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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक  गद्य

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(c)२००४-१०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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शम्भु कुमार सिंह

जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा, गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन विषय पर पी-एच.डी. वर्ष 2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।सम्‍पादक

 

 

निबंध : मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण (यू. पी. एस. सी. परीक्षार्थीक हेतु उपयोगी)          

निबंधकार :   डॉ. शंभु कुमार सिंह

 

 

 

मैथिली साहित्यक काल-निर्धारण

 

ज्ञान राशिक संचित कोष थिक साहित्य। शब्द आ अर्थक यथावत सद्भाव, जाहिमे मनुष्यक भावना आ बेधन चेष्टा समाविष्ट हो सैह थिक साहित्य। जनताक चित्रवृतिक परम्पराक संग ओकर सामञ्जस्य देखाएबे साहित्यक इतिहास थिक। व्यापक, गहन आ अध्ययनक सुविधाक लेल साहित्यकेँ समयक विभिन्न परिधिमे बाँटब काल-विभाजन थिक। मुदा काल विभाजनक ई तात्पर्य कथमपि नहि अछि जे एक कालक समाप्त भेलाक लागले पश्चात् दोसरहि दिन साहित्यक धारा दोसर दिशामे प्रवाहित होमए लगैत अछि। काल-विभाजन कोनो सुनिश्चित  मापदण्ड अथवा कसौटी नहि अछि,  एहि लेल काल विशेषक नामकरण, कखनहुँ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आ धार्मिक परिस्थितिक परिपेक्ष्यमे होइछ तैँ कखनहुँ रचना विशेषक प्रवृति प्रावल्यक आधार पर। साहित्य अनन्त अछि। कोनो साहित्यक वैज्ञानिक ओ विधिवत ज्ञान ओहि साहित्यक अध्ययन सँ संभव होइत अछि। साहित्यक सम्यक अध्ययनक लेल युग विभाजन वा काल-विभाजन आवश्यक अछि। एकर स्पष्टीकरण मिश्रबन्धुक निम्न पंक्तिसँ भ जाइत अछि:

            काल-विभाजन इतिहास के प्रासाद की दीवारें हैं। काल-विभाजन द्वारा यह माना जा सकता है कि, कब, कैसे और किधर लोगों की मनोवृत्ति और विचारधारा प्रवर्तित हुई। किन्तु काल निर्णय कोई सुकर कार्य नहीं। काल की कड़ी के दोनो छोड़ों को पकड़ना बहुत सूक्ष्मदर्शिता और गहरी विवेचना से हो पाता है।  विचारों और उसके प्रकाशन में जब कोई नयी क्रान्ति आ उपस्थित होती है, तभी काल श्रृंखला की नई कड़ी आरंभ होती है। कोनो निर्जन प्रदेशक शैवलनी सदृश एकर धारा अबाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहल अछि। अतः ओकर सम्यक विचारक परिचय पएबाक हेतु काल-विभाजन प्रयोजनीय अछि, उपयोगी अछि।

मैथिली साहित्यक काल-विभाजन पर जखन विचार करैत छी तँ ई एक गोट विचारणीय विषय बनि जाइत अछि। विभिन्न विद्वानक एहि संबंध मे मत अछि एवं प्रसिद्ध इतिहासकार लोकनि एहि प्रसंगे, विभाजन पृथकृ-पृथक कएल अछि। ओना तँ  साहित्य प्रवाहमान धाराक सदृश्य अछि, जिकर विभाजन दुःसाध्य नहि प्रत्युत असंभव भ जाइत अछि; किन्तु अध्ययनक सुविधाकेँ दृष्टिमे राखि विभिन्न प्रवृतिक प्रधानता आर अप्रधानताक आधार पर विभाजन क लेल जाइछ। ई विभाजन दू प्रकारेँ कएल जा सकैछ:

(I)                 देशकृत

(II)               कालकृत

साहित्य तँ सार्वभौमिक ओ सर्वकालिक अछि। यदि देशकृत विभाजन कएल जाए तँ साहित्य पृथक-पृथक  स्थान पर भिन्न-भिन्न नाम सँ संबोधित कएल जाएत।

कालकृत विभाजन किछु विशेष प्रवृतिक आधार पर कएल जाइछ। परिवर्तन मनुष्यक संग अवांछनीय रूपसँ अछि। सामाजिक, धार्मिक ओ राजनीतिक परिवर्तन भेल करैछ। कोनो युगमे कोनो खास तरहक प्रवृतिक प्रधानता पाओल जाइत अछि। प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति। अतः प्रवृतिक अनुरूप ओहि कालक नामकरण कएल जाइछ; जाहिसँ ई कथमपि नहि बुझबाक चाही जे आन-आन प्रवृतिक अवशेष भए जाइछ, अपितु ओ गौण रूपसँ सदिखन वर्तमान रहैछ। जाहिकालमे कोनो विशेष प्रवृतिक रचनाक प्रचुरता भेटैछ तँ ओ स्वतंत्र भ ओकर फराक नामकरण कएल जाइछ। एहि प्रकारेँ कालकृत विभाजनक एकगोट आर विशेषता पाओल जाइत अछि ओ थिक ग्रंथकेँ विशेष प्रसिद्धि भेलासँ कोनो कालक भीतर जाहि प्रकारक अनेक प्रसिद्ध ग्रंथ चलि आबि रहल अछि तेँ ओहि प्रकारक रचनाकेँ ओहिकालक अंतर्गत मानब उचित होएत। यद्यपि आनो-आन पुस्तक सभ ओहि कालक मध्य असाधारण कोटिक किएक नहि प्राप्त हो।

   अतः मैथिली साहित्यक युग विभाजन एहि रचना प्रवृतिक आधार पर तीन युगमे भेल अछि—पहिल अछि गीतिकाव्य युग, दोसर—नाटक युग, आ तेसरके—गद्य युगक संज्ञा देब उचित होएत। दोसर शब्दमे पहिलकेँ श्रृंगार युग दोसरकेँ  ‘भक्ति युग आ तेसरकेँ  ‘आधुनिक युग कहल जा सकैछ।

   प्रारंभिक युगमे मिथिलामे गीतिकाव्यक विशेष प्रचार-प्रसार रहलाक कारणेँ प्रायः गीति-युगक संज्ञा देल गेल। एहि युगक प्रवर्तक छलाह अभिनव जयदेव महाकवि विद्यापति ठाकुर। हिनकासँ ल कए कवीश्वर चन्दा झा धरि एकर पूर्ण प्रचार-प्रसार रहल। कवीश्वरक मृत्युक पश्चात् एहि युगक अवसान भ गेल।

मध्य युगमे आबि कए गीति काव्यक मधुर-मधुर गीत संयोगसँ नाटकक रचना दिस लोकक प्रवृति झुकल। अतः एहि युगकेँ नाटक युगक संज्ञा  देब उचित प्रतीत होइत अछि। एहि युगमे हमरा लोकनिकेँ उमापति उपाध्याय कृत पारिजातहरण म.म. रामदास झाक आनंदविजयाभिधान काशीनाथकृत विद्याविलाप कृष्णदेवकृत महाभारत आ धनपतिकृत माधवानल काम कण्डला सँ साक्षात्कार होइत अछि।

एवं प्रकारेँ नाट्य कलाक विशेष प्रदर्शन भेलासँ लोकक रूचि ओहिसँ बदलैत गेल एवं वर्तमान युग मे लेखकक प्रवृति गद्य लिखबा दिस विशेष झुकल। एहि युगमे लेखक वृन्द गद्य साहित्यमे अपन मौलिक रचनामे उपन्यास, गल्प, कहानी, निबंध, लिख दिस विशेष रूचि देखौलन्हि।

आब प्रश्न उठैत अछि जे एखन धरि जतेक काल-विभाजन मैथिली साहित्य मध्य कएल गेल अछि ओकर तिथि निर्धारण करबामे विद्वान लोकनिमे मतैक्य किएक नहि अछि? मैथिली साहित्यक प्रथम काल-विभाजन करबाक प्रयास (I) म. म. डॉ. उमेश मिश्र, मनबोध रचित कृष्णजन्मक अपन भूमिकामे कएलन्हि अछि। हिनका मतानुसारेँ:

(I)                 आदिकाल        1100 सँ     1300 ई. धरि

(II)               मध्यकाल       1300 सँ     1800 ई. धरि

(III)              आधुनिक काल  1800 सँ     अद्यतन।

उपर्युक्त विभाजन एकतँ  मैथिलीकेँ ध्यानमे राखने अछि आ भाषाक विभिन्न रूपकेँ ध्यानमे राखि कएल गेल  काल-विभाजन साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन नहि कहाओत। साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन मे भाषाक अतिरिक्त कृत्ति, कर्ता पद्धति ओ विषय पर ध्यान देब आवश्यक अछि।

      म. म. डॉ. उमेश मिश्र, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्क वार्षिक अधिवेशन, मार्च 1953 मे अध्यक्ष पदसँ मैथिली भाषा ओ साहित्य पर भाषण दैत, राजनीति, सामाजिक ओ भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ समस्त साहित्यकेँ निम्न भागमे प्रस्तुत कएने छथि:

 

(I)                 आदिकाल        1000 सँ     1600 ई. धरि

(II)               मध्यकाल       1600 सँ     1860 ई. धरि

(III)              आधुनिक काल  1860 सँ     1950 ई. धरि।

ओ मिथिला भाषा तथा इतिहासकेँ एहि प्रकारक उपादेयता पर विचार करैत तीनू युगमे नामकरण करैत छथि। आदियुगकेँ गीतियुग, मध्ययुगकेँ नाटकयुग एवं आधुनिक युगकेँ गद्ययुगक संज्ञासँ संबोधित कएल अछि। काल विभाजनक प्रसंगमे अपन विचारक परिवर्तनक कोनो युक्तिसंगत कारण म. म. मिश्रजी नहि देने छथि। परन्तु हिनक पूर्वक काल-विभाजन एवं नवीन काल विभाजनक बीच डॉ. जयकान्त मिश्रक प्रबंध प्रकाशित भ चुकल छल। डॉ. मिश्रक काल-विभाजन ऐतिहासिक पृष्ठभूमिमे सर्वमान्य अछि तँ आश्चर्य नहि जे म.म. जी अपन मतमे संशोधन कएने होथि। हिनक एहि प्रकारक विभाजनमे कए प्रकारक दोष आबि गेल अछि जे, सम्प्रति 1950 ई. मे आबि कए आधुनिक युगक समाप्ति मानैत छथि। मिथिला वा कोनो देशक जनताक चित्रवृत्त बहुल किछु राजनीतिक, सामाजिक साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितिक होइत अछि, मुदा जखन 1950 पर दृष्टिपात करैत छी तँ सर्वथा असंगत बुझि पड़ैत अछि, एहि कालमे कोनो राजनीतिक वा सामाजिक परिवर्तन नहि पाबि रहल छी जकर आधार मानि म. म. मिश्रजी अपन विभाजन मध्य आधुनिक कालक समाप्ति कएल अछि। जँ हिनक धारणा छनि जे काल-विभाजन राजनीति, सामाजिक एवं भाषाविज्ञानक दृष्टिएँ कएल जाय तँ राजनीतिक परिस्थितिकेँ ध्यानमे राखि सम्प्रति 1947 मानि सकैत छलाह। एहि प्रकारेँ विवेचना कएला उत्तर जखन हिनक विभाजनक साहित्यिक समीक्षा करैत छी, तँ हिनक परिभाषा अमान्य सिद्ध होइत अछि।

(2) डॉ. जयकान्त मिश्र साहित्य अकादमी सँ प्रकाशित अपन शोध-प्रबंध, ‘The history of Maithili Literature, Volume-I’ मे राजनीतिक घटनाक साहित्य परंपरा पर प्रभावक आधार पर काल विभाजनक प्रसंगे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि—

(I)   प्राक् मैथिली काल                          8म शताब्दीसँ 12हम शताब्दी धरि

(II)  प्रारंभिक मैथिली साहित्य                     1300 ई.सँ 1600 ई.

      (III) मध्यकालीन मैथिली साहित्य                        1600 ई. सँ 1860 ई.

(IV)             आधुनिक मैथिली साहित्य                   1860 ई. सँ अद्यतन।

डॉ. मिश्रक उपर्युक्त कथन बहुतो अंशमे तर्कपूर्ण एवं वैज्ञानिक कहल जाएत। यद्यपि अपन काल विभाजनक आधार ओ राजनैतिक घटनाक साहित्य परम्परा पर प्रभावे केँ राखलन्हि अछि। हिनका अनुसारेँ भाषा-वैज्ञानिक आ व्याकरणक दृष्टिएँ ई विभाजन समीचीन अछि। मुदा एहिमे सेहो किछु त्रुटि रहि गेल अछि। प्रारंभिक कालक समय जे 1300 ई. स्थिर कएल गेल अछि तकर आरंभ मानबाक कोनो कारण नहि देल गेल अछि। 1300 ई. मानलाक कारणेँ ओहिसँ पूर्वक बहुत रास रचना एहि परिधिमे नहि आबि सकल। मुदा विद्यापतिक पूर्वक साहित्यकेँ प्राक् विद्यापति साहित्यक संगे विस्तारसँ चर्चा कएने छथि। एहि साहित्यमे वर्णरत्नाकर तँ हिनक युग आरंभिक रचना थिके, चर्यापदहुक चर्चा ओ बड़ परिश्रमपूर्वक केने छथि। तखन हिनक उपर्युक्त मत स्वतः संदेहात्मक भ जाइत अछि।

1300 ई. मे मिश्रजी मुसलमानक आगमनक कारण प्रस्तुत करैत छथि। मिथिला सर्वदासँ कट्टर धर्मावलम्बी रहल ताहिसँ मिथिलापर मुसलमानक आगमनक कोनो प्रभाव नहि पड़य देल। एकर दोसर हेतु इहो भ सकैत अछि जे, जयकान्त बाबूक ध्यान ज्योतिरीश्वरक गद्य ग्रंथ वर्णरत्नाकर पर होइन्ह एवं एकर समय 1324 ई. लगभग कहने छथि। 1400 ई. क अभ्यन्तर विद्यापतिक प्रभाव साहित्य पर मुख्य रहल। एहि समयमे अपभ्रंशक पतनक अनन्तर पूर्वीय भारतमे मैथिलीक प्रयोग भेटैत अछि। श्री जयकात बाबू एहि काल-विभाजन अवसानक कारण प्रस्तुत करैत ओइनवार वंशक पतनक कारण प्रस्तुत करैत छथि।

एहि प्रकारेँ 1600 ई. सँ मध्यकालक प्रारंभ मानल गेल अछि ताहि हेतु विशेष उल्लेख नहि कएल गेल अछि। एहि युगमे मिथिलामे नाट्य साहित्यक पूर्ण प्रचार-प्रसार छल। जकरा ओ कीर्तनिञा नाटक कहल अछि। हिनका अनुसारेँ विद्यापति पदावलीक जे सशक्त धारा प्रवाहित भेलसे उमापतिसँ नाट्य रचनाक प्राचुर्य द्वारा एक महत्वपूर्ण ओ प्रौढ़ दिशान्तरकेँ प्राप्त कए नवयुग प्रवेश कएल परन्तु हिनक ई धारणा पूर्वाग्रहसँ अनुप्राणित अछि। वस्तुतः जकरा ओ मैथिलीक नाट्य परंपरा कहैत छथि ओ ओहिसँ पूर्व विद्यापति एवं ओहूसँ पूर्व ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम सँ प्रारंभ भेल। एहि समयक उल्लेख करैत मिश्रजी नेपालक जगतप्रकाशमल्ल, उमापति उपाध्याय एवं शंकरदेवक नाम लैत छथि, जे ओ मैथिली नाट्यकलाक प्रवर्तक क रूपमे अबैत छथि। एहि कालक अवसान सेहो खण्डवला कुलक अवसानसँ भेल।

डॉ. जयकान्त बाबू आधुनिक युगक आरंभ 1860 ई. सँ मानलन्हि अछि, जखन कि दरभंगा राज कोट ऑफ वार्डस (Courts of Wards)क संरक्षण मे चलि गेल आर दरभंगा शहरमे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार भेल। परन्तु जखन हम मिथिलाक सीमा मैथिलीक क्षेत्रकेँ दरभंगा सँ बाहरो मानैत छिऐक तँ खाली दरभंगेक स्थिति पर साहित्यक निर्धारण करब कतए धरि तर्कसंगत होएत?

(3) एहि प्रकारेँ प्रो. श्रीकान्त मिश्र सेहो अपन इतिहासमे उपर्युक्त  तथ्यक समर्थन कएल अछि। एवं क्रममे अनेक गतिरोधक मुख्य कारण प्रस्तुत करैत मिश्रजीक कथन अछि जे शिक्षा-पद्धतिमे बरोबरि मैथिलीक अवहेलना होइत रहल। समय पाबि साहित्यक आनहु अंग सभ गद्य, पद्य आदिक विशेष प्रगति होइछ।

(4) तेसर काल-विभाजन कुमार श्री गंगानंद सिंहक द्वारा कएल गेल अछि। तथा जकर उल्लेख अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलनक चौदहम अधिवेशनमे मैथिली साहित्यक प्रगति शीर्षक निबंध पर भाषण दैत अपन मतक पूर्ण विवेचना कएल अछि:

(I)              प्रारंभिक काल             800 सँ      1300 ई. धरि

(II)      मध्यकाल                1300 सँ     1800 धरि

       (III)      आधुनिक काल                  1800 सँ 19म, 20म शताब्दी धरि

प्रारंभिक कालमे ओ चर्यापदक आचार्य लोकनिक रचनाकेँ मानैत छथि, आ वाचस्पति मिश्रक भामति टीका आ सर्वानन्दक अमरकोष टीकामे संस्कृत पर्यायवाची अनेक मैथिली शब्दक उल्लेख कएल अछि। परन्तु चर्यापदक भाषा मैथिलीक पूर्व रूप भनहि भ सकैछ मुदा ओकरा मैथिली नहि कहि सकैत छी। भाषाविज्ञानक अनुसारेँ ई बुझि पडैत अछि जे लिपिबद्ध नहि भेलाक कारणेँ ओकरा भाषामे बहुत परिवर्तन भेल ताहिसँ ओ बहुत किछु आधुनिक मैथिलीक रूप धारण कए लेने अछि। प्रारंभिक कालकेँ 800 ई. ल जएबाक कोनो तेहन युक्ति नहि भेटैत अछि।

एहि प्रकारेँ सम्प्रति मध्यकालमे जयकान्त बाबूक प्रारंभिक मैथिली साहित्य ओ मध्यकालीन मैथिली साहित्य दुनूकेँ सन्निहित क देल गेल अछि। ज्योतिरीश्वरक वर्णरत्नाकर केँ मैथिलीक सभसँ प्राचीन उपलब्ध गद्य ग्रंथक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। एहि भाषामे प्रोत्साहन एवं विकास तत्कालीन नृपतिगणक सहयोगक फलस्वरूप भेल। एहिमे अनेक कवि एवं लेखक लोकनिक प्रादुर्भाव भेलासँ साहित्यक अभिवृद्धिमे सहायक सिद्ध भेल।

वस्तुतः साहित्यक प्रारंभ ओ विकास एहिठाम केन्द्रित भ जाइत अछि। ताहिसँ 1800 ई. सँ वर्तमान काल मानवामे समुचित कारणक आभाव भेटैत अछि। ओ आधुनिक कालकेँ दू भागमे विभाजित करैत छथि। 19म शताब्दी धरि मैथिलीमे जतेक ग्रंथ सभक चर्चा भेटैत अछि ओहि पर भाषा एवं वाक्यविन्यासक दृष्टिएँ 18म शताब्दीक छाप बुझि पड़ैत अछि। परन्तु 20म शताब्दीमे आबि कए क्रमशः एकर प्रयास भेलैक जे जतए जे छटा भेटलैक ओकरा ग्रहण कए मैथिलीक कायाकल्प कएल जाए। एहि विभिन्नताक मुख्य कारण राजनीतिक थिकैक।

(5) एहि काल विभाजनसँ मिलैत-जुलैत विभाजन श्री भोलालालदास मिथिला मिहिरक मिथिलांक मे सेहो कएलन्हि अछि जकर समानता एहि विभाजनसँ अछि।

(6) मैथिली साहित्यक मूर्द्धन्य विद्वान आ प्रसिद्ध भाषाविद् डॉ. सुभद्र झा अपन शोध प्रबंध ‘Formation of Maithili Language’ मे सेहो काल-विभाजन करबाक प्रयास कएल अछि। हिनक विभाजनमे सेहो कोनो मतसँ साम्य नहि भेटैत अछि, अतएव एकरा स्वतंत्र विभाजन कहल जा सकैछ। हिनक विभाजन एहि प्रकारेँ अछि:

(I)        प्रारंभिक कालक मैथिली                      A.D 1000        सँ     A.D 1300

(II)       मध्यकालीन मैथिली                A.D 1300         सँ     A.D 1800

(III)                          आधुनिक मैथिली                    A.D 1800         सँ     अद्यतन।

आलोचक क अनुसारेँ डॉ. झा मैथिली भाषा ओ साहित्यक विकास 1000 ई. पश्चाते मानैत छथि। संभव ई मानि जे वर्णरत्नाकर मे प्रयुक्त भाषा ओकर रचनाकाल 300 ई. पूर्व विकसित भेल छल। परन्तु की मिथिला-भाषा विकासक प्रक्रियाकेँ बुझबाक हेतु चर्यापद क भाषा सहायक सिद्ध नहि भ सकैछ? एहि प्रकारेँ डॉ. झा 1000 ई. पूर्वक रचना पर ध्यान नहि रखलन्हि अछि। 1800 ई. धरि मध्यकाल मानबाक हुनक आधार की अछि तकरा स्पष्ट सेहो नहि केने छथि। डॉ. झा काल विभाजनक क्रममे साहित्य परंपरा पर ध्यान नहि दए भाषाक विकासक दृष्टिएँ देखबाक प्रयास कएलन्हि।

मैथिलीक प्रारंभिक काल विद्यापतिक कीर्तिलता एवं कीर्तिपताका सँ  मानैत छथि। एहि प्रकारेँ ओ अपन निबंधमे लिखने छथि—“Hence as the display the genius of the language they are termed pro to Maithili or Maithili at the earliest stage of its development.”

वर्णरत्नाकरसँ कृष्णजन्म धरि मध्यकालीन मैथिलीकेँ उदारहणस्वरूप उपस्थित करैत छथि। कृष्णजन्म जकर भाषावलोकन कएलासँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे मनबोधक शैली 18म शताब्दीक प्रतिनिधित्व करैत अछि।

जखन कि प्रारंभिक मैथिली एवं मध्यकालीन मैथिलीभाषामे सभ्यता आबि गेल तखन आधुनिक मैथिलीक रूप धारण क लेलक। एहि प्रकारेँ एकर उद्भव एवं विकास 19म शताब्दीकेँ मानि सकैत छी। ई कहबामे कठिनता अछि जे कोन युगमे एहि साहित्यक कोन रूप छल एवं कोन स्थितिमे छल मुदा एतबा धरि अवश्य जे प्रत्येक युग अपन युगक छाप लैत अछि।

मैथिली साहित्यक प्रसिद्ध समालोचक स्व. प्रो. रमानाथ झा मैथिली साहित्यक काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मनतव्य डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश रचित मैथिली साहित्यक इतिहासक भूमिकामे उपस्थित करैत छथि जे काल विभाजनक समस्यापर कोनहुँ आचार्यक मतसँ हमरा संतोष नहि अछि। हिनक विभाजन एहि प्रकारेँ अछि:

(क)             विद्यापति युग- कृष्ण काव्य युग अथवा प्राचीन युग

(ख)             चन्दा झा युग – कृष्ण काव्य युग अथवा नवीन युग।

समालोचक लोकनिक मतेँ निश्चित रूपेँ उपर्युक्त काल-विभाजन रचना पद्धतिक आधार पर समीचीन होइतहुँ सर्वांगपूर्ण नहि कहल जाएत, कारण मैथिली साहित्यक बहुत रास रचना एहि काल विभाजने नहि आबि सकत जेना चर्यापद, वर्णरत्नाकर आदि। चन्दा झाक युगसँ पूर्वक समस्त मैथिली साहित्यकेँ प्राचीन युग मानब उचित नहि बुझना जाइत अछि।

(8) डॉ. दुर्गानाथ झा श्रीश अपन पुस्तक मैथिली साहित्यक इतिहास मे काल विभाजनक प्रसंगमे निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि:

(1) आदिकाल, प्राक् ज्योतिरीश्वर काल अथवा अपभ्रंश युग—ई. पू. प्रथम शतकसँ 1300 ई. धरि

(2) विद्यापति युग—1300 सँ 1860

      (क) विद्यापति युग—1700

      (ख) उत्तर विद्यापति युग—1700 सँ 1860

(3) आधुनिक काल—1860 सँ अद्यःपर्यन्त

      (क) वातावरण निर्माण—1860 सँ 1880

      (ख) चन्दा झा युग—1880 सँ 1930

      (ग) नव-नव विकासक युग—1930 सँ अद्यःपर्यन्त।

आलोचक लोकनिक अनुसारेँ हिनक मत बहुत अंश धरि समीचीन एवं तर्कपूर्ण बुझना जाइत अछि।

(9) डॉ. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास एवं मेघातिथिक छद्म नामसँ मैथिली साहित्यक प्रमुख कविक मैथिली कविताक विकास शीर्षकमे निम्न तर्क प्रस्तुत कएने छथि:

(I)     आदिकाल     1100  सँ 1556 ई. धरि

(II)    मध्यकाल    1556 सँ 1857 धरि

(III)   आधुनिक काल 1857 सँ अद्यःपर्यन्त।

आलोचकक अनुसारेँ हिनक दृष्टि शुद्ध  साहित्यैतिहासिक होएबाक चाही मुदा से नहि अछि। हिनक विभाजनसँ चर्यापद मैथिलीक विवेच्य वस्तु नहि रहि जाइत अछि, आ 1100 ई. धरि तँ एहन कोनो कृत्ति नहि अछि जकरा आधार मानि 1100 ई. सँ आरंभिक  काल मानल जायत.....। डॉ. झा काल सीमाक विभाजनमे डॉ. जयकान्त मिश्रसँ प्रभावित बुझि पड़ैत अछि; यद्यपि समग्र रूपेँ ओहो साहित्यिक विकासक मर्म  केँ अनुभव करैत अवश्य प्रतीत होइत छथि।

प्रो. शैलेन्द्र मोहन झा अपन अप्रकाशित शोध-प्रबंध आधुनिक मैथिली साहित्यक विकास मे उपरोक्त विभाजनक संशोधन करैत निम्नरूपेँ प्रस्तुत कएने छथि:

 

(I)     आदिकाल     1300  सँ 1555 ई. धरि

(II)    मध्यकाल    1555 सँ 1857 धरि

(III)   आधुनिक काल 1857 सँ अद्यःपर्यन्त।

(10) स्वर्गीय डॉ. राधाकृष्ण चौधरी अपन पुस्तक ‘A Survey of Maithili Literature’ मे निम्न रूपेँ काल विभाजनक प्रसंगमे अपन मत व्यक्त कएने छथि:

(I) Early Maithili Literature   900-1350 A.D

(II) Middle Maithili Literature            1350-1830 A.D

(III) Early Maithili Literature  1830- till dated

समालोचकक अनुसारेँ प्रो. चौधरी, अपन काल विभाजनक हेतु सेहो प्रस्तुत कएने छथि मुदा तकर विश्लेषण कएलासँ ओ सभ समीचीन नहि बुझना जाइत अछि। 1830 ई. सँ आधुनिक युगक आरंभ मानबामे कोनो ठोस कारण नहि भेटैत अछि। ने तँ तत्कालीन कोनो साहित्य उपलब्ध अछि आ ने मिथिलामे एहन कोनो राजनीतिक अथवा सामाजिक घटनाक सूत्र प्राप्त होइत अछि, जकर मिथिलाक सांस्कृतिक जीवनमे प्रभाव पड़ल हो।

(11) डॉ. दिनेश कुमार झा मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास नामक अपन पुस्तक मे काल विभाजनक प्रसंगमे अपन निम्न मत प्रस्तुत कएने छथि:

(I) आदिकाल/आधारकाल 800 सँ 1350 ई. धरि

(II) मध्यकाल 1350 सँ 1857 धरि

(III) आधुनिक काल-

(क)             ब्रिटिश काल 1857 सँ 1947 धरि

(ख)             स्वतंत्रता काल 1947 सँ अद्यःपर्यन्त।

डॉ. झा आदिकालक आरंभ सिद्ध साहित्यसँ, मध्यकालक आरंभ विद्यापतिक रचनासँ आ आधुनिक कालक आरंभ अंग्रेज सभक द्वारा राज्य स्थापना एवं नवीन शिक्षाक फलस्वरूप जीवनक नव परिस्थिति उत्पन्न भेला तथा साहित्यक स्पिरिट बदलि गेलासँ एवं अंग्रेजी एवं अन्य यूरोपीय साहित्यक मैथिली साहित्यपर प्रचुर प्रभावसँ मानैत छथि। हिनक मत समालोचकक अनुसारेँ बहुत अंश धरि तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक एवं समीचीन अछि। ई शुद्ध राजनैतिक दृष्टिसँ काल-विभाजन कएने छथि, मुदा आदिकालमे हुनक ओ दृष्टिकोण काज नहि कएलन्हि तहिना आधुनिक कालकेँ ब्रिटिश काल आ स्वतंत्रताकालकेँ भागमे विभक्त करब, उचित नहि बुझाइत अछि। 1947मे भारत अवश्य स्वतंत्र भेल मुदा ओहिसँ मैथिली साहित्यमे कोनहुँ ऐतिहासिक दिशान्तर भेल हो तकर कोनो प्रमाण नहि अछि।

(12) डॉ. बालगोविन्द झाव्यथित अपन पुस्तक मैथिली साहित्यक इतिहासमे मैथिली भाषा ओ मैथिली साहित्यक सुदीर्घ परंपरा कए देखि इतिहासमे काल-विभाजन एकर समस्त उपलब्ध कृत्ति, कर्ता, पद्धति ओ विषयकेँ ध्यानमे राखि निम्न रूपेँ कएल अछि:

 

(I) प्राचीन काल 700 सँ 1325 ई. धरि

(II) मध्यकाल 1325 सँ 1860 धरि

(III) आधुनिक काल 1860 सँ अद्यःपर्यन्त।

(13) डॉ. नित्यानंद झा मैथिली साहित्यक काल विभाजन शीर्षक निबंधमे अपन मत एहि प्रकारेँ व्यक्त कएने छथि:

(I) पूर्व विद्यापति काल           800 ई. सँ 1350 ई. धरि

(II) विद्यापति काल                1350 सँ 1700 ई.धरि

(III) उत्तर विद्यापति काल         1700 सँ 1900 ई.धरि

(IV)आधुनिक काल                  1900 सँ अद्यःपर्यन्त।

प्रो. सोमदेव मैथिली भाषा ओ साहित्य शीर्षक निबंधमे एहि रूपेँ कहलनि जे मैथिली साहित्यक इतिहासक काल-विभाजन जँ उपलब्ध सामग्री, प्रवृत्ति, एवं मोड़क दृष्टिएँ कएल जाय तँ एहि प्रकारेँ होएबाक चाही:

(I)प्राचीनकाल        8म शताब्दीसँ 1870 ई.धरि

(II) मध्यकाल        1870 ई.सँ 1936 ई. धरि

(III)नव जागरणकाल—

(क)             स्वतंत्रतापूर्व         1936 सँ 1947 ई. धरि

(ख)             स्वतंत्रता उपरान्त    1947 सँ 1986 ई. धरि

(ग)              जनचेतना युग       1986 सँ प्रारंभ।

प्रो. धीरेन्द्र मैथिली प्रकाश नवम्बर 1986मे काल विभाजनक प्रसंगे कहैत छथि:

(I)आदिकाल 800 सँ 1324 ई.

(II) ज्योतिरीश्वर युग 1324 सँ 1412 ई.

(III)विद्यापति युग 1412 सँ 1527 ई.

(IV)उत्तर विद्यापति युग 1527 सँ 1860

(V)आधुनिक काल 1860 सँ अद्यःपर्यन्त।

      (क) पुनर्जागरण युग 1890 सँ 1925

      (ख) नवयुग 1950 सँ अद्यःपर्यन्त।

समालोचक प्रो. झाक विद्यापति युग ओ उत्तर विद्यापति युगक मतसँ सहमत छथि, परन्तु ज्योतिरीश्वर नामसँ एक एक पृथक युगक कल्पनाकेँ उचित नहि मानैत छथि। कारण वर्णरत्नाकर सन अमूल्य ग्रंथकारक रचना करितहुँ ओ कोनो विशेष परंपराक स्थापना नहि क सकलाह। 1956 सँ नवयुग मानव सेहो अनुचित कहैत छथि, किएक तँ 1950 मे भारत अवश्य पूर्ण रूपेँ स्वतंत्र भेल मुदा ओहिसँ मैथिली साहित्यमे कोनहुँ विशेष उल्लेखनीय ऐतिहासिक दिशान्तर उपस्थित भेल हो तकर कोनो प्रमाण नहि अछि।

 (15) प्रो. प्रेमशंकर सिंह वैदेहीक 1963 ई., जनवरी-मार्च अंकमे मैथिली साहित्यक काल विभाजन शीर्षक निबंधमे नवीन दृष्टिकोणसँ काल-विभाजन प्रस्तुत कएने छथि:

(I)अपभ्रंश काल 1000 ई. सँ पूर्व

(II)प्रारंभिक युग 1100 ई. सँ 1556 ई.

(III)मध्य युग 1556 ई. सँ 1857 ई.

(IV)आधुनिक युग 1857 ई. सँ अद्यःपर्यन्त।

अपभ्रंश युगकेँ मैथिलीक पूर्व पीठिका मानि सकैत छी। अपभ्रंशकालक अनेक रचनासँ  हमरा लोकनिक साक्षात्कार होइत अछि। अतः भाषाक आधार पर ओकर नामकरण प्रारंभिक कालक पूर्वमे राखल गेल। तथापि एकर अपभ्रंश साहित्य सर्वदासँ समृद्धशाली रहल अछि। एहि युगक प्राकृत पैंगलम सदृश अपूर्व ग्रंथ प्राप्त होइत अछि। चर्यापद एवं सिद्ध लोकनिक सेहो अनेक रचना सभकेँ एहि कोटिमे राखल जा सकैत अछि। दिल्लीक बादशाह अकबर जखन सिंहासन पर बैसलाह तँ भारतक राजनैतिक स्थितिमे महान परिवर्तन भेल। एहि समयमे मिथिलाक शासनक भार पं. महेश ठाकुर केँ भेटलन्हि, तथा दिल्ली केन्द्रसँ मिथिलाक साहित्यक सेहो महान परिवर्तन भेल। गीति युगक अवसान भेलाक फलस्वरूप मैथिल विद्वानक ध्यान कीर्तनिञा नाटक लिखबा दिस विशेष भेल, परन्तु एहि नाटक सभमे गीत सभक समावेश भेल ओ पाण्डित्यपूर्ण ओ वर्गीय होमए लागल। म. म. उमापति सँ लए कए वर्तमान युगमे कवीश्वर हर्षनाथ धरि मैथिली नाटकक इएह रूप देखल जाइत अछि।

1854  ई. सँ मैथिली साहित्य मध्य नवीन युगक प्रादुर्भाव होइत अछि। 1857 क पश्चात् देशमे एक नव-जागरणक संचार भेल। सामाजिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोण सँ एहि सालक नाम इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। एकर नेतृत्व नवीन शिक्षित बुद्धिजीवी वर्गक हाथमे रहल। एहि सालमे भारतमे राजक्रांति भेल जकर फलस्वरूप एकर प्रत्येक क्षेत्रमे परिवर्तन भेल। अतएव भाषा एवं साहित्यक क्षेत्रमे परिवर्तन अवांछनीय नहि कहल जा सकैछ। अतएव नवीन दृष्टिकोणकेँ ध्यानमे राखि मैथिली साहित्यक आधुनिक  कालक प्रारंभ 1857 सँ मानबा मे आपत्ति नहि होमक चाही।

मुदा प्रस्तुत विभाजन केँ ल कए मैथिली साहित्य मध्य एकगोट आविष्कारक विषय बनि गेल अछि। म. म. जी एवं जयकान्त बाबू आधुनिक कालक प्रारंभ 1860 सँ मानैत छथि, एवं कुमार श्री गंगानंद सिंह तथा भोलालालदासक मतानुसारेँ 1800 ई. मानल गेल अछि।

डॉ. जयकान्त बाबू अपन तर्क प्रस्तुत करैत कहैत छथि जे , 1860 मे मिथिलाक शासक कोर्ट ऑफ वर्डसक अधीन चलि गेल  तकर फलस्वरूप भाषा-साहित्य नवरूप धारण कए लेलक, एहिमे हिन्दीक साक्षात् प्रभाव देखना जाइत अछि, जे रवीन्द्रक कवितासँ प्रभावित भए श्री सुमनजी कविता लिखल। एकर अवलोकनसँ साक्षात् ज्ञात होहत अछि जे देशी एवं विदेशी दुनू दृष्टिएँ एकर प्रभाव मिथिलाक आध्यात्मिक जीवन पर पड़ल।

मुदा 1857 सँ आधुनिक युगक प्रारंभ मानबाक सबल प्रमाण भेटैत अछि। अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोणसँ सेहो पर्याप्त छैक। एहि क्रांतिक प्रधान कारण छल जे एहि सँ व्यक्तिक स्वतंत्रताक अभ्युदय हो। एक दिस तँ  ई लोकनि अपन प्राचीन सांस्कृतिक सुरक्षा लेल उत्सुकता देखौलन्हि तँ दोसर दिस ओहि सांस्कृतिक परंपराक सुरक्षा एवं विकासक हेतु सचेष्ट रहलाह।

समग्र रूपेँ विचार कएला उत्तर निष्कर्ष रूपेँ कहल जा सकैछ, जे मैथिली साहित्यक मध्य आधुनिक कालक बड़ पैघ महत्व छैक, एतेक दिन धरि भाषा-साहित्य अन्हारमे टापर-टोइया दैत छल मुदा आधुनिक कालमे आबिकए ई नवीन रूप धारण कए लेलक। आधुनिक काव्यक प्रारंभमे चन्दा झाक नाम लेल जाइत अछि। चन्दा झा मैथिलीमे नवयुगक प्रवर्त्तक छलाह। वर्तमानमे मैथिली कवितामे शैली एवं भावधाराक दृष्टिएँ महान परिवर्त्तन भेल। नवीन युगक पदार्पण भेलासँ कविता कामिनी अपन नैसर्गिक सुषमाक भारकेँ वहन करबा मे असमर्थ भेलीह एवं ओकरा संग अग्रलेखक एवं पाठकक अभिरूचि एवं  मनोरंजनक हेतु उपन्यास साहित्य पर विशेष जोर देल गेल। एहि सभ दृष्टिकेँ ध्यानमे राखि 1857 सँ आधुनिक कालक प्रारंभ मानब उचित हैत।