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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक अदहा दर्जन लघुकथा-

1. जारैनक दुख मेटा गेल

सरस्‍वती पूजाक परात–माने माघक तेसर सप्‍ताहक अन्‍तिम दिनचिन्‍तामग्न भुल्‍ली काकी गुमसुम भेल घूर लग बैसल छेली। बगलमे बारह बर्खक बेटी–मरनी–सेहो बैसल छेलइ। मने-मन भुल्‍ली काकी विचारि रहल छेली जे आइ भरि–माने राति तक–तँ जारैन चलत मुदा काल्‍हिसँ की हएत! कोनो गरे ने देखा पड़ि रहल छेलैन जे केना जारैनक दुख मेटाएत।

ओना मरनीक जन्‍म ओहन परिवारमे भेल छल जइ परिवारमे बिनु जोत-कोर कएल खेत जकाँ बाल-बच्‍चाक बुधि परती बनल रहिते अछि। रहबो केना ने करतै, एक दिस गाममे स्‍कूल नहि जे धिया-पुताक लाट पकैड़ बच्‍चा गामोक स्‍कूल धरिक शिक्षा प्राप्‍त करत, आ ने ओहन विस्‍तारित परिवार जइमे बहुआयामी कारोबार रहने बुधिक विस्‍तार होइए। तँए बाल-बच्‍चाक बुधि  सकुचा कऽ थकुचा जाइते अछि। आ ने ओहन परिवारक संग सम्‍बन्‍ध रहैए जइमे परिवारजन अपने जिनगीसँ समाजक जिनगी आ समाजक जिनगीमे अपन परिवारक जिनगी देखनिहारो आ बुझि कऽ बुझौनिहारो रहैए।

ओना, आन दिन भुल्‍ली काकी दुनू माइ-धी जखन घूर लग बैसे छेली तखन अपन बीतल जिनगीक बेथा-कथाक संग भुल्‍ली काकी राजा-रानी, रजनी-सजनी, फुलकुमारी-फुलटुस्‍सीक संग फुलिया-फलियाक खिस्‍सा सेहो मरनीकेँ सुनैबते छेली। भुल्‍ली काकीकेँ गामोक लोक खिस्‍सकैर बुझिते छैन जइसँ केते गोरे खिसनी काकी सेहो कहिते छैन। अचेत बालबोध तँ सहजे घूर पजैरते चारूकात बैस खिस्‍सो सुनैए आ आगियो तपिते अछि। यएह ने भेल जिनगी जे जाड़क दुख मेटबै-ले आ जड़ाएल हथियारक आक्रमणकेँ रोकैले घूरक आगिकेँ हथियार जकाँ उपयोग करैए। जखने दुखक आक्रमण कमैए तखने ने ओते देहमे सुखक आगमन होइते अछि। जखने देह सुखाएत–माने देहमे सुख हएत–तखने ने सुखक सुख बुझि पड़त। दुनियाँमे के एहेन अछि जे सुख नहि चाहैए। भलेँ केते भेटल वा नइ भेटल ई दीगर बात भेल, मुदा केकरो सुखक खगता नइ छै ई बासी-मुहेँ झूठ बाजब नीक थोड़े हएत।

माइक खसल मन देख मरनी बाजल-

माए, मन किए एना खसल छौ?”

बेटीक बात सुनि भुल्‍ली काकीक मनमे अपन जिनगी आ अपन परिवार नाचि उठलैन। ओना केते गोरेकेँ परिवारक संग समाजो कहियौ आकि परिवारसँ बेसी समाजेक कहियौ, मनमे नचै छैन मुदा से भुल्‍ली काकीकेँ नहि भेलैन। हेबो केना करितैन। ओ तँ समाजक बीच बसल रहितो परिवारेक चिन्‍ता–माने परिवारक भरण-पोषण–सँ आगू नहि बढ़ि सकल छेली, मुदा तँए कि भुल्‍ली काकी समाजक काजसँ सोल्‍होअना हटले रहली सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। समाजमे केतौ बिआहे-दान भेल आकि आने नमहर कोनो काज, तइमे नइ जा अपन भाँज पुरबै छेली सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। से तँ पुरैबते छेली। मुदा तेकरा लोक थोडे समाजक काज–माने समाज सेवा–बुझैए। ओ तँ तेहेन चलनसारि अछि जे काजक हकार पबिते लोक अपन भागीदारी उपस्‍थित करिते अछि।

मरनीक बातसँ भुल्‍ली काकीक मनमे ईहो तँ एबे केलैन जे कमसँ कम एते तँ बेटीक जिज्ञासा जगबे कएल जे खसल मन देख बुझैक जिज्ञासा केलक। मुदा जे जिज्ञासा केलक ओ अखन–जाड़क मासमे–थोड़े एकरा बुते पुरौल हएत। तेहेन समए अछि जे जारैनक खर्च बेसी रहनौं माने भानससँ घूर तक, आमदक रस्‍ता बन्न अछि। ओना, सूर्यक रौदसँ काँचो लकड़ी वा गाछक पातो सुखि कऽ जारैन भऽ जाइए मुदा सूर्य तँ अपने तेना जाड़ो आ शीतलहरियोक ज्‍वरसँ आक्रान्‍त छैथ जे मुहोँ देखब कठिन अछि, तैठाम जारैनक सुख केना भेटत?

भुल्‍ली काकीक मन जारैनसँ जरनबाह दिस बढ़लैन। जरनबाह दिस मन बढ़िते नजैर पतिपर पड़लैन।

पतिपर परिते मन पड़लैन केना पतिक संग बेरू पहरमे सभ दिन जारैन आनए जाइ छेलौं। आगू-आगू कान्‍हपर लग्‍गी नेने ओ रहै छला आ पाछू-पाछू अपने जाइ छेलौं। अम्‍बोह गाछी-कलम गाममे अछिए, निच्‍चासँ जे लग्‍गीसँ पबै छला सेहो तोड़ै छला आ जे नइ पबै छला तेकरा गाछपर चढ़ि कऽ तोड़ै छला। जइसँ दुनू साँझक जारैनक ओरियान तँ भाइए जाइ छल जे किछु-ने-किछु उगैरियो जाइत रहए जेकरा जाड़-बरसात-ले ओरिया कऽ घरमे रखै छेलौं।

चारि साल पूर्व झलिमा कक्काक मृत्‍यु गाछेपर सँ खसने भेल छेलैन। जामुनक गाछपर सँ जारैन तोड़ैकाल झलिमा काका खसि पड़ला। गाछक ऊपर चढ़ि कऽ जारैन तोड़ै छला, भारी लग्‍गी छेलैन्‍हे जे सम्‍हारमे नइ रहलैन, बेसम्‍हार होइत खसि पड़ला।

भेल ई जे एकटा मोटगर जामुनक डारि सुखल छेलै, जइमे लग्‍गी लगा जे अपन सभ बल तोड़ैमे लगौलैन जइसँ बल ऊपर बढ़ने पएर ढील भऽ गेलैन! जारैन तँ टुटि गेल मुदा लकड़ियेक आसमे लगियो रहबे करै, जेकरा दुनू हाथसँ झलिमा काका पकड़ने रहैथ, ओही आसमे खसि पड़ला। लग्‍गियो हाथेमे रहैन डारिपर सँ डारिपर खसैत निच्‍चाँ खसला। ठनक जमीन रहबे करै चुरम-चुर भऽ गेला। घन्‍टा भरिक भीतरे प्राण छुटि गेलैन। जे भुल्‍ली काकी अपन आँखिक सोझमे देखने छेली।

ओना आजुक परिवेशो नहियेँ छेलैन जे भुल्‍ली काकीक मनमे गैसक चुल्‍हि वा गैसकेँ जारैन बुझितैथ...। लगले भुल्‍ली काकीक मनमे बेटीक प्रश्‍नक जवाब फुरलैन। जवाब फुरैक कारण भेलैन जे जहिना घरमे बाइस-बेरहट नइ रहने भुखाएल बच्‍चाकेँ माए प्रवोधैत किछु आन वस्‍तु दैत वा मुहसँ कोनो-कोनो बात कहैत तहिना भुल्‍ली काकी बजली-

बुच्‍ची, आइये भरि जारैन चलत। काल्‍हिसँ कथी लऽ कऽ भानस करब आ कथी लऽ कऽ घूर करब। समए तेहेन अछि जे जान बँचब कठिन अछि।

ओना मरनी बाध-बोनसँ गोबरो बीछि-बीछि आनै छल, जइसँ गोइठा-चिपरी सेहो पाथि जारैनक ओरियान करै छल आ गाछियो-बिरछी आ बँसवारिसँ सुखल पात खर्ड़ैर अनिते छल। मुदा जारैन-ले तँ अखन मासे कुमास अछि। भरि दिन सौनक झिसी जकाँ शीतो आ गाछपर सँ टप-टप पानिक बून जकाँ ओसो खसिते अछि।

अदहा अगहनसँ जे शीतलहर पनपल ओ रसे-रसे बढ़िते गेल। पूस चढ़ैत-चढ़ैत एहेन विकराल रूप बनि गेल जे लोकक दैनंदिनक काजेटा प्रभावित नइ भेल, जीबो दुभर हुअ लगलै। जइसँ बँचैक एकमात्र सहारा आगिये रहल। भरि-भरि दिन लोक आगि पजारि कहुना-कहुना दिवस गुदस करए लगला।

जखने अगियासीक विरधी हएत तखने जारैनक खर्च बढ़बे करत। तहूमे बैसाख-जेठक अगियासी नहि जइमे समैयो संग दइए। एक तँ ओहुना जाड़क मासमे ठंढक प्रकोपसँ आगियोक शक्‍ति कमि जाइए, तैपर अधिक शक्‍तिक खगता भेने जारैनक अधिक खर्च होइते अछि। ओना भुल्‍ली काकी आने-सालक (पाछूक साल) अटकारि कऽ जारैनक ओरियान करि कऽ रखने छेली, मुदा खर्च बढ़ने ओ माघक तेसर सप्‍ताह बीतैत-बीतैत ओरा गेलैन। 

ओना अचेतन मन मरनीक रहने माइक प्रश्‍नक उत्तर लगले सूरे दैत बाजल-

जारैन की कोनो खाइक वौस छी जे काज नइ लागत–माने बोइन बुत्ता नइ हएत–तँ लोककेँ भुखसँ परान छुटि जेतइ। जारैन तँ बाधसँ बोन धरि भेटैए। दुनू माइ-धी आनि लेब।

ओना बेटीक बात सुनि भुल्‍ली काकीक मन जुड़ेबे केलैन। जुड़ाइक कारण भेलैन जे जखन केकरो बेटा-बेटी जिनगीक विकट घड़ी कटैले फाँड़ बान्‍हि तैयार हएत तँ जरूर ओ ओइ विकट घड़ीकेँ टपबे करत।

मुदा लगले भुल्‍ली काकीक मनमे भेलैन जे एक तँ गाछ चढ़ै-जोकर नइ अछि, शीतसँ तेना भीज कऽ पीछड़ाह बनि गेल अछि जे ओइपर चढ़ि जरनवाहि करब दुसकर भऽ गेल अछि। तैपर ईहो तँ ऐछे जे गाछपर पुरुख-पात्र ने चढ़ि कऽ जरनवाहि करै छैथ, मरनी केना गाछपर चढ़ि जरनवाहि काए सकैए? ई तँ विचारक वेगमे भँसि, माइक बेथाकेँ कम करैक क्रममे बाजि गेल। हँ एते संभव अछि जे छोट लग्‍गीसँ छोट-छोट गाछक सुखल ठौहरी तोड़ि आनि सकैए। मुदा हमरेटा संगे शीतलहरीक प्रकोप अछि सेहो बात तँ नहियेँ अछि। सभकेँ छै, तँए छोट-छोट सुखल ठौहरी छोट-छोट गाछमे आब थोड़े हएत ओकरा तँ कहिया ने लोक तोड़ि कऽ जरा नेने हेतइ।

गाछक सुखल ठौहरीपरसँ उतैर भुल्‍ली काकीक मन गाछक पातपर पड़लैन। पातपर पड़िते मन कलियाएल फूल जकाँ कलियेलैन। कलियेलैन ई जे गाछेक पातटा नहि, बँसवारिमे बाँसोक पात तँ धरतीपर खसिते अछि। एक बेर बहुत नहि, मुदा थोड़बो-थोड़ तँ हेबे करत जे अपनो दुनू माइ-धी आनि सकै छी। खुशीक दशांश खुशी भुल्‍ली काकीक मनमे उठलैन। बजली-

बेटी, जेहेन बेर-बिपैत पड़ैबला अछि ओकरा मेटेबहक केना?”

बजैक क्रममे मरनी समस्‍याक–माने प्रश्‍नक–नाँगैर पकैड़ तँ बाजि गेल छल मुदा पड़ाइतकेँ ने नाँगैर पकैड़ पकड़ल जा सकैए, मुदा जे–माने पैछला दू मासक शीतलहरी–असथिर भेल अजेगर जकाँ थुसकुनियाँ मारि बैसल अछि ओकरा केना पकैड़ सकैए। माइक प्रश्‍न सुनि मरनी जारैनक मरम दिस जखन नजैर उठौलक तखन मर्माहत हुअ लगलै। मनमे रंग-रंगक प्रश्‍न उठए लगलै। बाध-बोधसँ चराटी गाए-महींक गोबर बीछि-बीछि अनै छेलौं, ओकर गोइठा-चिपरी पाथै छेलौं, से ने आब गाए-महींस चड़ैले–ठंढ दुआरे–जाइए आ ने अपने ओइ कनकनीमे टहैल-बुलि पाएब। तखन गोबर केतए-सँ आनब। जखन गोबरे ने रहत तखन गोइठा कथीक बनाएब...?

फेर लगले मरनीक मन तरैप गेलइ। तरैपते उठलै जे रस्‍तो-पेरापर दू-चारि चोत गोबर भेटिये जाएत, जेकरा आनि कऽ पाथबो करब तँ ओ सुखाएत केना? काँच गोबरक जारैन केहेन हएत? गोबरोक जारैन बनबैक तँ मासो आ मौसमो होइ छइ किने। कम्‍मो-सम्‍म रौद भेने पातर गोइठा बनौलो जाइए आ सुखि-सुखि जरनो बनैए। मुदा सेहो नहियेँ अछि। जेना-जेना रौदक धाह बढ़ैत जाइए तेना-तेना ने गोबरो-गोइठाक आकारोमे बढ़ोत्तरी होइ छइ। जेठुआ रौद गोरहाक होइते अछि। जे रायफल जकाँ जाड़सँ रक्षा करिते अछि, सएह ने सठि गेल।

मरनीक मन आगू बढ़ि गाछक सुखल ठौहरी आ निच्‍चाँमे खसल पातपर पड़लै। पातपर पड़िते मन औना गेलइ। औना ई गेलै जे अखन तँ गाछक पातो खसब बन्न अछि। ओकरो पतझाड़ होइक समए होइए। ओहो तँ बारहो मास एके रंग नहियेँ खसैए। तखन सुखल पात केतए-सँ खर्ड़ैर आनब?

दुनू माए-बेटी–माने भुल्‍ली काकी आ मरनी–घूर लग बैसल आगूक जिनगीक संग जीबैक आशा ताकि रहल छेली। कोनो आशा नजैरक सोझ आबिये ने रहल छैलैन। जखने केकरो जिनगी जीबैक आशामे विकट संकट उपस्‍थित भऽ जाइए तखने ने ओइ संकटकेँ भगबैमे मनो आ मनक मथनो ढाही मारि-मारि चूरम-चूर होइए, से तँ दुनू माए-बेटीकेँ भाइये रहल छल, तही काल तेरह-चौदह बर्खक करनी सेहो पहुँचल।

मरनी आ करनीक बीच सात-आठ बर्खसँ बहिना लगल छइ। जेहने मरनीक परिवार बोनिहारिनीक अछि तेहने करनीक परिवार सेहो अछि। ओना करनीक परिवार मरनीसँ नमहर अछि मुदा जीबैक–माने परिवार चलैक–आशा दुनूक एक्के रंग छइ।

लगमे करनी अबिते घूर लग बैसैत बाजल-

बहिना, तोरा ऐठाम तँ अगियासियोक ओरियान छह, हमरा तँ दिनमे भानसो हएब कठिन अछि।

करनीक बात सुनि मरनीक मनमे एते तँ आशा भाइये गेल जे हमरा आइ भरिक–माने रौतुका भानस करै तकक–जारैन अछियो मुदा बहिनाकेँ तँ सेहो ने छइ। जखन ओकरा आइयो भरिक जारैन नइ छै, तखन ओ केना जारैनक दुख मेटाएत?

तँए करनीक जुक्‍ति–माने जारैन ओरियान करैक विधि–केँ मरनी अखियाइस कऽ सुनए चाहि रहल छल। कोनो बेमारी साए गोरेकेँ आकि हजारे गोरेकेँ किए ने हौउ, मुदा जँ सभकेँ एकरंग बेमारी रहत तँ ओकर दबाइयो एक्के हएत किने। ओना, दुनू-गोरेक मनमे गंभीर समस्‍यो छल आ ओकर समाधानक गंभीर विचारो चलिये रहल छेलै, मुदा तेकरा मरनी पतझाँप दऽ बाजल-

बहिना, तोंहू भरि दिन झूठे-फूसेक परसादी बँटने फिरै छह?”

मरनीक बात सुनि करनीक मनमे जोरक धक्का लागल। धक्का लगिते मनमे फुरलै जे दुनियाँक तँ यएह सभसँ पैघ बेमारी अछि जे कियो केकरो दुख-बेथा नइ पतियाइत अछि आ जँ पतियेबो करैए तँ ओकरा हँसी-चौलमे उड़ा दइए।

कहू, जे जारैनक दुआरे एहेन समैमे भानस बन्न छै आ बहिना भऽ कऽ कहैए जे भरि दिन झूठे-फूसेक परसादी बँटै छह। मुदा छी तँ बहिन किने, ईहो तँ भाइये सकैए जे हँसी-चौलमे दुखे बिसरा दियए। मनमे रहने ने दुख देहो आ मनोकेँ दुखबैए आ मन बहैल गेने तँ दुखो ने बहैल जाइ छइ। मनकेँ असथिर करैत करनी बाजल-

बहिना, तोरा सन पथराएल लोककेँ जाबे आँखिसँ नइ देखा देब, ताबे अहिना अनका दुखकेँ सुनि-सुनि हँसबो करबह आ चौलो करबह।

करनीक बात सुनि मरनी ठमकल। मुदा लगले जहिना जिनगी चीत-सँ-पट वा पट-सँ-चीत नइ होइए, रसे-रसे करोटिया होइत-होइत माने करोट बदलैत-बदलैत बदलैए तहिना मरनियोँक विचार केना लगले उनैट जाइत। ओना मने-मन मरनी अपन अबैबला दुखकेँ जरूर देख रहल छल मुदा गपो-सप्‍पक तँ अपन दुनियोँ अछि आ दुनियाँदारी सेहो अछिए...।

दुनू बहिनाक बीच विचारक बेवधानकेँ–माने बीचक दूरीकेँ–सामंजस करैत भुल्‍ली काकी बजली-

बुच्‍ची, अखन अहाँ दुनू गोरे बच्‍चा छी, तँए जेते बुझला पछाइत–माने बुधि भेला पछाइत–जिनगीमे गति अबैए से अखन नइ आएल अछि। तँए नीक जकाँ जइ ढंगसँ बुझक चाही से नइ बुझि पेब रहल छी।

भुल्‍ली काकीक विचार सुनिते करनी जेना अपन विचार व्‍यक्‍त करैमे सह पौलक तहिना मुँहक रूखि बदललै। बदैलते मरनी दिस तकैत बाजल- बहिना, तोरा तँ दू गोरेक परिवार छह तँए हल्‍लुक सवारी पेब घोड़ा जकाँ फौद खेलाइ छह मुदा हमरा तँ छह गोरेक परिवार अछि, कहुना-कहुना तोरासँ दोबर-तेबर जारैनक खर्च अछि!”

करनीक बात सुनि भुल्ली काकी बजली-

करनी बुच्‍ची, एहेन समैमे जारैनक ओरियान केना करब?”

भुल्‍ली काकीक बात सुनिते करनीकेँ अपन माइक सिखौल बात मन पड़लै। मन पड़िते बाजल-

काकी, अखन तँ ने गोइठा-चिपरीक ओरियान भऽ सकैए आ ने जारैन-काठीक, गाछ-बिरीछक पातो नहियेँ भऽ सकैए, तखन तँ एकटा उपाय ऐछे जे गाछ-बिरीछ ने शीत-पाला बीता कऽ पात छोड़ैए मुदा बाँस तँ ओसक आगमन होइते पात छोड़ए लगैए, तँए बँसबिट्टीक बिच्‍चोमे आ कातोमे पात झड़िते अछि, ओहीमे सँ खर्ड़ैर कऽ आनब।

करनीक विचार सुनि भुल्‍ली काकीक मन सहमलैन। सहैमते बजली-

बुच्‍ची, अपना सभ सन-सन लोक-ले राजा आ दैव दुनू बेपाट अछि, तखन तँ अपनो सभ मनुखे छी ई तँ बुझए पड़त किने।

भुल्ली काकीक बात सुनि करनी बाजल-

काकी, राजा-दैव नइ बुझलिऐ?”

करनीक प्रश्‍नसँ भुल्‍ली काकीक मनमे खुशी उपकलैन। खुशी उपैकते मुस्‍की दैत बजली-

बुच्‍ची जहिना राजा मदारी छी जे परजाकेँ बानर बुझि नचबैए तहिना दैव मदनारी भेल जे दैव सभकेँ डोर पकैड़ नचबैए।

भुल्‍ली काकीक बात जहिना करनी सुनलक तहिना मरनियोँ सुनलक मुदा बुझलक दुनूमे सँ कियो ने। तँए भुखल बच्‍चा जकाँ दुनू गोरे भुल्‍ली काकीक मुँह दिस बकर-बकर ताकए लगल। जे भुल्‍ली काकी सेहो बुझली। ओना भुल्‍ली काकीकेँ मनमे ई कुवाथ नहि भेलैन जे किए ने हमर बात दुनू बुझलक। मनमे ई भेलैन जे अखन तँ दुनू बच्‍चा अछि तँए दुनियाँदारीक बात नइ बुझैए। मुदा बुझै-जोकर तँ भाइए गेल अछि। आब कहिया बुझत। बारह-चौदहबर्खक दुनू ऐछे, किछु दिनमे बिआह-दान हेतइ, सासुर बसत, परिवारक भार पड़बे करतै। से नहि तँ दुनूकेँ दोसर ढंगसँ बुझौनाइ नीक हएत।

दोसर ढंगसँ बुझबैत भुल्‍ली काकी बजली-

बुच्‍ची, जहिना देखै छहक किने जे एक दिस बरखाकेँ बहन्ना बना राजा गाछ-बिरीछ लगबै पाछू बेहाल अछि तँ दोसर दिस आन-आन देशसँ तेलो आ गैसो कीन-कीन, धुआँ-धुकुरक बहन्ना बना घरे-घर पसारि रहल अछि।

भुल्‍ली काकीक बात करनियोँ आ मरनियोँ बुझलक। बुझैक कारण भेलै जे आँखिक सोझमे गामेमे देख रहल अछि। ईहो देख रहल अछि जे भानस करैमे सुविधाजनक सेहो अछिए। मुदा लगले एकटा प्रश्‍न मनमे उठलै- तखन भुल्‍ली काकी किए बहन्ना कहै छथिन..! करनी बाजल-

काकी, अहाँ एकरा बहन्ना किए कहै छिऐ?”

करनीक जिज्ञासु प्रश्‍न सुनि भुल्‍ली काकी गंभीर भऽ गेली। गंभीर होइक कारण भेलैन जे जेहेन उपयोगी विचार अछि तेकरा जँ ऊपरे-झापरे किछु कहि बुझा देबै से नीक नहि। तँए प्रश्‍नक गंभीरताकेँ देख गंभीर होइत बजली-

एते जे गाममे गाछ-बिरीछ अछि, जे गामक सम्‍पैत छी, जँ एकर उपयोग नइ हएत तँ हएत की? देखते छहक जे लकड़ीक काज जे अछि ओ धीरे-धीरे लोहो आ प्‍लाष्‍टिको पकैड़ रहल अछि, तखन गामक-गाम जे लकड़ीक बोन अछि, ओ की हएत?”

भुल्‍ली काकीक बात सुनि करनी मुड़ी डोलबैत बाजल-

हँ, से तँ भाइये रहल अछि।

विचारमे सहमति देख भुल्‍ली काकी बजली-

छोड़ह दुनियाँदारीक गप, अखन जइ दुखसँ दुखी छह तेकर निमरजना केना हएत, से गप करह।

भुल्‍ली काकीक बात सुनि करनीक मन एकाएक बैसए लगल। मनमे नाचए लगलै जे भानस बिनु जरने केना हएत? तोहूमे जैठाम छी तिनको नहियेँ छैन जे मुहोँ खोलब–माने मंगबो करबैन–तँ मुँह भरत?

पाछू उनैट करनी तकलक तँ माइक बात मन पड़लै। मन पड़िते बाजल-

काकी, बँसबिट्टी सभमे तेते पातो आ सुखल कड़चियो सभ खसल अछि जे जँ ओकरा खर्ड़ैर आनब तँ जारैनक ओरियान भऽ जाएत।

करनीक बात भुल्‍ली काकीकेँ सोहंतगर लगलैन। बजली-

तखन ते जारैनक दुखे मेटा जाएत। समैयोमे देखै छी जे दिनो-दिन (कुहेस) कमले जा रहल अछि। सरस्‍वती पूजा भाइये गेल। वसंतक आगमन सेहो भाइए रहल अछि। गाछो-बिरीछ पतझाड़ लेबे करत।

हँसैत मरनी बाजल-

तखन तँ जारैनक दुखे मेटा जाएत किने?”

शब्‍द संख्‍या : 2465, तिथि : 17 अप्रैल 2017,

बेटीक पैरुख लघु कथा संग्रहक पहिल संस्‍कणसँ...।

 

2. बेटीक पैरुख

पचहत्तैर बर्खक फुलकुमारीक देहक पानि अखनो ओहिना जलजलाउ छैन जेना ढेरबामे रहैन, माने ढेरबामे जे चढ़लैन ओ अखनो चढ़ले छैन।

बैशाख मासक एगारह बजेमे मारन बाधसँ पुतोहुक संग घास नेने फुलकुमारी आँगन नहि जा सोझे मालक थैरक छाहैरमे आबि बैसली। छाहैरमे बैस अपन देहक थकानो हेट करए लगली आ गाइयो-बच्‍चाकेँ हिया-हिया देखए लगली। देखैत-देखैत जेना-जेना देहक थाकैन कमैत गेलैन तेना-तेना गाइक सिनेह मनमे उठैत गेलैन। उठैत सिनेहसँ सिनेहासिक्‍त होइत फुलकुमारी अपन दुनू हाथ जोड़ि आठ किलो दूधवाली गाएकेँ प्रणाम करैत पुतोहुकेँ कहलखिन-

छोटकी, एक लोटा पानि नेने आबह।

छोटकी माने भेल छोटकी पुतोहु’, नाओं छिऐन जलेसरी। नि:सन्‍तान एवं बैधव्‍य जीवन-यापन करैत जलेसरी करीब चालीस बर्खक अछि। दुइए सासु-पुतोहुक परिवार छैन।

बच्‍चेसँ फुलकुमारी नैहरेमे रहल जइसँ सासुर बसैवाली औरतसँ बेसी बजैक संस्‍कार रहबे केलइ। ओना समाजमे बेटी-जातिक विचारकेँ कम आँकल जाइए जइसँ ओकर कटाहो बातकेँ तन्नुक बुझले जाइए। तन्नुक आँक रहने ने गड़ैक सम्‍भावना आ ने गड़ला पछाइत विसविसाइयेक।

फुलकुमारीकेँ दू सन्‍तान भेलैन, दुनू बेटे। जेठ जीबछ आ छोट राधेश्‍याम।

जीबछ नोकरी करए बम्‍बइ गेल। कपड़ाक एकटा कारखानामे नोकरी भेलै, तैबीच बिआहो भेलइ। बिआहक दू सालक पछाइत पत्नियोकेँ बम्‍बइये लऽ गेल। अखन जीबछकेँ चारिटा सन्‍तान–तीनटा बेटा आ एकटा बेटी–छइ। चारू हाइ स्‍कूल-सँ-कौलेज धरि पढ़ैए।

बम्‍बइ गेला पछाइत जीबछ चारि-पाँच साल तक गामकेँ बिसरल नहि। मासे-मास रूपैयो पठबै आ साले-साल एबो करइ। जीबछेक लाटमे राधेश्‍यामो बम्‍बइ गेल। ओकरो ओही कारखानामे नोकरी भेलइ। ओना, राधेश्‍यामकेँ बम्‍बइक पानि नइ पचलै, रसे-रसे रोगाए लगल। छह मास बम्‍बइमे इलाजो करौलक मुदा रोग कमलै नहि जे बढ़िते गेलइ। ओना, सेवो जइ रूपे हेबा चाही से नै भेने निराश भऽ राधेश्‍याम गाम चलि आएल। जेहेन इलाजक आ पथ्‍य-पानिक जरूरत छेलै से गामोमे नइ भेने थोड़बे दिनक पछाइत रोधेश्‍याम मरि गेल।

राधेश्‍यामकेँ तीन साल पहिने बिआह भेले छेलइ। सन्‍तान-शखा एकोटा ने भेलै, तइ बिच्‍चेमे ई दुनियाँ छुटि गेलै, छुटि कि गेलै जे छोड़ि कऽ जाए पड़लै।

पतिकेँ मुइला पछाइत जलेसरी मनमे रोपि लेलक जे दोसर घर नइ जाएब। माने दोसर बिआह नइ करब। ओना समाजो तँ समाजे छी, जइमे सबहक अँटावेशो होइए आ सभ रंगक नियमो-बेवहार चलिते अछि। सभ नियम ई जे एहनो नियम ऐछे जे बिआहक पछाइत जँ पति मरि जाए तँ पत्नीकेँ दोसर बिआह वर्जित अछि। माने ई जे जीवन भरि विधवा बनि जीबह। ई भेल लड़की लेल नियम, मुदा ओहीठाम लड़का लेल एहेन नियम नहि अछि। ओ दोसर-तेसर कि जे दर्जनो बिआह कए सकैए।

 तहिना समाजमे किछु जाति एहेन अछि जइमे लड़का-लड़की–माने बिआहक पछाइत पति-पत्नी–मे कियो मरौ, माने पत्नी मरौ आकि पति’, दुनूकेँ दोसर-तेसर बिआह करैक अधिकार अछिए। तैसंग ईहो होइते अछि जे जइ जातिमे दुनूकेँ माने जहिना लड़काकेँ तहिना लड़कीकेँ  दोसर-तेसर बिआह करैक अधिकार रहितो जँ दोसर-तेसर नइ करए चाहैए तँ सेहो बड़बढ़ियाँ–माने नहियोँ कए सकैए। ओना चोरा-नुकी दुनूक संग चलिते अछि, माने जइ जातिमे लड़कीकेँ दोसर बिआह करैक अधिकार नइ छै, चोरा-छिपा कऽ ओहूमे कैये सकैए, मुदा से भेल समाजसँ छीप कऽ करब। हलाँकि समाजो तैपर सँ अपन नजैर छीपिये लइए आ छीपिते नहि अछि बल्‍कि छिपाएल धन जहिना लोक धीरे-धीरे बिसैर जाइए तहिना रसे-रसे बिसरियो जाइते अछि। मुदा तँए ई कहब जे नियम ढील भऽ बदैल गेल, सेहो नहियेँ भेल अछि। अखनो जीवित अछि आ कहिया तक जीवित रहत सेहो नहियेँ कहल जा सकैए।

घास झाड़ब छोड़ि छोटकी पहिने सासुक आदेश पूरबए विदा भेली। कलपर पहुँच हाथ-पएर धोइ कऽ पहिने अपने भरि छाँक पानि पीब लेली। पछाइत, बैशाख मासक गरमाएल लोटा जे आँगनमे बैसल-बैसल तबि गेल छल, तेकरा कलपर आनि चिक्कनि माटि नहि छौरसँ मजली।

चिक्कनि माटिसँ नइ माजैक कारण भेलैन जे माटिक राखल ढेरी लग जलेसरी नइ गेली, कलक बगलमे राखल छौरक ढेरीपर नजैर पड़ि गेलैन, ओहीमे सँ एक मुट्ठी छौर लऽ लेली।

छौर-पानिसँ भीतर-बाहर रगैड़ते लोटाकेँ ताउ शान्‍त होइत-होइत सभ तामस मिझा गेल। तामस मिझाइते धुआइओ गेल। धुएला पछाइत कण्‍ठ लगतक पानि भरि छोटकी सासुकेँ दइले बढ़ली, तैबीच शान्‍त भेल लोटा मने-मन छोटकीकेँ असिरवाद देलकैन जे ओ हमरा फुलकुमारी लग पहुँचबैत-पहुँचबैत कंचन बना देलक जइमे अमृत रूपी जल अछि। अमृतो तँ वएह ने छी जे जिनगी दइए। जखने मुहसँ प्रवेश करैत अमृत रूपी पानि नाभिकुण्‍ड लग पहुँचैए तखने ने शान्‍त-चित्तक किछु अवधि बढ़ि जाइ छै, जइसँ ऐगलो काजक मुहरी जागि-जागि जिनगीक संग चलैत रहैत अछि। सएह फुलकुमारियोक संग भेल। गाएपर नजैर अँटकौने फुलकुमारी मने-मन प्रणाम करैत बजली-

हे लछमी माता! अहीं एहेन दाता छी जे अपने बच्‍चा जकाँ हमरो दुनू सासु-पुतोहुक रछिया करै छी।

गाइक लक्ष्‍मी रूपकेँ देखते फुलकुमारी आराधना करए लगली, माने अपन कतर्व्‍य-कर्मकेँ अराधए लगली। तैबीच छोटकी पानि भरल लोटा नेने आबि लगमे ठाढ़ भऽ गेली। जेकरा फुलकुमारी नइ देख रहल छेली, किएक तँ आराधनामे नजैर तेना अँटैक गेल छेलैन जेना जीवन भेटला पछाइत एक संग मन-मस्‍तिष्‍क दुनू अँटैक जाइत अछि।

फुलकुमारीक बन्न आँखि देख छोटकीकेँ बुझि पड़लैन सासु ओंघा रहली अछि, सिनेह भरल स्‍वरमे बजली-

माए, लगले आँखि लागि गेलैन?”

होइतो अहिना छै जे किछु भेटला पछाइत खुशीसँ आनन्‍दक ओंघी सेहो अबिते छइ।

निमग्न फुलकुमारी पुतोहुक बात सुनिते अकचका कऽ बजली-

नहि! ओंघाइ नइ छी कनियाँ, गाइक रूइयाँपर नजैर पड़ि गेल छेलए।

रूइयाँ देखब, माने दुधारू गाइक प्रमुख लक्षणकेँ देखब छी, ई बात छोटकीकेँ बुझले रहैन। बजली-

घासो झाड़ब पछुआएले अछि।

आशा भरल शब्‍दमे फुलकुमारी बजली-

ऐठाम लोटा रखि दहक आ घास झाड़ए चलि जा।

छोटकी सएह केलक।

पानि पीला पछाइत फुलकुमारीक नजैर फेर गाइयेपर जा कऽ अँटैक गेलैन। अँटैकते मन विस्‍मित हुअ लगलैन। विस्‍मित ई जे जहिना अपन जिनगी अछि तहिना ने गाइयोक अछि। ओना, दुनूमे ई अन्‍तर ऐछे जे धनक भण्‍डार रहितो गाएकेँ अपन जिनगीक रक्षा करैक लूरि-बुधि नइ छै तँए, ने अपने रक्षा कऽ सकैए आ ने बच्‍चेक आ ने अपन दूधेक उपयोग अपनासँ कऽ सकैए। मुदा मनुख तँ से नहि छी। सभ किछु कऽ सकैए। तँए जँ दुनूक सम्‍बन्‍ध बनल रहत तँ एक-दोसरक आशापर असानीसँ जीवन-यापन कऽ सकै छी।

गामक बेटी फुलकुमारी। दू कट्ठा घराड़ी पिताकेँ रहैन। पिता–सिंहेश्वर–किसानी जिनगीसँ जुड़ल छला। खेत-बोनिहारक रूपमे जे सोल्‍हे बर्खक अवस्‍थामे सिंहेश्वर जीवन धारण केलैन ओ ता-जिनगी धारण केनहि रहला। किसानी जिनगीक अधिकांश लूरि सिंहेश्वरकेँ रहबे करैन। हर जोतब, रोपैन करब आ कमठौन करबक संग घर बन्‍हैक सभ लूरिसँ सम्‍पन्न छला।

सिंहेश्वरक पहिल पत्नी पहिल सन्‍ताने होनिहारिक समए मरि गेली, आ बच्‍चो माइये संग मरि गेल। परिवारमे दोसर-तेसर नइ रहने, असगरे सिंहेश्वर पेटक ओरियान करितैथ कि पत्नीक सेवा-टहल।

अपना आँखिसँ सिंहेश्वर पत्नीयोँ आ बच्‍चोकेँ मरैत देखने छला, मुदा जिनगियो तँ जिनगी छी, सभकेँ जीबैक आशा रहिते अछि। ओना, समाजिक नियमो आ अपन टुटल मनोक चलैत सिंहेश्वर साल भरि तक उपारजनक संग अपने हाथे भानसो-भात करैत रहला। मुदा साल भरिक पछाइत समाजो दवाब दैत सिंहेश्वरकेँ कहलकैन- दुनियाँमे अहींटा केँ एहेन गति नहि भेल, बहुतोकेँ भेलैन। तँए जखन मनुखक जिनगी भेटल तखन मनुख जकाँ ने परिवार बना परिवारिक जिनगी जीब।”

समाजोक विचार आ अपनो जिनगीक खगता देख सिंहेश्वर दोसर बिआह केलैन। दू सालक पछाइत दोसर पत्नीसँ फुलकुमारीक जन्‍म भेल। तीन सालक जखन फुलकुमारी छल तखने मइटुग्‍गर भऽ गेल। माने सिंहेश्वरक दोसर पत्नी सेहो ऐ दुनियासँ चलि गेली।

दोसर पत्नीकेँ मुइला पछाइत सिंहेश्वर तेसर बिआह नहि केलैन। केतबो समाजक लोक रंग-रंगक तर्क दऽ बुझबैत रहलैन मुदा किनको बात नहि सुनला।

सिंहेश्वर दू-दूटा पत्नीक मृत्‍युक संग पहिल सन्‍तानक मृत्‍यु देख चुकल छला। दुनूक कष्ट-पीड़ा आँखिक सोझमे नचिते रहै छेलैन, तैसंग ईहो आशा मनमे जागिये गेल छेलैन जे जखन तीन बर्खक सन्‍तान ऐछे तखन वंशो तँ आगू बढ़बे करत। एकरे नीक जकाँ पोसब-पालब। पोसै-पालैमे चारि-पाँच बर्ख धरि किछु बेसी परेशानी हएत, सएह ने। हएत तँ हएत। जखन मनुख बनि धरतीपर जन्‍म लेलौं तखन जँ अपन भार अपने नइ उठा चलब, तँ जेकर आशा हम करब ओकरो तँ अपन जिनगी छै, अपन बाल-बच्‍चा छै, अपन परिवार छइ। सभ ने अपन-अपन परिवार चलबैमे लागल रहैए। आब तँ फुलकुमारी तीन बर्खक भेल, छहमसिया बच्‍चा जकाँ तँ नहि अछि जे भरि दिन देह धरा राखए पड़त आ माइक दूधो दिऐ पड़त। अन्नो-पानिपर फुलकुमारी जीविये सकैए।

पाँच बर्ख टपला पछाइत फुलकुमारी आँगन-घरक किछु-किछु काज करए लगल। आठ बर्ख अबैत-अबैत भानसो-भात आ घरक आनो-आनो काज सम्‍हारए लगल। तैसंग सिंहेश्वर असगरूआ जिनगी जीबैक लूरिक अभ्‍यस्‍त सेहो होइत-होइत भाइये गेला।

बाल-विवाहक चलैन समाजमे सभ दिनसँ आबि रहल अछि। ओना, बाल-विवाहक प्रश्‍नपर समाजमे सभ दिनसँ विभाजन रहल आ अखनो अछि। बालो-विवाहक अपन उत्तर अछिए। उत्तर ई जे बेटा-बेटीक बिआह-दान करब माता-पिताक धार्मिक काजसँ जोड़ल अछि। धार्मिक काज भेल ओहन काज जे जिनगीसँ जुड़ल अनिवार्य काजक श्रेणीमे अबैत अछि। अनिवार्य तँ ऐछे जे वंशकेँ आगू बढ़ैक सीढ़ी छी। मुदा ओहन काज रहितो जँ माता-पिता बेटा-बेटीकेँ बीस-पच्‍चीस बर्खक जुआन बनबए चाहता आ बिच्‍चेमे अपने चलि जेता तखन जिनगीक काजक पूर्ति केना हेतैन। जँ पूर्ति नहि हेतैन तखन अधरमी तँ भेबे केला किने। जखन अधरमीक विचार मन मानि लेतैन तखन तँ नर्कक भागी भऽ गेला किने। एक तँ ओहुना कियो नर्क नहि जाए चाहैए, मुदा जँ कियो धोखा-धोखीमे चलि जाएत से आ बुझलमे जाएत से, दुनू एक रंग थोड़े हएत। जानि कऽ नर्क जाएब बेसी कष्टकर होइ छइ। तँए केकरो अपन मन जानि कऽ एहेन विचार देत? नहि देत।

ओना, समाजोक बन्‍धित चलैन आ आँखिक देखल अपन परिवारो तँ सिंहेश्वरकेँ छेलैन्‍हे, तँए सातमे बर्खमे बेटी–फुलकुमारी–क बिआह कऽ देलखिन ।

आइये नहि पहिनौं लोक परदेश खटिते छला। कलकत्ताक पटुआक कारखानामे लड़काक पिता नोकरी करै छला आ बाल-बच्‍चाक संग पत्नी गामेमे रहै छेलैन। तँए ओहन परिवारकेँ परदेशी परिवार नहियेँ कहल जा सकै छल, तँए भीतर-बाहरक विचार नइ रहने सिंहेश्वरक कुटुमैती माने बेटीक बिआह ओइ परिवारमे भेलैन। ओना समाजक किछु विचारवानक विचार स्‍पष्‍ट रहैन जे ग्रामीण परिवेश आ शहरी परिवेशमे जिनगीक सभ कथुमे अन्‍तर आबिये जाइ छै, जइसँ केतौ-ने-केतौ जिनगीमे बेवधान उपस्‍थित होइते छइ।

ओना, आन कारण जे लड़काक पिताक रहल होनि मुदा मूल कारण छेलैन जे बारह घन्‍टा चटकलमे[1] काज केला पछाइत पान-सात गोरेक परिवार शहरमे चलब कठिन भऽ जाइन। मुदा गाम तँ गाम छी, गाममे लोक नोनियोँ साग खा साए-साए बर्खक जिनगी हँसैत-खेलैत काटिये लइए। मुदा जे हौउ, कलकतिया लोक तँ बरागत छेलाहे तँए आगू-पाछू किछु-ने-किछु जनिते छला।

फगुआमे लड़काक पिता–मोतीलाल–गाम एला। सिंहेश्वरक पिसियौत बहिन ओही गाममे बसैत, तँए हुनके अगुआइमे बिआहक गप-सप्‍प शुरू भेल। ओना, बहिनकेँ घटक नहियेँ कहि सकै छिऐन आ ने बिआह-दानक दलाल। ओ तँ घटकैतीक रस्‍ताक राही भेली। तहूमे ओहन राही जे राहगीर बनबैमे सहयोगी होइथ। ओना, एहेन सूत्र सूत जकाँ गाम-गाममे पसरल ऐछे आ कथा-कुटुमैतीमे सक्रिय रूपमे चलितो अछिए।

फुलकुमारीक बिआह नअ बर्खक विनाशक संग भऽ गेल। टुकधुम करैत विनाश गामक स्‍कूल धेने छल तँए नाम-गामसँ लऽ कऽ परगना तक बुझल रहइ।

सिंहेश्वर अपन बेटीक बिआह ओहन लड़कासँ करैक विचार मनमे रखने छला जेकर चमड़ी काज करै-जोकर होइ।

पाँच गोरेक संग सिंहेश्वर अपनो घर-वर देखए अन्‍तिम विचारक दिन मोतीलालक ऐठाम गेला। अखन तक पिसियौते बहिनक माध्‍यमसँ गप-सप्‍प होइत रहल छल। जइमे सहमतक झलकी तँ छेलैहे।

एक तँ ओहुना गामक ओहन बच्‍चा जेकर परिवारिक आमदनी कम छै, ओकर जिनगियो तेहने–माने वगे-वाणि आ रहन-सहन–रहल अछि। तहूमे कलकतिया परिवार तँ भाइये गेल छल तँए मनसँ सिंहेश्वर मानि लेलैन। ओना, ई प्रश्‍न पहिने उठि गेल छल जे लड़काकेँ जँ अपन नाम-गाम लिखल हेतै तँ कुटुमैती कैये लेब।

एक गोरे पितेक सोझमे लड़काकेँ नाओं-गाँओं लिखैले कहलैन, जे विनाशकेँ लिखल भऽ गेलैन। तैपर लड़काक पीठ ठोकैत हुनकर पिता ईहो आश्‍वासन दैत सभकेँ सुना देलखिन-

बिआहक पराते लड़काकेँ कलकत्ता लऽ जाएब। ओतै पढ़ेबो-लिखेबो करबै आ चटकलमे काजो सिखेबै।

विह्वल सिंहेश्वर आश्वासन दैत बजला-

बैशाखमे काज[2] सम्‍हारि लेब।

ओना मोतीलालक गीध-दृष्‍टि सिंहेश्वरक अढ़ाइ कट्ठा घराड़ी-बाड़ीपर अँटकल छेलैन, जेकरा ओ खुलि कऽ नहि बजै छला, तेकर कारणो छल जे चारि भाँइक भैयारीमे सतरह धूर घराड़ी अपना छेलैन जइसँ ऐगला पीढ़ीकेँ घराड़ियो बास हएब कठिन छेलैन्‍हें। ओ समैयो नहियेँ छेलैन जे कलकत्तामे बासक चर्च-बिचर्च मनमे उठितैन। तँए सोलहन्नी गामेक आशा मनमे रहैन। ओना कखनोकाल खास कऽ जाड़क मासमे जखन चटकलसँ भरि देह पटुआक रूसी लगले डेरा अबैथ आ नहाइक समए रहै छेलैन, तखन मने-मन तामसो उठबे करै छेलैन जे जइ गाममे बसैयो-जोकरओना बसबक विराट रूप अछि, मुदा अखन से नहि, अखन एतबे जे रहै-जोकर जमीन घरक लेल–जमीन नहि अछि तइ गाममे रहिये केना सकै छी। ओना, तामस उठला पछाइत मोतीलालक मनमे ईहो एबे करै छेलैन जे जे भोज नइ खाइ ओइमे पारा मरौ आ जइ गाममे बसैयो-जोकर खेत नहि तइ गाममे साँझ-भोर नढ़िया-कुकुर भुकौ...। मुदा बेवस मनक बेवसी विचार कैये की सकैए। ओना करैले दुनियाँ बड़ीटा अछि, मुदा केनिहारो बड़ीटा हुअए तखन ने, से तँ बुझले बात अछि जे जँ कमेने होइत तँ गरिबोहोकेँ होइत जे भरि दिन कोदारि तमैए...।

बैशाख मास, फुलकुमारीक बिआह भेल। ओना गाम-घरमे–माने जैठाम फुइसिक घर अछिबैशाखक लगन माने बैशाखमे बिआहक दिन खतरनाक अछिए। कखन हवा-बिहाड़ि उठि जाएत आ भानसेक आगिसँ घरो जरि जाएत तेकर कोनो ठेकान नहियेँ अछि। मुदा फुलकुमारीक बिआहमे से नहि भेल। तीन दिन पहिने तेहेन निराउ बरखा भऽ गेल जे फागुनोक लगनक दिनसँ बेसी सोहनगर बना देलक।

एक तँ शहरी वातावरण दोसर पढ़ै-लिखैक सुविधा रहने मोतीलाल अपन बेटाकेँ मैट्रिक तक पढ़ा लेलैन। किछु-किछु अपन काजो, देखा-देखी सिखेबे केने छला तँए मनमे ईहो आशा रहबे करैन जे जखन चटकलक बिसवासू नोकर छीहे तखन धियो-पुताकेँ काज किए ने चटकलक मालिक देता। मुदा मनमे ईहो खरोंच उठबे करैन जे जखन अपने छेहा अनपढ़ छी तखन जँ लेबरक काज करै छी तँ बड़बढ़ियाँ, मुदा बेटा तँ पढ़ल-लिखल मैट्रिक पास अछि, ओकरा किए ने ऑफिसमे बाबूक काज हएत..?

विचार तँ मोतीलालक अनुकूले रहैन मुदा ई बात मनमे उठबे ने करैन जे जहिना घोंदा-घोंदे लेबरकेँ धिया-पुता सुतपुतिया भँट्टा जकाँ फड़ैए, तहिना जँ करखनो फड़ै तखन ने अँटावेश हएत, जँ से नइ फड़त तँ अपन मनक सपना सुतली रातिक सपना जकाँ फूसि हएत की नहि।

ओना, पेंशनक बेवस्‍था सेहो मोतीलालक मनकेँ भरने रहै छेलैन जे सेवा निवृत्तिक पछाइत जँ बेटा खाइयो-पीबैले नइ देत तैयो दुनू परानी ठाठसँ जिनगी काटि लेब। तहूमे साठि बर्खक पछाइत ने रिटायर हएब। मुदा ई बात मोतीलाल बुझबे ने करैथ जे सेवा-निवृत्तिक पछाइत अदहा जिनगी आरो जीब, मुदा तइले ओहन काजो करैत देहक रक्षा केने रहब तखन ने, से तँ पटुआक रूस्‍सी रसे-रसे फेफड़ेमे बसि रहल अछि, तखन केतेटा औरुदा लऽ लऽ नाचब, से बुझबे ने वेचारा केलैन।

पचासे बर्खक अवस्‍थामे मोतीलाल मरि गेला, पेंशनसँ वंचित भाइये गेला। आजुक समए नहि छल जे अनुकंपासँ दोसरो समांगकेँ नोकरी भेट जइतैन।

मुदा रच्‍छ रहलैन जे काजुल घरवाली रहैन जे अपन भार अपने उठौने छेली।

ओना विनाश सेहो उट्ठा काज शुरू कऽ नेने छल, जइसँ पिताक मृत्‍युक पछाइतो कलकत्तेमे रहल। मोतीलालकेँ मुइलाक साल भरिक पछाइत विनाशक दुरागमन भेल।

सासुरक परिवारिक स्‍थिति देख-बुझि विनाश अपने दिससँ दुरागमनक खर्च केलक। दुरागमनक पछाइत फुलकुमारी सासुर गेली, मुदा से वीध पुरबैले, मात्र सात दिन सासुरमे रहली।

सात दिनक पछाइत फुलकुमारी अपन पैत्रिक गाम चल एली। विनाश सेहो कलकत्ता गेला। खाली विनाशक माए–माने फुलकुमारीक सासु–अपन गाम धेने रहली।

सालमे एक मासक छुट्टीमे विनाश गाम अबै छला, जइमे दू-चारि दिन अपना गाममे रहै छला बाँकी समए सासुरेमे। कबैया-डोर रहने दू सालक पछाइत विनाश अपन गामक घराड़ी दियादक हाथे बेचि, माइयोकेँ सासुरे लऽ अनलैन।

दूटा बेटा विनाश-फुलकुमारीकेँ भेलैन। दुनूकेँ गामेक स्‍कूलमे नाओं लिखा देलखिन। दू सालक पछाइत विनाशक माए सेहो मरि गेली, जे सुख-सराध सासुरेमे विनाश केलकैन।

बाबन बर्खक अवस्‍थामे विनाशकेँ दमा रोग पकैड़ लेलकैन। एक तँ कलकत्ताक पानि जबदाह, दोसर दमा रोग, बेमारी बढ़िते गेलैन। अन्‍तो-अन्‍त चटकलक मालिक एक मासक दरमाहाक अतिरिक्‍त तीन हजार रूपैआ मिला अरतीस साए दऽ विनाशकेँ ताधरिक छुट्टी दऽ देलकैन जाधैर रोगमुक्‍त नहि भऽ जेता।

विनाशक रोग जड़ियाइते गेल, जइसँ कलकत्ता छोड़ि गामे आबि इलाज-बात करए लगला आ आमदनी लेल एकटा लटखेनाक दोकान केलैन। मुदा से नइ चला सकला। नइ चलबैक कारण रहैन जे एक तँ शहरी वातावरणक अभ्‍यस्‍त, दोसर वेपार करैक लूरि नहि। ओना विनाश मैट्रिक पास रहबे करैथ, तँए मनमे भेलैन जे भलेँ कलकत्ता जकाँ कमाइ नइ हुअए मुदा ट्यूशन पढ़ा किछु कमा तँ लेबे करब।

दोकानक संग-संग विनाश आठ-दसटा बच्‍चाकेँ ट्यूशन सेहो पढ़बए लगला। वएह आधार आमदनीक अपन रहलैन, जइमे बेमारीक दवाइयो आ पथो-पानि चलब कठिन भाइये गेल रहैन। मुदा फुलकुमारी तँ मेहनती रहबे करैथ।

एकटा निम्‍मन गाए सेहो पोसने छेली आ दू कट्ठा घरसँ बँचल जे वाड़ी रहैन तइमे तीमन-तरकारीक खेती तेना भऽ कऽ कऽ लइ छेली जइसँ खेनाइ-पीनाइक संग किछु-ने-किछु आमदनियोँ भाइये जाइत रहैन, जइसँ गुजर-बसरमे बेसी दिक्कत नहियेँ होइन।

गाममे रहलाक चारि सालक पछाइत विनाश मरि गेला। ओना फुलकुमारीकेँ सासुरक जे सुख होइ छै–माने परिवारसँ दियाद-वाद आ सर-समाजक–से नहियेँ भेटलैन। माने कहियो केकरो मुहेँ भौजी’, काकी’, दादी नहि सुनि सकली। भौजी-काकी-दादी सासुर बसैवाली ने होइ छैथ, से तँ फुलकुमारी सासुरमे रहबे ने केलीह। ओना, परिवारसँ लऽ कऽ समाज धरिमे फुलकुमारी बहिन’, दीदी सभ दिन बनल रहबे केलीह।

जहिना जीवन चिन्‍हनिहार जिनगीक श्रमकेँ चिन्‍ह अपनाकेँ श्रमशील जिनगीमे पएर रोपि ठाढ़ होइत चलब सिखैए आ चलैत-चलैत डेगा-डेगी दौड़ए लगैए तहिना फुलकुमारी अपन जीवन-श्रमकेँ चिन्‍ह तहियेसँ दौड़ए लगली जहिया पति मरि गेलैन, एकटा बेटा मरि गेलैन आ दोसर बेटा अपन परिवार बम्‍बइये लऽ कऽ चलि गेलैन।

ओना, फुलकुमारीक परिवार अखनो ओहिना भरल-पूरल छैन जेना पैछला पीढ़ीमे छेलैन। माने जहिना विनाशो भैयारीमे असगरे छला आ फुलकुमारियो असगरे...।

आइ भलेँ फुलकुमारी अपन विधवा पुतोहुक संग असगरे किएक ने जीवन-बसर कऽ रहली-हेँ मुदा बाप-पुरखाक घराड़ीपर तँ छैथे, तैसंग बम्‍बैयेमे किएन ने बसि गेलैन मुदा चारिगो पोता-पोतीक दादियो आ बेटा-पुतोहुक माइयो तँ वएह ने छैथ।

शब्‍द संख्‍या : 2735, तिथि : 26 मार्च 2017

बेटीक पैरुख लघु कथा संग्रहक पहिल संस्‍कणसँ...।

 

3. जन्‍मतिथि

तीस बर्ख नोकरी केला उत्तर रविकान्‍त आइ.जी. पदसँ सेवा निवृत्ति‍ भेला। जखन कि रविशंकर आइ.जी.सँ आगू बढ़ि डी.जी.पी.क पदभार सम्‍हारलैन‍। साल भरि ऐ पदपर रहता, ओते नोकरीक अवधि बँचल छैन। रविशंकरकेँ डी.जी.पी.क पदभार सम्‍हारला जखन तीन दिन भऽ गेल तखन रविकान्‍तकेँ मन पड़लैन‍ जे मीतकेँ बधाइ कहाँ देलिऐन। कारणो भेल जे पनरह दिन पहिनहिसँ जे कार्यभार दिअ लगलैन ओ नोकरीक अन्‍ति‍म दिन धरि नै फरिछौट भऽ सकलैन‍। समयक अभावमे रविकान्‍तकेँ मनमे एलैन जे मोबाइलेसँ बधाइ दऽ दिऐन। मुदा एक्के काजक तँ भिन्न-भिन्न जुइत होइए। जुइतिक अनुकूले ने काजो अनुकूल हए‍त, तँए मोबाइलसँ बधाइ देब उचित नै बुझि पड़लैन‍। ओना तत्काल जानकारीक रूपमे वधाइ दैत समए लेल जा सकै छल। मुदा से नै भेलैन‍। चाहक कप टेबुलपर रखि दहिना बाँहि उठबैत पत्नी‍केँ कहलखिन-

की ऐ बाँहिक शक्ति‍ क्षीण भऽ गेल जे काज नै कऽ सकैए। मुदा..!”

रश्‍मि‍ अपना धुनिमे छेली। ओना एक्के टेबुलपर बैस चाहो पीबै छेली आ मेद-मेदीन जकाँ मुँहमिलानीमे गपो-सप्‍प करै छेली आ अपने धुनिमे मनो वौआइ छेलैन‍। एकठाम बैस‍‍ चाह पिबतो मन दुनूक दू-दिसिया छेलैन‍। रश्‍मि‍क मनमे रविशंकरक पत्नी किरण नचैत रहैन। जिनगी भरि सखी-बहीनपा जकाँ रहलौं मुदा आइ ओ रानीसँ महरानी बनि गेली आ..? की हम ओइ बटोहिनी सदृश तँ ने भऽ गेलौं जेकरा सभ किछु छीनि घरसँ निकालि देल जाइ छइ?

जहिना कोनो नीनभेर बच्‍चा माइक उठौलापर चहाइत उठैत बेसुधिमे बजैत तहिना पतिक प्रश्‍नक उत्तर रश्‍मि‍ देलखिन-

ऐ बाँहिक शक्‍ति ओतबेकाल रहै छै जेतेकाल शान चढ़ाएल हथियार ओकरा हाथमे रहै छइ। नहि तँ प्राणशक्‍ति निकलला उत्तर शरीर जहिना माटि बनि जाइ छै तहिना बनि कऽ रहि जाइए। हाथसँ हथियार हटिते जिनगी हहरए लगै छइ।

तैबीच चाहक कप उठा चुस्‍की लैत रविकान्‍त बजला-

बच्‍चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। खेनाइ-पीनाइ, खेलनाइ-धुपनाइ, घुमनाइ-फीरनाइ सभ संगे रहल। कहाँ कहियो मनमे उठल जे दुनू मीतमे कोनो दूरी अछि। अपनाकेँ के कहए जे घरो-परिवार आ सरो-समाज कहाँ कहियो बुझलैन‍ दुनूमे कनियोँ अन्‍तर छै, मुदा आइ..?”

मुदा आइ की?”

यएह जे आइ बहुत दूरी बुझि पड़ि रहल अछि। बुझि पड़ैए जेना अकास-पतालक अन्‍तर भऽ गेल अछि। कोन मुँह लऽ कऽ आगू जाएब, से किछु फुरिये ने रहल अछि।

तखन?”

सएह ने मन असथिर नै भऽ रहल अछि। जिनगी भरिक संगीकेँ ऐहेन शुभ अवसरपर केना नै बधाइ दिऐन। मुदा एते दिन बरबैरक विचार छल आब ओ थोड़े रहत। कहाँ ओ सिंह दुआरपर विराजमान होइबला आ कहाँ हम देशक अदना एकटा नागरिक। की अपनाकेँ ओइ कुरसीक बुझी जइसँ हेट भेलौं? सीकपर रखल वा तिजोरीमे रखल वस्‍तु ओतबेकाल ने जेतेकाल ओ ओतए रहैए। रविशंकर आइ ओतए छैथ जेतए हमरा सन-सन जिनगी जे अन्‍ति‍म छोड़पर पहुँचनिहार हुनकर हुकुमदारी करत। कोन नजैरिये ओ देखै छल आ आइ कोन नजैरिये देखता।

रविकान्‍तक अन्‍तर-मनकेँ रश्‍मि‍ आँकि रहल छेली। मुदा जेते आँकए चाहै छेली तइसँ बेसी घबाएल माछ जकाँ मनक सड़ैन बढ़ल जाइत रहैन। की आँखिक सोझक देखल झूठ भऽ जाएत? केना नै भऽ सकैए। दू गोरेक बीचक बात तँ ओतबेकाल धरि सत्‍य रहैए जेतेकाल धरि दुनू मानैए। काज थोड़े छी जे गरैज कऽ कहत जे तोरा पलटने हम थोड़े पलटबौ..!

असथिर होइते रश्‍मि‍क मनमे विचार जगलैन‍। दुखक दबाइ नोर छी। पैघ-सँ-पैघ दुख लोक नोरक धारमे बहा वैतरणी पार करैए। बजली-

जहिना अहाँक मनमे उठि रहल अछि तहिना हमरो मनमे रंग-बिरंगक बात उठि रहल अछि। कहाँ रविशंकरक पत्नी किरण राजरानी आ कहाँ हम..? कहाँ राधाक संग कृष्‍ण आ कहाँ..! काल्हि‍ धरि दुनू गोरे एकठाम बैस‍ एक थारीमे खेबो करै छेलौं आ एक्के गिलासमे पानियोँ पीबै छेलौं मुदा आइ संभव अछि? आखिर किए?”

हवाक तेज झोंकमे जहिना डारि-डारिक पात डोलि-डोलि एक-दोसरमे सटबो करैत आ हटबो करैत तहिना पत्नीक डोलैत विचार सुनि रविकान्‍तो डोलए लगला। एक तँ पहिनेसँ रविकान्‍तक मन डोलि रहल छेलैन‍ तैपर पत्नीक विचार आरो डोला देलकैन‍। अनभुआर जगह पहुँचलापर जहिना सभ हेरा जाइत तहिना रविकान्‍त हेरा गेला। औनाइत बजला-

कानसँ सुनितो आ आँखिसँ देखितो किछु बुझि नै पाबि रहल छी जे की नीक की अधला! की करी की नै करी से किछु ने फूरि रहल अछि। साठि बर्खक संगीकेँ एते दूर केना बुझब? मुदा लगो केना बुझब? साठि बर्खक पथिक-संगी जँ आब दू दिशामे चली तखन केते दूरी हएत, साठि बर्खक जिनगियो तँ छोट नै भेल।

बिच्‍चेमे रश्‍मि‍ टपैक पड़ली-

जिनगी तँ एक दिन, एक क्षण वा एक घटनामे बदैल‍ जाइए आ साठि-बर्ख की धो-धो चाटब!”

तखन?”

सएह नै बुझि रहल छी। एतेटा जिनगी एक संग बितेलौं मुदा आइ जइ जिनगीमे पहुँच‍‍ गेल छी तइ जिनगीक सम्‍बन्‍धमे किछु विचार कहियो नहि केलौं।

जहिना आन गामक चौबट्टी, तीनबट्टीपर पहुँचते भक्क लगि जाइत, जइसँ पूब-पच्‍छि‍मक दिशे बदैल‍ जाइत तहिना पत्नीक बात सुनि रविकान्‍तकेँ भेलैन। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे ओहने चौबट्टी आकि तीनबट्टीपर भक्क खुजितो अछि। ओना रविकान्‍तक भक्क तेना भऽ कऽ तँ नहि खुजलैन‍ मुदा एक प्रश्‍न मनमे जरूर उठलैन‍-  बच्‍चासँ सियान भेलौं, सियानसँ चेतन भेलौं, चेतनसँ बुढ़ाड़ीक प्रमाणपत्र भेट‍ गेल। हरबाह थोड़े छी जे अधमरुओ अवस्‍थामे बुढ़ाड़ीक प्रमाण नइ भेटत। मुदा मन किए धकधका रहल अछि? जिनगीक चारिम अवस्‍था वानप्रस्‍थक होइ छै, संयासीक होइ छै जे दिन-राति दौगैत दुनियाँक हाल-चाल जानए चाहैए। से कहाँ मन मानि कऽ बुझि रहल अछि..?

पतिकेँ गंभीर अवस्‍थामे देख रश्‍मि‍ बजली-

अहाँक मनमे जे नाचि रहल अछि वएह हमरो मनमे नाचि रहल अछि। मुदा ईहो बात तँ झूठ नहियेँ छी जे जिनगीक संग बाटो बनै छइ आ बाटे संग बटोहियो बाट बनबै छइ?”

तैपर रविकान्‍त बजला-

की बाट?”

पतिक प्रश्‍न सुनि रश्‍मि‍ विह्वल भऽ गेली। मनमे उठलैन- हेराइत संगीकेँ बाट देखाएब बहुत पैघ काज छी। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन‍ जे तखन अपने किए एते वौआइ छी? कम-सँ-कम चाह पीबैकाल बैसारियोमे ऐ बातक विचार करैत अबितौं तँ औझुका जकाँ नहि वौऐतौं, जहिना जोतल आ बिनु जोतल खेतमे चललासँ पहिने धड़ियाइ छै, धड़ियेला पछाइत‍‍‍ पतियाइ छै, पतिएला पछाइत‍‍‍ पेरियाइत पेरा बनै छै आ वएह एकपेरिया बहुपेरिया बनैत चलै छइ...।

रश्‍मि‍ बजली-

अहाँ कौलेज छोड़ला उत्तर जिम्मा उठा सरकारी बाट पकैड़ साठि बर्ख पूरा लेलौं। ने कहियो जमीन दिस तकैक जरूरत‍ महसूस भेल आ ने तकलौं। मुदा आइ तँ ओतइ उतैर आबि गेल छी जेकर रस्‍ता अखन धरिक रस्‍तासँ भिन्न अछि।

पत्नी‍क विचार सुनि रविकान्‍त मुड़ी डोलबैत आँखि उठा कखनो पत्नीक आँखिपर रखैथ तँ कखनो धरती दिस ताकए लगैथ। आगिपर चढ़ल कोनो बरतनक पानि‍ जहिना निच्‍चाँसँ ताउ पाबि ऊपर उठि उधियाइक परियास करैत तहिना रविकान्‍तक वैचारिक मन उधियाइक परियास करए लगलैन। मुदा जहिना पिजराक बाघ पिजरेमे गुम्‍हैर कऽ रहि जाइत, तहिना आइ धरिक जे मन रूपी बाघ एहेन शरीर रूपी पिजरामे फँसि गेल छेलैन जे जेते आगू मुहेँ डेग उठबैक कोशिश करैथ ओते समुद्री वादल जकाँ आस्‍ते-आस्‍ते ढील होइत रहैन। आगूक झलफलाइत बाट देख रविकान्‍त बजला-

विचारणीय बात जरूर अछि, मुदा बिनु बुझल जिनगीक संग तँ अहुँक जिनगी चलल कहाँ केतौ बेवधान भेल। आइ जे कहलौं ओ तँ ओहू दिन कहि सकै छेलौं, जइ दिनसँ बहुत आगू धरि बढ़ि गेलौं। से तँ रोकि कऽ मोड़ि सकै छेलौं। मुदा आइ तँ जानल-बिनु जानल दुनू संगे वौआए चाहै छी!”

पतिक बात सुनि रश्‍मि‍ मने-मन विचार करए लगली जे दुनियाँमे एहनो लोकक कमी नै अछि जेकरा जरूरत‍ भरि लूरि-बुधि नै छै, मुदा ईहो तँ झूठ नहि, जे जेकरा छेबो करै ओइमे बेसी ओहने अछि जे या तँ उनटा वाण चलबैए वा नहियेँ चलबैए। तखन सुनटा वाण केना आगू बढ़त आ जँ बढ़बे करत तँ केते आगू बढ़त जेकरा आगू दुश्मन जकाँ चौबगली उनटा वाण घेरने अछि? मुदा कोन उपाय अछि, जखन शुद्ध तेल-मोबिल देल मजगूत इंजनो चढ़ाइपर दम तोड़ए लगैए आ टुटलो चक्का रहैत बिनु तेलो-मोबिलक गाड़ी भट्ठा गरे दौड़ैत रहैए जइमे बिनु ब्रेकक गाड़ी जकाँ केतेकेँ जानो जाइए आ केतेकेँ मुहोँ-कान फुटै छइ? रश्‍मिक मन कहलकैन- डेग आगू उठाएब जरूर कठिन अछि। मुदा लगले मनमे फेर उठलैन‍- जइ बाटकेँ पकैड़ आइ धरि चललौं जँ ओइ बाटकेँ छोड़ि दोसर बाट पकैड़ नव बटोही जकाँ विदा होइ, ई तँ संभव अछि। जहिना चिन्‍हार जगहक चोर पड़ा दूर देश जा अपन क्रि‍या-कलाप बदैल‍‍ लइए आ नव-मनुखक जिनगी बना जीबए लगैए...।

वाण लगल पंछी जकाँ पतिकेँ देख रश्‍मि अपन अनुभवकेँ सान्‍त्‍वना भरल शब्‍दमे बजली-

जहिना अहाँक जिनगी तहिना ने हमरो बनि गेल अछि। जएह बुढ़ापा अहाँक सएह ने हमरो अछि। मुदा एकठाम तँ दुनू गोरे एक छी। एक्के दबाइक जरूरत‍ दुनू गोरेकेँ अछि, तँए विचार दइ छी जे आब ने ओ रूतबा रहल आ ने ओकाइत, तखन जानि कऽ जहरो-माहूर खा लेब सेहो नीक नहि। मनकेँ थीर करू।

रश्‍मि‍केँ आगूक बात पेटेमे घुरियाइत रहैन तइ बिच्‍चेमे रविकान्‍त बजला-

बेसी दुख तँ नै बुझि पड़ैए मुदा साठि बर्खक प्रोढा अवस्‍था धरि हमरा सबहक नजैर नइ गेल! जखन कि सरकारक पैघ काजक जिम्मामे सभ दिन रहलौं। समयानुसार काज करितो अपन जिनगी तँ सुरक्षि‍त रखितौं। साठि बर्खक पछाइतो तँ चालीस बर्ख जीबैक छल। जखन कि ईहो तँ जनिते रही जे पछाइत दरमाहा टुटि जाएत आ जिनगीक आवश्‍यकता बढ़ैत जाएत।

पतिक विचारकेँ गहराइत समुद्र दिस जाइत देख मुँहक दसो वाण साधि रश्‍मि‍ छोड़लैन‍-

अनेरे मनमे जुड़शीतलक पोखैरक पानि जकाँ घोर-मट्ठा करै छी। ओना, घोरे मट्ठा ने घीओ निकालैए आ अन्‍है सेहो निकालैए। संयासी सभ केना फटलाहा कम्‍मल सबहक मोटरी बान्‍हि कन्‍हामे लटका लइए आ सौंसे दुनियाँ घुमैए। अहाँकेँ तँ सहजे‍ चरि-चकिया गाड़ी चलबैक लूरियो अछि।

पत्नीक विचार सुनि रविकान्‍त ओझरा गेला जे एक दिस संयासीक बात बाजि कहि रहल छैथ जे जहिना कानूनी अधिकारसँ जीवन-रक्षा होइए तहिना ने संयास अवस्‍था–माने वानप्रस्‍थ अवस्‍था– पवित्र मनुखक नैतिक अधिकार सेहो छी। आ दोसर दिस चरिचकिया गाड़ीक चर्च सेहो करै छैथ जे भरिसक अपनो लगा कऽ कहै छैथ..!

संगी देख रविकान्‍त दहलाए लगला। जहिना कोसी-कमलाक बाढ़िमे भँसैत घरपर बैस‍‍ घरवारी बंशियो खेलाइत आ कमला-कोसीक गीतो गबैत तहिना विह्वल भऽ रविकान्‍त बजला-

हँसी-चौल छोड़ू। आब कोनो बाल-बोध नै छी। आबो जँ समाजिक जीवन नै बनाएब तँ देखते छिऐ जे मनुख एकदिस चान छुबैए आ दोसर दिस सीकीक वाणक जगह बम-वारूद लऽ मनुखक बीच केहेन खेल दुनियाँमे खेला रहल अछि। खाएर, ओते सोचैक समए आब नइ रहल। जेकर तिल खेलिऐ ओकरा बहि देलिऐ। अपन चालीस बर्खक जिनगी अछि, ने हमर कियो मालिक आ ने हम केकरो मालिक छिऐ। भगवान रामकेँ जहिना अपन वानप्रस्‍थ जीवनमे अनेको ऋृषि‍-मुनि, योगी-संयासी सभसँ भेँट भेलैन‍ आ अपनो जा-जा भेँट केलखिन। तहिना ने अपनो दोसराक ऐठाम जाइ आ ओहो अपना ऐठाम आबए। मुदा विचारणीय प्रश्‍न ई अछि जे रामकेँ के सभ भेँट करए एलैन‍ आ किनका-किनका ओतए भेँट करए ओ स्‍वयं गेला। ई प्रश्‍न मनमे अबिते गाछसँ खसल पघिलल कटहर जकाँ रविकान्‍तक मन छँहोछित्त भऽ गेलैन‍। छँहोछित्त होइते जहिना खोंइचा-कमरी एक दिस होइत कोह उड़ि कऽ कौआ आगू पहुँच‍‍ जाइत, आँठी छड़ैप-छड़ैप बोन-झारमे बच्‍चा दइ दुआरे जान बँचबैत आ नेरहा उत्तर-दछिने सिरहाना दऽ पड़ल-पड़ल सोचए लगैत जे जेते पकबह तेते सक्कत हेबह तँए समए रहैत भक्ष बना लएह नहि तँ दुइर भऽ जेबह तहिना रविकान्‍त सोचैत-सौचैत जेना अलिसाए लगला तहिना हाफी-पर-हाफी हुअ लगलैन।

पतिकेँ हाफी होइत देख रश्‍मि‍क मनमे उठलैन‍ जे हाफी तँ निनियाँ देवीक पहिल सिंह-दुआरिक घन्‍टी छी। भने नीक हेतैन जे सुति रहता, नहि तँ ऐ उमेरमे जँ नीन उड़लैन‍ तँ अनेरे सालो-महिनेमे बदैल‍‍ जेतैन। फटकैत रश्‍मि बजली-

जेते माथ धुनैक हुअए वा देह धुनैक हुअए अपन धुनू। हमर जे काज अछि तइमे हम बिथूत नै हुअ देब। हमरा लिये तँ अहीं ने सभ किछु छी।

तीन साए घरक बस्‍ती बसन्‍तपुर। छोट-नमहर चालीसटा किसान परिवार गाममे शेष सभ खेत-बोनिहारसँ लऽ कऽ आनो-आनो रोजगार कऽ जीवन-बसर करैबला। अनेको जाति गाममे, जइमे मझोलका किसान बेसी। ओकरो सबहक दशा-दिशा भिन्न-भिन्न। तेकर अनेको कारणमे दूटा प्रमुख। जइसँ विधि-बेवहारमे सेहो अन्‍तर। किछु जातिक लोक अपने हाथे हरो जोइत लैत आ खेतक काजो करैत, जइसँ आमदनीक बँचतो होइत आ किछु एहनो जे अपने हाथसँ काज-उदम नै करैत तँए बँचत कम। कम बँचत भेने परिवार दिनानुदिन सिकुड़ैत गेल। ओना गामक बुनाबट सेहो भिन्न अछि। एक तँ ओहुना दू गामक बुनाबट एक रंग नहि, तेकर अनेको कारणमे प्रमुख अछि, खेतक बुनाबट, जनसंख्‍या आ जाति इत्‍यादि। बसन्‍तपुर गामक बुनाबट आरो भिन्न। ऊँचगर जमीन बेसी आ निचरस कम जइसँ गाछी-बिरछी सेहो बेसी अछि आ घर-घराड़ी, रस्‍ता-पेरा सेहो ऐल-फइल अछि।

बसन्‍तपुरमे दूटा नमहर किसान अछि। नमहर किसान परिवार रहने गामोक आ अगल-बगलक आनो गामक लोक जेठरैयती परिवारो बुझैत आ जेठरैयत कहबो करैए। राजक जमीन्‍दार तँ नहि, मुदा गमैया जमीन्‍दार सेहो किछु गोरे बुझैत। तेकर कारण जे दुनूक महाजनियोँ चलैत आ गामक झड़-झंझटक पनचैतियो करैत। कनी-मनी अनचितो काजकेँ गामक लोक अनठा दइत। तइमे राधाकान्‍त आ कुसुमलालक जमीनक बुनाबट सेहो भिन्न। चौबगली टोल सभ बसल अछि आ बीचक जे तीस-पैंतीस बीघाक प्‍लॉट छै ओ मध्‍यम गहींर अछि। जइसँ अधिक बर्खा भेने नाला होइत पानिक निकासी कऽ लैत आ कम भेने चौबगलीक ओहासीसँ रौदियाहो समैमे जमीन उपजिये जाइत। ओना दुनू गोरे बोरिंग सेहो गड़ौने छैथ तँए रौदियाहो समए भेने खेतक लाभ उठाइए लइ छैथ। पच्‍चीस-तीस बीघाक बीचक दुनू किसान छैथ। दुआरपर बखारियो आ पोखैरक महारपर दू-सलिया-तीन-सलिया नारोक टाल रहिते छैन।

राघाकान्‍तो आ कुसुमलालोक परिवारक बीच तीन पुश्‍तसँ ऊपरेक दोस्‍ती रहल छैन। ओना दुनू दू जातिक छैथ, मुदा अपेक्षा-भाव एहेन छैन जे चालि-ढालिसँ अनठिया कियो नहि ई बुझि पबैत जे दुनू दू जातिक छैथ। किएक तँ कोनो काज-उदेममे एक-दोसराक बाले-बच्‍चे एक-दोसरठाम अबैत-जाइत रहल छैथ। तेतबे नहि, कुटुम-परिवार जकाँ दुनू परिवारक बीच कपड़ा-लत्ताक वर-विदाइक चलैन‍ सेहो अछि। मुदा तैयो सराध-बिआह आदि परिवारिक काजमे दुनूक दू जातिक परिचय भाइये जाइ छैन।

नमहर भुमकम होइसँ पहिने जहिना नहियोँ होइबला बच्‍चा सबहक जन्‍म भऽ जाइ छै‍ जइसँ दोस्‍तियारेक संभावना अनेरो बढ़ि जाइ छै मुदा से नहि, राधाकान्‍त आ कुसुमलाल–दुनू गोरे–केँ एक्के दिन बेटा भेलैन‍। ओना कियो-केकरो ऐठाम जिगेसा करए नै गेला तेकर कारण भेल जे अपने-अपन घर ओझरा गेलैन‍। ओना, पमरिया-हिजरनी महिना दिन तक दुनू परिवारमे  दौग-बड़हा करैत रहल। रवि दिन जन्‍म भेने दाइयो-माइ छठिहारे दिन एकक नाओं रविकान्‍त आ दोसराक नाओं रविशंकर रखि देलखिन। अनेरे किए फूलक बोनमे आकि साँप-कीड़ाक बोनमे टहैलतैथ। बोन तँ बोने छी, दुनूक छी। तँए हरहर-खटखटसँ नीक दिनेकेँ पकैड़ लेलैन‍। ओना एकटा आरो केलैन‍ जे दुनूमे सँ कियो जातिक पदवी नै लगौलैन‍।

सुभ्‍यस्‍त परिवार रहने तीन बर्खक पछाइते स्‍कूल जाइ-जोकर दुनू भऽ गेल मुदा चारिम बर्खमे दुनूक नाओं गामेक स्‍कूलमे लिखौल गेल। ओना जेहने सोझमतिया राधाकान्‍त तेहने कुसुमलालो, मुदा नाओं लिखबै दिन रविकान्‍तक पिता गेलखिन आ राधाकान्‍त अपने नै जा भायकेँ पठौलखिन। पित्ती एक बर्ख घटा कऽ रविशंकरक नाओं लिखा देलखिन। ओना राधाकान्‍तकेँ स्‍कूलपर जेबाक मनो नहियेँ रहैन। किएक तँ स्‍कूल सबहक जे किरदानी भऽ गेल ओ देखै-जोग नै अछि। शिक्षक सभ विद्यार्थीकेँ नहियेँ पढ़ैले प्रेरित करै छैथ आ नहियेँ पढ़ैक जिज्ञासा जगा पबै छथिन, छड़ी हाथे पढ़बए चाहै छथिन।

एक तँ एकरंगाह परिवार तहूमे दोस्‍ती। दुनू गोरे तेहेन चन्‍सगर जे गामेक स्‍कूलसँ पटका-पटकी करैत निकलल। पटका-पटकी ई जे एक साल रविकान्‍त फस्‍ट करैत तँ दोसर साल रविशंकर, ओना हाइ स्‍कूलमे थोड़े गजपट भेलै, स्‍कूलक शिक्षक आँकि लेलैन‍ जे केतबो ऊपरा-ऊपरी छै तैयो सोचन-शक्‍तिमे दुनूक बीच अन्‍तर किछु जरूर छइ। कौलेज तँ बिना माए-बापक होइए, केकरा के देखत। मुदा ऑनर्सक संग दुनू गोरे प्रथम श्रेणीमे निकलल।

आइ.पी.एस. कऽ दुनू गोरेक ट्रेनिंग आ ज्‍वानिंग सेहो भेल। दोस्‍तीमे बढ़ोतरी होइते गेल।

शब्‍द संख्‍या : 2378

उलबा चाउर लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...।

 

4. पटियाबला

जेठ मास, दिनक तीन बजैत। देखैमे रातिसँ बहुत नमहर दिन बनैत मुदा जहिना कायाक संग माया आ रौदक संग छाया चलिते रहैए तहिना नमहर दिनक संग धूपो एते बढ़ि-चढ़ि जाइत अछि जे श्रमशक्‍तिक दौड़मे मझोलको दिनसँ छोट बनि जाइए। सुरूजक शक्‍तिवाण एते उग्र रूप पकैड़ लैत अछि जे धरतियो ताबा जकाँ तबैध आगि उगलैपर उताहुल भऽ जाइए। धरती-अकासक बीच लुलुआएल लू एक-ताले बाधमे नाचए लगैए। जेना राम-रावणक बीच वा महाभारतक सतरहम दिन भेल तहिना आ तेहने तीरसँ बेधित सुलेमान बेहोश भेल ओइ चिड़ै जकाँ श्‍यामसुनरक दरबज्‍जापर आबि दाबामे साइकिल ओंगठा ओसारक भुइयेँपर चारूनाल चीत खसि पड़ल। खसिते आँखि मूना गेलइ। जहिना बन्न आखि साँस चलैत अधमरूक होइत तहिना सुलेमान बेहोश छल।

श्‍यामसुनरकेँ बेरूका तीन बजेक चाह पीबैक अभ्‍यास छैन। बगलक घरक ओसारपर चाह बनबैत रहैथ‍ तँए साइकिलक खड़खड़ाएबसँ नै परेख सकला जे वाण लगल बाझ जकाँ कियो छैथ। साइकिलक बात समान्‍य तँए समुद्र उपछबसँ नीक जे जइ काजमे हाथ लागल अछि, ओकरा पूरा ली। सएह केलैन‍। चाह पीबैत श्‍यामसुनर दरबज्‍जापर अबिते देखलैन‍ जे ई अधमरू भेल के छिआ? मुँह निहारलैन‍ तँ चिन्‍हल चेहरा सुलेमानक!

आँखि बन्न, कुहरैत मनबलाक तँ बोलियो अ-स्‍पष्‍टे जकाँ भऽ जाइ छै, तँए बाल-बोध वा पशु जकाँ दुख बुझब कठिन भऽ जाइत, तथापि छाती थीर करैत श्‍यामसुनर टोकलखिन-

सुलेमान भाय, सुलेमान भाय?”

पानिक तहक अवाज जहिना ऊपर नइ अबैत, मुदा पानिक ऊपरक अवाज कम्‍पि‍त होइत, लहैरिक अनुकूल तेतए धरि जाइत जेतए ओ पूर्ण थिर नै भऽ जाइत। मुदा कोनो उत्तर अबैसँ पहिनहि श्‍यामसुनरकेँ मन पड़ि गेलैन‍ भिनसुरका अवाज- पटिया लेब पटिया, पटिया लेब पटिया।

लगले मनकेँ नअ घन्‍टा उचैट कहलकैन‍- भरिसक रौदक चोट आ मेहनतक मारिसँ सुलेमान एते बेथा गेल अछि जे आँखि खोलैक साहस नहि भऽ रहल छइ!

तैबीच चिन्‍हल दरबज्‍जा आ चिन्‍हार बोली अकाइन करोट फेरैत अधखिल्‍लू आँखि उठा सुलेमान बाजल-

श्‍याम भाय, केकर मुँह देख घरसँ निकललौं जे एको पाइक बोहैन नै भेल। उधार-पुधार ऐ उमेरमे खाएब नीक नै बुझै छी, कखन छी कखन नहि, केकरो खा कऽ मरब तँ कोसत। जलखै खा कऽ जे निकललौं, सएह छी। खाली पेटमे पानियोँ भोंकबे करै छै किने। पेटमे बगहा लगैए!”

सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनरकेँ भेलैन‍ जे भरिसक एकरे बिलाइ कुदब कहै छइ। भुखाएल बिलाइ जहिना छटपटाइत अपनो बच्‍चाकेँ कण्‍ठ चभैले तैयार हुअ लगैत तहिना भरिसक होइत हेतइ! मुदा रोगो तँ असान नहि, एक संग केते तीर लागल छैन। कोनो घुट्ठीमे तँ कोनो बाँहिमे, कोनो छातीमे तँ कोनो माथमे। भूख-पियास, थकान इत्‍यादिसँ बेधल छैथ! तोसैत श्‍यामसुनर कहलखिन-

सुलेमान भाय, आँखि नीक नहाँति खोलू। एक्के कप चाह बनौने छेलौं जे आँइठ भऽ गेल अछि। बाजू पहिने चाह पीब आकि खेनाइ‍ खाएब?”

पाश भरल बातमे आस लगबैत सुलेमान बाजल-

भाय, ऐ घरकेँ कहियो दोसराक बुझलौं जे कोनो बात बजैमे संकोच हएत। देहमे तेते दर्द भऽ रहल अछि‍ जे कनी पीठपर चढ़ि खुनि दिअ पहिने, तखन बुझल जेतइ।

साए घरक जुलाहा परिवार गोधनपुरमे। झंझारपुरसँ पूब सुखेत पंचायतक गाम गोधनपुर। जैठाम मरदे-मौगीए मिलि बिछानक कारोबार करैए। गाम-गामसँ मोथी कीनि, अपनेसँ सोनक डोरी बाँटि बिछान बीनि, उत्तरमे अंधरा ठाढ़ी, दछिन घनश्‍यामपुर, पूब घोघरडीहा आ पच्‍छिममे मेंहथ-कोठिया-रैमा धरिक बजार बना कारोबार करैए। ओना जुलाहा खाली गोधनपुरेटा मे नहि आनो-आनो गाममे अछि मुदा बिछानक कारोबार गोधनपुरेटा मे होइत। शहर-बाजरमे जहिना रंग-बिरंगक वस्‍तु-जात बिकाइत तहिना गामो-समाजक बजारमे चलैए। जइमे रंग-बिरंगक वस्‍तु-जातक बिकरी-बट्टा होइए। किछु वस्‍तुगत अछि आ किछु भावगत।

साइयो परिवार अपन-अपन क्षेत्र बनौने अछि। सभ दिन सभकियो भिनसरे जेर बना-बना निकैल जाइए। ओना कहियोकाल सुलेमानो जेरेमे निकलैत रहए मुदा आइ असगरे निकलल छल। अपनामे सीमाक अतिक्रमण करबो करैत आ नहियोँ करैत। खुल्‍ला बजार तँ वएह ने टिकाउ होइत जे बिसवासू वस्‍तुक बिकरी करए। नइ तँ घटिया माल आ बेसी दाममे वस्‍तुक बिकरी हएत। मुदा गोधनपुरक पटियाबलामे से नहि, एकरंगाह वस्‍तु एकरंगाहे दाममे बेचैत।

पीठसँ घुट्ठी धरि जखन श्‍यामसुनर दस बेर बुलला तखन सुलेमान पड़ले-पड़ल बाजल-

भाय, आब उतैर जाउ। एह, अरे बाप रे! ओइ जिनगीसँ घुरलौं। मन हल्‍लुक भेल।

कहि फुरफुरा कऽ उठि बैसैत बाजल-

भाय, अचेत जकाँ भऽ गेल छेलौं। आँखि चोन्‍हिया गेल छेलए। सौंसे अन्‍हारे बुझि पड़ए लगल छेलए। ई तँ रच्‍छ रहल जे दरबज्‍जाक पैछला देबालक ठेकान रहल, नहि तँ केतए वौआ कऽ मरितौं तेकर ठीक नहि।

श्‍यामसुनर सुलेमानक बातो सुनैत आ मने-मन विचारबो करैत जे हो-न-हो दरबज्‍जापर मरि जाइत तँ मुँहदुस्‍सी चिड़ै जकाँ लोक केना मुँह दुसैत तेकर कोनो ठीक नहि। जैठाम घरपर चिड़ै बैसने घरक सभ किछु चलि जाइत अछि तैठाम आइ हमरा संगे की होइत! मुदा जइ दुर्गतिक दुर्गपर सुलेमान पहुँच‍‍ गेल छल ओइठाम मनुखक मनुखपना केहेन होइ, ईहो तँ एक प्रश्‍न अछि।

सत्तैर-पचहत्तैर बर्खक सुलेमान सभ दिन पचास किलो मीटर बिछानक बोझ लऽ कऽ टहैल बेचि जीविकोपार्जन करैत अछि, ओहनकेँ की कहल जाए। जे खून-पसीना एकबट्ट कऽ जीब रहल अछि ओकर अन्‍तिम बोलो कियो परिवारक सुनि पबितै..?

श्‍यामसुनरक मन ठमैक गेलैन। ठमैकते बजला-

सुलेमान भाय, आब केहेन मन लगैए, किछु खाइ-पीबैक इच्‍छा होइए?”

मुस्‍की दैत सुलेमान बाजल-

भाय, आब जीब गेलौं। आब खेबे करब किने। किछु दिन औरो दुनियाँक खेल-बेल देख लेब।

जहिना गुड़ घाक टनक जेते बहैसँ पहिने रहैत अछि आ मुँह बनि निकैलते किछु बेसिया जाइत मुदा खिल–मूल–निकलला पछाइत‍ जहिना सुआस पड़ए लगै छै, जइसँ रूप बदैल‍‍ जाइ छै, पाशा आस लगबए लगै छै, तहिना सुलेमान बाजल-

भाय, सरेलहा भात-रोटी खाइक मन नै होइए।

तखन?”

टटका जँ गहुमक चारिटा रोटी भऽ जाइत तँ मन तिरपित भऽ जइत। ताबे नहा सेहो लेब।

सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनर बजला-

कल देखल अछि? बाल्‍टीन-लोटा आनि दइ छी, नीक नहाँति नहा लेब।

श्‍यामसुनरक बात सुनि हँसैत सुलेमान बाजल-

भाय, एना किए बजै छी। पचासो दिन पानि पीने हएब आ केतेको दिन नहेने हएब, तखन कल देखल नै रहत। लोटा-बाल्‍टीन कथीले आनब, आँगनमे काज हएत। हम सभ तरहक लूरि रखने छी ठाढ़े-ठाढ़ वा बैस‍‍ कऽ सेहो नहा लइ छी आ जँ सासुर-समधियौर गेलौं तँ लोटो-बाल्‍टीन लऽ कऽ नहा लेलौं। ओना, भाय की कहूँ लोको सभ अजीब-अजीब अछि। ने माल-जाल जकाँ नाँगैर छै‍ आ ने मनुखपना छइ। एक दिन अहिना रौदमे मन तबैध गेल रहए। एक गोरेक दरबज्‍जापर कल देखलिऐ, साइकिल अड़का नहाइले गेलौं। मन भेल पहिने चारि घोँट पानि पीब ली। तही बीच एकटा झोंटहा आबि झटहा फेकलक जे कल छुबा जाएत!”

सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनरक मनमे वाल्‍मीकि आबि गेलैन। तमसा नदीक तटपर वाण लगल क्रोंच पक्षीपर नजैर गेलैन। मुदा अपनाकेँ सम्‍हारैत बजला-

अहूँ सुलेमान भाय कोन खिस्‍सा भुखाएलमे पसारै छी। झब-दे नहाउ, आँगनमे ताबे रोटी बनबबै छी।

सुलेमान कल दिस आ श्‍यामसुनर आँगन दिस बढ़ला। जहिना भोजनक पूर्व स्‍नानसँ खुशी होइत तहिना खुशी होइत सुलेमान कल दिस बढ़ला। मुदा श्‍यामसुनरक मनमे प्रश्‍न-पर-प्रश्‍न उठए लगलैन‍। पहिल प्रश्‍न उठलैन‍ जे मृत्‍यु-सज्‍जापर पड़ल यात्रीकेँ वा फाँसीपर चढ़ैत यात्रीकेँ पुछि भोजन देल जाइत अछि। अपना मुहेँ सुलेमान कहलक जे गहुमक रोटी खाएब। बिनु मेजनक गहुमक रोटी ओहने होइत जेहेन डम्‍हाएल मालदह आम। जँ सोझहे रोटी कहैत तँ मरूआ रोटीक मेजन अचार, पिआजु, नून-मिरचाय, तेल सेहो होइत, मुदा टटका गहुमक रोटी केहेन हएत? सभकेँ अपन-अपन प्रेमी होइ छइ। जँ से नइ होइ छै तँ जुड़शीतलमे अरबा चाउरक बसिया भात-ले पहिने लोक तरूआ-भुजुआ किए बना लइए? मुदा तँए कि मोटका चाउरक बसिया भातक प्रेमी नून-पिआजु-अँचार नै हेतइ। मुदा जेते जल्‍दि‍बाजीक जरूरत अछि–जल्‍दि‍वाजी ई जे भुखाएल पेट, स्‍नानक पछाइत‍‍‍ दोसर रूप पकड़ैत–तइमे रसदार तरकारी बनाएब संभव नहि, तँए दूटा घेरा पका चटनी आ रोटीसँ काज चलि सकैए। सएह केलैन‍।

स्‍नान कएल नोतहारी जकाँ दरबज्‍जापर अबिते सुलेमानक भुखाएल मन प्रेमी भोजनक बाट ताकए लगल।

आगूमे थारी देखते सुलेमानक मन सौनक सुहावन जकाँ हरैष‍ उठल। रोटीक पहिल टुक चटनीक संग मुँहमे अबिते दँतिया कऽ दाँत पकैड़ जीह रस चूसए लगल। रस पबिते बिहुसैत सुलेमान बाजल-

भाय, दुनियाँमे केतौ किछु ने छइ। छै सबटा अपना मनमे। जाबे आँखि तकै छी ताबे बड़ बढ़ियाँ, आँखि मुनिते दुनियाँ धिया-पुताक खेल जकाँ उसैर जाइ छइ। अपने मुइने सृष्‍टि‍क लोप भऽ जाइ छइ।

सुलेमानक गंभीर विचार सुनि श्‍यामसुनरक मनमे उठलैन‍ जे भोजैत जँ भोजहैरिक रसगर बात सुनै छै तँ ओ आरो बेसी आनन्‍दि‍त होइ छइ। मुदा अपन बात तँ बिनु प्रश्‍न पुछने नै हएत। द्वैतमे दुनियाँ हेराएल छइ। बाढ़ि आएल धार जकाँ केतए-सँ-केतए भँसिया जाएत तेकर ठेकान रहत...। श्‍यामसुनर बजला-

सुलेमान भाय, ऐ उमेरमे एते भारी काज किए करै छी?”

   श्‍यामसुनरक प्रश्‍न सुनि सुलेमान विह्वल भऽ गेल। जिनगीक हारल सिपाही जकाँ तरसैत बाजल-

भाय, जखन अहाँ घरक बात पुछिये देलौं तखन किए ने सभ बात कहिये दी।

सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनर बुझि गेला जे बरियातीक भोज हुअ चाहैत अछि, से नहि तँ चरिया दिऐन-

सुलेमान भाय, कहने छेलौं जे गरम-गरम रोटी खाएब सराएल नै खाएब आ अपने गपक पाछू सरबै छी?”

श्‍यामसुनरक बात सुनि हाँइ-हाँइ दूटा रोटी आ अदहा चटनी खा एक घोंट पानि पीब सुलेमान बाजल-

भाय, माए-बापक बड़ दुलारू बेटा छेलिऐ। खाइ-पीबैक कोनो दुख-तकलीफ परिवारमे नै रहए। कपड़ाक कारोबार छल। चरखा चलबैसँ लऽ कऽ खादी भंडारसँ हाट धरिक कारोबार छल।

श्‍यामसुनरक मनमे उठलैन‍- मोबाइल, टी.बी, कम्‍प्‍यूटर, कपड़ा, जूतासँ घर भरल रहै छै मुदा सबुरक केतौ ठेकान नहि। भरि पेट अन्न नहि, फटलो वस्‍त्र नहि, मुदा छुच्‍छहो घरमे सबुर केना फड़ि जाइ छै! सुलेमानक परिवारिक जिनगीक ललिचगर गप सुनि श्‍यामसुनर जिज्ञासा केलैन‍-

ओ कारोबार किए छोड़ि देलिऐ। मेहनतो आ आमदोक खियालसँ तँ नीके छेलए?”

अपन बामा हाथसँ चानि ठोकैत सुलेमान बाजल-

गाम-गामक बाबू-भैया सभ गरीबक कारखाना उजाड़ि देलक। खादी भंडारकेँ लूटि लेलक। छुच्‍छे हाथे की करितौं।

फेर जिज्ञासा करैत श्‍यामसुनर पुछलखिन-

कोन-कोन तरहक कपड़ा बनबै छेलिऐ?”

सुलेमान-

पहिरन वस्‍त्रसँ लऽ कऽ ओढ़ैक सलगा धरि बनबै छेलिऐ।

डुमैत नाव देख जहिना नैया निराश भऽ जाइत जे जँ जिनगी बँचियो जाएत तँ जीब केना, तहिना सुलेमानक तरसैत मन काँपए लगल।

बातकेँ समटैत श्‍यामसुनर बजला-

ई तँ धिया-पुताक खेल भेल, जाए दियौ।

श्‍यामसुनर सुलेमानकेँ तँ कहि देलखिन जाए दियौ मुदा अपन मन ठमकलैन‍। काजक रूपमे समाज बँटल अछि। ओइ काजक लूरि तँ ओकरा-ले सुरक्षि‍त छइ। जँ कागजी ज्ञानक अभावो रहतै आ विकसित बेवहारिक ज्ञान देल जाइत तँ की घर-घर पाठशाला नै बनैत? जरूरत‍ छल समयानुकूल ओकरा बनबैक। से नै भेल।

तेसर रोटी खाइत सुलेमान बाजल-

भेल तँ सएह, मुदा परिवार बिलैट गेल।

परिवारक बिलटब सुनि श्‍यामसुनर आगू बढ़ि पुछलखिन-

अपन परिवारक कारोबार मरि गेला पछाइत‍‍ की केलिऐ?”

श्‍यामसुनरक प्रश्‍न सुनि उत्‍साहित होइत सुलेमान बाजल-

की केलिऐ! हमरो जुआनीक उठाइन रहए। मनमे अरोपि लेलौं जे दुनियाँमे केतौसँ कमा कऽ परिवार जीवित रखबे करब।

सुलेमानक संकल्‍पि‍त बात सुनि वाह-वाही दैत श्‍यामसुनर पुछलखिन-

दोसर कोन काज केलिऐ?”

गाम-गामक कपड़ा बुननिहार बम्‍बइ चलि गेलिऐ।

बम्‍बइमे केतए?”

भिवंडी। भिवंडीमे लूम चलै छइ। ओइमे कपड़ा बुनाइ होइ छइ। गमैया लूरि तँ रहबे करए, लगले नोकरी भऽ गेल। ओना मजदूरी रेट कम रहइ मुदा काजक माप सेहो रहइ। जेते करब तेते हएत। जुआन-जहान रहबे करी दिनकेँ ने दिन आ ने रातिकेँ राति बुझिऐ। खूब कमेलौं।

श्‍यामसुनर-

तखन ओकरा किए छोड़ि देलिऐ?”

श्‍यामसुनरक बात सुनि सुलेमानकेँ ओहिना भेलैन‍ जहिना चोटेपर दोहरा-तेहरा कऽ चोट लगलासँ होइत। कुम्‍हलाएल फूल जकाँ मुँह मलिन आ ठोरमे फुरफुरी आबए लगलैन नमहर साँस छोड़ैत बाजल-

भाय, चारि साल खूब कमेलौं, पाँचम साल बिहारी-मराठीक हल्‍ला उठल। हल्‍ले नै उठल केतेकेँ जानो गेल, केतेकेँ बहु-बेटी छिनाएल, केतेकेँ कमाइ लूटाएल। सभ किछु छोड़ि जान बँचा गाम आबि गेलौं।

तैपर श्‍यामसुनर फेर पुछलखिन-

गाममे आबि फेर की केलिऐ?”

सुलेमान-

तेही दिनसँ पटियाक ई कारोबार शुरू केलौं। सभ परानी लागल रहै छी, घीचि-तीड़ि कऽ कहुना दिन बीतबै छी।

श्‍यामसुनर-

सुलेमान भाय, हम ई नै कहब जे अहाँ नै काज करू, मुदा काजक ओकाति तँ देखए पड़त किने। कहुना-कहुना तँ चालीस-पचास किलोमीटर साइकिल चलैबते हेबइ?”

हँ से ने किए चलबैत हएब। आब की ओ कोस रहल जे घन्‍टामे कोस चलैमे लगै छल।

मुड़ी डोलबैत श्‍यामसुनर बजला-

एक तँ ओहिना शरीर ढील भऽ रहल अछि तैपर साइकिल चलबै छी। तेतबे नहि, हो-न-हो केतौ रस्‍ता-पेरामे खसिये-तसिये पड़ब आ हाथ-पएर टुटि जाएत तँ के देखत?”

एक तँ सुलेमानक जरल मन ठंढाएल तैपर सँ परिवार-ले हाथ-पएर टुटब सुनि बाजल-

भाय, केतबो अन्‍हारमे अनचिन्‍हार लोक ढेरिया किए ने गेल, मुदा हमहूँ तँ कोनो समाजक लोक छी तँए सभ समाज अपन-अपन धर्मक पालन करैए। तहूमे हम तँ चिन्‍हार छी, गोटे-गोटे अनठा कऽ आगू बढ़ि जाएत मुदा सभ तेहने तँ नहियेँ अछि। तहूमे जागल लोककेँ थोड़े विनाश होइ छइ।

सुलेमानक जागल बात सुनि श्‍यामसुनर ठमकला। मन कहलकैन- बात तँ बड़ सुन्‍दर अछि मुदा जागलक की अर्थ सुलेमान बुझैए, से बिनु जनने बात नै बुझि सकब। एक्के चीजक नाओं-शब्‍द ढेर अछि, नाओंक संग काज जुड़ल अछि। तैठाम बिनु पुछने काज नै चलत। पुछलखिन-

भाय, जागल केकरा कहै छिऐ?”

जेना सुलेमानकेँ रटले रहै तहिना धाँइ-दे बाजल-

भाय, जखन आँखि मूनल देखै छिऐ तँ बुझि जाइ छिऐ जे सूतल अछि आ आँखि तकैत रहैए तँ बुझि जाइ छिऐ जे जागल अछि।

फेर ताकबमुनबक ओझरी श्‍यामसुनरकेँ लगलैन‍। मुदा ओझरीमे नै पड़ि आगू बढ़ैत पुछलखिन-

केते गोरेक परिवार अछि?”

सुलेमान कहलकैन-

अछि तँ बहुत मुदा चारू बेटीकेँ सासुर बसने अखन तीनियेँ गोरेक अछि।

श्‍यामसुनर पुछलखिन-

बेटासँ ने किए ई काज करबै छी, ओ तँ जुआन हएत?”

बेटाक नाओं सुनि सुलेमान विह्वल भऽ गेल। जेना केतौ सुख-दुख दुनू बहिन गाड़ा-जोड़ी कऽ सामाक गीत गबैत होइ तहिना सुलेमान बाजल-

भाय, उमेरक ढलानेमे बेटा भेल। सभसँ छोट अछि। ओकरो दू अक्षर नै पढ़ा देबै, तँ लोक की कहत?”

लोक लाज सुनि श्‍यामसुनर हेरा गेला। एहनो जिनगीमे लोक-लाज जीवित अछि! बिहुसैत पुछलखिन-

मन लगा कऽ पढ़ैए किने?”

केकरा मनक बात ऐ युगमे के कहत। सभ अपने बेथे बेथाएल अछि। सुलेमान बाजल-

भाय, से तँ ओकरे मन कहतै जे मन लगा कऽ पढ़ै छी आकि मन उड़ा कऽ पढ़ै छी।

अहाँ की देखै छिऐ?”

हम तँ अपना धंधामे लगल रहै छी। तखन केना देखबै?”

संगी-साथी सभ कहैत हएत किने?”

हँ, से तँ कहैए जे जाइए पढ़ैले आ चलि जाइए सिनेमा देखए, मैच देखए।

परीछामे पास करैए किने?”

हँ से तँ ढौऔ-कौड़ी लगने पास कइए जाइए।

तब तँ आशा अछि?”

हँ, से तँ ओकरेपर टक लगौने छी। जँ कहीं नोकरी भेलै तँ दिने बदैल‍‍ जाएत।

बेटाक बात छोड़ि श्‍यामसुनर पत्नी-दे पुछलखिन-

घरवाली की सभ करै छैथ?”

पत्नीक नाओं सुनि सुलेमान पसिज गेल। मनमे उठलै- आब कि पत्नी ओ पत्नी रहल। संगे-संग चलबैवाली, काँट-कुशक परवाह केने बिना कखनो गुरुक काज करैवाली, तँ कखनो संगीक, कखनो प्रेमीक! जिनगीक अन्‍ति‍म क्षण धरि रहैक प्रतिज्ञा..! बाजल-

भाय, कहुना कऽ बुढ़िया भानस भात कऽ लइए। बेचारी दम्मासँ पीड़ित अछि!”

इलाज किए ने करा दइ छिऐन?”

गरीब घरक लोकक इलाज की हेतइ। जेते पथ होइ छै तइसँ बेसी कुपथे भऽ जाइ छइ। तखन तँ चाहै छी जे बेचारी पहिने मरए।

पहिने मरए सुनि श्‍यामसुनर पुछलखिन-

से किए?”

एतेटा जिनगीक सभ कमाइ लूटा जाएत, जखन हम मरि जेबै आ ओइ बेचारीक भीखक कलंक लागत।

सुलेमानक बात सुनि श्‍यामसुनर गुम भऽ गेला। किछु फूरबे ने करैन। सुलेमानक चेहरा दिस तकैत रहला। जेना आश्‍चर्यमे श्‍यामसुनर पड़ि गेला तहिना। किछुकालक पछाइत‍‍ कहलखिन-

आइ रहि जाउ। काल्हि‍ एम्‍हरेसँ बेचैत-बिकनैत चलि जाएब।

तैपर हँसैत सुलेमान बाजल-

भाय, जेना आइ एको पाइ बोहैन नै भेल तेना नीके हएत। मुदा, बिमरयाह घरवालीकेँ एक नजैर नै देख‍ लेब से केहेन हएत।

शब्‍द संख्‍या : 2413

उलबा चाउर लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...।

 

 

 

5. सनेस

लक्ष्‍मण रेखाक बीच सीता नहाँति बैसल सनक काका प्रेम रस पीब प्रेमीक संग अधरुपिया चालि पकैड़‍ अधखिलू फूलक गमकमे गमियेला, गमियाइते सौंझुका सिंगहार जकाँ मुँहक मुस्‍की महमहेलैन‍- अजीब ईहो दुनियाँ अछि। ने सतीए अछि आ ने वेश्‍ये अछि। बनौनिहारकेँ धन्‍यवाद दी जे एक दिस विवेकक विन्‍यास बाँटि पाँतिए-पाँति, पाते-पात परैस देलैन‍ तँ दोसर दिस दिन-राति बना आगूमे ठाढ़ कऽ देलैन‍। धर्मक संग पाप, सुकर्मक संग कुकर्म, विद्वानक संग मुरुख आ पुरुखक संग मौगीक जोड़ा लगा-लगा पतियानी बीच पात्रेक पत्ते-पत्ते सेहो परैस देलैन‍..!

जेते आगू दिस सनक काका देखै छला ओते छगुन्‍ता लगै छेलैन‍। एक दिस पानिक ठोप चन्‍द्रोदक कहबैत, तँ दोसर दिस असीम अथाह क्षीर सागर, मुदा चन्‍द्रोदको तँ केतौ दूधक तँ केतौ पानिक तँ केतौ दूधपनिया सेहो होइते अछि। कहू जे ई केहेन दुनियाँक खेल छी जे कियो असकरेमे सोल्‍होताल धऽ नचबो करैए, गेबो करैए, देखबो करैए आ कियो भीड़-भाड़ तकैत रहैए जे जेतेक देख‍निहार रहत तेते नीक नाच हएत।

दुनियाँक चक्कर-भक्कर देख‍ सनक कक्काक मन तरे-तर उदास भेल जाइत रहैन। जहिना घुमती बरियाती रंग-रंगक बात करैत तहिना मनमे उठैत रहैन। अनेरे मनुख बनि जन्‍म लेलौं। मनुखपना जखन एबे ने कएल तखन मनुख किए भेलौं? मुदा पना औत केना? बाँसक पना ओधि होइत अबै छै, केरा-मोथी-अड़िकोच इत्‍यादिमे सेहो ओहिना अबै छै, मुदा मनुखमे से कहाँ भेल? की बिनु पनेक मनुख ठाढ़ हएत? ठाढ़ तँ हएत मुदा शुद्ध ठाढ़ हएत आकि अशुद्ध? जखन जानवरोमे फेंट-फाँट होइते छै, तखन अपन हिस्‍सा मनुखे किए छोड़ि देत..?

थोड़ेकालक पछाइत सनक कक्काक मन कहलकैन- ओह! अनेरे दुनियाँक महजालमे फँसि मरैले छड़पटाइ छी। दुनियाँमे के एहेन अछि जे सुख-सागरमे बैस आनन्‍द नहि चाहैए, मुदा दुनियोँ तँ दुनियेँ छी जइमे रंग-बिरंगक सागरो सभ बसल अछि। क्षीर सागर, सुख सागर, लाल सागर, कारी सागर इत्‍यादि अनेक सागर...।

सनक कक्काक मन ठमकलैन‍। ठमैकते मनमे उठलैन- जीबैतमे जेतए वौआइ मुदा समाधि तँ ठौरपर लेब। जँ से नहि तँ हिटलर जकाँ थूकक धारमे भँसियाइत रहब!

उदास मन, बिरहाइत बगए सनक कक्काक रहैन। तखने भातीज पोलीथिनक झोरामे अदहा किलो अंगूर आ किलो भरि सेब आगूमे रखि देलकैन।

झोरा आगूमे देखते ठहाका मारि सनक काका हँसला। कक्काक ठहाकाक चोट मनमोहनकेँ नइ लगलैन‍, जेना आमक गाछपर गोला फेकते कोनो आमकेँ खसने गोलवाहकेँ जेहेन खुशी होइत सएह खुशी मनमोहनकेँ भेल। मुदा निशान साधल आमक महत किछु आरो होइते अछि। मनमोहन बाजल-

काका, ई अहींक सनेस छी।

सनेस सुनि सनक काका चौंकला जे सनेस कहि की कहैए! पुछलखिन-

केतक सनेस छी?”

कश्‍मीरी सेब छी आ पूनाक चमन अंगूर।

मनमोहनक बातसँ सनक कक्काक मन तरे-तर सनकए लगलैन। छौड़ा की बुझि मजाक करए आएल। जहिना बाप एकोटा कुकर्म नै छोड़लकै तही उतारक अपनो भेल जा रहल अछि आ सेब-अंगूर देखबए आएल अछि!

मुदा तामसकेँ तरेमे दाबि काका बजला-

हौ मनमोहन, एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की। बच्‍चा सभकेँ दऽ दिहक। अपने अनरनेबा आ लताम दुइर होइए। जेते तोहर लेब तेते अपन दुइरे हएत। अच्‍छा, एकर भाउ की छइ?”

लगले सुरे मनमोहन पुछि देलकैन-

एकर भाउ बुझैक कोन जरूरत‍‍ पड़ि गेल?”

मने-मन सनक काका सोचलैन‍ जे छौड़ा नमहर छिनार-लूटार जकाँ बुझि पड़ैए। बजला-

बौआ, आब तँ सहजे‍ चल-चलौए छी मुदा अपनो देश-कोसक हाल बुझब कोनो अधला थोड़े हएत?”

एक तँ सनक कक्काक बदनामी शुरूहेसँ रहलैन‍ जे घरोक लोक सनकाहे कहै छैन। केना नै कहतैन, सभ अपन-अपन परिवारक बाल-बच्‍चा-ले करैए आ सनक काका से बुझबे ने करै छैथ, माने अपन परिवार आ दोसर परिवारमे कोनो भेद नहि। जहिना अपन परिवार तहिना दोसराक।

अखन धरि मनमोहन यएह बुझैत जे परिवारोसँ काका बाड़ले-बेरौल छैथ तँए सभ चीजक दुख-तकलीफ होइते हेतैन। मुदा गप-सप्‍पसँ मनमोहनक नजैर करुआए लगल।

मनमोहनक रूखि देख सनक काका बुझैक कोशिश करए लगला, कारण की छइ। मुदा मनमे मिसियो भरि सन्‍देह अपनापर नै भेलैन‍। मन गवाही दैते रहलैन जे निनानबे प्रतिशत राक्षसक देश लंकामे विभीषण केना भक्‍ति‍-भजन करैत जिनगी गुदस करै छला। केहनो सघन बोन सुकाठ-कुकाठक किए ने हौउ मुदा आमक गाछ आम आ लतामक गाछ लताम फड़ब बिसैर जाएत? दोहरा कऽ मनमोहनकेँ पुछलखिन-

हौ बौआ, जहिना एक्के गोरे डाक्‍टरो आ इंजीनियरो नै भऽ सकैए किएक तँ दुनूक दिशा अलग-अलग छइ। मुदा सेबक जगह जँ अपनासँ नीक लताम आ अंगूरक जगह अनरनेबा नेने अबितह तँ फले नहि बीओ रोपि देतिऐ।

कक्काक प्रश्‍न सुनि मनमोहन उछलैत बाजल-

काका, दुनियाँ आब घर-आँगन बनल जा रहल अछि आ अहाँ अपन पुश्‍तैनी विचार रखनहि रहब।

मनमोहनक साँसक गरमीकेँ अंकैत सनक कक्काक सनकी तेज नै भेलैन‍। मिरमिराइत बजला-

बौआ, जँ दुनियाँ घर-आँगन बनि गेल तँ ओ नीक बात, मुदा ई तँ नीक नहि जे कियो नौड़ी-छौड़ी बना भाषा-साहित्‍य-संस्‍कृतिकेँ ओझरा मटिया मेट कऽ दिअए। से कनी बुझा दाए जे की भऽ रहल छइ?”

गुम्‍हरैत मनमोहन कहलकैन-

काका, दुनियाँ आब नव पीढ़ीक अछि तँए केतबो दुसबै ओ चढ़बे करत।

मनमोहनक प्रश्‍नसँ सनक कक्काक सनकी पाछू मुहेँ ससरलैन‍। पछुआ पकैड़‍ बजला-

बौआ, जर्मनी-जापानी आ अंग्रेजी शब्‍द ऐ लेल चढ़-चढ़ौ भऽ गेल जे ओकर विकास अगुआ कऽ मशीनमे पहुँच‍‍ गेल आ मशीनक नाओं रखि-रखि अहाँक घर-अँगनामे छिड़िया देलक! आ अहाँ ऋृषि‍-मुनिक राज मिथिला कहि-कहि ओतए पहुँच‍‍ गेलौं जे ओ सभ (ऋृषि-मुनि) की कहलैन‍ तेकर डि‍क्‍शनरिये चोरा लेत। तखन अहाँ बुझबै जे केहेन नव युगक नव लोक बनि गेलौं?”

सनक कक्काक बात सुनि मनमोहन ठमकल तँ मुदा पाछू हटैले तैयार नहि भेल। बाजल-

काका, बजारमे अखन एक-सँ-एक खाइयो-पीबैक समान आ फलो-फलहरी तेहेन आबि गेल अछि जे अपना ऐठामक फल-फलहरीकेँ के पुछत?”

मनमोहनक प्रश्‍न सुनि सनक कक्काक सनकी आगू मुहेँ ससरलैन, बजला-

बौआ, कोनो देश-कोसक विकासमे ओइठामक माटि, ओइठामक पानि, हवा इत्‍यादि जेकरा पंचभूत कहै छहक, मुख्‍य तत्व भेल। अनुकूल गतिए सृष्‍टि‍ चलैए। अपना ऐठामक लताम आकि कोनो आने फल जे अछि ओकरा ऐठामक काल-क्रि‍याक गतिए जे जरूरी छल ओ प्रकृति पैदा केलक। अपना ऐठाम एकरे अभाव भेल जे पहाड़ी फलकेँ मैदानी क्षेत्रमे नीक मानल जाइए।

अपनाकेँ निरुत्तर होइत देख मनमोहन मैदानसँ हटैक विचार करए लगल। मुदा सेब-अंगुरक पोलिथीन बीचक सीमा बनल रहलै। रूमाल चोर जकाँ सीमा पहिने के टपत..!

पाछू हटैत मनमोहन बाजल-

बड़ आशा लगा अनने छेलौं जे काकाकेँ नीक फल खुएबैन।

मनमोहनक बात सुनि सनक काका तारतममे पड़ि गेला जे अखन धरि जे हम बुझै छेलिऐ तइसँ भिन्न ने तँ मनमोहन अछि। आशाक दोहाइ लगा बजैए जे आशा लगा अनने छेलौं आशा तँ सभकेँ अपन-अपन होइ छइ। सबहक देहेटा अलग-अलग नहि, मनक उड़ान सेहो होइ छइ। पिजरामे बन्न सुग्‍गोकेँ पोसनिहार सिखबैए जे आत्‍मा राम पढ़़ू- चित्रकूट के घाटपर भए सन्‍तन के भीड़। तुलसी दास चानन रगड़े, तिलक करे रघुवीर...।मुदा सेहो तँ नहि बुझि पड़ैए। तखन? ओ तँ पुछनहि पता चलत। पुछलखिन-

हौ बौआ, जहिना घरक लोक हमरा बताह कहैए तहिना ने ओकरो सभकेँ सनकपनीए फल खुएबै।

कहि मने-मन सनक काका सोचए लगला। भाँग पीब कियो बाजि चुकल छैथ आकि असथिर मने सोचि कहने छैथ जे जेहेन खाइ अन्न तेहेन बने मन!’ मुदा अहू छौड़ाकेँ तँ छिछा-बीछा नीक नहियेँ छइ। भरि दिन देखै छिऐ जे ऐठामसँ ओइठाम, ओइठामसँ ऐठाम ढहनाइते रहैए। तैपर सँ दिन-दिन आगूए मुहेँ ससैर‍ रहल अछि, से केना? बहुरुपिया ने तँ छी? सलाइ रिंच जकाँ सभ नट पकड़ैबला..!

तही बीच मनमोहन बाजल-

काका, अहाँ अपने हाथे बाँटि दियौ।

मनमोहनक बात सुनि सनक काका ठमैक गेला। जहिना कोनो टपारि कुदैले दू डेग पाछू हटि दौग कऽ टपल जाइत तहिना काका पाछूसँ आगू बढ़ि बजला-

हौ बौआ, बतरसिया हाथ भऽ गेल, ओहुना हरिदम थरथराइते रहैए, तैपर कोनो काज करैकाल तँ आरो बेसी थरथराए लगैए। अपन चीज जे थोड़-थाड़ छिड़ियाइयो गेल तँ नहि कोनो, मुदा तोहर जे एकोटा अंगुर खसि पड़त तँ तोरे मन की कहतह। यएह ने जे सनकाहक ठेकान कोन। तँए हमरा चलैत तोरा मनकेँ ठेँस लागह से नीक नहि बुझै छी।

कक्काक बात सुनि मनमोहन बाजल-

तँ की काका घुमा कऽ लऽ जाइ?”

अनेरे ओझरीमे ओझराएल अपनाकेँ देख सनक काका, ठाँहि-पठाँहि बजला-

ई तोहर खुशी छिअ जे घुमा कऽ घरपर लऽ जा वा दोकानदारेकेँ घुमा दहक वा रस्‍ता-पेरामे कोनो धिए-पुतेकेँ दऽ दहक। हम किछु ने कहबह। एते दिनक पछाइत‍‍‍ दरबज्‍जापर एलह सएह खुशी अछि।

सनक कक्काक बात सुनि जहिना जाड़सँ कठुआ कियो देह-हाथ तानि अचेत भऽ जाइए तहिना मनमोहनकेँ हुअ लगल।

शब्‍द संख्‍या : 1285

उलबा चाउर लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...।

 

 

6. बेटी हम अपराधी छी

सही समैसँ साल भरि पहिनहि मनोहरकेँ सेवा मुक्‍ति‍क चिट्ठी ऑफि‍समे थम्‍हा देलकैन‍। थम्‍हबैक कारण रहैन काजक गजपटी। काजक गजपटीक कारण छेलैन मनक सन्‍ताप। ऑफि‍सक सभ मानि गेल जे मनोहरक मन चढ़ि गेलैन‍ तँए समुचित काज करइ जोग नै रहला।

ऑफि‍सेक कुरसीपर मनोहर बैसल रहैथ‍‍ कि चपरासी आबि हाथमे चिट्ठी थम्‍हेलकैन। पहिने तँ नै बुझि सकला जे सेवामुक्‍त भऽ रहल छी मुदा पढ़ला पछाइत‍‍ केकरोसँ पुछौक जरूरत‍ नै रहलैन‍। पत्रमे कोनो लेन-देनक कारण नहि, बतहपनीक कारण स्‍पष्‍ट लिखल रहैन। पत्र पढ़िते जहिना बर्खा होइकाल अनासुरती मेघ ढनढ़नाए उठैए तहिना एकाएक मनोहरक मनमे उठलैन। जेकरो कहबै सेहो बताहे बुझि सुनबो ने करत! तखन, कहबे किए करबै? अनेरे मुहोँ दुरि करब..!

मनोहरक मन जेना बेर-बेर चनकए लगलैन‍। टुकड़ी-टुकड़ी भेल मनमे उठलैन‍ जे सभटा कागत-पत्तरकेँ छीट-छाटि दिऐ, टेबुल-कुरसीकेँ उनटा-पुनटा दिऐ आ निकैल जाइ। मुदा मनोहरक मनक लगामकेँ बुधि पाछू खिंचलकैन‍। बदलैत सोच विचार केलकैन‍ जे एक तँ लिखतन बताह बनाइए देलक तैपर एहेन काज जँ करब तँ थियोरी प्रेक्‍टीकल भऽ जाएत, तखन बतहपनीक सजाक हकदार बनैमे केते देरी लगत?

कुरसीसँ उठि मनोहर सोझहे घरमुहाँ भऽ गेला। डेराक सुधिए ने रहलैन‍ जे भड़ो-किराया फरिछा लितैथ। मनोहरक बेसुधि मनमे बेठेकान सोच लगले उठैन आ पानिक बुलबुला जकाँ फुटि जाइन।

   गामक सीमा परहक बड़क गाछ देख‍ते मनोहरक आँखिक सोझमे भकइजोत जकाँ भेलैन‍। भकइजोतेमे देखलैन‍ जे यएह अपन गाम छी। मनमे अप्‍पन अबिते पएर जवाब देलकैन-

आगू नै बढ़ब। गाममे मुँह देखबैबला नै छी।

मुदा तपाएल मुँह लगले पएरकेँ कहलकै-

ईह बुड़ि रे, मुँह देखबैबला नै छी! ई समाज मुँह देखबैबला नइए। हरिदम विवेक-विवेकक भाँग घोड़ि-घोड़ि इनारेक पानिकेँ निशॉंए देने अछि आ निरलज जकाँ बजैमे लाजे ने होइ छै, सुझबे ने करै छै जे जखन पाइक हाथे शिक्षा बिकाइए तखन ओ शिक्षा पाइबलाकेँ हएत आकि बिनु पाइबलाक! जइ समाजमे रोग-वियाधि पाइक हाथे छोड़ौल जाइ छै तइ समाजमे बिनु पाइबलाक गति-मति की हेतइ! रौद-बसात, जाड़, पानि-पाथरक रक्षा केना करत। अदौसँ अबैत नर-नारीक सम्‍बन्‍धक बीच जखन दान-दहेज एहेन बड़का मोनि घारक पेटमे फोड़ि देने अछि, जइमे केते हाथियो-घोड़ा फँसि जान गमा रहल अछि, तइ मोनिमे अदना-अदनीक अह्लादे केतै कएल जा सकैए। महींसक आगू वीणक कोन मोल छइ।

मने-मन मनोहर घर दिस बढ़ैक हूबा करैथ मुदा पएर उठैले तैयार नै होइन। जँ पएर थोड़े तैयारो होनि तँ आँखि साफे नहि। धरतीपर ओंघराएल मनोहरक सभ सुधि-बुधि हेरा कऽ छिड़िया गेलैन‍।

मोबाइलक जुग रहने समाचार पसरैमे देरीए किए लगत। गाम-समाजक बच्‍चा-बच्‍चा बुझि गेल जे मनोहर बताह भऽ गेला, नोकरीसँ निकालि देलकैन‍। पेंशनो आने-आन लूटतैन।

सुनयनाकेँ पहिने बिसवास नै भेलैन‍। आइ धरिक जे पति-प्रेम मनोहरसँ भेटल छेलैन‍ ओ अनकासँ बहुत बेसी छेलैन‍। मुदा जानकी बेटीक काँच बुधि मानि गेल रहै जे पिता पागल भऽ गेला, नोकरीसँ भगा देलकैन‍।

गामेक लोकक जेरक संग दुनू माय-धी विदा भेली। लोकक बीच रंग-रंगक घौचाल चलैत रहइ। कोनो नीको मुदा बेसी अधले। घौचाल सुनि दुनू माय-धीक मन विचलित हुअ लगलैन‍। बेटीक मुँह सुनयना निहारए लगली आ माइक मुँह जानकी। पोखैरक घाटपर भुरही-माछ जहिना रंग-रंगक चाल चालि दैत तहिना दुनू माय-धीक कानमे रंग-रंगक चालिक बात पड़ए लगल...।

कचकूह मन जानकीक तँए बेसी विचलिते होइत गेल। बताह भऽ बाबू छोड़ि पड़ाए जेता, समाज सहजे‍ हमरा सन-सनकेँ भगाइए रहल अछि। तखन माइक की गति हएत..!

अधबटियाक पछाइत‍‍ सुनयनोक मन मानि गेलैन‍ जे पति पगला गेला। जानकीपर नजैर अँटका मने-मन सोचए लगली जे बाइस बर्खक कुमारि बेटीक मुँह सिंह दुआरिपर केना देखब? की दुनियेँ उजैर रहल छै आकि उजाड़ि चढ़ा देलक अछि? एको बीत धरती नै बँचल अछि जेतए नोरक धार सुखौल जाएत..!

जहिना दंगलक खलीफा पटका चारू नाल चीत अखड़ाहापर खसैए तहिना मनोहर बड़का गाछक निच्चाँ जिनगीक अखड़ाहापर चारूनाल चीत भेल पड़ल मने-मन सोचैत रहैथ- अपन जिनगीक हारिक कारण अपने छी तँए पत्नियो आ बेटियो-ले अपराधी छी! मुदा फेर मन कहैन जे अपराध कथी केलौं जे अपराधी भेलौं?

भवसागरमे डुमल मनोहरक शरीर चेतनशून्‍य छेलैन। तखने पत्नियोँ आ बेटियो लगमे पहुँच मुँह निहारए लगलैन‍। मँह देखते दुनूक मन कहलकैन‍- मुँहक रूखि कहाँ कहै छैन‍‍ जे कोनो रोग अछि। रणभूमिक हारिक रोग आ बिमारीक रोग तँ अपन बात अपने चिकैर-चिकैर कहै छै किने जे की छी...।

बन्न मुँह देख‍ मनोहरक छातीपर दुनू गोरे अपन-अपन सती हाथ रखलैन‍। छातीक धुकधुकी समतूले बुझि पड़लैन‍। आखिर किछु छैथ तँ एकक पिता, दोसराक पति छैथ किने। मुदा दुनूकेँ अपन-अपन बिसवासमे शंका भेल। शंका होइते एक-दोसराक मुँह सुनयनो आ जानकियो देखए लगली। देखते आँखि-आँखिक बीच जेना पुल बनि गेल। सुनयनाकेँ सान्‍त्वना दैत जानकी कहलक-

माए, बाबूजीक हृदय तँ ओहिना पवित्र देखै छिऐन!”

कदमक गाछक झूला जकाँ आस मारि सुनयना बजली-

बेटी, पुरुखक छातीपर बहुत भार होइ छइ। जेकरा माथपर जारैनक बोझ आकि अन-पानिक बोझ पड़बे ने कएल ओ ओइ बोझ उठबैबला छातीक धुकधुकी गनि केना सकैए। से नहि तँ छातीए डोला कऽ देखहुन जे मुहसँ केहेन बकार निकलै छैन।

माइक विचार सुनि जानकी आरो जाँच-पड़ताल करब नीक बुझलक। जहिना कलियाएल अड़हुल फुलाएल रहैए तहिना जानकीक मन पिताक छातीसँ ससैर‍ हाथ दिस बढ़लैन। केना नै बढ़ैत कहुना अछि तँ छातीक ऊपरेसँ ने लटकल अछि। जानकी बाजल-

माए, से नहि तँ छातीक धुकधुकीसँ अपनो मन धुकधुकाइते अछि। हाथक नारी पहिने देख‍ लहुन।

नारी तँ नारी छी, एक पुरखियाह। छाती जकाँ दुनू गोरे एक्केबेर थोड़े पकैड़ सकै छेली, नारीकेँ तँ बेरा-बेरी देखए पड़त, मुदा पहिने के देखत? दुनूक बीच ओझरी लगि गेलैन‍। एक पुरुख हजार रूप! की मनोहर जानकियो-ले वएह छैथ जे सुनयना-ले छथिन? मुदा की मनोहर सुनयनाक छिऐन आ जानकीक नहि? तखन? तैबीच जानकी सुनयनाकेँ कहलक-

माए, छातीक धुकधुकी तँ जोरसँ चलै छै तँए गनल भऽ जाइए मुदा हाथक नारी आइ धरि कहाँ गनलौं?”

बेटीक बात सुनयनाकेँ सोहनगर लगलैन‍। ऐठाम कियो आन अछि, जे ऐछो ओ तमसगीरे अछि, उकटा-चाल करत। बामा हाथसँ तरहत्‍थी पकैड़ सुनयना अपन दहिना हाथ मनोहरक वाजूपर देलखिन। मनोहरक वाजूपर हाथ पड़िते सुनयनाक कानमे झड़झड़ाए लगलैन-

सुनयना! बहुत आशा जिनगीसँ केने छेलौं, मुदा टुटि कऽ सभटा छिड़िया गेल। समाजक डर हमरा नै होइए मुदा अहाँ पत्नी छी तँए कहै छी। बताह बना बतहपनीक फरमान हाथमे धरा देलक। कमेलहो खेलक आ ऐगलो कमाइ मारलक। जखने घरसँ निकलब धिया-पुता जानि-जानि देहपर कियो गोला फेकत, कियो काँट फेकत, कियो गोबर माटि फेकत! केकरा की कहबै, हमरा बातकेँ कियो कान धड़त? आइ दस बर्खसँ जानकीक बिआहक पाछू पड़ल छेलौं, मास दिन पूर्व जवाब भेटल जे वैवाहिक सम्‍बन्‍ध भंग भऽ गेल!

सुनयना अपन कानकेँ आरो ठाढ़ करैत पतिक वाजूमे सटौलैन। मनोहरक वाजूमे कान सटिते धड़धड़ाइत अवाज आबए लगल-

हम ओइ चुगलासँ पुछै छिऐ जे कोन बुधिए जमाए बनि एते सेवा करौलक! बाइस बर्खक बेटीक मुँह देखल जाएत। जखन‍ घरक भार उठबैमे अक्षम भऽ गेलौं तँ अनेरे जीविए कऽ की करब। मुदा परिवार? सेहो कहाँ रखि पौलौं! दस बर्खक अवस्‍थामे बेटी कन्‍यासँ कनियाँक रूप धारण करए लगैए तैठाम जानकीक बिआहक चर्च पत्नी दस बर्ख पूर्व बारह बर्खक अवस्‍थामे केलैन‍। अपनो ओइ पाछू पड़लौं। काजोक अगुताहत नहियेँ बुझि पड़ल किएक तँ समयानुसार परिवर्त्तन हेबेक चाही। बीस-बाइस बर्खक बच्‍चि‍या समाजक कुमारि बच्‍चि‍या छी तँए समाजमे केकरो चौह अलगबैक अधिकार नइ छै जे ओकरा अलग बुझए। जँ जमीनो बेचि जानकीक बिआह कऽ लइ छी तँ की समाज भार उठौत जे एहेन काज आगू नै हएत?”

विस्‍मित भेल सुनयनाकेँ देख जानकी बाजल-

माए, कनी हमरो बाबूक नारी देखए दे।

बेटीक बोल सुनि सुग्‍गाक लोल सुनयना निहारए लगली। निहारिते मनमे उठलैन- यएह अवस्‍था छी जखन लोक सती बनैए, यएह अवस्‍था छी जखन लोक वेश्‍या बनैए आ यएह अवस्‍था छी जइमे लोक मातृ-पितृ भक्‍त बनि भगवत भजन करैए। मुदा जानकी..?

पतिक हाथ सुनयना जानकीक हाथमे दैत कान ठाढ़ कऽ मुँह निच्‍चाँ गोड़ि लेली। पिताक नब्‍ज पकैड़ते जानकीक कानमे घनघनाइत अवाज आएल-

बेटी जानकी! हम अपराधी छी। हमरासँ अपराध भेल।

नइ बाबूजी नहि! सौंसे दुनियाँ भलेँ कहए मुदा अपन जुआन नै निकैल सकैए। चौथारि सीमा धरि आबि अहाँ परिवारक सेवा करैत रहलिऐ। दुनियाँ बौक कहए कि बताह, कहह दियौ। मुदा अपन इमान कखनो धरमसँ विचलित नै हएत। हम मिथिवाला छी, हमरा वाजूमे शक्‍ति अछि। जहिना अपन कालखण्‍ड अपने इमानदारीसँ टपलौं तहिना ऐगला खण्‍ड हमरो छी। अपना दरबज्‍जापर बैस भगवत भजन करैत रहब, देहक चिन्‍ता नै करब। हमहूँ तँ सन्‍ताने छी किने। बेटा रहैत तँ बहिन बनि भार दैतिऐन। मुदा जखन भाए नै अछि तखन तँ हमहीं ने बेटा-बेटी भेलौं। ई प्रश्‍न हमरो भेल किने। बिआह हएत सासुर बसब, मुदा अहाँकेँ ऐ अवस्‍थामे छोड़ब केते उचित हएत। नीक-बेजाइक भार के उठौत। अपना जीबैत अपन माए-बापक एहेन गति भऽ जाए जे अनसोहाँतो-सँ-अनसोहाँत भऽ जाए, ई दोख केकरा सिर सवार हएत। मुदा समाजो तँ तेहेन अछि जे छातीक कोन बात कोढ़-करेज धरि खोखैर-खोखैर खाइते आएल आ खाइते रहत। हे शिव! एहेन धनुष उठबैक भार जँ अपने नै लेब तँ की ई समाज उठा सकैए? की मिथिलांगना अखनो धरि ई नै बुझि सकली जे माए-बाप जनमदाते टा नहि छैथ, जिनगीक हारि-जीतक सूत्रधार सेहो छैथ, जँ से नहि तँ सासु पुतोहुकेँ भिखमंगनी बेटी कहि किए मुड़ी गोंतबै छथिन। जरूरत अछि समयानुसार शक्‍ति उपका संचय करैक। जाबे तक से नहि हएत ताबे तक पुरुखक नजैर निच्‍चाँ केना कऽ पाबि सकै छी। देखए पड़त अपन भूत आ भविस। जाधैर अपन भूत-भविस देख‍ नै लेब, अपन-अपन बीर्तमानक लक्ष्‍मण रेखा खींच रक्षाक भार स्‍वयं नै उठा लेब ताधैर ऋृषि‍का, सती, साध्‍वी, पतिव्रता आदि-इत्‍यादिक शब्‍दक साकार जिनगी केना बनि सकत?”

जहिना नट-नटीनक नाचमे दर्शक चारू दिस घेरि बैसैत आ बीचमे दुनू अपन जिनगीक राग अलापैत‍ रहैए तहिना समाजक लोकक बीच मनोहर, सुनयना आ जानकी अपन-अपन जिनगीक राग अलापि उठि कऽ घर दिस डेग बढ़ौलैन। मनोहरक दुनू हाथ पकड़ने आगू-आगू सुनयना-जानकी आ पाछू-पाछू धिया-पुतासँ चेतन धरिक डेग बढ़ए लगल।

घरक मुड़ेरा देखते मनोहर दुनूक हाथ झमाड़ि कऽ छोड़ौलैन आ बजला-

बिसवासघात..! बिसवास घाती छी..! समाजमे जेहने मनुख रहत तेहने ने बनत। जे बिसवास देने छल सएह गर्त्तमे खसा पागल बना देलक! नहि सुनत दुनियाँ तँ नहि सुनह मुदा जाबे घटमे प्राण-घटवार रहत ताबे यात्रीकेँ कहबे करबै, कहिते रहबै।

सातम दसकमे मनोहर जिला-कार्यालयमे किरानीक नोकरी शुरू केने छला। समाजक पहिल विद्यार्थी मनोहर जे प्रथम श्रेणीसँ मैट्रि‍क पास केलैन‍। कौलेज लगमे नै रहने आगू पढ़ैक आशा तोड़ि जिनगीक मैदानमे उतरला। मुदा रिजल्‍टक कागत आँखिक सोझ अबिते मनमे उपैक गेलैन जे जहिना प्रथम श्रेणीक फल भेटल तेहने फलक गाछ रोपि ओकर सेवा टहल जिनगी भरि करैत अपनो आ समाजोकेँ नीक फल खुएबैन।

एक तँ सरकारी कार्यालयमे काज नै जे पढ़ल-लिखल सबहक अँटाबेस होइत, दोसर स्‍कूलो-कौलेज कम रहने सभ पढ़ियो ने पबै छल। मुदा मनोहरक संग संयोग नीक बैसलै। जिलाक कृषि विभागमे किरानीक नोकरी भऽ गेलइ। जहिना दशमीमे दुर्गास्‍थानमे साँझ दिअ जाइसँ पहिने अपन-अपन घरक भगवती-आगू साँझ दइए तखन दसनामा देवालयमे जाइए तहिना मनोहर नोकरीपर जाइसँ पहिने माता-पिताक असीरवाद लऽ लेब जरूरी बुझलक। खुशी तीनू गोरेक मनमे रहैन, मुदा तीनूक तीन रंगक। किए ने तीन रंगक रहितैन। हजारो रंगक फूलमे हजारो रंगक सुगन्‍ध होइ छै आ सभकेँ अपन-अपन सुगन्‍ध सिरजन करैक जहिना हक छै तहिना पसारैयोक छइहे।

दलानक ओसारपर बैस सत्‍यदेव कोदारिमे पच्‍चर लगबैत रहैथ‍। मनोहरकेँ खुआ आँगनमे माए असीरवाद देलक। आँगन-दलानक बीच मनोहरक मनमे उठल- ओह! माएकेँ तँ कहि देलिऐन जे नोकरीपर जाइ छी, असीरवादो देलैन‍ जे आब तोंही सभ ने ऐ घरक खुट्टा भेलह। हम सभ तँ पाकल आम भेलौं। मुदा से नहि, जहिना माइक एक रूप छैन‍‍, पिताक एक रूप छैन‍ तहिना एकटा संयुक्‍तो रूप तँ छैन्‍हे। तँए दुनू गोरेक ओइ रूपकेँ प्रणाम कऽ असीरवाद लेब मनोहरकेँ मनमे आएल। डेढ़िए-पर सँ बाजल-

माए, कनी एमहर आ।

शुभ काजमे विलमैक दोख अपनापर माए केना लेती, तँए अँइठे हाथे दरबज्‍जापर पहुँच मनोहरकेँ पुछलखिन-

की कहलह?”

तैबीच पिताकेँ गोड़ लागि मनोहर बाजल-

बाबू, नोकरी करए जाइ छी।

‘नोकरी’ कानमे पड़िते सत्‍यदेवक मन खुशिया उठलैन। मुदा सुगन्‍ध युक्‍त फुलबाड़ी आ बिनु सुगन्‍धक फुलबाड़ीक हवा जहिना दोरस रहैत तेना सत्‍यदेवकेँ नहि बुझि पड़लैन‍। असीरवाद दैत मनोहरकेँ कहलखिन‍-

बौआ, डि‍क्‍शनरी जकाँ जँ तीनियोँ-टा शब्‍दक कोष बना लेबह तँ मुइला पछाइतो बेर-बेर दर्शन होइते रहत, आ भरल-पूरल देख‍ आत्‍मा जुड़ाइते रहत।

सिनेह सिक्‍त पिताक शब्‍द सुनिते मनोहर सहमल, सहैमते सुहकारैत बाजल-

ओ तीन शब्‍द की छिऐ?”

बौआ, पहिल- झूठ नै बजिहह, दोसर- केकरोसँ एक्को पाइ कहियो डाँरिहक नहि आ तेसर- दरबज्‍जापर जे मनुख-शक्‍लक आबैथ, हुनका एक लोटा पानिक आग्रह जरूर करिहौनु।

पिताक मुँहक तीनू शब्‍दकेँ गुरु-पित वचन बुझि तत्काल मनोहर गीरह बान्‍हि रखि लेलक, रखबो जरूरी छेलइ। एगारह बजे ऑफि‍स पहुँचक छेलइ। मुदा पिताक वचनकेँ हास्‍य-कोषमे नहि हहासक डरसँ चाइलेंज-कोषमे लऽ अंगीकार केलक।

दुरगमनियाँ कनियाँ जकाँ मनोहर अपन उपस्‍थिति कार्यालयमे दर्ज करा, सभकेँ प्रणाम-पाती करैत कोहवर जकाँ असकरे कुरसीपर बैस गेल। कोनो काज नहि देख‍ चुनौल तमाकुलक गीरह जकाँ गामक गीरह खोलए लगल तँ भक्क-दे पिताक असीरवाद मन पड़लै। होइतो अहिना छै जे जखन रॉकैट तैयार भऽ उड़ैक रूप जखन धारण करैए तखन धरती छोड़ैसँ पहिने जहिना उनटा जाँच-पड़ताल होइ छै तहिना मनोहरो अपन जिनगीकेँ उनटा जाँच करए लगल मुदा पैछला कोनो बात मन नै पड़लै, पहिने पिताक वएह तीनू शब्‍द मन पड़लै जे तीनू प्रश्‍न बनि जिनगीक आगूमे ठाढ़ रहइ। मनमे उठलै- जँ अपन प्रश्‍नक जवाब दइ-जोकर नै छी तँ कोनो लजेबाक बात नहि, जे अपन कमजोरी केना सुहकारी। जाबे तक कोनो खेतमे नव सिरासँ जोति नव बीज नै देल जाइ छै ताबे नव फलक आशा केना हएत?

कुरसीपर बैसल मनोहरक मनमे पिताक असीरवादक तीनू शब्‍द तीन प्रश्‍नक गाछ रूपमे ठाढ़ भेल। कुशल माली जहिना सभ फूलक अपन-अपन पतियानी हियबैत तहिना मनोहरो अपन तीनू शब्‍दक पाँति हियाबए लगल। मुदा सतरंगा मकान बनौनिहार इंजीनियर जकाँ गुनियाँ-परकालसँ नइ गुनि, संकल्‍प बुझि विचारए लगल। ओना विचारक खण्‍डन-मण्‍डन जेते बेसी होइ छै ओकर बीज-स्‍वरूप दूधक मक्‍खन जकाँ ओते बेसी भेटबो करै छइ। मुदा मनोहरकेँ मनमे उठि गेलै- मात्र दू घन्‍टा ऑफि‍समे रहैक अछि। डेरो-डन्‍टा ठीक नहियेँ भेल अछि, तीन घन्‍टाक रस्‍ता काटि गामो जेनाइ अछि। तँए जेते खण्‍डन-मण्‍डन हेबा चाही तेते तँ नहि कऽ सकल, मुदा तात्वि‍क विचार जरूर केलक। ओना हनुमानजी जकाँ कखनो अकास मार्गपर नजैर पड़ै तँ विहाड़ि जकाँ भऽ जाइ, मुदा लगले महावीर जकाँ बदैल‍‍ लिअए। ‘झूठ नै बाजब।’ कोनो बड़का प्रश्‍न थोड़े भेल। नान्‍हिटा प्रश्‍न अछि। ने हमरा एक सेलक जीवाणुक इतिहास देखैक अछि आ ने सोनाक लंका। चौबीस घन्‍टाक दिन-रातिमे जे समयक संग अबैत जाएत आ विवेक कहैत जाएत तेतबे करबाक अछि...। मनोहरकेँ मनमे खुशी भेलइ। जहिना तीन प्रश्‍नक उत्तरमे एक प्रश्‍न हल भेने पास नम्‍बर चलि अबैत तहिना मनोहरक मनमे पासक आशा जगलै। आशा जगिते पास बदैल‍‍ पासापर दोसर आस मारलकै जे ‘दोसरकेँ नै डाँरब।’ मुदा ईहो बड़ भारी प्रश्‍न नै बुझि पड़लै, मन कहलकै- अपन खर्चमे कमी-बेसी भेनहि ने लोक करजदार होइए आकि कर्जदाता मुदा जँ सरपट चालि पकैड़ चलब तँ किए दुनूमे सँ कियो भेँट हएत। मुदा समाजक बीच परिवारकेँ रखैक जखन खगता मनमे एलै तँ सोल्हन्नी सरपट नै देख‍ मनोहरक मन अँटकल मुदा लगले घोड़ा जकाँ मन हिहिएलै- खगताकेँ जेते तक पचा सकब ओते पचाएब, आ बढ़ता-ले समाज अछि।

दू-तिहाइ अंकक आशा नहियोँ देख‍ मनोहरक मन मानि गेलै जे कोनो बेसी ओझरी नहियेँ अछि। मुदा तेसर प्रश्‍न- ‘दरबज्‍जापर एक लोटा पानि’ पर जखन नजैर पड़लै तँ मन ठमैक गेलइ। अपने घरसँ तीन घन्‍टाक रस्‍ता दूर रहब, दरबज्‍जापर बारह बजे दिन आकि बारह बजे राति जँ कियो आबि जाथि तखन अपना बुते की हएत? अखन माता-पिता जीबै छैथ तँ अपन दुआर-दरबज्‍जाक मुड़ेरा अकास ठेकेता मुदा परोछ भेला पछाइत‍ की करबै? जँ अखन नै विचारि बाट पकैड़ लेब तँ बेर-बिपैत पड़लापर तँ सहजे‍ लोकक बुधि हेरा जाइ छै, तखन केना विचारि पाएब..?

वस्‍त्रक एक-एक सूत बिलगा-बिलगा जखन मनोहर देखए लगल तँ बुझि पड़लै जे प्रश्‍न भारी कहाँ अछि। पीसक हले-हल बनबैक जन्‍मभूमि मातृभूमि भेल आ सेवाभूमि कर्मभूमि भेल। मातृभूमि कर्मभूमि होइत चलए तेतबे विचारैक अछि।

नोकरी भेलाक पनरह बर्खक पछाइत‍। मनोहरक माता-पिता मरि गेल छेलैन‍। अखन धरि मनोहर अठवारे गाम-अबै जाइ छल। गामक तसवीर तँ तेना भऽ नै सुधरल मुदा अपना घरसँ खा-पी कऽ बच्‍चा बी.ए. तक पढ़ि सकैए। घन्‍टा बीतैत-बीतैत डाक्‍टर ओइठाम पहुँच सकैए। तखन गाम छोड़ब-तोड़ब नीक नहि। जहिना माता-पिताक समए अबै जाइ छेलैं तहिना ऐगलो परिवार सेने रहब...। यएह सोचि मनोहर अपन परिवारकेँ गाममे रखलैन‍।

जोड़ा बरदक जोतबला परिवार सत्‍यदेवक छेलैन‍। ओना, जोड़ा बरदक जोतक अर्थ विकृत भऽ गेल अछि। विकृत ई भऽ गेल अछि जे साए-साए बीघा जमीनबला खुट्टा उसरन कऽ लेलैन‍। तर्क देता ट्रेक्‍टर-थ्रेसरक मुदा अपने परदेशसँ अगहने-अगहन गाम पहुँचता! से नहि, सत्‍यदेव मेहनती गिरहस्‍त छला। गिरहस्‍तीक सभ रूप सजौने छला। कलमी-सरही आमक गाछी पाँच कट्ठा अखनो छैन्‍हे। दू कट्ठा बँसबाड़ि, एक कट्ठा करजान, पाँच कट्ठा घराड़ियो छैन्‍हे। तीमन-तरकारीसँ लऽ कऽ बाड़ी-झाड़ी सेहो छैन्‍हे। पानिक अपन बेवस्‍था केनहि छैथ। तेतबे नहि, जेहने सासुक चालि-चलैन‍ छेलै तेहने सुनयनोक भऽ गेलैन‍। गिरहस्‍तियोक काज सत्‍यदेवकेँ बँटाएले जकाँ रहैन। अढ़ाइ बीघा बाधक खेती अपन रहैन। तीमन-तरकारी, बाड़ी-झाड़ी आ फुलबाड़ी-फलबाड़ीक भार पत्नीपर रहैन। जे सुनयनाक हृदयक रूप बनि गेलैन‍। माने, सासु-ससुरकेँ परोछ भेने घरक सोल्हनी भार सुनयने उठा नेने छेली। सुनयनाक अभ्‍यन्‍तर कहैन जे ऐ घरक सोल्‍हन्नी कर्ता-धर्ता अपने छी। तेकरा जँ अपना जकाँ नै रखि बिनु आड़ि-मेड़क घर बना लेब तखन किए कहै छिऐ जे नारीक शोषण होइए। की एहेन नारी नै छैथ जे पुरुखसँ मालिश करबै छैथ? मुदा से नहि, ई भेल गप-सप्‍प...।

जिला कार्यालयमे की खाली सरकारीए काम-काज होइए आकि जिला भरिक कथा-कुटुमैती, गाए-बरद आ महींसक खरीद-बिकरीक संग राजनीति, कूटनीति, छलनीति, दुर्नित इत्‍यादि सभ कथुक जिला छीहे। भलेँ कामकाजी लोक काजक औगताइमे तारिकोपर जेता मुदा पाछूसँ वारंट नेने औता। मुदा तेतबे तँ नइ अछि, कचहरी जाइ छी, भरि दिन केतए बैस समए गमाएब। तइसँ नीक किए ने पूर्बा हवाक गरपर बैस गाँजाक गन्‍ध पसाइर सभ गजेरीकेँ एकठाम समेटब नीक। एक चेहरा अनेक रूप दुनियाँक नव हाल भाइये गेल अछि। के अपराधी आ के अपराध रोकिनिहार? ई विचित्र स्‍थि‍ति अछिए। जँ दू-तीन-चारिक जोगकेँ खिचड़ी कहब तँ चाउर, दूध, चीनी आ मसालाक जोग खीर केना भऽ गेल? जँ से नहि, चाउर-दालि आ अल्‍लू-पानिक बीच चीन्नियोँ दऽ दिऐ तखन की हएत..? तँए सोझहे नून-चीनीक बात नइ अछि।

सिंचाइ विभागक बड़ाबाबू छला जुगल किशोर। आब सेवा निवृत्ति‍ भऽ गेला अछि। इलाकाक एक्के जातिक नहि, अधिकांश जातिक पजियारीक पेशा सेहो अपनौने छला। कार्यालय सभमे अहिना होइ छै एक चिन्‍हारे भेने तीन दिनमे हजार चिन्‍हरबा भऽ जाइ छइ। सरकारीए काजक भाषामे जुगल किशोर निपुण नहि, घटकैतीक भाषाक सेहो पाकल पड़ोर छला। हुनके भाँजमे मनोहर पड़ि गेला।

जखने जानकी एगारहम बर्ख टपि बारहममे पएर रखलक तखने सुनयना मनोहरकेँ जानकीक बिआहक भार सुमझा देलखिन। अखन धरि मनोहरकेँ कथा-कुटुमैतीक बोध नहि। भाँज लगलैन‍ जे जुगल-किशोरक हाथमे छपड़िया पैकार जकाँ साइयो जोड़ा बरद-गाए रहिते छैन। जिला कार्यालयमे मनोहरकेँ अपन पहचान छेलैन‍। जइसँ काजक बोझो कम रहै छेलैन‍।

एक दिन चारि बजे छुट्टी होइते जुगल किशोरसँ भेँट करैत मनोहर अपन बात जानकी बिआहक रखलैन‍। जेना जुगल किशोरकेँ जीए-पर रखल रहैन तहिना मनोहरकेँ कहलखिन जे कृष्‍णकान्‍त बी.ए. पास कऽ नोकरी-ले वौआइए, मुदा लेन-देन दुआरे काज नै भऽ पबै छइ। से जँ अहाँ अपनेसँ जा कऽ कहिऐन तँ ओहिना–माने बिनु लेन-देनेक–काज भऽ जेतैन आ अहूँकेँ बिआहमे लेन-देनक भार नै पड़त।

मनोहरक मन मानि गेलैन‍ जे एक परिवारकेँ ठाढ़ होइक प्रश्‍न छै से जँ कहलासँ भऽ जेतै तँ उचित-उपकार दुनू भेल। अपनो काज ससैर‍ जाएत।

ओना, बीचमे एकटा बाधा ठाढ़ भेल, ओ ई जे पहिने नोकरी होइ आकि बिआह। घटकैती भाषमे जुगल किशोर कहलखिन-

मनोहर बाबू, अहूँ सभ दिन कागतेमे ओझराएल रहलौं, एतबो ने बुझै छिऐ जे जइ घर बेटी जाएत तेकरा घरो ने छइ। दू-चारि मास कमा कऽ घर बनौत तखन निचेनसँ बिआह हेतइ। अखन एगारहे-बारहे बर्खक बेटी अछि, आब कि कोनो ओ जुग-जमाना रहलै, आब तँ बीस-बाइसक चलैन‍ भऽ गेल अछि। नीको अछि।

सोझमतिया मनोहर जुगल किशोरपर सोल्हनी बिसवास कऽ लेलैन‍। समए बीतैत रहल, बीतैत रहल...। मनोहर निचेन रहैथ जे बीस-बाइस बर्खक बीचक काज टरि गेल।

स्‍थायी रूपे जखन कृष्‍णकान्‍त बेवस्‍थि‍त भेल तखन जुगल किशोर अपन बेटीक बिआह कृष्‍णकान्‍तसँ पाँच लाख नगद गनि करा लेलैन‍। कृष्‍णकान्‍तो अपन पूर्व जन्‍मक कमाइ बुझलक। एक पट्टीमे नोकरी, दोसर पट्टीमे पाँच लाखक संग कनियाँ। के हमरा सन भागमन्‍त हएत।

जानकी जखन बाइसम बर्खमे पहुँचल, तँ सुनयना अन्‍ति‍म वारनिंग मनोहरकेँ देलखिन। तखन मनोहरकेँ चाँकि जगलैन‍। धर्म-कर्म बुझि मनोहर जुगल किशोरक गाम पहुँचला। तीन साल पहिने जुगल किशोर सेवा-निवृत्त भेले रहैथ‍‍। दरबज्‍जापर बैसल जुगल किशोरक मन मनोहरकेँ किछु मोट बुझहेलैन‍। मुदा अपन काज तँ पहाड़ी इलाकामे लोक गदहो चढ़ि कऽ लइए। खाएर, हमहूँ कोनो कुटुमैती करए थोड़े एलौं जे मान-रोख रखब। काजे एलौं काज करब जाएब तैबीच समैये कखन बँचत जे पहुनाइ करब। बुढ़ियो बाघीन तँ फेर बाघीन छिऐ किने। मनोहरकेँ देखते जुगल किशोर चपाड़ा दैत अभिवादन केलकैन‍-

आउ-आउ मनोहरबाबू! आब तँ भेँटो दुरलव, केमहर-केमहर..?”

मनोहर कहलकैन‍-

जानकी बाइस बर्खक भऽ गेल, सएह काजे आएल छी।

अखन धरि मनोहरकेँ नै बुझल जे कृष्‍ण कान्‍तक बिआह जुगल किशोरेक बेटीसँ भऽ गेलैन‍। मुदा ई दुनियाँक खेल छी जे दुनियाँमे रहितो लोक दुनियाँकेँ नै जानि पबैत अछि।

जुगल किशोरक मनमे भेलैन‍ जे मास दिन पहिनहि काज भेल आ आइ ई ताना-मारए दरबज्‍जापर चलि एला! अपना सीमा कुकुरो बताह। जुगल किशोर सोझहे कहलखिन-

ऐठामसँ चलि जाउ, नै तँ पुलिसकेँ बजाएब!!”

ओना जुगल किशोरक बात मनोहरकेँ तेते कठाइन नै लगलैन‍ जेते लागक चाही। किएक तँ अपन दरबज्‍जापर उचित-अभ्‍यागत-ले पुलिस आनी, सएह तँ मिथिलाक दरबज्‍जा छी।

पुलिसक नाओं सुनि मनोहर भरमे-सरमे घरमुहाँ भेला।

तही दिनसँ ऑफि‍सक काजमे मनोहरकेँ उन्‍टा-फेड़ हुअ लगलैन‍। जइसँ पागल घोषि‍त कऽ देल गेला।

शब्‍द संख्‍या : 3359

उलबा चाउर लघु कथा संग्रहक दोसर संस्‍कणसँ...।


 

[1] पटुआ-कारखानामे

[2] वैवाहिक कार्य

 

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