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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक 

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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रबीन्द्र नारायण मिश्र

लजकोटर

-३५-

दिल्ली अएला हमरा कतेको साल गुजरि गेल। ऐहि क्रममे एकसँ -एक नीक लोक भेटलाह, खरापो लोक भेटलाह। मुदा मदनबाबू सन केओ नहि भेटलाह। अपना-आपमे एकटा दृष्टान्त छलाह। जाबे दिल्लीमे रहथि ताबे तँ मदति करिते रहलाह, देशसँ बाहर गेलाक बादो ओहिना ध्यान रखैत रहलाह।

सप्ताहमे एक दिन अवश्य फोन करितथि। दिल्लीक गतिविधि खास कए अपन समाज-संस्थाक बारेमे जरूरसँ पुछितथि। विदेशमे हुनकर कारबार ततेक बढ़ि गेल छल जे दिल्लीक चीज-वस्तुक ने प्रयोजन बुझानि ने ओकर देखभाल करब संभव छल। हम असगरे कतेक की करितहुँ? बीचमे माधव आर चना उकबा कइए देने रहए। ताहिसँ अदकल रहबे करी। ओहि दिन जखन हुनकर फोन आएल तँ हम कहलिअनि-

" दिल्लीमे अपन मकानक किछु व्यवस्था किएक नहि कए लैत छी?"

"की कहैत छी? एसगरे कतए-कतए देखबैक? हमरा इच्छा अछि जे एहि मकानकेँ अपन समाज-संस्थामे दान दए दिऐक। एहि संस्थाकेँ मजगूत करब बहुत जरुरी अछि जाहिसँ दिल्लीमे अएनिहार अपन समाजक लोककेँ एकटा आश्रय होइक।"

"मुदा ताहू हेतु तँ सही आदमी चाही। एहि ठाम लोक गामसँ भने उठि कए चलि आएल अछि मुदा माथा गामेक छैक। ओहिना गोलैसी, जाति-पाँतिक उठा-पटक होइत रहैत अछि। कोनो आन प्रान्तक लोकमे एहन समस्या नहि अछि। केरल, कर्णाटक, तामिलनाडु, आनो, आनो प्रान्तक अपन संस्था छैक, अपन भाषाक इसकूल छैक मुदा अपना सभक किछु नहि अछि जखन की गामक-गाम उठिकए आब एतहि चलि आएल अछि।"

"समस्या तँ छैहे। मुदा समाधानो तँ हमही-अहाँ करबैक। नीकलोक जँ आगा नहि आओत तँ जाहिर छैक जे बेजाए लोक हाबी भए जाएत। गुन्डा-अबारा राज करत नीक लोक नुकाइत रहत। अहीं कहू से नीक होएत? नहिने? तेँ हमरा सभकेँ आगा आबए पड़त। हम अपन मकान दिल्लीक आओर संपत्ति अपन समाज संस्थाकेँ दान देबाक निर्णय केलहुँ अछि। एहि संस्थाक काज नीक लोकक हाथमे जाए से प्रयास करू। नीक इसकूल, कालेज सभ बनाउ। अपन भाषामे लोक लिखए-पढ़ए तकर ओरिआन करू।"

हम सोचलहुँ जे मदनबाबूक अभिलाषाकेँ साकार करबामे योगदान करक चाही। कालान्तरमे अपन समाजक हेतु एकटा महान प्रकाश स्तंभ बनि सकैत अछि। केहनो समय आबि गेलैक तैओ नीक लोकक पुछारी रहबे करतैक। मुदा हम एसगरे एतेक झंझटकेँ सम्हारबाक स्थितिमे नहि रही। अस्तु, हम हुनका कहलिअनि-

अपने अएबैक तखने काज सभ आगा बढ़त।"

"हमरा आबक कोन छैक। जखने कहब, आबि जाएब। मुदा अहाँ काज शुरु तँ करू।"

ठीक छैक।"

मदन बाबूक इच्छाक अनुसार अपन समाज संस्थाकेँ शरद पूर्णिमाक रातिमे बैसार करबाक निर्णय भेल।

मदन बाबू सेहो उपस्थित रहथि। दिल्लीक समस्त प्रावासी एहिमे आमंत्रित छलाह। सबेरे सकाल लोकक अएनाइ शुरु भए गेल।

दक्षिणी दिल्लीक प्रतिष्ठित मोहल्ला जोरबागमे मदन बाबूक घर छल। ओतहि बैसार भए रहल छल।

सभा मंडप सुसज्जित छल ।

कनीके कालमे लोक खचाखच भरि गेल। आगा पाँतिमे महिला समाजक प्रमुख लोक सभ छलीह। मालती आओर कुसुम जय जय भैरवि गेलथि मैथिलीक प्रतिष्ठित महिल ाकवि साहित्यकार बैसारक अध्यक्षता कए रहल छलीह। कार्यक्रमक शुरुआतेमे मदन बाबू दिल्लीक अपन समस्त संपत्ति अपन समाज संस्थाकेँ दानमे देबाक घोषणा केलाह। सभा-मंडप हुनक घोषणाक करतल ध्वनिसँ स्वागत केलक। बैसारक प्रयोजन स्पस्ट करैत मदन बाबू बजलाह-

समय एकटा एहन वस्तु अछि जकरा केओ आइ धरि नहि देखलक मुदा एहि संसारकक समस्तप्राणी एकर चपेटमे अबिते अछि, अबिते रहल। केओ एकर अपवाद नहि भए सकल। हम गामकेँ छोड़ि रोजी-रोटीक फिराकमे दिल्ली अएलहुँ। तहिआ गाम छोड़नाइ कोनो सोहनगर गप्प नहि रहैक। लोक कुचेष्टा करैक। मुदा हालत एहन होइत गेलैक जे आब दिल्ली लोकक घर-आङन भए गेल। जे जतएसँ आएल जेना-तेना अपन खोपड़ी ठाढ़ कए लेलक। एतहि बसि गेल। महानगरक चक्रव्युहमे जे जतहि फँसल से फँसले रहि गेल। साइते केओ वापस गेल।

एहि ठाम लोक बसि तँ गेल मुदा अधिकांश परिचयहीन भए गेल। बेसक अखनो अपन गामक नाम लए लेथु मुदा हुनका अपनो बूझल छनि जे जँ गाम जेताह तँ अपन परिचय देबाक हेतु माइक लगाबए पड़तनि। एहन बात तँ नहि अछि जे जतेक गोटे एहि ठाम अएलाह से सभ कोठिएमे छथि। अखनो कतेको गोटे फूटपाथपर भोर जाइत काल देखाइत छथि आसाँझमे जखन वापस जाइत रहैत छी तँ ओहिनाक ओहिना रहैत छथि। मुदा ककरो लगमे कोनो विकल्प नहि रहि गेल छैक। जेना गाम आपसीक संभावनाकेँ अपनहि लोक निठ्ठाहक डाहि देलकैक जाहिसँ घुरि नहि जाए, जाहिसँ जे किछु किछु खेत-पथार बाँचल छैक से सभ सोलहन्नी ओकरे संतानकेँ रहि जाइक, केओ बाँटै नहि।

अस्तु, अधिकाँश लोक जे महानगरक मायामे पड़लाह सेसामाजिक/ सांस्कृतिक विकलांगताक शिकार भए गेलाह। समस्या अछि जे अपन समाज संस्था एहन लोकक किछुओ कल्याण कए सकत कि नहि? अपन समाजक एहन लोक सभक समस्याक समाधानमे मदति भए सकतैक कि नहि? हम सभ बहुत आशावान लोक छी। सभकेँ बूझल अछि जे अपन समाज केहन अछि। मुदा तेँ की? जकर माए आन्हर होइत छैक सएह गामक इनार भरैत अछि। अपन लोकक काज आन के करत किए ककरत?”

आजुक बैसारमे अद्भुत शांति छल। लगैत छल जेना सभ एकहि परिवारक लोक छथि। बैसारमे कतेको महत्वपूर्ण निर्णय भेल।

अपन भाषाक इसकूलक स्थापनक सेहो निर्णय भेल। ऐहन बैसार भविष्योमे होइत रहए ताहि हेतु एकटा समिति बनाओल।

लोक जीवन भरि संपत्ति जोड़ैत रहि जाइत अछि अंतमे सभ किछु छोड़ि अंतहीन यात्रापर चलि जाइत अछि। अंत- अंत धरि संपत्तिकेँ बकोटने रहैत छथि। एहन कमे लोक होइत छथि जे समय रहिते चेति जाथि। मदनबाबू एहने लोकछथि।

एकटा मामुली आदमी छलाह। भाग्य संग देलकनि। आगा बढ़ए लगलाह तँ कहिओ पाछा घुमिकए नहि देखलाह। मुदा कोनो वस्तुक व्यर्थ मोह नहि रखलनि। दिल्लीक एतेक मुल्यवान घर आन-आन संपत्तिकेँ जाइत-जाइत अपन समाज संस्थाकेँ दए गेलखिन। ततबे नहि जेबासँ पहिने सुनिश्चित कए केलाह जे कुसुम,मालती एहन-एहन आओर महिला सभक अपने लोकक देल गेल त्रासदीसँ मुक्ति भेटए जाहिसँ सभ मर्यादित जीवन जीवि सकथि। गाम-घरसँ फटकी रहितहुँ अपन लोक सभ अपन भाषा अपन संस्कृतिसँ जुड़ल रहथि ताहि हेतु पर्याप्त जोगार कए गेलाह। जाइत-जाइत इहो कहि गेलाह -"अहाँ सभ आगा बढ़ू। हम सदिखन अहाँक संगे ठाढ़ भेटब।" मदन बाबूसन-सन लोक जाहि समाजमे होएत से कदापि पाछा नहि रहत, बढ़बे करत, सभ एतबे बात बाजथि।

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