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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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  • १. नारायण यादव- गुरुमैता-सल्हैता २. डॉ. बचेश्वर झाक दूटा आलेख- विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि आ विद्यापतिक रचनामे विरह वर्णन

    नारायण यादव

    गुरुमैता-सल्हैता

    मिथिलाक विभूति भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक जन्म 24 अप्रील 1930 ई.मे ग्राम भवटियाही जिला सुपौलमे भेल छल। स्व. विहारी गुरुमैता बड़ पैघ देश भक्त, क्रान्तिकारी, जुझारू, कर्मठ आ देशक प्रति समर्पित वतंत्रता सेनानी छलाह। भुवनेश्वर गुरुमैताक व्यक्तित्व आ कृतित्व जानवाक लेल हुनक वंशावलीक जानकारी आवश्यक अछि।

    वंशी गुरुमैता                   सोनाई गुरुमैता                 विहारी गुरुमैता

     

    नागेश्वर गुरुमैता                         मोतीलाल गुरुमैता

     

     

    विश्वनाथ गुरुमैता           कुशेश्वर गुरुमैता

                                       

                राज कुमार गुरुमैता         राम कु. गुरुमैता 

                                                   

                राम नारायण गुरुमैता                  देवनारायण गुरुमैता

     

     

    भुवेश्वर गुरुमैता लक्ष्मी ना. गुरुमैता          जयकृष्ण गुरुमैता

     

      स्व. विहारी गुरुमैताक सुपुत्र रामनारायण गुरुमैता और देवनारायण गुरुमैता स्वतंत्रताक आन्दोलनक दिवाना छल। राम नारायण गुरुमैता कलकत्ता विश्वविद्यालसँ बी.ए. पास कयने छलाह। मिथिलांचलक प्रथम स्नातक छलाह। पढ़ाइक दरम्यान सुभाषचन्द्र वोस, महात्मा गाँधी आदि स्वतंत्रता सेनानीसँ पहचान भेलैन्ह। क्रमश: राजेन्द्र प्रसाद आदि राजनेताक सभासँ अएलाह। बी.ए. पास कएलाक बाद ओ विहार अएलाह आ गाँधीजीक रचनात्मक कार्यक प्रचार-प्रसारमे लागि गेलाह। ओहि अन्तरालमे (1939-1942) दरभंगा कॉंग्रेस कमिटी आओर आर्य समाजक मंत्री पदकेँ सुशोभित कयलैन्ह। अपन विद्वताक वलपर राम नारायण गुरुमैता राम चरित्र मानसक, अंग्रेजीमे अनुवाद (पद्यानुवाद) कयलैन्ह। दरभंगा महाराजक चीफ मैनेजर डेनबी साहेव ओहि अंग्रेजी अनुवाद राम चरित्र मानसकेँ राम नारायण गुरुमैताक मुँहसँ प्रतिदिन सुनय लगलाह। मिस्टर डेनवी साहेव गुरुमैताजीपर बड़ खुश छलाह। दरभंगा महाराजासँ पैरबी कय रामनारायण गुरुमैताकेँ दरभंगा राजक फिल्ड इन्सपेक्टिंग ऑफिसरक रूपमे बहाली करौलैन्ह। मुदा किछुए दिनक पश्चात् ओ ओहि पदसँ इस्तीफा दय देलैन्ह, कियैक तँ राजक अधिकांश कर्मचारी सभ बड़ भ्रष्ट छल। भ्रष्ट कर्मचारीक संग काम केनाई राम नारायण गुरुमैताकेँ नीक नहि लगलैन्ह। ओ ओहि पदासँ इस्तिफा दय का्रेसक पूर्णकालिक कार्यकर्त्ताक रूपमे समाजक सेवामे लागि गेलाह। एहि दौरान ओ शिक्षाक अधिकसँ अधिक प्रचार प्रसारक लेल पुस्तकालय आ विद्या आ विद्यालय खोलौलैन्ह। ठाम-ठाम पुस्तकालय आ विद्यालय खोलल गेल। ओहिठाम गरीब-गुरबा, मजदूर किसान बैसि अध्ययन करैत छल। एहि क्रमे स्व. स्वनाम धन्य ललित नारायण मिश्र, स्व. श्याम नारायण मिश्र आ हुनक भाई लोकनि राम नारायण गुरुमैताजीक शिष्य बनलाह। भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू भेलापर पूर्ण सक्रियतासँ एहि कार्यमे लागि गेलाह।

    सन् 1939 ई.मे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीजीक भवटियाहीमे विशाल सभाक आयोजन राम नारायण गुरुमैता करौने छलाह। एहि सभमे हजारो हजार लेाक भाग लेलैन्ह। सभक भोजनोक व्यवस्था कयल गेलैक। राम नारायण गुरुमैताक माताश्री अपन हाथसँ चरखा द्वारा सूत तैयार कऽ गाँधीजीकेँ भेँट केलैन्ह। राम नारायण गुरुमैताक सुपुत्र डा. भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता जे 8-9 वर्षक अवस्थाक छलाह, ओ गाँधीजीक स्वागतमे विजय विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमरा गीत गावि फूलक माला गर्देनमे पहिराबय लगलाह। कद-काठीमे छोट रहवाक कारणे हाथ गाँधीजीक गरदनि तक नहि पहुँच सकलैन्ह । गाँधीजी भुवनेश्वर गुरुमैताजीकेँ गोदीमे उठा लेलैन्ह आ गुरुमैताजी गाँधीजीकेँ माला पहिरा देलैन्ह।

    सन् 1940 ई.मे राम गढ़मे काग्रेसक बैसार छल। राम नारायण गुरुमैता कॉंग्रेसक जुझारू, कर्मठ आ समर्पित कार्यकर्त्ता छलाह। तेँ दरभंगा तखन समस्तीपुर, वेगुसराय आ मधुबनीक एक मात्र जिला छल। कॉंग्रेस जिला कमेटीक प्रतिनिधिक रूमे ओहि बैसारमे राम नारायण गुरुमैतीजीकेँ भेजने छला। राम नारायण गुरुमैता ओहि बैसारमे ससमय पहुँचलाह। ओहि बैसारमे देश भरिक कॉंग्रेसी नेता पहुँचल छलाह। महात्मा गाँधीक अध्यक्षतामे बैसार भेल छल। एहि बैसारमे निर्णय भेल जे सुभाष चन्द्र वोसक जगहपर पट्टामि सीता रमैयाकेँ अध्यक्ष बनाओल जाय। राम नारायण गुरुमैता एहि प्रस्तावक विरोध कयलैन्ह आ ओ गाँधीजीक खेमासँ बाहर भय नेताजीक खेमामे आबि गेलाह। राम नारायण गुरुमैता स्वावलम्बी, क्रान्तिकारी, न्यायवादी, स्पष्टवादी, सत्यवादी आ जुझारू विद्वान नेता छलाह। जमींदार सेहो छलाह। हिनक पिता विहारी गुरुमैताक रग-रंगमे स्वाधीनताक आन्दोलन समायल छल। विहारी गुरुमैताक पिता भाईलाल गुरुमैताक सहयोगसँ कतेको गाममे जमीन खरीद कामत बनौने छलाह। जेना भवटियाही, गोढ़ियारी, मालिन बेलहा, सुग्गापट्टी मटियारी आदि। स्वतंत्रता प्राप्तिसँ पहिने कोसीक रेलवे पुल बरकरार छल। दरभंगासँ फारविसगंज बीच छोटी रेलबे लाइन छल। दरभंगासँ फारविसगंज रेल जाइत छलैक। 1942 ई.क आस-पास तेहेन ने भीषण बाढ़ि आबि गेलैक जे कोसीक भीतर रेल लाइनकेँ तहस-नहस कय देलक आ निर्मलीसँ आगाँ रेलक सवारी बन्द भय गेल जे अखन धरि बन्दे अछि। भवटियाही कामत सेहो तहस-नहस भय गेल। आब राम नारायण गुरुमैताक रहनाइ गोढ़ियारी कामतपर भऽ गेल। ओहिठामसँ स्वतंत्रता आन्दोलनक गति-विधि चलवय लगलाह। हिनक प्रथम पुत्र भुवनेश्वर भुवनेश्वर गुरुमैता जिनकर उम्र तकरीवन 12 वर्षक छलैन्ह। अपन पुत्रकेँ पढ़यवाक लेल राम नारायण गुरुमैता फुलपरासक अन्तर्गत म.वि. हुलासपट्टीमे नाम लिखा देलैन्ह। नाम सप्तम वर्गमे लिखल गेल। भुवनेश्वर गुरुमैता ओहि विद्यालयमे पढ़य लगलाह।

    1942 ई.क स्वतंत्रता आन्दोलनमे जखन भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता अपन विद्यालयमे एकटा नीक छात्रक रूपमे ख्याति प्राप्त कय चुकल छलाह। तखन एक दिन हिनक पिता राम नारायण गुरुमैता हुलासपट्टी मध्य विद्यालयपर पहुँचलाह आ भुवनेश्वर गुरुमैतासँ कहलैन-

    बौआ, एहि आन्दोलनमे पटनामे राष्ट्रीय झंडा फहिरावयक दरम्यान 07 सात बच्चा शहीद भऽ गेल। आब आठममे तोहर बारी छल।

    स्वतंत्रताक दिवाना राम नारायण गुरुमैता, जे भारतकेँ स्वतंत्र करबाक हेतु अपना बेटाकेँ बलिदान देबाक लेल तैयार छल- के ओ कहलैन-

    तो अपन विद्यालयक छात्रक नेतृत्व करैत फुलपरास थानापर राष्ट्रीय झंडा पहरावह। हम अपन एकटा बेटाकेँ भारत माताक लालक रूपमे वलिदानक लेल सूपूर्द कय रहल छी। गोली चलत तकर डर नहि करियहह।

    ई बात 11 अगस्त 1942 ई.क छल। 12 अगस्तकेँ अपना विद्यालयक छात्रक नेतृत्व करैत हाथमे झंडा लय भारत माताक जय-जयकार करैत फुलपरास थापर पहुँचलाह। हजारो-हजारक संख्या छात्र, नौजवान, किसान, मजदूर आ इलाकाक ग्रामीण जनता सभ थानाकेँ घेरने छल। भुवनेश्वर प्र. गुरुमैता हाथमे झंडा लय भारत माताक जय-जयकार करैत थानापर पहुँचलाह। थाना पहुँचैत देरी पुलिस भीड़केँ छिड़ियेबाक बास्ते हवाइ फायरिंग करय लागल। जखन मंचपर चढ़ि भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता झंडा फहरावय लागल तखन थानाक दरोगा ओहि बचापर गोली चलवय लागल। बच्चाकेँ कोनो परबाह नहि छल। गोली चलैत रहल। दरोगा निशाना बनौलक आ भुवनेश्वार प्रसाद गुरुमैताकेँ मारए लागल, तावत दरोगाक पत्नी जे सदृदय छली। ओ दरोगाक पैर छान्हि लेलकनि आ दरोगाक निशाना चुकि गेलैक जाहिसँ ओ बच्चा गोलीक शिकार होमयसँ बॉंचि गेल। एहिठाम ई पॉंती चरितार्थ भेल- जाके राखे साईयॉं मारि सके ने कोईउग्र भीड़ दरोगापर टूटि पड़ल। ओ सभ दरोगाकेँ धमकी देवय लागल कहलक-  जँ ई बच्चा अहॉंक गोलीसँ मरत तँ अहूँकेँ निर्वश कय देव। भ्ज्ञीड़ भारत माता की जयक नारा देबय लागल। स्थिति बड़ तनाव युक्त भऽ गेल। 12 अगस्तकेँ झंडा फहरौल गेल आ तेरह अगस्तकेँ थानामे आगि भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक नेतृत्वमे लगा देल गेल। 12 अगस्त 1942 ई.केँ भारतमे प्राय: सभ सरकारी संस्थापर तिरंगा झंडा फहरौल गेल। जयनगर थानापर झंडा फहरावयमे जे गोली चलल। जाहिमे नथुनी साह नामक युवक शहीद भऽ गेल। अखनो थानाक नजदीकक चौककेँ शहीद चौक कहल जाइत छैक। जकर स्मारक शहीद चौकपर बनल छैक। फुलपरास थानापर गागि लगलाक बाद चारू तरफ हाहाकार मचय लागल। भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताकेँ अंग्रेज छौटे गुरुमैता कहि स्मबोधित करय लागल। आ छोटे गुरुमैतापर शूट वारंट जारी भऽ गेल। म.वि. हुलासपट्टीसँ भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक नाम कटा देल गेल। राम नारायण गुरुमैतापर सेहो वारण्ट भय गेल। आब राम ना. गुरुमैता भूमिगत रहि आन्दोलनकेँ सक्रिय रखलैन्ह। मुदा राम नारायण एहि आपा-धापी आ नुक्की-छिपीमे बीमार भय गेलाह। अंग्रेजी समान आ अंग्रेजी दवाईसँ ओ परहेज करय लगलाह। झंझारपुरमे एकटा डॉक्टर हिनक मित्र रहथिन्ह। ओ हुनकर इलाज करैक लेल लालायित रहलाह। मुदा ओ अंग्रेजी दवाईयो खेवाक लेल शपथ खेने रहैथ। तुलसीक पात, वाकसक पात, काली मीर्च सेंधा नून इत्यादि जड़ी-बुटी मिला कय काढ़ा बनाओल गेल। ओ काढ़ाक सेवन करय लगलाह। मुदा बीमारी ठीक नहि भय सकलैन्ह। बीमारी खतरनाक रूप धारण कय लेलक। ओ मिथिलाक विभूति 20 अक्टूवर 1942 ई. केँ वाइसी गढ़ी (सुपौल) मे 35 वर्षक अवस्थामे एहि लौकिक शरीर के त्यागि परलोक सिधार लाह। स्वर्गवासी होमयसँ पहिनहि अपन सुपुत्र श्री भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताकेँ तीन कार्य करवाक हेतु आदेश देलैन्ह। जे निम्न अछि-

    (1)                     बेटा, मदन मोहन मालवीय जीक हिन्दू विश्व विद्यालयसँ एम.ए. करियहह।

    (2)                   मॉं केँ तीर्थाटन करा दियहक। 

    (3)                   पढ़ाई सम्पन्न भेलाक वाद देश सेवामे लागि जइयह।

     

    एहेन परिस्थितिमे भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता जिनका अंग्रेज छोट गुरुमैताक नामसँ सम्वोधित करैत छलाह, विचलित नहि भेलाह। दाह संस्कार सम्पन्न भेल। दाह-संस्कारमे बहुत संख्यामे आन्दोलनक कार्यकर्त्ता भाग लेलैन्ह। एहि घटनाक जानकरी अंग्रेजी फौजकेँ भय गेलैन्ह।

    थानापर राष्ट्रीय झण्डा आ थानामे आगि लगेलाक जूर्ममे श्री भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक (छोटे गुरुमैता) नामसँ वारण्ट जारी भेल छल ओहि समयमे छोटे गुरुमैताक गिरफ्तारी हेतु वारण्ट लय अंग्रेजी फौज दरबाजापर आबि घर घेर लेलैन्ह। ओहि समयमे संयोग नीक छल जे भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता अपन चाचाक संग अस्थि कलश चुनबाक हेतु समीपहिक दाह संस्कार स्थलपर गेल छलाह। घर लोकक मारफते हुनका गुप्त सूचना देल गेलैन्ह। सूचना मिलतहि ओ अस्थि लय चाचाक संग नेपाल भागि गेलाह। आ ओम्हरहिसँ सिमरिया जा अस्थि-कलशकेँ गंगामे प्रवाहित कयलैन्ह। ग्रामीण सभ दु:साहस कय सिपाही सभकेँ बड़ फटकारलैन्ह। तथापि क्रूर सिपाही लोकनि हुनका घरमे आगि लगा देलक। ई कारूणिक दृश्य देखि इन्द्र भगवानक हृदय द्रवित भय गेलैन्ह। आ झमाझम वारिस होमय लागल। घर जरऽसँ बॉंचि गेल। सिपाही लेकनि निरास भय वापस चलि गेलाह।

    राम नारायण गुरुमैताक निधनक पश्चात भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैताक अपन चाचा देवनारायण गुरुमैता स्वतंत्रता आन्दोलनमे सक्रिय भूमिका निभौलैन्ह। आब एहि स्वतंत्रताक आन्दोलनक नेतृत्व कर्त्ता खुटौना थानाक नहरी निवासी स्व. राम लषण सल्हैता भेलाह।

    राम लषण सल्हैता कर्मठ, सुयोग्य, क्रान्तिकारी निर्भिक, ज्योतिष शास्त्रक ज्ञाता, हिन्दी भाषी विद्वान एवम् स्पष्ट वक्ता छलाह। आब राम लषण सल्हैताक नेतृत्वमे देव नारायण गुरुमैता, सूर्य नारायण सिंह, सुवोध झा, गुलावी सोनार, उपेन्द्र मिश्र, यमूना सिंह, जिलवी खड़गाह आ सल्हैताजीक दुनू छोट भाई रामकृष्ण सल्हैता आ जयकृष्ण सल्हैता आन्दोलनकेँ सक्रिय बनेबामे सहयोग करय लगलाह। 

    राम लषण सल्हैताक वंशावलीक चर्चा मुनासीव बुझना जाइछ। आत्मा सल्हैता आ परमात्मा सल्हैता दुनू भाई सितहर बरहाक निवासी छलाह। जे अखन सुपौल जिलामे पड़ैत अछि। ओहि दुनू भाइक पास बहुत रास गाय (गोधन) छल। गायकेँ चरेवाक हेतु बहुत दूर-दूर तक चलि जाइत छलाह। गायक झुण्ड जतय-जतय जाइत छल ओकरा पॉंछा ओकर मालीक आ चरवाहा अपन डेरा डालि रहैत छलाह। ओहि क्रममे आत्माक सल्हैतका गाय खुटौना थानाक सिडुला गाँव पहुँच गेल। घनगर जंगल रहलाक कारणेँ गाय सभ भरि वरसात एहिठाम ठहरि गेल।

    सिडुलासँ पूरब एकटा बड़ ऊँचगर जगह छलैक। वाढ़िक पानि आ जाड़सँ बचवाक हेतु मालीक आत्मा सल्हैता आ ओकर नौकर सभ ओहि ऊँचगर जगहपर अपन स्थायी निवास स्थान वनाकय रहय लगलाह। किछु दिनक वाद जंगल आ परती भूमिकेँ उपजाऊ भूमि बना कय खेती वाड़ी करय लगलाह।

    गोधनसँ अधिक आमदनी होमय लगलैक। खेती नीक जकॉं करय लगलाह।

    खेतीसँ वढ़िया जकॉं आमदनी होमय लगलैक। किछु जमीन खरीद नीक जकॉं घर बनाकय रहय लगलाह। आत्मा सल्हैताक छोट भाए- परमात्मा सल्हैता जे सितहर-बरहा (सुपौल) मे रहैत छलाह ओ हिनका लय जयवाक हेतु प्रयास केलैन्ह मुदा आत्मा सल्हैता वापस नहि गेलाह।

    सिडुलासँ पूरब एकटा छोट नदी जे नहरक सदृश्य छल ओकरहि नामपर एहि गामक नाम नहरी राखल गेल। वर्त्तमानमे ई गाँव बड़ सुखी सम्पन्न आ विद्वानक वस्ती बनि गेल अछि। एतय प्रारम्भिक शिक्षासँ .......... शिक्षण संस्थान अवस्थित अछि। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सेहो अछि।

    आत्मा सल्हैताक एक मात्र पुत्र रघु सल्हैता भेलाह। आत्मा सल्हैता : वंशावली निम्न अछि-

     

    आत्मा सल्हैता

     

     

     


     

    रघु सल्हैता                                                           फुद्दी सल्हैता

     

     


     

                                        लेल्हाई सल्हैता                                मनरूपी सल्हैता

     

     

     


     

    गुदर सल्हैता       बच्चू सल्हैता       बाबूलाल सल्हैता

     

    Text Box: लालजी सल्हैता           रामजी सल्हैता 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
          
 
 
Text Box: जिन्त्री सल्हैता             मिन्त्री सल्हैता 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
             
 
 
Text Box: राम लषण सल्हैता          रामकृष्ण सल्हैता              जयकृष्ण सल्हैता 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
                                
 
 
Text Box: सचिदानन्द सल्हैता       कमलेश सल्हैता                 इन्द्र कुमार सल्हैता 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
                                
 
 
Text Box: विशेश्वर सल्हैता 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
  
 
 

     

     


     


     

    आब बाबू लाल सल्हैताक तीन सुपुत्र राम लषण सल्हैता राम कृष्ण सल्हैता, जयकृष्ण सल्हैतामे सभसँ जेठ भाई राम लषण सल्हैताकेँ एकटा विशाल हाथी छल। तकरीवन 10 हाथक छलैक। ओकरा पैघ-पैघ दॉंत सेहो छलैक। हाथी पैघ देश भक्त आ स्वामी भक्त सेहो छल।

    राम लषण सल्हैता दोसर बेटी जे दू सालक छल। एक दिन संध्याक समय ओ बच्ची हवेलीसँ निकलि हाथीक घर चलि गेल छल। हाथी बान्हल छल। हाथी ओहि बच्चीकेँ सूढ़सँ उठा लेलक आ ओकरा झूलबय लागल। बच्ची आस पाबि सुति रहल। तखन हाथी बैसि रहल आ अपना दुनू अगिला जॉंघ बीचमे राखि सूढ़सँ झॉंपि देलक। बच्ची हाथीक सायामे सूतल रहलीह। जखन हवेलीक अन्दर बच्चीक खोजवीन होमय लागल तँ ओ नहि भेटलैक। चारू तरफ खोज-पुछारि हाफय लागल। कतहु अता-पता नहि लागल। पोखैर-इनारमे सेहो खोजल गेल। हवेलीक अन्र कना-रोहट शुरू भय गेल। मुनहारि सॉंझ भय गेल छल। बच्चीक खोज-पुछारिक लेल बाड़ी-झाड़ी माल-जालक घरक तलासी भेल। सभ कियो हारि-थाकि कऽ संख्या समय निरास भय एक जगह जमा भेल। सॉंझ देमय लेल दीप, लालटेन वा डिविया जराओल जाय लागल। ओहि समयमे विजलीक सेवा नहि छल। लोक सभ लालटेन युगमे जी रहल छल। अंग्रेजी शासनक अत्याचार चरम सीमापर छल। ग्रामीण लोकनि पढ़नाइ-लिखनाईकेँ वहिष्कार करैत छल। हाथीक महाउथ हथिसार यानी हाथीक घर सॉंझ देबाक लेल गेल। सलाईसँ काठी निकालि डिविया जरौलक। महाउथ देखलक जे हाथी असमयमे बैसल किएक अछि?

    महाउथ तँ पहिने घवरेलाह। हाथीक लग पहुँचलाह। तँ देखैत छैथ जे हाथीक अगिला दुनू जॉंघक बीचमे बच्ची सुतल अछि आ हाथी अपन सूढ़सँ ओकरा झपने अछि। जाड़क समय छल। बच्चीक देह गर्म भऽ गेल छलैक। तँए ओ निश्चिन्तसँ सुतल छलीह।

    महाउथ दौगल मालीक लग। मालीक मालीक एमहर आउ। निरास भने सभ कियो हाथसार दिस दौड़ल। मालिक हाथीकेँ बैसल देखलक, तँ ओ घवरेलाह जे हाथी असमयमे किएक बैसल अछि। मनहि-मन सेाचए लगलाह जे हाथी बीमार न भऽ गेल। महाउथ मालीककेँ देखौलक जे हाथी अपना जॉंघक बीच कोना कऽ बच्चीकेँ झपने अछि। परिवारक सभ सदस्य देखलक सभ अचंभित भय गेल। मालीक हाथीसँ बच्चीकेँ देबाक लेल आग्रह केलैन्ह। हाथी अपन सूढ़सँ बच्चीकेँ मालिकक राम लषण सल्हैताजीक गोदीमे दय देलक।

    सभक निराश मन प्रफुल्लित भय गेल। राम लषण सल्हैता हाथीकेँ नहि बेचबाक प्रण कयलैन्ह। हाथी वफादार देशभक्त आ स्वामीभक्त छल। एकर एक उदाहरण प्रस्तुत कय रहल छी।

    राम लषण सल्हैता जे दरभंगा महाराजक द्वारा जूरी पंच मनोनित कएल गेल छलाह। गामक नजदीकमे अंग्रेजक कचहरी छल। ओतएसँ एकटा देवनजी राम लषण सलहैताकेँ पंचैती हेतु बजाबक लेल हाथीसँ आयल छल। राम लषण सल्हैता पंचैतीमे जयवाक हेतु तैयार होमय लगलाह। महाउथकेँ आदेश देलैन्ह जे तौं हाथीकेँ तैयार कर महाउथ हाथीक हौदा कसय लागल। राम लषण सल्हैता सेहो तैयार भेलाह। महाउथवार हाथी लय उपस्थित भेल। सल्हैताजी हाथीपर सवार भय पंचैती हेतु विदा भेलाह। तावत देवानजी हाथीपर चढ़ि आगाँ बढ़ि चुकल छल। सल्हैताजी सोचए लगलाह जे ई देवानजी केहेन असम्य अछि। हमरा चललाक बाद ओ पाछॉंसँ चलितैथ।

    हुनका आत्म सम्मानपर ठेस पहुँचलैन्ह। ओ महाउथवारकेँ ईसारा देलैन जे हाथीकेँ जोड़सँ चलाउ। हाथी नमहर छल। पैघ-पैघ डेग दैत देवानजीक हाथीकेँ पकैड़ लेलनि। आगाँ एकटा नाला छल देवानक हाथी नाला टपए लागल। तखन राम लषण सल्हैता महाउथवारकेँ इशारा कय देलनि जे देवानक हाथीकेँ पाछॉंसँ दाइब दे। महाउथक ईशापर सल्हैताजीक हाथी पाछॉंसँ सूढ़सँ डॉंरपर जोरसँ चापि देलक। देवानक हाथी नेंगराय लागल। पंचैती भेल। ओतयसँ सल्हैताजी घर अयलाह। देवानजीक हाथीक डॉंर टूटि गेलैक। एहि बातक जानकारी दरभंगा महाराजकेँ देल गेलैक जे राम लषण सल्हैताजीक हाथी दरभंगा महाराजक हाथीक डॉंर तोइर देलक। दरभंगा महाराज राम लषण सल्हैताकेँ दरभंगा बजौलक। राम लषण सल्हैता दरभंगा महाराजक ओय पहुँचलाह। महाराजाकेँ खबर पठाओल गेल। दरभंगा महाराज सल्हैताजीकेँ कहलनि जे अहॉंक हाथी बदमाश अछि। हमरा कचहरी परहक हाथीक डॉंर तोइर देलक।

    सल्हैताजी अपन सफाई देलक जे अहॉं देखू सल्हैताजी हाथीकेँ कुहलनि जे पट होजा।

    हाथी लेट गेल। सल्हेताजी हाथीक दॉंतपर चढ़ि दोसर दॉंतकेँ पकैर हाथीक दॉंतपर चढ़ि गेलाह। दरभंगा महाराजा खुश भय सल्हैताजीकेँ अभय दान दय देलैन्ह। ई दृश्य महारानी कोठाक ऊपरसँ देखि रहल छलीह। ओ ऊपरसँ आदेश देलैन्ह जे अहॉं ई हाथी हमरा दय दीअ। एहि बदलामे अहॉं चारिटा हाथी लय लीअ।

    महारानीक हठपर सल्हैताजी हाथी दय देलैन्ह। जहिया सँ ई हाथी सल्हैताजीक घर छोड़लक, तहियासँ सल्हैताजीक घरमे उड़ी-विड़ी लागि गेलैक।

    एमहर राम नारायण गुरुमेताक निधनसँ जतेक स्वतंत्रता आन्दोलनक क्रान्तिकारी लोकनि सभ छलाह, ओ राम लषण सल्हैताक ओतय रहि आन्दोलन करैत रहलाह। अंग्रेज सरकार एहि क्रान्तिकारी लोकनिकेँ गरफ्तार करबाक मुहिम चला रहल छल। नहरी गामक किछु असमाजिक तत्व जकरा लाम लषण सलहैतासँ दुश्मनी छल ओ अंग्रेज सरकारकेँ एहि बातक सूचना दय देलक। 1944 ईस्वीक दीपावलीसँ एक दिन पहिनहिक लगभग 9 बजे रात्रिमे 8 स्वतंत्रता सेनानी सवेरे भोजन कय सुतल छलाह। पहरापर देवनारायण गुरुमैता छलाह। पॉंच सौ मीटर दूरहिसँ अंग्रेजी फौज टार्च देलक आ राम लषण सल्हैताक नाम लैत दरबाजापर अयबाक कोशीश कयलैन्ह। मुदा देवनारायण गुरुमैता हुनका सभ सामना करैत रहलाह। बादमे ओ ओतयसँ बन्दुकक साथ भागि गेलाह। सभ आन्दोलनकारी सेहो परा गेलाह। आंगनसँ पाछॉं दय बहरेवाक एकहिटा रास्ता छल। आ वगलमे ढेकी घर छलैक। ओहि ढेकी घरमे दू क्रान्तिकारी यमुना सिंह आ उपेन्द्र मिश्र फँसि गेलाह। मुदा ओ दुनू घरक धरैनपर छुपि रहलाह। घरक तलासी होमय लागल। कतौ कोनो क्रान्तिकारी नहि मिलल। सभ अंग्रेजी फौज दरबाजापर जमा भय गेल। राम लषण सल्हैता सभ सिपाही आ पुलिस अफसरकेँ ततेक ने डॉंट-डपट कयलक जे सभ पुलिस पानि-पानि भय गेल। मुदा गामक जे राम लषण सल्हैताक प्रतिद्विन्दि छलाह, जे अंग्रेजी फौजकेँ बजा कऽ अनने छलाह। ओहि आदमीसँ अंग्रेज अफसर पानि पियेबाक आग्रह केलैन्ह। ओ आदमी लोटा लय ठेकी घरसँ पानि आनबाक हेतु गेलाह। धरैनपर बैसल क्रान्तिकारी द्वय हुनकासँ पुछलनि जे सिपाही सभ चलि गेल। ई सुनितहि ओ प्रतिपक्षी आबाज दय फौजकेँ बजौलक आ दुनू क्रान्तिकारीकेँ पकड़बा देलक। ओहि दुनूकेँ पकड़लाक बाद राम लषण सल्हैता, जय कृष्ण सल्हैता, विन्देश्वर सल्हैता, जीलेवी खड़गाहआ टीमू मण्डलकेँ गिरफ्तार कय जहल लऽ गेल। घरक सभ सामान लूटा गेल। घरक सभ सदस्य घर छोड़ि भागि गेल।

    अंगेजी फौजक उपद्रव बढ़य लागल। घरमे जतेक वत्रन वासन, सोना-चान्दी, गहना जेवर छल सभ लूटि कऽ अंग्रेज आ गामक विरोधी सेहो लऽ गेल। घरक तलासीमे राम लषण सल्हैताक एक मात्र पुत्र विशेश्वर सल्हैताकेँ पकड़बाक हेतु एड़ि-चोटी एक कय देलक। विशेश्वर सल्हैता घर छोड़ि अपना मामा गाम गोईत परसाही चल गेल। विरोधी लोकनि विशेश्वर सल्हैताक रहबाक पता सेहो अंग्रेजी फौजकेँ बता देलक। अंग्रेजी फौज विशेश्वर सल्हैताकेँ पकड़वाक हेतु परसाही पहुँचल। ओतयसँ ओ बाधे-बाघ पूरब तरफ भागि गेलाह। अंग्रेज सिपाही हुनका पकड़वाक हेतु खदेरऽ लागल।

    बाघमे एकटा हरवाहा हर जोतैत छल। अंगेज सिपाही हरवाहाकेँ जोड़सँ हल्ला कय विशेश्वर सल्हैताकेँ पकड़बाक हेतु कहलक। हरवाहा विशेश्वर सल्हैताकेँ पाछॉंसँ खदेरऽ लागल। आ हरवाहा विशेश्वर सल्हैताकेँ धीमी आवाजमे कहलक बौआ अहॉं जोरसँ भागू। हम अहॉंकेँ खदेरवाक नाटक करब। हरवाहा डरे विशेश्वर सल्हैताकेँ खदेरय लागल। आ ऊचगर मेड़पर ओंघरा कऽ गिरअ लागल। एहि तरहेँ विशेश्वर सल्हैता भागि कय पुलिसक पछाड़सँ छुटि गेलाह। भागल-भागल अपन जेठ बहिनक ओतय पहुँचलाह। बहिनक दरवाजापर आइत देरी एकटा तेहल्ला बाजल जे सल्हैता तँ अपने विलटिये गेल आब एकरो बिलटौत। ई सुनितहि विशेश्वर सल्हैता जे आत्म सम्मनक रक्षार्थ ओतय नहि रूकलाह आ आगाँ बढ़ि गेलाह। हिनक जेठ बहिन जँ बुझलक तँ विशेश्वर सल्हैताक पाछॉंसँ आवाज दय रोकलीह। मुदा सल्हैताजी वापस नहि भेलाह। एहि प्रकारे विशेश्वर सल्हैता भागैत-भागैत कोसीक ओहि पार जा अपन मौसीक ओतय शरण लेलैन्ह।

    एमर राम लषण सल्हैता सहित तथाकथित गिरफ्तार व्यक्तिकेँ जेलमे डालि देल गेल। राम लषण सल्हैता जेलमे अनसन करय लगलाह। अठरहम दिन ओ शरीरकेँ त्यागि देलक। क्रुर अंग्रेज सल्हैताजीक लाशकेँ हिनक परिजनकेँ नहि दय सकल। किछु गिरफ्तार व्यक्तिपर मुकादमा चलय लागल। एहि प्रकारे सल्हैताजीक परिवार आ धन सम्पतिक नाश भय गेल।

    स्वतंत्रता आन्दोलनमे जे क्षति राम लषण सल्हैता आ राम नारायण गुरुमैताकेँ भेलैन्ह ओ इतिहासक पन्नामे स्वार्णक्षरमे लिखवाक योग्य अछि।

    एमहर राम नारायण गुरुमैताक सहोदर भाए देव नारायण गुरुमैता जे किछु दिन धरि जेलमे बन्द रहलाह, तकर बाद जेलक चाहरदिवारीकेँ फानि जेलसँ बाहर निकलि अपन पितियौत भाय जे बेगूसरायमे बैंकक नौकरी करैत छलाह, ओतय चलि गेलाह। भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता अपन पिता राम नारायण गुरुमैताक श्राद्ध-कर्म सम्पन्न कय बेगूसराय आगाक शिक्षा ग्रहण करवाक लेल चल गेलाह। बेगूसरायमे दूटा उच्च विद्यालय छल एकटा बी.पी. उच्च विद्यालय आ दोसर जे.के. उच्च विद्यालय। बी.पी. उच्च विद्यालयक प्राचार्य नामांकन नहि लेलक। तखन नामांकन हेतु जे.के. उच्च विद्यालय पहुँचलाह। ओतयक प्रचार्य भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता जीक जॉंच परीक्षा लेन्हि। 100 अंकक प्रश्न पत्र देल गेल। परीक्षा सम्पन्न भेल। 100 अंकमे 100 अंक गुरुमैता जीकेँ प्राप्त भेलैन्ह। प्राचार्य हिनक प्रतिभा देखि गद-गद् भय गेलाह। नामांकन भय गेल। जे.के. उच्च विद्यालयमे श्री गुरुमैतजी पढ़य लगलाह। गुरुमैताजी बगूसरायमे पढ़बो करथि आ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघक शिविरमे सेहो भाग लैथ। हिनक चाचा जे जेलसँ भागि कऽ बेगूसराय चल गेल रहैथ ओ भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैतापर समसैल रहैत छलाह। किएक तँ ओ आर.एस.एस. शिविरमे भाग लेबाक हेतु जाइत छलाह। ओ ओहि शिविरमे भाग लेबासँ सदिखन मना करैत छलैन्ह। धीरे-धीरे भुवनेश्वर प्रसाद गुरुमैता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघक प्रचारक बनि गेलाह। देश सेवामे लागल रहलाह। पिताक आज्ञाक पालन करैत काशी हिन्दु विश्व विद्यालयसँ एम.एक. पास कयलैन्ह। माताकेँ तीर्थाटन करौलैन्ह। पद्म विभूषण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीजीक संरक्षणमे शोध कार्य सम्पन्न कयलाह। बहुत रास पा..... सभ लिखलैन्ह। हिनक शोधक विश्ज्ञय छल वर्णरत्नाकरक ऐतिहासिक पृष्ठि भूमि।

    एहि तरहेँ गुरमैता-सल्हैता परिवारक धन-सम्पति नष्ट भेलाक वादो स्वतंत्रता प्राप्तिमे अपन अहम भूमिका निभौलैन्ह। जे आइ धरि मिथिलांचलक आन, वान और शान अछि।

    डॉ. बचेश्वर झाक दूटा आलेख-

     

    विद्यापतिकालीन मिथिलाक कृषि

    जाहि समयमे विद्यापतिक आर्विभाव मिथिलामे भेल छल ओ संक्रमणक काल छल। सामाजिक विश्रृंखलताक कारणेँ किछु लेाक काज-धन्धा करबासँ मुँह मोड़ने छल। जे केओ काजुल, परिश्रमी छलो ओहो .......मे परि कर्त्तव्यहीन जीवन बितेनिहार भऽ गेल छल। मिथिलामे खेती आ पशुपालनक सिवाय दोसर जीविकाक साधनो तँ नहि छलैक। सीमित साधनो अछैत खेती करनाइ असौकर्ज बुझि दिनानुदिन आर्थिक दुर्वलताक शिकार होइत रहल। इएह कारण भेलै जे एतुका लोकक आर्थिक अवस्था लचड़ि गेलैक। एतबे नहि, किछु लोक कृषिक उमेक्षा कऽ भीख मांगब श्रेयस्कर बुझए लागल। एहन लोककेँ समाज घृणाक दृष्टिसँ देखैत छल। तेँ एहि प्रवृतिक लोकक ध्यान खेतीक ओर आकृष्ट करबाक निमित कहबी चरितार्थ भेल-

    उत्तम खेती मध्यम वाण,

    निषिद्ध चाकरी भीख निदान।

    तात्पर्य ई जे खेती करब सभसँ उत्तम मानल गेल। व्यवसाय करब मध्यम। नौकरी करब अधम मानल गेल। सभसँ अधलाह- भीख मांगब बुझल गेल। जहाँ तक नौकरीक गप्प छैक, आजुक समयमे नौकरियेकेँ प्राथमिकता भेटल छैक। ओ भलेँ सम्पन्न परिवारक किएक ने होथि, नौकरी हेतु अपस्यॉंत देखल जाइछ। एहनो समय छलैक जखन नौकरी कएनिहारकेँ समाजमे कुचर्चा होइत रहैक। एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे आत्म निर्भरताक शिक्षा देल जाइत छल।

    महा कवि विद्यापति अपन रचना लिखनावलीवर्षकृत्यमे मिथिलाक कृषिक बहुविधिवर्णात कहल अछि। संगहि कृषिकेँ उपेक्षाक दृष्टिसँ देखनिहारकेँ एहि ओर आकर्षित करबा लेल अपना रचनामे शिव आ गौरीक माध्यमसँ उपदेश देल अछि। विद्यापतिक मात्र उद्देश्य अकर्मण्यताक अन्मूलन करब छल।

    बेरि-बेरि अरे शिव मो तोय बोलो,

    किरिणी करिअ मनलाई,

    भिखि मांगिए पर गुण गौरव दूरिजाय,

    निर्धन जन बोलि सबे उपहासे,

    नहि आद। अनुकम्पा।

    तोहें शिव पाओल आक-धतूर,

    एहि पाओल फूल चम्पा।।

    भूमिक अधिकता आ जन संख्याक न्यूनताक कारण खेती अदलि-बदलि कऽ होइत छलैक। जाहि खेतमे एहि वर्ष धान गृहस्थ करैत छल, ओकरा परती छोड़ैत छल। ई करलासँ साल भरिमे खेतक ऊपज शक्ति बढ़ि जाइत छलैक। भूमि तीन श्रेणीक मानल गेल छल।

    विद्यापतिक समयमे पहिल श्रेणीमे गोचर, दोसर श्रेणीमे ऊपजाउ आ तेसर श्रेणीक वंजर।

    गोचर भूमिमे अनेक प्रकारक घास लगाओल जाइत छल जे पशुपालनक हेतु प्रमुख छल। ई गोचर भूमि साधारण गाममे एक सय दंड, पैघ गाममे दुई सय दंड एवम् नगरमे चारि सय दंड छोड़ल जाइत छल। वंजर भूमिकेँ तोड़ि कऽ खेतीक योग्य बनाओल जाइत छल। एहन भूमिकेँ विद्यापति खील भूमि कहलखिन्ह। एहन प्रकारक भूमिमे खेती कएनिहार भू-स्वामीकेँ सात वर्ष धरि ऊपजक आठम भाग दैत छल। तत्पश्चात् भू-स्वामीक अनुसार उपजक स्वामीत्वमे परिवर्त्तन भऽ जाइत छलैक। एखनहुँ परती जमीनमे खेती कएनिहारकेँ सुविधा देल जाइत छैक। एहि सुविधाक समय निर्धारित नहि छैक। जगह-जगहपर अन्तर देखल जाइत अछि।

    ओहि समयक समाज दू वर्गमे बँटल छल। एक वर्ग राजा महाराजाक सामन्तादिक छल। एहन वर्गक लोकक खेती-पथारी दूर-दूर धरि होइत छलनि। ओतए ओ लोकनिक खेती करबाक....... कर्मान्तिक अर्थात् कमतियाकेँ रखैत छलाह। एकर अतिरिक्त आरो अधिकारी वर्ग ओकर काजक निरीक्षण करबाक लेल राखल जाइत छल।

    समाजक दोसर वर्ग दलित वर्ग छल जे स्वयं अपन खेती करैत छल। एहन वर्गकेँ खेतीमे अपन पत्नीसँ सेहो सहयोग भेटैत छलनि। खास कऽपशुक हेतु सभ प्रकारक व्यवस्था स्त्रीगणे द्वारा होइत छल। महादेवकेँ मैथिल होएबाक प्रमाण कहक ईहो भऽ सकैछ। हुनक सासु मैना स्पष्ट रूपसँ कहैत छथिन्ह-

    हमर धिया जखन सासुर जयतीह तखन ओ घास काटि लौती आ बसहा चरौती।

    खेती-परती हर एवम् कोदारिसँ ओहू समयमे कएल जाइत छल। हरक व्यवहार विद्यापति साहित्यक संगहि तत्कालीन साहित्यमे सेहो कतेको स्थलपर कएने छथि। विद्यापति अपन वर्ष कृत्यमे हरक मुहुर्त्तक उल्लेख कएने छथि। ओहि दिन बरदक सिंहमे मक्खन गूड़ आदि रगड़ल जाइत छल। प्राय: ओहि दिन धनी-मनी व्यक्ति हरक-फारक आगूमे सोना लगबैत छल। विद्यापति कहैत छथि सोन लगायब एक विधान छल।

    एक तरहक कहबी छैक वा लोक धारणा जे पंचमीक मुहुर्त्तमे हर जोतबा काल जौं बरद चित्कार करए वा मेमिया तँ चारि गुणा उपज होएबाक संकेत भेटैछ। ओहि दिन पॉंच सिरोर जोतबाक विधान छलैक।

    विद्यापतिक लिखनावलीक एक पत्रमे हरक हेतु धुरन्धर बरदक चर्चा आयल अछि। खगौट भेलापर गृहस्थ एहन धुरन्धर बरदकेँ बन्हकी रखैत छल। एहिसँ ओहि समयक समाजक लचरल अवस्थाक परिचय भेटैत अछि। सम्पन्न गृहस्थ हरबाह खेत जोतबाक निमित रखैत छल। हरवाहीक अलाबा अन्यो काज हरबाहसँ करबैत छलाह।

    विद्यापतिक एक पद्यमे उल्लेख आएल अछि जे गौरी शिवसँ खेती करबाक लेल कहैत छथिन्ह, तखनुक ई पॉंति अछि-

    खटंग काटि हर हर जे बनाविअ,

    त्रीशूल तोड़ि करू फार।

    बसहा धुरन्धर हर लए जोतीय,

    खेत खोला पहाड़।

    धनी-मनी व्यक्तिक ओहिठाम कमतियाक ऊपर महत्म होइत छल जकरा निरीक्षक समान पद होइत छलैक। कामत परक खेती-पथारीक सभ प्रकारक खबरि कमतियासँ लैत रहैत छल। कोन खेतमे कोन तरहक अन्न उपजाओल जाय संगहि खेत कोना जोतल जाय, कोन खेतमे आरि ऊँच्च कए बान्हल जाय संगहि कोन खेतमे कतेक लागत लगाओल जाय इत्यादि इत्यादि तकर जिज्ञासा महतम कमतियासँ करैत छल।

    विद्यापतिसँ पूर्व मैथिली डाक आ घाघ भेल छलाह जनिका मिथिलाक कृषि कार्यक उद्गेता कहल जाइछ। मै. डाककेँ प्रकृतिक गहन अध्यययन छलन्हि। एखनहुँ डाक वचनावलीक अनुसार मिथिलाक गृहस्थ कृषि कार्यक समीक्षा कऽ समेत भऽ जाइत छथि। डाकक कहब छल- गृहस्थ छोट-क्षीण बरद नहियोँ राखथि मात्र दुई गोट धुरन्धर बरद कीनि खेती करथि। अपन खेती भेलापर अनको खेतीक हेतु मंगनी देथि। हुनक शब्दमे-

    नाटा बरद बेचि कए, दुई धुरन्धर कीन,

    अपन खेती करि कए आनकेँ मंगनी दीन।

    एतबे नहि, ओ कहने छथि खेतक उपजा जोतपर निर्भर करैत अछि।

    थोड़ के जोतिए अधिक मइ अविए,

    ऊँच के बान्हिए आरि।

    जौं खेत तैयो नहि उपजए तँ

    डाक के परिएह गारि।

    एहि लेल विद्यापतिकालीन ममहत्तम कमतियाकेँ सलाह दैत छलाह जे हरसँ तैयार कएला बाद खेतकेँ कोदारिसँ साधब उत्तम होइछ।

    मिथिलाक कृषिमे पर्याप्त वर्षाक अभाव प्राग ऐतिहासिक कालहिसँ रहल अछि। मानसून एतुका हेतु जुआवाजी कहल गेल अछि। किएक तँ अति वृष्टि अनावृष्टि आ दुर्भिक्षक शिकार एतुका गृहस्थ होइत रहलाह अछि। तेँ पटौनीक प्रभाव समय-समय पर होइत छलैक।

    विद्यापति साहित्यमे सेहो पटौनीक उल्लेख भेटैत अछि। पटेबाक एक यंत्र विशेषक चर्चा कएने छथि। यथा- रहट संस्कृत अरधदृ आ प्राकृतिक अरहट्ठ। एहि मंत्रसँ अहुखन इनारवा कूपसँ पानि बहार कएल जाइछ। एकर अतिरिक्त चर, चॉंचर, डबरा, खत्ता आ पोखरिसँ करीन द्वारा पटौनीक काज लेल जाइत छल। तत्कालीन राजा द्वारा बड़का-बड़का पोखरि खुनाओल गेल छल।। मिथिलामे एहन अनेको पोखरि विद्यमान अछि, जकर सकल आब बदलि गेल छैक। एहि तरहक पोखरि रजोखोरि कहबैत छल। किवदन्ति छल जे दैत्य द्वारा एहन विशाल पोखरि खुनल गेल छल।

    विद्यापति तँ भाव नदीक उल्लेख कएने छथि- गौरी जखन शिवसँ खेती करबाक आग्रह कएलनि तँ शिव कहलथिन्ह-

    सभ बात मानल मुदा पानिक अभाव भेलापर की होयत?तखन खेती तँ करब असौकर्ज होएत।

    एहिपर गौरी उत्तर देलनि-

    पाटय सुसरि धारा।

    एहिसँ ज्ञात होइत अछि जे तत्तयुगीन मिथिलामे पटौनीक काज गंगानदीसँ कएल जाइत छल।

    ओहि समयक कृषकमे प्रगाढ़ प्रेम होइत छलनि। एक-दोसरक हित चिन्तनक संग अति आदरक भाव रखैत छलाह। खेतसँ उपज निर्विघ्न ..... आब तेँ बाधक हेतु रखवार राखल जाइत छल। अहुखन मिथिलाक गाममे रखवार रखबाक प्रथा अछि। रखवारकेँ विशेष अधिकार गृहस्थक द्वारा देल गेल छल। कहुखन ई रखवार खेतक पूर्ण उपजकेँ हथिया लैत छल जे विद्यापतिक पदसँ ज्ञात होइछ-

    खेत कएल रखवारे, लूटल ठाकुर सेवा भोर।

    यदा-कदा एहनो होइत छलैक जखन खेतीक समय बीति जाइत छल तखन वर्षा होइत छल। जेकर विद्यापतिक पदसँ पुष्टि होइछ-

    समय गेले मेघे वरिसब,

    की दहु तेँ जलधार।

    एहना स्थितिमे वर्षाक पानिकेँ रोकबाक हेतु खेतमे ऊँच्च आरि बान्हल जाइत छल ताकि खेतसँ पानि ससरि नहि जाय। विद्यापतिक पद्यसँ संकेत भेटैछ-

    गेला पीड़ पिरोधक की फल।

    पुन: विद्यापति अपन रचनामे प्रेम रूपी फूलक हेतु शीलक आरि बान्हि मर्यादाक रक्षा कएने छथि-

    फूल एक फूलवारि लगाओल मुरारि,

    जतने पटओलन्हि सुवयन वारि।

    चौदिस वॉधलि सीलक आरि,

    जीव अवलम्वन करू अवधारि।

    एहिसँ ईहो ज्ञात होइछ जे लोक भूमिकेँ छोट-छोट टुकड़ीमे बाँटि खेती योग्य बनबैत छल। विद्यापतिक समयक कृषकक समस्त उपजाक अन्नक उल्लेख कतहु एकठाम नहि भेटैत अछि। तखन एतए मसूरी, राहड़ि, सरिसो, तिल जौ आदिक अवश्य उत्पादन होइत छलैक। जतेक प्रकारक अन्नक उल्लेख भेल अछि ओ सभ अन्न विभिन्न अवसरपर मिथिलामे विभिन्न देवी देवताक प्रसन्नताक हेतु दान कएल जाइत छल। एकर सांगोपांग वर्णन विद्यापतिक वर्षकृत्यमे भेटैत अछि।

    अनुकूल समयसँ यथेष्ट उपज होइत छलैक। गृहस्थी नीक हालतमे भेलासँ मिथिलाक लोक बाहर नहि जा कऽ घरहि रहैत छल। कहबी छलै-

    कर खेती घरही भला।

    इएह कारण छल जे एतुका जनमानस वाह्य परिवेशक अनुभवसँ वंचित रहक। विद्यापतिक पूर्व जहिना गृहस्थीसँ उदास लोक छल तहिना कविक रचनाक प्रभावसँ गृहस्थीक ओर झुकाव भेल छल। खेतीसँ उत्पन्न अन्नक उपयोग मोला व्यवस्था द्वारा चलैत छल। मोलाक अन्तर्गत क्रय-विक्रयक विधान छल। एकरो उल्लेख विद्यपतिक लिखनावलीमे आयल अछि। तौल-नापक व्यवस्थामे टंक और मानी पांथी चलैत छल। 4 मानी एक टंक होइत छलैक। ओहि समयक 1 मानी आजुक 16 सेरक बरा-बर होइत छलैक।

    खेतसँ पर्याप्त धानक प्राग्रिक प्रमाण छलैक जे पैघ गृहस्थ डेढ़िया वा सवाईपर कर्जा लगबैत छलाह। कर्जाक अदायगी अगहन मासमे नवका धान भेलापर होइत छलैक। विद्यापतिक लिखनावलीमे कृषि सम्बन्धी चर्चा विलक्षण ढंगसँ कएल गेल अछि।

    अस्तु...!

     

     

    विद्यापतिक रचनामे विरह वर्णन

    विद्यापति अपन वहुमुखी प्रतिभाक परिचय अपन रचनामे देलन्हि अछि, मुदा काव्य प्रतिमाक वास्तविक परिचय सुनक विरह गीतसँ होइत अछि। प्रेमक प्रगाढ़ता संयोगमे नहि वियोगेमे होइत छैक। महाकवि राधाक विरह-वेदनाक सजीव आ मर्मस्पर्शी वर्णन कएलन्हि अछि। जौं सूर विप्रलम्भ श्रृंगारमे गोपीक वेदनाक टीसकेँ भ्रमर गीतक अन्तर्गत उजागर कएलन्हि तँ विद्यापति सूक्ष्म दृष्टिसँ राधाक मनोदशाक विछोहावस्थाकेँ विरह गीत रूपमे उजागर कएल अछि।

    समयानुकूल विरहिणीक स्थितिक स्वाभाविक वर्णनमे विद्यापतिक कलम माजल छन्हि।

    साहित्य शास्त्रमे श्रृंगार रसकेँ रस राजक संज्ञा देल गेलैक अछि। कमनीयताक कारणेँ अन्य सभ रससँ एकर स्थान उच्च मानल गेलैक अछि। कविक वर्णनमे सत्यता रहबाक ....... ई सत्यता प्रेम वर्णनमे सर्वाधिक पाओल जाइत अछि।

    प्रेमक चित्रणमे विरहकेँ महत्वपूर्ण स्थान देल जाइत छैक। विरहक द्वारा प्रेमक प्रगाढ़ताक पूर्ण परिचय भेटैत छैक। विरह ओ कसौटी थिक जाहिपर प्रेम सुवर्णक परीक्षा होइत अछि। एकर अधिकतामे प्रेमी एवम् प्रेमिकाकेँ एक दोसराक प्रति वास्तविक भावावेश एवम् तन्मयता होइत अछि। विरह प्रेम जीवक एक मर्मस्पर्शी घटना थिक। एहिसँ प्रेमक परिपुष्टि होइत अछि। विरह एक प्रकारक पुट थिक। बिनु पुटे वस्त्रपर रंग नहि चढ़ैछ।

    साहित्य-दर्पणमे उल्लेख अछि-

    न बिना विप्रलम्भेन संयोग: सुखमश्नुते, कषामिते हि वस्त्रादो भूयान राग: प्रवर्त्तेत।

    अर्थात् बिनु विरहक प्रेमक स्वतंत्र सत्ता नहि। एही रूपेँ बिनु प्रेमक विरहक अस्तित्व नहि। प्रेमक अग्निकेँ प्रज्जवलित करैछ विरह-पवन, प्रेमक अंकुरकेँ बढ़बैछ विरह जल, प्रेम दीपक वर्त्तिकाकेँ उस कबैछ विप्रलम्भ। विरह-वेदना मधुममी होइछ। एहिमे रूदन एवम् आमोद सामने मालित होइछ। संयोगक अवस्थामे हृदयमे आशा एवम् निराशाक ओतेक द्वन्द्व नहि होइत अछि जतेक विरहक अवस्थामे। वरहमे वासनाक अन्धकार प्राय: लुप्त भए जाइत अछि तथा प्रेमक विशुद्ध अनुभूतिमे विरही डूबि जाइत अछि।

    श्रृंगार तथा विरहक एतेक महत्वकेँ जनैत विद्यापति अपनाकेँ ओहिसँ फराक कोना रखितथि? एहि विरह वर्णनक हेतु विद्यापतिक लेखनी सेहो चलल आ चलबेटा नहि कएल अपितु अपना रचना शक्तिक भाव एवम् अनुभूतिक बलसँ सम्स्त भारत वर्षकेँ भाव-विभोर कए देलक।

    विरह-वर्णनमे विद्यापति हृदयक अनेक भावकेँ निरलंकारिक भाषामे रखि सरलतासँ चित्रित कएल अछि जे ओ भाव सभ हृदय पटलपर स्वभावत: अपन अधिकार स्थापित कए लैछ।

    विद्यापतिकेँ महाकवि कहएबाक एक प्रधन कारण ईहो थिक जे विरह एवम् विरहक पश्चात् मिलनक वर्णनमे हिनकर स्थान उच्चत्तम रहल अछि। एहि मिलनमे ओ जे अपन स्वाभाविकता भवुकता सुन्दर कल्पना तथा पद्य योजनामे कमनीयता देखाओल अछि से एक महान कविए सँ सम्भव भए सकैछ। प्रेम सूत्रमे ग्रथित नायक लोकनिक चित्र हुनक काव्यमे सहसा जीवनक यांयलय प्रदर्शित कए देलक।

    पं. जगन्नाथ साहित्य दर्पणमे विरह अथवा काम दशाक दश अवस्था कएल गेल अछि-

    अभिलाषाश्चिन्ता स्मृति गुण कथनो द्वंग संप्रलाप उन्मादो व्याधिर्जड़ता मृति रिति दशात्रश्य कामदशा अर्थात् स्मरण, गुण-कथन, अभिलाषा, मूर्च्छा, व्याधि, उद्वेग, प्रलाप, जड़ता, उन्माद एवम् मरण। एहि दस अवस्थाक अतिरिक्तो अनेक भावक चित्रण विद्यापतिक कएलन्हि अछि। विरहक महत्वपर दृष्टिपात करैत विद्यापति लिखैत छथि-

    जेहन विरह हो तेहन सिनेह।

    प्रेमक असली स्वादक अनुभव विरहेक अवस्थामे वास्तविक रूपसँ भेटैत अछि। विद्यापतिक विरह व्यथिता राधिका अनभिज्ञ छथि। हुनका समीपमे नहि छथिन्ह। राधा हुनक वियोगमे शुक्क शीर्षा सुमनक सदृश्य धाराशालिनी छथि। हुनक अश्रुप्रवाहसँ भूमि कर्दमचुक्त भए गेल अछि। राधा ओहि थालबला भूमिपर लेटा रहली अछि। हुनक सखी सभ कृष्णक आगमनक आश्वासन दैत छथिन्ह परन्तु ई आश्वासन विरहग्निमे घीक काज करैत छन्हि। हिनक यौवन विरहक वेदनासँ दिनानुदिन क्षीण भए रहलन्हि अछि। ..... हुनक व्यथा अधिकतर भए जाइत छन्हि।

    विद्यापति राधाक हृदयक मनोवैज्ञानिक वर्णन करैत छथि-

    अंकुर तपन ताप यदि जारब, कि करब वारिदमेहे,

    ई नव यौवन विरह गमाएब कि करब से पिया ने हे।

    हरि हरि की इए दैव दुराशा,

    सिन्धु निकट यदि कंठ सुखाएब के दूर करत पिया सा।।

    एहिठाम दृष्टान्त दए राधिका जे अपन हृदयक दुख रखलन्हि अछि से सहृदय संवेध थिक। सहसा भावावेशमे आबि विधाताकेँ हरि-हरि की दए वैव दुरालाकहि भर्त्सना करैत अछि। एतए मधुमणी वेदनाक चित्रण कएल गेल अछि।

    सखीक सम्वादसँ जखन काज नहि चलैत छन्हि तखन राधा स्वम कृष्णकेँ रोकबाक प्रयास करैत छथि-

    माधव तोहे जनु जाए विदेशे

    हमरो रंग रभस लए जएबए लएवह कोन संदेशे,

    बनहि गमज करू होइत दोसर मति विसरि जएवए पति मोरा।

    हीरा मणि माणिक एको नहि मांगव फेर

    मांगव पहु तोरा।।

    एतए राधाक प्रेमक अलौकिक रसास्वाद अछि। तर्कक अनुसार आदान-प्रदान सेहो होएबाक चाही। रंग-रभसक प्रति बदल की दए सकताह? ओ थिक कृष्णक प्रेम। राधाक याचना। फेर मांगव पहु तोरा, नि:स्वार्थ प्रेमक भाव स्पष्ट रूपसँ प्रदर्शित भेल अछि।

    कृष्ण मथुरा प्रस्थानक वार्तासँ सम्पूर्ण गोकुल शोका कुल भए गेल अछि। सर्वत्र अश्रुक प्रवाह एवम् करूण चीत्कार प्रारम्भ भए गेल-

    अव मथुरापुर माधव गेल, गोकुल

    गोकुले उछलला करूणाक रोल नयन जले

    देख बहए हिलोल। 

    राधा बहुत दिनसँ आशा लगौने छलीह जे कृष्ण औताह। अवधिक अवसान भऽ गेल। बाट तकैत-तकैत ........... भए गेलन्हि। अन्तमे निराश भऽ विलाप करए लगलीह।

    लोचन धाम फेदायल हरि नहि आएल रे,

    शिव-शिव जिवओ ने जाए आस अरू झाएल रे।

    पहिने राधिका कृष्णक प्रेमक केन्द्र विन्दु छलीह। एखन सभटा विपरीत भए गेलन्हि अछि। तखन अपनाकेँ सॉंझक तारा बुझैत छथि। जकर दर्शन अशुभ होइछ, संगहि भादवक चौठीक चान अपन मुखकेँ बुझैत छथि जकर र्दन अशुभकारी मानल जाइछ- विरहाग्निमे दग्ध राधिकाक लेल ई जतबा आश्चचर्यक विषय भेल ओतबए लाजोक। विरहाग्निसँ जर्जरित राधाक हृदयक टीस स्पष्ट अछि-

    की हम सॉंझक एकसरि तारा, भादवचौठीक शशी,

    इथि दुहु झांझ कओन मोर आना जे पदुहँखि न हेरलि।।

    कालिदासक श्ति अपना विलापमे कहैत छन्हि-

    मदनेन विना कृतारति: क्षण मात्र किल जीवितेतिमे,

    वचनीय मिदं व्यवस्थितं रमणस्वा मनुयामि।

    यद्यपि।

    एतएव देखैत छी जे विद्यापति कालिदासहुक विरह-वर्णनसँ टपि जाइत छथि। एतए विरह वर्णनमे कविक कल्पनाक चातुर्यादर्शनीय अछि-

    लोचन नीर तटनि मिर माने, ततहि कलामुखि करए सनाने।

    सरस मृणाल करहजप माली, अएनिस जप हरिनाम तोरूनी।।

    अर्थात् विरहिणी राधिका नयनक अश्रुसँ नदीक निर्माण कए ओहीमे स्नान कए रहल अछि, तात्पर्य जे ततेक अश्रुपात भेलन्हि अछि जे ओ नारीक रूपधारण कए लेलक अछि।

    कृष्णक मिलनक आशा समाप्त भए गेलापर नायिका राधा अपन सौन्दर्यक त्याग करए लगलीह अछि। मात्र शरीर एवम् स्नेह बचि गेल छन्हि-

    सरदक रसधार मुख रूचि सोपलक हरिन के लोचन लीला।

    केसपाल लए भामरि के सोपलक पाए मनोभव पीला।।

    पावसकालीन विरहोद्वेगक एकसँ एक उत्तम पद्य पदावलीमे पाओल जाइत अछि। दु:खाभिभूत राधाक करूण क्रन्दन हृदय विदारक एवम् करूणोत्पादक अछि। एहि समयक प्रत्येक वस्तु जे संयोगक अवस्थामे आनन्द दायक अछि राधाक हृदयकेँ विदीर्ण कए रहलन्हि अछि। प्रियतमक विरहमे ओ सभ वस्तु कष्टदायक छन्हि।

    सखि हे हमर दुखक नहि ओर...।

    विद्यापति कह..... दिन रातिया।।

    एहि पदक अक्षर अक्षरसँ मग्न हृदयक हाहाकार प्रति ध्वनित भए रहल अछि। दुखक आगि ज्वालामुखी बनि फूटि पड़ल अछि। हरि बिनु केसे गमाओल दिन रातियाक भावक कविता रवीन्द्रनाथ सेहो लिखलन्हि अछि-

    तुमि यदि नादाओ, करो अमाम हेला।

    केमन करे कारबे आमार एमन बादल बेला।।

    संस्कृत साहित्यमे एहि प्रकारक अनेक वर्णन अछि-

    इतो विधुद्वल्ली विलसित मित: केतकितरो,

    स्फुरद्गन्ध प्रोधजलद निनाद स्फूर्जितमित:

    इत: केलिक्रीड़ा कलकलख: पक्ष्मलद्वशां

    कथं भात्स्यन्तेते विरह दिवसा: संमृतरसा:।।

    राधाक प्रेमक तन्मयता एतेक बढ़ि गेल अछि जे ओकर वर्शान्त नहि भए सकैत अछि। ओ कृष्णक नाम लैत-लैत एतेक तन्मय भए गेल छथि जे ओ अपनाकेँ स्वयं कृष्ण मानए लगैत छथिन तथा राधा-राधा जपए लगैत छथि। तत्क्षणहि हुनका अपन वास्तविक दशाक ज्ञान भऽ जाइत छन्हि। तथा विरहक तीव्र वेदनासँ ओ आुल भए उठैत छथि।

    अहुखन माधव-माधव रटइत राधा भेलि मधाई।

    भेल सन्देह।।

    एतए प्रेम पराकाष्ठापर पहुँचि गेल अछि। नायिका राधाक रूपमे सेहो तथा कृष्णक रूपमे सेहो दुनू अवस्थामे मर्मव्यथा सहैत छथि। एहि पदमे विद्यापति प्रेमक तन्मयताक एहन चित्र उपस्थित करैत छथि जे संसारक सम्पूर्ण साहित्यमे अपन सभता नहि रखैत अछि। इहि प्रकारसँ विरहमे मिलन एवम् मिलनमे विरहक वर्णन विद्यापतिहिक उत्कृष्ता थिक।

    विद्यापतिक विरह वर्णन कएक विशेषता ई अछि जे हुनक नायिका विरहमे रहितहु अपन भाग्यक दोष दैत छथि नायकक नहि। हिनक राधिका कुलवती ललना छथि तेँ प्रेममे जतेक बाधा, यातना आर जतेक व्यथा सहैत जाइत छथि हुनक प्रेम सोना जकाँ ओतेक चमकैत जाइत छन्हि। स्वप्नोमे ओ कृष्णकेँ कटुक्ति नहि कहैत छथि। अप्पन कर्मक दोष तथा कि करत नाए दैव भेलवाम।

    एहि प्रकारे अछि-

    सखि कहि कहब अपतोष, हमर अभाग पियाक नहि दोष।।

    अन्तमे युग-युग जीवथु लख कोष हमर अभाग हुनक नहि दोष।।

    विरहिणीक चित्रण कालिदासक शब्दमे-

    कल्याण वुद्धैरथवा तवाणं न कामचारी ममिशंक नीय:।

    ममैव जन्मान्तर पातकानां विपाक निस्फूर्जथुर: प्रसक्ष्य।।

    सीता सेहो पूर्ण जन्म पापकेँ अपन दुखक कारण मानैत छथि। एक स्थलपर तँ राधा निराश लऽ मृत्युक अभिलाषा करैत छथि जे भावोत्पूर्ण अछि-

    आन करह हिय विहि कएल आन,

    अवहु न निक सभ कठिन परान।।

    विद्यापतिक विरहमे प्रकृतिक उद्दीपन, रूपक चित्रण श्रृंगार रसक स्थायी भाव रतिकेँ जाग्रह करबामे सफल भेल अछि। जाग्रतावस्थामे तँ कृष्णसँ मिलन असम्भव अछिए, स्वप्नहुमे नायिकाकेँ कृष्णसँ मिलन नहि भऽ पबैत छन्हि। तेँ नीन नहि होइत छन्हि-

    सपनहुँ संगम पाओल, रंग बढ़ाओल रे

    से मोर विहि विधटाओल नीन्दओ हेरायल रे।।

    निन्द होइतन्हि कोना? ओ तँ प्रियतक संग विदेश चल गेलन्हि-

    सपनेहु तिलाएक तन्ह सों रंगे,

    निन्द विदेसल तन्हि पिआ संगे।।

    कालिदासक मत्तिणी- त्वंहितस्म प्रियेतिकहि कऽ पतिक विरहकेँ ........... करैत छथि। किन्तु एतए काकक भाषासँ प्रियतमक आगमनक प्रतीक्षा एवम् आकुलताकेँ नव जीवन देल गेल अछि-

    काक भाष निज भाषहु रे, पिय आओत मोरा

    क्षीर खीर........................ कनक कटोरा

    सोमे चलु.................. पिआ आओत मोरा।।

    जखन विरहक कष्ट असहय भऽ जाइत छन्हि तँ सन्देश पाठवए चाहैत छथि-

    के पतिया ले जाओत रे...। पास भेल साओन मास।

    विद्यापति विरहक सूक्ष्मसँ सूक्ष्म दशाकेँ देखलन्हि तथा ओहिसँ अपन हृदयक सम्बन्ध स्थापित कएलन्हि। ई विरहक प्रत्येक दशाक वर्णनमे अनुभूति पक्ष सर्वथा ऊँच स्तरक एवम् मनोग्राही रहल अछि। विद्यापति नायक-नायिका दुनूक विरहक चित्रण कएलन्हि मुदा स्मरणीय जेहन आकर्षक राधाक विरह वर्णन भेल अछि तेहन कृष्णक नहि यथा-

    अइसन नागर अइसन नव नागरि अइसन सम्प मोर,

    राधा बिनु सब बाधा मानिए नयन तेजिअ नोर।।

    वास्तवमे राधा एवम् कृष्णक प्रेम सागर सागरोपम्थिक।

    विरहमे सज्जनक प्रेम आओरो अधिक निखरि जा उठैत अछि। विद्यापति स्वयं लिखैत छथि-

    सुजनक प्रेम हेम समतूल,

    दरूइते कनक दुगुन होए मूल।।

    टुटइते नहि टुट प्रेम अद्भुत,

    ये सन बढ़ए मृणालक सूत।।

    विद्यापतिक विरह वर्णन विश्व साहित्यमे अपन स्थान मूर्घन्य बनौने अछि। हिनक भाव प्रारम्भमे लौकिक स्तरक तथा वैयक्तिक रहैत अछि, किन्तु जखन गम्भीरताकेँ प्राप्त करैत अछि तखन अलौकिक, समष्टि सूचक एवम् विश्वक निधि भए जाइत अछि।

    भाव पक्षक संगहि संग विरह वर्णनमे हिनक कला पक्षक समावेश सेहो पूर्ण रूपसँ भेल अछि। कलात्मकता कृत्रिम नहि अपितु स्वाभाविक अछि। अनुभूति व्यक्त करबामे सरलता अपनाओल गेल अछि। शब्द चयन, वाग्वैदग्ध, एवम् सुन्दर उक्तिसँ हिनक वर्णन अलंकृत एवम् विभूषित अछि। कलापक्षक रसक परिपाकमे सर्वत्र सहायक भेल अछि।

    एहि प्रकारेँ देखैत छी जे विद्यापति अन्य भाषाक विरह-वर्णनसँ अधिक उत्कृष्ट वर्णन कएने छथि। अन्य विशेषताक संग भाव पक्ष श्रेष्ठ रहितहु कलापक्षक उपेक्षा नहि भेल अछि। भावक गम्भीरताक अभिव्यक्तिक मनो वैज्ञानिक ढंगसँ कएल गेल अछि। मिथिलाक संस्कृतिक अनुपालन सर्वत्र करैत विरहिणीक शब्द-शब्दसँ वेदना नि:श्रृत भेल अछि।

     

     

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