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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२०००-२०२२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

कल्पना झा, पटना

इएह गूड़ खेने,कान छेदौने

विदेहक सम्पादक द्वारा जखन केदारनाथ चौधरी विशेषांक निकालबाक घोषणा भेल तखन जिज्ञासा भेल जे आखिर ई कोन महान साहित्यकार छथि जनिका उपर विशेषांक निकालि रहल अछि विदेह। जिज्ञासा शान्त करबा लेल जखन हिनकर पोथी सभ पढ़ब शुरू केलहुँ तँ एकक बाद एक लगातार चमेलीरानी,करार,माहुर आ अबारा नहितन, चारि गोट उपन्यास पढ़ि गेलहुँ। पोथी सभ पढ़ि एक टा अपराध बोध सन लागए लागल,एहन  उत्कृष्ट रचना सभक रचनाकारक नामसँ हम एखन धरि अनभिज्ञ छलहुँ,ताहि लेल। जखन कि 'ममता गाबए गीत' सिनेमा जकर निर्माणक कथा अछि "अबारा नहितन" से देखने छलहुँ अस्सीक दशकमे,प्रायः १९८३वा १९८४मे। मुदा निर्माताक नामसँ अनभिज्ञ छलहुँ। दस-बारह बरखक बएसमे ओतबा उहि नहि रहैत छै लोककेँ जे सिनेमाक निर्माता-निर्देशकक जनतब भेटैक। ताहि दिन परदाक पाछाँक लोक ततेक चर्चामे रहितो नहि छल।

एहन रोचक उपन्यास सभक रचयिताक नाम पर्यन्त नहि सुनल छल हमरा,जखन कि हम अपनाकेँ साहित्य प्रेमी लोक बुझैत रहल छलहुँ,नहि जानि कोना,किएक?

मैथिली साहित्य माने महाकवि  विद्यापति, हरिमोहन झा, यात्रीजी,मधुप जी,किरण जी,उपेन्द्रनाथ झा'व्यास'जी,लिली रे, प्रभास कुमार चौधरी,राजकमल,ललित,एतबे सुनल/बूझल छल। माने किछु साहित्य अकादमी विजेता साहित्यकारक नामसँ आ हुनकर कृत्य सभसँ अवगत छलहुँ,बस। केहन कूपमंडूकता छल,आब सोशलमीडियाक कृपासँ घर बैसल दुनिआँ देखि/सुनि रहल छी,तेहेन सन लागैए।निश्चित रूपसँ इंटरनेट एक अत्यन्त उपयोगी आविष्कार अछि विज्ञानक।

केदारनाथ चौधरी जीकेँ मैट्रिकसँ एम ए धरिक अध्ययन कालमे जे मैथिली प्रेम रोग लगलनि, हुनक ओहि मैथिली प्रेम रोगकेँ जँ मैथिल समाजसँ समुचित सहयोग भेटितनि,उत्साहवर्धन कएनिहार लोक भेटितनि तँ मैथिल समाज, मैथिली भाषाक कतेक उत्थान भेल रहैत। मुदा मैथिल समाजक असहयोगी प्रवृत्तिक कारणेँ एक टा प्रतिभासंपन्न व्यक्तित्व 'हिडेन कॉटेज'क सीमारेखामे सीमित भ' ' रहि गेलाह। हुनक व्यथित मोन मैथिल लोक आ मैथिल समाजसँ विरक्त सन भए गेल हेतनि,तेहेन सन लागैत अछि।ओ मैथिली प्रेमी तन मन धन लगा देलनि मैथिली सिनेमा "ममता गाबए गीत"क निर्माणमे,आ बदलामे हुनका प्रोत्साहन, सराहना ओ प्रशंसाक जगहपर बस संघर्ष, हतोत्साह टा भेटलनि।

"अबारा नहितन" पोथीक माध्यमसँ अपन संघर्षक एहन  रोचक विवरण देलनि अछि,जे एकहु क्षण लेल पाठकक मोन दिक नहि भ' सकैत अछि,जे ई की अपन दुखनामा लिखि क' प्रकाशित करा लेलनि अछि लेखक। संस्मरणात्मक उपन्यास रहितहुँ, एहि उपन्यासमे सभ तत्वक समावेश अछि,जे एक टा उपन्यास विधाक रिक्वायरमेंट होइत छै। माने गामसँ ल' ' शहर धरिक सामाजिक परिस्थितिक चित्रण,ओहि समयक राजनीतिक परिस्थिति,गाम घरक आपसी वैमनस्यता, कुटचालि,भ्रष्टाचार, चीन ओ पाकिस्तान द्वारा भारतपर आक्रमणक चर्चा,प्रवासी मैथिल समाजक दृष्टिकोण अपन मिथिला-मैथिली लेल,सभ टा समटैत अपन व्यथा कथा कहने छथि आ रोचक ढंगसँ कहने छथि। अपन मैथिली प्रेम रोगक चर्चा कतेक सहज,सरल रूपेँ कएलनि अछि लेखक,से एहि छोट सन अंशमे देखल जा सकैछ-"रोगक नाम भेल मैथिली प्रेम रोग।अपन व्यथाक विवरण दिअ पड़त।अहाँकेँ हमर व्यथा राग केहन लागल तकर चिंता हमरा कनिकबो नहि अछि। हमर मोनक संताप अबस्से कम भ' जाएत तैँ हमरा बड़बड़ाए दिअ।" अपन मोनक संताप कम करबाक क्रममे एहन  उत्कृष्ट पोथी पाठकक सोझाँपरसब साधारण गप्प नहि।

"अबारा नहितन" उपन्यास पढ़ि जे त्वरित प्रतिक्रिया हमर छल, जे हम मोने मोन बड़बडेलहुँ, "अरे ! एक टा फिल्म तँ एहि पोथीक कथानकपर सेहो बनि सकैत अछि।"  'ममता गाबए गीत' फिल्म बनेबाक क्रममे फिल्मक निर्माताद्वय केदारनाथ चौधरी आ महंथ मदन मोहन दास द्वारा भोगल एहि व्यथा-कथापर 'सुपरहिट' फिल्म बनि सकैत अछि । ई गप्प हम हास्य-विनोदमे नहि,गंभीरतासँ कहि रहल छी। एहि फिल्मक नाम "इएह गूड़ खेने कान छेदौने" राखल जेबाक चाही। हमर अनुमाने टा नहि,पूर्ण विश्वास अछि जे एहि फिल्मकेँ 'ममता गाबए गीत' फिल्मसँ बेसी पसिन करताह मैथिली-प्रेमी दर्शक।कारण एहिमे जे लिखल अछि से यथार्थ अछि,काल्पनिक किछु नहि। आ सत्य घटनापर आधारित,रियल हीरो बला कथापर बनल फिल्म बेसी पसिन कएल जा रहल अछि,एखनुक समयमे। चाहे ओ कोनो व्यक्तिक जीवनपर आधारित होअए किंवा कोनो ऐतिहासिक घटनापर।

मैथिल समाजक सर्वश्रेष्ठ उपाधि "अबारा नहितन" ग्रहण क' आ अपन मान-सम्मान एवं अभिमानकेँ थुर्री-थुर्री होइत देखि,जखन लेखक आ हुनकर मित्र मदन भाइ कलकत्तासँ आपस दरभंगा एबाक निश्चय केलनि,तखन निश्चित इएह फकड़ा मोनमे आएल हेतनि "इएह गूड़ खेने,कान छेदौने।" जखन कि मैथिली भाषामे फिल्म बना क' लाभ होएत, यश भेटत आकी मैथिल समुदायक बीच प्रशंसाक पात्र बनब,ताहि दिश हिनका लोकनिक ध्यान गेले नहि रहनि।मात्र मैथिली भाषाक रक्षार्थ फिल्म बनेबाक आयोजन कएने रहथि,जेना कि लेखक लिखलनि अछि एहि उपन्यासमे। एहि पोथीमे मैथिलीक पहिल सिनेमाक निर्माण-यात्राक बहन्ने मैथिल समाजमे यत्र-तत्र उपलब्ध पंडित, बुधिआर,बुद्धिजीवी,विद्वान, जे कहल जाए,तनिकर सभक मानसिकताक सटीक आ निर्भीक चित्रण सेहो कएल गेल अछि। उपन्यासक मुख्य पात्र महंथ मदन मोहन दास जीक मुहेँ कहल गेल वक्तव्य देखल जा सकैछ-"मिथिलामे पंडित छथि,बुधिआर छथि,बुद्धिजीवी छथि,मुदा सभटा विद्वान एकटा खास संभ्रांत जातिक छथि। सभहक दुआरिपर अहंकारक माला टाँगल छनि। ओ भाषण देबामे कुशल छथि, कविता कर'मे निपुण छथि, कथा लिख'मे पटु छथि आ आन आन गुणसँ सेहो विभूषित छथि। मुदा तमाम पंडितक बीच प्रतिस्पर्धा छनि। कियो किनकोसँ छोट नहि।सभटा पंडितकेँ एक मंचपर आनब असंभव। एक दोसराक आलोचना करैत करैत अपन अपन अलग अलग मंडली बना क' अपन भितरका इर्खाक पूजे टा क' रहल छथि। आब विचारियौ जे एहि ठामक पंडितक एहन  स्वभाव किएक छनि।एकर जवाब अछि जे अत्यधिक संस्कारी,अत्यधिक पांडित्य एहन विरल स्वभावकेँ जन्म दैत अछि। वशिष्ठ एवं विश्वामित्र दुनूक तर्क वितर्क आ एक दोसराकेँ पछाड़ैक जन्मजात प्रवृत्ति। तकरे प्रतिफल अछि जे सभटा पंडित अपन अपन अहंकारक ओढ़नामे नुकाएल छथि। मिथिलाक पांडित्य फूल नहि काँट बनि गेलैए। ई काँट जाबे तक अगिला पाँतमे बनल रहतैक,विद्यापति समारोह होइत रहतैक। मुदा मिथिलाक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रगतिमे मुख्यतः की बाधक छैक, तकर सही सही जानकारी कहियो नहि भेटतै।"

मिथिलाक महान तथाकथित हाइप्रोफाइल व्यक्तित्वक मानसिकताक विश्लेषण करैत एकटा दोसर प्रसंग सेहो मोन पड़ैए। बंबइमे फिल्म "ममता गाबए गीत" लेल वितरकक खोजमे अपसिआँत भेल लेखक,मदन मोहन जी आ भानु बाबूक पाला जखन पड़ैत छनि इनकम टैक्स महकमाक कमीश्नर साहबसँ। महाराष्ट्र सरकारमे चीफ ड्रग कंट्रोलर जीक नाम लैते देरी हुनकर मिजाजक पलटी मारब,महान मैथिलक प्रतिद्वंद्विताक पोल खोलैत प्रकरण अछि। दू गोट महान मैथिल आत्मा, एक दोसराक एहन  प्रतिद्वंद्वी ? दुखद अछि ई स्थिति। एहि प्रतिद्वंदिताक फेरामे प्रवासी मैथिल दू खेमामे बँटि जाइत अछि। दुनू महान मैथिलक माथपर सोनाक पाग। सोनाक पागमे कलयुगक वास। कलयुगक सिपहसलार भेल अहंकार। अहंकारक पुत्रवधू भेलीह इर्खा। तोरासँ हम कोन बातमे छोट। तोँ बड़ पैघ, तँ सड़ अपन घरमे। दू फाँक भेल मैथिल समुदायक एकहि टा कार्यक्रम छलै। अपन  भाषा अर्थात मैथिली भाषामे एक दोसराकेँ गाड़ि पढ़ब।जे होउक,तन-मन-धनसँ बनाएल मैथिलीक पहिल फिल्म "ममता गाबए गीत" प्रवासी  मैथिल महासंघक दू फाँक भेल चक्कीमे पिसा गेलनि।

एहन  भयावह स्थितिमे केहनो मैथिली प्रेमी, मैथिल समाजक उपकार लेल कोनो काज करबाक सहास कोना क' सकताह। तैँ बेर बेर लेखक अपन कपारकेँ कोसैत सन चर्चा करैत छथि अपन मैथिली प्रेम रोगक। एहन  सन जेना मति मारल गेल छलनि जे ई असाध्य रोग लगलनि। लेखकक शब्दसँ स्पष्ट बुझबामे आबि रहलए,जे मैथिली प्रेम रोगसँ ग्रसित होएब,दुर्भाग्यक गप्प-"सरल चित्त एवं मैथिली भाषालेल पूर्णत: समर्पित दीपक जीक सम्पर्कमे रहैत रहैत हमरा मैथिली प्रेम रोग नीक जकाँ जकड़ि लेलक। वयसक संग रोगमे विस्तार होइत गेल।" ई मैथिली प्रेम रोग सौभाग्यक गप्प बनि सकैत छलनि, जँ समाजक प्रतिष्ठित, बुद्धिजीवी, बुधिआर लोकसँ, एहन  मैथिली प्रेम रोगीकेँ उचित मान सम्मान आ समर्थन भेटितनि। मुदा एकरा विडम्बने कहल जा सकैछ जे लेखकक मैथिली प्रेम,हुनका मात्र दर्दे टा देलकनि। हुनकर दर्द शब्दक माध्यमसँ कोना बहराएल छनि से देखल जाए - "मैथिली प्रेम रोगक संबंध कोनो लेन-देन,नफा-नोकसानसँ नहि,मात्र हृदयक ओहि तन्तुसँ छैक जतए केवल दर्द छैक। दर्दमे पीड़ामे रोगी फुइस नहि बाजैत अछि।"

मैथिली साहित्यिक जगतमे व्याप्त अराजक स्थितिक भयावहताक चर्चा एहि पोथीक एक टा प्रसंगमे हिन्दी साहित्यक सफल ओ प्रभावशाली लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जीक वक्तव्यक माध्यमसँ राखल गेल अछि,जखन "ममता गाबए गीत" फिल्मक म्युजिक डाइरेक्टर श्याम शर्मा लेखककेँ कहैत छथिन, "मुहूर्त त' काल्हि होएत। आजुक काज शेष भ' गेलए। की हर्ज हमसभ फणीश्वरनाथ रेणुसँ भेंट करए चली ? हुनका कल्हुका मुहूर्तक निमंत्रण देबनि आ थोड़ेक गप्प-सप्प सेहो करब।"

रेणु जी गप्पक क्रममे कहैत छथिन, "हमहूँ मिथिलेक छी आ हमरो मातृभाषा मैथिलीए अछि। नेनामे हम जखन नेपालक विराटनगरमे रहैत रही,तखन मैथिली भाषामे कइएक-टा कथा लिखने छलहुँ। मुदा मैथिली भाषाक क्षेत्र सकुचल ,समटल आ एक विशेष जातिक एकाधिकारमे। अपने लिखू,अपने पढ़ू।श्रोताक अभाव,खैर छोड़ू ओहि प्रसंगकेँ। समय बदललैए आ आब मैथिली भाषामे फिल्म बनि रहलैए,ई हमरा प्रसन्न क' रहलए।" (पृष्ठ संख्या-८१)

उपन्यास पढ़ैत काल फणीश्वरनाथ जीक उपर्युक्त वक्तव्य पढ़ि हम सोचमे पड़ि गेलहुँ, माने मैथिली साहित्यक ई स्थिति १९६३-६४ ई.सँ एखन धरि,एकहि रंग रहि गेल।अपने लिखू,अपने पढ़ू बला स्थितिमे कोनो बहुत बेसी सुधार नहिए सन बुझना जाइत अछि।

मैथिली पोथीक उपलब्धताक समस्याक चर्चा सेहो आएल अछि,माने पोथी-पत्रिकाक वितरणक समुचित व्यवस्था, व्यवस्थित नहि रहलाक कारण सेहो पाठक धरि नहि पहुँचि पाबैत अछि पोथी सभ। ओना आब ऑनलाइन उपलब्ध होमए लागल अछि, तथापि ऑनलाइन ऑर्डर ओतबा सहज नै बुझाइत छै बहुत लोककेँ। गामे-गाम,शहरे-शहर एक टा सुनिश्चित स्थानपर मैथिली पोथीक उपलब्धता एखनो धरि नहिए भेल अछि। पता लगाबए पड़ैत छै, जे फलाँ पोथी कतए उपलब्ध भ' सकैए। ओना किनबाक इच्छा रहतनि पाठककेँ,तँ पातालोसँ ताकि लेताह मुदा पोथी कीनि क' नहि पढ़बाक बेमारी सेहो सभदिना रहलनि,मैथिल समाजक लोककेँ।

उपन्यासमे एकर चर्चा सेहो भेल अछि।देखल जाए-"कका कहलनि-कैंचा खर्च क' पत्रिका किननिहार धरतीक एहि भागमे कियो नहि भेटतौ,तेँ हम पत्रिका बेचै नहि छी,बिलहै छी। एक-दू दिनक बाद पत्रिकाक मूल्य नेताजीकेँ पहुँचा दैत छियनि। इहो कहि आबैत छियनि,जे पत्रिका हाथे हाथ बिका गेल।" स्थिति एखनो नहि बदलल अछि।मैथिली भाषाक पत्रिका एखनहु अहिना बिलहल जाइत अछि,बहुत ठाम। पत्रिका बिलहि, प्रकाशककेँ वितरक पाइ पहुँचा दैत छथि,ई कहि जे पत्रिका बिका गेल।

मैथिली भाषाक ई स्थिति दुखद। एहि भाषाक अपन लिपि छै,अपन व्याकरण छै आ सभसँ पैघ विद्यापति सन महान कविक आशीर्वाद छैक। मैथिली भाषाकेँ ई सामर्थ्य छैक जे ओ मिथिलाक संस्कृति, सभ्यता एवंपरम्पराकेँ अक्षुण्ण राखि सकैत अछि। मुदा ई वाक्पटुतासँ नहि  कर्तव्यपटुतासँ संभव होएत। मैथिल आ मिथिलासँ जेना मोन टूटि गेल छनि लेखककेँ, तकर कारण सेहो छै। एकठाम लेखक कहैत छथि,"मिथिलामे बहुत तरहक गुण छैक,जाहिमे प्रधान अछि आलस्यक साम्राज्य। एतुक्का समस्याक निदान लेल विष्णुकेँ नहि,महादेवकेँ अवतार लिअ' पड़तनि।तांडव नृत्य कर' पड़तनि।" पोथीमे कतेको ठाम मिथिलाक दुर्गुण सभकेँ निस्संकोच देखार करैत प्रसंग सभ आएल अछि। भिन्न भिन्न पात्रक चरित्र चित्रण करैत मैथिल लोक सभक निम्नस्तरीय मानसिकताकेँ देखार कएल गेल अछि। बेसी लोक अपन स्वार्थ सिद्धिमे लागल अछि,जे दुर्भाग्यपूर्ण।

कलकत्तामे "ममता गाबए गीत" फिल्मक वितरक ताकबाक क्रममे लेखकक सामना भेलनि मैथिली-सेवामे लागल तृप्ति नारायण उपाध्याय उर्फ तिरपित बाबूसँ। विचित्र कैरेक्टर मुदा एहन  लोकसँ निश्चित भेंट भेल होएत, सभकेँ अपन जीवनमे। लेखकक शब्दमे देखल जाए,"अछिंजलसँ धोअल तिरपित बाबूक मुखमंडलसँ सज्जनताक आभा प्रस्फुटित भ' रहल  छल। हुनक जीवनक एकमात्र उद्देश्य रहनि मिथिला- मैथिलीक कोनो तरहक सेवाक काज होइ, अपन सर्वस्व न्योछावर क' ओहि पुनीत काजमे योगदान करब। फिल्मक सभ टा समस्याकेँ जड़िसँ समाप्त क' देब, तकर वचन दैत छी।" तिरपित बाबू जाहि तरहेँ गणेश टॉकिजक व्यवस्था करबाक नामपर साठि रुपैया आ प्रोजेक्टर चलबै बला लेल दू बंडिल बीड़ी लेल पाइ ठकि अन्तर्धान भ' गेलाह,से हास्यास्पद, संगहि दुखद सेहो। एतबे नहि,मैथिली भाषामे बनल फिल्मक प्रलोभन द' ओ बहुतोसँ बहुत किछु ठकने हेताह,से अनुमान छलनि बाबू साहेब चौधरीक। बाबू साहेब चौधरी, जे वास्तवमे निर्लोभ, निर्भीक आ मिथिला-मैथिली लेल समर्पित लोक छलाह,मैथिली भाषा ओ मैथिलपरम्पराकेँ अक्षुण्ण रखबा लेल प्रतिबद्ध लोक।लेखक द्वारा देल बाबू साहेब चौधरीक परिचयक हिसाबसँ। बाबू साहेब चौधरीक सहयोगी स्वभाव आ मैथिली साहित्यकार लोकनिक असहयोगी प्रवृत्तिक चित्रण बड़ा बेजोड़ केलनि अछि लेखक। शब्द संयोजन देखबा योग्य। देखल जाए- "सरल हृदय बाबू साहेब चौधरी, हमरा दुनूक मदति लेल अधीर छलाह। ताहि क्रममे ओ मैथिली भाषाक अनेक नव-पुरान,छोट-पैघ, मोट-पातर कवि,कथाकार, नाटककार,आलोचक, समालोचकसँ भेंट करौलनि। मुदा सभ टा साहित्यकार अपन अपन व्यथासँ व्यथित छलाह। हुनकर सभक निजक वेदन ततेक गहींर छलनि जे हम सभ "ममता गाबए गीत" फिल्मक समस्याकेँ कात टारि हुनके दुखमे सहानुभूतिक बर्खा करैत करैत सभसँ पिण्ड छौड़ौलहुँ।" शब्द संयोजनक चमत्कार बहुत ठाम देखबालेल भेटल। सभहक चर्चा करब संभव नहि मुदा जे एकदम स्मरण भ' गेल अछि,से एकाध टा कथ्यक चर्चा हम अवश्य करब। एकटा कथ्य अछि, " संवादक डब कएल जा सकैए मुदा सुन्दरताक डब करब संभव नहि छैक।" ई बात मदन भाइ कहलनि अछि,लेखककेँ।जखन "ममता गाबए गीत" फिल्मक कलाकारक चयन करबाक क्रममे मुख्य हिरोइनक रूपमे अजराक चयनपर विचार भ' रहल छलनि,दुनू मित्रक बीच। अजराकेँ साइन करब फिल्मक बजटपर भारी पड़त,तकर प्रतिक्रियामे उपरोक्त बात कहल गेल छल।

तहिना लाख टाकाक एकटा गप्प कहल गेल अछि लेखक द्वारा, "प्रत्येक व्यक्तिक हृदय कूपमे रचनात्मक उर्जा भरल रहैत छैक।एकर प्रगटीकरण अथवा स्पष्टीकरण समयानुकूल होइत छैक।"

एहि उपन्यासक सभ पात्र एहन-एहन छथि, जेहन चरित्रक व्यक्तिसँ प्रत्येक मनुष्यक सामना भेल हेतनि जीवनमे। कहबाक माने, लोक रिलेट क' पाबैत अछि, कथाक पात्र सभसँ।चाहे ओ लेखकक मित्र शिवकांत होइथ किंवा महंथ मदन मोहन दास सन धीर गम्भीर लोक।विदुर नीतिक अनुगमन कएनहार लेखकक मैट्रिक फेल छोटका कका, बाबू शारदाकान्त चौधरी उर्फ कौआली बाबू होइथ वा लोअर फेल फकिरनाक छोटका नेना कंटिरबा। शिवकान्तक मामा चतुरभुज लाल दास,गामक भगिनमान टने झा,बौआ अर्थात बाबू नारायण चौधरी, फुद्दी कका, मैथिली भाषा लेल पूर्णत: समर्पित दीपक जी, बैद्यनाथ बाबू,मिस्टर टमाटर जी,भानु बाबू,जनिकर अन्तरात्मामे किछु विचार, स्वयं हीरो बनी, प्रायः पहिनेसँ संचित रहनि,जे अनुकूल समय देखि मुखरित भ' गेलनि।

कलकत्तामे फिल्मक वितरक ताकबाक क्रममे सेहो रंग- रंगक लोकसँ सामना भेलनि लेखक आ हुनकरपरम मित्र मदन भाइकेँ। तिरपित बाबू, बाबू साहेब चौधरी,रतन बाबू,कलकत्ता विश्वविद्यालयक विख्यात प्राध्यापक, हुनक पत्नी, सखा जी, बिड़ला जी माने छोटका बिड़ला जी, जे लेखक आ हुनकर मित्रकेँ "अबारा नहितन"क उपाधिसँ विभूषित केलथिन। संगहि फिल्मक कलाकार आ साउंड इंजीनियर, लाइटमैन सभकेँ मिला, कुल साठि-पैंसठि गोटाक टीम। माने असंख्य पात्रक समावेशसँ तैयार भेल ई उपन्यास विविध रंगक रस,स्वादसँ परिपूर्ण अछि।

एतेक रास पात्र रहितो,कतहु कोनो पात्रक परिचय वा गुणगाम/निन्दा करैत लेखक बहुत शब्द खर्च नहि केने छथि। माने अनेरे पन्नाक पन्ना नहि भरने छथि। सीमित शब्दमे अपन बात स्पष्ट करैत, एक टा रोचक पोथी पाठकक समक्ष प्रस्तुत करबालेल लेखक साधुवादक पात्र छथि। एकठाम लेखक कहलनि अछि,"कमलनाथक प्रशंसामे हम किछु पाँती आरो खर्च करब।" तहिना फिल्मक गीतकार रवीन्द्र नाथ ठाकुर जीक गुणगानमे सेहो सीमित शब्दक प्रयोग करैत गीतकारक असीमित गुणक वर्णन क' देलनि अछि। माने शब्द आ पाँती बहुत संयमित तरीकासँ खर्च कएल गेल अछि, जे पोथीकेँ उबाउ नहि होमए देने अछि। एहि बातक जतेक सराहना कएल जाए,कम अछि।

मैथिली प्रेम रोगसँ वशीभूत भ' मैथिली फिल्म निर्माणक डेग उठाएब बहुत सहासक काज छलनि लेखकक मुदा फिल्म निर्माण एवं फिल्म वितरणक पर्याप्त जानकारीक बिना अति उत्साहमे आबि फिल्म निर्माण प्रारम्भ करब एकटा व्यावहारिक त्रुटि भेलनि लेखकक। जकर नोकसान डेग डेगपर उठबए पड़लनि फिल्मक निर्माताद्वयकेँ। आरम्भमे फिल्मक बजट चालीस हजारक बनल छलनि,आ फिल्म निर्माणक अन्तकाल धरि बजट चालीस हजारपर ठाढ़े छलनि। येन केन प्रकारेँ मैथिली भाषाक फिल्म बनिओ गेलनि, तकर बात वितरक ताकैमे नौ डिबिया तेल जराबए पड़लनि आ वितरक नहिए भेटलनि।

"अबारा नहितन" पोथीक कथानक,शिल्प वा भाषाक गप्प करी, तँ हम ताकैत रहि गेलहुँ, मुदा त्रुटि तेहेन किछु भेटल नहि हमरा। बस कतहु कतहु वर्तनीक समस्या जेना- कतहु करता,कतहु करताह। कतहु छल,कतहु छलै। कतहु छै,कतहु छैक। कतहु छला,कतहु छलाह, एहन  किछु किछु मामूली सन त्रुटि देखाइ पड़ल, सएह टा।

एकटा अनुत्तरित प्रश्न जे लेखक एहि पोथीक अन्तमे  रखने छथि पाठकक सोझाँ,से झकझोरए बला अछि, "फिल्म पूरा बनि गेलै तकर सूचना पाबि हमरा दुख नहि प्रसन्नता भेल छल। मुदा एकटा जिज्ञासा मोनमे रहिए गेल रहए। की हम आ मदन भाइ मैथिल समाजमे अपरिचितसँ परिचित भेलहुँ? जवाबक प्रतीक्षामे मदन भाइ संसार त्यागि बिदा भ' गेला। मुदा हम एखन तक प्रतीक्षामे जीविते घुमि- फिरि रहल छी।"

मुदा मैथिल समाज लेल धनि सन। २०१२ ई.मे एहि पोथीक प्रथम संस्करण प्रकाशित भेल अछि। एहि दस बर्खमे लेखकक प्रश्नपर केओ कान-बात धरएबला नहि भेलनि, से दुखद।

 

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।