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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक   

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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गढ़-नारिकेल उपन्यास-त्रयी पहिल उपन्यास "सहस्रशीर्षा" क बाद दोसर उपन्यास

गजेन्द्र ठाकुर

द ........ फाइल्स

(पहिल खेप)

हमर नाम छी………..

आ गाम “गढ़ नारिकेल”

शुक्र दिन ऑफिससँ दस बजे रातिमे घुरलहुँ तँ डेरा पहुँचिते बेटी स्वागत केलक। बुझा गेल जे रूसल अछि। पुछलिऐ की भेल तँ ओ मोन पाड़लक जे अझुका सिनेमा देखबाक प्रोग्राम छलै। हमर एहि जवाबपर कि देरी भऽ गेल अछि, थाकल छी ओ सोफापर मुँह घुमा कऽ बैसि गेल आ कथुक उत्तरे नै दिअए। कनियाँकेँ कहलियन्हि जे काल्हि सिनेमा चलै चलब से नै हेतै, ८-११ बला शो तँ खतम भऽ गेलै। ओ बेटीसँ पुछि कऽ ओतहियेसँ चिकरि कऽ कहलन्हि जे अहाँ अझुका प्रोमिस केने रहिऐ। हँ प्रॉमिस तँ केने रहिऐ, तकरा पूरा तँ करैये पड़त। फेर मोन पड़ल जे सरकार नाइट शो देखेबाक अनुमति थियेटर सभकेँ देने छै, से आइ काल्हि ११ सँ २ बजेक शो देखि सकै छी। बूक माइ शो साइटपर ऑनलाइन टिकट कटेलौं आ से देखि बेटीक रुसब खतम भेलै। बेटा, कनियाँ आ माँ तीनू गोटे तैयार भऽ गेला आ सिनेमो जे पड़ि लागल से  सनगर। सालमे एक्के दू टा तँ नीक सिनेमा बनै छै बॉलीवुडमे।

दू बजे रातिमे सिनेमा देखि कऽ घुरि रहल छी आकि गाड़ीक लाइट एकटा बड़का होर्डिंगपर पड़लै, आ ओहने बहुत रास होर्डिंग अबैत गेल।

ओइ होर्डिंग सभपर राज्यक महिला मुख्यमंत्रीक कनी अगरायल सन अभयमुद्राबला फोटो छलै। ओना तँ बेटीसँ बेशी रनिंग कमेण्ट्री हमहीं करै छै, रस्ताक सभटा चीजक विस्तृत विवरण दैत गाड़ी चलबै छी, कखनो काल जखन दुनू हाथ छोड़ि खिस्सा आगू बढ़बै छिऐ तँ ओ टोकितो अछि आ सड़कक सभटा कानून, रेड-लाइट, ग्रीन लाइट, जेब्रा क्रॉसिंग, सभटा ओ बुझबऽ लगैए। मुदा ऐ होर्डिंग सभकेँ हम अनठा देलिऐ जे कहबै तँ उनटे सुना देत जे ई सभ हमरा बुझले अछि। मुदा ऐबेर से नै भेल। शीसा खोलि कऽ ओ अचरजसँ हमरासँ पुछलक-

“ई ककर फोटो छिऐ डैडी?”

“ईहो नै बूझल अछि, फलना दीदी मुख्यमंत्रीक फोटो छियन्हि ई”।

“मरि गेलखिन्ह? कहिया?”

कनी काल तँ हमरा बुझबामे नै आएल आ जखन आयल तँ ततेक हँसी लागल जे गाड़ी चलेनाइ मुश्किल। माँ कनियाँ आ बेटाकेँ कहलियन्हि जे ई किताबमे पढ़ैए जे मुइलाक बाद बड़का फोटो आ मूर्ति बनै छै से एकरा भेलै जे मरि गेलीह मुख्यमंत्री आ स्कूलमे एक्को दिनक छुट्टी नै भेटल, आ हमरा संगे ओहो सभ पेट पकड़ि कऽ हँसऽ लगला। बेटी हतप्रभ सभकेँ देखैत रहल। ओ हमरा दिस इशारा कऽ कय स्टीयरिंगपर ध्यानदेबा लऽ कहलक तँ हम गाड़ीकेँ सड़कक कात लगा कऽ गाड़ी ठाढ़ कऽ लेलौं।

“सूतल छलौं की, उठा देलौं।”- फोन घनघनाइए आ ओइमेसँ अबाज बहराइए।

“नै, एते जल्दी कहाँ सूतै छी, कि कोनो जरूरी गप अछि की?”, दू बजे राति कऽ ऑफिसक हाकिम बिना काजेक फोन किए करत, से जकरा इंस्टिंक्ट कहै छै तहिना पुछा गेल छल।

“एम्सक ट्रॉमा सेन्टर आबि सकै छी, आउ तँ फेर आगाँ गप हेतै”।

 

डेरा पहुँचि, कपड़ा पहीरि कऽ ऊबरकेँ बजबै छी, अपन गाड़ी लऽ जायब तँ पार्किंग भेटत आकि नै से सोचि कऽ। गेटपर उतरि कऽ जखने ट्रॉमा सेन्टरक भीतर जाइ छी तँ अबाज अबैए-

“सर, एम्हर छी हम”। हमर इंस्पेक्टर सहैब गालकेँ हाथसँ साटने हमरा शोर करै छथि।

“अहूँ एतै छी, हाकिम बजेने अछि, तेँ हम आयल छी”।

“हमरे दुआरे बजेने छथि, अटैक कऽ देलक गुण्डा सभ”।

“कतऽ, कोना?”

ओ अपन गालपरसँ हाथ हटबै छथि तँ गाल दू टुकड़ी दुनू दिस भेल देखाइत अछि।

“हाँ, हाँ”।

ओ धड़फड़ा कऽ हाथसँ गालकेँ साटि लै छथि।

हम कहै छिएन्हि- “अहिना केने रहू, अहाँकेँ अपन गाल देखा नै पड़ि रहल अछि तेँ अहाँकेँ पता नै अछि जे ….”। चुप भऽ जाइ छी।

कते कालसँ एतऽ छी।

एक घण्टासँ छी। जखन आइ.जी., डी.आइ.जी. सहैब सभ कनी काल पहिने एला तखनसँ कनी ध्यान देलकहेँ। ईहो सभ की करतै, देखै नै छिऐ भीड़।

एकटा डॉक्टर हुनका बजाकेँ लऽ जाइ छन्हि एकटा कोठलीमे। ओइ कोठलीक बाहर सभ हाकिम जमा छथि, सभ गम्भीर मुद्रा बनेने छथि। लोकल थाना बला सभ सेहो आबि गेल अछि। थाना बला सभ सहटि कऽ हमरा लग आबि गेल।

दरोगाजी हमरा अपन मोबाइल निकालि एकटा वी.डी.ओ. देखबैत छथि।

“देखू ऐ गुण्डा सभकेँ, हमरेपर पाथर फेकि रहल अछि”।

हवलदार सहैब टिपलखिन्ह जे ओइ सारकेँ हुजूर जेल पठा देलखिन मुदा गजेरी-चरसी सभ छै। कोनो डरे-भर नै होइ छै। हुजूरे कऽ मोटरसाइकिल थानेपरसँ चोरा लेलकन्हि, ओकर अखनि धरि पते नै चलल छै।

हम दरोगाजीसँ पुछलियन्हि- “अहाँकेँ की लगैए, की ई लॉ एण्ड ऑर्डरक गप छै आकि ऑफिसक काजसँ एकर कोनो सम्बन्ध छै”?

ओ कहै छथि जे मामिलामे पेंच छै। तहकीकात तँ जबरदस्त ढंगसँ हेतै। मुदा ओ सेहो कहै छथि जे मोटा-मोटी ई लॉ-ऑर्डरेक समस्या छिऐ। मुदा देखू…

गाल सीबि देल गेल छन्हि। इन्सपेक्टर साहेब हमरा कहै छथि जे गाल तँ दू टुकड़ी भऽ गेल छलै। सीलाक बाद डॉक्टर एना देखेने छलन्हि।

सभ हाकिम अपना-अपना घर दिस बिदा भेला। सरकारी गाड़ी इंस्पेक्टर साहैब कऽ लऽ गेलन्हि आ हम ऊबरकेँ फोन लगेलौं।

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अगिला दिन भोरे-भोर ऑफिस गेलौं तँ अर्दली इशारामे कहलक जे एकटा इनफॉर्मर आयल अछि। हम कहलिऐ जे ककरोसँ भेँट किए नै करा देलिऐ, एतेक गोटे ऑफिसमे अछि तँ कहलक जे कहैए जे अहींसँ भेँट करत, कहैए जे हमर इलाकाक हाकिम छथि, अनकापर ओकरा भरोस नै छै।

“हमर इलाकाक छी, कतुक्का छी, नामो-गाम बता देलक की?”

“नाम तँ नै बतेलक मुदा कहलक जे गामक नाम कहि दियौन्ह हाकिमकेँ, अपने बजा लेता। गामक नाम कहलक विचित्रे…. किदन तँ “गढ़ नारिकेल”!”

(अनुवर्तते) 

 

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