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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक 

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२१.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 

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जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’                               

आँखिमे चित्र हो मैथिली केर

                      ( आत्मकथा )

                १५. आगिक बाद आगि  

बच्ची किछुए दिनमे हमरा परिवारक आवश्यकताक अनुरूप अपनाकें बना लेलनि |

माएकें काजुल पुतोहु भेटि गेलनि | गृहस्थ परिवारक काजसँ पूर्ण परिचित छलीह बच्ची | नैहरमे माए,बाबू,दू टा भाए,दू टा भाउज,चारिटा  भातिज आ एकटा भतीजीक संग छलीह, एत’ सासु,ससुर,पति, छओ आ चौदह  बरखक दू टा दीय’र आ एकटा विवाहित ननदिक बीच प्रसन्न रहब जल्दी सीख गेलीह |     

अगिलगीक दुख क्रमशः कम होइत गेलै | जीवन सामान्य हुअ’ लगलै | हिनक पढाइ-लिखाइक लेल जे किछु सोचने रही, से स्थगित भ’ गेल  | हम यथास्थितिकें स्वीकार क’ लेलहुँ  आ अपन नोकरीक प्रतीक्षा करय लगलहुँ |

एक दिन अपन दरबज्जापर हम एसगर बैसल रही | पछ्बाइ टोलक बटोही कका कतहुसँ  जा रहल छलाह | ह्मरा सोर पाड़लनि | कहलनि, अहाँक घराड़ीक सटले  पूब खेत बिका रहल छै, अहाँकें कोनो व्यवस्था हुए त’ सामनेबला सबा दू कट्ठा भेटि सकैए, बिचारिक’ जल्दी कहू, ने त बिका जेतै |

एकटा नव समस्या सोझाँमे उपस्थित छल, बिनु समस्याक समस्या | हम सोचय  लगलहुँ, हमरा बैंकमे नोकरी त भेटबे करत, कते देरी हेतै, दू मास...चारि मास यैह ने | हम एखन कोनो तरहें जँ  पाइक व्यवस्था क’ लै छी त खेत कीनि सकैत छी | समाधान छनि बच्ची लग | जँ  हुनक गहना बन्धक ध’ क’ पाइक व्यस्था क’ लै छी त संभव अछि, अन्यथा नहि | घराड़ीबला जमीन छै, तें ल’ लेब जरूरी लागल |

हमरा मोन पडल, दू साल पहिने  ई गहना बन्हकी  ध’ क’ छोट बहिनक विवाहमे उपयोग केने रही, बादमे पौधा संरक्षणमे नियोजित भेलापर एक बेर छओ मासक पाइ भेटल त गहना छोड़ा लेलहुँ  |

हम बच्चीसँ  पुछलियनि ओ तैयार भ’ गेलीह | हम बाबूकें कहलियनि सभ बात | ओ पुछ्लनि जे ककरा नामे लिखबिऐ | हम हुनका अपने नामपर लिखा लेब’ कहलियनि | सैह भेलै | गहना मधुबनीमे बन्हक  राखल गेल | दू कट्ठा सबा पाँच धुर  खेत पुबाइ टोलक बुधन ठाकुरसँ  बाबूक नामपर 08.05.1974 क’ मधुबनीमे  रजिस्ट्री भेल | हमर पड़ोसीक सामनेबला खेत ओ  लिखौलनि |

बच्चीकें विश्वास रहनि जे पहिने जकाँ फेर सातो अठन्नी हमरा लग वापस आबि जाएत, जँ  हुनका बूझल रहितनि जे आब ई गहना हमरा वापस नहि भेटत, त ओ एत्ते आसानीसँ अपन पेटीसँ निकालिक’ सहर्ष नहि दीतथि | ओ नहि जनैत रहथि जे ओ गहना आब माटिमे परिवर्तित भ’ गेल अछि |

हमहीं कहाँ जनैत रहिऐक जे हमरा नोकरी भेटबामे एत्ते देरी भ’ जाएत आ  परिवारक स्थितिक कारण हमर प्राथमिकतामे गहना नहि रहि जाएत  |

क्यो नहि जनैत रहै जे देशक स्थिति एहेन भ’ जेतै, उत्तर प्रदेशक चुनावमे  इन्दिरा गांधी एहेन नेताक जीतकें राजनारायण द्वारा चुनौती देल जेतै, इलाहाबाद हाई कोर्ट हुनक जीतकें अबैध घोषित क’ देतै, प्रधान मन्त्री इन्दिरा गांधीसँ  इस्तीफ़ा मांगल जेतै, सौंसे देशमे हंगामा शुरू भ’ जेतै आ प्रधान मन्त्री द्वारा इस्तीफ़ा देबाक स्थानपर देशमे आपातकाल लागू भ’ जेतै आ बैंकमे बहाली सेहो स्थगित भ’ जेतै |

क्यो नै जनैत रहै, मुदा सभ भेलै |

नोकरीक प्रतीक्षामे मास पर मास बीतल चल गेल |

हम एक बेर सेंट्रल बैंकक क्षेत्रीय कार्यालय मुजफ्फरपुर गेलहुँ पता लगब’ | एकटा झाजी छलाह ए.एफ.ओ.| कहलियनि, हमरा सेलेक्शन भेना दस मास भ’ गेल, एखन धरि बहालीक चिट्ठी नै भेटल अछि | झाजी मुस्किआइत कहलनि,ठीक कहै छी, दस मासमे त बच्चो भ’ जाइ छै | झाजी एते कहिक’ अपन काजमे व्यस्त भ’ गेलाह |

हम यूनियनक सेक्रेटरीसँ  सम्पर्क केलहुँ, ओ ककरोसँ गप केलनि, हमरा कहलनि, टाइम लगेगा मगर होगा निश्चित ये भरोसा रखिए |

हमरा सचिव महोदयक वचनपर भरोस भेल, घर एलहुँ  आ जहिना प्रतीक्षा करैत छलहुँ, तहिना फेर प्रतीक्षा कर’ लगलहुँ |

घर, कैटोला चौक,मधुबनी वाचनालय यैह हमर ठेकाना छल |

हमर गामक मुखियाजी एकदिन परम शुभचिन्तक जकाँ बुझौलनि, विद्यार्थी, एना गाममे निश्चिन्त भ’क’ बैसलासँ आइ के समयमे  नोकरी नै हैत, नोकरी बिना दौड़-धूपके नै होइछै, एक बेर पटना जाउ, एम एल ए सँ भेंट करू, मुख्य मन्त्रीसँ भेंट करू, जरूरत हेतै त हमहूँ जैब, कोना ने हेतै मुदा  एना बैसलासँ त बैसले रहि जाएब |

हम निश्चिन्त रही जे नोकरी भेटबे करत, सभकें छोड़िक’ खाली हमर बहाली क’ देतै से त संभव नै छै | मुदा मुखियाजी एहि सभकें  फ़ालतू बात बुझै छलाह | हमर पिताजीकें सेहो कहलखिन | हमर पिताजी  सेहो मुखियाजीक सुझावपर मोहित भेलाह | अंततः पटनाक प्रोग्राम बनल | हमर परोसी अमिरीलाल ठाकुर ( हुनको लोक सभ मुखियाजी कहैत छलनि ) सेहो अपन जेठ बेटाक नोकरी लेल प्रयासमे मुखियाजीक संग भेलाह |

पटना गेलहुँ | शफीकुल्लाह अंसारी, कांग्रेसक एम एल ए साहेब सँ  भेंट केलहुँ | एकटा कागजपर संक्षेपमे लिखिक’ देब’ कहलनि | देलियनि | कहलनि, मुख्य मन्त्री महोदय से बात करता हूँ, वो अगर बुलाएंगे तो बताऊंगा तब जाइएगा मिलने |

साँझमे एलाह त कहलनि, उनका कहना है कि बैंक के मामलेमे हमलोग कुछ नहीं कर सकते हैं, सिलेक्शन हो गया है तो देर-सबेर नोकरी तो मिलेगी ही |

मुखियाजी कहलनि, चलू आब मोनमे ई नहि ने हैत जे प्रयास नै केलियै आ मुख्य मन्त्री महोदय कहि देलनि तखन चिन्ता करबाक काज नै छै |

घर आबि फेर हम ओहिना नोकरीक लेल प्रतीक्षा कर’ लगलहुँ जेना पहिने करैत रही |

खेत कीनब एखन हमर परिवारक आवश्यकता नहि छलैक | परिवारक आवश्यकता छलैक पाँच-छओ आदमीक जलखै, भोजन,कपड़ाक खर्च,समय-समयपर पाहुनक उचित सत्कार,सर-कुटुम्बमे आवश्यकतानुसार समय-समयपर भार-चंगेराक व्यवस्था, समय-समयपर ब्राह्मण-भोजनक व्यवस्था आदिमे आवश्यक खर्चक लेल टाकाक जोगार |

ई जोगार हथपैंचसँ  शुरू होइत-होइत खेत भरना तक जाइत छल |खेतक उपजासँ  तीन-चारि मासक  काज चलैत छल | फेर खेतीक लेल वैह जोगार होइत छल | टोलमे दू-तीन घर छोड़िक’ सभ घरक स्थिति मोटा-मोटी एहने छलै |

एहनो स्थितिमे मूड़न, उपनयन,विवाह,श्राद्ध,बरखी आदि काजमे लोक नीक भोजनक व्यवस्था करिते छल चाहे एहि लेल खेत भरना देब’ पड़ै अथवा बेच’ पड़ै |

भोजेमे अथवा वरियातीमे लोककें जी-भरि  नीक-निकुत खेबाक मौका भेटैत छलैक | तें लोक भोजक नामपर सब तरहक सहयोग देबा लेल तैयार रहैत छल | श्राद्धक भोज दू दिन होइ छलै, तें एकर आकर्षण बेशी छलै | भोज लोककें एतेक आकर्षित करैत छलै जे कोनो बृद्ध लोककें देखिते लोकक सोझाँ दू दिनक भोजक दृश्य उपस्थित भ’ जाइ छलै-पूड़ी-जिलेबी,खाजा-मुंगबा, रंग-विरंगक तड़ुआ-तरकारी आ चटनी, ब’ड़-ब’ड़ी, दही-चिन्नी-सकरौड़ी आदिक संग हाथ जोड़ने पाँते-पाँते घुमैत कर्ताक विनीत भाव- ‘अपने लोकनि संतुष्ट हेबै, तखने हमरो उद्धार हैत |’                      सबजाना भोज कम होइ छलै |

खाली पुरुखे सभ जखन भोज खाए जाइ छलाह त स्त्रीगण सभ अपनाले’ भोजन नै बनबैत छलीह, दिनका किछु बाँचल रहै छलनि से अथवा घरमे चूड़ा अथवा और किछु रहै छलनि त नून,गुड़ अथवा मूर संगे ख़ाक’ सूति रहै छलीह | पुरुख सभ एकर चिन्ता नहि करैत छलाह जे स्त्रीगण सभ की खेलनि | स्त्रीगण सभकें भोजन नै बनब’ पड़ैत छलनि, एतबेसँ  प्रसन्न रहैत छलीह | सबजाना भोज दिन त हुनको सभले’ पावनि भ’ जाइत छलनि| घरक स्त्रीगणकें भोजे दिन भानस-भातसँ अवकाश भेटैत छलनि |

सामान्य दिनमे सेहो कोनो घरमे स्त्री-पुरुखक भोजन  एक बेर नहि होइत छलै |

सभ पुरुख आ धिया-पुताकें परसन द’ द’ क’ खुआक’ जे किछु बचि जाइ छलै, से नून,मूर आकि गुड़ संगे खाक’ रहि जाइत छलीह स्त्रीगण सभ |

बेशी घरमे भात तखने बनै छलै जखन कोनो पाहुन अबै छलखिन | पाहुनक लेल  भात,दालि,तरकारी,तडुआ,कने घी आ दहीक व्यवस्था कोनो तरहें अवश्य कएल जाइत छलनि | पाहुनकें खुआक’ घरबारी भोजन करैत छलाह |

घरबारीक भोजनमे बेशी काल रोटी,दालि,अल्हुआक प्रधानता रहैत छलै | रोटी गहुम,मड़ुआ,खेसारीक बनैत छलै | जकरा खुट्टापर महींस रहैत छलै, ओकरे  दूध-दही भेटै छलै | जकरा खुट्टापर महींस नै छलै, ओकरा घरमे क्यो दुखित पड़ि  जाइ छलै तखने अथवा कोनो पाहुन अबै छलखिन तखन दूध कीनल जाइ छलै |धिया-पुताकें सेहो ओहीमे सँ बचाक’ द’ देल जाइ छलै |

हमर बाबा महींस पोसैत छलाह | हमर मझिली बहिनक द्विरागमनक समय महींस खुट्टापर सँ गेल, फेर कहियो खुट्टापर महींस नै आएल |

बहुत दुखित पड़लेपर ककरो समतोला खेबाक अवसर भेटैत छलैक, ने त कीनिक’ फल खैब संभव नै छलै | बाड़ीमे  केरा ककरो-ककरो रहैत छलै, त माटितर गाड़ि क’ डाबा ल’ क’ धूकिक’ पकाक’ खाइत छल |हमरो सबहक बाड़ीमे केरा, नेबो  आ अरड़नेबा छल | केराक उपयोग कतहु भार पठेबामे कएल जाइत छल, एकटा चंगेरामे एक कात पाकल केरा, दोसर कात दहीक भार लोकप्रिय छल |

पाकल केराक उपयोग चौठचन्द्र पावनिमे आ केरा घौड़ अथवा हत्थाक उपयोग छठि  पावनिमे सेहो होइत छल |आमक मासमे अपना गाछक आम खेबाक आनन्द भेटैत छलैक | हमरो सबहक आमक गाछ दुर्गास्थानमे छल,पुरना घराड़ी लग सेहो किछु गाछ छलै | नबका घराड़ीपर सेहो बाबा कलकतिया आ कृष्णभोग आमक किछु गाछ लगौने छलाह जे फड़ै छलै | दुर्गास्थानमे एकटा बेलक गाछ सेहो छलै |

गरीबी एहि लेल छलै जे घरमे छओ-सात आदमीक सामान्य जलखै-भोजनक अतिरिक्त समय-समय पर घरक मरम्मति,खेतीमे लागत  आ  भोज-भातक परम्पराक निर्वाह करैत सभ साल किछु खेत भरना पड़बाक कारणे जोत योग्य खेत कम भेल जा रहल छलै आ जे खेत छलै ताहिसँ  आवश्यकतानुसार उपज नै प्राप्त होइत छलै | बाहरी आमदनी नै रहबाक कारणे लोक सभ किछु लेल खेतपर आश्रित रहैत छल आ खेती भगवान भरोसे चलैत छलै | 

नोकरीक प्रतीक्षा धीरे-धीरे कठिन भेल जा रहल छल |

एकदिन एक पाँती लिखा गेल :

‘कहिया तोहर मूँह देखबौ गे, बहालीक चिट्ठी |’

आ एकटा गीत और जकर किछु पाँती द’ रहल छी :

मोटका-मोटका पोथी पढ़लौं

पोथी केर सभ पन्ना रटलौं

से सभ रटिक’ किछु नै भेल |

           पहिने जोड़ी जोड़ दशमलव

           आब जोड़ै छी नून आ तेल || मोटका-मोटका पोथी ........

ईहो टुकड़ी देखू :

पहिने छल डिगरीक सिहन्ता

आब अछि नोकरी केर चिन्ता

खेतो सभ अछि पड़ि गेल भरना

बिका गेलनि कनियाँ केर गहना

           हम छगुन्तामे पडले छी

           हे परमेश्वर ई की भेल ?? मोटका-मोटका पोथी......

अंतिम टुकड़ी :

पहिने बिपति पड़ै त लोकक

मदति करैत छला भगवान

आब कतबो हर-हर बम-बम कहू

देथि ने शिवशंकरजी ध्यान

          आइ कृष्ण गोवर्धनधारीक

          चक्र-सुदर्शन कत्त’ गेल ?? मोटका-मोटका पोथी ..........

समस्या मात्र हमरे लेल  नहि छल | हमरो सभसँ बदतर स्थितिमे बहुत लोक कहुना जीबि रहल छल |

समाजमे अधिक लोकक आर्थिक स्थिति दयनीय छलै | बहुत नवयुवक बेरोजगारीक कष्ट भोगि रहल छलाह | कतेक लोक एहेन छल जकरा रहबाक लेल घर नहि छलै, पहिरबाक लेल आवश्यक कपड़ा नै रहै छलै, भोजन लेल चाउर-दालि-आँटा  नै छलै |

एहेन लोक सबहक लेल फगुआक कोनो आकर्षण नै  रहैत छलै |

एहेन स्थितिक लेल जे गीत लिखाएल तकर चारि पाँती देखू :

छै  जेबी  जकर  खाली-खाली

आ  खरची  घरक लटपटायल

से  फगुआ  खेलायत कोनाक’

जकरा आंगन वसन्त नहि आयल .........  

ईहो चारि पांती :

जकरा सोझाँमे नेना कनैछै

माँ, की खैब भूख अछि लागल ?

से पूआ पकाओत कोनाक’

जकरा आंगन वसन्त नहि आयल .........  

 पटना / 30.07.2021                       ( क्रमशः )

 

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