logo   

वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

Home ]

 

India Flag Nepal Flag

(c)२००४-२०२१.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

रबीन्द्र नारायण मिश्र

लजकोटर (धारावाहिक उपन्यास)

१९म खेप

एहि तरहेँ हमर काज चलए लागल । हमरा आटो,कार ठीक करबाक कोनो लूरि नहि छल । तेँ शुरुमे हल्लुके काज सभ करी । बहादुर आ बटुक अपन-अपन काजमे माहिरछल । बहादुर टेम्पु आ बटुक कार मरम्मतिक काज करैत छल । हम छोट-मोट काज जेना पेंचर साटब,चक्कामे हवा भरब करए लगलहुँ । संगहि नव-नव काज सभ सिखबाक प्रयास करए लगलहुँ । बटुककेँ बेसी ज्ञान रहैक मुदा ओकरा समये नहि रहैक । भोर सँ साँझ धरि भूत जकाँ खटैत रहैत छल । बहादुर ओतेक लुरिगर नहि छल । ओकरा लग काजो कम रहैत छलैक । खाली समयमे ओ यथासाध्य हमरा अपन काजसभ सिखबैत रहैत छल । कखनो काल बटुको किछु-किछु मदति कए दैत छल । हमहु दिन-राति एक केने रही । जतेक संभव रहैक,काज करी । एहिबातसँ मालिक बहुत खुश रहथि । एकदिन असगरमे बजाकए कहैत छथि -
" हमरा लगैत अछि अहाँ सभकेँ पछाड़ि देबैक।"
" से की?"
"अहाँक हाथ बहुत माजल अछि ।"
मालिक द्वारा एहि तरहेँ उत्साहित केलासँ हम आओर जोर-सोरसँ काज करए लगलहुँ । मास दिनक भीतरे हमर जनसँ मिस्त्रीक काज करए लगलहुँ आ दरमाहा ,सुनबै तँ गुम्म पड़ि जाएब । पहिलुका महिनामे चारि हजार दरमाहा भेटल छल । एकहि मासक बाद जखन लिफाफा खोललहुँ तँ ओहिमे सँ निकलैत अछि कतेक? अनुमान करू? चलू हमही कहि दैत छी-"सोझे बीस हजार" । नोट गनैत-गनैत पसीना आबि रहल छल । लिफाफा देबए काल मदन बाबू बजाकए कानमे कहने रहथि-" ककरो कहबै नहि । अहाँक दरमाहा अहींकेँ बूझल हेबाक चाही।"
"ठीक छैक । हम खुशीसँ मदनबाबूकेँ गोर लगलहुँ आ डेरा बिदा भए गेलहुँ ।संयोगसँ ओहिदिन हम असगरे रही । बटुक आ बहादुर दारू कीनबाक हेतु पहिने निकलि गेल रहए ।
सभ सँ पहिने हम पुरना मकान मालिकक ओहिठाम गेलहुँ । ओतए कुसुम गेटेपर ठाढ़ि भेटि गेलीह । हुनकर बाँकी किराया चुकता करबाक हेतु लिफाफा हाथमे देलिअनि ।
" ई की अछि?"
"अहाँक बकिऔता किराया ।"
"हद भए गेल । एकर अखन कोन ताहिरी छैक?बादमे देखल जेतैक । अहाँ पहिने अपन व्यवस्थातँ ठीक कए लिअ ।"
कतबो कहलिऐक ओ लिफाफा नहि लेलथि । हमरा घिचने अपन कोठरीमे लेने गेलीह। देखिते-देखिते ओ हमरा भरि पाँज गछारि लेलथि। डरसँ हमर छाती धर-धर कए रहल छल। होअए कहीं डाक्टर ने आबि जाथि । अनेरेकेँ हंगामा भए जाएत ।हमर चिंताकेँ पढ़ैत ओ कहलीह –“ओ बाहर गेल छथि । काल्हि साँझधरि वापस अएताह ।”
कुसुम कोनो हालतमे हमरा जाए नहि देथि आ हम कोनो हालतमे ओतए रहए नहि चाही।
"जौँ डाक्टर आबि गेलाह तखन की होएत? "-एही चिंतामे हमर ओ समय कटि रहल छल ।ओमहर बटुक आओर बहादुर भरिपेट दारू पीबि डेरामे हंगामा केने छल । बहादुरक घरबाली तँ अभ्यस्त छलैक मुदा बटुकक घरनी केँ ई एकदम बरदास्त नहि रहैक । ओ हमरा फोन करैत छथि –
" कतए रहि गेलिऐक? ई सभ तँ हंगामा कए देने अछि ? जलदी आउ ।"
फोनक स्पीकर आन रहैक । कुसुम पुछैत छथि-"की भेलैक?"
हमर नवका पड़ोसीसभ पिविकए हंगामा केने छैक ।"
"तखन तँ अहाँ नहिए जाउ।"
हमरा हँसी लागि गेल ।
कुसुमक बिआहक कैक साल भए गेल रहैक मुदा धीआ-पूता नहि रहैक । डाक्टरकेँ पीबासँ फुर्सतिए नहि रहैक जे घर दिस सोचैत । मुदा सक्की छलैक एक नंबरक । केओ जँ कुसुमसँ गप्प करैत देखाजइतैक तँ आफत कए दैत छल । तकरबाद दुनूगोटेमे झंझट शुरु होइत । कुसुमकेँ कैकबेर दूपहर रातिमे बफारितोरैत सुनिऐक । पीबि कए कैकबेर ओ हाथो उठा दैत छलैक ।मुदा असलीबात की रहैकसे के आकिएक पुछितैक ? कहाँदनिडाक्टरेमे गड़बड़ीछलैक । कैकबेर जाँच-पड़ताल भेलैक । मुदा ढ़ाकक तीन पात । आइ जखन कुसुम हमरा साफे कहि देलथि तँ हमरा नहि रहल गेल ।
"तँ एकरा छोड़ि किएक नहि दैत छी?"
"एतेक आसान छैक । एखन अहाँकेँ बहुत किछु बुझबाक अछि । ई महानगर छैक ।"
"लएह इहोसएह कहि रहल छथि ।आब तँ मोन होबए लागल जे एहि महानगरी नामक बिमारीकेँ ठीके कए दी । मुदा कथी-कथी आ ककर-ककरा ठीक करैत फिरब।
ओहिठामसँ निकलैत -निकलैत बहुत राति भए गेल । सड़कपर कुकुरसभ भुकि रहल छल । कतहु केओ नहि देखा रहल छल । आब तँ बड़ी चिंतामे पड़ि गेलहुँ । ताबते एकटा एकदम खाली बस आएल । हाथ देखेलिऐक तँ ठाढ़ कए देलकैक । बसमे चढ़िकए जान-मे-जान आएल ।
बस संचालक पीने बुत छल । कहिऐ आम बुझैक इमली। आब की होएत? जेबीमे टाका रहए । डर होबए लागल जे कहीं किछु भए ने जाए । मोने-मोन हनुमान चलीसा पढ़ए लगलहुँ। संयोग नीक रहल जे अपन बस स्टाप आबि गेल । बससँ उतरि कए लागल जेना फेरसँ जीबि गेलहुँ ।
डेरा पहुँचलहुँ तँ देखैत छी जे ओकर बाहरी गेट बाहरेसँ बंद अछि । आब तँ बेस मोसकिलमे पड़लहुँ । एतेक रातिमे कतए जैतहुँ । कतहु केओ नहि देखाइत छल । ओकरासभकेँ बूझल रहैक जे हम बाहर गेल छी तथापि ताला बंद कए ई सभ कतए चल गेल? ताबते मे चौकीदार सीटी मारैत आएल ।
" बटुकआ बहादुर केँ देखलहक अछि की?"
"ओ सभ तँ कनिके काल पहिने अस्पताल गेलाह अछि।"
"ककरा की भेलैक?"
"बहादुर आ बटुकमे कोनो बात लए कए झंझट भए गेलैक । बहादुरक घरबाली थोर-थाम्ह लगबए गेलैक कि ओकर पैर पिछड़ि गेलैक । ओकरा पाछु बहादुर सेहो खसल। दुनूगोटेक टांगटुटि गेलैक अछि । बटुक ओकरासभकेँ लए कए अस्पताल गेल अछि ।"
"बटुकक घरबाली सेहो गेलैक अछि कि घरे मे छैक?"
"से नहि कहि सकैत छी । मुदा ताला तँ बाहरसँ बंद अछि।"
कहुना कए चौकीदारकेँ मनेलहुँ आ ओकरे संगे साइकलसँ अस्पताल पहुँचलहुँ । ओहि समय रातुक एक बाजि रहल छल । अस्पतालक गेटेपर बटुक भेटल । ओकर मुँहसँ दुर्गंध आबि रहल छल । बात लटपटाइत छल । कहि नहि एहन हालत मे एहिठाम धरि कोन आबि सकल?
हमरा देखिते कहए लागल-"हमर किछु दोख नहि । बहादुरेसभटा गड़बड़ केलक अछि। हमरा ओकरा आगुमे ठाढ़ होएब मोसकिल लागि रहल छल । कहुना कए आगु बढ़लहुँमुदा ओ पछोड़ धेने रहल । ताबे पुलिस आबि गेल छल । डाक्टरसभ मामला पुलिसमे रेपोर्ट कए देने रहैक ।पुलिस ओकरा पकड़ि लेलक आ थाना लेने चलि गेल ।अस्पतालमे बहादुर आ ओकर घरबाली भर्ती छल मुदा ओकरसभक हालतक सही जानकारी नहि भेटि रहल छल ।अस्पतालक स्वागत कक्षमे गेलापर पता लागल जे एकटा नेपाली महिलाक किछुए कालपूर्व मृत्यु भए गेलैक अछि। ओकर घरबलाक नाम बहादुर छैक आ ओकरो हालत बहुत खराप छैक । हमरा तँ जेना लकबा मारि देलक । मोने-मोन सोचलहुँ जे हमर भागे खराप अछि । जतहि जाइत छी ओतहि किछु-ने-किछु उकबा उठि जाइत अछि ।
ओतेक रातिमे जेबे कतए करितहुँ। फेर जखन अस्पताल आएल रही तँ बिना भेंटकेने वापस चलि जाइ सेहो उचित नहि बुझाएल,ओहो जखन कि ओकरासंगे केओनहि रहैक। आपत्तिकालीन वार्डमे आगा बढ़लहुँ तँदेखैत छी जे बहादुरकेँ आक्सीजन लागल अछि । डाक्टरसँ हालचाल पुछलिऐक तँ कहलक-"अजुका राति जँ खेपि गेलाह तँ बुझु बचि गेलाह। अखन किछु नहि कहल जा सकैत अछि ।"
रातिभरि जगले रहि गेलहुँ । बहादुरक हालत बेहतर रहैक। मुदा ओकरा अखन अस्पतालमे किछु दिन आओर रहए पड़ि सकैत अछि । डाक्टरसभक अनुसार ओकरजांघक हड्डी टुटि गेल अछि ।तकर शल्य चिकित्सा करबाक हेतैक । ओकरा ठीक होबएमे मासोदिन लागि सकैत अछि । आब समस्या छलजे ओकर घरनीक लहास के लए जाएत ? ओकर अंतिम संस्कार केना होएत ? अखनधरि बहादुरकेँ ई बात नहि बताओल गेल रहैक । जखन ओकरासे पता लगतैक तँ ओकर की हाल रहत? ई सभ बहुत रास समस्या छल।
बटुकआबहादुरमेजबरदस्ततालमेलछलैक, घरोमे आबाहरो।तइओएनाकिएकभेलैक? असलमे ओकर सभक कोठरी नामेक लेल फराकछल।ओहिठामआठ-दसटा कोठरी सभ एक-दोसरसँ सटल छल । सभमे तरह-तरहक किराएदारसँ भरल छल । एकहिटा लैट्रीन,एकहिटा स्नानगृह । कोनो निजताक गुंजाइस नहि छलैक । पेट भरबाक जोगारमे अस्तव्यस्तलोकसभ आओर किछु देखबाक-सुनबाक स्थितिमे नहि छल ।असलमे बटुककेँ नजरि बहादुरक घरबाली पर रहैत छलैक जाहि कारणसँ ओ बहुत बातसभपर कान पथने रहैत छल । बहादुर ई बात बुझैक । बटुक सेहो पाछा नहि छल । बहादुरक घरबालीसँ ओकरा बेस जमैत छलैक । मुदा ओहिदिन पीबिकए ओकर मोनक कुंठा जाग्रत भए गेल रहैक ।
हम अस्पतालक हातामे इएहसभ सोचैत घुमैतरही कि विजय देखेलेथि। ओ एही मामलाक तहकीकात करएआएल रहथि ।
"की औ! एतेक रातिमे एतए कोना छी? सभ किछु ठीक अछि ने ?"
"ठीक की रहत?"
"की भेल?"
ओकरा कहनाइ शुरुए केने रही कि बहादुरक नाम अबिते ओएह बात लोकि लेलथि।
"अहाँ एहि चक्करमे कोना पड़ि गेलहुँ ।"
"हमर पड़ोसीसभ छथि। आइ-काल्हि हम ओतहि रहैत छी ।"
"चुपचाप खसकिजाउ, नहि तँ थाना-पुलिस करैत-करैत एँड़ी खिआजाएत । ई महानगर छैक । एहिठाम अपन काजसँ मतलब राखू ।"
फेर ओएह बात । महानगरी छैक तकर माने की? की एतए मनुक्ख नहि ,दानव रहैत अछि? ई एहिठामक समाज एतेक विचारहीन होइत अछि जे खसलव्यक्तिकेँ मरैत छोड़ि आगा बढ़ि जाइछ।"
"एहिना कबाइत पढ़ैत रहि जाएब । अहाँनहि सुधरब ।जानी अहाँ आअहाँक काज। हम तँ कहबे ने करब । अहाँक भाग्य तँ नहि बदलि देब ।"- विजय बाजल ।
" हमरा किझु नहि बुझा रहल अछि ।"
"जखन अपन माथा नहि काज करए तँ कम सँ कम दोसरोक सुनल करी ।"
" की करू से अहीं कहू । "
विजय इसारा केलक जे हम ओकर जीपक पछिलका सीटपर बैसि जाइ । हम सएह करैत छी । विजय रस्ते-रस्ते कहैत गेल-" मुफ्तमे हत्याक केसमे फँसा देल जाएब । जिनगी भरि काहि कटैत रहि जाएब । अपन लोक छी तैँ कहि रहल छी,नहि तँ हमरा की ? आगा अहाँक मर्जी ।"
कनी कालमे जीप विजयक आङनमे ठाढ़ छल । जीप देखितहि किशुन आ मालती संगे विजयक घरसँ बाहर भेल । ओकरासभकेँ संगे देखि हम छगुन्तामे पड़ि गेलहुँ । विजय ई बात तारि गेल ।
" किशुन आ हमर सासुर एकहि गाममे अछि।ताहि हिसाबे ओहमर साढ़ूए छथि।"
"सएह कहू ,ई बात हमरा पहिने किएक नहि कहलहुँ?"
“बुझिए कए की करितहुँ?ई महानगर छैक । एहिठाम बहुत किछु सोचि कए चलए पड़ैत छैक ।अहाँकेँ हमर बात कठाइन लगैत होएत मुदा समय अएलापर अपने सभबात बुझा जाएत । कतेक मोसकिलसँ सीआइडीक खातासँ अहाँक नाम हटओने रही । आब फेर जौँ फसलहुँ तँके बचाओत?"- विजयबाजल ।
महानगर नहि भए गेल ,एकटा तमासा भए गेल । जकरे देखु सएहपाकल पड़ोर बनल घुमि रहल अछि।विजयक बात सुनि हम तुरंते झोड़ा उठा बिदा भए गेलहुँ । विजय, मालती आओर किशुनक बीचमे बेस तालमेल बुझाएल।कहि नहि से कोना भेलैक? टाकामे बहुत ताकति होइत अछि।संभवतः एहि सभक रहस्य ओएह छल।

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।