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पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य    

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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विदेह नूतन अंक पद्य १

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

1.जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'- ४ टा गजल 2.आशीष अनचिन्हार-२ टा गजल

1

जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'

३ टा गजल

ककरासं  ई  कही  हम  कहबामे लाज होइए

   ल' क' बिसरि गेलाह ओ मङबामे लाज होइए


 

  ठुमरी  ई  सुनि-सुनिक'  परेशान  भेल छी हम

  भागब त ओ की कहता  भगबामे लाज  होइए


 

  नब्बे   बरखमे  एखनो   दनदना  रहल   छथि

  हुनका  समक्ष  कारसं  चलबामे  लाज  होइए


 

  फेस-बुक के ई जमाना  मोबाइलकेर  जमाना

  अपनहि सिखा-सिखाक' डंटबामे लाज होइए


 

  एहि ठाम मैथिली छथि ओहि ठाम मैथिली छथि

  हिन्दीमे   हम  ने  बाजब  बजबामे लाज होइए


 

  ( सरल वार्णिक बहर / वर्ण : 18 )   

 ककरोले'   मजबूरी   कविता

  हमराले'    कस्तूरी    कविता


 

  लागय  सौंसे  दुनिया  अपने

  गप्पक  बड़का  धूरी  कविता


 

  कवि  आ  पाठक  दूरे  रहला

  कम  नै  केलक  दूरी  कविता


 

  ककरो खातिर बनि-बनि आबय

  सींनुर  टिकुली  चूड़ी  कविता


 

  कहिया ककरो खातिर बनती

  तरकारी  आ  पूरी    कविता 


 

  (  मात्रा-क्रम : 22222222    )

गरमी  जाड़क खेल जिनगी 

दिन आ रातिक मेल जिनगी


 

कखनो लागय फूल  गाछक

कखनो लागय  रेल  जिनगी


 

कखनो पाकल  आम जामुन

कखनो काँचे   बेल  जिनगी


 

कखनो लागय  माँछ  पानिक

कखनो लागय  जेल  जिनगी


 

मेला  सभदिन  पाप  पुण्यक

संगम सन अछि  भेल  जिनगी


 

बाजय    ताधरि  ढोल   डंफा

जा  दीयामे      तेल    जिनगी


 

( मात्रा-क्रम : 2222-2122 )

मौन रहत  ओ

 राम जपत ओ


 

 जैह     सिखेबै

 सैह  करत ओ


 

तेज        चलेबै

तेज   चलत  ओ


 

जैह   करत  ओ

सैह   कहत  ओ


 

चोर  कहू  जुनि

चोर   बनत ओ


 

वाह   कहै  क्यो

खूब   हंसत  ओ


 

पाइ   बहुत   छै

भोज  करत  ओ


 

पाग  खसै   नै
 

पैर  धरत   ओ


 

आगि मुतै  छल 
 

आब मरत  ओ


 

(मात्रा क्रम : 21-122)

 

 

2

आशीष अनचिन्हार

२ टा गजल

देह बसिया गेल छै

मोन मसुआ गेल छै


 

बाढ़ि रौदी सभ सही

मेघ अगड़ा गेल छै


 

फाइलो सभ कहि रहल

काज अधिया गेल छै


 

आइ फेरो हेतै किछु

बात भजिया  गेल छै


 

पानि चाहै ठोरकेँ

धार डेरा गेल छै


 

 

सभ पाँतिमे 2122 + 212 मात्राक्रम अछि

चारिम शेरक पहिल पाँतिक एकटा अंतिम दीर्घकेँ लघु नियम शैथिल्यक तहत मानल गेल अछि

आइ फेर निंद नै अबैए आइ फेर कियो जागल हेतै

आइ फेर मोन नै लगैए आइ फेर कियो जागल हेतै


 

आइ फेर चोट लागि गेलै आइ फेर कियो मलहम देलक

आइ फेर दर्द बड़ उठैए आइ फेर कियो जागल हेतै


 

आइ फेर देह छू कियो चलि गेल फेर कियो बैसल अछि

आइ फेर सेज सभ बुझैए आइ फेर कियो जागल हेतै


 

आइ फेर नोर आबि गेलै आइ फेर कियो पोछत जल्दी

आइ फेर आँखि ई बजैए आइ फेर कियो जागल हेतै


 

आइ फेर लोढ़ि लेत हमरा आइ फेर कियो छोड़त हमरा

आइ फेर नेह किछु कहैए आइ फेर कियो जागल हेतै

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।