logo logo  

वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

Home ]

India Flag Nepal Flag

(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

१. आशीष अनचिन्हार- हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-४ २. मोहनराज "गगन"- बीहनिकथा

आशीष अनचिन्हार

हिंदी फिल्मी गीतमे बहर-

गजलक मतलामे जे रदीफ-काफिया-बहर लेल गेल छै तकर पालन पूरा गजलमे हेबाक चाही मुदा नज्ममे ई कोनो जरूरी नै छै। एकै नज्ममे अनेको काफिया लेल जा सकैए। अलग-अलग बंद वा अंतराक बहर सेहो अलग भ' सकैए संगे-संग नज्मक शेरमे बिनु काफियाक रदीफ सेहो भेटत। मुदा बहुत नज्ममे गजले जकाँ एकै बहरक निर्वाह कएल गेल अछि। मैथिलीमे बहुत लोक गजलक नियम तँ नहिए जानै छथि आ ताहिपरसँ कुतर्क करै छथि जे फिल्मी गीत बिना कोनो नियमक सुनबामे सुंदर लगैत छै। मुदा पहिल जे नज्म लेल बहर अनिवार्य नै छै आ जाहिमे छै तकर विवरण हम एहि ठाम द' रहल छी-----------------

"शराबी" फिल्म केर ई नज्म जे कि किशोर कुमारजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि प्रकाश मेहारा। संगीतकार छथि बप्पी लाहिड़ी। ई फिल्म 1984 मे रिलीज भेलै। एहिमे अमिताभ बच्चन, जयाप्रदा आदि कलाकार छलथि।

 

मंज़िलों पे आ के लुटते, हैं दिलों के कारवाँ

कश्तियाँ साहिल पे अक्सर, डूबती है प्यार की

 

मंज़िलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह

जब कदम ही साथ ना दे, तो मुसाफिर क्या करे

यूं तो है हमदर्द भी और हमसफ़र भी है मेरा

बढ़ के कोई हाथ ना दे, दिल भला फिर क्या करे

 

डूबने वाले को तिनके का सहारा ही बहुत

दिल बहल जाए फ़क़त इतना इशारा ही बहुत

इतने पर भी आसमां वाला गिरा दे बिजलियाँ

कोई बतला दे ज़रा ये डूबता फिर क्या करे

 

प्यार करना जुर्म है तो, जुर्म हमसे हो गया

काबिले माफी हुआ, करते नहीं ऐसे गुनाह

तंगदिल है ये जहां और संगदिल मेरा सनम

क्या करे जोशे जुनूं और हौसला फिर क्या करे

 

एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 2122 2122 2122 212 अछि। बहुत काल शाइर गजल वा नज्मसँ पहिने माहौल बनेबाक लेल एकटा आन शेर दैत छै ओना ई अनिवार्य नै छै। एहि नज्मसँ पहिने एकटा शेर "मंज़िलों पे आ के लुटते, हैं दिलों के कारवाँ" (एहू शेरमे इएह बहर छै) माहौल बनेबाक लेल देल गेल छै।  एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। उर्दूमे "और" शब्दक मात्रा निर्धारण दू तरीकासँ कएल जाइत छै "और मने 21" आ "औ मने 2"। एहि नज्मक संगे आन नज्म लेल ई मोन राखू। जरूरी नै जे ई नियम मैथिली लेल सेहो सही हएत।अंतिम बंदक दोसर पाँतिक अंतिम शब्द अछि "गुनाह" जाहिमे एकटा लघु अतिरिक्त अछि। ई छूट उर्दू गजलक संग मैथिली गजलमे सेहो अछि।


"मदहोश" फिल्म केर ई नज्म जे कि तलत महमदूजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि राजा मेंहदी अली खान। संगीतकार छथि मदन मोहन। ई फिल्म 1951 मे रिलीज भेलै। एहिमे मनहर (देसाइ), मीना कुमारी आदि कलाकार छलथि।

 

मेरी याद में तुम न आँसू बहाना

न जी को जलाना, मुझे भूल जाना

समझना के था एक सपना सुहाना

वो गुज़रा ज़माना, मुझे भूल जाना

 

जुदा मेरी मँज़िल, जुदा तेरी राहें

मिलेंगी न अब तेरी-मेरी निगाहें

मुझे तेरी दुनिया से है दूर जाना

 

ये रो-रो के कहता है टूटा हुआ दिल

नहीं हूँ मैं तेरी मोहब्बत के काबिल

मेरा नाम तक अपने लब पे न लाना

न जी को जलाना, मुझे भूल जाना

 

एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 122 122 122 122 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। ई बहर संस्कृतमे सेहो भुजंगप्रयात (मात्राक्रम 122+122+122+122) केर नामसँ छै। उर्दूमे एकरा “बहरे मोतकारिब मोसम्मन सालिम” कहल जाइत छै। एहि बहरपर बहुत नीक रचना अनेक भाषामे रचल गेल छै। प्रसंगवश एहिठाम हम गोस्वामी तुलसीदास जीक ई रचना (रुद्राष्टकम्) द' रहल छी.............

 

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् |

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेङहम् ||१||

 

एहि रुद्राष्टकम् केर छंद भुजंगप्रयात अछि। एकरा एना देखू.. नमामी 122 शमीशा 122 न निर्वा 122 णरूपं 122 आन पाँति सभकेँ एनाहिते देखि सकैत छी। हमरा द्वारा लिखल एहि सिरीजमे तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ, तेरी याद दिल से भुलाने चला हूँ, बहुत देर से दर पे आँखें लगी थी सन नज्म एही बहरपर अछि।

"खिलौना" फिल्म केर ई नज्म जे कि लता मंगेशकरजी द्वारा गाएल गेल अछि। नज्म लिखने छथि राजा आनंद बख्शी। संगीतकार छथि लक्ष्मीकांत प्यारे लाल। ई फिल्म 1970 मे रिलीज भेलै। एहिमे संजीव कुमार, मुमताज, जितेन्द्र, शत्रुघ्न सिन्हा आदि कलाकार छलथि। ई फिल्म गुलशन नंदाजीक उपन्यासपर आधारित अछि।

 

अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंजूर हो जाये

सनम तू बेवफ़ा के नाम से मशहूर हो जाये


हमें फ़ुर्सत नहीं मिलती कभी आँसू बहाने से

कई ग़म पास आ बैठे तेरे एक दूर जाने से

अगर तू पास आ जाये तो हर ग़म दूर हो जाये

 

वफ़ा का वास्ता देकर मुहब्बत आज रोती है

न ऐसे खेल इस दिल से ये नाज़ुक चीज़ होती है

ज़रा सी ठेस लग जाये तो शीशा चूर हो जाये

 

तेरे रंगीन होंठों को कमल कहने से डरते हैं

तेरी इस बेरुख़ी पे हम ग़ज़ल कहने से डरते हैं

कहीं ऐसा न हो तू और भी मग़रूर हो जाये

 

एहि नज्मक सभ पाँतिक मात्राक्रम 1222 1222 1222 1222 अछि। एकर तक्ती उर्दू हिंदी नियमपर कएल गेल अछि। उर्दूमे दू दीर्घक बीच बला संयुक्ताक्षरकेँ एकटा लघु मानि लेबाक छूट सेहो छै मुदा ई मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय भाषामे नहि भेटत। एहि नज्मकेँ सुनलाक बाद सेहो बुझि सकबै जे "ए" केर उच्चारण "इ" मने "एक" केर उच्चारण "इक" जकाँ छै आ ई उर्दूक विशिष्टता छै।

 

मोहनराज "गगन"

बीहनिकथा

"हरियाणा पंजाबमे फेर अहि बेर कोर्ट रबासि फोरबाक समय सीमा निर्देशित कएने छैक कथी लँ कीन रहल छह?" राजेश अपन दोस राजू सँ।

"पिछला बरख सेहो दिल्ली मे बन्न कएने रहैक मुदा कहा मानै छैक लोक"

"कथी लोक मानते होली मे इकोफ़्रेंडली होली! दियावाती मे शुद्घ बसात केर नाम पर बिन रबासिक दियावाती अकिल सभटा हिन्दू पर छजै आकि आआरो कतौ..?

"हँ होऊ वियाह मुरन हिंदुस्तान पाकिस्तान केर मैच उपनयन सभमे ठीक मुदा दियावाती मे ज्ञान तखन की कहूँ"

"स्वस्थ हवामे सांस लेब' के नेँ चाहइ छैक मुदा मात्र दियावाती मे रोकि..? रबासिक कारखाना बन्न क' न दौऊ"

"चलु छोड़ू नेँ कीनब कोर्टक आदेश छैक मुदा पराली जरा शुद्ध हवा बाँटबाक प्रयास सेहो स्वीकार नेँ"

"से बन्न ने हेतैए नाक रगड़ि मैरि जाऊ" उदास होइति दुनूगोटे मुँह हप कएने बैसि गेल।

 

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।