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वि दे ह 

पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य    

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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विदेह नूतन अंक पद्य १

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह पथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१.अरुण लाल- ६ टा क्षणिका आ ३ टा कविता २. नन्द विलास रायक किछु कविता ३.संतोष कुमार राय 'बटोही'- दू टा कविता

अरुण लाल

६ टा क्षणिका आ ३ टा कविता

१.

हास 

ठमकि गेल छी

तहिये स' हमरा मन मे

अहाॅक उनमुक्त  हॅसी छल 

वा परिहास 

थाह कहाॅ लागल 

हम तं सूरदास , मन मे 

अंटबैत  रहलौं 

सुनैत रहलौं अहाॅ केर हास  .


 

२.

खास 

लोक  तं  सड़को पर

मरैत अछि  वा

स्वाभाविक मौत सेहो

मुदा ककरो मन मे 

पइस क' जे  मरैत अछि 

ओ  मौत ओकरा 

बनबैत छैक  खास .


 

३.

बात   


 

शब्द  ब्रह्म  होइत छै

जॅ निकलि गेल मूॅह स'

अनायास 

जॅ  सोचि -बिचारि क'

संधानि- तानि क'  बजलौं 

तं तीर जकाॅ चुभैत छैक

भ' जाइत छैक बात 

तेसर नयन 


 

क्यौ नञि अपन

बढि रहल सबतरि

अश्लीलताक प्रदशॅन

दिन दूगुना राति चौगुना

असहज सब घटना 

हे त्रिलोचन !

खोलू अपन तेसर नयन .


 उफाइंट


 

जिनगी जॅ भेल  उफाइंट

भांजब कतबो गोटी

नञि हएब लाल 

लागत  पवन्नी  

मन पर स हटाउ गदाॅ 

नञि त कोरैत रहू माइट


 

शूल


 

ककरो जिनगी 

मे शूलहि शूल

ककरो जीवन कते समतूल

ककरो ब हिस्से बराबर 

ककरो हिस्से बराबर

कविता

घर


 

घर त' सबदिन 

जाइत छलौं

हम ,

बस स उतरि

राति के बारहो बजे

निभीॅक भेल झटकि क'

एक पेरिया 

खुरपेरिया

बाट पकरने, पकरने

थाल कीच पिछ्छड़ मे

बरखा पानि बुन्नी के

सामना करैत 

टह टह रौद मे

घामे पसीने नहाइत

पूस माघक राति मे

सदीॅआयल ठिठुरैत

कनकनाइत 

अन्हरिया वा होइ

इजोरिया

मुदा एक राति 

ठकमुरिया लागि गेल

थकमका गेलौं ,

आब कत' जाऊ

कि बाजू

ककरा शोर करू

के सूनत

नदी के बेग मे

विलीन भ' गेल  घर

हमरा स कत्ते दूर 

भ' गेल घर,,,,,.


 

जीब लए छी हम

(ई रचना अपन छोटकी 

बेटी आभा  कें समपिॅत

केलहुं ।)

हंसैत हंसैत कले बले

जीब लए छी  हम

 

जीवन जं एक जहर छै

तं पीब लए छी हम


अहांक सतरंगी दुनियां

अहां  कें मुबारक बहुत

 

हमर फाटल जं चादरि

अपन सीब लए छी हम

 

खसा क' देखलौं बहुत 

कोनो छोड़लौं नै दाव


मुकाबिला केर शअख

एखनो रखने  छी  हम


प्रेम स्वगॅहु स' कम नै

करै छी अगर सांच मे


कहियो सोचब ई बात 

आई कहैत छी हम

 

हम  हंसी वा कानी

मतलव की अछि 

 

अरैज लए छी ओतबा

जतेक चाहैत छी हम


दोख हमरे गिनाबी

से कोनो बात ने


अहांक लचरल हंसी

पर हंसैत छी हम

प्रेमक बाट

 

प्रेम एकांत भेल 

चुपचाप गबदी मारने 

अपलक निहारैत मगन भेल कात

मिलिन्द माली के आहट मे , 

घुरिया  घुरिया

तकैत रहल बाट

कांट मे ओझरायल 

गुलाबक कली

मने मन प्रस्फुटित

होयबाक उमंग मे नाचि रहल

उझकि उझकि उठा 

रहल गरदनि

निहारि रहल अपन

सौंसे शुभ्र देह 

लोबान केर खूशबू

जेना पसरि गेल 

कली सब गमकि उठल 

अभिसारक आतुरता मे 

माली स' लगा रहल गुहारि ,  

मुदा, बसंत एखन कहाॅ आयल 

 -अरुण कुमार लाल दास, विद्यापतिनगर मधुबनी


नन्द विलास रायक

किछु कविता

इन्दिरा आवास

एक दिन मुखियाजीक चमचा एलैथ

ओ हमरासँ हाथ मिलौलैथ

हम हुनका कुर्सीपर बेसौलयैन

प्योर दुधक चाह पियौलयैन

खैनीमे चुन मिलेलौं

अपनो खेलौं हुनको खियेलौं

खैनी खा कऽ ओ बजला

अपना एबाक भेद खोलला।

 

बड्ड मोसकिलसँ मुखियाजीकेँ मनेलौं हेन

अहाँक नाओं हुनका डायरीमे लिखेलौं हेन

ओ कहाँ मानै छला

अहाँकेँ कहाँ जानै छला

जँ करेबाक हुअए काम

तँ जल्दी करू इन्तजाम

जुनि करू सोच-विचार

लाउ टका पॉंच हजार

नहि तँ दोसरो अछि तैयार 

मुदा अहाँ अपन छी खास 

अहाँपर अछि पूरा बिसवास

दियाएब अहाँकेँ इन्दिरा आवास

की यौ अहाँकेँ नहि लागल

हमर बात रास।

ऐ बकलेल बनि जाएत

मोफतमे अहाँकेँ मकान

भऽ जाएत धिया-पुताक कल्याण

समाजमे बढ़ि जाएत अहाँक मान

अहाँ बुझब एकरा अपन शान

जँ हमर गप्प अहाँकेँ कनीको पसीन अछि

तँ जल्दी करू भैया किएक तँ समये चन्द अछि।

नहि तँ बादमे बड्ड पचताएब

आ हमर दिमाग खाएब

मुदा हम की किछु कऽ सकब

अहाँकेँ की किछु दऽ सकब।

 

आखिर हम चमचाजीक बातमे एलौं

महाजन लक्ष्मी भैयाक ओइठाम गेलौं

हम केलिऐन हुनकासँ अर्ज

यौ महाजन दिअ हमरा पॉंच हजार टका कर्ज

लऽ लिअ कागजपर औंठा निशान

मुदा टाका करू जल्दी भुगतान।

 

महाजन लक्ष्मी भैया बजला-

ई लिअ रूपैआ करू अपन काम

समयेपर आपस करब

नहि तँ भऽ जाएत अहाँक महींस नीलाम।

 

हम देलिऐन चमचाजीकेँ टका पॉंच हजार

ओ मुस्की दैत भऽ गेला

फटफटियापर सवार

हम केतेको बेर ब्लॉकक चक्कर लगेलौं

मुदा आइ धरि इन्दिरा आवासक

राशि नहि पौलौं।

 

ब्लॉक दौड़ैत-दौड़ैत हमर चप्पल घिसल

ओमहर महाजनक टाका

आपस करबाक समय बीतल

हम चमचाजीसँ कहलयैन

अपना बोलीमे साए मन मिश्री घोरलयैन

यौ नेताजी, अन्नदाताबड़का बौआ 

कृपाकय आपस कऽ दिअ

हमर पॉंच हजार ढौआ

मुदा ओ करए लगला टाल-मटोल

किएक तँ हुनकर नेति छेलैन

करब पॉंच हजार टाका गोल

हम सोचलौं जे हमरा ठकलक

आ हमर महींस नीलाम करौलक

ओकरो बिगाड़ि दिऐन खेल

आ चमचाजीकेँ पहुँचए दिऐन जेल

मुदा हम ई काज नहि करि सकलौं

चमचाजीसँ लड़ाइ नहि लड़ि पेलौं

किएक तँ आजादीक आइ

72म बर्खक बादो हमरा

जकाँ गरीब असहाय अनाथ छै

जखन कि चमचाजीकेँ माथपर

एम.एल.ए; एम.पी.क हाथ छै

आखिर हमर महींस भऽ गेल नीलाम

नहि बनि सकल हमर मकान

बिगड़ल हमर सभ काम

दूध बेचि कऽ करै छेलौं गुजर

आब जीरी रोपैले

करै छी पंजाब प्रस्थान।q

 


 

 

 

मिथिलाधाम

जहाँ बहै कोसी, कमला, वागमती, वलान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन नहि आन यौ

छैन मण्डन, अयाचीक बड्ड नाम यौ

विद्यापति केर धाम यौ

पावण मिथिला धाम यौ।

 

जैठाम सीता सन भेली नारी

छला राजा जनक सदाचारी

आओर पाहुन छेलखिन श्री राम यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन नहि आन यौ

पावण मिथिलाधाम यौ...।

 

छैथ सखड़ामे माए सखेश्वरी

आओर ठाढ़ीमे परमेश्वरी

जैठाम बरहम बाबा विराजैथ गामे-गाम यौ

मिथिला सन नहि आन यौ

पावण मिथिलाधाम यौ...।

 

जैठाम आर्द्रा, चौठचन्द्र, जीतिया

भाए-बहिनक स्नेहक पाबैन अछि भातृ-द्वितीया

जैठाम कोजगराकेँ बड्ड नाम यौ

बॉंटैथ पान-मखान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन...। 

 

नेहरा, सरिसव आओर पोखरौनी

कोयलख, पिलखवाड़, मंगरौनी

ओइठाम पैघ-पैघ भेल विद्वान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन...।

 

जैठाम नामी माछ-मखान

आओर अछि फलक राजा आम

जैठाम जमाएकेँ बुझल जाइए भगवान यौ

आओर पाहुनकेँ भेटए सम्मान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिलासन...।

 

जैठाम कियो नहि भेटत लफंगा

सबसँ नीक शहर दरभंगा

ओइठाम पैघ-पैघ दोकान यौ

भेटत सभ समान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन...।

 

मिथिला पेटिंग मधुबनीकेँ दुनियाँमे बड्ड नाम छैक

खादी भण्डार मधुबनीकेँ भॉंति-भॉंतिक काम छैक

जैठाम मानव सेवा करब सभसँ बड़का काम यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

भेला ललित बाबू सन नेता

मिथिलाक सच्चा बेटा

विकासक खातिर देलखिन अपन प्राण यौ

मिथिला...।

 

मिथिला विभूति सूरज बाबू सन पैघ-पैघ भेला नेता

अजादीक लड़ाइ लड़बामे

रसिक, अनन्त, गुरमैता

देशकेँ अजाद करबामे

ऐ धरतीकेँ बड्ड योगदान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन...।

 

मिथिलाक कला, मिथिलाक साहित्य

मिथिला केर संस्कृति नीक

फूसि ने बाजब दान करब

ई मैथिलकेँ प्रवृति थिक

अन्न, वस्त्र वर्तनक संगे

करै छैथ लोक गोदान यौ

पावण मिथिलाधाम यौ

मिथिला सन...।

 

बड्ड मधुर अछि सुनब बाजबमे

मिथिलाक मैथिली भाषा

मिथिलाक विकास हुअए खूब

हमरो अछि अभिलाषा

मिथिलाक विकासक खातिर

हमहूँ देब योगदान यौ

पावण मिथिला धाम यौ

मण्डन अयाची केर छैन बड्ड नाम यौ

विद्यापतिक धाम यौ। q

 

 

 

जनता

अखन जनता सुतल अछि

मुदा ओ भूखल अछि

भूखलमे निन्नो

की होइ छइ

तँए ओ जागत

आ बाजत

बाजत अपन अवस्थापर

करत प्रहार

वर्त्तमान बेवस्थापर। q

 

ढौआ- 1

समयक संग लोकक

बदैल जाइत अछि

बेवहार

आन तँ आने छैथ

बदैल जाइ छैथ

अपनो रिश्तेदार।

यएह अर्थक युग छी

भाय यौ,

जँ ढौआ नै रहत

संगमे

तँ नहि चिन्हत

अपन जिगरी यार।

३.

संतोष कुमार राय 'बटोही'

दू टा कविता

 

1. गामक दुर्गा मंदिर

गामक लोकनि केँ सोच पर

हँसी आबि रहल अछि आइ

की उचित आओर की अनुचित हेतै

कियो नहि कहनिहार आब रहलै

सरिपहुँ सभ कियो मद्य पीने छथि

गाम मौगिया गेल छै


 

सभ किछु मे राजनीति 

नीक नहि होएत छै

श्रद्धा सँ पैघ 

किछु नहि होएत छै

पूजा केँ पूजा रहअ दियौ

फुसियौंह मे गामक बँटवारा

जुनि करू

गामक इज़्ज़त माटि मे 

नहि मिलबियौ बाबू-भैय्या


 

गामक संस्कृति केँ बँटनै

गामक आत्मा केँ हरण करनै जँका छै

इ ज़मीन किनकर छियैन्ह

जखन सभ कियो केँ टिकट कटले छन्हि

फसाद करनै कोनहु नीक गप नहि छियैए

सभ कियो इएह माएक संतान छी

माएक मंदिर जुनि बँटियौ।


2.गाम-घरुआ

गामक तीसी सेहो अमरित लगैत छै

नवका धानक चिउरा आओर गुँड़

मुनगा आओर बरहरक फूलक तरकारी

पोठी माछक संग मरुआक रोटी


 

बथुआ साग आओर मूरही

तुलसी-फूलक खीरक जवाब नहि

आउ भाई,मिल-बाँटि क' खाउ

जिनगी केर कोन ठिकान


 

सभ किछु सोहनगर छै

अपन महिंंषक दूध आओर घी

पोखरिक मखान

आम,जामुन,कटहर,गुल्लैर


 

सभ किछु अपन छी

जीभ सँ पानि टपकैत अछि

करब-त-करब की परदेश ओगरने छी

परञ्च हम सरिपहुँ गाम-घरुआ छी।

-संतोष कुमार राय 'बटोही', ग्राम-मंगरौना, पोस्ट-गोनौली, थाना-अंधराठाढ़ी, अनुमंडल-झंझारपुर, जिला-मधुबनी, बिहार-847401

 

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