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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक   

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-२०२१.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

 

अरविन्द ठाकुर-संपर्क-9955155156

पचपनियाँ बनाम बभनियाँ मैथिली:प्रतिरोधक स्खलित स्वर

मैथिली साहित्यक संवादगत परिदृश्य प्राय: निद्रावस्थहि मे रहैत अछि। मौसमी घटना जकाँ किछु विद्यापति-समारोह,त्रैमासिक कथा गोष्ठीसगर राति दीप जरएआ सहित्य आकादेमी द्वारा यदा-कदा आयोजित कवि-सम्मेलन/विचार-गोष्ठी सन किछु ढेला बीच-बीच मे एहि चहबच्चा मेधपजकाँ गिरैत अछि,कादो-सनाएल पानि मे किछु क्षण लेल किछु लहरि उठैत अछि आ थोड़बे कालक बाद चहबच्चाक पानि मोफ़तिया यजमानी चुड़ा-दही भकोसि कए फोंफ काटैत थुलथुलहा पुरहित जकाँ स्थिर आ निद्रावश भए जाइत अछि।इहो मौसमी घटनासभ अपन सीमितता मे समेटल रहि जाइत अछि आ एकरसभक प्रकृति सेहो एकांगी अछि।एकर सहभागी लोकनि कविता,कथा वा आलेखक माध्यम सं अपन बात कहि अपन-अपन ठाम धए लए छथि,श्रोता वा अन्य सहभागी दिस सँ ताली-वाहवाहीक अतिरिक्त कोनो ठोस प्रतिदान नहि आबैत अछि,आन कोनो प्रतिदान अपेक्षितहु नहि रहैत अछि। नतीजा जे ई सभटा उपक्रम एकालाप,प्रलाप,विलाप तक सीमित रहि जाइत अछि,संलापक स्थिति नहि बनाए पाबैत अछि।वाद,प्रतिवाद आ संवादक अभाव मे मैथिलीक द्वन्द्ववाद पुनकिअहि नहि सकल अछि आ तें एकर अधिकांश स्वरुप एकरस आ बासी अछि।

एमहर आबि पोथी प्रकाशनक गति त जोर पकड़लक अछि,किन्तु ओकर वितरण-व्यवस्था अखनिअहु व्यक्तिगत प्रयासहि तक सीमित अछि।पत्र-पत्रिकाक दलिदरा त जेना मैथिलीक भाग्य-रेखहि मे लिखल अछि।जे किछु बहराबितहु अछि,से कोनो ठोस वैचारिकता आ दृष्टिक अभाव मे बीधहि पुड़ैत रहैत अछिकोनो योजना नहि,कोनो नवीन परिकल्पना नहि,कोनो दूरगामी सँकल्पना नहिजे रचना भेटि गेल,छापि देलहु। परिणामस्वरुप मैथिली साहित्यक परिदृश्य संवादहीनताक नियति भोगबाक लेल अभिशप्त अपन स्थैर्यक ठाम पर कोनो पाथर जकाँ अचल पड़ल रहैत अछि आ अपन एहि दयनीय दशा पर कानिअहु नहि पाबैत अछि।ई संवादहीनता,ई विमर्षहीनता कोनो भाषा-साहित्य लेल बहुत खतरनाक आ मारूक होइत अछि।भाषा-साहित्यक जीवंतता, विकास आ आधुनिकीकरण लेल ई आवश्यक छै जे ओकर वैचारिकता,ओकर रचनात्मकता सतत प्रवहमान रहए। लेखन व्यक्तिगत कर्म होइतहु सामुहिकताक मुखापेक्षी अछि। तें लेखक कें बुझल रहबाक चाही जे ओकर चारुकातक लेखनक परिदृश्य की छै,के सभ लिखि रहल छथि,की लिखल जाए रहल छै,केना लिखल जाए रहल छै आ तहि मे ओकर अपन स्थिति आ स्थान की छै,ओकर अपन दिशा ठीक छै वा ओकरा मे कोनो परिवर्तन वांछित छै।लेखक जहि भाषा मे लिखि रहल छै,ओहि भाषा सँ सम्बन्धित आन्तरिक आ वाह्य गतिविधि की छै, तहि गतिविधि सँ भाषाक लाभ भए रहल छै वा हानि,तहु पर नजर राखब आ अद्यतन रहब सेहो लेखक लेल आवश्यक छै।लेखकक अपडेट रहब ओकर लेखन आ भाषादुनू कें परिमार्जित करए छै,आधुनिकता आ प्रगतिशीलता सँ लबरेज करए छै।किन्तु,जँ सुचना-संवाद सँ अपडेट रहल त से मैथिली की भेल!

सूचना-संवादक अभाव मे मैथिलीक अधिकांश लेखन एकभगाह आ असंतुलित भेल अछि।भावयित्री आ कारयित्री दुनू क्षेत्र मे अराजकता व्याप्त अछि।इतिहास-लेखन आ वैचारिक क्षेत्र त झूठ,प्रपंच आ क्षुद्रताक जीवन्त दस्तावेजहि बनल छै।प्रतिरोधी आ यथार्थवादी लेखक-शक्तिक अभाव मे भाषा आ क्षेत्रकसत्यठोह पाड़िकए कानि रहल छै।कोय ओकर नोर पोछनिहार नहि।इतिहास-लेखनक कुरुक्षेत्र मे प्रतिद्वन्द्वीविहीन भेल धृतराष्ट्र अपन सार आ सखा-संतानक सँग उन्मत्त भेल अपन पैशाचिक-विजयक घोष कए देने छै।मनमानीक इ स्थिति छै जे एकटा सबाल्टर्न-शकुनी-इतिहासकार भुइयांगत यथार्थ कें आम आदमीक नजरि सँ देखबाक दाबी ठोकैत एकर पुनर्लेखनक गप करए छथि आ एहि क्रम मे हुनक सम्पूर्ण शक्ति अपन जातिक श्रेष्टताक वर्णन सँ होइत हुनक अपन व्यक्तिगत/पारिवारिक कुलीनताक स्थापना आ ओकर दस्तावेजीकरण मे खर्च भए जाइ छै।इतिहासक सामाजिकताक नाम पर एहन विकट निर्लज्जताक लिखित प्रदर्शन होइ छै आ एहि समाजविरोधी विध्वंसक लेखन पर कतहु सँ कोनो प्रतिरोधक स्वर नहि अभरए छै। प्रतिपक्षक अक्षमता आ एकरा प्रति रूचिहीनता कें दोष सेहो देल जाए सकए छै,किन्तु एकर एकटा प्रमुख कारक संवादहीनता सेहो छै,जे साहसिक आलोचना कें पुनकए नहि दए रहल छै। नतीजा छै जे निहित स्वार्थी तत्वसभ निधोख भए कए मैथिली साहित्य न्यायालय सँ एक्स-पार्टी डिक्री लेने चलि जाए रहल छै।

शैलीक एकटा उक्ति छनि जे,”जेना एकटा निराश चोर चोरसभ कें पकड़निहार बनि जाइत अछि,तहिना निराश भए कए लेखक आलोचक बनि जाइत अछि। शैलीक एहि उक्तिक अर्थ लोक अपन-अपन आग्रहक आधार पर निकालि सकए छथि।एहिनिराशाक व्याख्या सेहो भिन्न-भिन्न प्रकार सँ कएल जाए सकए छै।कहल जाए सकए छै जे ईनिराशालेखकक अपन लेखनक नि:शक्तता,अपंगता वा असफलताक परिणाम छिअए।किन्तु एकर एकटा दोसरहु पक्ष छै आ खासकए मैथिलीक प्रसंग मे ओ बेसी प्रासंगिक आ उपयुक्त बुझाइ छै।एतय जाति-बिरादरी, गोधिया-दियादवादक किल्लत सँ ग्रस्त कतेकहु सशक्त लेखक आ ओकर लेखन कें यत्नपूर्वक अनठिआएल गेल छै आ षड्यन्त्रपूर्वक ओकरा चिन्हार नहि हुअए देल गेल छै।तें ईनिराशासशक्त,सार्थक आ प्रगतिशील लेखनक अछैतहुपहचानमोजरनहि भेटबाक परिणाम बेसी बुझाइ छै।गैर-मैथिल लेखकसभक सँग त ई अनदेखी परिपाटी जकाँ भेलहि छै,गुट-गिरोह सँ अलग रहनिहार मैथिलहु लेखक कें ई दण्ड भोगए पड़ल छनि।आवश्यकता एहि बातक रहए जे शैलीक एहि उक्ति कें चरितार्थ करैत एहि दुनू प्रकारकनिराशाक परिणामस्वरूपचोर पकड़निहारआलोचकसभक उत्पत्ति होइतए आ यथास्थिति कें खुल्ला चुनौती नहि त चुनौतीक आगमनक आशंकाजनित भय होइतए।अखनि तक एहन अपेक्षित स्थिति नहि आएल अछि।कामना करी जे ई उत्पत्ति जँ अखनि तक नहि भेलए त आगु हुअए,निकट भविष्यहि मे हुअए।

फ़ारसीक एकटा कहावत छै—“अदावत के आंखि मे हुनर बहुत बड़का ऐब छै। मैथिलिक पुरस्कार-सम्मान-लुटेरा समुदायक विभिन्न गुट-गिरोहक सँचालक आ ओकरा बलें वर्चस्वशाली बनल लोकक फोंक-भयभीत मानस कें हुनरमंद लोकक अस्तित्व खतरा जकाँ बुझाइत आएल छै आ ओ एहन तत्त्व सँ एन-केन-प्रकारेण छुट्टी छोड़ाए लिअए चाहए छै।एहि लेल ओसभ हुनर कें हतोत्साहित,भ्रमित करबाक लेल कोनहुटा छल-प्रपंच बांकी नहि छोड़य छथि।

एहन सन संवादहीन,संवेदनहीन आ मौन-प्रपंचमय परिदृश्य मे सुभाष चन्द्र यादवकगूलोक प्रकाशन आ एहि मे प्रयुक्त भाषा केंपचपनियाँनामकरण करैत एहि पर आलेखक माध्यम सँ अपन पक्ष राखब एकटा एहन घटना छै,जेकर मैथिलि-थाना द्वारा सँज्ञान लेब,डायरी मे दर्ज करब,ओकर तहकीकात करब आ निष्कर्ष पर पहुंचब बहुत आवश्यक छै।एहि घटनापर सकारात्मक विमर्षक मार्ग प्रशस्त करब मैथिली भाषा आ एकर लेखन कें आत्मावलोकन,आत्मपरीक्षण आ आत्मशोधन/आत्मपरिष्करणक अवसर प्रदान करत।एहि अवसरक लाभ लेबाक चाही। सुभाष जीक आलेख एहि बात कें उजागर करए छै जे साहित्यक दुनियां मे सभकिछु पवित्र आ पूजनीय नहि छै,आनहि क्षेत्रसभ जकाँ एतहु अपवित्र,अशोभन आ निन्दनीय तत्त्वक उपस्थिति रहए छै।मैथिलीक परिपेक्ष्य मे त ई उपस्थिति प्राणघातक मात्रा मे,जानमारू बहुमत मे छै।

सुभाष जीक आलेख विमर्ष कें जगैबाक लेल यथेष्ट खोराक दैत अछि,यद्यपि कि हुनकर कथनसभ मे बहुत रास झोलसभ सेहो अछि।जहि आलेखक माध्यम सँ ओ अनेक रास प्रश्न उठबए छथि,तहि आलेख पर सेहो अनेकानेक प्रश्न उठैत अछि।पहिल झोल त नामकरणहि मे अछि।ओ कहए छथि जे कोनो सोल्हकन सँ पुछला पर ओ अपन मातृभाषाठेठीबतबैत अछि आ शिक्षित सोल्हकन कहैत अछि जे,’मैथिली त बाभनक भाषा छिऐक। सोल्हकन एकराठेठीकहैत अछि।ठीक!शिक्षित सोल्हकन एकरा की कहैत अछि,से ओ नहि लिखलनि। हमर व्यक्तिगत अनुभव अछि जे सोल्हकनहि नहि,पढल-लिखल सम्पूर्ण मैथिलेतर जातिक लोक एकरा सभदिनतिरहुता कहैत आएल अछि,आइअहु कहैत अछि। हं,पुछला पर ई प्रतिक्रिया अवश्य भेटैत अछि जे मैथिल ब्राह्मणक आग्रही प्रभाव मेतिरहुताकेंमैथिली’ सँज्ञा दए देल गेल अछि।ई प्रतिक्रिया एकदम वाजिब आ तार्किक छै आ एकर प्रमाण छै जे आइयो एकर लिपि केंतिरहुता लिपिकहल जाइ छैकिछु एजेन्डाजीवी कें छोड़िकए।तखनि सुभाष चन्द्र यादव जी एकर नामकरणपचपनियाँकोन आधार पर कएलनि?हुनक आलेख मे एहि प्रश्नक उत्तर नहि अछि। ओ लिखए छथि जे सुपौल,सहरसा,मधेपुरा,अररिया तथा पुर्णियाक सवर्ण, पिछड़ा, दलित एवं सर्वहारा अर्थात सभ जाति आ वर्गक लोक एहि मैथिली(पचपनियाँ) मे बाजैत अछि।ई बाइ मे देल वक्तव्य जकाँ अछिकोनो मौलवीक फ़तवा जकाँ।ध्यातव्य जे जेकरा सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली मे पचपनियाँ कहल जाइ छै,तहि मे सवर्ण आ दलित त नहिए टा आबैत अछि,यादव सेहो एहि गोल मे सम्मिलित नहि अछि। सर्वहाराशब्द सेहो एहि सम्पूर्ण समुदाय कें नहि समेटैत अछि।एहि परिपेक्ष्य मे एकर नव-नामकरणसबजनियांबेसी उपयुक्त होइतए।जँ क्षेत्रीयताक विभाजन कें आधार बनाबी,तखनिअहु एकर नामकरणकौशिकीकिंवाकौशिकी मैथिलीहएबाक चाही छल।ओना एहि नामकरणोत्सव मेमैथिली’ सँज्ञाक प्रयोगहि किऐ हुअए? एतबे नहि,एहि नामकरणोत्सवक स्वघोषित पौरोहित्य ग्रहण करबाक धड़फड़ी मे सुभाष चन्द्र यादव जी एहि क्षेत्र-विशेष कें मिथिला कहि अनजानहि मे वएह एजेन्डा कें विस्तार दए दैत छथि,जेकरा लेल किछु मुर्दा-संस्कृतिक उघवाह अतीतजीवी लोकनि ढेका खोलिकए झालि बजा रहल छथि।

डा मेघन प्रसादक सँग एकटा साहित्यिक कार्यक्रम मे कएल गेल अपमानजनक व्यवहार निकृष्टता आ अधमताक श्रेणी मे आबैत अछि आ एहन कुकृत्य करनिहार कें विद्वान की,मनुष्यहु नहि मानल जाए सकैत अछि। नीक आ प्रशंसनीय बात जे सुभाष जी एहि कुकाण्ड सँ विचलित भेला आ तत्क्षण ओकर प्रतिकार कएलनि।किन्तु सुभाष चन्द्र यादव कोनो छोटभैया-नेता किंवा सियासी-भोलंटियर नहि छथि।ओ लेखक छथि आ लेखक अपन प्रतिकार वाणी-मात्र सँ नहि,लेखनक माध्यम सँ करए,से अपेक्षित रहैत अछि।मेघन-काण्ड भेला कतेकहु वर्ष बीत गेल,एहि अवधि मे सुभाष जी बहुत किछु लिखलनि,किन्तु एहि घटना पर लिखल हुनकर कोनो सँस्मरण,कोनो रिपोर्ताज, कोनो निबन्ध व्यक्तिगत रूप सँ हमरा त देखल-पढल नहि भेल।ओ कहि सकए छथि जे सभटा पत्र-पत्रिका पर बाभनहिसभक आधिपत्य रहए,तें हुनकर एतद्सम्बन्धी रचना नहि छपल।प्रश्न तखनिअहु अपन ठाम पर छै जे की ओ एहि सोल्हकन-अपमान-काण्ड पर किछु लिखने रहथि,लिखलनि त कतय छपलनि,नहि छपलनि त के नहि छापलकनि आ कोय जँ नहि छापलकनि त ओ स्वयं एकरा प्रकाशित किऐ नहि कएलनि? सुभाष जीक मामला मे त आर्थिक सँकटहु कोनो बहाना नहि अछि।साफ दिखते भी नहीं,सामने आते भी नहींसन गप!मेघन जी सँग भेल कुकृत्यक वाजिब आ असली प्रतिकार त इ रहए जे एहि घटना कें लिखिकए दस्तावेजी रूप देल जएतए आ एकर प्रस्तोता अपन कलम कें नोर आ लहू मे बोरि-बोरि लेखन-शक्तिक एहन सदुपयोग करितथि जे पढनिहार-सुननिहार एहि करतूत पर सिहरि उठितए,अपरिमित आक्रोष सँ भरि जएतए आ करतूतक दोषी कुकर्मीसभ पर असीम घृणा सँ थू-थू करितए।से नहि कए,बाभनहि राजकमल चौधरीक अभिनन्दन-लेखन करब हुनक प्राथमिकता मे किऐ अएलनि? देश मे लोकतंत्र छै,एकरा द्वारा प्रदत्त अधिकार छै,तें जवाबतलबी हएबाक चाही।किन्तु अधिकारक सँग कर्तव्य सेहो जुड़ल छै आ तें उत्तर मांगनिहार कें उत्तर देबाक उत्तरदायी सेहो हुअए पड़ए छै।

लेखनक प्रारंभिक दौर मे कोनो लेखक अपन लेखन-भाषाक राजनीति वा आन गतिविधिसभ सँ अनभिज्ञ आ निर्लिप्त रहैत अछि। ओकर लेखकीय चेतना मूलत: अपन लेखन पर केन्द्रित रहैत अछि।तें अपन आरंभिक लेखन मे आनहि लेखकसभ जकाँ सुभाष जी जँ बभनियाँ मैथिलीक प्रयोग कएलनि आ साहित्यिक गोष्ठी,सेमिनार आदिक सँ-संग अपन दैनिक बैठकासभ मे बाभनहिक सँगति धएने रहला,त ई स्वाभाविक मानल जए सकैत अछि।किन्तु तिरहुता किंवा ठेठी (जेकरा ओ आग्रहपूर्वक पचपनियाँ कहए छथि) मे लिखबाक बेगरताक भान त हुनका मेघन प्रसादक सँग भेल बेहुदगीक बादहि भए जएबाक चाही छल।दुर्भाग्य जे तहिया हुनका ई इलहाम नहि भेलनि।तेकर बादहु हुनक लेखनक माध्यम बभनिअहि मैथिली रहल आ हद त ई जे पचपनियाँ मैथिलीक एजेण्डा उठाएब आ ओकर तरफ़दारी-पैरोकारी करबाक लेल सेहो ओ बभनिअहि मैथिली कें अपन माध्यम किंवा औजार बनएलनि।की हुनका सन अति-प्रबुद्ध लेखक कें ई सामान्य सन बात नहि बुझल भेलनि जे कोनो भाषिक-परम्परा (लेखन, शैली,वर्तनी) मात्र मुद्दा उठएला,तहि पर नाराबाजी वा हू-ले-ले  कएला वा कोनो अज्ञात अस्तित्व सँ ओकर मान्यता,स्वीकृति वा प्रमाणपत्रक याचना कएला सँ नहि,ओहि मे लेखनक निरन्तरता सँ बनैत अछि? एहि प्रसंग मे दू टा लेखक त विषयगत रोल माडलक रूप मे मैथिली मे अपन उपस्थिति दर्ज कएनहि छथि आ सुभाष जीक दृष्टि-परिधिअहु मे हएबहि करता।तारानन्द वियोगी अपन लेखन मे बहुत कुशलताक सँग अपन गाम-घर-परिवारक अनेक शब्द आ वाक्यांशक प्रयोग करए छथि आ बभनियाँ मैथिली कें एकटा अलग तरहक ग्राम्य-सौन्दर्य सँ सज्जित कएलनि अछि,त जगदीश मंडल अपन विशेष वर्तनी आ शैलीक माध्यम सँ विपुल लेखन कएलनि अछि आ एकटा बेछप उदाहरणक रूप मे स्वयं कें प्रस्तुत कएलनि अछि।जगदीश मंडल एतबहि पर नहि रुकला अछि।ओ अपन विशिष्ट शैलीक निर्माणक सँग-संग ओकर विकासक लेल एकटा वृहत बौद्धिक-समुदाय कें अपन सँग लए कए चलए छथि आ साहित्यिक-सहकारिताक अनुपम प्रयोग मे सफल भेल छथि। हिनकासभ सँ प्रेरणा लए मे सुभाष जी कें के रोकलकनि?दोसर बात ई जे कोय केकरो बात अहिना नहि मानि लए छै।तें प्रेरणा देबए सँ पहिने स्वयं मे प्रेरणाक स्रोत उत्पन्न करए पडए छै।प्रेरणाक सत्त्व ई छै जे एकर महत्व दए सँ बेसी ग्रहण करए मे छै। अहांक वैचारिक व्यक्तित्व प्रेरक अछि तखनहि कोय अहां सँ प्रेरणा ग्रहण करत।प्रेरणादायी व्यक्तित्व बनबाक लेल भीमराव अम्बेडकर महाड़ मे जल-सत्याग्रह चलैलनि, नासिक मे कालाराम मन्दिर मे दलित-प्रवेश लेल आन्दोलन कएलनि।भारतक सँविधानक निर्माणक सँ-संग दलित-अस्मिता आ आन-आन विषय पर प्रचूर लेखन कएलनि।ठीक छै जे सभक तुलना अम्बेडकर वा गांधी सँ सँ नहि कएल जएबाक चाही,किन्तु जे स्वयं के एहि परम्परा-पुरुषक रूप मे प्रस्तुत करए चाहए छथि,हुनका सँ त ई पुछलहि जाए सकैत अछि जे अहां लग अपन पूंजी की अछि?इतिहास कें बिसरब,त ऐतिहासिक भूल करब।जहि सर्वहाराक गप एहि प्रसंग मे आएल अछि,ओकर नायक के रहए,के छै? ओ केकरा सँ प्रेरणा ग्रहण करत?एक समय रहए जे कोय एहि समाज कें अपन नायक उधार देबाक लेल तैयार नहि रहए।किऐ? एकमात्र कारण ई जे ई सर्वहारा अपन नायक के चुनब,मानब छोड़ि अपन बुद्धि-विवेक कें  ओकरहि सभक चौखटि पर राखि आएल,जेकरा सँ ओकरा लड़बाक रहए।दुर्भाग्य रहलए जे ई वर्ग कहियो बुद्ध कें पकड़लक,कहियो कबीर,कहियो रैदास कें,कहियो ज्योतिबा फुले कें,त कहियो बिजली पासी,बिरसा मुण्डा,झलकारी बाई,सुहेलदेव कें आ अन्तत: फेर पुरोहिती-चौखटि पर घुरि आएल। कौशिकी-कक्षक भीम केवट आ लौरिक मनियार सोल्हकन-लोकसमाज स्मृति मे यथावत छथि,किन्तु सोल्हकन-अभिजात्य लेल त्याज्य किऐ छथि?प्रारम्भिक दिन जेहन हुअए,किन्तु सुभाष जी सबदिन एलिट बनल रहबाक लेल प्रयासरत रहलाह अछि।एहि क्रम में ओ पचपनियाँक पौध लगबए सँ पहिने जमीन तैयार करबाक अनिवार्यता कें बिसरि गेल बुझाइ छथि।से नहि त पहिने  उगरी महाराज,सोनाय महाराज,चिल्का महाराज,लाला महाराज,लालमैन महाराज,छेछना डोम,दीना भदरी,अमर बाबा आ सलहेस इत्यादि  हुनक लेखनक परिधि मे किऐ नहि अएला।ई सभ नायक आन-आन जातिक छथि,किन्तु यादवहु मे त लौरिकक अलाबे कारू खिरहरि,बीशू राउत,महिनाथ आदि लोकनायक भेला।जखनि अपन प्रतिरोधक अभिव्यक्ति लेल अहां जाति कें आधार बनबए छिअए त अपन जातीय आधार कें त पहिने सुदृढ करू।

देश स्वतंत्र अछि,लोकतंत्र कें अंगीकृत कएने अछि आ देशक आधुनिक भूगोल प्रशासनिक दृष्टिकोण सँ राज्य, प्रमण्डल,जिला,अनुमण्डल,प्रखण्ड आदि  मे विभक्त अछि। एहन स्थिति मे आधुनिक व्यवस्था कें तिलांजलि दएत कोनो कपोल-कल्पित पुरातनकालक मिथकीयमिथिलानामक यूटोपियाक कामना करैत ओकरा पुनर्स्थापित करबाक चौल करब अंगुरी पर गिनल जाएबला किछु अतीतजीविताक कारोबारीसभक काज अछि आ ई बात मैथिलेतर समुदाय त बुझितहि अछि,मैथिलक बुझनुक बहुमत सेहो एहि यथार्थ सँ अनभिज्ञ नहि अछि।एहन स्थिति मेपचपनियाँक पैरोकारी करैत-करैत सुभाष चन्द्र यादव जी कें एहि यूटोपियाक गह्वर-पूजन मे भक्तिपूर्वक साष्टांग दण्डवत भए झालि बजाएब केना सोहएलनि?जखनि अनेक जिलाक गजेटियर लिखनिहार महान अण्वेषी इतिहासकार पी सी रायचौधुरी सहरसाक गजट लिखैत काल एहि क्षेत्र-विशेष कें कोनो मिथकीय-राजक हिस्सा मानए मे सशंकित भए गेला,एकरा सर्वकालीन स्वतंत्र क्षेत्र कहलनि,तखनि इतिहासक ककहरा सँ अनभिज्ञ कोनो व्यक्ति एहि तरहक भ्रम पसारए मे सहायक केना भए सकैत अछि? एतबहि नहि,ओ प्रकारान्तर सँ ईहो प्रस्ताव दएत बुझाइ छथि जे जँ हुनकपचपनियाँक एजेण्डा स्वीकार कए लेल जाए त ओ एहि सँ जुड़ल राजनीतिक वा भाषाई आन्दोलनक सहभागी भए जएता।विचित्र द्वैध,अपच अतिरेक आ ब्लैकमेलिंग सँ भरल अछि ई गप,जाहि मे धमकीक अढ सँ परस्पर लाभ बांटि गठबन्धन करबाक प्रस्ताव अन्तर्निहित अछि। आ की ई सुभाष जीक कोनो पराजय-बोध-विशेष अछि जे अन्तत: मनुष्य कें याचनाक मुद्रा मे लए आबैत अछि?कनी काल लेल मानि लेल जाए जे दातालोकनि(?) दिस सँ हुनक पचपनियाँ कें सम्मान देब गछि लेल गेल,हुनका साहित्य अकादेमीक वांछित सम्मान सेहो दए देल गेलनि।आब ओ की करता? अपन घरक ताखा पर राखल मिथिला-राज उतारि सम्मानदाता-लोकनि कें हस्तगत कए देता? कतहु नुकाए कए राखल अलादीनक चिरागक जिन्न कें प्रकट कए अतीतक पुनर्स्थापनक एहि तमाशा कें महा-आन्दोलन मे तब्दील कए  घमासान मचाए देता? एहि काजक लेल अपन लेखकीय वा सामान्य जीवन मे कतेक लेखक वा समर्थक तैयार कएने छथि ओ?

तिरहुता (जेकरा पचपनियाँ कहल गेल अछि) कें आदरविहीन (non-honorific) कहब सेहो अज्ञानतावश ओकर अनादर करब थिक। ठेठी आदरक अपन तरीका छै आ से तरीका देखबाक लेल कोनो अणुवीक्षण यंत्र (microscope)क बेगरता नहि छै।एकतुरिया वा छोट लेल जँ ‘तूं जेबही’ कहल जाइ छै,त जेठक लेल सम्मान देबाक स्थिति मे ‘तूं जेबहक’ कहल जाइ छै।एहन अनेक उदाहरण देल जाए सकैत अछि,जाहि पर सुभाष जीक ध्यान नहि गेल हुएनि,से सम्भव नहि ; अपन स्थापना कें सुदृढ करबाक लेल ओ एकरा जानि-बुझिकए अनठिअएने छथि,से बात अलग।अपन ‘गूलो’ मे ओ स्वयं ठेठीक आदरसूचक ठाठ पसारने छथि।‘घुरि कए आबै छियह’,’हौ!तू बड़ कंजूस छहक!’,’भैया,अपने टा खाइ छहक’,’बबा,कहिया कीन देबहक’,’पांच सौ लाइब कए देलियह।सबटा चाटि गेलहक आ पांच टका निकालै मे दांती लागै छह।‘ आदि सम्मानसूचक(honorific) नहि छिऐ,त की छिऐ?ई बात सही छै जे एहि सर्वहारा तिरहुता मे विकारीक उच्चारणबला कोनो शब्दक स्थान नहि छै आ तें ‘भ गेलै’,‘क देलकै’ आदिक स्थान एतय नहि छै ; किन्तु एकरा ‘भाए गेलै’, ‘काए देलकै’ लिखब त जानि-बुझिकए एकरा विकृत करबाक कुचेष्टा छिऐ। अजीब बात जे अपन आलेख मे सुभाष जी गर्वपूर्वक एहि प्रयोगक चर्चा करए छथि,जखनि कि ‘गूलो’ मे कएकठाम ‘कए-भए-लए’क प्रयोग करए छथि।ई त ‘गतानुगतिकता’क विरोधक नाम पर ‘नव-गतानुगतिकता’क प्रतिपादन करबाक,नींव राखबाक उपक्रम बुझाइत अछि।उपरोक्तक  जे उच्चारण कौशिकी जनपद मे होइ छै,तहि अनुरूप ओकरा ‘भए गेलै’, ‘कए देलकै’ लिखब बेसी उपयुक्त छै।ई अलग बात जे ‘गूलो’ मे इएह टा प्रयोग नहि छै।गूलोक प्रयोगसभ मिनजुमला खाता छिऐ,जहि मे भाषा,बचल-खुचल विभिन्न प्रकारक तर-तरकारी सँ बनलडलना’(mixed vegetable) भए गेल छै।एहि मे ‘काए’ के सँग-संग ‘कए’ के प्रयोग सेहो भेल छै आ ठाम-ठाम भेल छै।जँ ‘काए’ आ ‘भाए’ लिखल गेलए तखनि ‘लए’ किऐ?एकरहु ‘लाए’ हएबाक चाही छलए।लेखक एहन अनेक दोष टंकक वा प्रकाशकक माथ पर थोपि सकए छथि,किन्तु पाठक कें कोनो आन ठाम देल स्पष्टीकरण पढबाक फुरसत कहां छै।प्रयोग हएबाक चाही,एकर स्वागत! प्राय: प्रत्येक लेखक प्रयोग करैत अछि।किन्तु प्रयोग करैत ई सजगता त हएबाकहि चाही जे प्रयोग युक्तिसंगत हुअए, पाठकक मगज मे आसानी सँ घुसि जाइ,अराजकता नहि पसारए। ‘गूलोक पुनर्पाठ कयला पर केदार कानन कें कोनो असुविधा नहि भेलनि’ सन-सन तर्क बेतुक छै।केदार कानन एहि पोथीक प्रकाशक छथि आ एकर भुमिका सेहो वएह लिखलनि अछि।स्वाभाविक आ अपेक्षित छै जे ओ एकरा बेर-बेर पढथि।किन्तु पुनर्पाठक ई अपेक्षा सामान्य पाठकहु सँ किऐ राखल जाए? ईहो आवश्यक नहि जे सभक बौद्धिक-स्तर केदार काननहि जकाँ उच्चस्तरीय हुअए।

अनुभव कहैत अछि जे मैथिलीखिधांसीक ओस्तादलोकनिक खान अछि। डेग-डेग पर भेटता।केकरो खिधांस करए लागता त एहि पुण्य-प्रयास मे आकाश-पाताल एक कए देता।खिधांसक वेध-लक्ष्य जँ कोनो विचार वा स्थापना छै त ओकरा अपन उद्गम-माताक कोखि मे घुरि जएबाक लेल बाध्य कए देता आ जँ लक्ष्य(Target) पर कोनो व्यक्ति छै त ओकरा रौरव नर्क गेनहि कल्याण।किन्तु खिधांसीक एहि ओस्तादलोकनि कें हुनकर अपनहि कहल बात कें लिखिकए व्यक्त करबाक आग्रह करिअनु त अहांक आग्रह अनन्त-अनन्त जन्म तक अपन पालनक प्रतीक्षा करैत रहि जाएत।  कोनो व्यक्ति ताल ठोकिकए जे बात मौखिक तौर पर कहि रहल छै,तेकरा लिखित रूप मे व्यक्त करए मे ओकरा की दिक्कत? दिक्कत छै। दिक्कतहि टा नहि छै,खतरा सेहो छै।मौखिक अभिव्यक्ति मे अपनहि कहल बात सँ नठि जएबाक सुविधा छै।एहि सुविधाक लाभ लैत मूंहक अतिसार सँ ग्रसित मानुस बेर-बेर बोकरि सकैत अछि आ अपन वमन सँग अनर्गल प्रलापक मल-मुत्र विसर्जन कए सकैत अछि।लिखिकए अपन बात कहए मे मारिते रास खतरा छै।पहिल खतरा छै—मारि खएबाक।ई खिधांसीक ओस्ताद लोकनि प्रकटत: ‘बुधिक बखारी’ भनहि होथु,हुनका अपनहु बुझल छनि जे ओ वस्तुत: ‘फोंकहा सँठी’ सँ बेसीक औकात नहि राखए छथि।ई  सभ ओस्तादलोकनि पछुआरक वाणी-वीर छथि।सम्मुख होइतहि चरण गहि ‘नाथ-प्रभु-बापा’ कहि लम्बवत भए जेता,उठिकए देह झाड़ि लेता आ पछुआर जाइतहि फेर वएह गारि-कीर्तन।जे से!कोनो कथन एक बेर लिखित भेलाक बाद दस्तावेज भए जाइ छै,प्रकाश मे आबितहि अपरिवर्तनीय भए जाइ छै। लिखनिहार लेल अपन बात सँ नठबाक,पलटबाक कोनो गुंजाइश नहि रहि जाइ छै।जँ एहि मे कोनो आरोप छै त ओकरा प्रमाणित करबाक जिम्मेदारी आरोपकर्त्ता लेखक पर स्वत: चलि आबए छै। तथ्यहीन बात लिखला पर ओ सार्वजनिक निन्दा आ हास्यक पात्र बनि जाइ छै।ओकर समकालीन ओकर वयस,वरिष्टताक लिहाज कए भनहि दम साधि लिअए,चुप रहि जाइ,किन्तु अगिला पीढी ओकरा पर कोनो मुरब्बत नहि करत,ओकरा छील देत।कखनियो काल एहनहु होइ छै जे शब्दक मधुमय आवरण मे गरल परसबाक ओस्तादी कएल जाइ छै।किन्तु एहि सँ खतरा टरैत नहि छै,कनी विलम्बित भनहि भए जाओ। अपन बात कहबाक लेल लेखकक एक-एक शब्द-चयन,वाक्य-विन्यास आदि लेखकक मूल मंशा,ओकर वैचारिक-मानसिक स्थिति कें प्रकट कएअहि दए छै।बुझनुक पाठक लग अभिधा-व्यंजना-लक्षणा वा व्याज-स्तुति-वक्रोक्ति आदिक मायाजाल कोनो काजक नहि रहि जाइ छै। अपन शिल्प-शैली वा कलात्मकताक बल पर अहां अपन लेखन कें केतबहु आवरण दिअओ,ओकर वस्तुगत अर्थ-यथार्थ सुधि-पाठक तक पहुंच जाइत अछि। अहां द्वारा प्रयुक्त एकटा शब्द,एकटा वाक्य,एकटा अनुच्छेद अहांक लेखकीय टा नहि, अहांक व्यक्तिगत व्यक्तित्वक वास्तविकता कें नीक जकाँ प्रकट कए दएत अछि।जँ रामलोचन ठाकुर अपन पोथीबेताल कथाहरिमोहन झा कें समर्पित करैत आनहि परम्परावादी पण्डा-पुरहित साहित्यकार जकाँ हुनकाहास्य सम्राटकहए छथि त एहि एक शब्द मात्र सँ हुनकर मार्क्सवादी चोला आ व्यंग्य-हास्यक भेद सम्बन्धी हुनकर साहित्यिक समझ दुनू धराशायी भए जाइत अछि।जखनि महापण्डित गोविन्द झा लिखए छथि जे, ‘अधिकतर ग्राहक भेला समृद्ध वृद्ध भूमिहार ब्राह्मण,एकर प्रेरक भेलनि अपन जाति मे कन्याक कमी आ दोसर मैथिल ब्राह्मण वर्ग मे  समएबाक कामना’,त भूमिहार ब्राह्मणक प्रति हुनकर घृणा,एहि जातिक विराट पुरुषार्थ कें लघुकाय करबाक हुनक क्षुद्र-प्रयास आ मैथिल ब्राह्मण(हुनक अपन जाति) द्वारा बेटी बेचबाक अधम आ घृणित कर्मक बादहु ओकर श्रेष्टता(?) कें अवांछित सुरक्षावरण देबाक प्रपंच नुकाइत नहि अछि,जगजियार भएअहि जाइत अछि।जँ डा वीरेन्द्र मल्लिक अपन कविताअथातो काव्य जिज्ञासामे कविता कें मारिजुआना आ किदन-कहांदन घोषित करए छथि त ई बात नुकाइत नहि अछि जे ओ अपन काव्य-रचना सँ पूर्व कथीक सेवन करए छथि।जँ अग्निपुष्प अपन टिप्पणी मे जीवकांत कें एलेन गिन्सवर्गक परम्पराक कवि घोषित करए छथि त हुनक अध्ययन-मननक अल्पता स्पष्टतया देखार होइत अछि।एहन अनेक उदाहरण मैथिली मे अछि,किन्तु तेकर विस्तारण आन कोनो ठाम लेल छोड़ल जाए।एतय आशय एतबे जे अभिव्यक्तिक लेखन-प्रणाली दुधारी तलवार छै,जाहि पर चलब सभाक बुत्ताक बात नहि छै।

आन-आन भारतीय भाषाक साहित्य मे जे स्वतंत्रता,प्राय: किछुअहु कहि देबाक जे छूट आइ उपल्बध अछि, ओ सभ टा वर्त्तमान लेखकलोकनिक अपन अरजल नहि छनि।ई हुनकर पुरखासभ छला जे सभ अपन समय मे एकरा लेल कठिन सँघर्ष कएने रहथि।मैथिली साहित्य मे दुर्भाग्यवश एहन सँघर्षशील पुरखासभ वा त छथिअहि नहि, वा नगण्य छथि।मैथिलीक लगभग शत-प्रतिशत पुरखा लेखकसभ आजादी सँ पूर्व राजा,राजभवन, सामन्त, जमीन्दार आ आजादीक बाद सत्तासीन शक्तिशाली वर्गक आ सम्पूर्ण काल मे धार्मिक-प्रतिष्ठानसभक लेल स्तवन लिखबाक काज मे बाझल रहला आ एहि मे विद्यापति सन नमहर नाम सेहो सम्मिलित अछि।एकरहि परिणाम अछि जे मैथिली साहित्य सँ आक्रोश आ प्रतिरोध अलोपित अछि आ हमरासभ कें आत्मालोचनक परम्परा आ ओकर उप्लब्धिसभ सँ पूर्णतया वंचित रहि जाए पड़ल अछि आ वर्त्तमान वा दू-एक पीढी पूर्वक किछु गिनल-गुथल प्रगतिशील लेखकलोकनि कें प्राय: शून्य सँ अपन शुरुआत करए पड़लनि अछि। आधुनिकता आ ओकर सँघर्ष त वस्तुत: आब विचारणक केन्द्र मे आबि रहल अछि आ सेहो अधिकांशत: मैथिल ब्राह्मणेतर लेखकलोकनिक मारफत। ई स्थिति जातिक नाम पर स्थापित लेखकीय-प्रतिबद्धताहीन समुदाय कें भयभीत आ असहज कए रहल अछि। हुनकासभ कें बुझल छनि जे नबका पीढी कें देबाक लेल हुनकासभ लग ने अपन व्यक्तिगत पूंजी छनि,ने पुरखासभक देल कोनो समृद्ध क्रान्तिकारी विरासत आ जे किछु बटुआ-झोड़ा मे छनि,जँ तेकर नीक सँ जांच-पड़ताल भेलए त ओहिसभक फोंक  आ जीर्ण-शीर्ण अस्तित्व देखार भए जेतए,बेनंगन भए जेतए।तें कोनो नबका विचार आबितहि ओकरा पर अभद्र आक्रमणक कुत्सित प्रयास शुरू भए जाइत अछि।ई काज अखनि लेखनक माध्यम सँ कम,मौखिक रूप मे बेसी आ सोशल साइट्सक अभद्र टिप्पणीसभक माध्यम सँ बेसी भए रहल अछि।प्रसंगवश एकटा कहावत मन पड़ैत अछि—‘प्रेमी लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ चुम्मा-चाटी करए लागए छै  आ वक्ता लग जखनि शब्द सठए छै त ओ खोंखी करए लागए छै। वर्त्तमान स्थिति कें देखैत एहि कहावत मे एकटा टुकड़ी और जोड़ल जाए सकए छै—‘मैथिल लग जखनि शब्द सठि जाइ छै त ओ गारि पढए लागए छै।कहावत मजाकिया छै,किन्तु चेतबए छै।मैथिलीक राड़ी-बेटखौकी बहुत चिन्ताजनक छै। केकरो दोष बताएब ओकर खिधांस करब नहि होइ छै।ई लक्ष्य-तत्वक परिमार्जनक लेल एकटा शुभेच्छा सेहो होइ छै।एकर सँज्ञान लेब त अहां अपन परिमार्जनक दिशा मे बढब,नहि लेब त बूड़ू,लोकक की जाइ छै! ‘निन्दक नीयरे राखिए आंगन कुटी छबायतें कहल गेल रहए। आब ई अहांक इच्छा जे अपन कुतर्कक परम्परा मे नव कुतर्क गढि ली जे ई बात मैथिली मे नहि कहल गेल छै,तें एकरा नहि मानब।

एहिसभ परिपेक्ष्य मे जँ सुभाष चन्द्र यादव लिखित रूप मे कोनो विषय (एहन,जहिपर विवाद हएब सुनिश्चित-सन छै) पर अपन मन्तव्य प्रकट कएलनि अछि त हुनक लेखकीय साहसक (मैथिलीक परिपेक्ष्य मे दुस्साहस) प्रशंसा कएल जएबाक चाही। अनेक रास झोल,अन्तर्विरोध आ लचर प्रस्तुतिकरण (जहिपर पुर्व मे चर्चा कएल गेल अछि) आदिक उपस्थितिक बादहु सुभाष जीक आलेख मे जे बिन्दुसभ उठाएल गेल छै,तेकर अनदेखी करब कठिन त छैहे,एकरा अनठिआएब सेहो मैथिलीक हित मे नहि छै।

आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयक वार्षिक वाद-विवाद सभा मे पूर्व केन्द्रीय मंत्री आ सुप्रसिद्ध लेखक शशि थरूरक महत्त्वपूर्ण भाषण आ पुर्वोत्तर मैथिल पत्रिका मे सुभाष चन्द्र यादवक पचपनियाँ मैथिली पर केन्द्रित आलेख सँयोगवश एकहि समयावधि मे आएल आ दुनूक विषयगत केन्द्रीय तत्त्वउपनिवेशवाद’ सँ जुड़ल अछि। शशि थरूर आक्सफोर्ड मे अपन बात कहैत बेर ई नीक जकाँ जानैत रहथि जे ब्रिटेन भारत आ भारतीय जन-समुदाय सँग कएल अपन अपराधक मुआवजा  भारत कें कहियो आ किन्नहु नहि देत।किन्तु ई जानितहु ओ एहि बात कें रेखांकित कएलनि जे ब्रिटेन द्वारा गलतीक माफीअहि कें यथेष्ट मानल जाएत।शशि थरूरक कहब रहनि जे, ‘जँ दू सौ बरस तक भारत पर निर्दयता सँ राज करबाक एवज मे  ब्रिटेन प्रतिवर्षक लेल मात्र एकहु टका देत त हमसभ सन्तुष्ट हएब।सुभाष चन्द्र यादवक आलेख मे शशि थरूर बला स्पष्टता आ आक्रामकता नहि छनि,किन्तु ओ प्रकारान्तर सँ अनगिनत वर्षक पुरोहिती वर्चस्वक अधीन भेल शोषणक लेल माफी आ प्रतीकात्मक (Token) क्षतिपुर्तिअहिक गप कहि रहल छथि।तेवर जे हुअए,सुभाष चन्द्र यादवक आभार मानल जएबाक चाही जे ओ एहि आलेखक बहन्ने पुरोहिती उपनिवेशक तटस्थ हिसाब-किताब तैयार करबाक लेल मैथिली-समाज कें उद्वेलित कएलनि अछि,भाषा सहित्य पर पड़ल एकर दुष्प्रभावक निष्पक्ष आकलन हेतु खोराक देलनि अछि,एकटा परिणामदायी बहसक परम्परा शुरु करबाक डगर देखएलनि अछि,विषमता सँ पीड़ित वर्त्तमानक वास्तविकता आ प्रायोजित बौद्धिक प्रपंचक अभियानक क्षुद्रता कें उघार कएलनि अछि।ई आलेख एक दिस मैथिलीक औपनिवेशिक सत्ता कें देल गेल चुनौती अछि त दोसर दिस सर्वहाराक हेराएल अस्मिता कें खोजबाक,खोजिकए पुनर्स्थापित-पुनर्प्रतिष्ठित करबाक प्रयास सेहो अछि। एकर स्वागत लेल अभिजात्यक साहित्यिक-दुर्गक द्वारपट खोलल जएबाक चाही।

समय निरन्तर करवट फेरैत रहए छै आ एकर प्रत्येक करवटक सँग जीवन-जगतक कण-कण मे कोनो ने कोनो परिवर्तन होइ छै।एहि परिवर्तन कें रोकब कोनो ताकतक वश मे नहि छै।विवेकवान व्यक्ति वा समाज एहि परिवर्तनक हुलसि कए स्वागत करए छै आ एकर एकटा हिस्सा बनि गतिशीलताक प्रवाहक सहयोगी होइ छै।जे एहि परिवर्तनक अवश्यम्भाविता सँ आंखि मुनने रहए छै,अपन पुर्वाग्रही मन कें अतीतक भूलभुलैया मे अटकएने वर्त्तमान सँ स्वयं कें काटने रहए छै,ओ व्यक्ति वा समाज वा त ठस भेल मृत वा अप्रासंगिक भए जाइ छै वा परिवर्तनक अंधड़ ओकरा उड़िआकए अजायबघरक वस्तु बनाए दए छै।ई परिवर्तन जीवनक प्रत्येक क्षेत्र मे अपन प्रभाव छोड़ए छै आ तें साहित्य सेहो एकर प्रभाव सँ मुक्त नहि रहए छै। नव-स्वतंत्र अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनि कें लागलनि जे हजारक हजार वर्ष सँ हुनकसभक अस्मिता शासन-सत्ताक दुष्चक्रीय आवरण मे विलुप्त-सन भए गेल अछि आ ओकर पुनर्स्थापन हएबाक चाही।एकरा लेल एकटा विराट समूह आन्दोलित भए उठल।प्रत्येक आन्दोलन जकाँ एकरहु अपना लेल एकटा विशिष्ट सँज्ञाक बेगरता बुझएल। नव-अफ्रीकी देशक साहित्यकारलोकनिक ई विराट समूह अपन अस्मिताक आक्रोश-भरल खोज कें गर्वपूर्वकश्यामत्व’ (मूल शब्दनेग्रिट्यूड/Negritude) नाम देने छला। अपनहु देश मे दलित साहित्य अपन भिन्न पहचान बनएलक, जेकर अधिकांश श्रेय महाराष्ट्र कें जाइ छै।मराठी मे एहन साहित्यक विपुल आ प्रभावी भण्डार छै।जँ तिरहुत मे एहन साहित्यिक उभार कें स्वतंत्र व्यक्तित्व देबए लेल एकरा ‘सोल्हकनत्व’ कहि एकटा बहुजन समाज अपन अस्मिता,अपन भाषीय-संस्कृतिक आक्रोश-भरल खोज करैत अछि,ओकरा सर्वस्वीकृति दिएबाक सँघर्ष करैत अछि आ एकर अनेक उपकरण मे सँ एक ‘पचपनियाँ मैथिली’क पैरोकारी मे आवाज उठाबैत अछि त प्रगतिशील शक्तिसभ सँ ई सहज अपेक्षा होइत अछि जे ओ आगू बढि एकरा अपन अंकवार मे भरथि, एकर स्वागत-अभिनन्दन मे तोरण-द्वारहि टा नहि बनाबथि, हुलसिकए एहि प्रवृति कें सशक्त करबाक आयोजन मे सम्मिलित सेहो होथि।मैथिलीअहिक नहि,तिरहुत क्षेत्रीय समाजहु लेल ओ गर्वक स्थिति हेतए,जखनि ब्राह्मणत्वक तुलना मे सोल्हकनत्व कें हेय नहि मानल जएतए,बल्कि ओकरा श्रेष्टत्व प्राप्ति हेतए।ई स्थिति अपन आगमन लेल अभिजात्यक ‘कृपणता’क नहि,उदारताक मुखापेक्षी अछि।

प्रगतिकामी चेतना आ उदार सावधानीक सँग विचार कएला पर ई बुझाएत जे नानाप्रकारक एतिहासिक परम्परासभक आन्तरिक मार्गक अनवरत यात्राक चलते भिन्न-भिन्न जनसमूहक लेल भिन्न-भिन्न प्रकारक भाषाक आवश्यकता होइ छै आ एहि आवश्यकताक आन्तरिक प्रस्फुटन सँ भिन्न-भिन्न भाषा-उपभाषाक प्रकटीकरण होइ छै।ई बात सत्य छै जे एहि क्षेत्र-विशेषक बोली(जेकरा परम्परा सँ तिरहुता वा ठेठी आ सुभाषीय आग्रह सँ पचपनियाँ कहल गेल छै) कें भाषाक स्वरूप दए मे मैथिल ब्राह्मणलोकनिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहल अछि। भनहि एहि सभक पाछू बबुआनी करबाक लिलसा हुअए,यजमानीक नव-क्षेत्रनिर्माणक परिकल्पना हुअए वा अपन जातीय सँस्कृतिक उपनिवेश बनएबाक योजना हुअए,किन्तु ई मैथिल ब्राह्मणलोकनिअहि छथि जे नेपालक जनकपुर,विराटनगर,राजबिराज सँ लए कए बिहारक विभिन्न शहर-नगर-गाम आ झाड़खण्डक रांची,जमशेदपुर सँ लए कए बंगालक कोलकाता कि तेलांगनाक हैदराबाद तक खुब ताम-झाम सँ मैथिली सँ जुड़ल आयोजनसभ करए छथि।मैथिलीक विभिन्न अल्पायु-दीर्घायु पत्रिकासभ हुनकहिलोकनिक प्रयास सँ बहराएल अछि।मैथिली पोथीक प्रकाशनक जे काज भए रहल अछि,ताहि काजक सभटा अगुआ/प्रकाशक  मैथिल ब्राह्मणहि छथि।आइयो एहि भाषा मे लिखनिहारलोकनि मे एहि जातिक लोकक बहुमत छै।स्वाभाविक छै जे  एहि भाषा पर हुनकर सभक लेखनक शैलीक वर्चस्व छै आ तेकर प्रभाव आनहु जातिक लेखकलोकनिक लेखन पर पड़ल छै। हं,तखनि एकर माने ई नहि जे ओसभ स्वयं कें एहि भाषाक निर्माता आ भाग्य-विधाता मानि एकरा अपन उपनिवेश किंवा खबोतर बनाए लेथि।बहुमतक अपन अलग महत्व छै,किन्तु ई ध्यान राखब आवश्यक जेलोकलाजनैतिकतासेहो कोनो चीज होइ छै आ एकर अपेक्षा सभसं बेसी साहित्यकारहि सँ होइ छै। एहि ऐतिहासिक तथ्य कें सेहो नहि नकारल जाए सकए छै जे क्षेत्र-विशेष (तिरहुत कहू,कौशिकी कक्ष कहू वा मिथिला नामक मिथकीय खबोतर मे हड़पि लिअ) आ भाषा-विशेष (तिरहुता कहू,ठेठी कहू वा मैथिली नाम सँ जातीय खतियान मे दाखिल कए लिअ) दुनूक दृष्टिकोण सँ मूल डीही त सर्वहारा समुदायहि अछि। अभिजन समाज वा अग्रजन्मालोकनिक पाही हएबाक तथ्य अपन ठाम पर अचल अछि,भनहि महापण्डित गोविन्द झा सन-सन काव्य-नाटकाख्यानकाख्यायिका-लेख्य-व्याख्यानादि-क्रिया-सर्वविद्या-निपुणै:’ व्यक्तित्व कागज पर डीही-पाहीक भ्रमोत्पादक-मिथ्या-लेखनातिसार करैत रहथि।जखनि हमसभ ई सुनि उत्तेजित भए हाकरोस करए लागए छी जे फल्लां व्यक्ति आन-आन भाषा-बोली कें सुनब किंवा बोलब पसन्द करैत अछि वा हमरासभ सँ अलग वर्तनीक प्रयोग करैत अछि,त वस्तुत: हमरासभक रोष ओहि भाषा,ओहि बोली वा ओहि वर्तनीक उपर नहि,ओकर बजनिहार, ओकर सुननिहार,ओकर प्रयोगकर्ताक प्रति होइत अछि।ई बात प्रमाणित करैत अछि जे हम ओहि व्यक्ति सँ प्रेम नहि करए छी।जँ हमरासभक मन मे प्रेम उपस्थित रहितए त हमसभ ओकर वा ओकरसभक रूचि आ सँस्कारादि कें बुझबाक प्रयत्न सेहो करितहुं।ई जे चिढ हमरासभक मन मे प्रकट होइत अछि,से स्वयं कें विशिष्ट मानबाक,श्रेष्ट मानबाक क्षुद्रभाव सँ उपजैत अछि आ हमरासभकप्रेम-दारिद्र्यक सूचक अछि।एहि प्रेम-दारिद्र्य कें तजने बिना ने हमरासभक अपन कल्याण अछि,ने अगिलाक आ ने भाषा आ लोक-समाजक। हमरासभक पाण्डित्य-बोध कें ईहो बोध रहबाक चाही जे ई भाषाक भदेसपन छै जेरेणुकेंरेणुकाशीनाथ सिंह केंकाशीनाथ सिंहबनबैत अछि।भाषाक अभिजात्य कें पवित्र मूर्ति जकाँ पूजनीय-वंदनीय मानबाक मानसिकता सँ बाहर आबिअहि कएमारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसमकाशी का अस्सीसन कालजयी रचनाक जन्म भए सकैत अछि। बभनियाँ मैथिली सँ पिण्ड छोड़ाइअहि कएगूलोसन अभिनव कृति  रचल जाए सकैत अछि।

एतय एक बेर औरशैलीकें उपस्थित करी। हुनकर कथन मे प्रयुक्तनिराशाक किछु पक्ष पर पुर्व मे चर्चा भेल अछि।एहिनिराशा’ सँ जेआलोचना उत्पन्न होइत अछि,से केहेन हएबाक चाही?एहि पर विचारण सँ पहिने कन्नड़ दलित साहित्यकार डा मोगल्ली गणेशक दलित लेखन पर कएल किछु रोषपूर्ण टिप्पणी पर दृष्टिपात करैत चली।ओ कहए छथि जे, ‘दलित लेखक सौन्दर्य-पक्षक उपेक्षा करैत आइ तक जे लिखैत रहला अछि,ओ एकटा लमगर शिकायती-पत्र बनि गेल अछिअनेक दलित लेखकलोकनि अपन समुदायक अनुभवसभक पुंजी सँ अपन कैरियर चमकएलनि अछि।ई टिप्पणी खासतौर सँ आलोचना पर नहि,सम्पूर्ण दलित-लेखन लेल कहल गेल अछि।किन्तु एहि टिप्पणी मे जेलमगर शिकायती-पत्रकैरियर चमकाएब अछि,से ध्यातव्य अछि। रचनात्मक लेखन हुअए किंवा आलोचनात्मक,ओहि मे उपरोक्त दुनू चीज कथमपि स्वीकार नहि भए सकैत अछि।सदति मन राखए पड़त जे कलपला सँ,याचना सँ,समझौतावादी नजरिया सँ कृष्ण-सन पक्षधर होइतहु धर्म पर स्थिर पाण्डवलोकनि कें किछु नहि भेटलनि।कहियो बुद्ध कहने रहथि जे सँसार मे दुखक मात्रा बहुत अछि आ एहि सँ मुक्तिक लेल ओ करुणा आ अहिंसा सन मानवीय गुणक पैरवी कएने रहथि,जे कालान्तर मे असफल सिद्ध भए गेल।बुद्धक अहिंसक अनुयायी लोकनि कें लुटेरासभ सँ आत्मरक्षार्थ जूडो-कैराटे सन रणकौशल विकसित करए पड़लनि।ई बात सही छै जे युद्ध कोनो विकल्प नहि होइ छै,किन्तु ईहो बात सही छै जे जखनि कोनो विकल्प नहि होइ छै,तखनिअहि युद्ध होइ छै।मैथिलीक साहित्यिक सत्ताखोर,मखमलिया बुद्धिजीवी,अचूक अवसरपरस्त आ यथार्थ-विरहित यथार्थ-स्रष्टालोकनि एहन विकल्पहीनताक स्थिति नहि आबए देथि आ एहि स्थिति कें स्वीकार करथि जे भाषा कें अपन खबोत्तर वा उपनिवेश बनाए कए राखबाक उपक्रम ओहिना धराशायी भए जाएत,जेना पुरोहिती उपनिवेश भेलए,जेना ब्रिटिश उपनिवेश भेलए,जेना राजा-महराजा लोकनिक प्रासाद-दुर्ग आदि भेलए। व्यक्तिगत,परिवारगत लाभ आ अय्यासीक लेल एकटा विशाल समुदाय कें अपन शत्रु बनाएब पहिनुकहु युग मे उचित नहि रहए,अजुकहु युग मे बुधियारीक गप नहि छै।पुरुख बली नहि होत है,समय होत बलबान;भिल्लन लूटी गोपिका वहि अर्जुन वहि बान।समय आबि गेल छै जे प्रत्येक पक्ष ई स्वीकार करए जे हमसब वैदिक सिन्धु-सरस्वती सँस्कृति आ सनातन धर्मक मार्ग सँ आएल छी। ने कोय जन्म सँ शुद्र छै,ने कोय जन्म सँ ब्राह्मण। ई सभ कर्मणा दायित्व छै ,जे दूषित भए जन्म-आधारित भए गेल छै।अनेकानेक शताब्दी पूर्व जे जातिगत विभेदीकरण भेल रहए,ओकर आधार समाज मे श्रमक समुचित आ यथोचित विभाजन करब रहए,ने कि उत्कृष्टता वा निकृष्टता,श्रेष्टता वा अधमताक निर्धारण करब।एकरा आधार बनाए कोनो वस्तु पर कोय अपन एकाधिकार घोषित कए दिअए,ई अजगुत गप एकदम सँ अवांछित आ अस्वीकार्य छै।

दोसर दिस, “पाग-दोपटावला मैथिली चल जायत,लेकिन गोलगलावला मैथिली जीबैत रहतसन-सन हवाबाजी, ज्योतिषाचार्यी भविष्यवाणी,नाराबाजी आ खामखयाली सँ सेहो काज चलएबला नहि छै।पाग-दोपटाबला कें ई बुझि लिअए पड़तनि जे मुर्दा-संस्कृतिक गौरव-गानक पाछु खबोत्तर-रक्षा आ जीवित-संस्कृतिक उपेक्षाक उपक्रम आब लोक खूब नीक जकाँ बुझि रहल अछि,तें एहिपर पूर्णविराम लागब जरुरी।गोलगलाबला कें सेहो ई बुझि लिअए पड़तनि जे जीवित-संस्कृति कें मुर्दा-संस्कृति पर श्रेष्टता/वरिष्टता दिअएबाक लेल सामाजिक क्षेत्र जकाँ सामाजिक-न्याय मात्रक भरोसहि यथेष्ट नहि अछि आ एहि सँ प्रदत्त आरक्षण सँ साहित्य-संस्कृतिक क्षेत्र मे काज चलएबला नहि अछि।एहि क्षेत्र-विशेष मे मात्र नाराबाजी नहि,फांकीबाजी नहि,ठोस काज चाही। ठोस काज माने लेखन। आ से मात्र रचनात्मक साहित्यहि टा मे नहि,इतिहास आ आलोचनाक क्षेत्रमे सेहो प्रचूर यथार्थवादी लेखनक मांग करैत अछि। अकबर इलाहाबादीकमेरा ईमान क्या पूछती हो मुन्नी,शिया के साथ शिया,सुन्नी के साथ सुन्नीशेरबला दुपनियां-मानसिकता सँ पचपनियाबला एकजनियां एजेण्डाक फेकौअल खेलल जाए सकए छै,किन्तु एहि सँ ने निष्कलुष सत्यक सँधान कएल जाए सकए छै,ने निर्णायक शक्तिक सँचय। पक्षपात नहि करू,किन्तु अपन पक्ष त चुनैए पड़त,राखैए पड़त,स्थापित करैए पड़त।महान अफ्रीकी लेखक चेनुआ अचेबेक कहब कें सदति मंत्र जकाँ कण्ठस्थ राखए पड़त आ ओकरा क्रियान्वित करबा लेल प्रयत्नशील रहए पड़त—“जा तक हिरणसभ अपन इतिहास स्वयं नहि लिखत,ता तक हिरणसभक इतिहास मे शिकारीसभक शौर्य-गाथा गाबल जाइत रहत

मैथिली मे एहि सँ आगूअहुक काजसभ छै। हिरण कें अपन इतिहास लिखबाक सँ-संग ओकर पाठकक निर्माण सेहो करबाक अछि। करू।मैथिलीक खबोत्तर-पीठक कबन्ध-अस्तित्वक रहितहु कोनो प्रतिभाक लेल निराश हएबाक आवश्यकता नहि छै।संघर्ष आ ओकर निरन्तरता अवश्य चाही।कोनहु युग मे कोनो सत्ता-प्रतिष्ठान,कोनो मठ-सम्प्रदाय कोनो प्रतिभाक डगर नहि छेक सकल छै।मैथिलीअहु मे एहन मैथिलेतर लेखक,जिनका मे प्रतिभा छनि,लिखबाक जिद छनि,ध्येय मे निरन्तरता छनि,से अपन परिचिति बनएलनि अछि आ अपन लेखकीय प्रतिभाक धमक कें स्वीकृत करबएलनि अछि।ई परिचिति,ई स्वीकृति कोनो सम्मान,कोनो पुरस्कारक, कोनो प्रमाणपत्रक सोंगरक बेगरता नहि बुझैत अछि।ई स्वीकृति-परिचिति ईच्छा सँ हुअए वा अनिच्छा सँ, घोषित रूप मे हुअए वा मनहि-मन,से महत्त्व नहि राखैत अछि।ओना,जँ लिखब-रचब अहांक धर्म अछि त कोनो स्वीकृति, कोनो परिचिति,कोनो सम्मान-पुरस्कारक अपेक्षहि किऐ?अपन रचनाक मुल्यांकन भविष्य आ भावी पीढी पर छोड़ू।जँ अहां कें बुझाइ ए जे एहि भाषा-साहित्य कें जन्मना वेद-व्यास-समुदाय कब्जएने अछि त अहां कें तुलसीदास बनए सँ के रोकलक?जँ व्यवस्था पर वशिष्ठक आधिपत्य छै आ से अहां कें स्वीकार नहि अछि त विश्वामित्र बनए सँ अहां कें के रोकलक?जँ गुरू द्रोणाचार्य पक्षपाती बनि अर्जुन कें प्राथमिकता/वरीयता दएत अहांक तिरस्कार कए रहल छथि त अहां कें एकलव्य बनए सँ के रोकैत अछि?अहूं धनुर्धर बनू आ जँ गुरू अहां कें एकर अधिकारी नहि मानए छथि त हुनका अपन अऊंठा दए सँ नठबहि टा नहि करू,हुनकरहि अऊंठा छोपि लिअ।जँ अहांक प्रतिभा कोनो मठाधीश-प्रदत्त प्रमाणपत्र वा पुरस्कारादिक असीम लिलसा सँ सुखिकए टटाए नहि रहल अछि,जँ अहांक अतमा पुरहितक पंजी-प्रबन्धक सुरक्षा-कवच मे घुसिअएबाक लेल कलपि नहि रहल अछि,जँ अहांक बौद्धिकता खबासी-कर्मक लेल उताहुल-व्याकुल नहि अछि आ जँ अहांक मेरुदण्ड सोझ रहबाक सत्ती करची वा सांप जकाँ लहरदार हएबाक विषानि प्रवृति दिस लहरिया नहि मारि रहल अछि त फजुलक अरण्य-रोदनक की अर्थ? ई त जेकरहि सँ घीन अछि,तेकरहि देह मे देह रगड़ि ओकर दुर्गंध सँ जनम सोगारथ करबाक कृत्य भेल। ई तहिना हास्यास्पद अछि,जेना कार्ल मार्क्स कोनो धीरूभाई अम्बानी सँ अपन विचारक पुष्टिक कामना करथि,जेना हिरण कोनो शिकारी सँ अपन अमरताक वरदान चाहए,जेना विश्वामित्र कोनो वशिष्ठ सँ ‘ब्रह्मर्षिपदक याचना करथि,जेना कोनो भिखारी भिखारिअहि सँ भीखक अपेक्षा करए। जँ एना छै त अहां सम्मानक नहि,दया आ दुत्कारक पात्र छी। जँ विचार मे वैज्ञानिकता आ मानस मे पौरुष अछि, अपन लेखनक सार्थकता पर आस्था अछि त आत्मदया, आत्मग्लानि, आत्मरतिक आत्महन्ता मानसिकताक बेढ सँ बाहर आऊ। बनबाक अछि त अपन श्रम,अपन पौरुष,अपन शक्ति पर विश्वास राखनिहार स्पार्टाकस बनू। सम्मान-पुरस्कार आदिक वांछना कोनो पाप,कोनो अपराध नहि छै। यशेषणा साहित्यकारक लेल स्वाभाविक छै। किन्तु एकरा लेल याचनाक हद तक जाएब,सम्भव छै जे अहां कें लहलहाइत लत्ती बनाए दिअए,किन्तु अहां फलदार-छायादार-छतनार वृक्ष नहि भए पाएब। हारल मन सँ भीख मांगल जाइ छै,जे देनिहारक इच्छा-अनिच्छा पर निर्भर छै। प्रश्न अछि जे अहां कें भीख चाही वा अपन अधिकारचुनब अहींक हाथ मे अछि। हारि मानि चुकल व्यक्ति जीवनक कुरुक्षेत्रक एहन योद्धा(?) होइत अछि जे रणक्षेत्र मे उतरए सँ पहिनहि अपन अस्त्र-शस्त्रादि बाहरहि छोड़ि दएत अछि। प्रश्न अछि जे अहां लग कोनो अस्त्र-शस्त्र अछिअहु की? जँ अहां सही माने मे साहित्यक  हस्तिनापुर पर कौरव-दलक बलात आधिपत्य सँ आहत छी,आक्रोषित छी आ ईमानदारी सँ एकर प्रतिरोध करए चाहए छी,त एहि लेल एकाध बेर गारि देबाक बीध पुरि भागिकए कोनटा धए लेब कायरी-विकल्प अछि,कोय कए सकैत अछि,करैत रहैत अछि। जँ अहां मे आत्मसम्मान आ ओकर रक्षाक प्रति सजगता अछि,जँ अहां मे वीरता,पुरुषार्थ आ सँघर्षक सँकल्प अछि त अहां कें अन्यायक विरुद्ध लामबन्द हुअएअहि पड़त,अपन प्रतिरोध कें योजनाबद्ध प्रक्रियाक अन्तर्गत आनएअहि पड़त।कहबी छै जे असगर वृहस्पतिअहु झूठ। तें पहिने पांच टा पाण्डव कें एकत्रित करबाक लेल प्रेरक त बनू। कथा-कविताक पुष्पास्त्रक अपन महत्त्व छै,ओकरहु उपयोग हुअए।किन्तु निर्णायक युद्धक लेल इतिहास,आलोचना आ वैचारिक लेखनक रुद्रास्त्र सँ सुसज्जित भेने बिना विजयक गप त बाद,बराबरी (Draw)बला स्थितिअहुक कल्पना नहि कएल जाए सकैत अछि।

ओशो (आचार्य रजनीश) अपन ‘साहस सँ खुलैत अछि ईश्वरक मार्ग’ शीर्षक लेख/प्रवचन मे कहए छथि – ‘सत्यक बहुत रास लोक कें खोज छनि।परमात्माक बहुत चर्चा छै।किन्तु ई सभ साहस सँ कमजोर लोक कए रहल छथि। ओ,जे सँग छोड़बाक लेल राजी नहि छथि आ जे दीया बुतैबाक लेल राजी नहि छथि। अन्हार मे जे असगर चलबाक साहस करैत अछि बिना प्रकाशक,ओकरहि भीतर  साहसक प्रकाश जन्म लेब शुरू भए जाइत अछि। आ,जे अबलम्ब खोजैत अछि,ओ निरन्तर अबल होइत चलि जाइत अछि। हम जखनि कमजोर किंवा शक्तिहीन कहि रहल छी,त एतय तात्पर्य एहन लोकसभ सँ अछि,जे एकटा अबलम्ब पएबाक खोज मे छथि।भगवान कें अहां सहारा/अबलम्ब नहि बुझिअनु।जे लोकनि भगवान कें अबलम्ब बुझैत हएता,से सभ भ्रम मे छथि। हुनका भगवानक अबलम्ब नहि उपल्बध भए सकतनि। साहस सँ रिक्त एहन लोकक लेल एहि जगत मे किछुअहु उपल्बध नहि होइ छै।

 

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