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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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जगदीश प्रसाद मण्डल- पंगु (उपन्यास)- आगाँ आ दूटा लघुकथा

जगदीश प्रसाद मण्डलक

पंगु

उपन्याससँ...

5.

पन्द्रह अगस्त 1947 इस्वीकएलालकिलापर स्वतंत्र देशक तिरंगा झण्डा फहरा गेल। 30 जनवरी 1948 इस्वीकए गाँधीजीक मृत्यु गोली लगलासँ भऽ गेलैन। 26 जनवरी 1950 इस्वीकए देशक अपन संविधान लागू भऽ गेल। 1952 इस्वीमे लोको सभा आ राज्यक विधान सभा-ले सेहो चुनाव भऽ गेल।

1952 इस्वीक आम चुनाव देशक ऐतिहासिक चुनाव छल। ऐतिहासिक ऐ मानेमे जे जेतेटा देश भारत आइ अछि ओतेटा भारत शासनक दृष्टिसँ पहिने नइ छल। राजा-रजबारसँ लऽ कऽ जमीन्दार, महंथानासँ देश भरल छल। किसानक देश भारत रहितो किसानक मूल पूजी[i] राजा-रजबारसँ लऽ कऽ महंथाना-जमीन्दार धरिक हाथमे घेराएल छल।

ओना, लोक सभाक चुनावमे जहिना देशक शासन (केन्द्र शासन) काँग्रेस सरकारक हाथ आएल तहिना राज्यक शासन सेहो काँग्रेसक हाथमे आएल। मुदा केन्द्रोमे आ राज्योमे एकछाहा काँग्रेसेक प्रतिनिधिटा नहि पहुँचला, अनेको राजनीतिक पार्टीक प्रतिनिधि सभ पहुँचल छला। दिल्लीक शासनमे जहिना पण्डित जवाहरलाल नेहरूक नेतृत्वमे काँग्रेसी सरकार बनल, तहिना अनेको पार्टीक बीच कम्युनिष्ट पार्टीक प्रतिनिधि सेहो विरोधी दलक नेतृत्वमे ठाढ़ भेला। काँग्रेस पार्टीक अलाबे आन सभ पार्टीसँ बेसी कम्युनिष्ट पार्टीक प्रतिनिधि छला। चुनावसँ पूर्व सभ पार्टी अपन-अपन घोषणा पत्रक माध्यमसँ अपन-अपन कार्यक्रम निर्धारित कऽ नेने छल।

देशोक बीच आ राज्यो सभक बीच समाजिक-आर्थिक विषमता तँ छेलैहे। कोनो-कोनो राज्य औद्योगिक क्षेत्रमे अगुआ जिनगीक मूल समस्याक समाधानमे सेहो अगुआ गेल छल, जइसँ ओइठाम रोजगारसँ लऽ कऽ स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सभ किछु अगुआ गेल छेलइ। मुदा अधिकांश राज्य पछुआएल छल। पछुआएबो एक्के रंगक नहि छल, रंग-बिरंगक छल। कोनो राज्य अपन जमीनकेँ[ii] प्रगतिक पटरीपर चढ़ा नेने छल, तँ कोनो राज्य पाछुए मुहेँ ससैर रहल छल। केरल-बंगालक संग आनो-आनो राज्य सभ अपन अर्थ बेवस्थाकेँ पटरीपर चढ़बए लगल छल। ओना, अपन बिहारो तइमे पाछू नहि छल। घराड़ीक जमीनकेँ[iii] बेलगान करबा चुकल छल। बकास्त जमीनक आन्दोलन सेहो मिथिलांचलमे जमि कऽ भेल। मुदा बकास्त जमीन तँ ओ जमीन ने भेल जेकरा अंग्रेज बहादुर सर्वे-सेटलमेन्टसँ 1903 इस्वीमे फाइनल केने छल। मुदा तँए कि पुस्त-पुस्ताइनसँ लोक खेती करैत नइ आबि रहल छला, सेहो बात तँ नहियेँ छल। मुदा हुनका सबहक लेल जमीनक कोनो अधिकार पत्र नइ छेलैन, तँए ओ सभ बँटेदारक रूपमे अपनाकेँ बुझै छला। जमीन उपजबैत रहला, अगो-जनारसँ लऽ कऽ अधिया-बॉंट बॉंटैत खेतबलाकेँ अपन कर्जक सुदि-सबाइ चुकबैत खाली हाथे घर घुमैत रहला। तँए एहेन खेतिहर लेल नव सिरासँ बटाइ कानूनक जरूरत भेल। ओना, किछु परिवारकेँ बेलगान घराड़ी छेलैन मुदा हुनको सबहक घराड़ीक लूट-पाट होइते रहैन। ओना, बेलगान घराड़ीपर रहनिहार आ खेत उपजौनिहारक नाओंसँ सिकमी बँटाइक खतियान सर्वेमे बनि चुकल छल मुदा तेकर अतिरिक्तो आधासँ बेसीए बँटेदार छुटलो छलाहे। मिथिलांचलक साम्यवादी पार्टी अपन चुनावी घोषणा पत्रमे अपन समस्या-समाधानक प्रस्ताव रखि चुकल छल, खेतीक लेल माटि मूल पूजी छीहे। लिखितसँ मौखिक धरि अपन मूल समस्या जेना- भूमिहीनकेँ बासभूमि, खेत उपजौनिहारकेँ सिकमीक बटाइक अधिकार, अधिक जमीन रखनिहार जमीन्दार-महंथानाकेँ भूमि हदबन्दीक[iv] भीतर आनब आ ओकर शेष जमीन उपजौनिहारक हाथमे देबइत्यादि।तैसंगपीबैसँ लऽ कऽ खेत पटबै धरिक पानिक बेवस्था, अइलेकोसी नहरिक संग गाम-गाममे पसरल पोखैरिक जे समस्या सभ छल तेकर समाधान सार्वजनिक रूपमे हुअए, इत्यादि-इत्यादि। ऐ सभ समस्याक समाधानक लेल साम्यवादी पार्टी उठि कऽ ठाढ़ भेल।

मिथिलांचलक सौभाग्य रहल जे ऐठाम महान-महान साधक लोकनिक आवाजाही सदिकाल होइत रहल। खाली आबाजाहिये टा नहि भेल, ओ सभ मिथिलांचलकेँ अपन कर्मभूमि बना जीवन भरि सेवा करैत रहला।

सन् 1955 मे विनोबा भावे झंझारपुर एला। नमहर सभाभेल छेलैन।अखन जे थानासँ पच्छिम औद्योगिक क्षेत्रक रूपमे देखै छी, ओइ समय ओ नमहर फिल्ड छल, जैपर फुटबॉल सेहो खेलल जाइत छल, ओही फिल्डपर सभा भेल छल। भूदान आन्दोलनक रूपमे जमीनक आन्दोलन विनोबाजी ठाढ़ केलैन। हुनक माँग रहैन अपन जमीनक छबम् हिस्सा जमीन दान करू।

एक दिस तेलांगनाक सशस्त्र लड़ाइ जारी छल आ दोसर दिस भूदानी आन्दोलन शुरू भेल।ऐ आन्दोलनमे प्रेम-पूर्वक स्वेच्छासँ अपन जमीन दान कएल जाइ छल। गाम-गाममे भूदान कमिटीक गठन भेल छल।

परिवारक रूपमे जहिना जीविकाक लेल खेत आ खेतीक समस्या छल तहिना गाम-समाजक रूपमे सेहो अनेको समस्या छल। एक दिस नव स्वतंत्र देश, दोसर दिस धरतीसँ अकास धरि अनेको समस्या सबहक सोझामे उपस्थित भेल। गाममे एक दिस जहिना पेटक समस्या छल तहिना दोसर दिस वस्त्र, आवास, शिक्षा आ चिकित्साक समस्या सेहो छल। गाम-गाममे हैजा, चेचक, मलेरिया इत्यादि अनेको संक्रामक बेमारीक प्रकोप होइत रहै छल। जइसँ अनेको लोक मरै छला। ने पढ़ाइ-लिखाइक लेल विद्यालय छल आ ने बेमारीक लेल चिकित्सा सुविधा। तैबीच अन्ध-बिसवास तेना पसरल जे मनुखकेँ समुचित दिशा दिस बढ़ए नहि दैत छल। अन्हार घर साँपे-साँप सदृश वातावरण बनल छल।

राज्यो सरकार आ केन्द्रो सरकारक बीच अपन-अपन एहेन-एहेन समस्या सभ छल जे अर्थाभावमे किछु कइये नहि पेब रहल छल। ओना, अर्थाभाव सेहो छल मुदा मूल अभाव छल कुशल केनिहारक।

मिथिलांचल सभ दिनसँ धार-धुरक इलाका रहबे कएल अछि। दर्जनो धार मिथिलांचलक बीच अछिए। ओहू धार-धूरमे सभ धारक गति-विधि एक्के रंग सेहो नहियेँ अछि। किछु धार एहेन अछिजे बेसी काट-खोंट करैए आ किछु एहेन अछि जे बहैत तँ अछि सालो भरि मुदा समटल गतिये। तैसंग मरल धार सेहो अछिए। मरल धारक माने भेल, ओहन धार जे बरसातमे तँ किछु दिन बोहितो अछिमुदा रहैए सभ दिन सुखले। जइसँ ने ओइ जमीनमे उपजा-बाड़ी होइए आ ने उपयोगक कोनो दोसरे काज। तैसंग माटिक रूपमे सेहो दुभाग्य रहल अछि जे उपजाउ माटि माने उर्वर शक्तिबला खेतक माटि भँसि गेल आ ओकरा ऊपर दोखरा बाउल भरि गेल।

कोसी-कमला नदीक उपद्रव सबहक सोझमे छेलैहे। ओकरो रोक-थामक लेल मिथिलाक किसान उठि कऽ ठाढ़ भेला। कोसी नदीकेँ दुनू भागसँ बान्हि ओइ पानिक उपयोग सिंचाइ-ले करैक योजना बनल। बान्हक संग फाटकबला पुलो आ नहरोक योजना बनल। तैसंग बिजली उत्पादन लेल डैम बनबैक अवाज सेहो उठले छल। ओना, देश नव-नव स्वतंत्र भेले छल। जइसँ देशवासीमे स्वतंत्रताक उत्साह सेहो बनले छेलैन। कोसी नदीक दुनू तटबन्ध बनबैले एकाएक जन-सैलाव उमैड़ गेल। माने जन-आन्दोलनक रूपमे सहयोग भेल। गाम-गामसँ लोक अपन श्रमदान करैले पहुँचल। बान्हो बनल, नेपाल सीमाक बीच फाटकबला पुलो बनल।सबहक मनमे बिसवास भेल जे दुनू देशक जमीनक सिंचाइ हएत। मुदा आइ लक-धक साठि बर्ख बीतलोपर कोसी नहरक योजनाक की गति अछि, ओ सबहक बीच अछिए। देशक अजादीक लड़ाइमे जे पीढ़ी बलिदान देलैन हुनकर आइ तेसर पीढ़ी गुजैर रहल अछि, गाम-घर छोड़ि-छोड़ि ओ सभ पड़ाइन कए रहला अछि।

जहिना अपना देशमे अंगरेजी शासनक विरूद्ध 1935 इस्वीक पछाइत जन-आन्दोलन उग्र भेल छल तहिना दुनियाँक बीच सेहो युद्ध जारी छल, जेकरा द्वितीय विश्व युद्धक रूपमे जनै छी। दू भागमे बँटि दुनियाँक बीच जबरदस लड़ाइ फँसि चुकल छल। पहिल विश्व युद्धक भुक्तभोगी जर्मनी भऽ चुकल छल। 1917 इस्वीमे रूसमे साम्यवादी पार्टीक बीच सत्ता आबि चुकल छल। दोसर विश्वयुद्धमे एक दिस साम्यवादी देश आ दोसर दिस साम्राज्यवादी देशक समूह आमने-सामने भऽ चुकल छल।

ओना, दुनियाँक इतिहास लड़ाइयेक घटनासँ भरल अछि, मुदा अखन धरिक जे लड़ाइ–दू देशक बीच–रहल ओ एक विचारक कहियौ आकि एकधाराक, बीच रहल। किएक तँ एक्के विचारधाराक शासन-तंत्र अपन-अपन बजार-ले लड़ल छल। मुदा द्वितीय विश्व युद्ध, जेकरा शीत युद्ध सेहो कहै छिऐ, ओ वैचारिक रूपमेलड़ाइ भेल।

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त भेला पछाइत नव-नव केतेको देश साम्यवादी शासन अंगीकार कऽ लेलक। तीस सितम्बर 1949 इस्वीकए माओत्से तुंगक नेतृत्वमे चीन सेहो साम्यवादी शासन अंगीकार कऽ लेलक। जे देश ओहू समयमे दुनियाँमे सभसँ अधिक जनसंख्याबला देश छल।

द्वितीय विश्व युद्धसँ पूर्व दुनियाँक अनेको देश साम्राज्यवादी देशक उपनिवेश छल। अपन देश[v] सेहो छेलैहे। ओइ सभ साम्राज्यवादी देशक एक्केटा मनसा छेलै जे उपनिवेश देशक लूट-खसोट कऽ अपने समृद्धशाली बनल रही। आम-जनक जीवनसँ कोनो मतलब नहि छल, मनुखक जिनगी जानवारोक जिनगीसँ बत्तर बनले छल। ओही बत्तर देशमे अपनो सभ छेलौं। द्वितीय विश्व युद्धमे किछु साम्राज्यवादी देश पस्त भेल आ साम्यवादी देश- सोवियत संघ सेहो सभ तरहेँ जर्जर भऽ गेल। मुदा किछु भेल, तैयो सोवियत संघक आम-अवाम अपन देशक सत्ता कायम रखलैन। दुनियाँक जन-गण अपन अस्तित्वकेँ[vi] सेहो चिन्हलैन। जइसँ युद्ध समाप्त भेला पछातियो देश-देशक भीतर जन-आन्दोलन सेहो जोड़ पकड़लक। दुनियाँक बीच दुनू विचारधारा–माने पूजीवादी-साम्राज्यवादी आ समाजवादी-साम्यवादीअपना-अपना गतिये बढ़ए लगल। एका-एकी केतेको देश साम्राज्यवादी जालसँ निकैल साम्यवादी विचारधाराक अनुकूल अपन प्रगतिक बाट स्वयं बनबए लगल। जइसँ दर्जनो देश साम्यवादी बेवस्था अपनौलक।

अपना सभ एशिया महादेशमे छी। जे आन सभ महादेशसँ सघन अवादीबला महादेश अछि। चीनमे साम्यवादी शासन स्थापित भेला पछाइत, वियतनाममे साम्यवादी आन्दोलन जोर पकड़लक। ओना, छोट-छीन देश वियतनामो अछि आ कोरिया सेहो अछि, मुदा दुनूमे जबरदस लड़ाइ साम्राज्यवादी देशक संग फँसल। कोरिया बँटा कऽ दू भाग भऽ दू देश बनि गेल। मुदा वियतनाम बँटाएल तँ नहि, मुदा आइ धरिक दुनियाँक ऐतिहासिक लड़ाइमे सभसँ अधिक दिन तक लड़ैबला देशमे अपन प्रथम स्थान तँ बनौनहि अछि। वियतनाम लक-धक 34 बर्ख धरि लगातार लड़ैत रहल। हो-ची-मिन्हक नेतृत्वमे वियतनामक युद्ध भेल छल। बम-बारूदक प्रभाव वियतनामक एक-एक इंच जमीनक उर्वराशक्तिकेँ नष्ट कऽ देलक। मुदा साम्यवादी शासन बनिते ओइठामक जन-गणदेशभक्त सभ अपन-अपन पूर्ण शक्ति लगा देशकेँ समृद्धशाली आ उन्नतशील बनेबे केलैन। देवचरण जहिना अपना ऑंखिये देशक शासनक उतार-चढ़ाव देखने छला तहिना अपन परिवारक उतार-चढ़ाव सेहो देखते आबि रहल छला। 1920 इस्वीसँ पूर्व जे देशक अजादीक आन्दोलन छल ओ शुरूआती अवस्थामे छल, तँए आम जन-गण तक नहि पहुँचल छल। मुदा गाँधीजीक जे चम्पारण सत्याग्रह भेलैन, तइ दिनसँ देशक जन-गणक बीच नव शक्ति पैदा लेलक। 1917 इस्वीमे गाँधीजी चम्पारण आएल छला। स्पष्ट मुद्दा हुनकर छेलैन। मुद्दा छेलैन जमीन्दारक शोषण। केना जमीन आ जमीनक उपजाक लूटक संग आरो-आरोकेतेको लूट धनीक वर्ग[vii]गरीबक करै छल, से विचार सार्वजनिक मंचपर उठल। ओना, ओइसँ पूर्व अंगरेजी नीलहा वेपारी जमीनक छीना-झपटी केना करै छल से बात नीलक कोठीक इर्द-गिर्दक किसान खूब नीक जकाँ जनिते छला मुदा ओ शोषण सीमित दायरामे छल, तँए कम लोकक नजैर ओइ दिस बढ़ल।

नीलक उपजाक लेल अन्नक उपजसँ अधिक उर्वर शक्तिबला जमीन चाही। एक बेर जइ खेतमे नीलक खेती भऽ जाइ छल, ओ खेत चारि-पाँच बर्खक लेल उस्सर जकाँ भऽ जाइ छल। तेपटाक हिसाबसँ किसानक खेत नीलहा वेपारी लइ छल। तेपटाक माने भेल जे जँ छह कट्ठाक कोला अछि तँ ओइमे मात्र दू कट्ठामे पहिल साल नीलक खेती करबै छल। लक-धक दू बर्ख एक खेपक नीलक फसलमे समय लगै छेलइ। मुदा से आन्दोलनसँ पूर्वहि, माने 1920 इस्वीसँ पूर्वहि समाप्त भऽ गेल छल।

नीलक खेतीसँ लऽ कऽ सिकमी, भाउली इत्यादि जमीनक निलामी तक देवचरण देख चुकल छला। अपनो पूर्वजक जमीन केना निलाम भेलैन सेहो पिताक मुहेँ सुननहि छला। तैसंग अपने केना पुन: अपन पूर्वजक जमीन आपस करौलैन सेहो बुझले छेलैन। अपन परिवारिक अस्तित्वकेँ जीबैत देख देवचरणक मनमे जहिना खुशी होइत रहैन तहिना अपन ऐगला पीढ़ी- अकिंचन राधाचरणकेँ देख दुख सेहो होइते छेलैन। राधाचरणकेँ कमाइ-खटाइक कोनो ऊहि नहि छल। ओना, देवचरण अपना जनैत राधाचरणकेँ सुधारैक कम परियास नहि केलैन मुदा मनुखक सोभावो तँ सोभाव छी। जइ अनुकूल लोक अपन जिनगी सेहो बनैबते अछि। गाममे केतौ कीर्तन, अष्टयाम, नवाह होइत छल तँ माता-पिताकेँ बिनु कहनौं राधाचरण ओइठाम पहुँच जाइ छल। खाइ-पीबैक बेवस्था सेहो रहिते छेलइ। ओहीठाम रहि खेबो-पीबो करै छल। तहिना केतौ नाचे भेल आकि भोजे-भन्डाराभेल तँराधाचरण चुपचाप, माने परिवारमे बिना केकरो किछु कहने ओतए चलि जाइ छल। भलेँ ओकरा अधला नजरिये सेहो देखल जा सकैए मुदा से तँ अछि नहि। देवचरणकेँ लाख कोशिश केला पछातियो राधाचरणमे कोनो सुधार नहि भेल। माने राधाचरणकेँ ने श्रम करैक बोध भेल आ ने श्रम-जीविक ज्ञाने भेल। ओना, देवचरण अपन परिवारो आ अपन कारोबारक संचालन अपना विचारे करिते छला जइसँ कोनो वैचारिक बेवधान नहियेँ होइ छेलैन मुदा परिवारक बीच मनुखक जिनगी तँ नदीक धारा सदृश प्रवाहित होइते रहैए, तइमे किछु बाधा तँ देवचरणक नजरिक सोझमे पड़िते छेलैन। पड़बो केना ने करितैन? मनुख धरतीपर बहैत धार थोड़े छी, ओ तँ चेतनशील जीवनक धार छी। जइसँ चेतनशील मनुखक चेतनापर प्रभाव पड़ब सोभाविके छल। ओहुना देखै छी जे धार सभमे जखन धाराक मध्य बाउल भरि जाइए–माने पानिक बहावक बीच बाउल जमा भऽ जाइए–तखन पानिक धाराकेँ रोकिते अछि, जइसँ धाराक प्रवाह ठमैक दोसर-तेसर दिस मुँह बना बहए लगैए, तहिना ने मनुखोक वंशगत विचारक प्रवाहमे श्रमहीनता एलासँ दिशाहीनता अबिते अछि। तँए देवचरणकेँ चिन्तित हएब सोभाविके छेलैन।

संयोग बनल, जहिना एक दिस देशक शासन विदेशीसँ स्वदेशीक हाथ आएल तहिना अपन पूर्वजक अरजल जमीनक अधिकार सेहो दोसराक हाथसँ देवचरणक अपना हाथ एलैन। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र किसानक रूपमे देवचरण अपनाकेँ देखए लगला। भलेँ राधाचरणक स्थितिसँ सेहो ऐगला पीढ़ीक भविसक चिन्ता सोभाविके रूपमे होइ छेलैन। ओना, हरिचरण सेहो तेरह-चौदह बर्खक भइये गेल छल, मुदा जइ परिवारमे पिता, बाबा, परबाबा जीवित रहै छैथ तइ परिवारमे तेरह-चौदह बर्खबलाकेँ लोक बच्चे बुझैए, जेकर अवस्थाकेँ खाइ-खेलाइबला सेहो मानले जाइए, मुदा से सभ परिवारमे नइ होइए। एहनो परिवार सभ अछिए जइमे पैछला पीढ़ीकेँ असमायिक मृत्यु भेलापर वा कोनो कारणे पिता-बाबाक छाया हटलापर परिवारक भार बच्चापर पड़िते अछि। जइसँ खाइ-खेलाइक स्थान परिवारकचिन्तो-फिकिर आ भारी-भारी काजक बोझ सेहो काँच उमेरबला बच्चाक सिरपर चढ़िते अछि। ओना, हरिचरणकेँ गात[viii] देख देवचरणक मनमे एते आशा बनले छेलैन जे भीरो-कुभीरक भार पोता उठाइये सकैए मुदा से ओकरा संग अन्याय-अनुचित भेबे कएल। जैठाम विकल्प रहैए तैठाम तँ संकल्पक धरो सेहो गतिमान रहिते अछि, मुदा जैठाम विकल्पे नहि, तैठाम तँ धारामे थोड़-थाड़ रूकाबट होइते अछि। खाएर, ई मात्र एकटा देवचरणेक संग हएत सेहो बात नहियेँ अछि। ओना, देवचरणक जे समस्या छैन ओ आनसँ थोड़ेक सटलो छैन आ थोड़ेक हटलो छैन्हे। सटै-क माने भेल जे जइ परिवारमे बाबा, पिता आ पुत्र- तीनू पीढ़ीक तीनू जीवित छैथ। तहिना हटल ऐ दुआरे छैन जे देवचरण अपने उमरदार भऽ गेला अछि, जइसँ समरथाइक सामर्थक ओ रूप दुर्बल भइये गेल छैन, जइमे कठिन शारीरिक श्रम करै छला। तहिना दोसर पीढ़ीमे राधाचरण जीवित रहितो श्रमचोर भेने श्रमहीन भइये गेल अछि। मुदा परिवार तँ परिवार छी। ओकर अपन नियमित क्रिया छै, जइ बलपर ओ ठाढ़ भऽ आगू मुहेँ बढ़ैए।

भिनसुरका उखड़ाहाक आठ बजेक समय। परिवारक पतराएल काज, माने खेती-बाड़ीक काज नइ रहने, देवचरणकेँ निसचिन्ती रहबे करैन। ओना, माल-जालक सेवा-काज आगूमे छेलैन्हेमुदा जे समय खेती-बाड़ीक छेलैन, ओइमे कमी ऐने काज पतराएले छेलैन। दरबज्जाक ओसारक चौकीपर बैस देवचरण चाह पीब नेने छला। तहीकाल हरिचरणकेँ ऑंगनसँ निकलैत देखलैन। देखते हरिचरणकेँ शोर पाड़ैत बजला-

बौआ, एमहर आबह।

बाबाक बात सुनि हरिचरण लगमे आबि चौकीपर बैसैत बाजल-

की कहलौं, बाबा?”

हरिचरणक बात सुनि देवचरणक मन जेना पतालसँ उड़ि अकासमे पहुँच गेल होनि तहिना भेलैन। मुदा उमेरो[ix] तँ उमेर छी, ओकरो अपन गुण-धर्म अछिए। तहूमे देवचरण इमानदारीसँ अखन तक परिवारक गाड़ीक जुआ खिंचैत आएल छैथ, तँए असथिर चिते बजला-

बौआ, अखन तक परिवारक भार अपन सिर सजिगाड़ीक जुआमे[x] कन्हा लगा खिंचैत एलौं, मुदा आब ओ सामर्थ नहि रहल जेकर खगता परिवारकेँ अछि। तँए...।

तँएकहि देवचरण चुप भऽ गेला। मुदा हरिचरणक मनमे जिज्ञासा उपैकिये गेल। हरिचरण बाजल-

बाबा?”

बाबाकअतिरिक्त हरिचरण किछु ने बाजल। मुदा हरिचरणक मनक छीपल विचार देवचरणक मनकेँ हौंर देलकैन। जइसँ रंग-रंगक विचार, संकल्प-विकल्पक संग उठए लगलैन, जइसँ नवाकुंर पोताकेँ की कहितैथ आ की नइ कहितैथ, तइ बिच्चेमे देवचरणक मन फँसि गेलैन। मुदा लगले देवचरणक मनमे उपकलैन जे जिनगीक कोनो ठेकान थोड़े अछि, ओ तँ बेठेकान अछि। अखनो मरि सकै छी आ पचीस-पचास बर्ख जीवियो सकै छी। तखन तँ बीचमे एकटा समस्या उपस्थित भइये गेल अछि, जे जइ रूपे परिवारकेँ हमर श्रमक खगता छै तेकरा पुरबैमे आब अपन दैहिक शक्तिक अभावक कारणे किछु-किछु बाधा उपस्थित हेबे करत। मुदा हरिचरण सन नव शक्तिक[xi] उदय तँ परिवारमे भइये गेल अछि, एकरा जँ सही ढंगसँ उपयोग करब तँ कोनो तरहक बाधा परिवारमे उपस्थित नहि हएत। देवचरण बजला-

बौआ, अखन तँ काजक बेर अछि तँए अखन एतबे राखह। साँझू पहर जखन दुनियाँदारीसँ निचेन हएब तखन सभ कियो- तोहूँ, तोहर माइयो आ दादियो एकठाम बैस विचारि लेब जे आगू केना चलैक अछि। जहिना हल्लुकसँ भारी[xii] काज परिवारक मध्य अछि तहिना नव-पीढ़ीसँ पुरान पीढ़ी धरि सेहो सभ छीहे।

हरिचरण बाजल-

से तँ छीहे। मुदा अहाँ किछु भेलिऐ तैयो तँ धान-गहुम दौन करैबला खोहक जोतल बरद जकाँ मेहौता छीहे। जेना-जेना खोहपर अहाँ घुमबै तेना-तेना ने अहींक लागल बीचलो आ पैटक बरद जकाँ हमहूँ सभ घुमबै।

मुस्की दैत देवचरण बजला-

अखुनका विचारकेँ कानपर रखिहह। साँझूपहर सभ एकठाम बैस कोनो-ने-कोनो रस्ता निकालिये लेब।

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शब्द संख्या : 2492, तिथि : 27 मई 2018

जारी....


 

[i]जमीन

[ii]खेतकेँ

[iii]बासभूमिकेँ

[iv]बीस बीघाक भीतर

[v]भारत

[vi]मनुखक जिनगीकेँ

[vii]जमीन्दार वर्ग

[viii]शरीरक रंग-रूप

[ix]मनुखक अवस्था

[x]ऐगला भागमे

[xi]दैहिक शक्ति

[xii]शारीरिक श्रमक खियालसँ

 

जगदीश प्रसाद मण्डल

दूटा लघुकथा-

श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक

दूटा लघुकथा

भारीपन भार बनि गेल’, ‘प्रवल इच्छा

 

भारीपन भार बनि गेल

जिनगीक आधा उमेर[i] बीतला पछाइत पचास बर्खक चेतनाननकेँ अपन चेतन-शक्ति बदैल गेलैन। चेतन शक्ति बदलने सोचनो-शक्ति आ क्रियो-शक्ति बदैल गेलैन। जइसँ चेतनानन अपने-आपमे समाहित भऽ गेला।

जेठ मासक बेरुका तीन बजेक समय, दरबज्जापर बैसल चेतनाननक मन अपन जिनगीक समीक्षा करए लगलैन। समीक्षाक दौड़मे विचार फुटलैन-

भारीपन भार बनि गेल..!”

चेतनाननक मनसँ फुटि कऽ विचार बहरेबे कएल छेलैन कि पत्नी- बुधिवादिनी चाह नेने दरबज्जापर पहुँचली। ओना, सभ दिनक चाह पीबैक अभ्यास चेतनाननकेँ सभ रंगक छैन। माने गरमी मासमे तीन बजे, मध्यमास–  आसिन-कातिक आ फागुन–मे अढ़ाइ बजे आ जाड़क मासमे दू बजे बेरुका चाह पीब चेतनानन दोसर उखड़ाहक काजमे लगै छैथ। अभ्यासक हिसाबसँ चाह पीबैक इच्छा समयपर जगिते छेलैन मुदा चाह पीबैसँ पहिने जे बदलल जिनगीक विचारक मथन मनमे उठि गेल छेलैन तइसँ चेतनाननक मन थोड़ेक ओझरा गेल रहैन। माने, चाह पीबैक जेतेक इच्छा आन दिन रहै छेलैन तइमे आइ थोड़ेक कमी आबि गेल छेलैन। चाह पीबैक इच्छा कमने पत्नीसँ गप करैक इच्छा सेहो कमि गेल छेलैन जइसँ आगूमे ठाढ़ पत्नीपर एक नजैर खिरा चुपचाप चाहक गिलास देखए लगला। 

ओना, अपन बुइधिक ओकातिये बुधिवादिनीक मनमेविचार जगि गेल छेलैन जे भरिसक पति कोनो चिन्तामे पड़ि गेल छैथ तँए जेहेन मन उछटगर हेबा चाही से नहि छैन। फेर भेलैन जे किए ने पुछिये लिऐन जे मन खसल देखै छी। मुदा फेर भेलैन जे खसलो मनक (गम्भीर रूपमे) तँ अपन-अपन दिशा होइते अछि। माने ई जे एक खसब भेल जे कोनो संकटकेँ दूर करैले ओकर समधानल रस्ता खोजैमे खसैए आ दोसर होइए जे नीक जिनगी पेबा-ले भविसक बाट समधानि कऽ खोजबमे सेहो मन खसबे करैए। लगले बुधिवादिनीकेँ भेलैन जे जखन किछु बाजि नहि रहल छैथ तखन अनेरे मधुमाछी-छत्तामे गोला मारि कटाएब नीक नहि। तँए, अपन जे अखुनका काज अछि पहिने तेकरा मुसताजिसँ कऽ ली। जँ कोनो दुखो-तकलीफ मनमे हेतैन तँ एक्केबेर बिढ़नी जकाँ थोड़े हनहना उठता...।

चाहक गिलास चेतनाननक आगूमे रखि बुधिवादिनी पान आनए ऑंगन विदा भेली। जे काज चेतनाननकेँ सेहो सभ दिनक बुझले छैन।

चाह-पान पीला-खेला पछाइत जहिना चेतनानन अपन जीबनपट खोलए अपन विचारधारा दिस विदा भेलातहिना बुधिवादिनी सेहो अपन जीवनघट पार करए अपना घाट दिस विदा भेली। समुन्नत परिवारक जे घट-घटवारि होइए ओ जहिना चेतनाननकेँ बुझल छैन तहिना बुधिवादिनीकेँ सेहो बुझले छैन। ओ बुझब भेल जे परिवारक सभ जनकेँ अपन-अपन शक्तिक अनुकूल परिवारक क्रिया-कलापमे लागल रहब। जहिना कोनो घरमे अपन-अपन जगहपर वस्तु-जात सैंत कऽ राखल रहैए जइसँ एक-दोसरमे टकराइक सम्भावना नइ रहै छै, तहिना परिवारमे मनुखोक अछिए। जे किछु दिन पूर्व तक चेतनाननक परिवारमे नइ छेलैन मुदा आब से बात नइ रहलैन। आब परिवारक सभ कियो अपन-अपन परिवारिक दायित्व बुझि रहल छैन जइसँ एक-दोसराक बीच अढ़बै-चढ़बैक रस्ता बन्न भऽ गेलैन।

ओना, बुधिवादिनी अँगनाक काज दिस विदा भऽ गेली मुदा पतिक खसल चेहराक रूप देख मनमे विचार जगिये गेल छेलैन जे मन किए मलिन छैन? अर्द्धांगिनी होइक नाते दुनियाँमे जँ कियो लग[ii] छैन तँ ओ हमहीं ने छिऐन। जाधैर हमर सम्बन्ध नहि बनल छल, माता-पिता जीबैत रहथिन ताधैर ओ दुनू गोरे छेलैन, मुदा हुनका दुनूक परोछ भेने आ हमरा एने तँ सम्बन्धमे बदलाव एबे कएल। मुदा जखन मनमे कोनो तरहक परिवारिक उलझन आबि गेल होनि तखन जँ हमरा किछु नहि कहि मने-मन बेथित बनल रहता सेहो तँ नीक नहियेँ भेल। विचार अबिते बुधिवादिनीक मनमे दोसर विचार टपैक पड़लैन। ओ टपकलैन ई जे जँ परिवारिक उलझन नहियेँ रहल होनि, समाजिक वा बेकतीगते कोनो रहल होनि, तखन जँ किछु नहियेँ कहलैन तँ ओ उचिते केलैन।

उचित अनुचितक बीच बुधिवादिनीक विचार समुचित होइते अपन काजमे लगि गेली।

पत्नीकेँ लगसँ हटिते चेतनाननक मनक जेना नि:साँस छुटलैन। नि:साँस छुटिते मनमे उपकलैन जे भने पत्नी लगसँ हटि गेली। लगमे रहितैथ तँ विचारमे बाधा उपस्थित करितैथ।

एकान्त होइते चेतनाननक मन साकांच भऽ सजगलैन। सजगिते अपन बीतल जिनगीपर नजैर निछोह दौड़लैन। की जीवन छल, की सोच-विचार छल आ आइ[iii] की अछि? आब तँ सोझ जीवन देख रहल छी जे दुनियाँमे जेतेक मनुख छैथ ओ सभ ने चाहि रहला अछि जे सोझ जीवन भेटए। मुदा सोझ जीवन-ले सोझ ज्ञानक खगता अछि किने, जेकर प्राप्ति भेला पछातिये ने कियो सुखसँ सुखी बनैत आ अपन स्वतंत्र रूपमे शासनसूत्र अपनबैत जिनगीक धारमे बहए लगैए। ऐठाम शासनसूत्रक माने भेल, जिनका किनको जिनगीमे सफलता भेटल छैन हुनका मनमे ईहो तँ जगिये जाइ छैन जे असफल जिनगी जीनिहारकेँ सही दिशा देखबैत सही बाटपर आनि, कखनो आगूसँ बाँहि पकैड़ आगू मुहेँक विचारक बाट धराबी तँ कखनो खच्चा-खुच्चीमे लसकैत देख पाछूसँ बल लगा आगू मुहेँ ठेलैक परियास सेहो करी। जइसँ जे विचार सूत्र बनैए वएह भेल शासनसूत्र। जखने मनुखक जिनगीमे प्रकाशित मन स्वतंत्र बाटक शासनसूत्र पकैड़ चलए लगैए तखने ओ सफल जिनगीक आनन्दसँ आनन्दित सेहो हेबे करैए। जे चेतनाननकेँ आधा जिनगी बितला पछाइत भेलैन। मुदा आधा जिनगी जे बितल छेलैन ओ सोल्होअना उनटल छेलैन जेकर पछाड़सँ अखनो पछड़िये रहला अछि। अखन धरि जे समाजक बीच मनुखक निर्माण भऽ रहल अछि ओ समाजिक बेवस्थाक अनुकूल भऽ रहल अछि जइमे शासन बेवस्थाक भरपूर प्रभाव सेहो पड़िते अछि। खाएर जे अछिमुदा ई तँ हर जीवनमे अछिए जे परिवारसँ समाज धरि अपन भारीपन[iv] बनल रहए। जे चेतनाननकेँ सेहो छेलैन्हे।

कौलेज तकक पढ़ाइ छोड़ला पछाइत चेतनानन स्वतंत्र जिनगी धारण करैक खियालसँ नोकरी दिस नहि तकलैन। ओना, अपनो परिवारिक सम्पैत ओतेक छेलैन्हे जे एक परिवारक जीवन-यापनक कोन बात जे तीनियोँ-चारि परिवारक जीवन-यापन भइये सकैत छल, जँ समुचित ढंगसँ समुचित श्रमक उपयोग करितैथ, मुदा समाजिको परिवेश तँ परिवेश छीहे। एके-दुइये चेतनानन समाजक बीच सेवाक रूपमे बिआह-दान, श्राद्ध-मुड़नक संग पूजा-पाठमे आगू बढ़ए लगला। जइसँ किछु-किछु समाजक बीच जन-मतो आ जन-संघो बनियेँ गेल छेलैन। जखने जनमत, जनसंघ बनत तखने राजसत्ताक शिकारी सभ अपना-अपनीकेँ हथियाबए चाहिते अछि। शुरुहमे तँ चेतनानन अबूझ-अबोध जकाँ छला, तँए एक्के पक्षक बीच पहुँचला मुदा कनी ऑंखि-पॉंखि भेने आब दोसरो-तेसरोसँ सम्बन्ध बनबए लगला अछि। जइसँ भीतरे-भीतर भलेँ बहुरूपिया बनि रहल होथि मुदा ऊपरसँ (देखौआ) तँ समाजक अगुआएल लोक भइये गेला किने। जँए अगुएला तँए सबहक बीच पूछ सेहो भेलैन। तहूमे मनुखक पूछ। ओना, जानवरक पूछ भलेँ माछी-मच्छड़ रोमैबला किए ने हुअए मुदा मनुखक पूछ तँ से नहियेँ छी, मनुखक पूछ तँ मनुखकेँ भरियेबे करैए। जखने मनुख अपन भारीपन देखैए तखने ने अपन जिनगीक सफलताक भान ओकरा होइ छइ। जे पबिते मनुख सुरसा (रामायणिक) जकाँ हनुमानसँ दोबर रूप अपन देखैबते अछि।

पचास बर्ख बितला पछाइत चेतनाननक विचारमे जहिना बदलाव एलैन तहिना सोचै-बुझैमे सेहो एलैन जइसँ जीवन पद्धति सेहो बदलिये रहल छेलैन।

ओना, चेतनानन गामक चौकपर साँझ-भोर चाह पीबैक बहन्ने सभ दिन जाइ छैथ जइसँ भरि दिनक गामसँ दुनियाँ तकक उड़न्ती समाचार साँझू पहरकेँ भेट जाइ छैन आ भरि रातिक समाचार भोरमे भेटिये जाइ छैन। समाचारकेँ समाचार जकाँ चेतनानन एकहरफी सुनि लइ छैथमुदाओइपर अपन कोनो टीका-टिप्पणी वा राय-विचार नइ दइ छथिन। तेकर कारण ई अछि जे ओ नीक जकाँ बुझए लगल छैथ जे जहिना रेडियो-अखबारक उड़न्ती समाचारकेँ आरो उड़न्ती आ फुड़न्ती-सुड़न्तीकेँ आरो फुड़न्ती-सुड़न्ती समाचार बना बँटिते अछि। जइसँ ओकर असलियत रूप झँपाइये जाइ छै, तँए टीका-टिप्पणी मात्र बातकेँ बतंगर बनाएब छोड़ि आर किछु ने रहैए। मुदा समाजक धारासँ अपन मुहोँ बन्न कए राखब तँ उचित नहियेँ भेल। जेकरा पुड़बैले चेतनानन  चौकक उड़न्ती समाचारक नाँगैर पकैड़ नेङड़ियबैत घटनाकेँ घटित बेकती लग पहुँच अपन विचार रखए लगला अछि।

आइ भोरमे जखन चेतनानन चौकपर पहुँचला कि एक गोरे चाहक गिलास आगू बढ़ा देलकैन। चाह देख चेतनानन बुझि गेला जे भरिसक कोनो काजक भार ऊपर औत। मुदा बिनु कहने मानियोँ लेब तँ उचित नहियेँ हएत। चाहो पीबए लगला आ ऑंखि उठा-उठा ओकरोपर नचबौ लगला जे मुहसँ की निकलै छैन। आधा गिलास चाह जखन चेतनाननक ससैर कऽ पेटमे चलि गेलैन तखन राधारमण बाजल-

चेतन भाय, अहॉंसँ एकटा भारी काज अछि..!”

काज तँ काज भेल, मुदा भारी काज की भेल? बिनु बुझने चेतनानन बजला-

काज तँ काज भेलओ भारी की हएत?”

राधारमणक मन मानि गेलैन जे काज हेबे करत। बाजल-

भाय साहैब, इण्टरमे बेटा फेल भऽ गेल हेन, दिन-राति घरमे पेटकान लाधि कनैत रहैए, तीनियेँ दिनमे मरैमान भऽ गेलअछि ने किछु खाइए आ ने पीबैए। से कनी युनिवरर्सिटीक काज सल्टिया दिअ।

चेतनानन-

बच्चा पढ़ैमे केहेन अछि?”

राधारमण-

हाइ स्कूलमे सब दिन फस्ट करैत रहल। मैट्रिकमे सेहो सत्तैर प्रतिशतसँ बेसीए नम्बर आएल छेलइ।

राधारमणक बात सुनि चेतनानन बजला- अच्छा..!”

मदनानन सेहो चाहेक दोकानपर छल। चेतनाननक मुहसँ अच्छासुनि अपन नम्बर लगबैत बाजल-

चेतन भाय, हाइ कोर्टक काज हमरो बजैर गेल अछि।

चेतनानन पुछलखिन-

की?”

मदनानन- दुनू भैयारीमे जमीनक विवाद अछि, डिस्ट्रिक कोर्टमे केस चलै छल, एकतरफा जजमेन्ट भऽ गेल, सैह...।

गप्पक क्रममे चेतनानन अच्छा तँ कहि देलखिन मुदा जखन चाहक दोकानसँ घरमुहॉं भेला तखन आइ धरिक जिनगी चेतनाननक नजैरपर  नचलैन। अपन पैछला पचास सालक जिनगी ओहन दिशाहीन भऽ गेल जे टुटि-टुटि खसि-खसि ओतेक नीचाँ खसि पड़ल जे ओकरा सम्हारि कऽ आजुक सीमापर आनब कठिन भऽ गेल अछि।कहुना-कहुना अपन जिनगीकेँ समयक पटरीपर चढ़ा चलबए चाहै छी, सएह ने पार लगि रहल अछि। तैठाम अनकर काज सम्हारब तँ आरो जपाल भइये जाएत। अपना दिस जखन तकै छी तखन बुझि पड़ैए जे ओतेक अधला वृत्तियो आ विचारो अपना अपन जीवनक गाड़ी दौड़ेलौं जे नर्कक अट्ठाइसो भोगक अधिकारी बनि गेल छी, तेकरा पुराएब आ कि..?

घरपर पहुँचते तेचनाननक नजैर बुधिवादिनीपर पड़लैन। ओना, बुधिवादिनियोँ चेतनेननक रस्ता तकै छेली। नजैर पड़ि चेतनानन बजला-

भारीपन भार बनि गेल अछि।

अपने बोझक तर दबाएल पतिक बात सुनि बुधिवादिनी किछु ने बजली।

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शब्द संख्या : 1471, तिथि : 21 जुलाई 2018


 

[i]साए बर्खक आधारपर

[ii]नजदीक

[iii]पचास बर्खक पछातिक

[iv]गुरुआइ वा गुरुत्व

 

प्रवल इच्छा 

अदहा जेठ बीत गेल छल। आन सालसँ भिन्न ऐ सालक जेठक रोहानी अछि। आन साल जेना बरखा नइ होइ छल तइसँ गर्मीक प्रकोप विशेष रहै छल, से ऐ साल नहि अछि। समय-समयपर तीनटा बिहड़िया बरखा भेल, जइसँ जेठ रहितो फागुन जकाँ खुशनुमा समय बनल। ओना, बरखा तीनिए-टा भेल, मुदा अकासमे वादल बेसी काल उमड़ैत-घुमड़ैत रहल, जइसँ ने बेसी रौदक ताप बढ़ल आ ने लूए चलल। आन साल जेना लोक दस बजैत-बजैत खेत-पथार, बाध-बोनसँ घरपर चलि अबै छल से ऐबेर नहि अछि। नहाइ-बेर तक लोक बाध-बोनक काजमे जुटल रहैए।

गामक रोहानी सेहो आन सालसँ नीक अछि। जहिना बैशाखा तीमन-तरकारीसँ बाध लहलहा रहल अछि तहिना गरमा मकइ, धान आ खेरही सेहो बाधकेँ हरियर-कचोर केनहि अछि। तैसंग आम-जामुन सेहो तेना लुधकी लागि फड़ल अछि जे गाछी-बिरछीसँ अबैक मन नहि होइए। केते सालक पछाइत ऐबेर एहेन आम फड़ल अछि। जहिना आमक फड़ी अछि तहिना जामुनोक अछिए। तहूमे गामक जे किसान सभ छैथ, ओ ओहेन अनुभवी छैथ जे जहिना चुनि-चुनि आमक गाछी-कलम लगौने छैथ तहिना जामुनो-गुलजामुन लगौनहि छैथ। जइसँ गुल-जामुनक संख्या बेसी अछि। गृहस्ताश्रममे सरही-कलमी दुनूक खगतो अछिए। जहिना खाइ-पीबैले नीक-नीक कलमी आमक खगता अछि तहिना जरण-मरणमे सरही आमक गाछक खगता सेहो अछिए।

प्राचीन गाम रहने जहिना गाछी-कलमसँ सम्पन्न अछि तहिना बेख-बुनियादिसँ सेहो सम्पन्न अछिए। बेख-बुनियादि भेल- नीक-नीक सुकाठ लकड़ीक गाछक संग बाँस-बँसबारि सेहो। जीवनमे जहिना खाइ-पीबैले आम-जामुन, लताम-बेल इत्यादि सभ रंगक फलक खगता होइए तहिना घर-घरहट करैले नीक लकड़ियो आ बाँसोक खगता अछिए।

ओना, पुरानो-पुरान गाममे अन्तर अछि। किछु गाम एहेन अछि जे कमला-कोसीक, चपेटमे पड़ि केता बेर उपटल अछिआ केता बेर बसल अछि, मुदा हमर गाम से नइ अछि। धार-धुरमे केबल एकटा चरिमसुआ धार अछि जे बर्खाक पानि पीबते फुलाइए आ बर्खाक अन्त होइत-होइत सटकए लगैए जे कातिक बीतैत-बीतैत सुखि जाइए। ओना, गामक जेतेक जमीन धारक पेटमे अछिओइमे कोनो उपजा-बाड़ी नहियेँ होइए, तइसँ एते नोकसान तँ गामक अछिए, मुदा एते तँ नफ्फो अछिए जे कमो बरखा भेने आन-आन गामक पानि उठा कऽ धार अनैए आ गामक पोखरियो आ चौरियो सभकेँ भरि दइए जइसँ पानिक सोलहन्नी खगता तँ नहि, मुदा अदहा-छिदहा तँ पूरा होइते अछि। तहूमे धारक पेट तेहेन उथराह अछि जे तीनियोँ-चारि हाथ पानि मोटाइते ऊपर फेकए लगैए। जइसँ खेतो सभ पनिआइए आ पोखैर-झाँखैर सेहो भरि जाइए।

तेतबे नहि, कमला-कोसीक प्रकोप नहि रहने गामक गाछियो-कलम आ खेतो-पथारक ऑंड़ि-मेड़ नीक अछिए। साए-साए बर्खक जहिना शीशोक गाछसँ गाम भरल अछि तहिना साए-साए बर्खक आमोक गाछ आ बाँसोक बँसवारि अछिए। सुकाठ लकड़ीमे शीशोओक अपन महत अछिए। महत ई जे जहिना घरक खुट्टा-खाम्ही मजगूत होइए तहिना घरक ऊपरका भागमे तड़क, धरैन, मानी थम्हक रूपमे सेहो अछिए। तैसंग घरक बीचला भागमे केबाड़-चौकैठक संग सुतै-बैसैले चौकियो-कुरसीक पूर्ति केनहि अछि।

ऐबेर जहिना उपजा-बाड़ी, कलम-गाछी लहलहा रहल अछि तहिना लगनो[iv]क धुमसाही अछि। अपनो मुड़नक नौत-हकार मात्रिकसँ आएल अछि। परसू ममियौत भाइक बेटाक मुड़न छी, कपड़ो-लत्ता आ नौत-पुराइक चीजो-वौस कीनए झंझारपुर गेल छेलौं। बजारो आ हाटोक काज छल। ऐगला हाट रबि दिन होएत, जइसँ काज नइ चलैत, तँए बुधेक हाट करए झंझारपुर गेल छेलौं। झंझारपुरसँ चीज-वौस कीनि घरपर आबि साइकिलसँ उतैर चीज-वौस उतारिते रही कि हंसराज काकाकेँ खेत दिससँ अबैत देखलयैन। रस्ते कातमे घरो अछि आ दरबज्जाक रूखि सेहो रस्ते दिस अछि।

हंसराज काकाकेँ देखते कहलयैन-

काका, तमाकू खा लिअ तखन जाएब।

ओना, पौने एगारह बाजि रहल छलजइसँ नहाइ-खाइ बेर भइये गेल छल, मुदा जखन सोझामे हंसराज काका पड़ला आ किछु नहि बजितौं से केहेन होइत। पान-सात दिनसँ भेँटो नहियेँ भेल छला।तँए तमाकुलक बहाना बना बाजल छेलौं। जहिना कहलयैन तहिना ओहो दरबज्जापर आबि बजला-

केतौ बाहर गेल छेलह, किसुन?”

बजलौं-

हँ, झंझारपुर हाट गेल छेलौं। परसुका मुड़नक नौत-हकार मात्रिकक अछि। ओहीक चीज-वौस कीनए गेल छेलौं।

तैबीच अपनो चीज-वौसकेँ अँगनामे रखि दरबज्जापर आबि तमाकुल चुनबैक ओरियान करए लगलौं।

हंसराजो काका अपन हाथक कोदारि, खुरपीआहँसुआकेँ चौकीक निच्चाँमे रखि बैसला। साइकिलसँ उतरल रही तँए पसेना चलैत रहए।ओना, समयमेघौन जकाँ छल तँए रौद मड़ियाएल रहइ, मुदा तैयो मासक धर्मे गरमी किछु छेलैहे। तमाकुल चुना काकाकेँ देलिऐन। ओहो तमाकुल मुँहमे लैत बजला-

ऐ बेरका लगन तँ देखै-जोकर अछि!”

लगनक चर्च होइते बजलौं-

ऐबेर कनाह-कोतर सभ उठि जाएत। जेकरो सबहक बिआह पौंरकाँ नइ भेल तेकरो सबहक आ जे ऐबेर बिआह करै-जोकर भेलतेकर, सबहक बिआह भऽ जाएत।

सबहक बिआह आकि कनाह-कोतर सुनि हंसराज कक्काक मन खुशी भऽ गेलैन। मुस्की दैत बजला-

ई तँ बढ़ियाँ बात भेल किने। जेतेक धिया-पुताक बिआह भऽ जाएत ओतेक माइयो-बाप अपन कर्जसँ मुक्त हेबे करत किने।

बजलौं-

से तँ मात्र वएह माए-बाप ने जेकरा या तँ अन्तिम धिया-पुताक बिआह हेतै वा जेकरा एक्केटा हेतइ, सएह ने अपन धिया-पुताक कर्जसँ मुक्त हएत, मुदा जेकरा जेरक-जेर धिया-पुता छै ओ केना मुक्त हएत?”

हंसराज काका बजला-

भलेँ सोल्हन्नी मुक्त नहियेँ हएत, मुदा ओते तँ हेबे करत किने जेते भार उतैर गेल रहतै। कर्जो-कर्जा आ चुक्तियो-मुक्तिमे अन्तर तँ अछिए। कियो सोलहन्नी चुका मुक्त होइए आ कियो अदहा-छिदहा चुका अदहा-छिदहा मुक्त होइए। तँए, जेते भार उतैर जेतै ओते जान तँ हल्लुक हेबे करतै किने।

बजलौं-

हँ, से तँ हेबे करत। मुदा तेहेन जुग-जमाना आबि गेल अछि जे केहनो-केहनो परिवार बेटीक बिआहमे हिल जाइए।

हंसराज काका बजला- तइमे केकर दोख?”

केकर दोख सुनि मन ठमैक गेल। किएक तँ एक्के आदमी बेटाक बिआहमे राजा जकाँ बनि अधिक-सँ-अधिक सम्पैत बेटीबलासँ लिअ चाहैत अछि आ वएह आदमी बेटीक बिआहमे दाँत चिआरि बजैए जे समय बड़ खराप भऽ गेल अछि। जइसँ गरिबाहाकेँ बेटीक बिआह करब पहाड़ोसँ भारी भऽ गेल अछि...।

बजलौं- दोख केकर रहत काका, दोख तँ सोलहन्नी लोकेक अछि। पहिनौं ने बिआह होइ छल, कहाँ एते भारी लोककेँ बुझि पड़ै छेलइ। परिवारमे जहिना आन-आन काज चलै छल तहिना ने क्रमिक ढंगे बेटा-बेटीक बिआहो चलै छेलइ।

तमाकुलक थूक फेकैत हंसराज काका बजला-

दोख सबहक अछि। तखन तँ सभकेँ एते गड़ भेटिये जाइए जे समैये एहेन बनि गेल अछि जे सभकेँ वाध्य भऽ करए पड़ै छइ।

बजलौं-

जेतए जे होइएसे तेतए हौ, मुदा ठनकाक अवाज सुनि लोक अपन जान बँचबैले अपने माथपर लइए, तहिना ने...।

बिच्चेमे हंसराज काका बजला-

माथपर हाथ नेनहि की हएत, जेतए ठनकाकेँ खसैक छै तेतए खसबे करत किने। माथपर हाथ लिअ तैयो आ नइ लिअ तैयो, जेतए ठनकाकेँ गड़ भेटतै तेतए खसबे करत किने।

बजलौं-

हँ!से तँ खसबे करत।मुदा...।

हंसराज काका बजला-

मुदा-तुदा किछु ने।

बातकेँ बदलैत बजलौं-

काका, ऐबेर तँ अहाँक लक्ष्मी दहिन छैथ।

लक्ष्मी दहिनक माने भेल तीमन-तरकारीकेँ महग हएब। हंसराज काकाकेँ डेढ़ बीघा खेत छैन जइमे दस कट्ठा कलम-गाछी लगौने छैथ आ एक बीघा खेतमे बारहो मासक तीनू समैयक[iv] तरकारीक खेती करै छैथ जइसँ परिवारक निमरजना करैत, हाथो-मुट्ठी गरमा कऽ रखिते छैथ। तैसंग ईहो छैन जे तीन बीघा तीन-फसिला खेत छैन, जइमे फसल-चक्रक मिलानसँ खेती करै छैथ, जइसँ अन्नक पूर्ति भइये जाइ छैन। खरीफक मौसममे तीनो बीघामे धानक खेती करै छैथ आ रब्बीक मौसममे दू बीघामे गहुम आ एक बीघामे दलिहन-तेलहनक खेती करै छैथ।ओना, अगता गहुमक खेती केने खेरही आ सुर्जमुखीक खेती सेहो कइये लइ छैथ जइसँ तेते उपज भऽ जाइ छैन जे बेचबो-बिकिनबो करिते छैथ...।

अपना जनैत हंसराज काकाकेँ बड़प्पनक बात कहलयैन मुदा मनमे जेना खेतीसँ किछु तकलीफ रहल होनि तहिना मुँह बिजैक गेलैन। बिजकैत मुहेँ बजला-

किसुन, जे इच्छा रोपि अखन तक किसानी जिनगी बितेलौं से अखन तक पूर्ति नइ भेल, आ बुझि पड़ैए जे ऐ जिनगीमे हेबो ने करत।

जिनगीक इच्छा आ ओकर पूर्ति नइ भेलासँ हंसराज काकाकेँ खेतीक विषपनसँ मन विसाइन-विसाइन भइये गेल रहैन, तँए एहेन विचार व्यक्त केने रहैथ। मुदा दरबज्जापर छैथ आ अपनो जँ ओहने बात बाजि आरो विसविसी जगा दिऐन से केहेन होइत। तँए पाशाकेँ आस दैत बजलौं-

काका, दुनियाँ किछु हौ आ देशे किछु हुअ मुदा अहाँ तँ अपन जिनगीक बाजी मारिये नेने छिऐन!”

अस्सी बर्खसँ ऊपर हंसराज कक्काक उमेर छैन मुदा साठि बर्ख पूर्व जे अपन पैत्रिक सम्पैतकेँ[iv] आधार बना खेती-बाड़ीकेँ धेलैन से अखनो धेनहि छैथ। जइसँ परिवारक गुजर-बसरमे कहियो रीन-पैंच नइ करए पड़लैन, आ ने ओइ भाँजेमे पड़ला। जइ साल देश स्वतंत्र भेल तही साल हंसराज काका मैट्रिक पास करि कौलेजमे ढुकला जे देशक आजादीक चारि सालक पछाइत बी.ए. पास केलैन। हाइ स्कूलसँ पहिनहि जे देशक आजादीक लेल तिरंगा झण्डा उठौलैन से आजाद भेला पछातिये रखलैन। ओना, पनरह अगस्तकेँ साले-साल अखनो झण्डा उठा देशवासीकेँ जगैबते छैथ, मुदा से केतेक जागल आ केतेक सुतल, से हंसराज काका जनिते छैथ।मुदा तैयो अपन स्वतंत्र विचारो आ स्वतंत्र जीवनक लेल स्वतंत्र पेशोक प्रति समाजकेँ जगाइये रहला अछि...। तैबीच हंसराज कक्काक घड़ीपर नजैर चलि गेल। एगारह बाजि रहल छल, अपनो ठंढाइये गेल छेलौं जइसँ नहाइक विचार मनमे उठिये रहल छल मुदा केना बजितौं जे काका अहूँकेँ नहाइक बेर उनहल जाइए आ हमरो बेर उनहल जाइए तँए अखन जाउ।

हंसराज काका बजला-

किसुन, आइ पचास बर्खसँ कोसी नहैर लटकल अछि। अरबो रूपैआ सरकारी खजानसँ खर्च भऽ चुकल अछि, मुदा की लाभ नहैरसँ भेल अछि से कोनो केकरोसँ छिपल अछि। देखौआ सरकारो किसान लेल लोहाक बोरिंग नब्बे प्रतिशत सब्सिडी दऽ कऽ गड़ौलक, मुदा तइसँ किसानकेँ केते लाभ भेल से के नइ जनैए।

अपनो ई काज देखलो अछिए आ देखतो छीहेजे एकोटा बोरिंग काज नइ कऽ रहल अछि। सबहक पाइप झझरी भऽ कऽ फुटि गेल, आ सभटा निकम्मा भेल अछि।

बजलौं-

हँ, से भइये गेल अछि। मुदा लोको तँ लोके छी किने काका, जेकरा सुविधा भेटै छै सेहो आ जेकरा नइ भेटै सेहो, दुनू तँ एकरंगाहे अछि। भलेँ तैबीच कमीशनखोर आकि घूसखोर किएक ने उठि-बैसल हुअए। मुदा दिन-राति दुनू नइ कानैए सेहो बात नहियेँ अछि, कनिते अछि। मुदा बेवश लोक, बेवश किसान करबे की करत।

हंसराज काका बजला-

तइसँ की अपना सभ अलग छी। आकि ओकरे सभ जकाँ नइ कानै छी।

बजलौं- से तँ छीहे, मुदा...।

हंसराज काका बजला-

मुदा-तुदा किछु ने। हँसब आ कानब लोककेँ अपना हाथमे अछि। जे कानबक विचारसँ ग्रसित भऽ कनैक किरदानी करत ओ कनबे करत किने, मुदा जे हँसैक हंसक विचारकेँ अगुआ कर्म करत ओ हँसत नइ ते कानत। भलेँ नाटकक रंग-मंचपर किछु लोक कननी पात्र बनि अभिनाइये करए, मुदा ओहो ने देखौआ कननी कनिते अछि।

बजा गेल-

हँ, से तँ अछिए। मुदा अहूँ...।

अहूँसुनिते हंसराज काका बुझि गेला जे हमरो दुखकेँ किसुन ओहिना बुझि रहल अछि जेना अनकर दुखकेँ बुझैए। हँसबो-हँसब आ कानबो-कानबमे अन्तर तँ अछिए, जे ओइ अन्तरकेँ नइ जनैए ओ दोसर रूपे कानबकेँ बुझैए आ जे ओइ अन्तरक मंत्रकेँ, माने अन्तरंग मंत्रणाकेँ जनैए ओकर कानबक सीमा दोसर होइत अछि। हंसराज काका बजला-

किसुन, नहाइ बेर भऽ गेल, तँए नीक जकाँ सभ बात अखन नइ करब, किएक तँ जहिना कोनो रेलगाड़ीकेँ कोनो कारणे दू-चारि मिनट विलम भेने एके स्टेशन नहि, सभ स्टेशनमे विलम होइते चलि जाइ छै, जइसँ ओकर पहुँचैक जे गनतव्य स्थान रहल, ओइठाम समयपर नहियेँ पहुँचैए, तहिना ने मनुखोक अछि।

अपना विचारे हंसराज काका बिना कौमा-पूर्ण विराम देने धुरझाड़ बाजि गेला मुदा अपने बुझबे ने केलौं, जइसँ मन झुझुआए लगल। मने-मन मनकेँ मजगूत केलौं जे जे राम से राम, सभ बात हंसराज काकासँ बजाइये कऽ छोड़बैन।

जहिना भौजेत नौतहारीकेँ खाइले नौत दइ छैथ आ पुछि-पुछि खुअबै छैथ तहिना अपन विचार हंसराज काका हमर बदरियाएल मेघकेँ बरदपनक लेल नौत दइए देलैन, तखन हमहीं की ओहन बुड़िवान छी जे ओकरा सुर-वाण छोड़ि दुर्बान बनाएब। फेर मनमे उठल जे नहाइक बेरमे जे विलम हेतैन से अपना वर्णिक करनीसँ हेतैन आकि हमरा लरनीक चलैत हेतैन। अपनो कल परहक नहाएबमे देरी हएत, मुदा गंग-स्नान तँ हेबे करत किने। से नहि तँ जहिना भगता अपना गहवरमे कारनीक भूतकेँ बकबैए तहिना अपनो किए ने करी। 

बजलौं-

काका, हमरा मात्र एकटा फूलक काज छल आ अपने फूलक ढकिये आगूमे रखि देलौं, तइमे से एकटा फूल चुनि कऽ निकालब हमरे नानाक[iv] दिन छी, तँए अपने...।

हमर विचार सुनि हंसराज कक्काक मनमे हँसी उठि गेलैन मुदा हँसबक जे दोसर रूप अछि, माने केकरो अल्ढ़रपनपर हँसब, बुड़िपना छोड़ि आरो की हएत। तँए अपन देखौआ हँसीकेँ चिन्हौआ हँसीमे बदैल हंसराज काका बजला-

बौआकिसनु, तूँ बाजल छेलह जे अहॉंकेँ लक्ष्मी आबि गेली, से तूँ कोनो बाल-बोधक लड़कपन जकाँ नहि, बेटपन जकाँ बजलह।तँए, पहिने ओ बुझि लएह।

जहिना ढलानपर ऊपरसँ निच्चाँ उतरैमे पएर अपने आगू बढ़ए लगैए तहिना हंसराज कक्काक विचार सुनिते अपनो पएर बढ़ए लगल। बजा गेल-

से की काका?”

हंसराज काका बजला-

देखह किसुन, तोहर जे काकी छथुन से हमर दिन-रातिक मालिक[iv] छैथ, जखने विलमसँ दरबज्जापर पएर देब, तखने ओ जवाब-तलब करए लगती!तँए, धड़फड़मे कनी-मनी कहि दइ छिअ बाँकी दोसर दिन कहबह।

अपना मनमे बेसी-सँ-बेसी जिज्ञासा जागि चुकल छल तँए हंसराज काकाकेँ पिंजरामे फँसबैत बजलौं-

की बाल-बोध जकाँ बजलौं काका?”

हंसराज काका बजला-

लक्ष्यक रस्ता पकैड़ चलबलक्ष्मीक आगमन भेल, आ लक्ष्यक सीमापर पहुँच जाएब लक्ष्मी पएब भेल, तइमे...।

अपन मनक मनियाँ जेना सोल्हो आँखि खोलि बुझैले तैयार भऽ गेल छल, एकाएक बजा गेल-

से की भेल काका?”

काका बजला-

बौआ किसुन, की कहबह! अपन मन हारब नइ कबूल रहल अछि मुदा दाबल जरूर बुझि पड़ि रहल अछि।

जेतेक जल्दी बुझैक विचार जगल छल तेतेक बुझ पड़ाएल जाइ छल तइसँ मन खिनखिना लगल, तँए बिच्चेमे बजाइयो गेल छल। मुदा से हंसराज काका बुझि गेला। अपनोकेँ सम्हारैत आ हमरो सम्हारैत बजला-

बौआ, जहिना देशक रीढ़ किसान छी तहिना ओइ रीढ़मे तेहेन घुन लगि गेल अछि जे ने जीबए दए रहल अछि आ ने मरए दए रहल अछि! घड़ीक पेनडुलम जकाँ बीचमे लटका झूलबैए।

हंसराज कक्काक गप सुनि मनमे हुअ लगल जे कृष्ण जकाँ वृन्दावन आ राम जकाँ रामवनमे ने ते हंसराज काका बोहिया-भुतला रहला अछिजे एना ताशक गुलाम जकाँ तीन प्वाइन्ट बना बादशाहकेँ जीरो बना रहल छैथ! बजलौं-

काका, नहाइ बेर भऽ गेल अछि, से नहि तँ अहीठाम नहा कऽ पहिने भोजन कऽ लिअ, पछाइत गप-सप्प हेतइ।

हंसराज काका बजला-

मुड़कट्टीमे कहि दइ छिअ, बीचमे टोक-टाक नइ करिहह। जँ कोनो बात बुझैमे नइ आबह तँ ओकरा मनेमे गाड़ि कऽ रखिहह, दोसर दिन फरिछा देबह।

समर्थन करैत बजलौं- बेस विचार केलौं काका..!”

हंसराज काका बजला-

किसानी जिनगीमे ई पचासियम बर्ख बीत रहल अछि। मुदा अखनो तक ने अपना हाथ-जुतिमे पानि आएल आ ने बीज आएल आ ने खेतीक करैक कला, जइसँ अपन मन खिन्न भऽ कानि रहल अछि, नहि कि पेट जरने कनै छी। खेत हमर आ बीज आन देशक, ई केतए तक उचित अछि! मनमे प्रवल इच्छा छल जे सभ-कथुक बीज अपने बनाएब, मुदा से आइ तक नइ भेल। तँए मन झुझुआ कऽ कानि रहल अछि।

हंसराज कक्काक असल बात सुनि एकाएक जेना भक्क खुजि गेल।

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शब्द संख्या : 2301, तिथि : 30 अप्रैल 2018

 

 

[1]साए बर्खक आधारपर

[1]नजदीक

[1]पचास बर्खक पछातिक

[1]गुरुआइ वा गुरुत्व

 

 

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