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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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जगदीश प्रसाद मण्डल- पंगु आ आमक गाछी (उपन्यास) धारावाहिक आ दूटा लघुकथा

जगदीश प्रसाद मण्डलक

पंगु

उपन्याससँ...

7.

देश स्वतंत्र भेला पछाइत, जमीनक लड़ाइ सौंसे देशमे पसैर गेल। 1947 इस्वीसँ पूर्व जहिना एकमुरही लड़ाइ अंगरेजी शासनक खिलाफ उठल छल तहिना स्वतंत्र भेला पछाइतदेशमे जमीनक लड़ाइ पसैर गेल। लड़ाइ केना ने पसरैत, आखिर कृषि प्रधान देशो तँ छीहे किने। बिनोवा भावेक नेतृत्वमे भूदानी आन्दोलन शुरू भेल। आन्दोलनक नारा छल- जमीनबला अपन कुल जमीनक छठम हिस्सा स्वेच्छासँ दान करैथ। ओ जमीन खेतीपर जीवन बसर करैबला भूमिहीनक बीच देल जाए।

ओना, जमीनक लड़ाइ दू रूपमे चलल।पहिल, जमीनबलासँ बकास्त जमीन खेती करैबला बँटेदारकेँ देल जाए, आ दोसर भूदानमे प्राप्त जमीनक बँटबारा सेहो हुअए। भूदानकेँ यज्ञ रूपमे स्थापित कएल गेल।

खेत ओहन सम्पैत छी, जइमे एक धुर-आध-धुर लेल खून-खराबी, मारि-पीट गामे-गाम होइते आबि रहल छल। हजारो मुकदमा जहिना कोर्टमे फँसल छल तहिना हजारो भूमिहीन सेहो कानूनी शिकंजामे फँसि जहल जाइत-अबैत रहला।

ओना, गाम-गामक संग जिला आ राज्य स्तरपर सेहो भूदान कमिटी बनलछल, तैसंग सरकारी कार्यालय सेहो बनल, मुदा जइ ढंगसँ भूदानी नारा छल तेकर ठीक विपरीत ओकर कार्यान्वयन हुअ लगल। लेन-देनक अड्डा सरकारियो कार्यालय आ भूदानियो कमिटी बनि गेल। जेकर परिणाम हुअ लगल जे एक-एक जमीनक सबूत[i] तीन-तीन, चारि-चारि आदमीकेँ भेटए लगल। एक दिस जमीन देनिहार दाता अपन जमीन छोड़ए नहि चाहै छल, तँ दोसर दिस प्राप्तकर्ताक बीच सबूत लऽ कऽ तेहेन ओझरी लागि गेलजे गामे-गाम लड़ाइ फँसि गेल।

भूदान कमिटीक जे सदस्य लोकैन छला ओहो आगिमे घी दइक काज करबे केलैन। ओना, गामे-गाम किछु एहेन दाता सेहो छेलाहे जे अपन देल जमीन, अपना विचारसँ भूमिहीनकेँ सुपुर्दो केलैन आ अपने हाथे दखल-कब्जा सेहो करबा देलखिन। मुदा एहेन लोक एक्की-दुक्की भेला। गाम-समाजक जेहेन समस्या जमीनक छल ओइ अनुपातमे पॉंच-दस प्रतिशत एहेन भेल।

छठम हिस्सा, जमीनदान करैमे सेहो एकरूपता नहि रहल। हथ-उठाइ भीख जकाँ छठम हिस्साक जगह मात्र किछु जमीनक नाम-पत्रटा दऽ देलखिन। सेहो ओहन जमीन देलखिन जे उपजाउ भूमि नहि छल। चौर-चाँचर, परती-पराँत जमीन छल। ओना, गाम-गाममे गरीबकेँ मात्र जमीन उपजबैयेक समस्या नहि, बसो-बासक समस्या सेहो छल। गामक चौथाइ आवादी ओहन छल, जेकरा घर बन्हैक अपन घरारियो ने छेलइ।

गामे-गाम तँ नहि, मुदा किछु गाम मिला-मिला खादी भण्डार सेहो बनल। गाम-गामक समाजक किछु जाति विशेष ओहन छल जे खादी कपड़ा बुनै छल। खादी भण्डार ओकरा कच्चा माल[ii] दइ छेलै आ ओकरासँ बुनल कपड़ा कीनै छल। ओना, कपड़ा बुनैक लूरि मात्र किछु जाति-विशेषकेँ छल, एकर[iii] समाजीकरण नइ भेल छल, जइसँ किछु जाति-विशेषक बीच उद्योग सीमित भऽ गेल। कपड़ा बनबैक जे कच्चा माल छेलै ओ जातिक बन्धन तोड़ि अधिकांश जातिक बेवसाय जरूर बनल छल, मुदा वएह बेवसाय आगू बढ़िते कपड़ा बुनब समाजिक बन्धनमे फँसि गेल छल। तहूमे खास कऽ मुस्लिम जातिक बीच जोलहा आ धुनियाक बेवसाय बुझए जाए लगल। हिन्दू-मुसलमानक बीच समाज बनले अछि। हिन्दू ऐ बेवसायकेँ नहि अपनौलक। मुसलमानोक बीच सैयो जाति अछि। ओइ सैयो जातिमे मात्र दू जाति- जोलहा-धुनियाक रोजगार मात्र बनि कऽ रहि गेल। जोलहा-धुनिया सभ गाममे अछिसेहो बात नहियेँ अछि। किछु-किछु खास गाममे अछि। तहूमे परिवारक संख्याक हिसाबसँ सेहो ठेकान नहियेँ अछि। जइसँ सभ गामक जोलहा-धुनियाक बेवसायो नहियेँ बनल। जइ-जइ गामक जोलहा-धुनियाक रोजगार कपड़ा बुनब नहि छल, ओ सभ अपन-अपन आन-आन रोजगार जीवकोपार्जन लेल करबे करै छल।

गाम-गामक खादी भण्डार भूदानी सबहक अड्डा बनि गेल। माने ई जे भूदान कमिटीक जे सदस्य सभ छला, ओ सभ खादिये भण्डारमे खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ अपन डेरा रखै छला आ खादिये भण्डारक वस्त्र सेहो प्राप्त करै छला। जइसँ एकाएकी खादी भण्डार टुटए लगल, अन्तो-अन्त सभ टुटि गेल। गाम-गामक एकटा बेवसाय मरि गेल। खादी भण्डारकेँ टुटने जहिना कपड़ा बुनकरक रोजगार गेल तहिना सूत कटनिहारक रोजगार सेहो मरबे कएल। एक तँ ओहिना गाम-गाममे बेरोजगारी पसरल छल, तैपर एकटा आरो बढ़ि गेल। ओना, मिथिलांचलमे अनेको साधन कल-कारखानाक लेल मौजूद अछि मुदा साधन रहितो कल-कारखानाक अभाव रहबे कएल। ठाम-ठीम चीनीक मिलआ धानसँ चाउर बनबैक मिलटा मात्र छल। ओना, लघु उद्योगक रूपमे सेरसो-तोरीसँ तेल बनबैक संग कुशियारसँ गुड़ बनबैक हथकर्घा[iv] रूपमे सेहो छल, मुदा ओहो वृहत् रूपमे नहि छल। चीनी मिल सेहो सालो भरि नहियेँ चलै छल, सालक मात्र छह मास चलै छल। छह मास बन्न रहै छल, जइसँ मिलमे काज करैबला श्रमिक सबहक बीच ईहो समस्या[v] छेलैहे। ओना, कहैले बैसारीक समय श्रमिककेँ आधा वेतन देल जाइ छेलै, मुदा ओहूमे अनेको रूकाबट छेलइ। ओहो नियमित रूपसँ नहियेँ चलै छल।

गाम-गाममेनगदी खेतीक रूपमे कुशियारक फसिल छल, मुदा कुशियारो तँ सभ खेतमे नहियेँ उपजैए। नीचरस खेत, जइमे पानि बसैए तइमे कुशियारक खेती नहियेँ होइए। कुशियारक खेती-ले ऊँचरस जमीन चाही। जे सभ गाममे नहियेँ अछि। ओना, जैठाम-जैठाम चीनी मिल बैसौल गेल ओ कुशियार उपजैबला जमीन देख-देख बैसौल गेल, मुदा मिलसँ दूर-दूर हटलो गाम सबहक किसान, नगदी खेती बुझि कुशियारक खेती थोड़-थाड़ करबे करै छला। गामक खेतसँ मिल तक कुशियार पहुँचबैक साधन रेलोक माल गाड़ी छल आ बैल गाड़ी सेहो छल। रेलक स्टेशने-स्टेशन मिलक राटन बनल छेलइ। जैठाम इलाकाक किसान बैलगाड़ीसँ कुशियार पहुँचबै छला। ओना, कुशियारक रेट मिलक जेते रहै छल तइमे ढुलाइ खर्च सेहो ओही मूल्यमे कटौती होइ छेलै, जइसँ स्थानीय किसान आ दूरक किसानक दरमे अन्तर होइते छल। तहूमे नगद कारोबार सेहो नहियेँ होइत छल।

कुशियारोक खेती करैमे किसानकेँ अनेको समस्या छेलैन्हे। एक तँ सीजनल फसिल रहने एकेबेर सभ किसानक कुशियार तैयार होइ छेलैन, जे समयपर नहि कटने वजनमे कमी अबै छल, तैसंग मिलक जेतेक क्षमता, कुशियार पेरैक छल तेही अनुकूल कुशियारक पुर्जा[vi] भेटै छेलै जइसँ किसानकेँ अबै-जाइक समस्या छेलैन्हे। तेकर पछातियो नगदा-नगदी कारोबार नहियेँ छल। मासक-मास, सालक-साल किसानक कुशियारक दाम पछुआइत छल, जइसँ कुशियार उपजौला पछातियो समयपर किसान अपन पाइसँ काज नहि कऽ पबै छला। ओना, जइ मिलकेँ जेतेक कुशियारसँ चीनी बनबैक क्षमता छल, ओ ओतबे ने पेरत। जँ किसान बेसी खेती केलैन तँ ओहिना खेतमे रहि जाइ छेलैन, जइसँ खेती अनबिसबासू बनैत गेल आ मिलो बन्न हुअ लगल।

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शब्द संख्या : 911, तिथि : 30 मई 2018

जारी....


 

[i]कानूनी अधिकार

[ii]सूत

[iii]कपड़ा बनबैकेँ

[iv]बिनु इंजिनक

[v]माने छह मास बैसारीक समस्या

[vi]राटनपर कुशियार आबैक आदेश पत्र

आमक गाछी

आरम्भ...

1.

बीस जून। ओना, बीस जून गोटे साल शुरू जेठमे पड़ैए तँ गोटे साल उतार जेठमे, तैसंग कोनो-कोनो साल अखाढ़क शुरूमे सेहो पड़िते अछिमुदा से नहि, ऐ साल बीस जून उतार जेठमे पड़ल। सप्ताहसँ बेसी बैरसाइत[i]केँ सेहो भइये गेल छल...।

बीघा भरिक देवचन्द्रक गाछी-कलममे तीनटा आमक गाछ भरखैर पकैत, बॉंकी सात-गाछमे गोटि-पङ्गरा आ शेषमे कोनो-कोनोमे बोनाइत तँ कोनो-कोनोमे अखन खिच्चे सुआदक रंग पकड़ने। ओना, प्रेमनगरक किसान आन गामक किसानसँ कनी बुधिगरो आ श्रमगरो[ii] नइ छैथ सेहो केना नइ कहल जाए। प्रेमनगरक चारूकातक जे गाम सभ अछि, जेना- रामपुर, कृष्णपुर, महमदपुर आ रूद्रपुरइत्यादिगामक किसान सभ जे कलम-गाछी लगबै छैथ, तइमे कलमी आम हुअ कि सरही, जामुन हुअ कि बैर, बेल हुअ कि बरहर, शीशो हुअ कि गमहाइर, सभ कियो सहरगंजा रोपै छैथ, मुदा प्रेमनगरक  किसान सभ जे गाछी-कलम लगौने छैथ आकि लगबै छैथ ओ एकदम कतारबन्दी रूपमे। कतारबन्दीक माने ई जे कलमी आमक कलममे जहिना कलमी आम छोड़िदोसर ने कोनो आमे गाछ आ ने बेखे-बुनियादिक। बेख-बुनायादि भेल लकड़ी उपयोगी वृक्ष। ओना, कलमियो आम सइयो रंगक अपन गुण-धर्मबला अछिए, तँए एक गुणक मिलान आ एक धर्मक मिलान ओहूमे बेसी नीक होइत अछि। किएक तँ ओकर सभ किछु एक रूपे चलैए आ से नइ रहने जहिना बहुधर्मीकेँ एकठाम भेने होइए तहिना केतौ नहाइकाल झगड़ा तँ केतौ खाइकाल झगड़ा, केतौ चाहक झगड़ा तँ केतौ अनचाहक झगड़ा होइतो अछि आ अरबेधलो रहिते अछि। अरबेधब भेल- आगियो आ खढ़-पातसँ लऽ कऽ ठहुरी-चेरा धरिक सुखाएल जरनोकेँ एकठाम राखि देब, भलेँ किए ने कनी-कनी हटाइये कऽ रखलौं आ पूरबा-पछबा हवामे ऊड़ि-पुरि एकठाम भऽ सुनैग कऽ पजैर जाइते अछि। खाएर.., प्रेमनगरक किसान श्रेष्ठ किसान छथियो आ मानलो जाइते छैथ। इलाकामे जखन कखनो आमक गाछी-कलम वा बेख-बुनियादिक चर्च केतौ होइए तँ प्रेमनगरक चर्च जहिना होइए तहिना रामपुरोक चर्च होइते अछि मुदा से प्रेमनगरक विपरीत दिशामे। विपरीत दिशा भेल- जहिना भगवान रामक नाम शुभ रहितो गन्दा-सँ-गन्दा वस्तु देख राम-रामकहि गबाही रखि दइ छिऐन, जहिना मृत्युक बरियातीमे राम-नाम सत् छी कहैत असमसानक पार लगबै छी तहिना ने जुआन-जहानक बरियातीमे रसगुल्ला खाइत-खाइत राम-धाम सेहो पार लगबैबते छी। खाएर जे छी से छी, सभ नीके छी आ सभ अधले छीमुदा सभ कियो तँ छीहे किने।

पनरह जूनकेँ कौलेजमे गरमी छुट्टी भेल, ओना किछु गोरे एकरा अमैया छुट्टी आ किछु गोरे ग्रीष्मावकाश सेहो कहिते छैथ मुदा जाए दियौ ऐ बातकेँ, बात तँ बाते छी, अपना मनक मौजी बहुकेँ कहलौं भौजीआ लोको लग अपन निर्लजताक नाच नचैत रहलौं। भाय, पत्नी पत्नी छैथ किने, ओ तँ जहिना जीवन संगिनी भेली, अर्द्धांगिनी भेली तहिनाप्रेमिका सेहो भेबे केली, मुदा तैठाम जँ कियो दिन-राति टी.भी.मे खेले वा सिनेमे देखती तँ देखौथ आ अपन कर्मक समय विधाताक हाथमे दऽ दौथ..!

गरमी छुट्टी होइते धीरेन्द्र सोझे गाम आबि गेल। बीस जूनकेँ जगमोही सेहो आम खाइक बहन्ने अपन मातृक पहुँचल।

धीरेन्द्र आ जगमोही पटनेमे रहि पटने कौलेजमे बी.ए. फाइनल इयरमे पढ़ितो अछि आ एक्के विषय दुनूक रहने संग-संग किलासोमे आ ट्यूटोरियलमे सेहो एक-दोसरकेँ देखतो अछिए। मुदा जहिना जेनरल क्लासमे तहिना ट्यूटोरियल क्लासमे सेहो दुनूक बैइसैक ब्रेंच अलग-अगल अछिए। जइसँ लगक गपो-सप्प कहियो किए हएत। ओना, अखन तक ने धीरेन्द्र अपन अंगीत जगमोहीकेँ बुझैत आ ने जगमोहीए धीरेन्द्रकेँ बुझैए। तेहेन जुग-जमाना आबि गेल अछि जे ने कियो नामक टाइटिलसँ केकरो परेख सकैए आ ने जाति-पाँजिसँ, केकरा एते छुट्टी छै जे अनेरेक रमझौआमे लागल रहत। नव पीढ़ीक लोक खेलाड़ी आ सिनेमा-कलाकार सबहक नामधुन करत आकि अपन बाप-पुरुखाक..! कोन मतलब ओकरा छै जे अपन बाप-पुरुखाक वंश आ जीवनकेँ बिटिया अपन वंशक इतिहासक संग देश-दुनियाँक इतिहासकेँ बुझत। मुदा ईहो तँ बात सबहक सोझेमे अछि जे जे जेते जिनगीक रस पीबए चाहैए ओ ओते बेचैन सेहो भेले जाइए।

ओना, समाजशास्त्र विषयक जेनरल क्लासमे पचाससँ ऊपर विद्यार्थी अछि, मुदा शनियेँ-शनि जे ट्यूटोरियल क्लास चलैए ओ उनटा पाठक, तँए ओ क्लास मात्र पान-सातटा विद्यार्थी करैए बॉंकी अधिकांश मैटिनी शो सिनेमा देखैए वा किछु गोरे घुमि-फिर शहरे-बजार देखैए। मैटिनी शो सिनेमा देखैक कारण टिकटक कन्शेसन सेहो अछिए। उनटा पाठ जे ट्यूटोरियल क्लासमे होइए ओ ई होइए जे आन दिन– माने सोमसँ शुक्र धरि शिक्षक जे पढ़बै छैथ ओकर उत्तर ओइ क्लासमे विद्यार्थीसँ लेल जाइए। आइक परिवेशमेमाने शिक्षण संस्थानक परिवेशमे, ट्यूटोरियल क्लासक नामो भरिसक छात्र सभ नइ बुझैत हएत–जखन कौलेजमे पढ़ाइये नहि भऽ रहल अछि तखन ओकर उत्तर की भेटत।

ट्यूटोरियल क्लासक पान-सातटा विद्यार्थीमे जहिना धीरेन्द्रक तहिना जगमोहीक उपस्थिति अनिवार्य रूपसँ रहैए। बॉंकी पान-सातक बीच नव-पुरान होइत रहैए। सभ शिक्षकक अलग-अलग सप्ताहमे ट्यूटोरियल क्लास होइ छैन, तँए ऐ बातकेँ शिक्षक सभ नहि बुझि पबै छैथ। ओना, छात्रो सभमे किछु गोरेक सम्बन्ध शिक्षको सभ संग छैन्हे, तँए अपन-अपन ट्यूटोरियलमे अपन-अपन परिचित छात्र रहिते छैन जइसँ नव-पुरान हएब सोभाविके अछि। जहिना धीरेन्द्र अपनाकेँ ओते सक्कत बना क्लास पहुँचै छल जे जे किछु शिक्षक पुछतातइमे जे पढ़ौने छैथ ओकर अतिरिक्त अपनो विचार राखब, तहिना जगमोही सेहो अपन तैयारीक संग क्लास पहुँचै छल। ओना, ट्यूटोरियल क्लासमे कम विद्यार्थी रहने आगूक जे दुनू ब्रेंच बैसैक अछि, तहीपर दहिना भागक ब्रेंचपर धीरेन्द्र बैसैत आ बामा भागक ब्रेंचपर जगमोही। समयक मिलानी दुनूकेँ रस्तोक मिलानी करबैत आ ट्यूटोरियल क्लासक सेहो। माने भेल एक गाड़ी पकड़ैले जहिना दूटा यात्री अपन निर्धारित समयपर घरसँ विदा होइ छैथ जइसँ रस्तामे गप-सप्प भलेँ नहियोँ होइत हौनु मुदा मुँह-मिलानी तँ होइते छैन। कहैकालमे भलेँ सभ कहि दइ छिऐ जे शरीरक पाँच इन्द्रीमे जहिना मुँह भेल, आँखि भेल तहिना कानो भेल। मुदा की तीनूक जीवन क्रिया एक्केरंग अछि? मुँहमे मुंगबाक सुआदसँ लऽ कऽ तेतैरक खट-मीठ आ नीमक तीतपन तकक रस भेटते अछि, जखन कि आँखि सोझे देखैबला भेल। नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधला देख-देख ऑंखि कखनो कानि-कानि नोरो चुबबैए तँ कखनो मिरचाइक कड़ुपनसँ पानियोँ तँ बहैबते अछि। मुदा कान तँ काने छी, खा-पीब कऽ रस चुसैक कोन बात जे आँखि जकाँ ने देखिये सकैए आ ने मुँह जकॉं सुआदे पाबि सकैए, लऽ दऽ कऽ हवामे उड़ल नीक-बेजाएकेँ खाली सुनिटा सकैए। जइसँ, जहिना बहिरा अपने ताले नचैए तहिना नाच करत। मुदा ऐ सभसँ कोन मतलब धीरेन्द्रेकेँ आकि जगमोहीए-केँ छइ। दुनू गोरे कौलेजमे पढ़ैए, कौलेजिया संगी कहियौ आकि क्लासक संगी, एक-दोसरक छी। अट्ठारह बर्खक उमेर सेहो दुनू टपिये गेल अछि, किए ने खुलि कऽ खेलाएत। मुदा से नहि, दुनू अपन-अपन सीमाक बीच अनुबन्ध अछि। ओना, दुनूक प्रश्नोत्तर दुनू तँ सुनिते अछि, तैसंग शिक्षक सेहो ट्यूटोरियल क्लासमे सुनै छथिन जइसँ एक-दोसरक अध्ययनक गहराइ सेहो एक-दोसर बुझिये रहल अछि। ओना, क्लासमे शिक्षक निर्धारित पाठ्यक्रममे जे पोथी निर्धारित अछि ओकरे आधार बना पढ़बै छैथ मुदा शिक्षको तँ शिक्षके ने भेला। कियो जेतबो सिलेबशमे अछि तेतबो ने पढ़बै छैथ आ कियो कियो एहनो तँ छथिए जे ओरिकासँ घी परसै छैथ। ओरिकासँ घी परसबक माने भेल सिलेबशसँ अतिरिक्तो पढ़ाएब, हुनका कोन मतलब छैन जे दालिक सुआद रहल कि मेटाएल। ओ तँ सिलेबशक कोन बात जे दुनियॉंक सिलेबश आगूमे रखिये दइ छैथ। शिक्षकेक अनुकरण ने शिक्षार्थी करत। ओहो ने वएह बुझत। भलेँ किए ने ओ शिक्षकक पठनकेँ निर्णित करए जे जहिना शिक्षक जुग-स्रष्टा छैथ तहिना जुग-द्रष्टो तँ होइते छैथ। तँए शिक्षार्थियोकेँ तहिना ने जिनगीक बाट भेटत।

ओना, शिक्षको अपन सिखपनसँ सीखिये नेने छैथ जे ट्यूटोरियल क्लासमे अनेरे जे माथक बोझ बढ़ाएब (माथक बोझ बढ़ाएब भेल- एक-एक छात्रसँ प्रश्न पुछब) तइसँ नीक जे पैंतालीस मिनटक घन्टीमे दस मिनट रीब-रीबेमे गेलबँचल पैंतीस मिनट, से नहि तँ एक-एक छात्र-छात्रासँ प्रश्न पुछि समय ससारि लेब। जे लाभ धीरेन्द्रोकेँ आ जगमोहीकेँ सेहो भेटिये जाए। जहिना कहल जाइए जे करत-करत अभ्याससँ जड़-मूढ़ सेहो सुजान भइये जाइए। मनुख तँ सहजे मनुख छी, अन्न-खाइबला आ पानि पीबैबला। घोड़ा घास खाइए तखन तँ एते हिहिआइए, मनुख तँ सहजे मनुख छी जेकर सभ जीव-जन्तुसँ अतिरिक्त गुण भेल हँसब।

ट्यूटोरियल क्लासक शिक्षक भेला प्रश्नकर्त्ता, धीरेन्द्र आ जगमोही भेल उत्तर देनिहार। बाँकी सभ शिक्षकोक भाषण आ विद्यार्थियोक उत्तर-भाषण सुननिहार भेल। तँए खुलल वा झाँपल भेल निर्णयकर्त्ता। किए अनेरे कोनो पक्षमे ठाढ़ हएत। किए ओ प्रश्नकर्त्ता प्रश्न अङ्गेजत आ किए ओकर जवाबदेह बनत। सभ ने सुविधानुसार जीबए चाहैए। जखन अवसर भेटल तखन वएह सभ किए छोड़ि देत। अपन उत्तरमे जहिना शिक्षकक भाषण सिलेबशकेँ अतिक्रमण करै छेलैन तहिना धीरेन्द्रो आ जगमोहीओ उत्तर दइते छल। तेकरा शिक्षक लोकैन, ट्यूटोरियल क्लासक विषय कहि परीक्षामे लिखैसँ परहेज करैक सलाह दुनूकेँ दैत क्लास अन्त करै छला।

दुनियाँमे प्रेमोक अपन रंग-रूप छइ। सात अरब लोकमे जगमोहीक जेहेन रूप धीरेन्द्र देख रहल छल ओहन रूप धीरेन्द्रक जगमोही नहि देख पेब रहल छल। दुनूक अपन-अपन नजरियो आ दृष्टिकोणो छेलैहे। मुदा ट्यूटोरियल क्लासक जे सिख (अध्ययन) छल ओ दुनूकेँ जरूर नव सिखपन (अध्ययनशीलता) दिस बढ़ौलक, जइसँ एक-दोसरक बीच, भिन्न दृष्टि रहितो आकर्षित करबे करै छल।

ओना, आकर्षणोक अपन गुण-धर्म अछि। कोनो आकर्षण ओहन होइए जइमे विकर्षणो समान रूपमे संगे चलैए आ कोनो एहनो आकर्षण अछिए जइमे विकर्षणक मात्रा कम रहने हेराएल-हेराएल सन रहैए। जइसँ आकर्षणे-आकर्षण बुझि पड़ैए। तहिना विकर्षणोक तँ छइहे जे बेसी मात्रामे भेने आकर्षणकेँ दाबि दइए। जखन लोहा सन निर्जीव धातुक चुम्बकीय आकर्षण ओहन होइए जे अपना सन-सन भतलोहोकेँ अपना संगमे रंगि अपन गुण-धर्मसँ भरिये दइए। भलेँ ओ ओतबेकालक किए ने होउजेतेकाल चुमकलोहमे सटि अपनो चुम्बकत्वमे किए ने बदैल गेल हुअए। खाएर जेतए जे होइ से तेतए हुअए। अजगर सन साँपो जखन अपन नजैरक कनखी आ मुँहक सूसकारीसँ आन साँपकेँ लगमे आनि भक्षे किए ने कऽ लैत हुअए मुदा तइसँ कोन मतलब धीरेन्द्रकेँ आकि जगमोहीएकेँ अछि। अखन तँ जिनगीक एको टपान दुनूमे सँ एको ने टपि सकल अछि, तखन जिनगीक टपानक बाते केना बुझत।

जहिना धीरेन्द्रक मनमे जगमोहीक प्रति जिज्ञासा जागल तहिना जगमोहीकेँ सेहो धीरेन्द्रक प्रति जागल। एक रस्ताक राही–माने एक विषयक विद्यार्थी–भेने दुनूक मनमे एते तँ जिज्ञासा जगिये चुकल अछि जे जखन दुनू गोरे एक कौलेजक एक क्लासमे पढ़ै छी तखन बुधियो-ज्ञान ने एकरंग हुअए। एकर माने ईहो नहि जे आनसँ  बेसी नइ हुअए, आ ने यएह माने हएत जे आनसँ कम्मो नइ हुअए। एक स्थानक यात्रीक बीच एहेन कोनो सीमा थोड़े अछि जे सभकेँ एक्केरंग चलए पड़त। कौलेजोमे तँ तहिना होइते छै जे कियो प्रथम श्रेणीमे उतीर्ण होइए, कियो दोसर श्रेणीमे आ कियो तेसर श्रेणीमे। मुदा जिनगीक अध्येता अपन जिनगीक अध्याय ओहीठामसँ शुरू करैक चेष्टा करै छैथ जैठाम मजगूत नीवक जरूरत अछि। औझुके नीवपर ने काल्हि ठाढ़ हएत। तँए, भविसवेत्ता भलेँ जे हुअए मुदा भविसक निर्माता नइ छी सेहो केना नइ कहल जाएत। औझुके रोपल गाछ ने काल्हि फल देत।

धीरेन्द्रो आ जगमोहीयो एक-दोसरक जीवन परिचय गुप्त रूपसँ भॉंज लगबए लगल। मुदा दुनूक प्रतिबन्धित बाट, प्रतिबन्धित ऐ मानेमे जे जानकारी पबैमे कहीं सीमोलंघन ने भऽ जाए, नइ तँ जगहँसी हएत। एक तँ पटनामे ने धीरेन्द्रकेँ बेसी चिन्ह-पहचीनक लोक आ ने जगमोहीएकेँ। ओना, कौलेजो आ हाइयो स्कूल, सइयो-हजारो अपरिचित चेहराक परिचित करबैक गड़ छीहे, मुदा परिचय-पात करैक जगह तँ छी नहि, छी तँ पढ़ै-लिखैक जगह। जेकर अपन निर्धारित सीमा-सरहद अछि। तँए, एक सिमानक बीच रहि कियो अपनाकेँ पार-घाट लगैबतो अछि आ लगबौ चाहैए। 

धीरेन्द्रकेँ पिता-पुत्रक बीच जे सीमा अछि तइमे जहिना पिता जीबेन्द्र छथिन तहिना पुत्र धीरेन्द्रो अछि। माने ई जे अनेको क्रिया-कलापक बीच पिता-पुत्रक जीवन अछिए। मुदा अखन से नहि। अखन एतबे जे जेतेक उचित खर्च विद्यार्थीक छल ओ धीरेन्द्र जहिना निमाहि रहल अछि तहिना जीबेन्द्र सेहो अपन पुत्रक हिसाबसँ अपन माहवारी खर्चो आ स्वतंत्रतो देब निमाहि रहल छैथ। मुदा ऐ सीमाक बीच धीरेन्द्र अपन कोर्सक किताब सिलेबशक अनुसार पिताक पाइसँ कीनि नेने छल मुदा शिक्षकक मुहसँ अनेको अन्य किताबक नाओं सुनि मन तँ उछटबे कएल। जइसँ धीरेन्द्र प्रतिदिन एक घन्टा कौलेजक रीडिंग रूममे बैस नव-नव पोथी पढ़ैत रहल अछि। कौलेजक रीडिंग रूम, पुस्तकालय आ कार्यालय तीनू कोठरी एक्के मकानमे जुड़ल अछि। तीनूक बीचक देवालमे शीशा लागल अछि जइसँ एक दोसर कोठरीकेँ नीक जकॉं देखल जाइए।

धीरेन्द्र रीडिंग रूममे कुर्सीपर बैस टेबुलपर तीन-चारिटा किताब रखि एकटाकेँ उनटा रहल छल, तहीकाल जगमोही पुस्तकालयक पैछला किताब जमा करैत ऐगला लइले आलमारी देखए लगल। ओना, पुस्तकालयक सभ पोथी रजिष्टरमे अंकित ऐछे मुदा ओ दोसर विद्यार्थी देख रहल छल।

नमगर-चौड़गर रीडिंग रूमक कोठरी, दर्जनो आलमारी किताबसँ सजल अछिए। एकसँ दू आलमारी प्रति विषयक किताबसँ सजौल फुटा-फुटा लगौल अछि। बीचमे बइसैले कुरसीक संग टेबुल सेहो लगले अछि। जइसँ बिनु बँटवारा केनहुँ बैइसैक जगह बँटाइये गेल अछि। माने ई जे आलमारीक लगेमे कियो बैस कऽ पढ़बकेँ नीक बुझबे करैए। धीरेन्द्र अपन समयानुसार रीडिंग रूममे किताब सभ टेबुलपर रखि कलमसँ कॉपीमे लिख पुन: किताब उनटबैत रहए। पुस्तकालयक आलमारीमे जगमोही किताब खोजि रहल छल। पुस्तकालयो आ रीडिंगो रूमक आलमारी हाथ-हाथ भरिक दूरीमे सजल अछि। पुस्तकालयक दुनू आलमारी खोलि जगमोही किताब खोजि रहल छल आ दोसर दिस धीरेन्द्र दुनू आलमारी खोलि किताब निकालि टेबुल सजौने छल।

दू आलमारीक बीचक जे जगह अछि ओइ बीच होइत जगमोही धीरेन्द्रकेँ देख रहल छल। तही बीच पुस्तकालयक किछु किताब गड़बड़ भऽ गेल रहै तेकर कहाकही ऑफिसमे उठल। मुदा किताब तँ किताब छी, आगियोमे जरैबला, पानियोमे गलैबला आ दिबारो-दिम्मककेँ खाइबला, तैठाम अनेरेक ने कहा-कही भेल। खाएर.., जेकरा माए-बाप जन्म दइए से तँ माए-बापकेँ बिसैर जाइए, ई तँकौलेजक पुस्तकालयक किताब छी, एकर के माए-बाप छै! अनेरे के एते आलमारीकेँ उधेसत। ओना, देवालक बीच शीशा लगल रहने जहिना जगमोही पुस्तकालयमे बन्न अछि तहिना रीडिंग रूपमे धीरेन्द्रो बन्ने अछि मुदा देख रहल छल दुनू एक-दोसरकेँ।

ओना, अखन तकक तरपेसकी जानकारीमे जहिना जगमोही अपन मामा गामक धीरेन्द्रकेँ बुझैत तहिना धीरेन्द्रो अपना गामक भगिनी जगमोहीकेँ बुझैत। मुदा अखन धरि एको दिन बात-चीत नहि भेल।

पुस्तकालयक कार्यालयमे कहा-कही भेने सबहक धियान ओइ दिस भेल आ जगमोहीक धियान धीरेन्द्र दिस भेल। शुरूमे जगमोही मोट-मोट किताब धीरेन्द्रक टेबुलपर राखल देख थोड़ेक सहमल जरूर मुदा एते तँ आत्म-शक्ति जगिये गेल छेलै जे धीरेन्द्र मामा गामक छी। चाहे तँ नाना दाखिलमे हुअए वा मामा दाखिलमे वा भाइक दाखिलमे, मुदा अंगीत तँ छीहे। जँ सेहो नइ छी तैयो एक कौलेजक एक क्लासक आ एक विषयक संगी तँ भेबे कएल। जखन एक्के विषयक संगी छी तखन जीवनक क्रियो-कलाप तँ एक्केरंग ने हएत। केना कोयलाखानक श्रमिक अपनाकेँ लेबर क्लास कहि एकठाम बैसार-उसार करैए। केना खेतक धान रोपनिहार धनरोपनिया कहबैए। कहॉं केतौ मर्द-औरतक भेद छइ। एक दिस मातृकक सम्बन्ध, दोसर दिस कौलेजक सम्बन्ध अछिए, तैसंग एक उमेरक सियान सेहो दुनू गोरे छीहे। तखन गप-सप्प करैमे बाधा की? चोरनुकबा प्रेममे कोनो दम होइए, ओ तँ चोर सबहक क्रिया भेल। प्रेम तँ सार्वभौंम अछि।विचारक प्रेम, बेवहारक प्रेम, जिनगी जीबैक प्रेमइत्यादि, जे लोकचोरा-नुका कऽ किए करत।

दू आलमारीक बीचक रस्ता देने शीशाक देवाल पार करैत जगमोही धीरेन्द्रक अनुकरण करए लगल। धीरेन्द्र जहिना किताबमे ऑंखि गाड़ि, समुद्री हीरा जकॉं पाँति खोजि कॉपीमे नोट कए रहल छल, तेकर हू-ब-हू फोटोग्राफी जगमोही अपन बुधिक डायरीमे उतारए लगल। दस मिनटक फोटोग्राफीक रील जगमोही मनमे गढ़ि नेने छल।

संजोग भेल, पॉंच बाजि गेल। आब सभ किछु बन्द हएत। जगमोहीकेँ दूटा किताब लेबाक छेलै जे इसू करा चुकल छल। धीरेन्द्र आलमारीमे किताब रखि कॉपी नेने बाहर निकलल। ओना, लोको पतराएले छलइ। मात्र दू गोरे कौलेजक स्टाफ आ चारि-पॉंचटा विद्यार्थी अछि। पुस्तकालयक सीढ़ीसँ निच्चाँ उतैरते जहिना धीरेन्द्रक नजैर खिर जगमोहीपर छिछलल तहिना जगमोहीक नजैर सेहो धीरेन्द्रपर छिछलए लगल। ओना, दुनूकेँ अपन-अपन नैतिक अनुशासनक विचार मनमे दौड़िये रहल छल। अही गुन-धुनमे दुनू बिना किछु बजने-भुकने कौलेजक अन्तिम गेट लग पहुँच गेल। चौबट्टी जगह, तँए के किमहर जाएत तेकर जानकारी दुनूकेँ अपन-अपन।

ओना, एहेन कोनो प्रतिकूल मौसम नहियेँ अछि जे दुनूक बीच गप-सप्प नइ भऽ सकैए।मुदा ग्रामीण परिवेशक उपज दुनू, माने दुनूक जन्म गाम देहातमेभेनेदुनूक मनमे गाम गमैया सम्बन्ध सेहो बनियेँ गेल अछि। तँए दुनूक बीच किछु ओझरौठ अछिए। जे ने जगमोही बुझि सकल अछि जे धीरेन्द्रक संग कोन तरहक सम्बन्ध मानि बाजल जाए, आ ने धीरेन्द्रे से बुझि रहल अछि। तैसंग दुनूक मनमे ईहो बेवधान छैहे जे अपनासँ उमेरमे जेठ मानल जाए वा छोट। तेकर कारण दुनूक अपन-अपन अछि। धीरेन्द्रक मनमे नचै छै- जखन दुनू गोरे कौलेजक एक क्लासमे पढ़ै छीतखन ई मानि लेब जे जगमोहीक उम्र हमरासँ कम हेतैई तँ बालबोधक विचार भेल! किएक तँ जेतेक समय हमरा अ-आसँ अबैमे अखन धरि लागल तेते तँ जगमोहीकेँ सेहो लगल हेबे करत, तखन छोट मानल जाए वा पैघ? आइ जँ कौलेजमे एको क्लास आगू-पाछू रहितौं तखन तँ एकटा देखौआ सीमा भेटैत, जहिना कोनो गामक जमीनक नापी लेल पैछला सर्वेक कोनो पहचान भेटला बाद अमीनकेँ कोनो खेतक आड़ि-मेड़ बनबैमे असान होइए तहिना। मुदा धीरेन्द्रक मनमे एकटा विचार उठल। उठल ई जे जइ गाममे बाढ़िक कारणे वा भुमकमक कारणे सिमानक पहचान मेटा गेल रहैए तँ ओइ सीमाकेँ पकड़ै तँ दोसर गामक सिमानक सहारा लेले जाइए।

जगहमोही जखन अपन पैछला इतिहास दिस नजैर खिरौलक तँ साफ-साफ देखए लगल जे जहिया पॉंच बर्खक रही तहिये बाबा लोअर प्राइमरी स्कूलमे नाओं लिखा देलैन, तहियासँ ने कहियो फेल केलौं आ ने कोनो क्लासे फानि कऽ टपलौं।मनमे उठलै- तहिना ने धीरेन्द्रोकेँ भेल हएत। बीचमे मातृकक सम्बन्ध सेहो अछि, जँ नानाक सम्बन्धमे हएत आ तखन जँ भैयारीक सम्बन्धे बाजबईहो तँ नीक नहियेँ हएत। आ तहूमे जँमाए बुझती तखन तँ ओहो गनजन करबे करती..!

ओना, धीरेन्द्रोक मन सकताइये रहल छल जे अनजान-सुनजान महाकल्याण। गप-सप्पक पछाइत जखन सम्बन्धक असल परिचय हएत तखन अपन विचारकेँ सुधारि लेब। तहिना जगमोहीक मन सेहो रसे-रसे ओहन सीमापर पहुँच गेल। तँए दुनूकेँ मुँह खोलैक अनुकूल मौसम बनि गेल। एक तँ ओहुना जखन संगे-संग पढ़ै छी तखन बजा-भुकी करैमे कोन एहेन पहाड़े आकि समुद्रे बीचमे बाधक अछि।

गेटपर पहुँच धीरेन्द्र जगमोही दिस तकलक। ओना, जगमोही सेहो धीरेन्द्रे दिस ताकि रहल छल।दुनूक ऑंखि मीलि गेल। ऑंखि मिलिते दुनूक मुँह टुस्कियाएल। जहिना पत्ता-कलश वा फूल-फलक टुसी चलिते अपन सुगन्ध निकालए लगैए तहिना दुनूक मनसँ निकलए लगल...। जगमोही बाजल-

डेरा केतए रखने छी?”

जहिना जगमोही बाजल तहिना धीरेन्द्र उत्तर देलक-

ऐठामसँ साए मीटर हएत।

धीरेन्द्रक बात सुनि जगमोही घड़ी देखलक। पॉंच बाजि कऽ पॉंच मिनट भेल छेलइ। मने-मन अपन समयक अँटकार लगौलक तँ बुझि पड़लै आधा घन्टा समय बीचमे खाली अछि। जगमोहीक ऐगला समयक सीमा निर्धारित छेलै, किएक तँ सचिवालयमे जगमोहीक पिता- गोविन्द कार्यरत छथिन जे नित्य छअ-पौने छअ बजे तक डेरा अबै छथिन। पिताजीकेँ अबैसँ पहिनहि जगमोही अपन कौलेजक काज निवटा डेरा पहुँच जाइए। तैबीच जगमोहीक माइयो बजारक काज कऽ आबि जाइ छथिन।

जगमोही बाजल-

रस्ते-रस्ते चलि कऽ अपन डेरा देखा दिअ। दोसर दिन समय पेलापर आगूक किछु गप-सप्प करब।

सोल्होअना जगमोहीक बात नहि सुनि धीरेन्द्र बिच्चेमे बाजल-

चलू, संगे-संग चलबो करू आ अहॉं अपनो डेराक जानकारी दिअ।

साइए मीटरपर धीरेन्द्रक डेरा, गपे-सप्पमे दुनू गोरे पहुँच गेल। डेरा लग ठाढ़ होइत धीरेन्द्र असमंजसमे पड़ि गेल। असमंजस ई जे शहर-बजार छी। ऐठाम सभ तरहक प्रतियोगिता अछि! मुदा लगले मनमे उठि गेलै जे अखन विद्यार्थी जीवनमे छी, तँए अखन वर्त्तमानक विचार करब अछि नहि कि भविसक। धीरेन्द्र बाजल-

डेरामे चाह-ताह तँ नइ बनबै छी मुदा जलखैक ओरियान तँ रहिते अछि, चलू पहिने जलखै कऽ लेबतखन जाएब।

ओना, दुनूक मन गवाही दइते रहै जे कौलेजसँ लऽ कऽ गाम धरिक सम्बन्ध अछिए, तखन खेबे-पीबेमे कोन हर्ज...। जगमोही बाजल-

डेरा तँ भीतर जा कऽ देख लेब मुदा जलखै नइ करब। बेसीसँ बेसी एक गिलास पानि पीब लेब।

दुनू गोरे कोठरीमे पहुँचल। कोठरीमे कुरसी नहि, छोट-क्षीण कोठरीमे धीरेन्द्रक पूर्ण जिनगी समटल अछि। एक्के चौकीपर बैस धीरेन्द्र बाजल-

गाममे ऐबेर आम खूब फड़ल अछि, अमैया छुट्टी हेबे करत...।

जगमोही बाजल-

अहॉंक घर प्रेमनगर छी आ हमरो...।

हमरोसँ आगाँ नहि बढ़ि जगमोही चुप भऽ गेल।

अपन गामक नाओं सुनि धीरेन्द्र बाजल-

अहूँक मातृक तँ प्रेमनगरे ने छी?”

जगमोही-

आइ एतबेपर रहए दियौ। पनरह जूनसँ अमैया छुट्टी भऽ रहल अछि, माइयो नैहर जेती, हुनके संग बीस जूनकेँ अहॉंक गाम पहुँच जाएब।

मुस्की दैत धीरेन्द्र बाजल-

हमरा गाम पहुँचब आकि अपन मातृक?”

जगमोही-

अहॉं जे बुझिऐ...।

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शब्द संख्या : 3068, तिथि : 10 अगस्त 2018

जारी....


 

[i]बटसावित्री

[ii]मेहनत करैबला

 

जगदीश प्रसाद मण्डल

दूटा लघुकथा

कियो ने पुछैए

एकतीस साल नोकरी केलाक बाद रामानन्द भाय घुमि कऽ गाम एला। एकतीस सालक बीच ए.एस.पी. सँ लऽ कऽ चारि मास आइ.जी.क पद सेहो सुशोभित केने छला। तैबीच ऑफिसक कर्मचारी जरूर बुझैन जे खिशियाह अफसर छैथ तँए काजमे कोताही केने बिगड़बो करता आ भऽ सकैए जे लाल कलम चला देता तँ नोकरियोमे जड़ब हेबे करत। किछु गोरे इमानदार सेहो बुझिते छेलैन। पचीस दिसम्बरकेँ रामानन्द भाय सेवा निवृत्त भेला आ अपन पेंशनक सभ काज सम्हारि दस जनवरीकेँ डेराक सभ वस्तु जात नेने पत्नीक संग गाम आबि गेला। तेसर दिन माने बारह जनवरीकेँ, भिनसुरका चाह पीब रामानन्द भाय अपन ऐगला[i] जिनगीक विषयमे गौर करए लगला। तही बीच पत्नी- सुलेखा सेहो कोठरीसँ निकैल दरबज्जापर पहुँचली। पत्नीपर नजैर पड़िते रामानन्द भाय बजला-

गामक कियो ने पूछ करैए..!”

ओना, सुलेखाक जे बीतल जिनगी छेलैन ओ तँ अफसर परिवारक रहैन तँए कोनो बात वा कोनो बेवहारकेँ देखै-बुझैक तरीका अप्पन बनि गेल छेलैन। जइ अनुकूल ओ बजली-

अखन दुइये दिन एना भेल अछि तइमे केना ई बुझि गेलिऐ?”

अपन समझसँ सुलेखा बाजल छेली, मुदा सेवा निवृत्तिसँ पूर्वक विचार जिनगीक अनुकूल जहिना रहैए तहिना सेवा निवृत्तिक पछाइत मृत्युक सम्भावनासँ प्रभावित भेने जीवन-मृत्युक बीचक सम्भावनाक संक्रमण भेने अनुकूल विचार सेहो प्रभावित होइते अछि। जइसँ विचारमे किछु-ने-किछु संक्रमण होइते अछि। हेबो केना ने करत, जीता-जिनगी लोक दोसरक सहारा बनैए आ मृत्युक आगमन देख लोक दोसराक सहारा चाहिते अछि। तँए रामानन्द भाइक विचार पत्नीक विचारसँ सहमेलू नहि भऽ सहखेलू जकाँबुझि पड़लैन। मुदा समस्या किछु हुअ आकि केहनो हुअ ओ तँ समस्याग्रस्त लोककेँ भोगै-विचारै पड़ैए।

रामानन्द भायकेँ पत्नीक विचारमे जे आसरस भेटक चाही से नइ भेटने मन थोड़ेक निरस जकाँ भइये गेलैन। मुदा जे विचार रामानन्द भाइक मनमे पनैप गेल छेलैन ओकर पेंपीकेँ ओतै रोकि, मनकेँ दोसर दिस बहटारैत बजला-

जइ दिन गामसँ नोकरी करए विदा भेल रही ओ दिन आ आइ जखन नोकरी छुटला पछाइत गाम एलौं हेन तइमे केतेक अन्तर आबि गेल अछि से अनुमान करै छिऐ?”

पतिक बात सुनि सुलेखा थोड़ेक सिरसिरेली जरूर मुदा किछु लोकक एहेन सोभाव होइते अछि जे जहिना खुशी रहलापर बोली-वाणीकस्वर रहल तहिना नाखुशी भेलापर सेहो ओहिना रहल। सुलेखो तहिना अपन मुँह बन्न कऽ लेली, किछु बजली नहि। भऽ सकैए जे मने-मन गुड़-चाउर फाँकए लगल होइथ।

लक्ष्मणपुर गाममे पहिल-पहिल आइ.पी.एस. रामानन्द भाय भेला। ओना, पढ़ै-लिखैक खियालसँ लक्ष्मणपुर बहुत पछुआएल अछि। सोल्होअना बिनु पढ़ल-लिखल गाम नहियेँ अछि मुदा जनसंख्याक चौथाइयोसँ कम जरूरे अछि। पनरह-सँ-बीस प्रतिशत साक्षर पुरुख वर्ग आ दू-सँ-पाँच प्रतिशत महिला वर्ग साक्षर अछि। रामानन्द भाय विद्यार्थीए जीवनमे लक्ष्मणपुरक वातावरणसँ अलग भऽ मात्रिकक वातावरणमे जा पढ़ला, बढ़ला आ पालल-पोसल गेला, जैठाम पढ़ाइ-लिखाइक औसत अधिक अछि आ तहूमे खासकए रामानन्द भाइक मामा-नानाक परिवार तँ आरो बेसी अगुआएल छेलैन। रामानन्द भाइक मामाक परिवारमे ई सातम पीढ़ी चलि रहल छैन जे पढ़ै-लिखैक धारासँ नीक जकाँ जुड़ल अछि। माने अक्षर-बोध आ अध्ययन बोधक सातम पीढ़ीक नम्बरपर रामानन्द भाइक मामा सभ भेलखिन। मामक चारि भाँइक भैयारी छैन। जे चारू चारि दिशाक अध्ययेता। किएक तँ हुनक पिता- रघुनन्दन बाबाक अपन खास सोच रहैन। रघुनन्दन बाबाक अपन खास सोच परिवारक खियालसँ रहल होनि वा समाजक जरूरतक खियालसँ जे चारू बेटा– रूपलाल, भूपलाल, दुखलाल आ सुखलाल–केँ चारि दिशाक अध्ययन दिस झुकौलैन, जइसँ एकटा बेटा किसानी ज्ञान, दोसर मशीनी ज्ञान, तेसर चिकित्सा आ चारिम वकालत दिस बढ़ला। किछु दिनक पछाइत चारिम बेटा- सुखलाल जिला जज बनला। वएह वातावरण रामानन्दकेँ भेटल छेलैन जइसँ आइ.पी.एस. बनला। ओना, लक्ष्मणपुरक अपन धरतीक उपज, माने शिक्षाक दौरमे एक गोरे मैट्रिक पास करि कोसी प्रोजेक्टक किरानी, दोसर मैट्रिक पास लोअर प्राइमरी विद्यालयमे शिक्षा मित्र आ तेसर बेकती बी.ए. पास केला पछाइत बेरोजगारे रहि गेल। वएह कलकत्तासँ दिल्ली तक घुमि-फीरि नोकरी नइ भेने सठिया-कठिया कऽ बी.एल.मे नाओं लिखौलक आ वकील बनि झंझारपुर कोर्टमे कार्यरत अछि। बाँकी गामक लोक छोट-मोट बेपारक संग खेती-गिरहस्ती करैए। तँए की गाममे सम्पन्नता नहि अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। झोरे छाप डॉक्टर किए ने हुअए मुदा लक्ष्मणपुरक डॉक्टर तँ वएह छी किने। जेकरा काजमे समाजक बिसवास छइ। भगवान रच्छ रखथुन लक्ष्मणपुरवासीकेँ जे टाटा हॉस्पीटल बम्बई आ आयुर्वेद संस्थान दिल्लीक मुँह नहि देखए पड़इ। कियो सुखे थोड़े जाइए। दमकल-बोरिंगसँ लऽ कऽ ट्रेक्टर धरिक मिस्त्री, बिजलीक मैकेनिकक संग मोबाइलक मैकेनिक सेहो लक्ष्मणपुरमे अछिए। तौला-कराही बनबैबला माने बरतन-बासनक सृजनकर्त्ताक रूपमे कुम्हार-पण्डित सेहो अछिए। दुर्गा स्थानक दुर्गा माताक संग ब्रह्म स्थानक रेमन्तक संग घोड़ो गढ़बे करैए। तहिना केबाड़-चौकैठक संग चौकी आ सजल-धजन पलंग धरिक सृजेता कर्मकार कलाकार लक्ष्मणपुरमे नहि अछिसेहो केना नइ कहल जाए। तहिना काँच-कड़चीसँ काँच बाँसक फुलडालीसँ लऽ कऽ पनडालीक संग पतडालीक[ii] अतिरिक्त डाला-धनडाला तकक निर्माणकर्त्ता नइ अछि सेहो केना नइ कहल जाएत। जइ गाममे सभ कथुक सम्पन्नता रहत तइ गामकेँ जँ सम्पन्न नइ कहबै तँ ओइ गामक तौहीनक संग बेइमानी सेहो भेबे कएल किने। मुदा से बात नहि, गौंओं आ अनगौंओं सभ लक्ष्मणपुरकेँ सम्पन्न समाज मानिते अछि। जँ से नइ मानैत अछि तँ कियो अनगौंऑं किए अपन बेटी-बेटाक संग भाइयो-बहिनक बिआह लक्ष्मणपुरमे करैए। किनका मनमे एहेन इच्छा नइ रहै छैन जे अपन बहिन वा बेटीक जिनगी नीक जकाँ नहि चलए। ओना, जिनगियो-जिनगीमे अन्तर होइते अछि। एक्के गाममे एक परिवारक जिनगी खाइ-पीबैसँ लऽ कऽ कपड़ा-लत्ता, घर-दुआरिक संग पढ़ै-लिखै तक सम्पन्न रहैए आ ओहीठाम माने बगलेमे, दोसरकेँ केकरो पढ़ै-लिखैक खर्च नइ जुटै छै तँ केकरो रहैक नीक घर नहि छइ। तहिना केकरो कपड़ा-लत्ताक अभाव अछि तँ केकरो खेबा-पीबाक। मुदा किछु अछि, गाम तँ सबहक छिऐन्हे। सभकेँ अपन-अपन अधिकारो आ कर्तव्यो छैन्हे। तइमे जे जेहेन विचारक छैथ ओ ओइ अनुकूल अपन परिवारक सिरजनो-प्रतिपाल करै छैथ आ नष्टो-संहार करिते छैथ।

आइसँ बतीस बर्ख पूर्व रामानन्द भाय जखन आइ.पी.एस. कम्पीट केलैनतँगामक जेते बुझै-सुझैबला लोक छला सभ खुशीसँ झूमि उठल छला। किनको झुमैक खुशी छेलैन जे गाम समाजक लोक उठि कऽ सत्ता तक पहुँचला, तँ किनको खुशी जे गाममे कोनो भीड़-कुभीड़ पड़त तेकर रक्षक गोबरधन धारी कृष्ण जकाँ अवतार लइये लेलैन। किनको मनमे खुशी ऐ दुआरे रहैन जे देखा-देखी दुनियाँ चलैए, जखने एक गोरे धरतीसँ उठि अकास छुबि लेलैन तखने दोसरो-तेसरेा छुबे करत। आ किनको मनमे ई आशा छेलैन जे बिनु पढ़ल-लिखलकेँ ने नोकरी[iii] नइ भेटैए आकि नइ भेटत मुदा ओइ संग पढ़लो-लिखल जे टौआएल फिरैए कमसँ कम आब ओकरा सबहक बेरा पार हेबे करत। जखन एते पैघ डिग्री रामानन्द भाय हाँसिल केलैन तखने ने पैघ पदक प्राप्ति सेहो हेबे करतैनजइसँ दबल-कुचललकेँ लाभ हेबे करत।

रामानन्द भाइक पिता जनकनन्द साधारण पाँच बीघा जोत जमीनक गिरहस्थ, जिनका अपन होश-हवास एते नहि जे रामानन्द भाइक पदक गरिमाकेँ बुझितैथ मुदा सासुरक जे परिवार रहैन ओइसँ किछु-ने-किछु अंकैत तँ जरूर छेलाहे। बेटाक डिग्रीक खुशीमे समाजे नाचि उठल छल जइसँ जनकनन्द सेहो झूमि उठला। बेटाक प्रतिष्ठाक खुशीमे जनकनन्द समाजक संग कुटुम्बो-परिवारकेँ भोज खुएबाक विचार मनमे रोपि लेलैन।

ट्रेनिंग सम्पन्न केला पछाइत रामानन्द भाय गाम एला। परसू जुआइन करए जेता। बीचमे काल्हि भरि समय अछि। जनकनन्दकेँ भोज करैक अवसर भेटलैन। ओना, रामानन्द भाय पनरह दिन पहिनहि अपन कार्यक्रमक जानकारी पिताकेँ दए देने रहैन। भोजो तँ भोज छी, अपन-अपन गुण-धर्म तँ ओकरो छइहे। बिआहक भोज बरियातीक भोज भेलजइमे दू समाजक बीच मनुख-मनुखक कान्हक मिलानीक संग लड़का-लड़कीक बिआह होइत अछि।तँए ऐ भोजमे रस्सा-कस्सी सोभाविक अछि, जइसँ खेबा-पीबाक ओहन रूप पकड़बे करत। किए ने लोक (बरियाती) बाजत जे जहिना अँठियाहा रसगुल्ला छल तहिना लालमोहनो आ डलनामे सेहो डलडेक छौंक पड़ल छेलइ। मुदा ओहीठाम श्राधक भोजक महात्म बदैल जाइए। बदलबो केना ने करत, जैठाम मृत-आत्माकेँ स्वर्ग-नर्कक भागी बनैक प्रश्न अछितैठामक पंच जँ भोजमे तीमन-तरकारीक परिचय करए लगत तखन अनेरे ने भोजखौक सभ भेल-गेलमे ओइ आत्माकेँ नर्क पठौत। मुदा जनकनन्दक भोज तँ से छेलैन नहि, ओ तँ रामानन्द भायकेँ शुभकामनाक छेलैन। तँए ऐठाम जँ भोज खाइबला शुभकामना छोड़ि अड़कच-बथुआ बाजत से की लक्ष्मणपुरक लोक बेकूफ अछि। एते खुशी तँ सबहक मनमे छेलैन्हे जे गामक धरतीसँ अकास टेकै धरिक खाम्ही गाममे बनि ठाढ़ भेला अछि।

तेसर दिन चारि बजे रामानन्द गामसँ विदा हेता। दुपहरक पछातियेसँ समाजक एका-एकी लोक शुभकामनाक संग रामानन्दकेँ अरियातै-ले आबए लगला। ओना, काजुल लोक जँ चारि बजे यात्रा करता तँ ओइसँ पनरह मिनट पहिने तैयारी करैमे लगता आ समयसँ पाँच मिनट पहिने पहुँचैक परियास करता, मुदा अकाजुल तँ बेरक चारि बजेक यात्रा-ले भोरेसँ सिंगार-पेटार नहि करत तँ ओकरा-ले ओ यात्राक सगुन की भेल। मुदा से नहि, रामानन्द भाय ट्रेनिंग कऽ चुकल छला, काज करैक ढंगमे नवपन आबि गेल छेलैन। दुपहरक पछातियेसँ समाजक शुभेझुकेँ देख-देख अपन यात्रा मन पड़ए लगलैन। मुदा ओ तँ चारि बजे हएत। तँए खुला देहक संग रामानन्द अपन शुभचिन्तकक शुभकामना ग्रहण कऽ रहल छला। समाजो तँ समाज छी, जखन बेटियोकेँ लोक धान, हरदी आ दूभिक खोंइछ भरि विदा करैत तखन बेटा तँ सहजे बेटा छी, तहूमे ओहन बेटा जे धरतीसँ उठि अकासक सोंगर बनि ठाढ़ अछि, तँए कियो नववस्त्र तँ कियो बटखरचा, भाड़ा लेल नगद-नारायण सेहो अरपनक संग अर्पित कइये रहल छेलैन।

घरसँ निकलैकाल रामानन्द भाय घर-जनसँ लऽ कऽ गाम-जन तक शुभेक्षुक रूपमे देख रहला अछि। सबहक सेवा सबहक कल्याण मनमे नाचि रहल छेलैन। सीमा टपबैत जहिना रामकेँ अयोध्यावासी अरियातलकैन तहिना रामानन्द भायकेँ लक्ष्मणपुरवासी अपन गामक सीमान धरि अरियाइत देने रहैन।

पान खेला पछाइत रामानन्द भाय पत्नीकेँ सोर पाड़लैन। ओना, सुलेखाक मन भीतरे-भीतर थौआ भऽ गेल रहैन, मुदा पदक अन्तिम सीढ़ीक रोब तँ अर्द्धमृतो जीवित छेलैन्हे। लगमे अबिते सुलेखा बजली-

किए एना डकबाहि केलौं?”

पत्नीक शब्दक स्वाद जेना रामानन्द भायकेँ कड़ुआएल बुझि पड़लैन मुदा जहिना चढ़न्त धारक वेग आ उतरन्त धारक वेगक गति बदैल जाइ छै तहिना रामानन्द भायकेँ हुअ लगलैन। मुदा एकटा नमहर जिनगीक भुक्त भोग तँ बनियेँ गेल छलातँए सोचैयो-विचारैक आ बुझबो-सुझबोक नजैर तँ बनियेँ गेल छेलैन। बजला-

दुनियाँमे हमरा-ले अहाँ सँ लगक दोसर कियो ने अछि, तँए अहाँकेँ एकटा बात कहए चाहै छी।

दर-दरसँ गुजरल रामानन्द भाइक मन अनुभूतिक संग अनुभव कऽ नेने छेलैन जे जिगनीमे चूक जरूर भेल, जँ से नहि भेल तँ एकतीस बर्ख पूर्वक समाज आइ किए कुद-रूप चेहरा देख भटैक गेल? पतिक कल्पित भाव बुझि सुलेखा अपन गुरुत्वक भाव जगबैत पुछलकैन-

की कहए चाहै छी?”

विस्मित होइत रामानन्द भाय बजला-

पदक मदमे समाजक संग भारी चूक भेल!”

सुलेखा बजली-

की चूक भेल?”

रामानन्द भाय बजला-

मन बोझिल अछि, काल्हि कहब।

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शब्द संख्या : 1584, तिथि : 9 जुलाई 2018

 

केकरो कियो ने

एक तँ ओहुना मधुबनी जाइसँ पहिने पत्नीसँ खूब रक्का-टोकी भेल। रक्का-टोकीक कारण छल एकटा मुकदमा। रक्का-टोकी होइत-होइत रका-टोकहुअ लगल। आ ओहो एते बढ़ि गेल जे दुनू परानी दू दिस भऽ गेलौं। माने ई जे पत्नी बजली-

हमरा एहेन ठाँठ महींस आकि ठाँठ गाए पोसैक जरूरत नइ अछि जे भरि दिन ओकरा पाछू लागल रहू आ दूधक बेरमे फूल सुँघा देत।

एक मानेमे पत्नीक विचार जँचल। जँचल ई जे गाए आकि महींस कियो पोसैए धनक उगाही बुझि।ओ भलेँ कम दुधगैर हुअए आकि बेसी ई दीगर बात भेल। मुदा साफे किछु ने हुअए ई तँ कनी कठाइन भइये गेल। मुदा पत्नी बाजल छेली एकटा केसक उदाहरणमे।

आइसँ तीस बर्ख पहिने गाममे दू गोरेक झगड़ाक पनचैतीमे पंच बनि गेलौं। ले बङौर!गुर केतौ आ पह केतौ पड़ि गेल! जइ झगड़े पनचैतीमे गेल रही ओकर चर्च पंच सभकेँ अबै दुआरे पछुआएले छल तइसँ पहिने गामक दोसर गप उखैड़ गेल। जेते गोरे पनचैतीमे पहुँचल रही तहीमे दू पार्टी बनि गेल। दू पार्टी जँ विचारे धरि रहैत तखन तँ कोनो बात नहि। गाम-घरमे एना होइते छइ। कोनो घटना गाममे किए ने हुअए, जहाँ-तहाँ दू गोरे–चारि गोरेक बीच कहा-कही होइते अछि, भलेँ ओइ कहा-कहीक कोनो कारगर परिणाम नइ निकलौ। मुदा एतए से नहि भेल। दुनू पार्टीक बीच हाथा-बाँही होइत थापर-मुक्का चलि गेल। धरमागती जँ पुछी तँ मारि बेसी हमरे पार्टी माने हम जइ पार्टीमे रही सएह सभ खेलक। मुदा बेकतीगत रूपमे हम बेसी हाथ चलेलौं, हाथ कि चलेलौं जे दुनू हाथमे ऑंगुरक मुक्का बान्हि बेसुमार चलेलौं जइसँ एक गोरेकेँ बेसी चोट लगि गेलै, वएह केस कऽ देलक, सएह केस आइ तीस बर्खसँ लड़ैत आबि रहल छी। लड़ैत की आबि रहल छी, मधुबनी जाइ-अबै छी। कहियो हाकिम नहि, तँ कहियो पेशकारक ह़ड़ताल, कहियो वकीलक वहिष्कार, तँ कहियो चपरासीक हड़तालक दुआरे कोर्ट लगबे ने कएल, जइसँ तारीक-पर-तारीक होइत-होइत आइ तीसम बरख बीति रहल अछि।

मासे-मास तारीक भेने परिवारक अनिवार्य खर्चमे, माने मासक बजटमे केसक खर्च साए रूपैआ जोड़ाइये गेल अछि। ओना, परिवारमे पाँच-दस, पचीस-पचास रूपैआक केते काज खगि जाइए से बरदास करैत आबि रहल छी।

पत्नीक प्रश्नक उत्तर देब जरूरी छेलएहे। जँ से नहि देब तखन तँ पत्नीक संग हारबे ने भेल। आ जखने घरमे पत्नीक जीत हएत तखने ने पुरुख-जुइतिक घर मौगी-जुइतिक भऽ जाएत वा पुरुखाह घर मौगियाह भऽ जाएत। आ जँ से हएत तँ गाम-समाजक मुँह रोकि देबै, कहबे करत किने- फल्लॉं घर मौगियाहक घर छी। मनमे कोनो ताले-मेल नइ बैइसए। पछाइत घाल-मेल करैत बजलौं-

केस-मोकदमाक हाल अहाँ थोड़बे बुझबैओ इज्जतक लड़ाइ छी, बिनु लड़ने केकरो इज्जत होइ छइ।

आमक गाछक सराइर हुअए आकि लत्तीक फोंकगर मुड़ी, ओकरा तोड़ि देने जहिना मुड़िये बदैल जाइए तहिना भेल। पत्नी बजली-

हमरा ऐ केससँ कोनो मतलब नइ अछि, सात गोरे फँसल अछि, जे गति ओइ छबोकेँ हेतै से हमरो हएत।

बजैक क्रममे तँ पत्नीक विचार नीक छेलैन्हे। किएक तँ सम्मिलित परिवार ने छी। दुनू गोरे मिलि कऽ ने ठाढ़ो केने छी आ आगू मुहेँ चलाइयो रहल छी। मुदा जँ केसक पैरवी छोड़ि देबै तखन तँ अनेरे गैर-हाजिरीमे वारंट हएत, जब्ती-कुर्की हएत! आजँ कहीं पुरान केस बुझि हाकिम फैसले लिखि देलैनतखन तँ सजो भऽ सकैए। तैकाल मे हमर साती पत्नियो पूरि पौती आकि अपने पुरए पड़त?

ओना, एते चलाकी दुनू परानीक गप-सप्पमे कइये नेने छेलौं जे पत्नीकेँ बेतुकार उत्तर नहि दए, कहने रहिऐन जे मधुबनीसँ ऐ बेरक तारीक केने अबै छी, तखन निचेनसँ दुनू परानी विचारि लेब।

अपने मधुबनीए-मे रही। जेठुआ लगन जखन एहेन अछि, तखन फगुआ मासक फागुनक लगन केहेन भेल छल से सभकेँ बुझले अछि। अपना बुझल नइ छल जे औझुका लगन अपनो लगल अछि, तँए थोड़े निचेन रहबे करी। आठ-नअ बजे रातिमे जखन घरपर पहुँचलौं तँ देखलिऐ जे सौंसे अन्हार पसरल अछि। घरमे एकोटा मनुख नहि। गुण अछि जे गाए-महींस नइ पोसने छी, एकटा जँ पीलिया कुत्ता अछियो तँ ओकरा-ले समाजे खुजल अछि। ओना, जखन दरबज्जापर पएर देलौं तखन ओ दरबज्जाक आगूमे अन्हारेमे बैसल छल। हारि-थाकि निर्णय केलौं जे अनका भरोसे लोक केते दिन जीब सकैए, से नै तँ भेल ते चारिटा रोटी बनाएब अछि। अनेरे तीमन-तरकारी बनबैक भाँजमे की पड़ब से नै तँ जखन अपने उपजौल तरकारी अछि, तखन किए ने ओकरा उसैनिये वा पकाइये कऽ पुष्टगरसँ चहटगर सन्ना बना ली। एते करब कोन असाध भेल।

तेसर दिन हहाएल-फुहाएल पत्नी धिया-पुताक संग नेने पहुँचली। बजलौं- लगन कटबए केतए गेल छेलौं?” 

पत्नी बजली-

बहिनक बेटीक सासुर। बिआह छेलइ।

मनक विचारकेँ मनेमे दाबि, मुँह बन्न कऽ लेलौं। किएक तँ मनमे आबि गेल- च-र-र-अ सरोकारे करहर मौसा।

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शब्द संख्या : 718, तिथि : 11 जुलाई 2018


 

[i]अबैबला

[ii]पत-पथिया

[iii]सरकारी नोकरी

 

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