प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.


जगदीश प्रसाद मण्डल
भंगतराह कवि
भंगतराह कविक माने भेल शास्त्रीजी। भाय, साहित्य जगत छी माने साहित्यकारक समाज छी, ऐ बीच शास्त्री, उपशास्त्री, आचार्य, उपाचार्य इत्यादिक भरमार अछियो आ रहक्को चाहबे करी। अपना गाममे माने किसानपुर गाममे सेहो गोटि-पंगरा साहित्यकार साहित्यसँ जुड़ल छथिए। भाय, ऐठाम एहेन धोखा नइ हुअए जे एहनो-एहनो गाम सभ अछि जइमे छेहा माने सोल्होअना साहित्यकारे छैथ आकि सोल्होअना प्रोफेसरे वा डॉक्टरे छैथ। गोटि-पंगरा साहित्यकार, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, डॉक्टर गामे-गाम आइये नहि, सभ दिनसँ होइत आबि रहल अछि। किसानपुर गाममे माने अपना गाममे रविकान्त भाय सेहो साहित्यसँ जुड़ल छैथ। रविकान्त भाइक संग चारि-पाँच आरो साहित्यकार ओहिना काँखमे झोड़ा टंगने रहै छैथ जहिना भाड़ा-किराया पाबि सीताराम सीताराम करैबला मंडली सभ अछि। एकर माने ई नइ बुझब जे हम हुनकर खिदहौंस करै छिऐन। हुनकर एकनिष्ठता छैन। जखन समाजमे ओहन वस्तुक मांग बढ़ल तखने ने एहेन-एहेन मंडलीक माल उठिकऽ ठाढ़ भेल। आजुक जे भोज-भात अछि, ओ जँ प्राचीन पद्धतिक समाजसँ चलैत, तँ गाम-गाममे भानस करैबला श्रमिक वर्ग बनि केना पबैत? जे अखनो भरि दिन चुल्हिक आगि लग अपन देह झड़कबैए। तेतबे नहि, भोज्य-विन्यासक सैंकड़ो नब रूप गढ़ैक लूरि सेहो रखने अछि। मुदा ओकर मेहनताना केते होइए? खाएर ऐठाम से नहि। बस एतबे जे रविकान्त भाय साहित्य सेवामे लगल छैथ।
रविकान्त भाय एक उमेरिया छैथ। ओना, अपन जीवनकेँ ढंगसँ पकैड़ रविकान्त भाइक सीमा धरि जरूर पहुँच गेल छी मुदा पण्डित जवाहरलाल नेहरूजी जकाँ चाचा बनैमे देरी अछिए। नइ तँ विज्ञान पढ़निहार केतौ इतिहास लिखैथ। अपने जीवन जकाँ जँ बुझबैन, तखन हुनकर जीवन नीक जकाँ नहि ने बुझि सकब, मुदा जखन हुनकर जीवन-साधनाक बाट पकैड़ देखब, तखन हुनकर वास्तविक रूपक स्वरूप जरूर देख लेब।
साहित्य मंचसँ जुड़ल जहिना शास्त्रीजी छैथ तहिना रविकान्त भाय सेहो छैथ। ओना, दुनू भैयारीमे जहिना भाय-भाइक भैयारीक सम्बोधनसँ होइए, तहिना दुनू गोरेक बीच सेहो होइ छैन। अपन आ रविकान्त भाइक एक तँ एकठाम घर रहने दिनमे तीन बेर भेँटो होइते छैथ। आ दोसर, अपनो जिज्ञासा रहैए जे गामसँ बाहर तँ वएह बेसीकाल निकलै छैथ, अपने तँ भरि दिन परिवारेमे ओझराएल रहै छी। तँए, साँझूपहर-के बड़बैर भेँटो करिते छिऐन। भाय, पोखरिक महारपर जे नट सभ बसल अछि ओ सभ जहिना साँझूपहरमे अपन परिवारकेँ माने पत्नीकेँ, ताड़ी पीला पछाइत लठियेबो करैए आ भरि राति सेवो नइ करबैए सेहो केना नइ कहल जाए। केतबो मारि-गारि किए ने सुनए मुदा अंगरेज जकाँ तलाक नइ ने देत।
शास्त्रीजी आ रविकान्त भायमे चेहराक रंग विचित्र रहितो एकचित्र बनल छैन्हे। माने ई जे जीवनमे, आयुक हिसाबसँ, रविकान्त भाय ऊपर छैथ। माने बीस बरख ऊपर छैथ आ शास्त्रीजी निच्चाँ छैथ। मुदा साहित्यिक जीवनसँ देखल जाए तँ शास्त्रीजी ऊपर छैथ। माने जैठाम रविकान्त भाइक साहित्यिक जीवन बीस बर्खक छैन, तैठाम शास्त्रीजीक जीवन पैंतीस-चालीस बर्खक छैन। साहित्यसँ माने सम्पूर्ण साहित्यसँ जेतेक रूचि शास्त्रीजीकेँ जे रहल होनु, मुदा कवितासँ रूचि शुरूहेसँ रहलैन, तँए पैंतीस-चालीस बर्खक कवि शास्त्रीजी भेबे केलाह। तैसंग कखनो-काल मंचक अनुकूल आरो-आरो साहित्यिक विधामे सेहो वक्तव्य दइते छथिन। शास्त्रीजीक अपन मनक बात छिऐन जे अपन विचार अनका खूब सुनबए चाहै छैथ आकि अनको बात सुनए चाहै छैथ। भाय एहेन विचार शास्त्रीएजी टामे छैन सेहो बात नहियेँ अछि। अपनोमे अछिए। माने ई जे सदिकाल मनमे रहैए जे अपन बात आन सुनबेटा नहि मानबो करए, मुदा अनकर बात सुनैले, मानैक तँ कोनो गप्पे नहि, अपना छुट्टीए ने अछि।
पैंतीस-चालिस बर्खसँ शास्त्रीजी साहित्यिक विधामे किछु-ने-किछु लिखैत आबि रहल छैथ, मुदा सोभावसँ भंगतराह रहने कोनो लिखित रचनाक ठेकान नहि छैन। कहब जे भंगतराह किनका कहबैन? भांग पीबि कियो शिव-दरबारमे माने महादेवक दरबारमे शिव-भक्ति वा महादेव भक्ति करै छैथ आ कियो चौक-चौराहापर भाँगक दोकानसँ भाँग कीनिकऽ पीबि रस्ते-पेरे अर्र-दर्र करै छैथ।
ओना, शास्त्रीजी केँ सोल्होअना भंगतराह नहि कहबैन। परिवारक जे अस्त-व्यस्तता छैन, ओ शास्त्रीजी केँ एकाग्र हुअ'ए ने दइ छैन, जइसँ केलहो श्रम हेरा-ढेरा जाइ छैन। एक तँ श्रम अपने-आपमे अनमोल रत्न छीहे मुदा ओकरा परेखब आ प्राप्त करब तँ आरो, माने जखन कुशल परेखनिहार आ प्राप्तकर्ता रहता तखने ने भेट सकै छैन।
शुरूमे माने हाइ स्कूलमे जखन साइंस, आर्ट, वाणिज्य इत्यादि विषयक पढ़ाइ फुटैए, तइ समयमे शास्त्रीजी साइंसक विद्यार्थी छला, जे कौलेजमे आबि बी.एस-सी.क क्रममे मोड़ लेलकैन आ साइंस पढ़ब छोड़ि संस्कृत विषय पढ़ब शुरू केलाह। विश्वविद्यालयसँ 'शास्त्री'क उपाधि पौलैन। ओना, लगनशील एहेन जे वैदिक साहित्यकेँ धांगि देलैन। मुदा कोन रूपमे धँगलैन, से वएह बुझै छैथ।
तीन भाँइक भैयारीक बीच माझिल छैथ शास्त्रीजी। पाँच बीघा जमीन परिवारमे। शास्त्रीजी घुमन्तू भइये गेला। इलाकाक हिसाबसँ शास्त्रीजीक विवाह गड़बड़ भेलैन। इलाकाक हिसाबक माने भेल जे भौगौलिक बनाबटक कारणेँ कोनो इलाकामे श्रमशील माने शरीरसँ श्रम करैबला मनुक्खक निर्माण होइए आ कोनो इलाकामे श्रमक बदलल स्वरूप रहने वौद्धिक मनुक्खक निर्माण होइते अछि। विवाह गड़बड़ ई भेलैन जे पढ़ल-लिखल पत्नी रहने परिवारक स्तर ऊपर उठलैन, मुदा आर्थिक संकटसँ खसैत रहलैन। किसान परिवार शास्त्रीजीक छैन्हे। आ तैपर शास्त्रीजी घुमन्तू भइये गेल छैथ। कविता पाठ, भागवत-पुराणक प्रवचन, गीता प्रवचन इत्यादिमे अपन सोल्होअना समय लगैबते छैथ।
जेठो भाय आ छोटो भाय, माने तीन भाँइक बीच शास्त्रीजी माझिल छैथ, गामक खेत हथिया लेलकैन। जाबे तक छोट परिवार शास्त्रीजीक रहलैन ताबे तँ कोनो समस्या नइ बुझि पड़लैन, मुदा जखन अप्पन दुनू बेटा छँटगर भेलैन, परिवारमे खेत-पथारक विवाद शुरू भेलैन, तखन अपन आमदनी कमलैन आ खर्च बढ़लैन।
अखन तकक जे जीवन शास्त्रीजीक रहलैन ओ परिवारक बेवहारक अनुकूल नइ रहलैन। परिवार बुझि शास्त्रीजी अपन पत्नियोँ आ बच्चो सभकेँ भाएपर ओंगठौने रहला मुदा अप्पन कमाइक कोनो हिसाबे ने रहलैन। सभ बुझिते छी जे लोअर प्राइमरीक बच्चाक पढ़ाइमे की खर्च अछि। तैठाम साहित्यकार सन भुखाएलक की खर्च हएत। ओना, साहित्य जगतक बीच शास्त्रीजीक एहेन वफादारी छैन्हे जे जैठामसँ हुनका हकार पड़ै छैन, तैठाम ओ जरूर पहुँचै छैथ। साइठ बर्खसँ ऊपरक उमेर भेलो पछाइत शास्त्रीजी पएरे वा साइकिलक सवारीसँ जीवन चला रहला अछि।
परिवारक विवादक एहेन स्वरूप बनि गेल छैन जे कोर्ट-कचहरीक काज दिनो-दिन बढ़िते जा रहल छैन जइसँ दिन-रातिक बीच एक्को पल चैन भेटब कठिन भऽ गेल छैन। गारजनक हैसियतसँ शास्त्रीजी जवाबदेह छथिए। अपन जे जीवन छेलैन, माने केस-मुकदमासँ हटल, तइमे काफी बदलाव आबि गेलैन। एक दिस आमदनीक कमी हुअ लगलैन, दोसर दिस यत्र-तत्र खर्चा बढ़ि गेल छैन। खाएर किछु छैन मुदा मनुक्ख बनि अखन तक तँ शास्त्रीजी ठाढ़ छथिए। नइ सभ कार्यक्रममे, माने साहित्यिक कार्यक्रममे, भाग लऽ पबै छैथ, तँए नहियेँ लइ छैथ सेहो नहियेँ कहल जा सकैए।
स्वभावसँ शास्त्रीजी साहित्यकारक ठाठ-बाठक लोक छथिए। अर्थशास्त्रसँ कहियो भेँट नहि भेलैन जे बुझि पेबितैथ, भावलोकक अर्थनीति की अछि आ भुवनलोकक अर्थनीति की अछि। अखनो शास्त्रीजीक अप्पन मन गवाही दइते छैन जे दानी बनि दान देब महादान छी, तँए मानबकेँ मानि लेबा चाही।
साहित्यिक कार्यक्रमक जे परिदृश्य बदैल रहल अछि तइ अनुकूल शास्त्रीजीक विचारक परिमार्जन नहि भऽ सकलैन। अपना संयोजकत्वमे शास्त्रीजी साहित्यिक कार्यक्रम करैक निश्चय केलैन। तिथि निर्धारित कऽ लेलैन। साहित्य संसारमे बिरले कियो बाँचल हेता जिनकासँ शास्त्रीजीक सम्बन्ध नहि छैन। वहुआयामी वृत्तिक शास्त्रीजी छथिए, तँए सम्बन्ध स्थापित होइमे देरी लगिते ने छैन। परिवारोसँ फ्री छथिए। आजुक परिदृश्यमे महिलाक हाथ-मुट्ठीमे की सभ छैन। बुझल बात अछिए जे महिलाक अधिकार दिआबैले सभ अपसियाँत छी, मुदा कोन घर एहेन छुटल अछि जइ घरमे महिला शासक नहि छैथ।
निर्धारित समयपर रविकान्त भाय अपन संगीक संग शास्त्रीजीक ऐठाम पहुँचला। जहिना सतयुगमे ऋषि-मुनि गाछक निच्चाँमे माने छाहैरमे अपन कला-संस्कृतिक प्रदर्शन करै छला तहिना शास्त्रीजीक दरबज्जाक आगूमे तीनटा आमक गाछ छैन्हे।
रविकान्त भाय, गामक एकटा ढेरबा बच्चाकेँ पुछलखिन-
"बौआ, आँगन जा कने शास्त्रीजीक भाँज लगाबह ते।"
जेना ओइ बच्चाकेँ बुझले रहै तहिना टपैक बाजल-
"दछिनबारि टोलमे छैथ।"
"केते दूरपर टोल अछि?"
"सटले-सटल टोल सभ अछि।"
अपन पाँचो-सात संगीकेँ संग केने शास्त्रीजीक भाँज लगबैत दच्छिनबारि टोल पहुँचते रविकान्त भाय देखलैन जे शास्त्रीजी धुरझाड़ कविता वाचि रहला अछि आ दस-बारहटा श्रोता हुँहकारी दऽ रहल छैन। मने-मगन शास्त्रीजी, हाथक इशारासँ रविकान्त भाय सभकेँ बइसैले कहलखिन आ अपन कविताक अन्तिम चौपाइमे हाथ लगौलैन।
सामंजस करैत रविकान्त भाय, शास्त्रीजीक मनोनुकूल अपनाकेँ निरमित करैत शास्त्रीजीक कविताक विराम होइत देख मुड़ी उठा शास्त्रीजी पर देलैन तँ शास्त्रीजीकेँ भक्क खुजलैन। भक्क खुजिते मनमे उठलैन, बेवहारानुकूल अपना बुते तँ अतिथि लोकनिकेँ समयपर ठंढो-गरम आकि चाहे-पान नहि करा सकलयैन..! गामक तरक तह पकैड़ शास्त्रीजी बाहरी सभ साहित्यकारकेँ संगोर केने गाम दिस विदा भेला, मनमे यएह शुभेक्षु इच्छा रहैन जे समाजो दुनियाँक समाजसँ परिचित हेता आ बाहरियो समाज कर्मीक समाजसँ परिचित हेता। चारिये डेग जखन आगू बढ़ला, कि एकटा सुभ्यस्तगर परिवारक गारजन सोझमे पड़लैन। हुनका देखते शास्त्रीजी बजला-
"हौ जगरनाथ, आइ अपना गामक सौभाग्य जगल। इलाकाक नामी-गरामी साहित्यकार सभक पदार्पण भऽ रहल छैन से केना पार लगेबह।"
शास्त्रीजीक विचारक मर्मकेँ जेना जगरनाथ बुझि गेला तहिना बजला-
"हम अहाँ कि कोनो बाँटल छी, ईहो दरबाजा तँ ओही गामक छी ने, जइ गाममे साहित्यकार सभकेँ बजौलिऐन हेन। सभ खर्च हम करब। तखन तँ कनी-बिलम्म हेबे करत।"

 

-जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन।
मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह।
 

रचनापर अपन मतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।