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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१.रबीन्‍द्र नारायण मिश्र-संगम तीरे २.आशीष अनचिन्हार- प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल

 

रबीन्‍द्र नारायण मिश्र-संगम तीरे  

पत्नीक संग डेढ़ सालक बच्‍चा आ किछु मोटा-चोंटा सहित इलाहाबाद स्‍टेशनपर पहुँचलौं। हमर अनुज दड़िभंगासँ हमरा मदैत करए आएल रहैथ। दिल्‍लीसँ स्‍थानान्‍तरणक बाद नव निर्मित कार्यालय कर्मचारी चयन आयोगमे योगदान करबाक हेतु हम इलाहाबाद सपरिवार बिना कोनो डेरा तकने आएल रही। आब सोचैत छी तँ अपनो हँसी लगैत अछि, आश्‍चर्यो होइत जे केना नान्‍हिटा बच्‍चा ओ पत्नीकेँ इलाहाबाद टीशनपर छोड़ि अनुज-संगे डेरा ताकए विदा भेलौं..!

पहिल बेर अही क्रममे डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीसँ हुनकर आवास तिरमुक्ति पर भेँट भेल। हुनकासँ भेँट भेलापर लागल जेना केतेको सालसँ परिचित होथि। सभ काज छोड़ि कऽ हमरासँ गप करैत रहला। परिवारक अन्‍य सदस्य सभ स्‍वागतमे लागल रहला। एक अपरिचित मैथिलक एतेक स्‍वागत करत?

जयकान्‍त बाबूक मार्गदर्शनक अनुसार प्रयास कए हमरा लोकनिकेँ ओही दिन साँझ धरि डेरा भेटल। डेरा दड़ियागंजमे छल। ओइठामसँ टीशन आपस जा परिवारकेँ अन्‍य सदस्‍य, सामान सहित डेरामे प्रवेश केलौं। दिन भरिक संघर्षसँ हम सभ थाकि कऽ चूर भऽ गेल रही आ जेना-तेना भोजन कए शान्‍ति पूर्वक सूति रहलौं। प्रात:काल स्‍टेनली रोड स्‍थित कर्मचारी चयन आयोगक कार्यालय पहुँचलौं। ओ कार्यालय स्‍थापित भऽ रहल छल, अस्‍तु कार्यालय चलेबाक हेतु मूल वस्‍तु जेना कुर्सी, टेबुल तक नहि छल। एकटा अधिकारी छला जे ओइ कार्यालयक एक भागमे सपरिवार रहैत छला। क्रमश: किछु कर्मचारी सभ एला। टेबुल, कुर्सीक बेवस्‍था भेल। किछु स्‍थानीय नैर्मिातक कर्मचारी राखल गेल। आ कार्यालय चलि पड़ल। किछुए दिनमे नव भर्तीक विज्ञापनक आधापर आयोजित लिखित परीक्षाक हेतु आवेदन पत्रसभ आबए लागल। किछुए दिनमे एकटा कोठरी आवेदनक लिफाफासँ भरि गेल।

किछु दिनक बाद कर्मचारी चयन आयोगक क्षेत्रीय निदेशक बनि कऽ श्री एल.के.जोश–आइ.ए.एस.–एला। कारी-कारी करगर मोछ, गोरनार भुट्ट आ बेसी काल गुमसुम रहएबला जोशीजीक एलाक बाद कार्यालयक प्रगति तेजीसँ होमए लागल। जोशीजीक पत्नी इलाहाबादेमे छेलखिन, तँए ओ ओहीठाम अपन पदस्‍थापना करौलैथ। कार्यालयमे कर्मचारी कम छल आ काज एकाएक बढ़ि गेल छल जइ कारणसँ लोक सभ तनावमे रहैत छल। चूकी परीक्षाक तिथि पहिने घोषित भऽ जाइत अछि, तँए सभ काज समयवद्ध ठंगसँ करबाक छल। तहिया कम्‍पूटरक आगमन नहि भेल छल। सभ काज हाथेसँ होइत रहइ। हालत ई छेलै जे जोशीजी स्‍वयं नित्‍य सैकड़ोक तादादमे प्रवेश पत्र लिखैत छला आ अनकर कथे कोन। परीक्षाक बेवस्‍था करब कोनो जबार भोज करबसँ बेसी कठिन काज छल।

एतेक अस्‍त व्‍यस्‍तताक बाबजूद ओ कार्यालय आगू चलि पड़ल मुदा जोशीजी निरन्‍तर उदास रहैत छला। कारण परिवारिक छल। पत्नीक लगमे रही तँ ओ इलाहाबाद अएला आ थोड़ेक दिनक बाद ओ इलाहाबाद छोड़ि विदेश चलि गेलखिन। स्‍पष्‍टत: सभ किछु ठीक-ठाक नहि छल। बेकतीगत जीवनक ऐ अन्‍तर्द्धन्‍दसँ गुजरैत हुनकर मोन आसानीसँ पढ़ल जा सकैत छल। एकर दुष्‍प्रभव हुनकर कार्यालयक काजोपर पड़ैत छल।

जोशीजीक प्रेम विवाह भेल छल। हुनकर पत्नी इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे इतिहास विषयक व्‍याख्‍याता छेलखिन। उम्रमे हुनकासँआठ साल पैघ। मुदा प्रेम तँ आन्‍हर होइत अछि। विवाह भऽ गेल। दूटा बच्‍चो भेल। मुदा खटपट सेहो शुरू भऽ गेल जे चलिते रहल आ अन्‍ततोगत्‍वा हुनका लोकनिक विवाह विच्‍छेद भऽ गेल। जोशीजी दिल्‍ली आपस चल गेला आ कार्मिक विभागक सचिव भेला। केन्‍द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT)क उपाध्‍यक्ष भेला। आब ओ ऐ दुनियाँमे नइ छैथ।

प्रेमक आवेशक अंजाम केतेको बेर बहुत कुटिल होइत अछि। उफानकमे रहएबला जोड़ी कएक बेर एक-दोसरक हत्‍या कऽ दैत अछि। नित्‍यप्रति एहेन घटना होइत रहैत अछि, तथापि लोक प्रेम करैत अछि। जँ प्रेम त्‍यागसँ अभिभूत नहि भेल, तँ ओ अस्‍किर हेबे करत। के हारत, के जीतत तेकर कोनो ठेकान नहि, मुदा सर्जनात्‍मकता तँ अन्‍त भाइए जाइत...।

जोशीजीक प्रकरणकेँ स्‍मरणसँ दृदयमे कएक बेर अखनो कचोट भऽ जाइत अछि। दुनू गोटे अतिशिक्षित ओ संभ्रान्‍त परिवारक छला। स्‍वयं बहुत योग्‍य रहैथ मुदा जीवनक व्‍यतिक्रमकेँ नहि नहि सम्‍हारि सकल। भावी प्रवल।

कार्यालयमे एकाएक तेतेक काज आबि गेल आ काज केनिहार लोक तेतेक कम छल जे बहुत अस्‍तव्‍यस्‍तता भऽ गेल। रबियो दिन छुट्टी नहि होइत छल। कखनो काल तँ दिल्‍ली घुरि जेबाक इच्‍छा होइत छल। दड़ियागंजसँ स्‍टेनली रोड स्‍थित कार्यालय आएब-जाएब कठिन काज छल।

एक्कापर चढ़ि कऽ बेसी काल यात्रा होइत छल, तथापि समय तँ लगिते छल। तँए कार्यालयक आसपास डेरा ताकए लगलौं। आखिर किछु दिनमे १७, नयाममफोड़गंज हमर डेरा भेल। ममफोड़गंज इलाहाबादक संभ्रान्‍त आवासीय मोहल्‍लामे सँ मानल जाइत अछि। मकान मालकिन वृद्धा, स्‍वतंत्रता सैनानी छेली, जिनका सभ गुरुजी कहैन, कारण ओ शिक्षक छेली। सेवा निवृत भऽ गेल रहैथ। मासमे एक दिन पैंशन लेबए लेल जखन ओ जाथि तँ लगैक जे ओ दिव्‍य बेकती ठाढ़ अछि। आन दिन विक्षिप्‍त जकाँ एकटा कोठरीमे सिमटल। भूतलपर दोसर किरायादार छल। छतपर खाली जगहमे गोइठा भरल छल। कुलमिला कऽ ई आवास सुखद छल। आसपासमे नीक लोक सभ छल।

इलाहाबाद विश्वविद्यालयक भूतपूर्व कुलपति स्‍व. ए.वी. लाल, अर्थशास्‍त्र विभागक विभागाध्‍यक्ष डॉ. महेश प्रसाद, प्रसिद्ध महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. रमा मिश्र इत्‍यादि सभ आसे पासमे रहैत रहैथ। निगम चौराहा लगेमे छल। मिठाइ केर दोकान घरेलू समान इत्‍यादि सभ किछुक दोकान सेहो आसेपासमे।

कार्यालयसँ ममफोड़गंज स्‍थित हमर डेरा पैदल ५-७ मिनटक रस्‍ता छल। अस्‍तु आवागमनक समय ओ खर्चा दुनू बाँचए लगल। क्रमश: आसपासक लोक सभसँ परिचय होमए लागल आ जीवन यात्रा अपेक्षाकृत सरलतासँ आगू बढ़ए लगल।

छुट्टी दिनमे आसपास एमहर-ओमहर आएब-जाएब प्रारम्‍भ भेल। मोतीलाल नेहरू रिजनल इन्‍जीनियरिंग कौलेजमे हमर पितियौत भातिज पढ़ै छला। कहियो काल हुनकासँ भेँट-घाँट करए छात्रावास चलि जाइ। ओतए गेलापर अफशोस हुअ लागए जे नीक नम्‍बर रहितौं हम ऐ इन्‍जीनियरिंग कौलेजमे अपन नओं नहि लिखबा सकलौं।

गामक एकटा फौजी कहियो काल अबैत रहै छला। सासुरक किछु सम्‍बन्‍धी सेहो भेट गेला। हमर स्‍कूलिया संगी इन्‍जीनियरिंग पास कऽ इलाहाबादेमे नौकरी पकैड़ लेने रहैथ। एवम्‍ प्रकारेण पूर्व परिचित लोक सभसँ सम्‍पर्क भऽ गेलाक बाद कार्यालयसँ हटि कऽ समाज भऽ गेल जे क्रमश: बढ़िते गेल, तइसँ इलाहाबादमे रहब मनलग्‍गू भऽ गेल। कहि नहि हम दिल्‍ली छोड़ि इलाहाबाद किएक एलौं?

प्राय: मोनमे रहए जे गाम लग रहत। खर्चा कम होएत वा इलाहाबाद धार्मिक स्‍थान अछि, तँए अध्‍यात्‍मिकताक विकासमे सहायक रहत। मुदा इलाहावाद आबि कऽ कोनो सुविधाजनक स्‍थिति नहि भेल। कार्यालयमे काज बहुत छल। रबियो दिन व्‍यस्‍तता रहैत छल, कारण अधिकांश परीक्षा रबिए दिन होइत छेलइ। अध्‍यात्‍मिक दृष्‍टिसँ किछु विशेषता तँ ऐ शहरकेँ अछिए। प्रतिवर्ष माघमे संगममे जबरदस्‍त मेला लगैत अछि। कहाँ-कहाँसँ सन्‍त-महात्‍मा, गृहस्‍थ सन्‍यासी लाखोक संख्‍यामे ओतए आबि कऽ मास करै छैथ। भजन-कीर्तन करै छैथ।

गाम-घरक चिन्‍तासँ बेफिक्र लोक एकटा अद्भुत आनन्‍दक अनुभव करैत अछि। माघ मेलाक अवधिमे कहियो-कहियो विशेष स्‍नान होइत अछि। ओइ दिन तँ लगैत अछि जेना समुद्र संगम दिस अग्रसर भऽ रहल अछि।

माघ मेलामे रंग-रंगक सन्‍त-महात्‍माक समागम होइत छल। ओइमे देवराहा बाबाक नाओंकेँ के नइ जनैत अछि। हुनकर उम्रक बारेमे कहल जाइत अछि जे ओ केतेक दिन जीला तेकर केकरो सही अनुमान नहि अछि। डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद २-३ सालक रहैथ तँ हुनकर पिता बाबा लग लऽ गेल रहथिन आ बाबा हुनका देखते कहि उठला जे ई तँ राजा हएत। सन्‍ १९५४ इस्‍वीमे भारतक राष्‍ट्रपति भेलाक बाद ओ बाबाक दर्शन केने रहैथ। ओही समयक समस्‍त प्रख्‍यात नेता सभ बाबाक दर्शन हेतु अबैत रहै छला। ओ घन्‍टो पानिमे डुबकी लगौने रहैत छला। हुनका योग सिद्ध रहैन आ सामने ठाढ़ बेकतीक मोनक बात बुझि जाइ छला। कहल जाइत अछि जे बाबा पानिपर चलि सकैत छला, योग क्रिया द्वारा एक स्‍थानसँ दोसर स्‍थान जा सकै छला। मंचपर बैस कऽ बाबा भक्‍त सभकेँ प्रसाद फेकैत रहै छला। केकरो-केकरो माथपर पैर रखि कऽ आशीर्वाद दैत छला। एहेन बेकती बहुत सौभाग्‍यशाली मानल जाइ छला।

देवराहा बाबाक सम्‍बन्धमे हमर एकटा निदेशक महोदय सद्य: घटनाक वर्णन करैत कहला जे एकबेर हरिद्वारमे बाबा आएल रहैथ। ओ ओइठाम मेला अधिकारी छला। एकटा हाथी बताह भऽ गेल छल। लोक सभ कोनो तरहेँ ओइ हाथीकेँ नियंत्रित नहि कऽ पाबि रहल छला। बाबाक कान तक ई समाचार गेल। ओ हाथीक हेतु एकटा केरा देलखिन मुदा केकरो ओइ पागल हाथीक लग जेबाक साहस नहि होइ। बाबाक एकटा भक्‍त सिपाही ओ केरा लऽ हाथी दिस बढ़ल। हाथी ओकरा देखते हाथसँ बाबाक देल केरा लऽ कऽ खा लेलक आ एकदम शान्‍त भऽ गेल। एवम्‍ प्रकारेण रंग-रंगक प्रसंग बाबाक बारेमे सुनबामे अबैत छल। जाबे इलाहाबादमे रही, ताबे प्रति बर्ख बाबाक दर्शन माघ मेलामे होइत रहल। ऐ लेल ममफोड़गंजसँ माघ मेला क्षेत्र कएक बेर पएरे जाइत रही, कएक बेर रस्‍तामे एक्का कए ली। एक बेर सोचैत रही जे जा तँ रहल छी, मुदा एतेक दूरसँ फेर पएरे केना आएब। ततबेमे देखै छी जे हमर परिचित एकटा बेकती हमरा दिस बढ़ि रहल छैथ आ आग्रह करए लगला जे आपस हुनके संगे साइकिलपर चलब।

१९ जून सन्‍ १९९० क योगिनी एकादशीक दिन बाबा ब्रम्‍ह्लीन भऽ गेला। एवम्‍ प्रकारेण भारतक एक महान सन्‍तसँ प्रत्‍यक्ष दर्शन सम्‍भव नहि रहल, मुदा हुनकर स्‍मृति हमर इलाहाबाद प्रवाससँ सभ दिनक लेल जुड़ि गेला। बाबाकेँ खेचड़ी विद्या सिद्ध छल जइ कारण हुनका भूख ओ आयुपर नियंत्रण छेलैन।

इलाहाबादमे रहैत प्रभुदत्त ब्रह्मचारीसँ भेँट-घाँटक सौभाग्‍य सेहो भेटल। ओ सन्‍त तँ छलाहे, धार्मिक, अध्‍यात्‍मिक विषयक सैकड़ो पुस्‍तकक लेखक सेहो छला। हुनकर लिखल भगवती कथाक दुनू खण्‍ड देवराहा बाबाक मंच लग प्रसाद स्‍वरुप लोक कीनैत छल। बाबा ओइमे हाथ लगा कऽ सम्‍बन्‍धित बेकतीकेँ दैत कहथिन-

जा कलियाण होइ। एकरा पढ़।

प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम झैसीमे छल। ओइ आश्रम द्वारा संस्‍कृत महाविद्यालय चलैत छल, जइठाम गरीब विद्यार्थी सभकेँ नि:शुल्‍क शिक्षा देल जाइत छल। एकबेर हम अपन अनुजक संगे ओतए गेल रही। प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजी हुनका बारेमे जिज्ञासा केलैन आ हुनका आग्रह केलखिन जे हुनकर संस्‍कृत महाविद्यालयसँ शास्‍त्रीक पढ़ाइ करैथ, मुदा ओ तइले तैयार नहि भेला।

कृष्‍णाष्‍टमीक अवसरपर हम सभ सपरिवार प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजीक आश्रम गेल रही। आश्रममे कृष्‍णाष्‍टमीक पर्व मनौल जा रहल छल। करीब ४ बजे ओ बाहर एला आ हमरा सभकेँ हुनकासँ भेँट भेल। ब्रह्मचारीजी आग्रह केलैन जे हम सभ कृष्‍णजन्‍म देखबाक लेल आश्रमेमे रूकि जाइ, मुदा किछु काल धरि ठहैर हम सभ आपस डेरा आबि गेलौं। एकर अलाबा यदा-कदा हम हुनकर आश्रमपर जाइत रहै छेलौं। ओइ आश्रमक अध्‍यात्‍मिक वातावरणक आनन्‍द लैत रहै छेलौं।

संगममे स्‍नान, माघ मेलाक मास भरिक आयोजन, आ संत महात्‍माक दर्शन इलाहाबाद रहैत स्‍वत: उपलब्‍ध छल जेकर लाभ हमरा यथा-सम्‍भव होइत रहल।

डॉ. जयकान्‍त मिश्रसँ भेँट इलाहाबाद अबिते भेल। ई भेँट-घाँट अनवरत बनल रहल। मैथिल मात्रसँ हुनकर सिनेहक ई प्रमाण छल। कएक बेर हुनका ओइठाम मैथिली भाषाक मूर्धन्‍य विद्वान लोकनिसँ भेँट-घाँट सेहो भऽ जाइत छल। क्रमश: हुनकर समस्‍त परिवारसँ तँ तेतेक सम्‍पर्क भऽ गेल जे लगैत छल जेना हुनकर कोनो निकट सम्‍बन्‍धी होइ, ई सभ विशेषता हुनकर छेलैन। ऐमे हमर योगदान की कहल जा सकैत अछि? मधुर वाणी, उदार हृदय ओ अपनत्‍वसँ सरावोर बेवहार केकरो आकर्षित कए सकैत छल। प्राय: सभ सप्‍ताह खास कऽ छुट्टी दिन हुनका ओइठाम जाइत रहै छेलौं। ओहो कएक बेर हमरा डेरापर सपरिवार अबैत रहै छला।

हुनकर पिता म. म. डॉ. उमेश मिश्रजीक बरखीक भोजमे हम अबस्‍स आमंत्रित रहै छेलौं। भोजो अद्भुत होइत छल। बहुत नेम-टेमसँ हुनकर पत्नी भोजक आयोजन करै छेली।

अस्‍तु, हमर इलाहाबादक स्‍मृतिक डॉ. मिश्रजी एकटा अमिट अंग भऽ गेला तँ कोनो आश्‍चर्य नहि। इलाहाबादक चर्च होइक आ डॉ. मिश्रजीक ज्‍येष्‍ठ पुत्र डॉ. रूद्रकान्‍त मिश्रजीक चर्च नहि करी तँ ई हुनका संगे बड़का अन्‍याय हएत। रूद्रकान्‍तजी सोभावसँ एकदम शान्‍त छला। संस्‍कारसँ तेजस्‍वी, कर्मठ, मेहनती आ भावुक व्‍यक्‍तित्‍व। पितासँ सपरिवार अलग रहै छला। पहिल पत्नीक असमयमे निधन भऽ गेल रहैन। ओइ पक्षमे एकटा कन्‍या रहइ। दोसर विवाहसँ सेहो सखापात रहैन। रसूलाबादमे गंगा स्‍नान करैत, गंगामे गायत्री जप करैत हुनका कएक दिन देखिऐन। संस्‍कृतक विद्वान छला। इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे संस्‍कृतक व्‍याख्‍याता छला। परिवारिक कारणसँ कर्जमे डुमल रहै छला। कहैथ जे हुनकर दरमाहाक अधिकांश भाग सूदे-तरे चल जाइत अछि। अतिरिक्‍त काज कऽ कऽ कमाइ करक हेतु निरनतर चेष्‍टाशील रहै छला। अपन कार्यालयमे परीक्षाक उत्‍तर पुस्‍तक जाँचमे कएक बेर हुनका बजबिऐन। अद्भुत परिश्रम आ एकाग्रतासँ ओ काज करै छला। हुनकर काजमे एकटा गलती नहि पाबि सकैत छी। हमरासँ बहुत पटै छेलैन आ कएटा नितान्‍त व्‍यक्‍तिगत गपसभ हमरासँ करैथ जे लिखब उचित नहि। एकबेर हम सपत्नी हुनकर डेरापर गेल रही। बहुत स्‍वागत भेल। हलुआ से स्‍वादिष्‍ट छल जे आइ धरि जीहमे पानि आबि जाइत अछि। बहुत रास सभ गप-सप्‍प भेल। बच्‍चा सभ संस्‍कारी।

किछु दिनक बाद ओइ हलुआक प्रशंसा डॉ. जयकान्‍त मिश्रजी ओइठाम कएल। तुरन्‍त ओतहुँ हलुआ बनल। कहक माने जे ऐठामक हलुआ सेहो कम नहि...। मुदा हलुआ रूद्रकान्‍तजीक बेसी स्‍वादिष्‍ट छल।

रूद्रकान्‍तजी दिल्‍ली आएल रहैथ। हुनकर पहिल पत्नीसँ कन्‍याक विवाहक आमंत्रण देबाक हेतु। हम ओइ कार्यक्रममे गेल रही। दिल्‍लियेमे विवाह-कार्यक्रम भेल रहइ। हुनकर समस्‍त परिवारसँ भेँट भेल। रूद्रकान्‍तजीसँ बहुत दिन बाद फोनपर गप भेल। डॉ. जयकान्‍त मिश्रजीकेँ साहित्‍य आकदमीसँ २००० इस्‍वीमे भाषा सम्‍मान भेटल रहैन। तइ क्रममे ओ सभ दिल्ली आएल रहैथ। हम भेँट करए गेलौं मुदा कनीक देरी भऽ गेल छल आ पता लागल जे किछुए काल पर्वू ओ सभ इलाहाबादक हेतु प्रस्‍थान कऽ चूकल छैथ। किछु दिनक बाद सुनैमे आएल जे रूद्रकान्‍तजी नहि रहला।

ऑफिस तँ ऑफिस होइत अछि। चाहे ओ प्रयागमे होइक वा दिल्‍लीमे। इलाहाबाद अबैसँ पर्वू सोचने रही जे ओ धार्मिक स्‍थान अछि आ ओइठामक लोक सभ बहुत संस्‍कारी हेता। किछु एहेन लोक भेटबो कलाह। इलाहाबादक धार्मिक प्रसांगिकता अखनो अछिए। तँए किछु हदतक हमर ई सही छल। मुदा कार्यालयक अन्‍दर जे वातावरण छल, (आपसी सिरुफुरौआल कहि सकै छी) से तँ नर्के छल। एकटा निदेशक महोदय (जे आइ.एस. अधिकारी रहैथ) कहला जे कलक्‍टरक रूपमे काज करबामे हुनका ओतेक दिक्कत नहि भेल जेतेक १३ आदमीकँ सम्‍हारैमे ऐ कार्यालयमे भऽ रहल अछि। अधिकारी, कर्मचारी सभ युवक छला। केकरो बेसी अनुभव नहि रहइ। काज से बहुत रहइ। तनावक एकटा प्रमुख कारण सेहो छल। मुदा असल कारण छला एकटा स्‍टाफ जे दुनियाँ भरिक तिकरमवाज छला। जँ केकरो तंग करक हेतु २० किलोमीटर पएरो चलए पड़त तँ ओ तइले तैयारे रहै छला।

एक राति करीब २ बजे हम भभा कऽ हँसि पड़लौं। श्रीमतीजीक नन टुटि गेलैन। निन्न टुटिते पुछली-

की भेलै, अहाँ एना किए हँसि रहल छी?”

असलमे ओइ दिन कार्यालयमे मारि-पीट भऽ गेल रहइ, जेकर स्‍मरणसँ हँसी लागि गेल रहए। कार्यालयक दूटा स्टाफक बीच बाता-बाती होइत-होइत हाथापायी चलए लगल।

हल्‍ला सुनि कार्यालयक सभसँ पैघ अधिकारी, निदेशक महोदय जे आइ.एस. छला, कोनो बहन्ने खसैक गेला। सभ गोटे मुहाँ-मुहीं देखैत रहल आ झंझैट हाथापायीमे बदैल गेल। एकटा सज्‍जनक हाथ टुटि गेल। ओ एफ.आई.आर. करबाक हेतु थाना विदा भेला। हुनकर अपेक्षा रहैन जे हम हुनका संगे थाना गबाहीमे चली, मुदा हमरा से पसिन नहि भेल आ ने हम ओइ झंझैटमे पड़ए चाही, अस्‍तु गाहे-बगाहे मौका ताकि कऽ हम घटना स्‍थलसँ खसैक डेरापर चल एलौं। ऐ बातसँ पीड़ित कर्मचारी बहुत नाराज भेला आ बहुत दिन धरि ऐ बातकेँ मोनमे गाड़ने रहला।

नौकरीक शुरूआती दौड़मे दरमाहा कम छल। ओभर टाइम केलाक बाद किछु पैसा अतिरिक्‍त भेट जाइत छल। असलमे अधिकारीगण एकरा एकटा हथियारक रूपमे इस्‍तेमाल करैत छला। जे पसिन्नक लोक छल ओकरा असानीसँ ओभर टाइम भेट जाइ छल। हमरा सबहक एकटा संगी (जे दड़िभंगेक छला) चलाक-चुस्‍त रहबाक कारणेँ बिना अतिरिक्‍त काज केनौं ओभर टाइम प्राप्‍त कए लैत छला। कार्यालयोक समयमे ओ पढ़ैत रहै छला। प्रतियोगिता परीक्षा सबहक तैयारीमे लागल रहै छला आ अन्‍तत: आइ.ए.एस. परीक्षा पास कऽ ओ बहुत आगाँ बढ़ि गेला। किछु साल पूर्व आयकर आयुक्‍त रहैथ।

ओभर-टाइम कार्यालयमे संवेदनशील मुद्दा छल। एकबेर समस्‍त कर्मचारीक अगुआ बनि हम कार्यालयमे हड़ताल करबा देलिऐ। परीक्षाक समय नजदीक रहइ। उम्‍मीदवार सबहक प्रवेश पत्र जारी हेबक छल मुदा कार्यलयमे काज ठप। मान-मनौअलक बाद हड़ताल समाप्‍त भेल। मुदा हड़तालमे सहयोगी हेबाक कारण बहुत दिन धरि तंग कएल गेल।

एक दिन हम श्रीमतीजीकेँ डाक्‍टरसँ देखबए गल रही। कार्यालय आएबमे बिलम्‍ब भऽ गेल। जखन ओतए पहुँचलौं तँ देखलौं जे पूरा कार्यालयक कर्मचारी बाहर ठाढ़ अछि। निदेशक महोदय सेहो कुर्सी लगा कऽ बाहरेमे बैसल छला। मनमे उठल- माजरा की अछि? माथ ठनकल। तह-तहक बात सोचाए लगल। थोड़ेक आगाँ बढ़लौं तँ कियो कानमे फुसफुसा कऽ कहलैन-

ताला सभ कुंजीक अभावमे बन्‍दे रहि गेल अछि!”

जल्‍दीसँ डेराआपस जा कऽ कुंजीक गुच्‍छा अनलौं। कोठरी सभ खोलल गेल। निदेशक माहेदय अपन कोठरीमे बैसला। तेकर बाद असगरमे बजा कऽ हमरा अपन नाराजगी व्‍यक्‍त केलैन। एहेन संतुलित आ संयत बेकती कम होइत अछि। लगभग तीन साल हुनका संगे काज करबाक अवसर भेल। प्राय: पहिलबेर हुना तमसाइत देखलिऐन जे वाजिवछल। असलमे कुंजीक झाबा बिना हमर जानकारीकेँ हमर बच्‍चाकेँ पकड़ा देने रहइ। हमरा ऐ बातक जानकारी नहि छल। मुदा गड़बड़ी तँ भाइए गेलइ।

कार्यालयक रोकड़क हिसाव तथा पैसाक लेन-देन एकटा कर्मचारी छला जे जँ रातियोकेँ केतौ देखा जाइतैथ तँ भूतक प्रत्‍यक्ष दर्शनक आभास होइत। कारी, भुट्ट, बीड़ी पीबैत आ टंकक पर टिपिर-टिपिर करैत। अपन काजमे मेहनती आ माहिर रहबाक कारण अधिकारी सभ ओकरा मानैत। तेकर दुरुपयोग ओ लोककेँ तंग करबामे करैत छल। कोनो बिल दियौ, ओ ताकि कऽ लगती निकालि दैत, दाबापर कैंची चला दैत, ऐसँ टोकर परपीड़क सोभावकेँ आनन्‍द होइत रहइ। लोक सभ ओकरासँ तंग तँ रहए मुदा कएल किछु नहि।

जखन प्रशासनक अधिकारी हम भेलौं तँ पहिने मौका भेटते ओकरापर आक्रमण कऽ देल। भेलै ई जे ओकर कोनो काजमे सुधारक परामर्श देलिऐक तँ ओकरा बड्ड खराप लगलै। चिकरए, भेकरए लागल जे ओकरा ऐ काजसँ हटा देल जाए, हम ने यएह देखलौं ने वएह, तुरन्‍त आदेश निकालि ओकरा जगह दोसर कर्मचारीकेँ खजॉंची बना देलिऐक। आक तँ ओ साँप जकाँ छटपटाए लगल, डिरियाइत घुमैत रहल। केतए-केतए-सँ सिफारिस लगेलक, मुदा हम अरि गेलिऐक। ओकरा हटए पड़लै आ कार्यालयक काज सेहो चलिते रहल।

डॉ. जयकान्‍त मिश्रजी अंग्रेजीक प्राध्‍यापक छला। इलाहाबाद विश्वविद्यालयमे विभागाध्‍यक्ष पदक हेतु हुनका मोकदमाबाजीक सामना करए पड़ल। हुनके विभागक कियो प्राध्‍यापक इलाहाबद विश्वविद्यालयमे मोकदमा कऽ विभागाध्‍यक्षक पदक हेतु हठ केने छल, मुदा ओ हारि गेल। अंग्रेजीक व्‍याख्‍यता रहितौं मैथिली आ मिथिलाक प्रति हुनकर अनुराग जगजाहिर अछि। हुनका ओइठामसँ मैथिलीमे ५-७ पृष्‍ठक एकटा पत्रिका निकलैत छल। हुनकर समस्‍त परिवार ओइ पत्रिकाक तैयारीमे लागल रहैत छल। ओकरा सैंकड़ो लोककेँ पठौल जाइत छल। एकाध बेर हमहूँ ओइ काजमे लागल रही।

प्रतिवर्ष विद्यापति पर्व समारोह इलाहाबादमे मनौल जाइत छल। जइमे जयकान्‍त बाबू बढ़ि-चढ़ि कऽ भाग लैत छला। मुदा ओइमे गुटबन्‍दी भऽ जाइत छल। एकबेर तँ हालत तेतेक खराप भेल जे मारि-पीट तक भऽ गेल आ एक गोरेक कुर्ता सेहो फाटि गेलैन।

कार्यालयक गुटबन्दी पराकाष्‍ठापर छल। छोटसन कार्यालयमे मानवीय सम्‍बन्‍ध एतेक जटिल छल जेकर वर्णन नहि। निदेशक सभ आइ.ए.एस. अधिकारी होइत छला, मुदा मानवीय सम्‍बन्‍धक ओझरी सरकारी आदेशसँ नहि सोझरा सकैत छल। मोटा-मोटी दू भागमे कार्यालयक लोक सभ बँटि गेल रहैथ। कियो नव स्‍टाफ आबए तँ दुनू गुट ओकरा पटबैमे लागि जाइत। अहीक्रममे हमर कौलेजक सहपाठी स्‍मरण भऽ जाइत अछि। सी.एम. कौलेज दड़िभंगासँ ओहो पढ़ल छला। दड़िभंगामे घर रहैन। नौकरी भेलाक बाद कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबादमे पदस्‍थापित भेला। मुदा मोटा-मोटी  ओ दोसर गुटमे चलि गेला। बादमे ओ आइ.ए.एस परीक्षाक माध्‍यमसँ आयकर विभागमे पदनियुक्‍त भेला आ तेकर बाद कहियो भेँट नहि भेला। कार्यालयक एहेन उठा-पटकक बीच ९ वर्षक समय केना कटल से आश्चर्य...।  

इलाहाबाद स्‍थित कर्मचारी चयन आयोगक कार्यालयक मुखिया निदेशक आइ.ए.एस. अधिकारी होइत छला। १९८७ इस्‍वीमे हमरा चलि एलाक बाद ओइमे आन-आन सेवाक अधिकारी सभ सेहो नियुक्‍त भेला। ओइ पदपर वएह बेती अबैत छला जिनकर इलाहाबादमे घर वा परिवार रहए। हम ९ साल ओइ कार्यालयमे रहलौं जाइ अन्‍तरालमे चारिटा निदेशक संगे कार्य करबाक अवसर भेटल। ओइ चारूमे एकटा प्रोन्नत द्वारा आइ.ए.एस. बनल छला। ओइसँ पूर्व ओ प्रान्‍तीय सीनीक सेवा (पी.सी.एस.)मे रहैथ। हुनकर पिता उच्‍च न्‍यायालयक सेवा निवृत्त जज रहथिन। पिताक एक मात्र सन्‍तान छला। बहुत स्‍टाइलमे रहैथ। ओइ समयमे मूलत: फिएट वा एम्‍बेसडर कारक चलैन छलैक। हुनका लगमे फिएट कार छलैन, जइसँ ड्राइभर हुनका कार्यालय आनए आ लऽ जाए। दुपहरियाक भोजन सेहो घरे जा कऽ करैथ। कार्यालयमे जखन ओ पदस्‍थापित भेल रहैथ तँ कएक दिन धरि थूकदानीक लेल हंगामा भेल रहए। थुकदानी कोन नियमक अधीन कीनल जाए। हारि कऽ ओ अपन घरेसँ थुकदानी लऽ अनलाह। हुनका पान खेबाक आदैत रहैन, तँए पिकदानी राखब अनिवार्य छल।

कार्यालयमे ओ कोनो रूचि नहि राखैथ। सभ अधीनस्‍थ अधिकारीपर छोड़ि देने रहैथ। एमहरसँ प्रस्‍ताव आएल तँ ओइपर दसखत आ ओमहरसँ आएल तँ ओइपर दसखत।

कएक बेर तँ एहेन होइ जे एक्के विषयपर विपरीत आदेशपर ओ दसखत कऽ दैत छला। कहियो काल हुनकर घर जेबाक अवसर प्राप्‍त होइत छल। रसूलबाद स्‍थित गंगाक घाटसँ लगे काफी ऐल-फइल ओ सुन्‍दर हुनकर घर छल। बादमे पता लागल जे सेवा निवृत्तिक बाद ओ अपन घर बेचि लेला आ राजस्‍थानमे अपन पैतृक स्‍थानपर रहए लगला।

कार्यालयमे हुनका निष्‍पृह रहबाक कारणे कार्यालयक महौल खरापे होइत गेल। मानवीय सम्‍बन्‍धमे कटुता बढ़ैत रहल आ किछु गोटे दिन-राति एक दोसरक टाँग खिचौवलमे लागल रहला।

सन्‍ १९८५ इस्‍वीमे कर्मचारी चयन आयोग, इलाहाबादक समक्ष प्रस्‍ताव छल जे बिहारमे दूटा नव परीक्षा केन्‍द्र स्‍थापित कएल जाए। ओहीमे एकटा केन्‍द्र दड़िभंगा वा मुजफ्फरपुरमे ओ दोसर दुमका वा भागलपुरमे। हमरासँ तत्‍कालिन निदेशक महोदय ऐ विषयपर परामर्श मंगलैन। हमर आग्रहक अनुसार दड़िभंगा आ दुमकामे परीक्षा केन्‍द्रक स्‍थापना भेल। दड़िभंगामे परीक्षा आयोजनक बेवस्‍था हेतु पर्यवेक्षकक रूपमे हम दड़िभंगा गेलो रही। दड़िभंगामे ५-६ टा परीक्षा केन्‍द्र छल जइमे हजारोसँ बेसी परीक्षार्थी भाग लेला। किछु केन्‍द्रपर परीक्षा बेवस्‍था स्‍तरीय नहि छल तथापि जेना-तेना काज ससरल। दड़िभंगामे परीक्षा केन्‍द्रक स्‍थापनासँ सैकड़ो स्‍थानीय विद्यार्थी सभकेँ कर्मचारी चयन आयोगक माध्‍यमसँ नौकरी भेटल, अन्‍यथा हुनका पहिने अही परीक्षा हेतु पटना जाए पड़ैत छल। दुमका केन्‍द्रमे अपेक्षाकृत कम उम्‍मीदवार रहैत छल, तँए बादमे ओ परीक्षा केन्‍द्र नहि रहल। दुमकाक जगह भागलपुरमे परीक्षा केन्‍द्र बनल जे सफल रहल।

सन्‍ १९८३क आसपास ओइ कार्यालयमे किछु नव लोक सबहक पदस्‍थापना भेल जइमे प्रमुख छला- श्री संजीव सिन्‍हा, एम.ए; एल.एल.बी.। ओ इलाहाबादक एकटा संयुक्‍त परिवारसँ अबैत छला। हुनक समस्‍त परिवार अति शिक्षित एवम्‍ वरिष्‍ठ अधिकारी सभ छला। हुनकर एकटा बहिनोइ भारत सरकारमे सचिव पदसँ सेवा निवृत्त भेला। हुनकार बेवहार ओ विचारसँ ओइ कार्यालयक वातावरणमे तँ जे सुधार भेल से भेल, मुदा हमरा तँ जबरदस्‍त समर्थन भेटल। हुनकासँ मित्रता अखन धरि ओहिना चलि रहल अछि। बीचमे ओ दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरित भऽ कऽ एला, फेर आपस इलाहाबाद गेला, हम दिल्‍ली चल एलौं, मुदा हमरा लोकनिक पारस्‍परिक सम्‍बन्‍ध ओहिना मधुर बनल अछि। हुनकर समस्‍त परिवारसँ हमरा क्रमश: सम्‍पर्क भऽ गेल जे अद्यावधि बनल अछि। कार्यालयक ओहन विकट वातावरणमे एहेन नीक लोक भेटला से ईश्वरक चमत्‍कारे कहक चाही। हमरा जीवनमे किछु गोटे एहेन भेटला जे बिना कोनो स्‍वार्थे निरन्‍तर मदैत करैत रहला। हमरा प्रति सद्भावना रहलैन आ संकटक समयमे सहोदर जकाँ ठाढ़ रहला। निश्चय कोनो जन्‍मक हमर पूण्‍यक ई फल रहल होएत।

दड़िभंगामे नौकरी करैत काल पिण्‍डारूछक डॉ. विनय कुमार चौधरीजी ओ दिल्‍लीमे काज करैत काल हमरे नामधारी मिश्रजी (मूलत: दड़िभंगाक लगक रहनिहार) हमर जीवनमे प्रात:स्‍मरणीय छैथ।

के कहैत अछि जे कार्यालयमे दोस्‍ती नहि होइ छइ? किंवा ओइठामक सम्‍बन्‍ध चलता होइत अछि। काजसँ काज मतलब राखए-बला परिवेशमे बेसी अपेक्षा सम्‍भवो नहि अछि आ ने राखक चाही। परन्‍तु उपरोक्‍त बेकती सभ विभिन्न समयमे कार्यालयमे हमरा भेटला आ जीवन भरिक हेतु घनिष्ट मित्र बनल रहला।

इलाहाबाद कार्यालयक महौल खराप करैमे एक बेकतीक बहुत योगदान छल। आब ओ ऐ दुनियाँमे नहि छैथ मुदा जखन कखनो हुनकर चर्चा होइत अछि तँ ओ बात सभ मोन पड़िते अछि।

गामक परिवेशसँ हम एकबेर दिल्‍ली तेकर बाद इलाहाबाद आबि गेल रही। नौकरी केना कएल जाइत अछि, तेकर बेवहारिक अनुभव नहि छल आ ने ओइ वातावरणमे कहियो रहलौं। दिन राति मेहनत करी, साए प्रतिशत इमानारीसँ काज करी, केकरो अहित नहि करी, तथापि अधिकारी लोकनि खूब प्रसन्न नहि रहैथ, कारण कोनो बात भेल आ आ ठाँइ-पठाँइ लड़ि जाइ, मुहेँपर सही बात बाजि दिऐ, कएक बेर सही विषयपर आक्रमणक सेहो भऽ जाइ, ऐ सभ कारणसँ अधिकारी लोकनिकेँ अहंपर चोट पड़ैत छेलैन आ सभ मौका पाबि कऽ तंग करैथ। कएक बेर बाजिव हक देबामे बाधा ठाढ़ कए दैथ आ किछु नहि तँ व्‍यंगे कऽ दैथ। कहलक माने जे काजसँ अधिकारीक अहंक रक्षा सरकारी कार्यालयमे अधिक महत्‍वपूर्ण होइत अछि, से बात जाबे बुझलिऐक, ताबे बहुत देरी भऽ गेल छल।

कार्यालयक काज हेतु माटाडोर गाड़ी छल। ओकर ड्राइभर सज्‍जन बेकती छला। प्रशासनक काज हमरा जिम्‍मा छल, तँए गाड़ी ओ ड्राइभर हमर नियंत्रणमे रहैत छल। निदेशक महोदयक लेल अलगसँ गाड़ी नहि छल। आइ.ए.एस. अधिकारी होइतो ओ स्‍कूटरसँ कार्यालय अबैत छला। एकदिन एकाएक गाड़ी हुनकर घरपर पार्क भेल आ ओ गाड़ीक उपयोग अपना अधीन कऽ लेला। हमरा एकर जानकारी नहि छल भोरे किछु काजसँ केतौ जेबक हेतु गाड़ी तकलौं तँ पता लागल जे गाड़ी नहि अछि। हमरा बहुत तामस भेल। ड्राइभरकेँ डाँट-फटकार कऽ दिलिऐ। ओ नून-तेल लगा कऽ निदेशक महोदयकेँ चुगली कए देलक। सुनबामे आएल जे हुनका घर जा कऽ रंग-बिरंगक उपराग देलक। परिणाम भेल जे निदेशकजी बहुत क्रुद्ध भऽ गेला। ओहुना ओ हमरासँ अप्रसन्ने रहै छला।

ऐ घटनाक बाद हमर हुनकर सम्‍बन्‍ध कहियो पटरीपर नहि आएल। आब सोचैत छी तँ हँसी लगैत अछि- अपनोपर, हुनकोपर।

कार्यालयमे जे छल से छल, मुदा ओइसँ हटि कऽ हमर एकटा स्‍वस्‍थ, सुयोग्‍य लोकक समाज बनि गेल छल जइसँ तमाम कष्‍ट अभाव आ संघर्षक बीच हमरा मोन लगैत छल।

डॉ. शुभद्र झाजी गाहे-बगाहे इलाहाबाद अपन माझिल पुत्र (भास्‍करजी)क ओइठाम अबैत रहै छला। हुनकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसरमे डेरा छल। एकबेर करीब ११ बजे दिनमे हम शुभद्र बाबूसँ भेँट करए भास्‍करजीक डेरापर गेलौं तँ डाक्‍टर साहैब कहला जे ओ लगातार ९ घटनासँ अध्‍ययन कए रहल छैथ। मैथिलीक शब्‍दकोषसँ सम्‍बन्‍धित किछु काजमे लागल छला।

एकबेर शुभद्र बाबूकेँ हम नोत देने रहिऐन। डेरासँ ओ असगरे विदा भेला। भास्‍करजी पाछाँ विदा भेला आ हमर नायकटरा स्‍थित डेरापर पहिने पहुँच गेला। शुभद्र बाबूक कोनो पता नहि छल।

भास्‍करजी परेशान रहैथ। हुनका ताकए हेतु एमहर, ओमहर वौआइत छला कि शुभद्रबाबूकेँ निच्‍चाँमे हमर नाम लऽ कऽ चिचियाइत सुनलौं। घर पहुँच कऽ कहए लगला जे गलतीसँ ओ बगलमे कनी हटि कऽ धोबी घाटपर चलि गेल छला। असलमे ओ मकान धोगीक छल, से गप हम हुनका कहने रहिऐन। कनी कालक बाद भाष्‍करजी सेहो आपस एला आ तखन भोज-भात भेल। हमर डेरा देख कऽ शुभद्र बाबू कहैथ जे केराक घौरमे जेना बातमे सँ पता निकलैत अछि, तहिना तोरा डेरामे कोठरीसँ कोठरी निकलैत अछि। गपक क्रममे कहलैथ जे सेवा निवृत्तक बाद रहक हेतु पाण्‍डिचेरीमे घर बनाबह। हुनका पाण्‍डिचेरी बहुत पसिन छेलैन। एवम्‍ प्रकारेण जखन-कखनो आ इलाहाबाद अबैत छला तँ हमर-हुनकर भेँट-घाँट होइत रहैत छल, जे निश्‍चय आनन्‍ददायी छल।

“Life is an endless struggle.

Ef you stop struggling,

You are tirished.”

उपरोक्‍त कथन एकदम सत्‍य अछि। जीवन संघर्षक अन्‍तहीन यात्राक प्रत्‍येक डेग आगाँक यात्राक पथ प्रदर्शक बनि जाइत अछि। एहेन कमे लोक छैथ जे बनल-बनाएल सभ किछु प्राप्‍त कए लैत छैथ। मुदा हुनका ओ आनन्‍द कदापि नहि भऽ सकै छैन जे कठोर संघर्षक बाद प्राप्‍त छोटो-मोटो उपलब्‍धिसँ होइत अछि। इमानदारीसँ परिश्रमक कऽ जीवन-यापन करब तलवारक धारपर चलब थिक। लेकिन यदि आदमीमे साहस होइ, दृढ़ निश्‍चय होइ, ईश्वरमे आस्‍था होइ तँ संघर्ष रंग लबैत अछि। कहबी छै जे “Say not the struggle availith not.” नहि कहू जे संघर्ष रंग नहि अनैत अछि, अबस्‍स अनैत अछि, देर-सबेर भऽ सकैत अछि। ताइ लेल धैर्य चाही।

इलाहाबाद विश्वविद्यालयक प्रख्‍यात उपकुलपति स्‍व. ए.वी. लाल कहियो काल साक्षात्‍कार लेबए-ले कर्मचारी चयन आयोग अबैत छला। ओही क्रममे कएक बेर हम हुनका ओइठाम जाइत छेलौं। हुनकर घर गेलापर अद्भुत शानतिक आभास होइत छल। हुनका धिया-पुता नहि छेलैन। पत्नी आ ओ अपने अद्भुत शान्‍तिसँ रहैत छला। सोभावक सरलताक कोनो वर्णनन नहि। एकबेर भोपाल साक्षात्‍कारक क्रममे हम सभ संगे अतिथि गृहमे रहल रही। भोपाल संगे घूमल रही।

दिल्‍ली एला पछाइत केतेको दिनक बाद पता लागल जे हुनकर पत्नीकेँ हुनके नौकर हत्‍या कऽ देलक। भेलै ई जे ओ अपने केतौ बाहर रहैथ।घरमे पत्नी असगरे रहथिन। आल्‍मीरासँ किछु पाइ निकालि कऽ नौकरकेँ तरकारी आनक हेतु देलखिन। ओइ आल्‍मीरामे रूपैआक गड्डी ओकरा देखा गेलइ। ओ लालचमे पड़ि कऽ कोनो भारी चीजसँ हुनकर माथपर चोट केलक जइसँ एकाएक हुनकर मृत्‍यु भऽ गेल। नौकरबा सभटा रूपैआ-पैसा लऽ कऽ फरार।

ओइ नोकरक पिताकेँ आ ओकरो स्‍व. ए.बी.लालजी इलाहाबाद विश्वविद्यालमे नौकरी धरौने रहैथ। बहुत दिनसँ ओ सभ हिनका परिवारसँ जुड़ल छल। मुदा लोभमे आबि गेल। सभ बफादारी मिनटोमे बिला गेलइ। मुदा फबलै नहि। पकड़ा गेल। आजन्‍म काराबास भेलइ। मुदा एक निर्दोष आदमी मारल गेल। वृद्धावस्‍थामे ए.बी.लालजीकेँ घोर कष्‍ट लिखल रहैन। ऐ भाई जरा देख के...। आदमी से जानबर ज्‍यादा वफादार है..। जइ बेकतीक पूरा परिवारकेँ ओ संरक्षण देने छला, आजिविकाक प्रबन्‍ध केने छला आ संगे रखैत छला वएह विश्वासघात कऽ गेल। भावी प्रवल।

ईजीवन बड़ विचित्र अछि। स्‍मृतिक आँगनमे जेतइ ठाढ़ होइ छी, धँसि जाइतअछि। रंग-बिरंगक घटनाक्रम सभ माथाकेँ गछारि लैत अछि। की लिखू, केतबा लिखू आकि चुप्‍पे रहि जाँउ। रंग-रंगक घटना क्रम सभ होइत रहल। नीको लोक सभ कालचक्रमे पिसाइत रहल। एकक टा मुर्ख, गमार, बैमान, उचक्काकेँ फलैत-फुलैत देखलिऐ।

किछु नहि बुझाइ छै जे आखिर की-सँ-की भऽ जाइत अछि। निश्‍चय जीवन दू दूना चारि नहि अछि। भऽ सकैए कएक जनम्‍क हिसाब-किताब होइत होइक। सत्‍य की अछि, से तँ भगवाने जानैथ।

ओइ समयमे इलाहाबादक चर्चित व्‍यक्‍तित्‍वमेसँ एकटा छला, राम सहाय,आइ.ए.एस.। ओ फौजी छला। फौजसँ सेवा निवृत्तिक पछाइत आइ.ए.एस.मे आएल रहैथ। इलाहाबाद विश्वविद्यालयक उपकुलपति बनौल गेल रहैथ। आर केतेको महत्‍वपूर्ण पद सभपर ओ रहला मुदा हुनकामे अहं नामक चीज नहि छल। हुनकासँ गप-सप्‍प केलासँ अद्भुत उत्‍साह होइत छल। एकबेर कोनो काजे हुनका ओइठाम गेल रही। हुनकर पत्नी नौकर-चाकरक अछैत स्‍वयं चाह बनौलैथ, अपने हाथे चाह परसलैथ आ गप-सप्‍पक दौरान तेना कऽ मिलि गेली जे लगैत रहए केतेको बर्खक पुरान जान-पहचान अछि। निरन्‍तर प्रसन्न रहैत छला। कखनो तनाव नहि। हम ऐ प्रसन्नताक रहस्‍यक बारेमे पुछलिऐन तँ ओ कहलैन-

एकर दूटा कारण अछि- पहिल तँ हमर पत्नी छैथ जे निरन्‍तर हमरा संग दैत रहली आ दोसर हमर अहंकार रहित बेवहार। हम एकसँ एक पदपर रहलौं मुदा सामनेबला बेकतीसँ बिलकुल बराबरीक बेवहार कएल। पदाक अहंकार हमरापर कहियो हाबी नहि भेल। जखन जे समस्‍या आएल, ओकर तुरन्‍त ओ सरलताम समाधान करब हमर सोभाव अछि। ऐसँ हमर माथ निरन्‍तर चिन्‍तामुक्‍त रहैत अछि।

एक दिन हुनका पैंट-सर्ट पहिरने कटरा स्‍थित लक्ष्‍मी सीनेमा लग साइकिल चलबैत देखलिऐन। सीभील लाइन्‍ससँ कटरा साइकिलेसँ आबि गेल रहैथ। ई चुश्‍ती-फुर्तीओइ उमेरमे केतए भेटत? एहेन-एहेन लोक पृथ्‍वीपर ईश्वरक बरदान थिक। निश्‍चय किछु एहेन नीक लोक सभ छैथ जिनका भरोसे पृथ्‍वी माता सभ अन्‍याय सहि जाइ छैथ आ जीवन चक्र चलैत रहैत अछि।

इलाहाबाद विश्वविद्यालयक सहायक उपकुलपति टी.पतिजी गणितक विद्वान छला। सीधा, साधा पएरे चलैबला बेकती छला। कएक बेर साक्षात्‍कारक क्रममे ओ कर्मचारी चयन आयोग अबैत छला। साक्षात्‍कारक बाद पएरे आपस भऽ जाइत छला। लगेमे मिठाइक एकटा दोकान खुजल छल। पूरा आग्रह कऽ कऽ ओ मिठाइक दोकानपर लऽ जाइथ। हुनका लगमे एकटा सूची रहै छल जइमे इलाहाबादक कोन मिठाइक दोकानमे कोन मधुर बढ़ियाँ भेटैए तेकर जानकारी छल। दोकानपर ओइ सूचीकेँ देख ओ मिठाइक आदेश करैथ। बादमे ओ इलाहाबाद विश्वविद्यालयक उपकुलपति सेहो भेला।

असलमे इलाहाबाद विद्या, कला, संस्‍कृति आ अध्‍यात्‍म हेतु युग-युगसँ ख्‍यात रहल अछि। निराला, महादेवी वर्मा, पंत इत्‍यादि एक-सँ-एक विद्वान ओइठाम भेला। एहेन ऐतिहासिक स्‍थापर रहि कऽ हमरा निश्‍चय बहुत आनन्‍द होइत छल। कार्यालयक उठा-पटकमे ओतहि छोड़ि ओइसँ हटि कऽ एकटा सुन्‍दर समाज हमरा उपलब्‍ध भऽ गेल छल।

आपति काल परेखिय चारी,

धरिज धर्म मित्र ओ नारी।

तुलसी बाबाक उपरोक्‍त कचनी एकदाम सटीक अछि। धैर्य अछि, अनवरत संघर्ष करबाक चेष्‍टा अछि, तँ कोनो प्रश्‍न नहि अछि जे अहाँ गन्‍तव्‍य तक नहि पहुँचब। अबस्‍से पहुँचब। आ सत्‍य पुछी तँ सही रास्‍तापर चलबाक संकल्‍प अपने आपमे विजयक आभास कऽ दैत अछि आ तइले तँ भगवान दैते छथिन।

एकबेर हमर ससुर इलाहाबद आएल रहैथ। हुनका संगे हुनकर अनुज रहथिन। हमर श्रीमतीजीकेँ आपसी यात्रामे नैहर जेबाक रहैन। टीशन जेबाक हेतु हम रिक्‍सा आनए गेलौं। कनिक्के दूर आगू गेल हएब कि कुकुर काटि लेलक। तथापि रिक्‍सा अनलौं आहुनका लोकनिकेँ विदा कऽ देलिऐन। हुनका सभकेँ पता नहि चललैन जे हमरा कुकुर काटि लेलक अछि, अन्‍यथा नहि जइतैथ। आब हम असगर भऽ गेल रही। ओइ समयमे कुकुर कटला बाद अंतरीमे १४टा नमका सूइ लगैत छेलइ। एकबेर पहिनौं सुपौलमे १९७५ ई.मे हमरा कुकुर कटने छल। १४ टा सूइ ओइ बेर पड़ल छल। मुदा ओइ सूइक कोनो विकल्‍प नहि छल। कोताही केलापर रैबीज हेबाक डर छल। गाममे एक बेकतीकेँ रैबीजसँ मरैत देखने रही। से सोचि चिन्‍तामे पड़ि जाइ छेलौं।

हमर डेरासँ १० किलोमीटर दूर नगरपालिका अस्‍पतालमे रैबीजक सूइ लगैत छल। एक दिनक बाद सूइ लगबक हेतु जाए पड़ैत छल। ओइमे कार्यालयक एकटा स्‍टाफ हमरा बहुत मदैत केला। ओ अपन साइकिलसँ हमरा लऽ जाथि, सूइ लगबा दैथ आ आपस डेरा तक पहुँचा दैथ। पेटमे सौंसे गुल्ठी भऽ गेल छल। मकान मालकिन बोतलमे पानि गरमा कऽ दैत छेली जइसँ पेटकेँ सेकल करी।

क्रमश: उहो समय बीति गेल। पता नहि, कुकुरकेँ हमरासँ कोन जन्‍मक वैर छइ। तेसर बेर फेर दिल्‍लीमे आरकेपुरम डेराक लगमे कार्यालयसँ आपस अबैत काल नान्‍हिटा कुकुर अद्भुत तेजीसँ हमरा दिस आएल आ झपट्टा मारलक। कुकुर तेसर बेर काटि लेने छल। सभ काज छोड़ि कऽ चोट्टे सी.जी.एच.एस. जा कऽ सूइया लेलौं। ताबत सूइक आकार बदैल गेल छल। छोटा सूइ मात्र ६ टा लेबाक छल। लगेमे सी.जी.एच.एस. छल, तँए बहुत फेतरत नहि भेल। डाक्‍टरक कहब छेलै जे जेतेक बेर कुकुर। बानल काटत तेतेक बेर फेरसँ सूइ लेब अनिवार्य अछि। आब तँ कुकुरकेँ देखते साकंछ भऽ जाइ छी। जइसँ चारिम बेर सूइया नहि लेबए पड़ए।

हम इलाहाबादमे ९ साल रहलौं। चारि साल गुरुजीक मकानमे किरायेदार छेलौं। १७ नयाममफोड़गंज, इलाहाबाद। तीन साल तँ निचैन भऽ कऽ रहलौं मुदा तेकर बाद तंग करए लागल जे मकान खाली करू। यद्यपि हम अपना भरि किराया समयपर देबक हेतु बहुत साकांक्ष रही। कोनो तरहेँ तंग नहि करिऐक मुदा ओकरा मोनमे मकानक चिन्‍ता होइत रहइ। डर होइ जे मकान चलि जाएत। केतबो बुझबिऐक मुदा ओकर मोन नहि बुझि पबइ। हमरा ओइ मकानमे बहुत नीक लगैत छल। मुदा नित्‍य प्रतिक झंझटसँ मोन तंग भऽ गेल आ कनी दूर हटि कऽ एकटा छोटसन मकान किरायापर लेलौं। ओकर किराया अपेक्षाकृत कम छल। कोठरीक आगाँ बड़ीटा छत छल जइमे कुर्सी धऽ कऽ बैसार होइत छल।

मकान मालिकक सेवा निवृत्त पुरातत्‍व विभागक अधिकारी छला। बहुत सौम्‍य आ सहृदय बेकती। हमरा सबहक बहुत धियान राखैथ। ऐ डेरामे आबि कऽ बुत शान्‍ति भेल। किराया कम रहलासँ उसास सेहो भेल। लगभग २साल हम ओइ डेरामे रहलौं।

हमर सबहक डेराक ठीक सामने ऊपरमे एकटा सज्‍जन सपरिवार रहैत छला। हुनकर छोटसन बच्‍चा स्‍कूलमे पढ़ैत छल। स्‍कूलक सवक पूरा करबाक क्रममे ओ अपन बच्‍चक जे दुर्गति करैत छला जे बिसरल नहि जा सकैए। प्रति दिन पढ़ाइक अन्‍त बच्‍चा मारि-पीटसँ होइ छल।

पता नहि, ओइ बच्‍चाक की भविस भेल। अपन जीवनक महात्‍वाकांक्षा ओ भूतकालक असफलताक चोट निर्दोष बच्‍चापर बजारि कऽ अपने बच्‍चाक भविस नष्‍ट केनिहार ओ असगरे नहि छैथ।

माता-पिताक ई बुझक चाही जे ऐ तरहक बेवहारसँ बच्‍चाक दिमाग कुंठित भऽ जाइत अछि, असफलताक भाव ओकरा घेरि लैत अछि आ एकटा व्‍यक्‍तित्‍व निर्माणसँ पहिनहि नष्‍ट भऽ जाइत अछि। एहने बच्‍चा सभ पैघ भऽ कुण्‍ठाग्रस्‍त भऽ आन-आनसँ बदला लैत रहैत अछि। एहने एकटा उदाहरण हमरा दिल्‍लीमे भेटल। हम गृहमंत्रालयमे अधिकारी छेलौं। हमर निदेशक महोदय प्रोन्‍नत आइ.ए.एस. अधिकारी छला। बेवहारमे बहुत कर्कस, बात-बातमे गारि देब हुनक सोभाव छल। बुझेबे ने करए जे ऐ बेकतीक संग केना समय कटत। क्रमश: हुनकर व्‍यक्‍तित्‍व बुझैमे आएल, आपसी सम्‍पर्क बढ़ल तँ एकदिन कहला जे हुनकर एहेन सदा बेवहार ओ अशुद्ध भाषाक हेतु हुनकर पिता जिमेदार छैथ। हुनकर पिता पाकिस्‍तानसँ भारत आएल रहथिन। हिन्‍दू कालैज दिल्‍लीसँ पढ़ल रहथिन आ मंत्रालयमे अधिकारी रहथिन। बचपनमे हुनका संगे बहुत सख्‍ती ओगारि-मारि करथिन जइ कारणेँ हुनकर सोभाव एहेन भऽ गेल जे सबहक हेतु कष्‍टकारी छल। धिया-पुताक संगे कएल गेल बेवहार ओकर व्‍यक्‍तित्‍वक अंग भऽ जाइत अछि। हमर ऐ डेराक सामने भूतलपर गैरेजमे एकटा चतुर्थ वर्गीय कर्मचारीक परिवार रहैत छल। नित्‍यप्रति साइकिलसँ ओ कार्यालय जाइत छल। कार्यालय जाइत काल पूरा परिवार ओकरा विदा करैत छल। परिवारमे बुढ़ माए, पत्नी आ कएटा बच्‍चा सभ छल। ओतेक छोट जगहमे सभ गोटे अद्भुत आनन्‍दसँ रहै छल। साँझमे कार्यालयसँ ओकर आपसीपर परिवारमे अद्भुत आनन्‍द पसैर जाइत छल। जोर-जोरसँ ठहाकासँ आस-पासक वातावरणमे आनन्‍द पसैर जाइत अछि।

इलाहाबादक हमर दोसर डेरा अपेक्षाकृत छोट छल। एक्केटा कोठरी संगे स्‍नान, पैखाना गृह ओ कनीटा भनसा घर। मुदा आगूमे छत बड़ीटा छल। राति-बिराति छतपर जुड़ल पाइप लग लघी कए लैत छेलौं। एक राति अहिना करैत रही कि संयोगसँ निच्‍चाँक फ्लैट बालकनीमे सूतल एकटा बृद्धक मुँह खूजल रहैन आ हुनका नोनछराइन लगलैन। धड़फड़ा कऽ उठि गेला जे की भेल। भोर भेने ओइ बुढ़क जमाए (जे इन्‍जीनियर छला) तमसाएल एलाह। लाख बुझबिऐन जे मेघसँ पानिक बुन्नी खसि पड़ल हेतै, मुदा ओ मानैले तैयार नहि भेला। अन्‍तवोगत्‍वा हम अपन गलती मानि झगड़ा समाप्‍त कएल। कहि नहि सकै छी जे केतेक भारी संकटसँ जान बँचि गेल।

थोरेक दिनक बाद हमरा सभकेँ कार्यालयसँ सटले नयाकटरा मोहल्‍लामे एकटा धोबीक मकान किरायापर भेल। ओइमे भनसा घर छोड़ि कऽ तीनटा कोठरी छल, छत छल आ किराया सेहो ठीके-ठाक छल। कर्यालयसँ पाँच मिनटमे घर आबि जाइ छेलौं।

सटले वगलमे श्रीवास्‍तवजी रहै छला। ओ सभ अतिशय नीक लोक छला। कहियो काल टीवी देखबाक इच्‍छा भेलापर हम सभ ओइठाम चल जाइत रही। चित्रहार सप्‍ताहमे दू दिन होइत छल। टीभी देखू आ चाहो पीबू। पहिल बेर चन्‍द्रमापर गेल भारतीयसँ इन्‍दिरा गाँधीजीक वार्तालापक सद्य प्रसारण हम ओत्तै देखने रही। क्रमश: टीभीक चलन बड़ी तेजीसँ बढ़ि रहल छल। घरे-घरे टीभीक एन्‍टिना टँगाइत छल। सभ दोकानपर टीभी बिकाय लागल छल। हमर ज्‍येष्‍ठ पुत्र भास्‍कर छतपर लऽ जाथि आ सभ घरपर लागल एन्‍टिना देखबए लगैत। हमहूँ दोकान सभपर टीभीक मूल्‍यक सर्वे करैत रहलौं। कारी, उज्‍जर (स्‍वेत-श्‍याम) टीभीक जमाना छेलइ। ओकरा रंगीन टीभीमे परिवर्तित होमए-मे बहुत समय लागि गेल।

नयाकटरा स्‍थित हमर डेराक मकान मालिक धोबी छला। बड़ीटा परिवारमे कियो पढ़ल-लिखल नहि छल। सबहक मुखिया बुढ़िया माए छेलइ। एकबेर हम किरायाक रसीदक मांग कएल, जइसँ इनकमटैक्‍समे छूट भेटैत। कनियेँ-कालमे जोरसँ हल्‍ला भेल!

पुछलिऐन जे की भेलइ? भेल ई रहै जे किरायाक रसीदक मांगसँ ओ सभ भयभीत भऽ गेल जे मकान हाथसँ गेल आ ताहि चिन्‍तामे आपसमे लड़ए लागल। हम हुनका कहलिऐन जे कहियौ जे रसीद नहि चाही। से कहिते देरी तुरन्‍त एकदम शान्‍ति भऽ गेल।

इलाहाबादक प्रसिद्ध गणितज्ञ स्‍व. गणेश प्रसादक ओ सभ धोबी छल आ वएह मकान बनबैमे मदैत केने रहथिन। क्रमश: ऊपरमे किछु आर कोठरी सभ बनौलक जइमे हम किरायेदार छेलौं।

इलाहाबादक फगुआ बहुत आकर्षक होइत छल। पुरुकिया आ नाना प्रकारक पकवानक संग रंगमे सराबोर शहर मदमस्‍त ढंगमे फगुआ मनबैत छल। लाउडस्‍पीकरसँ पूरा मोहल्‍ला हल्‍ला होइत रहै छल आ झुंडक-झुंड लोक सभ रंग खेलाइत एक ठामसँ दोसर ठाम अबैत-जाइत रहैत छला। गाम-घरमे जहिना पहिने फगुआ मनौल जाइत छल, लगभग ओहिना इलाहाबादोमे धूम धर्ड़क्का होइत छल। मुदा आब तँ गामोमे फगुआ नि:शब्‍द भऽ गेल अछि। डालपर फागु सुनबामे नहि अबैत अछि। जोगीरा नहि गौल जाइत अछि। शराब बन्‍दीक बाद डगमग-डगमग चलैत लोक सभ देखबामे नहि अबैत अछि। फगुआ दिन गाम फोन कएल तँ पता लागल जे सभ किछु शान्‍त अछि। कोनो धू-धर्ड़क्का नहि। सभ अपन-अपन असोरापर बैसल पुरुकिया आ मालपूआक आनन्‍द लइ छैथ।  

इलाहाबाद प्रवासक महत्‍वपूर्ण घटनाक्रममे हमर कनिष्‍ठ पुत्रक जन्‍म छल। जन्‍मक समय नजदीक एलापर माए गामसँ एली। कमला नेहरू अस्‍पताल- इलाहाबादक प्रख्‍यात अस्‍पताल अछि। ओहीठाम हुनका भर्ती करौल गेल। माय संगे रहैथ। २-३ दिन रहलाक बाद डाक्‍टर सभ अस्‍पतालसँ ई कहि कऽ आपस कऽ देलक जे अखन समय लागत। मूल कारण अस्‍पतालक हड़ताल रहै, जइ कारणसँ मरीज सबहक देख-रेख कठिन भऽ गेल छल।

घर पहुँचले रही कि तुरन्‍त अस्‍पताल जाए पड़ल। अस्‍पतालमे बहुत कम डाक्‍टर छला। हड़ताल चलिते रहइ। सी.जी.एच.एस.सँ हुनका हेतु दबाइक बोतल सभ अनने रही। ओइमे-सँ एकटा चढ़ैबते देरी स्‍वस्‍थ्‍य खराप होमए लागल। रच्‍छ भेल जे ऐ गड़बड़ीक तुरन्‍त पता लागि गेल आ डाक्‍टर सबहक तत्‍परतासँ हुनकर जान बँचि गेल।

डाक्‍टर सभ विचार-विमर्श कऽ कऽ कहलक जे शल्‍य चिकित्‍सा द्वारा बच्‍चाक जन्‍म हएत। तइले प्रात:काल भोरेसँ अस्‍पतालमे तैनात रही। डाक्‍टरक परामर्शक अनुसार शल्‍य चिकित्‍साक सामग्री सभ कीनलौं। अस्‍पतालमे बेहोशी डाक्‍टरकेँ नहि रहबाक कारण ऑपरेशनमे देरी भऽ रहल छल। एलेनगंजमे डाक्‍टरक घरपर जा कऽ बहुत प्रयास केलौं, मुदा जखने हुनका आबक इच्‍छा भेलैन तखने एली। ऑपरेशन टीमक नेतृत्‍व डॉ. शशिवाला श्रीवास्‍तव  करै छेली। ओ इलाहाबादक सफल तथा नामी डाक्‍टर छेली। हम हुनकर पिताक किरायेदार रहल रही। जान-पहचान देल। ऑपरेशनक समयमे हमर कार्यालयसँ कएक गोटे उपस्‍थित रहि भरपूर मदैत केलाह जइमे श्री संजीव सिन्‍हाजीक योगदान अविस्‍मरणीय अछि।

किछु कालक बाद एकटा नर्स हँसैत बाहर निकलल आ पुत्र-जन्‍मक सूचना देलक। २० अप्रैल १९८५ क ११:३४ मिनटपर हमर छोट पुत्र क्षितिजक जन्‍म भेल। ऐसँ केतेक आनन्‍द भेल, तेकर वर्णन नहि कएल जा सकैत अछि। तुरन्‍त प्राइवेट वार्डमे कोठरीक बेवस्‍था कएल आ अर्द्ध-बेहोशीक हालतमे बच्‍चाक संग जच्‍चाकेँ ओतए आनल गेल।

तेकर बाद तँ देखनिहरक ढवाहि लागि गेल। इलाहाबादक ई विशेषता थिक। लोकमे भावुक लगाव बेसी होइ छै, आ बेरपर आनो-आनो लोक ठाढ़ भऽ जाइत अछि। अगल-बगलमे रहैबला पड़ोसी, परिचित, कार्यालयक सहकर्मी, अधीनस्‍थ कर्मचारी सभ एकाध बेर अस्‍पताल अबस्‍स आएल। दिन भरि भूखल रही। संगम जा कऽ हनुमानजीक दर्शन केलाक बादे भोजन कएल।

इलाहाबादमे आकाशवाणीमे कार्यरत कार्यक्रम अधिकारी डॉ. श्‍याम विद्यार्थीजी सँ आकाशवाणी युववाणी कार्यक्रमक रिकर्डिंगक दौरान भेल। सकारात्‍मक सोच ओ सरल सोभावक कारण हुनकासँ अनायासे मित्रता भऽ गेल। यदाकादा आकाशवाणीसँ हमर कार्यक्रम होइत रहै छल। स्‍थानीय अखबारमे सेहो कएकटा लेख कहियो काल छपैत छल। कार्यालयक बाद हमर ई सभ मनोरंजन छल।

डॉ. श्‍याम विद्यार्थी राजस्‍थानक रहनिहार छला आ संघ लोक सेवा आयोगसँ आकाशवाणीक र्काक्रम विभागमे राजपत्रित पदपर नियुक्‍त भेल छला। ओइ समयमे डॉ. मधुकर गंगाधर आकाशवाणीक निदेशक छला। ओ पूर्णियाक छला आ किछु दिनक बाद स्‍थानान्‍तरित भऽ दिल्‍ली चल गेला।

पटनासँ निकलैबला प्रसिद्ध मैथिली साप्‍ताहक मिथिला मिहिरमे हमर कएकटा कथा, लेख आ कविता सेहो छपल। बादमे मिथिला मिहिर बन्‍द भऽ गेल आ हम दिल्‍ली स्‍थानान्‍तरित भऽ गेलौं। तेकर बाद ऐ तरहक गतिविधि कम भऽ गेल।

कार्यालयक वागवानीक देख-भालक हेतु एकरा नैनित्रिक कर्मचारी छल। ओ गाहे-बगाहे हमर बच्‍चा सबहक मनोरंजन सेहो करैत रहै छल। ओकर खूबी ई छल जे प्रत्‍येक बातमे ओ कहैत यससर एक दिन ओकरा पुछलिऐ जे तूँ ई कला केतए सीखलह?

कहलक जे पूर्वमे ओ एकटा बहुत पैघ अधिकारीक ओइठाम काज करै छल। वएह ओकरा यससर कहबाक आदैत लगौलक। जँ ओकर खिलाफो कोनो बात होइत तँ ओकर उत्तर ओ यससर मे दैत छल।

असलमे यससर सरकारी कार्यालयक रामवाण थिक। केहनो संकटसँ अहाँ यससरक सहयोगसँ उबैर सकै छी। सरकारी कार्यालयमे अधिकारी सभकेँ काजसँ बेसी हुनकर अहं तुष्‍टि जरूरी होइत अछि। अहाँ दिन राति काज करू आ अधिकारीसँ अहंक टकरावमे कसि गेलौं तँ सभ गुड़-गोबर भऽ जाएत। नीक बेवहार तँ उचित थिक, मुदा बात एतबेपर नहि धमि जाइत अछि। जी-हजुरीक बिना नीक कार्य मूल्‍यांकन नहि होइत अदि। एहेन कियो बिरले हेता जे काजक आधारपर श्रेष्‍ठता तँइ करैत हेता।

जीवनमे सभ किछु गणितीय गणना जकाँ नहि चलैत अछि। सभ किछु सोचले नहि होइत अछि आ जे भऽ जाइत अछि से कए बेर अप्रत्‍याशित रहैत अछि।

यत चिन्‍तितं तदिह दुरतरं प्रयाति

यच्‍चेतसपिज कृतं तदिहाप्‍यपेति

प्रातर्भवामि वसधाधिप चक्रंवर्ती

सोहं व्रजामि विपिने जटिल तपस्‍वी।

भगवान राम द्वारा कहल उपरोक्‍त वाक्‍य हमरा-अहाँपर ओहिना लागू होइत अछि। जे हेबाक छै से हेतइ। होनी कियो रोकि नहि सकैत अछि। तथापि जीवनमे हाथ-पर-हाथ धऽ बैसलो नहि जा सकैत अछि। जे भावी अछि से हेतइ।

दड़िभंगासँ दिल्‍ली नौकरी करए गेल रही। ओइठामसँ थोड़बे दिनमे प्रयास कऽ कऽ इलाहाबाद आबि गेलौं आ ऐठाम ९ वर्ष रहलौं। आब अपनो आश्‍चर्य लगैत अछि जे केना ओइ वातावरणमे एतेक दिन रहि सकलौं। असलमे कार्यालय तँ जे छल से छल, मुदा बाहर एकटा नीक समाजिक परिवेश बनि गेल छल जइसँ बहुत भावनात्‍मक समर्थन भेट जाइत छल। आ कहबी छै जे अन्‍हेर गाइक राम रखबार।

अन्‍तिम २ साल जे निदेशक छला, हुनकासँ हमरा एकदम नहि पटल। यद्यपि हम परिश्रम पूर्वक ओ पूर्नत: इमानदारीसँ काज करी तथापि ओ असंतुष्‍ट रहैथ आ तंग करैथ। हमर बदली हेतु दिल्‍ली मुख्‍यालय लीखि देलखिन। हम दिल्‍लीसँ डराइ जे केना गुजर हएत, तँए ओहनोमे इलाहाबादे रहए चाही मुदा से नहि भेल आ फरबरी १९८७ मे हमर स्‍थानान्‍तरण दिल्ली गृह मंत्रालय भऽ गेल।

इलाहाबाद हमरा गाम-घर लगैत छल। बहुत नीक समाज भऽ गेल छल। कार्यालयमे कनी-मनी झंझट तँ सभठाम रहिते छै, ओकरा झेलिये रहल छेलौं। बच्‍चा छोट रहए। अर्थ-कष्‍ट तँ रहबे करए। तँए हम ओइठामसँ हटए नहि चाही, परन्‍तु निदेशक महोदय हाथ धो कऽ हमरा पाछू पड़ल रहै छला। कार्यालयमे दू गुट छल। स्‍पष्‍टत: ओ हमर घोर विरोधी गुटक संग भऽ गेल छला। वरिष्‍ठ अधिकारीक हेतु ई उचित नहि छल मुदा हुनका हमरा खिलाफ किछु भेटैन नहि तँए खिसियौल बिलाड़ि जकाँ...।

विरोधी सभकेँ हमरा खिलाफ हावा दैथ। हमरासँ काज सभ हटा कऽ विरोधी खेमाकेँ दऽ दैथ। मुदा लोक हमरा संगे जे छल से छल। हुनका डरे हटल नहि, मुदा हुनका हाथमे प्रशासकीय चाबुक छल, जेकर गलत उपयोग ओहमरा परास्‍त करए लेल प्रयोग करैथ।

बदलीक खिलाफ हम अध्‍यक्ष, कर्मचारी चयन आयोगकेँ आवेदन देल। हम ईहो लिखलिऐ जे जँ बदली होइक तँ हमर घोर विरोधीक सेहो होनि मुदा निदेशक ओकर पक्ष लऽ लइथ। असलमे निदेशकजीकेँ हमरासँ डर होइन।

एकबेर ओ कहला जे हम घरेमे रही आ ओ हमरा पूरा दरमाहा दऽ देल करताह। मुदा हम कहलिऐन जे काज करब हमर अधिकार अछि। बिना काज केने हम वेतन किएक लेब?

ऐ विषयपर अध्‍यक्ष, कर्मचारी चयन आयोगसँ दिल्‍लीमे हम भेँट केलौं। ओ भेँट करैकाल तुरन्‍त एकटा अधिकारीकेँ बजा लेला जे इलाहाबादमे पूर्वमे रहैथ आ निदेशकसँ परिचित छला। परिणाम भेल जे अध्‍यक्षजीसँ भेल हमर सभटा गप इलाहाबाद निदेशकजीक कानमे चल गेल। हम ओतेक खुलि कऽ हुनकासँ गपो नहि कए सकलौं।

इलाहाबाद आपस एलौं तँ निदेशकजी तेतेक घबड़ाएल छला जे स्‍वयं हमर कक्षमे पहुँचला आ रंग-रंगक आश्‍वासन दिअ लगला। मुदा सचमे ओ डरा गेल रहैथ। डरेबाक हेतु ओ स्‍वयं जिम्‍मदार छला। हम तँ अपन आस्‍तित्‍वक हेतु संघर्षशील रही। अन्‍ततोगत्‍वा हमर बदली भऽ गेल। ओना, कनीकाल लेल सत्‍य हारैत बुझाबामे आएल मुदा...।◌

 

आशीष अनचिन्हार

प्रो. हरिमोहन झाजीक गजल 

प्रस्तुत अछि मैथिलीक व्यंग्य सम्राट प्रो. हरिमोहन झाजीक लिखल ई गजल जे कि हुनक रचनावली (कविता खंड)सँ पृष्ठ-87सँ साभार अछि। तकर बाद हम एकर तक्ती कऽ देखाएब जे ई वास्तवमे गजल थिक की नै थिक--


 

ने लड़लहुँ फौजदारी जौं

त रुपया केर धाहे की


 

खसौलक नोर नहि बापक

त ओ कन्याक विवाहे की


 

ने आधा ऐंठ फेकल गेल

त फेर ओ भोज भाते की


 

ने बहराएल एको बन्दूक

त ओ थिक बराते की


 

ने लगला जोंक बनि कय जे

तेहन दुलहाक बापे की


 

जौं लस्सा बनि कुटुम सटला

त ओहिसँ बढ़ि पापे की


 

पड़ल नहि खेत सुदभरना

त ओ बापक सराधे की


 

ने फनकल जौं देयादे सन

त ओ गहुमन दराधे की


 

1972मे लिखल (प्रकाशित) आब एकर तक्ती देखू--


 

पहिल शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि--1222-1222 पहिल शेरक दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--1222-1222

दोसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर शेरक दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-11222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि।

तेसर शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि- 1222-12221 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--12122-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि।

चारिम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि 1222-122221 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि--122-1222  जँ कथित तौरपर "ए"केँ लघु मानी (जे कि गलत अछि) तखन एहि चारिम शेरक मात्राक्रम एना हएत-- पहिल पाँति -1222-12221 दोसर पाँति-122-1222 दूनू व्यवस्थाकमे मात्राक्रम मतलाक हिसाबें नै अछि।

पाँचम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि- 2222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि।

छठम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि।

सातम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि-- 1222-1222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें अछि।

आठम शेरक पहिल पाँतिक मात्राक्रम अछि- 1222-2222 दोसर पाँतिक मात्राक्रम अछि-1222-1222 जे कि मतलाक हिसाबें नै अछि।


 

उपरक विवेचनासँ स्पष्ट अछि जे ई गजल नै अछि। ओना हरिमोहन झाजी अपन आत्मकथा "जीवन यात्रा" मे लिखै छथि जे ओ पटना आबि मोशायरा सभमे सेहो भाग लेबए लगलाह। भऽ सकैए जे मात्र लौलवश ई कथित गजल हरिमोहनजी लिखने होथि। जे किछु हो मुदा ई गजल गजल इतिहासमे उल्लेख करबा योग्य नै अछि मुदा ओइ बाबजूद मात्र अइ कारणसँ हम विवरण देलहुँ जे काल्हि कियो उठि कऽ कहि सकै छथि जे हरिमोहन झा सन महान हास्य-व्यंग्यकार गजल लिखने छथि आ सही लिखने छथि। बस एही कारणसँ हम एतेक मेहनति केलहुँ अन्यथा एहि गजलमे कोनो एहन बात नै। हरिमोहन झाजी गजलक संबंधमे की सोचैत छलाह तकर बानगी "कहू की औ बाबू" नामक कविताक पहिले खंडमे देने छथि--


 

बसाते तेहन छै जे गोष्ठी मे कवियो

गजल दादरा आ कव्वाली गबैये

किछु दिन मे एहो देखब औ बाबू

जे कविताक संग-संग तबला बजैए


 

हरिमोहन झा रचनावली (कविता खंड) पृष्ठ-120 (11-11-1978 मे प्रकाशित)। भऽ सकैए जे हरिमोहनजीकेँ उर्दू शाइर सभहँक संग घनिष्ठता होइन मुदा ओ घनिष्ठता शाइरी ज्ञानमे नै बदलि सकल से उपरक हुनक विचारसँ परिलक्षित भऽ जाइए।

 

रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।