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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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  • १. नारायण यादव- प्रेमक आँसु २. डॉ. बचेश्वर झाक आलेख- कन्यादानक भीषण समस्याक कारण आ

    नारायण यादव

    प्रेमक ऑंसु 

    बात ओहि समयक थिक। जखन रामू काकाकेँ तेसर बेटीक जन्म भेल छलैन्ह। हम भोरमे टहलवाक शौकीन छी। भोरे उठि जखन दू-तीन किलोमीटरसँ टहलि वावस भेल रही तँ देखै छी जे राम काका माथपर हाथ नेने, मुँह लटकौने बैसल छथि। हम तँ पहिने बड़ आश्चर्यचकित भेलहु। जे रामू काका एकटा हसमुख चेहराआ मजकियल छलाह। गाम भरिक लोक सभ हुनकासँ खुश रहै छल किएक तँ ओ कहनो आफद-विपत आ मुसिवतमे पड़ल लेाकककेँ हसबैत रहै छलाह। से आई मनहुस कियैक भेल छथि? हम हिनकर चिनताकेँ भॉंपि नहि सकलहु। मुदा एकाएक पुछि देबैक सेहो नीक नहि बुझना जाइत छल। कियैक तँ जखन ओ भेटत छलाह तँ कहैत छलाह जे मौरनिंग-वाकसँ आबि गेलहु।

    कहु तँ स्टेशन कय डेग भेल। स्टेशनकेँ नपबाक भार रामू काका हमरेपर छै जे अहॉं कहै छी।

    तँ ककरापर छैक भोरे उठि स्टेशनपर चक्कर अहॉं दैत छी आ नपबाक भार हमरापर रहत।

    सुवहमे टहलवाक मजा दोसर छैक रामू काका। आ हमहींटा थोरे टहलै छी। हमर मित्र लोकनि अपन घरवालीक संग टहलैत छथि। आर जे अकेले रहैत छथि हमरा संग जाइत छथि जेना सत्य नारायण बाबू, जय नरायण बाबू, राजवीर बाबू, बड़ा बाबू, लाइव्रेरियन साहेव, दीपकजी, विजय बाबू, युगेश्वर बाबू। सुवहक मौरनिंग वाक् सँ बड़ लाभ होयत छैक। रामू काका जकरा कोनो तरहक ब्लड प्रेसर छैक, मधुमेह , थाइराइड छैक, डिप्रेशन छैक, आदि-आदि सभ विमारीक दवाई छैक मॉंरनिंग वाक। आ जकरा कोनो बीमारी नहि छैक तकरा लेल तँ सोनामे सुगन्ध भय जाइत छैक। ओहि आदमीकेँ जावत टहलैत रहत तावत् कोनो बीमारी भैये नहि सकैत अछि।

    रामू काका जखन भेटि जाइत छलाह तँ एहि प्रकारक गप्प-सप हंसी-मजाक होइत छल। मुदा आजुक माहौल अजीव छल। रामू काकाक चिन्तित मुद्रा देखि हम हुनका नजदीकमे बैसि रहलहु आ कहलहु-

    रामू काका कने तम्बाकू खुऔ।

    रामू काका चून-तम्बाकू दैत बजलाह-

    हौ तो तँ तम्बाकू नहि खाइत छलह। कहियासँ खाय लगलह?”

    हिनक चिन्तित मुद्रा भंग भेल। हम बजलहु-

    रामू काका से तँ ठीके कहलहु। हम तँ तम्वाकू नहि खाइत छी। मुदा अहॉंक उदास मुद्रा देखि, हमहु चिंतित भय गेल छलहु। अहॉंक चितिंत आ उदासी मुद्रा देखि ओहि मुद्राकेँ भंग करवाक हेतु चून-तम्बाकूसँ बात शुरू कयलहु।

    हम चुनौटीसँ तम्बाकू निकालि ओहिमे चून दय लगवय लगलहु। आ रामू काकाकेँ दैत बजलहु-

    रामू काका, सभ ठीक-ठाक अछि की नहि?”

    की ठीक रहत फेर बेटिये भेल।

    हमरा हंसी लाइग गेल आ हम खुब जोरसँ हसैत बजलहु-

    रामू काका, अहॉं बड़ भाग्यशाली लोक छी। जे तीनटा बेटी भेल। साक्षात लक्ष्मी-सरस्वती आ पार्वतीक जन्म अहॉं ओहिठाम भेल अछि। हम एहिशीक अवसरपर अहॉंकेँ मुवारक दैत छी। एहिमे दु:खी होयबाक कोनो प्रश्ने नहि अछि। बेटी एहेन सुख थिक, जकरापर ईश्वर मेहरवान छथि, ओकरे बेटी होइत अछि।

    बेटी स्त्री अछि, बेटी नारी अछि, बेटी फुलवारी अछि, बेटी दर्पण आ दर्शन अछि। बेटी सीता अछि, बेटी सावित्री अछि, बेटी माता अछि, बेटीवलिदानक गाथा अछि, बेटी श्रमद् भागवत गीता अछि, बेटी अछि तँ संसारमे सभ सुख भेटत। माय-पावक जे सेवा बेटी करत ओ बेटा कथमपि नहि करत। तेँ, बेटी भेल ताहि लेल अपने एतेक दुखी छी?

    रामू काका हमरापर खौझाइत बजलाह-

    यौ मास्टर साहेब, अहूँ हमरासँ मजाक करैत छी, हमरा खौझा रहल छी। अहॉंकेँ होइत अछि की हम बेटी जनमावऽ बाला मशीन छी। देखू मंगलाकेँ ओ केहेन मरियल अछि आ ओकरा दू-दूटा बेटे छैक। हमर ई तेसर बेटी अछि। सभ हमर मजाक उड़बैत होयत। आब हम एहि समाजमे मुँह देखयवाक नहि रहि सकलहु। हमरा बेटीसँ बड़ नफरत भय गेल अछि। आओर हमरा तीन-तीनटा बेटिये अछि।

    रामू काका अहॉंकेँ बेटीसँ कियैक एतेक नफरत भय गेल अछि। बेटी नहि रहत तँ एहि संसारक श्रृष्टि कोनो होयत। यहि बेटीसँ नफरत अछि तँ वियाह कियैक कयलहु। बेटीसँ नफरत अछि तूं मायक कोखसँ जनम कियैक लेलहुँ मॉंओ तँ बेटीक रूप थिक। रामू काका, ओ आब युग-जमाना नहि अछि जे बेटी समाजक कोढ़ बनत। बेटीक उँचाई आब बेटासँ बेसी छैक। कोन एहेन विधा अछि जाहिमे बेटी, बेटासँ कम छैक से देखू तँ बेटा जखन जबान होयत तँ की करत की नहि से कियो नहि जानैत अछि। जुआरी राखी, व्यभिचारी, लूच्चा, लम्पट आदि भय सकैत अछि। बेटी कहियो शरावी, जुआरी, चोर, डकैत नहि भय सकैत अछि। देखू जे डकैती, लूट, अपहरण बेटे नहि करैत अछि। पैघ-पैघ लोकक जेना- पैघ हाकीम, मंत्री, विधायक आ सांसद बेटा लूट, डकैती, अपहरणक अंजाम दय रहल अछि। तेँ बेटीकेँ पोसू-पालू आ शिक्षित बनाउ। एकटा बेटी शिक्षित होयत तँ एकटा परिवार शिक्षित होयत। आ एकटा बेटा शिक्षित होयत तँ मात्र एकटा पुरुष शिक्षित होयत। रामू काका, अहँ अपन चिन्ताकेँ त्यागू आ बेटा-बेटीमे फर्क नहि राखू। देखैत नहि छिऐक जे शशिकान्त बाबक बेटी यू.पी.एस.सी. परीक्षामे तेसर स्थान प्राप्त कयलक अदि। एै यौ रामू काका, अपना गाममे बेटाक कमी छैक कहाँ ककरो बेटा एहेन पद प्राप्त कयलक अछि।

    रामू काका जे मनहूस छलाह से आब मन हुलसगर भेलैन्ह। ओ मनोयोगसँ तीनू बेटीक लालन-पालन आ समुचित शिक्षाक व्यवस्था केलैन्ह।

    किछु दिनक उपरान्त तीनू बेटीक पढ़ाई-लिखाई चलय लागल। तीनू बेटीक नाम सीता, गीता आ सावित्री छल। पढ़य-लिखयमे तीनों एकपर एक छल। पहिल बेटी सीता पी.पी.एस.सी. कम्पीट कयलैन्ह। दोसर बेटी- गीता डॉक्टर भेलीह आ तेसर सेवा करय लगलीह। तीनू बेटीक वियाह-शादी योग्य बरसँ विनु दान-दहेजेक भय गेल।

    रामू काकाक तीनू बेटीक शादीमे हम गेल छलहुँ। आई रामू काकाक खुशी देखि हम कहलियैन्ह-

    रामू काका, जाहि दिन तेसर बेटीक जन्म भेल छल ताहि दिन अहॉं कतेक उदास रही। आब कहू जे बेटा पैघ आकि बेटी?आई एहि परोपट्टामे अहॉंक परचम फहरा रहल अछि की नहि? माय-बाप, बाल-बच्चाकेँ जन्म दैत छैक। मुदा भाग्यक निर्माण ओकर कर्त्तव्य करैत छैक।

    रामू काका हमरा आगाँ हाथ जोड़ि ठाढ़ भऽ बजलाह-

    बौआ तोहरे बोल भरोसपर हम जिंदा छी, एहिमे तोहर बड़ पैघ योगदान छल।

    रामू काकाक ऑंखिसँ प्रेमक अश्रु बहै लगलैन्ह। q

     

    डॉ. बचेश्वर झाक आलेख

     

    कन्यादानक भीषण समस्याक कारण

    मध्य मिथिलांचलमे वैवाहिक परम्पराक पालन आइसँ अनुमानत: सय वर्षक ...... दोसर रीतिसँ होइत छल। ताहि समयक हेतु ई रीति-रेवाज हितकर रहल होएत, मुदा तकर प्रभाव बादक मैथिल सन्तानपर ताहि तरहेँ पड़ल जे एखनहुँ तकर छाप अमिट अछि।

    ओनातँ कन्यादानक समस्या प्राय: सभ दिनसँ एक कठीन समस्या रहल अछि। समयानुसारे भलेँ ओकर रूप परिवर्त्तित होइत गेल हो...।

    महाकवि विद्यापति अपन पुरुष-परीक्षामे एही समस्याक सन्दर्भ चचर्चा कएलन्हि-

    कन्या ककरा दी?पुरुषकेँ?”

    पुरुष शब्दक प्रयोग ओ विशिष्ट अर्थमे कएने छथि। अन्यथा सभ पुरुषाकार थिकाह। वीर, ध्यर्यवान, विद्वान आ वुद्धिमान, चारिटा पुरुषक लक्षण होइछ, एकर अभाव जकरामे छैक से पूँछ हीन पशु थिक। तेँ कन्याक विवाह पुरुषसँ हो।

    खास कऽ कन्यादानक समस्या आजुक समस्यासँ भिन्न होएबाक कारण ओहि समयमे जनसंख्या कम आ भूमि अधिक रहलोपर सन्ताँ भूमिसँ भरण-पोषण सहजहि भऽ जाइत छल। आजुक अपेक्षा आवश्यकता कम आ उपभोगक पदार्थो परिमार्जित नहि। विज्ञान अपन प्रभाव ओतेक नहि देखओने छल। आइ तँ विज्ञान मिथिलाक कथे कोन सम्पूर्ण धरतीक देश लोक, संस्कृतिकेँ जोड़ि देलक अछि। तेँ ओहि समयमे मिथिलाक लोकक उक्ति छल-

    उत्तम खेती, मध्यम वाण।

    निषिद्ध चाकरी, भीख निदान।।

    अर्थात् खेतीकेँ उत्तम, व्यापारकेँ मध्यम, चाकरी वा नौकरीकेँ निषेध तथा भीख मांगव सभसँ नीच कर्म मानल जाइत छल। इएह कारण छल जे एहिठाम कहल जाइत अछि-

    कर खेती घरही भला।

    कहबाक तात्पर्य घरेमे रहू, खेती करू अमोधमंत्र छल। एतबे नहि, ओहि समयक हेतु अधिक सन्तानवान होएब मान्य छलैक। किएक तँ प्राकृतिक प्रकोपक कारण जनाधि आ नहि होमए पबैत छल, जाहिसँ जन संख्याक वृष्टिक ऊपर अंकुश स्वत: लागि जाइत छल। एतए तक जे परिवारक कोन कथा? गामक गाम जनशून्य भऽ जाइत छल। तेँ अधिक सन्तानबला लोक पुण्यवाण कहबैत छलाह। बेटा नहि रहलापर बेटीक सन्तान वंशक टेक रखैत छल.........।

    काल-क्रमे बेटी ............ होपरान्त जमीन-जथा दऽ घरेमे राखब परिपाटी चलल जे कनेदानीकहबैत छल। कनेदानी राखब प्रतिष्ठाक बात बुझल गेल। कनेदानीक सन्तान भगिनमान कहबैत छथि। जनिक पुरुषा कनेदानी रखलन्हि से डीही कहबैत छथि। कनेदानीक सन्तान डीही पक्षक परम भक्त होइत छलाह। बिना दरमाहाक नोकर ई भगिनमान होथि, संगहि डीहीक कृपाकांक्षी सेहो। तेँ जनहासक कारण नहि बुझाइत छल। कनेदानीक प्रति प्राय: भलमानुष होइत छलाह, जे बादमे बिकौआक नामसँ जानल गेलाह।

    बिकौआक सन्दर्भ किछु चर्चा : हरि सिंह देव महाराजक द्वारा पञ्जी-प्रवन्ध कएल गेल। एहिसँ मैथिल-व्राह्मणक पञ्जीकृत भेलापर श्रेणी बनल। ओहिमे योग, श्रोत्रभ्, भलमानुष प्रभृतिक उदय भेल। पञ्जीक अनुसार जे निम्न श्रेणीकेँ प्राप्त कएलन्हि ओहिमे सँ किछु सम्पन्न व्यक्ति उच्च श्रेणीक व्राह्मणसँ सम्बन्ध कए सर्व साधारणक दृष्टिमे प्रतिष्ठा हासिल करबाक चेष्टा कएलन्हि।  एतए तक जे निम्न श्रेणीक व्राह्मण पैघसँ पैघ जमींदार रहितहुँ ओहि प्रतिष्ठाकेँ प्राप्त नहि कए सकैत छलाह। फलत: अर्थ अपन प्रभाव देखओलक अन्तरालमे एक बाट प्रशस्त भऽ गेल जे निम्नो श्रेणीक ब्राह्मण वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा अपनाकेँ ऊपर उठा सकैछ। स्पष्ट अछि कनेदानी राखब एहि पञ्जी-प्रथाक कारणे चलाउल गेल। सुखी सम्पन्न लोक एहि सुविधाक उपयोग करए लगलाह। उत्तरोत्तर देखा-देखीमे एक तरहक उपरौंझक स्थिति उत्पन्न भऽ गेल। किन्तु, ओहिकालक मान्यताक कारणेँ एहन बहुत कम लोक छलाह जे निम्न श्रेणीक लोकसँ सम्बन्ध करए चाहैत छलाह। फल ई भेल जे एहि अल्पसंख्याक व्राह्मणक मांग बढ़ि गेल। एहि वर्गक लोककेँ समाज तेहन ने टीकासनपर चढ़ा देलक जे सभ व्याहकेँ मात्र पेशा बनाए लेलक। इएह वर्ग बिकौआ कहाओल अर्थात् जे बिकथि। विक्रयबला पदार्थसँ ई वर्ग भिन्न छलाह। पूर्ण मूल्य देलहुँ सन्ताँ क्रय कएनिहारक जूतिमे ई नहि रहथि। ई बिकौआ बिकथि मात्र विवाहक हेतु। विवाहोपरान्त ई पूर्ण स्वतंत्र रहथि। ने स्त्रीक प्रतिदायित्व आ ने सन्तानक प्रति स्नेह। मतलब रहन्हि केवल विदाइसँ कोनोटा त्रुटि सासुरमे भेलापर रूखि एहन तँ साधारण बात रहन्हि, अपन सन्तानक जन्मक सम्बन्धमे भ्रामक प्रचार कऽ देबामे संकोच नहि करथि। एहन तरहक दन्त कथा वल्हमीझाक आदिक सम्बन्धमे प्रचलित अछि।

    बिकौआक लक्षण : ई बिकौआ आजुक तुलनामे कम नहिकिन्तु, मुद्रा मोचन हजार-लाख जँ नहि नहि करैत छलाह तँ दान जैतुक ....... सँ लेथि। जाहि कन्यासँ विवाह होइन्ह तकर पालनक भारसँ मुक्त रहबे करथि, संगहि अलाबा ऊपरसँ हिनक धाक कड़गर रहन्हि। उत्तम भोजन, वस्त्र आ ढेउवा विदाइक रूपमे भेटि जाइन्हि। एतए तक जे बाप-पुरुषा वा नीज रीन-कर्जा लेल सेहो सासुरेसँ चुकाएब उद्देश्य रहन्हि। सालमे एक-आध बेर सासुर जाथि ताहि सहवाससँ जे सन्तान उत्पन्न होइन्हि वएह कनेदानीक वा डीहीक उपलब्धि बूझल जाइत छल। ई बिकौआ आकर्मण्य जीवनक अभ्यासी भऽ गेल छलाह। ...... किछु नहि मात्र पेट पोशव उद्देश्य रहन्हि। तम्बाकू, भांगक पूर्ण अभ्यासी रहथि। शरीरिक चेष्टा घिनौन बनौने रहथि। चालि-ढालि पूर्ण असभ्य जेकाँ रहैत छलन्हि। माथमे चानन-ठोप लगौने रहथि। पैरक वेमाय विदरल ठोर नमरल पेट चुबैत कनेरक टारी रथि तथापि एहनो अश्रद्ध रूप भेलापर महग रहथि, किएक तँ पञ्जीक प्रमाण पत्र भेटल रहन्हि। तेँ कन्या पक्ष हिनक रूप, गुण वैभवक मूल्यांकन नहि कऽ सोन सन कन्याकेँ ढेंग संग बान्हि दैत छल। बादमे ई बिकौआ वदु-विवाही होमए लगला, जाहिसँ मैथिल व्रह्मणमे कन्यादानक मुख्य समस्या छल। बहुविवाहक समस्या बिकौआ द्वारा केवल उत्पन्न भेल से नहि आओरो कारण भऽ सकैछ, जेना राजकुलक संसर्गसँ व्राह्मणमे कुप्रथा अएबाक संभावना। पहिने व्राह्मण तपी, त्यागी होथि किन्तु मंत्री अथवा राजपुरोहित भेलापर देखाउससँ बहु विवाहक अभ्यासी भेलाह। किएक तँ राजभवनमे रानिक अतिरिक्त सुन्दरीक झुण्ड निवास करैत छल। परञ्च, मैथिलक ई बिकौआ वर्ग अर्थक लोभसँ निम्न कुलमे पच्चीस-तीस स्त्रीसँ विवाह करैत छलाह। एतबे नहि, श्मशानघाट जेबासँ पूर्वो विवाह कऽ लैत छलाह। जँ प्रथम स्त्रीकेँ घर अनितो छलाह तँ शेषकेँ नैहरेमे छोड़ि दैत छलाह। इएह जीवन निर्वाहक उत्त साधन छलन्हि। एहि बहु विवाहक प्रथाकेँ तोड़बाक चेष्टा प्यारेलाल मुंशी 1870 ई.मे कएने छलाह। हुनका आन्दोलन जोर-शोरसँ चलल छल। ओहि परिप्रेक्ष्यमे 1878 ई.मे तिरहुतमे 54 बिकौआ व्राह्मण मृत्युसँ 665 स्त्री विधवा भेल छल जाहिमे अधिकांश युवतीमे छल। एतए तक जे मधुबनी जिलाक कोइलख निवासी एक बिकौआ 50 वर्षक आयु तक 35 विवाह कऽ नेने छलाह। सन् 1875 ई. दरभंगा जखन सवडिविजन बनल तँ तात्कालीन पदाधिकारी मेटलाक आदेश कएल जे प्यारे लाल मुंशीक आन्दोलनक अनुसार बहु विवाह बन्द हो। एहि तरहेँ बिकौआ द्वारा बहु विवाहक समस्या उत्पन्न भेल से कही वा मिथिलाक लोक द्वारा बनाओल गेल। रूढ़िवादी विचारक कारण कन्याक भविष्यक समीक्षा नहि कऽ अपन उत्तरदायित्वकेँ समाप्तिक बहानामे बिकौआक ठोंठमे कन्या बान्हब थिक।

    बंगालक कुलीन प्रथा सेहो मिथिलाक बिकौआ प्रथाक समान छल। वार्ड (Ward) महोदयक अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे वंगपराक उदय चन्द्रकेँ 65 स्त्री छलन्हि, कुशदाक राम किंकरकेँ 72 स्त्रीसँ विवाह रहन्हि। एक एहनो घटना भेटैत अछि जे दुगलीक रामचन्द्र मुखर्जीकेँ 32 स्त्री रहैन्ह आ वो 65 वर्षक अवस्थाकेँ पार कएने छलाह, दैवात् यक्ष्माक शिकार भऽ गेलाह, मृत्युक निश्चितता जानि बालक कहलथिन्ह-

    दीन भावसँ बाबूजी अपने तँ मरैत छी घरमे एको चुटकी अन्न नहि अछि, एहन हालतमे श्राद्धो कोना होएत?”

    पिता किछु गंभीर भऽ निहसंकोच भऽ कहलथिन्ह-

    अविलम्ब नव गोपाल चटर्जीक 9 वर्षीय कन्यासँ हमर विवाहक व्यवस्था करू, किछु दिन पूर्व प्रस्ताव आएल छल, एखनो ओ कन्या अविवाहिते अछि।

    पुत्र सम्वाद पठा कए 250 रूपैया पर बात निश्चित कएलथिन्ह। विवाहक 9 मासक अभ्यंतरे रामचन्द्र मुखर्जीक मृत्यु भऽ गेलन्हि। एहि तरहेँ ओ अपन श्राद्धक इन्तजाम विवाहे द्वारा पूरा कए मुइलाह। ई सभ छल बहु विवाहक कुपरिणाम! विवाह सन पवित्र रेवाजकेँ दुषित करब समाजक कुचालि कहू वा कलंक।

    बिकौआ द्वारा विवाहित कन्याक जीवन झाँकी :एहि प्रथाक प्रकोप तँ तेहन छल जे बूढ़, बकनेर, अकर्मण्य वरक संग तरूणीक विवाह एक प्रकारक विडम्वना कहल जा सकैछ। अनेको कोम लांगी जीवनक सोलहम वसन्तक पहिने विधवा भऽ कठीन जीवन जीबाक अभ्यासी होइत गेल। राजा राम मोहन रायक शती-प्रथा उन्मूलनसँ अनेको विधवा वा बूढ़क स्त्री काम पिपासावश कुत्सित कर्मक भाजन भेल। एतबे नहि, बिकौआ द्वारा विवाहित किशोरी पिताक घरमे आजीवन थोपल रहलासँ कुमार्ग गामी भऽ जाइत छल। एहिसँ दारूण स्थिति ई भेल जे मैथिलक दरिद्र समुदाय बिकौआक वंशधर एखनो अछि। हिन्दूस्तानक अधिकांश शहरमे भनसिया, भीमंगा वा ताईं नीच कर्ममे प्रवृत मैथिल ब्राह्मण बिकौआक सन्तान थिकाह। इहए कारण अछि जे मिथिलेत्तर प्रान्तमे मिथलाक कुख्यातिक कुचेष्टा लोक करैत अछि। आब बिकौआ प्रथाक अन्तो आवश्यक छल।

    बिकौआ प्रथाक अन्त कहू वा विकल्प दहेज प्रथाक आरंभक कारण- अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसारसँ लोक नैतिक स्तर ऊपर उठए लागल। विज्ञान विकाल भेल। वैज्ञानिक आविष्कारसँ लोक जीवनमे आमूल परिवर्त्तन होमए लागल। चिकित्सा विज्ञान प्राकृतिक प्रकोपकेँ रोकि देलक। जनह्रास नहि भेलासँ जनवृद्धि अवाध गतिमे होमए लागल। स्वाधीनताक कारणेँ जन जीवन उर्द्धगामी होइत गेल। तेँ आब कनेदानी राखब आ ओकर सन्तानक भार उठाएब असौकर्ज भऽ गेल। शिक्षित समुदायमे वैचारिक क्रान्ति आएल तेँ पुरना प्रथा, रूढ़िवादिता, कुलीन प्रथा  वा बिकौआक समूल नष्ट करब आवश्यक प्रतीत भेल। अनमेल विवाह, वृद्ध विवाह, बाल विवाहक परम्पराकेँ ....... अपन वैभवक अंश नगद रूपमे दऽ कन्याक विवाह कराएबक परिपाटी शुरू भऽ गेल।

    दहेजक दारूण स्वरूप : जहिना बिकौआक श्रेणी छल तहिना शिक्षित वर्गक माप दण्ड कायम भेल व्यवस्था रूपमे। डाक्टर, इंजीनियर, ओभरसियर, टेकनीसियन ........ श्रेणी सरकारी सेवक प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय श्रेणी ओ चतुर्थवर्गीय गैर सरकारी सेवकक संगहि शिक्षण संस्थाक सेवक श्रेणी कायम भेल। आब की छल वरक विक्री उपर्युक्त आधारपर होमए लागल। बरदहटा जकाँ वरक हाट सेहो लागल रहैछ जेन सौराठक सभा गाछी। जाहि कन्याक पिताकेँ जेहन उपाय रहैछ तेहन श्रेणीक वरकेँ खरीद कऽ विवाह करबैत छथि। दिनानुदिन दहेजक प्रकोप बढ़ले जाय रहल अछि। एहि दहेजक दारूण रूप तँ ई भेल जे गरीब कुमार व्रह्मण जे अयोग्य अछि ओ अविवाहिते मरैत अछि। अनेको उदाहरण भेटैत अछि। बिकौआ प्रथामे एहन बात नहि भेल रहए। खैर! दहेज-प्रथामे सक्ष्मक संग विवाह करायब युग-धर्म मानल गेल अछि, मुदा दहेजक विकराल रूप सामने अछि। बिकौआ रूसैत छल तँ ओ मनौती कएलापर मानि जाइत छल, किन्तु ई दहेज-प्रथाक शिक्षित वर्ग तँ रूसलापर स्त्रीक जान लऽ लैत अछि। एतबे नहि, कन्याक अपमान, तिरस्कार ओ अवहेलना करब स्वाभाविक होइछ। मनोनुकूल विदाइ वा दहेजक राशिमे कमी भेलापर सासु, ससुरक संग आगत व्यवहार तककऽ दैत छथि। पहिलुका बिकौआ मांग, तमाकू खाइत छल तँ आजुक वर मदिरा, सिगरेट, चरस ओ ....... अभ्यासी होइत अछि। बिकौआ एक आध बेर सासुर अबैत छल, मुदा आजुक ई बिकौआ सालो भरि सासुरे रहबाक आकंक्षी अछि। अन्तर सिर्फ एतबाटा जे बिकौआक स्त्री पितेघरमे रहैत छल जाहिसँ मर्यादित छल, मुदा एखनुका वरक स्त्री संगहि रहैत अछि, किन्तु एहि पढ़लाहीक शील, स्वभाव रहन-सहन चालि-ढालि वातावरणक कारणेँ विकृत भऽ जाइछ। अधिकांश स्त्री तँ शीलहरणक शिकार भऽ जाइत अछि। कोना बूझब जे बिकौआ प्रथाक अन्त भेल? आजुक ई दहेज प्रथा तँ ओकरोसँ विभिन्न रूपमे सामने आएल अछि। आजुक दहेज प्रथाक कारणेँ कन्याक पिताक धर्म, धन ओ इज्जत सभ नीलाम भऽ जाइत अछि। पाईक अभावमे कन्याक पिता बोझ तरहक दूभि जकाँ पिअरगात कृशकाय भऽ समय काटि रहल अछि। कतबो रूप-गुणसँ युक्त कन्या छन्हि, मुदा पाईक अभावमे हुनक पिताकेँ केओ मोजर नहि दऽ सकैछ। पैसाक पिशाची लोक योग्य-अयोग्य कन्याक सीमाकेँ सन्दिग्ध कऽ देने अछि। अनेको पिता-पुत्रीकेँ शिक्षित करैत छथि, ताकि हुनका बेटाबला दहेजमे छूट देताह मुदा से सम्भव नहि। योग्य वर कन्याक वरण करथि से ख्याल केओ नहि करैत छथि जाहिसँ निर्मल दाम्पत्य जीवन नशीव होएब कठीन भऽ गेल अछि। एकर प्रतिफल की होएत? मैथिल समाजक श्रृंखला टूटि जायत, आर्थिक विषमता सामाजिक जन्म देत।

    एक दिसि जँ कन्या पक्ष बालक भीत जकाँ ढहल जाय रहल अछि तँ दोसर दिसि वरक पक्ष मनोरथ्ज्ञक पूल बिनु सिमेन्ट-बालुक जोड़बामे तल्लीन अछि। कहिया धरि ई दहेजक दाहसँ सन्तप्त रहत से नहि जानि।

    दहेजक कारण अविवाहित कन्याक जीवन झाँकी : दहेजक दर्दनाक असरि तेहन तरहेँ पड़ि रहल अछि जे अधिकांश सम्भ्रान्त परिवारक कन्याक कौमार्य अवस्था विवाहक पतिक्षेमे समाप्त भऽ जाइछ। एतए तक जे यौवनकालमे नारकीय अवस्थाक अनुभव करैत अछि। प्राय: बेटीबला ओ बेटाबला दूनूक समक्ष ई समस्या उत्पन्न छन्हि।केओ एहिसँ मुक्त नहि छथि मुदा टाका गनाएब आ गानबकेँ आइ मर्यादाक विषय जानल जाइत अछि। जे जतेक टाका गनबैत छथि ओ ओतेक गर्वोक्तिसँ समाजकेँ बुझबैत छथि, संगहि जे गनैत छथि से अप्पन बड़प्पनक विशद् वर्णन करैत छथि।

    सभसँ खेदक विषय तँ ई जे गरीब लोक जे बेटीक प्रति ताका लैत अछि वा छल, तकरा लोक बेटी बेचबा कहैत छल। घृणाक दृष्टिसँ देखैत छल, आइ ओकर उनटा हवा बहि गेल अछि। बेटा बेचनिहारकेँ लोक बेटा बेचबा नहि कहि समाजमे उच्चासन दैत अछि जाहिसँ बेटाक विवाह टाका लऽ कए करबामे गौरवान्वित होइत अछि। ई समाजक लोकक विचारहीनता नहि तँ आर की? एहिसँ निन्दनीय बात आइ की होएत? तखन तुलसीक पाँति स्मरण भऽ जाइछ-

    समरथकेँ नहि दोष गोसाईं।

    अर्थात् पैघ लोककेँ दोषी नहि कहल जाइछ। ओइ दहेजक पृष्ठपोषक समाज पैघे लेाक छथि तेँ एकर उन्मूलन सम्भव कोना? नहि जानि बिकौआक जगह दहेज आएल आ ई कहिया धरि लोककेँ खिहारैत रहत? आइ तँ आइ तँ अधिकांश ललना अभावी पिताक छातीपर दुर्गम पहाड़ बनि बैसलि अछि। कतेक तँ विवाह सूत्रमे बान्हलोपर भाग्यपर झखैत अछि। मनोनुकूल घर-वरक अभवमे संघर्षरत जीवन बिता रहल अछि। सुख सुविधामे पलल बालिका पतिक घरमे गंजन, दुव्यर्वहार, व्यंग्यपूर्ण वाक् वाणसँ विद्ध होइत रहैछ जकर कारण होइछ लेन-देनक गड़वरी, दान जैतुकमे मनचाही वस्तुक आपूर्त्तिमे कमी। एतबे नहि दहेजक उपरान्त वरियातक विशिष्ट सेवा नहि भेलासँ वा कोनो तरहक विघटन भेलापर कन्याकेँ सासुरमे पति द्वारा वा पतिक घरक लोक द्वारा अमर्यादित व्यवहार कएल जाइछ। कतेकठाम तँ कन्याक हत्या कऽ देल जाइछ आ नहि तँ कन्या स्वयं आत्म हत्या कऽ लैत अछि। सभक मूलमे दहेजे अछि जे कन्याक पिताकेँ विवश कऽ दैछ, विवशताक कारण होइछ द्रव्याभाव, अर्थाभाव। कोजागरा, जड़ाडरक संग-संग साल भरि तक व्राह्मण समाजमे बेटीबलाक तनोतरी ढील भऽ जाइछ तेँ विवाहसँ विध भारी कहल जाइछ।

    दहेज-प्रथाक उन्मूलनक उपाय- यद्यपि वर्त्तमान सरकार दहेज लेनिहार ओ देनिहार दुनूकेँ कठोर दण्ड देबाक अध्यादेश जारी कएल अछि, मुदा ई नैतिक पतनबला लोक एखनहुँ कम्बल ओढ़ि कऽ घी पीबएबला बात रखने अछि। सरकारक ऑंखिमे तँ गर्दा दैते अछि संगहि समाजोकेँ उल्लू बना रहल अछि। लेन-देन कऽ लइए। गुप्त रूपसँ ताकि हम आदर्श रूपमे कुटमैती कएल अछि। तेँ सरकारक द्वारा एकर उन्मूलन कथमपि सम्भव नहि। एकरा लेल वैचारिक क्रान्ति चाही, समाजक हरेक व्यक्तिक नैतिक समर्थन चाही। ई एक कलंकपूर्ण रेवाज थिक जतए पाइपर दू आजीवन मिलि कए रहए बला जीव तकर प्रेमक आकलन पाइपर हो। निश्चय एहि तरहक समाजकेँ कलंकित समाज घोषित कएल जाय जतए टाकाक आधारपर दाम्पत्य सम्बन्ध बनाओल जाइछ। एक शब्दमे कहए पड़त जे विवाहक पवित्रताकेँ तखने कायम राखल जायत जखन हरेक वर्गक लोक आत्मगत विचार कऽ विवेकपूर्ण निर्णय लेथि। आडम्वरपूर्ण विवाह प्रक्रियाक संग दहेजक विकृत परिपाटीक विरोध करथि। भविष्यक जननी सृष्टिक संरचना करनिहारि आजुक कन्या काल्हि पूर्ण अभिशप्त भए जाएत।

    यत्र नार्य वस्तु पूज्यन्ते,

    रमन्ते तत्र देवता।

    मनुस्मृतिक ई वाक्य सर्वथा अमान्य भऽ जाएत आ एक दिन हमरा लोकनिकेँ अवनतिक महान गर्तमे लऽ कए चल जायत!q

     

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