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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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  • श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल

    लघु कथा

    चहकल विचार

    काल्‍हिये वरस्‍पैत काका हाइ स्‍कूलसँ सेवा निवृत्त भेला अछि। जिनगी भरिक नोकरीक भारसँ निवृत्त होइसँ पहिने मनमे खूब खुशी छेलैन जे बेटो-पुतोहु ठौर लगि कऽ जगरनाथेपुरीमे रहैए आ बेटियो सभ ठौरेपर अछि। जइ समैमे नोकरी शुरू केने रही तइ समैमे जेते मास दिन खटलापर दरमाहा भेटै छल तइसँ चारि गुणा बेसी (नव वेतनमान बनने) आब पेंशने भेटत। जहिना अखन धरिक जिनगीमे केकरो रोब-दाब नइ सहलौं तहिना भगवान आगूओ जिनगीक पार लगेबे करता।

    हाइ स्‍कूलक शिक्षणमे जिनगीक पैंतीसम बर्ख बीता वरस्‍पैत काका सेवा निवृत्त भेल छला। नीतिशास्‍त्रक विद्यार्थीसँ जे जिनगी शुरू केलैन ओ साठि बर्खक जिनगीक सीमानपर पहुँचा देलकैन। अखन धरि जइ घर-अँगनामे रहै छला ओ अस्‍थायी रूपे, मुदा आब स्‍थायी रूपे रहता, तँए दुनू परानीक ऐगला जिनगीक पहिल काज यएह स्‍थायित्‍व आनब छेलैन।

    तीन बजे भोरे नीन टुटिते वरस्‍पैत कक्काक मनमे एलैन जे अखन धरि दुनू परानीक बीच बिनु ठौर-ठेकानक जिनगी छल। कहियो गाए-महींस गनैक ड्यूटी करै छेलौं, तँ कहियो भोँटक बूथपर सवा किलो मिठाइ महावीरजी केँ कबुल, जाइ छेलौं। तहिना पत्नियोँक छेलैन। ओना बापक घरमे जीबैक सभ लूरि सीख नेने छेली। तेकर कारण छल जे पिता सदिकाल चरिया-चरिया कहैत रहै छेलैन जे अपन जिनगीक काज हर मनुखकेँ चीनहक चाही। हाथ-पएर सभकेँ छइहे, जखने ओकरा ओइ काजकेँ पकड़ैक लूरि भऽ जेतै तखने ढलानपर ढलकैत गाड़ी जकाँ जिनगी असानीसँ चलए लगत।

    ओना वरस्‍पैत कक्काक संग भेला पछाइत सुगिया काकी किसान परिवारक कन्‍याँसँ नोकरिहारा परिवारक कनियाँ बनि गेल छेली। तँए क्रियामे जहिना सभकेँ होइ छै तहिना सुगियो काकीकेँ भेले रहैन।

    तीन बजे भोरे वरस्‍पैत काकाकेँ नीन टुटिते पत्नीकेँ जगबैक विचारसँ बजला-

    पैछला चालि-ढालि छोड़ू, एते दिन दोसरक हाथमे छेलौं तँए दोसर जिनगी छल, आइसँ स्‍वतंत्र भेलौं। तँए जिनगीक चालि-ढालि सेहो ने तोड़ए-जोड़ए पडत। तहूमे जखन हम केतौ आ अहाँ केतौ चिड़ै जकाँ छेलौं तखुनका आ आब एक्के घर-दुआरिमे दिन-राति मनुख जकाँ रहब, से तँ अपने ने विचार करैत चलब।

    ओना सुगिया काकीक नीन सेहो टुटले छेलैन, मुदा चुपचाप अपन बुढ़ाड़ीक जिनगीक हिसाब लगबै छेली जे आब केतबो सींग कटा नेरू बनब से पार लागत। तहूमे दुनू परानी एक उमेरिये छी तँए रोगो-बियाधि  तँ ओहने ने धड़त।

    मने-मन सुगिया काकी वौआइते छेली कि वरस्‍पैत कक्काक अवाज सुनली।

    ओना वरस्‍पैत काका ओछाइन छोड़ि उठि गेल छला, तहूमे गाममे बिजली आबि गेने देहक पानिमे सेहो कनी-मनी करेन्‍ट आबिए गेल छेलैन। ओछाइनपर सुतले-सुतल सुगिया काका बजली- 

    दिन-रातिक वसन्‍त वेलमे किए औनाइ छी?”

    अपन मनक बाट पकैड़ वरस्‍पैत काका शेष जिनगीक दिशामे दिशा ताकए चाहै छला तँए पत्नीक बातकेँ नीक जकाँ अँगेज नइ सकला। अपने बेथे बेथाएल बेकती जकाँ वरस्‍पैत काका समाजिक जिनगीमे पएर रोपए चाहै छला। तँए विचारसँ लऽ कऽ समाजक सम्‍बन्‍धक क्रिया धरि संलग्‍न करबाक छैन। नोकरिहारा जिनगी रहने एते तँ भाइए गेल छेलैन जे गाममे नइ रहने छुतको केश आ सराधो-बिआहक भोज छुटि गेले छेलैन जइसँ समाजिक सम्‍बन्‍धमे सेहो कमी आबिये गेल छेलैन।

    वरस्‍पैत काका बजला-

    औनाइ कहाँ छी, पौनाइ तकै छी। दुनू गोरेक बीचक जिनगीक बात अछि किने, तँए दुनू गोरे जँ विचारि नइ चलब तँ सदिकाल दुनू परानियोँमे खटपट होइते रहत।

    जिनगीक अलिसाएल (माने अठबजिया सुति उठनिहारि) देह, मुदा पतिक विचार तँ सेहो दोसर पाशापर छेलैन्‍हे। अँघस-मँघस करैत सुगिया काकी उठली। उठि तँ गेली मुदा मनमे होनि जे कनीकाल आरो ओछाइन धेनहि रहितौं...।

    अपन ऐगला जिनगीक ओहन रूप वरस्‍पैत काका बनबए चाहै छला जेना समाजमे समाज बनि समाज रहैए। मुदा समाजो तँ समाज छी। सनातनी धारामे बहैत नीक-सँ-नीक आ अधला-सँ-अधलाकेँ अपन धारमे गलित-पचित करैत अनवरत बहैत आबि रहल अछि आ आगूओ बहैत रहत। भलेँ गदियाएल बेसी हुअए कि मटियाएल। मुदा वरस्‍पैत काका तँ नीतिशास्‍त्रक विद्यार्थी, विद्यार्थी जीवनसँ शिक्षक धरि रहला तँए मन बेसी ओम्‍हरे लटकल रहैन। ओना ई बात वरस्‍पैत काकाकेँ बुझल छैन जे नीति, रीति, गीत, मीत आ हित समए आ स्‍थानक अनुकूल चलैए। जँ से नइ चलैत तँ गीत गीते छी जे नीके लगैए मुदा समए-स्‍थानक भेद भेने किए कोइलीक स्‍वर कौआक भऽ जाइ छइ? 

    ओछाइनपर पड़ल सुगिया काकीक मन अग-दिगमे पड़ल छेलैन। जँ उठै छी तँ अपन सुखक नीन जाएत आ जँ नइ उठै छी तँ पतिक पतिपना जाएत। तहूमे काल्‍हिये सेवा निवृत्ति भेला अछि, लगले कहता जे जाबे कमाइ छेलौं माने नोकरी करै छेलौं आ हाथमे हरियरका कड़कड़ौआ नोट दइ छेलिऐन ताबे कमासूत पति छेलिऐन आ सेवा-निवृत्त होइते बोल-कहल भऽ गेली!

    सामंजस करैत सुगिया काकी बजली-

    अखन ऐ अधरतियामे केतए जाएब! आउ, अही ओछाइनपर बैस जिनगीक सूत्रधार जकाँ अपनो दुनू गोरे सुतियाउ।

    ओना पत्नीक जे आग्रह छेलैन से वरस्‍पैत काका नइ बुझि पेला। तेकर कारण भेलैन जे पत्नीक पहिल शब्‍द जे अधरतिया छेलैन, तेहीक वेद-भेद करैमे ओझरा गेल छला। जइसँ ओछाइन तक अबैत-अबैत धियाने हटि गेलैन।

    वरस्‍पैत काकाकेँ मनमे उठल छेलैन अधरतिया की भेल? यएह ने भेल जे जँ छह बजे सुर्यास्‍त होइए आ दोसर दिन छह बजे सुर्योदय हएत, तेकर बीचला सीमान बाहर बजे राति भेल। बाहर बजे रातिक पछाइत ने राति छोट होइत जाएत जइसँ अधरतिया बनत। अखन तँ रातिये राति ने राति चलत। मुदा भोरक उदय आ रातिक अस्‍त सेहो तँ एकटा सीमाने भेल किने। तैबीच जखन राति खटिया कऽ आधापर औत तखनो ने अधरतिया औत..?

    मनक ओझराएल विचारकेँ सोझरबैत वरस्‍पैत काका बजला-

    बड़बढ़ियाँ कहलौं। अहूँ उठि कऽ बैसू आ हमहूँ बैसै छी।

    नइ चाहितो सुगिया काकी उठि कऽ बैसैत बजली-

    अहाँ सिरमा दिस बैसब आकि गोरथारी दिस?”

    पौरुकी जकाँ जे तीन बजे भोरे घुटैक-घुटैक अपन मेदिनकेँ जगबैए आकि मेदिने घुटैक-घुटैक मेदकेँ जगबैए से तँ पौरुकीए जानए, मुदा वरस्‍पैत कक्काक मन अपन ऐगला जिनगीक सूत्रपात करैमे ओझराएल रहैन।

    बजला-

    दुनू परानीक बीच जेहने सिर तेहने गोर, तइले अनेरे किए बातकेँ बतंगर बनबै छी।

    बजैक क्रममे वरस्‍पैत काका बाजि तँ गेला, मुदा लगले मन पाछू घुमि छछाड़ी काटए लगलैन जे जेहने दुनियाँक रीति-प्रीत अछि तेहने तँ बेरीतो आ बेप्रीतो अछिए। किए कियो केकरो दस थापर मारि मनकेँ शान्‍ति दइए? जखन कि सभ बुझै छी जे विचारक मिलानसँ शान्‍ति अबैए, तहिना ने प्रेमी-प्रेमिकाक बीच प्रेम सेहो शान्‍ति दइए...।

    अपन विचारमे वरस्‍पैत काका डुमल रहैथ तँए मुहोँ बन्न रहैन आ ओछानिक कातमे ठाढ़ो रहैथ।

    पतिकेँ चुपचाप ठाढ़ देख सुगिया काकीक मनमे शंका भेलैन जे भरिसक मने-मन मन्‍हुआ ने तँ रहल छैथ। पति-पत्नीक बीच जँ पति मन्‍हुआ कऽ महुरा जाथि सेहो पत्नीक लेल उचित नहियेँ भेल। तखन तँ ई भेल जे पतिक अनुकूल पत्नी नइ छैथ वा पतिकेँ अनुकूल बनबैक कला पत्नीकेँ नइ छैन। अपनाकेँ पाछू दिस घुसकबैत सुगिया काकी बजली- 

    एकटा बात बुझलिऐ?”

    जिज्ञासा करैत वरस्‍पैत काका बजला-

    की?”

    मुस्‍की दैत सुगिया काकी बजली-

    स्‍वतंत्र जिनगीक पहिल राति दुनू परानीक छी?”

    स्‍वतंत्र जिनगी सुनिते वरस्‍पैत कक्काक मनमे गंगा-लहरिक ओ मौज जे जमुना धार होइत बहैए, भेटलैन। मुस्‍कान भरैत वरस्‍पैत काका बजला-

    सहए ने कहए चाहै छी!”

    कहि वरस्‍पैत काका पत्नी लगसँ सहटैत अपन ओछाइन दिस बढ़ला। ओछाइन लग अबिते औनाइत मनमे उठलैन जे जँ कियो जिनगीक सुत्रधारमे संगी होएत तँ जरूर जिनगीक दिशा निरंतर संग होएत। मुदा घरक जखन पत्नियोँ सएह छैथ तँ पड़ोसी आकि बहरबैया अखन भेटबे किए करता। ओहू वेचारा पड़ोसीक मनमे हेबे करतैन किने जे काल्‍हिये वरस्‍पैत गुरुजियाइसँ सेवा निवृत्त भेला अछि, धएल-उसारल लऽ कऽ एबे कएल हेता, जँ पेशावो करैकाल ओमहर ताकब तँ दुनू परानीकेँ मनमे हेबे करतैन जे रतिचर छी। जँ दुनू परानीक बीचक गप-सप्‍प रहैत तँ गोनू झाक चोरो पकड़ब होइत। मुदा सेहो नहियेँ अछि।

    ओछाइनिक कातमे ठाढ़ भेल वरस्‍पैत काका कुशेश्‍वर स्‍थान जकाँ हेरा गेला। माने ई जे जैठाम एक नइ अनेक धारक मिलान होइए। धारक पेट भलेँ हटलो-हटल किए ने होइ मुदा बाढ़िमे उफान एलापर सभ सभमे मिलिये जाइए। तँए कुशेश्‍वर स्‍थानक भवलोक तँ अगम अछिए। ओना, चण्‍डेश्‍वर स्‍थानमे सेहो सुपेन धार अछि, मुदा एक तँ जुति-भाँतिमे ओछ आ दोसर समूह नहि, असगरुआ अछि। तँए अपन ताले-मात्रा केते देखा सकैए। बड़ करत तँ धरतीसँ सटल ट्यूवेलकेँ डुमौत, मुदा पानियोँ पीबकेँ नहियेँ रोकि सकैए। धरतीसँ भरि छाती ऊपर उठा चबुतरा बना लोक पानिक जोगार काइए लेत आ चापाकलक पानि पीबे करत। मुदा कुशेश्‍वर स्‍थानमे धारक पानि बेराएब ओते असान अछि जे कोसी-सँ-कमला धरि आ करेहसँ तिलजुगा धरिक धारक पानिक संग मिलि हेलबो करैए आ समुद्री बाट पकैड़ चलबो करैए...।

    कछमछ करैत वरस्‍पैत काकाकेँ किछु फुरबे ने करैन जे की केने की हएत। अखन धरि किताबक ने कीड़ा बनि चटलौं मुदा समाजोक बीच तँ कीड़ा अछिए। ओकरा केना पकैड़ पएब..?

    अपन बीतल समय माने दुनू परानीक साठि बर्ख तँ वरस्‍पैत काकाकेँ आधा-छिधा मनो पड़ैन मुदा आगूक जे मृत्‍यु धरिक शेष जिनगी अछि, से बुझिए-मे ने अबैन। बुझबो धिया-पुताक धूरा-माटिक खेलो नहियेँ छी। ओना किताबी बोध भेने आगू-पाछू दुनूक नक्‍शा मन पड़ैन मुदा नक्‍शाक नक्‍शा केना बनत, जाबे नक्‍शा नै बनत ताबे नक्काशी केना आबि पौत? ऐठाम आबि वरस्‍पैत कक्काक मन घुरिया जाइन। तँए ने पुन: ओछाइनपर पड़ला आ ने आन दोसरसँ गपे-सप्‍प कऽ सकला।

    किरिणक लालिमा अकासमे पसरल। वरस्‍पैत काका बुझि गेला जे आब पौह फाटि रहल अछि, दिनक आगमन लगिचा गेल...।

    वरस्‍पैत काका पत्नी लग जा बजला-

    आब की कोनो नोकरीक जिनगी रहल जे आठ बजे तक ओछाइने धेने रहब। जाबे हम मुँह-कानमे पानि लइ छी ताबे अहूँ चाह बनाउ।

    ओना, सुगिया काकीकेँ सेहो चाह पीबैक इच्‍छा जगैत रहैन मुदा कोढ़िया लेल जहिना गंगा दूर अछि तहिना सुगियो काकीकेँ रहैन। तैयो वेचारी पतिक बातकेँ आदेश बुझि चाह बनबए उठली।

    चाह बनल। दुनू परानी चाह पीविते रहैथ कि पड़ोसीक एकटा दस-बारह बर्खक कन्‍याँ रस्‍ते-रस्‍ते दौड़लो जाइत आ बजबो करैत-

    सुमित्रा बहिन सीमा कातमे बैसल छथिन।

    ने ओ लड़की वरस्‍पैत काकाकेँ आकि सुगिया काकीकेँ किछु कहलकैन आ ने इहए दुनू गोरे किछु पुछलखिन।

    लड़कीक मनमे भेल जे भऽ सकैए जे जखन गामेमे बीआ-वान भेल अछि तखन माए-बापक कानमे केतौ नहि गेल होनि, सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए।

    सुमित्रा वरस्‍पैत कक्काक बेटी। मुदा बेटीक रूपमे अखन तक वरस्‍पैत काका सीमा कातमे बैसल सुमित्रापर विचार नइ केने छला। तँए मनमे भेलैन- गामे छी, केतेको लोकक नाओं सुमित्रा हएत।

    दोसर, ईहो भेलैन जे बेटी-जातिक लेल ने नैहर-सासुर अबै-जाइक विधि-विधान अछि, तइसँ हटल सेहो अछिए, तँए अखन तक दुनू परानीक मनमे ई नइ उठल छेलैन जे हमरे बेटी सुमित्रा छी।

    ओना अखन धरि सुगिया काकी उड़न्‍ती सुनने छेली, तँए उड़न्‍तीकेँ घरनी रूपक भाँजमे छली। मनमे एहेन विचारो केना जगितैन जे एकटा प्रशासनिक अफसरक परिवारमे–माने वरस्‍पैत कक्काक ओ बेटी प्रशासनिक अफसरक पत्नी छथिन–एना हएत। तँए एहेन विचार मनमे अबै ने दैन। एबो किए करितैन, जे जिला-जवारक भार उठा चलैबला अछि ओ परिवारमे लुल्‍हो-नाँगर केना भऽ सकैए। तही बीच अलोधनी काकी जे सुगिया काकीसँ उमेरदार छथिन, आबि कऽ सुगिया काकी लग बजली-

    कनियाँ, छोटकी बेटी आबि कहलक जे वरस्‍पैत कक्काक सुमित्रा बेटी सासुरसँ अधरतियेमे निकैल माए-बाप ऐठाम आबि गेली.!”

    तैबीच टोलक दस-बारहटा अबोध-सँ-सबोध धरिक लड़की आँगन पहुँच गेली। आँगनक सीमामे सभकेँ प्रवेश करिते सुगिया काकीक नजैर पड़लैन। तैबीच सुमित्रा रस्‍तेसँ ठोह पाड़ि कनैत आबि रहल छेली।

    ओना गाम-घरमे कननिहारो कम नहियेँ अछि, कियो दुखे आ कियो सुखे मुदा कनैत तँ सभ अछिए। तँए कियो अनका कानबपर किए धियान देत। अहीं कहू जे कन्‍याँदान सन समाजक कृति, दान-दहेज बेर माने बेटीक बिआह काल सभ डिरिआइ छी, मुदा छुच्‍छे डिरियेनौं तँ नहियेँ हएत। पढ़ल-लिखलसँ बिनु पढ़ल-लिखल धरिक लोक, किए ने बुझि पेब रहल छैथ जे परिवार-समाजक संस्‍कारसँ जुड़ल प्रमुख समस्‍या अछि, जैपर परिवार-समाजक नीब ठाढ़ अछि?

    जहिना बाघक आँखिपर आँखि पड़ने बघजर लगि जाइए तहिना सुगिया काकीकेँ सुमित्रापर पड़िते भेलैन। बघजर लगिते सुगिया काकी अचेत भऽ खसि पड़ली। खसला पछाइतो मनमे बेर-बेर उठैत रहैन जे ई की भेल.! एना किए भेल..?  

    ओना, ई सुगियो काकी आ वरस्‍पैतो काकाकेँ बुझल छेलैन जे दस बर्ख पूर्व जमाए दोसर बिआह कऽ नेने छला, जे अन्‍तर्जातीय छल।

    जहिना कानक गुज्‍जी निकालै-काल गोटे बेर रूइया कानेमे अँटैक जाइए आ कटकी निकैल जाइए, आ तखन वएह रूइया केते भारी कानकेँ लगै छै, से भुक्‍तभोगिये ने जनै छैथ मुदा रूइया सन हल्‍लुक वौस रहितो, एते भारी कानमे केना लगैए जे ठेकी जकाँ सुनबे बन्न कए दइए तहिना अँगनाक दृश्‍य भऽ गेल।, जे बच्‍चा-सँ-सियान आ चेतन-सँ-बुढ़ धरिसँ भरिया गेल छल। जेते मुँह तेते बोल...।

    वरस्‍पैत काकाकेँ सुमित्रा बेटी लग पहुँचैक साहस नहि भेलैन जे किछु पुछितथिन। ओसारक खाम्‍ह लगा ओंगैठ कऽ बैस अपन जिनगीकेँ निहारए लगला। भूल केतए भेल आ चूक केतए भेल? जा भूल-चूक नइ भेल ता एहेन दृश्‍य उपस्‍थित किए भऽ रहल अछि।

    ओना वरस्‍पैत कक्काक मन समस्‍याक हिसाबे भरियाएल नहियेँ रहैन, तेकर कारण ई जे मनो तँ मन छी, अधमनीसँ डेढ़ मनी धरि होइत अछि...। ओहन मन ने बेसी भरिया जाइए जे समस्‍याक भारीपनकेँ बेसी देखैत हुअए, मुदा जे ओइ भारीपन के देखबे ने करत, ओ ओकर भारीपन बुझिए केना पाबि सकैए। वरस्‍पैत कक्काक जिनगीमे ओहन परिस्‍थितिये ने बनल जे ओइ गहराइक तह तक पहुँच पेबतैथ।

    खाम्‍हमे ओंगठल वरस्‍पैत कक्काक नजैर सुमित्रापर गेलैन। पैंतीस बर्ख पूर्व सुमित्राक जन्‍म दोसर सन्‍तानक रूपमे भेल। ओना गाम-गामक अपन-अपन समाज चलिये आबि रहल अछि। कोनो गामक समाजमे कोनो जातिक वाहुल्‍य अछि तँ कोनोमे कोनो जातिक, जइ समाजक माने जइ जातिक वरस्‍पैत काका छैथ, ओ अल्‍पसंख्‍यक जातिक समाज अछि। एक-दू घर दसटा गाममे गनि-गूथि कऽ अछि। समाजक सम्‍बन्‍धक एकटा कारण ईहो ऐछे जे जेतेक दूरमे बेटा-बेटीक बिआह-दान होइए ओतेकक बीच समाजिक सम्‍बन्‍धक एक रूप-रंग सेहो बनियेँ जाइए। तँए सनातनी धारामे अबैत समाज टुट-नफा होइतो बहिये रहल अछि।

    जइ समाजक वरस्‍पैत काका छैथ, ओइ समाजमे दस बर्खक कन्‍याँ होइते बिआहक योग्‍य मानल जा रहल अछि। समुचित पद्धतिक अनुकूल लड़का-लड़कीक उमेरक हिसाबमे सेहो एकरूपता हएब जरूरी अछिए। जँ से नइ हएत तँ विधवाक बाढ़ि जोर पकड़बे करत। ओना विधवाक बाढ़ि जोर पकड़नहि अछि तेकर कारण आन-आन, अछि।

    तेरह बर्खक सुमित्राक बिआह सत्तरह बर्खक दीनबन्‍धुक संग भेल छेलैन। ओना कौलेजमे पढ़ैत दीनबन्‍धुक मनमे तत्खनात्‍ बिआह करैक विचार नइ रहैन, मुदा देखो-देखी आ समाजक चलैनक अनुकूल सेहो दीनबन्‍धु विरोध नइ कऽ सकल।

    बिआहक तीन सालक पछाइत दुरागमन भेलैन, तइ बिच्‍चेमे दीनबन्‍धु नोकरी लेल प्रतियोगिताक परीक्षाक तैयारी सेहो पूरा कऽ लेलैन। परीक्षामे नीक रिजल्‍ट भेलैन, प्रशासनिक अफसरक बाट प्रशस्‍त भेलैन।

    दुरागमनक पछाइत सुमित्रा सासुर एली। एक तँ किसान परिवार, दोसर पाछूसँ अबैत परम्‍पराक बीच सुमित्रा अपन जिनगी बितबए लगली।

    ओना दीनबन्‍धुक प्रेमक अँकुर विलासनीक संग ट्रेनिंगे समैमे अँकुर गेल रहैन। मुदा ओ प्रेम, संगी-साथीक रूपक छेलैन। ट्रेनिंग केला पछाइत एक्के जिलामे दीनबन्‍धुओ आ विलासनियोँ पदस्‍थापित भेलैथ। पदस्‍थापित भेला पछाइत दुनूक बीच संगीक रूप छल। दुनूक जातियो दू अछि। अखन धरिक अबैत विचारमे जातिक दूरी मनमे बनले छेलैन।

    ओना जइ जातिक दीनबन्‍धु छैथ, ओइ जातिमे एकसँ बेसियो बिआह करैक चलैन जकाँ बनियेँ गेल अछि। माने ई जे जेते गाममे दीनबन्‍धुक जाति छैन, प्राय: सभ गाममे एकाध गोरे एहेन छैथे जे दू-तीन-चारि-पाँच बिआह केनहि छैथ। ओना परम्‍परानुकूल एक-पुरुखकेँ एक नारीक संग बिआहक चलैन अदौसँ आबि रहल अछि, मुदा पुरुखक लेल एकसँ बेसी बिआह करब एक्‍की-दुक्की अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए।

    तइसँ भिन्न विलासनी जातिक अछि। विरले एहेन अछि जे एकसँ बेसी बिआह केने छैथ। ओना, परिवार चलैक लेल केतौ-केतौ एकसँ बेसी बिआहक खगतो अछिए। जेना पहिल पत्नी माने बिआही कनियॉं जँ कोनो कारणे निसन्‍ताने मरि गेली, वा बाँझपन छैन वा कोनो एहेन रोगसँ ग्रसित छैथ, जइसँ जिनगीक भरोस उठि रहल अछि। एहने-एहने कारणे विलासनीक जातिमे विरले एकसँ बेसी बिआह होइत अछि।

    नव परिवेशमे जातिक सम्‍बन्‍धमे किछु ढील-ढीली, छुटपन आबिये गेल अछि। गामो-समाज तँ गाम-समाज छी, प्रेमक सेहो अपन आँखि होइते अछि। ओना आँखियो तँ आँखि छी, जे केतौ छिछड़पन अछि तँ केतौ गढ़पन सेहो अछि। छिछड़पन भेल उमेरक उमंगमे बहब आ गढ़गर भेल गुण-विशेषक आकर्षण।

    जहिना दीनबन्‍धु बी.ए. ऑनर्स अर्थशास्‍त्र विषयसँ केने छैथ तहिना विलासनी सेहो अर्थशास्‍त्रेसँ बी.ए. ऑनर्स छैथ। विषयो विषयक तँ अपन छाप पड़िते अछि। एक रंग हाइयो स्‍कूल वा कौलेजोमे रहितो विषयवार-प्रभाव नइ पड़ैए सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। ओना भाषाक रूपमे साहित्‍य सेहो दुनू गोरे कौलेज तक पढ़ने, मुदा भारतीय साहित्‍यक अपेक्षा अंगरेजी साहित्‍य बेसी। ओना अंगरेजी साहित्‍य पढ़ैक पाछू दुनूक मनसा यएह रहैन जे प्रशासनिक परीक्षा पास करब। ओना अर्थशास्‍त्रक प्रभाव दुनूक मनकेँ बेसी पकड़ने रहैन। जइ दुआरे प्रतियोगिता परीक्षामे पूर्णरूपेण अर्थशास्‍त्रो रखनहि रहैथ।

    गनले-गूथल प्रशासनिक अफसर जिलामे अछिए। तहूमे जे लगक रहता हुनकेसँ ने भेँटो-घाँट आ गपो-सप्‍प हएत। ओना, सरकारी सेवामे काजोक सम्‍बन्‍ध बनियेँ जाइए। सएह सभ कारण दीनबन्‍धुओ आ विलासनियोँक बीच भेबे कएल।

    आजुक परिवेशमे देशक बहुतो जगह एहेन ऐछे जइमे प्रशासनिक सेवाक रूपे बदलल जा रहल अछि आ वेपारीक रूप बढ़ल जा रहल अछि। साधारणो अफसरक लेल करोड़क खेल चलिये रहल अछि।

    नव पीढ़ीक उदीयमान शक्‍ति जे अनेको विषयक अध्‍ययन कऽ रहल अछि, ओकर इतिहास देख रहल अछि। तैठाम मनुखेक इतिहास छुटि जाए, सेहो तँ संभव नहियेँ अछि। विकास प्रक्रियामे आजुक परिवेशक इतिहास की कहि रहल अछि, ओ प्रशासनिके अफसर नइ बुझैथ तँ दोसर बुझिये के सकैए?

    दीबन्‍धुओ आ विलासनियोँ एक-उमेरिया घोड़ा जकाँ सरपट चालिमे दौड़ए लगलैथ। ओना दीनबन्‍धुक बिआह आ दुरागमन दुनू भऽ गेल छेलैन, मुदा किसान परिवार आ नोकरिहारा परिवारक बीचक जे खाधि सभ अछि, ओइ खाधिमे एकटा ईहो तँ ऐछे जे जँ पच्‍चीस बर्खक बेटा-पुतोहु अपन घर बसौता आकि माता-पिताक घरवास करता? प्रश्‍न तँ अछिए। खाएर जे अछि, मुदा दीनबन्‍धु अखन तक परिवारक संग माने पत्नीक संग नइ रहला।

    ओना विलासनियोँक उम्र चढ़ि कऽ डम्‍हा गेल छेलैन मुदा छेली अविवाहित। प्रश्‍न एहेन उठि गेल जे कन्‍याँ-जोकर बरे ने भेटैए। सरकारियो शासन कमजोरे अछि जे गनि-गनि ओकरा जोड़ा लगबै ने अबै छइ।

    अपन रंगीन भविस देख दुनू बिआह कऽ लेलैन। ओना जातीय संस्‍कार दीनबन्‍धुक सोल्‍हैनी नइ मेटाएल छेलैन मुदा घोड़ा हौउ कि घोड़ी, लगाम तँ लगौले जाइए। तइ सीमामे दीनबन्‍धु छिछैल जाइ छला। जइसँ लगाम विलासनियेँक हाथमे रहलैन। तहूसँ जबरदस दीनबन्‍धुक मनकेँ ई दबने रहैन जे जइ वादाक संग विलासनीक संगी बनल छी तइ वादाक अनुकूल तँ सुमित्राकेँ बिनु पतिक सासुरे बसए पड़तैन..! खाएर.., भेबो सएह कएल।

    मुदा समाजो तँ समाज छी। दीनबन्‍धुक पिता–सोनाइ–केँ समाज सलाह देलकैन जे अखन अपनो दुनू परानी हट्टा-कट्ठा छीहे मुदा नारीक तँ ई उम्र नारीत्व प्राप्‍त करक छिऐन। तँए अपने पुतोहुकेँ बेटाक डेरा पहुँचा दियौन।

    एक तँ जुआनीक लहैर, तैपर कुरसीक धाह दीनबन्‍धुकेँ रहबे करैन, पत्नीक संग पिताकेँ सेहो देखलैन।

    ओना अखन तक दीनबन्‍धु विलासनी लग ई चोरौने रहला जे सुमित्राक संग विवाहित छी। तँए चोटाएल गहुमन साँप जकाँ आँत ममोड़ि चुप भऽ गेला।

    एक नारीक जिनगीकेँ देख विलासनी ससुरकेँ कहलैन-

    जखन अपन लोक छैथ तखन किए ने रहती?”

    ओना विलासनीक विचार सोझगर छेलैन, मुदा मनमे रहैन अपनाकेँ चुल्‍हि-चौकाक कारिखसँ बँचाएब।

    सोनाइक नजैर दीनबन्‍धुपर पड़िते विलासनीपर चलि जाइन। नजैर जाइते मनमे खौंझ उठि जानि, अपन परिवारक ई गति। एक तँ समरथाइयोमे कियो केकरो भार नइ लिअ चाहैए, तैठाम तँ हम पचास टपि गेल छी।

    जिनगीक टुटैत धारमे सोनाइक टुटैत विचार भँसिया रहल छेलैन। अन्‍हार, दुनियाँक चारूकात अन्‍हार, की यएह छी मनुखक जिनगी..?

    जिनगीक पछाड़मे पछड़ैत सोनाइ विलासनीकेँ कहलखिन-

    परिवारक रत्न पैदा करैवाली सुमित्रा छैथ, नोकरनियोँ बनि जँ रहती तैयो अपन परिवारक सुख हेबे करतैन।

    धीरे-धीरे लोकक भीड़ कमए लगल। जेना-जेना लोकक भीड़ कमल तेना-तेना सुगिया काकीक मन सेहो हल्‍लुक हुअ लगलैन। अन्‍तो-अन्‍त टोलबैयासँ ऑंगन खाली भेल। खाली होइते सुमित्रा वरस्‍पैत काका लग पहुँच, पएर पकैड़ कानैत बजली-

    पिताजी, हमर नारीत्‍व नइ भेटत?”

    वरस्‍पैत कक्काक दुनू आँखिसँ अन्‍हार रातिक वरिसैत वादल जकाँ नोरक टघार चलिते रहलैन। मुदा उपाइए की? अपन दोख मेटबैत वरस्‍पैत काका बजला-

    हमर कोन दोख।

    बाजैक क्रममे वरस्‍पैत काका बाजि गेला। मुदा लगले मन रोकैत कहलकैन-

    तखन दोख केकर?”

    जिनगी भरि वरस्‍पैत काका नीतिशास्‍त्रक विद्यार्थी, शिक्षक रहला मुदा समाज जे घृणित अनीतिमे बहि रहल अछि, ओकराकेँ सम्‍हारत। मुदा मनुख एक रहितो विचारो आ बेवहारोमे हटल-हटल अछिए। वरस्‍पैत काका विद्यालयमे शिक्षण वृत्तिसँ जुड़ल रहला तँए समाजक रीति-नीतिसँ हटल नइ रहला सेहो नहियेँ कहल जा सकैए।

    जहिना हवामे कखनो-कखनो झोंक अबैए तहिना वरस्‍पैत कक्काक मनमे रहि-रहि कऽ झोंक उठैत रहैन, मुदा अपना लग अबैत-अबैत झोंकक झोंकी झूकि जाइन। फेर झोंकाएल मनक नजैर पड़लैन- समाजक दर्पण अपन साहित्‍यपर। यएह दर्पण साहित्‍य छी? अही साहित्‍यसँ सबहक हित हएत?

    मुदा अपना लग अबैत-अबैत वरस्‍पैत कक्काक अपने मन दुतकारि दैन जे समाजक सन्‍तान रहनौं समाजसँ दूर रहलौं, जँ समाजक संग रहितौं तँ केतौ-ने-केतौ हमरो जगह तँ रहबे करैत। समाजक बुधिजीवी श्रेणीक रहितो हम केतए छी?

    नीक जकाँ वरस्‍पैत कक्काक मन थीरो ने भेल छेलैन कि दोसर उमकी चढ़लैन। उमकी चढ़िते मुँह फुटलैन-

    समाजेक सन्‍तान ने हमहूँ छी आ हमरो ने समाज छी, तैठाम हमरा सन लोकक विचारक अँटावेशो तँ समाजे ने करत?”

    वरस्‍पैत कक्काक आगूमे ठाढ़ पैंतीस बर्खक नि:संन्‍तान बेटी अपन जिनगी देख रहल अछि। मने-मन वरस्‍पैत काकाकेँ कूहि होइ छेलैन, मुदा के कूहि रहल अछि आ के कुहा रहल अछि से वरस्‍पैत कक्काक मनमे एबे ने करैन।

    अनमनस्‍यक भेल वरस्‍पैत काकाकेँ देख सुमित्रा टोकलकैन-

    बाबूजी, पिता तँ अहीं छी किने! अपन बेथा केकरा कहब?”

    ओना वरस्‍पैत काका बजैमे पीछराह सभ दिन रहला, तँए बजैक क्रममे कहियो नहि चुकला। तहूमे बेथाएल-सोगाएल पैंतीस बर्खक ओहन बेटी जे नारीत्‍वसँ हारि रहल छैन, संग-संग जिनगीक पछाड़ सेहो छैन्‍हे। बेटी छी से विधाताक डायरीमे सेहो अंकित अछि, मनुखक जीवनक सार्थकता सेवासँ होइ छै, माए-बापक सेवासँ पैघ धर्म ओहन नारीक लेल नहि अछि जे पतिव्रतसँ वंचित हुअए।

    वरस्‍पैत कक्काक भाव-विचार देख-सुनि सुमित्राक मन जेना पुलकित भेल। पुलकित होइते पुलैक कऽ बजली-

    पिताजी..?”

    पिताजी सुनि वरस्‍पैत कक्काक मन चौंकलैन। बजला-

    बेटी, चरेवेति-चरेवेति वेदवाक्‍य अछि। जे जिनगी चलायमान रहल वएह जिनगी जिनगी छी। जाबे जीब ताबे तोरा बिसरबह नहि।

    सुमित्रा जइ मने बाजल होथि, मुदा वरस्‍पैत कक्काक मनमे भेलैन जे बड़का धसनाक तरमे पड़ि गेलौं। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन जे कोनो सन्‍ताप मनुखकेँ जीते जिनगी होइ छै, तँए कोनो सन्‍तापसँ तखने बँचि सकै छी जखन ओइ सन्‍तापितकेँ ता-जिनगी पकड़ने रही जा जिनगी रहए। समयक हवा कखनो आगूओ दिस झोंकैत आ कखनो पाछूओ दिस, जइसँ ओकर गति-विधिमे उतार-चढ़ाव अबिते अछि। मुदा मनुख तँ मनुख छी। हवा-बिहाड़िकेँ अनुकूलो बना सकैए आ ओकरा मोड़ियो सकैए। मुदा प्रश्‍न तँ सामूहिक छी। सामूहिक समस्‍याक समाधान तँ समूहे ने कए सकैए। जँ ओकरा बेकतीगत रूपमे कएलो जाएत तँ ओ समूहक बीच हेराएले रहत। जँ से नहि रहैत तँ की हमरा सिर जे बरिसल अछि ओ दोसराक सिर नहि बरिसत, सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए...।

    विह्वल होइत वरस्‍पैत काका सुमित्राकेँ पुछलखिन-

    बुच्‍ची, सत-सत कहह जे जिनगीक सुखसँ वंचित छह आकि जिनगीक सुख भेट रहल छह?”

    पिताक प्रश्‍नसँ सुमित्रा तिलमिला गेली। तिलमिला ई गेली जे जिनगीक सुख की? जहिना गाछो-बिरीछ आ लत्तियो-फत्तीमे एके गाछमे हजारो मुड़ी रहैए, सभ मुड़ीकेँ अपन-अपन खगता छै, जइसँ ओ लहटगर बनि बढ़बो करैए आ फुलेबो-फड़बो करैए। तहिना ने मनुखोक जिनगी अछि। ओना कहैले मनुखकेँ एकेटा मुड़ी होइ छै मुदा से नहि। जिनगीक बढ़ैत क्रममे हजारो-लाखो मुड़ीक सृजन होइ छै आ ओकर भरण-पोषनक पाछू लोक हाल-बेहाल रहैए...।

    पिताकेँ की उत्तर सुमित्रा देती, से स्‍पष्‍टे ने भऽ रहल छैन।

    तैबीच सुगिया काकी सेहो आँखिक नोर आँचरसँ पोछैत वरस्‍पैत काका लग पहुँचली।

    माएपर नजैर पड़िते सुमित्राक नजैर निच्‍चाँ उतैर अपन मातृत्‍वपर गेलैन। मुदा समाजो तँ समाज छी। मर्यादा अमर्यादाक विचार करैबला।

    लड़खड़ाइत-लटपटाइत सुमित्राक मुहसँ निकलल-

    बाबूजी, नैहर-सासुरमे किछु अन्‍तर तँ अछिए?”

    सुमित्राक बात सुनिते वरस्‍पैत काका सहमला। सहैमते मनमे उठलैन, बेकती-बेकती मिललासँ समाज बनबो करैए आ हटलासँ टुटबो करैए, जेहेन समाज निरमित हएत तेहने ने ओकर आचार-विचार आ बेवहारो बनत। मुदा से बनाएब ओतेक असान कहाँ अछि? जैठाम प्रतिदिन विकृति मनुखक निर्माण होइए तैठाम सुशिष्‍ट समाज केना बनि पौत? ओना बोली-चालीक क्रममे वास्‍तविक जिनगी किए ने सटल हुअए मुदा बेवहारिक रूपमे हजारो कोस हटल नइ अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। मन-वचन-कर्मक एक सूत्रवाक्‍य किए ने हुअए मुदा तीनूक दूरी अकासो-पतालसँ बेसी हटल अछिए।

    अकास-पतालक बीच वौआइत वरस्‍पैत कक्काक मन अँटैक गेलैन। अँटैकते मन कलशलैन। कलैशते बेटी सुमित्रापर नजैर पड़लैन। नजैर पड़िते बुझि पड़लैन जे यमुना धार जकाँ जमुनियाँ नोर बेटीक नयनसँ निकैल पितासँ किछु याचना करए आएल अछि। मन पघिल गेलैन। पघिलते फुटलैन-

    जहिना हम मनुख छी, तहिना ने सुमित्रो अछि। सबहक अपन-अपन जिनगी आ अपन-अपन जिनगीक लीलाक संग विचारो-विवेक अछि, तैठाम बलउमकी बलबा सेहो नीक नहियेँ अछि, मुदा प्रश्‍नो तँ जिनगियेक छी। जँ मनुखकेँ जिनगीए नहि तखन ओ पशुवत छोड़ि ऐछे की?”

    वरस्‍पैत कक्काक मन जे अखन तकक जिनगीमे घोड़-दौड़ रूपे चलै छेलैन ओ एकाएक ठमैक गेलैन। ठमैकते बुझि पड़लैन जे मुरदा जकाँ अस्‍सी मन पानि शरीरमे आ नबे मन जारैन शरीरपर लदि गेल अछि। मुदा उपाइये की अछि?

    ठमकल मनसँ ठीठैक कऽ विचार निकललैन- मनुख-मनुखक सहयोगी तँ भाइये सकैए। मुदा जेतबे धरि अपन सीमा अछि तेतबे धरि ने नाचत। हमहीं सुमित्राक पिता छिऐ, जँ हमरे हाथ-पएर टुटि जाएत तँ सुमित्रे की हमर देहक दुख छीन सकैए? ओ तँ अपने ने भोगए पड़त? अखन आँखि तकै छी तँए सन्‍ताप बुझि पड़ैए, आ जँ आँखि बन्न रहैत तखन देखबे की करितिऐ?”

    मुदा लगले वरस्‍पैत कक्काक मनमे ईहो उठलैन जे जँ बेटीक दर्द बाप नइ बुझै आ बापक दर्द बेटी नइ बुझै तखन दुनूमे सामंजसे केना भऽ सकैए? रहल अपन कर्तव्‍य से तँ काजेसँ देखल जाएत। ओकर क्षेत्र तँ खाली विचारे धरि नइ अछि। ओ तँ बेवहारमे सेहो अछिए।

    ..भटकैत विचारक बोनमे वरस्‍पैत काका अँटकैत बजला-

    बेटी, जहिना अखन धरिक जिनगी घर-सँ-बाहर बीतल मुदा तैयो परिवारक सेवा करैत रहलौं, तहिना आगूओ ताधैर करैत रहब जाधैर तोरा सन जिनगी समाजमे बेटीकेँ भेटैत रहत।

    बजैक क्रममे वरस्‍पैत काका एकसूरे बाजि गेला मुदा बजला पछाइत जखन पाछू उनैट तकलखिन तँ बुझि पड़लैन जे जहिना अपने बिनु सींग-नॉंगैरक छी तहिना तँ समाजो अछि। केकरा कहबै के सुनत? लोको तँ लोके छी। बेटाक बिआहमे राजा बनि जाइए आ बेटीक बिआहमे भीखमंगा जहिना बनि जाइए तहिना ने केतौ जातिक समाज तँ केतौ गामक समाज सेहो बनिते अछि। 

    बेथासँ बेथित पतिक मुँह देख सुगिया काकी सामंजसमे बजली-

    जइ सोगे सोगाएल छी आकि जइ बेथे बेथाएल छी ओ ने कोनो सोग छी आ ने बेथा। जाबे आँखि तकै छी ताबे आँखिक सोझमे सुमित्रो रहत। जिनगीक कोनो ठेकान अछि जे पहिने के आँखि मूनब।

    पत्नीक विचार सुनि वरस्‍पैत कक्काक मन कनी खनियेलैन। खनियाइते मनमे सुमित्रा सन बेटीक पौराणिक कथा सभ नाचए लगलैन- पतिक सेवा, नारी-धर्मक वृतान्‍त छी तैठाम जँ सुमित्राक जान बकैस देलैन, ई तँ ओइसँ बहुत नीक भेल!

    बेटीक बात सुनि वरस्‍पैत कक्काक मनमे जेना कनी हूबा जगलैन, जेतेक हूबा जगलैन तेतेक मनसूबा सेहो जगलैन। पत्नीकेँ कहलैन-

    बेटी, कखन घर छोड़ि निकलल हएत कखन नहि, तँए पहिने चाह पिआउ। पछाइत खाइ-पीबैक ओरियान करब।

    सुगिया काकी बजली-

    सुमित्रा घरक बेटी छी आकि पाहुन जे अपने ओरियान करब? ओकर घर छिऐ, लिअ अपन घर। खाइ-पीबैले देत तँ देत, नइ देत तँ नइ देत!”

    माइक विचार सुनि सुमित्रा बिहुँसए लगली। मुदा बजली किछु ने।

    शब्‍द संख्‍या : 4173, तिथि : 20 जनवरी 2017

     

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