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जगदीश प्रसाद मण्डल

आत्मबल
आने गाम जकाँ मिथिलाक गाममे एकटा जीताएलपुर गाम सेहो अछि। जीताएलपुर गामक अपन विशेषता अछि। ओना, एहेन विशेषता कोनो एक्के गामक रहल अछि सेहो बात नहियेँ अछि। बोनाएल-सँ-बोनाएल आ झँपाएल-सँ-झँपाएल गाम किए ने हुअए, तँए ओ गाम आने गाम जकाँ गोटि-पङरा डॉक्टर, गोटि-पङरा प्रोफेसर वा गोटि-पङरा खास-खास गुणकेँ प्रदर्शित नहि केलक, से नहि। करितो अछि आ करैत आबियो तँ रहले अछि। ऐठाम एकटा बात आरो अछि ओ अछि जे खुदरा-खुदरी जखन सभ गुण सभ गाममे अछिए, तखन जँ सभ मिलाकऽ देखब तँ सोल्होअना भइये जाइए। जखन सभ गुण सभ गाममे अछिए तखन गाम सौंस भेल की नहि? जेकरा सभगुण सम्पन्न बुझै छी, मानी वा नइ मानी ई अहाँक विचार भेल जे कहबै जे सजमनिया टोल एकटा गाम अछि, जइ गाममे एकोटा परिवार एहेन नइ अछि जे अरबमे नोकरी नइ करैत हुअए। ओना, जीताएलपुर रूआवी गाम अछि, रूआव ऐ मानेमे रखने अछि जे 'सुतिकऽ उठबौ आ ऐँठकऽ चलबौ।' खाएर जे जेतए अछि ओ ओइ गामक बातो भेल आ काजो भेल, मुदा जीताएलपुरक बच्चा-बच्चा जानियोँ रहल अछि मानियोँ तँ रहले अछि जे कोनो गाममे विद्यालय तीन-चारि साए बरख पूर्वसँ अछि, रूप चाहे जे होउ, मुदा जीताएलपुरमे विद्यालय बनल देश स्वतंत्र भेला पछाइत। जखन एकटा स्वतंत्रता सैनानी अपन अन्तिम समयमे माने वृद्धपन एलापर जीताएलपुर गाममे विद्यालय स्थापित केलैन। ओही गामक छैथ सुचित भाय।
बच्चेसँ सुचित भाय ओहन बाल विद्यालयकसँ बच्चा जकाँ रहला जे गामक विद्यालयमे अपन फुलवारी लगौलैन। माने जइ समय विद्यार्थीक माध्यमसँ विद्यालय परिसरमे फूलक खेती होइ छल। अखन तँ मलिछामक नककट्टा महादेव जकाँ, बान्ह-सड़क आ नहर भेने, कोनो गामक नाके कटि गेल अछि तँ कोनो गामक मुहेँ कटि गेल अछि। तैठाम आब चरचे की करब। पहिलुका अपेक्षा गामक रूपमे बदलाव आएल अछि। एहेन परिस्थितिमे गामक खेतकेँ, गामक उत्पादित पूँजीकेँ, उपजाऊ भूमि बनबैक स्थिति पैदाकऽ रहल अछि। सरकारक डोराडोरि देखिये रहल छी जे कोसीक नहरबला फाटकक आयु समाप्त भऽ रहल अछि आ नहरक शाखा-प्रशाखा अखनो कोसीए मे झिलहोरि खेल रहल अछि।
जहिना बाल-बोध बच्चा बाल-विद्यालय लऽ कऽ अप्पन परिवार धरिक बीच अपन जीवन धारण करैक लूरि सीखि लइए तहिना सुचित भाय सेहो सीख लेलैन। ऐठाम ई नहि बुझब जे माता-पिताक बीच एहेन दोष पैदा केना लऽ लेलक जे काजक अढ़ान बेटीपर दिअ लागल आ बेटाकेँ आरक्षित कोटाक लाभ देलक। जहिना बाल मनक जीवन अपन दुनियाँ देख आत्मबल पैदा करैए तहिना सुचित भायकेँ सेहो भेलैन। ओना, जीवनक संग आत्मबल केतौ टुटबो करैए आ केतौ लेबान होइत अप्पन रक्षा स्वयं करैत अपन जीवनकेँ बँचाइयो लइए। ऐठाम एकटा विचार आरो अछि, ओ अछि आत्मा छी की, किए ने अहूले डॉक्टरी चिकित्सा होइए। जखन शरीरक सभ अंगक प्रत्यारोपण हुअ लगल अछि तखन आत्मोक किए ने होइए? किए ने लोक बुधिविचड़ीमे लागल रहत। बुधि-विचड़ियेसँ ने विचारमे एकरूपता औत आ ओ मिलल-जुलल विचारधाराक रूपमे सामूहिक विचार प्रवाहित हएत।
अखन तक मिथिलाक किसान-परिवारमे शहर-बाजार जा नोकरी करैक धारणाक जन्म नइ भेल छल। एकर माने ई नइ बुझब जे परिवेश ओहन नइ बनल अछि जइमे देशक किसानक बेटा इंजीनियर बनि बाहर जा कऽ गाड़ीक ड्राइवरी नइ करै छैथ आ अपनाकेँ इंजीनियर घोषित करैत चालीस हजार डॉलर महिना नइ कमाइ छैथ। एकर माने एतबे नइ बुझब जे पहिने बड़का लोक, बड़का लोकक माने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक इत्यादि, विदेश नोकरी करए जाइ छला आ अखन औंठा छाप देनिहार गरीब-गुरबा सेहो विदेश जा कऽ नोकरी करए लागल अछि। खाएर तइ सभसँ सुचित भायकेँ कोन मतलब छैन। कौलेजक पढ़ाइ, माने स्नातक, (बी.ए.) सम्पन्न केलाक बाद जखन परिवारक जिनगी अंगीकार करैक बीच सुचित भाय पहुँचला, तइसँ पहिनहि हुनक पिता बिआह-दुरागमन करा अप्पन अन्तिम सन्तानक परिवार रोपणक स्थितिमे सुचित भायकेँ पहुँचा चुकल छेलैन। तैबीच साले-साल, आइ पचास बर्खसँ प्रत्येक कातिक मासक दिवाली दिनसँ एक पनरहिया भागवत कथा अपना दरबज्जापर करबैत आबि रहल छैथ। दरबज्जाक एते महत्व तँ अछिए जे जँ कियो दरबज्जापर आबि कोनो बात कहै छैथ तँ ओ सत्य मानले जाइए। आनक मनमे माने सुनिहारक मनमे जे भेल होनि, मुदा सुशील कक्काक अपने मन अपने धिरकारि कहलकैन जे 'अनेरे कोन मायाक जालमे घोंसियाएल जा रहल छह। अही भागवतक मंचपर सँ समाजकेँ जना दिऐन जे अप्पन परिवारक जेते भार छल ओ सम्पन्न भऽ गेल। माने माता-पितासँ बेटा-बेटी धरिक, अपन परिवारक प्रति जवाबदेहीक भार मेटा गेल। आब तँ ओ भार ओइ बेकतीक भेल जेकर परिवार निर्माण हएब अछि। परिवारमे दू तरहक काज होइए, एक सृजनात्मक आ दोसर उपयोगक। माने उत्पादनसँ उपभोग धरिक। उपयोग आ उपभोगमे अकास-पतालक दूरी बनले अछि आ बनबो तँ कएले अछि। बाल-बच्चाकेँ कोन तरहक जीवन देल जा सकैए ओ तँ निर्भर करैए परिवारक आमदनीपर, माने उत्पादनपर। मिथिलांचलक कृषिक ओ अवस्था बनियेँ गेल अछि जेकरा ढलानोन्मुख कहल जाइए, कोनो परिवारमे जँ एहेन विचारक जन्म होइए जे बेटा-बेटीक पढ़ाइ-लिखाइ, शादी-बिआहमे करोड़ोक खर्च करी आ माता-पिता ले साधारणो जीवनक बेवस्था उपलब्ध नहि करा सकिऐन। ई केतौसँ उचित नइ अछि। सुशील काका सुचित भायकेँ दबज्जापर बैसा माइयक सोझ, माने सुशील काका अपन पत्नीक सोझमे कहला-
"बौआ, दरबज्जापर एक पनरहिया भोज-भातक संग कातिक मासमे भागवत जहिना करैत एलौं हेन तहिना तोंहू निमाहैत चलिहह। पिता छियह तँए एते कहि दइ छिअ जे जहिना अप्पन बेदाग जीवन रहल तहिना तोंहू निमाहि चलिहह।"
अपना विचारे सुशील काका की कहलखिन आ सुचित भाय की बुझलैन, ई तँ दुनू गोरेक बीचक भेलैन तँए तेसर जे बुझैथ। मुदा पिताक विचार सुनि सुचित भाय बजला किछु नहि, बजबो किए करितैथ, परिवारक बीचक बेकतीक एक क्रम छी, जे सभक संग अछि। जीवनक हर क्षेत्र समयक संग संचरित होइत चलबे करैए। ओना, सुशील काका अपन विचार व्यक्त करैत ऐ आशमे रहबे करैथ जे बेटाक अप्पन मुहसँ सुनि नेने आत्माकेँ तुष्टि भेटत। तुष्टियो तँ तखने ने भेटैए जखन जीवनक पद्धति घोषित करैत कियो अपन जीवन स्थापित करैए। आत्माक तुष्टिक कारण ई जे विचारस्वरुप आत्मा एक पीढ़ीसँ दोसर पीढ़ीमे संचरित होइत अप्पन स्वरूप निर्धारित करैत चलैए। बेटाक मुहसँ सुनैक दोसरो कारण छेलैन, ओ ई छेलैन जे लोकक मनमे हजारो रंगक बातो अछि आ विचारक संग काजो अछिए, मुदा से तँ बजला पछातिये ने कएलपर नजैर दौड़त। जँ किछु करबे ने करब, तखन तँ ओहिना ने रहि जाएब जेना दुनियाँमे गाछ-बिरीछ, पोखैर-झाँखैड़, गाए-महींस अछि।
सभ तँ जनिते छी जे कर्मे धर्म आ धर्मे कर्म छी, तैठाम जँ कियो अपन धर्मेमे बट्टा लगा बटमारि कऽ लैथ वा घाटा लग घटवारिये करैथ। ई तँ अपन-अपन मनक बीचक धार भेल। ओना, सुचित भाय, पिताक विचारसँ एक्को पाइ अलग नहि छला, किए तँ कौलेजक अध्ययनक क्रममे मिथिलाक परिवारक गढ़नक विशाल रूप पढ़ि चुकल छला, जइमे लूल्ह-नाँगर, अकलेल-बकलेल सभक मानवीय सम्बन्ध निहित अछि। जहिना धर्म ओ थिक जे धार्मिक जीवन प्रदान करए, तहिना कर्म ओ थिक जे धर्म बनि सदैत प्रवाहित होइत चलए। बजैक क्रममे सभ बजिते छी जे दुनियाँ फुसिआहक भऽ गेल अछि, मुदा अपने की छी से तँ अपने ने देखब।
किछु समय गुमा-गुमीक पछाइत सुचित भाय बजला-
"पिताजी, अखन धरिक धाराक अनुकूल जे धारणा, धारणा दुनू रूपमे काजोक रूपमे आ विचारोक रूपमे, बनल आबि रहल अछि, तइ अनुकूल अपने कहलौं, जे पिताक शब्दसँ एको अक्षर कम-बेसी बुझिमे अबैत तखन ने किछु बजितौं, से तँ नहि अछि। अहाँ मुहसँ कहि भार दी वा नहि दी, मुदा परिवारक ऐगला भागक भागीदार हमहीं ने छी।"
जीवनक अन्तिम दौड़मे सुचित भाय पहुँच गेल छैथ। अपन जीवनसँ पूर्ण सन्तुष्ट छैथ। मनमे भेल जे सुचित भाय सन लोक जे पाकल आम जकाँ छैथ, माने भरपूर गुण सम्पन्न, ई नइ जे सड़ल-सड़ाएल आम जकाँ झुलि रहल छी, कखन खसब तेकर ठीक नहि। गामक रत्न जँ मानल जाए तँ ओ सुचित भाय छैथ। जेहेन जहिया समय रहलैन तेहेन तहिया अपन जीवन धारण करैत समयक संग चलैत आबि रहला अछि। एकाएक मन एते उत्तेजित भऽ गेल जे सुचित भाय ऐठाम विदा भऽ गेलौं।
दरबज्जेपर सुचित भायकेँ देखलयैन जे जेना अपन परिवारक नक्शा देख रहला होथि तहिना बुझि पड़ला। कनी फरिक्केसँ कहलयैन-
"भाय, गोड़ लगै छी।"
धड़फड़ाएल लोक जकाँ पहिनहि केना कहि दतिऐन जे भाय किछु पुछए आएल छी।
जहिना बजलौं तहिना सुचित भाय, बिऔहती कनियाँ-बर जकाँ हमर चेहरा निहारए लगला। सुचित भाइक नजैरिक दौड़ देख अपनो सियनगर बर जकाँ रूप बना हुनका आगूमे ठाढ़े रहलौं।
 

-जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन।
मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह।
 

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