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निर्मला कर्ण- अग्नि शिखा (भाग- १९)

निर्मला कर्ण (१९६०- ), शिक्षा - एम् ए, नैहर - खराजपुर,दरभङ्गा, सासुर - गोढ़ियारी (बलहा), वर्त्तमान निवास - राँची,झारखण्ड, झारखंड सरकार महिला एवं बाल विकास सामाजिक सुरक्षा विभाग मे बाल विकास परियोजना पदाधिकारी पद सँऽ सेवानिवृत्ति उपरान्त स्वतंत्र लेखन।
मूल हिन्दी- स्वर्गीय जितेन्द्र कुमार कर्ण, मैथिली अनुवाद- निर्मला कर्ण
 

अग्नि शिखा (भाग- १९)

पूर्व कथा:
राजा पुरूरवा उर्वशी सs विदा लs पृथ्वी पर वापस जाई के बात कहैत छथि। पुनः हुनका सs भेंट करवाक लेल अबई के वचन दs अमरावती में अपन निवास जाइत छथि।
आब आगू:
राजा पुरूरवा के स्वर्ग सँs भूमंडल पर आएल तीन मास बीत गेल छल। राज्य कार्य में पुरूरवाक मोन आब पहिले सन नहि लगैत छलनि। सदिखन हुनकर ध्यान उर्वशी पर लागल रहैत छलनि। कखनो-कखनो ओ विरह वेदना में व्याकुल भs जल बिनु मीन सन तड़पs लगैत छलथि,मुदा अतेक शीघ्र ओ स्वर्ग लोक कुना कs जा सकैत छलाह? भला कोन कारण देखबितैथ स्वर्ग लोक जयवाक ? एहेन कुनो कारण हुनका नहि भेटि रहल छलनि। देवेन्द्र के कुनो संदेश एखन धरि नहि आबि रहल छल। आब ओ कोन उपाय करथि उर्वशी सँs मिलन केर, हुनका नहि बूझना जाइत छलनि। उर्वशी के विरह के कारण ओ लगन पूर्वक पृथ्वीक शासन व्यवस्था सम्हारवा में समर्थ नहि भs पाबि रहल छलाह।
राजा पुरूरवा एक दिन अपन राज प्रासाद में चुपचाप बैसल उर्वशी के ध्यान में निमग्न छलाह। ताहि समय राज्य ज्योतिषी के पदार्पण भेल। अचक्के हुनक दृष्टि पुरूरवाक सीधा राखल हथेली पर चलि गेलनि l कुतूहल वश ओ ध्यान पूर्वक पुरूरवाक हथेली के निरीक्षण करs लगलाह।प्रसन्नता हुनक मुख पर छलकि उठल। ओ प्रसन्न भय बाजि उठलाह -
"राजन् बुझना जाइत अछि आहाँ के जीवनसंगिनीक साथ अति शीघ्र भेटय बला अछि"।
राजा के मुख पर उदास सन मुस्कान प्रगट भेलनि फेर ओ गंभीर होइत राज ज्योतिषी सs पुछलथि -
"कतेक दिन में अपनेक बात सत्य होयत ब्राह्मण देव"?
"अधिकतम छ:मास! मुदा एक गोट समस्या देखि रहल छी राजन्"!
"ओ कथि थिक देवता"?
"दांपत्य सुख बहुत कम अछि राजन् अपनेक हथेली में। आहाँ के पत्नी के वियोग में आधा उम्र बिताबय पड़त राजन्"।
राज ज्योतिषी केर बात सँs राजा के उत्साह समाप्त भय गेल। हुनका भरतमुनि केर श्रापक स्मरण आबि गेलनि। पुन: दु:खी भय गेलाह राजा पुरूरवा। ओ गुमसुम भs गेलथि। राज ज्योतिषी कक्ष में व्याप्त मौन के तोड़लथि -
"मुदा अपनेक जीवनसंगिनी कोनो साधारण रमणी नहि होयतीह राजन्"l
कुतूहल वश पुरूरवा पूछलथि - "फेर"?
"कुनो दिव्य नारीक योग अछि"।
पुरूरवा पुन: गंभीर भs गेलथि। हुनक मोन में उर्वशीक स्मरण तीव्र वेग सँs हिलकोर मारs लगलनि। मोन में टीस सन उठs लगलनि। मुदा अपन आंतरिक व्यथा के ओ संयम सँs नियंत्रित कs लेलथि। अपन व्यवहार सँs मोनक व्यथा प्रगट नहि होमय देलथि राज ज्योतिषी पर।
राज ज्योतिषी सँs एम्हर-ओम्हर के राज्य सँs संबंधित बात होमय लगलनि । पुरूरवा हां - हूं में अनमनायल भाव सँs जवाब दैत रहलथि। हुनक ध्यान तs स्वर्ग लोक में बैसल अपन प्रेयसीक निकट पहुंचि गेल छलनि।
चरिम दिन इन्द्रक संवाद आयल। तीन दिन उपरान्त विशेष कार्य वश देव सभा होमय के छल। ओहि सभा में पुरूरवाक उपस्थिति आवश्यक छल,स्वर्गक अर्ध-शासक होयवाक कारण।भला हुनक अनुपस्थिति में कुनो विशेष कार्यवाही कोना भय सकैत छल ?
पुरूरवा के उपयुक्त अवसर भेट गेल उर्वशी सँs भेंट करवाक। ओ शीघ्र स्वर्ग जयवाक तैयारी करs लगलाह । तत्पश्चात ओ विदा भेलाह अमरपुर के दिशा में । रथ हुनका गंतव्य पथ पर तीव्र गति सs लs गेलनि । स्वर्ग में पहुंचि ओ सर्वप्रथम देवेंद्र सँs भेंट केलथि,तत्पश्चात नंदनकानन में जाकय उर्वशी सँs भेंट कय अपन विरह वेदना के शांत कय ह्रदय तृप्त केलथि।
तत्पश्चात कतेक दिन तक देव सभा भेल जाहि में राजा सम्मिलित भय कार्य निष्पादन केलथि । सभा समाप्त भेलाक उपरांत पुरूरवा के पुन: पृथ्वी पर आबय पड़लनि।
आब ओ प्रत्येक मास स्वर्ग लोक जाय लगलाह। कारण स्वयं इन्द्र के कहनाम छल -
'स्वर्गक शासन व्यवस्था के संचालन में राजा पुरूरवा के अनुमति एवं सहयोग आवश्यक हैत'।
स्वर्ग लोक जाय पर ओ उर्वशी सँs भेंट अवश्य करथि। दिन प्रतिदिन उर्वशी-पुरूरवाक प्रेम प्रगाढ़ सँs प्रगाढ़तम भेल गेल। प्रेमाग्नि के ज्वाला दुनू के हृदय में तीव्र सँs तीव्रतम होइत गेल।


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राजा पुरूरवाक रथ वायु वेग सँs आकाश मार्ग सs चलल जा रहल छल। पुरूरवा ओहि रथ में सवार छलाह। हुनकर मोन अत्यंत प्रसन्न छलनि। मोन में उछाह छलनि। "पिया मिलन केर आस" - मनुष्य के स्वर्ग तक झीकि लs जाइत अछि! राजा पुरूरवा तs ओहुना स्वर्गक शासन के अर्ध अधिपति छलाह ।
मंद सुगंधित पवन मन-प्राण के शीतलता प्रदान कs रहल छल। आकाश में छिटपुट बादल एम्हर-ओम्हर घूमि रहल छल। एहि कारण पृथ्वी हुनका धुंध में लपटायल मात्र एक गोला दृष्टिगत भय रहल छल। ओ प्रसन्नता में किछु-किछु गुनगुनाइत जा रहल छलाह । बहुत रास मूल्यवान उपहार हुनक रथ में भरल पड़ल छल। उर्वशी के देवाक वास्ते बड़ हुलास सँs ओ ई सभ उपहार तैयार करबौने छलाह। रथ तीव्र गति सँs अपन मार्ग पर चलैत रहल।
आब रथ दूसर दिशा में घूमि गेल । किछु काल धरि ओहि दिशा में चलैत रहल । राजा पुरूरवा रथ के गति तीव्र केलनि। ओ शीघ्र!अति शीघ्र अपन गंतव्य पर पहुंचि जाय के चाहैत रहथि । दसो दिशा में नीरवता व्याप्त छल। अचक्के हुनक दृष्टि दक्षिण दिशा में घूमि गेलनि । ओम्हर किछु रथ उरैत हुनका दृष्टिगोचर भेल । राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित भs गेलाह।
'ई रथ तs दानव निर्मित लगैत अछि ' - राजा पुरूरवा मोनहि मोन सोचलनि।
'मुदा दानव के आकाश मार्ग में तs होयवाक नहि चाही' - मोन में सोचैत राजा पुरूरवा अपन रथ ओहि दिशा में घुमा लेलनि। पुरूरवा के रथ आब पूर्व दृश्ट दानव निर्मित रथ के पाछू लागि गेल। आब अनेक रथ हुनका देखवा में आबय लागल,जे पंक्ति बद्ध भय चलि रहल छल। पुरूरवा के मोन में आशंका होमय लागल -
'ई तs दानव के रथ अछि,अवश्य एहि सभ रथ के लs कs स्वर्ग लोक सs दानव आबि रहल होयत' सोचलथि पुरूरवा। रथ आब अत्यंत निकट पहुंचि गेल छल। ओ अगिलका रथ के रुकवा हेतु तीव्र स्वर में आवाज लगौलथि,मुदा ओ सभ आओर तीव्र गति सँs भागs लागल। ई देखि राजा के अनहोनी के आशंका होमय लागल।
पुरूरवा अपन रथ के गति आओर तीव्र कय दानवक रथ सँs आगु निकालि लेलथि। आब हुनक दृष्टि एक रथ सँs टकरायल। अरे! ई की भेल ! ओहि रथ में तs राजा के अपन प्रेयसी उर्वशी छलीह। संगहि छलीह उर्वशीक प्रिय सखी चित्रलेखा! राजा के एक झलक उर्वशी के भेट गेलनि! राजा के झलक पाबि एक करुण चित्कार निकलि पड़ल उर्वशी के कंठ सँs अपन रक्षा हेतु!
ओह! दानव राज केशि चोर सन स्वर्गक दुनू अप्सरा के हरण कय पड़ा रहल अछि! हठात् पुरूरवा के मस्तिष्क में ई बात बिजली सन चमकि उठल ! राजा झट अपन तलवार निकालि लेलथि! ओहि रथ सs पहिलहि तलवार निकलि गेल छल। दुनू के मध्य युद्ध होमय लागल। देखितहि-देखइत में आग्नेयास्त्र के प्रयोग करs लागल केशि। किछु क्षण पुरूरवा किंकर्तव्यविमूढ़ सन भs गेलाह। केशि के द्वारा आग्नेयास्त्रक प्रयोग करवा सँs क्षुब्ध भs राजा पुरूरवा अपन तलवार फेंकि शीघ्र दिव्य अस्त्रक प्रयोग करs लगलथि। आब दुनू के मध्य घनघोर युद्ध होमय लागल । एहि अप्रत्याशित आक्रमण सs ओना तs दानवराज किछु घबड़ा गेल छल मुदा दानवक हौसला बुलंद छल,कारण शत्रु नितांत असगर छल। घमासान युद्ध होमय लागल।
पुरूरवा एहि युद्ध सँs कनिको विचलित नहि भेलथि। ओ तs क्रोध सs उन्मत्त छलाह। आखिर दानवराज केशि हुनक प्रियतमा पर अपन कुदृष्टि रखने छल! अपन प्रियतमा पर उठय वला हाथ के कटवा हेतु ओ अपन पूर्ण शक्ति सँs युद्ध कs रहल छलाह। अनेकों राक्षस अपन प्राण गंवाओल । आब बहुत कम दानव दृष्टिगोचर भs रहल छल। पुरूरवा के उत्साह एवं युद्ध के गति अत्यंत तीव्र वेग में आबि गेल छल। राजा आब मायास्त्र के प्रयोग केलथि। दानव के अनेकों पुरूरवा दृष्टिगोचर होमय लगलाह । ओ सभ वास्तविक पुरूरवा के चिन्हित नहि कय सकलाह,आ वास्तविक पुरूरवा के छोड़ि कs अन्य छाया पुरूरवा सँs युद्धरत भय गेलथि ।
आब राजा अपन बरछी निकालि लेलथि आ इकर प्रयोग केशि पर केलथि। ओकर छाती सs रक्त के धार झरना सन झहड़ लागल। केशि जतेक बेरि तलवारक वार कएल ओ पुरूरवा के कवचबद्ध बाहु सs टकराकs वायु में विलीन होमय लागलa । आब केशि मूर्छित भय रथ में खसि पड़ल।
अपन राजा के मूर्छित पाबि दानव गण भयानक हुंकार भरय लागल। ओ सभ पुरूरवा के अखन धरि रथ तक आबै सs रोकि रहल छल। पुनः आग्नेयास्त्र के प्रयोग राजा पुरूरवा द्वारा कएल गेल । आब जतेक गनल-चुनल दानव गण बचल छलाह ओ सभ वायुमंडल में नर्त्तन करैत खसs लागल।
पुरूरवा अपन रथ सs उछाल मारि केशि के रथ में प्रविष्ट भय गेलथि, एवं केशि के रथ सs निकालि भूमंडल के दिशा में फेंक देलथि। पुन: ओकर रथ सs उर्वशी एवं चित्रलेखा के अपन रथ के दिशा में उछालि देलथि। ओ दुनू सखी आश्वस्त भय रथ में बैस गेली। आब पुरूरवा स्वयं एक उछाल भरल आ अपन रथ में प्रविष्ट भs गेलाह। रथ पुनः चलनाई प्रारंभ कएल। आब ओ विपरीत दिशा में (स्वर्गक दिशा में) जा रहल छल ।
उर्वशी अपन प्रियतम के पाबि भाव-विभोर भs रहल छलीह। हुनक प्रसन्नता के कुनो सीमा नहि छल। यैह स्थिति पुरूरवा के छल । उर्वशी के सुरक्षित अपन रथ में आनि राजा अति प्रसन्न छलाह । प्रसन्न मुख हँसइत राजा कहलथि -
"यदि हम सही चिन्हि रहल छी तs आहाँ सम्भवत: चित्रलेखा थिकहुँ। आहाँ दुनू सखी पाताल लोकक यात्रा पर भ्रमण के वास्ते जा रहल छलहुँ? हँ ! स्वर्ग लोक में आब आहाँ सभ के देखs के लेल किछु नहि बचल छल"?
चित्रलेखा - "राजन् आहाँ के हंसी सूझैत अछि,आ हम सभ अत्यंत भयग्रस्त भs गेल छलहुँ"।
"ई चोर कोना पकड़लक आहाँ दुनू सखी के"?
"ई हमरा नहि उर्वशी सs पूछब तs ठीक रहत। किएक सखी!तों चुप किएक छह, राजन् के प्रश्न के जवाब दहुन"!
"हम!हम!हम कहियनि? हँ राजन् ! वास्तव में दोष हमर छल"।
"हम यैह तs पूछैत छी! ओकर हाथ में कोना पड़लहुँ आहाँ दुनू"?
उर्वशी के मधुर स्वर गुंजित होमय लागल। पुरूरवा के कर्ण गह्वर में हुनक आवाज अमृतक बून्द सन टप-टप टपकs लागल। ओ निरंतर अपन दृष्टि उर्वशी पर जमौने छलाह । उर्वशी राजा के निरंतर अपन मुख के निहारैत देखि लज्जा वश बीच-बीचमें अपन आँखि के पलक के पर्दा सs झाँपि लेथि। वातावरण में उर्वशी के आवाज गुंजित भs रहल छल,आ राजा हुनक मधुर स्वर सुनि अपन सुध-बुध बिसारने जा रहल छलाह -
"अपन कक्ष में बैसल -बैसल जखनि हमर मोन कुण्ठित होमय लागल,हम चित्रलेखा लग पहुंचलहुँ। ओकरा नींद सँs जगाओल,पुनः भ्रमण करवाक योजना बनाओल"।
"वाह कतेक नीक बात ! जवाब नहि आहाँ के सौंदर्यमयी देवी-गण!अर्ध रात्रि-प्रहर आ घूमs के शौक! आ उहो केकर! सुंदरता के देवी-गण के! वाह-वाह! की कहब ! की आहाँ सभ के ज्ञात नहि,कि जे केओ देखत आहाँ सभ के। आहाँ के सुंदरता ओकर तs प्राण हरण कs लेत। अगर ओ किछु शक्ति राखैबला होयत तखन बलपूर्वक आहाँ के उठा कs अपन शयनागार के श्रृंगार बनाओत"।
"जाऊ! छोड़ि दिय! हम नहि बतायब आब आगु किछुओ । आहाँ तs हमर हंसी उड़ाबय लगलहुँ।आहाँ हमरा बना रहल छी"। उर्वशी हृदय में प्रसन्न होइत मुदा ऊपर सs मधुर क्रोध देखाबैत बजलीह -
"नहि-नहि आहाँ कहु ने। आहाँ के बनेवाक सामर्थ्य तs ब्रह्मा जी के नहि छलनि,तखन हमरा कोन हिम्मत जे आहाँ के बनायब"?
"कहि दहुन चित्रलेखा आब तों बता दहुन,हम नहि बाजब किछु" - उर्वशी मान देखाबैत बजलीह ।
"नहि गे दाई हम नहि कहबई किछुओ ! हम दू गोटे के बीच बाजs वाली के छी" - चित्रलेखा मुस्काइत कहलीह ।
"की हम आ तों अलग-अलग श्रेणी के थिकहुँ "?
"अवश्य! पहिले नहि छलहुँ,मुदा आब भs गेलहुँ"l
"भला से कोना "!
"एकर प्रत्यक्ष प्रमाण साक्षात राजा पुरूरवा छथि। ताहू सs बढ़ि कs आहाँ दुनू के एकहि सुर में धड़कैत हृदय अछि जे,एकहि कथा कहि रहल अछि "।
"अच्छा आब हम बुझलहुँ,अहुँ उर्वशी के हृदय के धड़कन चिन्हि गेलहुँ अछि!
राजा पुरूरवा मुस्काइत बाजि उठलाह।
"हँ!ओ अपन धड़कन संग एकहि नाम लैत रहैत छैक,आ ओ नाम आहाँक थिक राजन्"।
चित्रलेखा के मुख सँs ई बात सुनि उर्वशी गंभीर भय गेलीह।
घबड़ाउ जूनि सखी,हम तs आहाँ के राजदार थिकहुँ। आहाँ के ई बात कुनो तेसर के कान तक नहि पहुंचत"।
,"हम तs सुनिये लेलहुँ ! नहि की! तेसर कान तक तs बात जा पहुंचल"। - पुरूरवा हंसैत-हंसैत बजलाह।
"कथि सुनलहुँ आहाँ"? - उर्वशी पूछलथि।
"वैह....वैह.....कि.....आहाँ....पुरूरवा के मुख सs आवाज नहि निकलि पाओल घबराहट में ।
"आय....आय.....आय...... " -
अपन जीह निकालि कs नकल उतारs लगलीह उर्वशी पुरूरवा के। ई देखि चित्रलेखा आ पुरूरवा दुनू गोटे हंसs लग लथि । आब उर्वशी संकोच वश एंव लज्जा सs अपन दृष्टि झुका लेलथि। किछु देर तक मौन व्याप्त रहल हुनका तीनू के मध्य,पुनः चित्रलेखा बाजलथि -
"स्वर्ग लोक तs संकट सs पुनः घेरा गेल बुझाईत अछि। आब तs हमर सबहक प्रतिष्ठा खतरा में पड़ल अछि"।
"नहि आब एहेन किछु नहि होयत,किएक तs उत्पातक जइड़ केशि मरि गेल अछि"। - राजा पुरूरवा हुनका दुनू के आश्वस्त केलथि ।
चित्रलेखा मौन भs गेलीह । उर्वशी मौन भंग केलथि -
"ई दुर्घटना मात्र आहाँ के कारण भेल "।
"की! कथि कहलहुँ ! हम थिकहुँ एकर कारण! हमरा कारण भेल ई दुर्घटना ! ई कोना कहि सकैत छी आहाँ"? - पुरूरवा पूछलथि।
"हँ! हमर हृदय के चोरी केलहुँ आहाँ!हम ओकर तलाश करैत पहुंचलहुँ उद्यान में,आ ओतहि ई दुर्घटना भs गेल " - उर्वशीक एहि बात पर चित्रलेखा आ पुरूरवा दुनू हंसs लगलथि।
"आहाँ अपन हृदय के विषय में चित्रलेखा सs पूछि लितहूँ तs चोरक नाम ई बता दितथि,तखन आहाँ के चोर के तलाश करवा हेतु उद्यान में जाय के आवश्यकता नहि होइत"।
पुनः एक बेर सम्मिलित ठहाका पसरि गेल। एहि प्रकार सs हंसी-दिल्लगी सs परिपूर्ण बात करैत-करैत ओ आनंद पूर्वक कखनि आ कोना अमरावती पहुंचि गेलथि किनको ज्ञात नहि भs सकलनि। किछु काल पूर्व के दुर्घटना के ओ सभ आनंद मय वातावरण में बिसरि गेल छलाह।

क्रमशः

 

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