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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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आशीष अनचिन्हार

हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-7


 

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी----------------- 


 

1


 

गोवर्धन राम त्रिपाठीजीक गुजराती उपन्यास "सरस्वतीचन्द्र"पर आधारित फिल्म "सरस्वतीचंद्र" केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर। संगीतकार छथि कल्याणजी-आनंद जी। ई फिल्म 1968 मे रिलीज भेलै। एहिमे नूतन, मनीष, विजय चौधरी आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 2122-122-122-12 अछि। एहि नज्मक पहिल दू पाँति "कहाँ चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के...." माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै।


 


 

कहाँ चला ऐ मेरे जोगी, जीवन से तू भाग के

किसी एक दिल के कारण, यूँ सारी दुनियाँ त्याग के


 

छोड़ दे सारी दुनियाँ किसी के लिए

ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए

प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं

प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए


 

तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या

मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं

खुशबू आती रहे दूर ही से सही

सामने हो चमन कोई कम तो नहीं

चाँद मिलता नहीं सबको संसार में

है दिया ही बहुत रौशनी के लिए


 

कितनी हसरत से तकती हैं कलियाँ तुम्हें

क्यूँ बहारों को फिर से बुलाते नहीं

एक दुनियाँ उजड़ ही गयी है तो क्या

दूसरा तुम जहाँ क्यूँ बसाते नहीं

दिल न चाहे भी तो साथ संसार के

चलना पड़ता है सबकी खुशी के लिए


 

एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि।


 

2


 

फिल्म "हमराज" केर ई नज्म जे कि महेन्द्र कपूर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि साहिर लुधियानवी। संगीतकार छथि रवि। ई फिल्म 1967 मे रिलीज भेलै। एहिमे सुनील दत्त, राज कुमार, मुमताज आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 212-212-212-212 अछि।


 


 

तुम अगर साथ देने का वादा करो

मैं यूँ ही मस्त नग़मे लुटाता रहूँ

तुम मुझे देखकर मुस्कुराती रहो

मैन तुम्हें देखकर गीत गाता रहूँ


 

कितने जलवे फ़िज़ाओं में बिखरे मगर

मैने अब तक किसीको पुकारा नहीं

तुमको देखा तो नज़रें ये कहने लगीं

हमको चेहरे से हटना गवारा नहीं

तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो

मैं हर एक शै से नज़रें चुराता रहूँ


 

मैने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे

तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो

तुम न समझो तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं

मैं समझता हूं तुम मेरी तक़दीर हो

तुम अगर मुझको अपना समझने लगो

मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ


 

मैं अकेला बहुत देर चलता रहा

अब सफ़र ज़िन्दगानी का कटता नहीं

जब तलक कोई रंगीं सहारा ना हो

वक़्त क़ाफ़िर जवानी का कटता नहीं

तुम अगर हमक़दम बनके चलती रहो

मैं ज़मीं पर सितारे बिछाता रहूँ


 

एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि।


 

3


 

फिल्म "बहारें फिर भी आएंगी" केर ई नज्म जे कि महेन्द्र कपूर जी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि कैफी आजमी। संगीतकार छथि ओ.पी.नैयर। ई फिल्म 1966 मे रिलीज भेलै। एहिमे धर्मेंद्र, तनुजा, माला सिन्हा आदि कलाकार छलथि। एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222-1222-1222-1222 अछि।  पूरा नज्म जीवन-दर्शन आ गेयतासँ भरल अछि मुदा हरेक पाँतिमे बहरक पूरा पालन भेल छै।ई नज्म ओहन-ओहन लोकक मूँहपर थापर अछि जे कहै छथि जे बहरक पालनसँ कथ्य आ गेयता घटि जाइ छै।


 

बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं खाली

बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी


 

थकन कैसी घुटन कैसी चल अपनी धुन में दीवाने

खिला ले फूल काँटों में सजा ले अपने वीराने

हवाएं आग भड़काएं फ़िज़ाएं ज़हर बरसाएं

बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी


 

अँधेरे क्या उजाले क्या ना ये अपने ना वो अपने

तेरे काम आएँगे प्यारे तेरे अरमां तेरे सपने

ज़माना तुझसे हो बरहम ना आये राह पर मौसम

बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी


 

एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। "चल अपनी" एकर तक्ती अलिफ-वस्ल केर नियमसँ छै।

 

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।