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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१.१.जगदीश प्रसाद मण्डल- लघुकथा- संकट १.२. जगदीश प्रसाद मण्डल- पंगु - उपन्यासक आरम्भ (आगाँ)

१.१.

जगदीश प्रसाद मण्डल

लघुकथा

संकट

चालिस बर्खक पछाइत राधाकान्तकेँ कृष्णकान्तसँ भेँट भेलैन। भेँटो ओहिना नइ भेलैन, कृष्णकान्तसँ राधाकान्त नियारि कऽ भेँट करए आएल छला। प्रणाम-पाती भेला पछाइत कृष्णकान्त पुछलखिन-

भाय, की हाल-चाल?”

की हाल-चालकहिकृष्णकान्तअथिति संगीक स्वागत-बात करैमे लगि गेला। कुरसीपर बैइसैत राधाकान्त बजला-

भाय, की हाल-चाल रहत! संकटमे जिनगी पड़ि गेल अछि..!”

राधाकान्तक बात सुनि कृष्णकान्त अपन विचारकेँ रोकि आँगन जा पत्नीकेँ कहलैन-

पुरान मित्र एला अछि, तँए आदर-सत्कारमे कमी नइ होइन।

दिनक एगारह बजेक समय, अगहन मास। ओना, गाम कि इलाकेमे जखन राधाकान्त प्रवेश केला आ खेती-पथारी, उपजा-बाड़ीपर जे नजैर पड़लैन तखनेसँ मने-मन विचारए लगला जे अपन इलाका की छल आ अखन की बनि गेल अछि!

ओना एक परिवार रहितो, जँ परिवारमे अतिथि-अभ्यागत अबै छैथ तँ एकरंग आदर-सत्कार नहियेँ होइत अछि। तेकर कारण अछि जे अभ्यागतो-अभ्यागतमे अन्तर होइते अछि। आ ओ होइए मनुख रूप देख नहि, बनाबटी सम्बन्ध देख। पाहुन एने जे स्वागत-बात परिवारमे होइए ओइसँ अलग सासुरक पाहुन एने होइए। तहूसँ अलग दोस-महीम आ हित-अपेक्षित एने सेहो होइते अछि। खाएर जे होइए, ओ तँ परिवार-परिवारक अपन-अपन बेवहारपर निर्भर अछि। ऐठाम कृष्णकान्त आ राधाकान्तक दोस्तीक सम्बन्ध अछि।

पतिक विचार सुनिते श्यामाक मनमे एलैन जे पुरानो मित्र तँ एक रंगक नहियेँ होइ छैथ। ओहूमे अन्तर अछिए। पहिल ओहन मित्र भेला जे बालपनसँ वृद्धपन धरि एक-रसमे निमाहैत आबि रहला अछि। माने ई जे जहियासँ मित्रता भेलतहियेसँ आबाजाही होइत रहने रंग-रंगक सम्बन्धमे बढ़ोत्तरी भेल रहैए आ दोसर भेल शुरूमे–माने जखन मित्रता भेल–तैबीच नीक जकाँ मित्रता चलल, मुदा आबाजाही कम रहने सम्बन्ध ओतबेपर अँटैक गेल। सएह राधाकान्त आ कृष्णकान्तक बीच भेलैन।

जहिया सी.एम. कौलेजमे पढ़ैले प्रवेश केलातहियेसँ राधाकान्त आ कृष्णकान्तक बीच मित्रता भेलैन। संजोग एहेन बनल जे कौलेजमे नाओं लिखबए जहिये राधाकान्त पहुँचला तहिये कृष्णकान्तो। दुनू गोरेक मैट्रिकक परीक्षाक रिजल्ट सेहो एके रंग छेलैन। सेकेण्ड डिवीजनसँ मैट्रिक पास केने रहैथ। ऑफिसमे जाधैर दुनूक एडमिशन भेल ताबे तक अपन-अपन काजमे लागल छला। नाम लिखौला पछाइत जखन दुनू गोरे ऑफिससँ निकलला तखन गप-सप्प भेलैन। ओना, गप-सप्पक दोसरो कारण भेल। दोसर कारण भेल दुनूकेँ डेरा लेब सेहो छेलैन।

कौलेजक गेट टपि दुनू चाहो पीबैले आ गपो-सप्प करैले दोकानपर पहुँचला। खाली टेबुल देख दुनू गोरे एके टेबुलक कुरसीपर बैसला। राधाकान्त कृष्णकान्तकेँ पुछलैन-

अहाँकेँ घर केतए छी?”

जिला-जबार पुछैक जरूरत दुनूमे सँ किनको किए रहतैन। आइ ने दरभंगा जिला बँटि कऽ तीन जिला बनि गेल अछि मुदा ओइ समयमे जिला तीन सब्डिवीजनमे बँटल छल- दरभंगा-मधुबनी आ समस्तीपुर। दरभंगा जिलो आ सब्डिवीजनो छल। तँए समस्तियोपुर आ मधुबनियोक बासी कनिष्ट छलाहे।

कृष्णकान्त बजला-

हमर घर हरिपुर अछि आ अहाँक?”

राधाकान्त-

हमर सीतापुर।

जखन सबहक बाबा एके छी माने जिला एक छी, तखन पित्ती आ बड़-भाय–माने सब्डिवीजनक आ ब्लौक–क मोजरे केते, तँए दुनूक बीच कोनो मन-मनान्तर किए उठितैन। ओहुना विद्यालयमे गाम-समाजक हिसाबसँ जातीय बन्धन थोड़ेक ढील अछिए। माने ई जे कथा-कुटुमैतीमे जइ हिसाबे जातिक जड़ि खुनि-खुनि जीऔल जाइ छै, तैठाम तँ ओ जगजगार हेबे करत किने। से विद्यालय, महाविद्यालयमे नहि अछि। ओइ हिसाबे बुझू माटिक तरमे झँपाइते जा रहल अछि। ओना, दुनूक चेहरो-मुहरामे तरपट नहियेँ छेलैन। दुनूक सामंजसक बाधाक बीच केतौ बाट खाली नइ छल। संजोग भेल, चाहे दोकानदार अपन बीस बर्खक कमाइसँ निच्चाँ ईंटा जोड़ि ऊपर सीमटीक चदरासँ छाड़ि हालेमे एकटा घर बनौलक जइमे दूटा कोठरी छइ। एकटामे अपन परिवार छै आ दोसर भाड़ा लगौत।

राधाकान्तो आ कृष्णकान्तो दरभंगा शहरक लेल अनाड़ी छलाहे। चाह हाथमे पकड़ैत राधाकान्त दोकानदारकेँ पुछलैन-

विद्यार्थीक रहैबला डेरा भॉंजपर केतौ अछि? ओना, दुनू गोरेकेँ गामेसँ भॉंज लगि चुकल छेलैन जे चौबे लॉज छै, जइमे दू-चारि कोठरी सदिकाल खालीए रहैए। चौबेजी अपनो भरि दिन एकटा चटसारपर बैस गॉंजे पीबैत रहै छैथ तँए कोनो विद्यार्थीकेँ डेरा नइ भेटैक प्रश्न मनमे उठिते ने अछि।

बगलक खाली कुरसीपर बैस दोकानदार अपन अन्तर-शक्ति जगबैत बाजल-

दू गोरेक रहैबला एकटा कोठरी हमरो अछि।

रहैक डेराक आशा सुनि दुनूक मन तिरपीत भेल। कृष्णकान्त दोकानदारकेँ पुछलैन-

की भाड़ा लेबइ?”

एक तँ जेहने अनाड़ी दोकानदार तेहने अनाड़ी राधाकान्तो-कृष्णकान्त। ओना, जेहेन डेरा तेहेन भाड़ाक दर छेलैहे। मुदा कोनो नव, भाड़ा दइबला वा लइबलाक संग तँ विकल्प बनले अछि जे जइ तरहक घर अछि तइ तरहक भाड़ा भेल। जहिना चौबे लॉजक भाड़ा, दस रूपैआसँ बीस रूपैआक बीचक अछि, तेहने घर ने दोकानदारोक छैन। तैबीच दोकानदारक मन नचैतविद्या-अध्ययन केनिहारक रूप लग पहुँच गेल। एक ब्रह्मचारीक रूप देख दोकानदार ठॉंहि-पठॉंहि बाजल-

बौआ, अहाँ सभ छोट भाइक रूपमे रहब, तैठाम हमर बाजब नीक हएत। अहाँ दुनू गोरे अपनामे विचारि लिअ, जे भाड़ा कहब, हम कोठरी दऽ देब।

एक तँ दुनूक मनमे सी.एम.कौलेजमे प्रवेशक खुशी, तैपर चाहक खुशी सेहो छेलैन्हे। तँए माता-पिताक सोहे-बात मनमे किए रहितैन जे अपन ओकाइतिक हिसाबसँ काज करितैथ। ओना, दुनूक मनमे नव विचार सेहो अँकुरिये गेल छेलैन। ओ अँकुरल छेलैन दोकानदारक विचार देख, जखन बेचारे अपने सभपर फेक देलैन तखन बजारक जे हिसाब अछितइ हिसाबसँ ने बाजब।

पचीस रूपैआ भाड़ा तय-तसफिया करैत दोकानदार बाजल-

कनिये दूरपर घर अछि, चलू चलि कऽ देखाइये देब आ तालाक कुञ्जी सेहो दऽ देब।

सोना-चानी दोकान-ले भिनसुरका चारि पाँच बजेक समय जहिना कुसमय भेल तहिना चाहक दोकानले दुपहरक समय भऽ जाइते अछि। माने स्पष्ट अछिए। एकर विपरीत दिशा सेहो अछिए। चाहक दोकान-ले चारि-पाँच बजे भोरक समय शुभ भेल आ सोना-चानीक दोकान-ले अशुभ, तहिना सोना-चानीक दोकान-ले दुपहरक समय शुभ भेल मुदा चाहक दोकानदार-ले अशुभ भेबे कएल। खाएर जे होइए हुअ दियौ अपना ताले दुनू बेताल अछि। समय शुभ-अशुभ होइते ने अछि, काज आ स्थान ओकरा शुभ-अशुभ बनबैत अछि।

कौलेजमे अखन पढ़ाइ शुरू होइमे आठ दिन बाँकी छल। तँए आठम दिनक दिन ठेक राधाकन्तो आ कृष्णकान्तो आ दोकानदार सेहो अपन-अपन काज दिस बढ़ला। संग हटला पछाइत जहिना एक दिस दोकानदारक मन अपन एक जिनगी चढ़ैत देखलक। माने ई जे दरभंगा सन बजारमे अपन दस धुर घराड़ी बनौलक तेकर खुशी, तैपर दोकानक आमदनीक संग घरक भाड़ा सेहो देखलक। मने मन दोकानदार अपन प्रज्वलित होइत भविस देखए लगल तहिना दोसर दिस राधाकान्तो आ कृष्णकान्तो अपना बले अपन काज सम्हारि कऽ ने घरमुहाँ भेला, तँए मनमे मस्ती उठब सोभाविके अछि। दुनू मस्तीसँ आगू बढ़ैत ओइ मोड़पर आबि अँटैक कऽ ठाढ़ भेला जैठामसँ दुनू बेकतीक अपन-अपन गाम दिसक रस्ता फुटैत अछि। मात्र दू घन्टाक बीचक दुनू सम्बन्ध जेना बहैत जिनगीक धारकेँ एकठाम जोड़ि देलक। एक धारमे जुटला पछाइत धारसँ पुन: अलग दोसर धार बनाएब जहिना असान अछि तहिना भारियो तँ अछिए। ओना, होइत दुनू अछि। एक पुरुष आ एक नारीक बीच सम्बन्ध भेने सृष्टिक शक्ति जखन आबि जाइए तखन जँ दू पुरुखक बीच सम्बन्ध बनत तँ ओ भलेँ सृष्टिकर्ता नहि बनए मुदा सिरजन कर्ता नइ बनि सकैए सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैत अछि। ओना, तैबीच दुनूक अपन-अपन परिवारो आ विद्यालयक विद्याध्ययनक विचार सेहो भइये गेल छेलैन जइसँ आमक कलमक गाछ जकाँ नमगर-चौड़गर देह-दैहिक मिलान सेहो भइये गेल छेलैन। एक तँ पैछला कथाक सम्बन्ध, तैपर दू घन्टाक टटका सम्बन्ध सेहो तहदर-तड़गर बनियेँ रहल छेलैन।

अन्तिम विदाइकेँ नव आवरण दैत कृष्णकान्त बजला-

भाय, अखन तक हेराएल भैयारी छेलौं, मुदा आब तँ भेटल संगी भेलौं, संग मिलि चलबो अछि आ चलैत रहबो अछिए। तँए एकटा निसचित समय बना लिअ जे केते बजे दरभंगा पहुँच जाएब।

राधाकान्त बजला-

भाय, अहाँ इलाकामे जे होइत हुअए मुदा हमरा इलाकामे बेटा होइ कि बेटी, माता-पिता घरसँ बिनु खेने नइ निकलए दइ छैथ, तहूमे बुझिते छिऐ जे विदाइयक भोजन केहेन होइ छइ। तँएबारह बजेक बादे घरसँ निकैल हएत, तइ हिसाबे पहुँचब।

राधाकान्तक बात जेना कृष्णकान्तकेँ छुबि देने होनि तहिना मन छुबाइन भऽ गेलैन। अपन इलाकाक ऊपर लागल कलंककेँ साफ करैत कृष्णकान्त बजला-

भाय, एना जे हमरा इलाका आ अपना इलाकाक बेवहारक बात केलौं से की हमर घर मिथिलासँ बाहर अछि?”

सामंजस करैत राधाकान्त बजला-

भाय, हमर-अहाँक एक बेवहार-विचार रहितो प्रकृति अवघात करिते अछि। की अपने ऐठाम एहनो इलाका नइ अछि जे धार-धुरमे कटि-छँटि कऽ तेनानष्ट भऽ गेल जैठाम बेटा-बेटीकेँ माता-पिता भूखले घरसँ विदा नइ करै छैथ।की एकरा नकारल जा सकैए?”

राधाकान्तक बातपर कृष्णकान्त अपन मुड़ी डोलबैत चुप्पे रहला। एक-दोसरक नजैर-मे-नजैर मिलबैत दुनू गोरे अपन-अपन गामक रस्ता पकैड़ विदा भेला।

एक डेरा आ एक कौलेजमे तीन साल समय बीतल। दुनू गोरे, राधाकान्तो आ कृष्णकान्तो एक संग एक घरमे चौबीसो घन्टाक किरिया-कर्म करैत बी.ए. ऑनर्सक किलासमे पहुँच चुकल छला। अर्थ शास्त्रक विद्यार्थी रहने दुनूकेँ अर्थ-चरित्रक आत्म-ज्ञान मनमे जागि ई स्पष्ट कऽदेने छेलैन जे अपन जे पैतृक सम्पैत अछि ओ जीवनक लेल परियाप्त अछि। तँए, नोकरीकेँ मनसँ हटा दुनू गोरे अध्ययन दिस अपनाकेँ लगौने रहला। दुनू गोरे अर्थशास्त्र-प्रतिष्ठाक डिग्री पाबि अपन पुस्तैनी किसानी जिनगी शुरू केलाह।

पतिक विचार–माने पुरान मित्र एला अछि–सुनि श्यामा अगदिगमे पड़ि गेली। अगदिग ई जे अभ्यागतक माने तँ दोस-महीमसँ लऽ कऽ सर-सम्बन्धी होइत अनठियोक संग अछिये, मुदा पहिने जे स्वागतक ढंग छल ओइमे थोड़ेक तोड़-जोड़ सेहो भेबे कएल अछि। पहिने एक लोटा जल अभ्यागतकेँ पएर धोइले देल जाइ छल मुदा आजुक परिवेशमे ओ गौण भऽ गेल। तेकर अनेको कारण अछि...। मुदा लगले श्यामा अपन पतिक नाड़ पकैड़ मित्रक नाड़ी पकैड़ लेली। लोटामे जल आ गिलास नेने श्यामा दरबज्जापर पहुँचली। ओना, श्यामा सहैम-सरमा कऽ एकाएक धकचुका गेली। धकचुकाइक कारण भेलैन जे झुर्ड़ीक आगमन भेने राधाकान्तक चेहरा झुड़िया गेल छेलैन जइसँ वयसगर रंग-रूप पकैड़ नेने छेलैन। मुदा अपन घर अपन होइए किने। जेकर मान-सम्मानक भार घरवारीक ऊपरमे अछिए। पत्नीक धकचुकीकेँ मठियबैत कृष्णकान्त बजला-

एना धक-चुकाइ किए छी।मित्रतामे छोट-पैघ नइ होइ छइ। सबहक सम्बन्ध मित्रवत होइ छै, माने बराबरीक सम्बन्ध। जहिना अहाँ मित्रणी-मैत्रेयी भेलिऐन तहिना ओहो ने मित्रणा भेला।

ओना, किसान परिवारसँ जुड़ल श्यामा, मुदा अपनाकेँ पतिक आगूमे पतिक पूरक रूपमे बुझै छेली, तँए मुँह दाबि बाजबसोभाविके छल। लोटाक जल आ गिलास रखि श्यामा चाह आनए आँगन गेली। पुतोहु चाह बना नेने छेलैन। पियासक तृष्णा सेहो कनी-मनी राधाकन्तकेँ जगिये चुकल छेलैन। पानि पीबिते रहैथ कि श्यामा चाह नेने पहुँच गेली। यएह ने भेल अतिथि-सत्कार जे खान-पानक संग गप-सप्पमे मन बहलबैत बहेलिया बनल रही।

टेबुलपर चाहक कप रखि श्यामा आँगन दिस विदा हुअ लगली।मुदा कृष्णकान्त रोकैत बजला-

मित्र की कोनो हमरेटा छिआ जे अहाँ छोड़ि कऽ आँगन जाइ छी। जहिना ओ अहाँक मित्रणा छैथ तहिना अहूँ ने मित्रणी छिऐन!”

खग जानए खगक बोल, पतिक विचार सुनि मुस्कुराइत श्यामा आगूमे बैसली। टेबुलक एक भागमे राधाकान्त दोसर भाग कृष्णकान्त आ तेसर भाग श्यामा छेली। जहिना दू पुरुखक बीच एक नारीकेँ रहने पुरुष परीक्षा होइए, माने जहिना दुनू भॉंइक बीच सीताकेँ रहने रामक परीक्षा भेलैन तहिना ने लक्ष्मणोक भेबे केलैन। से खाली पुरुषेक परीक्षाटा होइएएहेन बात नहि अछि, नारियोक संग अछिए। ओ अछि दू नारीक बीच एकटा पुरुखक हएब। हँ! एकरा अहाँ सौतीनक डाह नइ बुझब।

जेना थाकल-ठेहियाएल राधाकान्त पानि पीलैन तेना चाह कण्ठसँ निच्चाँ नइ ससैर रहल छेलैन। जइसँ रूकि-रूकि चाह पीबै छला। श्यामा बीचमे ओहिना सकदम छेली जेना कियो ओहन स्थानपर पहुँचला पछाइत सभ किछु हेराएल-हेराएल देख सकदम भेल रहैए।श्यामाक मनमे उठैत रहैन जे पतिक संग मित्रक केहेन बेवहार रहल छैन। बिनु ओइ बेवहारकेँ बुझने-जनने कोनो एहेन बेवहार ने भऽ जाए जे ओइसँ विपरीत होइ वा हटल-हटल होइ। ओना, एहनो तँ मानले जाइए जे मूर्खक उच्चकोटिक ज्ञानपन वएह भेल जे चुपचाप सुनि-सुनि मनमे घोड़ैत रहल। श्यामा तँए चुप, मुदा राधाकान्तकेँ सेहो चुपचाप सकदम देख कृष्णकान्त बजला-

मित्र, चाहमे किछु कमी अछि जे पीबैमे बाधा उपस्थिति होइए।

बच्चासँ सीखल-जाँचल राधाकान्त छलाहे, मित्रक नस-नस ओहिना जनिते छला जहिना नर्कक मंत्र घाट होइत अछि। बजला-

मित्र!मित्रणीक चाहपवित्र छैन मुदा अपने चाह अपवित्र भऽ गेल अछि।

राधाकान्तक बात सुनि श्यामाक मन सेहो बजैले लुसफुसेलैन। लुसफुसाइक कारण भेलैन जे राधाकान्त मित्रणीक चर्च कऽ देने छेलखिन। ओना, श्यामाक मनमे गाड़ी रोकैक ब्रेक जकाँ आगू-पाछू सेहो दुनू ब्रेक लागले छेलैन। मुदा ओ तँ सलाइ रिंच जकाँ बहुरूपिया अछि, जइसँ ई निर्धारित करब थोड़ेक कठिनाह तँ अछिए जे कोन नट केतेपर रिंचसँ कसाएत। श्यामाक मनमे ब्रेक ई लगलैन जे परिवारक मालिक तँ पुरुख भेला, घरक सभ छार-भार हुनका ऊपर भेलैन। हम तँ साधारण चाह अननिहारि छेलौं। पीनिहार सभ छी, बनौनिहार एक भेली माने पुतोहु बनौली, तैबीच मित्रक एहेन बोल किए भेलैन? एहनो तँ संभव अछिए जे जहिना दूधक फूलक जे सुगन्ध अछि ओ ओकरे (माने दूधेक) लोहियासँ सटल-जरल दूधक नहियेँ अछि। भले ओ दूधेक किए ने होइ। ओ तँ जरल डारहीक जराइन महक निकालबे करत। सएह तँ ने मित्रोकेँ भेल छैन।

काग-भुशुण्डी जकाँ रस्ता परहक बर्खाक पानिमे नहा पाँखि फड़फड़ा कऽ झाड़ि शान्त-चित्तसँ श्यामा अपन मुँह बन्न केने रहली।

एमहर मित्रक विचार सुनि कृष्णकान्त स्तब्ध भऽ गेल छला। जे एहेन विचार मित्रक मुहसँ किए निकलल। ओना, मनमे ब्रेक जकाँ ईहो लागि गेल रहैन जे मित्रक मन जरूर बेथासँ बेथित छैन। A Friend is a need friend in deed. केहेन बेथा? केना पुछबैन बेथाक बेहाल?मुदा बिनु बुझने कियो केकरो बेहालकेँ सुहालो तँ नहियेँ बना सकैए। सभ समस्याक अपन-अपन सीमो छै आ श्रेणियो छइहे। ओही सीमा-श्रेणीक बीच ने समाधानो अछि। ई तँ नहि ने, जेना कृष्ण-सुदामाक बीच भेलैन। दोस्तिनीक जे सिनेही सनेस कृष्ण हँसि-हँसि खाए चाहै छला से सुदामा अढ़ दाबि-दाबिनुकबए चाहै छला। भलेँ कृष्ण चित्तचोर छला बुझि तँए गेला, मुदा सुदामाकेँ अपन गरीबीक प्रति ग्लानि नइ होइत रहैन सेहो केना नहि कहल जाएत...। कृष्णकान्तक मन भीतरे-भीतर तिरछियाइत ओतै पहुँच गेलैन जेतए पियासलकेँ पानिक तृष्णा तेज रूपमे जगैए।ओना, जहिना पियासल गाए-मालक तीन रूप सामने अबैए। पहिल- जोर-जोरसँ डिरियाएब, दोसर- हूकरब आ तेसर- अपन पियासकेँ आँखिसँ निकालि मलकारक आँखि चढ़ि-चढ़ि करूण क्रन्दन करब। यएह स्थिति कृष्णकान्तक बनि गेलैन। जे राधाकान्त बुझि गेला। बुझि ई गेला जे एक तँ हम सभ उमेरगर भेलौं, अनेको रंगक दुख-दर्द सहल देह अछि, तैठाम अशुभ बात मुहसँ निकालैमे कृष्णकान्तकेँ असोकर्ज तँ भइये रहलैन अछि। दुखाएल मने मुस्कुराइत राधाकान्त बजला-

मित्र, अहाँक गाममे लक्ष्मी साक्षात् नाचि रहली अछि। मुदा हमर...।

बीच रस्तामे राधाकान्तक विचारक गाड़ीकेँ रूकिते देख पाछूसँ ठेलैत कृष्णकान्त बजला-

से की?”

राधाकान्त बजला-

कौलेज छोड़ला पछाइत अपन पैतृक सम्पैतिक काज- खेती-बाड़ीमे तेना बोहिया गेलौं जे बीचक तीस साल केना बीत गेल से बुझबे ने केलौं। जहिना वेरागी सभ राम-रमैया, कृष्ण-कन्हैयाक सतसंगक पाछू बोहिया जाइ छैथ तहिना भेल। अहूँकेँ बिसैर गेलौं आ अहाँक संग मित्रणियोकेँ बिसैर गेलिऐन।मन अछि किने जे लोकनिया हमहीं गेल रही। ओही गामक लोक ने हमरा लोकना-लोकना कहए लगल।

राधाकान्तक विचार सुनि श्यामा अखियास करए लगली। हिनकर बचपनाक देह केहेन लालबुन्द छेलैन आ आइ झुर्ड़ी पड़ि रहल छैन! जरूर केतौ-ने-केतौ जिनगीमे खॉंच-खरोच भेलैन अछि। नहि तँ एहनो होइ जे जे आम सुभर निरोग छल ओ कोलिपदु भऽ जाएत! एकर माने ई नइ बुझबै जे जेतबो सत् बात छोट बेदरा बजैछल, तेतबो सत् बात आइ बाप-पित्तीक कोन बात जे बाबो नहि बाजि पबै छैथ। किए ने बाजि पबै छैथ से तँ अपनो मन कहिते हेतैन...।

बेर-बेर श्यामा आँखि उठा-उठा राधाकान्तक शरीरपर नचबए लगली।

ओना, कृष्णकान्तक मनमे ईहो उठए लगलैन जे खेला-पीला पछाइत जिनगीक नीक-बेजा एक बात करब नीक हएत। मुदा लगले मन ईहो कहए लगलैन जे दुखक जड़ि जेते जल्दी मेट जाए ओते शुभ...।

कृष्णकान्त बजला-

मित्र, तीस साल पैछला जिनगी नीक रहलजे एक पीढ़ीक जीवन भेल, बढ़ियाँ बात। मुदा पछातिक दस बर्ख?”

हारल सिपाही जकाँ नहि, बाधासँ बाधित सिपाही जकाँ राधाकान्त बजला-

मित्र दस बर्खसँ जंगली गाइयक (नील गाए) उपद्रव गाममे तेते बढ़ि गेल अछिजे बाड़ी तकमे तीमन-तरकारीक उपज नइ भऽ पबैए। जहिना हाथ रहैत निहत्था बनि गेल छी तहिना बुधि रहैत बुधिहीन सेहो बनि गेल छी। शुरूक तीन साल मनमे यएह होइत रहल जे जहिना बोन-झाड़ दिससँ नील गाए वौउरा कऽ गाम दिस आबि गेल अछि तहिना चलियो जाएत।

कृष्णकान्त बजला-

तइमे की बाधा भेल?”

की कहब!सबे नचाबे राम गोसाँइ। एक दिस जहिना गंगा प्रदूषित धार दुनियाँमे घोषित अछि, तहिना दोसर दिस वैतरणी पार करैवाली पवित्र धार कि नइ छैथ सेहो तँ वएह छैथ। जेते मनुखक लहास गंगा धारमे अर्पित-समर्पित होइए, तेते कोन धार पचा सकैए।गाइयक रूपमे जंगली जानवरक उपद्रव तेते बढि गेल जे जीब कठिन भऽ गेल अछि।

कृष्णकान्त बजला-

पहिने नील गाएकेँ सील-मोहर करए पड़त जे एकरा केहेन पशु मानल जाए।

अन्तिम खुशी जाहिर करैत राधाकान्त बजला-

मित्र, आब जिनगीए केतेक शेष अछि। एते दिन काजपर बैसल छेलौं, काजमे समय नचैत छल, मुदाआब ओ सभ सभटा चलि गेलतँए आब थोड़ेक फ्री सेहो भइये गेलौं, भेँट-घाँट होइत रहत।

कृष्णकान्त-

मित्र, पाँच दिन रहू। अपन हाथक उपजौल एक-एक चीज-वौस खुआ देब। पाँच दिनक पछाइत जाएब।

राधाकान्त बजला-

मित्र, अपन जिनगी ओहने बना नेने छी जेहेन समय-साल बनि गेल अछि। भनेचालीस बर्खक बीचक भेँट-घाँट जे गैप छल ओ समतल बनि जाएत। आइ भरि छी, काल्हि भोरे चलि जाएब।

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शब्द संख्या : 2595, तिथि : 4अप्रैल2018

 

१.२

जगदीश प्रसाद मण्डल

पंगु

उपन्यासक आरम्भ

2.

14 जनवरी 1934 इस्वीक दिनक एक बजेमे जबरदस भुमकम भेल। अखुनका जकाँ भुमकमक नाप-जोख करैबला कोनो यंत्रक अविष्कार नहियेँ भेल छल जइसँ लोक बुझैत जे केहेन भुमकम भेल, मुदा एते तँ भेबे कएल जे बड़का-बड़का गाछो सभ खसल, भीतघर सेहो खसल आ खेत-पथारमे दारारि फटि-फटि जमीनक भीतरसँ बाउल ऊपर आबि-आबि बाधक-बाध जमीनमे पसरबो कएल। पानिक मोकर सभ सेहो फुटल। गाम-गामक शकल बदैल गेल। घर खसने लोको मरल।

आने गाम जकाँ क्षति सीतापुरमे सेहो भेल। ओना, सीतापुरमे एकोटा घर पजेबाक तँ नहियेँ छलखालीपान-सात परिवारकेँ कँचका पजेबाक घर छेलै, ओहो सभ खसल। सीतापुरमे अधिकांश घर टटघर छल जे लकड़ी-बाँसक खुट्टापर ठाढ़ छल, ओ हिल-डोलि जरूर गेल मुदा खसल नहि। ओना, सीतापुरमे लोअर प्राइमरी स्कूल सेहो छेलै मुदा सरकारी नहि, एकटा शिक्षक स्कूल चलबै छला। बीस-पच्चीसटा विद्यार्थी छल। सभ विद्यार्थी शनियेँ-शनि हुनका सनिचराक रूपमे पाभैर चाउर आ एक-एकटा पाइ सभ दैत रहैन। एक गोरे ऐठाम शिक्षक रहै छला जे खाइयो-पीबैले दइ छेलैन आ बदलामे परिवारक बच्चा सभकेँ दरबज्जेपर पढ़बैत रहथिन।गौंऑंक सहयोगसँ पनरह हाथ नमती भीतघरक रूपमे स्कूल छल। भुमकममे ओहो खसि पड़ल। स्कूल खसला पछाइत बहरबैयाक[1] कचहरी[2]मे पढ़ाइ हुअ लगल। तीन-चारि सालक पछाइत स्कूलक जगह बदैल, माने जैठाम स्कूल छल ओइ जगहसँ हटि दोसरठाम एकटा परतीपर गौंएक सहयोगसँ पुन: भीतघर बनल। स्कूलक जगह बदलैक कारण भेल जे ओइ जगहकेँ लोक अशुभ मानलक।

अंगरेजक विरोधमे एहेन माहौल बनि गेल छल जे स्कूलक जे शिक्षक छला, ओहो चोरा-नुका कऽ लोक सभकेँ देशक अजादीक विषयमे बुझबै छला। गाम-गाममे अंगरेजी शासनक समर्थक सेहो छेलाहे। वएह सभ चुगली करि देलकैन जइसँ 1942 इस्वीमे शिक्षक पकड़ा गेला। स्कूल बन्न भऽ गेल। ओना, साल भरिक पछाइत जहलसँ शिक्षक निकललामुदा घुरि कऽ सीतापुर नहि एला। स्कूलक भीतघर ओहिना ठाढ़ भेल रहल। तीन सालक पछाइत दोसर शिक्षक एला। हरिचरणक नाओं सेहो पिता[3] स्कूलमे लिखा देलखिन।

देश स्वतंत्र भेल, मुदा अखन तक आमजन स्वतंत्र शब्दक अर्थ बुझबे ने करै छला। सीतापुर गाममे बेसी-बेसी जमीनबला सेहो छला मुदा मालगुजारी असुलनिहार जमीन्दार मालिक नइ छला। जइसँ पाहीपट्टीक मालिक अपन पटवारी, गुमस्ता आ बराहिलक माध्यमसँ कचहरियो चलबै छला आ मालगुजारी सेहो असुलै छला। कचहरी चलबैक माने भेल, गाममे जे झगड़ा होइ, तेकर पनचैती करब। ओना, तइ मानेमे जमीन्दार कमजोर छला। तँए गामक मुँहगर सभकेँ सेहो पनचैतीमे बजबै छला। कचहरीक कारोबारीकेँ कमजोर होइक कारण छल जे दू परिवार वा तीन परिवारक बीच जे झगड़ा होइ छल ओइमे जे मारि-पीट होइ छल, ओ टटका रहै छलतँए कनियोँ अनुचित भेने पार्टी मानबे ने करैत रहए। माने पनचैती स्वीकार नइ करैत छल। जइसँ कचहरीक आदेश टुटि जाइ छल।

देश की स्वतंत्र भेल की नइ भेल, से बुझनिहारक अभाव तँ रहबे करइ। मुदा रंग-रंगक भाषणो गाममे चलिते छल जइसँ किछु हेराएल-भोथियाएल मुद्दा सभ सेहो जगिते छल। जमीन्दारी टुटि गेल, जमीन्दारक शासन सेहो टुटि गेल। आब मालगुजारी सरकार असुलत आ ओइ पाइक खर्च समाजक काजमे लागत इत्यादि...।

अखन तक गाममे ने एकोटा नीक सड़क छल, ने एकोटा पुल, आ ने स्कूल बनल। आम जनक नजैरमे सेहो नव-नव विचार जगबे कएल। पुलक नाओंपर दसटा ईटा रस्ता परहक कोनो-कोनो खाधिमे बिछा देल जाइत रहै, जैपर होइत लोक बरसातमे चलैत छल।

आम-कटहरक खुदरा गाछो आ गाछीमे सेहो जमीन्दारक ऐमला-फेमलाक संग लड़ाइ उठल। ओना, अखन धरिक[4] जे कचहरीक रूतबा छेलै ओ वौद्धिक रूपमे कमल मुदा बेवहारिक रूपमे ओहिना छल माने पूर्वते। माने ई जे देश स्वतंत्र भेला पछातियो गारि पढ़ब, मारबइत्यादि कचहरीक ऐमला-फेमलाक बेवहार रहबे कएल। आमक गाछीक लड़ाइ गाछक तड़ी-फड़ीक लेल भेल। तँए एकराआन गाममे जे कहल जाइत होइ मुदा सीतापुरमे आमक गाछीक लड़ाइ कहल जाइत अछि। से केबल आमक गाछीक लड़ाइये कहल जाइए से बात नइ अछि। आमक गाछीकेँ बिआहोक सभा-गाछी आ दोस्तियारीक धरम-गाछी सेहो कहले जाइए।

आमक गाछीक लड़ाइ कचहरीक पटवारी-गुमस्ता-बराहिलक संग गुलाबचनकेँ भेल। गुलाबचनकेँ तीन भॉंइक भैयारी, तीनू भॉंइ कातिक-सँ-फागुन धरि अपने गाछीमे अखड़ाहा खुनि कुश्ती लड़ैत छल। गुलाबचनक पिता गोपीचनकेँ अपन बुद्धि-अकिल छेलैन तँए अपन सोच-विचार सेहो छेलैन्हे। तेकर एकटा कारण ईहो छल जे दस कट्ठा खेतकेँ गोपीचन चारू बापूत मीलि कोदारीए-सँ उनटा लइ छला, माने तामि लइ छला। तैसंग अपन चारिटा महींस सेहो पोसने रहैथ, जेकर दूध-दही खाइते छला। तँए जिनगीमे ऐसँ बेसी आरो चाही की? कोनो कि गोपीचन शास्त्र-पुराण पढ़ने छला जे मनुखक देहपर हाथीक माथा आ बिनु घटकैतिये राम-सीताक जोड़ी नगर बधू केना धनूष टुटैसँ पहिने लगा लेलैन, ऐ सभपर विचार करितैथ। ई तँ छी शास्त्र-पुरानक विचार। अपन विचार शास्त्र-पुरानमे रहअ। ऐसँ गोपीचन आ गोपीचनक तीनू बेटाकेँ कोन मतलब? मतलब छै अपन मेहनतक संग बापक देल सम्पैतकेँ सुरक्षित राखबसँ।

पैछला साल गोपीचन मरि गेला। गोपीचन जा जीबै छला ता मालिककेँ अपन जमीनमे अपन रोपल आम-कटहरक फड़ अपना हाथे बाँटि-बाँटि दइ छेलखिन। बेटा सभ एतबे करै छेलैन जे गाछक आधा-छिधा आमो आ कटहरो तोड़ि आगूमे आनि राखि दइ छेलैन आ महींस चरबए चलि जाइ छल। जइसँ मालिकक संग बँटबाराक महिरम बुझबे ने केने छल।

आम-कटहर तोड़बए कचहरीक बराहिल पहुँचल। गुलाबचनकेँ एतबे अनुमान छेलै जे अपन गाछी-कलम छी। आन गामक लोक सभ कचहरीमे रहैए, ओकरो खेनाइ-पीनाइ तँ गौंए ने देत। तँए पाँचटा दसटा आम हमहूँ देबइ।

तीनू भॉंइ गुलाबचन मड़ुआ रोपि कऽ आएले छल। दुपहरक समय रहै, बराहिल आबि गुलाबचनकेँ आम तोड़ए कहलखिन। तैपर गुलाबचन बाजल-

अखन मड़ुआ रोपि कऽ तीनू भॉंइ एबे केलौं हेन, निचेनसँ गाछीक आम तोड़ब। पछाइत पाँचटा आम अहूँकेँ कचहरीमे पहुँचा देब।

अखन धरि थाना-पुलिस जकाँ बराहिलो अपनाकेँ बुझिते छल। पटवारीक नाओं कहैत बाजल-

सरकारक हुकुम छह, आम आइये तोड़बह।

तहीकाल गुलाबचनक मझिला भाए- बालचन पहुँचल। तीनू भाँइमे बालचन सभसँ बूफगर। जेहने छिपगर जबान तेहने हाथो-पएर। बराहिलक मुँहक बात सरकारक हुकुम छह सुनिते बालचनकेँ देहमे देशी सरकार बनैक विचार जगि गेल। जगैक कारण ईहो रहै जे काल्हिये साँझमे सोराजीलालक मुहसँ सुनने छल जे देश-स्वतंत्र भेल, सबहक देश भेल तँए केकरो कियो मालिक नहि रहल। सबहक देश भेल, सबहक शासन भेल। बराहिलकेँ बालचन कहलक-

हम अपना चीजक अपने मालिक छीकी तोहर सरकार छह। जा, नइ देबह एकोटा आम।

बालचनक बात सुनि बराहिल ठमकल, मुदा जहिना शासनक कुर्सीपर बैसल अफसर वा थानाक वर्दी पहिर एको लीबरक आदमीकेँ ढोड़ साँपक फुफकार होइत अछि तहिना बराहिलक सेहो भेल। तैबीच गुलाबचन अपन भाएकेँ चुप करैत कहलक-

बालचन, दरबज्जापर आएल दुश्मनोकेँ लोक नीके बोल कहै छै, तूँ किए अनेरे झगड़ा बेसाहै छँह।

ने गुलाबचने अपन विचारक भावार्थ बुझलक आ ने बालचने बुझलक मुदा बराहिल बुझि गेल। बुझबो केना ने करैत, जिनगी तँ बीतै छेलै शासकीय भाषा-शास्त्रीक बीच ने...। जँ गुलाबचनकेँ एतबो होश रहितै जे दरबज्जापर आबि बराहिल ऑंखि देखबैए आ हम ओकरा अभ्यागत बुझै छिऐ! जँ से बुझैक शक्ति रहितै तखन जेठ भाइक भाषा नै बजैत। ओना, बराहिल बालचनक धुआ-काया देख सहैम गेल छल, मुदा जमीन्दारीक मंत्र जे मनकेँ पकैड़ नेने छेलै, तइसँ फुफकार रहबे करइ। गुलाबचनक दरबज्जापर सँ बराहिल कचहरी दिस विदा होइत बाजल-

आइ तोरा सभ भॉंइकेँ देखा दइ छियौ।तीनू भॉंइकेँ हथकड़ी लगा जेल जखन पठेबौ तखन अपने बुझि जेबही!”

बराहिल चलि गेल। गुलाबचन सेहो नहाइ-खाइ दिस बढ़ल।

कचहरी पहुँच बराहिल पटवारीकेँ सभ बात सुना देलकैन। ढहैत सामंती सोच आ उठैत जनवादी विचारक बीच पटवारीक मनमे द्वन्द्व पसैर गेल। मुदा समाजिको सत्ता तँ सत्ता छीहे, ओहूमे केतेको भत्ता अछिए। समाजोमे तँ एहेन लोकक विचारक सत्ता रहले अछि जे राज-काजसँ या तँ जुड़ल रहल अछि वा ओइमे सटल रहने अपन सत्ता बनौने रहल अछि। स्कूली शिक्षा तँ पटवारीकेँ कम्मे रहैन मुदा जमीन्दारी सूत्रक नीक अनुभव रहबे करैन। बराहिलकेँ राजक हथियार बना लड़ाइयक सूमा बनौलैन। गाममे जेतेक मुँहगर-कन्हगर लोक छल, जेना- मैनजन, देबान इत्यादिजेसभ कचहरीसँ जुड़ल रहए–सबहक बैसार पटवारी केलक। अपनो गुमस्ता, बराहिलक संग गामक असेसर[5]केँ बजा एकठाम केलक। सर्वसम्मैतसँ काल्हि आम तोड़ैक निर्णय भेल। समयक हिसाबसँ सभ गुलाबचनक गाछी पहुँच बलजोरी आम तोड़ब शुरू केलक।

गुलाबचनकेँ बुकौर लगि गेल। मुदा बालचनक हिम्मतमे मिसियो भरि कमी नइ आएल। बालचनक हिम्मत देख गुलाबचन बाजल-

बौआ!धन, धरम दुनू जेतह। आम तोड़ै छै ते तोड़ए दहक। छोड़ि दहक। भगवानकेँ दइक हेतैन ते ऐगला साल अहू बेरक साती आम दए देथुन।

जहिना गर्म आगिमे पानि ढारने मिझा तँ जरूर जाइए मुदा ओकर परितापकेँ ठण्ढा होइमे किछु समय लगिते अछि तहिना बालचनक मनमे ईहो उठैत रहै कचहरीक झगड़ा गाममे पसैर जाएत। हेबो केना ने करितै गौंओ तँ संग छेलैहे। तेतबे नहि, वेचारा ने कहियो स्कूले देखने आ ने तेहेन पुरुखक सतसंगे भेल छेलै जइसँ पुरुखपनाक बोध होइतै। मुदा एकटा विचार बालचनक मनमे जरूर जगलै जे जखन गौंऑं सभ हँसेड़ीक रूपमे कचहरीक संग हमर सम्पैत लूटए आएल अछितखन ओकरा संग हमर समाजिक सम्बन्ध केहेन हएत? की हम ओइ समाजसँ ई नहि पुछि सकै छी जे समाज जखन विचारसँ चलैए तखन हँसेड़ी बनबैक की प्रयोजन भेल? जरूर किछु-ने-किछु भीतरमे रहस्य अछि...।

संजोग बनल। जखन गुलाबचनक गाछीमे आम टुटब शुरू भेल, तखने जेठुआ बिहाड़ि जकाँ भरि गाममे बिर्ड़ो उठल। एकाएक नवतुरिया सभ सेहो गुलाबचन-ऐठाम पहुँचए लगल। गामक नवका पीढ़ी जे अखड़ाहापर खेलाइ छलओ सभ बालचनकेँ गुरु कहै छेलैन। सोराजीलाल सेहो गुलाबचनक ऐठाम एला। अबिते सोराजीलाल सबहक बीचमे गुलाबचनकेँ कहलखिन-

गुलाबचन, अहाँ संग अन्याय होइए, एकरा रोकू।

सोराजीलालक विचारक प्रभाव जेते बालचनपर पड़ल तेते गुलाबचनपर नइ पड़ल। पड़बो केना करैत, जेकर विचार पहिनहि हारि मानि चुकल छलओ केना लगले उठि कऽ ठाढ़ होएत। घरसँ कड़ुतेल पिऔलहा लाठी निकालि बालचन बाजल-

भैया, तूँ घरेपर रहह। घर-दुआरक संग स्त्रीगणो आ बालो-बच्चाकेँ देखैत रहिहह। हम छोटका भैयाक संग जा कऽ आम तोड़बकेँ रोकबै।

जहिना देशक ओइ सिमानपर जे शक्तिशाली देशक सीमा सेहो छी, जाइत सिपाहीकेँ परिवारक लोक अन्तिम विदाइ बुझैएतहिना गुलाबचनक मनमे उठए लगल। एक दिस समांगक जिनगी देख रहल छलआ दोसर दिस सम्पैत। रंग-बिरंगक विचार गुलाबचनक मनमे चकभौर लिअ लगल। जिनगी-ले सम्पैत अछि वा सम्पैत-ले जिनगी? मुदा अखन सोचै-विचारैक लेल ओते समयो नहियेँ अछि जे आनो-आनसँ बुझि विचारब। तहूमे जखन लड़ाइयक मोर्चा बनि रहल अछितखन सभसँ बुझबो-विचारब केतेक नीक हएत? लड़ाइक मोर्चाक विचारक अनुभवो सभकेँ एक्केरंग नहियेँ होइ छइ। जे लड़ाइयक मोर्चापर उतरनिहार अछि वा जे मोर्चापर कहियो गेबे ने कएल, दुनूक विचारोमे भिन्नता हेबे करत किने..!

सोचैत-विचारैत गुलाबचन अपन दुनू भॉंइकेँमाने ज्ञानचनो आ बालचनोकेँकहलक-

बौआ, आम अपन परिवारक तोड़ि रहल अछि, मुदा जखनसमाजो पीठपोहु छैथतखन पाछुओ हटब नीक नहि। तँए पहिने दरबज्जापर आएल सहयोगी सभकेँ पुछि लहुन जे आगू की करब।

गुलाबचनक विचार सुनि जहिना दुनू भॉंइ–ज्ञानचन आ बालचन–ठमकल तहिना समाजक नवतुरिया सभ सेहो ठमकल। मुदा सोराजीलाल, जे दर्जनो बेर जेल-यात्राक करैत गुलाम देशसँ मुक्ति पाबि चुकल छैथ, हुनका विचारमे मुक्तिक ओ रूप ओहिना झलैक रहल छेलैन जेना पौने छला। अगुआइ करैत सोराजीलाल बजला-

गुलाबचन, जिनगीक बाटमे केहनो आफद-असमानी वा केहनो रोड़ा-पाथर किए ने आबि कऽ रोकए मुदा पाछू नइ हटी। किएक तँ ओ निर्णायक दौर होइत अछि। ओइठाम पाछू हटने लोक पछुआ जाइत अछि। ओना, तइमे थोड़ेकहोशियारीक खगता जरूर अछि मुदा पाछू हटब किन्नहु नीक नहि।

सोराजीलालक विचारमे गुलाबचनकेँ की भेटल से तँ गुलाबचने जानत, मुदा बिच्चेमे बालचन बाजल-

सोराजी भैया, अहाँक विचार जँ संग रहत तँ सम्पैत बँचबैले हम अपन जानकेँ अराधि लेब। अहाँ जे कहबहमतइ हिसाबसँ करैले तैयार छी।

बालचनक विचार सुनि सोराजीलाल बजला-

बालचन, लड़ाइक मोर्चाक एक-एक क्षण ओ क्षण छी जे क्षणमे छनाक कऽ सकैए। तँए एको क्षण गमौने बिना चलह आम तोड़बकेँ रोकैले।

सोराजीलालक विचार सुनि बालचनक मनमे लहरैत आगि जकाँ एकेबेर धधरा उठल। अपन लाठी सम्हारि बालचन गाछी दिस आगूए-आगू दौड़ल। पाछू-पाछू समाजक नवतुरियो, सोराजियोलाल आ परिवारक बाल-बच्चा सहित जनिजातियो सभ गरियबैत विदा भेल।

आमक गाछीमे गुमस्ता, पटवारी, बराहिलक संग असेसरो आ समाजक पाँचटा मुँहगर-कन्हगर लोक सेहो छला। गामक हँसेड़ीकेँ दौड़ैत अबैत सभ कियो देखलैन। एक्के-दुइये गुमस्तो, पटबारियो, बराहिलो आ असेसरो आमक गाछीसँ भागल। मुदा गामक जे पाँचो गोरे छला ओ पूर्ववते गाछीमे रहला। ओना, हुनका सबहक मनमे मारिक डर नइ पैसल रहैन। डर नइ पैइसैक कारण हुनका सबहक मनमे रहैन जे हम तँ समाजक लोक भेलौं किने, बीच-बचाउ करैत रहब। मुदा ई विचार मनमे जगबे ने केलैन जे जे बात अखन मनमे उठि रहल अछिओ तँ आम तोड़ैसँ पहिनौं उठि सकै छल। जँ से उठल रहैत तँ एहेन परिस्थितीए किए बनैत?

जमीन्दारक ऐमला-फमिलाकेँ भागैत देख सोराजीलालक मन अड़हुलक फूल जकाँ फुला गेलैन। गाछी पहुँच टुटल आमक ढेरीकेँ देखबैत सोराजीलाल बजला-

गुलाबचन, अहाँक आम छी लऽ जाउ।

तही बीच सिंहेश्वर–माने गामेक एक जातिक मैनजन,बाजल-

गुलाबचन, अनेरे ने लाठी-लठौबैल करए चाहै छी। समझौता मानि लिअ।

सिंहेश्वरक विचार सुनि गुलाबचन थकथकाएल मुदा सोराजीलाल बालचनकेँ कहलखिन-

बालचन!समाजक यएह लुच्चा-लम्पट सभ गरीबक सम्पैत्तियो आ इज्जतो-आबरूकेँ सभ दिनसँ लूटैत आएल अछि। अखन ई समाज नहि राजक हँसेड़ी छी, तँए जे भागल से अपन जान बँचौलक, मुदा जे पकड़ा गेल तेकरा छोड़ब उचित नहियेँ हएत।

सोराजीलालक विचार बालचन मानि लेलक। मुदा विचारमे कनी संशोधन जरूर केलक। संशोधन ई केलक जे कड़ुतेल पिऔल लाठी अछि, तँए ओइ लाठीसँ अवघात बेसी हएत। अवघात ई जे जहिना लोहाक तीर बनबैकाल करूतेल पिऔलासँ ओ विषाक्त भऽ जाइएतहिना बाँसक लाठियोमे होइए। जइसँ साधारण लाठीक अपेक्षा ओइसँ बेसी अवघात भऽ सकैए। लाठी रखि बालचन सिंहेश्वरक दुनू गालमे दू चाट मारलक।

सिंहेश्वरकेँ गालमे चाट लगिते जेतेक नवतुरिया छल, भुआ जकाँ बाँकी चारूपर लटैक हाँइ-हाँइ सभकेँ चोटियाबए लगल। दुनू हाथ उठा सोराजीलाल सभकेँ शान्त केलैन। मुदा एक दिस जहिना मारिक चोटसँ चोटाएल गहुमन साँप जकाँ पाँचो फुफकार काटि रहल छल तहिना दोसर दिस गनगुआरि-साँप जकाँ समाजोक सिपाही सभ सीटी बजाइये रहल छल। लड़ाइ जीतला पछाइत लड़ाइ लड़निहारक विचार सर्वोपरि भइये जाइए। सर्व-सम्मैतसँ निर्णय भेल जँ पाँचो गोरे साए-साए बेर कान पकैड़ समाजक बीच उठए-बैसएतँजान छोड़ि देबइ।

आगू-पाछू पाँचोकेँ करैत देख सोराजीलाल पुन: विचारमे संशोधन करैत बजला-

कान पकैड़ कऽ उठब-बैसब छोड़ि पाँचोकेँ थूक चटबाउ।

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शब्द संख्या : 2156, तिथि : 15मई2018


 

[1]पाहीपट्टीक

[2]कामत

[3]देवचरण

[4]बीतल समयक

[5]चौकारी टेक्स असुलनिहार

 


रचनापर अपन मतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।