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१.
उषाकिरण
खान-
अनुभूतिः एकटा पाठकीय
प्रतिक्रिया२.
अशोक
-बनैत कम बिगड़ैत बेसी-
सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह
३.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
यू.पी.एस.सी. लेल-चित्राक सनेस
उषाकिरण
खान
अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया
जखन पन्ना जी लिखल कथा संग्रह ‘अनुभूति’ हमरा हाथमे आएल तखन अतिशय प्रसन्नता भेल। किएक तँ पन्ना जीक संगे हम कएक बेर अस्सीक दशक मे संगहि कथा पाथ कएने छलहुँ। हुनका कथाक मानसिक धरातल आ लेखकीय सावधानी बूझल छल। कथाकारक अनुभूतिक परिचय छल स्थिरचित्तक बुझनुक लेखिका सहजहि श्रोता एवं पाठक सँ सोझा सोझी गप्प करैत छथि। अनुभूतिक वेष्टन मोनक आगाँ पाछाँ रहैत छन्हि, तैं कथाक विकास एकटा सुष्पष्ट विचार यात्रा जकाँ छन्हि। पन्ना जी अनेक परिवेशक कथा लिखैत छथि। ठोस धरातल पर चलय बाली आइ काल्हिक स्त्रीक कथा ओ संवेदना संग नहि पएरक धमक संगे लिखने छथि। जेना ‘सेवानिवृत्ति’। सेवानिवृत्तिक पश्चात् संतान आ स्वजन परिजन मुँह बओने रहैत छथि, जीवन चरित कमाई आ बचत के कोना आलसात कए लेल जाए तकर ब्योंत मे लागल रहैत छथि मुदा वृद्ध माता पिताक चिंता नहिये टा करैत छथि। पन्ना झा जीक कथाकार स्वानुभूति केँ सोझाँ धए टा देलन्हि अछि ओकरा विवछओलन्हि अछि नहि। इएह हिनक विशेषता छन्हि। अपन दृढ़ पद चाप छोड़ब। सेवानिवृत्ति कथाक चर्च हम बारंबार करए चाहैत छी, ओ कथा बूँद मे समुद्र तँ थिके, एकटा पइघ संदेश दैत अछि। मनहि ओ स्वयं दुलारपुर सन नगरक कात बला गामक बेटी छथि तरौनी सन बुद्धिजीवी गामक पुतहु परंच मिथिलाक असूर्यम्पश्या ग्राम ललनाक ज्ञान छलन्हि, कलकत्ता जाए आ ओतए शिक्षा प्राप्त कए, ओतुक्का सामाजिक जीवन के अनुभव लए जे किछु अपना क्षेत्रक विकासक कामना कएलन्हि तकर सत्व ओ ‘सेवानिवृत्ति’ कथामे देने छथिन्ह, एकटा गाम जे आदर्श अछि, विद्यालय, अस्पताल इत्यादि छैक महाविद्यालय नहि छैक। महिला महाविद्यालय फोलब ‘हाइ-रिस्क’ काज छैक, छात्रा जुटतैक कि नहि? मुदा कल्पना शील लेखिका आधुनिक शिक्षाक आवश्यकता बलें महाविद्यालय फोललनि आ सफल भेलीह। कथामे स्वयं कथानायिका श्राद्धा केर विकास क्रमशः भेल छन्हि ओहिना जेना हुनक महिला शिक्षाक प्रयोजनक।
आइ काल्हि शिक्षा सभक जन्मसिद्ध अधिकार छैक तकर कानूनी व्याख्या खूब प्रचारित भऽ रहल छैक। गुल्ली-डंटा खेलए बला बालकसँ लए गइचरवाही मे खैनी ठोकए बला नेन्ना सभ केँ धऽ कऽ स्कूल आनल जाइत छैक। भनहि ओ लोकनि मिड डे लंच लऽ कऽ पड़ा जाइत छथि। लेखिका कमौशा कथामे एकटा निरसय परसनक बालक निरसू केँ अपना संगे आनि गृहकार्यमे लगौलनि आ ओकरा शिक्षा देमए लागलीह। मुदा जखन ओ स्वस्थ सबल बला भऽ गेल। हिनकर सभटा शिक्षा बिसरि पुनः परिवारक अंतहीन जालमे ओझरा। कथामे कचोटक मात्रा स्वल्प छैक आ कमजोर वर्गक दारूण स्थितिक मात्रा अधिक छैक प्रायः सभकेँ बूझल छैक जे व्यक्तिगत आ सामाजिक प्रयाससँ गामे टा नहि घर सेहो खुशहाल आ चिंताहीन हेतैक मुदा से नहि होइत छैक। दूरदृष्टिक अभाव मे ग्रामीण अपन हर्ज करैत अछि, ओकरा अनकर दृष्टि केर लाभ लेबाक क्षमता नहि छैक। क्रमशः आधुनिक होइत समाजक एकटा सटीक कथा अछि-‘पुनरावृत्ति’ चारूकात लौह कवार लागल हो कतहुँ सँ हवाक सिहकी नहि प्रवेश करैक, सूर्यदेवक किरण नहि प्रवेश करैक तैं कि भोअ-साँझक अस्तित्व मेटा जाएत? नहि ने? न मिथिला मे प्रकाश आएल। पति सँ अकारणे प्रताड़ित स्त्री पिताक आशीर्वाद सँ स्वाबलम्बी भऽ जाइत छथि। पुत्रीक शिक्षाक प्रति सजग तँ छथि मुदा हुनकर भाग्य अपने सन होएतैन्ह से नहि बिचारने छलीह। मुदा अधिक आगाँ ससरल समय मे बेटी सुधा मान्यता केँचुल उतारि फेकलक आ स्पष्ट विचार संगे आगाँ पएर बढ़ओलक, मनहि ओ परिस्थिति जन्य पुनरावृत्तिक शिकार भेलीह मुदा सिनुर चुड़ी आ मिथ्या संस्कार केँ निषेध कएलन्हि। ओ उहापोहक अन्हारसँ उबरि एकटा सेविका सँ उद्गार व्यक्त करैत छथि जे माथ हल्लुक करक लेल- ‘एक कप चाय बना दे’
पन्ना जीक लेखिका मनोविज्ञानविद् छथिन्ह से- ‘असमान्य केँ सनक सामान्य केस हिस्ट्री बला कथा पढ़ि परिलक्षित होइत अछि। अही वजनकेँ कथा छैक सरोकार। पति-पत्नी संगे रहथि, दुनू एके शिक्षा प्राप्त करैथ आ एके जीविका मे संलग्न रहथि तथापि स्त्रीपर परिवार, समाज आ आजीविका तेहराएल बोझ रहैत छैक आ पति निश्चिंत; ई अजुका त्रासदी छैक जकरा सँ प्रत्येक शिक्षिताजूझैत अछि तँ मूल्यांकनक’ नायिका किएक ने जूझती?
’नीति प्रकरण’ कथामे ‘बिचमाइनक’ भूमिका महत्वपूर्ण छैक? जकर अप्पन घर बिगड़ल रहैत छैक ओ अनकर सुखी घर उजाड़य पर तुलल रहैत अछि। समय रहितहि यदि पति-पत्नी ई बूझि लेथि तखन कएक टा परिवार विघटित होअऽ सँ बाँचि जाएत। सघन संवेदनाक कथा छैक- ‘बऽर घुरिए गेल’। कतेको गीत कवित्त लिखलनि कवि विद्यापति, पं. हरिमोहन झा, यात्रीजी तथापि एकटा आडम्बर पूर्ण समाज नायक अविश्वस्तरीय, तरल प्रकारक वस्तुक अस्तित्व आइयो अछि। मिथ्या अहंकार, घोर लिप्साक प्रतीक मिथिलाक सर्वाध्जिक सोचबा पर विवश करैत छैक।
पन्ना जीक प्रत्येक कथा किछुने कि अनुभव करबापर विवश करैत छैक आ तैं कथा-संग्रहक नामकरण अनुभूति बहुत नीक। एकटा नयनाभिराम आ बीछल पौथी मैथिली मे आबए से स्वागत योग्य अछि। प्रत्येक छोट कथा जे या तँ आकाशवाणीक लेल लिखल गेल आ कथा गोष्ठी मे पढ़बाक लेल लिखल गेल अछि महत्वपूर्ण। एकदम बूंदमे समुद्र। कथा, कथा सूत्र जकाँ बुझाइत अछि। पन्ना जी केँ हम आग्रह करबनि जे पलखति पाबि आब कथा सूत्रक विस्तार करथु आ पूर्ण कथा लिखथु जाहिसँ पाठकक छाँक पुस्तै।
कथा संग्रह फ्लैपपर वांछित अवांछित शब्द संचयन छैक जाहिसँ बचल जा सकैत छलैक। ‘दू आखर’ लेखिकाक दृष्टिक निर्विविवाद टिप्पणी अछि आ हुनक स्वयं केर विकासक एकटा संक्षिप्त सूचना। पन्ना झा जी जन नन कन्त्ये वर्सियल व्यक्तित्वक जे अनुभूति सबकम हाथमे अछि से उत्तर आधुनिक मिथिलाक निर्माणक अनुभूति छैक जाहिमे बालक-बालिका युवजन आ वृद्ध-वृद्धा, दादा-दादी सब छथि। अर्थात् उत्तर आधुनिक विचार एसकरूआ नहि अछि, सभाराज बला परिवारक कामना करैत अछि समाज निर्वीथ नहि अछि, मदतिक हाथ चारू भागसँ बढ़ैत अछि।
पन्ना जीक लेल शुभकामना।
२.
अशोक -बनैत कम
बिगड़ैत बेसी-सुभाष
चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह
बनैत बिगड़ैत सुभाष चन्द्र यादवक दोसर कथा संग्रह थिक। पहिल कथा संग्रह ‘घरदेखिया’ करीब छब्बीस वर्ष पूर्व आयल रहए। एतेक अंतराल पर आयल संग्रह स्वाभाविक रूपें लोकक ध्यान आकृष्ट करैत अछि। से अहू दुआरे जे सुभाष चन्द्र यादव मैथिलीक जानल-मानल कथाकार छथि। मैथिली कथा साहित्यमे सुभाषक अपन विशिष्ट योगदान अछि। आलोचक कुलानन्द मिश्रक कहब छनि जे मैथिली कथाक क्षेत्रमे एकटा निश्चित सीमाक अतिक्रमण सुभाष चन्द्र यादवक वादे आरम्भ भेल। जे अखनुक नव्यतम कथाकार लोकनिक प्रियतम आस्था आ पवित्रतम विश्वास बनि गेल अछि।
अपन कथा-संग्रह ‘घरदेखिया’क शीर्षक कथा घरदेखिया सुभाषकेँ मैथिली कथामे स्थापित कऽ देने छल। ई कथा मिथिला मिहिरक 15सितम्बर1974क अंकमे पहिल बेर छपल रहए। ई कथा 1977मे मैथिली अकादमीक कथा संग्रहमे अपन स्थान बनौलक। कथाक संग देल सम्पादकीय टिप्पणीमे कहल गेल जे ‘बीसम शताब्दीक एहि उन्नत युदमे समाजक एकटा वर्गक यथार्थ सँ ई कथा जे अंतरंग साक्षात्कार करबैत अछि, से एके संग मोनमे अनिवर्चनीय आह्लाद आ भीतर धरि पैसि जाए बला अवसाद सँ भरि दैत अछि। कथामे भाषा कोना फोटोग्राफी करैत चलैत छैक, तकर बड़ सुन्दर उदाहरण ई कथा अछि’। वस्तुतः ‘घरदेखिया’ सुभाषक अनेको प्रसिद्ध कथामे सँ एक थिक। ओ कथा अभावग्रस्त लोकक घरक परिस्थिति केँ बहुत सुन्यस्त रूपें देखबाक संवेदित करैत अछि। उपेनक संग पाठक सेहो ‘काका’क आर्थिक अभाव केँ देखि चिंतित भऽ उठैत अछि। आब बेटीक बियाह लेल टाकाक जोगाड़ कोना हेतैक? पाठक सोचबा लेल विवश होइत अछि।
निश्चित रूपसँ सुभाष मैथिली कथाकेँ अपना तरहक किछु उत्तम कथा सभ देलनि अछि। घरदेखियाक संग काठक बनल लोक, फँसरी आ झालि बहुतो पाठक आलोचक द्वारा प्रशंसित भेल अछि। ई कथा सभ सुभाषेक नहि मैथिलीक नीक कथाक रूपमे मानल जाइत अछि। सुभाषक नीक कथा आरो अछि। हम एतऽ किछु आर कथाक नाम लऽ सकैत छी। एकटा दुखांत कथा, उतर मेघ, जासूस कुकुर आ चोर, हीर्थ, परिचय, बेर-बेर, लिफ्ट आ फुकना। ई सभ कथा अपन शिल्प ओ कथ्यक संतुलनसँ अभीष्ट प्रभाव छोड़बामे सफल भेल अछि। कमसँ कम शब्द मे कोनो व्यक्ति, घटना अथवा भावक राजीव ओ भावपूर्ण अंकन एहि कथा सभमे भेल अछि। एकटा कलाकारक रूपमे सुभाष वर्णनसँ बेशी चित्रणमे अपन निपुणता देखबैत रहला अछि। से बिना कोनो ताम-झाम, रंग-रोगन के। तैं सुभाषक कथा सभ कखनो कऽ एकटा देखा-चित्र, शब्द चित्र सन लगैत अछि। साहित्यमे जेकरा रेखाचित्र कहल जाइत अछि, ओहि मे कमसँ कम शब्द मे कलात्मक ढ़ंग सँ कोनो वस्तु, व्यक्ति अथवा दृश्यक अंकन कएल जाइत अछि। एहिमे साधन शब्द होइत अचि, रेखा नहि। तैं एकरा शब्दचित्र सेहो कहल जा सकैत अछि। एकर अंग्रेजी नाम स्केच, फोटो नहि थिक। रेखाचित्र मे कथाक गहीरताक अभाव रहैत अछि, परंतु रेखाचित्रमे नहि। ई सभ बातक होइतो कथा आ रेखा चित्रमे बहुधा भेद करब मुश्किल होइत छैक।
सुभाष चन्द्र यादवक ‘घरदेखिया’ संग्रह मे पैतीसटा कथा रहए। बनैत-बिगड़ैतमे एक्कैसटा कथा अछि। एहि एक्कैसटा कथामे एकटा कथा अछि ओ लड़की। ई कथा ‘असंगति’ नाम सँ ‘घरदेखिया’ संग्रहमे सेहो अछि। दुनू कथामे घटना एक्के थिक। मुदा उपस्थापन आ निस्पत्तिमे अंतर अछि। एहि प्रकारे एक्के घटना सँ निर्मित्त कथाक दूटा पाठ, दू शीर्षकसँ हमरा सभकेँ भेटैत अछि। घटना महानगरक होस्टल लगक थिक। मोटरमे बैसि कऽ एकटा लड़का आ लड़की चाह पीलक। चाह पीबि कऽ दुनू कप लड़की हाथमे रखने रहए। नवीन, जे ओकरासँ अपरिचित रहए, तकरा जाइत देखलक तँ पुछलकै जे की अहाँ ओहि दिस (चाहक दोकान दिस) ज रहल छी? सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि कऽ ओकर हाथक कपपर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओहि दुनूक अइंठ कप लऽ जाएत? लड़कीक नेत बुझिते ओ जबाब देलकै नहि। असंगति मे नवीन अंत धरि तिलमिलाइत रहैये आ सोचैये जे ओ किएक नहि कहि सकलै, ‘हाउ डिड यू डेयर?’ कथा एहि ठाम खतम होइत अछि। मुदा ओ लड़की मे एकरबादो कथाकेँ विस्तार देल गेल छै। नवीनक मानसिक अंतर्द्वन्द्व छैक। ओ सोचैत अछि जे दुनू मे क्यो दोषी रहल हेतै आ दुनू दोषी हेतै आ दुनूमे क्यो नहि। कारण आरो भऽ सकैत छल। अंततः एतबे सत्य रहि गेलै जे लड़की उदास भऽ गेल छलै आ नवीन दुखी। ई सभ बात ओ सोचने चल जा रहल छल। दुनू कथामे घटना कनियेंटा अछि। आर जे किछु अचि से मानसिके स्तर पर अछि। पहिलमे अपमानक बोध अंत धरि बनल छैक। एहि बातक पछताबा छै जे लड़की (असंगतिमे लड़कीक नाम कूकी थिक) के झाड़ि कऽ बदला किएक नहि लेलक? ओकरा औकात किएक नहि देखा सकलै! तोहर ई मजाल जे हमरा अइंठ कप उठा कऽ लऽ जाइ लेल कहबें? मुदा ओ लड़की मे ई अपमान बोध अंततः समझौता मे बदलि जाइत अछि। थोसथाम भऽ जाइत छैक। लड़कियो उदास जे अनेरे कहलकै आ नवीनो दुःखी जे अइंठ कप लऽ जइते तँ की भऽ जइतैक। मुदा ई सभटा मन कथे। मनेक भीतरमे चलैत। पजरैत आ मिझाइत। कथाक एहि दुनू पाठक विस्तारसँ तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक भऽ सकैत अछि।
बनैत बिगड़ैतमे संग्रहीत कथा सभसँ पूर्व कथाकार ‘अपन गप्प’ मे कहैत छथि जे ‘हमर रचना और किछु नहि, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समयक सार तत्वकेँ प्रतिबिम्बित करऽ चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करऽ चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सभ सँ प्रेम करए। आ प्रेम बएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत’। कथाकारक इच्छा आ कथा सभकेँ जँ देखी तँ लागत जे कथाकार अपन अभीष्ट केँ बहुत अंश धरि प्राप्त कऽ लेने छथि। जतऽ कतहु अभीष्टक प्राप्ति नहि भऽ सकलनि अछि तँ से अभीष्टक अस्पष्टता आ ताहि कारणे उत्पन्न शिल्पक कमजोरी थिक। प्रथम पुरूष कथावाचक वला अर्थात् कथा कहनिहार ओ कथा जननिहार जतऽ एक छथि से एगारह टा कथा अछि। एहि सभ कथा केँ आत्मानुभूतिक निकट मानल कथा अछि। एहन कथा सभ अछि, अपन-अपन दुःख, आतंक, एकटा अंत, एकटा प्रेम कथा, कनिया पुतरा, कारबार, कुश्ती, तृष्णा, दृष्टि, बात, रम्भा, हमर गाम। एहि एगारहो कथामे सँ दस टा कथा मे हम सोझे-सोझ पात्रक रूपमे कथामे सम्मिलित छथि। मुदा एकट्य़ा कथा ‘तृष्णा’ मे ओ दोसर पात्र अखिलनक खिस्सा कहैत छथि। एहि कथा सभक माध्यमे देश-कालक प्रति जे प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि से यथार्थ लगैत अछि। से वर्त्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थितिमे राग-भावक होइत अभावकेँ देखबैत अछि। सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध-अनुबन्ध बदलि रहल अछि। अनकर दुख तकलीफक प्रति एक मारूक उदासीनता पसरि रहल छैक। कारोबारी सम्बन्ध अश्लीलता हदकेँ छूबि रहल अछि। शासन-व्यवस्था असंवेदनशील आ भ्रष्ट भऽ गेल छैक। लोक कमजोर आ असहायकेँ दबब चाहैत अछि। गाम-घरमे जमीन-जाल, सम्पत्तिक छीना-झपटी बढ़ल छैक। कथा-कार चाहैत छथि जे प्रेम कयनिहारक बीच सम्वादहीनता नहि उपजय। सम्वादहीनता सँ ओ बैचेन होइत छथि (एकटा प्रेम कथा) ओ मानैत छथि जे पति-पत्नीक बीचोमे सभ किछु साझी नहि होइत छैक (अपन-अपन दुख), शासन-व्यवस्थाक अंग भेलापर मित्र-परिचितोक बात-व्यवहार बदलि जाइत छैक। ई बात-व्यवहार आतंकित कऽ सकैत अछि (आतंक)। श्रद्धा आ स्नेह देखाबऽ लेल कर्मकाण्ड जरूरी नहि छैक (एकटा अंत), निश्छल आ निर्विकार यौवनकेँ छली आ विकारग्रस्त मानसिकतासँ बचाएब कठिन भेल जा रहल छैक (कनियाँ पुतरा)। एहि कारोबारी युगमे असहाय आ निर्बलकेँ आर्थिक-शारीरिक शोषणसँ बाँचब मुश्किल भऽ गेलैक अछि। मानवीयताक ह्रास भऽ रहल छैक (कारोबार), जीवनक आपा-धापी लोककेँ जहिना-तहिना रहबापर विवश करैत छैक (कुश्ती), कोनो सुन्दर-दृष्टि-भंगिमावाली स्त्रीक प्रति सहज खिंचाओ आ लगाओ सम्भव छैक। लोकमे ई इच्छा जनमि सकैत छैक जे ओकर संग हर्तदम बनल रहय। संग नहियो भेटतैक तँ स्मृति आत्माकेँ आलोकित करैत रहतैक (तृष्णा), मनुक्खकेँ जीबाक लेल सार्थक ओ व्यावहारिक दृष्टि आवश्यक छैक (दृष्टि), जीवनमे बहुतो घटना घटैत रहैत छैक। जीवन कथा चलैत रहैत छैक। दुख-सुख भोगैत रहैत अछि लोक। परन्तु बात कखनो-कखनो बनि पबैत छैक (बात), रम्भा सन रूपवती स्त्री ककरो कोनो अवस्थामे विचलित कऽ सकैत अछि। एहि विचलनमे मोनकेँ नुका कऽ राखब सम्भव नहि छैक। मोन पारदर्शी भऽ जाइत छैक। मोनक सुन्दरता आ कुरुपता देखार भऽ सकैत छैक (रम्भा), अनुपस्थित जमीन्दारक लेल गाम आब स्मृतिमे जा रहल छैक। गामक जीवन विकट भऽ गेल छैक। वस्तुतः गाम आब अपन नहि रहि गेलैक अछि (अपन गाम)। एहि सभ कथामे जे भाव-विचार व्यक्त भेल अछि से बहुलांशमे कथामे अनुस्यूत भऽ कऽ आएल अछि। मुदा जतऽ-ततऽ कथामे फूटसँ टिप्पणी, चिन्तन, दर्शन वा मन्तव्यक सोङर सेहो दिअ पड़लनि अछि कथाकारकेँ। कथा-संग्रहमे संगृहीत किछि कथा सभमे ई सोंगर कखनोकेँ कने खीचल-तीरल सेहो लागि सकैत अछि। लागि सकैत अछि ब्जे कथावाचक जेना किछु आगू बढ़ि गेल अछि आ कथा कतहु पाछूए छूटि गेल अछि। हमरा जनैत एकर कारण कथाक रूप-विधान थिक। ले आउट थिक। कथात्मकताक अभाव थिक। जेँकि सुभाष अपन कथा लेल वातावरण आ पृष्ठभूमिक निर्माण नहिएँ जकाँ करैत छथि तैँ हुनका अभीष्ट प्राप्ति लेल कखनहुँ कऽ फूटसँ उपक्रम करऽ पड़ैत छनि।
किछु कथामे कोसीक बाढ़ि आ कोसी कातक गामक चित्रण बहुत प्रामाणिक रूपसँ भेल अछि। किछु कथामे असगर हेबाक कष्ट-भोग दारुण भऽ गेल अछि। एहि कथा सभक चित्रण भयाओन अछि। जाहि कथामे कोसी आ कोसी कातक गाम अछि से कथा केनरी आइलैंडक लारेल, परलय आ हमर गाम थिक। कोसीक बाढ़िसँ तबाही, कोसी कातक गामक रस्ता-पेंड़ाक दुरुहता कहैत अछि जे ई एकटा दोसरे संसार थिक। विकाससँ दूर, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्धक बदलैत आयाम आ ओहि भीतरसँ राग-विरागक झिलमिलाइत मनोभाव, बनैत बिगड़ैत जातीय-वर्गीय सम्बन्ध कथा सभकेँ स्मरणीय बनबैत अछि। “परलय” आ “हमर गाम” शीर्षक तँ कथाक अनुकूल लगैत अछि, ओकर संगति छैक मुदा केनरी आइलैंडक लारेलक कोनो संगति कथामे नहि भेटि पबैत अछि। कैनरी आइलैंड स्पेनक आइलैंड थिक, जे मेडीटरेनियन समुद्रमे अछि। एहि आइलैंडपर लारेल नामक गाछ खूब होइत छैक। एहि झमटगर गाछक छोट-छोट पातक उपयोग मुकुट, टोपी बना कऽ लोककेँ सम्मानित करबामे होइत रहल अछि। इन्गलैंडमे राजाक मुकुटमे लारेल लगाओल गेल रहैक। मुदा कथामे ई लारेल के थिक, से स्पष्ट नहि होइत अछि। कथाक संग शीर्षकक संगतिक समस्या किछु आनो कथाक संग अछि।
“असुरक्षित” आ “एकाकी” बाहर आ भीतरसँ असगर भेल लोकक व्यक्तिचित्र थिक। ई दुनू कथा बहिरंग आ अंतरंगक बीच होइत आवाजाहीक कथा थिक। कखनो बहिरंग हावी भऽ जाइत छैक तँ कखनो अंतरंग। ई स्थिति व्यक्तिवादी मानसिकताक देन कहल जा सकैत अछि। एहन लोकमे असुरक्षा-बोध बढ़ि जाइत छैक। ओ अपन वर्तमान वातावरणक संग ताल-मेल नहि बैसा पबैत अछि। दाना, नदी आ कबाछु एहन कथा थिक जेकरामे कोनो पैघ बात कहबाक तागति छैक मुदा अन्ततः से बात उभरि नहि सकल अछि। एक ओझरायल अनुभूति आ संकोच, कहि सकैत छी जे एहि कथा सभकेँ पुष्पित हेबामे बाधक भेलैक अछि। तथापि “नदी” प्रवहमान धारक रूपमे तँ नहि मुदा रुकैत-चलैत वात्सल्यक अनुभूति जगबैत छैक। “दाना” एहि कारोबारी समयमे मनुक्खकेँ हरेक दाना लेल चिड़ै-चुनमुनी सन बनैत देखबैत अछि। “कबाछु”क अनुभूति जुगुप्सा जगबैत छैक जखनि कि एहि कथामे गहींर सत्यक बीज अछि। सत्य ई थिक जे जखन व्यक्तिक वर्ग बदलि जाइत छैक तँ ओकरा अपन पूर्ववर्ती व्यवहार, चालि-चलन, श्रम वा आराम सभक प्रति एक हीनता-बोध, लाज-संकोच उपजि जाइत छैक।
कथा-संग्रहक नाम बनैत बिगड़ैत, एहि नामसँ प्रकाशित कथाक आधारपर राखल गेल अछि। एहि कथामे माय-बाप लगसँ परदेश चल गेल सन्तानक कुशलता लेल व्याकुल अनिष्टक आशंकासँ डेरायल, संतानसँ भेटल अवहेलनाक संताप भोगैत पति-पत्नीक खिस्सा कहल गेल अछि। पत्नीकेँ एहि मानसिकतामे कौआक टाहि आ कुकुरक कानब अशुभ लगैत छै। ओ परेशान होइत अछि। पति विभिन्न तर्कसँ पत्नीक ध्यान एहि अशुभ कल्पनासँ हटाबऽ चाहैत अछि। मुदा पत्नी खिसिया जाइत छै। कटाह बात कहि दैत छै। ओहि कटाह बातसँ पति आर पीड़ित होइत अछि। एहि क्रममे ओ विभिन्न बात सोचैत अछि। कौआक कुचरबाक मादे अशुभ कल्पनाकेँ कौआक विलायल जेबासँ जोड़ि दैत अछि। कौआ संग अपनो (दादाक) विला जेबाक कल्पना करैत अछि।एहि प्रकारेँ जेना सन्तानक विछोहसँ उपजल क्षोभ आ दुखमे अपनाकेँ कौआ सन कुरुप मानि, अशुभ मानि, विला जेबाक, मरि जएबाक, स्मृतिमे चल जेबाक उपालम्भ देल गेल अछि।
सुइभाष चन्द्र यादवक एहि कथा-संग्रहक अनेक कथामे गामक, दादाक, स्नेह-भावक स्मृतिमे चल जेबाक बात कहल गेल अछि। जेना ई सभ आब स्मृतिएटामे जीवित रहत। वस्तुतः वर्तमान समएपर ई सभ कथाकारक प्रतिक्रिया थिक। ई प्रतिक्रिया समयकेँ बनैत कम आ बिगड़ैत बेसी देखि कऽ, पाबि कऽ व्यक्त भेल अछि। जेना ई समय बनि कम रहल अछि, बिगड़ि बेसी रहल अछि। वर्तमान समएपर कथाकारक ई प्रतिक्रिया यथार्थ भले ही हो, मुदा ई यथार्थ उदास आ निष्क्रिय करैत अछि। एहिसँ ने हृदएमे प्रेरणा होइत अछि आ ने आत्मबल भेटैत अछि। तैँ सुभाषजी सँ ई आशा करब अनर्गल नहि होएत जे ओ अगिला समएमे समकालीन यथार्थक एहन पक्ष सेहो प्रस्तुत करता जे प्रेरित आ सक्रिय करत। जाहिसँ आत्मबल भेटत। एहन कथा वस्तुतः कम बिगड़ैत आ बेसी बनैत कथा होएत।
३.
चित्राक सनेस
शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न।
यू.पी.एस.सी. लेल
चित्राक सनेस
मिथिलाक भूमि पुरातन कालहिंसँ आर्यावर्तक संस्कृतिक आकर्षण केन्द्र रहल अछि। सभ दर्शनक संग-संग साहित्य सरिताक वैभव-विकासमे मिथिलाक योगदान अविस्मरणीय। एहि भूमिक जनभाषामे ज्योतिरीश्वरसँ लऽ कऽ अद्यतन काल धरि साहित्यकारक भरमारि लागल अछि। ओहि साहित्यकारक ढेरीमे एकटा एहेन साहित्यकार भेल छथि, जनिक नाम सुनिते हमरा सबहक वास्तविक रूप उपटि कऽ आिव जाइत अछि। ओ छथि- बैधनाथ मिश्र। तरौनी गामक लाल बैधनाथ मिश्र मैथिली साहित्यमे ‘यात्री’ नामसँ प्रसिद्ध भेलाह। बौद्ध दर्शनसँ प्रभावित रहवाक कारण हिन्दीमे ‘नागार्जुन’ नामसँ रचना करैत छलाह। प्रांरभिक रचना संस्कृतमे कएलनि, मुदा चौगमा गाम वासी आ मैथिलीक चर्चित महाकाव्य अम्बचरितक सृजनहार पं. सीता राम झाक प्रेरणासँ मैथिलीमे सेहो लिखए लगलाह। मैथिली साहित्यक हुनक प्रमुख कृति -पारो- मानल जाइत अछि, परंच एक छोट मुदा प्रासंगिक कविता संग्रह ‘िचत्रा’ हुनका कविक रूपेँ हमरा सबहक भाषाक ध्रुवतारा बना देलक।
चित्राक रचना कोनो योजना बना कऽ नहि कएलन्हि। सन् १९३१सँ लए कऽ सन् १९४९ई. धरिक लिखल किछु कविताक संकलन एहि पोथीमे कएल गेल अछि। एक दिशि मातृभूमि प्रेम तँ दोसर दिशि मैथिलीक दशापर क्षोभ। जीवनक समग्र मूल्यक तात्विक विवेचन। अनियोजित रचना सबहक संकलन बड़ कष्टदायी होइत अछि, मुदा एहिमे भाव प्रवाहक अभाव नहि वुझना जाइत अछि। माॅ मिथिले शीर्षक कवितामे अपन ठाम, अपन गाम, अपन बुद्धि आ अपन दर्शनक सरल रूपमे प्रदर्शन कएल गेल। गौतम यज्ञवल्यकसँ लऽ कऽ रमेश्वर महाराजक महिमाक गुनगान। एहि गुनगानक मूल अछि- अपन संस्कृतिक विश्लेषण। भारती आ मंडन िमश्रक लेल कीर दंपतिक उदवोधनमे अपन पहिचान झलकैत अछि। उदयनाचार्य जग्रन्नाथपुरीमे सनातनक पुनरूद्वारक प्रमाणित भेलाह, ई मिथिलाक विजय थिक। विद्यापतिक कविता हमर धरोहरि अछि। अयाची मिश्रक सादा जीवन सेहंतित अछि, तँ शंकरक वालोहं जगदानंद.... वाल साहित्यक आ वाल कौशलक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण।
एक दिशि ‘मॉ मिथिले’ कवितामे अपन माटिपर स्वाभिमानक दर्शन तँ दोसर दिशि ‘अंतिम प्रणाम’ कवितामे अपन जन्म-आ कर्मपर क्षोभ। अर्न्तद्वन्द्वक एहेना दशा वा वेदना कविमे िकएक उत्पन्न भेल? एहि कविताक माध्यमसँ कवि जागरण करवाक लेल पलाएन करए चाहैत छथि। अपन संस्कारमे निहित विषमतासँ अकच्छ कवि झाँपल व्यथाकेँ नि:शब्द उघारए चाहैत छथि। जेना अवोध अपन माएसँ घरसँ भागि जएवाक धमकी उपरे मोने दैत अछि, ओहिना कविक वेदनामे हृदएगत पलाएन नहि अछि। ‘कविक स्वप्न’ कवितामे कवि समाजक विगलित अर्थहीन व्यक्तिगणक कचोटक मार्मिक चित्रण कएलन्हि अछि मिथिलाक भूमिमे सम्यक अर्थनीतिक अभाव अछि तेँ समाजक परिदृश्यमे भारी अन्तर देखए मे अवैछ। एहि भूमिपर एकसँ वढ़ि कऽ एक महामानव भेलाह, परंच साधन आ शिक्षाक अभावमे कतेक प्रतिभा मोनइसँ बाहर नहि निकलि पबैत अछि- ‘तानसेन कतेक रविवर्मा कते
घास छीलथि वाग्मतीक कछेड़मे
कालिदास कतेक विद्यापति कते
छथि हेड़ाएल महिम वारक हेड़मे’
जौं पेट-पांजड़ि अन्न जलक त्रासमे आकुल हो तँ शिक्षाक कल्पना निर्मूल प्रमाणित भऽ जाएत, परंच स्वपनोमे आशक दर्शन। कविकेँ समाजमे नव जोश उत्पन्न करवाक प्रेरणा भेटल तेँ प्रवासकेँ छोड़ि अपन मिथिला धुरि अएवाक निश्चय कएलन्हि। एहि कविताक रचना काशीमे कएलनि, मुदा मोन तरौनीमे घुिरया रहल छल। निश्चय जन्मभूमिक दशापर वेदनासँ कविक मोन तपि रहल होइतनि।
‘बूढ़ वर’ कविताक दर्शन कएलापर हास्यपर व्यथाक विजय दर्शित होइत अछि। शीर्षकसँ स्पस्ट होइत अछि जे विवाहमे कनिया-वरक वएसमे अन्तर अवश्य हएत। कविताक मूलमे जएवाक वाद तँ स्पष्ट भऽ गेल जे वरकेँ वरांठ वा खोरनांठ किछु कहल जाए अनसोहांत नहि लागत। जीवनक अंतिम अवस्थाक वर काँच-कुमारिक वरण कहलन्हि। विवाहिता नि:संतान रहि गेली। माएक विरोध नि:सफल भऽ गेल। स्त्रीगणक व्यथाकेँ के बूझत? वाप कैंचाक लोभमे बेटीकेँ बेचि लेलन्हि। मिथिलामे एहि प्रकारक पाप होइत रहल अछि। समाजक तथाकथित आगाँक पाँतिमे बैसल जातिक दीन आ कर्तव्यहीन जनमे ई व्यवस्था पलेगक रूप धारण कएने छल। अंतमे वेटी धरती माएसँ फटवाक लेल आग्रह करैत छथि।
‘विलाप’ कविताक विषएमे लिखब कठिन अछि जे एकरा वाल-वियाहक कुकृत्य वा विधवाक विलापमे सँ की मानल जाए? वाल कालक वियाह संस्कारमे आनंदक कोन रूप होइत अछि? दुरागमनमे कनिया सिखेलासँ कनैत छथि, मुदा नोरक अभिप्राय नहि बूझैत छथि। जखन नोरक अर्थ बुझवाक वएस भऽ गेलनि तँ वज्रपात? वैद्यव्य जीवनक मार्मिक छंद......।
श्रंृगारसँ पहिने नीति आ वैराग्य, एहि जीवनक उदेश्यपर विचार करवाक आवश्यकता अछि। वैद्यव्य जीवन पतिक स्मृतिक संग जीबए चाहैत छथि। विहंुसलि नायिका, मुदा समाजक कुदृष्टिक डर। एहि कवितामे सेहो उच्च जातिक व्यवस्थापर कटाक्ष कएल गेल। विधवा वियाह मिथिला समाजक सवर्ण वर्गमे पूर्णत: वंचित छल, एखनो आंगुरेपर गनल-गुथल होइत अछि। जाहि वर्गक लोक शांतिसँ दु:खो नहि सहए दैवए चाहैत छथि, ओहिमे जन्मपर कोना गर्व करू? कविकेँ कतिपय व्यथा छन्हि एिह व्यवस्थासँ, खिन्न छथि उच्च जातिक अलच्द सदृश सोचसँ। पुरूषसूक्तमे कर्मक आधारपर जकरा चण्डाल आ छुद्र सन संज्ञा देल गेल, हुनक सोच एखन पारदर्शी अछि। ओहि वर्गक कांताकेँ ई अधिकार छन्हि जे कुकर्मी स्वामीसँ कखनो जान छोड़ा कऽ आन मनुक्खक वरण कऽ सकैत छथि मुदा आगाँक पाँतिमे बैसल प्रवुद्ध वर्गक विधवा अवला बनि उज्जर साड़ीमे दुवकलि छथि, मुदा तैयो वागमती कातक बगुला हुनक चरित्र हनन करवाक लेल सदिखन उद्धत छथि। एहि दशाकेँ देखि कोनो कविक ई उक्ति प्रासंगिक अछि-
आगि भेल शीतल, पानि अदहन भऽ उधिएलै
काँट बनल कोमल आ फूले गड़ि-गड़ि गेलै
ककरासँ करतै तकरार हम जिनगी
धिक-धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी।
कौशिकीक धार कवितामे कोशी माएक पसारल विनाश लीलासँ भेटल परिणामक पीड़ा मड़ोरि दैत अछि। मुदा ई थिक मिथिलाक शोक। ‘प्रेयसी’ कविता श्रृंगारसँ भरल अछि। प्रेमी द्वारा प्रेमिकाक प्रति समर्पित संवाोधन नीक लागल। एहि सिनेहमे प्रेमी प्रेमिकाकेँ अपन शक्ति मानैत छथि। सिनेहक मूल रूपक वर्णन, कतहु रूपक चर्च नहि। प्रेमी अपन प्रेमीकाकेँ तपवति छथि मुदा ओ अपन निर्णएसँ नहि विलग भेली। एहि समर्पणसँ प्रेमी िसनेहक जुआरि पानि फुटि गेल-
अपन इच्छापर तोहर आशाक कैलियहु होम
तों वनलि रहलि सदए सखि मोम
‘फेकनी’ कविताक नायिका फेकनी कंजूस महिला छथि। कैंचा वचा-वचा कऽ अपन संततिक लेल राखव छनि हुनक इच्छा। दूध बेचि कऽ टका जमा करैत छथि, ओहो दूधमे पानि मिला कऽ तेँ पानि जकाँ दिवस वितैत छन्हि। कोनो धर्म-कर्म नहि, कवि एहिसँ छुब्ध छथि। एहि प्रकारक घटना हमरा सबहक गाम-घर होइत अछि। पेट काटि कऽ जकरा लेल संयोजन करैत छथि, ओ ओहि धनकेँ की करताह? सहज अछि-
पूत कपूत तँ किएक धन जोहव
पूत सपूत तँ किए धन जोहव।
‘लखिमा’ कविता मिथिला नरेश राजा शिव सिंहक अर्द्धागिनी लखिमा रानीक प्रति समर्पित अछि। महाकवि विद्यापतिक श्रंृगार रसक सिद्धिमे लखिमा जीक व्यक्तित्व आ सुन्दरताक पैघ भूमिका छल। ओना विद्यापतिक चरित्रपर संदेह करव कविक ना दृष्टिकोण नहि अछि, मुदा हुनक श्रंृगारक नायिका लखिमा रानी छलीह। महाकविक रचनासँ स्पष्ट होइत अछि जे लखिमाक सौन्दर्य ततेक विलक्षण छल जे हुनक रचनाकेँ अमरत्व प्रदान कऽ देलक। विद्यापतिक नयनमे लखिमा अवश्य छलीह, परंच ओ कर्तव्यवंधसँ बान्हल छलाह। हुनक मनमे विरति छलन्हि।
‘उड़ान’ शीर्षक कविता कल्पनापर आधारित अछि। सहज अछि जे कल्पनाशील व्यक्तिकेँ कर्मसँ वेसी एहिपर विश्वास होइत छैक। वास्तविक जीवनमे कर्मक जतेक महत्व हो मुदा कल्पनाक उड़ान विलगित मानवकेँ आनंदक शिखरपर पहुँचा दैत अछि। कल्पना कहियो धोखा नहि दैत अछि, एहिमे ककरोसँ आश नहि होइत अछि। स्वप्नक भारकेँ केओ नहि डिगा सकैत छैक।
‘गामक चट्ठी’ कविता प्रवासमे रहनिहार एकटा गरीवक नाओ लिखल हुनक कनिया व्यथाक किछु पाँती थिक।
गाममे अपन नेनाक संग रहैत दीनक दाराकेँ की-की सहए पड़ैत अछि, एकर मार्मिक वर्णन कएल गेल अछि। जौं हाथमे किछु कैंचा नहि हुअए तैयो गाम अएवाक निवेदन व्यथित कनियाँक हृदएगत कचोट बुझना गेल। चारू कातसँ समस्यासँ घेरल नारी अपन पतिसँ खाली हाथ गाम धुरि अएवाक लेल कहैत छथि। जीवन डोरिकेँ पकड़ि कऽ राखव कठिन भऽ गेलनि। सम्यक अर्थनीतिक उद्धोषण यात्री जीक एहि कवितामे देखएमे आएल। अपन सनेशकेँ कखनो उधारि, कखनो झाँपि यात्री जी असमान समाजक अस्तित्वकेँ ललकारि रहल छथि। दीनक नेना पितृक दर्शनक लेल आकुल छथि, ओ तँ नेना छथि मुदा माए किए बजावए चाहैत छथि अपन स्वामीकेँ। कविक एहि भावकेँ स्पष्ट करव आजुक लोकसँ संभव नहि बुझना जाइत अछि।
ठीठर मामा कविता गाममे सभ दिन रहएबला ठीठर पाठकक पटना प्रवासक िस्थतिपर लिखल गेल अछि। भगजोगिनीक दर्शन करएबला लोककेँ हजार वोल्टक इजोतमे उजगुजाहटक अनुभव होइत एहि। एहि कविताक प्रसंग साधारण अछि आ भाषामे प्रवाहक अभाव बुझना गेल।
‘परमिटक साड़ी’ चारि अना वेहरी दऽ कऽ तीन टकामे परमिटसँ कनिया काकीक लेल आनल साड़ीपर आधारित अछि। गाम-घरमे बेहरी दऽ कऽ समान खरीदवाक परम्परा प्राचीन अछि। एहि कथाकेँ यात्री जी कोन उद्धेश्यसँ लिखलन्हि नहि स्पष्ट भेल। देश कालक दशापर सामान्य प्रस्तुति। कृतिका नक्षत्रमे, हिमगिरिक उत्संगमे, भए गेल प्रभात आ ताड़क गाछ शीर्षक कविता सभ प्रकृति वर्णनक छोट छाया प्रस्तुति करैत अछि। ई चारूटा कवितामे कविक उदेश्य हुनक शब्दसँ नहि प्रकट भऽ सकल। छंद समायोजन नीक लागल मुदा दोसर, कविता सभसँ तारतम्य नहि बुझना जाइत अछि। ‘द्वन्द्व’ कविताक शब्द-शब्दमे परिताप दर्शित भेल। किंकर्तव्य विमूढ़ छथि कवि, गाममे रहथि की प्रवासमे? गाममे विपन्नता, मुदा सिनेहक आवरण अछि। मोरंग वा आन ठामक प्रवासमे कैंचा-कौड़ी तँ अछि, मुदा परिवार समाजक िसनेह नहि। पावनि तिहारक जे आनंद गाममे भेटैत अछि, ओ शहरमे संभव नहि। एक ठाँ गामक जीवनसँ कविक मोन गुजगुजा गेलनि। गामक छोट लोक (साधन विहिन) पलाएन कऽ रहल अछि, तेँ सामाजिक व्यवस्थामे अन्तर आिव गेल। यात्री जीक अर्न्तमन समाजक बदलैत स्वरूपसँ संतुष्ट अछि, किएक तँ हुनक साम्यवादमे समाजवादक ज्योति प्रखर भेल अछि।
‘ऋृतु संधि’ शीर्षक प्रकृति वर्णनसँ जोड़ल अछि, मुदा एहिमे अर्थनीतिक मर्म झाँपल अछि। ग्रीष्मक तात्पर्य दीन मुदा उद्वेलित दीन, वर्षाक अर्थ नव जीवनक विश्वास। दीनमे साधनक अभाव परंच हुनक श्रद्धा उद्वेलित अछि। एहि कवितामे महाकवि पंतक छाया वादक झलकि देखएमे अबैत अछि।
जौं यात्री जीक पद्य सागरक सुवासित सरिता चित्राकेँ मानल जाए तँ एहिमे सभसँ पैघ योगदान ‘वंदना’ कविताक देल जाएत। ‘वंदना’ कविताक शीर्षक मात्र माध्यम थिक हुनक जन जनक व्यथाकेँ नग्न करवाक लेल। मिथिलाक समग्र जीवन दर्शनकेँ एहि कवितामे कवि मंचस्थ कऽ देलनि। नेपथ्यमे िकछु नहि रहि गेल। अनुलोम-विलोम, आशक्त-घृणा सभटा उपटि कऽ बाहर कऽ देलनि। मिथिला वर्णनपर बहुत रास कविताक रचना भेल अछि। परंच वेसी किछु विशेष वर्गकेँ महिमामंडित कएलक। उपेक्षितकेँ सम्मान देवाक िहनक शैली आवएबला वास्तविक मैथिल संस्कृतिक रक्षकक लेल कोसक पाथर प्रमाणित हएत। मिथिलाक माटि-पानिमे रहनिहार, संस्कृतिकेँ आत्पसात केनिहार सभटा मैथिल छथि। मैथिलीमे एतेक सम्यक सोच रखएबला कतेक लोक छथि? मैथिली भाषीक चर्च होइते मैथिल ब्रह्मण आ मैथिल कर्ण कायस्थक नाओ उमरि जाइत अछि, मुदा अन्य वर्ग की मैथिल नहि? जौं दोसर भाषाक लोक उपर्युक्त दुनू जातिक लेल एहि भाषाक वाचकक प्रयोग करैत छथि, तँ दुनू किएक नहि िवरोध करैत छथि? ओना एहि वर्गक किछु लोक विस्तृत सोचक छथि, मुदा ओ सेहो एहि प्रश्नपर चुप भऽ जाइत छथिन्ह? यात्री जीक आत्मा निश्चित रूपसँ एहि कविता रचना करए काल काँपि गेल हेतनि। एहि सनेशकेँ जौं सभ गोटे आत्मसात कऽ ली तँ मैथिलीक परिदृश्य अवश्य बदलि जाएत। आर्य, द्रविड़, आंग्ल, इस्लाम आ पारसी सभ परिवारक सभटा भाषामे मात्र मैथिलीपर जातिवादी स्वरूपक कलंक लागल अछि।
‘चित्रा’ संग्रहक विशेष पक्ष अछि- एकर सम्पूर्णता। आंचलिक रचनाकेँ मैथिली साहित्यमे प्राथमिकता देल गेल अछि। एहि भ्रमकेँ यात्री जी ‘गाॅधी’ शीर्षक कविता लिखि कऽ तोड़ि देलनि। गाँधी मात्र एक व्यक्तिक नाअो नहि ‘भारतीय दर्शन’ थिक। एहि दर्शनमे कोनो विभेद नहि, सबहक लेल स्थान एहि दर्शनक मूल संस्कार थिक। विडंम्बना अछि जे समाजमे िदव्य ज्योति जगावएबलाक अंत निर्मम होइत छन्हि। इसा-मसीह आ सुकराते जकाँ गाँधी मर्म स्पर्शी रूपेँ विलोकित भेलाह। राजा भर्तृहरिक ‘वैराग्य शतक’ जकाँ यात्री जीक रचनामे क्षोभक अवलोकन कएल जा सकैत अछि। ‘आसिन मासक राति इजोरिया कहैमे तँ ज्योतिक प्रतीक थिक, मुदा बुढ़वा पीपरक ठुट्ठपर बैसल नील कंठक त्राससँ भरल जीवनमे एहि ज्योतिक कोन अर्थ? फागुनक इजोरिया टहाटही हो वा युग धर्म सभ ठाम विगलित असार जीवन रसकेँ छंदसँ यात्री जी पसारि देलनि। जेठक दुपहरियामे कालक प्रहारकेँ देखएबाक सार्थक प्रयास कएल गेल।
देश दशाष्टक भ्रष्टाचारपर लिखल यात्री जीक अश्रुकण थिक। यात्री जीक यौवन परतंत्र भारतमे बीतल, मुदा स्वतंत्रताक दू बरख वाद एहि कविताक रचना कएलन्हि। जे आश अप्पन लोकसँ कहल गेल ओहि आशक पूर्णतामे संदेह देखएबाक यात्री जी प्रयास कएलनि।
परम सत्यकेँ चित्राक सतोगुण कहल जा सकैत अछि। स्वामी विवेकानंदक शून्यवादी सोच सदृश यात्री जी जहानक अस्तित्वपर प्रश्न चिन्ह लगएवाक प्रयास कएलनि। प्रारंभमे वैराग्यक अनुभूति, मुदा शनै: शनै विश्वासक सोतीमे डुवकी लगावए लगलनि। यएह थिक गृहस्थ धर्म। मनुष्य विपत्तिमे संसारकेँ मायागृह बूझैत अछि, परंच मोहक तांडवसँ केओ नहि बचि सकैछ। अंतमे विश्वासक संग एहि कविताक दुरागमन कएल गेल।
अंतिम पद्य एकटा पाछाँक पछातिमे विचरण करएवाली नारीक कर्मगाथा थिक- ‘गोट-विछनी’। नारी पुनरूत्थानपर भाषण खूव देल जाइत अछि मुदा अज्ञ, दीन, साधन विहीन, शोषित आ समाजक धारसँ बाढ़िक खाधि जकाँ कटलि नारीक व्यथा लग केओ नहि जा सकल।
‘चित्रा’ कविता संग्रह चित्रा नक्षत्रक तीत पानि जकाँ चिन्तन करवाक योग्य अछि। रचनाकारक जीवन चरित्र जौं सम्यक हो तँ रचनाक विषए-वस्तु समाजक लेल दर्शन भऽ जाइत अछि। समग्र जीवन संघर्षक पांजड़िमे वितएवाक कारण यात्री जी कर्म आ धर्मक हृदएमे घुसि गेल छथि। चित्रासँ स्पष्ट दर्शन भेल जे यात्री जी मानव धर्मी छथि। छनहिमे कचोट आ क्षणहिमे क्रान्तिक जुआरि, आवेग आ अतृप्तिक छोभ रहितहुँ विहानक विश्वास तृण-तृणकेँ िसहरा दैत अछि। एहि रचनाकेँ जौं आत्मसात कऽ लेल जाए तँ वैदेहीक मिथिलामे पुर्नस्तित्व सुधारससँ ओत प्रोत भऽ सकैत अछि।
शेष- अशेष............
पोथीक नाओ- चित्रा
रचनाकार- श्री यात्री
प्रकाशक- अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद प्रयाग
रचना वर्ष- १९४९
