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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

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मैथिली साहित्य आन्दोलन

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जगदीश प्रसाद मण्डल- पंगु (उपन्यास) धारावाहिक आ दूटा लघुकथा

जगदीश प्रसाद मण्डलक

पंगु

उपन्याससँ...

9.

उमेरक चलैत अपन गिरैत दैहिक शक्तिकेँ अँकैत देवचरण हरिचरणक बिआह करब अनिवार्य बुझलैन। अनिवार्यक दू कारण भेलैन, पहिल- अपन आगू बढ़ैत परिवारकेँ अपना आँखिये देखब, जइसँ मनमे तृप्ति जगैत अछि। दोसर कारण मनमे ईहो भेलैन जे ओना हरिचरणकेँ पढ़ाएब-लिखाएबसँ लऽ कऽ ओकर बिआह-दान करब धरिक काज राधाचरणक कर्तव्यक सीमामे अछि मुदा ऊहिगर बेटाकेँ नहि रहनेआतैसंग हरिचरणक जीवनचर्याकेँ देख देवचरणक मनमे ईहो भेलैन जे जेहेन पोता क्रियाशील अछि, ओहने क्रियाशील लड़कीक संग जँ बिआह कए देबै तँ ऐगला पीढ़ीक जीवन-यापन संतोषप्रद हेबे करत। यएह इच्छा ने सभ परिवारमे वृद्धजनक होइ छैन जे अखुनका जे परिवारिक जिनगी अछि ओ दिनानुदिन अगुआइत चलए।

ओना, मिथिलांचलो तँ मिथिलांचले ने छी। जहिना कुशाग्र बुधिक लोक अनुकूल परिस्थिति भेटने नीक-सँ-नीक विद्वता, नीक-सँ-नीक कलाकारिता, नीक-सँ-नीकटेकनोलॉजी आ नीक-सँ-नीक जिनगीक पारखी बनैए तहिना ने नीक-सँ-नीक भोगवादियो आ नीक-सँ-नीक जोगवादियो बनिते अछि। अपना सबहक मिथिला वएह ने छी जे जइ पत्नीकेँ सहयोगी-संगी बुझै छी ओइ पत्नीकेँ परिवारिक कोनो क्रिया-कलापक भार नइ पड़ैन, तँए भानस करैले भनसिया, पानि भरैले पनिभरनी, कपड़ा-लत्तासँ लऽ कऽ घरक निपाइ-पोताइ तक अनके[i] सिरे-हाथे होइ। मुदा से नहि, ओहनो मिथिलांचल तँ अछिए जैठाम बेटा-पुतोहु अपन पाछूसँ अबैत खनदानी परिवारमे पिताक अनुसरण करैत सहयोगी बनि तिल-तिल, कण-कणक अनुभवक अभ्यास करैत तिले-तिल, कणे-कण अबैबला काल्हुक अनुकूल बनबैत अपन भविसकेँ अनुकूलतामे पीअबैत, निर्माण करैत आगू बढ़ैए।

मिथिलांचलक ओइ हिस्सामे देवचरण हरिचरणक बिआह करब मनमे रोपि लेलैन जेतए अपने सन सीमान्त किसान[ii] परिवार हुअए। जइ परिवारक जन-जन अपन भविसक पाछू लगि श्रम-संस्कृतिकेँ अंगीकार करैत श्रमशील-शिलाक क्रमगतिसँ निर्माण-कार्यमे लागल हुअए। ओना, ई इच्छा तँ अपन मनक भेल, मुदा जैठाम बरपक्ष छी तैठाम अपने उपकैर कऽ केना कन्यागतकेँ कहब जे अहाँ अपन कन्याक बिआह हमरा परिवारमे करू। एक तँ अनेरे लोकक मनमे उठत जे जाबे लड़का खोमाह नइ छै ताबे एहेन चर्च किए करै छैथ। तैसंग ईहो तँ अछिए जे मनोनुकूल कन्या नइ रहने एकटा-दूटा कन्यागतकेँ तँ बहटारि सकै छी, मुदा जँ तइसँ बेसीकेँ बहटारए चाहब तँ अनेरे ने सभ कहबे करत जे फल्लॉं लड़काक सिरे तेहेन बौगली[iii] सिया कऽ रखने छैथ जे कन्यागत जँ अपन डीहो-डाबर बेच कऽ लगा देत तैयो ने भरतैन...!

संजोग बनल, हरिचणक बिआह समस्तीपुर जिलाक ओहन गामक किसान परिवारमे भेल, जे परिवार अपन कृषि क्षेत्रकेँ ओहन बिसवासू रूपमे बना कऽ ठाढ़ केने अछि, जइसँ इंजीनियर, डॉक्टर तकक समावेश परिवारेमे होइक सम्भावना बनल अछि। जेहने देवचरण खेतिहर पुतोहु चाहै छला तेहने पुतोहु भेटने अपन सोलह सालक पोताक बिआह सोलह सालक कन्या- परमेसरीक संग केलैन। भुखाएल-दहेजियाएल मन देवचरणकेँ रहबे ने करैन, तँए हरिचरणक बिआहसँ सोल्होअना तृप्ति देवचरणकेँ भेलैन।

समयक अनुकूल तँ राधाचरणक सुधार नहियेँ भेलैन मुदा बेवहारिक रूपमे दूटा महींसिक सेवा करैक भार सिरचढ़ भेने धीरे-धीरे सुधरए लगलैन। सुधार देख देवचरण समयक अनुकूल महींसिक सेवाक संग आरो-आरो काज करैले राधाचरणकेँ चरिया-चरिया चरैबेति बना लेलैन। ओना, उमेर पाबि सेहो राधाचरणक मनमे परिवारक प्रति प्रेम जागल, जइसँ बकलेल-ढहलेल जकाँ जे वौआइत रहै छल तइमे सुधार भेल। ओना, परिवारमे परिवारजनक बीच जे सम्बन्धसूत्र अछि, माने पैछला पीढ़ीक बेटा-भातीज, नाइत-पोतासँ लऽ कऽवर्तमान पीढ़ीक भाए-भौजाइआ तहिना ऐगला पीढ़ीक काका, पिता, बाबा-नाना इत्यादि, सेहो अछिए। जहिना भक्त आ भगवानक बीच अभक्त रूप अछि तहिना ज्ञान आ कर्मक बीच सेहो अछिए। जखने दुनूक बीचक अभक्त रूप मेटा भक्त रूपमे परिणत होइए तखने जिनगीक सार्थकता सफल हुअ लगै छइ। जे हरिचरण आ देवचरणक बीच भेल। ओना, देवचरण किसानी जिनगीक मर्मभेदी रहनौं अपन जिनगीमे पंगु बनल रहला, मुदा अपन पंगुपनक कारणकेँ बुझि देवचरण अपनाकेँ ओही जिनगीमे समावेश करैत परिवारक गाड़ीक जुआकेँ कन्हेठ आगू मुहेँ खिंचते रहला, जइसँ अभावोकेँ कुभाव नहि बुझि सुभाव बना जीवन-बसर करबे केला, जे अपन सभ गुण-शील हरिचरणकेँ दान-दैछनामे दैत ऐ दुनियासँ विदा भेला।

देवचरणकेँ चौदह बर्ख मृत्यु भेना भऽ गेलैन। हरिचरण बतीस-तैंतीस बर्खक भऽ गेल। तीनटा सन्तानो भेलइ। राधारचरण सेहो चारिमपनमे पहुँच गेला। देशमे हरित क्रान्तिक रूपमे नव जागरण भेल। परम्परासँ अबैत कृषि-कार्यमे बदलाउ आएल। जेतए सिंचाइक करीन छल ओ बदैल पम्पसेट आएल। खेत जोतैक जे जनकजीक समैयक तीनबित्ता हर छल ओइक जगहट्रेक्टर आएल। तेतबे नहि, धान कुटैक ढेकी बदलल, चुड़ा कुटैक उक्खैर बदलल, पाथरक जत्ता बदलल, तेल पेड़ैक कौल्हु बदलल इत्यादि-इत्यादि किसान परिवारसँ लोप भेल आ नव-नव तकनीकसँ सिरजल लोहाक इंजिन लोकक हाथमे आएल, जेकर रफ्तार दसगुणासँ लऽ कऽ हजारगुणा धरिक अछि। ओना, जइ गतिये किसानी तकनीक आगूसँ उतरल तइ हिसाबे किसान नहि उतैर सकल मुदा साफे नहियेँ उतरल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। कियो उतरल वा नहि उतरल, चढ़ल वा नहि चढ़ल मुदा हरिचरण, जे बतीस-तैंतीस बर्खक जवान किसानक रूपमे उतरबे कएल। से ओइ भाव-रूपमे उतरल जहिना एक जवान हाथमे बन्दूक उठा अपन मातृभूमिक रक्षार्थ सीमापर माघक शीतलहरीक पाला, जेठक रौद आ भावदक बर्खाक अट्ठा-बज्जर सहैतअपन दायित्वक निर्वहन करै छैथ, तहिना ने जवान किसान सेहो अपन मातृभूमिक सेवार्थ भूख-पियास मेटबैले माघक पाला, जेठक रौद आ भादवक गर्जन-तर्जनकेँ अङ्गेजैत अपन दायित्वक निर्वहन करै छैथ।

हरिचरण अपन तीनू बीघा जमीनकेँ समाजिक रूपमे अदैल-बदैल, रकबाक हिसाबसँ दस कट्ठा घाटा उठबैत अढ़ाइ बीघा खेत एकठाम केलक। अपन जिनगीक सूत्रकेँ पकैड़ चारि इंचबला बोरिंग आ पाँच हॉर्स पावरबला इंजिनक साधन बना अपन फसिल सिंचाइक बेवस्था सेहो केलक। तैसंग अढ़ाइयो बीघा खेतमे ओतेक काज ठाढ़ केलक जइमे भरि दिन दुनू परानी अपन दुनियाँ बुझि अपनाकेँ सोल्होअना समर्पित केलक। तेतबे नहि, अस्पतालक डॉक्टर आ कृषि फार्मक कुशल किसान जकाँ अपन बाल-बच्चाकेँ सेहो देखा-सुनी कराइये रहल अछि। तैसंग सालो भरिक खेतीपर दैत सुअन्न, सुफल आ सुसाग-सब्जीक केतेक जरूरत मनुखकेँ अछि, तहूक उपार्जन कइये रहल अछि।

मिथिलांचलक बीच अपन मिथिला बना फलक नाओंपर खाली आमेक गाछी-कलम नहि, सालो भरिक जे फलक क्रम अछि तइ हिसाबक फल, तहिना ओइ हिसाबक तीमन-तरकारीक संग अन्नो उपजाइये रहल अछि।

अपन साधक जे क्रिया अछि तइमे तँ हरिचरण अपन सफल स्वरूप देख रहल अछि, मुदा आगूक जिनगीकेँ देखैत हरिचरण जखन अपन वृहद् स्वरूप देखए लगैए तखन पंगुपन आगूमे नचिते छइ। ओना, केतबो पंगुपन हरिचरणक आगूमे किए ने नाच करए, मुदा किसानक समाजमे किसान वृन्द कहेबाक अधिकारी तँ अछिए।

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शब्द संख्या : 935, तिथि : 6 जून 2018

 


 

[i]नोकरे-चाकरेक

[ii]तीन बीघा जमीनबला किसान

[iii]रूपैआ रखैबला

 

जगदीश प्रसाद मण्डल

दूटा लघुकथा

हमरा नीक नहि लगैए

दिल्लीसँ एना रामरतन तीनू परानीकेँ माने रामरतन अपने, पत्नी- गुलाब आ पुत्र- परमेसर आइ सात दिन भेलैन अछि। एक दिन तँ ट्रेनक थकान मेटबैमे बीति गेलैन, तँए ने रामरतन किछु देख पेला आ ने बुझि पेला। मुदा आइ छह दिनसँ माता-पिता सहित पत्नीक लीला देखियो रहल छैथ आ विचारियो रहल छैथ मुदा बाजि किछु ने रहल छैथ। एगारह बजे दिनमे खाइले बैसला तखन पचीस बर्खक पत्नीकेँ देखलैन जे घरक चौकीपर पड़ल-पड़ल भारत-इंग्लैंडक बीच मैच देख रहल छैथ आ पचपन बर्खक माए ओसारपर पीढ़ी बैसा, लोटामे पानि रखि घरमे भोजनकथारी परोसि रहल छैथ...।

गुम्म भेल पीढ़ीपर बैसल रामरतन मने-मन विचारि रहल छला जे एकरा की कहबै, नीक कहबै आकि अधला कहबै? तही बीच थारी नेने सुनयना आबि बेटाक आगूमे रखि ऐ आशामे ठाढ़ भेली जे थारीक वस्तु देख बेटा किछु बजबो करैए आकि शान्तचित्त खाइए। थारीक भोज्य-पदार्थपर रामरतनक मन नहि पहुँच अपन पत्नीक लीला देख तरैस रहैन छेलैन। बेर-बेर मनमे चकभौर उठि रहल छेलैन जे ई केहेन भेल! कहाँ धरि एकरा उचित कहल जा सकैए? पचीस बर्खक लोक ओछाइन धेने रहए आ पचपन बर्खक अधवेशू दौड़-दौड़ काज करए! रामरतनक मन ठमैक गेलैन। किएक तँ भोजन करैसँ पहिनेजँ कोनो  बिगड़ल बात मुहसँ निकालब तँ हो-न-हो ओ बात मोनि फोड़ैत धार जकाँ बहए ने लगए। जखने फुटल मनक धार बहत तखने भोजन गड़गट भऽ जाएत। गरगट भेने समुचित रूपमे ने भोजन क्रियान्वित हएत आ ने मनेक तृप्ति भऽसकत। मुदा लगले रामरतनक मनमे ईहो उठए लगलैन जे अनुचितकेँ सोझमे देख चुपचाप रहबोकेँ तँ नीक नहियेँ छी। मुदा नीक केनिहार लग अधला केनिहारक पर पीतो केना फेकल जाए। जखने पीताएल मनक पीत फेकब तँ ओकरा पड़बे ने करत। तोहूमे घरक चौकीपर पत्नी पड़ल छैथ। जखने किछु बोल मुहसँ निकलए लगत कि आरो केबाड़ सरका लेती जे माए-बेटाक बीचक बात छी, ऐमे पुतोहुकेँ कान झॉंपि लेबा चाही...।

असमनजसमे विचारैत रामरतन बजला-

माए, हमरा ई नीक नइ लगैए।

रामरतनक बजैक क्रम पत्नीक क्रिया दिस रहैन जे सुनयना नइ बुझि पेली। हिनकर नजैर थारीमे परोसल भोज्य-वस्तुपर अँटकल रहैन। तैबीच हमरा ई नीक नहि लगैएसुनि माए बजली-

बौआ, अपन घरक अन-तीमन केतबो अधला हएत तँ अनका घरसँ नीके हएत।

माइयक बात सुनि रामरतनक मनमे उठलैन जे ई तँ केकर दिनक पइर भऽ गेल, गोला फकलौं पाकल आमपर आ चलि गेल बगुरपर जे तोड़ि अनलक बगुरक काँट! मनकेँ मारि रामरतन भोजनक बाद तीनू गोरेकेँ एकठाम बैसा अपन बात रखैक विचारमे आगूमे आएल विचारकेँ चौपैत रखि बजला-

माए, अपन गाम-घरक जे अन-तीमन अछि ओ परदेशक थोड़े हएत। केहेन बढ़ियाँ तरकारीमे बाड़ीक हरदीक रंग रन-रन करैए। शहर-बजारमे ते कँचका ईटाक गरदीमे रंग मिला हरदी बनबैए आ मिरचाइक जगह एसिडमे लोक मिरचाइक गुण तकैए।

रामरतनक विचारक मोड़ सुनयना नहि बुझि पेली, मुदा अन-तीमनक प्रशंसा तँ सुनबे केली तँए मुस्कियाइत बजली-

बौआ, हम सभ गाम-घरमे रहैबला छी, मारि-घुसि कऽ एक बेर दिनमे आ एकबेर रातिमे खाइ छी। मुदा तूँ सभ ते शहरूआ-बजरूआ भेलह, दस बेर चाहो पीबैत हेबह आ दस बेर नस्तो-पान तँ करिते हेबह। तँए कम्मे-कम्मे वौस छह, जे किछु घटह से कहिहह।

बलाएकेँ टारैत रामरतन बजला-

कोनो आनठाम छी जे खाइमे लाज-धाक हएत। जे घटत से मॉंगि लेब।

परिवारक काजमे रमल-समल सुनयना किए बात-चीतमे ओझरैतैथ तँए ऐठामसँ ससैर गेली। ओना, काज दिस तँ सुनयना ससैर गेली मुदा कानकेँ कनसोहक बेटापर जगौने रहली। यएह ने भेल सजगता। अहीले ने दुनियाँ हेरान अछि।

रामरतनकेँ भोजनक अप्पन अन्दाज छैन जे कोन समैक भोजन केते मात्रामे करी, ई अन्दाज रामरतनकेँ विद्यार्थीए जीवनसँ रहल छैन। ओना, अपना मिथिलांचलमे एहेन अन्दाज पबैमे थोड़ेक असुविधा जरूर अछि, मुदा से अछि सामुहिक भोज आ अनठामक भोजनमे। किएक तँ शुरूक परोसमे पहिने ओतबे भोज्य-वस्तु परोसल जाइए जइसँ भोजनक शुरूआत हुअए आ पछाइत एका-एकी दर्जनो विन्यास परोसल जाइए। मुदा परिवारमे तँ निमाहले जा सकैए, जैठाम प्रतिदिनक भोजन होइए। रामरतन ईहो अन्दाजि लेलैन जे उचित मात्रामे परोसल गेल अछि। उचित मात्राक अन्दाज रहने रामरतन रसे-रसे भोजनो करए लगला आ रसे-रसे पत्नी आ माइक लीला सेहो देखए लगला। ओना, सुनयना सजग छैथ तँए दोसर काज करितो बेटाक भोजनपर सेहो सजग छेली, तँए कनी हटल रहनौं बीच-बीचमे बजै छेली-

बौआ, हम केतौ अनतए नइ छी, तूँ असथिरसँ खाह।

ओना, माइक बात रामरतन अधसुन सुनै छलाकिएक तँ अपने भोजनो जे करै छला तहूपर धियान नइ छेलैन। धियान छेलैन पत्नी आ माइक लीलापर। जखन पत्नी आ माइकेँ फुटा-फुटा देखए लगला तखन पहिल नजैर माएपर गेलैन। माएपर नजैर उठिते रामरतनक मनमे उठलैन जे जहिना माए सदिकाल परिवारक काजमे सटल चलि रहल छैथ तहिना पितो तँ छथिए, तैबीच मोटा-मोटी अपनो सएह छी।मुदा तैबीचमे पत्नीक बेवहार एहेन किए बेदरंग[i] छैन? जखन कि सियान ओहो भऽ गेली तखन सियनपन कहिया औतैन?

लगले रामरतनक मन छिटैक परिवारिक बनाबटपर गेलैन। जइ तरहक अखन अपन परिवारक बनाबट भऽ गेल अछि तइ अनुकूल तँ ओहो ठीके-ठाक छैथ, मुदा..?

मुदालग आबि रामरतनक विचार चकभौर लेलकैन। चकभौर लइते विचार छिटकलैन जे दिल्लीक लेल भलेँ पत्नी ठीक छैथ मुदा गाम लेल केना ठीक कहल जाए?पहाड़सँ गिरैत जलधार समतल जमीन होइत समुद्रमे विलीन होइए मुदा मनुखक जिनगीमे किए एकर अभाव भऽ जाइए? जरूर केतौ-ने-केतौ विषम कारण अछि। ई बात सत् जे मनुखक शरीर जलधार जकाँ नहि अछि, मुदा मनुखक ज्ञान-शक्ति तँ जलधारोसँ जलधार अछि माने पानियोँसँ पातर अछि, तखन ओ किए ने सर्व-हिताइ भऽ पबैए? विचारकेँ समेट उसारि रामरतन भोजन केलैन। भोजन केला पछाइत जखन ओछाइनपर आराम करए गेला तखन पत्नीक विचार पुन: जगि गेलैन।ओना, दिनमे सुतैक अभ्यास रामरतनकेँ नहि छैन मुदा विचारमे थाकल मन सुतैले मजबूर केलकैन। विचारमे उलझल मनकेँ ओछाइने धरब नीक होइतो अछि। किएक तँकाजक दौड़मे अधला होइक सम्भावना भइये जाइए, तीनकेँ तेरह आ तेरहकेँ तीनक परेखक बीच मन फँसि जाइए।

ओछाइनपर रामरतनक देह तँ पड़ि रहलैन मुदा मन माता-पितासँ पति-पत्नीक संग परिवारमे दौड़ गेलैन। दौड़ते उठलैन- दुनू बेकतीमाने पति-पत्नी, परिवारक ऐगला सृजक तँ छीहे। तैठाम जँ पैछला पीढ़ीक गुण-धर्मकेँ अङेज नहि लेब, तखन विषम परिस्थितिकेँ सम केना बनाएब? एक दिस भविस अछि तँ दोसर दिस भूतो तँ अछिए, तैबीच तँ अपने सभ ने वर्तमान भेलिऐ।

पत्नीक परिवारपर नजैर पहुँचते रामरतनक मन दुनू परिवारक भूत, वर्तमानआभविसक क्रिया-कलापपर गेलैन। अपन किसान परिवार रहल अछि आ पत्नीक पिता नोकरी करै छैथ जइसँ हुनकर परिवार नोकरिहाराक रूप पकैड़ नेने अछि, जेकर उपज पत्नी छैथ...।

ऐठाम आबि रामरतनक विचारमे सिकुड़न तँ एबे केलैन जे तैसंग फैलाव सेहो एलैन। परिवार छोड़ि गामसँ निकललौं। जहिना पिताक अनुकरण–मरदा-मरदी, काजक–अपने करितौं तहिना माइक अनुकरण तँ पत्नियो करबे करितैथ। मुदा से भेल नहि। लगले रामरतनक मनमे दुनू परिवारक माने नोकरिहाराक आ गामक किसान परिवारक सिकुड़न-फैलावक बीच फँसि गेलैन। मनमे उठलैन- धारक बीच जहिना पानिक घुमाव होइए तहिना तँ परिवारिक काजक बीच सेहो मनक घुमाव होइते अछि। घुमावो केना ने हएत? गामक परिवारमे अनेको दिशा अछि। बेकतीसँ लऽ कऽ परिवार होइत समाज धरि। जइमे परिवारजन अपन समय आ क्षमताक अनुकूल अपनाकेँ पीरो लइए, मुदा नोकरिहाराक तँ से नहि अछि। ओ तँ नोकरीक अनुकूल अपन समय आ शक्तिकेँ ओइ अनुकूल बना लइए। तहूमे नोकरीक काजक बान्हल समय अछि। ओना, कहैले बान्हले अछिमुदा ओ बान्हल-खुजल दुनू अछि। सरकारी काम-काजक संग कारखानाक काज आठ घन्टा बान्हल अछि मुदा कारखानोमे ओभर टाइम आ बिनु कारखानोक परिवार वा अन्य अनेको तरहक काज एहनो तँ अछिए जे नोकरीदाताक अनुकूल करए पड़ैए...।

रामरतन जेतेक विचारक तहमे जाइ छला तेते मनमे ओझरौठ बढ़ल जाइ छेलैन। मुदा मनमे पत्नीक प्रति जे भरास उपैक गेल छेलैन ओ पूर्ववते छेलैन। कछमछ करैत रामरतन घन्टा भरिक पछाइत ओछाइन छोड़िमुँह-कान धोइते छला कि मनमे उठलैन-  पत्नी आ माइकेँ एकठाम बैसा गप-सप्प करब नीक नहि हएत। किएक तँ जहिना गुलाबक संग अपन पतिक रूपक सम्बन्ध अछि तहिना माइयोकेँ ते सासु-पुतोहुक सम्बन्ध छैन्हे। तैसंग दुनू माय-पुतक विचारो तँ निर्णित नहियेँ अछि जे एक राय बना बाजब। जइसँ विचारमे भिन्नता एबाक सम्भावना अछि। जँ हम कोनो विचार पत्नीकेँ अनुकरणीय रूप कहबैन आ माइक जँ अनुकरणीयपर सँ धियान हटि अपन बेटा-पुतोहुक सुख-भोग दिस बढ़ि जाइन तखन तँ अनेरे दुनू गोरेक विचारोमे द्वन्द्व शुरू भऽ जाएत, जइसँ जे मनमे अछि, से नहियेँ हएत। तँए नीक हएत जे माएकेँ छोड़ि पत्नियेकेँ किए ने चेतौनी रूपमे कहिऐन...।

रामरतनक मनक विचारमे थीरपन एलैन। तही बीच गुलाब सेहो चाह नेने पहुँचली।

चाह देख रामरतनक मनमे उठलैन जे बिनु चाह पीने जँ गप-सप्प चला देब तँ हो-न-हो क्रोधमे चाहे पीब गड़गट भऽ जाए। तइसँ नीक जे पहिने दू घोंट चाहे पीब ली। चाह पीब रामरतन बजला-

अहाँ तँ बुझै छी जे परिवार अपन छी, परिवारक सभ कियो अपने छैथ, तैबीच अधबेसू माए जे दौग-दौग काज करै छैथ आ अहाँ बिजली-पंखा तर बैस टी.बी.मे भारत-इंग्लैंडक मैच देखै छी, ई केहेन विचार भेल?”

ओना, अखन तक रामरतनकेँ पत्नीक परख नीक जकाँ नहि आएल छेलैन जे कोन रूपक जीवन-संगिनी छैथ। पति-पत्नीक बीचक जे आजुक परिवेश बनि गेल अछि ओ बहुआयामी बनि गेल अछि, जइसँ किछु-ने-किछु सभ प्रभावित भइये रहल छैथ। मुदा आयामोक तँ अपन ज्वाला होइते छइ।

जहिना रामरतन पत्नीपर शब्द-वाण फेकलैन तहिना गुलाबो शब्द-वाणकेँ रोकैत बजली-

गाम एलौं हेँ माता-पिताक ऐठाम पहुनाइ करए आकि..?”

पत्नीक विचार सुनि रामरतनक मन क्रोधसँ भभैक उठलैन। बजला-

अपना जे बुझि पड़ए मुदा हमरा नीक नइ लगैए।

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शब्द संख्या : 1458, तिथि : 19 जुलाई 2018      


 

 

 

 

भारीपन भार बनि गेल

जिनगीक आधा उमेर[ii] बीतला पछाइत पचास बर्खक चेतनाननकेँ अपन चेतन-शक्ति बदैल गेलैन। चेतन शक्ति बदलने सोचनो-शक्ति आ क्रियो-शक्ति बदैल गेलैन। जइसँ चेतनानन अपने-आपमे समाहित भऽ गेला।

जेठ मासक बेरुका तीन बजेक समय, दरबज्जापर बैसल चेतनाननक मन अपन जिनगीक समीक्षा करए लगलैन। समीक्षाक दौड़मे विचार फुटलैन-

भारीपन भार बनि गेल..!”

चेतनाननक मनसँ फुटि कऽ विचार बहरेबे कएल छेलैन कि पत्नी- बुधिवादिनी चाह नेने दरबज्जापर पहुँचली। ओना, सभ दिनक चाह पीबैक अभ्यास चेतनाननकेँ सभ रंगक छैन। माने गरमी मासमे तीन बजे, मध्यमास–  आसिन-कातिक आ फागुन–मे अढ़ाइ बजे आ जाड़क मासमे दू बजे बेरुका चाह पीब चेतनानन दोसर उखड़ाहक काजमे लगै छैथ। अभ्यासक हिसाबसँ चाह पीबैक इच्छा समयपर जगिते छेलैन मुदा चाह पीबैसँ पहिने जे बदलल जिनगीक विचारक मथन मनमे उठि गेल छेलैन तइसँ चेतनाननक मन थोड़ेक ओझरा गेल रहैन। माने, चाह पीबैक जेतेक इच्छा आन दिन रहै छेलैन तइमे आइ थोड़ेक कमी आबि गेल छेलैन। चाह पीबैक इच्छा कमने पत्नीसँ गप करैक इच्छा सेहो कमि गेल छेलैन जइसँ आगूमे ठाढ़ पत्नीपर एक नजैर खिरा चुपचाप चाहक गिलास देखए लगला। 

ओना, अपन बुइधिक ओकातिये बुधिवादिनीक मनमेविचार जगि गेल छेलैन जे भरिसक पति कोनो चिन्तामे पड़ि गेल छैथ तँए जेहेन मन उछटगर हेबा चाही से नहि छैन। फेर भेलैन जे किए ने पुछिये लिऐन जे मन खसल देखै छी। मुदा फेर भेलैन जे खसलो मनक (गम्भीर रूपमे) तँ अपन-अपन दिशा होइते अछि। माने ई जे एक खसब भेल जे कोनो संकटकेँ दूर करैले ओकर समधानल रस्ता खोजैमे खसैए आ दोसर होइए जे नीक जिनगी पेबा-ले भविसक बाट समधानि कऽ खोजबमे सेहो मन खसबे करैए। लगले बुधिवादिनीकेँ भेलैन जे जखन किछु बाजि नहि रहल छैथ तखन अनेरे मधुमाछी-छत्तामे गोला मारि कटाएब नीक नहि। तँए, अपन जे अखुनका काज अछि पहिने तेकरा मुसताजिसँ कऽ ली। जँ कोनो दुखो-तकलीफ मनमे हेतैन तँ एक्केबेर बिढ़नी जकाँ थोड़े हनहना उठता...।

चाहक गिलास चेतनाननक आगूमे रखि बुधिवादिनी पान आनए ऑंगन विदा भेली। जे काज चेतनाननकेँ सेहो सभ दिनक बुझले छैन।

चाह-पान पीला-खेला पछाइत जहिना चेतनानन अपन जीबनपट खोलए अपन विचारधारा दिस विदा भेलातहिना बुधिवादिनी सेहो अपन जीवनघट पार करए अपना घाट दिस विदा भेली। समुन्नत परिवारक जे घट-घटवारि होइए ओ जहिना चेतनाननकेँ बुझल छैन तहिना बुधिवादिनीकेँ सेहो बुझले छैन। ओ बुझब भेल जे परिवारक सभ जनकेँ अपन-अपन शक्तिक अनुकूल परिवारक क्रिया-कलापमे लागल रहब। जहिना कोनो घरमे अपन-अपन जगहपर वस्तु-जात सैंत कऽ राखल रहैए जइसँ एक-दोसरमे टकराइक सम्भावना नइ रहै छै, तहिना परिवारमे मनुखोक अछिए। जे किछु दिन पूर्व तक चेतनाननक परिवारमे नइ छेलैन मुदा आब से बात नइ रहलैन। आब परिवारक सभ कियो अपन-अपन परिवारिक दायित्व बुझि रहल छैन जइसँ एक-दोसराक बीच अढ़बै-चढ़बैक रस्ता बन्न भऽ गेलैन।

ओना, बुधिवादिनी अँगनाक काज दिस विदा भऽ गेली मुदा पतिक खसल चेहराक रूप देख मनमे विचार जगिये गेल छेलैन जे मन किए मलिन छैन? अर्द्धांगिनी होइक नाते दुनियाँमे जँ कियो लग[iii] छैन तँ ओ हमहीं ने छिऐन। जाधैर हमर सम्बन्ध नहि बनल छल, माता-पिता जीबैत रहथिन ताधैर ओ दुनू गोरे छेलैन, मुदा हुनका दुनूक परोछ भेने आ हमरा एने तँ सम्बन्धमे बदलाव एबे कएल। मुदा जखन मनमे कोनो तरहक परिवारिक उलझन आबि गेल होनि तखन जँ हमरा किछु नहि कहि मने-मन बेथित बनल रहता सेहो तँ नीक नहियेँ भेल। विचार अबिते बुधिवादिनीक मनमे दोसर विचार टपैक पड़लैन। ओ टपकलैन ई जे जँ परिवारिक उलझन नहियेँ रहल होनि, समाजिक वा बेकतीगते कोनो रहल होनि, तखन जँ किछु नहियेँ कहलैन तँ ओ उचिते केलैन।

उचित अनुचितक बीच बुधिवादिनीक विचार समुचित होइते अपन काजमे लगि गेली।

पत्नीकेँ लगसँ हटिते चेतनाननक मनक जेना नि:साँस छुटलैन। नि:साँस छुटिते मनमे उपकलैन जे भने पत्नी लगसँ हटि गेली। लगमे रहितैथ तँ विचारमे बाधा उपस्थित करितैथ।

एकान्त होइते चेतनाननक मन साकांच भऽ सजगलैन। सजगिते अपन बीतल जिनगीपर नजैर निछोह दौड़लैन। की जीवन छल, की सोच-विचार छल आ आइ[iv] की अछि? आब तँ सोझ जीवन देख रहल छी जे दुनियाँमे जेतेक मनुख छैथ ओ सभ ने चाहि रहला अछि जे सोझ जीवन भेटए। मुदा सोझ जीवन-ले सोझ ज्ञानक खगता अछि किने, जेकर प्राप्ति भेला पछातिये ने कियो सुखसँ सुखी बनैत आ अपन स्वतंत्र रूपमे शासनसूत्र अपनबैत जिनगीक धारमे बहए लगैए। ऐठाम शासनसूत्रक माने भेल, जिनका किनको जिनगीमे सफलता भेटल छैन हुनका मनमे ईहो तँ जगिये जाइ छैन जे असफल जिनगी जीनिहारकेँ सही दिशा देखबैत सही बाटपर आनि, कखनो आगूसँ बाँहि पकैड़ आगू मुहेँक विचारक बाट धराबी तँ कखनो खच्चा-खुच्चीमे लसकैत देख पाछूसँ बल लगा आगू मुहेँ ठेलैक परियास सेहो करी। जइसँ जे विचार सूत्र बनैए वएह भेल शासनसूत्र। जखने मनुखक जिनगीमे प्रकाशित मन स्वतंत्र बाटक शासनसूत्र पकैड़ चलए लगैए तखने ओ सफल जिनगीक आनन्दसँ आनन्दित सेहो हेबे करैए। जे चेतनाननकेँ आधा जिनगी बितला पछाइत भेलैन। मुदा आधा जिनगी जे बितल छेलैन ओ सोल्होअना उनटल छेलैन जेकर पछाड़सँ अखनो पछड़िये रहला अछि। अखन धरि जे समाजक बीच मनुखक निर्माण भऽ रहल अछि ओ समाजिक बेवस्थाक अनुकूल भऽ रहल अछि जइमे शासन बेवस्थाक भरपूर प्रभाव सेहो पड़िते अछि। खाएर जे अछिमुदा ई तँ हर जीवनमे अछिए जे परिवारसँ समाज धरि अपन भारीपन[v] बनल रहए। जे चेतनाननकेँ सेहो छेलैन्हे।

कौलेज तकक पढ़ाइ छोड़ला पछाइत चेतनानन स्वतंत्र जिनगी धारण करैक खियालसँ नोकरी दिस नहि तकलैन। ओना, अपनो परिवारिक सम्पैत ओतेक छेलैन्हे जे एक परिवारक जीवन-यापनक कोन बात जे तीनियोँ-चारि परिवारक जीवन-यापन भइये सकैत छल, जँ समुचित ढंगसँ समुचित श्रमक उपयोग करितैथ, मुदा समाजिको परिवेश तँ परिवेश छीहे। एके-दुइये चेतनानन समाजक बीच सेवाक रूपमे बिआह-दान, श्राद्ध-मुड़नक संग पूजा-पाठमे आगू बढ़ए लगला। जइसँ किछु-किछु समाजक बीच जन-मतो आ जन-संघो बनियेँ गेल छेलैन। जखने जनमत, जनसंघ बनत तखने राजसत्ताक शिकारी सभ अपना-अपनीकेँ हथियाबए चाहिते अछि। शुरुहमे तँ चेतनानन अबूझ-अबोध जकाँ छला, तँए एक्के पक्षक बीच पहुँचला मुदा कनी ऑंखि-पाँखि भेने आब दोसरो-तेसरोसँ सम्बन्ध बनबए लगला अछि। जइसँ भीतरे-भीतर भलेँ बहुरूपिया बनि रहल होथि मुदा ऊपरसँ (देखौआ) तँ समाजक अगुआएल लोक भइये गेला किने। जँए अगुएला तँए सबहक बीच पूछ सेहो भेलैन। तहूमे मनुखक पूछ। ओना, जानवरक पूछ भलेँ माछी-मच्छड़ रोमैबला किए ने हुअए मुदा मनुखक पूछ तँ से नहियेँ छी, मनुखक पूछ तँ मनुखकेँ भरियेबे करैए। जखने मनुख अपन भारीपन देखैए तखने ने अपन जिनगीक सफलताक भान ओकरा होइ छइ। जे पबिते मनुख सुरसा (रामायणिक) जकाँ हनुमानसँ दोबर रूप अपन देखैबते अछि।

पचास बर्ख बितला पछाइत चेतनाननक विचारमे जहिना बदलाव एलैन तहिना सोचै-बुझैमे सेहो एलैन जइसँ जीवन पद्धति सेहो बदलिये रहल छेलैन।

ओना, चेतनानन गामक चौकपर साँझ-भोर चाह पीबैक बहन्ने सभ दिन जाइ छैथ जइसँ भरि दिनक गामसँ दुनियाँ तकक उड़न्ती समाचार साँझू पहरकेँ भेट जाइ छैन आ भरि रातिक समाचार भोरमे भेटिये जाइ छैन। समाचारकेँ समाचार जकाँ चेतनानन एकहरफी सुनि लइ छैथमुदाओइपर अपन कोनो टीका-टिप्पणी वा राय-विचार नइ दइ छथिन। तेकर कारण ई अछि जे ओ नीक जकाँ बुझए लगल छैथ जे जहिना रेडियो-अखबारक उड़न्ती समाचारकेँ आरो उड़न्ती आ फुड़न्ती-सुड़न्तीकेँ आरो फुड़न्ती-सुड़न्ती समाचार बना बँटिते अछि। जइसँ ओकर असलियत रूप झँपाइये जाइ छै, तँए टीका-टिप्पणी मात्र बातकेँ बतंगर बनाएब छोड़ि आर किछु ने रहैए। मुदा समाजक धारासँ अपन मुहोँ बन्न कए राखब तँ उचित नहियेँ भेल। जेकरा पुड़बैले चेतनानन  चौकक उड़न्ती समाचारक नाँगैर पकैड़ नेङड़ियबैत घटनाकेँ घटित बेकती लग पहुँच अपन विचार रखए लगला अछि।

आइ भोरमे जखन चेतनानन चौकपर पहुँचला कि एक गोरे चाहक गिलास आगू बढ़ा देलकैन। चाह देख चेतनानन बुझि गेला जे भरिसक कोनो काजक भार ऊपर औत। मुदा बिनु कहने मानियोँ लेब तँ उचित नहियेँ हएत। चाहो पीबए लगला आ ऑंखि उठा-उठा ओकरोपर नचबौ लगला जे मुहसँ की निकलै छैन। आधा गिलास चाह जखन चेतनाननक ससैर कऽ पेटमे चलि गेलैन तखन राधारमण बाजल-

चेतन भाय, अहाँसँ एकटा भारी काज अछि..!”

काज तँ काज भेल, मुदा भारी काज की भेल? बिनु बुझने चेतनानन बजला-

काज तँ काज भेलओ भारी की हएत?”

राधारमणक मन मानि गेलैन जे काज हेबे करत। बाजल-

भाय साहैब, इण्टरमे बेटा फेल भऽ गेल हेन, दिन-राति घरमे पेटकान लाधि कनैत रहैए, तीनियेँ दिनमे मरैमान भऽ गेलअछि ने किछु खाइए आ ने पीबैए। से कनी यूनिवर्सिटीक काज सल्टिया दिअ।

चेतनानन-

बच्चा पढ़ैमे केहेन अछि?”

राधारमण-

हाइ स्कूलमे सब दिन फस्ट करैत रहल। मैट्रिकमे सेहो सत्तैर प्रतिशतसँ बेसीए नम्बर आएल छेलइ।

राधारमणक बात सुनि चेतनानन बजला-

अच्छा..!”

मदनानन सेहो चाहेक दोकानपर छल। चेतनाननक मुहसँ अच्छासुनि अपन नम्बर लगबैत बाजल-

चेतन भाय, हाइ कोर्टक काज हमरो बजैर गेल अछि।

चेतनानन पुछलखिन-

की?”

मदनानन-

दुनू भैयारीमे जमीनक विवाद अछि, डिस्ट्रिक कोर्टमे केस चलै छल, एकतरफा जजमेन्ट भऽ गेल, सैह...।

गप्पक क्रममे चेतनानन अच्छा तँ कहि देलखिन मुदा जखन चाहक दोकानसँ घरमुहाँ भेला तखन आइ धरिक जिनगी चेतनाननक नजैरपर  नचलैन। अपन पैछला पचास सालक जिनगी ओहन दिशाहीन भऽ गेल जे टुटि-टुटि खसि-खसि ओतेक नीचाँ खसि पड़ल जे ओकरा सम्हारि कऽ आजुक सीमापर आनब कठिन भऽ गेल अछि।कहुना-कहुना अपन जिनगीकेँ समयक पटरीपर चढ़ा चलबए चाहै छी, सएह ने पार लगि रहल अछि। तैठाम अनकर काज सम्हारब तँ आरो जपाल भइये जाएत। अपना दिस जखन तकै छी तखन बुझि पड़ैए जे ओतेक अधला वृत्तियो आ विचारो अपना अपन जीवनक गाड़ी दौड़ेलौं जे नर्कक अट्ठाइसो भोगक अधिकारी बनि गेल छी, तेकरा पुराएब आ कि..?

घरपर पहुँचते चेतनाननक नजैर बुधिवादिनीपर पड़लैन। ओना, बुधिवादिनियोँ चेतनेननक रस्ता तकै छेली। नजैर पड़ि चेतनानन बजला-

भारीपन भार बनि गेल अछि।

अपने बोझक तर दबाएल पतिक बात सुनि बुधिवादिनी किछु ने बजली।

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शब्द संख्या : 1471, तिथि : 21 जुलाई 2018


 

[i]बेदराक रंग माने बालपन-रंग

[ii]साए बर्खक आधारपर

[iii]नजदीक

[iv]पचास बर्खक पछातिक

[v]गुरुआइ वा गुरुत्व

 

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