प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी

अप्रदीप्त इजोत

पुष्प-कोँढ़ी मे, सञ्च-मञ्च,
बैसल अछि अति सुन्दर प्रसून,
कुसुमित होबए सँ अनठेने,
की पाबि रहल ओहि मे सुकून?

जा धरि नहि पुष्पित होएत ओ,
सुन्दरता कोना देखतै संसार?
गुण रहले सँ त' हेतै नहि ,
जा धरि नहि हेतै ओकर प्रसार।

जखन हेतैक प्रस्फुटित फूल ,
मधुकर अओतए ताकए पराग,
हवा, सुगंध लए, सबतरि बँटतै,
गम-गम करतै पूरा बाग।

सौंदर्य देखि-देखि ओहि कुसुमक,
वर्णन करता श्रृंगार-कवि ,
के नहि मोहित होएत बिलोकि ,
फुलाएल पुहुपक, सुंदर छवि ?

मुदा, के सजाओत बिआह-मंडप?
अपुष्पित फूलक माला सँ,
आ, के चुमाओत वर-कनिआँ के?
अकुसुमित फूल ध', डाला सँ।

प्रस्फुटित कुसुम सँ हार बनैत अछि ,
बढ़बैत अछि कंठक सुन्दरता ,
जा धरि रहता अपुष्पित, ता धरि,
देवक'सीस नहिए चढ़ता।

राखल-राखल त' गुण सेहो ,
रहि जाइत अछि, ठामहि-ठाम,
फुलाएल फूल पसारै सुगंध,
पूरब-पच्छिम, दक्षिण-वाम।

पकैड़ लैत छै घुन क्षमता मे,
लेल ने जाए जँ कोनो काज,
बढ़तै गाछ, तखन ने अओतए ,
फूल-फल, इएह छै रेबाज।

जेना खाद आ पानि पड़ैत छै,
नमहर होइत जाइछ पादप,
ओहिना, गुणक' विकास हेतु,
आवश्यक करब अछि कर्मक' तप।

लोक बिसरि जाइछ ओहि गुण के,
पुष्पित नहि भ' बनि सकल फूल,
ऋद्धि-पुष्प केँ सभ देखैत अछि ,
जग के रीतक' इएह अछि, मूल।

गुण के बीआ, रहले सँ की?
जँ, बढ़ि क नहि भ' सकल गाछ,
मौलाएल-मेधा, कतए प्रशंसित?
सुनैत अछि ओ, अगबे कटाछ।

दीआ मे, टेमी, तेल सँ, की?

जा धरि नहि बरत, निकलत इजोत,
की, देखाएत हूबा , नाविक के?
जा धरि नहि सिंधु मे उतरत पोत।

की होएत, गुण के रहले सँ?
जँ बढ़ल ने ओ, ने आएल काज,
जनि तो नहि रचलक चारु चित्र,
के करत, ओहि चित्रकार पर नाज?

पड़ल-पड़ल मरि जाइत अछि मेधा,
भ' जाइत अछि, पूरा भोथ,
जे, आलस सँ नहि चलता-फि रता ,
ओ त' हेबे करता लोथ।

के कहतन्हि वाक्ऋषभ हुनका?
मौका पर नहि होइ छन्हि बाजल,
के करतै ओहि गुण के बड़ाई?
गुण रहितहुँ जे अछि नहि माँजल।


ओहि फूलके, होइत अछि बड़ा ई,
जे, फुलाएल, गमकल आ सुंदर,
जग गाबि रहल अछि विरुद-गीत,
जे गुणी संग, आ ओकर धुरंधर।

परिमार्जन बाद, बनैत अछि कंचन,
अहिबाती-सि उँथि क', चूड़ामणि ,
पूर्ण द्युति सँ, चमकैत तखन छथि ,
अबैत छथि जखन नभ-मध्य, तरणि ।

ओ मेधा, जे बनि सकैत अछि
विश्व-क्षितिज पर ज्ञान-नक्षत्र,
जँ, बिन विकसित भ', पड़ल रहल,
ओँघड़ा एत रज मे, यत्र-तत्र।

की लाभ भेलै गुण रहलो सँ?
जे रहि गेल, अलसाएल, सूतल,
प्रभा-स्त्रोत, बिनु बरल, व्यर्थ भेल,
क' सकैत प्रकाशित, छल भूतल।

संघर्ष, विकास-यात्रा-पथ पर,
सहयोग, कुसुम बनि ,स्वतः उगत,
अड़चन, अन्हार बनि आओत त',
इच्छा-बल, इजोत-स्तम्भ, बनत।

राखले रहि जाइत अछि गुणक खान,

जँ नहि प्रयुक्त हो अवसर पर,
बिनु रेआज, होथि केहनो गायक,
भ' जाइत छन्हि भोथ, स्वर हुनकर।

सभ जनैछ, इजोत रखैत अछि ,
तिमिर भगाबए के सामर्थ्य,
दीप्ति-स्त्रोत जँ बारल नहि जाए,
तखन, इजोतक'छै कोनो अर्थ?

समचा रहला सँ की हेतै?
जँ कएल ने जाए, प्रज्वलित अनल,
एहि मे की दोख इजो तक'छै?
कि ओ कहतै, अपने किए ने बरल?

कखनो ने गुण के दोख छै,
दोषी त' अछि गुणधारक,
बैसा, गुण मे लगबै छै घुन,
बनबै छै दोषी, बेकारक।

दीप्त-इजोत, तैयार रहैत अछि ,
लड़ए,सघन अन्हार सँ,
कतबो कुहेलिका पसरि जाउ,
नहि प्रभा दबत, ओहि भार सँ।

गुण रहितहुँ, जे गुण बढ़ि ने सकल,
मानव-मेधा के क्षति अछि ,
सद्गुण बढ़ला सँ सभक लाभ,
आ, गुणक' सेहो सदगति अछि ।

प्रतिभा संगे अन्याय होएत, जँ
रहि गेल इजोत, अप्रदीप्त,
मेधा-क्षितिज पर चमकए बला ,
रहि जेतै नक्षत्रक'जगह, रिक्त।

 


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