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कल्पना झा

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४

रिएक्सन मे लिखलनि पहिल उपन्यास 'कुमार'

 

"असलमे हम रिएक्सन मे 'कुमार' रचना कएल वक्तव्य छनि उपेन्द्र नाथ झा 'व्यासजीक।

सर्वविदित अछि जे १९३३ मे प्रकाशित हरिमोहन झाक उपन्यास 'कन्यादानलोकप्रियताक नब कीर्तिमान स्थापित कएने  छलए। मूलतः  एहन उपन्यास सिद्ध भेलजे हरिमोहन झा जी केँ तँ लेखकक रूप मे स्थापित कएबे कएलकनिमैथिली साहित्यक लोकप्रियता सेहो बढ़ौलक। हमरा तँ इहो सुनल अछि जे 'कन्यादानउपन्यास पढ़बालेल बहुत लोकजे गैर-मैथिली-भाषी छलाहसेहो मैथिली सीखब शुरु कएलनि। एहि उपन्यास मे लेखक मैथिल समाज मे व्याप्त अंधविश्वास  पाखंड केँ देखार कएलनि अछि। संगहि मैथिल समाज मे बेटा  बेटीक पालन पोषणपढ़ाइ-लिखाइ मे जमीन-आसमानक अन्तरसंगहि मैथिल लोकक संकुचित सोच दिस पाठकक ध्यान आकृष्ट करबाक प्रयास कएने छथि। पोथीक समर्पणे मे मैथिल समाज पर कटाक्ष रूपी प्रहार देखबा/पढ़बालेल भेटि जेतनि पाठक केँ "जाहि समाजमे बी० ए०  पास  पतिक जीवन संगिनी  बी पर्यन्त नहि जनैत छथिन।मैथिल समाजक नकारात्मक पक्ष केँ उजागर करैत  पोथी 'व्यासजी केँ बहुत नीक नहि लगलनि। एमहर एहि उपन्यास 'कन्यादान' लोकप्रियता सँ उत्साहित १९४३ मे एकर अगिला भाग 'द्विरागमनसेहो प्रकाशित भेलनि हरिमोहन झा जीक। १९४५ में 'प्रणम्य देवताकथा-संग्रह सेहो प्रकाशित भेलनि। सभ पोथीक विषय-वस्तु ओएह...मैथिल समाजक कौचर्य-कुचेष्टा-खिधांस। किछु लोक हरिमोहन झा जीक पीठ ठोकैत कहथिन - वाह ! हरिमोहन बाबू वाह ! की बढियाँ लीखल अछि !

मुदा 'व्यासजी वैचारिक स्तर पर हरिमोहन बाबूक रचनाक संदेश सँ असहमत रहथि। खाली अपन समाजक खिधांसखाली अपन संस्कृति पर आक्रमण, 'व्यासजी केँ नहि अरघलनि। हुनकर कहब छलनि, "मैथिल समाजक उत्कर्षआदर्श एवं गरिमामय संस्कृति सँ के नहि परिचित हेताह ? उत्कर्षक कत्तहु चर्चा नहिमात्र अपकर्षक चर्चा... खाली अपकर्षक चर्चा करैत रहबाक की औचित्य ? एहि सँ मैथिल समाजक मनोबल टूटय लगतैक। लगतैक जेना सभटा खरापे-खराप अछि अपना मिथिला मे।"

संयोगवश एक दिन सतीश बाबू (पूर्व मुख्य न्यायधीश हरिमोहन बाबू आमने-सामने बैसि गप्प करैत रहथि। 'व्यासजी सेहो ओत्तहि ठाढ़ रहथि। सतीश बाबू व्याकुल जकाँ हरिमोहन बाबू सँ पुछलथिन - " की अहाँ अपन समाजक खाली खिधांस लिखैत छी ? अपन समाजक उत्कर्ष पर लिखू !"

'व्यासजी केँ सेहो नहि रहल गेलनि। तखन  पढ़ितहि छलाह। तथापि ओहो निवेदन कएलथिन - "ठीके... प्रोफेसर साहेब,  अपने की-कहाँ लिखने जा रहल छियैक ! बहुत अनुचित रहल छैक।"

तकर बाद तँ जेना प्रलय गेलनि 'व्यासजी लेल। हरिमोहन बाबूक आँखि लाल-लाल उठलनि। 'व्यासजी दिस आग्नेय नेत्र सँ ताकैत बजलाह - अहाँ विद्यार्थी छी....अहाँ की टुभ-टुभ बजैत छी..... अहाँ की बुझैत छिऐक..... अहाँ केँ कोन ज्ञान ?

'व्यासजी स्तब्ध रहि गेलाह। तत्काल तँ  कोनो उत्तर नहि सकलथिन। सोचलनि, "आब लेखनक माध्यमे हम हरिमोहन बाबू केँ उत्तर देबनि।तकर बाद 'व्यासजी एक आदर्श व्यक्तित्व केँ मुख्य पात्र बनाए उपान्यास लिखब आरम्भ कएलनि। इएह उपन्यास पछाति 'कुमारनाम सँ प्रकाशित भेलनि।

कुमार उपन्यास 'व्यासजी लिखलनि जखन  कुमारे छलाह। पाण्डुलिपि मुजफ्फरपुर मे मित्र उमानाथ बाबू केँ देने छलथिन। प्रूफ-आदि देखबाक भार हुनके उपर छलनि। तहिया उमानाथ बाबू मुजफ्फरपुर मे रहैत छलाह। छपबा मे बड़ समय लगलनि। बिआह  चतुर्थी आदिक बाद जखन 'व्यासजी मुजफ्फरपुर पहुँचलाह तँ पाँच-सात प्रति कुमारक छपल भेटलनि। कहबाक माने कुमार मे लिखल 'कुमारउपन्यासक प्रकाशन तखन भेलनि  जखन 'व्यासजी विवाहित गेल छलाह।

कुमार उपन्यास पर 'व्यासजीक समकालीन लेखक लोकनिक  बहुत नीक-नीक प्रतिक्रिया अएलनि।

सबसँ बेसी प्रशंसा कएलथिन 'सुमन'जी   कहलथिन - 'व्यास'जी अहाँ रुचिए बदलि देलियैक पाठकक... खाली विवाह ... द्विरागमन .... विवाह-द्विरागमन - इएह उपन्यासक विषय रहइक ... अपने मौलिक उपन्यास लिखल अछि  रमानाथ बाबूतंत्रनाथ बाबूसभक प्रशंसा भेटलनि। हरिमोहन बाबू सेहो पीठ ठोकलथिन। आशीर्वाद देलथिन।

'व्यासजीक वस्तुतआदर्शोन्मुखी विचारधाराक लोक छलाह। हुनकर लेखनी मे सेहो तकर झलक स्पष्ट देखल जा सकैछ। दुष्ट चरित्रक चित्रण करए नहि चाहैत छलाह 'व्यासजी। आदर्श चरित्र केँ 'हाइलाइटेडकरब हिनकर स्वभाव-अनुकूल लक्षण कहि सकैत छी। दुष्टहु लोकक चरित्र मे गुण देखाओकरा मानव बना दैत छलाह। कथानकक अनुरूपेँ कतहु-कतहु पुरुष चरित्र मे दूषणता भेटियो सकैएमुदा हिनका द्वारा चित्रित स्त्रीगण सर्वथा शुद्ध  निर्दुष्ट भेटतीह।  'व्यासजीक नीक लोक बला छवि जे छलनिआदर्श व्यक्तित्व बला छविसे हिनकर लेखनी पर सभदिन हावी रहलनि।  एकटा अकाट्य सत्य अछि।

समाज मे आदर्श स्थापित करबाक प्रयास हिनकर लेखनी मे यत्र-तत्र अभरत। ध्यान देबाक बात अछिजे सुधारवादी सन 'ऐटिट्यूडनहि देखाएत हिनकर लेखनी मेहँ...आदर्शवादी अवश्य देखाएत। चूँकि  स्वयं अपन व्यक्तिगत जीवन मे एकटा आदर्श पुत्रआदर्श अग्रजआदर्श पतिआदर्श पिता  कर्म-क्षेत्र मे आदर्श अभियन्ता बनि सभठाम आदर्श स्थापित करैत रहलाह। से हिनकर रचना मे जँ परिलक्षित जाइत अछितँ से कोनो आश्चर्यक गप्प नहि ने ?

 


संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1

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