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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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  • दुर्गानन्द मण्डल

    लघुकथा

    सीख

    नान्हियेटा मे बुधुआ बुढ़िया दादीकेँ एक दिन तंग-तबाह केने छल।

    दाय यइ दाय एकटा खिस्सा कहियौ। नीमन खिस्सा कहियौ। झब-दे कहियौ, नहि तँ ठोँठ दाबि कऽ मारि देब।

    रउ सरधुआ, छोड़ ने रौ। गरदैन छोड़ ने, नहि तँ मरि जाएब।

    दाय जोरसँ चिचिआ-चिचिआ ई कहैए।

    अरौ बाप रौ बाप। ई छौड़ा हमरा मारि देलक!”

    बुधुआ दाइक गरदैन छोड़ि देलक आ जा कऽ दाइक कोरामे बैस जाइए, खिस्सा सुनैले।

    दाय खिस्सा शुरू केलैन। एक नगरमे एकटा राजा छेलइ। ओकरा फूलक एकटा बड़का फुलबाड़ी छेलइ। जइमे सभ तरहक फुल रोपल छेलै आ बहुत रास फूल फुलाएलो छेलइ। जइमे एकटा बड़ सुन्दर फूल खिलल छल। नमहर आ सुन्दर सेहो छेलइ। सभ फूल ओकरा राजा-गुलाब कहै छेलइ। रसे-रसे राजा गुलाब आन-आन फूल सभसँ अपन प्रसन्नता पाबि अंहकारी भेल जे छल। ओ एतेक अहंकारी भऽ गेल जे आब ओ आन-आन फूलसँ बातो ने करए चाहै छल। मुदा आन-आन सभ फूल राजा गुलाबक ऐ बेवहारकेँ ओकर नादानी बुझि ओकरा सम्मान दइते रहल।

    ओइ राजा गुलाबक जड़िमे एकटा बेश नमहर करिया पाथर गाड़ल छेलइ। अकसरहॉं ओइ करिया पाथरकेँ ओ राजा गुलाब डॉंटैत रहै छेलइ। जे तोरा कारण हमर रूप आ सौन्दर्य खराप भऽ रहल अछि। तों केतौ किए ने चलि जाइ छेँ।

    ओ पाथर कएक बेर राजा गुलाबकेँ समझौलक। जे एतेक घमण्ड नीक नइ होइ छइ। मुदा राजा गुलाब अहंकारमे मातल अकैड़ कहलक-

    अरेकाला पाथर, हमरा आगॉं तोहर कोन तुलना। तूँ तँ हमरा शरणमे पड़ल छेँ।

    समय बीतैत गेल। किछु दिनक पछाइत एक बेकती ओइ फुलबाड़ीमे आएल। घुमैत-घुमैत ओकर नजैर ओइ पाथरपर पड़लै। ओ ओकरा उखाड़ि अपना संग नेने चलि गेल। राजा गुलाबक खुशीक कोनो ठेकान नहि रहलै। ओ सोचए जे नीक भेल ई पाथर ऐठामसँ हटि गेल। अनेरे ई हमर सुन्दरताकेँ खराप करै छल।

    समय बीतैत गेल। थोड़बे दिनक पछाइत ओही फुलबाड़ीमे एक आदमी ओइ फुलबाड़ीमे आएल। ओकरा ओ राजा गुलाब फूल खूब नीक लगलै। ओ ओकरा तोड़ि एकटा मन्दिरमे जा भगवानक मूर्तिक चरणमे समर्पित कऽ देलक। राजा गुलाबकेँ ओतए एकदम नीक नै लगै छेलइ। ओकरा अपन पैछला दिन-राति मोन पड़ए लगलै। ओकरा फुलबाड़ीमे भेटए-बला सम्मान सेहो मोन पड़ए लगलै। ताबत ओकरा केतौसँ हँसी सुनाइ पड़लै। ओ गुलाब एमहर-ओमहर चारूकात तकलक मुदा केकरो ने देलक।

    ताबत ओकरा एकबेर दिव्य आवाज सुनि पड़लै- 

    राजा गुलाब, तूँ एमहर-ओमहर की देखै छेँ। हमरा देख। हम वएह पाथरक मूर्ति छी, जेकरा तूँ ओइ फुलबाड़ीमे तुच्छ बुझि सदिखन कटैत रहै छेलेँ। आइ देख जे तूँ हमरा शरणमे पड़ल छेँ।

    राजा गुलाब तँ आश्चर्यचकित छल। बाजल-

    भाय पाथर, तूँ एतए एलेँ केना?”

    ओ मूर्ति रूपी पाथर बाजल-

    सून राजा गुलाब, जे बेकती हमरा एतए अनलक ओ एकटा मूर्तिकार छल। ओ हमरा छेनी-हथौरीसँ तोड़ि-ताड़ि पाथरसँ भगवान बना ऐ मन्दिरमे स्थापित कऽ देलक। आ तूँ..?”

    राजा गुलाबआत्म ग्लानिसँ भरल ओइ मूर्ति रूपी पाथरक सामने सिर झूका क्षमा याचना करैत बाजल-

    भाय, अहंकारीक सिर सदिखन निच्चॉं होइते छइ। अत: मानवकेँ अपन अहंकारक त्याग कऽ देबाक चाही। ताकि ओकरा अपन हस्तीक पता रहइ।

    से सुन बौआ रौ बुधुबा, एतए बदमाशी नइ कर। सुन कहबी छै- मेटा दिअ अपन हस्ती यदि मतिवा चाही कि दाना, माटिमे मिल कऽ गुले-गुलजार होइए।

    सीख- कखनो फूलक समान नै जीबू, जइ दिन जरूर खिलब आ तोडल जाएब।

    जीनाइ यदि छह तँ पाथर बनि जीबह, जइ दिन तराशल जेएब, भगवान बनि जाएब।

    बुधुबा तँ तात दाइक कोरमे अलिसा गेल छल।

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