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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२१.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

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आशीष अनचिन्हार

"पाठक हमर पोथी किए पढ़थि"

 

एहि शीर्षककेँ एनाहुतो लीखि सकैत छी जे "पाठक हमर पोथी किए किनताह"। एहि तरहक विषयपर विवाद होइत रहत मुदा हमरा लाभ बुझाइए जे हम पाठक लग अपन self-appraisal प्रस्तुत कऽ रहल छी। बहुत लोक एकरा नैतिक रूपे खराप मानताह तँइ मैथिलीमे एहन विषयपर नै लीखल गेल (मौखिक तँ सभ लेखक करिते छथि) मुदा हम नहि मानैत छी। कहबाक लेल तँ ई  self-appraisal प्राइभेट नौकरी लेल छै जाहिमे कर्मचारी अपन गुणक विवरण दैत छै आ ओकर बॅास ओकरा देखि कऽ मिलान करै छै जे लिखल चीज वास्तवमे सही छै कि नै आ तकर बाद ओहि कर्मचारीक वेतन वृद्धि वा प्रमोशन होइत छै। हमरा लगैए जे ई साहित्यो लेल नीक काज करत। एहि विषय अंतर्गत लेखक अपन पोथीक ओहन किछु विशेषता अवश्य लीखथि जकरा बादमे समीक्षक-आलोचक देखि कऽ तय कऽ सकथि जे देल गेल विशेषता केर निर्वाह पोथीमे भेल छैक वा कि नै। आ एहि क्रममे हम अपन पोथी "अनचिन्हार आखर" जे कि 2011 मे श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ प्रकाशित भेल छल पाठक लग तकरा दऽ रहल छी। श्रुति प्रकाशन केर परिचय लेल ओकर विकीपीडियापर जा सकैत छी जकर लिंक https://mai.wikipedia.org/s/iu7 अछि।

जहिया इंटरनेटपर ब्लागपर धूम रहै तहिया लेखक सभ अपन पोथीक नामपर ब्लाग बनेलाह मुदा "अनचिन्हार आखर" नामक ब्लाग 2008 मे बनल आ 2011 मे अही नामसँ हमर पहिल पोथी प्रकाशित भेल। पोथीक नाम ब्लागक नामपर हो से आइडिया गजेन्द्र ठाकुरजीक छलनि आ प्रकाशनक श्रेय हुनके। वर्तामनमे एहि पोथीक प्रिंट रूप उमेश मंडल, निर्मलीसँ प्राप्त भऽ सकैए। आब आबी किछु एहन बातपर जाहिसँ ई पाठककेँ ई सहूलियत हेतनि जे उपरमे लिखल पोथी किए पढ़बाक चाही वा कि किए किनबाक चाही---

1) कोनो विषय वा विधापर पहिल बेर लिखबासँ पहिने कतेक तैयारी हेबाक चाही तकरा जनबाक लेल पाठक एवं लेखककेँ अनिवार्य रूपसँ पढ़बाक चाही ई पोथी।

2) रचनामे प्रचलित शब्द हेबाक चाही वा कि पुरान एवं अप्रचलित से बहस मैथिलीमे अनवरत चलि रहल अछि आ ताही संदर्भमे पाठक एवं लेखक-आलोचक सभकेँ आमंत्रित करैत छियनि ई पोथी पढ़बाक लेल। हमर एहि पोथीमे नव आ पुरान दूनू तरहक शब्दक जाहि तरहे प्रयोग कएल गेल अछि से ताहिसँ दूनू पक्षक लोक संतुष्ट हेताह से हमरा विश्वास अछि।

3) ई पोथी वैदिक छन्द जनबाक लेल सहायक अछि। लोक वेदक नाम तँ जपैत छथि मुदा वैदिक छन्दक गिनती कोना होइत छै से नै जानि पाबै छथि। पाठक ई पोथी एहि लेल ई पोथी अवश्य पढ़थि।

4) साहित्यमे खास कऽ गजलमे प्रेमपरक विषय अनिवार्य रूपसँ अबैत छै मुदा अधिकांशतः प्रेमपरक रचना एक सीमाक बाद बाधक भऽ जाइत छै। मुदा प्रस्तुत पोथीमे प्रेमक प्रयोग एना भेल छै जे बाप-बेटी वा कि भाए-बहीनि एकै संगे एहि पोथीक रचना सभकेँ पढ़ि सकैत छथि।

5) जे पाठक मैथिली गजलक विकासक्रम बूझए चाहै छथि तिनका ई पोथी अवश्य पढ़बाक चाही। ई पोथी अही विधा केर अछि।

 

एहि पाँच टाक अतिरिक्त आरो बात सभ अछि जाहि लेल पाठककेँ ई पोथी पढ़बाक चाही मुदा एहि ठाम ओ बात सभहक खोज करबाक लेल हम पाठक एवं आलोचक दूनूकेँ आग्रह करबनि।

 

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।