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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

१.मिथिलेश कुमार सिन्हा- "चुप्पी" (बीहनि कथा) २.प्रणव झा- एकटा संस्मरण आ एकटा खिस्सा

मिथिलेश कुमार सिन्हा

"चुप्पी" (बीहनि कथा)

ओ'अपन बहिन'क ओत' आएल छलीह. हमर घर आ ओकर बहिन'क सासुर एकहि ठाम अगल-बगल मे छल. हम स्नातक'क फाईनल परीक्षा द' गाम आएल छलहुँ. हमर खान-पीन ओकरे बहनोई , जे हमर जिगरी दोस्त छैथि, हुनके ओहिठाम होईत छल. दोस'क साढि, तं स्वाभाविके छै....किछु हंसी-मजाक होइते छलै.
'ओ' लगभग मास दिन रहलीह..कहिया हमरा दुनू केर बीच प्रेम'क बीज अंकुरित भेल, नहि कही ? समय बीतलोपरान्त ओकर जेठ भाय ओकरा ल' जबाक वास्ते आवि गेलैथ. मोन भकदन क' गेल....

हमहुँ कहलहुँ जे हमरो दडिभंगा तक जेबाक अहि चलू हम ओत' धरि साथ रहब, किछु काज अहि क' वापस आबि जाएब !
बस सं विदा भेलहुँ. किछु आगू चलि क' एकटा चौक पर बस'क डरेभर,कंडक्टर, खलासी आ आन यात्री सभ चाय-नाश्ता कर' लेल उतरि गेलाह संगहि ओकर भाय सेहो उतरि गेलाह.
हम बसे मे....
किछु क्षण मौन रहलाक उपरांत हम ओकर सीट लग आवि पुछलिये :
"की, चलिए जेबै ?"'
ओ' मौन....
"हम मोन आएब की नहि ?"
फेनो चुप.....
ओ' हमरा दीस नोर सं भरल आँखि सं देखलिह....
ओहि काल हमरा दुनू के कोनो होश नहि छल की केओ आनो देख-सुनि रहल छै....ओ सभ की सोंचैत हेतैक ?
प्रेम'क आवेग मे मोन आंधर भ'जाएत छै ने ! सैह आब बूझि पड़ल.
"आब कहिया भेंट हाएत ?"
ओकर आंखि टूभ-टूभ लाल....ओढनी सं आंखि'क पोर पोछैत एतवे बजलिह,
"जे मोन होइए, भैया सं कहि दियौ ने...?"
ताबैं बस'क खलासी सभ यात्री कें बस मे बैस' लेल हल्ला कर' लागल. हमर मोन'क बात मोने रहि गेल, किछु बाजि नहि पौलहुं.....

पन्द्रह'म वर्ष'क उपरांत, हमरा एक विवाह समारोह मे शामिल होव' केर मौका भेंटल. एकसरे छलहुँ. मोन भेल किछु पानीपूड़ी'क आनंद ली. बढि गेलहुं ओहि काउंटर लग.
भीड़ मे घूसू कोना...? 'गर खोजैते रही कि आवाज आएल,
"की हाल,कखन औलहुं ?"
चौंकि पुछलियैह "के...?"
"हम.... हमहूं त' अहां के नहि चिन्हलहुं, उ त' भौजी कहलथिन्ह कि अंही छियै ! इ दाढी मे चिनहिये मे ने अबैत छी.... एहि मे अखैन धरि स्मार्ट
लागैत छी !" एक्के सांस मे बाजि गेलीह.
"ओहहो अहां....
हमहूं नहि चिन्ह  पौवलहुं, आब त' अहूं मे परिवर्तन आबि गेलैए....''

हम बजलियै. "मोन छी ने ?" ओ' पुछलकै.
"एह.... एहो विसर' वाला छै ?"
"हां, अपनेक ओ बस'क चुप्पी आई धरि मोन मे सूईया सन चूभि रहल यै...."
"अहां अपन वियाह सं खुश छी ने ?" हम एहि मुद्दा सं फराक होम' लेल पुछलियैह.

"हां,तन सं तं खुब्भे, मोन सं त' नहिए ने ....!"
बाजि, अपन नोर पोछैत
फुर्र भ' गेलिह.
मोन में हथौड़ा'क चोट सन लागल....
कंठ सूख' लागल....
पानि पर पानि गटागट पीवोपरांत मोन शांत नहि भेल. वापस होटल मे आबि, विस्तरा पर धम्म सं खसि पडलहुं. नीन जेना बिला गेलैए टुकुर-टुकर नचैत पंखा कें निर्विकारें घुरि रहल छी.

प्रणव झा

एकटा संस्मरण आ एकटा खिस्सा

राजा खानदान (संस्मरण)

 

बात आठ नौ बरष पहिने के अछि । एक बेर हम अपन पिसियौत भैया-भौजी संगे दरिभंगा घुमय के योजना बनेलौं। भोरगरे उठि क नहा-सोना कऽ तीनु गोटे टेंपू से दरिभंगा के लेल बिदा भ गेलहुं। ओतय पहुंचि क सर्वप्रथम श्यामा माई के दर्शन केलहुं । श्रद्धालु हमर आ गृहणी भौजी के मोन दर्शन में भाव विभोर भ रहल छल, मुदा कामरेड भैया के ओहि दर्शन में दार्शनिक तेज प्रज्वलित भ गेल छलैन। ओतय से निकलला पर बाट में ओ बजलाह जे ईह, ऐ मंदिर प्रांगण के वातावरण बड्ड पवित्र अछि मुदा बुजह जे इहो जे छह से सामंतवादऽक प्रतीक छह। हम पुछलियैन जे से कोना यौ भायजी?

भायजी बजलाह जे देखह ई मंदिर जे अछि से महराज रामेश्वर सिंहऽक चिता पर बनायल गेल अछि। “हमर चितो पर लोक पूजा अर्चना करय” ई सामंती सोच नै अछि त की अछि?

हम बजलहुं जे ईह! अहुं भायजी कहां के लिक कहां भिडा दैत छी। ऐ पर भायजी बजलाह हौ हम ठीके कहैत छियह। एतबे में भौजी प्रांगण के सभटा छोट-नमहर मंदिर, गाछ-वृक्ष आदि के पूजा क के आबि गेलिह आ बजलिह जे आब चलै चलू आगा। हमरा श्यामा माई के प्रसाद ’लड्डू’ बड्ड पसिन्द छल हम बजलहुं जे भौजी प्रसाद त द दिय ने। तै पर ओ बजलिह जे एह एतेक दूर सपैर कऽ एलहुं अछि त सभटा मंदीर में पूजा-पाठ केला के बादे खायब। ऐ पर हम की बजितहुं जे आधाटा लड्डू त हम पंडितजी से मांगि क पहिनेहे खा नेने छी! चुपे रहय में भलाई बुझलहुं आ सभ गोटे आगा बढि गेलहुं । आगा मनोकामना मंदिर में पूजा करैत, लक्ष्मिश्वर निवास(संस्कृत विश्वविद्यालय), नरगौना पैलेस, मिथिला विश्वविद्यालय के कैंपस घुमैत, फ़ोटो खिंचबैत दरभंगा महराजऽक किला पहुंचलहुं जहां से आगा बढैत कंकाली मंदिर प्रांगण में जा पहुंचलहुं ।

ओतय श्यामा माई मंदिर प्रांगण सन चहल पहल नै छल, मुदा वातावरण ओतुको दिव्य बुझना गेल छल। एकटा छोट-छिन दोकान पर दू टा छैंडा प्रसाद बेच रहल छल । प्रसाद किनला के बाद मंदिर में ढुकलहुं त देखल जे मंदिर में त केयौ अछिए नै। तखने हमर नजैर एकटा पुरूष पर पडल, जिनकर उमैर गोटैक पचपन बरख हेतैन । गंजी-धोती पहिरने, माथ पर चानन ठोप, गौर वर्ण पर आर शोभा बढा रहल छलैन। गंजी-धोती कतौ-कतौ खोंचायल सन छल मुदा उज्जर बग-बग छल। हम पुछलियैन जे की यौ महराज अहिं पंडित जी छी ? ओ बजलाह जे छी त हमहुं पंडिते मुदा ऐ मंदिर के पुजारी नै छी । हम अपस्यांत हौइत बजलहुं जे की भ गेलै त। छी त अहां पंडिते ने से कनि हमरा सब के प्रसाद चढाब के अछि से अहां चढा ने दियौ।

ऐ पर ओ बजलाह जे बौआ चढा त हमहुं सकै छी मुदा “ककरो हक नै मारबाऽक चाही”। हमहुं राजे खानदान के छी, ऐ मंदिर के सेवा करैत एलहुं अछि। अहां सब पांच मिनट बैसै जाउ पुजारी जी आबि जेताह ।

बैसे के त पड.बे करितै, हम सब बैसियो गेलहुं, मुदा आसू भायजी त विशुद्ध पंचोभिया ब्राम्हण छलाह, गोटगर टीक-ठोप बला। ओ ओय ब्राम्हणदेव से शास्त्रार्थऽक मुद्रा में बजलाह जे औ जी अहां कोन राजा खानदानऽक छी । औइनवारि वंश के छि आ की खंडवाला वंश के छी। ओ बजलाह जे हम राजा महेश ठाकुरऽक वंशज छी। मुदा आसू भायजी एतबे से कहां मानय बला छलाह। ओ यक्ष जेना सवाल पर सवाल करैत गेलाह आ ओ ब्राम्हणदेव युधिष्ठिर जेना सभटा सवालऽक यथोचित जवाब दैत गेलाह। ऐ तरहे लगभग आधा-पौन घंटा बीत गेल छल। अंततोगत्वा आसू भायजी हुनका से बजलाह जे अच्छा चलू राजा महेश ठाकुरऽक खानदान के वंशावली बताउ त। ओ पंडितजी, रटाओल सुग्गा जेना धुरझार बाजय लगलाह राजा महेश ठाकुर, राजा गोपाल ठाकुर, राजा परमानंद ठाकुर, राजा सुभंकर ठाकुर, राजा पुरषोत्तम ठाकुर, नारायण ठाकुर, सुन्दर ठाकुर, महिनाथ ठाकुर, निरपत ठाकुर, रघु सिंह, बिष्णु सिंह, नरेन्द्र सिंह, प्रताप सिंह, माधो सिंह, छत्र सिंह बहादुर, रुद्र सिंह बहादुर, महेश्वर सिंह बहादुर, लक्षमेश्वर सिंह बहादुर, रामेश्वर सिंह, कामेश्वर सिंह................एक स्वरे ई नाम-पाठ सुनि क हमरा नजैर के सामने ओ वंशव×क्षऽक चित्र नाचै लागल जे हम दरिभंगा के म्युजियम में एकबेर देखने रहि।

ऐ उत्तर के सुनला के बाद आसू भायजी ठीक ओहिना आस्वस्त भेलाह जेना अर्जुन के द्वारा अपन दसो टा नाम बतौला पर ’उत्तर’ विश्वस्त भेल छलाह जे किन्नर वेशधारी हुनकर सारथी आन केयौ ने ’अर्जुने’ थिकाह।

एही बीच में घंटी डोलबैत संठी सन कायाबला पुजारीजी सेहो आबि गेल छलाह। हम सब भगवती के दर्शन केलहुं, भौजी पूजा केलिह आ पुजारीजी प्रसाद चढौलाह, दान-दक्षिणा दैत हम सब ओत से विदा भेलहुं आ कि पाछां से ओ ब्रामणश्रेष्ठ टोकलाह जे “हे बाउ, हमरो किछु देने जाउ, दू दिन से हम भोजन नै केलहुं अछि”।

ऐ पर हम कनि विस्मयित भेल छलहुं। ता भौजी प्रसाद बला डिब्बा से ४ टा लड्डू निकालि क हुनका हाथ में थम्हा देलखिन आ हमहु अपन पर्स से एकटा दसटकिया निकालि कऽ हुनका हाथ के थम्हा देलियैन। ऐ के बाद ओ हमरा सब के खूब रास आशीर्वाद दैत विदा केलाह। ओतय से विदा होइत हमरा मोन मे दू टा बात गूंज लागल छल – “हमहु राजे खानदान के छी”, “ककरो हक नै मार्ऽ के चाही” ।

फेसबुक केsर चक्कर (मैथिली खिस्सा)

कुशल जी, नोयडा के एकटा बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर छलाह। जहिना नाम कुशल तहिना ओ अपन पेशा आ बेक्तिगत जिनगी के सब कार्य में कुशल छलाह। समाजिकता सेहो छलैन्ह आ समाज सं जुडल रह के शौख सेहो। महानगरिय जिनगी के एकटा साईड इफ़ेक्ट इ अछि जे एतुका जिनगी के भागाभागी में अहां नहियो चाहैत समाज से कटि जायत छि!

आधुनिक काल में मनुक्खक जिनगीशैली मे तकनिकि के बड्ड योगदान अछि। एहि क्रम में तकनिकि, भागादौरी में व्यस्त मनुख के समाज सं जोडै में सेहो मददगार साबित भऽ रहल अछि । जतय एक तरफ़ नेता से लऽ के अभिनेता सब भरि दिन ट्वीटर पर टिटियाइत रहै अछि ओतै आनो आन लोक सभ फ़ेसबुक आ व्हाट्सएप के मदैद स̐ अपन बिछुडल समाज-समांग आ संगी सब स̐ जुडल रह के नया प्रयोग में लागल छैथ। एहन लोक में कुशलजी के नाम अग्रणी श्रेणी मे राखल जा सकै अछि कियेक त हुनका फ़ेसबुकिया कीडा় खुब कटलकैन अछि। दिन भरि में देखल जाय त २४ घंटा में ओ १८ घंटा त निश्चिते फ़ेसबुक पर ओनलाईन भेट जेताह। नाना प्रकार के पोस्ट करैत रहताह – राजनीति स̐ ल के समाज तक आ फ़ूल-पत्ति से ल के जंगल-झाड तक । हुनका अंदर दिनोदिन ई फ़ेसबुकिया कीडा के संक्रमण बढैत जा रहल छलैन्ह जेकर परिणाम ई भेल छल जे हुनकर कनिया̐ के आब ई आदैत से किछु असोकर्ज जेना होमय लागल छल । दोसर गप्प जे ई किछु समाजिक आ क्षेत्रिय समस्या पर सेहो अपन प्रतिक्रिया ठांय पर ठांय दैत छलाह, जे किछु गोटे के अनसोहा̐त बुझना जाय छल। ऐ बातक शिकायत सेहो इनबोक्स में खूब भेटय छलैन्ह । चलु जे से मुदा दोसर गप्प के गैण बुझि पहिल गप्प के प्रमुख मानल जाय।

अहिना एक दिन घर में ऐ फ़ेसबुकिया रोग के ल के खुब महाभारत मचल। कनिया̐ हिनका खुब सुनौली। विवाह स ल के आई धरि के जतेक उपराग छल सभटा मोन पारि पारि के ओय सभसं कनिया̐ हिनका पुन: अलंक्रित केलिह।

उपरागक एहन दमसगर डोज स̐ कुशलजी के मोन अजीर्णता के शिकार भ गेल। हुनका अतेक रास गप्प पचलैन नै। ओ अपन मोबाईल में से फ़ेसबुक के अनइंस्टल करै के कठोर फ़ैसला लेलाह। हुनका लेल ई फ़ैसला लेनाई नोटबंदी के फ़ैसला से कम कठोर नै छल मुदा जेना सरकार के नोटबंदी में देश कऽ हित बुझना गेल छल तहिना हिनको अखुनका परिस्थिति में फ़ेसबुक बंदी में अपन हित बुझना गेल छल । तथापि फ़ेसबुकिया कीडा় के असर अतेक जल्दि कोना जा सकै छल से ओ फ़टाफ़ट अपन मोबाईल निकाललाह आ लगलाह अपन फ़ेसबुक स्टेसस अपडेट में – "पब्लिकक भारी डिमांड पर हम काल्हि सौं फ़ेसबुक छोडि रहल छी, ताहि लेल जिनका जे किछु कहबा-सुनबा के होइन से आई अधरतिया धरि कहि सकै छी ! "

तकरा बाद त अधरतिया तक पोस्टऽक जेना ’बाढि’ आबि गेल होय। आ तहिना ’गिदरऽक हुआ-हुआ’ जेना ओय पोस्ट सभ पर कमेंटऽक हुलकार होमय लागल छल। जौं जौं समय बितल जाय छल कुशल जी के मोन कोना दैन करय लागल छल । मुदा एहि बेर फ़ेसबुक बंद करय के प्रण ओ कदाचित भीष्म पितामह के साक्षी मानि के लेने छलाह आ कि कनिया̐ के शब्द वाण हुनका तहिना घायल केने छलैन जेना अर्जुन के वाण कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह के । परिणाम ई भेल जे अंतत: ओ फ़ेसबुक बंद क देलाह।

मुदा ककरो एने-गेने की जिनगी क चक्र रूकल अछि! एहिना फ़ेसबुको के चक्र हिनका अनुपस्थितियों में अपन गति से चलिते रहल। यद्यपि किछु निकटवर्ती सर-समांग सब से वाया व्हाट्सएप विमर्श क सिलसिला चालुए छल। ऐ घटना के किछु दिन बितल हैत की एक दिन कुशलजी के एकटा फ़ोन आयल।  ’हेल्लो!’

"हें..हें…हें…मनेजर साहब यौ….नमस्कार"

"नमस्कार। अहां के?" प्रतिउत्तर में कुशल जी बजलाह।

" हें..हें…हें…नै चिन्हलौं? आह! चिन्ह्बो कोना के करब, पहिने कतौ भेंट भेल हैब तखन की ने। हम अहांक फ़ेसबंधु छी। नाम अछि पुष्पेन्द्रनाथ चौधरी। पुष्पेन्द्रनाथक अर्थ भेल पुष्प क राजा अर्थात कमल आ हुनकर नाथ अर्थात कमलपति भगवान विष्णु । हें..हें…हें…" अपन साहित्यिक परिचय दैत ओ फ़ेर स̐ बलह̐सी ह̐सय लगलाह ।

कुशलजी किछु याद करबाक चेष्टा करैत फ़ेर बजलाह "ओह। अच्छा। कहु की समाचार।"

हें..हें…हें… हमहु अत्तै सोनीपत में रहै छी। अहा̐क फ़ेसबुक पोस्ट सब स̐ बहुत प्रभावित छी। समाज में अहा̐ सन लोक सब के बड्ड आवश्यकता अछि। अतएव अहा̐के फ़ेसबुक छोडला से हम बहुत दुखित छी। अहा̐ के अंतिम पोस्ट सब हम देखने छलहु̐ । हम जनैत छी जे अहा̐क बात सब किछु गोटे के लोंगिया मिर्चाई सन लगै छलैन । आ एहने लोक सब के धमकी के कारणे अहा̐ फ़ेसबुक छोडलहु̐ अछि। मुदा जहिया तक हमरा सन लोक जीवित अछि अहा̐ के डराय के कोनो आवश्यकता नै अछि। एहि संबंध में हम अहा̐ से भेंट क के विमर्श करै चाहै छि। बड्ड तिकरम से अहा̐ के नंबर उपलब्ध भेल अछि। आई हम नोयडा आबि रहल छि आ अहा̐ से भेंट करै के अभिलाषी छी ।"

"मुदा हम आफ़िस क काज में कनि व्यस्त छी" कुशल जी बजलाह

"आहि आहि आहि। बस किछु मिनट के भेंट चाहै छी। हम बस एक घंटा में पहु̐च रहल छी।" ई बजैत उत्तर के प्रतिक्षा केने बिना ओम्हर से फ़ोन राखि देल गेल ।

फ़ोन राखि के कुशलजी पुन: अपन कार्य में व्यस्त भ गेलाह। करीब डेढ घंटा के बाद रिसेप्शन से फ़ोन आयल "सर कोई पुष्पेंद्रनाथ चौधरी आपसे मिलने आए हैं ।"

"ठीक है भेज दो" कहि कुशलजी फ़ेर अपन काज में व्यस्त भ गेल छलाह।

दू मिनट बाद अर्दली एकटा थुलथुल काय व्यक्ति के संग नेने हाजिर भेल। उजरा धोती, ताहि पर से घाम में लभरायल सिल्क के कुर्ता, लंबा टा चानन केने ई व्यक्तित्व भीडो में आराम स̐ चिन्ह में आबि सकै छैथ से इ कियौ मैथिल थिकाह।

"आउ बैसु" अतिथि के स्वागत करैत कुशलजी बजलाह।

आह मैनेजर साहेब आइ अहा̐ स भेट भेने हमर जिनगी धन्य भ गेल। कहिया से नियारने छलहु̐, आइ जा के अहा̐ पकड় में एलहु̐ अछि। अच्छा से सब जाय दिय, पहिने ई बताउ जे अहा̐ फ़ेसबुक किये छोडलहु̐ अछि? अहा̐के भाषा बचाउ आन्दोलन बला किछ कहलक अछि आ कि शिथिला राज्य बला धमकेलक अछि, आ कि शिथिला हुरदंगिया सेना बला सब घुरकेलक अछि? अहा̐ बस एक बेर ना̐ लिय बा̐कि हम देख लेब। हम सभटा बुझै छि एकर सब के खेल-बेल। यौ महराज हमहु̐ बीस बरख स̐ एम्हरे रहै छी आ दिल्ली के गोट-गोट कालोनी सब जै में मैथिल-बिहारी सब बसल अछि,में पैठ बनौने छि। इलाका के छा̐टल बदमाश सब हमरा ना̐ से धोती…धोती त खैर पहिरैत नै जाय अछी धरि पैजामा में लघी क दैत अछि। एहि प्रकारे चौधरी जी आधा-पौना घंटा तक खूब हवा-बिहारि देलखिन ।

जखन हवा-बिहारि के क्रम किछु रुकले तखन गप्पक दिशा मोड़ैत चौधरीजी बजलाह: “हें..हें…हें… अहां भोजन त कैये नेने हैबैक?”

आब चरबजिया बेरा में एहन प्रश्न के की उत्तर देल जाय! अस्तु कुशलजी एहि प्रश्नक उत्तर एकटा प्रश्ने से देलाह "कि अहां भोजन नै केने छी की?"

"आह। हम त घरे सं भोजन क के विदा भेल रही। आब त जे हतै से नस्ते-पानी हेतै की। हमर घरनी त जलखै संगे बांन्है छलखिन । मुदा हम मना करैत कहलियैन जे मनेजर साहेब बिना नस्ता करेने मानथिन्ह थोरेक ने। से अनेरहे हमरा ई सब फ़ेर घुरा क नेने आबय परत।"

चौधरी जी के आशय बुझ में कुशलजी के कोनो भांगट नै रहैन। तथापि ओ मोने मोन किछ राहत अनुभव करैत सोचय लगलाह जे हाथ एहिना टाईट अछि, एहन में यदि जलखै भरि कराक हिनका स̐ पिंड छूटै त सौदा महरग नै अछि।

एहि निर्णय पर पहु̐चैत ओ चौधरीजी से बजलाह। जे चलु तखन किछु जलपाने क लेल जाय। हुनका संग नेने कुशलजी बगल क एकटा रेस्टोरेंट में पहु̐चलाह।

ओतय बैरा के बजाय ओकरा दू टा सिंहारा, दू टा लालमोहन आ दू टा चाह क आर्डर दैते छलाह आ की चौधरी जी बीच में कूदैत बजलाह " इह! एकटा जमाना छल जे एक प्लेट सिंहारा माने दू टा सिंहारा बुझल जाय छल। आ ताहि पर से उप्पर से परसन जतेक लेल जाए तकर हिसाब नै। आ आब त एकटा सिंहारा के फ़ैशल आयल अछि। जे कहु, हमरा सन लोक के त एकटा सिंहारा से मोन छुछुआएले रहि जाय अछि। आ लालमोहन के की पुछल जाए। बरियाति सब में त गिनती के कोनो हिसाबे नै रहै छल। खौकार सब के बाजी लागय त सै, डेढ सै, दू सै टिका दैत छल। मुदा आबक जुग के की कही!"

ई बजैत ओ बैरा के चारि टा सिंहारा, २० टा लालमोहन आ दू कप चाह क आर्डर क देलखिन, आ व्यापार कुशल बैरा सेहो कुशलजी द्वारा कोनो संशोधन के इंतजार केने बिना आर्डर ल के निकलि गेल। पा̐च मिनट बाद हिनकर सभक मेज पर सिंहारा आ लालमोहन के पथार लागि गेल छल।

कुशल जी नहु नहु चम्मच काँटा स तोरि तोरि सिन्हारा आ लालमोहन खाय लगलाह आ ओम्हर कुशलजी बुलेट क गति से सिन्हारा आ लालमोहन के सद्गति देबय लगलाह। जा कुशलजी संग दैत २ टा सिन्हारा आ  २ टा लालमोहन खेलथिन्ह टा बचलाहा सबटा माल चौधरीजी के पेट में अपन जगह पाबि गेल छल। चाह क अंतिम चुस्की लैत चौधरीजी बजलाह "ईह! इ नास्ता की भेल बुझू जे भोजन भ गेल।"

"बेस तखन आज्ञा देल जाउ।" बैरा के बिल के बदला में पांच सौ के नोट पकराबैत कुशल जी बजलाह।

"हें.. हें ..हें ... हें आब त अपने घरे निकलबै की ने। हम सोचै छलहुँ जे एतेक दूर आयल छी आ आई संजोग बनल अछि त भौजियो से एकरत्ती भेंट भैये जैतै त ...हें.. हें ..हें ... हें।" इ बजैत चौधरीजी फेर सं बलहँसी हँसय लगलाह। आब ऐ ढिठाई पर कुशलजी की कहि सकै छलाह! तिरहुत्ताम के रक्ष रखैत मौन स्वीकृत्ति दैत चौधरी जी के संग क लेलैथ आ गाड़ी में बैस घरक बाट धेलाह।

घर पहुंचला पर चौधरीजी कुशलजी के कनियाँ 'चँदा दाई'  आ बुतरू सब के बीच रैम गेलाह आ तुरत्ते हुनका बीच में अपन वाक्-कुशलता के धाक जमा देलखिन।

गप्प-सप्प  एम्हर आम्हार से होयत माँछ क गप्प पर पहुँचल। चौधरीजी बजलाह "ईह! अहाँक  बगले में त छलेरा गाँव में बड़का मछहट्टा लगै अछि. बड़का-बड़का जिबैत रहु भेटै छै. चलु घुरि क अबैछि।" ई बजैत ओ कुशल जी के हाथ धेने बाहर जाय के उपक्रम करय लगलाह।

आब आगाँ के खिस्सा अहाँ अपनहुँ सोची सकै छि। अस्तु रात्रि पहर दिवगर माँछ-भात-दही-पापड के भोजन भेलै। भोरे कुशलजी के छए बजे से एकटा मीटिंग छल बिदेशी क्लाइंट संगे वीडियो कांफ्रेंसिंग पर। ओ पँचबज्जी भोरे ऑफिस निकली गेलाह आ एम्हर चौधरी जी आठ बजे तक चद्दर तानि क फोंफ कटैत रहलाह।

उठला पर चाह-चुक्का संगे फेर सं दमसगर नस्तो भेलै। चलै काल ओ कुशलजी के कनियाँ के कल जोरि के क्षमायाचना के भांगट पसारैत बजलाह "हें ..हें...हें... भौजी तखन आब आज्ञा देल जाउ। हमारा कारणे जे अहाँ सब के कष्ट भेल होयत तकरा लेल क्षमाप्रार्थी छि हें ..हें...हें..."

"नै नै ऐ में कष्ट के कोन गप्प छै। अतिथि सत्कार त हमर सबहक परम कर्तव्य थीक" ई बाजि चँदा दाई हिनका जेबाक आशा में केबार लग ठाढ़ भ गेल छलीह मुदा चौधरीजी एक बेर फेर किछु संकोच करैत आ बलहँसी हँसैत बजलाह "हें ..हें...हें...जै काज से नोयडा आयल रही तै में किछु पाई के खगता भ गेल। मैनेजर साहब अपनहि रहितैथ तखन त किछु बाते नै रहितै जतेक कहतियन पुराइये दितथिन मुदा ओ त भोरे भोर मीटिंग के लेल निकली गेल छैथ। से दूओ हजार टका जौं भ जैतै त ...."

चँदा दाई किछु धकमकाइत चौधरी जी के हाथ में एकटा दू हजरिया के नोट थम्हा देलीह।

सांझ में कुशलजी जखन आफिस से घुरलाह त चँदा दाई हिनका हाथ से मोबाइल छीन किछ करै लगलीह। कुशलजी के भेलैन जे हौब्बा! आब कोन काण्ड भ गेलै। कनिके काल में कनियाँ हिनका हाथ में मोबाइल दैत बजलीह "लिय अहाँक मोबाइल में फेसबुक इंस्टॉल क देलौं अछि ... आब अहि पर करैत रहु शोशल नेटवर्किंग।"

इति श्री !

 

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