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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक 

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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रबीन्द्र नारायण मिश्र

लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)

३०म खेप 

-३०-

जहिन-जहिना हमर सामर्थ्य बढ़ैत गेल तहिना-तहिना हमरा ओहिठाम लोकक ढ़बाहि लागैत रहल ।आखिर कतेक गोटेकेँ हम अपना ओहिठाम रखितिऐक? जकरा अपना ओहिठाम काज नहि भए सकै तकरो कतहु-ने-कतहि जोगार करेबाक प्रयास करी । जाबे ओकरा काज नहि भेटैक,दरमाहा नहि भेटि जाइक,ताबे हमरा ओहिठाम रहबाक ओरिआनरहिते छल । हम अपन मकानक एक तल ओहीसभ हेतु छोड़ि देने रही । हमरा ओतए जेसभ काज करैत छलाह ओहिमे प्रमुख छलाह शंकर । ओ सभक मेट छलाह । हमरा हुनका रहलासँ ई सुविधा छल जे ओ आओर कार्यकर्तासभकेँ नीकसँ व्यवस्था कए लैत छलाह । एक हिसाबे ओ मालिके जकाँ रहैत छलाह ।

मुदा एकदिन हुनका चलते बेस मोसकिलमे पड़ि गेलहुँ । पुलिस हुनका तकैत-तकैत हमरा लग आबि गेल । ओ कतहु नहि भेटथि । असलमेओ एकटा पड़ोसक कन्याकेँ लए चंपत भए गेल रहथि । कतए गेलाह,कोनो पता नहि । हमरो कहिओ एहिबारेमे किछु नहि कहलाह। आब की होएत? सभठाम हमरे घरक पता देने रहथि । पुलिस हमरा उठाकए थाना लए गेल । आब की करी? ककरा कहिऐक जे जान बाँचत? किछु नहि फुराए ।

एहि घटनासँ हमरा आँखि खुजि गेल । आब बुझाए जे किएककैकगोटे एहिसभ सँ बँचि कए रहए कहैत छल । मुदा हम ओकरा सभकेँ बुरिबक बुझिऐक । अपन लोकक काज नहि अएलहुँ तँ जीबिए कए की करब " -से मोने-मोन सोची । मुदा आब शंकर तँ तेहन  झटका देलाह जे हाथ-पैर सुन्न लागि रहल अछि ।

पुलिस लाख हाथ-पैर मारलक, ने ओहि कन्याक, ने शंकरक कोनो पता भेटलैक । हमरा उपर पुलिस दिन-राति दबाब बनओने रहैत छल । कतबो कहिऐक कोनो सुनबाइ नहि । पुलिस हमरा हाजतिमे बंद कए देलक । जमानतो नहिभेटल ।असलमे केस बहुत जगजिआर भए गेल रहैक।अखबार,रेडिओ,टेलीवीजन दिन-राति घोल केने रहैत छलैक । मुदा जखन हमर जहल जेबाक समाचार छपल तँ हमर कतेकोमित्र,शुभचिंतक परेसान भए गेलाह । हमर कर्मचारीसभ सेहो हल्ला केलक । तकर परिणाम उल्टे भेलैक । पुलिस लाठीसँ कर्मचारी सभकेँ ओध-बाधकए देलक । सभटा भेल मुदा शंकर पकड़ल नहिजा सकल ।

कन्या नवालिग छलि । केना-ने-केना ओकरा संपर्कमे अएलैक आ तकर शंकर नाजायज फएदा उठओलक । कनिको ई नहि सोचेलैक जे हमरो ऊपर किछु असर होएत । जखन दिल्ली आएल रहए तँ किछु नहि रहैक ।आधार कार्ड बनेबाक हेतु हम ओकरा अपन घरक पता देलिऐक । अपना ओहिठाम काज धरा देलिऐक । काज नीक करैक । बात-व्यवहारो नीक रहैक । क्रमशः ओकरापर विश्वास बढ़ैत गेल । कर्मचारीसभक देखरेखक भारओकरे दए देलीऐक । सत बुझी तँ ओ मालिके जकाँ काज करए।ओ एहनो भए सकैत अछि से नहि सोचि सकलहुँ । तकरे फल भोगि रहल छी । जे भेल से भेल आब एहिसँउबड़ब कोना?

हमरा जहलमे जेबाक समाचार सुनि एकदिन मदनबाबू भेंट करए अएलाह । ओ कारबारक क्रममे विदेश चल गेल रहथि। ओहिठामसँ अएलाह तँ हमरा बारेमे जानकारी भेटलनि । जहलमे भेंट करए अएलाह । हुनका देखितहि कनाए लागल । ओ हमरा लेल मनुक्खक देहमे भगवानोसँ बेसी रहलाह अछि । हमर हालत देखि हुनका नहि रहल गेलनि ।

"अहाँक ई हाल केना भेल?"

" हमर किछु गलती नहि अछि । मुदा पुलिसकेँ असली गुनहगार नहि भेटलैक तँ हमरे पकड़ि लेलक किएक तँ ओकर पता हमर घरेक छैक ।"

"एहनो कतहु भेलैक अछि ।"

ओ मोबाइल फोनसँ पता नहि ककरा-ककरासँ गप्प केलाह । औ बाबू! धराधर एकसँ -एक पुलिसक अधिकारी ओतएपहुँचए लागल । ओ सभ हुनकासँ घटी मानि रहल छल । मदनबाबू अड़ि गेलखिन -

"पहिने हिनका जहलसँ बाहर करू तखने हम किछु सुनब। "

पुलिससभ थरथर काँपि रहल छल । घंटाभरिक अंदरे हमर जमानतक कागज बनि गेल। हम जहलसँ छुटि मदनबाबूकसंगे हुनके ओहिठाम बिदा भेलहुँ । जाबत हम जहलसँ छुटलहुँ नहि ताबे ओ कतहु नहि गेलाह । हुनकर एहि महानताकेँ की कहबै? एहि दुनियाँमे अधलाह लोक अछि तँ भगवान नीको लोकक कमी नहि रखने छथि। तेँ ई संसार चलिओ रहल अछि ।

मदनबाबूक प्रयाससँ हमरा जमानतो भेल आ किछु दिनक बाद केससँ नामो हटि गेल। मुदा हम तबाह तँ भइए गेलहुँ। सभटा काज लटकि गेल । मासदिन काज बैसिगेलासँ कैकटा कार्यकर्ता एमहर-ओमहर भए गेल । फेरसँ सभकिछुकेँ पटरीपर आनबामे कतेको दिन लागि गेल ।

मदनबाबूकेँ फेर विदेश जेबाक रहनि । जाइतकाल हमरा बजा कए अपनाभरि बहुत किछु जोगार कए गेलाह ।

हवाइअड्डाधरि बहुत सिनेहक गप्प-सप्प करैत रहलाह ।कहलाह-

" नीक काज करैत रहू । काँटेमे गुलाब फुलाइत छैक । मानलहुँ जे किछुगोटे धोखा दए देलक आ आगुए दए सकैत अछि मुदा तकर चलते अहाँ अपन सही रस्ता किएक बदलि लेब? नीक -नीके होइत छैक । शक्ति इजोतमे होइत छैक,अन्हारमे नहि । दीप जराउ,अन्हारक पाछु नहि जाउ । ई छोट-मोट मामलासभ अपने शांत भए जेतैक । "

हमरा गुम्म देखि कहैत छथि-

" आब अहाँ बिआह कए लिअ।"

हुनकर बात सुनि हम लाजसँ मुड़ी नीचा कए लेलहुँ । जहाजक उड़बाक समय लगीच छल । हुनका प्रणाम केलहुँ ।

नीकसँ रहब । पता नहि आब कहिआ भेंट होएत?” से बजैतमदनबाबू अंदर चलि गेलाह । हम अपन घर वापसबिदा भेलहुँ। रस्तामे ओ रहि-रहि कए मोन पड़ैत रहलाह ।थाकि से गेल रही ।झलफल भए गेल छल । हवाइअड्डासँ लौटिकए सबेरे- सकाल सुति रहलहुँ।

 

 

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