बात कहने छी तकरे बुझू। दोसर शेरमे आठ टा दीर्घ अछि। पाँचम शेरक दूनू पाँतिमे आठ-आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलक रदीफ "भगवान भरोसे" अछि आ काफिया "आ" ध्वनि संग "ज" वर्ण अछि जेना काज-सुराज, ब्याज, लाज, अनाज मुदा पाँचम शेरक काफिया अछि "भाँज" जे कि गलत अछि। "भाँज" केर ध्वनि "आँ" केर ज छै मुदा मतलामे "आ" ध्वनिक संग ज छै। तँइ पाँचम शेरक काफिया गलत अछि। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। मुदा बहरे मीरक हिसाबसँ सेहो एहि गजलमे कमी अछि।


 

2


 

फोड़त आँखि दिवाली आनत

कान काटि कनबाली आनत


 

अहींक हाथ पयर कटबा लय

टाका टानि भुजाली आनत


 

देश प्रेम केर डंका पीटत

केस मोकदमा जाली आनत


 

पेट बान्हि कऽ करू चाकरी

एहने आब बहाली आनत


 

पूरा पूरी दान चुका कऽ

सबटा डिब्बा खाली आनत


 

एहि गजलक पहिल आ दोसर शेरक हरेक पाँतिमे आठ-आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिमे एकटा लघु फाजिल अछि तेनाहिते दोसर पाँतिमे सेहो एकटा लघु फाजिल अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिमे छह टा दीर्घ आ दू टा लघु अछि। कऽ शब्दक विवेचना उपर जकाँ रहत। दोसर पाँतिमे "ए" शब्दकेँ लघु मानि लेल गेल अछि जे कि हमरा हिसाबें उचित नै। पाँचम सेरक पहिल पाँतिमे सात टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। कऽ लेल उपरके विवेचना देखू। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलक काफिया ठीक अछि। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। मुदा बहरे मीरक हिसाबसँ सेहो एहि गजलमे कमी अछि।


 

3


 

लाख उपलब्धिसँ ओ घेरा गेल अछि

बस हृदय आदमी के हेरा गेल अछि


 

सब समाजक चलन औपचारिक बनल

लोक संबंधसँ आन डेरा गेल अछि


 

सबटा चेहरा बनौआ अपरिचित जकाँ

मूल चेहरा ससरि कऽ पड़ा गेल अछि


 

भोरसँ साँझ धरि फूसि पर फूसि थिक

लोक अपने नजरिसँ धरा गेल अछि


 

देशक सोना पाँखि बनत एक दिन

फेर अनचोके मे ई फुरा गेल अछि


 

एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-1122-2212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-1222-2212 अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-1221-2212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-1121-22212 अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2121-2122-12212 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2121-2122-12212 अछि। चारिम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 211212212212 अछि आ दोसर पाँतिक 212212112212 अछि। पाँचम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 22222112212 अछि आ दोसर पाँतिक 212222212212 अछि। एहि गजलक तेसर, चारिम आ पाँचम शेरक काफिया गलत अछि। एहि गजलकेँ हमरा बहरेमीरपर मानबासँ आपत्ति अछि आ से किए ई पाटक लोकनि मात्राक्रम जोड़ि देखि सकै छथि जे अलग-अलग लघु जोड़लाब बादो लघु बचि जाइत छै। तँइ हमरा आपत्ति अछि संगे-संग ई गजल आर कोनो बहरपर आधारित नै अछि सेहो स्पष्ट अछि।


 

4


 

डिब्बा सन सन शहरक घर अछि

पानि हवा मे मिलल जहर अछि


 

गाम जेना बेदखल भऽ रहल

बाध बोन धरि घुसल शहर अछि


 

आजुक युगमे कोना पकड़बै

चोर साधु मे की अंतर अछि


 

देश बनल शो केश बजारक

जनतंत्रक बेजोड़ असर अछि


 

अजब दौर अछि लक्ष्य निपत्ता

दिशा हीन ई भेड़ सफर अछि


 

मतलाक दूनू पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। तेसर शेरक पहिल पाँतिमे आठ टा दीर्घ आ एकटा लघु अछि। दोसर पाँतिमे आठ टा दीर्घ अछि। चारिम आ पाँचम शेरक दूनू पाँतिमे आठ आठ टा दीर्घ अछि। एहि गजलमे आएल "भेड़ सफर" शब्द युग्मपर आगू चलि भाषा खंडमे चर्चा हएत। ई गजल बहरे मीरपर आधारित अछि जाहिमे जकर नियम अछि जे "जँ कोनो गजलमे हरेक मात्रा दीर्घ हो तँ ओकर अलग-अलग लघुकेँ सेहो दीर्घ मानल जा सकैए। एहि गजलक मतलाक पहिल पाँतिक काफिया "घर" केर उच्चारण हिंदी सन कएल जाए तखने सही हएत अन्यथा मैथिली उच्चारण हिसाबें गलत हएत। बाद बाँकी शेरक काफिया मतलाक काफियापर निर्भर करत तँइ ओकर विवेचना हम नै क' रहल छी।


 

नरेन्द्रजीक चारि टा हिंदी गजल जे कि हुनक फेसबुकक वालसँ लेल गेल अछि----


 

1


 

यह जो चौपट यहां का राजा है

कुछ नहीं वक़्त का ताकाजा है


 

हम लड़ाई से बहुत डरते हैं

क्यूं कि कुछ घाव अभी ताजा है.


 

देश उनके लिए खिलौना है

हमको इस बात का अन्दाजा है


 

जैसे चाहे इसे बाजाते हैं

गोकि जनतंत्र एक बाजा है


 

अब उठा है तो धूम से निकले

यारो आशिक का ये जनाजा है


 

एहि गजलक पहिल पहिल आ दोसर दूनू शेरक  शेरक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। एहि शेरक दोसर पाँतिमे शायद टाइपिंग गलती छै तँइ सही शब्द "तकाजा" हम मानलहुँ अछि। दोसेर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-112222 अछि।  तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि आ दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-2222 अछि। चारिम शेरक पहिल आ दोसर दूनू शेरक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। एहि शेरक दोसर पाँतिमे शायद टाइपिंग गलती छै तँइ सही शब्द "बजाते" हम मानलहुँ अछि। पाँचम शेरक दूनू पाँतिक मात्राक्रम 2122-12-1222 अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। कुल मिला देखी तँ एहि गजलक दूटा शेर बहरसँ खारिज अछि (दोसर आ तेसर)। एहि गजलमे काफिया ठीकसँ पालन भेल अछि।


 

2


 

क़यामत ऐन अब दालान पर है

नज़र दुनिया की रौशनदान पर है.


 

न जाने रौशनी आयेगी कब तक

अभी तो तीरगी परवान पर है.


 

पिघल जाता है उनके आँसुओं पर

मेरा गुस्सा दिले नादान पर है.


 

शगल उनके लिए है शायरी भी

मगर मेरे लिए तो जान परहै.


 

मुहब्बत की वकालत करने वाला

अभी नफ़रत की इक दूकान पर है.


 

एहि गजलक हरेक शेरक हरेक पाँतिमे 1222-1222-122 मात्राक्रम अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। एहि गजलक काफिया सेहो ठीक अछि।


 

3


 

बाढ़ में लोग बिलबिलाते हैं

रहनुमा बाढ़ को भुनाते हैं


 

घोषणाओं पे घोषणाएं हैं

नाव वह काग़ज़ी चलाते हैं


 

इस तरफ़ भुखमरी का आलम है

और वह आँकड़े गिनाते हैं


 

फंड जो भी जहां से आता है

ख़ुद ही वो बाँट करके खाते हैं


 

साल दर साल बाढ़ आ जाये

दरअसल ये ही वो मनाते हैं


 

एहि गजलक हरेक शेरक हरेक पाँतिमे 2122-12-1222 मात्राक्रम अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि। एहि गजलक काफिया सेहो ठीक अछि।


 

4


 

आकाश से टपके हुए किरदार नहीं हैं

हम भी मक़ीन हैं किरायेदार नहीं हैं |


 

उनके इरादों की भी मालूमात है हमें

ऐसा नहीं कि हम भी ख़बरदार नहीं हैं


 

वह नाम हमारा मिटायेंगे कहाँ कहाँ

बुनियाद की हम ईंट हैं दीवार नहीं हैं |


 

इंसान हैं अपनी हदों का इल्म है हमें

हम आपके जैसा कोई अवतार नहीं हैं |


 

हम अपनी मुहब्बत की नुमाइश नहीं करते

रिश्ते निभाते हैं दुकानदार नहीं हैं |


 

पढ़ना ही अगर हो तो पढ़ो इत्मीनान से

अदबी किताब हैं कोई अख़बार नहीं हैं |


 

एहि गजलक पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2212-2212-221122 अछि। दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2212-1212-221122 अछि। दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम 2212-2212-221212 अछि। दोसर पाँतिक मात्राक्रम 2212-122-122-1122 अछि। बहरमे जतेक मान्य छूट छै से लेल गेल अछि मुदा तइ बादो ई गजल बहरमे नै अछि। मतलाक दूनू शेरेमे एकरूपता नै अछि। तँइ हम मात्र दू शेरक तक्ती केलहुँ अछि बाद-बाँकी शेरक विवेचना पाठक बुझिये गेल हेता। काफिया सेहो गलते अछि।


 


 

बहरक हिसाबसँ नरेन्द्रजीक गजल-- 


 

चारू मैथिली गजलकेँ देखल जाए तँ ई स्पष्ट अछि जे नरेन्द्रजी अधिकांशतः बहरे मीरपर आश्रित छथि आ ताहूमे कतेको ठाम हूसल छथि। जखन कि बहरे मीर बहुत आसान बहर छै आ एहि बहरमे छूट बहुत छै। तेनाहिते जँ चारू हिंदी गजलक बहरकेँ देखल जाए ई स्पष्ट होइए जे नरेन्द्रजी बहरे मीरक अतिरिक्त आन बहर सभपर सेहो हाथ चलबै छथि आ ओहूमे कतेको स्थानपर हूसल छथि। तथापि ई उल्लेखनीय जे आनो बहरपर ओ गजल लीखि सकै छथि। नरेन्द्रजी मैथिली-हिंदीक देल उपर बला गजलक बहर संबंधमे हमर ई स्पष्ट मान्यता अछि जे नरेन्द्रजी मात्र लयकेँ बहर मानि लै छथि जखन कि लय आ बहरमे अंतर छै। लय मने गाबि कऽ, गुनगुना कऽ। लयपर लिखलासँ केखनो बहर सटीक भैयो सकैए आ केखनो नहियो भऽ सकैए।

बहर ओ काफियाक आधारपर नरेन्द्रजीक गजलकेँ एकै बेरमे हम गलत नै कहि सकै छी कारण मैथिलीक कथित गजलकार सभसँ बेसी मेहनति नरेन्द्रजी अपन गजलमे केने छथि आ जँ ई थोड़बे मेहनति करतथि वा करता तँ हिनक गजल एकटा आदर्श गजल भऽ सकैए। ओना एहि बातक संभावना कम जे ओ एहि तथ्यकेँ मानताह। करण वएह जिद जे व्याकरण कोनो जरूरी नै छै। रचनामे भाव प्रमुख होइत छै आदि-आदि। मैथिलीमे नरेन्द्रजीक गजल अपन पीढ़ीक अधिकांश गजलकार (सरसजी, तारानंद वियोगी, रमेश, देवशंकर नवीन एवं ओहने गजलकार) सभसँ बेसी ठोस गजल छनि से मानबामे हमरा कोनो शंका नै मुदा बहर ओ काफियाक हिसाबें पूरा-पूरी सही नै छनि (मने नरेन्द्रजी मात्र अपन समकालीनसँ आगू छथि)।  एहिठाम हम नरेन्द्रजीक चारि-चारि टा गजल लेलहुँ मुदा आन ठाम हुनक प्रकाशित वा हुनक फेसबुकपर प्रकाशित मैथिली आ हिंदी गजलक अनुपातसँ ई स्पष्ट अछि जे नरेन्द्रजी मैथिलीमे मात्र संपादकक आग्रहपर गजल लिखै छथि। मने मैथिली गजल हुनकर ध्येय नै छनि। अइ बादों आश्चर्य जे हिंदी गजलमे हुनकर कोनो विशेष स्थान नै छनि। ई बात हम एकटा हिंदी गजल पाठकक तौरपर कहि रहल छी। हुनकर समूहक किछु लोक हुनका भने बिहारक हिंदी गजलकारक लिस्टमे दऽ दौन मुदा वास्तविकता इएह जे हिंदी गजल संसारमे नरेन्द्रजीक कोनो स्थान नै छनि। आ एकरा मात्र राजनीति नै कहल जा सकैए। हिंदी गजलमे एहतराम इस्लाम, नूर मुहम्मद नूर, जहीर कुरैशी सभ पुरान छथि एवं नवमे गौतम राजरिषी, स्वपनिल श्रीवास्तव, वीनस केसरी, मयंक अवस्थी आदि अपन स्थान बना लेला मुदा की करण छै जे नरेन्द्रजी असफल रहि गेला। हम फेर कहब जे हरेक चीजमे राजनीति नै होइ छै। हिंदी गजलक नव शाइर गौतम राजरिषी, स्वपनिल श्रीवास्तव, वीनस केसरी, मयंक अवस्थी आदिक पाछू कोनो संपादकक हाथ नै छलनि मुदा नीक लिखलासँ कोन संपादक नै छापै छै। आ हिनकर सभहँक सभ गजल व्याकरण ओ भाव दृष्टिसँ संतुलित रहै छनि आ तँइ ई सभ बहुत कम समयमे हिंदी गजलमे अपन स्थान बना लेला मुदा नरेन्द्रजी नै बढ़ि सकला आ ताहि लेल मात्र हुनक बहर ओ व्याकरण नै पालन करबाक जिद जिम्मेदार छनि। मैथिली गजलमे तँ ई अपन समकालीन गजलकारसँ आगू बढ़ि जेता मुदा ई हिंदीमे पिछड़ले रहता कारण ओहिठाम बहर सेहो देखल जाइ छै जखन कि मैथिली गजलमे बहर देखानइ आब शुरू भेलैए।


 

किछु एहन बात जे कि प्रायः हम, सभ आलोचनामे कहैत छियै " मैथिलीक अराजक गजलकार सभ हिंदीक निराला, दुष्यंत कुमार आ उर्दूक फैज अहमद फैज केर बहुत मानै छथि। एकर अतिरिक्तो ओ सभ अदम गोंडवी मुन्नवर राना आदिकेँ मानै छथि। मैथिलीक अराजक गजलकार सभहँक हिसाबें निराला, दुष्यंत कुमार आ फैज अहमद फैज सभ गजलक व्याकरणकेँ तोड़ि देलखिन मुदा ई भ्रम अछि। सच तँ ई अछि जे निराला मात्र विषय परिवर्तन केला आ उर्दू शब्दक बदला गजलमे हिंदी शब्दक प्रयोग केला, तेनाहिते दुष्यंत कुमार इमरजेन्सीक विरुद्ध गजल रचना क्रांतिकारी रूपें केलथि। फैजकेँ साम्यवादी विचारक गजल लेल जानल जाइत अछि। मुदा ई गजलकार सभ विषय परिवर्तन केला आ समयानुसार शब्दक प्रयोग बेसी केला। एहिठाम हम किछु हिंदी गजलकारक मतलाक तक्ती देखा रहल छी ( जे-जे मतला हम एहिठाम देब तकर पूरा गजल ओ पूरा तक्कती हमर पोथी मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहासमे देखि सकै छी)---


 

सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाजीक एकटा गजलक मतला देखू--


 

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है

देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है


 

मतला (मने पहिल शेर)क मात्राक्रम अछि--2122+2122+2122+212 आब सभ शेरक मात्राक्रम इएह रहत। एकरे बहर वा की वर्णवृत कहल जाइत छै। अरबीमे एकरा बहरे रमल केर मुजाइफ बहर कहल जाइत छै। मौलाना हसरत मोहानीक गजल “चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है” अही बहरमे छै जकर विवरण आगू देल जाएत। ऐठाँ ई देखू जे निराला जी गजलक विषय नव कऽ देलखिन प्रेमिकाक बदला विषय मिल आ पूँजी बनि गेलै मुदा व्याकरण वएह रहलै।


 

आब हसरत मोहानीक ई प्रसिद्ध गजलक मतला देखू---


 

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है


 

एकर बहर 2122+2122+2122+212 अछि।


 

आब दुष्यंत कुमारक ऐ गजलक मतलाक तक्ती देखू---


 

हो गई है / पीर पर्वत /सी पिघलनी / चाहिए,

इस हिमालय / से कोई गं / गा निकलनी / चाहिए।


 

एकर बहर 2122 / 2122 / 2122 / 212 अछि।


 

फैज अहमद फैज जीक ई गजलक मतला देखू--


 

शैख साहब से रस्मो-राह न की

शुक्र है ज़िन्दगी तबाह न की


 

एहि मतलाक बहर 2122-1212-112 अछि।


 

आब कने अदम गोंडवी जीक एकटा गजलक मतलाक तक्ती देखू—


 

ग़ज़ल को ले / चलो अब गाँ / व के दिलकश /नज़ारों में

मुसल्सल फ़न / का दम घुटता / है इन अदबी / इदारों में


 

एकर बहर 1222 / 1222 / 1222 / 1222 अछि।


 

एहिठाम हम ई मात्र भाव ओ कथ्यसँ संचालित गजलकारक कुतर्कसँ बँचबा लेल देलहुँ अछि। जखन दुष्यंत कुमार सन क्रांतिकारी गजलकार बहर ओ व्याकरणकेँ मानै छथि तखन नरेन्द्रजी वा आन कथित क्रांतिकारीकेँ व्याकरणसँ कोन दिक्कत छनि सेनै जानि।


 

भाव, कथ्य, विषय ओ भाषाक हिसाबसँ नरेन्द्रजीक गजलक सीमा---


 

उप शीर्षकमे "सीमा" एहि दुआरे लिखलहुँ जे  भाव, कथ्य ओ विषय लेल कोनो रोक-टोक नै छै जे इएह विषयपर लिखल जेबाक चाही वा ओहि विषयपर नै लिखल जेबाक चाही। अइ ठाम देल गेल नरेन्द्रजीक मैथिली-हिंदी गजलक भाव ओ भाषासँ स्पष्ट भेल हएत जे नरेन्द्रजी चाहे मैथिलीमे लिखथि वा हिंदीमे हुनकर विषय मार्क्सवादी विचारधाराक आगू पाछू रहैत छनि। ओना ई खराप नै छै मुदा दुनियाँ बहुत रास "भूख"सँ संचालित छै चाहे ओ पेटक हो, जाँघक हो कि धन, यश केर हो। जतबे सच पेटक भूख छै ततबे आन भूख सेहो। तँइ एकटा भूखक साहित्यकेँ नीक मानल जाए आ दोसर भूखकेँ खराप से उचित नै। नरेन्द्रजीकेँ सेहो कोनो विपरीत लिंगी आकर्षित केने हेथनि आ कोहबरमे हुनकर करेज सेहो धक-धक केने हेतनि। ओना विचारधाराकेँ महान बनेबा लेल ओ कहि सकै छथि जे ने हमरा कोनो विपरीत लिंगी आकर्षित केलक आ ने कोबरमे करेज धक-धक केलक। ई हुनकर सीमा सेहो छनि हुनकर विचारधाराक सेहो। अइ ठाम एकटा महत्वपूर्ण प्रश्न राखए चाहब जे नरेन्द्रजी वा हुनके सन क्रांतिकारी गजलकार सभ व्याकरणक ई कहि विरोध करै छथि जे व्याकरण कट्टरताक प्रतीक थिक मुदा आश्चर्य जे विषय ओ भावक मामिलामे नरेन्द्रजी वा हुनके सन गजलकार सभ कट्टर छथि। हमरा जतेक अनुभव अछि ताहि हिसाबसँ हम कहि सकैत छी कथित रूपसँ छद्म मार्क्सवादी सभ दोहरा बेबहार करै छथि अपन जीवन ओ साहित्यमे। व्याकरणक कट्टरताक विरोध आ विषय ओ भावक कट्टरताक पालन इएह दोहरा चरित्र थिक। एकै कथ्यपर कोनो विधाक रचना लिखलासँ ओहिमे दोहराव केर खतरा तँ होइते छै संगे संग पाठक इरीटेट सेहो भ' जाइत छै। कोनो रचना जखन पाठके लेल छै तखन पाठकक रुचिक अवमानना किए? हँ एतेक सावधानी लेखककेँ जरूर रखबाक चाही जे पाठकक अवांछित माँग जेना अश्लीलता, दंगा पसारए बला रचना नै लीखथि। एक बेर फेर हम हिंदीक संदर्भमे कहए चाहब जे हिंदी गजलक कथ्य बहुत विस्तृत छै। हिंदी गजलमे साम्यवादी विचारधारा बला गजलक अतिरिक्त आनो विषयपर गजल छै आ हमरा हिसाबें नरेन्द्रजी हिंदी गजलमे नै बढ़ि सकला आ ताहि लेल बहर ओ व्याकरण संग एकै कथ्यपर लिखबाक जिद सेहो जिम्मेदार छनि। एहिठाम देल नरेन्द्रजीक मैथिलीक चारिम गजलमे  "भेड़ सफर" मैथिलीमे अवांछित प्रयोग अछि। नरेन्द्रजीक भाषा प्रयोग खतरनाक अछि। हम जानै छी जे एना लिखलासँ लोक हमरा शुद्धतावादी मानए लागत मुदा हम ई चिंता छोड़ि लिखब जे हरेक भाषामे आन भाषाक शब्दक प्रयोग हेबाक चाही मुदा एकर मतलब नै जे सभ शब्दक प्रयोग मान्य भऽ जेतै। उदाहरण दैत कही जे मैथिलीमे "वफा" शब्द प्रचलित नै अछि मुदा "वफादार" शब्द बहुप्रचलित अछि। एहिठाम प्रश्न उठैत अछि जे जखन वफा शब्दक प्रचलन नै तखन वफादार कोना प्रचलित भेल। ई बात शुद्ध रूपसँ आम जनताक बात छै। आम जनताक जीह आ संदर्भमे "वफा" शब्द नै आबि सकलै जखन कि वफादार उच्चारणक हिसाबसँ आ संदर्भक हिसाबसँ प्रयोग होइत रहल अछि।


 

निष्कर्ष--- नरेन्द्रजी गजल बहर ओ काफियाक हिसाबसँ दोषपूर्ण तँ अछि मुदा मैथिलीक अपन समकालीन ओ परवर्ती गजलकार यथा सरसजी, रमेश, तारानंद वियोगी, विभूति आनंद, कलानंद भट्ट, सुरेन्द्रनाथ, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, राजेन्द्र विमल संगे एहने आन गजलकार सभसँ बेसी ठोस अछि। हिनक हिंदी गजल सभ सेहो बहर ओ काफियाक हिसाबसँ दोषपूर्ण अछि आ ओहिठाम हिनकासँ पहिने बहुत रास व्याकरण ओ भाव बला गजलकार अपन मूल्याकंन लेल प्रतीक्षारत छथि तँइ हिंदी गजलमे हिनकर टिकब बहुत मोश्किल छनि। विश्वास नै हो तँ हिंदी गजलक गंभीर पाठक बनि देखि लिअ। जँ नरेन्द्रजी व्याकरण पक्षकेँ सम्हारि लेथि आ आनो विषयपर गजल कहथि तँ निश्चित ई बहुत दूर आगू जेता। आ जेना कि उपरक विवेचनसँ स्पष्ट अछि जे हिनका बेसी मेहनति नै करबाक छनि। किछु अहम् ओ व्याकरणकेँ हेय बुझबाक चक्करमे हिनक नीको गजल दूरि भेल अछि। ओना हम उपरे आशंका बता देने छी जे आने कथित क्रांतिकारी जकाँ ईहो व्याकरणकेँ बेकार मानता।


 

नोट---- 1) एहि समीक्षामे जतेक संदर्भ लेल गेल अछि से हमर पोथी "मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास"सँ लेल गेल अछि तँइ कोनो प्रकारक संदर्भ जेना पं गोविन्द झाजीक कोन पोथीक कोन पृष्ठपर चंद्रबिंदु युक्त स्वर लघु होइत छै आदि जनबाक लेल ओहि पोथीकेँ पढ़ू।

2) बहरक तक्तीमे जँ कोनो असावधानी भेल हो तँ पाठक सभ सूचित करथि। हम ओकरा सुधारब।

 

२.

प्रणव कुमार

मैथिली कथामे स्त्री

 

उपरोक्त विषय पर चर्चा केनाय एत्तेक हल्लुक बात नै अछि, तथापि हम जे किछु लेखक केर रचना पढलहुঁ अछि ओय माह्क किछ स्त्री पात्र वा नायिका क भूमिका के विवेचना के प्रयत्न क रहल छि।


 

सर्वप्रथम हम यात्री बाबा के उपन्यास ’पारो’ के नायिका पार्वती उर्फ़ पारो केर चर्चा कय रहल छी। पारो के पहिल परिचय पाच छ: वर्षिय, श्याम वर्णिय बुचिया के रूप मे कैल गेल अछि, आ कथा के मार्मिक अन्त १७-१८ वर्षक पारो के अकाल मृत्यु क घटना के संदर्भ स होय अछि। मैथिली कथा मे स्त्री पात्र सब मे पारो के चरित्र एकटा एहन चरित्र अछि जे पाठक के हृ्दय स्थली में भावना के तीव्र प्रवाह त लैए आबै अछि संगहि मिथिला क्षेत्र में ७०-८०-९०के दशक में(आ संभवत: किछु एखनो) स्त्री जीवन के दशा के कैएक टा परत खोलि के राखि दैत अछि। २-४ घंटा में पारो सन नायिका के नेन्पन केर खेलौर स ल के किशोरी पारो के चमत्कृ्त क दै बला बुद्धि, विवेक, मर्यादा के निभाब वाली धिया आ अंतत: समाजक दोष के कारणे अपरिपक्ब अवस्था में अकाल मृ्त्यु के वरण करैत पारो के झलक कोनो चलचित्र जेका पाठक के आखि के आगा एक के बाद एक क के निकलि जाय अछि।

पारो नेनपने स चंचल छलीह आ किशोरावस्था में पहुचैत पहुचैत लोक व्यवहार आ ग्यान मे पारंगत भ गेलि। कथावाचक कहै छैथ जे ओ पारो से १-२ वर्षक जेठ छलाह मुदा तैयो लोक व्यवहार के जे बात हुनका इंटर में गेला पर बुझ एलैन से पारो ओहि बयस में बुझै छलीह जखन कथावाचक आठमी में छलाह। ऐ प्रकारे यात्रीजी ई बात के इंगित करै छैथ जे मिथिला के नारी में मानसिक परिपक्वता बहुत जल्दी आबि जाय अछि। पारो पढ्बा लिखबा, कथा-कविता में सेहो बेस तेज छलीह, स्वाईत हिनकर पिताजी हिनका खूब पढैबा के इच्छा रखै छलाह, मुदा से हिनकर माय के पसिन्न नै छल। ई मैथिल समाज के एकटा आर चरित्र चित्रण अछि जेकरा यात्रीजी ऐ कथा में खोलि क देखेलथिन्ह अछि। ई चरित्र कमोबेस आजुक मैथिल समाज में सेहो व्याप्त अछि, स्वाइत मिथिला क्षेत्र में स्त्री साक्षरता दर कदाचित सगर देश में सभस निम्न स्तर पर अछि। औपचारिक शिक्षा नैहो भेंटला पर पारो रामायण, गीता, अमरकोष, हितोपदेश आदि ग्रंथ के घोषि लैत छथिन।

प्रेम विवाह आ विवाह स पूर्व अपन जिवनसंगी के निक से जानि लै के इच्छा आ ऐ से जुडल दिवास्वप्न सेहो पारो के मोन मे उचरै छैन्ह आ एकरा ओ कथावाचक के जाहिर सेहो कर छथिन जे “बिरजू भैया, भाइये-बहिन में जबिआह दान होयतैक त कतेक दिव होयतै। कत’ कहादन अनठिया के जे लोक उठा ल अबै अछि से कोन बुधियारी!” किशोरी पारो के मोन मे पुरुष जाति के प्रति जे आशंका छल से ओकर लिखल कविता के ऐ लाइन में सेहो व्यक्त होय अछि:

सखी हम करमहीन

कोन विधि खेपब दिन

कोन विधि खेपब राति

निट्ठुर पुरूख क जाति

कोन विधि काटभ काल

हैत हमर की हाल।

परिस्थिति के मारल पारो के विवाह किशोरावसथे में अपना सं दुना उमिर के दुत्ति वर स भ जाय अछि। कथा के अंत होय अछि शारिरिक रूप स अपरिपक्व पारो के प्रसव के कारण भेल अकाल मृत्यु स। इ भाग पढैत काल पाठक के कोंरह फ़ाटि जाय से स्वभाविक अछि। ऐ प्रकारे देखल जाय त पारो एकटा तेजस्विनि मिथिलानी छथि जे मैथिल समाज में व्याप्त दोष के कारण जिबैत अपन अभिलाषा के समेट क रखै छथिन आ अंतत: अकाल मृ्त्यु के प्राप्त हौय छथिन।

आब अबै छी प्रो० हरिमोहन झा के रचना पर। ओना त हिनकर कथा-उपन्यास सब में नाना प्रकार के स्त्री पात्र सब भरल परल अछि, मुदा हम एतय हिनकर उपन्यास कन्यादान आ द्विरागमन के पात्र बुच्ची दाई आ मिस बिजली बोस के चर्चा क रहल छि। बुच्ची दाई के चरित्र जत अपन समय के मैथिल समाजक स्त्री क वास्तविकता अछि त मिस बिजली कदाचित ओ चरित्र अछि जेहन लेखक मैथिल स्त्री के भविष्य देखय चाहै छलाह। बुच्ची दाई एकटा एहन अबोध बालिका के चरित्र अछि जिनका मानसिक आ शारिरिक परिपक्वता से पहिनेहे बिआह क देल जाय छैन्ह आ ताहि कारणे ऐ संबंध के बुझ आ निभाब मे ओ अक्षम छलीह।  मुदा रूप आ गुण स पूर्ण बुचिया समय बितला पर आ सिखौला पढौला पर आधुनिकता के लिबास ओढि लै अछि। मिस बिजली बोस काशी विश्वविद्यालय में पढै वाली ओ कन्या छलीह जे कुशाग्र बुद्धि के संगे ठाय पर ठाय बाजय के कौशल सेहो राखै छलीह आ एहि कौशल के बले सीसी मिश्र के दर्प चुड-चुड करै छथिन आ हुनका हुनकर गलति के एहसाह दियाबै छथिन।


 

दू टा पुरूष लेखक के बाद दू टा स्त्री लेखक के रचना में स्त्री पात्रक चर्चा करै चाहै छी। सर्वप्रथम लिली रे के कथा उपसंहार के नायिका ’अपर्णा’ के चर्चा क रहल छी। लिली रे अपन विभिन्न रचना में स्त्री पात्र के मार्फ़त ऐ बात के उल्लेख कएने छथि जे मैथिल समाज स्त्री के विवाह, प्रेम-संबंध आदि के ल क अनुदार रहल अछि आ औखन तक अनुदार अछि। जे महिला वर्ग पितृ्सत्तात्मक समाज मे युग युग स सीदित आ प्रताडि.त होइत रहल छथि, सेहो वर्ग अपन समाजक दोसर सदस्य के प्रति अनुदार बनल रहलीह, सहानुभुति के अभाव रहलनि। शिक्षित आ आधुनिक मानल जाय बला समाजक पुरूष वर्गक मानसिकता में परिवर्तन नै आयल। ’अपर्णा’ के चरित्र एहि अन्तरविरोधक मर्मस्पर्शी उद्घाटन अछि। अपर्णा के प्रति हुनक बहिनोइ विनयक आचरण भावनात्मक नहि, शोषणात्मक छैन। ओ डाक्टरी के प्रवेश परीक्षाक मार्गदर्शनक नाम्पर अपर्णाके अपन मोह जाल में फ़ासि लैत छथि। अपर्णा के बहिन वसुधा के आचरण इर्ष्याभाव स भरल अछि ओ अपन पति के लंपटता के दोष नै दैत अछि, अपर्णा के दोषी मानैत अछि। ओ अपर्णा के तेज से जरैत अछि। पित्ति लग शिकायत क अपन छोट बहिन के प्रति घरक सदस्य में घृणा घनिभूत क दैत अछि। घौल भेल पिता अपर्णा के दंडित करबाक हेतु कठोरतम निर्णय करैत हुनकर पढाई छोरा एकटा मजदूर संगे साहि दैत छथिन। अपर्णा डाक्टर नै बनि सकलि मुदा अपन परिश्रम आ विद्या के बल पर सासुर के खूब सुखी-सम्पन्न बना दैत छथिन। मुदा विडंबना अछि जे अपर्णहिक परिश्रम स गिरथाइनि बनलि ननदि सब सब सेहो हुनकर कुचेष्टा करै अछि। अपर्णा त्यागमयि छथि, सेवाभावि छथि, सहानुभूतिशील छथि, अपन मोनक व्यथा कौखन प्रकट नै होमय दै छथिन। सबस बढि के धैर्य आ स्वाभिमान छैक। इ स्वाभिमान पतिक देहावसानक जिग्यासा मे आएल पिता के कहल वचन में (’एहिठाम हमरा सब मानैत अछि। अहास बहुत बेसी!’) सेहो स्पष्ट अछि।

अंतिम स्त्री चरित्र जेकर हम चर्चा एखन क रहल छि ओ अछि डा० शेफ़ालिका वर्मा के कथा ’मुक्ति’ के नायिका ’मेहा’। मेहा कोमल सदृ्श्य भाव वाली तेजस्विनी कन्या छथिन जिनका समाजक देखावटी उत्थान आ इळिटनेश नै पसिन्न छैन्ह। ओ अपन मा के महिला-मुक्ति आंदोलन आ ओय स जुड.ल सदस्या सब के आलोचक छथिन जे महिला-मुक्ति के नाम पर बड.का बड.का जुलूस त निकालै छथिन मुदा ई बात के अन्तर्बोध नै छैन जे महिला के मुक्ति चाहि कथि स। ओ अब अपनहि जानैत या अन्जान मे नारी के प्रतारणा के बढावा दै बला काज करै छथिन। एहि क्रम मे मेहा के विवाह एकटा प्रोफ़ेसर साहब से होय बला रहै छैन जे वास्तव मे पकरौआ विवाह छल आ तेकर बदला लै लेल प्रोफ़ेसर साहब मेहा संग हुनक पांच टा सखि के सिनुरदान क दैत छथिन। मुदा तेजस्विनि मेहा ऐ विकट परिस्थिति के अपन कुशाग्रता आ तेज से स्म्हारि लैत छथिन, ओ ऐ विवाह के अमान्य साबित क दैत छथिन आ प्रोफ़ेसर साहब के मुक्त करैत बजै छथिन जे “हम एहि विवाह के नै मानैत छी आ नै हमर संगी मानत। हम सब एत्तेक गेल-गुजरल नै छी । नारी के नियति मात्र विवाह छैक मुदा हम एकरा नै मानैत छी। विवाह स्त्री पुरूषक समर्पण थिक। जे बलजोरी देल जाय आ जे एक्कहि संगे पाच गोटे के देल जाय ओ सिन्दूर धर्मक दृ्ष्टिए मान भ जाए मुदा हम कहियो नै मनब।

प्रोफ़ेसर साहब मेहा के ऐ तर्क-वितर्क से अवाक भ गेल। ओ एकटा अग्यात सम्मोहन स आविष्ट भ मेहा से अपन अपराध लेल क्षमा मांगैत छथिन आ हुनका अपन जीवन संगिनि बनाब के वचन दैथ छथिन।

एहि प्रकारे हम देखैत छि जे जत पुरूष लेखक सब स्त्री पात्र के द्वारा समाज मे स्त्री के अवस्था आ हुनका प्रति व्याप्त कुप्रथा पर चोट करै छथिन ओतय महिला लेखिका स्त्री समाजुक स्थिति के सुक्ष्म विवेचना करैत छथिन।


एकटा जन्मेजय कथा (व्यंग्य)

 

ओना  महाभारतs सबटा कथा सब युग के लेल प्रासंगिक रहल अछिएहि क्रम में राजा जन्मेजयक एकटा कथा सेहो आजुक 

समय के हिसाब सं खूब प्रासंगिक अछि. राजा जन्मेजय अर्जुन के पोता  राजा परीक्षित के बेटा  उत्तराधिकारी छलाहएक बेर राजा परीक्षित कलयुगक प्रभाव सं ग्रस्त 

मरल सांप केर माला बनाय ऋषि शमीक के गर में  हुनकर अपमान कदेलखिन अपमान सं ऋषि के बेटा श्रृंगी 

पित्तिया गेलाह पित्ते आमिल पिने छलाह  अपन बाबू के अपमानक 

बदला लेबय के ठानि नेने छलाहएहि के लेल  नागराज तक्षक के बजायराजा परीक्षित केठिकाना लगाबय के सुपारी  देलखिन

बस तखन की अर्जुन सं पराजित  अपमानित तक्षक एहने मौक़ा के बाट जोहैत छलाहस्वाइत   सुपारी उठब में कोनो कौताही

 नै रखलाह  सही मौक़ा पाबि ओपरीक्षित के 'मर्डर देलाह

परीक्षित केर मर्डर के बाद हुनकर बेटा जन्मेजय गद्दी पर बैसलाहबापक ह्त्या के सभटा पिहानी जानलाक बाद हिनका मोन  में 

बदलाक भावना प्रज्ज्वलित  गेलैन   तक्षकसहित सभटा नाग के समूल नष्ट करै के ठानि लेलैथ   के लेल सर्प यज्ञ करेलैथ

 मुदा  'मर्डरके मास्टरमाइंड यानी ऋषि श्रृंगी के छोड़ि देलखिन.

 

"आब एकटा 'बाबासे के पंगा लैबदले लै के छैक  तक्षके सं  लैत छी  ओकर समूल नाश  दैत छी." ( सकै अछि एहने किछु विचार हुनका मोन में आयल हेतैनयद्यपि  तरहक बात महाभारत मेंआधिकारिक रूप सं कतौ ने 

देखलहुँ पढ़लहुँ अछि).हं  भेल एना की सर्प यज्ञ में एक एक  के सभटा निर्दोष सांप सब खसि खसि  भस्म होमय लागल

ओकरा सब के पतो नै छल जे ओकर सब के दोष की छैक जेकर सजा ओकरा सब के भेंट रहल छलखैर.हजारोलाख सांप के मुइला के 

बाद जखन तक्षक केर पारि एलै तखन पता नै  कुन देवता पित्तर से सेटिंग  के आस्तिक नामक एकटा ब्राम्हण के 

भेज के सर्प यज्ञ रुकवा देलक  तक्षक केर जान बचि गेल.कहल जाय छैक जे एकर बाद जन्मेजय  तक्षक दुनू बर्षो-बरख जिबैत रहलाह  अपन-अपन राज पाट के भोग केलाहकहाँदैन कहल जायछि जे तक्षक केर बाद में इन्द्रक 

दरबार में सेहो बड्ड निक पैठ बनि गेलछल  तरहे देखल जाय  मास्टरमाइंड ऋषि श्रृंगीएक्सीक्यूटर तक्षक  बदला लै पर 

उतारू जन्मेजय के  किछु नै भेल मुदा  सब प्रक्रिया में मारल गेल बेचारा हजारोलाख निर्दोष सांप सभ जेकर एकमात्रअपराध 

जे  तक्षक के समुदाय से छलाह.

उपसंहारआजुक समय में एहि कथा के प्रासंगिता चिन्हियौ  विचार करियौअहाँ बुद्धिजीवी छी

 


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