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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

मैथिली लघुकथा १. पुरुषक नहि विश्वासे- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र २.प्रणव झा- अरजल जमीन

मैथिली लघुकथा

 

 

पुरुषक नहि विश्वासे

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

 

आशुतोष गोड्डा सं छला आ सैनिक स्कूल तिलैया सं 12वीं पास केलाक बाद दिल्ली विश्विद्यालय में बी एस सी में नामांकन लेने छला। पढबा में तेज आ अपना विषय के प्रति साकांक्ष छला। भाषा में बहुत निक पकड़ छलनि जाहि कारने शिक्षक आ विद्यार्थी में बहुत चर्चित छला।शब्द केर प्रयोग, ओकर उचाचरण, लालित्य सब किछु में बेजोड़ छला आशुतोष।ई एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार सं छलाह। तीन भाई – एक पैघ एक छोट आ आशुतोष बीच में।आशुतोष केर जेठ भाय हिनका सं तीन वर्ष केर पैघ आ ओहो सैनिक स्कूल तिलैया केर छात्र।हिनक पिता छोट छीन सड़क इत्यादि के मरम्मत के ठीकेदारीकरैत छलथिन आ घर इत्यादि सम्हारक काज आशुतोष केर माय जे की चतुर गृहणी छलथिन करैत छलथिन। कहि नहि कथिलेल आशुतोष के सैनिक अधिकारी बनबाक भुत नेने सं सवार छलनि। हुनकर जीवन केर एक मात्र उद्देश्य सैनिक अधिकारी बनब छलनि। अपन कक्षा केर एक लड़की चंद्रकला सं नहु-नहु आशुतोष केर सामिप्य भ रहल छलनि। ओना प्रारम्भ में ई सामिप्य सहज आ पढबाक जिज्ञासा धरि सिमटल लेकिननित-नित आगा आ प्रगाढ़ होइत।

 

आशुतोष जखन बी एस सी में पढ़ैत छला ताहि क्षण अपन क्लास केर सब छात्र संग फील्ड वर्क लेल एक आत्मीय प्रोफेसर के संगे गुजरात गेल छलनि। ओतय मनोयोग सं काज केलनि। करीब 25 दिन रहला। हुनका संगे चंद्रकला सेहो छलथिन।  चंद्रकला सावरि, सुनदरि छलि। अति संस्कारवती। चंद्रकला केर पिता इनकम टैक्स केर कमिश्नर छलथिन।  दू भाई के बीच असगर बहिन। चंद्रकला  बीच में – एक भाय जेठ आ एक छोट। उपर सं जेठ भाय आई आ भाउज दुनू आई आर एस आ इनकम टैक्स विभाग में पदाधिकारी। मुदा अहि बातक लेशो मात्र घमण्ड नहि छलनि। चंद्रकला सामान्य वस्त्र पहिरैत छली।  मेक उप सेहो नाम मात्र।  अपन पैघ-पैघ आंखि में काजर जरुर लगबैत छली जे हुनका सौन्दर्य के कतेक गुणा बढ़ा दैत छल. चंद्रकला केर पहचान हुनकर सहजता, लज्जा भाव, आ पढ़ाई में समर्पण छलनि। आशुतोष संग काज करैत-करैत नहि कहि कोना चंद्रकला आशुतोष संग प्रेम करे लगलनि।  आशुतोष के सेहो एहि बातक भान जल्दी भ गेलनि। बिना बिलम्ब केने आशुतोष सेहो अपन ठोर मुसकियबैत चंद्रकला के अपन प्रेमक स्वीकृति द देलथिन। चंद्रकला के एकाएक भेलनि जे समस्त संसार केर ख़ुशी जेना हुनका तुरत भेट गेलनि। मोन भेलनि जे मस्त भ सरिसो के खेत सं भरल खेत में नृत्य क सरिसबक पीयर फुल सं भरल खेत में घुसबो केली। दुनू हाथ आसमान दिस उठेली आ सिनेमा केर गीत “चलती फिरूं उड़ती चलूं आज गगन में” गेनाई शुरू केलनि।  एकै आखर के बाद लज्जा आ हुनकर संस्कार जेना चंद्रकला के हाथ पकडि रोकि दनि? थमि गेली। भेलनि “ई की भेल?” यैह सब सोचैत-सोचैत नहु-नहु चलय लगलनि। करीब पांच डेग चलल हेती की कनि दूर सं आशुतोष केर हाकब सुनेलनि: “चंद्रकला, चंद्रकला? कत छी?”

 

आब चंद्रकला आरो साकांक्ष होइत झट दनि सरिसबक खेत सं बाहर आबय लगली. लाज होम लगलनि, “कहीं आशुतोष हमरा हाथ ऊपर केने सरिसबक खेत में गबैत आ नचैत त नहि देख लेलनि? हे भगबान! अगर देख लेला त की सोचता?” अहि तरहक भाव मोन में बेर-बेर आबय लगलनि। डेग झटझारइत खेत सं बाहर आबय केर उपक्रम केली। अहि बीच आशुतोष आबि गेलाह अकचकाईत पुछलथिन: “की भेल चंद्रकला! अहाँ खेत में की क रहल छी? हम अहाँ के बगल बला गाम में किछु जानकारी लेबाक हेतु अपना संगे ल जाय चाहैत रही।"

 

अकचकाइत अपन वस्त्र आ भाव-भंगिमा के ठीक करैत बाहर अबैत चंद्रकला बजली: “कुनो बात नहि। ओहिना सरिसब के फूल निक लागल त कनि भीतर खेत में घुसि गेलौं।  देखू ने कतेक सोभनगर लगैत छैक? दिल्ली में की ई भेटत?”

 

आशुतोष बिना किछु कहने अपन मुशकान सं हुनकर बात के हाँ कहलनि।

 

आब चंद्रकला बजली: “चलू ने कुन गाम चलक अछि? हम तैयार छी. हमर रेकार्डर, पेन, नोटबुक सब किछु हमरा लगे अछि।”

आशुतोष कनि रोमांटिक भ गेला। एहि क्षण चंद्रकला हुनका कनि अधिके सुन्नरि लगैत छलथिन। आगा बढैत चंद्रकला के हाथ अपन हाथ में लैत कहलथिन: “हाँ, सरिसब के फूल त एहि खेत में सत्ते बड्ड निक लगैत छैक। मोन त होइत अछि अहि खेत के बीच में हमहु घुसी?”

 

चंद्रकला लजाईत बजली: “ठीके घूस चाहैत छी अहाँ?”

 

आशुतोष: “अहाँ मोने की झुट्ठे? बहुत मोन क रहल अछि।"

 

चंद्रकला: “ठीक छैक। तखन घुसु ने सरिसबक खेत में हमरा लग कैमरा अछि। हम फोटो खीचैत छी।"

 

आशुतोष: “मुदा हमर एक शर्त अछि।"

 

चंद्रकला: “की शर्त”?

 

आशुतोष: “हमरा संगे अहुं चलू खेत में। आ दुनू गोटे एक संगे फुलक सौन्दर्य, प्रकृति केर सजल रूप आ खेतक हरियर-पीयर स्वरुप के देखी, निहारी आ ओकरा संगे तारतम्य स्थापित करी”।

चंद्रकला लजा गेली।  फुसिये के अभिनय करैत बजली: “नहि-नहि अहाँ जाऊ। हम की करब जाक?”

 

चंद्रकला के लज्जा भाव में हाँ अथवा स्वीकारोक्ति केर अभिव्यक्ति स्पष्ट देखल जा सकैत छल। चंद्रकला के प्रेम में मग्न भेल आशुतोष जेना चंद्रकला केर अंतर्मन केर भाषा बुझि गेला। बिना समय बरबाद केने चंद्रकला के हाथ पकरि खेत के भीतर जाय लगला। उन्मादित मोन सं नहि-नहि कहैत चंद्रकला आशुतोष संगे खेत में बिदा भेली। आशुतोष केर पकड़ जोर भेल गेलनि। चंद्रकला आशुतोष केर हाथक दबाब सं आनंदित छली। तिल-तिल अनुराग बढ़ल जा रहल छलनि। आशुतोष सेहो गदगद छला। दुनू खेतक तह में घुसि गेलनि। आशुतोष एकाएक चंद्रकला के अपन बाहुपास में जकडि लेलनि। नहि-नहि कहैत चंद्रकला लाजवंती केर पात जकां समटल आशुतोष केर शरीरक अत्यधिक सामीप्य प्राप्त पाबि बैकुंठक सुख में विलीन होमय लगली। बिना कुनो प्रतिकार केने अपना आपके आशुतोष के उपर न्योछावर भ गेली। एकरा कहैत छैक नैशर्गिक प्यार आ प्यार में समर्पण। सघन खेत में फेर दुनू के बीच सब किछु भेल जे स्थापित आ कमिटेड प्रेमी-प्रेमिका में होइत छैक।  हाँ, अपन मोन के सबल करबा लेल चंद्रकला आशुतोष के छाती सं सटैत, आशुतोष केर ह्रदय केर केश के जकरैत नहु-नहु कान में अतेक जरुर कहलथिन: “आशु, अहाँ हमरा कहियो छोड़ब त नहि?”

 

प्रेम में – शरीर आ मोन दुनू – पागल आशुतोष झट दनि कनि ठसकल स्वर में बजला: “की कहैत छी चंद्रकला? हम आ अहाँ आब कहियो कुनो स्थिति में अलग नहि हैब।  हाँ भ सकैत छी अगर अहाँ के हम पसीन नहि आबि आ कुनो अहाँ के पिता, भाई, आ परिवार के स्टेटस बला भेट जाय।"  

 

चंद्रकला आशुतोष के एहि बात सं तमसा गेली। कनि रुसैत उत्तर देलथिन: “की कहैत छी आशु? हमरा लेल अहाँ सबसँ उत्तम छी। अहाँ सफल रहि, असफल रही, हम अहाँ संगे आनंदित रहब।  आई सं परिवार आ स्टेटस के बात नहि होबाक चाही।”

अपन गलती के अनुभव करैत आशुतोष बिना किछु कहने अपन कान पकरैत चंद्रकला सं माफ़ी मांगि लेलनि। चंद्रकला सेहो फेर सं हुनक छाती सं सटि गेली। दू शरीर एक आत्मा बनि चुकल छल आ निश्छल प्रकृति केर कोरा में बिहंसि रहल छल। ने कुनो छल ने प्रपंच। ने शहर केर कोलाहल ने थोपल स्टेटस केर मर्यादा। निष्कपट, प्रांजल, शुद्ध, आ नैशर्गिक प्रेम। आधा घंटा कोना बीत गेलनि से पते नहि चललनि। एक त निरजन में खेत दोसर दुपहरिया के बेर।  कियोक नहि एलेक। आधा  घंटा के बाद आशुतोष चंद्रकला के माथ, आंखि, गाल, ठोर आ गरदनि में चुम्मा लैत गदगद भेला। चंद्रकला कुनो प्रतिकार नहि केलथिन। अंत में ओहो एक बेर आशुतोष के पकरि ठोर में चुमि लेलथिन। फेर दुनू गोटे चकवा चकवी जकां हाथ में हाथ देने खेत सं बाहर एलनि आ दोसर गाम दिस अपन फील्डवर्क लेल बिदा भेलनि। भरि रस्ता गप्प कम केला मुदा दुनू ख्वाब में रह्लनि।

 

किछु दिनक बाद दुनू – आशुतोष आ चंद्रकला फील्ड-ट्रिप सं वापस दिल्ली विश्विद्यालय आबि गेलनि। आब प्रति दिन चंद्रकला आशुतोष लेल किछु-ने-किछु जरुर लबैत छली। क्लास समाप्त होइते एक ठाम बैसनाई, सिनेमा देखनाई, निरुला में किछु खेनाई, आर्ची गैलरी सं बिभिन्न तरहक कार्ड कीनब ओहि में अपन मोनक अभिव्यक्ति करैत एक दोसर के देब, लेब करैत समय भागल जा रहल छलनि। चंद्रकला केर शरीर के दोसरे रंगक चुहचुही आबि गेल रहनि। मस्त अलमस्त, मुदा संयत भाव सं सुन्दर स्वाभाव आ संस्कार सं।  अनुकरणीय, निक प्रेमक परिभाषा या दृष्टान्त एकरे कहल जा सकैत छल।

 

समय अपन प्रवाह सं चलैत अछि।  एकर गति पर ककरो नियंत्रण नहि।  चंद्रकला आ आशुतोष बी.एस. सी. पास केलाक बाद एम. एस. सी. में आबि गेलनि। आब चंद्रकला अपन अधिक सं अधिक क्षण आशुतोष संग बिताबय चाहैत चंद्रकला। अपन पिता आ यूनिवर्सिटी केर एक प्रोफेसर सं सिफारिस करा विमेंस हॉस्टल में आबि गेली। तर्क देलथिन जे रिसर्च लेल अपना आपके तैयार करती।  पिता आ भाई कतेक बेर हिनका प्रशासनिक सेवा लेल प्रोत्साहित केलथिन मुदा चंद्रकला अपन धुन में मगन रहली जे शोध करती आ यूनिवर्सिटी में पढ़ेती। घरक लोक थाकि क छोडि देलथिन। 

 

आशुतोष कॉलेज के हॉस्टल सं यूनिवर्सिटी हॉस्टल में राघब लग आबि गेला। आब 8 बजे राति धरि आशुतोष आ चंद्रकला एक दोसरक सामिप्य में रहे लगलनि। प्रेम तिल-तिल बढ़ल गेलनि। विभाग केर सब छात्र आ बहुत शिक्षक सेहो बुझि गेल्थिन जे हिनक प्रेम सॉलिड रॉक छनि। एहि बीच आशुतोष केर ध्यान एकाएक भारतीय सेना के अधिकारी बला नोकरी दिस चलि गेलनि। अते चंद्रकला आ आशुतोष में अंतर छलनि। चंद्रकला केर इच्छा सामान्य जीवन जिबाक रहनि। ओ चाहैत छली जे आशुतोष सेहो हुनके जकां शोध करथि आ यूनिवर्सिटी अथवा कुनो कॉलेज में पढ़ाबथि। लेकिन आशुतोष अपन जिद पर डटल रहला। चंद्रकला आशुतोष केर भावना के सम्मान करैत चुप भ गेली। चंद्रकला कनि दब्बु प्रकृति के छली। कखनो काल आशुतोष हुनकर एहि स्वभाब के गलत फायदा उठबैत छलनि।

 

आशुतोष केर किछु व्यवहार राघब के  विचित्र लगैत छलनि। ओ हमेशा स्मार्ट बनि रहैत छला। ढंग सँ वस्र पहिरनाई, गर्दनि में स्कार्फ़ केर प्रयोग, मोछ के ऊपर ऐंठब, छाती तानि क रहब, गर्दनि ऊंच आ सोझ केने चलब, हमेशा गंभीर रहब, अंग्रेजी केर उच्चारण आ शब्दाबली पर अधिक ध्यान राखब किछु एहेन गुण सँ युक्त छला आशुतोष।  पढ़बा में आशुतोष नीक छला। कुनो बातक वर्णन अथवा फील्ड वर्क केर रिपोर्ट साधल मानवशास्त्री जकाँ करथि। राघब के जूनियर रहितौं आशुतोष राघब केर भाषा एवं अन्य चीज़ सबके ठीक करैत छलथिन। आर त आर राघब केर एम फिल केर रिपोर्ट केर जखन अंतिम रूप बनि गेलनि  त ओ आशुतोष के भाषा शुद्धिकरण एवं सिंगार लेल देलथिन। आशुतोष सेहो एहि काज के बहुत प्रोफेशनल ढंग सँ केलनि। 10 दिन में पूरा रिपोर्ट के सुन्दर, सोभनगर आ व्यवस्थित क देलथिन। फाइनट्यून भेलाक बाद राघब ओकरा बाइंडिंग लेल द देलथिन। आशुतोष सेहो राघब के बहुत सम्मान करैत छलथिन।

 

आशुतोष प्रतिदिन वर्जिस करैत छला। अपन कक्ष में सद्दाम हुसैन केर फुल स्केल पोस्टर रखैत छला। पोस्टर के नीचा अपना हाथे लिखने रहथि - LET US IMBIBE HIM 

 

ई किछु एहेन बात रहैक राघब के कोनादन लगलनि। एक दिन राघब हुनका सँ जिज्ञासा केलथिन, "आशुतोष, ई सद्दाम केर पोस्टर आ ऊपर सँ अहाँक स्लोगन। एकर मतलब हमरा नहि लागल?"

आशुतोष बिहँसैत बजला, "सर, सद्दाम केर दृढ़ इच्छाशक्ति, निर्णय आ हिम्मत हमरा प्रभावित करैत अछि। अमेरिका सनक देश के असगरे हिलेने अछि। सैनिक शाशक हो त सद्दाम सन। तांहि हम सद्दाम के पसिन करैत छी। देखू, हमेशा ई सैनिक केर वर्दी में रहैत अछि। सब सँ पहिने अपने निर्णय लैत अछि । युद्ध भूमि में सेहो आगा रहय बला नेता अछि एहि सँ एकर सेना में जोश भरल रहैत छैक।“

 

राघब यद्यपि आशुतोष केर तर्क सँ बहुत प्रभावित त नहि भेला  हुनकर जोश आ उमंग राघब के अवश्य प्रभावित केलकनि।

 

एकदिन आशुतोष राघब के संबोधित करैत कहलथिन, "सर, हमरा जीवन मे मात्र एक नौकरी प्रभावित करैत अछि -सेनाक नौकरी। अगर रईसी आ गौरव के जीवन जीबाक हो त सेना में अधिकारी के नौकरी जॉइन करु।" 

 

आशुतोष केर आँखि सँ साफ बुझना जा रहल छलनि जे हुनकर जीवन केर उद्देश्य की छनि। राघब केर दोसर प्रश्न छ्लनि: "आखिर की बात एहेन छैक एहि में? अहाँ नीक विद्यार्थी छी, प्रशासनिक सेवा में जा सकैत छी, आई पी एस बनू, किछु क सकैत छी। पुलिस में सेहो कम सुविधा थोड़े ने छैक? अहाँ रिसर्च में नीक क सकैत छी। बहुत उत्तम स्तर केर शिक्षक भ सकैत छी?"

 

आशुतोष बजलनि, “सर, हम अपने सँ सेना के ऑफिसर्स केर ठाठ देख चुकल छी। भले पाई कतौ भेटय लेकिन जे सुविधा, मस्ती, रोब आदि सेनाक ऑफिसर होबा में छैक से कतौ उपलब्ध नहि।“

 

आशुतोष के सैन्य अधिकारी बनबाक उच्च आकांक्षा देखि राघब अपना आप के मौन रखनाई उचैत बुझलनि। लेकिन मोने मोन थोड़ेक आशुतोष केर भविष्य के ल'क चिंतित जरूर भ गेला।

 

एम एस सी प्रीवियस के नवम मास में एकाएक एक दिन आशुतोष चंद्रकला के कहलथिन , "देखू, हम परीक्षा नहि देब। आब हम राति दिन सैनिक अधिकारी बला एंट्रेंस कर तैयारी करब।" 

चंद्रकला : "ई बात त ठीक। मुदा परीक्षा देब में की हर्ज? कम सँ कम हॉस्टल में रहबाक अधिकार त रहत?"

 

आशुतोष: "से त ठीक मुदा हम दू नाव में पैर नहि राखै चाहैत छी। सब समय आ ऊर्जा हम अपन प्रतिस्पर्धा बला परीक्षा में लगबे चाहैत छी।"

 

चंद्रकला के बुझा गेलनि जे आशुतोष के बुझेनाई असंभव अछि। चुपे रहब में अपन आ आशुतोष दुनू के हित बुझना गेलनि।

 

खैर, समय बितैत रहल आ आशुतोष अपन तैयारी में संलग्न रहला। अंग्रेजी आ जनरल नॉलेज कर चिंता हुनका नहि छलनि। हां कनि फिजिकल फिटनेस में डर रहनि। पहिल बेर में लिखित परीक्षा नहि पास क पेलनि। निराश भेला। दू-तीन धरि मौन भ गेला। ने बाजब ने भूकब। भोजनो नीक सँ नहि करथि। हाँ, दू-तीन बेर राघब लग आबि अवश्य बाजथि, "ई नहि पचा पाबि रहल छी सर जे लिखित परीक्षा में हमरा कथी लेल नहि भेल?"

 

राघब सेहो दुखी छला। भरोश दैत कहलथिन, "कम ऑन आशुतोष! ई प्रतिस्पर्धा केर परीक्षा छ्ल कुनो यूनिवर्सिटी केर रूटीन परीक्षा नहि। रूटीन परीक्षा में जतेक विद्यार्थी नीक लिखतै, सब पास भ जेतैक। एकर विपरीत कम्पटीशन केर परीक्षा में निश्चित पद रहैत छैक आ अनन्त प्रवेशार्थी। तांहि बहुत गम्भीर छात्र सेहो छटा जाइत छथि। अहाँ मेधावी आ संस्कारी लोक छी। अपन कर्तव्य में लागल रही। सफलता एक ने एक दिन अवश्य भेटत।"

 

राघब के बात सँ जेना आशुतोष के प्राण में प्राण एलनि। विस्वाश फेर जाग्रत भेलनि। कहलथिन, "ठीक कहैत छी सर। हमरा अनेरे भूतकाल केर असफलता पर पश्चाताप के छोड़ि फेर सँ पूर्ण मनोयोग सँ तैयारी करक चाही। आब हम सैह करब आ बाहरी दुनियां सँ थोड़ेक दूरी राखब।"

 

एहि बीच चंद्रकलाकेर होस्टल में एक ऋचा नामक लड़की एली। ऋचा के चंद्रकला सङ्गे रूम शेयर करक छलनि। थोड़ेक दिन में दुनू में प्रगाढ़ मित्रता भ गेलनि। ऋचा के चंद्रकला अपन आ आशुतोष केर सब बात बता देलथिन। आशुतोष सँ भेट सेहो करा देलथिन। ऋचा  गोरधप-धप, नमहर कद काठी, मुहँ में पानि, पैघ आँखि, आकर्षक शरीर, उंन्नत आ सुडौल कुच केर स्वामिनी छलि। जांघ तरासल, नितम्ब उठल आ गजगामिनी जकाँ चलैत छलि ऋचा। जेहने ऋचा देखबा में सुन्नरि तेहने बजबा में। ककरो पहिल बेर में अपन तनक सुंदरता सँ आ वचनक चातुर्य सँ अपन गुलाम बना लैत छली। मुदा आशुतोष के ऋचा अपन जेठ भाय बना लेलनि। इम्हर परीक्षा में नहि भाग लेबक करने आशुतोष के ऑफिशियली होस्टल खाली करय पड़लनि। यद्यपि राघब हुनका अपना रूम में रखने रहलनि। एक समस्या भोजन के छलनि। आशुतोष बाहर सँ भोजन करे लगला। 

 

आशुतोष  के घरक स्थिति बहुत नीक नहि छलनि। पिता रइस आ एक नंबर कर देहचोर। किछु ठीकेदारी आ किछु खेतीबाड़ी सँ जीवनक गुज़ाडा चलैत छलनि। ऊपर सँ आशुतोष तीन भाई। पहिल भाई सेहो सैनिक स्कूल तिलैया सँ पढ़ल। बाद में आर्मी अफसर बनलथिन। मुदा थोड़ेक दिन में नौकरी छोड़ि लखनऊ आबि टेलीकॉम जगत में अपन व्यवसाय स्थापित केलनि। लखनऊ में अपना सँ पांच वर्ष पैघ अपने व्यवसाय के क्षेत्र केर दिक्षीत ब्राम्हण कन्या सँ प्रेम विवाह क लेलनि। माता पिता आ भाई सब सँ कुनो संबंध नहि छलनि। लेकिन आशुतोष केर माय बहुत गुणमति स्त्रीगण छलि। ओ विपरीत परिस्थिति में अपन दू छोट बालक के पढ़बैत छलि। आशुतोष एना स्थिति में निर्णय लेलनि जे आब ओ ट्यूशन पढा अपन खर्च चलेता। 

 

ऋचा छलि मध्यप्रदेश केर सिन्धी। दू बहिन आ एक भाय। ऋचा  सबसँ पैघ, तकर बाद भाय जे इंजीनियरिंग केर द्वितीय वर्ष केर छात्र आ सबसँ छोट बहिन आ ओहो इंजीनियरिंग केर प्रथम वर्ष केर छात्रा। आशुतोष सँग सैनिक स्कूल केर समय केर हुनक मित्र विजय  सेहो छलथिन जे एम एस सी करैत छला। चूंकि विजय केर अंक बहुत नीक नहि छलनि तांहि ओ बाहर में रहैत छला। ऋचा के भाई आ बहिन के सेहो होस्टल नहि भेटल छलनि।

जखन हिनकर सभक संबंध प्रगाढ़ होमय लगलनि त सब मिलक मुखर्जी नगर में एक फ्लैट शेयर मोड में ल लेलनि। आशुतोष आब होस्टल छोड़ि देलनि। होस्टल में राघब आ चंद्रकला रहि गेलनि। 

 

चंद्रकला के पिता आब चंद्रकला सँ विचार करैत लड़का तकनाई शुरू करय चाहैत छला। मुदा चंद्रकला एकै बात कहै छलथिन, "बिना पी एच डी आ नौकरी केने ओ व्याह नहि करती।" हालांकि ई त चंद्रकला के बहाना छलनि। हुनकर मोन में रहनि जे एकबेर जखन आशुतोष आर्मी अफसर केर नौकरी में चयनित भ जेता त हिनका अपन पिता आ जेठ भाई सँ भेट करा सब राज बता देथिन।

 

एमहर आशुतोष लिखित परीक्षा में दोसरो बेर असफल भ गेला। आब ओ बहुत तनाव में आबि गेला। छेपक में एहो बात बतेनाई जरूरी जे ऋचा मुक्त स्वभाब के।लड़की छलि। 11 विं क्लास सँ अनेक पुरुष मित्र सब सँग मानशिक आ दैहिक संबंध रखली। हुनका रति-रभस में, चुम्बन में आलिंगन में आ काम कीड़ा में बहुत आनंद अबैत छलनि। ओना त आशुतोष सँ भाई बहिन केर सम्बन्ध छलनि तथापि आशुतोष सँग सटिक रहब, हुनका भरि पांज क छेकब, हुनका सङ्गे आलिंगनबद्ध भय सुतब आदि सहज भाव सँ करैत छलि। आशुतोष सेहो अहि में आनंदित होइत छला। जखन आशुतोष के दोसर बेर सफलता नहि भेलनि तखन ओ एकदिन चंद्रकला के कहलथिन, "चंद्रकला, आब अहाँ अपन पिता के पसिन केर कुनो योग्य लड़का सङ्गे विवाह क लिय। हमर जीवन अंधकार भेल जा रहल अछि।" 

 

चंद्रकला के आँखि में नोर भरि गेलनि। बजली, "की कहैत छी आशुतोष? हम अहाँ सँ सिनेह केने छी। अहाँ जतय रहब हम ओतहि रहब आ खुश रहब। एहेन बात नहि बाजू अहाँ। अगर कही त आई हमर घर चलू। हम एखने अपन पिता आ भाई सँ अपन सबहक प्रेम आ विवाह के बात करैत छी। अगर कही त हम कोर्ट विवाह लेल सेहो तैयार छी।"

 

आशुतोष कहलथिन : "हमर कहब अछि, अगर सफल नहि भेलौं त हमरा सङ्गे अहुँके जीवन बर्बाद भ जैत। अहाँक प्रति हमर प्यार ओतबे शाश्वत आ प्रांजल अछि जतेक अहाँक सिनेह हमरा प्रति।" ई कहैत आशुतोष चंद्रकला के अपन बाहुपाश में ल लेलथिन। प्रेमाधिक्य में चंद्रकला छोट नेना जकाँ कनैत रहलि।

 

आब चंद्रकला पी एच डी करय लागली। बस्तर केर मुड़िया जनजाति केर जड़ी-बूटी केर ज्ञान, तंत्र-मंत्र आ चिकित्सा पद्धति पर हिनकर दिव्य काज चलि रहल छलनि। मुदा आशुतोष के प्रति प्यार एवं हुनक जीवन रूपी नैय्या के डगमग करैत चलब के कारणे चंद्रकला केर शोध कार्य जेना एक ठाम ठमकल पड़ल होनि! 

 

एहि बीच आशुतोष केर परिवार में एक आरो घटना घटित भ गेलनि। हुनकर जेठ भाय आ भउजी में तलाक केर स्थिति आबि गेलनि। बेचारी आशुतोष केर माय परेशान। करती त की करती? एकटा बेटा छलनि आशुतोष के जेठ भाय के। ओ बेचारा ककरा लग रहत? काज धाज से रुकल। जेठ बेटा घर मे बैसल। 

 

आशुतोष केर छोट भाय सेहो बी एस सी केलक बाद टेलीकम्यूनिकेशन केर क्षेत्र में नौकरी केनाई शुरू केने छलाह। प्रारंभिक संघर्ष केर बाद स्थिति नीक भ गेल छलनि। गाम पर माता पिता के सहयोग करब शुरू क देलथिन। हुनकर नाम छलनि प्रकाश। ओ बीच बीच मे आशुतोष लग अबैत रहैत छलाह। हुनका ऋतु अपना प्रेमजाल में फंसा लेली। पहिने हँसब, बाजब आ बाद में सब किछु शुरू भ गेलनि। बाद में ई जानकारी आशुतोष के सेहो चलि गेलनि। ऋतु आ प्रकाश घोषणा क देलथिन जे दुनू प्यार करैत छथि आ विवाह करती। विवाहक रोड़ा आशुतोष छलथि। मा कहलथिन, "जाबेत धरि आशुतोष सेटल नहि भ जेता आ विवाह नहि क लेता तावेत धरि प्रकाश केर विवाह कुनो हालत में संभव नहि छनि।" आब की हो? सब चुप।

 

एहि बीच आर्मी ऑफिसर केर एंट्रेंस में आशुतोष असफल होइत रहला। अंत मे आयु सीमा सेहो खत्म भ गेलनि। पत्राचार केर माध्यम सँ प्रबंधन केर मास्टर डिग्री हासिल केलनि। आ अंततः एक सवयं सेवी संस्था में छोट छीन नौकरी पकड़ि लेलनि। हुनक प्रेम में मातलि दीपशिखा एखनो हुनका सँ विवाह करबा लेल तैयार। मुदा अपन हाव भाव सँ एवं अन्य श्रोत सँ आशुतोष चंद्रकला के ई सूचना द देलथिन जे हुनकर विवाह आब कुनो स्थिति में संभव नहि छनि। चंद्रकला आब की क सकैत छलि। 

 

चंद्रकला संगे हुनका सँ एक साल जूनियर लड़की सौम्या सेहो बस्तर केर मुड़िया जनजाति पर शोध करैत छलि। ओहो निखिल नामक एक क्लासमेट सङ्गे प्यार करैत छलि। प्यार की त लिव इन रिलेशनशिप में छलि। दुर्भाग्य सँ निखिल केर वकील पिता के ई संबंध नहि ठीक लगलनि। निखिल अलाइड सर्विस में आबि गेला। बाद में ई विवाह नहि भेलैक। हारि क सौम्या एक इंजीनियर सँग अरेंज्ड विवाह केली। ई अलग बात छैक की विवाह केर प्रथम दिन सँ हुनका अपन इंजीनियर पति सँ एडजस्ट होब में दिक्कत शुरू भ गेलनि।

 

एक बेर एक मास लेल चंद्रकला आ सौम्या अपन शोध केर प्रयोजन सँ बस्तर गेल छलि। जखन बस्तर सँ एली त सौम्या सँ चंद्रकला के पिता कहलथिन जे एक इंजीनियर टाटा कंसल्टेंसी में काज करैत छैक। नीक परिवार छैक। लड़का के पिता आई आई टी दिल्ली में प्रोफेसर, जेठ भाई सेहो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में छैक। छोट भाय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सँ एम बी बी एस क रहल छैक। लड़का सहज छैक आ देखबा सुतबा में सुन्नर। अगर चंद्रकला के इच्छा होइक त एक बेर भेट क सकैत अछि। सौम्या चंद्रकला के ओहि लड़का के देख के हेतु उकसबय लागलि। चंद्रकला एक बेर फेरो आशुतोष लग गेली। आशुतोष अहि बेर साफ-साफ कहि देलथिन , "देखू, एहि स्थिति में आब हमर आ अहाँक विवाह संभव नहि अछि।" चंद्रकला के आँखि सँ धाराप्रवाह नोर खसैत रहलनि। थोड़ेक काल मे वापस होस्टल में आबि गेली। सब बात सौम्या के कहलथिन। सौम्या फेरो हुनका अपन दृष्टांत दैत एक बेर अपन पिता द्वारे चयनित लड़का सँ भेट करबा लेल मना लेलनि। दोसर दिन एक होटल में चंद्रकला अनन्त अग्रवाल सँ भेट केलनि। अनन्त हुनका ठीक लगलथिन।

 

अनंतों के चंद्रकला बड्ड नीक लगलथिन। दुनू अपन-अपन अभिभावक के विवाह करक स्वीकृति द देलथिन। एहि स्वीकृति केर 15 दिनक भीतर आशुतोष केर विवाह गोड्डा कॉलेज केर हिंदी केर प्रोफेसर केर बेटी सँ भ गेलनि। एक मासक बाद ऋचाक विवाह आशुतोष केर छोट भाई प्रकाश सँग भ गेलनि। आब चंद्रकला के सब बात बुझ में आबि गेलनि। किछु त नहि बजली मुदा करेज भीतरे भीतर जेना दू फांक भ गेलनि। नहियो चाहैत ऋचा आ आशुतोष के श्राप दैत कहलथिन, "जाउ! हमर विश्वास, प्रेम आ समर्पण के अतेक खण्ड-खण्ड केलौं अछि अहाँ सब मिल क! कहियों नीक नहि हैत।" हां, ई श्राप ओ चुपचाप मुक्त अकास में ठाढ़ भेल देने छलि। ओ बजली आ सृष्टि केर नियंता सुनलक। नीक जकां सुनलक।

 

विवाह के स्वीकृति दैत देरी पांच दिनक भीतर चंद्रकला के दिल्ली में एक यूनिवर्सिटी में लेक्चरर केर नौकरी लागि गेलनि। हुनकर मंगेतर जे पुणे में पोस्टेड छलथिन से एकाएक नोएडा में आबि गेलथिन। शायद भगबानो के लागल होनि जे एकरा सङ्गे बहुत अन्याय भेलैक आब न्याय होबक चाही!

 

ऋचा केर भाई एक मलयाली लड़की सँ प्रेम विवाह क सऊदी अरब चलि गेला । छोट बहिन सेहो प्रेम विवाह एक महाराष्ट्रीयन इंजीनियर सँ केलनि।

 

विवाह के दोसरे साल चंद्रकला के एक बेटी भेलनि आ ऋचा के बेटा। सौम्या के सेहो एक बेटा रहैक। तीन साल के बाद चंद्रकला के बेटा आ ऋचा के बेटी भेलैक। बेटी भेलाक एक वर्ष के बाद ऋचा आ प्रकाश में भयंकर लड़ाई शुरू भ गेलैक। स्थिति एहेन भ गेलैक जे दुनू आब संबंध ने विच्छेद क लेथि। मुदा प्रकाश केर मां आ ऋचा  के सोचक कारणे फेरो दुनू में समझौता भ गेलैक। 

 

आशुतोष आब दिल्ली छोड़ि पटना चलि गेला। पटना में गुमनाम जिनगी जिबय लगलनि। दू बेटीक पिता। आमदनी सीमित। दुखक एकाकी जीवन। शायद एहि बातक अनुभव करैत जे सब किछु चंद्रकला सँग धोखा के कारण भेल अछि आ पता नहि भविष्य में की-की हैत

 

चंद्रकला राघब के भैया कहैत छलि। किछु दिन पहिने भेट भेलनि दुनू के एक सेमिनार में। एक कात में आनि राघब लग चंद्रकला बजली: "भैया, ऋचा आ आशुतोष केर व्यवहार हमरा तबाह केने छ्ल। हमर रोम-रोम सिहरि गेल छल। हम अन्हार में चलि गेल रही। तहिना ओहो सब खुश कहियों नहि रहत।"

 

विजय गुरगांव में एक ऐड एजेंसी में काज करैत अछि। ओकर कनिया सेहो मैनेजमेंट कंसलटेंट छैक। विवाह के 20 वर्ष भ गेलैक मुदा संतान एखन धरि नहि भेलैक अछि। 

 

सौम्या केर पति ओकर जीवन नर्क क देने छलैक। अंत मे बहुत मुश्किल सँ तलाक भेटलैक। आब दोसर विवाह केलनि अछि आ अपन पति आ बेटा संगे जीवन जीब रहलि छथि। यूनेस्को में नौकरी सेहो लागि गेल छनि।

 

चंद्रकला एक सफल पत्नी, पुतोहु, माँ, शिक्षिका केर भूमिका निभा रहलि छथि। जीवन मे आनंद आ परमानंद छनि। मुदा पुरुष जाति पर विश्वास नहि छनि। कोना रहतनि??? पुरुषक नहि विश्वासे।

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मैथिली लघुकथा

 

प्रणव झा

अरजल जमीन

 

"की भेल यौ, कोनो निदान भेटल कि नै?" लालकाकी लालकक्का के दुआरि पर कपार धऽ कऽ बैसल देख के बजलिह।

कहां कोनो बात बनल ओ त  अडल अछि जे नै अहांक के त पाई देबैये पडत नै त ई जमीन हम आन ककरो हाथे बेच देब आ अहां के बेदखल होबय पडत।

आ पंच सब कि बाजल?

पंच सभ की बाजत, कहै ये जे अहां लग पाई देबाक कोनो सबूत नै अछि , नै अहां के नाम सं जमीन लिखायल गेल अछि त इ बात कोना मानल जाय जे अहां ई पांच कट्ठा जमीन कीनने छि! बेस त किछ बीच के रस्ता निकालल जा सकै अछि । आब देखियौ जे काइल्ह कि फ़ैसला होई अछि।

 

बात इ छल जे करीब पच्चीस-तीस बरष पहिने लालकक्का अपन्न मेहनत आ श्रम के कमाई सं पांच कट्ठा घरारी के जमीन गामक जमीनदार ’सेठजी’ से कीनने छलाह । ओइ टाइम में जवान जुआन छलाह, कलकत्ता के एकटा मील में नौकरी करै छलाह, किछु पाई भेलैन त माय कहलखिन जे एकटा घरारी के जमीन कीन ले। बेस त किछु जमा कैल आ किछु ईपीएफ़ के पाई निकाईल के इ सेठजी से पांच कट्ठा घरारी के जमीन कीन नेने छलाह. मुदा भांगट एतबे रहि गेल छल जे ओ जमाना शुद्धा लोक सभ के जमाना छल, लिखा-परही, कागज-पत्तर गाम घर में कहां होई छल ओइ टाईम में ! बस मुंहक आश्वासन चलै छल । से लालकक्का के इ घरारी के दखल त भेंट गेल छल मुदा जमीन के रजिस्ट्री नै भेल। इ गप्प सब लालकाकी के बुझलो नै छल। के ओई जमाना में इ गप सब अपन नबकनियां के बतबै छल! बेस लालकक्का धीरे-धीरे ओय बंसबिट्टी के उपटेलाह, आ किछेक साल में एकटा छोट छिन पक्का के घर बना लेलाह. ओई टाईम में गाम में गोटैके घर पक्का के बनल छल, तखन लालकक्का के नाम सेहो बजै छल गाम में । बाद में जुआनी गेलैन आ काजो छुटलैन, आ ओ गाम धेलाह। गाम में कोनो बेसी खेत पथार त छलैन ने जे ओहि में लागल रहितैथ, तखन कोहुना समय कैटिये रहल छल ।ओना लालकक्का के इ व्यक्तिगत विचार छल जे लोक  के जीवन में तीन टा कर्म पूरा करबा के रहै अछि – घर बनेनाई, बेटी बियाह आ बेटा के अपन पैर पर ठारह रहै योग बनेनाई । से लाल कक्का इ तीनो काज सं निश्चिंत भ गेल छलाह आ कखनो गाम में त कखनो बेटा लग में जीवन बिताबय लगलाह। मुदा किछु दिन पहिने एकटा एहन बम फ़ूटल जै कारणे लालकक्का के अपन अरजल घरारी हाथ सं निकलैत बुझना गेलैन । जेना होमय लगलैन जे जीवन में किछु नै केलहुं। बात इ भेल छल जे अचानके से गाम में बात ई उठल  जे हिनकर घरारी के जमीन त हिनका नाम पर अछिए नै। सेठजी के मुईला उपरांत इ जमीन हुनकर बडका बेटा के नाम पर चढा देल गेल छल आ आई सेठजी के मुईला के कतेक बरष उपरांत जमीनदारजी के इ जमीन ककरो आन के बेचय के बात कय रहल छलाह। लालकक्का के जखन ई खबर दलालबौआ द्वारा लगलैन ओ जमीनदारजी लग जाय कहलखिन जे औ जमीनदारजी! ई कि अन्याय करै छि। इ घरारी हम अहांक बाबूजी से किनने छलहुं चारि हजार कट्ठा के भाव से बीस हजार रूपया में से अहुं के बुझल अछि, अहां के सामने पैसा गिन के देने छलहुं। कतेको बरष से एहि घरारी पर घर बना के वास कय रहल छि, से ओय समय में त लीखा परही भेल नै छल, आब अहां करै चाहै छि त इ जमीन हमरा नामे लिखियौ। इ बात पर जमीनदारजी भौं चढा के बजलाह जे देखू अहां दूइए कट्टा के पाई देने रही आ बांकि के तीन कट्टा में एहिना बास क रहल छी, से जौं यदि अहां सभटा जमीन लिखबऽ चाहै छि त लाख रूपए कट्ठा के दर से तीन लाख टाका लागत आ नै जौं अहां लग पांच कट्ठा जमीन कीनय के कोनो सबूत अछि त से बताबु। एतेक घुडकी लालकक्का सन शुद्धा लोक के विचलित करय लेल बहुत छल । तथापि ओ हिम्मत कऽ के बजलाह जे यौ श्रीमान एना कोना अहां बाजि रहल छि अहांके सामनेहे हम अहां बाबू से ई जमीन कीनने छलहुं आ कतेको बरष सं एतय रहै छि, आई सं पहिने त अहां किछु नै बजलहुं । बीच में दलालबौआ बजलाह जे  कक्का अहां लग लेन-देन के कोनो सबूत कोनो कागज ऐछ कि? यदि नै अछि त फ़ेर त पंचैति करा क जे निर्णय होय अछि से स्वीकार करय परत अन्यथा अहां के ओइ जमीन से बेदखल होबय परत ।

 

काल्हि भेने पंचैति बैसल – पंचैति कि बुझु, दलालबौआ, जमीदारबाबू, आ दू-चारि टा लगुआ-भगुआ । पंचैति में जमीनदारबाबू तीन लाख टका के मांग रखलैथ, लालकक्का सेहो अपन पक्ष रखलैथ। अंतत: ई निर्णय भेल जे लाल कक्का या त दू कट्ठा जमीन जै पर घर बनल अछि से सोझा जमीनदारबाबू से लिखा लियैथ आ नै जौं पांचो कट्ठा के घरारी चाहिएन त डेढ लाख टाका (जमीनदारबाबू द्वारा प्रस्तावित मूल्य के आधा) जमीनदारबाबू के देबय परतैन ।

 

लालकक्का कहियो सपनो में नै सोचने छलाह जे हुनका संगे एहनो कपट भ सकै अछि । मुदा आब कोनो चारा नै रहि गेल छल । बेटा के जौं इ बात कहलखिन त ओकर रिस्पोंस ठंढा छल. पहिने त अफ़सोच केलक जे बाबूजी अहां आई धरि ई बात नै मां लग बजने छलहु नै हमरा सभ लग। फ़ेर कहलक जे दूइए कट्ठा लिखा ने लिय, घरारी ल के की करब, हमरो सभ के कियौ  गाम में नै रह दै चाहै अछि आ साल में किछुए दिन लेल त गाम जाय छी। मुदा लालकक्का के लेल ओ जमीन कोनो धिया-पुता से कम छल कि! अपन पसीना के कमाय से अरजल घरारी। ओ निर्णय केलाह जे डेढ लाख टाका दऽ के पांचो कट्ठा लिखबा लेब। लिखबाय सेहो पचास हजार टाका लगिए जाएत। माने जे आब सवाल छल दू लाख टाका के जोगार के । किछु पाई एम्हर-आम्हर से कर्ज लेलैथ । बांकि के लेल बेटा के कहलखिन त ओ कहलक ठीक छै अहां ओकर अकाउंट नं० भेजु हम दस दिन मे कतौ से जोगार क के ट्रांसफ़र क दैत छि। लाल कक्का जखन जमीनदारबाबू लग अकाउंट नं० मांगय गेलाह त एकटा नबे ताल शुरू भ गेल । जमीनदारबाबू कहलाह जे पाई त अहांके सभटा नकदे देबय परत से अहां अपना अकाउंट पर मंगबा लिय आ हमरा बैंक से निकालि क दऽ देब।

 

लाल कक्का सभटा गप्प बेटा के कहलखिन। बेटा कहलक जे नै ई ठीक नै अछि, ओ कैश में पाई ल के ब्लैकमनी बनबै चाहै अछि से अहां मना क दियौ। आ ओनाहुं जौं आइ अहां से पाई ल लेत आ पहिनेहे जेना मुकैर जायत तखन की करबै? से अहां साफ़ कहि दियौ जे जौं पाई बैंक के मार्फ़त लेताह त ठीक नै त हम नकद नै देब।

 

लालकक्का के  इ बुरहरी में एहन उपद्रव भेल छल दिमाग अहिना सनकल छल तै पर से अपन अरजल जमीन हाथ से निकलि जाय के डर। तहि लेल शायद हुनका बेटा के इ आदर्शवादी बात निक नै लागल छल। उल्टा-सीधा सोचय लगलाह । भेलैन जे छौंडा  कहिं टारि त नै रहल अछि।

 

फ़ेर ध्यान पडलैन अपन एफ़डी दऽ। करीब डेढ लाख हेतै। बड्ड जतन सं जमा क के रखने छलाह। कोनो मनोरथ लेल। पता नै शायद पोता के उपनयन लेल की अपने श्राद्ध लेल हुनकर मोने जनैत हेतैन कि लालेलाकी के।

एकाएक निर्णय केलैथ आ लालकाकी के कहलखिन जे एकटा काज करू – पेटी से हमर एफ़डी के कागज सभ निकालू त । लालकाकी उद्देश्य बुझैत कहलखिन जे धैर्य धरू ने, कंटीर कहलक अछि ने जे जमीनदारबाबू के अकाउंट नं० पठा देब लेल ओ पाई भेज देत, से कहै त ओ सहिए अछि कि ने – ईमानदारी के पैसा कमसेकम ईमानदारी से जमीनदरबा के भेटै ने, एकबार फ़ेर जाउ ओकरा से मांगियौ अकाउंट नं०, जौं पाई के ओकरा बेगरता छै त देबे करत ने।

हं! हम भरोसा कऽ के पछताय छी आ आब बेटा ईमानदारी देखा रहल अछि। यै, आब सज्जन आ ईमानदार लोक के जुग रहलै अछि! देखलियै नै कोना जमीन लेल दरिभंगा में एकटा के आगि लगा के मारि देलकै। ई लोभी आ बैमान दुनिया के कोनो ठेकान नै। तैं निकालू झट द कागज सब, आईए बैंक भ आबि।

 

आब एतेक सुनला के बाद लाल काकी की जवाब दऽ सकै छलिह । हुनका लग एतेक गहनो त नै छ्ल जे आवेश दैत कहितथि जे "त बेस इ गहने बेच दिय"। बस चुपचाप पेटी खोलि क कागज निकालै लगलिह।

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प्रणव कुमार 

राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई  दिल्ली 


 

 

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