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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

| विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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  • १.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र: परिचर्चा: परित्यक्ता आ परिस्थिति: मिथिलाक सन्दर्भ मे २. नन्द विलास राय: लघुकथा- कठही साइकिल

     

      

    डॉ. कैलाश कुमार मिश्र

     

    परिचर्चा

    परित्यक्ता आ परिस्थिति: मिथिलाक सन्दर्भ मे

     

    वैधव्यअभिशाप अछि आ कोनो महिला केँ परित्यक्ता बनेनाइ महा-दुष्कर्म। ई दुष्कर्मपितृसत्तात्मक समाज निर्लज्जता सँ, क्रूरता सँ ऐतिहासिक समय सँ करैत आबिरहल अछि। स्त्री शोषणक एहि सँ घृणित उदाहरण भेटब दुर्लभ। आश्चर्य तखन होइतअछि जखन जाहि पुरुषक कारणे हुनक पत्नी  परित्यक्ता बनलथिन तिनका समाज हुनकरआर्थिक संपन्नता, सामाजिक गरिमा (नाम), उच्च शिक्षा आ ओहदा, व्यवसायकिसफलता आदिक कारणे सम्मानित करैत अछि, मर्यादाक चद्दरि ओढ़बैत अछि, वक्ता बनबैत अछि। सबसँ अधिक दुःख तखन होइत अछि जखन तथाकथित आधुनिक महिला जेपढ़ल-लिखल छथि, सब बात बुझैत छथि, नारी स्वतंत्रताक दम्भ भरैत छथि, नारिवादक झण्डा हाथ मे लेने कोनो ऑलयम्पिकक धाविका जकाँ सनसन करैत दौड़ैतरहैत छथि; लेकिन समय एला पर अपन व्यक्तिगत हितक कारणे शोषक पुरुषक सङ्गदेमए लगैत छथि। जखन रक्षके भक्षक भ' जाए त' ककर आश? एहि विषयकेँ बुझबाक लेलएकर तह मे घुस' पडत। इतिहास सँ वर्तमानक जे बहुत विशाल दूरी एकपेड़ियाउबड़-खाबड़ बाट अछि ताहि पर यात्रा सहभागी अवलोकनार्थी बनि करए पड़त। यथार्थकनजदिक जयबा लेल लिङ्ग भेदक भावकेँ त्याग करए पड़त। कागद की लेखी आ आँखन कीदेखी दुनू साक्ष्य केँ बेर-बेर ख़रोंच मार' पड़त। जखन ई सब काज पूर्ण निष्ठा आईमानदारी सँ समय लगाक' ' लेब त' बातक गह मे पहुँच सकैत छी। नारी सँसम्बन्धित ई विषय अछि ताहिं जौं कियोक गुनमति गम्भीर मैथिलानी एहि पर काजकरथि त' सजातीयताक भाव एहि मे स्वतः आबि सकैत अछि। 

    हमश्रीमती अपर्णा झाक जिज्ञासक निराकरण अथवा हुनका द्वारे ठाढ़ कएल समस्या परविचार करबा लेल एहि विषय पर अपन कलम उठाओल अछि। अपर्णा पुछैत छथि "परित्यक्ता अथवा पथ बाट जोहैत स्त्री या प्रतीक्षारत स्त्री

    अपर्णा झाक कहबाक शैली आ हुनका द्वारा उद्धरित कएल किछु लोकजीवनक घटित दृष्टान्त हमरा झकझोडि देलक। 

    सबसँपहिने ई स्थापित क' ली जे परित्यक्ता किनका कही? हमरा जनैत आ लोकजीवनकजीवन्त उदाहरण देखैत परित्यक्ता ओहेन स्त्री भेलीह जिनका विवाहक बादकोनो-ने-कोनो कारणे हुनकर पति त्यागि देने छथिन। बहुत दृष्टान्त मे पतिदोसर स्त्रीगण केँ घोषित आ अघोषित रूपेँ आनि लैत छथि। बाट जोहए बालीस्त्रीगण ओ होइत छथि जिनकर पति कतौ गेल छथिन मुदा हुनका नहि बूझल छनि जे कतएगेल छथि, की क' रहल छथि। सब बिदेसिया गीत एहेन स्त्री पर लिखल गेल अछि।

     

    परदेसिया केँ चिट्ठी लिखै छै बहुरिया 

    पड़लै अकाल पिया कटै छी अहुरिया”।

     

    या फेरो:

    कियेक दुईए दिनक छुट्टी मे गाम एलयै

    भरि दिन घुमिते रहलियै ने आराम केलियै”।।

     

    एहि गीत सब मे प्रतीक्षा छैक। एहेन प्रतीक्षा जाकर अंत सुखांत हेतैक। ई एहेन बाट जोहब छैक जाहि मे सब किछु मधुर-मधुर हेतैक। 

    मुदाओहि महिलाक की हेतैक जकर पति ओकरा विवाहक बाद छोड़ि देलथिन, परित्यक्ता बनादेलथिन? जकर श्रृंगार, टिकुली, काजर, पाउडर, गहना, वस्त्र, सब बेकार भ' गेलैक। जकरा पति त' छोड़िये देलकैक समाज सेहो नीक भाव सँ नहि देखैत छैक।ओकरा सँ नीक त' विधबा जकरा लेल समाज एक निश्चित बात, वस्त्र, खान-पान, व्यवहार आ आचरण तय करैत ओकरा समाजक मुख्यधारा मे किछु हद धरि जुड़बाक अवसरप्रदान करैत छैक।

     

    पित्रिसत्तात्म्क समाज समाजक संरचना मे बहुत चालाकी सँ परित्यक्ताक स्थान निर्धारित करैत अछि। विध-बेभार आ देवता पितर मे एहि प्रथा केँ जोड़ैत अछि। एकर उदेश्य कहीं ई त नहि जे स्त्रिग्न समाज मानशिक रूप सँ परित्यक्ता बनबा लेल तैयार भ’ जाथि? चलू लोक परम्परा मे चलैत छी। मधुश्रावणी कथा मे एक प्रसंग सन्ध्याक विवाहक अबैत छैक।सन्ध्या के छथि? सन्ध्या शिवानी गौरीक छोट बहिन छथि। अपन सुन्नरि सारि सन्ध्या सँ महादेब केँ प्रेम भ’ जाइत छनि। सन्ध्या सेहो अपन बहिनोई महादेब सँ प्रेमक आदान-प्रदान केनाई शुरू केलनि। परिणाम ई भेल जे जखन सन्ध्या विवाह योग्य भेलीह त’ महादेब गौरी सँ चोराक सन्ध्या सँ विवाह करबा लेल चल गेलाह। एम्हर गौरी महादेब केँ तकने फिरथि मुदा ओ कतहु नहि भेटथिन्ह। बहुत खोज कएला पर गौरी केँ महादेबक विषय मे जानकारी भेटि गेलनि जे महादेब सन्ध्या सँ विवाह करए गेल छथि। गौरी केँ बड़ दुःख भेलनि ओ कानय लगलीह। कनैत-कनैत देह सँ घाम चललनि आओर मैल छुटए लगलनि-गौरी मैल छोड़ा कए जमा कएलनि आओर ओकर एकटा साँप गढि कए बाट पर राखि देलथिन-महादेब जखन सन्ध्या केँ विवाह क’ ल’ अनलनि त’ गौरी केँ कनैत देखल संगहि बाट पर मैलक साँप सेहो।महादेब ओहि साँप मे प्राण दए देलाह ओ लह-लहाए लागल। महादेब आओर सन्ध्या केँ देखि गौरी कानए आओर गारि-शाप देमए लगलीह:

    “की ए हम आहे शिब चोरनी की चटनी

    की ए हम कोखिया विहूत

    की हम आहे शिब सेवा मे चुकलहुँ

    केलहुँ दोसर विवाह

     

    तखन महादेब कहलथिन:

    नहि अहाँ आहे गौरी चोरनी चटनी

    नहि अहाँ कोखिया विहूत

    नहि अहाँ आहे गौरी सेवा मे चुकलहुँ

    हमरा कर’ परल दोसर विवाह

     

    तखन गौरी कहलनि:

    मरिहौ गे सन्ध्या तोरो जेठ भइया

    होएबे मे कोखिया विहूत

     

    तखन महादेब पुनः समझाबैत कहलनि:

    जनु गारी दिअ गौरी अपनो जेठ भइया

    जनु कहिओ कोखिया विहूत

    तोरहि सन गौरी पातरि छितरि

    तोरहि सन सुकुमारी

    बतिसो दाँत बिजुली छिटकनि

    सन्ध्या हुनकर नाम

     

    बहुत अधिक विनम्रता स सन्ध्या कहैत छथिन:

    कार्तिक गणपति गोद खेलाएब

    होएब चेरिया तोहार

     

    आब महादेब निष्कर्ष दैत बजला: “अहाँ अनेरे कानि रहल छी। अहाँकेँ ई साँप बेटी भ’ क’ जन्म लेने अछि। अही नन्हिकीरबी केँ खेलाएबा लए हम एकटा कनियाँ आनि देल अछि।

    कथा अतहिं अंत भ’ जाइत छैक। आश्चर्यक बात ई जे गौरीक एहि प्रश्न आ शंका पर कहियो कोनो स्वर नहि उठल। पुरुख कथिलेल उठेता? स्त्रीगन सब सेहो मौन छथि। परित्यक्ता एहि कथा मे गौरी आ सन्ध्या दुनू छथि – पार्टटाइम या आंशिक परित्यक्ता। पतिक 100 प्रतिशत प्रेम सँ गौरी आ सन्ध्या दुनू जेना वंचित भ’ जाइत छथि! परित्यक्ता शब्द सँ जेना दुनू विभूषित भ’ जाइत छथि।

    बात आगा बढ़बैत छी। हमरा लगैत अछि महर्षि गौतमक पत्नी अहिल्या मिथिलाक पहिल परित्यक्ता छथि। इन्द्र गौतमक अनुपस्थिति मे आबि गेला। हुनका लग चलि गेलीह। फेर ताहि लेल अतेक पैघ आ दुर्दान्तक दण्ड! अपने विवाह केलाक बादो तप, तपस्या। पत्नी लेल सभ बन्धन? कोना चलत काज? आ फेर ओहि बन्धन अथवा श्राप सँ मुक्त के करतनि हुनका? एकर निर्णय सेहो श्राप देमय बला पति रूपक पुरुष करताह। गौतम कहैत छथिन जे जखन राम त्रेता युग मे अतए अऒताह तखन शिला मे परिणत अहिल्या हुनक चरणक स्पर्श सँ फेरो मनुख-योनि मे वापस लौटती।

    दोसर परित्यक्ता सीता छथि। सीता अपन पत्नी धर्मक पालन करैत राम संगे कत’-कत’ नहि जाइत छथि। वैह राम गर्भवती सीता केँ असगरे जंगल भेज दैत छथि। मर्यादा उत्तम भ’ जैतनि अगर सीता संगे राम सेहो फेर सँ जंगल चल जैतथि? से कहाँ करैत छथि? आर त आर अश्वमेध यज्ञ काल सेहो हुनका सीता कहाँ स्मरण अबैत छथिन? सोनाक सीता बना यज्ञ-वेदी पर बैस जाइत छथि। जखन लव-कुश भेट जाइत छथिन तखन सीताक स्मरण अबैत छनि। वियोग आ दर्द सँ छटपटाइत सीता धरतीक कोखि मे विलीन हेबाक लेल निवेदन करैत छथिन – “फाटू हे धरती!” धरती अपन पुत्रीक बात सुनैत देरी फाटिजाइत छथि आ सीता ओहि मे विलीन भ’ जाइत छथि।

    मिथिलाक तेसर परित्यक्ता भामती छथि. उद्भट विद्वान आचार्य वाचस्पति अपन गहन ज्ञान, परिश्रमक क्षमता आ हठयोगक कारणे उत्तर सं दक्षिण धरि ख्याति अर्जित कएने रहथि। आचार्य प्रवर अनेक ग्रंथक रचना कएलनि ताहिमे प्रमुख अछि: (1) न्यायणिका, (2) ब्रह्मतत्व समीक्षा, (3) तत्व विन्दु, (4) न्यायवार्तिका तात्पर्य टीका, (5) न्यायसूची निबंध, (6) सांख्यतत्व कौमदी, (7) तत्ववैशारदी। एकरा अतिरिक्त तत्कालीन पाचम नवम शताब्दी मे शंकराचार्यक आग्रह पर “अठारह वर्ष स्वगृह मे साधनारत भए सांसारिक सुख त्यागि 6 भागमे मंडन मिश्रक ब्रह्मसूत्रक शंकरभाष्यक टीकाक रचना कएलनि। आ ताहि मे भामती मूक योगदान दैत रहलथिन। तैँ हेतु ताहि मूक अवदान केँ अमर करए लए टीकाक नाम भामती संज्ञा सँ जोड़ि देलनि। ई मूक अवदान बड्ड कठिन शब्द अछि। अगर वाचस्पति केँ साधने करक छलनि त’ विवाह कथिलेल केलाह? एहि लेल जे पत्नी रूप मे भामती बिना ढउआ केँ आ बिना भावनाक संचार केँ सेविका बनल रहथि? वाचास्पतिक विद्वताकेँ नमन मुदा भामतीक प्रति हुनक प्रयोग हुनका द्वारे जानि-बुझि क’ भामती केँ परित्यक्ता बनाएब थिक।

    मैथिली लोक व्यवहारक गीत मे अनेक गीत भेटत जाहि मे सौतिन शब्दक प्रयोग अछि। सौतिन लेल कुबजो, कुब्जा शब्दक प्रयोग अछि जे हमरा जानैत घृणा सूचक अछि।

    बात परित्यक्ताक क रहल छी त’ उदाहरण समाज स लेमए पड़त। समाज दिस आँखि उठाबय पड़त। समाज केँ निहारए पड़त। नारी मनोदशा आ दर्दक, टीसक अनुभूति करए पड़त।

    एक बहुत स्थापित साहित्यकार अपन इच्छा सँ बिपरीत माता-पिता केँ मन आ मान रखबाक चक्कर मे एहेन परम्परागत आ अति सामान्य लड़की सँविवाह क’ लेलाह जे कोनो रूप सँ हुनका संग साम्य नहि रखैत छलि – नहि दैहिक सौन्दर्य मे आ ने विद्या मे। विद्वान आ दैहिक सौन्दर्य आ सौष्ठव सँ परिपूर्ण साहित्यकार मन बना लेलाह जे विवाह क’ लेताह मुदा ओहि लड़की सँ कोनो तरहक कोनो सम्बन्ध नहि रखता। सैह भेल। विवाह भ’गेलनि। चतुर्थी धरि सासुर मे रहला। संपन्न सासुरक लोक पाहुनक स्वागत मे कोनो कमी नहि रखलक। उपर सँ बिधकरी अति चातुरि। नीत-नूतन बात कहनि। सृंगार, मनुहार, प्रेमक बात मे ओझराबए लगलथिन। दियासलाई आ काठी एक ठाम रहतैक त’ आगि लगबे करतैक। सैह भेलैक। जाहि पत्नी सँ कहियो कोनो सम्बन्ध नहि रखबाक उदेश्य सँ विवाह केने छलाह ओकर प्रेम मे फँसि गेलाह। मन भले नहि मिलल होनि देह मिल गेलनि।15 दिन रहला। बहुत रंगक बात भेलनि। कतेक बेर केलि केला। 15 दिनक बाद घर आबि गेला।

    घर वापस अएला पर पुनः अपन वैदुश्य आ सौन्दर्य पर दंभ भेलनि। भेलनि, आहि रे बाप, विवाह त’ गलत परिवेश, गलत परिवार आ गलत लड़की सँ भ’ गेल। अविकसित, बैकवर्ड सँ भ’ गेल! आब की हो? नहि-नहि, एहेन लड़की संग जीवन कोना कटत? असंभव। महानगरक सभ्य समाज लग कोना रहब? मर्यादा आ इज्जत नीलाम भ’ जाएत। फेर की उपाय? यैह जे त्यागि दी। परित्याग करी। परित्यक्ता बना दी। परित्यक्ता कोना बनत? अपमान सँ, शोषण सँ, दैहिक-मानशिक उत्पीड़न देला सँ। से केँ देत? हम स्वयम देब। ई निर्णय अन्तिम? एकदम अन्तिम। बिना एकर दोसर कोन उपाय?” यैह सब सोचैत भविष्यक महान साहित्यकार आ कलामा नारी उत्पीड़नक ठीका ल’ लेलाह। एक दुखद, तर्कहीन, अनर्गल आ अमानवीय घटनाक बीया बाउग़ भ’ गेल छल। ओ अपन वीभत्स रूप लेल तैयार छल।एक विद्वान एक चांडाल बनि गेल छल।

    साहित्यकार महोदय केँ सासुर सँ अएबाक हेतु बेर-बेर समाद अबनि। ई एहेन निष्ठुर जे जेबे ने करथि। सासुरक लोक हिनक प्लाट सँ अनजान। अंत मे ससुर महोदय स्वयम हिनकर दरबज्जा पर आबि गेल्थिन। आब की करताह? कोनो उपाय नहि बचलनि। लाचार भय सासुर गेला। खूब मान-दान भेलनि। नाना तरहक सचार लागल। खूब मन सँ भोजन केलाह। राति मे पत्नी एल्थिन। आबिते कामिनी मानिनी बनैत कहलथिन:

    “जाऊ! कतेक निष्ठुर लोक छी अहाँ? नहिअएलहुँ आ ने चिट्ठियो भेजलहुँ? एहेन कतौं मनुख भेलैक अछि? हम रुसल छी अहाँ स।” से कहैत कनिया मुँह बिपरीत अवस्था मे करैत झुट्ठे सुतबाक भगल केलनि।

    विद्वान साहित्यकार चुप रहला। गंभीर रहला। किछु नहि बजला। की बजितथि? मन त कोनो धराने अपन व्याहत धर्मपत्नी सँ मुक्तिक कामना आ ब्योंत मे बाझल छलनि।पत्नी दिस देखबो ने केलनि।

    तुरते पत्नी केँ बुझा गेलनि जे किछु त’ गडबड अछि। झट दनि विचार केलनि: “आखिर ई किछु प्रतिक्रिया कियैक नहि देला? हे भगबती! किछु अनिष्ट बुझना जा रहल अछि हमरा। कहीं कोनो निर्दय मनुखक संग त’ हमर हाथ विधाता नहि लगा देलनि? की करी? ककरा पर मानिनी बनी हम? जे मनुहार करत से त’ कोनो ध्याने-बात नहि द’ रहल अछि। फेर की करी? अहिना सुति रही? से कोना हएत? भले बाबा बिद्यापति कहि गेला ‘पुरुखक नहि बिस्वासे’। कोनो स्थिति मे पुरुख पर विश्वास नहि करी। फेर की करी? एहि ह्रदयहिन पुरुख केँ ह्रदय-वान पुरुख बनाबी। से कोना? एकरा अपन प्रेमक जाल मे गछानी।” यैह सब सोचैत बेचारी नव ब्याहल कनिया अपन जीवनक नैया केँ डूबए सँ बचेबाक उक्ति सोचय लगलीह। करबट अपन पति महोदय दिस बदलैत बजलनि: “की बात पाहुन! रुसल छी की? किछु गलती भ’ गेल हमरा सँ की? अगर गलती भेल त’ कहू। हम माफ़ी मांगि लैत छी”।

    अतेक बात कनिया कहलथिन मुदा पाहुन पर कोनो प्रभाव नहि परलनि। गुम-सुम-गंभीर बनल रहलाह। कनिया केँ अशुभक अशंका भेलनि। हिनकर आँखि मे कनि बिकराल, बिकट स्वरुप देखली। कनि कसाई कनि निर्दयातक भाव लगलनि। कनि ज्ञानक व्यर्थ घमण्डक अनुभूति भेलनि।लेकिन दोसर कोन उपाय? पैघ जाति आ कुलक मर्यादा सँ छेकएल छी। दोसर विवाह त’ आब सपनो मे नहि देखल जा सकैत अछि। तखन की करक चाही? किछु नहि अतबे जे येन-केन-प्रभावेन हिनका मना ली। से कोना मनाबी? प्रेम सँ आ अपन मनुहार सँ। देखैत छी, भगबती सफलता दैत छथि की नहि? अहि तरहक अंतर्द्वंद सँ जुझैत कनियाँ पाहूनकेँ अपना छाती सँ जकरबाक यत्न शुरू केलनि। आहि रे बा! ई की? पाहुन त’ एक क्षण मे बज्र उग्र भ’ गेलाह।हाथ झकझोरि देलथिन। अपन बलक प्रदर्शन करैत कर्कश ध्वनि मे बजला: “खबरदार जे आई के बाद हमरा सँ कोनो तरहक सम्बन्ध रखलहुँ। हमरा अहाँ सँ कोनो तरहक सम्बन्ध नहि रखबाक अछि। हम आई सँ अहाँक शरीर नहि छुब। अहुँ अपन मर्यादा मे रहू। अगर से मर्यादा केँ तोरबाक चेष्टा करब त’ हमरा सन खराप लोक नहि भेटत”।

    कनिया आब पूर्ण साकांक्ष भ’ गेल छलीह। भेलनि साहित्यकारक नाम पर राक्षस सँ विवाह भ’ गेल। आब की करी? कनि दृढ़ भेलीह। कहलथिन: “देखू, हम अहाँक व्याहता छी। हमर सम्बन्ध मे हमर पिता अपनेक पिता सँ सब किछु स्पष्ट क’ देने छलाह। अहेन समस्या छल त’ नहि कहि दितहुँ? हम आब कत’ जा सकैत छी? अहीं कहू? आ फेर विवाहक यात्रा मे त’ अहाँ हमरा संग सब किछु कएल जे एक स्त्री-पुरुष करैत अछि?”

    अहि बात सँ बेफ़िक्र मद मे चूर साहित्यकार अपन राग अलापैत रहला: “हमरा से सब किछु ने बुझल अछि। हमरा अहाँ सन जाहिल स्त्री संग कोनो सम्बन्ध नहि राखक अछि। अहाँक रस्ता अलग, हमर रस्ता अलग। नदीक दू स्वतन्त्र कछेड़। ककरो सँ ककरो मिलन संभव नहि अछि। ख़बरदार जे हमर देह मे सटबो केलहुँ।”

    पत्नी पाछा कोना होइतथि? लागल रहली। किछु मनुहार, किछु क्रंदन, किछु नोरक धार चुएलनि। किछु अपन माता-पिताक विवशताक भान करेलनि। कनि गिदरभभकी सेहो देलथिन। मुदा साहित्यकार महोदय त’ अडिग रहला। अपना केँ लंठ-साहित्यकार मानैत छला। एहि पत्नी सँ कोनो सम्बन्ध नहि रखता से ब्रह्मवाक्य छलनि।

    तथापि पत्नी हिम्मत करैत अर्ध वस्त्र मे एकबेर साहित्यकार महोदय केँ अपन बाहुपाश मे लेबाक प्रयाश केली। एहि बेर क्रोध सँ बताह भेल साहित्यकार अपन पत्नी केँ उपर प्रहार क’ देलाह। बेचारी लाचार भेल मारि खाइत रहली। बंद घर मे विचित्र स्वर सुनि लड़कीक माए आ भाऊज जागि गेल्थिन। घर खोलबाक आदेश देलथिन। लड़की घर खोलैत माएकेँ गर लागि कानए लागली। कनैत रहली आ बजैत रहली: “सब अनर्थ भ’ गेल। हमर कपार फुटि गेल। मनुखक बदला हैवानक संग भ’ गेल।”

    माए आ भाऊज पुछैत रह्ल्थिन: “की भेल बुच्ची?” मुदा हिनकर मुँह सँ बकारे ने निकलनि। कतेक काल धरि कनैत रहली। लोक सब बोसैत रह्लनि। उम्हर साहित्यकार महोदय काल-नाग आ यमक अवतार बनल क्रोध मे मातल घर मे क्रोधक ज्वाला मे धू-धू जरि रहल छला। हुनका सँ लोक पुछनि: “पाहुन! की भेलैक? किछु बकझक भेलनि की?” पाहुन पहिने त’ चुप रहला। फेर कर्कश स्वर मे उत्तर देलाह: “हमरा की पुछैत छी? अपन बेटी के पुछू। ओ जे कहती हमहुँ सैह कहब।” बहुत देर धरि वातावरण शांत रहल।

    जखन कनियाँ भरि इच्छे कानि अपन मनक दर्दबहा लेलथि त' कहलनि: "हिनका हमरा सँ कोनो सिनेह नहि छनि। ई माता-पिताकइज्जत हेतु विवाहक स्वांग केने छथि। हिनका हमरा सन सामान्य नहि आधुनिकाचाही जे हिनका सँग महानगर मे हाथ-मे-हाथ थामने स्वच्छन्द घुमि सकए। ई हमरासँ कोनो तरहक सम्बन्ध नहि राखय चाहैत छथि। उलटे हमरा सँ जतेक जल्दी होमुक्ति पाबै चाहैत छथि। वेदमंत्रक उच्चारण सँग जेपत्नी बनेलनि तकरा पालन करैत अपन अधिकारक भाव जगबैत हम किछुए क्षण पूर्वहिनका देह दिस जएबाक अनर्गल प्रयास कएल तकर परिणाम देखू।" ई कहैत अपन छातीकओ हिस्सा देखा देलथिन जतए आदरणीय साहित्यकार अपन घुसाक निर्दय प्रहार केनेछलाह। निलाह-स्याह ओहिना देखा रहल छलनि। एक क्षण मे साहित्यकार महोदयकअसली रूप बाहर आबि गेल छलनि। ओतय उपस्थित महिला सभक हृदय काँपि गेलनि।अनर्थ भ' चुकल छ्ल। एकर कतेक बिकट रुप भ' सकैत अछि एहि पर कियोक निश्चितनहि छली। 

    अंत मे कन्याक माए थोड़ेक गम्भीर होइत अपन जमाय लग नहुँ-नहुँ गेलिह। स्थिरे सँ कान लग फुसफुसा क' बाजय लगली:

    "पाहुन!सब किछु ठीक ने? ई छौरी कोनो गलत बात त' नहि कहि देलकन्हि? चारि भाई मेअसगरि छैक ने, ताहिं कनि छिड़िया गेल छैक। ओना मनक बड़ शुद्ध छैक। जे रहल सेमुहँ पर कहि दैत छैक।" 

    साहित्यकार निराकार भेल सबबात सुनैत रहला। अंत मे सासु पुछलथिन: "अगर कोनो त्रुटि छनि त' बाजथि? हमसब हिनकर सब माँगक पूर्ति अपन हैसियत हिसाबे करक प्रयास करबनि।"

    गहीर सांस लैत साहित्यकार ठाईं-पठाईं बजला:

    "देखू! ई विवाह नहि चलत। हिनका सँग नहि हम खुश रहि सकैत छी आ ने यैह रहि सकैत छथि। हिनकर सोच आ हमर सोच मे कोनो साम्य नहि अछि"। 

    सब बात जेना एकहिं सांस मे साहित्यकार महोदय बाजि गेलाह।

     

    सासुअपन मायक ममत्वक कारणे गुम सधने रहली। फेर बजनाई शुरू केलनि: "देखथुपाहुन! ई ब्राह्मणक बेटी छैक। एना कोना हेतनि? विवाह एक केँ कहैत अछिसात-सात जन्मक सम्बन्ध छैक। उठथु आ दुनू मिल क' रहथु।" 

    बेटीदिस तकैत माए बजली: "सोना, एना नहि चलैत छैक जीवन। दुनू गोटे हिल-मिल रहू।सब चीज़ नीक रहत। जाउ घर।"  ई कहैत माय बलपूर्वक बेटी केँ पाहुन सङ्गे घरदिस ल' गेलिह। आब सब किछु सामान्य भ' चुकल छ्ल। घर मे आगि आ घी केर समिधाएकत्रित छ्ल। केवल होम करबाक मंत्र फुकक प्रयोजन छ्ल। ई प्रयोजन कन्याक माएपूरा केलनि। अग्नि सुगंधित भ' धू-धू पजरए लागल। दू देह एक भ' गेल।साहित्यकार महोदय केँ एहि व्याहता मे आधुनिका देखाय लगलनि। दुनू मस्त भ' गेलाह। ओहि दिन एक आर बात भेल। प्रेमक अग्नि ततेक प्रबल छलनि दुनूक जे ओहीराति आ क्षण नायिका केँ गर्भ ठहरि गेलनि। विवाहक, अहि तरहेँ एक उद्देश्यपूरा भ' गेलनि।

     

    सोझे सालद्विरागमन भ' गेलनि। जहिया सँ नायिका अपन सासुर अएलिह तहिया सँ साहित्यकारफेरो अपन उग्र रूप मे आबि गेलाह। मारि-पिट शुरू भेल। कखनो डंडा सँ त कखनोबेल्ट सँ। कहियो-कहियों आनो चीज़ सँ प्रहार करैत रहला। संगति साफे बन्द।पूर्ण विराम। यातना अबाध गति सँ चलैत रहलनि। एक साहित्यकार अपन कुकृत्य सँदोसर साहित्यकार लेल सामग्रीक ओरिओन करैत रहला। नारीक शोषण होइत रहल।शोषिताक गर्भ मे शोषितक बीज पनपैत रहल। विनाशक क्रिया मे निर्माणकप्रक्रिया अपन स्वरूप पकरैत रहल।

    कोनहुना अपन सासुरमे रहैत नायिका एक पुत्रीक जन्म देलीह। पति सँग स्थिति नर्क जकाँ भ' गेलनि।बहुत यत्न केलीह मुदा असफलता हाथ लगलनि। यातना सहैत-सहैत तन -मन जबाब द' देलकनि। सासुर सँ नैहर आबि गेलीह। केश चललैक। 

    अहिबीच साहित्यकार अपना सँ 18 वर्षक छोट लड़की सँ चुपे-चाप विवाह क' लेलाह।ककरो कानो ने लागय देलाह। डर छलनि नौकरी चलि जेतनि। नाम बदनाम भ' जेतनि।

     

    बादमे विधिवत तलाक भ' गेलनि। आर जे केला से केलाह। एक नीक काज जरूर केलनि जेअपन जन्मल बेटीक विवाह अपन अरजल पाई सँ नीक जकाँ करा देलथिन।

     

    हुनकपत्नी सेहो अपन जीवन अपने जकाँ जिबक कोशिश करैत छथि त’ लोक हुनका नीक-अधलाहकहैत छनि। यैह थिक सामाजिक मर्यादा। यैह थिक महानता। साहित्यकार महान भेलछथि। नारी चेतना, साहित्य आ सृंगार केर बात करैत छथि। एक दू आधुनिक आतथाकथित विदुषि हुनकर सब कृत्य आ कुकृत्य बुझैतो हुनका हँ मे हँ मिलबैतछथि। वरिष्ठ साहित्यकार लोकनि क्षणिक लोभे हुनका सङ्गे घुमरैत रहैत छथि।हुनक यशक झंडा फहरबैत रहैत छथि।

     

    हालहिंमे एक नवोदित साहित्यकार केँ एहि तथाकथित महान साहित्यकारक पूर्व पत्नी जेआब तलाक शुदा आ परित्यक्ताक टैग सँ जानल जाइत छथि, भेटलथिन्ह। नवोदितसाहित्यकार हुनका लग गेलाह। अपन परिचय एक साहित्यकारक रूप मे देलनि।  परित्यक्ताक दर्द साहित्यकारक प्रति घृणा बनि ज्वार-भटा जकाँ फुइट पड़लनि।अपन ब्लाउज खोलि एक-एक दागक प्रदर्शन करैत बजली: "कहीं एहेन साहित्यकार त' नहि छी अहुँ जे अपन पत्नी सँग जलाल जकाँ व्यवहार करैत छी।" जखन ज्वालाफ़ुटले रहनि त’ अनेक तरहक नीक अधलाह बात सेहो कहि देलथिन, जे कोनो नाजायज नहिरहैक।

     

    बात एतहुँ कहाँसमाप्त होइत अछि। साहित्यकार अपन दोसर पत्नी केँ सेहो यातना मे रखने रहैतछथि। मारैत-पीटैत छथि। आधुनिका सब सङ्गे घुमरैत छथि। खूब साहित्य लिखैतछथि, खूब भाषण करैत छथि। समाजक एक तबका एहि महापतितकेँ आइकॉन बना रखने अछि। हुनक प्रथम पत्नी केँ परित्यक्ता आ कुलक्षणा कहैतअछि। एकरा की कही? ई बात पाठक पर छोड़ि दैत छी।

     

    परित्यक्ताकलिखल आ ऐतिहासिक स्वरूपक की बात करी, अपन आँखि सँ अनेक स्वरूप देखने छी।कतौ परित्यक्ता सम्बन्धी रहलि छथि त' कतौ परित्यक्ता बनबै बला। कतौपरित्यक्ता त' कतौ दुर्दैवक मारलि परित्यक्ता।

     

    एकउदाहरण विचित्र अछि जे समाजक मानशिकता केँ आईना देखबैत अछि। से की? ई कथाप्रारम्भ होइत अछि एक अति सामान्य परिवारक युवक सँ जे अपन माता-पिताक एसगरसंतान छला। B. Com करैत देरी दक्षिण मे कतौ चाय बागान मे डेप्युटी मैनेजर'कनौकरी लागि गेलनि। 

    हुनका गामक बगले केँ गामक एककन्यागत जिनका 4 लड़की मात्र छलनि, नीक पैसा दहेज दए अपन जेठ बेटी सँ विवाहकरा देलथिन। कन्यागत किछु नहि अपितु बहुत रास फुइस बाजल छला। लड़की पढ़लिनहिये जकाँ रहैक। साकांक्ष सेहो नहि, बल्कि कनि अकान जकाँ। देखबा सुनबा मेमुदा अपूर्व। रंग-विरंगक गहना, वस्त्र, प्रसाधन सँ सजलि। बर कानियाँ केँदेखैत दंग। चतुर्थी कोना बितलै से बुझबे नहि केलाह। चतुर्थी प्रात अपनेसङ्गे कोयंबटूर हनीमून लेल बिदा भेला। जखन ओतए गेलाह त' ज्ञात भेलनि जेलड़की साफे साकांक्ष नहि छैक। नित्यकर्म तक करबाक नीक सँ चेष्टा नहि छैक। आब कीहो? तेसरे दिन वापस आबि गेलाह। सासुर आबि सासु आ ससुर केँ सब खेरहाकहलथिन्ह। ससुर उत्तर देलथिन्ह: "अपने उदास नहि होउ पाहुन, अहाँक सासु सबबात बुझा देतीह।" ई कहैत ससुर दरबज्जा दिस चलि गेलाह।

    सासुलग अबैत नहुँ-नहुँ कहलथिन्ह: "पाहुन! ई मन छोट नहि करथु। हम सब हिनकरविवाह अपन दोसर बेटी सँ करा देबनि। दोसर एकरा सँ 2 बरखक छोट अछि।सर्वगुणसम्पन्न छनि हिनकर सारि।

     

     श्रीमानमैनेजर साहेबक चानी। दिने सँ सारि पाहुन लग आबि गेलिह। सब किछु नार्मल।बहिनोई सँग सब किछु करए लगलि जे एक पति-पत्नीक बीच बन्द घर मे अन्हार मेहोइत छैक। अहि क्रम मे 7 मास बीत गेल। 7 मास मे सोझे साल द्विरागमन भेलनि।द्विरागमन मे सारि कोना अबितथिन? उपाय नहि छलनि। ताहिं पत्नी एलथिन। गामअबिते देरी नव पुतोहुक असलियत सबकेँ लागि गेलैक। आब की हौक

    परिवारेमे किनको सरबेटी गरीब मुदा अतीव सुन्नरि। तुरत लड़कीक पिता विवाहक निवेदनभेज देलथिन। श्रीमान मैनेजर साहेब बिसरि गेलाह जे ओ सात मास धरि अपन सारिसँग गुलछर्रा उड़ेने छला। सब वचन बिसरि गेला। सब मर्यादा धो-पोछिक चाटिगेलाह। अपन दुखड़ा गबैत रहला। माए-पितियाइन सब अतबे कहथिन्ह: "धन कही एकराजे सात मास धरि एहि अकान आ बकलेल कानियाँ सँग कोना बितेलक! एकरा आब शीघ्रअहि जंजाल सँ मुक्ति भेटक चाही।"

    अपना प्रति एहि तरहकसहानुभूति पाबि श्रीमान मैनेजर साहेब मने-मन गदगद छलाह। विवाह तय भ' गेलनि। प्रथम पत्नीक सब सामान, वस्त्र, गहना, द्रव्य-जात राखि राते-रातीमारि पीट क' सासु भगा देलथिन्ह। कानियाँ थोड़ेक निवेदन अवश्य केल्थिन जेहुनको रह' देल जानि। मुदा केँ सुनैत अछि?

     

    आबश्रीमान मैनेजर साहेबक दोसर पत्नी हुनका ई आदेश, निर्देश द' देलथिन्ह : "जाहि दिन अहाँ पहिल पत्नी केँ अपन घर घुसा लेब ताहिये दिन हम माहुर खाआत्महत्या क' लेब।"

    मैनेजर साहेब एकाएक एक परमपत्नीभक्त पति बनैत बजला: "राम-राम! अहाँ की बजैत छी? विवाह सँ आई धरि हमएकर शरीर नहि छूल। आब घर घुसेबाक कोन प्रयोजन?"

     

    मैनेजरसाहेब केँ वंश वृक्ष दोसर पत्नीक संतान सँ होमय लगलनि। बेटी-बेटा-बेटी। सबहरेक छह मास पर गाम आबथि। गाम अबितहिं नहि जानि कोना प्रथम पत्नी जकराअड़ोस-पड़ौसी सब बियहुती कहैक बुझि जाइक। राति क' आबि जाइक। मुदा, भोजन त दूरमैनेजर साहेब केर माय पितियाइन सब समान छीन मारि-पिट क' भगा दैत छलथिन्ह।बेचारी रस्ताक भिखमंगी बनल अछि। मुदा कियोक मैनेजर साहेब केँ इहो नहि कहिसकलनि जे ओकरा अपना घर पर कम सँ कम अन्न-वस्त्र दियौक। आसरा दियौक। ऊपर सँ बाप-संबंधी सब सेहो ओहि अभगली परित्यक्ता केँ मारैत पीटैत छैक। जीवन नर्क बनल छैक।

     

    एहिप्रकरणक जड़ि मे अगर चली त' एहि परित्यक्ता केँ परित्यक्ता बनेबै मे प्रथमदोख ओकर पिता केँ छनि।  जखन हुनका बुझल छलनि जे हमर बेटी एहेन अछि त’ विवाहकथिलेल करा देलथिन्ह? ओहि पैसा सँ ओकरा लेल कोनो रिहैबिलिटेशन सेन्टर अथवाकिछु आरो क' सकैत छला। से नहि केलनि। जखन जमाय बेटी केँ छोड़ि देलथिन्ह त' ओकरा जीवन लेल कोनो इंतज़ाम करक छलनि। 

    दोसर दोखमैनेजर साहेब केँ? अगर सारि सँ विवाह नहि करबाक छलनि त' संबंध कोन कारणेसात मास धरि रखला? पुनःश्च, अगर दोसर विवाह केलाह त' प्रथम पत्नीक सब किछुवापस कथिलेल नहि क' देलथिन्ह

    एहि प्रकरण मे दुनू पक्षक समाज सेहो ओहिना पातकी अछि।

    अनुभवक कथा अनंत अछि। ककरा कही ककरा छोड़ी? कहब तखने बात फरिछायेत। बिना कहने कोना बुझबैक?

    एक दृष्टान्त हाले केँ अछि। से की? एक व्यक्ति विवाह केलाह। विवाहक एक वर्षक बाद कतौं नौकरी लेल गेलाह। जे गेलाह से 3 वर्ष धरि एबे नहि केलाह। सब उपाय भेल। जगह-जगह लोक पहुचल। थाना-पुलिस मे रपट लिखा देल गेल। मुदा किछु ने भेल।अंत मे ओहि युवक केँ माता-पिता हुनक पत्नीक विवाह ओहि युवक सँ छोट भाई सँ करा देलथिन। परिवार चलए लगलैक। स्त्री मानि लेलक जे हमर प्रथम पति आब एहि संसार मे नहि छथि, त देओर संग विवाह कर’ मे कोनो हर्ज नहि। पहिल पति सँ एक लड़की रहैक। दोसर पति सँ एक बालक। सब किछु पटरी पर निक सँ चलय लगलैक। करीब 9 वर्षक बाद एकाएक ओहि महिलाक जीवन मे भूचाल आबि गेलैक। पहिल पति कहि नहि कोना कतए सँ वापस घर आबि गेलैक। अपन पत्नी लग गेल। बाद मे पता चललैक जे ओकर अनुपस्थिति मे ओकर छोट भाई सँ विवाह भ’ गेल छैक पहिल पत्नी केँ। बेचारी महिला दू नाव मे कोना पैर रखत? बड़का समस्या। पहिल पति ओकरा पर अपन अधिकार जतबैक। दोसर पति कहैक जे हम त’ सब चीज़ अवधारि क’ विवाह केने रही।दुनू भाई मे द्वन्द चलैत रहलैक। अन्तिम निर्णय ई भेलैक जे महिलाक प्रथम पति दोसर कोनो लड़की सँ विवाह करथु। जखन से भ’ गेलैक त’ मामला सुलझि गेलैक।

    मिथिला मे एहनो विधान रहल अछि जे जाति-मूलक नाम पर एक आदमी 20-25 टा विवाह क’ लैत छलाह। एक दू छोडि अधिकांश पत्नी परित्यक्ताक जीवन जीबैत छली।परित्यक्ताक अर्थ केवल अन्न-वस्त्र-स्थानक तकलीफ अथवा सामाजिक मर्यादे नहि अपितु शारीरिक, मानशिक सुख स वंचित हएब सेहो भेल। जखन लाचार भेल अहि तरहक स्त्रिग्न किछु दोसर पुरुष दिस देखैत छथि त’ समाज हुनका कुलटा, निर्लज्ज, अपवित्र, भ्रष्ट, दुश्चरित्र आ ने जानि की-की कहैत आबि रहल अछि? किनको डाईन त’ किनको डाहि कहि टार्चर कैल जाइत छनि। समाज बौक बनल रहैत अछि।धनक इच्छाक पूर्ति भ’ सकैत अछि, तनक इच्छाक पूर्ति कोना हएत?

     

    खादी आ मिथिला/मधुबनी पेन्टिंग केर शुरुआत भेला सँ बहुत परित्यक्ता अपन आर्थिक मर्यादाक रक्षा करबा मे सफलं रहलि छथि। पेंटिंग मे पद्मश्री गंगा देवी, गोदावरी दत्ताक कथा सबके बूझल अछि। खादीक आगमन सँ कतेको परित्यक्ता अपन अन्न, वस्त्रक उपार्जन करबा मे सफल भेली। अपन सोच, अरमान, सपना, सृंगार सब किछु खादीक ताग मे देखनाई शुरू केलनि। कलात्मकता अपन पराकाष्टा पर पहुँच गेल। मिथिलाक सूती खादी देखैत-देखैत समस्त भारत मे अपन महिनी, कलाकारी आदि गुणक कारणे प्रसिद्द भ’ गेल।

     

    हम मानवशास्त्र, कला-इतिहास आ मानवाधिकारक छात्र रहल छी।आदिवासी आ ग्रामीण समाज मे काज करैत आबि रहल छी। आदिवासी समाज मेकोनो कारणे अगर पति-पत्नी मे नहि पट्लैक त’ पति-पत्नी दुनू केँ ई स्वतंत्रता छैक जे अपन जीवनसाथी केँ छोडि दोसर ताकि लए। एहि सँ परित्यक्ता प्रथाएहि तरहे ओहि समाज मे प्रभावी नहि छैक जाहि तरहे अपना समाज मे।

     

    एक बात आरो हमरा अचरज मे डालैत अछि। लोक जाहि मे स्त्रिग्न सेहो सम्मिलित छथि, सभ कियोक अहि तरहक विधानक परिचालन लेल पुरुख सँ अधिक दोष स्त्री केँ दैत छथि। जखन की सत्य ई अछि जे पितृसत्तात्मक समाज अपन जाल ऐना ने बिछेने अछि जाहि मे सामान्य केँ केँ पुछैत अछि आधुनिका आ पढलि महिला सेहो फंसि जाइत छथि। अंत मे अतबे कहब जे परित्यक्ता स्त्री समाजक समस्या नहि अछि। ई मानवक समस्या अछि। एहि पर गंभीर बनक जरूरत अछि। सबकेँ एक संग आबि संगोर करैत अहि समस्याक निदान निकलबाक अछि। अहि अभिशाप केँ समाप्त करक अछि। से भेल तखने हम सब गर्व सँ कहि सकैत छी जे हम सब प्रगतिक पथ पर बढ़ि रहल छी।

     

    नन्द विलास राय

    लघुकथा

    कठही साइकिल

    कतेक दिन ऐ पुरनका कठही साइकिलपर चढ़बह। कहह दुनियाँ केतए-सँ-केतए चलि गेल आ तूँ बीस-बाइस बर्खक ऐ पुरनका साइकिलपर चढ़ै छह!”  -गेनालाल जियालालकेँ कहलकैन।

    जियालाल हँसैत बजला-

    हौ भाय, तोहर बेटा सभ जे कमाइ छह ने, तँए तोरा हरियरी सुझै छह।

    तैपर गेनालाल बजला-

    आ तोरा जे कोचिंग सेन्‍टर आ चटिया सभकेँ टीशन पढ़ेलासँ आठ-दस हजारक महिनवारी आमदनी होइ छह से की करै छहक। कमतीमे एकटा सकेण्‍डो हेण्‍ड फटफटिया कीनि कऽ चढ़ह। हौ मरबह तँ किछ लऽ कऽ दुनियासँ नै जेबह। जेतबे सुख-मौज ऐ धरतीपर करबह ओतबे संग जेतह।

    जियालाल बजला-

    हौ भाय, अखन हमरा बड़ समस्‍या अछि तँए अखन हमरा अही साइकिलपर चढ़ह दएह।

    चाहक दोकानदारो दुनू संगीक गप सुनैत रहए ओ बाजल-

    मर्र! ऐ लोहाक साइकिलकेँ कठही साइकिल किए कहै छिऐ?”

    तैपर गेनालाल बजला-

    ऐ साइकिलमे पाइडिल देखै छिऐ, काठक छी आ ऐ साइकिलपर जखन चढ़बै तँ जहिना कठही बैलगाड़ीक धुरामे सोन-तेल नै रहलापर चलैकाल कों-काँए, पों-पाँएक अबाज निकलै छै तेनाहिये ऐ साइकिलसँ अबाज निकलै छइ।

    चाहक दोकनदार पुछलकैन-

    से अहाँ केना बुझलिऐ?”

    गेनालाल जवाब देलखिन-

    एक दिन हम निर्मली बसेसँ गेल रही। एक बोरा नोन कीनि अही साइकिलपर राखि बस स्‍टैण्‍डपर गेल रही। बस स्‍टैण्‍डपर नोन रखि जखन साइकिल पहुँचाबए जियालालक कोचिंग सेन्‍टरपर गेलौं तँ बुझाएल जे ई लोहाक नहि, काठक साइकिल छी। तहियेसँ हम एकरा कठही साइकिल कहै छिऐ।

    जियालाल बजला-

    हौ भाय कनेको पलखैत नै भेटए जे साइकिलकेँ भंगठियो करा लेब। दू दिन भंगठी करैले मिस्‍त्री ओतए साइकिल छोड़ि देलिऐ मुदा साँझमे जखन साइकिल लाबए गेलौ तँ साइकिल ओहिनाक-ओहिना राखल।

    तैपर गेनालाल हँसैत कहलकैन-

    धुर्र बुड़ि, तोरा कपारमे सुख लिखले ने छौ। कमा-कमा पाइ बैंकमे जमा कर मुदा भोग तँ तोरा बेटाकेँ लिखल छौ।

    जियालाल हँसैत जवाब देलखिन-

    ठीके कहलीही भाय, हमरा भागमे सुख नै लिखल अछि।

    ई गप-सप्‍प गेनालाल आ जियालालक बीच भूतहा चौकपर चाहक दोकानमे होइत रहइ।

    गेनालाल आ जियालाल हाइ स्‍कूलसँ लऽ कऽ कौलेज धरिक संगी। गेनालालक घर झिटकी गाममे जखैन कि जियालालक घर नवटोली गाममे। दुनू गोरेक छठा किलाससँ एगारहम किलास धरि बनगामा हाइ स्‍कूलमे संगे पढ़लैथ। संगे मैट्रिक पास केलैन। मैट्रिक पास केला पछाइत दुनू गोरे निर्मली कौलेजमे इन्‍टरमे नाओं लिखौलैन। निर्मली कौलेजमे बी.ए. धरि दुनू गोरे संगे पढ़ला। गेनालाल पास कोर्सक विद्यार्थी छला जखैन कि जियालाल अंग्रेजी आनर्सक छात्र।

    बी.ए. पास केला पछाइत गेनालाल नौकरीक लेल परियास करए लगला।मुदा तीन बर्ख धरि परियास केला बादो जखन नौकरी नहि भेलैन तँ खेती-गृहस्तीमे भीर गेला। ओ अपना बापक एकलौता बेटा। पाँच बिघा जोतसीम जमीनक मालिक। ऊपरसँ गाछ-कलम-बाँस-पोखैर सभ किछु। नौकरी नहियोँ भेलापर गुजर-बसरमे कोनो दिक्कत नहि होइन। गेनालालकेँ दूटा बेटेटा। जे मैट्रिक केला पछाइत दिल्लीमे काज करै छैन आ दरमाहा भेटलापर अपन खर्चा राखि बापक बैंक-खातामे पठा दइ छैन। बेटा सबहक कमाइ आ खेतक उपजासँ गेनालाल आनदपूर्वक जिनगी बितबै छैथ। सुखक जिनगी बितबैक कारण ई जे परिवार छोट छैन। दुनू बेटा अखन अविवाहिते छैन जे दिल्ली खटै छैन। घरपर मात्र अपने आ पत्‍नी। खेतो सभ मनकूतपर लगौने छैथ। हँ, दूध खाइ वास्‍ते एकटा दोगला गाए जरूर पोसने छैथ।

    गेनालाल अपना बेटा सभकेँ मैट्रिकसँ आगाँ ऐ दुआरे ने पढ़ौलखिन जे पढ़ल-लिखल आदमीकेँ नौकरी नै भेटलापर समाजमे जे दुरगैत होइए से देखैत छथिन। जखन कि कम्‍मो पढ़ल-लिखल लोक दिल्ली, मुम्बइ, कलकत्तामे प्राइवेटो नौकरी कऽ शानसँ अपन जिनगी बितबैत अछि। मुदा जियालालक सोच ऐसँ बिलकुल भिन्न छैन। हुनकर कहब ई जे जइ पढ़ल-लिखल बेकतीमे टाइलेन्‍ट रहत ओ विद्यार्थीके ट्यूशनो पढ़ा अपन जिनगी शानसँ चलौत। पटनामे एकसँ एक कोचिंग संस्‍था अछि जेकर आमदनी लाखोमे अछि।

    जियालाल सीमान्त किसानक बेटा। हुनका बाबूजीकेँ मात्रअढ़ाइ बीघा खेत। जियालाल दू भाँइ। जेठ जियालाल अपने आ छोट पन्नालाल। पन्नालाल जखन मैट्रिकमे पढ़ैत रहैथ तखने हुनकर पिताजी परलोक चल गेला। मुदा पन्नालालकेँ पिताजीक स्वर्गवासक बादो हुनका पढ़ाइ-लिखाइमे कोनो दिक्कत नै भेलैन। जेठ भाय जियालाल ट्यूशन पढ़ा छोट भाएकेँ माने पन्नालालकेँ एम.ए. धरि पढ़ौलकैन। एम.ए. पास केलाक तीनियेँ मासक पेसतर पन्नालालक बहाली शिक्षा मित्रक पदपर भऽ गेलैन।शिक्षा मित्रमे बहाल भेलाक दू मासक भीतर पन्नालालक बिआह एकटा डीलरक बेटीसँ भेलैन।

    जियालाल अंगेजी आनर्सक संग बी.ए. केला पछाइत नौकरीक लेल काफी परियास केलखिन मुदा सफलता नइ भेटलैन। जइ समैमे सरकार शिक्षा मित्रक बहाली केलक ओइ समैमे जियालालक उमेर चालीस पार कऽ गेल रहैन। तँए शिक्षा मित्रमे बहाली होइसँ वंचित रहि गेला।

    जखन सरकार शिक्षा-मित्रकेँ मानदेय पनरह साएसँ बढ़ा कऽ चारि हजार कऽ देलकैन आ एगारह मासक नौकरीकेँ साठि बर्खक उमर धरि स्थायी कऽ देलकैन तँ पन्नालालक पत्नी अपना दुल्हाकेँ सिखा-पढ़ा परिवारमे भीन-भिनौज करा देलकैन।

    जखैन जियालाल आ पन्नालालमे भीन-भिनौजीभऽ गेलैन तँ जियालालकेँ एक बिघा जोतसीम खेत आर घराड़ी आ कलम-गाछी मिला कऽ पाँच कट्ठा हिसा भेल रहैन। हुनकर पाँच गोरेक परिवार। जेठ दूटा बेटी तैपर सँ एकटा बेटा आ दू परानी अपने। एक बिघा जेातसीम खेतसँ जखन परिवारक गुजर-बसरमे कठिनाइ होमए लगलैन तँ जियालाल ट्यूशन पढ़ाबैपर बेसी जोर देलखिन। ओना तँ दस बर्ख पहिनहिसँ निर्मलीमे एकटा कोचिंग संस्‍थामे अंग्रेजी पढ़बैत रहैथ। कोंचिग आ ट्यूशनक कमाइसँ जियालाल अपन दुनू बेटीकेँ पढ़ा-लिखा कऽ बिआह कऽ देलखिन। दुनू बेटियो आ जमाइयो टी.इ.टी. पास कऽ शिक्षकमे बहाल छैन। एकटा बेटाकेँ नीक पढ़ाइ खातिर पटना बी.एन.कौलेजमे नाओं लिखौने छेलखिन। बेटो विवेक पढ़ैमे चन्‍सगर। ओ पटना विश्वविद्यालयसँ मैथिलीमे एम.ए. कऽ प्रतियोगिता परीक्षाक तैयारीमे लागल छथिन।

    आइ फेर गेनालालक भेँट भूतहा चौकपर चाहक दोकानपर जियालालसँ भऽ गेल। गेनालाल चाहक दोकानपर पहिनेसँ बैसल रहैथ। जखन जियालाल निर्मलीसँ टीशन पढ़ा भूतहा चौकपर एला तँ चाह पीबैले चाहक दोकानक आगूमे साइकिल ठाढ़ करिते रहैथ कि गेनालालक नजैर जियालालपर पड़लैन, ओ बजला-

    कह भाय, समाचार। आबो धरि वएह पुरनका साइकिलपर चढ़ै छेँ। रौ पूरा दुनियाँ सुधैर जेतै मुदा तूँ नहि सुधरबेँ। हे मरिहेँ ने तँ सभ किछ लाधि कऽ नेने जइहेँ। पचपन-छप्‍पनक उमेरमे ऐ कठही साइकिलपर चढ़ै छेँ। रौ तोरा बुझाएब आ दिल्ली पएरे जाएब बरबैर अछि। आ-आ चाह पीब ले।

    जियालाल हँसैत कहलकैन-

    तोहर जे बेटा कमा-कमा पाइ पठा दइ छौ ने तँए तोँ मोछमे घी लगबै छेँ।

    तैपर गेनालाल बजला-

    आब तँ तोरो बेटाक तँ पढ़ाइ खतम भऽ गेल छौ। तोँ तँ तेसरे साल कहने रहँ जे विवेक पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए.मे फस्‍ट क्‍लाससँ उतीर्ण भेल हेन।

    ई गप-सप्‍प होइते रहए कि एकटा स्‍कारपियो गाड़ी आबि चाह दोकानक बगलमे रूकल। ड्राइवर गाड़ीसँ निकैल बीचला गेट खोललक। एकटा युवक गाड़ीसँ निच्चाँ उतरल। ओ पैन्‍ट-कार्ट-टाइ लगौने रहए। जखने ओइ युवकक नजैर जियालालपर गेलैन ओ दुनू हाथे पएर छुबि हुनका गोर लगलकैन।

    बौआ विवेक! अच्छा काकाकेँ गेार लगहुन। –गेनालाल दिस इशारा करैत जियालाल बजला।

    विवेक गेनालालोकेँ पएर छुबि गोर लगलकैन आ बजला-

    बाबूजी, हमर चौथे दिन ट्रेनिंग खतम भऽ गेल। परसू बीरपुर डी.एस.पी. पदपर योगदान केलौं हेन। काल्‍हि पटनामे मीटिंग छल। अखन पटनेसँ बीरपुर जा रहल छी। ऐ ठाम एलौं तँ मनमे भेल भऽ सकैए बाबूजी निर्मलीसँ घूमल हेता।

    गेनालालक बोलती बन्द। ओ कखनो जियालालकेँ देखैथ तँ कखनो विवेककेँ आ कखनो ओइ स्‍कारपियो गाड़ीकेँ।

    जियालाल विवेकसँ पुछलखिन-

    माएसँ असिरबाद लेबए कहिया अबै छहक।

    तैपर विवेक कहलकैन-

    मनमे तँ रहए जे पटनासँ घुमतीमे अहाँ सभसँ आर्शीवाद लऽ लेब मुदा दरभंगेमे रही तँ बीरपुरक एस.डी.ओ. साहैब फोन केलैन। ओ कहलैन जेतेक जल्दी बीरपुर पहुँच सकी पहुँचू। तँए बीरपुर जल्दी पहुँचब जरूरी भऽ गेल। रबि दिन गाम आबि रहल छी।

    ई कहि ओ जियालाल आ गेनालालकेँ गोर लागि गाड़ीमे बसि कऽ चलि गेला।

    गेनालाल बजला-

    भाय जियालाल, तोहर कठही साइकिलक मान रहि गेलौं। तोहर बेटा पढ़ि-लिख कऽ डी.एस.पी. भऽ गेलौ। वाह भाइ वाह!”

    तैपर जियालाल बजला-

    भाय हमर बेटा कि तोहर बेटा नइ छियौ।

    ई सुनि गेनालाल, जियालालकेँ भरि पाँज कऽ पकैड़ छातीसँ लगा लेलखिन।

    शब्‍दसंख्या : 1130

     

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