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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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  • देवेश झा

    हिन्दू विवाह :एक समीक्षा

     

    प्रमुख विचार विंदु : 1॰विवाह  2॰ कर्तव्य   3॰  यौवनक आवेग  4॰ ज्ञान

    5॰ प्रतिस्पर्धाक संवेग   6॰आदर्श संबंध

    30 जून 2018 के दैनिक जागरण पत्र विवाहक अदभूत दर्शन करौलक । किछू घंटाक विवाहक विधि नवोढ़ा कन्याक (नायिकाक) समग्र स्वच्छ्न्द अस्तित्वकें शून्यक धरातल पर आनबा मे सक्षम भऽ जाइत अछ । कतऽ नवयौवनक निश्चिन्त आ मस्त जीवन आऔर कतऽ अपर पक्षक कर्त्तव्यक कारख़ाना । पत्नी एवं गृहिणीक जीवन कोनो घरक आबालबृध्द घरमें पधारल पत्नी रूपी बहूकेंदेखि परमानंदक अनुभूति करैत बजै छैथि- आब की ? कोन चिंता ? घरमे नव कनिया आबिये गेल छैथ, सब काज करबे करती आ सब भार सहबे करती, चलू मिठाई खाऊ आ खुशी मनाउ। किन्तु एतहिसॅ असंतुलनक आर्त्तनादमुखरित होइत अछि जे कन्या यौवनक आवेगमे ज्ञान एवं प्रतिस्पर्धाक संवेग संबलसॅ अनुस्यूत उच्चपदाकांक्षाक संग “सुपर वुमेन “ बनवाक कामनासॅ स्फुरित आर स्पंदित होइत रहैत छैथि ओ पत्नी तथा गृहिणीके दायित्वसॅ दबिकें आहत होइत अपना जीवनके धिक्कारय लागैत छथि । जखनकि हमरा सभक मध्य कियो एहेन दुखद भाव नहि रखैत छथि ।

               ते आवश्यक बुझना जाइत अछि जे पति-पत्नीक आदर्श संबंधके  बुझबाक लेल विवाह एवं विवाह विधि केर पुरातन-नूतन रूपके बुझल-बुझाओल जाय।यथा-

    हिन्दू विवाह धर्ममे विवहके एक प्रकारक संस्कार मानल गेल अछि, जकरा दाम्पत्य जीवनक उत्तरदायित्व  कहल जा सकैत अछि। अन्य धर्मक अनुसारे विवाहके पति-पत्नीक बीच एक प्रकारक समझौता सेहो कहितॅ उचिते। ओना विवाह एक समझौता त थिकिए, मुदा विवाहोपरांत पति-पत्नीक संबंध मे अग्निके साक्षी मानिके सात फेरा लगाबैत छी जे हम सदा दुनू साथ रहब, मुदा आजुक जमाना किछु और अछि। हम अग्निके साक्षी मानि पवित्र बंधनमे त बंधि जाइत छि मुदा समयके बदलैत क्रममे किछू दिनमे एहि पवित्र संबंधक निर्वहन करयमे आजुक युवावर्ग (युवक-युवती) के किछु उकरू बुझि पड़ैत अछि।

        वैदिक कालमे विवाह संस्कार एक महत्त्वपूर्ण संस्कार मानल गेल अछि । ऐहि संस्कार मे स्वागत- सत्कार, विवाहक उद्घोष, वस्त्रादि उपहार, वर- वधुक प्रतिज्ञा, कन्यादान, गुप्तदान, दहेज, पाणिग्रहण, ग्रंथि बंधन, विवाहक विशेष यज्ञ, सात-परिक्रमा, शिलारोहण, ध्रुव आ सूर्यक दर्शनक, शपथ आश्वासन आदि क्रियासॅ निवृत्त होमय पड़ैत अछि । हिन्दू धर्ममे गृहस्थ जीवन मनुष्य के दायित्व निर्वहणक योग्य बनबाक एक मार्ग थीक, जाहिमे शारीरिक, मानसिक आ आर्थिक परिपक्वताक  ज्ञान होइत अछि । एहि क्रममेंअनेक वरिष्ठ व्यक्ति, गुरुजन, कुटुम्ब संबंधी सबसॅ धर्म, पुजा-पाठ, देवताक आवाहन, अनुष्ठान करयबाक ज्ञान प्राप्त होइत अछि ।

          ओना तॅ विवाह आठ प्रकारसॅ सम्पन्न होइत अछि।

    1॰ ब्राह्म विवाह :- सुयोग्य वरसॅ कन्याक विवाह बिना कोनो दान दहेजक करबाक प्रथा दुनू पक्षक सहमति सॅ होएब ब्राह्म विवाह कहाबैत अछि ।

    2॰ दैव विवाह :- कोनो सेवाक भावसॅ किछू मूल्य लऽ क पहिने अपन कन्याके दानमे दैत छ्थिन्ह ई दैविवाह भेल।

    3॰आर्ष विवाह :- ओना तॅ ई विवाह पहिने कन्यादान बदला गौदानक रुपमे होइत छल। पहिने पुत्रीक विवाहक लेल वर पक्ष गायक दान करैत छलाह। एकरे आर्ष विवाह कहैत छी।

    4॰ प्रजापत्य विवाह :- मैथिल संप्रदायमे कन्याक विवाह दोसर वर्गक वरसॅ करा देव प्राजापत्य विवाह कहबैत अछि ।

    5॰ गंधर्व विवाह :- दुनू पक्षक सहमतिसॅ कोनो रीति रिवाजक अनदेखी करैत वर- कन्याक विवाहके गंधर्व विवाह कहल जाइत अछि। एकरा ई युगमे प्रेम विवाह  सेहो कहैत छी । जेना :- दूष्यन्त-शकुन्तलाक विवाह  गंधर्व विवाह कहल गेल जिनक पुत्र भरत भेलाह। हुनके नाम पर हमर देशक नाम पड़ल भारत ।      

    6॰ असुर विवाह :- वर्त्तमान सामयमे विवाहक जे प्रथा चलैत अछि, ओकरा असुर विवाह कही तॅ कोनो हर्ज नहि । ज़ोर जबरदस्ती भगाक दान कार्यक दहेजक बिना विवाह असुर विवाह कहबैत अछि ।

    7॰ राक्षस विवाह :- कन्याक सहमतिक बिना विवाह करब राक्षस विवाह कहबैत अछि ।

    8॰ पिशाच विवाह :- कन्याक मदहोसक अवस्थामे वा वरक किछू नशाक अवस्था मे किछू खुआके लऽ जा के विवाह कराएब पिशाच विवाह कहबैतअछि ।

      भारतीय सांस्कृतिक अनुसार विवाह कोनो शारीरिक आ सामाजिक अनुबंध मात्र नहि अछि अपितु दूनूक दाम्पत्य जीवनकें एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधनाक रुपमे दर्शाओल गेल अछि । ठीके कहल गेल अछि :- “धन्यो गृहस्थाश्रम: ”।

    मिथालमे पहिने सॅ विवाहक प्रथा अनेक दृष्टिकोणसॅ देवताक आवहानक उपरान्त अग्निदेवके साक्षी रुपमे संकल्प आदि करकें वरुण देवसॅ कृपालाभक बड़ अदृष्ट फल होएत अछि अहि दुनू शक्तिके एक हिएबाक एक गंभीर बात आर्य विवाहमे राखल गेल छल ।

         विवाहक संबंधमे आर्ययूगसॅ पत्नीक दिशिसॅ पतिकें शतायु होयबाक प्रार्थना आ पतिक दिशसॅ अभिन्न दाम्पत्य प्रेम प्रार्थना कएल गेल अछि जेना ।

    राघवेन्द्रे यथा सीता विनीता काश्यपे यथा ।

    पावके च यथा स्वाहा तथा त्वं मयि भर्त्तहि । आदि आदि

     (धर्मविज्ञान,पृ0156)

        एहिप्रकारें जेना रामक प्रति सीताक कश्यपके प्रति विनताके, अग्निक प्रति स्वाहाक, दिलीपक प्रति सुदक्षिणाक, वासुदेवक प्रति देवकीक, अगस्तक प्रति लोपमुद्राक, अत्रिक प्रति अनुसूइयाक, यमदग्निक प्रति रेणुकाक आ श्रीक़ृष्णक प्रति रुक्मिणीक पवित्र प्रेम छलैन्ह ओएह प्रेम आजुक वर कन्या मे मधुर प्रेम जीवनक ई प्रार्थना आर्य विवाह कालसॅ अछि जे एहि युगमे संभव नहि बुझाबैत अछि ।

            एतय हमर मंतव्य अछि जे विवाह एक पति पत्नीक बीच परस्पर विश्वासक एक समझौता तॅ थिकिए संगे- संग एक प्रकारक कर्त्तव्य सेहो थीक जे विवाहोपरान्त व्यक्तिक जीवन शैलीमे कतेक प्रकारक उतार-चढाव अबैत अछि जाहि मध्य मनुष्य जीवन गाड़ीक दूनुपहियाक सदृश घुमैत ई जिनगी सुख-दुखक अनुभव करैत बितैत अछि ।

    विवाहक विषयमे किछू मिलल-जुलल तथ्य युक्तिसंगत बुझि पड़ैत अछि।

    यथा –

    जे पहिने एक दोसरसॅ आनठिया (अनचिन्ह)

    पुन: क्रमश: एक दोसर पर आश्रित ,

    उत्तरोत्तर सौंसे (संपूर्ण ) जिनगिक संग ,

    शनैह-शनैह परस्पर अभिन्न अपनामे,

    एक उदात्त आनंदयुक्त मधुर स्पर्श ,

    अकस्मात् अपनामे रुष्ट नोक- झोंक,

    उच्चावच मति पर चलैत बढ़ैत विरक्ति-,

    विभेद-तलाकक किनार तक।

    कतहु जिद आ कतहु मानक अहम भाव ,

    तथापि रकम-रकम दुनु निकट सूत्रमे बन्हैत एक पुष्प माल,

    इ मधुर अज्ञातसॅ ज्ञातक दिशामे ,

    चलैत प्राणान्त पर्यन्त समय साध्य यात्रा ,

    कनिया वरक इ कटु मधुर संबंध कखनहु,

    अचार कखनहु तिक्त चटनी तॅ संगहि मधुर ,

    रसायनक शाही भोग कखनहु लावण्य कखनहु नीम,

    सब कीछु मिली भौतिक जगतक रुपें परिणत होइत अछि ।

    काव्यक नवरश रुचिर भोगमे,

    दु:खहुमे आनंद, परमानंद जाहिमे व्याप्त ,

    दुखज जीवनक सुख ।

     

    पुन: विवाह थीक

    एक आश विश्वास मिलनमे आनंद ,

    समाजमे जीवनक समर्पण ,

    भल हो ओहि नवोढ़ा नारि केर ,

    जे आनक लेल  अपनाके त्यागि देलैथ,

    अपना लेलैथ, सर्वथा अनभिज्ञके ,

    अपना आँचर मे समा लेलैथ।

    ताहिना धन्य छैथ ओ पुरुष सिंह,

    जे नवागता अनचिन्हारि अबला पर ,

    स्नेहिल विश्वास करैत अपना घर धरा,

    समग्र ऐश्वर्य आ स्वयंके सौपि देलैथ ,

    आओर की कहू-वाह रे विवाह, आह रे विवाह ।

     

                                     -देवेश झा

                             प्राध्यापक, मैथिली विभाग

                            एन0 डी0 कॉलेज, रामबाग ,

                             पुर्णिया ।

     

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