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वि दे ह 

पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य    

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

मुन्नी कामत केर

सुखल मन तरसल आँखि‍

काव्‍य संग्रहक दोसर संस्‍करण

(पहिल संस्‍करण : 2014, दोसर संस्‍करण : 2017)

 


 

 

काव्‍य क्रम

समरपि‍त होइत बेटी/18

नव जीवनक निर्माण/19

घर-घर बढ़ल अति‍याचार/20

संकल्प/21

दहेजक बिहाड़ि/22

एहेन समाज/26

सुरज दादा/27

सियान भेल हमर खेल/28

महगाइक खेल/29

सुखद अछि ई मिलाप/30

सान हमर मिथिला/31

विरह/33

देशक राजनीति/34

विदेशी चालि‍/35

बेटी किए बनेलहक विधाता!/36

दुनियाँ तबाह भऽ गेल/37

अन्‍हार भेल जाइए देश अपन/39

बाबू हम सिपाही बनबै/39

आगमन अहाँक/40

हरल जाइए जननि/41

कौआक दुलार/42

कोइस रहल छी जन्‍मकेँ/43

गाम-घर/44

मलार/45

मुनगा/45

सगरे इजोत हमर मिथिला/46

अरिकंचन/47

हमर मिथिला हमर परान/48

नारी/49

जट-जटिन/50

सुखल मन तरसल आँखि/53

मनुखक सौदा/54

अनमोल-बोल/55

चलाकक दुनियाँ/56

बून-बून बँचाबी हम/57

जि‍नगीक मरीचिका/58

तकैत जिनगी कड़कटक ढेरमे/60

संकल्प-2/61

ठमकल शब्द/62

दहेजक बिहाड़ि/63

हराएल हमर रूप/64

विदाइ/65

बेटी/67

दहेजक आगि/68

ओइ पार/69

नेताजी/70

पहिल बरखा/71

किसान/72

समाजक वि‍डम्‍बना/73

दर्दक टीस/74

रोकू कियो ऐ बाढ़िकेँ/75

नोराएल आँखि/‍76

कि‍ए छी हम अछूत/77

भ्रष्टाचारक परसाद/78

तब हँसत तुलसी/79

शिल्पकार/80

यादि‍ गामक/81

आशाक किरण/82

नारीक पहचान/83

आजाद गजल-1/84

आजाद गजल-2/85

बौआ देखहक चान्‍दकेँ/86

भोरक सनेस/87

बेटी-लहास/88

बाल-श्रम/89

फगुआ/90

आन्‍हर कानून/91

बूनक मोल/91

करी मिथिलासँ पहचान/93

करिझुमड़ी कोसी/94

नइ लेब आब हम दहेज/95

मिथिलाक दादा/96

पाहुनक माछ/96

हमरा पागल कहैत अछि लोक/97

सगरे अन्‍हार अछि/98

माइक रूदन/99

अपना दिस निहारू/100

नचार किसान/101

स्वच्छ समाज/102

माए एक चुटकी नून दऽ दे/103

बेटी/104

कारी-बजार/106

शब्दक खेल/107

माए बता तूँ एगो बात/108

अन्‍हार घरमे हत्या/109

बेटी/110

भेल पूर आस/111

भाइक सिनेह/112

अल्हर मेघ/113

सिया तोरे कारण/114

जाड़/115

बन्‍दिश/117

टाकासँ बिआह/118

काँच बाँस जकाँ लचपच उमेरिया/119

मनक वेदना/120

सरहद/121

जतरा/123

अंकक मेल/123

बहि‍न/125

                                                                         ◌

समरपि‍त होइत बेटी

 

जहि‍या एकर जन्‍म भेल

तहिए डिबिया मिझा गेल,

सभ कहलक कलंक एलौ

छठिहारोसँ गीत हरा गेल।

जँ-जँ ई नमहर भेल

समाजक बोझसँ दबैत गेल

गामक लाज, बाबूक पगड़ी

पकैड़‍ बेटी सियान भेल।

एक जन्‍म बीतल,

दोसर जन्‍म लऽ तैयार भऽ गेल

केकरो नै किछु कहलक

हरिदम समरपित होइत गेल

जुबान रहितो मूक बनि‍

सभ दुख सहैत गेल।

बेटी बनि गेल

समर्पण आ तियागक मूर्ति

तैयो एगो कलंक

एकरा माथ पर

किए लगि गेल

किए कहैए हमर समाज की

बेटी जनैमते दू हाथ धरती

तर चलि‍ जाइत छइ।

 

नव जीवनक निर्माण

 

ब्रह्माक छी सन्‍तान हम

ब्रह्रमा बनि‍ आएल छी

जेकर कर्म अछि

नित नव निर्माण करब

हम केना ई बिसरल जाइ छी।

अछि हमरा बाँहिमे बल

मस्तिष्कमे अपार ज्ञान

फेर किए हम सुस्त बनि‍

अपन मनोबल घटेने जाइ छी।

एक्के माटि आ एक्के साँच

अछि परमात्मा ले

जइसँ ओ सभ

मनुखक निर्माण करैत अछि

एक्के ज्ञानक सारसँ

ओ सभपर बरसा करैत अछि।

फेर अहाँ किए पछुआएल छी

अपनापर बिसवास रखू

आत्मबल मजगूत करू

असगर चलु राहपर

केकरो नै बाट देखू

लक्ष्‍य अहाँक आगू अछि

पाछू मुरि नै कमजोर बनू

ब्रह्माक सन्‍तान अहाँ छी

तँए ब्रह्मा बनू

नित नव गुण, संस्कार आ

नव जीवनक निर्माण करू।

घर-घर बढ़ल अति‍याचार

 

घुमि‍ आउ सरहदक लाल

ओतए रहनाइ अछि बेकार

सीमाक परवाह छोड़ू

देखियौ अपन देशक हाल।

बिसैर गेल सभ

मर्यादा अपन

मान-सम्मान

संस्कृति अपन

धर्म-मानवता भेल बेकार

बढ़ि‍ रहल अछि अति‍याचार।

बाहरबलासँ नै

आब घरबलासँ खतरा अछि

मूस बाघ बनल

गीदर बनल अवारा अछि।

दुश्मनक डेरा ओइ पार नै

घर-घर ओकर बसेरा अछि

पाँच सालक बेटी बेइज्‍जत हुअए

की यएह हमर परम्परा अछि?

मनुख, मनुखक दुश्मन बनल

नै केतौ कोनो भैयारी अछि

सभ सम्‍बन्‍ध खण्डित भेल आइ

देख रहल छी भवि‍स अपन

केतेक कारी सियाह अछि।

 

संकल्प

 

बान्‍हि लिअ मनकेँ

कर्तव्यक डोरसँ

कहीं मनक चंचलता

बेलगाम ने बना दिअए

हूंकार भरि ई अहंकार

कहीं अहाँकेँ शैतान ने बना दिअए।

गि‍रैसँ पहिले

अगर सम्‍हैर जाए

तँ चोट नै लगत,

निश्चय होइ सच्चा

तँ अकासकेँ झुकबैत

कोनो देर नै लगत।

एना तँ घटि-घटि कऽ चान

एक दिन पूर्ण होइ छै

ढलैत सुरूजक संसार

इजोत करैक वचन

दिया दइ छइ।

नै हारिक

संकल्प रखू मनमे

तँ पूसक कपकपाइत ठण्‍ढमे

गरमाहट एगो जुगनु ओ दइ छइ।

 

दहेजक बिहाड़ि

 

माए-

“नाँघि एलौं सासुरक चौकैठ‍,

कलंकित तूँ हमर कोइख केलँह

ओनइ केतौ डुमि‍ मरितेँ

मोलि‍ चुनर ओढ़ि‍,

किए आँगन एलँह।”

 

बेटी-

“माए हम आन नै,

अहींक खून छी

नै बनाउ हमरा बीरान,

ईहो तँ हमरे घर छी।”

 

माए-

“बेटी बीरान बिआहे दिन भऽ जाइ छै,

माइक आँचर माथसँ उठि‍ जाइ छै,

वएह दिन ओ दू कुलक लाज रखैक सप्‍पत खाइ छै,

मर्यादाक बछिया पहिर,

अपन सासुरकेँ स्वर्ग बुझि हर कर्त्तव्य निमाहैत

ओत्तै जीवन समपन्न करै छइ।”

 

बेटी-

“माए हम नै कोनो पाप केलौं,

नै अहाँक कोइखकेँ कलंकि‍त केलौं,

हमरा सभ प्रतिज्ञा याद अछि,

अपन मर्यादाक अभास अछि।

पर हमहूँ तँ एगो जान छी, न कि कोनो वस्तु,

जेकर बेर-बेर सौदा होइत अछि।”

अहीं कहू जहियासँ अहाँ हमर बिआह केलौं

सभटा खेत, जेवर-जत्था बेचि‍ देलौं,

आब ई घरो गीड़बीपर अछि,

तैयो नै ओकर पेट भरैत अछि।”

 

माए-

“हमरा शरीरमे जब तक जान अछि

हम ओकर मांग पूरा करैत रहब

जब तक ओकर भूख शान्‍त नै होइ

हम खून बेचि‍ ओकरा तृप्त करैत रहब।”

 

बेटी-

“कि‍ए अहाँ अन्‍हारमे छी,

हमरा बेटी होइपर शर्मसार करै छी,

तँए आइ बिछिया हम उतारि एलौं,

सभ सम्‍बन्‍ध तोड़ि एलौं

दऽ एलौं हम तलाक

हारि एलौं दहेजक वाक।”

 

माए-

“चुप रह नि‍रलज! ई की बात बजै छँह,

हिन्दू भऽ मुस्लिम रीत चलबै छँह,

एक बेर ई डोर बन्‍हैए

मरन तक नै गाठ खुलैए

ई दहेजक आगि‍ हमरेटा नै घर-घर लगै छइ।”

 

बेटी-

“माए दहेज लेनाइ-देनाइ दुनू पाप अछि,

तलाक नर्ककेँ स्वर्ग बनबैक मार्ग अछि,

एगो सुयोग जीवन-साथी हर बेटीक अधिकार अछि।

 

माए-

“चारि आखर पढ़ि‍ तूँ हमरा सिखाबए चललँह,

युग-युगसँ चलैत आएल परंपरापर तूँ ओंगड़ी उठबए लगलँह।

एक बेर जे छोड़ि दइ पतिकेँ ओ राँर कहाबै छै,

एहेन पापिनी तँ नरकोमे नै जगह पबै छइ।

नै बाज कि‍च्‍छो, तोरा वाणी सँ दुषित पूरा गाम हेतै,

जो डुमि‍ मरिहँ केतौ, हमर कोइखक उद्वार हएत।”

 

बेटी-

“माए तुहों तँ एगो बेटी छीही?

फेर अपन बेटीक दर्द किए नै बुझै छीही,

नारी बनि‍ किए नारीकेँ असहाय करै छीही।

जे परम्परा जीवैक अधिकार छीनि‍ लइत

ओकर हाथ किए पकड़ै छीही।

जइ बेटीक खुशीले तूँ

दहेजक दलदलमे फँसल छँह,

आइ वएह बेटीकेँ मरैक श्राप करै छीही।

तूँ सच-सच बता दे माए,

हमर खुशीले तूँ निलाम भेलँह

आकि‍ अपन परम्परा प्रतिष्ठाले।

तोरे जकाँ माए-बाप

दहेजक बिहाड़ि‍ उठेलकै

एकबेर देखि माए, ई बिहाड़ि

केतेक बेटीकेँ जिनगी उजारलकै।

ई कोनो प्रतिष्ठा नै, पाप छिऐ

जेकर जननी कियो ने

माए-बाप छिऐ।

आबो बन्‍न करू मुट्ठी

तबे मिलत बेटीक श्रापसँ मुक्ति।”

 

माए-

“बेटी हम नीन्नसँ सूतल छेलिऐ,

घोर अन्‍हारमे डुमल छेलिऐ

नै चिनहलिऐ ऐ दानवकेँ

नित सेवा करि नमहर केलिऐ

आइ देखलौं ऐ भोंकारकेँ,

खोइल ई परम्पराक पट्टा

दहेज मुक्त बनाएब अपन समाजकेँ।

बताएब जन-जनकेँ की,

पुरुख सत्तात्मक समाजमे

महिलोकेँ अधिकार छै

जब पुरुख क सकैए पुनर्विवाह

तँ महिलो लेल नै कोनो रिति-रिवाज छइ।

स्वतंत्रता हर बेक्‍तीकेँ जन्मसिद्ध अधिकार छइ।”

 

एहेन समाज

 

घुमि‍ एलौं पूरे संसार

तैयो रहलौं घरसँ अंजान!

62 बर्खक बाबा केलक चुमौन

15 बर्खक नवालिकसँ

कहू केहेन भेल मन।

करियाक बिआहक

भेल चारि साल!

सात गो खून केलक

नै भेल कोनो केस-फोदारी

गर्भेमे मारैत गेल

बेटीक गला घोटैत गेल

ई दुगो हर साल।

मास्टर-साहैब अपन

दुनू बेटीकेँ घरमे बैठा

चुल्हा-चौका करबैत अछि

अपन घर अन्‍हार करि

केना दोसरक घर इजोत करैत अछि।

ई कोनो एक जगहक नै

हर कोणक दृश्य अछि

हमरे ऐ अगल-बगलमे

घटित भऽ रहल यथार्थ अछि।

 

सुरज दादा

 

बाल-कविता

 

माए केहेन ई सुरज-दादा छै

कि‍ए नै ई कोनो स्‍कूल जाइ छइ।

जब प्राणीकेँ कष्ट देनाइ पाप छै

तँ फेर ई कि‍ए पाप करै छइ।

जाड़मे नुकाएल रहै छै

गुमारमे जड़बै छइ।

माए तुहीं एकरा समझाबिही

ई कि‍ए नै केकरो बात मानै छइ।

चन्‍दा मामा जकाँ ईहो

कि‍ए नै काज करै छै?

 

माए- बौआ नै तूँ बुझबहक

अखैन‍ ई राज

धैन ई दादा जे चलैत अछि सभ काज।

पढ़ि‍-लिखि‍ जब तूँ नमहर हेबहक

सभ गुत्‍थी अपने सुलझेबहक।

असिम शक्ति छै हिनका लग

अपार गुण हिनकामे विद्यमान छै

तँए तँ पहिल अर्घ हिनका दऽ कऽ

जग नत-मस्तक होइ छइ।

 

सियान भेल हमर खेल

 

अँगना-अँगना ढोल बजैए

सभ खुशीमे झुमैए-गबैए

बाबू हमहूँ अपन गुड़ियाक बिआह करब

ईहो नमहर भेल जाइए।

आजन-बाजन हम मँगाएब

गहना-जेबर गड़हएब

लहंगा पहिरा अपन खुशीकेँ

हम दुलहन बनाएब।

गाम-गमाति‍ न्योंत पठाएब।

अँगना-अँगना ढोल बजैए

सभ खुश

सभ धी-सुआसिनकेँ मंगाएब

सोहर-समदौन गाबि कऽ

अपन दुलारीकेँ सासुर पठाएब।

पर बाबू केकरा संगे हम

एकर बिआह रचाएब

ऐ लोभी समाजमे

केना एकरा दहेजसँ बँचाएब।

नै लगाएब हम सियाकेँ मेहदी

कोनो बेपारिक रंगसँ

नै उठाएब हम सुहागक चुनरी

जे रंगल होइ दहेजक कलंकसँ।

 

महगाइक खेल

 

टमाटर अपन रंग देखा

सभकेँ ललचबैए

पिऔजक बात की कहूँ

भाग तँ छिलके

तैयो कनाबैए।

बढ़ल जाइए दूधक दाम

धानक खेत भेल बीरान

गरीबक रोटीपर

अखरे नून ओंघराइए।

केतौ बंजर तँ केतौ दहार

नै अछि खुशी

नअ केतौ बहार।

रूपैआ तँ आब

झुटका भेल

कऽ रहल अछि

सभ नेता ई खेल।

देख कऽ देशक समस्या

मन गरमाइए,

सोचि‍ कऽ देशक भवि‍स

जी घबराइए।

 

सुखद अछि ई मिलाप

 

पागलपनसँ सुसज्जित

प्रेमक गाथा

देखलौं अम्बरकेँ झुकबैत

समुद्रक आगू माथ।

ई प्रेमक हर्ष अछि

या मि‍लनक उत्तेजना

जँ उफनैत अछि लहर

झुमैत अछि हर एक बून

चुमैले ओइ अनन्‍त अकासक अँगना।

ठाढ़ समुद्रक कछेरमे

बहुत दूर-दूर तक

देख रहल छी

आनन्दमय दृश्य हम।

झूमि‍ रहल अछि जलपरि

हर्षित अछि सुरूज

पहिरा कऽ अपन

रंगक ओढ़नी

साक्षात् भेल ऐ प्रेमकेँ

देख रहल छी

ई मनमोहक दृश्य

समुद्र आ अकासक मिलाप हम।

 

सान हमर मिथिला

 

हम मिथिला वासी

पहचान हमर मैथिल छी

हमर संस्कार सीता

भक्ति हमर उगना छी।

कहैए दुनियाँ हमरा

तूँ तँ उज्जर बालुमे सिमटल छँह

नै छौ कोनो सुख-सुविधा

तूँ तँ पाइ-पाइले तरसल छँह।

ने नीक स्‍कूल छौ ने कौलेज

तूँ तँ रोजगार ले भटकै छँह

जे कि‍छु छौ तोरा ले

सेहो भ्रष्टाचारमे घिरल छौ।

पर हम यएह कहै छी की

हमर मिथिलाक संसारमे

पहचान अलग छै

करोड़ोक बीचमे ठाढ़

ओकर सान अलग छइ।

एकर कला-कृति

विदेशमे सराहल गेल

एकर सभ्यता-संस्कार

देशमे सम्मानित भेल।

हमर मेहनत‍क आगू

दुनियाँ नत्मस्तक भेल

जब उज्जर रेतमे

हरियरी लहलहा गेल।

असुविधाक बादो

केतेक विद्वानक जन्‍म भेल

नै छी पाछू कि‍च्‍छोमे

नून-रोटी खाइ छी

दिन-राति‍ कमाइ छी

बाल-बच्चा परिवार संग

गर्वसँ स्वर्गमे जीवन-यापन करै छी।

 


 

विरह

 

प्रेम संगे विछोह

कि‍ए रहै छै

सौन अबैत केतेक झूला

सुन्न परि जाइ छइ।

कोनो घर हंसै छै

तँ कोनो नोरसँ डुमै छइ।

केतौ धरती तरसै छै

तँ केतौ मन तरपै छै

ने सजनीक मन

साजन समझै छै

ने धरतीक पियास

बादल बुझै छइ।

कहने छै कोनो कवि

 

सौनो कहियो प्रेम केने छेलै

अपन प्रेमीक नाओं बादल रखने छेलै

जब कनै छेलै दुनू एक-दोसरक वियोगमे

तँ लोग ओकर नाओं वर्षा देने छेलइ।

 

पर जखन वियोगक अग्निमे

झुलसए लगलै धरती

तँ लोग ओकर नाओं

उज्जर रीत रखलकै

अकाल, बंजर, सुखार रखलकै।

मुदा ऐ वियोगकेँ

की नाओं देल जाए

प्रीतमक प्रतीक्षामे

भऽ रहल छै पाथर मन

एकरा कोन आस देल जाए।

आब तँ ई सौन चिढ़ाबए लगलै

कारी मेघ हँसए लगलै

मिलनक आसमे गहन लगलै

बज्जर पूरा देह भेलै

कान्हा जबसँ गेलै

केतेक गोपी बौक भऽ गेलइ।

 

देशक राजनीति‍

 

दिन-राति‍ फेक रहल छी पासा

तैयो नै खेलक बोध अछि,

ई अहाँक नै शासनक दोष अछि।

नि‍त लड़ै छी झगड़ै छी

अपन एकता छीटै छी

जब-जब घरमे भेदिया पोषैत अछि

तब लंका जकाँ स्वर्ण भवन

छौरक ढेर बनैत अछि।

कहियो पूब, कहियो पच्‍छिम

कहियो उत्तर, कहियो दक्षिण

मुँह बौने ठाढ़ अछि

कहि फेर हुअए ने कैद चिड़िया

पिंजरा चारुकात अछि।

नै अछि आइ बापू कियो

न अम्बेदकर, न पटेल

न कियो निस्वार्थ राष्ट्रवाहक अछि,

खण्डित भऽ रहल देश अछि

टुकड़ा-टुकड़ामे बसैत अहंकार अछि।

आबो समझू राजनीतिक राज

मेटाउ आपसमे कलह-विकार

नै तँ अहिना पार्टी-पार्टी बँटैत जाएत

सभ अपनेमे मरैत जाएत

वंशहीन भऽ जाएत ई समाज

सगरे उज्जर साड़ी फहराइत जाएत।

राजनीति बहुत पेचेदार अछि

कुर्सीक लालच बढ़बैत अति‍याचार अछि।

 

विदेशी चालि‍

 

की कहब शहरक हाल

देशी मुर्गीक

भेल विदेशी चालि।

जेकरा माइक दर्जा मिलल अछि

जेकरा बिनु नै होइए

कोनो शुभ काज

ओइ माइक दशा देख

होइए पूरे देह लाज।

कॉट-झार एतए हरियरी भरैए

पर माए तुलसी

पानि‍ बिनु सुखल जाइए।

ससुर-भैंसुरसँ भेल बेपर्दा

आँखि‍क लाज हराएल जाइए।

साड़ी-सूटक बात छोड़ू

टीसर्ट-स्कर्ट पहिराबा भेल

बढ़ैत महगाइ जकाँ

कपड़ा छोट होइत गेल।

पहिरन अछि सभ

एतए नकाब

केतेक करब हम बखान

की कहब शहरक हाल

देशी मुर्गीक

भेल विदेशी चालि।

 

बेटी किए बनेलहक विधाता!

 

पजेब अछि पैरमे

जेकर घ्वनि मघुर अछि

मुदा पकर बहुत मजगूत

कहैत अछि कि तूँ अजाद छँह

पर अछि सिमान;

कदम-कदमपर।

एगो एहेन देवालक जे

बनल अछि;

बिनु बालु-सिमेन्‍टसँ

सोचक देवाल!

चाहे असमानमे उड़ी हम

पर ओइ देवालक ऊँचाइ

नै समाप्त होइत अछि

आखिर केतेक जन्‍म तक

पाछू करत ई देवाल!

आ कखैन‍‍ तक हम कहब

बेटी किए बनेलहक विधाता।

 

दुनियाँ तबाह भऽ गेल

 

बाबू कि‍ए एहेन

समयक घारा बदलैए

सच्चे कहै छेलै

मुसहरु काका

दू हजार बारहमे

दुनियाँ तबाह भऽ जेतै!

नि‍त एतए अन्याय होइ छै

मनुख-मनुखकेँ

मारने फिड़ै छै

आन गोरेक बात छोड़ह

भाए भाएकेँ आ बेटा बापकेँ

कोदारिसँ काटने फिड़ै छइ।

अपने घरमे सभ हराएल रहै छै

पड़ोसी जकाँ सभ घोंसियाएल रहै छै

नै छै केकरोसँ मेल-मिलाप

घर-घर नाचि‍ रहल छै कोन अभिशाप।

अँगनामे तुलसी सुखाएल जाइ छै

नारीक लक्ष्‍मी रूप हराएल जाइ छै

नै डरै छै कियो भगवानसँ

नि‍त गिरै छै अपने इमानसँ।

ईमानदारी लुप्त भऽ

बेइमानी उजागर भेलै

झूठक खेती पनपैत गेलै

मनसँ मन दूर भेलै

सच देखहक बाबू यएह छिऐ

ठीके दुनियाँ तबाह भऽ गेलइ।

 


 

अन्‍हार भेल जाइए देश अपन

 

राम राज भेल खतम

रावण राज अछि चरमपर,

देखियौ यो भलमानुस

सभ अछि ऐ करमसँ।

गरम हाथ बजबैए ताली

नरम हाथ मसुआएल अछि,

पर ताण्डव दुनू दिसन

कियो उन्‍चास तँ कियो पचास अछि।

सभ कहैए कि हम उत्तम,

हम इमानदार, हम सर्वश्रेष्ठ छी।

मुदा कियो नै छी केकरो

सभ-क-सभ भ्रष्टाचारी कुष्ट छी।

अपने माएकेँ बेचि‍ खाइबला

अछि सभ ऐ संसारमे,

नि‍त बढ़ि‍ रहल अछि महगाइ

केना जिन्दगी कटत अन्‍हारमे।

 

बाबू हम सिपाही बनबै

 

बाबू जहिया हम नमहर हेबह

देशक बेटा बनबह

बन्‍दूक लऽ कऽ सीमापर

दुश्‍मन संगे लड़बै।

बाबू हमरा एगो बर्दी सिआ दिअ

फौजीबला स्‍कूलमे

नाओं लिखा दिअ।

जे अखैनसँ हम सीखबै

तब ने असली हिरो बनबै।

जनगणमण नित गाबि कऽ

माताक चरणमे नतमस्तक हेबै

नै हेतै कम कखनो हमर सान

बढ़ेबै हम अपन देशक मान।

 

आगमन अहाँक

 

अहाँक आगमनसँ

अशान्त मन शान्त भेल

हर्षित भेल घर-आँगन

खुशी सगरे पसैर गेल।

उदास हमर मन-मन्‍दिरमे

अहाँक प्रतीक्षा छल

सुनैले ई किलकारी

एक-एक पल पहाड़ छल।

कमल नयन, चन्द्र मुस्कान

माखनसँ बेसी नाजुक छी

अहाँ बिनु अपूर्ण छेलौं हम

हमर पूर्णताक अहाँ पहचान छी।

सुरूज जकाँ प्रकाशमान

वायु जकाँ गतिमान

ज्ञानक सभटा सार मिलए

सुख-समृद्वि आ सम्पन्नता

सगरे अहाँकेँ सम्मान मिलए।

जुग-जुग जीबए‍‍ हमर लाल

पूरा होइ सभ अभिलाषा

मीलै सभ खुशी एकरा

दिअ यएह माए हमरा अहाँ वरदान।

 

हरल जाइए जननि

 

जइ पुरुखकेँ स्‍त्री जन्‍म देलक

आइ वएह गहुमन बनि‍ फुफकारैए

ई आन्‍हर 3 सालक बच्‍चियोकेँ

डसने जाइए।

जे औरत मर्दकेँ

रूप, आकृति, पहचान देलक

अपन खूनसँ सींच

प्रकाशक राह दखेलक

आइ वएह औरतक जिनगी

अन्‍हार करैए

ओकरा बजार आ कोठाक राह देखबैए।

जइ आदमीकेँ

आँगुर पकैड़‍ कऽ चलनाइ नारी सिखेलक

आइ वएह नारीकेँ पएर तोड़ैए

घरक 4 दीवारमे

ओकर अवाज दफन करैए।

जे आँचर ओकरा शीतल छाँह देलक

आइ वएह आँचरमे नोर उझैल‍ देलक।

 

कौआक दुलार

 

कियो दुष्ट कियो करिया

तँ कियो पपियाहा कहि‍

ऐ कौआकेँ बजबैए

पर एकर निःस्वार्थ प्रेम देख

हमर आँखि‍ डबडबाइए।

चुइन-चुइन दाना लाइब

सभ बच्चाकेँ खिआबैए

ओ नै बुझैत बेटा-बेटी

एकर तँ दुनू अपने सन्‍तान अछि

हमरा मानवसँ केतेक ऊँच

देखियौ ऐ करियाक विचार अछि।

जन्मक संगे हम माए बनि‍

पर अन्याय करै छी

बेटीकेँ पराइ आ बेटाकेँ वंशक मान बुझै छी

झूकि‍ जाइए मन हमर

बाँटि लइ छी प्रेम अपन

जब माइक प्रेम नै मिलल एक रंग

तब कियो केना देत बेटीक संग।

कोइस रहल छी जन्‍मकेँ

 

तीन सालक उमेर छल

तुतना लगल बोल छल

गुड्डा-गुड़िया हमर सहेली

दिन-राति‍ करैत रही बाबा संग अठखेली।

अ-आ अखैन जननौं ने छेलौं

पएर अखैन‍ तिति खेलैले

उठेनौं ने छेलौं

की बधि‍ गेल ऐमे घुँघरू।

की दोख छल हमर

जे राति‍क अनहरियामे

छोड़ा कऽ माइक आँचर

पकड़ा देलक बाइयक आँगुर

सीमासँ सिमाबाई बनलौं

बेटी छेलौं कहियो आइ तँ वाइफ बनलौं।

केना कहब समाज लूटलक हमरा

केलक बे-आबरू बजारमे

जब अपने कातिल भेल हमर

तँ कि करब शि‍कायत केकरोसँ हम।

अपने हालपर कनै छी

बेटी छेलौं तँए आइ

अपन जि‍नगीकेँ कोसै छी।

 

गाम-घर

 

कदिमा, भुजिया, तिलकोरक तरूआ

भँट्टा-अल्‍लूक झोर यौ

मन पड़ैए ओ

पटुआ साग-चटनीक मेल यौ।

आमक टुकला

पिऔजक गोला

बसिया भात आ

माछक मुड़ा

आब बुझाइए सबहक मोल यौ।

मखानक लाबा

बाबाक पनबटिया

ओरहा-डाढ़ीक खेल यौ।

मन पड़ैत अछि गामक बतिया

दिन छल ओ केतेक अनमोल यौ।

 

मलार

 

आँखि‍ तोहर मटरक दाना

ठोर कमलक पंखुड़ि

गाल मथल मक्खन सन

मुस्कान तोहर चाँद रे।

मुट्ठीमे भाग मुनने

तूँ भाँपि‍ रहलेँ जोगी सन

बन्न आँखि‍सँ देखैत छेँ

तूँ सगरे संसार रे।

चला रहल छह पएर

आगु बढ़ैले

बुझि‍ रहल छी तोहर

तोहर मनक चंचलता

संगे मनक सवाल रे।

 

मुनगा

 

घौरछे-घौरछे झुलैए जजमान

देखैमे लगैए सुगबा साँप

भरि गाछ गछारने छै भुआ

कियो कहैए सोहिजन तँ कियो कहए मुनगा

एलै जुरशीतल

हेतै हलाल

मुट्ठीए-मुट्ठीए परसेतै भरि गाम

मुनगा तीमन ठण्डा होइ छै

आँखि‍क ज्योति‍ से बढ़बै छै

फुलक तरूआ अछि लाजवाब

गाछक नै होइ छै कोनो काज

मुदा मिथि‍लामे छै एकर राज।

 

सगरे इजोत हमर मिथिला

 

गेल रही हम हिमांचल

भेटल एगो बाबा मांजल

कहलखिन छी गर मैथिल अहाँ

तँ करू व्‍याख्‍या

मिथि‍लाक सत्‍कार अछि कि‍ए महान?

कहलौं हम जे अछि अतिथि

हमरा लेल भगवान जकाँ।

पहिले लोटामे पानि लेने

पखाड़ब आ आचमनक रिवाज अछि

भात-दालि‍, तरकारी, भुजिया

तैपर तरूआ, हमर पकवान अछि।

दही-चूड़ा संगे अँचार

जानैए सभ संसार

पान-मखान विदाइक बेला

करैए अपन बखान।

छोट-नमहरकेँ सम्मान

देखेने हमर दलान अछि

जड़िकेँ शीतलता देने अछि

सिखेने हमर संस्कार अछि।

सुनि‍ कऽ कहलखिन बाबा

अलगे छौ तोहर संस्‍कार

धन्य तोहर मिथिलाक संसार

जेतए उपजैए एहेन नेक विचार।

 

अरिकंचन

 

खत्ता-खुत्ती, कछेर-छापर

सुखलोमे हरिया जाइ छै

चाकर-चाकर होइ छै पत्ता

पानि‍ ओइपरसँ ओंघरा जाए छइ।

दूगो जाइत छै एकर

हरियर बेसी आ ललका कम कबकबाइ छइ।

नै छै कोनो जी अंजान

मिथि‍लामे घर-घर एकरा

सभ स्वादसँ खाइ छइ।

अनेरबे ई जनमैए एतए

तँए बुझाइए अरिकंचन नाओं छै

तीमन एकर बड़ सुअदगर

माछसँ कम नै सान छइ।

की करी हम बखान एकर

सोचि‍ओ कऽ गाल गुदगुदाइ छइ।

 

हमर मिथिला हमर परान

 

हमर मिथिला, हमर जननि

हमर ई परान अछि

देखलौं बर दुनियाँ आगू

मुदा मिथि‍ले हमर जान अछि।

 

एतुक्का माटिमे सुगन्‍ध संस्कारक

जे नै बुझैत केकरो आन अछि

आनोकेँ अपना बनबैए

यएह मिथिलाक पहचान अछि।

 

एतए गोबरक होइत अछि पूजा

बगराकेँ मिलैत दुलार अछि

एहेन पावन धरती हमर

एतइ जननिक धाम अछि।

 

जे एला एतै बैसि गेला

कखनो राम तँ कखनो उगना छला,

देवतो करैत ऐ माटिसँ दुलार अछि

एहेन पावन हमर धरती

एहेन सुन्दर हमर गाम अछि।

 

नारी

निर्मल अछि ओ ममता अछि

निर्मल हुनकर दुलार

ओ नारी अछि ऐ समाजक

जइमे रचल-बसल अछि संसार।

नै मिल अनुकूल परिवेश हुनका

नै ज्ञानक सार

तैयो हेरान छी देख कऽ

केतेक उच्च आ आदर्श अछि हिनकर विचार।

सभ युगमे दबबैत आएल

नारीक कुटनीतिक ई संसार।

तैयो कहि रहल अछि आइ नारी

जननी छी हम समाजक

हमहीं बदलब एकर सोच-विचारि कऽ

पैदा करब अपन कृतिसँ एतए

मानवताक निश्छल संस्कार

निर्मल रहब हम ममता रहब

बाँटब जन-जनमे सिनेह।

 

जट-जटिन

 

जटिन-

“छोड़ि मिथिला नगरिया

बान्हि‍ अपन ई पोटरिया

तूँ केतए जाइ छँह रे..!

जटबा केतए जाइ छँह रे...!

छोड़ि अपन सजनियाँ

ति‍याग कऽ सभ खुशियाँ

तूँ केतए जाइ छँह रे

जटबा केतए जाइ छँह रे...!”

 

जट-

“जाइ छियौ गे

जटिन देश-गे-विदेश

जटिन देश-गे-विदेश

भऽ गेलैए गैर आब

अपन प्रदेश!

साड़ी अनबौ गे जटिन

गहना अनबौ गे...।

साड़ी अनबौ गे जटिन

गहना अनबौ गे

बौआ-बुच्ची ले सेहो

नव अंगा अनबौ गे!”

 

जटिन-

“नै लेबो रे जटबा

विदेशक सनेस

नै लेबो रे जटबा

विदेशक सनेस

हमरा तँ चाही जटबा

तोहर संग आ सिनेह!”

 

जाट-

“नै रोक गे जटिन

हमर तूँ डेग

कमेबै नै तँ केना

भरब सबहक पेट!

बौआ कनतौ गे जटिन

बुच्ची ललेतौ गे

बौआ कनतौ गे जटिन

बुच्‍च्‍ी ललेतौ गे

जरतौ जे पेट जटिन

कोइ नै सोहेतौ गे।”

 

जटिन-

“घुर-घुर रे जटा

सुन-सुन रे जटा

जि‍द्द छोड़ रे जटा

कोइ नै ललेतौ रे जटा

हरे जटबाऽऽऽ

रे मेहनत‍ करि नून रोटी खेबै

मुदा संगे मिथि‍लेमे रहबै रे जटा..!

चल-चल रे जटा

अपन देश रे जटा

अपन खेत रे जटा

मरूआ रोटी रे जटा

नून रोटी रे जटा

हे रे जटबाऽऽऽ

तूँ धान रोपीहेँ हम जलखै

लऽ कऽ एबौ रे जटा...!”

 

जटा-

“सुन-सुन गे जटिन

हमर सजनी तूँ जटिन

घरक लक्ष्मी तूँ जटिन

हमर जि‍नगीक गाड़ी तूँ जटिन

हमर ज्ञानक खान तूँ जटिन

हे गे जटनी ई ई ई...।

तूँ जीतलँह हम हारलौं गे जटिन

छोड़ि अपन देश

नै केतौ जाएब गे  जटिन

रहतै मिथि‍लेमे

सदैव अपन बास गे जटिन

हे गे जटनी ई ई ई...।

गै दुनू गोरा मिलि‍

मेहनत‍ करबै तँ जि‍नगी स्वर्ग हेतै गे जटिन।”

 

जटिन-

“हमर साजन तूँ जटा

तोहर सजनी हम जटा

हे रे जटबाऽऽऽ...।

दुनू गोरा हँसैत

अहिना जि‍नगी काटब रे जटा...।”  

 

सुखल मन तरसल आँखि‍

 

एगो सहारा छल

गरीबक,

अखरा रोटीपर

मेल पि‍औजक!

ऊहो सुआद छिनाएल जाइए

खेतसँ पिऔज

हराएल जाइए।

सभटा अंगोरा

गरीबेपर ढराएल

सुखल रोटी

तेल ले ललाएल

तैपर सँ

पिऔज गुल खेलाएल।

बान्‍हए परतै जुन्ना

आब पेटमे,

केकरो किछु कहैसँ तँ

नीक छै यएह की

बज्जर खसाबी अपने मुँहमे।

मनुखक सौदा

 

लाख-दू-लाख

पाँच-पाँच लाख

पर बात होइ छै,

तिमन-तरकारी जकाँ

मनुखोक आब सौदा होइ छइ।

 

मास्टरकेँ दू-लाख

इंजीनि‍यरकेँ पाँच लाख

डाक्टरकेँ दस लाख भाव छै,

जेहेन सौदा लेबहक हो बाबू

तेहेन माल दइक रिवाज छइ।

 

लक्ष्‍मी लग लक्ष्‍मी जाइ छै,

गरीबक घर बज्‍जर खसै छै,

कन्यादान बिखाएल जाइ छै,

पहिले तँ खाली बेटीए छल,

आब बापोक लहास

पोखैर‍-इनारमे ढेरीआएल जाइ छइ।

 

दानक नाओंपर प्राण मंगै छै

हमर समाज निःसंकोच ई पाप करै छै,

कहिया एकर बुधि‍ खुलतै,

अन्‍हार घरसँ इजोतमे एतै,

जल्‍दी मुझाउ ई दहेजक आगि‍

नै तँ जरए पड़त सभकेँ

अइमे आइ-ने-काल्हि‍।

 

अनमोल-बोल

 

(बाल कवि‍ता)

 

जलसँ शीतल मुस्कान

मिसरीसँ मीठ बोल!

सभ कष्ट दूर होइ

जे करैए एकर मोल।

कम बाजी

उचित बाजी

नै बाजी कोनो

अनरगल बोल!

जीवनमे आनि नीक आचरन

जे अछि अनमोल।

करूआ बोल

कटुता बढ़ाबैए

अपनेकेँ अपनासँ

दूर भगाबैए!

नै कही केकरो तितगर बोल

जे नाश करैए जिनगी

ओइ पिटारकेँ नै कहियो खोल।

 

चलाकक दुनियाँ

 

आउ सुनाबी एगो बात पुरानी

जंगलमे छल एगो लोमड़ी सियानी

चलाकी आ बुद्विमानीकेँ ओ खान छल

सभकेँ चकमा देनाय ओकर काम छल।

एकबेर खाइ छल रोटी बौआ

झपैट कऽ भागल रोटी कौआ

जा कऽ बैठल लोमड़ी आगाँ

देख कऽ रोटी

लोमड़ी लोभाएल!

भरि-भरि मुँह ओकरा पानि‍ आएल

पबैले रोटीकेँ

चलाबी कोन तीर ऐ बुद्धूपर।

कहलक जेतेक सोहनगर

रंग तोहर कौआ

ओहोसँ मीठ तोहर बोल रे,

कान हमर तरैस रहल यऽ

सुना तूँ कोनो राग अनमोल रे।

मुर्ख कौआ फुइल गेल

अपन प्रशंसा सुनि‍ सभ भूलि‍ गेल।

जखने कहलक काँव-काँव

रोटी कहलक हम जाँव-जाँव

ओकर भूखल पेटकेँ तृप्त काँव-काँव।

बून-बून बँचाबी हम

 

एलै गुमार

चढ़लै खुमार

जरलै धरती

फटलै दराड़ि‍।

बून-बून-ले

फेर सभ तरसतै

हेतै सभकेँ सभ बिमार।

 

सुन रमुआ, चल डोमरा

करी हम एगो काज

अखनेसँ हम बरखा

पानि‍ जमा कऽ

बुझाबी हम धरतीक पियास।

 

तब नै ई दराड़ि फटतै

नै कोनो अपदा घटतै

आइएसँ हम अपन

काल्‍हि बनाएब,

अपन देशकेँ

सुखारसँ बँचाएब।

 

जि‍नगीक मरीचिका

 

लटैक रहल छल

घौरछा गाछमे

रसभरल मीठ आमक

लोभी मन

ललचाइत जी

कहलक तोड़ि खाइ एकरा

मुदा कि करी

भय छल पहरुक।

मन नै मानलक

पाइन मुँहमे भरि गेल

फेर सोचलूँ

बस एगो तोड़ू

तँ डर केहेन

यएह तँ निअम अछि संसारक।

सभ खाइत अछि

नुका कऽ

कखनो घरमे

तँ कखनो बाहरमे

ऊँच, नीचसँ बनैए

एतए सभ अपन

अही पथपर तँ चलैत अछि

सभक सभ।

पर सच जे अनभिग अछि

सभसँ ई अछि

ई मीठ फल नै

जहर अछि कोनो

जे बदलि रहल अछि

हमर विचार आ

हमर संस्कार

जे दऽ कऽ अपन मिठासक लालच

झोंकि रहल अछि

धधकैत भट्ठीमे।

जि‍नगीक बाटमे

ऐत नित्तहु केतेक मरीचिका

पर सीखब हम अकरेसँ

संघर्षक रोज नव तरीका।

 

तकैत जिनगी कड़कटक ढेरमे

 

देह सुखल

पेट हाड़ी

आँखि दुनू लाल छल।

टुकुर, टुकूर

ताकैत छल हमरा दिस ओ

ओकरा मुँहपर

अनंत सवाल छल।

पटनाक रेलवे लाइन पर

ठाढ़ निर्बोध बच्चा

फटल पुरान लटकौने

टाँगने छल एगो बोरा

अपन पीठ पर

देखि कऽ ओकरा एना लागल जेना

ताकि रहल अछि अपन जि‍नगी

गन्‍दाक ढेरमे।

पर नै जानि केतेक निर्बोध

अहिना जनमैत अछि ऐ संसारमे।

नित ताकैत अछि अपन मंजिल,

अपन भविष्य

अहिना कड़ा कड़टक ढेरमे।

 

संकल्प- 2

 

छोड़ि जाएत माझी पतवार

उफनैत जि‍नगीक राहमे

अछि हसरत हुनकर कि,

थामैए पतवार हुनके अंश ऐ मजधारमे।

छी गर अहाँ कृति हुनकर

तँ राही बनू ऐ राहक

उठाउ पतवार आ माझी बनू

जि‍नगीक अपन राहक।

आएल छी अहाँ जेतए तक

ओइसँ आगुक कल्पना करू

देख रहल अछि राह लक्ष अहाँक

मुस्‍कियाइत ओइ पारमे।

छोड़ि कऽ मोह वट वृक्षक

समना करू हवा आ पानिक

तब बनत बेक्‍तीत्‍व अहाँक

अहाँक नामसँ ऐ संसारमे।

अहाँ अगर अंश छी हुनकर

तँ बुझाइ नै कहियो ई दीप

जे छोड़ि गेल अपन सभ कि‍छु

बस एगो अहींक बिसवासमे।

 

 

ठमकल शब्द

 

रूकि जाइत

ई हवा

ई दृश्‍य

ई बहार, दुनियाँक

हम

भऽ जाएब विलीन केतौ

रूकि जाइत ई कलम

आर

हरा जाइत शब्द केतौ।

नै उठत

वेदना मनमे

नै उमड़त भावना कोनो।

जब जाएब

चुपचाप एतएसँ

तँ मेटौ जाएत

सभ इच्‍छा मनक

ने आएब हम

याद केकरो

ने करब हम याद किनको

ओइ अज्ञात सफरमे

नै मिलत संगी कोनो

बरसैत मेघ, चिलमिलाइत धूप

सबहक बीचमे

रहब हम असगर ठाढ़

ने लऽ जाएब, ने छोड़ि जाएब किछो

बस एगो डिबिया जे जरत

ऐठाम सदखन, सबहक मनमे

हएत ओ हमर कृति,

हमर करमक ज्योति‍।

 

दहेजक बिहाड़ि

 

कहिया तक रहबै हम

समान यौ भैया

कहिया मिटतै ई अभिशाप यौ

हमरो तँ परमतमे भेजलक

मुदा अबैत ऐ संसारमे सभ हेय कऽ देखलक

कियो कुलक्‍छनी तँ कियो कलंकनी कहलक।

 

भैयाकेँ दुलार केलक

हमरा धुतकारि कऽ माए भगौलक

दिन-राति‍ हम माइक हाथ बँटाएब

बाबू-दाइक सेवा करै छी

तैयो किए ई फटकार सुनै छी!

 

सुनि रहल छी सबहक मुँहसँ

दहेज बिनु नै हएत हमर बिआह

जे थामत हाथ हमर

बाबू भरत पहिले जेबी ओकर।

 

हम बेटी छी आ कि समान

जे गाम-गामसँ औत लोक

करैले हमर दाम।

 

आब सजबए पड़त सभ बेटीकेँ

अपन आत्मदाहक समान

आरो कहिया तक पिसाइत रहतै

बेटीक समाज।

हराएल हमर रूप

 

जब एलौं तँ रुइया छेलौं

कोमलताक सागरमे डूबल छेलौं

सिनेहसँ छुबै छल सभ हमरा

हम सपनामे सूतल छेलौं।

 

अंजान छेलौं दुनियाँक साँचसँ

ऐ घोल-फचक्का, ऐ धधकैत भट्ठीसँ

छीनि‍ गेल ओ स्वरूप

देलक दुनियाँ हमरा नव रूप।

 

देख कऽ दुनियाँक रंग

काँइप रहल अछि हमर अंग

छल, कपट, धोखाधरी

सभ अछि सबहक संग।

 

केतेक अरब रामक आबए पड़तै

करैले एतएसँ पापक अन्‍त

देख कऽ ई हम छी दंग,

आइ सबहक मनमे बसल अछि

हजारो रावणक अंग।

 

विदाइ

 

जो गे बेटी,

आब कि निहारि रहल छेँ

नोराइल आँखिसँ केकरा ताकि रहल छेँ।

एतए तक लिखल छेलै संग

अतै तक छेलियौ हम तोहर बाप।

एक जन्‍म तूँ एतए गमेलेँ

हमरा संगे सभ सुख दुख हँसि कऽ बितेलेँ

अहिना तूँ ओतौ रहिहेँ

खुशीक दीप जरइहेँ

केलियौ आइ हम तोरा पराइ

मन कनैत अछि

ठोर हंसैत अछि

कऽ रहल छी आइ तोहर विदाइ।

 

जड़ैत ज्योति

माए गे,

केतेक दिन तक हम बच्चा रहबै

बकरी संगे खेलैत रहबै

हमरो दुनियाँकेँ

जानैक एगो मौका दऽ दे

माए हमरा बस्ता दिया दे।

छै छोट हमरासँ

मालिकक बेटा

अंगरेजियेमे फटर-फटर करै छै

हम नै बुझै छी

आ-आ सन कोनो अक्षर

माए गे,

हमरो स्कूल जाए दे।

मालिकसँ जा कऽ तूँ कहि दही

नै चरेबै आब हम

भैंस हुनकर

नै खेबै तरकारी, रोटी

हमरा नूने रोटी खाए दे

मुदा माए गे,

हमरा तूँ पढ़ैले जाय दे।

पढ़ि लिख हम

अफसर बनबै

तोरा-ले नब साड़ी अनबौ

बाबूक बुरहक सहारा बनि

हम दुनियाँमे नाम करबै

माए गे,

आब हमरा अपन भविष्य बनाबए दे

हमरा जिनगी समारऽ दे।

 

बेटी

 

बेटी अभिशाप नै वरदान अछि।

तिलकक बिहारिसँ

बेटीकेँ नै बहाबू

ई छी घरक लक्ष्मी

हमरा नै समान बनाबू।

 

नै अछि ई बोझ

नै अभागी

शक्तिक ई प्रतिरूप अछि

एकरा नई शापित बनाबू।

 

दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती

संगे सीतो अइमे समाइल अछि

बेटीए-क आँचरमे मनुखक काल्हि अछि

हमरा नै कलंकित बनाबू।

 

दहेजक आगि‍

 

सुनथुन यै सासु-माए

हमहूँ छी किनको बेटी

हमहूँ किनको दुलारी छी

हमहूँ 9 महिना किनको कोइखमे

आस आ ममतासँ भीचल छी।

नै बुझियौ आन हमरा

हमहूँ एगो माइक अंश छी

लऽ कऽ आइल छेलौं

आश एगो कि,

माएकेँ छोड़ि, माए लग जाइ छी।

बाबू छोड़ि बाबू लग

यएह अभिलाषा बनेलौं हम

सपना सहेजने एलौं हम।

बाबू हमर अछि गरीब

बेटीक कन्यादान कऽ कए

तँ राजा जनको भऽ गेल छल फकीर

जब हृदयक टुकड़ी सोंपि देलकैन

तँ कि आगाँ चाह रखैत छी।

दहेजक खातिर केतनो बेर अहाँ हमरा जरैब

तैयो नै अहाँ अपन

एक बितक पेटक अग्निकेँ बुझा पएब

छोड़ू ई लालच, मोह

अहूँ तँ केकरो बेटी छी।

आइक नै तँ काल्हिक चिंता करू

घरमे बेटी अछि अहूँक जवान

अपन नै तँ ओकर चिन्‍ता करू।

 

ओइ पार

 

तूँ बता रे खेवैया

कि छै ओइ पारमे

माए, बाप, भाय, बहिन

अपन, पराया सभ नाता, रिश्ता

मिलतै ओइ संसारमे।

सुनै छिऐ राजा हुअए या रंक

छोड़ऽ पड़तै सभकेँ ई देहक संग

तूँ बता रे माझी

बिन देहक वएह मलार

मिलतै ओइ संसारमे।

नै मंजिलक अछि खबर

नै रस्ताक पहचान

तूँ बता रे खेवैया

अन्हार रस्‍तापर चलैत हम

कोनो रस्‍ता बना पेबै

ओइ पारमे।

 

नेताजी

 

सफेद कुर्तामे हमर नेताजी

हाथ जोड़ि, नतमस्तक नेताजी

जुबान खामोश, अबोध नेताजी

देखियौ आइल हमर गाम

हमर पालन हार, नेताजी।

 

मंगैले भीख

आश लगौने नेताजी

भिखक नाम पर

खून मॉंगैत अछि, नेताजी।

 

केतेक सालसँ हम सभ चुसाइत छी

आब बस पाइन अछि देहमे

यौ नेताजी।

 

बुझि रहल छी करतूत अहाँक

धप-धप वस्‍त्रक भीतर

कारी मन अहाँक नेताजी।

केतनो खाइ छी तैयो

दैतक खूनल पेट नै भरैत अछि

अहाँक नेताजी।

 

जँ फेर पकड़ा देब बन्‍दूक

हवलदार बनि

हमरे सभपर दहारब अहाँ

यौ नेताजी।

 

पहिल बरखा

 

छुबि हमर मनकेँ

गुदगुदेलक ओ प्रेमसँ

छुलक हवाक झोका हमरा

अपन शीतलताक मलारसँ।

 

छीट रहल छल चॉंद-चॉंदनी

जे थपथपैलक हमरा गालकेँ

अपन ममतामय दुलारसँ।

 

झमैक कऽ आएल कारी मेघ

नहा कऽ गेल संसारकेँ

अपन होठक मिठाससँ।

 

छुबि कऽ हमर अंग-अंगकेँ

चुइम कऽ धरतीक कण-कणकेँ

पुचकारलक सहलैलक

अपन सिनेहक बरखासँ।

 

किसान

 

होइत भिनसरे

अजबे ओरियान छै हमरा गामक

कियो पकैड़ बरदक जुआ

कियो खाइए रोटीक संग नून

दौड़ल अपन काम पर।

 

सभ परानी माइट संगे

अपन जीवन बीतबैए

बच्चा तँ बच्चा

बड़को अहिना पोसाइए।

 

दिन-राति‍ मेहनत करि ई

धरतीक कौइखसँ अन्न उपजाबैत अछि

नै कोनो थकान एकरा

नै केकरोसँ शिकाइत अछि।

 

एहेन निर्मल अछि

हमर किसान जिनकर

दान आ संतोषे

संस्कार आ पहचान अछि।

 

समाजक वि‍डम्‍बना

 

देख कऽ ई समाजक वि‍डम्‍बना

बिआहब आब हम धि‍या केना

चारपर खढ़ नै‍ पेटमे अन्‍न नै‍

नै अछि संगमे एक्‍को अना!

 

मांग भेल ड्राइवरकेँ लाख

मास्‍टर आ डाक्‍टरक नै पुछूँ बात

दि‍नक उजयारि भेल कारी, भेल घनघर राति!

 

ई हमरेटा नै‍

जन-जनक खिस्‍सा अछि

बेटी‍बला केँ मलिन छै

बेटाबलाकेँ हँसैत मुखरा अछि

नन्‍हि‍टा धि‍या हमर भेली आब सयानी

ति‍लकक ऐ युगमे बिआहव केना बिटिया रानी

बहि‍ रहल यऽ अभिलाषा सभ, जेना मुट्ठीमे पानि‍।

 

दर्दक टीस

 

पहाड़ जकाँ दु:ख

देलक पहाड़

एहेन एबकी आएल अखाड़

सगरे मचल हाहाकार।

 

केतए गेल सभ देव

केतए नुकाएल दुःख हरता

कुहरा कऽ जन-जनक

धि‍यान मग्न भेल रक्षण कर्ता।

 

माइक सुन भेल आंचर

केतौं हराएल नुनुक बोल

असगर छोड़ि बुढ़ बापकेँ

बिछुरि गेल बेटा अनमोल।

 

बाबा-बाबा करैत

गेल केतेक प्राण

कि‍ए ने बचेलौं हे बाबा

अपन भक्तक अहाँ जान।

 

 

रोकू कियो ऐ बाढ़िकेँ

 

और केतेक जानक बलि‍

देबै यो महा मनुख,

किया बनैले चाहै छी भगवान

देखियौ अहींक करनीसँ

समसान बनल उत्तराखण्ड प्रान्त।

पहाड़क छाती चीर कऽ

ओकरा घाइल अहीं केलि‍ऐ

नदीकँ हाथ-पएर काटि कऽ

ओकरा अपाहिज सेहो बनेलि‍ऐ

गाछ-बिरीछ काटि कऽ

छत हीन माए धरतीकेँ केलिऐ

शुरू केलिऐ अहाँ

विनासक लिला

सभ ताण्डव ठाढ़ अहीं केलिऐ।

आब प्रकृतिसँ खेलवारि

करैक सजाए देखियौ

नदीक हुहंकार सुनियो

बून-बून-ले केतौ तरसैत धरती

तँ केतौ वएह बूनमे डुमैत जान देखियौ।

ऐ असंतुलिताक कारण अहाँ छी

कि‍ए अहाँ बनैले चाहैए महान छी

आबो खोलू अपन केवाड़

कहि पूरा दुनियाँ ने बनि‍ जाए श्‍मशान-घाट।

 

नोराएल आँखि‍

 

उजरल घरमे पोखैरक पानि‍

पीब रहल अछि अखनो लोक

पुछि रहल अछि निर्बोध बच्‍चा

कहि‍या तक भोगबै हम ई सोग।

 

केना उजरल घर बसतै

केना एकर नोर सुखतै

और केतेक दि‍न

अहि‍ना भोगतै ई भोग।

सबहक दाता वएह एगो माता

जि‍नकर अछि समान पूत

कियो कहाबए हि‍न्‍दू-मुस्‍लि‍म

आ कियो अछूत।

 

भाय-भायकेँ जाति‍मे बाँटि

धुतकारैत देखैत छी समाजमे

की कहब हम ई वि‍डम्‍बना

केतेक चोट लगैत अछि कोढ़मे।

 

कि‍ए छी हम अछूत

 

वएह वि‍धना हमरो बनौलक

वएह रँग-रूप-गुण देलक

पर अबिते ऐ संसारमे

परजाति‍ कहि‍ कऽ सभ धुतकारलक।

 

पहि‍ले जाति‍ बारि कऽ गाम बँटलक

मनक संग पाइनो बँटलक

नै कियो बुझलक हमरा मनुख

देख कऽ सभ मुँह फेरलक।

 

कहू मुदा हे बुधि‍जीवी

हमरेसँ सभ उद्धार होइए

हमर बनेलहा दौरा देवताक

माथपर चढ़बैए!

 

एक्के धरतीपर

सभ जन्‍म लेलौं

वएह माटिपर सभ ठाढ़ छी

तँ हम कि‍ए अछूत कहाइ छी!!

 

 

भ्रष्टाचारक परसाद

 

एगो खेल खेलैत देखलौं

स्कूलमे

हरा गेल छल खिचरी

सभ प्लेटमे।

 

देख कऽ भेल अचम्भा

पुछलौं सर ई कोन अछि

जादू-टोना

सर कहलखिन

कि कहब हम केहेन अछि

भ्रष्टाचारक मारि

अबैए तँ यऽ भरल प्लेट

मुदा मिलैत अछि यएह जादूक खेल।

 

एक मुट्ठी बड़का बाबू

एक मुट्ठी छोटका बाबू

दू मुट्ठी अफसर साहैब

आ झपटैत अछि

तीन मुट्ठी कलर्क बाबू

देखते-देखते गाममे फकाइत अछि

मुट्ठी-मुट्ठी अहिना बँटैत अछि।

 

जेकरा देखू टक लगेने अछि

कहै छैथ हमरा दिअ

ई तँ सत्यनरायण भगवानक परसाद अछि।

 

तब हँसत तुलसी

 

हम एक पुरुखक बेटी छी

एक पुरुखक बहिन

एक पुरुखक पत्नी

तँ एक पुरुखक मॉं

हर पग-पग पर

हरेक संघर्षक बीच

हरेक सुख-दुखमे

हरेक रूपमे हम पुरुखक संगे ठाढ़ छी

हमरो मुँहमे वएह जिह्वा अछि

हमरो दृष्टि वएह देखैत अछि

हमरो दिमाग वएह सोचैत अछि

हमरोमे वएह साहस या हौसला अछि

आइ पुरुखक संगे चलैमे हम समर्थ छी

तँ फेर किए आइयो

कए साए-मे सँ पचहत्तैर महिला

घरेलू हिंसाक शिकार अछि

ई हमरा लेल नै

हे बद्धिजीवी अहाँले लाजक बात अछि।

आबो जागु हे मानुस

विकसित अपन विचार करू

नारीकेँ परितारित करनाइ छोड़ू

नव युगक निर्माण करू।

जेतए नै हएत नारिक इज्जत

ओइ समाजक केना विकास हएत

केना रहत हँसैत तुलसी

केना आँगन खिलखिलाइत

माइक पूजा पहिले करि

नतमस्तक भऽ मन झुकाए

देखयौ फेर काल्हि अपन

केतेक सुन्दर अछि हँसैत खेलाइत।

 

शिल्पकार

 

आइ हम देखै छी जइ दिस

वएह दिस ठाढ़ एगो शिल्पकार अछि

दौड़ रहल यऽ सभक सभ

रेसमे लऽ कऽ अपन औजार

कहि रहल अछि देब हम संसारकेँ

नव रूप रंग आकार।

मुदा केकरो नै

टोहैत देखै छी अपनाकेँ

नै निखारैत अपन

प्रतिभा आ गुणकेँ।

ई संसार तँ परिपूर्ण अछि

लोभ मोह आ भयसँ अछि दूर

तखन एकरा हम की देब अकार

रूप रंग आ प्रकार।

बनबैक यऽ तँ बनाउ

अपन प्रतिमा अपन ओजारसँ

निखारू मानवता खुदमे

अपन उच्च विचारसँ।

 

यादि‍ गामक

 

गामक बर मन पड़ैए

पिपरक गाछ

पुरबा बसात

पिअर सरसो मन पड़ैए।

 

लटकल आम

मजरल जम

गमकैत महुआ मन पड़ैए।

 

धारक खेल

कदबा खेत

रोटी-चटनी मन पड़ैए।

बाधक झिल्ली

मुठिया धान

पुआरक बिछौन मन पड़ैए।

 

घुरक आगि

पकैल अल्‍हुआ

ओ गपशप मन पड़ैए।

गामक बर मन पड़ैए।

 

आशाक किरण

 

अखार बीतल

सौन बीतल

बीतल जाइए

भादबक फुहार

सुइख गेल सभ

इनार-पोखैर

नै बरसल ऐ बेर एको अछार।

बज्‍जर भेल

मॉं धरती

कारी सभ

गाछ-पात

कोन पाप भेल

हमरा सभसँ

आबो तँ बताबह हौ सरकार।

नै खाइले अन्न

आ ने मिझबैले तरास

एना कहिया तक बिताएब

और केतेक मास

आब समटऽ

अपन भाभट

दए हमरा सभकेँ

जीबैक अधार

हे भगवान तूँ

बरसाबए पानिक बौछार।

 

नारीक पहचान

 

देख कऽ चिड़ै-चुनमुन

मन होइत छल कि

हमहूँ उड़ी अकासमे।

जा कऽ देखी

घरक बाहर

की अछि

संसारमे।

भैया संगे हमहूँ

जाइतौं स्कूल

ओझराएल रहितौं किताबमे।

मुदा जब निहारै छी

अपन दिस

छल बानहल जंजीर

पैरमे।

माए कहलक

हमर मान आ बाबूक पगरी

छौ दुनू तोरे हाथमे।

नैनटा

हमर उछलैत मन

मरि गेल विडम्बनाक संसारमे।

सपना देखैसँ पहिले

जगा देलैन

सुनि माइक वचन

बहुत कचोट भेल मनमे।

हम बेटी छी

आकि अवला

जे चुप रहैक यएह इनाम मिलैत अछि

पुरुख सत्तातमक समाजमे।

 

आजाद गजल- 1

 

मनमे आस सफर लम्बा अन्‍हार बहुत

पनैप रहल अछि मनमे सुविचार बहुत

 

नै डर अछि मिटै कऽ हमरा एको रती

बढ़ैत ने रहए चाहे ई अति‍याचार बहुत

 

माथ उठा कऽ चलैत रहब हम सदिखन

मनमे अछि घुमि रहल धुरझार बहुत

 

बेदाग रहत चुनरी सीताक बुझल अछि से

देहमे अछि अखनो प्राण आ इनकार बहुत

 

चिरैत रहब अन्‍हारक कलेजा छी ठनने

मुन्नीकेँ मिलत अइसँ आगू प्रकार बहुत।

 

आजाद गजल- 2

 

मुदत्ते बाद महफिलसँ मुँह झाम निकलल

बेकार छल निकलल जेना काम‍ निकलल

 

हरा गेल भीड़मे आबि कऽ ताकी निङ्गहारि

नतीजा जे छेलै निकलबाक सरे-आम निकलल

 

छीन‍ गेल सरताज हमर खाली माथ हँसोंति

बेबस बनि लाचार शर्मसार अवाम निकलल

 

फेर सत्तामे अबैक उम्मीद नै एक्को रती

घुरब नै फेर आइ ओइ देने पैगाम निकलल

 

सच तँ ई अछि राजनीतिमे दाग लागल

मुन्नी अपने करमसँ कत्लेआम निकलल।

 

बौआ देखहक चान्‍दकेँ

 

चन्‍दा मामा दूर छै

देखहक केतेक मजबूत छै

नित कटै-छँटै छै

तैयो हंसैत छै

केतेक अटल निर्भय छइ।

 

बौआ तुहो अहिना बनिहक

दुखसँ कहियो नहि घबरैहक

गिरबहक तबे तँ

चलनाइ सीखबहक

लगतह चोट तँ

सम्‍भरनाइ सीखबहक

देखह चान्‍दकेँ

जे घटैत-घटैत मेटा जाइ छै

तैयो एक बेर नै घबड़ाइ छै

धीरे-धीरे फेर आगा बढ़ि

परिपूर्ण भऽ कऽ पुनः

अकासमे खिलखिलइ छइ।

भोरक सनेस

 

उठह हौ बौआ

उठू यइ बुच्चिया

देखियौ दृश्‍य भिनसरकेँ।

भागल अनहरिया

भेल इजोत

करू स्वागत दादा सूरजक।

जतेक भिनसर

उठबहक बौआ

ओतेक नमहर हेतह दिन

कुल्ला-आचमन करि कऽ

लए आशीष अपन नमहरक।

भिनसरे नहेलासँ

मन तरो-ताजा हेतह

निरोग बनल रहब अहाँ

नै दरकार हएत कोनो डाक्टरक।

खुब पढ़ि-लिख

बौआ -बुच्ची

आगू-आगू दौड़ैत चलू

अछि अहींक कन्‍हापर

भार अपन देशकेँ।

 

बेटी-लहास

 

एक-एक दिन बीतल

पुरल एक मास,

अन्‍हार घरमे

सूतल छेलौं हम

नअ मास।

देखै‍क बहुत

जिज्ञासा छल हमरा

ऐ घरक मालिककेँ

जे नअ मास तक

बिनु कहले मेटबैत

अएल हमर

सभ भूख पि‍यास।

आइ भेटत रौशनी हमरा

देखब हम संसारक चेहरा,

लेब हम आइ नव जीवनक साँस

पूरा हएत हमर आइ सभ आस।

आँखि‍ बन्‍द अछि

किछो देख नै सकै छी हम

मुदा महसुस भऽ रहल-ए

एगो बज्र हाथ, जे

दबौचि‍ रहल अछि

हमर कण्‍ठकेँ

एगो अवाज जे बेर-बेर

हमरा कान तक पहुँच रहल अछि

बेटी छिऐ मारि दहि‍न!

बस रूकि‍ गेल हमर साँस

बनि‍ गेलूँ हम लहास।

 

बाल-श्रम

 

कुड़ा-कड़कट बीछ कऽ

बाबू नै हम

कोनो पाप करै छी,

अहाँकेँ गन्दगी

पहिले साफ करि

फेर अपन पेटक जोगार करै छी।

बाल-श्रम अछि जुलुम

बड़का-बड़का पोस्‍टरमे पढ़लौं

पर अफसर आ नेतेक घरमे

नित काज करैत एलै

जब पेटक आगि‍ धधकैत अछि

तब ने कोनो

कागज-कलम सोहाइत अछि।

चोरी-चपाटीसँ तँ नीक

मेहनत‍ करि दूगो रोटी खाइ छी।

 

फगुआ

 

सभ मिलि‍ करैए हमजोली

कान्हा संग गोपी

खेल रहल अछि होली।

नील-पियर, लाल-हरियर

अछि सभ रंग सुनेहरा,

आइ बेरंग नै रहैए कियो

चाहे धोती होइ या घाघड़ा।

दादी चाउरक पुआ बनेतै

माए दही आ खीर खियेतै

बाबू देतै आशीष,

रंगा-रंग होइ सबहक जिनगी

जिबैए सभ लाख बरिस।

ई अवसर नित अबैत रहैए

ई मेल-मिलाप बनल रहैए

नै हइय केकरोसँ झगड़ा

सभकेँ बधाइ दिवस सुनहरा।

 

 

आन्‍हर कानून

 

देश-देशसँ

एलै अवाज

तैयो नै बदलल

हमर समाज।

नै होइए

एकरा दरद कोनो

नै देखैए ई

कोनो पाप

किएक तँ बानहल अछि

एकरा आँखि‍पर

कारी साँप।

जे डसि रहल अछि

हमर संस्कारकेँ

हमर नीककेँ

करा रहल अछि

हमरासँ नि‍त पाप।

 

बूनक मोल

 

फाटल धरती

जरल घास

एक बून पानि बिनु

अछि सभ उदास।

नै बुझलौं हम

प्रकृतिक निअम

कानै पड़त आब

केतेक जनम।

आइ बुझितौं मोल

जे पाइनकेँ

तँ एना पियासल नै मरैतौं जाइन कऽ।

बहुत नाच नचेलौं

छन्नी-छन्नी धरतीकेँ केलौं

अपन सुविधा खातिर

धरतीकेँ सिमेन्‍टसँ झँपलौं

वएह अपमानक बदला छी ई

लागए नै पैरमे माटि

तेकरे जमाना छी ई

आब तँ नोरोमे नहि

पानि अबैए

जेकरा पीब हम पियास बुझाबी

बुझा रहल यऽ आइ

ओइ एक बूनक मोल

छल हमरा-ले ओ केतेक अनमोल।

 

करी मिथिलासँ पहचान

 

चलू मिथिला, सुनियौ मैथिली

केतेक मीठ ई बोल यौ

मिसरी घुलल अछि हर शब्दमे

करियौ एकर मोल यौ।

सीताक नैहर एतए

उगनाक ई प्रिय स्थान यौ

ऋषि-मुनिक भूमि ई

अछि एतए विद्वानक खान यौ।

होइत भिनसर सुगा

सीता-राम पढ़ैत अछि

बौआ नुनु कहि सभ

बात बजैत अछि

करियौ भूमिक पहचान यौ।

एतए कऽ माछ-पानक

दुनियाँ करैए बखान यौ

धोती-कुरता आ पाग

अछि पुरुखक पोषाक यौ।

धरतीपर हम जन्‍मलौं

अछि ओइ जन्‍मक

कोनो नीक काज यौ

फेर-फेर हम एतै जनमी

अछि एतबे विनती भगवान यौ।

 

करिझुमड़ी कोसी

 

दू-चारि दिन नहि

आइ सात दिनसँ

ऊपर भेल

कोसी करिझुमड़ी

सभ लेने चलि गेल।

नै खाइले

अन्न अछि

नै पीबैले पानि

ऊ डसिनिया

सभ ढेकरैत लऽ गेल।

बाउ हराएल अछि

भाय ढिस भऽ पड़ल अछि

राइते-राति‍ आएल

एहेन निरलज्जिया जे

कुहरा कऽ चलि गेल।

नै बँचल एक कनमो किछो

नै भाय-बाप नै सम्‍बन्‍धी कियो

असगर ठाढ़ छी कछारिमे

ई कोसी करिझुमड़ी

असहाय छोड़ि हमरा

हँसैत चलि गेल।

 

नइ लेब आब हम दहेज

 

दहेजक खातिर

गिर गेलौं हम

मानवताक समाजमे।

कि कहब आब

अपन दुखरा

कि लिखल छल कपारमे।

धोती-कुरता पहिर कऽ बाबू

ठाठसँ चिबबैत पान अछि

हमरा बना कऽ पापी

आब ओ कात अछि।

पढ़ि-लिख हम

बानर बनलौं

बाबूक बातमे एलौं

दहेज लऽ कऽ

केहेन काज केलौं।

नै बुझलौं

नारीक शक्ति

नै ओकर सम्मान केलौं,

कि कहब आब हम कि

केतेक घिनौन कुकर्म केलौं।

 

मिथिलाक दादा

 

खेत बेच मन कारी झाम

मुदा खाइए माछ भिनसर-साँझ।

जमीनक मोल नै जानैए ई

पुरखा अरजलहा बेचैमे लागैए की।

बैठल-बैठल ताल करैए

पटुआ धोती पहिर घुरैए।

चुप रहि कऽ सभ नाच नचाबैए

हुक्का गुरगुड़बैत अपन काज सलटियाबैए।

फाटल जेब मुदा ऊँच शान

देखियौ मिथलाक एगो ईहो पहचान।

तैयो खुआबैए ई सभकेँ

नित पान मखान।

 

पाहुनक माछ

 

एलखिन पाहुन लऽ कऽ माछ

भदवरियामे नै अछि सुखल कोनो गाछ।

माए हम करबै आब कोन काज

केना रखबै मान केना सजेबै साज।

सुनू कनियाँ हमर बात

छानि उजारू करू ई काज।

नै केना बना कऽ देबै

रामकेँ केना उपासल रखबै।

छानि उजरतै तँ फेर बनेबै

मुदा रूसल पाहुन केना मनेबै।

पजारू चुल्हा पड़लैए साँझ

लगाउ आसन परसू तिमन संगे तरल माछ।

 

हमरा पागल कहैत अछि लोक

 

लरखड़ाइत पएर थरथड़ाइत ठोर

नसाबाज हम नै, अछि जालिम सभ लोक।

 

चोरी केलौं नै मुदा चोर कहेलौं

पर डकैती करि बाइज्जत घुमि रहल अछि लोक।

 

एक मु़ट्ठी अन्न-ले तरैस रहल छी

देखियौ गोदामक-गोदाम अन्न सड़ि रहल अछि लोक।

 

हम मेहनतो करि नै अपन पेट भरि पाबै छी

पर हमर सरकार भरल पेट अरबोक घोटाला करैत अछि

आब सोचियौ सभ लोक।

 

 

सगरे अन्‍हार अछि

 

भ्रष्ट आ भ्रष्टाचारसँ

भरल पूरा संसार अछि

कियो नै बँचल एतए

सौंसे ओकरे राज अछि।

कियो देखा कऽ लुटैए

कियो चोरा कऽ लुटैए

तँ कियो लजाए कऽ लुटैए

लूटिक एतए बजार अछि।

के कहत केकरा एतए

सभ एक प्रकार अछि

गर्भमे सिखैए भ्रष्टाचार

यएह नव युगक संस्कार अछि।

कदम-कदमपर घूस दैत मानव

दुनियाँमे अबैए

आगुओ घूसे दैत

घुसकौल जाइए

मोर-मोरपर देखबैत यएह नाच अछि

घूस दइबला सभसँ बड़का बइमान अछि।

 

 

माइक रूदन

 

सोचलौं बेटा

बेटी भेल

रोपलौं आम

बगुर उगि गेल।

बढ़ि‍ रहल अछि

समाजक अति‍याचार

केना बचैब हम

18 बर्ख एकर लाज।

ई हमर बोझ नहि

हमर अंश छी

जेकरा हम नैनामे बसाएब,

मुदा केना कऽ सियाही

भरल घरमे अपन चुनरी बचैब।

कलंक बेटी नहि

ई समाज अछि

जे युग-युगसँ

उज्जर चुनरीमे लगबैत दाग अछि।

चारू दिस छल लक्ष्मण रेखा

तैयो हरण भेल सीता सुलेखा।

कऽ रहल अछि

नचार हमरा

बेटीसँ दूर हमरा।

शूल बनि मनमे गड़ैए

बेटी तँए गर्भमे चुभैए

बन्‍द करू आब अति‍याचार

बसाबए दिअ हमरा

बेटीक संसार।

 

अपना दिस निहारू

 

बड़ केलौं

उक्टा पेंची

अक्कर खिद्यांस

ओकर धेंस

कहियो तँ आंगुर

अपनो दिस उठाउ

अपन मनकेँ बुझाउ।

उठैए जे

एगो आंगुर केकरो दिस

तीन आंगुर देखबैए

यऽ अपने दिस।

मारू साँपकेँ

निकालू मनक काँटकेँ

जतेक साफ मन रखबै

दुनियाँ ओतेक सुन्दर देखबै।

बहुत भटकलै

खोजैले भूत

दुबैक कऽ बैठल छल

ओकरे करेजमे

बनि कऽ सूत।

 

नचार किसान

 

बाबू केना हेतै आब

पाबैन-तिहार।

बीसे-बीस दिनपर

हेतै खर्चाक भरमार

नै अगहनक करारीपर

देतै कियो पैंच उधार

बाबू केना हेतै आब

पाबैन-तिहार।

छुच्‍छे छाँछी रहि जेतै

अबकी चौरचनमे

मरूआ भेल अलोपित

आब मिथिलामे

केना कि उपाय करिऐ

केतएसँ करिऐ हम जोगार

बाबू केना हेतै आब

पाबैन-तिहार।

जतरामे धिया-पुता

लव कपड़ा मंगै छै

दिवालीमे फटक्का-ले कनै छै

छट्ठी मैयाक की

अरग देबै बेर

बाबू केना हेतै आब

पाबैन-तिहार।

 

स्वच्छ समाज

 

छोड़ि जाइ छी एगो चेन्‍ह हम।

निस्प्राण भऽ गेलौं

मुदा हमर दरद सदि‍ जीबैत रहत,

हम चुपचाप जा रहल छी

मुदा हमर चिख अहाँकेँ

हरिदम झकझोरैत रहत।

दोष हमर नहि,

अहाँक मानसिकताक छल

बुराइ हमरामे नहि

अहाँकेँ संस्‍कारम छल।

बेजुबान हम नहि

अहाँकेँ बना कऽ गेलौं

खामोश भऽ कऽ

अपन अवाज बुलंद

करि गेलौं।

अगर अछि अहाँमे

जिंदा कनियोँ मानवता

तँ बचाउ दोसर दामिनीक लाज,

यएह हमर इच्‍छा अछि

निस्‍पाप हुअए अपन समाज,

करू नै समर्पित हमरापर

फूल आ मोमबत्ती गाड़ि

देब हमरा सहि श्रर्द्धाजलि‍

तँ करू संकल्प! बनाएब अहाँ

नारीकेँ जीऐले एगो स्वच्छ समाज।

 

माए एक चुटकी नून दऽ दे

 

आइ हम जनलिऐ

बेटी आ बेटामे

कि भेद होइ छै,

गर्भमे बेटी

कि‍ए गरै छइ।

 

नारीक दुःख

नारिये जनै छै,

तँए तँ सभ माए

बेटी जन्‍माबैसँ

डरै छइ।

 

जइ बेटीकेँ माए

जीवन दइ छै,

वएह बेटीकेँ

समाजक अति‍याचार करि

मरैले नचार करै छइ।

 

बेइज्‍जत भऽ कऽ

मरैसँ तँ नीक

माए इज्जत कऽ तूँ

मृत्‍यु दऽ दे

ई पुरुख सत्तात्मक समाज छीऐ

माए जनैमते तूँ हमरा

एक चुटकि नून दऽ दे।

 

बेटी

 

छोड़ऽ काका

बेटा-बेटी कऽ

अन्‍तरक खेल।

सोचऽ तूँ एक बेर

बेटा-बेटी मे

की फरक भेल।

बेटा कनेतह

पर बेटी पोछतह नोर

बेटा एक कुल

मुदा बेटी दू कुल

करतह इजोर।

थाकि-हारि कऽ जब तूँ

केतौसँ एबहक काका

सिनेह बरसाबैले

आगु जेतह बेटी।

कि‍छु दिन कऽ

मेझमान बनि ई तोरा

घर आइल छऽ

तोहर दुलार आ

आशीष लऽ कऽ

चुप-चाप चलि जेतह बेटी।

तब फटतह तोहर कोंढ़

आ अन्‍तर-मनसँ

एतए एगो अवाज कि

अगला जन्‍म तूँ फेर

ऐ आँगनमे अहियहन बेटी।

 


 

कारी-बजार

 

कारी-धन कारी-बजारी

कारी चादरसँ लिपटल

हमर देश अछि।

केना बेदाग करब एकरा

सगदर कारी-स्याह अछि।

निचाँ-निचाँ की देखब

जब ऊपरे अन्‍हार अछि

कोनो दोसर नै रंग एतए

सगदर कारी-बजार अछि।

राष्ट्रपति होए या प्रधानमंत्री

सभ कऽ सभ दरिद्र अछि

कि कहब बेशर्मी केतेक हद तक

एकरा देहमे समाएल अछि।

भगाबू दिम्मक कऽ

अपन घरसँ

नै तँ ई हड्डी तक

खाइले तैयार अछि

सोचू-विचारू अपनामे

अहीं कऽ हाथमे

काल्‍हिक सरकार अछि।

 

शब्दक खेल

 

चुन्नु-

“अ सँ अनार

आ सँ आम

रटैत जी थोथरा गेल,

आब नै खेलब हम

ई शब्दक खेल।”

 

माए-

“तँ चलू उराबए

चलि पतंग

हरियर अपन

लाल ओकर

पिअर भैया कऽ

आब कहू सभ मिला कऽ

केतेक उड़ि रहल अछि पतंग।”

 

चुन्नु-

“एतौ तँ अछि सवालक जाल

माए हमरा पहिले ई बता दिअ

एक सँ आगाँ केतेक होइ छै

सुलझा दि‍अ ई महाजाल।”

 

माए-

“पहि‍ले कहू आब

कहियो नै उबबै

खेलसँ,

नै उलझबै अंकक जालसँ

तब हम अहाँकेँ सभ सिखाएब।

सभ सबालक जवाब

अहाँकेँ बनाएब।”

 

माए बता तूँ एगो बात

 

माए बता तूँ एगो बात

खोल तूँ ई मेघक राज

के सभ रहै छै ओतह

कि छै ओकरा सबहक काज।

भोरक सुन्दर सुरज

दुपहर कऽ किए जरबै छै

साँझ पड़ैत फेर

केतए हरा जाइ छइ।

राति‍ कऽ अबै छै मामा

सजा कऽ मोतीक थार

कि ओतौ छै बहुत बड़का संसार।

कहियो देखै छी कनियेँ

कहियो बेसी

कहियो तँ साफे नै देखाइए

तूँ बता माए मामा एना किए

नुका-छुप्पी कऽ खेल खेलैए।

सुनू बौआ हमर बात

बिना पढ़ने नै खुलत ई राज

जेना-जेना अहाँ पढ़ैत जाएब

सभ भेदकेँ भेदैत जाएब।

 

अन्‍हार घरमे हत्या

 

हम बेटी छी तँ

हमर कोन दोष

हमहूँ तँ एगो जान छी

हमरो आँखि यऽ

कान यऽ मुँह यऽ

हम नै निष्प्राण छी।

नै चलाबू एना कैंची

हमर मन डराइए

देखियौ हमर कटल हाथसँ

लाले खून बहराइए।

अन्‍हार घरसँ तँ

निकलए दिअ

एक बेर तँ हमरो

निष्ठुर संसारकेँ देखए दिअ।

केना लेलक एतए जन्म सीता

ओइ रहस्यकेँ जानऽ दिअ

हमरा नै मारू

जेकरा लोक पुजै छै

ओइ माइक मुँह देखए दिअ।

 

बेटी

 

जन्‍म भेल तँ कहलक दाइ

भेल दू हाथ धरती तर

कियो नै‍ सोचलक हमहूँ जान छी

कहलक दही नून तरे-तर।

बावू कपार पीटलैन

माए भेल बेहोश

जँ हम जनि‍तौं तँ

नै‍ अबितौं ऐ लोक

ऑंखि‍ अखैन‍ खुलल नै‍

कान अखैन‍ सुनलक नै‍

आ बना देलक हमरा आन

कहलक कोनो अट्ठारह बर्ख

रखबिहि‍ एकर मान।

 

ने केकरो कि‍छु लेलौं हम

ने केकरो कि‍छु देलौं हम

जे माए हमरा जन्‍म देलक

ओकरो मुँह नै‍ देख पबलौं हम

अजब दुनि‍याँ अछि ई

अछि गजबक लोक

कि‍एक करैत अछि एना

कि‍एक भेजैत अछि बेटीकेँ परलोक

अबैत ऐ धरतीपर

इजोतसँ पहि‍ल भेल अन्‍हार

हमहूँ डुमि‍‍ गेलौं

आ डुमि‍‍ गेल संसार

समाज बनल हत्‍यारा

बाप बनल जल्‍लाद

बसैसँ पहि‍ने उजारि देलैन

बेटीक संसार।

 

भेल पूर आस

 

उमरल आएल

देखि कारी मेघ

चलि गेल धानी

पुबरिया खेत।

बंजर भूमि आब

पनिया जेतै,

मेटतै आब अपनो दुख

सगरे अन्न उझला जेतइ।

बुच्ची-ले लब आंगी अनबै

तोरा-ले लव साड़ी

अबकी जतरामे

निर्मली बजारक खेबै पकौरी।

आइ पुबारि बाध रोपबै

काल्हि पछवारि

परसू उत्तरवारि आ दक्षिणवारि

चारू दिस लहलहेतै खुशीए-खुशी

सुख-सम्पन्न हम सभ भऽ जेबइ।

 

भाइक सिनेह

 

जब छोट छेलौं

तँ केतेक सिनेह

करै छल हमरा भैया

हमर एगो नोरपर

केतेक रूप बदलै छल भैया

हाथी घोड़ा भालू बनि कऽ

मनबै छल हमरा भैया।

पहिलुक कर हमरा खिया कऽ

फेर सुगा मैना कऽ हिस्सा

सेहो खियाबै छल भैया।

पर आब एगो अलगे रूप बदललखिन भैया

भिन-भिनौजक खेल

खेला रहल छथिन भैया।

केतनो कनै छी

तैयो नै देखैले अबैए भैया।

आब हम नै खेलबै ई खेल

रहि नै सकबै भैयासँ करि कऽ झगड़ा

भगवान हमरा फेरसँ

बच्चा बना दइए

हमरा भैयासँ ओ सिनेह मंगा दइए।

 

अल्‍हर मेघ

 

बजबैए मेघ

तबला ढोल

बरसाबैए पानि

टिपिर-टिपिर

झमर-झमर

राग अनमोल।

सन-सन-सन

हवा सनसनाय

तन-मन केँ ओ

थिरकाबैत उड़ि जाए।

झमकि कऽ आबैए

कारी मेघ

चुमैले

धरतीक चरनकेँ

तृप्त भऽ

ई अल्हर मेघ

हँसैत खिलखिलाइत

फेर अकासमे मेघ

अलोपित भऽ जाए।

 

सिया तोरे कारण

 

जनक दुलारी सिया

सहैत एलौं सभ दरद

अहाँ कि‍ए?

रानी भऽ वनमे रहलौं

पतिक खातिर

सभ सुख ति‍यागलौं

पग-पगपर संघर्ष केलौं

सभ परीक्षामे खड़ा उतरलौं

तँ फेर ई समाज नै अहाँकेँ

अपनेलक कि‍ए?

 

जइ पति ले सभ

किछु अहाँ ति‍यागलौं

वएह अहाँकेँ ति‍यागलक कि‍ए?

कि‍ए ने विद्रोह अहाँ केलौं

नारीक हित ले अवाज उठेलौं।

सदि‍खन सुनै छी हम एक्के बात।

एहेन सति सीता नै बँचलै

तँ केना बँचतौ तोहर लाज?

 

जौं एगो सीता जे

अवाज उठैइतै,

तँ फेर कोनो सीता

नै परतारित होइतै।

चुप रहैक ई

सजा मिलैए,

केतेक सीता नित

वनवास भोगै छइ।

जाड़

 

एलैए जाड़

लऽ कऽ दुखक पहाड़।

केना कटत दिन-राति‍

केना बीतत

ई जाड़क कड़ार‍।

उजरल छौइन

टुटल अछि टाट

नै अछि कोनो ओहार

घरक चारू कात

अछि बाटे-बाट।

पुआरक ओढ़ना

पुआरक बिछौना

केकरा कहै छै

लोक कम्‍मल

केना कहै छै

होइ छै जाड़ सुहाना।

कहियो घरसँ निकैल‍ कऽ देखियौ

एक राति अतए बीता कऽ देखियौ

ठिठुरि कऽ मरैए

लोक नित केतेक जेना।

गरीबेकेँ तँ

भगवानो मारै छै

अगर नहि!

तँ फेर पत्थरक देह बना

कि‍ए नै भेजै छइ।

जे ढाहि‍ दइ

सरकारक भीखकेँ

अनुदानक नाओंपर

भेटैत मजाकक

इन्‍दि‍रा-अवास आ

सरकारी राहत कोषकेँ।

 

बन्‍दिश

 

हाथ-पएर दुनू अछि

पर नै चलि पबै छी

नै किछु करि पबै छी

जीह अछि मुदा बौक बनल छी

बस आँखिसँ देख रहल छी

कानसँ सुनि रहल छी

वेदनाक भट्ठीमे

अपन देह झुलसा रहल छी

जिंदा लहास बनि जी रहल छी

केकरासँ कही

केकरा बुझाबी कि हमहूँ एगो जान छी

कही ओइ बेवस्थासँ

कि बेवस्था बनबैबला लोकसँ

कि स्वयंसँ।

सहज ई मानि ली कि हम चुप

रहैले बाध्य छी

किएकि हम लड़की छी।

 


 

टाकासँ बिआह

 

काका घरमे

बाजै बधैया

होइ छै बुचिया कऽ

बिआह यौ

चारि बहिन हमहूँ छी

चारू कऽ चारू कुमार यौ।

दिन-राति मेहनत करि

रोटीए-टा कऽ करि

पबै छी जोगार यौ

छी हम महगाइ आ गरीबी

कऽ मारल

अछि बाबू हमर किसान यौ।

दिदियो कऽ देखै

लेल आएल

गाम-गामसँ केतेक ने

बरतुहार यौ

पसिन करि खाइयो कऽ गेल सबटा

तरूआ आ पान यौ।

तैयो अछि बैसल दीदी

25 सालसँ कुमार यौ।

कहलक सभ बरतुहार

बिना दहेजक केना

चलत काम यौ

हम छी बेटा बाला

अपन पैसा खर्चा करि

नै करब बिआह यौ।

युगमे लड़की

सँ नै टाकासँ

होइत अछि बिआह यौ।

 

काँच बाँस जकाँ लचपच उमेरिया

 

काँच बाँस जकाँ लचपच उमेरिया

डगमगैत अछि डेग यौ

केना भरब हम गगरी

केना चलब डगर यौ।

 

किया जन्‍मलौं ऐ धरतीपर

की छल हमर कसर यौ

माए-बाबू नीकसँ

बाइजो नै पाबलौं

बनलौं अपने हम माए यौ।

 

ज्ञान, पोथीक दुनियाँसँ

रहलौं जे अनचिनहार यौ

की कहब

केहेन अछि हमर जिनगी

भेल संसार अन्‍हार यौ।

 

मनक वेदना

 

रहि-रहि एगो

हुक उठैए

सउँसे देह दगद

भेल जाइए

आब नै बँचत मान

भऽ रहल छी हम निष्प्राण।

 

जिनगी बनि गेल धुँआ

हवा कऽ मलारोसँ

काँपि उठैए

सभ रूआँ।

 

अछि सभ रस्ता अंजान

 

झामर भेल मनक अभिलाषा।

 

केतए ठाढ़ छी

केतए जा रहल छी

नै अछि हमरा किछो ज्ञान

पर बुझैत छी हम अतेक कि

जि‍नगीक अन्‍तिम यात्रा

लऽ जाइत अछि समसान।

 

सरहद

 

ई सरहद, ई सीमा

कथी-ले?

जमीन बॉंटैले!

पर जमीनक संगे

मन बँटाइत अछि

मनुखकेँ मनुखसँ

अलग करैत अछि।

 

हम एक जाति छी

मानव जाति!

फेर किए नै कियो

ई बुझैत छी

जाति-पाति-ले किए लड़ै छी?

 

सरहद कऽ नाओंपर

भाय-भाय कऽ बाँटै छी

धिक्कार अछि हमरा

अपन मानवतापर

जे ऐ सरहदक सीमा

मे बैंध गेल छी

हमरासँ नीक

तँ ई हवा, पानि

आ चिड़ै-चुनमुनी अछि

जे स्वतंत्र भऽ ऐ

कातसँ ओइ कात तक

अपन संगी बनबैत अछि।

 

मुदा हम देवालक

बिच घेराएल छी

जखन लगैत अछि

जे आब सीमा मिटा जाएत

भाय-भायसँ गला मिलत

तब ई देवाल

और मजबूत भऽ

अकासकेँ छुबए लगैत अछि।

 

आखिर कहिया ई

सरहद हटत?

कहिया ई मनक देवाल गिरत?

 

हमर अबैबला पीढ़ी

अही देवालमे कैद रहत?

 

 

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