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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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भावना मिश्रा

गरीब लोक

 

डेकची 1 घंटा सं चुल्ही पर चढल अछि,मुदा एखन धरि भात नहि  बनल अछि। 

बौआ बजलाह -- " माँ ,माँ  खाएक दे ना, 1 बजैत अछि बड़ भूख लागल अछि।कतेक देर से भात बनि रहल अछि,आबि बनि गेल हेतो।"

रीतिया बजलीह -- "कनि देर थम ...

कनि आर समय लागतै भात बनै मे।"  

एतबा मे बौआ भूख सँ हाक मारि के कानय लागल,माँ के आँखि सं नोर झड़य लागल। 

सोचय लगलीह --  ई बेरि  कोराना के कारण सब किछ बंद छल आ समय पर खेत बाउग नहि भेल।  बाढ़ि के कारण जेँ भी फसल भेल,सब तहस- नहस भए गेल।कोरोना के द्वारा रीतिया  के बाप के घर बैठे पड़ल आ मजदूरी भी नहि मिलल ।

कुनू विधि से 10% ब्याज पर  उधार लौ के खेत बाउग करलक रीतिया के बाप,आब करजा कैना चुकाएत?

दोकान बला से हो बेहाल बन्न क' देलक.एतबा मे बौआ तामस सं चुल्ही पर चढल डेकची के लात लगा देलक....

 

डेकची निचा खसि पड़ल.. आ ई कि ? भात तेँ अछि नहि ई मे तेँ छुछे पानि अछि ....

पेटकुनियां द' देलक! 

                   भावना मिश्रा

                    नई- दिल्ली।

 

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