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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-2018.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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जगदीश प्रसाद मण्डलक तीनटा लघु कथा

1

पुरान साड़ी

जेठ मासक अमरस्साक नीन तँए सुति कऽ उठैमे कनी देरी भाइये गेल। ओना, नीन केतबो मोटाएल आकि भरियाएल किएक ने हुअए मुदा पत्नी उठा कऽ तोड़िये सकै छैथ। मुदा छैथ तँ सोलहन्नी पतिवरते, कखनौं सुखमे बाधा उपस्थित नहि करए चाहै छैथ। सुतबकेँ सुख बुझि अपने केतबो काल धरि सुतल रहब तैयो ओ उठेती नहि, जइसँ नीन सुरक्षित बँचल रहिये जाइए। तहिना खेबाकाल सेहो बिनु पुछनौं पत्नी बजलोरी थाड़ीमे तरूआ-तरकारी आ छलिगर दही आगूए-सँ फेकैत रहै छैथ, भलेँ मनमे एहनो आशा किए ने होनि जे थारीमे जँ बँचल रहत ओ अपने हिस्सा ने भेल जइसँ डेढ़िया-दोबर पबैक आशा पत्नीकेँ बनियेँ जाइ छैन। खाएर जे छैथ, मुदा जिनगी भरि संग तँ वएह रहती तँए दोसराक सिहन्तो केने कोनो लाभ नहियेँ अछि।

ओछाइनपर सँ उठि आँखि मीड़िते दलानसँ निच्चाँ भेलौं कि मिरचाइ-धनियाँ, हरदी-लसुन बेचैबला वेपारी–मखन–क अवाज कानमे आएल-

धनियाँ..., मिरचाइ..., हरदी..., लसुन... लइ जाएब यै...?”

अवाजेसँ बुझि गेलौं मखन छी। मनमे भेल चनौरागंजसँ, माने चारि किलोमीटरसँ वेपारी ऐठाम पहुँच गेल आ अपने ओछाइनपर सँ उठि दलानक निच्चाँ भेलौं! मन लजा गेल। जइसँ वेपारीपर नजैर नहि अँटका धरती दिस गाड़ि लेलौं। मुदा वेपारी जेतेक रेहल अछि तइसँ बेसी खेहल सेहो अछिए। केना ओ अपन शिकार छोड़त। नजैर पड़िते टोकलक-

भाय साहैब, एकटा समाचार भेटल किने?”

मखनक बात सुनि चौंकलौं। केहेन समाचार? गामक आकि अमेरिकाक? किएक तँ देखते छी जे दरभंगा रेडियो स्टेशन जखन सुतले रहैए तइसँ पहिनहि आन-आन देशक अकासवाणी सभ जागि-जागि अपन-अपन समाचारक हल्ला मचा दइए। फेर भेल जे जँ कहीं गाम-घरक समाचार हुअए तखन? मनमे अबिते दोहरौनी लाज जागि गेल। जागि ई गेल जे जँ गामेक समाचार हएत आकि टोले-पड़ोसक हएत तखन केना एहेन लोक लगमे मुँह उठाएब जे चारि किलोमीटरसँ आबि घर लग अपन कारोबार पसारने अछि आ अपने अखन ओछाइने छोड़लौं हेन! मुदा समाचारो तँ समाचार छी। जिनगियोक भऽ सकैए, जिनगी जीबैक लूरियोक भऽ सकैए। माने, जिनगी जीबैक कलो भेट सकैए आ जीवन-मृत्युक संघर्षोक दर्शन भऽ सकैए। तँए समाचारकेँ बुझब जरूरी अछिए। मुदा रच्छ रहल जे मखन बिनु पुछनहि अपने बजैत आगू बढ़ि गेल-

सुभद्र भाइक माए चारि बजे भोरमे मरि गेलखिन।

मखनक सुनौल समाचारकेँ दू टुकड़ी कऽ देखिऐ तँ एक टुकड़ी तँ साफ देखाए जे सुभद्र भाइक माएमाने सुधनी–काकी मरि गेली। मुदा दोसर टुकड़ीपर नजैर पड़िते बुझि पड़ए जे अमरस्साक चारि बजे भोर तँ सभसँ सुखद समय होइए, तखन केना काकी मरली? माने ई जे बारहो मास आ चौबीसो घन्टाक दिन-रातिमे जेठ मासक भोर सभसँ सुखद होइए, तइमे केना यमदूत आएल जे काकीक प्राणे लऽ कऽ उड़ि गेलैन! मुदा लगले मनमे उठि गेल जे अखन चाह-पानक समय अछि, मुइल काकीक जिगेसा करए जँ अखने जाएब आ एहेन समयमे चाहो-पान सुभद्रे भायपर लादि दिऐन से उचित नहि। कोनो कि सुभद्र भाय टोलेक छैथ जे कन्नो-खिजी सुनि लगले विदा हएब। आन टोलमे घर छैन, समाचार सुनैत-सुनैत ने सुनब, तइमे किछु समय तँ लगबे करत। तहूमे गाम-गाममे तेहेन लॉडस्पीकर-बाजा सभ परमानेन्ट लटका देल गेल अछि जे मोबाइलोमे गप-सप्प करब कठिन भऽ गेल अछि। तखन एहेन-एहेन समाचार की प्रभावित नहि हएत? हेबे करत। जहिना प्रदुषणकेँ दूर करैले एक दिस नमहर-नमहर योजनामे खर्च भऽ रहल अछि तहिना प्रदूषणकेँ बढ़बैयो-ले नहि भऽ रहल अछि सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। तहूमे आन प्रदूषणसँ बड़ बेसी तँ देहमे हौहैठ-कलकैल हएत, देह चुलचुलाएत। मुदा ध्वनि प्रदूषण तँ लोकक मत्थे चाटि बताह बनाएत..!

दरबज्जापर सँ चोटे आँगन जा पत्नीकेँ कहलयैन-

झब-दे चाह बनाउ। सुभद्र भाइक ऐठाम जाएब जरूरी भऽ गेल।

ओना पत्नीकेँ सुभद्र भाइक समाचार भेट गेल छेलैन तँए नाकर-नुकर नहि केलीह। जाबे मुँह-कान धोलौं ताबे पत्नियोँ चाह बना लेलैन। कलपर सँ आबि चाह पीलौं। चाह पीला पछाइत पानपर नजैर पहुँचल। मुदा नजैर अँटकल नहि, उड़ि कऽ आगू बढ़ि गेल। आगू ई बढ़ि गेल जे हरण-मरणमे पान नइ खेबा चाही। तहूमे सुभद्र भायसँ दियादीक सम्बन्ध सेहो अछि..!

पानक फसादमे मन तेना फँसि गेल जे सुभद्र भाइक ऐठाम जेबाक विचारे मनसँ उतैर गेल। मुदा चाह पीबैत-पीबैत किछुए काल बीतल कि सुधनी काकी आगूमे झमैक कऽ कुदि पड़ली। काकीक कुदब देख मनमे उठल- नबे बर्खक जिनगीक टपानमे कहियो सुधनी काकी अपन नवपनक तियाग नहि केलैन! समाजो आ परिवारोक संग काकीक सम्बन्ध सभ दिन एकरंगोहे बनल रहलैन। ओना, कहियो काल सम्बन्धमे घटी-बढ़ी सेहो होइत रहलैन मुदा अपना मने काकी जेहने शुरूमे छेली तेहने काल्हियो धरि रहबे केलीह। तहूमे राति नअ बजे तक एकेठाम बैस काकी संगे घर-परिवारक गप-सप्प करबे केलौं अछि, सुभद्रो भाय छला..!

सुधनी काकीपर सँ मन सुभद्र भायपर पहुँच गेल। जखने सुभद्र भाय मन पड़ला कि जिगेसा करब सेहो मन पड़ल। चाह पीब नेने छेलौं मुदा पान पछुआएल छल। पानपर नजैर पड़िते मनमे मटाउ हुअ लगल जे पान खा कऽ जाइ आकि बिनु पान खेने? अगदिगमे पड़ि गेलौं। मनमे उठल- जखनसँ ककीक मृत्‍युक समाचार सुनलौं तखनसँ आँखियो कहाँ अपना मने नोर बहौलक आ मुहोँ कहाँ कानल? मुदा मनमे ईहो उठल- कानत किए? सुधनी काकी सन-सन धरमी जँ गाम पीछु पाँचो-सातटा रहत तँ ओ अपन विचार कर्मसँ बिचड़ैत कर्मकार जकाँ कर्मी-धर्मी धार बहैबते रहत। भलेँ इलाहाबादक त्रिवेणी घाटपर वृन्दावनसँ बहैत आएल यमुना धार किए ने पतराइत-पतराइत पतरखेप खेपैत हुअए, मुदा धारक धारा तँ मानल जेबे ने करत किने? ओना, देखनिहारो आ ओइमे डुबकी लगा नहेनिहारो मानए वा नहि मानए...।

मन आगू बढ़ल। आगू बढ़ैत मनमे फुड़फुड़ा कऽ एकटा विचार खसल। विचार ई खसल जे एक तँ पान, तैपर ओकर पातकेँ अशुद्ध केना बुझल जाएत..?

शुद्ध अशुद्धक बीच मन घुरियाए लगल। फेर भेल जे भरिसक मरल लोकक ने तँ बरस-गाँठ मनबै दुआरे अशुद्ध भेल? मुदा अखन से तँ नहि, अखन तँ सुधनी काकीक जिगेसा करए जा रहल छी..! तैबीच काकी अपन डोर[1]मे बान्‍हि विचार देली-

बेटा, जखन तोरे सभले जिनगी गलेलौं तखन तोरा मुँह पान नहि! हँसैत खाइत खेलाइत आबह। आब कि हमरा कोनो अगुताइ अछि। जखन मन हुअ तखन जरबिहह आकि केतौ माइटिक तरमे गाड़ि दिहह।

सुधनी काकीक विचार मनमे जगिते नजैर फुन-फुना उठल। फुनफुनाइत नजैर पानपर उतरल। अन्दाजए लगलौं जे जेतेक कालमे घुमि कऽ घरपर आएब तेतेक कालक हिसाब जोड़ि पान लऽ ली। पाँच खिल्ली पानक पात बिछेलौं। पान तँ बिछा देलिऐ मुदा चुनक कोही हाथमे लइते मन पनपनाए लगल। मुदा तैबीच सुधनी काकी फेर घुमि कऽ आबि कहली-

चुनक कोही-तोही फेकैक काज नइ छह! जाबे तोरा सबहक बीच छेलौं पान-तमाकुल खेलौं। ओ भोग-पारस आब हमर थोड़े रहल, तँए तूँ हमरा-ले कोही नइ फेकिहह। चुनक कोहिये फेक देबहक तखन आगू पान केना खेबह?”

सुधनी काकीक विचारमे तेना ने बिचड़ए लगलौं जे पाँचोटा बिछौल पातमे कोनमे चुन कम पड़ल आ कोनमे बेसी से ठेकाने ने रहल। तहिना खएरो बेरमे सएह भेल। मुदा जे भेल से भेल, कोनो कि संगीतक उत्सवमे जाएब अछि जे चुन मुँह काटत आकि जर्दा हुचकी उठौत तँ...। हाँइ-हाँइ कऽ एक खिल्ली पान खा बाँकी चारू खिल्लीकेँ समेट प्लाष्टिकमे लटपटा गमछाक खूटमे बान्हि विदा भेलौं। जेठ मास छीहे तँए गंजी-कुरताक जरूरते की। तहूमे ओहन लोकक कृत्यमे जा रहल छी जे हँसैत-हँसबैत चारि पीढ़ी धरि नब्बे बर्खक उम्र गुजारलैन..!

दरबज्जापर सँ हेट होइत गामक रस्तापर जखन पएर पड़ल कि अनायास पैरक गति तेज हुअ लगल, मुदा जहिना पैरक गति तेज भेल तहिना मन लजा उठल, लाज हुअ लगल। जइ सुभद्र भायसँ एतेक लगीची सम्बन्ध अछि, तिनकर माए चारि बजे भोरेमे मुइली आ जिगेसा करए आठ बजे भिनसरमे जा रहल छी! सुभद्र भाइक नजरिक सोझ पड़ब तँ की कहता! मुहेँ बाजैथ वा नहि मुदा मने तँ जरूर मनमनेबे करता किने जे वाह रे बेर परक खलीफा, बेरेपर दिशा-मैदान सभटा उतरए लगै छैन..!’

मुदा मन जागल, जगिते विचार देलक-

जहिना स्कूल, कौलेज आकि कोनो कार्यालयमे कर्मचारी एगारह बजेसँ ड्यूटी करए जाइ छैथ, परिवारिक लोक रहने जँ कोनो कारणे पाँच मिनट पहिने नहि पहुँच पेने अपन उपस्थिति ऑफिसमे नहि दर्ज कऽ सकला आ रस्ते-रस्ते आबि अपन काजमे जुटि गेला,  पछाइत जँ ओ अपन उपस्थिति दर्ज करता, ओकरा की मानल जाए?”

विचार जगिते अपनो गर अँटल। गर ई अँटल जे चारि बजे भोरमे काकी मुइली, अखन आठ बजैए, आँगनसँ असमसान तक भरि दिनक काज भेल, तैठाम जँ नित्य-निवृत्तिमे कनी-मनी आगू-पाछू भेल तँ ओकरा काजेसँ ने पुरौल जाएत। सुभद्र भाय ओहेन लोक थोड़े छैथ जे काकी लग बैस सोझे कैनते हेता। हुनको नजैर कहिते हेतैन ने जे के केहेन लोक अछि। तँए अनेरे मनमे शंको करब नीक नहियेँ छी। फेर भेल जखन सुधनी काकीक अन्तिम विदाइ दइले जाइये रहलौं अछि आ जँ हमरो बहन्ने सुधनी काकी दू-चारि आँगनमे बैस किछुकाल गुजारि लेती, ईहो कम थोड़े भेल?

काजक लोक बनिते मनमे भेल जे एक मुट्ठी मूज किए ने कर्त्ताक डोराडोरि-ले नेने चली? सएह केलौं, भाय जेकर डोराडोरि जेतेक सक्कत रहत ओकरेमे ने ओतेक सक्कतपन रहत।

हाथमे मूज नेने जखन सुभद्र भाइक घरपर पहुँचलौं कि समाजक मजमा देख अपने हेरा गेलौं।  हेरा ई गेलौं जे असगरूआ सुभद्र भाय एतेक लोककेँ नौत-हकार केना दऽ एलखिन? छोट भाए जे छैन ओ तँ सुधनी काकीक कोड़ैला बेटा भेलखिन, वेचाराक छठिहारक छाती छुटि रहलै हेन, तँए ओकरा कानैसँ मनाहियो तँ सुभद्र भाय नहियेँ कऽ सकै छैथ। तहूमे जेठ रहू कि छोट, माए तँ दुनू भाँइक मुइली हेन, अपन-अपन हिस्सा तँ सभकेँ कानबो तँ हेबे करतैन। सुभद्र भाय अपनो तहूमे बरदाएल हेता। तैसंग माए माइये छथिन। अनका जकाँ सुभद्र भाय थोड़े छैथ जे आँखिक सोझमे माइक शरीरकेँ आगिमे बिसरजन नहि करैथ। भाय! दुनियाँ बड़ीटा छै, अपन-अपन आँट-पेट देख ने अपन आँट-पेट बनाएब? गामसँ अहाँ काज करए बाहर गेलौं। काज केला पछाइत जखन बैसारी भेल, बुढ़ भेलौं तखन बाप-पुरखा मोन पड़ला, गाम मोन पड़ल! खाली मरैले गाम आएब तँ जरौत के सेहो ने विचारि लिअ पड़त जे जँ हम केकरो माए-बापकेँ नहि जरौने छी तँ अपन माए-बापकेँ जरबए के औत? तँए मरैबेर जँ घीच्चम-तीड़ा लहासक हएत तइसँ नीक नहियेँ ने हएत!

माए मुइने असगरे सुभद्र भायपर बिपैतक बोझ खसिये पड़लैन। असगरे कनता कि बजारसँ कपड़ा आनए जेता आकि कान्हपर उठा माएकेँ असमसान लऽ जेथिन आकि अहरी-अछिया खुनता..?

मुदा, जेना गामक लोक ई बुझैत होथि तहिना एकाएकी सभ आबए लगला। मुदा बुझैक पाछू किछु कारणो तँ जरूर हेबे करत। ओना, समाजेक मनचोभिया नाचबला सभ सेहो अपन नाच दरबज्जापर ठाढ़ केने छल। रंग-रंगक नाच-गानसँ सुभद्र भाइक दरबज्जा गनगनाइत रहैन। मनमे भेल जे सुभद्र भाय तँ काकीकेँ ओगरने आँगनमे हेता तँए काजक पछातिये अपन उपस्थिति दर्ज कराएब। चोटगर नाच रहबे करै, बीचमे जा कऽ बैसलौं। चारूकातक लोक जे नचितो छला आ गबितो छला, ओ अपना मने खूब चोटियेबो केलैन आ चोटो खेलैन। तहिना जे गरियबै छला ओ गारियो तँ सुनिते रहैथ। सुधनी काकीक ने विदाइ समारोह छिऐन तँए समाजक लोक सभ अपन-अपन भागीदारी दर्ज तँ करबे करता किने...।

उठि कऽ कनियेँ आगू बढ़लौं कि दोसर ठाम निर्गुण सम्प्रदायक प्रवचन चलैत देखलौं। दूटा बबाजी अपनामे खट-समाद करैत रहैथ। एकक कहब रहैन-

अपनामे लागि जाउ।

आ दोसरक कहब रहैन-

राम धुइनमे लागि जाउ।

दुनूक खट-समादसँ परहेज करैत कतवाहि देने निकैल थोड़ेक आगू बढ़लौं तँ ओतए देखलिऐ जे कियो बाँस अनलक, कियो बाँस फाड़ैए, कियो खड़ौआ जौड़ बाँटैए, कियो कुरहैर-टेंगारी लऽ लकड़ीक ओरियानमे लागल अछि आ कियो बाँसक फट्ठाकेँ बिछा मचान बनबैक सुरसार कऽ रहल अछि जैपर सुधनी काकीकेँ सुता असमसान घाट पहुँचौल जाएत। जेना बिजली चालित कोनो मशीन गनगनाइत चलैत रहैए तहिना समाजक बीचक सौम्यपनसँ सुधनी काकीक मृत्युक पछातिक प्रक्रिया चलि रहल छल..!

सभ काजकेँ नीक जकाँ संचालित होइत देख मनमे भेल जे सुभद्र भायकेँ अपन आँखिक देखल सभ बात सुनाइयो देबैन आ मुइल माए लग बैसल हुनका सन बेटाक रंगो-रूप देख लेब। आँगन गेलौं। ओना, सुधनी काकीक मुँह माछी दुआरे झाँपल रहैन मुदा जिज्ञासुकेँ पहुँचते सुभद्र भाइक बहिन मुँह उघाइर कऽ दर्शन करा दैत आ पुन: ओहिना झाँपि दैन। काकीक दर्शन केला पछाइत जखन सुभद्र भायपर नजैर पहुँचल कि हुनका हँसैत देखलयैन। सुभद्र भायकेँ हँसैत देख अकबका गेलौं। कहाँसँ सुभद्र भाय दुनू परानी एकठाम बैस हबो-ढकार भऽ कनितैथ, तँ देखै छिऐन मकैक लाबा जकाँ मुँहक दाँत देखा-देखा हँसि रहला अछि! फेर मनमे भेल जे जहिना राजाक मंत्री मुँह-मिलानी करैत मिलल मुहेँ वातावरणकेँ अनुकूल बनबैत तहिना सुभद्र भाय बना रहला अछि। हुनकर हँसीकेँ हँसोइथ-हँसोइथ अपनो मुँहमे लिअ लगलौं जे ओहने रूप अपनो बनि गेलापर अन्तिम संस्कारक विचार करब।

जहिना नाटकक मंचपर जाइसँ पहिने नटुआ अपन रूप-रंग बदैल लइए तहिना अपनो रंग-रूप बदलैत सुभद्र भाय लग पहुँच हुनका पजरा दबा कऽ बैसलौं। बैसला पछाइत मनमे उठल जे केतए-सँ गप उठाबी? सुभद्र भाय तँ हँसि रहला अछि, तँए अखन काजक गप उठाएब बुड़िबकी हएत। विपरीत परिस्थिति अछि, मृत माइक आगू बेटा हँसैत अछि..! मने-मन लाख कछमछेलौं मुदा बजैक कोनो गर नइ लागल। थोड़ेकालक पछाइत एकटा गर लागल। गर ई लागल जे जहिना विद्वतजन दोसरक बात बेसी सुनै छैथ आ ओकरा अपन मनक मथानीमे मक्खन जकाँ मोहि घी बना उत्तर देबकेँ नीक बुझै छैथ, तहिना सोचलौं। तहूमे एकटा आरो गर सुतरल जे अखन काकीक जिज्ञासा ने कऽ रहल छिऐन, तँए थोड़ेकाल आँखि-मुँह बन्न कऽ सुमिरन नहि करबैन सेहो केहेन हएत। तइ बिच्चेमे सुभद्र भाय बजला-

गौरी, अपना आँखिये हम कहियो माएकेँ नइ देखलयैन जे नव साड़ीकेँ देहमे लगौने हेती। अभावमे नहि, बेटी-पुतोहुक विचारमे।

सुभद्र भाइक बात सुनि अकबका गेलौं। किछु फुरबे ने कएल जे की बाजी? मुदा मन कहलक- बाजि नइ सकै छी, मुदा पुछि तँ सकिते छी। पुछलयैन-

से की भाय साहैब?”

सुभद्र भाय बजला-

दूटा पुतोहु छैन जे दुनू अखन मुहेँ लग बैसलो छैन्हे, जहिया कहियो माएकेँ नव साड़ी कोनो कुटुम-परिवार देने हेतैन वा अपनो बजारसँ कीनि आनि देने हेबैन, तँ ओ साड़ी माए ओतबे काल नवमे पहिरै छेली जेतेक काल आन गामसँ अपना गाम अबैमे लगैत रहैन। भलेँ पुतोहुक देहक साड़ी पनरहे दिनक किए ने पहिरल हुअए, मुदा तेकरासँ ओ बदैल अपन नव साड़ी पुतोहुकेँ दऽ दइ छेली।

सुभद्र भाइक विचार पहिने तँ सहरगंजा जकाँ बुझि पड़ल मुदा पछाइत बुझलौं जे सचमुच सुधनी काकी तियागक प्रतिमूर्ति छेली। जे देहक वस्त्र फेक सकैए ओ पेटक अन्न नहि फेक सकैए!

अपन मन भकरार भऽ कऽ फुला गेल। बजलौं-

भाय साहैब! मासेक धक हएत, बाध दिससँ काकी अबैत रहैथ, रस्ता कातक लतामक गाछ लगसँ देखलयैन तँ बुझि पड़ल जे कोनो टोल दिससँ आबि रहली अछि। फरिक्केसँ काकीकेँ कहलयैन-

काकी, गोड़ लगै छी!”

झटकल अबिते रहैथ, असीरवाद दैत-दैत ओहो लतामक गाछ लग पहुँच पुछलैन-

अखने सुति कऽ उठलह हेन?”

ओना, काकी असथिरसँ बजली मुदा बुझि पड़ल जे जँ कहीं अपना उकैतिये कहि दैथ जे तोरे सन-सन जुआन-जहान हिमालय पहाड़पर चढ़त!’ मुदा से काकी किछु ने बजली। अपन जान बँचैत देख हमहीं पुछलयैन-

काकी, अनका पुतोहु जकाँ ने ते अहूँक पुतोहु सभ ताल-मात्रा देखबै छैथ?”

जेना सभ दिन बरी बनौनिहारि बरीवाहिनीकेँ ठोरेपर बरी पकैए तहिना काकी बजली-

पुतोहु जे ताल-मात्रा देखौती से कि कोनो हम बिनु परिछौने आँगन अनने छी।

अदहा-छिदहा बात काकीक बुझबो केलौं आ अदहा-छिदहा नहियोँ बुझलौं। पुछलयैन-

से केना काकी?”

बच्चा जकाँ पढ़बैत काकी कहलैन-

परिछन भेल, लूरिक नाप-जोख।

काकीक बात फेर मनमे लटपटाएले रहल। अपन आँखि बिआह-दुरागमन होइकालक परिछन देखने छल। जइमे दसटा स्त्रीगणकेँ गीत गबैत, फोटो खिचबैत देखने छल, तँए परिछनकेँ ओतबे बुझैत रही। बजलौं-

से केना काकी?”

गम्भीर होइत कहलैन-

जखने जेठकी कनियाँ डेढ़िया टपल कि आने स्त्रीगण जकाँ फुसफुसा कऽ पुछलिऐ- कनियाँ, भत-उसना बनौल होइए? बिना किछु उत्तर देने पुतोहु चुपेचाप आँखि मिला नजैर निच्चाँ कऽ लेली। अपन परिवार तँ ओहन ऐछे जइमे समए-कुसमए भत-उसना होइते अछि। बुझि गेलौं। बड़ बेसी तँ एतबे ने कहि सकै छेलिऐन जे बकलेल माए-बाप बकलेले बना पठौलक। मुदा तइसँ की होएत।”

तैबीच जेठकी पुतोहु–माने सुभद्र भाइक पत्नी–कबुल करैत बजली-

सोलहन्नी सत् कहने छेली!”

जेठकी पुतोहुकेँ कबुल करिते पुछलयैन-

आ छोटकी पुतोहुकेँ केना परिछन केलिऐन?”

मुस्की दैत बजली-

डेढ़ियापर ढेर स्त्रीगण सभ कुटिचाल करैत रहए, तैबीच मे जा असथिरसँ पुछलयैन- कनियाँ, जइ घर एलौं हेन तइमे अल्लूक संग ओलोक तरकारी चलैए, से ओल उखाड़ल होइए किने?”

ओना बजली गीतक लयमे मुदा ओल उखाड़ब ओतेक असान तँ नहियेँ अछि। कारण, एक तँ माइटिक तरक तरकारी छी ओल, तैपर गाछसँ कन्द धरि कब-कबाह सेहो होइते अछि।

पुछलयैन-

ओ की कहलैन?”

बजली-

ओहो मुड़ी गाड़ि लेली..!

अपना बेटीकेँ पालैक लूरि जइ माएकेँ रहत ओ आनोक बेटीकेँ तँ पालिये सकैए! तखन एते विषमता किए?”

तैबीच दरबज्जापर हल्ला भेल-

आब ऐठाम देरी नहि करू, असमसानोक रस्ता नमहर अछि।

शब्द संख्‍या : 2553, तिथि : 24 अक्टुबर 2017


 

 2

 

गाम बिसैर गेल

पैछला रबिकेँ गौरीकान्त गाम आएल। एलाक दसे मिनटक पछाइत भाँज लगि गेल जे बेटाक संग गौरीकान्त अमेरिकासँ दिल्ली आ दिल्लीसँ पटना हवाइ जहाजसँ उतैर रिजर्व गाड़ी पटनासँ केने गाम पहुँचल। गौरीकान्तक घराड़ी तँ बँचल छै मुदा ओ मराड़ी बनि गेल अछि। ने पुरना इनारक पानि चालू आ ने घरे-दुआर एकोटा ठाढ़। इनारक ऊपरका लहरा सभ तेना खसि पड़ल जे पानिसँ निच्चाँ जमीन पकैड़ लेलक। बिनु नौतल जहिना बर, पीपर आ पाखैर चलि अबैए तहिना भाँगो-धथुर नइ औत सेहो नहियेँ कहल जा सकैए, मुदा से रच्छ रहल जे गौरीकान्तक बेटा पानिक दसटा बोतल संगे नेने आएल छेलइ। बोन-झाड़ भेल घराड़ी गौरीकान्तक। भाय मिथिलाक ने माटि छी, बिनु केनौं-धेनौं किछु-ने-किछु होइते अछि। कोनो कि राजस्थान आकि गुजरातक थोड़े छी जे बलुआएल रहने किछु जनमबे ने करत।

चारि बजे बेरूपहरमे गौरीकान्त गाम पहुँचल छल। बेटाकेँ पहिल भेँट गामक रहइ, ओना जन्म अखुनका झाड़खण्डेमे भेल छेलै, जइसँ दू-तीन खेप बच्चामे गाम आएल छल, मुदा ओ पाँच बर्खक अवस्थासँ पहिनहि। गाम अबिते गौरीकान्त जखन हिया कऽ गाम दिस तकलक तँ बुझि पड़लै जे जहिना गामक भूगोल बदैल गेल अछि, भरिसक तहिना लोकक गणितो तँ बदलिये गेल अछि! ओना, अपन इतिहास की अछि से तँ अपने जानब। मुदा लाख मनक बोझ मनपर पड़िते गौरीकान्तक मन अखनो ओइ विचारसँ सक्कत ऐछे जे विचारि आएल छल- जिनगीक शेष भाग समाजमे बिता समाजक हाथे संस्कार लेब।

गौरीकान्त हमर लंगोटिया संगी छी, जहिना गाममे एकठाम घर तहिना एक उमेरक सेहो ऐछे आ संगे-संग केजरीवाल हाइ स्कूलसँ मैट्रिक पासो केने छी। गामक हम दुइये गोरे एक किलासक संगी रही। गौरीकान्त हमरासँ नीक रिजल्टो आनए आ पढ़ैयोमे तेज रहए, तँए ओ साईंस रखने छल आ हम कनी दब–माने भुसकौल–रही तँए आर्ट रखने छेलौं। तहूमे ओहेन विषय सभ, जेकरा चूड़ा-दही-चीनीक भोज बुझि सभ मैथिल बैस-बैस खाइत रहल। ओना, हाइ स्कूलमे एकटा बात ईहो छल जे पढ़ाइक क्रममे–विषयवार–घेरा-घेरी सेहो छल आ से किछु जानियोँ कऽ छल आ किछु अनजानोमे। माने ई जे सम्पन्न हाइ स्कूल रहितो झंझारपुरमे जहिना वायोलॉजीक पढ़ाइ नइ छल तहिना तमुरिया हाइ स्कूलमे कॉमर्सक पढ़ाइ नइ छल। हँ! जे नव-धव विद्यालय छल, अर्थक अभावमे जे शिक्षकक जोग नइ बना सकल छल, ओकर तँ बाते भिन्न भेल। खाएर जे भेल, मुदा झंझारपुर जहिना डॉक्टरकेँ पैदा करैमे नपुंशक रहल तहिना तमुरियो वेपारीकेँ पैदा करैमे नपुंशके रहल।

अमेरिकाक माटि-पानिमे रमल गौरीकान्त अपन रहैक अपना जनैत बेवस्था केनहि आएल छल। एते तँ समय आगू बढ़िये गेल अछि जे एकटा वैगमे पाँच हाथक रहैक घरसँ लऽ कऽ कुर्सी-टेबुल आ कोंच-पलंग तक आनि हवा भरि बनाइये सकै छी।

तीन दिनक रूटिंगमे सुनील आएल अछि जइमे माए-बापकेँ–माने दुनू परानी गौरीकान्तकेँ–रहैक असथाय बेवस्था करैत, चारिम दिन अमेरिका विदा भऽ जाएत। ओना, गाम पहुँचैमे गौरीकान्तकेँ सीमाकातमे पुछए पड़ल छल। किएक तँ गामक मुँह-कान जहिना नहर-सड़क बनौलक तहिना उजाड़बो तँ करबे केलक। तँए गाम देख गौरीकान्त भकचकाएल जरूर, मुदा अपना धराड़ीक कोणपर जे तहियेसँ ताड़क गाछ छल ओ छेलैहे, जेकरा ठेकना गौरीकान्त अपन घराड़ी चीन्हि पएर रोपलक। गाड़ी-सवारीक झमारल तीनू गोरे–दुनू परानी गौरीकान्त आ सुनील–रहबे करए, तँए सुतै-बैसैक बेवस्था अबिते कऽ लेलक। पर-पैखाना तँ धड़फड़मे नहि बनौल जा सकैए, आ ने तेकर कोनो तेहेन हलतलबीए बुझि पड़लै, किएक तँ सौंसे घराड़ी बोन-झाड़ लगले अछि। खाइ-पीबैक सेहो बेसी तरद्दुत करैक जरूरते नहि। आठ दिनक खेनाइक पैकेटे बनौल अनने अछि।

दोसर दिन भोरमे चाह-ताह पीला पछाति तीनू गोरे सुतै-बैसैक वस्तु छोड़ि, बाँकी सभ किछुकेँ समेट पीठपर लादि गामक अपन खेत-पथार टोहियाबए विदा भेल। दूटा खेत पुरना सड़कक कातमे जे रहै ओ लगले भेट गेलै मुदा तीनटा जे बाधमे छेलै ओइ बाधेमे पानि पसरल देख घुमि कऽ चलि आएल। अबिते नहाइक इच्छा तीनू गोरेकेँ भेल, पियास तँ बोतलक पानिसँ ससाइर लेलक मुदा नहाइक तृष्णाकेँ तँ पोखैर, इनार आकि चापाकलेसँ ससाइर सकैए। ओना, एक्के घन्टामे खेत घुमि कऽ माने खेत देख कऽ तीनू गोरे डेरापर डन्टा नेने आबि चुकल छल। तैबीच एकटा संजोग बनल। संजोग ई बनल जे अही गामक एक गोरे, जेकर उमेर करीब पैंतालीस बर्खक अछि, ओ अमेरिकासँ आएल दोसर संगी पौलक, तँए बिनु बजौले गौरीकान्तक ऐठाम पहुँच गेल। ओकर नाओं छिऐ- ठकनलाल।

जिनगीक सोल्हम बर्खमे ठकनलाल गामसँ बम्बै नोकरी करए गेल, शुरूमे एकटा कारखानामे लेबरक श्रेणीमे काज करए लगल। मुदा ओ बेसी दिन नहि केलक, किछुए दिनक पछाइत लेबरक ठीकेदारी करए लगल। माने गाम-घरसँ आएल छुट्टा श्रमीक सभ जे भोरू-पहरमे चौक-चौराहापर मौजूद रहैए आ उट्ठा काज गछैए, ओकरे ठीकेदारी करए लगल। बम्बै शहरमे रहैत रहैत ठकनलालकेँ कनी-मनी पाँखि जनमए लगल। साल भरिक पछाइत ठकनलाल गाम-घरसँ लोककेँ बझा-बझा कारखानामे लगबए लगल। आमदनी बढ़लै। मुदा जहिना अकासमे उड़ैत गोटे चिड़ै अपन जेरसँ हजारो किस्मक दोसर चिड़ैक जेरमे वौआइत पहुँच जाइए आ पहुँचला पछाइत ओइ चिड़ैक की गति होइ छै, ओ तँ चिड़ै-चिड़ैपर निर्भर अछि। ओना रेंगिग सिस्टम नइ अछि सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। खाएर जे अछि आ जेतए अछि से तेतइ रहह...।

पाँखि भेला पछाइत ठकनलाल सेहो एकटा अमेरिकन ठीकेदारक हाथे अमेरिका पहुँच गेल। केतए की भेलै से तँ अखन तक ठकनलाल केकरो लग नहि बाजल तँए हमहूँ नइ बुझै छी। मुदा एकरो तँ झूठ नहियेँ कहल जा सकै छै जे ममियौतो भाय आ पिसियौतो भाय अपन-अपन रूपैया खर्च कऽ कऽ जहलसँ निकालि कऽ नहि अनने छल। ओना, दुनू मसियौत-ममियौत भाय ठकनक दुनू बेटाकेँ अपने लग रखि कमाइक गर धड़ा देने अछि। जेलसँ एला पछाइत ठकनलालकेँ परिवारक सभजन बैस निर्णय कऽ लेलक जे ठकन गाममे रहत। ओकरा हजार रूपैया महिना गाममे देब। ओही कारावासक पड़ल ठकनलाल गौरीकान्तक ऐठाम पहुँचल।

भाषाक मिलानी होइमे गौरीकान्तकेँ मिसियो भरि परेशानी नइ भेल। किएक तँ दुनू गोरेकेँ गामक भाषासँ लऽ कऽ अमेरिकन भाषा तकक मिलानी रहबे करइ। दुनूकेँ अमेरिकासँ लऽ कऽ गाम धरिक एक-कनिहा संगी भेबे कएल। मुदा तइमे कनी फेंट-फाँट भेल। फेंट-फाँट ई भेल जे गौरीकान्त दुनू परानी अमेरिकाक खाएल-पीअल- रमल-बसल, मुदा ठकनलाल से नहि, असगरे खाएल-पीअल-रमल-बसल आ घरवाली सोलहन्नी गामेवाली रहलै ओना, धरतीपर जे जिनगी पौलक ओकरा सभकेँ धरतीक सुख पबैक आ जीबैक इच्छा छइहे, मुदा ओइमे ओझरी लागल अछि। खाएर जे अछि, ओझरीक पोझरीकेँ पछाइत सोझराएब। जखने दू आदमीक बीच काज करैक एक-शैली आबि गेल तखने गामक काजमे धक्का लगबे करत। दुनू गोरेक बीच दसे मिनटमे काजक दौड़ शुरू भेल। गाम-गाममे दस-बीसटा गाड़ी-सवारी भाइये गेल अछि। ठकनलालक संग सुनील रमकल। दुइये किलोमीटरपर बजार, जैठाम चापाकलक समानसँ मिस्त्री धरि भेटैए। चापाकलक मिस्त्रीकेँ बुझल जे ऐठाम तीस-पैंतीस फुट निच्चाँमे पानि भेट जाइए। केहेन पानि औत आ नइ औत तेकर ठिक्काक भार तँ नइ अछि। सोझे पानिक ठिक्का-पट्टा पटि गेल। ठकनक संग सुनीलो अमेरिकन चालि पकैड़ लगले कलक मिस्त्रीकेँ हुण्डे काज सुमझा आगू बढ़ि ईंटा-सिमटी-लोहा इत्यादि घरक समानक सभ जोगार बैसबऽ चलि गेल। जाबे ठकनक संग सुनील डेरापर पहुँचल ताबे कलक मिस्त्री, बिनु नापक कल जकाँ तीस फुट पाइपक जगह साए फुट पाइपक हिसाब लगा, कलसँ पानि निकालि दरबज्जापर बैस गेल। सभ हिसाबक मुँह-मिलानी करैत पचास रूपैआ बकशीश पबैत मिस्त्री खुशी-खुशी गाम गेल। काजक शैली दू रंगक होइए। पहिल तँ सभकेँ बुझल अछिए जे ऑफिसक टेबुलक फीस बनल छै, दैत चलियौ आ काजकेँ तेज गतिये करैत चलू। मुदा दोसर शैली लिखित-अलिखितक बीच ओझरा गेल अछि, जेकर प्रभाव गाम-गाममे केहेन अछि ई तँ गौंवे ने बुझि सकै छैथ।

तेसर दिन गौरीकान्त बैंक सबहक मुँह-मिलानी करता। तेकर समय बनल। तेसर दिनक काज करैत सुनील अमेरिकाक बाट तीन दिन पहिने जहिना चारि बजेमे पहुँचल तहिना पकैड़ लेलक। गामक लोक आड़ि-मारिबला अछिए, कियो अमेरिकासँ आबैथ आकि लंकासँ, समाजमे जेहने जिनगी रहल छैन तेहने ने भोग भोगता। ओइमे  गामक लोक केतौ नहि रहत। मुदा तँए की लोकक आवाजाही घटल सेहो बात नहियेँ अछि।

चारि कोठरीक घरक संग कीचेन, बाथ रूम सबहक बेवस्था संगे बनबैक विचार गौरीकान्तक भेलैन। ओना, दलान बनौत कि नहि, से थोड़ेक लटपटाएल अछि। किएक तँ गौरीकान्तक आगू धर्म संकट फँसि गेल। धर्म संकट ई जे दलान पुरुखकेँ बैसैक छिऐ, गामक लोकक आबा-जाही नहि, तैठाम दुनू परानी सड़कक कातक दरबज्जापर केना बैसब। भाय, गाम जखन गौरीकान्त आबि गेल तखन पुरनो गप-सप्प तँ किछु उखड़बे करत किने? जखने पुरना गप-सप्प उखड़त तखने लंगोटिया संगीमे अपनो हिसाब हेबे करत। जँ से हएत तँ ओकरा हिसाबक बहीमे नाम दर्ज भऽ जाएत। मुदा अपनो तँ समाज छी जैठाम जीबैक विचार होइए तैठाम जँ एक जुगक समाजक जीवन्त बेकती जँ श्रद्धासँ अन्तिम संस्कार पबैले गाम आएल, तखन जँ से नइ भेटै ओहो तँ समाजक कलंके भेल। तइ कलंकक भागी तँ हमरा छोड़ि कियो दोसर हएत नहि। किएक तँ धरमराजक दरबार जखन अन्तिम बेरिया पहुँचब, तखन जिनगी भरिक ने हिसाब-बारी हएत जे जे समाज अहाँकेँ स्वतंत्र जीबैक अधिकार देने अछि तेकरा अहाँ की देलिऐ?

गौरीकान्तसँ भेँट करैक विचार मनमे रोपि लेलौं। ओना, गौरीकान्तक तीनू दिनक जिनगीक हिसाब बुझिये रहल छी जे महाकाल जकाँ समझ रहलै। तँए जखने महाकालीक पूजा हएत तखने छोट-छीन देव-देवी पछुआ जेबे करत। अपनो तँ एते सोन्हि भेटिये गेल अछि जे काने-कान ने सुनैत सुनब- गौरीकान्त गाम आएल। तैबीच तँ हजारो कान बीचमे अछिए। तहूमे तीन दिन बेसी नइ भेल, पचि सकैए। तँए दोखी बनैक बाट नइ देखलौं। चारि-छह मास जन्मक अन्तर दुनू गोरेक बीच अछि। दुनू गोरे संगे-संग हाइ स्कूल तक पढ़लौं। गौरीकान्त साइंस पढ़ि इंजीनियर भेल। पिता मेहनती लोक, मेहनतक उपारजनमे पढ़ब-लिखब दिस खर्च करबकेँ नीक बुझै छेलखिन, तँए खर्चक कोताही कहियो ने हुअ देलखिन। गौरीकान्तो प्रतिभाशील, असानीसँ इंजीनियर भेल। प्रतियोगितो औझुका जकाँ नहि छल। जे आइ झारखण्ड राज्य छी ओ बिहारे छल। इंजीनियर बनि टाटानगरमे नोकरी शुरू केलक। बिआह नइ भेल छेलइ। इंजीनियर बनिते सुभ्यस्त परिवार सभसँ घटक सभ पहुँचल। अन्तो-अन्त अंग्रेजी ऑनर्सक कन्याँक संग बिआह भेल। इंजीनियर बनिते गौरीकान्तक अपन मन जेते अमेरिका जा नोकरी करैक भेलै तइसँ बेसी पत्नी आ सासुरक भेल। किएक तँ सासुरमे एकटा ओहन बेकती रहैथ जे नोकरी करैले अमेरिका गेला आ दसे बर्खक कमाइसँ गाम आबि अपन इंजीनियरिंग कॉलेज चला रहला अछि। से बुझल-देखल रहबे करैन, तँए बेसी जोर देलखिन। तैसंग पत्नियोँकेँ जेठुआ टुकलीकेँ जहिना धिया-पुता नॉंगैरमे काठी खोंसि उड़बैए तहिना तेतेक उड़ौलकैन जे दिन-राति जागलो-सुतलमे अमेरिके देखैत। अमेरिकाक नाओं सुनिते कियो कहैन-

बहिन, स्वर्गक भोग तोरेटा कपारमे विधाता लिखलखुन!”

तँ किम्हरोसँ पत्र अबैत-

बहिन, आब तों बहिने जकाँ भरि जिनगी बहिने बनल रहि जेबह!”

एक तँ बिनु बोझ पड़ल महिला गौरीकान्तक पत्नी कनछुटू रहबे करइ। खाएर जे रहइ, जेहेन रहइ.., मुदा पाँच सालक पछाइत टाटानगरक नोकरी छोड़ि गौरीकान्त अमेरिका चलि गेल।

तीस साल नोकरी केला पछाइत, इंजनक बीच इंजन बनल गौरीकान्त चारि साल पहिने सेवा मुक्त भेल। व्यस्त जीवन अमेरिकाक ऐछे, पत्नी छोड़ि दोसर लगमे कियो ने बैसनिहार आ ने हबे-गब केनिहार। तइमे मात्र दुइये परानी, कखनो बेटा नजैर पड़ैत तँ पुतोहु नहि, कखनो पुतोहु तँ बेटा नहि। अपने दुनू परानी काजसँ अकाज भाइये गेल अछि। जइसँ जीवन्ता जिनगीसँ हटिये गेल छइ। पहाड़पर सँ ढरकल जिनगी भाइये गेल छइ। मुदा किछु छै, एते तँ जीबठगर गौरीकान्तकेँ मानले ने जाएत जे जिनगी भरिक हेराएल-भोथियाएल जँ अन्तिम संस्कार धरि आबि गेल तँ ओकर उद्धार होइते अछि।

चारि बजे बेरू पहर गौरीकान्तसँ भेँट करए विदा भेलौं। बीघा डेढ़ेक दूरीपर घर। घर मरने घराड़ी कनी बोनाह भाइये गेल छइ। मुर्दघटी जकाँ तँ नहि, मुदा मरण-हरणक नुआँ-बिस्तर आ टुटल-फुटल तौलो-कराहीक कान-खापट तँ फेकल जाइते अछि। इनार भथा गेल। पुरना–माने पैछला जिनगीक देखल–मात्र एकटा ताड़क गाछ ठेकानपर, बाँकी सभ बेठेकना गेल। जे आमक गाछ, पाँच बर्खक छल ओ चालीस बर्खक भऽ गेल। गामक पाँचटा पोखैरमे तीनटा कमला-बाढ़िमे भथाइये गेल आ बँचल जे दूटा अछि ओकरो मुँह-कान तेना ने झड़ल-झुड़ल अछि जे ओहो अपन पुरना चिन्ह बिसैर गेल।

दुनू परानी गौरीकान्त टेन्टमे बैसल अपन ढहैत जिनगीक गर-गुर लगबैक सोंगर-सबहक विचार करैत छल। आगूमे मकानक काज चलैत रहइ। माने चारि कोठरीक पक्का मकानमे हाथ लागल छेलइ।

टेन्टसँ आगू बढ़िते रही कि आगूए-सँ ठकनलाल दुनू हाथे पकैड़ आगू देखबए लगल। अपनो मनमे भेल जे जाबे काज–कृत्ति–केँ आँखिसँ देख नइ लेब, ताबे काजक बात बुझब केना? जँ गपो-सप्प करब तँ ओ काजोक भऽ सकैए आ अकाजकोक। तँए पहिने काजेकेँ–माने मकानक नींवक खुनाइकेँ–किए ने अगुआ ली। ठकनो लाल गामसँ अमेरिका तकक खेलाड़ी अछिए। मकानक नींवक कोण लग पहुँचा ठकनलाल खाइ-पीबैक जोगारमे टेन्ट पहुँच गेल। गौरीकान्तसँ कोनो वस्तु पुछैक जरूरत ठकनलालकेँ रहबे ने करइ, तँए गौरीकान्त किछु बजबे किए करत। सभ जोगार-पाती–माने खाइ-पीबैक वस्तु–टेबुलपर लगा ठकनलाल फेर लग पहुँच गेल। ओना, एतेक जरूर भेल जे ठकनलालकेँ संग छोड़ने नींवकेँ हिया कऽ देखैक समय भेट गेल। शहरी स्टाइलक घर। जेहने घर-घराड़ी बनाएब तेहने ने सरो-समाज देखब...।

तैबीच ठकनलाल बाजल-

काका, दुइये गौरेमे केते घर की करता।

आन सभसँ कनी हटलो रही आ कनी अपनो बोलीकेँ दबलौं, तँए फुस-फुसा कऽ नइ बुझू, मध्यम स्वरे बुझू। बजलौं-

ठकन, जखन मनेजरी लेलह तखन अपनो परिवारक ने जोगार बैसैबतह। एतबो नइ बुझै छहक जे सड़ल-पाकल दुनू परानी गौरीकान्त आबि गेल। माथो दुखैते ते कहतह मुम्बैये हॉसपीटल लऽ चलैले। पाँच दिन आकि दस दिन, जे समय लगतह तैबीच दुनूठाम माने अहूठाम आ अपनो ऐठाम, ओगरवाही केना करबह?”

ओना, ठकनलालक अपन सोच रहै जे पाँच सालसँ कममे नीक जकाँ घर नहियेँ सजत तैबीच सभतुर लागल रहबे करब, जँ कहीं तइ बिच्चेमे दुनू परानी मरली तँ अपन सजौल-बनौल घर अपने सभ परानी ने भोगब। जहिना अपन परिवार शहरसँ गामक जहलखानामे पठा देलक तहिना ओकरो सभकेँ देखा देबै जे हमर माए-बाप बड़ बुद्धू नइ छल जे ठकना नाम रखलक..! मुस्की दइते ठकनलाल टेन्टक भीतर हवादार कुरसी-टेबुल लगा अरियातए आएल छल, बाँहि पकड़ने लऽ जा कऽ गौरीकान्त लग बैसौलक।

अपना मनमे नचैत छल जे हाइ स्कूल तकक जिनगीक संगी दुनू गोरे रहि चुकल छी। ओतबे संगपनामे ने अखन धरिक संग पुरल अछि। मुदा ओ तँ अपना समयमे निमहल। आब तँ दुनू परानी गौरीकान्त सड़ि-गलि-पकि आएल अछि। बेटा-पुतोहु अमेरिकामे रहतै। जे दोहरा कऽ गाम औत कि नहि। अमेरिकेमे ओ सभ रहत आ माए-बापक श्राद्धो-कर्म ओतैसँ सुनि मानत। मुदा गाम तँ से नहि छी। गामक धरतीपर पहुँच गेल अछि। श्राद्ध केनिहार खरचा दुआरे कियो भलेँ नइ तैयार हुअए मुदा मरैक जगह लग, चारि हाथ खाधि खुनि ओइमे नइ मटिया देत, एहनो अबिसवास तँ नहियेँ कएल जा सकैए। मटियेबे करत। ओना, जहिना अपना मनमे होइ छल तहिना गौरीकान्तक मनमे सेहो छेलैहे। तैबीच ठकनलाल चौहद्दी बान्हि चुकल छल, तँए कान्ही मिलानमे देरी किए लगैत। की कहाँ, पान-सातटा पुड़िया आनि ठकनलाल टेबुलपर पहिनहि पसाइर चुकल छल। मनमे हुअए जे एते जे खेला पछाइत गप-सप्प शुरू करब आ टटके खेलहा बिसैर जाएब सेहो केहेन हएत। बजलौं-

ठकन, जहिना अबै बेरक जलखै होइए तहिना ने जाइ बेरक पनपिआइ सेहो हएत, तँए आपस होइकाल ई सभ खेबह। अखन चाह टा पीबह।

ईहो तँ अमेरिकन गुण अछिए जे खाइकाल जखने कहत नहि आ जँ थारीमे दऽ देलिऐ तँ लगले मारि बैसत। ठकनलाल अपन चालि पकैड़ मानि लेलक। दुनू परानी गौरीकान्तक संग गप-सप्प शुरू भेल। सुहरदे मुहेँ गौरीकान्त बाजल-

गाम बिसैर गेल हएत।

गौरीकान्तक प्रश्नक भीतर नीक-बेजाए अनेको प्रश्न छिपले अछि, ओ केना लगले बाजल जा सकैए आकि तत्काल टारले जा सकैए..? बजलौं-

गाम केकरा बिसरल जे तोरा बिसरतह?”

ओना, मनमे ईहो होइत रहए जे जँ पाइ बेसी हेतै तँ एहेन स्कीम धरा समाजक एकटा बास स्थल किए ने बनैक विचार देब। ओना, अपन आँखिक ज्योति जेहेन गौरीकान्तक हेतइ, तेहन देखत। मुदा अपन नजैर गौरीकान्तक पत्नीक निच्चाँ-ऊपर घुमि रहल छेलए जे आब केहेन विचार मनमे उठि रहल छैन। सेवा दुआरे बेटा-पुतोहु गाम अबैक विचारमे मिसियो भरि देरी नइ केलक..!

गौरीकान्त अपन जुगक जिनगीक जखन समीक्षा करैत तँ पबैत जे जइ अवस्थामे अखन पहुँच गेल छी, तेकर निमरजना केना हएत, ई परिवारक मिलल धारक ऐगला छोर छी, जँ बीचमे सुखा जाएत वा भथन भऽ जाएत तखन तँ जिनगीक धारे अवरूद्ध भऽ जाएत..!

खसल मने गौरीकान्त अपनाकेँ समर्पित करैत बाजल-

भगवाने दरबार जकाँ समाजोक दरबारकेँ बुझिये रहल छी, तँए अपनाकेँ ओइ समर-भूमिमे समर्पित करबे करब।

आगू बजैक सभ रस्ता बन्द देख, बिना किछु बजने प्रणाम-पाती करैत ओतए-सँ विदा भऽ अपना ऐठाम चलि एलौं।

शब्द संख्‍या : 2482, तिथि : 28 अक्टुबर 2017


 

 3

 

ऐँठ साड़ी

आइ छठिक खरना पाबैन छी। साढ़े सात-पौने आठ बजे भिनसुरका बात छी। ओना नीन समैयेपर टुटि गेल छल मुदा पाबैनक उछाही नीन टुटिते आगूमे खसि पड़ल। आगूमे खसल, माने जखने आइक प्रभात दिस तकलौं कि छठिक खरना नजैरपर आएल। जहिना छठिक खरना नजैरपर आएल तहिना सूर्यक अर्घ सेहो आएल, मुदा तैसंग ईहो आएल जे अर्घ देल जाइए सूर्यकेँ मुदा पाबैनक नाओं छी छठि परमेसरी..!

अखन तक ऐ प्रश्न दिस नजैर कहियो उठले ने छल जे एकेबेर बोझ जकाँ तेना माथमे चढ़ि गेल जे नीन टुटला पछातियो ओछाइन छोड़ैक साहसे ने हुअए। तैबीच किसनी काकीकेँ पुतोहुक संग कहो-कही आ ललको-ललकी शुरू भेल। सेटले आँगन अछि, ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल सुनए लगलौं। किसनी काकी अपन पुतोहुकेँ कहलखिन-

तोरा धिरित नइ छह!”

ओना, किसनी काकी अपना पतोहुपर ललैक कऽ बाजल छेली मुदा धिरित नइ छह सुनिते मन ठमकल। सोचलौं, जँ अखन काकीक आगू जाएब तँ पुतोहुक शब्द हमरेपर छोड़ए लगती। हो-न-हो जँ कहीं यएह पुछि दैथ जे आइ कोन पाबैन छी, पुरुखक आकि स्त्रीक..? तँ की हुनका हम बुझा कऽ शान्त कऽ सकब? पुरना घावपर नून छीटि अनेरे जे देहो आ मनोकेँ विसविसाएब तइसँ नीक पत्नीए-केँ पठा बुझि ली।

पत्नीकेँ कहलयैन-

किसनी काकी आइ भोरे-भोर किए एते गरमाएल छैथ, से कनी बुझने आउ ते...।

कनियोँ देरी हएत तँ बुझले अछि जे ओ केहेन ठोर-पकाहि लोक छैथ, लगले कहए लगती जे तूँ हमरा आन बुझै छह जे सभटा उधारीए खाता चलत। जे समांग जीबैतमे आँखिक सोझमे सेवा-बरदास नहि करत ओ मुइला पछाइत केते करत तेतबो की नइ बुझै छी। 

जहिना पत्नीकेँ कहलयैन तहिना ओ विदा भेली। तइ बिच्चेमे किसनी काकी दोहरा कऽ बजली-

जखैन गामे-लोककेँ धिरित नइ अछि तखैन परिवार सबहक की रहत..!”

कान ठाढ़ करि कऽ रहबे करी, धियान किसनीए काकीपर रहए। कनी नरमाएल अवाज बुझि पड़ल। किए तँ परिवारक संगे गामक बात सेहो बाजि रहली अछि। जरूर कोनो तेहेन बात मनमे हेतैन। अपन जे प्रश्न छल- भगवान भास्करक अर्घ आ छठि परमेसरीक पाबैन, तेकरा मने-मन बन्ठा काकापर सोंपि, मुँह-कानमे पानि लइले तैयार भेलौं। बन्ठा काका, माने हाइ स्कूलक ओहन शिक्षक जे अपन विचारपर ठाढ़ होइक दम रखने छैथ। बच्चेसँ नीक विद्यार्थी रहला। विद्यार्थी जीवनसँ लऽ कऽ जहिया नोकरी शुरू केलैन तहिया तक सुलोचन कुमार नाओंसँ जानल-मानल जाइ छला। मुदा नोकरीक पछाइत गामक लोक हुनका बन्ठा काकाक नाओंसँ पुकारए लगलैन। तेकर कारण शरीरक कद भरिसक सेहो छैन। ओना, समाजक देल नाओं बन्ठा’, बन्ठा बौआ’, बन्ठा भायबन्ठा काका जे छैन यएह ने ससैर कऽ बन्ठा बाबा तक पहुँचतैन। माए-बाप छठियार दिन बेटा-बेटीक नाओं रखैए। नाओं रखैक माने भेल समाजक दाइ-माइ सभ जे अपनामे विचारि आमक पातपर लिखि नामक प्रस्ताव दइ छथिन, तेकरे ने माए-बाप मानि अपन बच्चाक नाओं घोषित करै छैथ। तहिना ने समाजक देल नाओं सोल्होअना स्वीकार भेलैन। धनपत राय जहिना प्रेमचन्द भेला, मुनीन्द्र चौधरी राजकमल भेला तहिना सुलोचन कुमारसँ बन्ठा सेहो भेला। ओना ई नाओं शुरूमे सुलोचन कुमार जखन धिया-पुताक जेरमे आमक गाछीक अखड़ाहापर जाइ छला तहियो बन्ठा पहलमानक नाओं धारण केने छला। मुदा अखड़ाहा छोड़ला पछाइत जखन विद्यालय धेलैन, तेकर पछाइत लिखित नाओं एने पुन: ओ दबि गेलैन।

पत्नीकेँ अबिते कहलयैन-

दोहरा कऽ किसनी काकी लग जाउ आ हमरे नाओं कहबैन जे धाहे-बोखारे फल्लाँ धऽ धऽ जरै छैथ, से कनी चलि कऽ देखथुन।

ई सोचि बजलौं जे आँगनसँ जखने काकी निकैल औती तँ गप-सप्पक क्रम बदलने मनो बदलतैन, जइसँ विचारमे ढीलपन औतैन। जखने विचारमे ढीलपन देखबैन कि गपक पाशा बदैल कीकीकेँ दोसर दिस मोड़ि देबैन। अनेरे पाबैन-दिन जे भोरेसँ घौचाल शुरू भेल ओहो दबि जाएत।

कहलापर पत्नी आँगनसँ तँ निकैल काकीकेँ बजबए विदा भेली, मुदा जखन अपने चद्देर-तद्देर ओढ़ि बोखरलग्गु बनि सिरमापर मुड़ी देलिऐ कि पत्नी दरबज्जाक कोनचर लगसँ हिया कऽ देखए लगली। हिया कऽ देखैक कारण भरिसक ई रहैन जे जखन काकी लग झूठ बजैले जाइ छी, तखन झूठ बजौनिहार केते अपन झूठक मेकप केलैन...। अपनो मनमे भेल जे सोझमतिया किसनी काकी छथिए, पतिआइमे देरी लगबे ने करतैन। भाय, पाबैन-दिन छी, भोरेसँ जँ किसनी काकी विवाद लधती तँ हो-न-हो दुपहर होइत-होइत कहीं पाबनियेँपर ने अट्ठा-बज्जर खसि पड़ए। जखने एकबेर अट्ठा-बज्जर खसत कि पाबनियेँ खोंर भऽ जाएत। खोंर भेला पछाइत जहिना जितिया पाबैन खोंर भऽ एकसंझू बनि जाइए, तहिना भऽ जाएत। जखने जितिया पाबैन जकाँ छठि एकसंझू हएत तखने...। छठि कि कोनो आन पाबैन छी जे एकसंझूओसँ काज चलि जाएत। दू-संझू पाबैन छी, अनेरे एकटा टुटि जाएत! तहूमे जँ छीप दिससँ टुटत तँ जड़ि दिस अदहा लगने लगलो रहैत, मुदा जँ कहीं जड़ि दिससँ टुटल, तखन तँ दुनू कूर समाप्त! तँए किसनी काकीक मनकेँ बदलब जरूरी बुझिये पड़ल।

अपन मुँह झाँपि दुखताह की बनब जे अँगनासँ निकैलते पत्नी ड्योढ़वालीकेँ ललकब सुनए लगली-

एना होइ! किसनी काकी किए बजली जे ललमुँही सभ सभटा पाबैन ढंस केने जाइए..!”

ड्योढ़वाली बगलेमे पड़ोसीक परिवार छथि।

ड्योढ़वालीक बात सुनि पत्नी दरबज्जाक मुँहथैरपर ठमैक कऽ ठाढ़े रहली। एक तँ दरबज्जाक आगूए-मे पड़ोसनी किसनीए काकी-दे बजैत, आ किसनीए काकीकेँ बजबैले जाइत रहैथ। पत्नीक मनमे भेलैन जखने किसनी काकीकेँ बजा कऽ अनबैन आ अपना काने ड्योढ़वालीक बात सुनती, तँ अनेरे अहीठाम कहा-कही शुरू हएत! जखने घर लग कहा-कही हएत तखने सभ छार-भार अपना ऊपर खसत! पत्नीक मने घुमए लगलैन। ने आगू डेग उठबैक साहस होनि आ ने पाछू हटैक। बलुआह माटिक मुरुत जकाँ ने एक बून पानि थम्हैबला आ ने चाननक शीलाक रगरक रग्गर थम्हैबला..!

दूरक ललक लगमे सुनए लगलौं। मुदा एकटा जरूर भेल जे कनी हटलमे जहिना किसनी काकीक अवाज बुझि पड़ै छल तहिना लगमे ड्योढ़वालीक। मरदा-मरदीक ललक नइ सुनने मनमे उठल जे ऐठाम सोलहन्नी दुखताह बनने काज नइ चलत, दोसर रंगक मेकप करए पड़त। सुतलसँ उठि चौकीए-पर बैस मने-मन विचारए लगलौं जे आब की करी? अपन विचारकेँ सोलहन्नीसँ अठन्नी बनेलौं। बनेलौं ई जे चौकीपर सँ निच्चाँ उतैर चद्देर ओढ़लौं। भाय! महिला जगतमे ने जा रहल छी, तँए ओहने रूप ने बनबए पड़त।

चद्देर ओढ़ि निच्चाँ होइते पत्नीकेँ देख बजलौं-

पाबैन दिन छी, एना जे पएर-मे जत्ता बान्हि आँटा पीसब तखन तँ छठिक ढोलक ठकर-ठकर ठक-ठकुआ सुनिते रहब..!”

भाय, अपन घर अपने समेटने ने समटाइए। अनकर सभ खिड़की खोलि अपने बन्न कऽ कऽ राखए चाहबै से केना हएत। जँ अनकर खोलबै तँ अपनो खोलियौ। मुदा से पत्नी चेतली। चेतली ई जे चोट्टे आँगन दिस घुमैत बजली-

अँगना-घरमे काज छिड़ियाएल अछि। अपनेसँ किसनी काकीकेँ देखियौन।

तैसंग ईहो रच्छ रहल जे ड्योढ़ोवाली चुप भऽ पाबैनक जोगारमे लगि गेली। अपने आगू बढ़ि किसनी काकीक ऐठाम पहुँचलौं। ओतए चारि-पाँच गोरे ठाढ़ भेल गप-सप्प करैत रहैथ। जइमे बन्ठो काका छला। चद्देर ओढ़ल देख अगुआ कऽ बन्ठे काका बजला-

की बौआ, सभ दिन खइहह पबनियेँ ललैहह!”

बन्ठा कक्काक मुँहपर जवाब दइक हिम्मत नइ भेल। हिम्मत नइ होइक कारण भेल बनौआ दुखताह ने रही, तँए केमहरसँ की बाजब से ओरियेबे ने कएल। बिच्चेमे लसैक गेलौं। केना ने लसैकतौं, जँ निरोग बनि बजितौं तँ भगलपन किए लधने छी? कोनो कि पूस माघक जाड़ मास छिऐ जे चद्देर ओढ़ने छी। अखन ते छठिक व्रतधारी एक-पहर साँझोमे आ एक-पहर भोरोमे छाती भरि जलतरंग करैए, तहूमे अनका सोझामे रहितौं तँ भग्गल भगलपन जोड़ि कहितिऐ जे मच्छरक दुआरे चद्देर ओढ़ने छी, मुदा बन्ठा काका लग एहेन झूठ बिना पकड़ेने रहब। आन भलेँ बन्ठा काकाकेँ अदना बुझैत होनि मुदा अपने तँ जरूर जनै छी जे बन्ठा काका पौराणिक पुरुख छैथ, जे बजता से करता आ जे करता से बजता। बन्ठा चमार जहिया बन्ठ लकड़ीसँ अखड़ाहापर बन्ठा हाथे ढोल बजबै छला, तहिया लोरिक-रूदल सन मनियार छल तेकरे जकाँ ने बन्ठो काका छैथ। तँए अपनाकेँ निरोग केना कहितिऐन? ओना, अपना मने ओ रोगी बुझि हमरा पाबैनसँ बाड़ि देने छला मुदा पाबैन-दिन अपनो केना पाछू घुसैकतौं। भाय, आसीन-कातिक छिऐहे सरदी-बोखारक मौसम छी, सएह ने हमरो भेल हएत। मुदा केते निरोग कहबैन आ केते रोगाएल, से नपैक थर्मामीटर थोड़े अछि। लगले दोसर प्रश्न आगूमे उठि गेल। उठि ई गेल जे जँ बेसी निरोग कहबैन तँ कहता जे चलह तँ पोखैरक घाट देखिऐ जे घाटक पानि पवित्र अछि की नहि, जलतरंग जोग अछि की नहि। जँ थाल-कादो हएत तँ सौंसे पोखैर भलेँ नहि, मुदा जेतबो दूरमे माए-बहिन हाथ उठा सूर्य भगवानकेँ अर्घ देथिन, तेतबो दूर तक फरिच जल रहत तखने ने पवित्रतासँ हाथ उठाएब हेतैन...।

फेर भेल जे एहेन भरिगर काजमे पड़ब नीक नहि। पोखैरक घाटेपर थाल-कादो हेतै तँ हौउ। सभकेँ थाले-कादो नीक लगै छै तँ अपनो नीके लागत। आ जँ अपन मन नइ मानत तँ चबुतरा देल चापाकल दरबज्जापर अछिए, बाल्टीन भरि पानि आगूमे रखि डाली पसारि देब। जखने सूर्य भगवान मेघमे उगता कि धाँइ-दे बाल्टीनक जलमे नचबे करता, बस तखने अर्घ दऽ देबैन। तैबीच बन्ठा काका किसनी काकीकेँ बोधि नेने छला तँए वातावरण थोड़ेक नरमा गेल छल। जइ काजे किसनी काकी बिगड़ल छेली, तेकर निराकरण छठिक प्रात भनेक तिथिपर रहि गेल। पाबैन भरिक अंकुश किसनी काकीकेँ बन्ठा काका लगा चुकल छला। बजलौं-

काका, पाबैन छिऐ, आइ तँ छुट्टीए-मे हएब। हमरे ऐठाम चलू, चाहो-ताहो पीब आ किसनी काकी भोरेसँ किए ललकारा भरै छेली सेहो कनी बुझि लेब।

ओना, अखन तक हम अपना मने निरोग छी मुदा बन्ठा काका तँ रोगीए बुझै छैथ तँए ओ अपना ऐठाम चलि कऽ गप-सप्प करैक जगहसँ नीक हमरे ऐठमाकेँ बुझलैन। भऽ सकैए दुखताहक होनि वा बेसी दिनपर गाम एलासँ समाजिकता सेहो होइन। खाएर.., दुनू गोरे विदा भेलौं। थोड़ेक आगू बढ़िते बन्ठा काका बजला-

बौआ, की कहबह। तेहेन लंकाबास भऽ गेल अछि जे अखन तक चाहो ने पीलौं हेन।

पुछलयैन-

किए! अबेर-कऽ नीन टुटल की?”

अबेर सुनि बन्ठा काका सहमला। सहमैक कारण भेलैन जे जँ समैपर उठलौं, तखन चाहे किए पछुआएल? आ जखन पहिलुक काज- चाह पीब अपन धुरी छोड़ि देलक तखन ऐगलो सबहक ने धुरी छुटि जेतइ? अपनाकेँ सम्हारैत बन्ठा काका बजला-

बौआ, की पुछै छह! पाबैन-दिन छी, पबनौटक आशा सभकेँ अछिए, मुदा डुम्मा लोकक मुआबजा सरकारकेँ सभसँ बेसी भरए पड़ै छइ।

काका बजिते छला, तैबीच दरबज्जापर पहुँचलौं। पहुँचते पत्नीकेँ कहलयैन-

अखन तक बन्ठा काका तीन बेर चाह पीब नेने रहितैथ, से निराधारे छैथ, तँए तीनू बेरक मोजगरा पुराएब।

बिच्चेमे बन्ठा काका लोकि लेलैन-

ऐँह, अहिना लोक बजैए!”

मुहसँ निकैल गेल- केतौ अनतए बजलौं हेन।

मुँह दुसैत बन्ठा काका बजला- 

यएह ने तोरा सन-सन नवतुरियामे बुड़िपन अछि जे पत्नियोँ लग पुरुख बनल नइ होइ छह!”

तैबीच, पत्नी शुरूहेमे जे चाह बनौने छेली ओ दूटा कपमे नेने एली। जहिना भोरुका तुकक चाह छुटने बन्ठा कक्काक मन खौंता गेल छेलैन तहिना चाह पीबते शान्त भेलैन।

बजलौं-

काका, गाममे सभ दिन अहाँ नइ रहै छी, केतेको विचार, केतेको प्रश्न मनमे उठैए आ बिसैर जाइ छी। आन कियो गाममे अहाँ सन छैथ नहि, जे मनगर जवाब देता।

एक तँ चाह पीला पछाइत बन्ठा कक्काक मन शान्त छेलैन्हे, तैपर हमर विचार सुनि आरो शान्त होइत बजला-

मनमे तँ बहुत अछि, मुदा बहुत तँ बहुत लोककेँ तैयार भेने ने हेतइ।

बन्ठा कक्काक बातसँ बुझि पड़ल, काका अपनो वौआइ छैथ आ हमरो वौएता। कहलयैन-

काका, दुनियाँ-दारीक गप-सप्प छोड़ू, अखनो एकटा प्रश्न मनमे घुरियाइए। तँए पहिने ऐठाम तकक वृतान्त सुना दिअ, पछाइत अपन बात फरियाएब।

पत्नी पान नेने एली। पान खेला पछाइत बन्ठा कक्काक मन जेना पूर्ण तृप्त भऽ गेलैन। ओना, मुँहक सुरखीसँ बन्ठा काका शान्त जकाँ बुझि पड़ैथ, मुदा मनमे अशान्ति छेलैन। अशान्तिक कारण छेलैन जे एक दिस लोककेँ देखै छला आ दोसर दिस पाबैन दिस तकै छला तँ बुझि पड़ै छेलैन जे कमला धारक कटहरबा घाटक कटहरक कोआ सभकेँ भेटबे करत...। गम्भीर होइत बन्ठा काकाकेँ देख मनमे भेल जे छी छठि पाबैन, जइमे लोक पोखैर आकि धारमे स्नान करैत सूर्यकेँ अर्घ चढ़बैए आ दोसर दिस बन्ठा काका समुद्रमे डुमबैक विचार सुनबए लगता। तइसँ नीक जे अपने किए ने किछु चालि मारी। बजलौं-

काका, चाहक यात्रा किए भङ्गैठ गेल?”

ओना बन्ठा कक्काक मन तुरछए लगलैन, मुदा जखन समाजेक पोखैरमे स्नानक संग सूर्यकेँ अर्घ दैक पाबैन छी तखन अपनो ने ओही समाजमे छी, तँए मनकेँ दबैत बजला-

बौआ, आन दिन तोरा पितियाइनकेँ जगा कऽ उठबए पड़ै छल, मुदा आइ पहिनहि उठि सिरखड़ियावालीसँ कहा-कही करै छेली। हुनके दुनू गोरेक अवाज सुनि अपन नीन टुटल।

पुछलयैन-

किए पाबैन-दिन, भोरे-भोर दुनू गोरे कहा-कही करै छेली?”

मुस्की दैत बन्ठा काका बजला-

जहिना कोटाक खराँत-ले लोक डीलर ऐठाम पहिने हम लेब तँ पहिने हम लेब करैत कहा-कही करैए तहिना बुझह।

बजलौं-

काका, आइ खरना पाबैन छी, तखन किए डीलरबला गप बजलिऐ?”

बजला-

डीलरक ऐठाम चाउर-गहुमक बँटवारामे ते कनी लज्जैत रहितो अछि मुदा पाबैनमे की अछि से तँ स्त्रीगणे सभ जानैथ।

बन्ठा काकाकेँ भँसियाइत देख बजलौं-

काका, आइ पाबैनक दिन छी, तोहूमे मन कनी गड़बड़ो अछि, तँए चौहद्दी छोड़ि अपन चास-बासक गप करू।

बन्ठा काका जेना बुझि गेला तहिना बजला-

बौआ, साड़ीक कहा-कही छल। सिरखड़ियावालीक कहब रहै ऐँठ साड़ीसँ खरना पाबैन नइ हएत।

बन्ठा कक्काक बात सुनि सहमलौं, किएक तँ ऐँठ की से बुझिये ने पेब रहल छेलौं। पुछलयैन-

की ऐँठ काका?”

बन्ठा काका बजला-

ऐँठ भेल जे, जे साड़ी एको दिन पहिरल हुअए।

बजलौं-

काकीक कहब की छेलैन?”

बजला-

हुनकर कहब जे अपने मनक बात छी, पहिल खींच देलिऐ ओ निरेठ भऽ गेल। जखन निरेठ भेल तखने ओ ऐँठ नइ रहल। तइले एते कहा-कही करैक कोन जरूरत। मुदा कहा-कहीक बात करैत जँ चाह बनबए कहितिऐन तखन ओ झगड़ा अपना दिस उनटैत की नहि, तँए चुपे-चाप आगू बढ़ि गेलौं।

आगू बढ़ब सुनि अपनो नीक लागल। बजलौं-

नीक केलौं।

हमर नीक सुनिते बन्ठा काका बजला- 

नीक की हएत कपार! कनियेँ आगू बढ़लौं तँ देखलिऐ, सोनरेवाली आ कैथिनियाँवालीकेँ खूब ललका-ललकी रस्तेपर करै छेली। अपन-अपन बात सुनबैले दुनू गोरे रस्तेकेँ रोकने छेली। मुदा रच्छ रहल जे फरिकेसँ दुनू गोरेक गप सुनि नेने छेलौं। एकक कहब रहै जे खरना पाबैन करैले अलगसँ एकटा साड़ी बनि कऽ ऊपरेसँ आएल अछि, ओ पहीर लोक पाबैन करत।

बिच्चेमे बजा गेल-

दोसरक कहब की छेलैन?”

बन्ठा काका बजला-

दोसरक कहब रहै जे हम जे दुर्गेपूजाक मेलामे खरना पाबैनले साड़ी कीन नेने छेलौं से की करब। मुदा रच्छ रहल जे दुनू गोरे रस्ता छोड़ि देली। आगू बढ़लौं।

नीक केलौं, काका।”-हम कहलयैन।

बन्ठा काका बजला-

नीक की करब, अपनेटा नीक केने थोड़े नीक होइए। आनो नीक बुझि करत तखन ने। किछु छी तँ लंकाबास छी किने। किछुकेँ छोड़ैत चलू, किछुसँ जुटैत चलू। किसनी भौजीकेँ अठ-अठ हाथ कुदैत पुतोहुपर देखलयैन। ओना, पुतोहु अपन हाथ ससाइर नेने छेली। तँए सासुक बातकेँ खलिया बन्दूकक अवाज बुझि अनठौने छेली आ अपन खरना पाबैनपर सुरता लगौने छेली। मुदा रच्छ रहल जे जखने किसनी भौजी आगूमे अबैत हमरा देखली कि एकाएक चुप भऽ गेली। ललकैकाल आँखिसँ नोर निकलै छेलैन कि नहि, से तँ नहि देख पेलिऐन मुदा चुप होइते देखलयैन जे दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर टघैर रहल छैन। नोर देख मन खटकल जे भोरे-भोर कोन एहेन खटका किसनी भौजीकेँ भेलैन!”

बजलौं-

ओना, किसनी काकी तँ छोट-छीन खटकाकेँ नइ मानै छैथ। जेना हरहारा साँपकेँ देखते कियो डेरा कऽ पाछू हटि जाइए आ कियो हाथपर राखि खेलाइए, तहिना छोट-छीन खटकासँ किसनी काकी खेलाइ छैथ। मुदा जँ आँखिसँ नोरक टघार निकललैन तँ जरूर कोनो तेहेन काज रहल हेतैन।

बिच्चेमे विचारकेँ छीनैत बन्ठा काका बजला-

हँ, गम्भीर बात छेलैन।

गम्भीर सुनि सुनैक जिज्ञासा भेल। बजलौं-

की गम्भीर बात छेलैन से तँ कहने हेती किने?”

बन्ठा काका-

पुछलयैन, भौजी दुनू आँखिसँ नोरक दुनू धार बहैए, से की?”

ऐगला बात हमरा पेटेमे रहए तइ बिच्चेमे किसनी भौजी कहली-

बन्ठा बौआ, नवतुरिया सभकेँ बुझल हेतै कि नहि, मुदा अहाँ तँ सोझेमे तहियो छेलौं आ अखनो छी।

कहलयैन-

हँ, से तँ छीहे।

हमर बात- हँ, से तँ छीहे सुनिते किसनी भौजीक विचारक धारकेँ जेना धारा भेटल तहिना धड़धड़ाइत बजली-

सासुर बसना जहिया पाँचे बर्ख भेल छल तहिये स्वामी मरि गेला, से तँ बुझले अछि।

बजलौं-

ताबे हमहूँ नवतुरिया रही। तँए, भाय जे मुइला से तँ बुझल अछि मुदा किए मुइला से नइ बुझल अछि।

किसनी भौजी-

यएह पाबैन छी, अगते शीतलहरी पकैड़ नेने छेलइ। तहूमे अनाड़ी मास[2], माने उतारक मास छल तँए लगले जाड़क मसीम पकड़ा गेल।

कहि किसनी भौजी ठमैक गेली। भौजीकेँ ठमैकते कहलयैन-

हँ, कनी-मनी सालो मन पड़ैए।

साल सुनि किसनी काकीकेँ आरो सह भेटलैन। सहटैत सेरियाम धरतीपर उतैर बजली-

ओही साल छठिए पाबैन दिन मरि गेला। 

बजलौं-

आब नीक जकाँ मन पड़ल। ओइ सालक शीतलहरीमे बहुतो लोक गाममे मरल। अखुनका जकाँ कि लोककेँ नुआ-बिस्तरक सुख छल। जाड़क मास अबिते केते लोक कठुआ-कठुआ मरै छल।

किसनी भौजी बजली-

सासुक मुँह देख अपन जिनगीकेँ तियागि ऐठाम रहलौं। पतिक संग बेटोक मृत्यु भऽ गेल छेलैन। एक तँ खेत-पथार बेसी नहि, तैपर जेहो छल तेकरो दियाद-वाद सभ हड़पैक कोशिश केलक। एहेन स्थितिमे दू सालक बेटाकेँ पोसलौं।

मुड़ी डोलैत हमरा मुहसँ निकलल-

से तँ आँखिक देखल अछि।

तैपर किसनी भौजी बजली-

अनका बेटा जेकाँ बेटाकेँ नीक जकाँ नइ पढ़ा सकलिऐ, तेकर कारण छल जे एक दिस वृद्ध सासु अपन जिनगीसँ हारल-थाकल छेली, दोसर दिस भविसक बेटा। मुदा तैयो सम्हारैत-सम्हारैत बीस बर्खक बनाइये देलिऐ। आँखि-पाँखि भेलै, दस हजारक नोकरी दिल्लीमे करैए।

कहलयैन-

से तँ अहाँ स्त्रीगण रहितो परिवारक गाड़ीक धुरीकेँ, केकैयी जहिना रणभूमिमे दशरथक गाड़ीमे अपन बाँहि लगा समर जीतलैन तहिना गामक नमूना तँ छीहे। तँए नमनीय छीहे।

हमर बात सुनिते किसनी भौजी पसीज गेली। अपन विचारक बहैत तूफानी बेगकेँ रोकैत किसनी भौजी बजली-

बौआ, पाँचसँ दस प्रतिशत परिवार एहेन अछि जेकरा नुआ-बिस्तरक अभाव छइ। मुदा अधिकतर परिवार आब ओहेन अछि जेकरा जरूरतसँ बहुत बेसी कपड़ा-लत्ता छइ। कहुना-कहुना तँ बीस जोड़सँ बेसी कपड़ा अपनो घरमे अछि। तखन ई कोन बहाना भेल जे छठिक खरना-ले ऐँठ साड़ी उपयोग नइ हएत। दू साए रूपैआसँ सौंसे पाबैन हएत, तैठाम ऐ खर्चक माए-बाप के भेल?”

भौजीक मनक बात बुझि गेलौं तँए असथिरसँ हुनका कान लग अपन मुँह लऽ जा फुसफुसा कऽ कहलयैन-

जेहेन अहाँक लूरि-बुधि अछि तेहेन अपने ने जीवन-बसर करब आ जेहेन हुनकर–माने अहाँक पुतोहुकेँ–छैन तेहेन ओ अपने ने जीती। तइले अनेरे मगजमारी केने की फैदा।

जहिना नढ़ियाक बोल नढ़िया, सुग्गाक बोल सुग्गा, हंसक बोल हंस आ कुत्ताक बोल कुत्ता परेख बाजए लगैए तहिना हमर बोल परेख किसनी भौजी कहलैन-

कखन हमर पनचैती करब?”

कहलयैन-

ई पनचैती थोड़े छी, छी तँ ठट्ठा। पाबैनक प्रात पनचैती हएत।

बन्ठा कक्काक बात सुनि कहलयैन-

तखन तँ ओमहरसँ अहाँक जान छुटिये गेल। आब, एकटा प्रश्न हमरो अछि। सूर्यक अर्घ, छठि परमेसरी पाबैन केना कहबैए?”

बन्ठा काका बजला-

तोरो प्रश्नक जवाब विस्तारसँ ओही दिन, माने जइ दिन किसनी भौजीक पनचैती हेतैन, देबह। अखन एतबे बुझह जे आसिनक आश आ कातिकक बासक बीचक ई बीचमानि छी।

शब्द संख्‍या : 2925, तिथि : 01 नवम्बर 2017


 

[1] डोर भेल जे जेना बैजनाथ, जगरनाथ इत्यादि स्थान जेबाक संकल्पित विचार।

[2] तीर्थक घटी-बढ़ीक कारण कोनो साल ऐगला मौसमकेँ पकड़ैमे देरियो होइए आ कोनो साल लगले पकड़ा जाइए।

 


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