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वि    दे    ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक गद्य

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(c)२००४-१०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) (क्रमसँ दोसर खेप) २.दुर्गानन्‍द मंडल-समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-३.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर

१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)(क्रमसँ दोसर खेप)

जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।

शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। प्रस्तुत अछि पहिल खेप।- सम्पादक

आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)

(क्रमसँ दोसर खेप)

हमरा आब अचरज होइत अछि-ओहि समय दिल्ली स्थायी रूप सँ बसवाक एक रत्ती नहि
तँ आस छल आ नहि तँ सोचने छलौं। किन्तु एखन पंचानन जीकें पढ़ैत छी तँ लगैत अछि शब्द ब्रह्म थीक।पंचानन जीक आग्रह आ विचार सँ एकर प्रकाशनक भार शेखर प्रकाशन पर देल गेल शरदिन्दु चौधरी स्वयं डेरा पर आबि 700 पन्नाक पांडुलिपि ल गेलाह। शरदिन्दुक उत्साह देखि हम बुझलौं जे कोनो काज हेवाक रहैत छैक तँ कोना अनुकूल बसात बह लगैत छैक- कोना विधि दहिन भ जाइत छथि। हमरो उत्साह बढ़ि गेल- तखन पांडुलिपिक संग ई पत्र-
आदरणीया
आत्मकथा पढ़लहुँ। नीके नहि कतहु अत्यन्त मार्मिक हृदयस्पर्शी आ कतहु-कतहु तँ अन्यत्र नहि भेटल शब्दावलीक विलक्षण प्रयोग। बहुत मोन लागल। प्रसंग सभ रोचक एक दोसराक संग जोड़ैत अगाँ अविरल बढ़ैत। मात्र खटकैत अछि भाषा जे अहाँ स्वयं स्वीकार करैत छी जे मैथिली हम बहुत प्रयत्न सँ सिखलहुँ किछु शब्द केँ बदलबाक आवश्यकता छैक आ किछु अशुद्धिकें दूर करबाक छैक। आ कोनो कठिन नहि छैक। हमरासँ कोनो प्रसंग नहि हटाओल गेल। कारण कतहु ई नहि बुझना गेल जे लिखबाक बहन्ने पाठक पर धौंस झाड़ि रहल होइऐक। अहाँक भोगल यथार्थक अभिव्यक्ति कें कपचबाक धृष्टता करबामे असमर्थ पाबि रहल छी से एहि कारणे जे पापाक बतहिया बेटी क असाधारण सम्प्रेषणीयता केँ बाधित-खंडित करबा योग्य हम असाधारण कलमक
पुजारी नहि छी तेँ। ओतँ निवेदन जे जेना ब्रह्मा बनि अपने एकर सृजन कयलिऐक अछि तहिना विश्वकर्मा बनि एकरा सुन्दर बनयबा लेल अपने स्वयं हाथ चलबियौ। हँ शुद्धताक दृष्टिसँ हम एहि पर काज करबा लेल सतत् तत्पर भेटब।
शरदिन्दु चौधरी
शेखर प्रकाशन
एहि पोथीक प्रकाशनक क्रम मे शरदिन्दु हमर परिवारक अभिन्न अंग बनि गेल छलाह। हम दूनू गोटे कखनो काल पारिवारिक दुख सुखक गप करैत रहैत छलौं। विमोचन समारोह मे ओ कतेक स्नेह उत्साह सँ मंच पर हमर परिवारक बखान करैत रहलाह संगे हमरा कहलनि-अहाँ एतेक भीड़ कोनो समारोह मे देखने छलियैक आ ताहि मे विमोचन समारोह मे आब अहाँ उदास नहि रहियौक-हँसैत रहु- हमर उदासी सँ शरदिन्दु उदास भ जाइत छलाह ई अनुभूत हम केने छलौं। जखन नचिकेताक विचार किस्त किस्त पर आयल हम अभिभूत भ उठलौं-सरिपों कोनो रचना कें बुझवा लेल सहसंवेद्य हृदय चाही
माननीया शेफालिका जी
नमस्ते!
तेरी हर चाप से जलते हैं खयालों मे चिराग
जब भी तू आए जागता हुआ जादू छाए
तूझको छू लूँ तो ऐ जाने तमन्ना मुझको
देर तक अपनी बदन से तेरी खूशबू आए-
ई ओहि शायरीक अन्तिम अंश थीक जकर प्रशंसा सँ अहाँ किस्त किस्त जीवन प्रारंभ केने छी। सरिपहुँ अहाँक प्रत्येक कृतिक आहट सँ पाठकगण भाव-विभोर भ जाइत अछि आ जखन ओहि कृतिके पढ़ि लैत अछि तँ बहुत देर धरि ओ चिन्तन मनन करवा लेल बाध्य भ जाइत अछि सत्य-सरल-सुबोध भाषा मे लिखल गेल अपनेक एहि आत्मकथा किस्त किस्त जीवनक इएह विशेषता थीक।
उदय नारायण सिंह नाचिकेता
निदेशक
केंद्रीय भाषा संस्थान भारत सरकार

तखन मोन पड़ि गेल ओहि गीतक प्रथमांश-जाहि सँ हम किस्त किस्त प्रारम्भ केने छी-
ज़िन्दगी मे तो सभी प्यार किया करते हैं
मैं तो मरकर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा।
आ पत्रक हुजूम सँ साहित्यकार शंकर दयाल जीक पत्र मुस्कुरा उठैत अछि-
प्रिय शेफालिका वर्मा जी
आपने जिस प्रेम और अपनापन के साथ वर्ष की शुभकामनाएँ भेजी हैं उनका
जबाब शब्दों मे दे पाना कठिन है। मैं ऐसे कार्डों को संभालकर साल भर अपने सामने रखता हूँ और इसी रूप मे अपनों को याद करता हूँ। आपके साथ मेरा जो अनौपचारिक संबंध है उसका निर्वाह इसी भांति हो यही मेरी कामना है। आपकी कविताओं के दौर से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो अक्षरों के भी हाथ पाँव होते हैं- वे कभी छटपटाते कभी दौड़ते हैं कभी भाग खड़े होते पर पीछा नहीं छोड़ते। आपकी कविताओं से गुजरते मुझे आँसू ग्रंथि तथा मैं नीर भरी दुख की बदरी की याद आ जाती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य की परिभाषा साधारणीकरण के रूप मे की है यानी पाठक रचना के साथ-साथ
अपने को भी सहभागी बना ले-तब किसी रचना की सफलता होती है। शेफालिका जी आपकी कविताओं को पढ़ते हुए मेरी भी स्थिति कई बार ऐसी ही हुई है। निश्चय ही नया साल आपके लिए नई अनुभूतियाँ और विश्वास लेकर आए-यही मेरी संकल्पना है।
आपका
शंकर दयाल सिंह
एम पी
कामता सदन बोरिंग रोड पटना
दिनांक 17 जुलाई 89
भीम भाईक फोन आयल आँखि नोरा गेल छल। एक समय छल कतेक अंतरंगता हमरा सभमे छल-हम सभ एक दोसर कें हृदय सँ चीन्हैत छलहुँ-आ पत्र केँ पढ़ितहि टेप मे गाओल तरुणाक संग हिनकर गीत मोन पड़ि गेल-
हर पल तुझे मैं याद किया करता हूँ
तुझे भूला कर मैं एक पल कभी जीया तो नहीं।
विमोचनक बाद लगले चन्द्रेशक फोन आयल-हम किस्त किस्त पढ़लौं। एतेक अपूर्व-एतेक भावना एतेक दर्द अहाँ मे कत सँ आयल हमरा अहाँ सँ ईर्ष्या होइत अछि। हम किएक
नहि ओना लिख पबैत छी।बजैत-बजैत भावावेश सँ हुनकर गर बाझि गेल छलैक-आ झट द फोन राखि देलनि-हमरा जेना सौंसे संसारक सम्पदा भेटि गेल-हुनक आँखिक नोर जेना हमर आँखिमे आबि गेल।
एहिना हमर गुरुदेव डॉ अनंत लाल चौधरी अवकाश प्राप्त प्रोफसर पटना वि वि क
फोन आयल- शेफालिका! अहाँक किस्त किस्त पढ़लौं। कतेक व्यथा अहाँक पाती-पाती मे भरल अछि। विद्यार्थी जीवन मे अहाँ एतवे संवेदनशील छलौं जेना हमरा मोन पड़ैत अछि- अहाँक व्यक्तित्व आ कृतित्व मे हमरा कोनो अन्तर नहि देखा पड़ैत अछि-कतेक एकरूपता! पति पत्नीक प्रेम विश्वास आपसी सामंजस्य एकर अभूतपूर्व चित्राण केने छी। स्त्रीक प्रत्येक रूपक वर्णन-कोनो एकटा लड़की परिस्थितिक अनुसार अपना कें समखपत क दैत छैक कोना सभकें खुश राखवाक प्रयास करैत एहि ऊँचाई पर पहुँचल- आजुक पीढ़ी लेल प्रेरणादायी अछि प्रत्येक परिवार मे रामायण-गीता जकाँ एहि पुस्तक कें राखवाक चाही- जाहि सँ नव पीढ़ी केँ आलोक भेटय-कतेक ठाम हमर आँखि भरि आयल-अहाँकेँ फेर बधाई अनेको आशीर्वाद।
दिल्ली मे मंजर आलमक फोन दरभंगा सँ आयल हम एकदम चिहुँकि उठलौं- विहुँसि
उठलौं- अहाँक किस्त किस्त पढ़लौं- मैडम एतेक नीक लागल जे रहल नहि गेल। अपने केँ बधाई देवा लेल लगले फोन कय देलौं-
विमोचन उपरांत इंगलैंड जेवा काल दिल्ली मे राजीव लग छलौं कि भीम भाईक पत्र
राजीवक पता सँ आयल। आ दरभंगाक शुभ्रता शुचिता मोन पड़ि गेल-
बान्धवी शेफालिका जी
सोझाँमे किस्त-किस्त जीवन अछि। एहन सुन्दर पोथी लेल हार्दिक बधाइ लिअ।
मुदा शेफालिकाजी किस्त-किस्त जीवन हमरा अहाँक आत्मकथा कहाँ लागल हमरा तँ
अहाँक आत्माक कथा बुझि पड़ल। सोझे आत्मासँ बहरायल उद्गार। आत्मा जेना निर्बन्ध निर्लेप निस्सीम होइछ आ ओकर तार सोझे परमात्मासँ जुड़ल रहैछ तहिना अहाँक ई आत्माक कथा हमरा उन्मुक्त निश्छल निर्मल लागल अछि आ एकरो तार सोझे परमात्मा ललन बाबू सँ जुड़ल लगैत अछि। आत्माक अदृश्य अनुराग-तागसँ जुड़ल अहाँक जीबट भरल जीवनक ई सम्मोहक सतरंगी गुड्डी मैथिली साहित्याकाशमे अगराइत-उधिआइत अपन अपरुप छटा छिड़या रहल अछि छिड़यबैत रहत।
अहाँ भनहिँ अपन जीवनकेँ किस्त-किस्तमे क क तकर विस्तृत फिरिस्त तैयार कयलहुँ
अछि मुदा अहाँक समस्त व्यस्त जीवन हमरा जनैत ओहि अलमस्त प्रशस्त स्वर्गस्थ जीवनधन ललन बाबूक तिल-तिल नूतन पुण्यस्मृतिमे विगलित भेल चल गेल अछि।
भवदीय
भीमनाथ झा
30 05 08

देख रहा हूँ इस दुनिया को आपकी मुहब्बत है
आज मेरी दोनों आँखें आपकी इनायत है आपकी इनायत है।
ललन 17 04 92

मोन पड़ि जाइत अछि दिनेश्वर लाल आनन्दक उद्गार-
मिलनक मधुरतम क्षण मे विरह वेदनाक अनुभव करैवाली प्रेमक चरम सफलताक
समय मे असफल प्रेमक भावना मे जीवैवाली अनवरत मिलयामिनीक अनुभूतिमे डुबल विप्रलब्धाक सर्जन करैवाली कवयित्री श्रीमती शेफालिका वर्मा स्वयं अपनहि मे विरोधाभासक प्रतिमूर्ति छथि। हिनक प्रेमी आ पति श्री ललन कुमार वर्मा सहरसाक प्रमुख सुविख्यात अधिवक्ता आ हमरपत्नीक भ्राता। हिनक समस्त काव्यक प्रेरणा श्रोत आ हिनका लेल साक्षात् काव्य स्वरूप छथि। तैं प्रेमक चरम सौभाग्यपूर्ण परिणति विवाहक बाद जखन अधिकांश कविक कवित्व नूल तेल लकड़ीए मे समाप्त भए जाइत अछि ताहिठाम हिनक काव्य सर्जनाक प्रारम्भे चिरइप्सित विवाहक पश्चात भेलन्हि अछि
तैं महाकवि आरसी बाबू कें भनहि आश्चर्य लागैन्ह जे गृहस्थीक जाहि मरूभूमिमे कतेक कवि कवयित्रीक रस स्रोत सूखि गेल ताहि प्रपंच मे हिनक कवि हृदय कोना मात्रा जीविते नहि सरसता एवं वचन विदग्धताक प्रचार प्रसार क रहल अछि । मुदा यथार्थ मे कोनो आश्चर्यक गप्प नहि थीक। ओना सुविख्यात एवं सिद्धहस्त प्रौढ़ लेखक स्व ललितेश्वर मल्लिकक भतीजी एवं विहारक सुप्रसिद्द अधिवक्ता एवं मैथिली तथा हिन्दीक प्रौढ़ लेखक श्री ब्रजेश्वर मल्लिक क पुत्री एहि कवयित्रीकेँ लेखन कला उत्तराधिकारे मे भेटल छन्हि। दैनिक जीवन मे कवयित्री अपना पति संग तन मन प्राणसँ तेहन एकाकार छथि जे हिनक काव्यक मर्म हिनक सफल दाम्पत्य जीवनेमे समाहित छन्हि। भाषाक संबंध मे ई ज्ञापित कए देब आवश्यक जे कवयित्री जानि बुझि कए एहन कतेक शब्दक प्रयोग कएने छथि जे एहि क्षेत्रमे बाजब प्रचलित छैक मुदा मैथिली साहित्य मे जकर प्रयोग आइ धरि नहि होइत छैक जेना यादि हारि प्यार किछ गोटा केँ कठाइन भने लगनि मुदा ई एहि
क्षेत्रक भाषाक अपन रंग थीक।
दिनेश्वर लाल आनंद
साहित्यकार पटना

(क्रमसँ तेसर खेप अगिला अंकमे)

 

दुर्गानन्‍द मंडल

गोधनपुर (नि‍रमली) , दुर्गानन्‍द मंडलक

 

समस्‍त मैथि‍लक लेल राखीक शुभकामना-

 

 

ओना तँ अपन देश सभ दि‍नेसँ पावनि‍ये ति‍हारक देश रहल अछि‍। जतए सभ दि‍न कोनो ने कोनो पावनि‍-ति‍हार मनाओल जाइत अछि‍। आइ होली, तँ काल्‍हि‍ दीवाली, परसू दुर्गापुजा, तँ तरसू कालीपूजा। आइ अनन्‍त चतुरदशी तँ काल्‍हि‍ नरक-नरावन चतुरदशी। आइ भ्रातृ द्वि‍ति‍या तँ काल्‍हि‍ जि‍ति‍या, आइ शनि‍याही घड़ी, तँ काल्‍हि‍ बुधवारि‍ घड़ी। कहि‍यो सि‍र पंचमी, कहि‍यो वसन्‍त पंचमी। तातपर्य सालो भरि‍ सभ दि‍न पावनि‍ए-पावनि‍। जहि‍मे सभ पावनि‍केँ एकटा अलग महत्‍व होइत अछि‍।

     कोनो पावनि‍ रंग-अबीरसँ जुड़ल होइत अछि‍ तँ कोनो अटूट भक्‍ति‍सँ। कोनो पावनि‍ साँए-बेटासँ जुड़ल अछि‍ तँ कोनो भाए-भतीजासँ, ओहि‍ पावनि‍मे अपना देशमे रक्षा बन्‍धनक एकटा खास लौकि‍क तथा अलौकि‍क दुनू तरहक महत्‍व होइत अछि‍। तँ भारतक पावन पावनि‍मे रक्षा बन्‍धन अति‍ पावन मानल गेल अछि‍। जहि‍ पावनि‍मे कलाइपर धागा बान्‍हव भृकूटि‍क बीचमे टीका लगाएव आ मुँह मीठ कराएव देखल जाइत अछि‍। औझके दि‍न बहीन अपन भायक गट्टापर राखीक धागा बान्‍हि‍ अपन रक्षाक दान लैत अछि‍। एकटा समए छलै जे युद्धक समएमे एकटा बहीन मुसलमान भाइक गट्टापर राखी बान्‍हि‍ अपनाकेँ सुरक्षि‍त बुझैत छल। कि‍एक तँ एक भाय अपन बहीनक सतीत्‍वक ओकर मान-मर्यादाक रक्षा जरूर करत।

परन्‍च मनुक्‍ख तँ पूर्ण समर्थ छथि‍ नहि‍। नहि‍ जानि‍ जे एकर बादो कतेको माए-बहीनक लाज लुटल गेल हएत। आ लुटल जाइए।

वास्‍तवमे एहि‍ अपवि‍त्र वृति‍, दृष्‍टि‍ आ कृति‍केँ पवि‍त्र बनाबए पड़त। आर मन, वचन, कर्मसँ पवि‍त्र रहि‍ सभसँ अपन बहीनक समान बर्ताव करए पड़त।

रक्षा बन्‍धनक रहस्‍यकेँ जानए पड़त, मानए पड़त। आजूक तारीखमे एहि‍ बातक खगता अछि‍ जे बहीनो आइक तारीखमे अपन भायसँ कोन प्रकारक रक्षा चाहैत छथि‍? तनक रक्षा, धर्मक रक्षा, सतीत्‍वक रक्षा आदि‍‍ महत्‍वपूर्ण तत्‍व अछि‍।

     आइ एकपेरि‍या धेने, चूप-चाप चलैत एसगरूआ बहीनकेँ एहि‍ बातक सदि‍खन आशंका बनल रहैत छैक जे क्‍यो आसूरी प्रवृति‍बला लोक रावण बनि‍ ओकर लोक-लाजकेँ समाप्‍त ने कऽ दै। एहि‍ लेल सभ बहीनक तरफसँ हम राखीक शुभ अवसरपर सभ भाइसँ दान स्‍वरूप ई लेबए चाहैत छी जे ओ अपन आसूरी प्रवृति‍, क्रोध, लोभ, मोह आदि‍ दान कऽ दथि‍। जाहि‍सँ हम अवला बहीनकेँ ई बुझना जाएत जे हमर पवि‍त्रता, हमर सतीत्‍व, हमर मान-मर्यादा सदि‍खन सुरक्षि‍त अछि‍। आ हमरा एक-आधटा नहि‍ अपि‍तु संसारक सभ पुरूष भाय बनि‍ हमर रक्षकक रूपमे सभठाम ठाढ़ छथि‍।

ओना परम-पि‍ता परमात्‍मा सभ आत्‍माक पि‍ता छथि‍। सबहक रक्षक पालक वएह छथि‍। हुनका समक्ष स्‍त्री-पुरूषक देहकेँ कोनो भेद नहि‍ छै। एहि‍ हेतु हम समस्‍त मैथि‍ल आ मैथि‍ली प्रेमीसँ हमर रक्षा-सि‍नेह रूपी बन्‍धन स्‍वीकार करू। परमात्‍मा अहाँक जीवनमे, शांति‍, शुभभावना, सि‍नेह, सहानुभूति‍, मधुरता पवि‍त्रता आदि‍ गुणसँ भरने रहथि‍। ई हमर शुभभावना अछि‍।

एहि‍ अमुल्‍य पावनि‍मे आत्‍मीक राखी अपन-अपन गट्टापर बान्‍हि‍, आत्‍म चेतनाक टीका लगा आ मीठ-मीठ बोलक मधुरसँ अपन मन आ आत्‍माकेँ मीठ राखी।

    

नाटक- बेटीक अपमान

नाटककार- बेचन ठाकुरजी

चनौरागंज (मधुबनी)

अंक-2

दृश्‍य- तेसर

 

 

(स्‍थान- बलवीर चौधरीक घर। सुरेश चौधरी बि‍आह-दानक संबंधमे गप करए पहुँचि‍ रहल छथि‍। बलवीर दलानपर कुर्सीपर बैसल छथि‍। तखनहि‍ सुरेशक प्रवेश)

 

सुरेश- नमस्‍कार, बलवीर बावू।

बलवीर- नमस्‍कार, नमस्‍कार। आउ पधारल जाउ।

(सुरेश कुर्सीपर बैसल छथि‍।)

बौआ टुनटुन, बौआ टुनटुन, एक लोटा जल लेने आउ। एकटा अभ्‍यागत पधारलाह अछि‍।

(टुनटुनकेँ एक लोटा जल लए कए प्रवेश)

सुरेश बावू, चरण पखारल जाउ।

सुरेश- आगू-पाछूबला कोन बात करैत छी। मि‍थि‍लाक जे रि‍वाज अछि‍ से नि‍भाबहि‍ पड़त। पहि‍ने चरण पखारू तहन कोनो बातचीत होएत।

सुरेश- बलवीर बावू, यद्यपि‍ हम वर पक्षसँ आएल छी। मुदा कि‍छु बात बनत तहन ने चरण पखारब। हमर बात-ददाक कहब छलनि‍। ओहि‍ परम्‍पराकेँ हम कोनो बि‍सरि‍ सकैत छी? होउ, गप कि‍छु आगू बढ़ाउ।

बलवीर- बाजू तखन, केम्‍हर-केम्‍हर अएलहुँ अछि‍?

सुरेश- कि‍छु दि‍न पूर्व अपने हमरा लग बाजल रही जे हमरा एहि‍ बेर एक गोट कन्‍यादान केनाय अछि‍। ओ कुटमैती अपने कएलहुँ वा नहि‍।

बलवीर- कहाँ कएलहुँ। नहि‍ ओतेक सम्‍पत्ति‍, अछि‍ आ ने कन्‍यादन कए पाबैत छी। घर तँ वर नहि‍, वर तँ घर नहि‍। की अहाँक नजरि‍मे कोनो लड़ि‍का अछ?

सुरेश- हँ अछि‍ हमरे भागि‍न।

बलवीर- केहेन घर-वर अछि‍?

सुरेश- अपना चशमासँ अपने देखब, से बि‍ल्‍कुल ठीक होएत। ओना हमरा समक्षसँ, नहि‍ बढ़ि‍या तँ खरावो कि‍यो नहि‍ कहि‍ सकैत छथि‍।

बलवीर- अहाँक वि‍चारसँ ई कुटमैती करैबला अछि‍?

सुरेश- हमरा वि‍चारसँ ई कुटमैती आँखि‍ मुनि‍ कऽ कए लि‍अ। लड़ि‍का-लड़ि‍की एकदम जोगम-जोग अछि‍।

बलवीर- सुरेश बावू, जदि‍ हम ई कुटमैतीमे ठकेलहुँ तहन हमर गृहणी कोरमे जीवन भरि‍ चटक करैत रहतीह। से यादि‍ राखि‍ लि‍अ।

     सुरेश बावू, हम हुनकामे सकबैन की नहि‍।

सुरेश- नहि‍ सकबैन तँ हम सकए देब। हम छी ने। आदर्श कुटमैती होएत।

बलवीर- जहन अपने ई डि‍ट्टो पावर लगाबैत छी, तहन हम नहि‍ देखब-तेखब। एक्के बेर काल्‍हि‍ छेके कए लेब। ई कुटुमैती पक्के बुझु। आबहु चरण पखारब की नहि‍?

सुरेश- आब चरणहि‍टा पखारब! जे नहि‍ से करब। पान, बीड़ी, सुपारी, सीगरेट, नश्‍ता, भोजन सबटा करब। पाछू काल कने समधीनो लग जाएव, फुसुर-फुसुर बति‍याएब। तहन गाम वापस जाएब। (पाएर धोलनि‍)

बलवीर- बौआ टुनटुन, अन्‍दरसँ नश्‍ता पानि‍ लाउ।

(टुनटुन अन्‍दरसँ नश्‍ता। पान, बीड़ी, सलाइ, सुपारी आनैत छथि‍। सुरेश ओ बलवीर नश्‍ता कए पान, सुपारी, बीड़ीक उपयोग करैत छथि‍।)

सुरेश बाबू, हम ठहरलहुँ एकटा साधारण वा गरीब लोक। हम की नश्‍ता कराएब, की व्‍यवस्‍था करब?

सुरेश- बाप रे बा..., एहेन नश्‍ता तँ हम बापो जनम नहि‍ खेने रही। मोन तँ गदगद भए गेल।

     आब चलबाक आज्ञा देल जाउ। कने भागि‍नो एहि‍ठाम जेबाक अछि‍ एखनहि‍। तहन ने काल्‍हि‍ ओ सभ छेका-छुकीक व्‍यवस्‍था करताह। बेस, जाय राम जी की।

बलवीर- जय राम जी की। कहल सुनल माफ करबैक सरकार।

(सुरेशक प्रस्‍थान)

पटाक्षेप

 

दृश्‍य चारि‍म-

(स्‍थान- दीपक चौधरीक घर। मोहनक छेकाक पूर्ण तैयारी। दलानपर एकटा डोलमे पानि‍ ओ लोटा राखल अछि‍। कुर्सीपर बैसि‍ कऽ प्रदीप कुमार ठाकुर पेपर पढ़ि‍ रहल छथि‍। कि‍छुए देर पश्‍चात सुरेश कामत, बलवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्‍देश्‍वर चौधरी ओ हरे राम सि‍ंहक छेकाक सामग्रीक संग प्रवेश। गंगाराम आ चन्‍देश्‍वर बलवीरक क्रमश: छोट भाए आ पैघ भाए छथि‍न्‍ह। हरे राम सि‍ंह बलवीरक बुजुर्ग पड़ोसी छथि‍। गंगा रामक हाथमे छेकाक श्रमजान अछि‍। दुआरि‍पर दस गोट कुर्सी लागल अछि‍।)

प्रदीप- (ठाढ़ भऽ कऽ) नमस्‍कार कुटुम, नमस्‍कार कुटुम, नमस्‍कार कुटुम। (कल जोड़ि‍ दुनू तरफसँ नमस्‍कार पाती भए होइत।)

    आउ, आउ, पधारल जाउ, पधारल जाउ। पहि‍ने सभ कि‍यो चरण पखारू।

(सभ कि‍यो चरण पखारि‍ रहल छथि‍। आ बारी-बारीसँ कुर्सीपर बैसैत छथि‍।)

    सुरेश बावू, कने हम अन्‍दरसँ आि‍ब रहल छी।

सुरेश- बेस जाउ।

(प्रदीप अन्‍दर जा कऽ दीपकक संग आबैत छथि‍।)

दीपक- नमस्‍कार समधि‍, नमस्‍कार कुटुम, प्रणाम मामाश्री। (कल जोड़ि‍ दुनू तरफसँ नमस्‍कार पाती भेलनि‍।)

कहु समधि‍, अपने सभ कि‍यो आबि‍ गेलि‍ऐक।

बलवीर- हँ, हँ, हमरा लोकनि‍ सभ ि‍कयो आबि‍ गेलहुँ।

दीपक- धन्‍यवाद। बौआ, गोपाल, गोपाल।

(अन्‍दरसँ गोपाल कहलनि‍- जी बाबूजी)

कने एम्‍हरौ धि‍यान देब बौआ।

(गोपाल नश्‍ता लऽ कए प्रवेश ट्रे मे संगमे सोहन सेहो छथि‍। सोहन सभकेँ नश्‍ता दैत छथि‍। सभ कि‍यो नश्‍ता कए हाथ मुँह धोइ कऽ बैसैत छथि‍।)

प्रदीप- गोपाल बौआ, कने चाह-पान, बीड़ी-सुपारी, सि‍करेट-सलाइ सेहो देखहक।

गोपाल- जी चच्‍चा, जाइत छी।

(गोपाल अन्‍दर जा कए ट्रे मे सभ कि‍छु आनैत छथि‍। सोहन सभकेँ पहि‍ने चाह दैत छथि‍ पीवलाक पश्‍चात पान-बीड़ी-सि‍करेट दैत छथि‍। जनि‍का जे मोन होएत छनि‍ से लैत छथि‍। नश्‍ता-पानि‍सँ सभ नि‍वृत छथि‍। सोहन ओ गोपाल ठाढ़ छथि‍।)

सुरेश- भागि‍न, बौआकेँ बजाउ। गामपर कि‍यो नहि‍ छथि‍ भैंस हमरे हाथपर लगैत अछि‍।

दीपक- हँ, हँ, आबि‍ रहल छथि‍। तैयार भए रहल छथि‍।

प्रदीप- सुरेश बाबू, अहाँक भैंस अहीं हाथपर लगैत अछि‍। भैंस बड़ दुलारि‍ छथि‍। सुरेश बाबू छेका-छुकी तँ होइबहि‍ करत। पहि‍ने दस आदमीक बीचमे लेन-देन फाइनल भऽ जाए। बादमे तू-तू-मै-मै कइलासँ प्रति‍ष्‍ठे जाइत अछि‍।

हरेराम- सुरेश बाबू, प्रदीप बाबूक गप्‍प हमरा बड्ड नीक लागल। हदमद्दीसँ नीक उल्‍टीए। बाजू, प्रदीप बाबू अहीं, कोना की लेन-देन?

प्रदीप- हम नहि‍ बाजब। बजताह सुरेश बाबू। कुटुमकेँ वएह आनलथि‍। कोना की गप करथि‍न्‍ह, से तँ वएह ने कहताह।

हरेराम- बाजू सुरेश बाबू, केना की गप्‍प?

सुरेश- कोनो गप्‍प-सप्‍प नहि‍। हम बलवीर बाबूकेँ यएह कहलि‍यन्‍हि‍ जे ई कुटमैती करैबला अछि‍ आ ओ भऽ कऽ रहत। एहि‍मे हम पड़ल छी।

गंगाराम- तहन छेकामे वि‍लंब ि‍कएक सुरेश बाबू? एत्ते टाइल गुल्‍ली खेलाबाक कोन प्रयोजन? एत्ते कि‍यो छि‍रहारा खेलए।

चन्‍देश्‍वर- यौ सुरेश बाबू, सभटा अहींक चक्कर चालि‍ छी। कहलहुँ आदर्श कुटमैती आ देखि‍ रहल छी बटुआ भरू कुटमैती अऍं यौ, एखुनका युग माने अल्‍ट्रासाउडक युगमे लड़ि‍कोक अभाव अछि‍। ओहि‍ हि‍साबे लड़ि‍कीएक बड़ अभाव अछि‍। हमरा ई कुटुमैती नहि‍ करबाक अछि‍।

हरेराम- हरबराउ नहि‍ बौआ। नवका कुटमैतीमे एहि‍ना तोड़-जोर हेाइत अछि‍। अहाँ शांत रहु। देखि‍यौक की होइत छैक? मॉं सरस्‍वतीक कि‍रपा हेतैन तँ भऽ जाएत। कोनो काज हरबराए कऽ नहि‍ करी।

प्रदीप- हरेराम बाबू, चन्‍देश्‍वर बाबू एतेक गैसमे कि‍एक आबि‍ गेलाह। कोनो कुटमैती कएने छथि‍ की नहि‍।

गंगाराम- हँ, हँ, अहींटा कुटमैती कएने छी। आ देखने छी। हमरा एहेन दलालबला कुटुमैती नहि‍ करबाक अछि‍। लड़ि‍काक लेल दुनि‍या, बड़ीटा अछि‍।

प्रदीप- गंगाराम बाबू, अहूँ बड़ भासि‍ रहल छी। कने होशमे बात करू।

हरेराम- ओम शांति‍, ओम शांति‍, ओम शांति‍। कृपया सभ कि‍यो शान्‍त होउ। हल्‍ला गुल्‍ला नहि‍ होएवाक चाही। प्रदीप बाबू, कने दीपक बाबूसँ एक बेर अंदर जा कऽ वि‍चार करि‍औक। ओना आधुनि‍क युगमे बेटीक बड़ अभाव अछि‍ आओर बेटा भरमार अछि‍।

प्रदीप- ठीक कहलहुँ हरेराम बाबू, कने हम आ दीपक बाबू अंदरसँ आबि‍ रहल छी।

(दीपक ओ प्रदीप अन्‍दर गेलाह। कुटुम लोकनि‍ दुआरि‍पर बैसल छथि‍। फेर सुरेश सेहो अन्‍दर जाइत छथि‍। तीनू अंदरमे गप्‍प करैत छथि‍।)

सुरेश- भागि‍न प्रदीप, हमर प्रति‍ष्‍ठा बचाउ। हम हि‍नका सभकेँ कहि‍ देने छि‍यन्‍हि‍ जे बि‍आह आदर्श होएत।

दीपक- से बि‍ना बुझने अहाँ कि‍एक कहि‍ देलि‍ऐक।

सुरेश- से हम बड़ पैघ गलती कएलहुँ।

दीपक- अहाँकेँ कम-सँ-कम पाँचो लाख टाका नगद आ अलावे सब समान कहबाक चाही की ने। बुढ़ पुरान भऽ कऽ भसि‍या जाइत छी मामा।

सुरेश- तोहर जे मोन छह, ताहि‍पर कुटमैती नहि‍ हेतह भागि‍न। जाह, दोसरे कए लि‍ह। हमरा एतेक मोलाइमे सम्‍हारल नहि‍ होएत।

(अन्‍दरसँ खि‍सि‍या कऽ आबि‍ दुआरि‍पर बैसैत छथि‍।)

प्रदीप- आब ई कुटमैती लागि‍ रहल अछि‍ जे नहि‍ सम्‍हरत। दीपक बाबू, छोड़ू लोभ-लालच। कहबी अछि‍- लोभ: पापस्‍य कारणम्। अहाँ मामाश्रीकेँ कसि‍ कऽ पकड़ू। कुटमैती तँ केनाइ अछि‍। आदर्शे रहए दि‍यौक। अन्‍यथा अहुँक प्रति‍ष्‍ठा चलि‍ जाएत आओर ममोक प्रति‍ष्‍ठा चलि‍ जाएत। दुआरि‍पर सँ एहेन सम्‍हरल कुटुमकेँ नहि‍ घुमैबाक चाही।

दीपक- तहन की कएल जाए, सर?

प्रदीप- कने मामाश्रीकेँ बजाबि‍औन आ हुनकेपर सभटा छोड़ि‍ दियौन्‍ह।

दीपक- बेस सर, मामाश्रीकेँ बजाबैत छि‍यन्‍हि‍।

(बाहर आबि‍ मामाश्रीकेँ कहैत छथि‍। मामाश्री, यौ मामाश्री, मामाश्री यौ)

सुरेश- कने प्रदीप बाबू भीतर बजाबैत छथि‍।

(सुरेश अन्‍दर जाइत छथि‍। प्रदीप दीपक ओ सुरेश अन्‍दरमे गप-सप्‍प करैत छथि‍।)

प्रदीप- अहीं जे-जेना करबै सुरेश बाबू, सएह होएत। एतय प्रति‍ष्‍ठाक सवाल अछि‍। खाली एना करबाक प्रयास करबैन जाहि‍सँ साँपो मरि‍ जाए आ लाठीयो नहि‍ टूटए।

सुरेश- चलै‍-चहल दुआरि‍पर। कुटुम्‍बो की कहैत होएताह। की नहि‍। हम एक्के बेर बाजबह। ओहि‍मे गुंजाइश होएतह तँ करि‍हह, नहि‍ तँ तोहूँ घर, उहो घर।

(सभ दुआरि‍पर आबैत छथि‍।)

बलवीर- हरेराम बाबू, कने पुछि‍यौन्‍ह, की केना वि‍चार भेलन्‍हि‍?

हरेराम- सुरेश बाबू, की केना वि‍चार भेल? हमरा सभकेँ जल्‍दी कहु। बड़ वि‍लंब भए रहल अछि‍।

सुरेश- हम ि‍हनका सभकेँ कहलि‍एनि‍ जे बलवीर बाबू नवका टीचर छथि‍। ई बेचारा गरीबे छथि‍। ई आदर्श वि‍आह करताह। ताहुमे ओ कोनो अन्न-छेरू नहि‍ छथि‍, मुर्ख-गमार नहि‍ छथि‍ जे ठकि‍ लेताह। बेचार लड़ि‍कीबला अपना मुँहसँ कहलाह जे हम जे कि‍छु देबैन से अपन बेटी-जमाएकेँ देबैन ने, कि‍नको आनकेँ देबैन फेर ओ बजलन्‍हि‍ जे हम ओतेक जरूर देबैन जाहि‍सँ कोनहुँ पक्षकेँ प्रति‍ष्‍ठापर नहि‍ पड़ए।

प्रदीप- बस करू। लेन-देनक गप्‍प खतम करू आओर छेका-छुकीक कार्यक्रम शुरू करू। की यौ दीपक बाबू, गप्‍प मंजूर अछि‍ की नहि‍?

दीपक- जाउ, अपने सभ जे जेना करि‍औक। मंजूर अछि‍।

हरेराम- तहन दीपक बाबू, पुरहि‍तकेँ खबर कएने छी?

दीपक- आइ भि‍नसरे खबर केलि‍एन्‍हि‍। ओ अएलो छथि‍। कखनो देखने रहि‍यन्‍हि‍। कोनाे जजमान ओहि‍ठाम गेल होएताह।

हरेराम- कने जल्‍दी, पुरहि‍तोकेँ देखि‍यौन्‍ह आ लड़ि‍कोकेँ बजाउ।

प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहि‍तकेँ जल्‍दी ताकि‍ आनू

(सोहन अंदर जाइत अछि‍)

प्रदीप- जाउ बौआ सोहन, पुरहि‍तकेँ जल्‍दी ताकि‍ आनू।

(सोहन अंदर जाइत अछि‍।)

बौआ गाेपाल, भैयाकेँ बजाउ।

(गोपाल सेहो अंदर जाइत अछि‍। पहि‍ने पुरहि‍तक संग सेाहनक प्रवेश। पुरहि‍तकेँ सभ कि‍यो साग्रह बैसाबैत छथि‍। तहन गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ गोपालक संग मोहनक प्रवेश। मोहन सभकेँ पएर छुबि‍ प्रणाम करैत छथि‍ आ सभ कि‍यो आशीर्वाद दैत छथि‍न्‍ह।)

हरेराम- बैसु बौआ। (मोहन बैसि‍ जाइत छथि‍)

की नाम छी?

मोहन- मोहन कुमार चौधरी। (ठाढ़ भऽ कऽ)

हरेराम- पि‍ता जीक की नाम छी?

मोहन- श्री प्रदीप चौधरी।

हरेराम- परदादाक नाम की छी।

मोहन- (असमंजशमे पड़ि‍) नहि‍ बुझल अछि‍।

हरेराम- खाइर छोड़ू, कोनो बात नहि‍। अहाँ करैत की छी?

मोहन- दि‍ल्‍लीमे एक्‍स-पोर्ट छी।

हरेराम- अच्‍छा, बैस जाउ। (मोहन बैस जाइत)

पुरहि‍त, आब अपन कार्यक्रम शुरू कएल जाए। बड़ वि‍लंब भए गेल।

बौआ- हँ हँ, हमहुँ दुपहरि‍यामे अएलहुँ। एम्‍हर-ओम्‍हर घुमि‍ रहल छलहुँ वि‍लंब देखि‍। आउ बौआ पीढ़ि‍या बैसू। (मोहन पीढ़ि‍यापर आ पुरहि‍त कंबलपर बैसैत छि‍थि‍ कलशमे पानि‍ छन्‍हि‍। बौआ झा दीपकसँ कुश मंगबैत छथि‍।)

सुनू कुटुम सभ, हम वि‍धेटा पुराएव। कारण छेकाकेँ बड़ लेट भए रहल अछि‍। समए सेहो ठंढ़ी अछि‍।

सुरेश- पंडीजी, अहाँकेँ जे नीक लगए से करू।

बौआ- पढ़ु बौआ, ओम श्री गणेशाय नम: -5

मोहन- ओम, श्री गणेशय नम: -5 

बौआ- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5

मोहन- ओम श्री गौरीके शंकराय नम: -5

बौआ- ओम, श्री बराय नम: -5

मोहन- ओम, श्री बराय नम: -5

बौआ- ओम, श्री कन्‍याय नम: -5

माेहन- ओम, श्री कन्‍याय नम: -5

बौआ- अोम श्री शुभ ि‍बयाहै नम: -5

मोहन- अोम श्री शुभ ि‍बयाहै नम: -5

(अन्‍दरमे छेकाक गीत भए रहल अछि‍ छेकाक डाली मोहनक दुनू हाथमे गंगाराम देलखि‍न।)

बौआ- बौआ जाउ, डाली गोसाइ लग राखि‍ आउ।

(मोहन सभकेँ पाएर छुबि‍ गोर लगैत छथि‍ कुटुम सभ हुनका गोर लगाइ दैत छथि‍।)

दीपक बाबू, हमरा दक्षि‍णा दि‍अ। हमरा बड़ वि‍लंब भए रहल अछि‍।

दीपक- भोजन-साजन कए लि‍अ आ राति‍मे एतै वि‍श्राम करू।

बौआ- भोजन-साजन कए लेब, से संभव अछि‍। मुदा रात्रि‍ वि‍श्राम असंभव अछि‍। यौ बाबू हमर कन्‍या बड़ डरबुक छथि‍। बि‍ना हमरा रहने हुनका नीने नहि‍ होइत छनि‍।

प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँ वि‍आह कहि‍या करए चाहैत छी?

बलवीर- अहाँ जहि‍या करू।

प्रदीप- पंडीजी, कने बि‍आहक दि‍न देखि‍यौक।

(पंडि‍जी पतरा देखैत छथि‍।)

बौआ- काल्‍हुक दि‍न अछि‍। परसुओक दि‍न अछि‍।

चारम-पाँचम-छठम दि‍न नहि‍ अछि‍। फेर सातम दि‍न अछि‍। (एक सए टका लऽ कऽ प्रस्‍थान)

प्रदीप- बलवीर बाबू, अहाँकेँ कोन दि‍न पसीन अछि‍?

बलवीर- हम बेटीबला छी। हमरा बड ओरि‍यान करए पड़त। हम सातम दि‍नका वि‍आहक दि‍न मंजूर करैत छी।

प्रदीप- बेस, बि‍आहक दि‍न फैनल भए गेल, सातम दि‍नका। गोपाल कने भोजनक जुगार देखहक।

गोपाल- (गोपाल अन्‍दर जा कऽ आबि‍) चाचा भोजन तँ तैयार अछि‍। भोजन सराए रहल अछि‍।

प्रदीप- हरेराम बाबू, चलै-चलू भोजन करए।

सोहन बौआ, लोटा आ बाल्‍टीनमे पानि‍ नेने आउ। (सोहन अन्‍दरसँ बाल्‍टीनमे पानि‍ आनैत छथि‍।)

कुर्रा- उर्रा करै जाइ-जाउ सरकार।

(सभ कि‍यो कुर्रा कए तैयार छथि‍।)

चलै चलू भोजनमे।

(सबहक प्रस्‍थान) पटाक्षेप

 

दृश्‍य पाँचम क्रमस: आगाँ-