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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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  • १. नारायण यादव- इमानदार चोर २. डॉ. बचेश्वर झाक २ टा आलेख

    नारायण यादव

    इमानदार चोर

    चोर-चोर मसियौत भाय। दूटा चोर एक पैघ व्यापारीक घरमे चोरी करबाक हेतु पहुँचल। दुनू चोरक नाम पनमा आओर मखना छल। दुनू चोरी करवाक कलामे निपुण छल। कतबो सतर्क घरक मालिक कियैक नहि होथि। मुदा जखन पनमा, मखनाक विचार ओहि मालिकक घरमे चोरी करवाक हेतैक तँ चोरी कइये लैत छल।

    ओहि इलाकाक सवसँ पैघ व्यापारी छल। ओकर नाम करोड़ीमल छलैक। पनमा, मखना करोड़ीमलक घरमे चोरी करवाक लेल पहुँचल। जखन करोड़ी मलक पहरेदार सुति रहल तखन निशा भाग रातिमे पनमा मखना व्यापारीक घरमे सेंध काटय लागल, सेंध काटल भय गेल। तखन मखना सेंघमे अपन दुनू पैर दय सेंघक जॉंच कयलक। पैरसँ ससेंघक अगिला भागक जॉंच कय, पुन: पैर वाहर कयलक। जखन ई बुझुना गेलैक जे आब घरमे पैइसवामे कोनो बाधा नहि होयत। तखन ओ सेंघक वाटे घरमे पैइसवाक प्रयास करय लागल। जखन ओ पूरा सिर सेंघमे देलक आकि देबाल नीचा धसि गेल। मखना देबालक तरमे दवा कय मरि गेल। पनमा कतबो प्रयास कयलक जे मखनाकेँ खिंची ली से नहि भय सकल। अन्तमे भोर भय गेल। पनमा दोसर दिन राजाक ओतय जा कय नालिश कयलक, राजाक ओतय फर्द वयान ई देलक जे राति हम सभ करोड़ी मलक घरमे चोरी करबाक हेतु गेल रही। हमर संगी सेंघ कटलक आ ओहिमे प्रवेश करबाक हेतु घुसल आकि देबाल धसि गेल आ हमर निर्दोश संगी मारल गेल। मालिक करोड़ी मलक कमजोर देबालक कारणेँ हमर संगी मारल गेल। हम सभ जावत चोरी नहि कयलहु तावत तक तँ निर्दोषे छलहुँ।

    चोरोक एक अजीब दुनिया होइत छैक। राजाक बुद्धिसँ चोरक बुद्धि पैघ होइत अछि।

    राजा पनमाक फर्द वयान (नालिशी) केँ स्वीकार कयलक। राजा चोकर नालिशीकेँ सुनवाई शुरू करय लगलैन्ह। राजा सिपाहीकेँ हुकुम देलैन्ह जे ओहि व्यापारीकेँ एतए उपस्थित करू।

    सिपाही राजाक आदेशानुसार ओहि व्यापारीकेँ न्यायालयमे बजाओल गेल। राजा व्यापारीसँ पुछलथिन्ह-

    सेठजी, अहॉंक मकानक दिवाल कमजोर कियैक छल जे एकटा निर्दोष चोर सेंघमे दवा कय मरि गेल?”

    व्यापारी वाजल-

    सरकार, चोर निर्दोष कोना छल?”

    ताहिपर राजा बजलाह-

    जावत चोर चोरि नहि कयने छल तावत तँ ओ निर्दोषे छल। चोरीक वादे ने ओ दोषी होइताह। चोर मरि गेल अहॉंक दिवालक कमजोरक कारणेँ तेँ हेतु अहॉंकेँ फाँसीक सजा भेट रहल अछि।

    व्यापारी बजलाह-

    सरकार, एहिमे हम कोनो दोषी भेलहु। हम तँ अपने मकान नहि वनौने छलहुँ। मकान तँ राजमिस्त्री वनौने छल।

    राजा बजलाह-

    हँ, अहॉं दोषी नहि छी, एहिमे राजमिस्त्री दोषी अछि। सिपाहीकेँ आदेश देलैन्ह जे व्यापारीकेँ छोड़ि दियौक आ ओकरा बदलामे राज मिस्त्रीकेँ फाँसी दय देल जाए।

    राजाक हुकुम सुनि सिपाही व्यापारीकेँ बरी कय देलक। आ राजमिस्त्रीकेँ पकड़ि राजाक दरवारमे उपस्थित कयलक। राजा बजला-

    राज मिस्त्री अहॉं केहेने दिवाल जोड़लहु जे एकटा निर्दोष चोर दिवालमे दवि मरि गेल। दिवाल कमजोर जोड़लाक जूर्ममे अहॉंकेँ फाँसी भेटल।

    राजमिस्त्री बजलाह-

    सरकार एहिमे हमर कोन दोष। हम तँ राजमिस्त्री थिकहु। गारा (मशाला) बनेनाई काम तँ हमर काज नहि अछि। हमर लेवर जे मशाला बना कय हमरा देत तकरे सने हम जोड़व। मशाला कमजोर बना कऽ दयलक तेँ दिवाल कमजोर भऽ गेल। एहिमे तँ हम निर्दोष छी। सरकार हमरा सन निर्दोष लोककेँ फाँसी दय कोन लाभ। फाँसी तँ दोषीकेँ देबाक चाही।

    राजा बजलाह-

    ई राजमिस्त्री ठीके कहैत छथि। राजमिस्त्रीकेँ छोईर दहक आ ओहि मजदूरकेँ फाँसी पड़वाक चाही।

    सिपाही लोकनि राजमिस्त्रीकेँ छोइड़ देलक आ ओहि मजदूरकेँ पकड़ि अनलक। राजा, मजदूरकेँ सामने बजौलक। राजा राजमिस्त्रीक बदला ओहि मजदूरकेँ फाँसीक सजा सुनौलक।

    मजदूर अपन सफाईमे बाजल-

    सरकार, एहिमे हमर कोनो दोष नहि, कियैक तँ जखन हम मशाला (गारा) सिमेंट-वालु) मे पानि मिला रहल छलहु तखन हमरा पाछॉंमे एकटा हाथी भरकि हमरा तरफ दौबल तँ पानि गाड़ा (मशाला)मे अधिक पड़ि गेल। तेँ महशाला गीला भय गेल आ तेँ दिवाल कमजोर भय गेल।

    राजा मजदुरक बात सुनि हाथीक महाउथकेँ बजाबक आदेश देलैन्ह। तुरंत सिपाही हाथीक महाउथकेँ बजौलक। आ आदेश पारित कयलक जे मजदूरकेँ माफ कय हाथीक महाउथकेँ फाँसी देल जा सकैत अछि। हाथीक महाउथकेँ फासी देल जा सकैत अछि। हाथीक महाउथकेँ अपन सफाई देबाक लेल कहल गेल। हाथीक महाउथ अपन सफाईमे बाजल-

    सरकार एहिमे हमर कोन दोष। हम हाथी लय कऽ आबि रहल छलहु ताहि बीच एकटा महिला झुनझूना बाला जेवर पहिर पहिर हाथीक वगलमे आयल। हाथी कंगनक आवाज सुनि भरकि गेल तँ एहिमे हम कतय दोषी भेलहु।

    राजाकेँ महाउथक बात ठीक बुझैल। महाउथ निर्दोष सावित भेल। आब महाउथक बदला ओहि महिलाकेँ दोषी मानलक। ओहि महिलाकेँ सिपाही राजाक दरवारमे उपस्थित कयलक। महिलासँ अपन सफाई देबाक आदेश भेल।महिला बाजलि-

    सरकार, एहिमे हमर कोन दोष। हम जे गहना पहिरने छलहु से तँ अपने नहि बनौने छलहु। ओ तँ हम बाजारक सोनारसँ खरीने छलहु। ई गलती तँ सोनारक छैक जे एहेन झुनझुनावाला गहना कियैक बनौलक। जे हम ओकरासँ खरीद कय पहिरलहु। ओ एहेन गहना नहि वनौतथि तँ हम झुनझुनावाला गहना नहि खरीदतहु आ नहि पहिरितहु। जँ ई गहना हम नहि पहिरतहु तँ हाथी नहि भरिकैत ने गाड़ामे अधिक पानि पड़ितैक आ ने सेठजीक दिवाल कमजोर होइतैक।

    राजा ओहि महिलाक वयानसँ सन्तुष्ट भेलाह। सैनिककेँ आदेश देलथिन्ह जे एहे महिलाकेँ बरी कय देल जाय आ एकरा बदलामे गहना बनौनिहार सोनारकेँ फाँसी देल जाय।

    तुरत सैनिक सोनारक खोजमे लागि गेल। गहिना बनौनिहार सोनारकेँ पकड़ि लौलक। राजाक सामने हाजिर कैल गेलैक।

    सोनारसँ राजा सफाई देबाक लेल कहलक।

    सोनारकेँ अपन बचावमे कोनो जवाब नहि फुरैलैन्ह। राजाक सामने सोनार दोषी सावित भेल। राजा सोनारकेँ फाँसिक सजा सुना देलैन्ह।

    एहि तरहे जल्लादकेँ सूचित कयल गेल जे सोनारकेँ फाँसीपर लटका दे कियैक तँ राजाक आदेश छलै जे हत्याक बदला हत्यासँ लेल जाय। जल्लाद सोनारकेँ लय फाँसीक फन्दा ओकरा गर्दनमे लगौलक आ रस्सीकेँ ऊपर तरफ खिचिलक। संयोग नीक छल जे बार-बार फाँसीक फन्दा सोनारक गर्दनमे लगाओल जाय आ जहॉं ऊपर खिंचल जाय तँ फाँसीक फन्दा सोनारक गर्दनमे सँ निकलि जाय।

    किछु देर ई सिलसिला जारी रहल मुदा सोनारक गर्दनमे फाँसीक फन्दा नहि टिकल। जल्लाद राजाक समीप पहुँचल तँ कहलक-

    सरकार, एहि सोनारक गर्दनमे फाँसीक फन्दा काम नहि करैत अछि। राजाक आदेश भेल मोट गर्दन वालाकेँ पकड़ि ला आ ओकरा फाँसी दय दहिन।

    आब दू गोट सिपाही मोटका गर्दन वलाकेँ खोजमे लागि गेल। किछु दूर गयलाक वाद एकटा मन्दरिपर बाबाजी चेला जकर गर्दन बड़ मोट छल तकरा पकड़ि लय गेल। बाबाजी चेला आ चेला गुरु किछु दिन पूर्वमे ओहि मन्दिरपर दोसर देशसँ आएल छल। चेलाक कथन छलैक ओ अपन गुरुकेँ कहलथिन्ह जे अपना सभ बर्त्तमान मन्दिरपर चलू कियैक तँ ओहि राजमे टके सेर भॉंजी आ टके सेर खाजा छैक। सस्ता मधुर खरीद ओ दुनू गुरु-चेला खाय लागल। यद्यपि गुरुजी ओहि मन्दिरपर जयबासँ रोकलक। मुदा चेलाक जिद्दपर ओहो राजी भय गेल छलाह। आब गुरुजी एकटा तरकीव सोचलक। ओ चेलाकेँ कानमे किछु कहलैन्ह। कहलैन्ह-

    जखन तोहरा गर्दनमे फाँसीक फंदा लगौतुन्ह तखन हम तोहरा गर्दनसँ फाँसीक फन्दा हम अपना गर्दनमे लगा लेव। जखन हम फाँसीक फन्दा लगवय लाव तखन हमरा गर्दनमे सँ फाँसीक फन्दा निकालि अपना गर्दनमे लगा लिहअ। ई शिलशिला तावत धरि चलय दिहक जावत राजा नहि पहुँच जाथि।

    राजाक सिपाही गुरुजीक चेलाकेँ पकड़ि राजाक दरवारमे उपस्थित कयलक। चेलाक संग गुरु सेहो दरवारमे उपस्थित भेलाह। राजाक हुक्मक आधारपर चेला जकर गर्दन वड़ मोट छल फाँसीक तख्तपर लय गेल आ फाँसीक फन्दा ओकरा गर्दनमे लगाओल गेल। एक, दू, तीनक आवाजक संग रस्सी खिंचत आकि गुरु दौड़ि कऽ ओहि तख्तपर पहुँच गेलाह। चेलाक गर्दनसँ फॉंसिक फन्दा अपना गर्दनमे लगा लेलक आ सिपाहीकेँ कहलक हमरा फॉंसी दिअ, एकरा छोइर दियौ। सिपाही सैह करय लागल। मुदा पूर्व नियोजित कार्यक्रमक अनुसार गुरु-चेला बेरा-बेरी गुरुक गर्दनिसँ चेला आ चेलाक गर्दनिसँ गुरु फॉंसीक फन्दा अपना गर्दनिमे लगावक हेतु प्रयासरत रहय लगलाह। एहि बातक सूचना सिपाही राजाकेँ देलैन्ह। राजा स्वयं आवि एहि गुरु-चेलाक कारनामाकेँ देखलैन्ह। ओ सिपाहीकेँ आदेश देलैन्ह जे फॉंसीक प्रक्रिया तावत बन्द करू जावत हम अगिला आदेश पारित नहि करी। राजा ओहि दुनू गरु-चेलाकेँ अपना लग बजौलैन्ह। आ गुरुसँ पुछलैन्ह जे अहॉं दुनू व्यक्ति एना कियैक फॉंसीपर झुलबाक हेतु तत्पर छी। गुरु राजाकेँ कानमे कहलक जे सरकार अखन एहेन मुहुर्त छैक जे फॉंसी फन्दापर झूलि जाइत ओ इन्द्र लोकक राजा होयत तेँ हम चाहैत छी जे हम फॉंसीपर झूलि आ जाहिसँ इन्द्रलोकक राज बनी औ चेला एहि मर्मकेँ जानैत छथि तेँ ओ इन्द्र लोकक राजा बनबाक आकांक्षा करैत छैथ। तेँ अपने निर्णय कय दीअ जे के इन्द्र लोकक राजा वनवाक योग्यता रखैत छथि।

    राजा सोचलक जे एहि छोट-छीन राज्यक राजसँ बढ़िया जे हमहीं ने कियैक इन्द्र लोकक राजा बनी। ओ सिपाहीकेँ आदेश देलैन्ह जे एहि दुनू गुरु-चेलाकेँ छोड़ि एहि नीक मुहुर्त्यमे हमरे फॉंसी फन्दापर झुला  दे। सिपाही एहि दुनू गुरु-चेलाकेँ बकसि देलक आ राजाकेँ फॉंसीक फन्दापर झुला देलक। गुरु-चेला राम-राम करैत अपना देश भागि कऽ चलि अयलाह।

     

    डॉ. बचेश्वर झाक २ टा आलेख

    मैथिलीक विकासमे नेपालक योगदान

    सन्दर्भ बोध- मैथिली साहित्यक उत्पत्तिक जनमानसक हृदयसँ भेल अछि तेँ एहिठाम जनमानसक हेतु मनोरंजक गीत काव्य ओ नाटकक प्रधानता रहल अछि। एहि कारणेँ मैथिली साहित्यक विकासधारा मिथिलहिटामे नहि प्रवाहित भेल प्रत्युत् मिथिलाक अतिरिक्त एकर प्रधानधारा उत्तर नेपालमे एवम् दोसर पुर्वांचल प्रदेशमे प्रवाहित भेल। जहाँ तक वास्तविकता छैक नेपाल आ मिथिलाक सम्बन्ध सदा-सर्वदासँ आबि रहल अछि। कर्णाट् वंशीय राजा हरि सिंह देव मुसलमान आततायी गयासुद्दीन तुगलकसँ पराजित भऽ मिथिलासँ भागि नेपाल गेला ओतहि राज्यक स्थापना कएल। मिथिलाक विद्वान लोकनि सेहो अपनाकेँ असुरक्षित बुझि नेपालेमे आश्रय लेलनि। नेपालक तत्कालीन राजा लोकनि मैथिल विद्वावनक बड़ सम्मान कएलनि। ओहिठामक राजा संगीत आ नाटकक विशेष प्रेमी छलाह। कला मर्मज्ञ मैथिल विद्वान अपना संग अनेको विषय-वस्तुक पाण्डुलिपि लेने गेल छलाह तेँ हुनका सभक समादृत हएब उचिते छल। संगीतसँ परिपूर्ण मैथिली नाटकक रचना नेपालक तत्कालीन राजा लोकनिक अवधिमे मैथिल विद्वान द्वारा भेल। यैह कारण जे नेपाल मैथिला विद्वान आ भाषाक केन्द्र भऽ गेल रहए।

    नेपालमे मैथिली भाषाकेँ राजकीय भाषा मान्यता भेटि गेल छलै। मुख्य भाषाक रूपमे मैथिली गनल जाइत छल। साहित्यक हरेक विधा एहिठाम अनुप्राणित भेल। एहुखन नेपालक तराई क्षेत्रमे मैथिली भाषी कए मिथिलाक संस्कृतिक स्पष्ट प्रभाव देखल जाइत अछि।

    नाट्यम् रसात्मक काव्यम् काव्य क्षेत्र तँ आरो चमत्कृत भेल। खास कऽ हृदय काव्यक भरपूर सामग्री नेपालमे ओरिआओल अछि।

    सातम् आठम् शताब्दीक वौद्धगानसँ लऽ कऽ जे क्रम नेपालक धरतीपर मैथिलीक विकास हेतु चलि पड़ल छलैक ओ मध्य कालमे आबि अति समृद्ध अवस्थामे देखल जाइ अछि।

    म.म. हर प्रसाद शास्त्री 1916 ई.मे सिद्ध साहित्यक अन्वेषण नेपाल मध्य कएल, जेकरा बंगला भाषाक प्राचीनतम साहित्य आनि वौद्धगान ओ दोहाक नामसँ प्रकाशित कएल।

    ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णरत्नाकरनेपालहिमे प्राप्त भेल। विद्यापतिक प्रमाणिक पदावली एतुक्के देन थिक।

    कर्णाट् वंशीय राजालोकनिक संग मल्लवंशीय राजा लोकनि सेहो मैथिली साहित्यक अनन्य प्रेमी छलाह। देखल जाइछ जे जय स्थित मल्लसँ लऽ कऽ रंजित मल्ल धरि एतए मैथिलीक सर्वांगीण विकास कएल। मल्लकालीन मैथिली साहित्यमे गीत तथा नाटकक प्रधानता रहल अछि। गीत काव्य भक्ति प्रधान अछि। भक्तपुर (भात गाँव)क राजा भूपतीन्द्र मल्ल (1687-1731) ई. राज्यकाल विष्णु, शिव आ भवानी आदिपरक शतश: मैथिली गीतक रचना कएने छलाह। एहिठामक रचित मैथिली गीतपर महाकवि विद्यापतिक रचनाक पूर्ण प्रभाव अछि। भाषा परिमार्जित एवम् सुललित देखल जाइछ-

    हे देवि!शरण राखूभवानी,

    तुअ पद कमल भ्रमर मोर मानस

    जनम जनम ईहो मानी।

    भूतीन्द्र मल नृप ईहो गाओल

    जय गिरिजा पति स्वामी।।

    मिथिलाक छिन्न-भिन्न भाषा, साहित्यक आकारकेँ सुरक्षित सम्वर्द्धित नेपालेक राजवंश द्वारा भेल। एहुखन नेपालक लाइव्रेरीमे अमूल्य ग्रन्थ ओ दुर्लभ ग्रंथ सभ ठेकनाओल अछि जे जीर्णवस्थाकेँ प्राप्त कएने अछि।

    विश्व साहित्यक पर्यालोचन कएलासँ स्पष्ट भऽ जाइछ जे साहित्यक समस्त प्रभेदमे नाटकक स्थान अति महत्वपूर्ण अछि। संस्कृतक आचार्य लोकनि काव्येषुनाटकम् रम्यम्क अन्तर्गत नाटककेँ अनेक विषयक दृष्टिए रमणीय कहि एकर सत्यतापर मोहर लगा देलन्हि। नाटकमे अनुकरणात्मक अभिनय दृश्यमान होइछ तेँ एकरा रूपक कहल जाइछ। उन्मेष युगक प्रमुख नाटक केन्द्र भक्तपुर बनेपा कान्तिपुर अछि।

    हरि सिंहदेवक नेपाल आगमनसँ इतिहासमे नाना प्रकारक परिवर्त्तन भेल तथा नेपाल आ मिथिलाक अनेक प्रकारक सम्बन्ध भऽ गेलैक। हरि सिंह देवक मृत्युक पश्चात् हुनक पुत्र मान सिंह देव तथा श्याम सिंह देव नेपालमे राज्य कएलन्हि। श्याम सिंह देव नेपालमे राज्य कएलन्हि। श्याम सिंह देवक कन्याक विवाह मिथिलामे भेल। एकर फल ई भेल जे मैथिल विद्वानक आदर सत्कार नेपालक राजदरवार एवम् अन्य विशिष्ट समाजमे बराबर होइत रहल। बादमे नेपालक मल्लवंशी राजाक पारिवारिक सम्बन्ध सेहो मिथिलामे भेल। एहिसँ मिथिलाक भाषाक प्रभाव नेपालपर नीक जकाँ पड़ल। मिथिलासँ विशिष्ट विद्वान, पण्डित, कवि, धर्मशास्त्री, संगीतज्ञ सभ नेपाल जाय लगलाह। मिथिलामे हुनका लोकनिक संरक्षणक सेहो कोनो व्यवस्था मुसलमान सवहिक निरंतर आक्रमणसँ नहि रहि गेल। इहए कारण भेल जे मैथिल विद्वान लोकनि मिथिलासँ मैथिली नाटकक बीज नेपाल लऽ गेलाह। मैथिली नाटकक जन्म वस्तुत: मिथिलामे भेल मुदा विकास नेपालमे।

    नेपालमे मैथिली नाटकक विकासक संक्षेपत: निम्नलिखत कारण भेल-

    (क)                       पारस्ववर्ती क्षेत्र होएबाक कारण मिथिला आ नेपालक सांस्कृतिक सम्बन्ध बरोवरि अछि।

    (ख)                      नेपाल सभ दिन हिन्दूराज्य रहल आ मिथिलामे सेहो हिन्दूत्वक प्रति मोह। नेपालक राजा एहिठामक विद्वान ओ पण्डितक सम्मान कएलन्हि।

    (ग)                        नेपालक मल्लवंश ओ मिथिलाक कर्णट् वंशक रक्त सम्बन्ध दूनू क्षेत्रक निवासीमे, भाषा आ संस्कृतिकेँ आओर निकट अनवामे सहमत भेला।

    (घ)                        मुसलमानी आक्रमणक कारणेँ एहि भू-भागक विद्वान आ पण्डित नेपाल जाय स्वस्थ चित्त भए सकलाह।

    (ङ)                        हरि सिंह देव एतए 1324 ई. गमासुद्दीन तुलकसँ पराजित भए नेपालमे भात गाँवक निकट अपन राज्य स्थापित कएलन्हि जे पाँच पीढ़ी धरि चलल। एहि कर्णट शासन कालमे कवि साहित्यकारक पर्याप्त आदर भेल।

    (च)                       मल्लवंशक राजा सभ सेहो मैथिल विद्वान, पण्डित, कवि संगीतज्ञ आदिकेँ सम्मानित करैत छलाह आ वसवाक हेतु पर्याप्त भूमि आ सम्पत्ति देलन्हि।

    (छ)                       मल्लवंशक शासनकालमे मैथिली नेपालक राज भाषा भए गेल तथा मैथिलीकेँ विकसित होएबाक अवसर भेटल।

    (ज)                       इतिहास साक्षी अछि जे मुसलमानी प्रभुत्वमे नाटक नहि विकसित भेल। हिन्दू राज्य नेपाल तकर नीक वातावरण प्रस्तुत कएलक।

    (झ)                       नाटकक विषय-वस्तु नेपाल आ मिथिलाक प्रचलित कथाक आधारपर लेल गेल।

    मल्लवंशक राजा जय स्थित मल्ल स्वयं बड़ कलाप्रिय छलाह। हिनक समय 1394 ई. धरि कहल जाइछ। हिनक पश्चात् मक्षमल्ल (1474) ई. धरि नेपालमे मैथिली नाटकक रचनाक कोनो पुष्ट प्रमाण नहि भेटैछ। मक्षमल्लक पश्चात् नेपाल तीन भागमे विभक्त भऽ गेल आ तीनटा राजधानी भात गाँव, बनिकपुर तथा कान्तिपुर आ ललित पाटन आ काठमाण्डू स्थापित भेल। एहि तीनू राज्वंशक राजा लोकनि स्वयं नाटकार छला तथा ओ लोकनि कवि एवम् नाटककारकेँ प्रश्रय देलन्हि। विभिन्न अवसरपर नाटकक अभिनयक आयोजन करबैत छलाह। नाटककेँ रचनिहारकेँ प्रोत्साहन दैत छलाह।

    भाग गाँव शाखामे विश्व मल्लक समय (1533) मे नाटकक बहुत विकास भेल। प्रसिद्ध नाटक विद्या विलापक रचना ओही समयमे भेल।  एहि नाटकक अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सेहो विद्या विलापनाम विधा सुन्दर नामसँ कएल। जगज्योर्तिमल्ल (1618-1833) राज्यकालमे मैथिली नाटक खूब विकसित भेल। हिनक राज्यकालमे मुदित कुवलमश्व वंशमणिक लिखलन्हि। हर गौरी विवाह एवम् कुंज  विहारी नाटक सेहो कम प्रसिद्धि नहि पओलक। हिनक पौत्र जगत्प्रकाश मल्लक समयमे छौटा मैथिली  नाटक लिखल गेल। उषाहरण, नलीय नाटकम्, पारिजात हरण, पार्वती हरण, मलय गन्धिनी एवम् मदन चरित्र। सुमति निता मित्र मल्ल स्वयं एक पैघ नाटककार छलाह जनिक लिखल आठ गोट नाटक भेटैत अछि। हिनक पुत्र भुपतीन्द्र मल्ल स्वयं कवि छलाह जनिका समय चौदहटा रचना भेल रंजित मल्लक समयमे तँ चरम सीमापर नाटकक रचना पहुँच गेल छल ई मल्ल वंशक अन्तिम राजा छलाह। 1921 ईस्वीमे मल्लवंशक अन्तिम राजा रंजित मल्लक समयमे (1921) मैथिली नाटक रचना एक प्रमुख बात थिक।

    नेपालमे शहवंशक उदय आ एकीकरणक पश्चात् भाषाक नामपर गौण काज लेल अछि। गोरखा बोलीक प्रभावमे पड़ि मैथिली तँ लग-भग मेटाय गेल। खाली नाच, गीत कतहु-कतहु लेखन आदिमे एकर रूप सुरक्षित रहलैक। राणाकालीन नेपाल भाषा साहित्यक हेतु अन्धकारक युगक रूपमे मानल जाइत अछि। मैथिलीक अवस्था तँ नेपालमे विचारणीय रहल।

    2007 सालक मुक्ति राणा शासनसँ आ बादमे 2017 साल धरि उथल-पुथलक समय होएबाक कारणेँ मैथिलीक विकास हेतु नेपालमे कोनो ठोस काज नहि भऽ सकल। 2014-16 सालमे एकटा नव जागरण पत्रक एक मात्र अंकक प्रकाशन संतोष दिया सकैत अछि। 1960 ई.क बाद कनेक स्थिरता तँ आएल मुदा सरकारी संरक्षणक अभावमे गत 30 वर्षमे जतेक साहित्यिक काज होएबाक चाही ओ नहि भऽ सकल। कोनो साहित्यानुरागी आ पिपासु मोनकेँ आ अहलादित करएबला सामग्रीक अभाव सदैव खटकैत रहल तथापि एहि अवधिमे जे किछु भऽ सकल अछि तकर साहित्यक विधागत लेखा-जोखा कएल जा सकैछ।

    आधुनिक काल : मध्यकालीन मैथिली साहित्यक जएटा उपलब्धि अछि से आधार स्तभक रूपमे मानल जाइछ। मुदा नेपालमे मैथिली साहित्यक सम्पूर्ण काज 1960 ई.क बादे भेल जकरा हमरा लोकनि आधुनिक कालक प्रारंभ मानि कऽ चलैत छी।

    एहिसँ पूर्व पचासेक दशकमे पं. सुन्दर झा शास्त्री अपन मूल जन्म स्थान दरभंगासँ मैथिली लेखकक रूपेँ प्रतिनिधित्व करैत छलाह। गलीक कुकुर आदि एखनो दरबार नै खुजलैए सन रचना करैत छलाह।

    पं. जीवनाथ झा सेहो अपन प्रवन्ध काव्य आदि रचनासँ प्रतिष्ठित भऽ चुकल छलाह। वस्तुत: जनकपुरमे पं. जीवनाथक प्रवेश एतुक्का वातावरणमे साहित्यक प्रति अनुराग जगौलक आ ओ साहित्यक गुरुजीक रूपमे सर्वत्र चर्चित भेलाह। डॉ. धीरेन्द्र साठिक बाद जनकपुरमे आधुनिक मैथिलीक शुरूआत कएलन्हि। ओ एहिसँ पूर्व मैथिली लेखकक रूपमे प्रतिष्ठित भऽ गेल छलाह। 1962 ई.मे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन नेपालक मैथिली सहित्यक इतिहास लिखलन्हि, जाहिमे प्राचीन साहित्यक रूपमे चर्चा भेल अछि ओतेक आधुनिक कालक साहित्य हल्लुक प्रतीत भेल अछि। तेँ हिनकासँ तुलनात्मक दृष्टिए डॉ. जयकान्त मिश्रक इतिहास लेखन श्रेष्ठतर अछि। पहिल कारण तँ एक दशकमे साहित्य लेखन ओतेक समृद्ध नहि छल। दोसर सूचनागत त्रुटि सेहो प्रफूल्ल सिंहकेँ भेलन्हि।

    आब तँ तीन दशकमे किछु-किछु एहन रचना सभ भेल अछि जकरा आंगुरपर गनल जा सकैत अछि।

    प्रवन्ध काव्यमे पं. रमाकान्त झाक व्यथाडॉ. धीरेन्द्रक त्रिपुण्डपं. मथुरानन्द चौधरी माथुरक खण्ड काव्य त्रीशूलीप्रमुख अछि।

    मुक्तक काव्यमे डॉ. धीरेन्द्रक हैंगरमे टाँगल कोटकरूणा भरल ई गीत हमरराम भरोस कापड़ि भ्रमरक बन्न कोठरीमे औनाइत धुँआ, नहि आब नहि, मोमक पिघलैत अधर, अपन्न-अनचिन्हार, विनोद चन्द्र झाक कृषक बाला, पं. शुभ नारायण झाक यंत्रणा’, पं. सुरेश झाक मैथिली रस कलश काव्य प्रमुख कृति देखना जाइछ। पं. झा मैथिली गीता सेहो लिखने छथि। चन्द्र शेखर झा शेखरक हम नेपाल हमर नेपालीकविता संग्रह आएल अछि।

    अनुवाद विधा : नेपालक कतिपय साहित्यकार विभिन्न रचनाक अनुवाद मैथिली भाषामे कएलनि अछि, जे हुनक मैथिली प्रेमक प्रतीक थिक। यदुवंश लाल चन्द्र सप्तरी जिलाक तिलाठी ग्रामवासी द्वारा उसैको लागिक चॉंदनी साहक रचनाकेँ लोकेश्वर व्यथित, पं. कृष्णा प्रसाद उपाध्यायक द्वारा विद्यापतिक पदावलीक, डॉ. धीरेन्द्रक उमर खैयानकमहाकवि भनुभक्तक रामायण मैथिलीमे अनुवाद कऽ वद्रीनायण वर्मा अद्भुत कएल अछि। प्रकाशनक बाटपर अछि पं. सूर्यकान्त झाक मेघदूतक, डॉ. रमेश द्वारा सात जापानी कथा अनुवाद मैथिलीमे चमत्कारी प्रयास थिक।

    कथा-उपन्यास आ साक्षात्कार विधा : वस्तुत: नेपालमे मैथिली कथाक क्षेत्रमे सेहो नीक काज भेल अछि। किछु प्रतिबद्ध कथाकारक संग्रह एखन धरि समक्ष नहि भेल अछि तेँ छुछुन्न लगैत अछि। एखन धरि प्राप्त कथा संग्रहमे डॉ. धीरेन्द्रक कूहेश आ किरण’, ‘पझाइत धूरक आगि’,‘शतरूपा आ मनु राम भरोस कापड़ि भ्रमरक तोरा संगे जयवो रे कुजवा, रेवती रमण लालक पाधवनहि एलाहमधुपुरसँ प्रमुख अछि।

    डॉ. धीरेन्द्रक सम्पादनमे नेपालक प्रतिनिधि गल्प संग्रह, प्रो. सुरेन्द्र लाभक संपादनमे नेपालीय मैथिलीक उत्कृष्ट गल्प प्रकाशित भेल अछि।

    उपन्यास : एहि विधामे श्यामाझाक बिनु माइक बेटी’, कुमरकान्तक सेहन्ताक अतिरिक्त एम्हर डॉ. धीरेन्द्रक भोरुकवा, कादो कोयला, ठुमुकि चल, पाठककेँ सेतोष दैत अछि।

    साक्षात्कार : साक्षात्कार विधामे रेवती रमण लालक साक्षात्कार एक मात्र पोथी अछि, ओना एहि क्षेत्रमे राम भरोस कापड़िक नीक काज सभ भेल अछि। जकरा अनतर्गत अश्रेय, केदारनाथ व्यथित, विजय मल्ल, मातृका प्रसाद कोइरालाक साक्षात्कार खूब चर्चित भेल अछि।

    नाटक : एहि विधामे आधुनिक नाटककारमे महेन्द्र मलंगिया लेखनमे भिड़ल छथि। प्रारंभिक रचना लक्ष्मण रेखा खण्डित’, जुआएल कन-कनी, ओकरा आंगनक बारह मासा, टूटल तागक एकटा छोर, एकांकी संग्रह हुनक प्रमुख पुस्तकाकार छन्हि। काठक लोक फिलहाल चर्चामे आएल अछि। देहपर कोठी खसा दिअआलुक बोरी सन बहुतो रेडियो रूपक ओ लिखने छथि। एकांकी लेखकक रूपमे डॉ. धीरेन्द्र, राम भरोस कापड़ि, डॉ. लक्ष्मण शास्त्री, श्याम सुन्दर शशि, ललनक प्रमुख स्थान अछि।

    निवन्ध समालोचना तथा संस्मरण : एहि विधामे प्रो. ब्रज किशोर ठाकुरक अध्ययन ओ विवेचन छोड़ि आन रचना पुस्तकाकार रूपमे नहि आबि रहल अछि। ओना, डॉ. धीरेन्द्रक साहित्य सम्बन्धी, भ्रमरक लोक संस्कृति सम्बन्धी, डॉ. विमलाक साहित्य सम्बन्धी महेन्द्र मलंगियाक, रेवती रमण लालक राजेन्द्र किशोरक विविध सामयिक निबन्ध सभ प्रकाशित भेल अछि।

    यात्रा संस्मरण : एहि विधामे राम भरोस कापड़ि भ्रमरक अत्यन्त महत्वपूर्ण रचना आएल अछि। प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौनक, रेवती रमण, श्याम शशि सेहो एक दिस संलग्न छथि। समालोचना संग्रहमे राम भरोस कापड़ि भ्रमरक सम्पादनमे नेपालक मैथिली पत्रकारिता आएल अछि।

    पत्र साहित्य : 2025 सालसँ प्रारम्भ भेल नेपालक सामयिक संकलन युग आब एकटा ठोस रूप लऽ चुकल अछि। प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौनक सम्पादनमे मैथिली विराटनगरसँ डॉ. हरिदेव मिश्रक सम्पादनमे ईजोत काठमांडूसँ, पं. सुन्दर झा शास्त्रीक सम्पादनमे फूल-पात काठमांडूसँ, वाणीक हिलकोर जनकपुरसँ संगहि दुविधान एतहिसँ एम्हर 2019 सँ राम भरोस कापड़िक सम्पादनमे गाम-घर साप्ताहिक निरन्तर प्रकाशित भऽ रहल अछि। अर्चना द्वैमासिक गत 16 वर्षसँ प्रकाशन आ ऑंजुरआब मासिक रूपमे प्रकाशित भऽ रहल अछि। नेपाली भाषी साहित्यकार द्वारा मैथिली साहित्य सेवामे डॉ. कृष्णा प्रसाद उपाध्यायक नाम आदरसँ लेल जा सकैछ। ओना, हिनके भाइ डॉ. लक्ष्मण शास्त्री तँ अद्भुत काज कएलनि अछि। ई अपन दू गोट पोथी दऽ एक धर्म काव्य युधिष्ठीर महाकाव्य आ दोसर धीकताम् गीत काव्य। रामेश्वर प्रसाद अर्याल द्वारा रचित शिव-मधुक भाग्य रेखा नामक कथा काव्य देखि पड़ैत अछि। फुटकर रचनामे मनुव्राजकी, केवेर धिमिरे, जगदीश धिमिरे आदि प्रमुख छथि।

    उपसंहार वा निर्णयात्मक बिन्दु : एहि तरहेँ विभिन्न विधामे गत तीस वर्षसँ भेल विकासक रूप रेखा पूर्ण संतोष तँ नहियेँ दैत अछि मात्र आशा टा जगबैत अछि। विकासक संभावना नीक छैक। अवसर पाबि चिक्कन काज कऽ सकैछ। नेपालमे संवैधानिक राजतंत्रक अन्तर्गत पूर्ण प्रजातंत्रक बहाली भेलासँ भाषा विकासक गति अपना ढंगसँ संचालित कएल जा सकैछ। राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठानसँ सरकारमैथिली विभाग खोललक अछि जाहिसँ किछु महत्वपूर्ण रचना सभक प्रकाशन होएब सम्भव थिक। खास कऽ मैथिली साहित्यक इतिहास, शब्द कोषओ विधागत संग्रह प्रमुख रहत। तहिना अनुसंधानक हेतु विद्वत वृतिक संभावना सेहो छैक जाहिसँ सरकारी वा नीज पुस्ट सामग्रीमे सुरक्षित मैथिलीक पुरना महत्वपूर्ण पाण्डूलिपिक उद्धार कएल जा सकैछ। सम्पूर्ण मैथिली संसारक हेतु अपन रचनासँ योगदान पहुँचेबाक लेल एहिठामक साहित्यकार तल्लीन छथि।

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    मैथिली साहित्यक अवदान

    मिथिला भाषा रामायण

    चन्दा झा

    कविवर मैथिली साहित्याकाशक चन्द्र थिकाह। मैथिली साहित्यकेँ अपन शीतल ज्योत्सनाक अमर वरदान देलन्हि। इएह कारण थिक जे ओ मैथिलीक महान् कविक रूपमे समादृत होइत आधुनिक मैथिली साहित्यक जनक मानल जाइत छथि। वस्तुत:विद्यापतिक पश्चात् इएहटा कवि भेलाह जे मातृभाषाक वास्तविक महत्व बूझि ओकर विकासक दिशामे प्रयत्नशील भेलाह।

    उन्नैसम शताब्दीमे पुन: कवीश्वरे जनभाषाकेँ काव्य भाषाक रूपमे मण्डित कैलन्हि तथा अपन सशक्त लेखनीसँ अनवरत साहित्य सृष्टिमे योगदान दैत मातृवाणीक अर्चनामे सुवर्ण वर्णावलीक उपहार चढ़बैत रहलाह। हिनक वहुमुखी प्रतिभा, प्रगाढ़ पाण्डित्य, साहित्यक रूचि, पुरातत्व-प्रेम एवम् दीर्घ जीवन विविध प्रकारेँ मैथिली साहित्यक सम्वर्द्धनमे सहायक सिद्ध भेल। हिनक जन्म सन् 1931 ई.मे सप्तमी वृहस्पतिकेँ दड़िभंगा जिलाक पिण्डारूछ गाममे भेल छल। प्रारम्भिक शिक्षा मातृक बड़ गाँव सहरसा जिलामे भेल। बादमे संस्कृतक उच्च शिक्षाक हेतु पवित्र नगरी काशी गेलाह। काशीसँ प्रत्यागत भेलापर पाण्डित्यक अतिरिक्त हुनक कवित्व शक्तिक यशोवल्लरी चतुर्दिक पसरए लागल। बाल्यकालहिसँ प्रतिभापूर्ण प्रतीत भेलाह।

    मिथिला भाषा रामायणक मूल प्रेरक स्व. महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह छलाह। मातृभाषा मैथिलीमे धर्म ग्रंथक अभाव खटकलैन्ह। चन्दा झा शिवक समर्पित भक्त छलाह। शिवक प्रिय राम तेँ भक्ति भावना हुनक साहित्यक कृतिक विधा थिक। मातृभूमि ओ मातृभाषा प्रेमक पुष्पाञ्जलि दय ओ अपन काव्य देवताक अर्चना कैलन्हि। एहि दृष्टिए मिथिला भाषा रामायण हुनक सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रिय कीर्त्ति थिक। चन्दा झाक नामोल्लेख मात्रसँ हिनक रामायणक उद्घोष होइछ। ग्रन्थक नाम करणेसँ मिथिला-मैथिलीक प्रति कविक सहज अनुरागक परिचय भेटैत अछि। प्राय: ई शौभाग्य कोनो आन ग्रंथकेँ नहि हएत जेकर प्रत्येक शब्दपर विद्वत मण्डली विचार कएने हो तथा जे पाण्डित्यक कसौटीपर परिशुद्ध प्रमाणित भेल हो।

    रामायण भारतीय वाङमय केर आदर्श कृति थिक। देशक चारित्रिक आदर्शकेँ अनुप्राणित करबाक लेल राम चरितक अवतार मैथिलीमे आवश्यक छल। वस्तुत: जाहि सांस्कृतिक संघर्षक युगमे चन्दा झाक आर्विभाव भेल छल तकर ई अनिवार्य प्रतिक्रिया छल। कवीश्वरक एहि कृतिक केँ सर्व प्रथम महा काव्यो हैबाक सौभाग्य प्राप्त छैक। चन्द्र कवि जहिना काव्यात्मकतामे बाल्मीकि तहिना रचना करबामे प्रमुख। चन्दा झाकेँ युग जागरणक प्रतीक मानल जाइछ। ओना तँ मिथिला भाषा रामायणक मूलाधार थिक अध्यात्म रामायण मुदा अटूट श्रद्धाक कारणेँ मौलिकताक निर्वाहमे त्रुटि नहि होए देल अछि। विशेष कय मिथिलाक वर्णन, लक्ष्मण-परसुराम सम्वाद, लंका दाह वर्णन, राम अंगद-सम्वाद आदि कतेक स्थल अछि जतए कविक मौलिक प्रतिभा स्फुट भेल अछि, तथा मनोरम सिद्ध भेल अछि। वभिन्न रसक प्रयोग लेल राम कथाक महत्व सर्वोपरि अछि तहिना भाव प्रकाशनक क्रममे विविध अलंकारक प्रयोगसँ ओ एकर कला पक्षकेँ समृद्ध बनौने छथि। एतए स्पष्ट अछि जे रामायण मूलत: भक्ति काव्य थिक। मिथिलाक गौरवक गुणगान नहि बिसरलाह अछि रामक मुँह कहबैत छथि-

    सत्य तिरहुति यज्ञभूमि पुण्य देनिहारि,

    शास्त्रकेँ बजैत बेर कीर बैसि डारि-डारि।

    पुन: सीताक चरितक प्रसंगमे ओ एहि विषयकेँ नहि बिसरल छथि जे सीता मिथिलाक बेटी छलीह। सीता स्वयं कहलैन्ह-

    जनक जनक जननी अवनि,

    रघुनन्दन प्राणेश

    देवर लक्ष्मण हमर छथि,

    नैहर मिथिलादेश।

    एकर भाषा ओ शैली माधुर्य जन साधारणकेँ आकृष्ट कएलक। ओ शीघ्रहि विद्वानसँ लऽ कऽअशिक्षित समाज मध्य ई प्रिय भए गेल। एहि गंथक अध्ययनसँ मैथिली विद्वानकेँ अपन मातृभाषाक गौरव ओ गंभीरताक ज्ञान भेलन्हि। एहि क्रममे देखब जे अशोक बाटिकाक वन्दिनी सीताकेँ अपन विपन्न जीवनसँ विशेष कठोर बचन कहबाक भनस्ताप छन्हि जे मनो वेदना विगलित भए उठल अछि- हे रघुनाथ! अनाथ जकाँ दश कंठकपूरी हम आइलि छी सिंहक त्रास महावनमे, हरि नीक समान  हेराय छी।

     

    ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

     

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