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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

आशीष अनचिन्हारक प्रस्तुत आलेख विदेहक 150म अंक, 15 मार्च 2014मे प्रकाशित भेल छल मुदा वर्तमानमे ई आलेख बेसी प्रासंगिक भऽ गेल अछि। तँइ विदेहक पाठक लेल ई आलेख एक बेर फेर देल जा रहल अछि (सं.)--


आशीष अनचिन्हार

तीन टा बिंदु


 

भाषा केर मनोविज्ञान भाग-1


 

जखन केओ कहै छै जे "मैथिली मधुर भाषा थिक" तखन हमरा ओहिसँ बेसी बड़का गारि किछु नै बुझाइत अछि। कोनो भाषा मधुर वा खटगर वा नुनगर की तेलगर होइते नै छै। आ जँ मधुर होइ छै तँ किएक?

ऐ प्रश्नपर एबाक लेल बड़ साहस चाही।

मध्यकालीन मिथिला सामंती छल। सामंत बैसल की चमचा सभ घेरि अपन समस्या सुनबए लागैत छलाह। आ जखन केकरो अहाँ अपन समस्या सुनेबै वा की केकरो चमचइ करबै तखन भाषा तँ मधुर राखहे पड़त। हमरा जनैत मैथिली अहीठाम मधुर भाषा थिक। कारण मैथिल चमचइ कर'मे बहादुर होइ छथि। मधुर बोल तँ राखहे पड़तन्हि।


 

ठीक विपरीत मिथिलाक दलित ओ गैर-सवर्णक भाषामे चमचइ नै छै तँए ओहिमे टाँस बेसी बुझि पड़ै छै आ ब्राम्हण-कायस्थ सभ ओकरा रड़बोली कहै छथि।मुदा हमरा जनैत ई मात्र दृष्टिगत भेद अछि। जकरा अपन बाँहिपर विश्वास छै ओकर बोली ओ भाषामे टाँस रहबे करतै--जेना मिथिलाक दलित वर्गक मैथिली।आ जे चमचइमे लागल रहत तकर बोली ओ भाषामे मधुरता रहबे करतै--जेना मिथिलाक ब्राम्हण ओ कायस्थ वर्गक मैथिली।


 

भाषा केर मनोविज्ञान भाग-2


 

ई हम दू मिनट लेल मानि लै छी जे ब्राम्हण-कायस्थ महातेजस्वी होइ छथि तँ हुनके टा पुरस्कार भेटबाक चाही। मुदा की ब्राम्हण-कायस्थ दरभंगे-मधुबनी-सहरसामे छै वा मिथिला मने की दरभंगे-मधुबनी-सहरसा छै। ऐ समस्यापर जखन हम दृष्टिपात करै छी एना बुझाइए----


 

१) जेना-जेना दरभंगा-मधुबनी-सहरसाक क्षेत्र खत्म होइत जाइए तेना-तेना ब्राम्हण-कायस्थ ओ आन छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत जाइए (१००मे ९७टा केसमे)। चाहे ओ सीतामढ़ी हो की मुज्फफरपुर हो की पूर्णिया हो की भागलपुर हो की समस्तीपुर हो की बेगूसराय हो की चंपारणक किछु क्षेत्र (झारखंडक क्षेत्र बला लेल एहने बुझू, राजनैतिक बाध्यताकेँ देखैत नेपालीय मैथिलीक उल्लेख नै क' रहल छी)। 


 

२) जेना-जेना ब्राम्हण-कायस्थओ छोट जातिक भाषाक बीच अंतर खत्म होइत गेलै ब्राम्हणवादी सभ ओकरा मैथिली मानबासँ अस्वीकार क' देलक। ऐ कट्टर ब्राम्हणवादी सभहँक नजरिमे ई छलै जे भाषाक भेदसँ ब्राम्हण वा छोट जातिमे भेद छै। आजुक समयमे अंगिका ओ बज्जिका भाषाक जन्म ब्राम्हणवादक एही प्रवृतिसँ भेल अछि। किछु दिन पहिने नरेन्द्र मोदी द्वारा मुज्फफरपुरमे भोजपुरीमे भाषण देब एही ब्राम्हणवादक विरोध अछि आ हम एकर स्वागत करै छी तथा ओहि दिनक बाट जोहि रहल छी जहिया ओ दरभंगा-मधुबनीमे भोजपुरी बजता। जँ ठोस विचारक रूपमे आबी तँ निश्चित रूपें कहि सकै छी जे मैथिलीकेँ तोड़बामे ई ब्राम्हणवादी सभ १०० प्रतिशत भूमिका निमाहला। जँ कदाचित् ई ब्राम्हणवादी सभ दरभंगा-मधुबनी-सहरसासँ हटि क' सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ पुरस्कार देने रहितथि तँ कमसँ कम मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहैत। ई अकारण नै अछि जे रामदेव झा, चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आदि एहन महान ब्राम्हणवादीक कारणे दरभंगा रेडियो स्टेशनसँ बज्जिकामे कार्यक्रम शुरू भेल।


 

३) आ जँ मैथिली टुटबासँ बचि गेल रहितै तखन मिथिला राज्य लेल एतेक मेहनति नै कर' पड़ितै। कारण चंपारणसँ गोड्डा धरि सभ अपन भाषाकेँ मैथिली बुझितै। ऐ ठाम हम ई जोर द' क' कहब चाहब जे पुरान होथि की नव राज्य आंदोलनी सभ सेहो ब्राम्हणवादी छथि। अन्यथा ओ सभ सेहो रामदेव झा. चंद्रनाथ मिश्र अमर, सुरेश्वर झा आकी आन-आन मैथिली विघटनकारी सभहँक विरोध करतथि।


 

आखिर की कारण छै जे धनाकर ठाकुर अपन मानचित्रमे चंपारण वा गोड्डाकेँ तँ लै छथि मुदा ओहि क्षेत्रक साहित्यकार लेल पुरस्कारक माँग नै करै छथि। ई प्रश्न मात्र धनाकरे ठाकुरसँ नै आन सभ राज्य आंदोलनीसँ अछि।

ऐठाम ई बिसरि जाउ जे पुरस्कार कोनो छोट जातिकेँ देबाक छै। जँ ब्राम्हणे-कायस्थकेँ देबाक छल तखन फेर सीतामढ़ी, मुज्जफपरपुर, पूर्णिया, भागलपुरक,चंपारण, बेगूसराय आदिक ब्राम्हण-कायस्थकेँ किएक नै ?


 

तँ आब ई देखबाक अछि जे के-के मिथिला राज्य आंदोलनी ब्राम्हणवादी छथि आ के-के साँच मोनसँ मिथिला राज्यकेँ चाहै छथि।


 

भाषा केर मनोविज्ञान भाग-3


 

लोक जखने ब्राम्हणवादक नाम सुनै छथि हुनका बुझाइत छनि जे सभ ब्राम्हणकेँ कहल जाइत छै। मुदा हमरा लोकनि बहुत पहिनेसँ कहैत आबि रहल छी जे ब्राम्हण आ ब्राम्हणवादक कोनो सम्बन्ध नै। कोनो चमार सेहो ब्राम्हणवादी भ' सकै छथि। ब्राम्हणवाद जाति विशेष नै भेल ई मात्र मानसिकता भेल जे कोनो जातिमे भ' सकैए। ब्राम्हणवादक प्रमुख तत्व वा लक्षण एना अछि---


 

१) केकरो आगू नै बढ़' देब------ एकटा छलाह स्व. रमानाथ मिश्र "मिहिर"। ई नीक हास्य-व्यंग केर कविता लीखै छलाह। मुदा ई मैथिली साहित्यमे आगू नै बढ़ि सकला। कारण? कारण हिनक दोख छलनि जे ई चंद्रनाथ मिश्र " अमर" जीक भातिज छलखिन्ह। दालि आ देयाद जते गलत तते नीक। साहित्यक स्तरसँ ल' क' पारिवारिक स्तरपर रमानाथ मिश्रजीकेँ पददलित होम' पड़लनि।


 

ब्राम्हणवाद मात्र दलिते लेल नै छै। बहुत रास ब्राम्हण अपनो जाति केर लोककेँ आगू नै बढ़' दैत छै। 


 

२) मात्र अपने टाकेँ नीक बुझब--- जँ साहित्य अकादेमीक लिस्ट बला झा-झा सभ प्रतिभावान छथि तँ फेर मैथिली साहित्य विश्वक छोड़ू भारतीय साहित्य केर समकक्ष किएक नै अछि। आ जँ प्रतिभे छै तखन तँ श्री विलट पासवान "विहंगम" भारतीय राजनीतिसँ ल' क' मैथिली साहित्य धरि योगदान देने छथि। की विहंगम जी प्रतिभाहीन छथि। विहंगम जी सन-सन आर बहुत बेसी नाम अछि।


 

३) परिवारवाद---- रामदेव झा जखन रिटायर भेलाह तँ साहित्य अकादेमीमे ओ अपन ससुर चंद्रनाथ मिश्र अमरकेँ बैसा देलाह। तकर बाद अमर जी अपन समधि विद्यानाथ झा विदितकेँ बैसेलाह। आब विदितजीक निकट संबंधी (चेलाइन) छथि।


 

कारण-- ब्राम्हणवादक एकमात्र कारण हीन भावना अछि।

 

रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।