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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)२००४-१७.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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जगदीश प्रसाद मण्‍डल- तीन गोट लघु कथा

 

अपन रोपल गाछी भुताहि

रामनवमी दिनक बेरुका उखड़ाहाक पाँच बजेक समए। अनेको लॉडस्‍पीकरसँ सूर भरल गीत-नाद गाममे अनघोल केने...। कोनोसँ अवाज निकलै- रामराजमे सभ बरबैर..!’ तँ कोनोसँ निकलै- दैहिक-दैविक भौतिक ताप रामराजमे नहि रहि पबैत..!’ तँ कोनोसँ अवाज निकलै- रघु कुल रीत सभ दिनसँ आएल, प्राण जाएत तँ जाएत मुदा वचन नहि जाएत..!’

अनघोल वातावरण रहने रघुवीर कक्काक मन सेहो घोर-घोर होइत रहैन।

अपन साठि बर्खक बीतल जिनगी दिस नजैर देलैन। पाछू घुमिते अपन बाल-बोधक जिनगीक मिलल रूप–विद्यार्थी जीवन–होइत अपन चालीस बर्खक समाज सेवाक बीच जखन एलैन तँ मन ओझराए लगलैन। अनेको प्रश्‍न मनमे उठए लगलैन जे जखन अपना जनैत केकरो ने अधला सोचलिऐ आ ने अखनो सोचै छी आ ने केकरो अधला केलिऐ आ ने अखनो करै छिऐ, तखन लोक किए अधला करैपर उताहुल भेल अछि? माने ई जे समाजेक लोक समाजोक लोककेँ आ तैसंग अपनो आ हमरो किए अधले नजरिये देखबो करैए आ करबो करैए..?

रघुवीर कक्काक मनमे एकाएक ठनका जकाँ ठनक जगलैन। जगिते बकार फुटलैन-

अपन रोपल गाछी भुताहि! जइ समाज रूपी गाछीकेँ रोपि समाजरूपक माली बनि सेवा करैत अखन तक आबि रहल छी ओ एना भुताहि किए बनि रहल अछि..!”

रघुवीर कक्काक ठनकल मन रहबे करैन, चोटे पाछू उनैट तकला तँ बुझि पड़लैन जे केतौ-ने-केतौ एहेन रोगक प्रकोप भीतरे-भीतर भेल अछि, जे चाहे बाँकी रूपमे हुअए आकि आने-आन कोनो रोगसँ गरसित भेल हुअए, मुदा भेल तँ जरूर अछि..!

रघुवीर काका जेते विचारकेँ सोझराबए चाहैथ तेते ओझरी लगि-लगि जाइत रहैन। कोनो एहेन उत्तर मनमे जगबे ने करैत रहैन जे पेब मन हल्‍लुक होइतैन।

गुम-सुम भेल रघुवीर काका अपन मनक घोड़ाकेँ चारूदिस दौड़ा-दौड़ा ताकए लगला मुदा आँखि देखबे ने करैन! भाय आँखि देखब ओते असान थोड़े अछि जे लगले देख जाएब..? तही बीच चाह नेने पत्नी पहुँच कहलकैन-

चाह पीब लिअ, पान खा लिअ आ रामनवमी दिन छीहे रामराज देखए चलू।

ओना तैबीच रघुवीर काका चारि-पाँच घोंट चाह पीब नेने छला तँए मनक ओझराएल विचार पतराए लगल छेलैन, ओना सोल्‍हन्नी नइ पतराएल रहैन तँए पत्नीक बात सुनि तामस तँ नइ उठलैन मुदा झड़क जरूर उठलैन। झड़कवाहि उठिते मन नचलैन। नचैत मनमे एलैन जे एक दिस पत्नी कहि रहली अछि- रामनवमीक मेला छी, देखैले चलू। आ दोसर दिस अपन मन रूपी पति[1] लोकक लीला देख-देख घोर-घोर भेल अछि! तैठाम की मेला देखब आ कोन मेला देखब..? मुदा लगले होनि जे पति-पत्नीक बीच तँ एहेन पार्टनरशीप ऐछे जे अदहा-अदहा बँटवारा अछि। अपने किछु छी तैयो अदहे छी आ पत्नियेँ किछु छैथ तँ अदहाक मालिक छथिए...।

रघुवीर काकाकेँ किछु फुरबे ने करैन जे की केने की हएत। थोड़ेकालक पछाइत, चाह जखन अदहापर एलैन–माने अदहा गिलास जखन पीब लेला–तखन एकटा जुकती मनमे औनाइत खसलैन। खसलैन ई जे केतबो अदहाक मालिक पत्नी किए ने होथि मुदा छैथ तँ पत्नियेँ। बहला-फुसला अधिक हिस्‍सा लाइए सकै छी। कक्काक मन कनी सुगबुगेलैन। सुगबुगाइते बजला-

जखन मेला देखए जाएब, तहूमे जुड़शीतलक धुर-खेल तँ छी नहि जे जय-शिव, जय-शिव करैत मेला घुमि लेब। रामनवमी छी। रामक जनम दिनक उछाही जेकरा छै ओ तँ आइ की-की ने लूटाएत मुदा हमरा बुते तँ अहूँकेँ खुशी-खुशी मेला देखौल नइ हएत।

ओना, रघुवीर कक्काक बात सुनि काकीक मन मधुआ गेल छेलैन मुदा तैयो लाड़-झाड़ करैत बजली-

जइ दिनसँ बाप-माइक घर छोड़ि एहेन जरल घर एलौं जे कोनो मनोरथ पूर नइ भेल।

एक तँ पहिनहिसँ रघुवीर कक्काक मन भुतियाएल रहबे करैन, जेकरा समेट समाज-परिवारसँ हटि पत्नी लग पहुँचल छला, तैठाम तेहेन बज्‍जर सन कथा भेटलैन जे मन आरो चुरम-चुर भऽ गेलैन। चुरम-चुर होइत मनकेँ कहुना-कहुना बीछि-बीछि कऽ समटलैन। समैटते मन बिहुसलैन, बिहुसिते बकार फुटलैन-

हम तँ चाह अदहा पीब नेने छी अहाँ पीलौं?”

पतिक बात सुनिते सितियोकाकी सभ लाड़-झाड़ समटैत बजली-

नइ कहाँ पीलौं हेन। हम कि कोनो औझुका लोक छी जे पतिकेँ बिना खुऔनहि-पीऔने अनजल कऽ लेब! अखुनका लोक ने टेस्‍ट करैत अपनो टेस्‍ट करैए जे नीक-बेजाए-क विचार पति करता कि पत्नी। हँ, जैठाम सूर्यक उदय अछि तैठाम पतिक की दशा छैन सेहो तँ सबहक सोझहे अछि।

सितिया काकीक सिताएल विचार सुनि रघुवीरो कक्काक मन सिता गेलैन। सिताइते बजला-

अदहे गिलास चाह पीलौं हेन अखन अदहा बाँकीए अछि तँए जँ आँगनमे कोशलौने होइ तँ जा कऽ पीब लिअ, नहि तँ अदहा रखने छी लीअ पीबू।

पतिक बात सुनि सितिया काकी लजा गेली। लजा ई गेली जे खाइ-पीबैक कारोबारी तँ अपने छी किने तैठाम जँ मौगियाही चालि पकैड़ जे परिवार रहत, माने परिवार रहत दस गोरेक आ सिदहा लगाएब सात गोरेक जे खाइत-पीबैत रस्‍तेमे सठि जाएत! ओइ परिवारमे विवाद हएत की नहि? हेबे करत, जखने खाइक भोजन रस्‍तामे सठत तखने ने किछु गोरे खा कऽ सुखे ढेकार करत आ किछु गोरेकेँ भुख ढकार करए पड़तैन। जखने दुनू ढकार हएत तखने दू रंग हवा चलबे करत, तैठाम के दोखी हएत? हँ! एहेन संभव अछि जे उपार्जनकर्ता भरपूर उपारजन, कोनो कारणे नइ कए पबैत होथि मुदा ई तँ हमरे ने बुझए पड़त। भरि थारी नहि, हिस्‍से भरि। हँ! एहनो संभव ऐछे जे दस गोरेक भोज्‍य-विन्‍यासमे, वस्‍तुक वाहुल्‍य देख, दस गोरेक जगह पनरह गोरेक बना रस्‍ता-पेरापर फेक गन्‍दा करबै सेहो केहेन हएत? मन कहलकैन- तखन? तखन तँ यएह ने हएत जे जहिना छबे-छबे खेत बढ़ैए, कौरे-कौरे पेट बढ़ैए तहिना रसे-रसे बुधियो-बेवहार ने सिखैत-सिखैत सीखि चलैए।

सितिया काकी अपन लड़-झड़क चालि-प्रकृति पकैड़ बजली-

जहिना हमर अदहा गिलास तहिना ने अहूँक अदहा भेल, तैठाम अपन-अपन दायित्‍व तँ निमाहए पड़त किने।

पत्नीक बात सुनिते रघुवीर काका बजला-

शुभ काजमे अपने ने देरी करै छी, दसटा हौर्नक अवाज जे कानक ठेकीकेँ केतबो ठेलत तइसँ की हेतइ। नीक जकाँ बनि-ठनि कऽ मेला देखए चलू, अहीं संगे हमहूँ जाएब।

अहीं संगे हमहूँ जाएब सुनि माने पतिक बिसवासू विचार सुनि सितिया काकी विस्‍मित हुअ लगली।

पत्नीकेँ विस्‍मित होइत देख रघुवीर काका बजला-

तेते ने लॉडस्‍पीकरक अवाज आबि रहल अछि जे अहाँकेँ सुनैमे रामनौमीए-टा अबैए मुदा चैती नवरात्राक[2] नौमी सेहो छी। तँए दुनूक बीच छी, कोन मेला देखए जाएब से पहिने विचारि लेब तखन ने घरसँ डेग उठाएब।

रघुवीर कक्काक बात सुनि सितिया काकी औनेली नहि, ऐ दुआरे नै औनेली जे भगवतीक आराधना–नवमीक मेला–आ रामनवमीक मेला–तहूमे केते सालक पछातिक राम जन्‍मोत्‍सव छी–दुनूमे अन्‍तर तँ अछिए। ओना, ओइ दिस सितिया काकीक नजैर नइ गेलैन। रस्‍तेमे अँटैक रामनवमीए दिस बढ़ि गेलैन।

पतिक विचारकेँ सोल्‍होअना अनदेखी करी, सेहो केहेन हएत। सितिया काकीक मन उमुर-घुमुर करए लगलैन। कोनो रस्‍ते ने देखैथ जे आगू की केने दुनू बेकती मिलानसँ मेला देखए जइतैथ। मुदा लगले जुकती फुरलैन। जुकती ई जे रामनौमियो मेला छी आ नवरात्रियोक मेला छी, मुदा छी तँ दूनू मेले, तँए किए ने दुनू मीलि मेल-मिलान-मिलाप करैत मेला जाइ...।

सितिया काकीक मन मानि गेलैन जे पतियेपर किए ने जहिना सीता रामकेँ माता-पिता बोन जाइले छोड़ि देलखिन तहिना हमहूँ आश्रित भऽ मेला देखए जाय।

ओना, सितिया काकी धड़फड़मे अपने भरिक विचार कऽ लेली, जइसँ नजैरमे ई एबे ने केलैन जे नारियोक रूप अरूप अछि। केतौ नारी अपन इज्‍जत-आवरू-ले अपने बलिक बकरा बनि रक्तसँ धरती सींचै छैथ तँ केतौ दर्जन भरि बाल-बच्‍चावाली दूधमुहाँ बच्‍चाकेँ पतिक सिर मेढ़ि दोसर घरक बरक पूजा नइ करै छैथ सेहो नहियेँ कहल जा सकैए।

सितिया काकी नजैर उठा रघुवीर काकापर देलैन, मुदा बजैक जे विचार रहैन ओ मनेमे घोंटाइत रहलैन जे रघुवीर काका बुझि गेलखिन। मुस्‍कुराइत रघुवीर काका बजला-

जखन मेला जाइक विचार मनमे उठल, तखन नहियोँ जाएब मनकेँ मारब हएत किने। से नहि तँ झब-दे चाह पीब बनि-ठनि कऽ आँगनसँ तैयार भेल आउ।

पतिक बात सुनि सितिया काकी ठमकली। ने आँगन दिस डेग उठैन आ ने मेला जाइ दिस विचार उठैन। मेला तँ मेला छी दुनियाँक मेला। जे दुनियाँक कोण-कोणमे पसरल अछि। अयोध्‍या जे रामक जन्‍मभूमि छिऐन, ओइठामक सोहान आ जनकपुरक सोहान, जे सासुर छिऐन, दुनू एक्केरंग थोड़े हएत। तैसंग गाम-गाम आ परिवार-परिवारक आराध्‍य देव रहने गाम-परिवारक संग बेकतीगत सेहो पूज्‍य छथिए, तैठाम केते दूर तक देखल जाए ई तँ नजैर-नजैरिक खेल छी किने?

ठमकल पत्नीक रूप देख रघुवीर कक्काक मनमे परिवारक ओइ अभिभावक (रक्षक) जकाँ विचार उठलैन जिनका लेल एक दिस घर-परिवारक गाड़ीकेँ आगू ससरब कठिन अछि आ दोसर दिस पाछूसँ कोनो सहारो नहियेँ अछि, माने हाथ सोल्‍हन्नी खाली...। तैठाम पत्नीक रूप बदैल सियाही सन सियाह बनियेँ रहल छेलैन, तँए विचारकेँ आगू ठेलैत रघुवीर काका बजला-

मेला देखए नइ जाएब तँ नहि जाउ, मुदा दुनू परानी एकठाम रहैत जे चुपा-चुपी केने छी से हमरा नीक नहि लगैए।

जहिना कोनो पशु आँखिक इशारा मात्र पेब फुरफुरा उठैए आ कोनो अँड़पेन देला पछाइतो नहि उठए चाहैए तेना सितिया काकीकेँ नहि भेलैन, ओ अपनो बले उठैत बजली-

मेला देखी वा नइ देखी, जहिना छी तहिना तैयार भऽ टहैल आबए चलू।

पत्नीक विचार सुनि रघुवीर कक्काक मनमे खुशी उपकलैन- जे पत्नियेँ ने लक्ष्‍मियो आ लक्ष्‍मीपात्रो छैथ जे अपन विभव देख अपन शक्ति अजमा घरसँ बाहर दुनियाँक मेला देखए चाहै छैथ। बजला-

बड़बढ़ियाँ कहलौं। मुदा गामो तँ गामे छी किने, कोनो कि शहर-बजार छी जे पतियानी लगा बनत। जेकरा जेतए अँटावेश होइ छै से तेतए बसि जाइए तँए शहर जकाँ एकपेरिया तँ नहि अछि, अछि तँ बहुपेरिया तखन कोन रस्‍ते जाएब शुरू करब, ई विचार तँ अखने ने कऽ लेब।

ओना सितिया काकीक नजैर (मन) अखन धरि आन-आनकेँ जे देखने छेली तेही हिसाबक छेलैन, तँए आगू दिस तकैक ने खगते पड़लैन आ ने तकबे केलीह। जखन खगते नहि तखन कियो ओरियाने कथीक करत। अनेरे दुनियाँक बोनमे जे असगरे वौआएत, से कथीले? मुदा रघुवीर कक्काक विचार ठनका जकाँ सितिया काकीक मनमे खसले छेलैन। तैपर तेहाला (तेसर) कियो अछियो तँ नहियेँ जे कनी-मनी टपो-टोइया आकि संगो-साथ दइत। असगरमे दुसगर होइते छइ। मुदा लगले मन कलशलैन। कलैशते चैती गाछक नवटुस्‍सा जकाँ मन काकीक टुसियेलैन, टुसियाइते बजली-

जखन दुनू परानी अदहा-अदहा घरसँ बाहर धरिक दुनियाँ बाँटि नेने छी तखन अपन विचारक[3] विचार[4] अपने ने पहिने ओइ मुहसँ देबै जइ मुहसँ विचार निकलल, पछाइत ने हमर पार औत?”

सितिया काकीक पत्नी रूपकेँ पति–रघुवीरकाका–देखलैन। देखते मन गवाही देलकैन जे अपन विचार पत्नी पूर केने बजली अछि, ओकरा पुराएब तँ अपने दायित्‍व छी किने। मुदा मुहसँ तँ वएह ने निकालब जे ओकर[5] मुँह केमहर छइ? जाबे मुँह नइ देखब ताबे मुँह मिलानी केना करब आकि मुँह मिलान हएत केना..?

जहिना सम्‍पन्न फड़ल आमक गाछपर अनठेकानियोँ गोला फेकलासँ गोटे पाकल आम खसिये पड़ैए, मुदा की ओकरा ठेकानल कहब आकि ओ बेठेकानले भेल। मुदा बेठेकानलो तँ ठेकानल भाइये गेल जे तोड़ि के अनलक।

ओना  ठेकानल तँ ओ ने भेल जे ठेकना कऽ–माने लक्ष्‍य करि कऽ–गोला ओइ आमपर फेकलौं जइ आमपर मन गड़ल छल। गाछमे तँ सोहरी लागल आम ऐछे मुदा जेते अछि तेते खगतो नहियेँ ने अछि। आकि सभटा हमरे-ले अछि जे गोट-गोट कऽ तोड़ि लेब..! रघुवीर काका बजला-

जहिना देश सेवा, मानव सेवा देश भक्‍ति छी तहिना भक्‍तिक बीच अभक्‍ति आ सभक्‍ति केहेन अछि ओ बिना बुझने भक्‍तियो केना करब..?”

ओना अपना जनैत रघुवीर काका सोझराएले बात बजला मुदा सितिया काकी नीक जकाँ नहि बुझि पेली। ने ई बुझि पेली जे पतिक विचारक आगू अपने अदहे छी। तँए पिपाशु पक्षी जकाँ सितिया काकी रघुवीर काका दिस मुँहक दोसर बोल सुनैले आँखि उठौली।

मने-मन रघुवीर काका सितिया काकीक विचारकेँ तारि रहल छला। तारिते भारैत बजला-

जहिना दुनियाँक बोनमे सभ हेराएल अछि तहिना अपनो दुनू परानी तँ छीहे, तँए मेला देखैसँ पहिने मेलाक रस्‍ताक प्रण मनमे रोपए पड़त तखन ने मेलाक रस पीब, नहि तँ लोकेक भीड़ देखैत चलि आएब!”

ओना अखन धरि सितिया काकी मेलाक वएह रूप बुझै छेली, मुदा पतिक अनमोल विचार सुनि थकमकेली। मन कहलकैन अपने की बुझि रहल छी आ पतिक मुहेँ की सुनि रहल छी..! ओना सितिया काकी जिद्दयाहि स्‍त्रीगणक श्रेणीमे अबिते छैथ मुदा ने जिद्द धरैक विचार सक्कत छैन आ ने जिद्द पकड़ैक मन मजगूत छैन। मुदा आइ तँ रामनवमीक मेलाक संग नवरात्राक नवमी मेला सेहो छी..! सितिया काकी बजली-

एना जे झाँपल-तोपल श्‍लोक बचै छी तइसँ नइ हएत, हमरा मुरकुट्टियेमे कहू जइसँ मन मानि जाए।

पत्नीक सिनेह भरल पिपाशु मनकेँ जँ रघुवीर काका नहि थतमारि सकैथ, ई केहेन होएत। तहूमे ओ पत्नी जे जहियासँ माता-पितासँ उत्‍सर्जित भऽ हाथ पकड़ने एलैन, ओ केना हाथ पकड़ने आगूओ चलतैन ई तँ विचारणीय प्रश्‍न रघुवीर कक्काक मनमे रहबे करैन...।

जहिना कोनो विचार चितासन्न भेला पछातिये नव विचारक संग नव जीवन दइए तहिना काकाकेँ भेलैन। ओना जहिना सितिया काकी मने-मन विचारकेँ घोंटि रहल छेली तहिना मने-मन घोंटैत रघुवीरो काका अपन जिनगी पढ़ए लगला।

चालीस बर्ख पूर्वसँ, जइ गाम-समाजमे साइयो रंगक छुआ-छूत पसरल अछि–माने जातियेटा मे नहि आनो-आनोमेतँए ओइ समाजमे एकरूपता आनब तँ ओइ समाजक प्रमुख क्रिया भेबे कएल। जँ से नहि भेल तँ सदिकाल कखनो किछु-ले तँ कखनो किछु-ले हल्‍ला-फसाद, झगड़ा-झंझट होइते रहत आ समाजो टुटिते रहत। तँए जाबे कोनो बेवहारिक बन्‍धन–माने बेवहारिक चलैन–केँ एकसूत्रमे नहि आनि चलब ताबे समाजमे एकसूत्रताक जड़ि केना जड़ियाएत..?

यएह सभ विचार मथन करैत रघुवीर काका समाजक बीच अपन विचार रखलैन जे जखन सभ मनुखे छी तखन सभ एकठाम बैस किए ने खाएब-पीब। अनेरे, छुत-अछुतक बीच बँटल छी..!

रघुवीर कक्काक विचार संजीवनी जकाँ समाजकेँ जीवनदात्री बुझि पड़लैन, समाजक सभकेँ विचार नीक लगलैन। ओना रंग-रंगक अरचन बीचमे उठैक संभावना सेहो बुझिये पड़लैन, जइसँ विचारक संग बाटो टुटैक संभावना अछिए। मुदा गामक अधिकांश परिवारक एकमुँहरी विचार भऽ गेलैन।

समाजो तँ समुद्रे जकाँ अछि। जहिना समुद्रमे हरण, मरण आ जरन सदिकाल चलिते रहैए तहिना समाजोमे तँ होइते अछि। सएह भेल। एक गोरेक वृद्ध बाबाक मृत्‍यु भेलैन। जहिना सभ एकठाम बैस खाइ-पीबैक विचार केने छला तहिना सभ लोरिक बरियात जकाँ जरबैयो-ले गेला। जइसँ सबहक भेँट सभकेँ असमसान घाटमे भेबे केलैन। असमसाने घाटपर ने असमानक मन्‍दिर सेहो अछि। जे कखनो बरफवारी करैए तँ कखनो जलवारी आ कखनो अगवारियो तँ करिते अछि...। ओना जइ रोगक निदानक बाट पकैड़ समाजक कर्णधार उठि कऽ ठाढ़ हुअ चाहै छला ओइ दिस ओइसँ पहिने–माने वृद्धक मृत्‍युक पूर्व–सेहो कनी-कनी डेग उठा नेने छला जइसँ समाजमे आड़िक माने बन्‍धनक टुट-फाट सेहो शुरू भऽ गेल छल। जइसँ जाति-जातिक बीच विचार संघर्षक संग बेवहारमे सेहो उतैर रहल छल। मुदा आगि लगलेपर ने कुकराहा सेहो उड़ैए जे दोस्‍त-दुश्‍मनक भेद खतम करैत केकरो घरमे लगि जाइए। सेहो भाइये रहल छल। जइसँ समाजक कोढ़-करेज खोखैर खाइबला बेवहार जरिये रहल छल।

ओना समाजमे समाजिक बन्‍धन हौउ आकि देशमे देशक बन्‍धन, मुदा सभ–समाजिक संगठनो आ राजनीतिक दलो–मंचपर एकरा अधला कहिते छैथ, भलेँ परोछमे एकरे बले–माने छुआ-छुतेक बले–नचबो-गेबो किए ने करैत होथि।

ओना जहिना समाजो तहिना राजनीतिक दल सेहो अछिए। जे कियो हाथीक नाँगैर पकैड़ हाथीक परिचय दइ छैथ तँ कियो हाथीक सूढ़ पकैड़ आ कियो हाथीक टाँग पकैड़, मुदा सभकेँ तँ देखैक अपन-अपन दाबी छैन्‍हे जे असल हाथीक परिचय हमरे अछि। भलेँ सभ अपन-अपन दाबी अपने-अपने घरमे किए ने रखैत होथि मुदा समस्‍यो तँ समस्‍या छी। जहिना समाजकेँ समाजक मंचपर आबि संकल्‍पक संग अंगीकार करैत बेवहारिक धरातलपर आबए पड़तैन तहिना राजनीतिक दलकेँ समाजिक मंचपर चढ़ि समाजकेँ राजनीतीकरण करैक संकल्‍पक संग जमीनी सच्‍चाइकेँ प्रतिपादित करए पड़तैन। जा से नइ हएत ता दिल्‍लीक लड्डु बनैत रहत, रामनवमीक संग नवरात्राक नवमीक मेला अबैत-जाइत रहत।

रघुवीर कक्काक मनमे सेहो नव विचार जगलैन जइसँ मन मुस्‍कियेलैन। मुस्‍कियाइत मन रघुवीर कक्काक विचारकेँ टुस्‍कियौलकैन। टुस्‍कियाइते विचार चैती कलश जकाँ भकरार हुअ लगलैन। भकरार होइते मुहसँ निकललैन-

चलू जे राम से राम, रस्‍ते-रस्‍ते चलबो करब आ गपो-सप्‍प करब, भलेँ मेला देखी आकि नहि देखी।

रघुवीर कक्काक विचारकेँ केते दूर तक सितिया काकीक सिताएल मन बुझलकैन से तँ ओ अपने जानैथ आ जानैथ सुनयना दादी मुदा रघुवीर कक्काक मनमे बिसवास जगबे केलैन। विस्‍मित होइत सितिया काकीकेँ जहिना माइयक गोदमे बैसल बच्‍चा अपन जिनगीक सोग-पीड़ा बिसैर चैनक साँस लइत अरामसँ जीवन मुक्‍त भऽ सुतैए तहिना पतिक खलियाएल गोद देख मनमे जगलैन।

जगिते मनमे उठलैन- चालीस बर्खसँ आइ माने पूबसँ पच्‍छिम, की देख रहल छी? की अपन रोपल गाछी भुताहि भऽ गेल..?

ओना, टुटैत-बँटैत समाजकेँ देख जेते चिन्‍तित रघुवीर काकाकेँ हेबा चाहिऐन से नइ छैथ, मुदा चिन्‍ता नइ छैन सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। कम चिन्‍तित हेबाक कारण छैन जे जेतए-जेतए एहेन बान्‍हक बन्‍धन अछि तइ बन्‍धनकेँ या तँ तोड़ि लेलैन वा छोड़ि-छाड़ि देलखिन। जइसँ हिमालयक तराइक सघन बोनमे जहिना ने केतौ रस्‍ता रहै छै आ ने बिनु रस्‍तेक कोनो जगह खाली छै, गाछक बोन छै अपन-अपन अँगना-घर सभ बनौनहि अछि।

सूर्यास्‍त होइते एक दिस घड़ी-घन्‍टक अवाज भेल तँ दोसर दिस आरती गायन। सितिया काकी बजली-

गपे-सप्‍पमे रहि गेलौं, चाहक बेर सेहो भेल। अहूँ तैयार हौउ आ हमहूँ चाह बनौने अबै छी।

पत्नीक पत्नीत्व देख रघुवीर कक्काक मनमे सामक समत्‍व विचार जगलैन मुदा बजला किछु ने..!

शब्‍द संख्‍या : 2623, तिथि : 7 अप्रैल 2017

बेटीक पैरुख लघु कथा संग्रहसँ...। 

 

सनेस

लक्ष्‍मण रेखाक बीच सीता नहाँति बैसल सनक काका प्रेम रस पीब प्रेमीक संग अधरुपिया चालि पकैड़‍ अधखिलू फूलक गमकमे गमियेला, गमियाइते सौंझुका सिंगहार जकाँ मुँहक मुस्‍की महमहेलैन‍- अजीब ईहो दुनियाँ अछि। ने सतीए अछि आ ने वेश्‍ये अछि। बनौनिहारकेँ धन्‍यवाद दी जे एक दिस विवेकक विन्‍यास बाँटि पाँतिए-पाँति, पाते-पात परैस देलैन‍ तँ दोसर दिस दिन-राति बना आगूमे ठाढ़ कऽ देलैन‍। धर्मक संग पाप, सुकर्मक संग कुकर्म, विद्वानक संग मुरुख आ पुरुखक संग मौगीक जोड़ा लगा-लगा पतियानी बीच पात्रेक पत्ते-पत्ते सेहो परैस देलैन‍..!

जेते आगू दिस सनक काका देखै छला ओते छगुन्‍ता लगै छेलैन‍। एक दिस पानिक ठोप चन्‍द्रोदक कहबैत, तँ दोसर दिस असीम अथाह क्षीर सागर, मुदा चन्‍द्रोदको तँ केतौ दूधक तँ केतौ पानिक तँ केतौ दूधपनिया सेहो होइते अछि। कहू जे ई केहेन दुनियाँक खेल छी जे कियो असकरेमे सोल्‍हो ताल धऽ नचबो करैए, गेबो करैए आ देखबो करैए, आ कियो भीड़-भाड़ तकैत रहैए जे जेते देख‍निहार रहत तेते नीक नाच हएत।

दुनियाँक चक्कर-भक्कर देख‍ सनक कक्काक मन तरे-तर उदास भेल जाइत रहैन। जहिना घुमती बरियाती रंग-रंगक बात करैत तहिना मनमे उठैत रहैन। अनेरे मनुख बनि जन्‍म लेलौं। मनुखपना जखन एबे ने कएल तखन मनुख किए भेलौं? मुदा पना औत केना? बाँसक पना ओधि होइत अबै छै, केरा-मोथी-अड़िकोच इत्‍यादिमे सेहो ओहिना अबै छै, मुदा मनुखमे से कहाँ भेल? की बिनु पनेक मनुख ठाढ़ हएत? ठाढ़ तँ हएत मुदा शुद्ध ठाढ़ हएत आकि अशुद्ध? जखन जानवरोमे फेंट-फाँट होइते छै, तखन अपन हिस्‍सा मनुखे किए छोड़ि देत..?

थोड़ेकालक पछाइत सनक कक्काक मन कहलकैन- ओह! अनेरे दुनियाँक महजालमे फँसि मरैले छड़पटाइ छी। दुनियाँमे के एहेन अछि जे सुख-सागरमे बैस आनन्‍द नहि चाहैए, मुदा दुनियोँ तँ दुनियेँ छी जइमे रंग-बिरंगक सागरो सभ बसल अछि। क्षीर सागर, सुख सागर, लाल सागर, कारी सागर इत्‍यादि अनेक सागर...।

सनक कक्काक मन ठमकलैन‍। ठमैकते मनमे उठलैन- जीबैतमे जेतए वौआइ मुदा समाधि तँ ठौरपर लेब। जँ से नहि तँ हिटलर जकाँ थूकक धारमे भँसियाइत रहब!

उदास मन, बिरहाइत बगए सनक कक्काक रहैन। तखने भातीज पोलीथिनक झोरामे अदहा किलो अंगूर आ किलो भरि सेब आगूमे रखि देलकैन।

झोरा आगूमे देखते ठहाका मारि सनक काका हँसला। कक्काक ठहाकाक चोट मनमोहनकेँ नइ लगलैन‍, जेना आमक गाछपर गोला फेकते कोनो आमकेँ खसने गोलवाहकेँ जेहेन खुशी होइत सएह खुशी मनमोहनकेँ भेल। मुदा निशान साधल आमक महत किछु आरो होइते अछि। मनमोहन बाजल-

काका, ई अहींक सनेस छी।

सनेस सुनि सनक काका चौंकला जे सनेस कहि की कहैए! पुछलखिन-

केतक सनेस छी?”

कश्‍मीरी सेब छी आ पूनाक चमन अंगूर।

मनमोहनक बातसँ सनक कक्काक मन तरे-तर सनकए लगलैन। छौड़ा की बुझि मजाक करए आएल। जहिना बाप एकोटा कुकर्म नै छोड़लकै तही उतारक अपनो भेल जा रहल अछि आ सेब-अंगूर देखबए आएल अछि!

मुदा तामसकेँ तरेमे दाबि काका बजला-

हौ मनमोहन, एक दिनक भोजे की आ एक दिनक राजे की। बच्‍चा सभकेँ दऽ दिहक। अपने अनरनेबा आ लताम दुइर होइए। जेते तोहर लेब तेते अपन दुइरे हएत। अच्‍छा, एकर भाउ की छइ?”

लगले सुरे मनमोहन पुछि देलकैन-

एकर भाउ बुझैक कोन जरूरत‍‍ पड़ि गेल?”

मने-मन सनक काका सोचलैन‍ जे छौड़ा नमहर छिनार-लूटार जकाँ बुझि पड़ैए। बजला-

बौआ, आब तँ सहजे‍ चल-चलौए छी मुदा अपनो देश-कोसक हाल बुझब कोनो अधला थोड़े हएत?”

एक तँ सनक कक्काक बदनामी शुरूहेसँ रहलैन‍ जे घरोक लोक सनकाहे कहै छैन। केना नै कहतैन, सभ अपन-अपन परिवारक बाल-बच्‍चा-ले करैए आ सनक काका से बुझबे ने करै छैथ, माने अपन परिवार आ दोसर परिवारमे कोनो भेद नहि। जहिना अपन परिवार तहिना दोसराक।

अखन धरि मनमोहन यएह बुझैत जे परिवारोसँ काका बाड़ले-बेरौल छैथ तँए सभ चीजक दुख-तकलीफ होइते हेतैन। मुदा गप-सप्‍पसँ मनमोहनक नजैर करुआए लगल।

मनमोहनक रूखि देख सनक काका बुझैक कोशिश करए लगला, कारण की छइ। मुदा मनमे मिसियो भरि सन्‍देह अपनापर नै भेलैन‍। मन गवाही दैते रहलैन जे निनानबे प्रतिशत राक्षसक देश लंकामे विभीषण केना भक्‍ति‍-भजन करैत जिनगी गुदस करै छला। केहनो सघन बोन सुकाठ-कुकाठक किए ने हौउ मुदा आमक गाछ आम आ लतामक गाछ लताम फड़ब बिसैर जाएत? दोहरा कऽ मनमोहनकेँ पुछलखिन-

हौ बौआ, जहिना एक्के गोरे डाक्‍टरो आ इंजीनियरो नै भऽ सकैए किएक तँ दुनूक दिशा अलग-अलग छइ। मुदा सेबक जगह जँ अपनासँ नीक लताम आ अंगूरक जगह अनरनेबा नेने अबितह तँ फले नहि बीओ रोपि देतिऐ।

कक्काक प्रश्‍न सुनि मनमोहन उछलैत बाजल-

काका, दुनियाँ आब घर-आँगन बनल जा रहल अछि आ अहाँ अपन पुश्‍तैनी विचार रखनहि रहब।

मनमोहनक साँसक गरमीकेँ अंकैत सनक कक्काक सनकी तेज नै भेलैन‍। मिरमिराइत बजला-

बौआ, जँ दुनियाँ घर-आँगन बनि गेल तँ ओ नीक बात, मुदा ई तँ नीक नहि जे कियो नौड़ी-छौड़ी बना भाषा-साहित्‍य-संस्‍कृतिकेँ ओझरा मटिया मेट कऽ दिअए। से कनी बुझा दाए जे की भऽ रहल छइ?”

गुम्‍हरैत मनमोहन कहलकैन-

काका, दुनियाँ आब नव पीढ़ीक अछि तँए केतबो दुसबै ओ चढ़बे करत।

मनमोहनक प्रश्‍नसँ सनक कक्काक सनकी पाछू मुहेँ ससरलैन‍। पछुआ पकैड़‍ बजला-

बौआ, जर्मनी-जापानी आ अंग्रेजी शब्‍द ऐ लेल चढ़-चढ़ौ भऽ गेल जे ओकर विकास अगुआ कऽ मशीनमे पहुँच‍‍ गेल आ मशीनक नाओं रखि-रखि अहाँक घर-अँगनामे छिड़िया देलक! आ अहाँ ऋृषि‍-मुनिक राज मिथिला कहि-कहि ओतए पहुँच‍‍ गेलौं जे ओ सभ (ऋृषि-मुनि) की कहलैन‍ तेकर डि‍क्‍शनरिये चोरा लेत। तखन अहाँ बुझबै जे केहेन नव युगक नव लोक बनि गेलौं?”

सनक कक्काक बात सुनि मनमोहन ठमकल तँ मुदा पाछू हटैले तैयार नहि भेल। बाजल-

काका, बजारमे अखन एक-सँ-एक खाइयो-पीबैक समान आ फलो-फलहरी तेहेन आबि गेल अछि जे अपना ऐठामक फल-फलहरीकेँ के पुछत?”

मनमोहनक प्रश्‍न सुनि सनक कक्काक सनकी आगू मुहेँ ससरलैन, बजला-

बौआ, कोनो देश-कोसक विकासमे ओइठामक माटि, ओइठामक पानि, हवा इत्‍यादि जेकरा पंचभूत कहै छहक, मुख्‍य तत्व भेल। अनुकूल गतिए सृष्‍टि‍ चलैए। अपना ऐठामक लताम आकि कोनो आने फल जे अछि ओकरा ऐठामक काल-क्रि‍याक गतिए जे जरूरी छल ओ प्रकृति पैदा केलक। अपना ऐठाम एकरे अभाव भेल जे पहाड़ी फलकेँ मैदानी क्षेत्रमे नीक मानल जाइए।

अपनाकेँ निरुत्तर होइत देख मनमोहन मैदानसँ हटैक विचार करए लगल। मुदा सेब-अंगुरक पोलिथीन बीचक सीमा बनल रहलै। रूमाल चोर जकाँ सीमा पहिने के टपत..!

पाछू हटैत मनमोहन बाजल-

बड़ आशा लगा अनने छेलौं जे काकाकेँ नीक फल खुएबैन।

मनमोहनक बात सुनि सनक काका तारतममे पड़ि गेला जे अखन धरि जे हम बुझै छेलिऐ तइसँ भिन्न ने तँ मनमोहन अछि। आशाक दोहाइ लगा बजैए जे आशा लगा अनने छेलौं आशा तँ सभकेँ अपन-अपन होइ छइ। सबहक देहेटा अलग-अलग नहि, मनक उड़ान सेहो होइ छइ। पिजरामे बन्न सुग्‍गोकेँ पोसनिहार सिखबैए जे आत्‍मा राम पढ़़ू- चित्रकूट के घाटपर भए सन्‍तन के भीड़। तुलसी दास चानन रगड़े, तिलक करे रघुवीर...।मुदा सेहो तँ नहि बुझि पड़ैए। तखन? ओ तँ पुछनहि पता चलत। पुछलखिन-

हौ बौआ, जहिना घरक लोक हमरा बताह कहैए तहिना ने ओकरो सभकेँ सनकपनीए फल खुएबै।

कहि मने-मन सनक काका सोचए लगला। भाँग पीब कियो बाजि चुकल छैथ आकि असथिर मने सोचि कहने छैथ जे जेहेन खाइ अन्न तेहेन बने मन!’ मुदा अहू छौड़ाकेँ तँ छिछा-बीछा नीक नहियेँ छइ। भरि दिन देखै छिऐ जे ऐठामसँ ओइठाम, ओइठामसँ ऐठाम ढहनाइते रहैए। तैपरसँ दिन-दिन आगूए मुहेँ ससैर‍ रहल अछि, से केना? बहुरुपिया ने तँ छी? सलाइ रिंच जकाँ सभ नट पकड़ैबला..!

तही बीच मनमोहन बाजल-

काका, अहाँ अपने हाथे बाँटि दियौ।

मनमोहनक बात सुनि सनक काका ठमैक गेला। जहिना कोनो टपारि कुदैले दू डेग पाछू हटि दौग कऽ टपल जाइत तहिना काका पाछूसँ आगू बढ़ि बजला-

हौ बौआ, बतरसिया हाथ भऽ गेल, ओहुना हरिदम थरथराइते रहैए, तैपर कोनो काज करैकाल तँ आरो बेसी थरथराए लगैए। अपन चीज जे थोड़-थाड़ छिड़ियाइयो गेल तँ नहि कोनो, मुदा तोहर जे एकोटा अंगुर खसि पड़त तँ तोरे मन की कहतह। यएह ने जे सनकाहक ठेकान कोन। तँए हमरा चलैत तोरा मनकेँ ठेँस लागह से नीक नहि बुझै छी।

कक्काक बात सुनि मनमोहन बाजल-

तँ की काका घुमा कऽ लऽ जाइ?”

अनेरे ओझरीमे ओझराएल अपनाकेँ देख सनक काका, ठाँहि-पठाँहि बजला-

ई तोहर खुशी छिअ जे घुमा कऽ घरपर लऽ जा वा दोकानदारेकेँ घुमा दहक वा रस्‍ता-पेरामे कोनो धिए-पुतेकेँ दऽ दहक। हम किछु ने कहबह। एते दिनक पछाइत‍‍‍ दरबज्‍जापर एलह सएह खुशी अछि।

सनक काकक बात सुनि जहिना जाड़सँ कठुआ कियो देह-हाथ तानि अचेत भऽ जाइए तहिना मनमोहनकेँ हुअ लगल।

 

शब्‍द संख्‍या : 1285

उलबा चाउर कथा संग्रहक तेसर संस्‍करणसँ

 

जन्‍मतिथि

तीस बर्ख नोकरी केला उत्तर रविकान्‍त आइ.जी. पदसँ सेवा निवृत्ति‍ भेला। जखन कि रविशंकर आइ.जी.सँ आगू बढ़ि डी.जी.पी.क पदभार सम्‍हारलैन‍। साल भरि ऐ पदपर रहता, ओते नोकरीक अवधि बँचल छैन। रविशंकरकेँ डी.जी.पी.क पदभार सम्‍हारला जखन तीन दिन भऽ गेल तखन रविकान्‍तकेँ मन पड़लैन‍ जे मीतकेँ बधाइ कहाँ देलिऐन। कारणो भेल जे पनरह दिन पहिनहिसँ जे कार्यभार दिअ लगलैन ओ नोकरीक अन्‍ति‍म दिन धरि नै फरिछौट भऽ सकलैन‍। समयक अभावमे रविकान्‍तकेँ मनमे एलैन जे मोबाइलेसँ बधाइ दऽ दिऐन। मुदा एक्के काजक तँ भिन्न-भिन्न जुइत होइए। जुइतिक अनुकूले ने काजो अनुकूल हए‍त, तँए मोबाइलसँ बधाइ देब उचित नै बुझि पड़लैन‍। ओना तत्काल जानकारीक रूपमे वधाइ दैत समए लेल जा सकै छल। मुदा से नै भेलैन‍। चाहक कप टेबुलपर रखि दहिना बाँहि उठबैत पत्नी‍केँ कहलखिन-

की ऐ बाँहिक शक्ति‍ क्षीण भऽ गेल जे काज नै कऽ सकैए। मुदा..!”

रश्‍मि‍ अपना धुनिमे छेली। ओना एक्के टेबुलपर बैस चाहो पीबै छेली आ मेद-मेदीन जकाँ मुँहमिलानीमे गपो-सप्‍प करै छेली आ अपने धुनिमे मनो वौआइ छेलैन‍। एकठाम बैस‍‍ चाह पीबितो मन दुनूक दू-दिसिया छेलैन‍। रश्‍मि‍क मनमे रविशंकरक पत्नी किरण नचैत रहैन। जिनगी भरि सखी-बहीनपा जकाँ रहलौं मुदा आइ ओ रानीसँ महरानी बनि गेली आ..? की हम ओइ बटोहिनी सदृश तँ ने भऽ गेलौं जेकरा सभ किछु छीनि घरसँ निकालि देल जाइ छइ?

जहिना कोनो नीनभेर बच्‍चा माइक उठौलापर चहाइत उठैत बेसुधिमे बजैत तहिना पतिक प्रश्‍नक उत्तर रश्‍मि‍ देलखिन-

ऐ बाँहिक शक्‍ति ओतबेकाल रहै छै जेतेकाल शान चढ़ाएल हथियार ओकरा हाथमे रहै छइ। नहि तँ प्राणशक्‍ति निकलला उत्तर शरीर जहिना माटि बनि जाइ छै तहिना बनि कऽ रहि जाइए। हाथसँ हथियार हटिते जिनगी हहरए लगै छइ।

तैबीच चाहक कप उठा चुस्‍की लैत रविकान्‍त बजला-

बच्‍चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। खेनाइ-पीनाइ, खेलनाइ-धुपनाइ, घुमनाइ-फीरनाइ सभ संगे रहल। कहाँ कहियो मनमे उठल जे दुनू मीतमे कोनो दूरी अछि। अपनाकेँ के कहए जे घरो-परिवार आ सरो-समाज कहाँ कहियो बुझलैन‍ दुनूमे कनियोँ अन्‍तर छै, मुदा आइ..?”

मुदा आइ की?”

यएह जे आइ बहुत दूरी बुझि पड़ि रहल अछि। बुझि पड़ैए जेना अकास-पतालक अन्‍तर भऽ गेल अछि। कोन मुँह लऽ कऽ आगू जाएब, से किछु फुरिये ने रहल अछि।

तखन?”

सएह ने मन असथिर नै भऽ रहल अछि। जिनगी भरिक संगीकेँ ऐहेन शुभ अवसरपर केना नै बधाइ दिऐन। मुदा एते दिन बरबैरक विचार छल आब ओ थोड़े रहत। कहाँ ओ सिंह दुआरपर विराजमान होइबला आ कहाँ हम देशक अदना एकटा नागरिक। की अपनाकेँ ओइ कुरसीक बुझी जइसँ हेट भेलौं? सीकपर रखल वा तिजोरीमे रखल वस्‍तु ओतबेकाल ने जेतेकाल ओ ओतए रहैए। रविशंकर आइ ओतए छैथ जेतए हमरा सन-सन जिनगी जे अन्‍ति‍म छोड़पर पहुँचनिहार हुनकर हुकुमदारी करत। कोन नजैरिये ओ देखै छल आ आइ कोन नजैरिये देखता।

रविकान्‍तक अन्‍तर-मनकेँ रश्‍मि‍ आँकि रहल छेली। मुदा जेते आँकए चाहै छेली तइसँ बेसी घबाएल माछ जकाँ मनक सड़ैन बढ़ल जाइत रहैन। की आँखिक सोझक देखल झूठ भऽ जाएत? केना नै भऽ सकैए। दू गोरेक बीचक बात तँ ओतबेकाल धरि सत्‍य रहैए जेतेकाल धरि दुनू मानैए। काज थोड़े छी जे गरैज कऽ कहत जे तोरा पलटने हम थोड़े पलटबौ..!

असथिर होइते रश्‍मि‍क मनमे विचार जगलैन‍। दुखक दबाइ नोर छी। पैघ-सँ-पैघ दुख लोक नोरक धारमे बहा वैतरणी पार करैए। बजली-

जहिना अहाँक मनमे उठि रहल अछि तहिना हमरो मनमे रंग-बिरंगक बात उठि रहल अछि। कहाँ रविशंकरक पत्नी किरण राजरानी आ कहाँ हम..? कहाँ राधाक संग कृष्‍ण आ कहाँ..! काल्हि‍ धरि दुनू गोरे एकठाम बैस‍ एक थारीमे खेबो करै छेलौं आ एक्के गिलासमे पानियोँ पीबै छेलौं मुदा आइ संभव अछि? आखिर किए?”

हवाक तेज झोंकमे जहिना डारि-डारिक पात डोलि-डोलि एक-दोसरमे सटबो करैत आ हटबो करैत तहिना पत्नीक डोलैत विचार सुनि रविकान्‍तो डोलए लगला। एक तँ पहिनेसँ रविकान्‍तक मन डोलि रहल छेलैन‍ तैपर पत्नीक विचार आरो डोला देलकैन‍। अनभुआर जगह पहुँचलापर जहिना सभ हरा जाइत तहिना रविकान्‍त हेरा गेला। औनाइत बजला-

कानसँ सुनितो आ आँखिसँ देखितो किछु बुझि नै पाबि रहल छी जे की नीक की अधला! की करी की नै करी से किछु ने फूरि रहल अछि। साठि बर्खक संगीकेँ एते दूर केना बुझब? मुदा लगो केना बुझब? साठि बर्खक पथिक-संगी जँ आब दू दिशामे चली तखन केते दूरी हएत, साठि बर्खक जिनगियो तँ छोट नै भेल।

बिच्‍चेमे रश्‍मि‍ टपैक पड़ली-

जिनगी तँ एक दिन, एक क्षण वा एक घटनामे बदैल‍ जाइए आ साठि-बर्ख की धो-धो चाटब!”

तखन?”

सएह नै बुझि रहल छी। एतेटा जिनगी एक संग बितेलौं मुदा आइ जइ जिनगीमे पहुँच‍‍ गेल छी तइ जिनगीक सम्‍बन्‍धमे किछु विचार कहियो नहि केलौं।

जहिना आन गामक चौबट्टी, तीनबट्टीपर पहुँचते भक्क लगि जाइत, जइसँ पूब-पच्‍छि‍मक दिशे बदैल‍ जाइत तहिना पत्नीक बात सुनि रविकान्‍तकेँ भेलैन। मुदा एहनो तँ होइते अछि जे ओहने चौबट्टी आकि तीनबट्टीपर भक्क खुजितो अछि। ओना रविकान्‍तक भक्क तेना भऽ कऽ तँ नहि खुजलैन‍ मुदा एक प्रश्‍न मनमे जरूर उठलैन‍-  बच्‍चासँ सियान भेलौं, सियानसँ चेतन भेलौं, चेतनसँ बुढ़ाड़ीक प्रमाणपत्र भेट‍ गेल। हरबाह थोड़े छी जे अधमरुओ अवस्‍थामे बुढ़ाड़ीक प्रमाण नइ भेटत। मुदा मन किए धकधका रहल अछि? जिनगीक चारिम अवस्‍था वानप्रस्‍थक होइ छै, संयासीक होइ छै जे दिन-राति दौगैत दुनियाँक हाल-चाल जानए चाहैए। से कहाँ मन मानि कऽ बुझि रहल अछि..?

पतिकेँ गंभीर अवस्‍थामे देख रश्‍मि‍ बजली-

अहाँक मनमे जे नाचि रहल अछि वएह हमरो मनमे नाचि रहल अछि। मुदा ईहो बात तँ झूठ नहियेँ छी जे जिनगीक संग बाटो बनै छइ आ बाटे संग बटोहियो बाट बनबै छइ?”

तैपर रविकान्‍त बजला-

की बाट?”

पतिक प्रश्‍न सुनि रश्‍मि‍ विह्वल भऽ गेली। मनमे उठलैन- हेराइत संगीकेँ बाट देखाएब बहुत पैघ काज छी। मुदा लगले मनमे उठि गेलैन‍ जे तखन अपने किए एते वौआइ छी? कम-सँ-कम चाह पीबैकाल बैसारियोमे ऐ बातक विचार करैत अबितौं तँ औझुका जकाँ नहि वौऐतौं, जहिना जोतल आ बिनु जोतल खेतमे चललासँ पहिने धड़ियाइ छै, धड़ियेला पछाइत‍‍‍ पतियाइ छै, पतिएला पछाइत‍‍‍ पेरियाइत पेरा बनै छै आ वएह एकपेरिया बहुपेरिया बनैत चलै छइ...।

रश्‍मि‍ बजली-

अहाँ कौलेज छोड़ला उत्तर जिम्मा उठा सरकारी बाट पकैड़‍‍ साठि बर्ख पूरा लेलौं। ने कहियो जमीन दिस तकैक जरूरत‍ महसूस भेल आ ने तकलौं। मुदा आइ तँ ओतइ उतैर आबि गेल छी जेकर रस्‍ता अखन धरिक रस्‍तासँ भिन्न अछि।

पत्नी‍क विचार सुनि रविकान्‍त मुड़ी डोलबैत आँखि उठा कखनो पत्नीक आँखिपर रखैथ तँ कखनो धरती दिस ताकए लगैथ। आगिपर चढ़ल कोनो बरतनक पानि‍ जहिना निच्‍चाँसँ ताउ पाबि ऊपर उठि उधियाइक परियास करैत तहिना रविकान्‍तक वैचारिक मन उधियाइक परियास करए लगलैन। मुदा जहिना पिजराक बाघ पिजरेमे गुम्‍हैर कऽ रहि जाइत, तहिना आइ धरिक जे मन रूपी बाघ एहेन शरीर रूपी पिजरामे फँसि गेल छेलैन जे जेते आगू मुहेँ डेग उठबैक कोशिश करैथ ओते समुद्री वादल जकाँ आस्‍ते-आस्‍ते ढील होइत रहैन। आगूक झलफलाइत बाट देख रविकान्‍त बजला-

विचारणीय बात जरूर अछि, मुदा बिनु बुझल जिनगीक संग तँ अहुँक जिनगी चलल कहाँ केतौ बेवधान भेल। आइ जे कहलौं ओ तँ ओहू दिन कहि सकै छेलौं, जइ दिनसँ बहुत आगू धरि बढ़ि गेलौं। से तँ रोकि कऽ मोड़ि सकै छेलौं। मुदा आइ तँ जानल-बिनु जानल दुनू संगे वौआए चाहै छी!”

पतिक बात सुनि रश्‍मि‍ मने-मन विचार करए लगली जे दुनियाँमे एहनो लोकक कमी नै अछि जेकरा जरूरत‍ भरि लूरि-बुधि नै छै, मुदा ईहो तँ झूठ नहि, जे जेकरा छेबो करै ओइमे बेसी ओहने अछि जे या तँ उनटा वाण चलबैए वा नहियेँ चलबैए। तखन सुनटा वाण केना आगू बढ़त आ जँ बढ़बे करत तँ केते आगू बढ़त जेकरा आगू दुश्मन जकाँ चौबगली उनटा वाण घेरने अछि? मुदा कोन उपाय अछि, जखन शुद्ध तेल-मोबिल देल मजगूत इंजनो चढ़ाइपर दम तोड़ए लगैए आ टुटलो चक्का रहैत बिनु तेलो-मोबिलक गाड़ी भट्ठा गरे दौड़ैत रहैए जइमे बिनु ब्रेकक गाड़ी जकाँ केतेकेँ जानो जाइए आ केतेकेँ मुहोँ-कान फुटै छइ? रश्‍मिक मन कहलकैन- डेग आगू उठाएब जरूर कठिन अछि। मुदा लगले मनमे फेर उठलैन‍- जइ बाटकेँ पकैड़‍‍ आइ धरि चललौं जँ ओइ बाटकेँ छोड़ि दोसर बाट पकैड़‍‍ नव बटोही जकाँ विदा होइ, ई तँ संभव अछि। जहिना चिन्‍हार जगहक चोर पड़ा दूर देश जा अपन क्रि‍या-कलाप बदैल‍‍ लइए आ नव-मनुखक जिनगी बना जीबए लगैए...।

वाण लगल पंछी जकाँ पतिकेँ देख रश्‍मि अपन अनुभवकेँ सान्‍त्‍वना भरल शब्‍दमे बजली-

जहिना अहाँक जिनगी तहिना ने हमरो बनि गेल अछि। जएह बुढ़ापा अहाँक सएह ने हमरो अछि। मुदा एकठाम तँ दुनू गोरे एक छी। एक्के दबाइक जरूरत‍ दुनू गोरेकेँ अछि, तँए विचार दइ छी जे आब ने ओ रूतबा रहल आ ने ओकाइत, तखन जानि कऽ जहरो-माहूर खा लेब सेहो नीक नहि। मनकेँ थीर करू।

रश्‍मि‍केँ आगूक बात पेटेमे घुरियाइत रहैन तइ बिच्‍चेमे रविकान्‍त बजला-

बेसी दुख तँ नै बुझि पड़ैए मुदा साठि बर्खक प्रोढा अवस्‍था धरि हमरा सबहक नजैर नइ गेल! जखन कि सरकारक पैघ काजक जिम्मामे सभ दिन रहलौं। समयानुसार काज करितो अपन जिनगी तँ सुरक्षि‍त रखितौं। साठि बर्खक पछाइतो तँ चालीस बर्ख जीबैक छल। जखन कि ईहो तँ जनिते रही जे पछाइत दरमाहा टुटि जाएत आ जिनगीक आवश्‍यकता बढ़ैत जाएत।

पतिक विचारकेँ गहराइत समुद्र दिस जाइत देख मुँहक दसो वाण साधि रश्‍मि‍ छोड़लैन‍-

अनेरे मनमे जुड़शीतलक पोखैरक पानि जकाँ घोर-मट्ठा करै छी। ओना, घोरे मट्ठा ने घीओ निकालैए आ अन्‍है सेहो निकालैए। संयासी सभ केना फटलाहा कम्‍मल सबहक मोटरी बान्‍हि कन्‍हामे लटका लइए आ सौंसे दुनियाँ घुमैए। अहाँकेँ तँ सहजे‍ चरि-चकिया गाड़ी चलबैक लूरियो अछि।

पत्नीक विचार सुनि रविकान्‍त ओझरा गेला जे एक दिस संयासीक बात बाजि कहि रहल छैथ जे जहिना कानूनी अधिकारसँ जीवन-रक्षा होइए तहिना ने संयास अवस्‍था–माने वानप्रस्‍थ अवस्‍था– पवित्र मनुखक नैतिक अधिकार सेहो छी। आ दोसर दिस चरिचकिया गाड़ीक चर्च सेहो करै छैथ जे भरिसक अपनो लगा कऽ कहै छैथ..!

संगी देख रविकान्‍त दहलाए लगला। जहिना कोसी-कमलाक बाढ़िमे भँसैत घरपर बैस‍‍ घरवारी बंशियो खेलाइत आ कमला-कोसीक गीतो गबैत तहिना विह्वल भऽ रविकान्‍त बजला-

हँसी-चौल छोड़ू। आब कोनो बाल-बोध नै छी। आबो जँ समाजिक जीवन नै बनाएब तँ देखते छिऐ जे मनुख एकदिस चान छुबैए आ दोसर दिस सीकीक वाणक जगह बम-वारूद लऽ मनुखक बीच केहेन खेल दुनियाँमे खेला रहल अछि। खाएर, ओते सोचैक समए आब नइ रहल। जेकर तिल खेलिऐ ओकरा बहि देलिऐ। अपन चालीस बर्खक जिनगी अछि, ने हमर कियो मालिक आ ने हम केकरो मालिक छिऐ। भगवान रामकेँ जहिना अपन वानप्रस्‍थ जीवनमे अनेको ऋृषि‍-मुनि, योगी-संयासी सभसँ भेँट भेलैन‍ आ अपनो जा-जा भेँट केलखिन। तहिना ने अपनो दोसराक ऐठाम जाइ आ ओहो अपना ऐठाम आबए। मुदा विचारणीय प्रश्‍न ई अछि जे रामकेँ के सभ भेँट करए एलैन‍ आ किनका-किनका ओतए भेँट करए ओ स्‍वयं गेला। ई प्रश्‍न मनमे अबिते गाछसँ खसल पघिलल कटहर जकाँ रविकान्‍तक मन छँहोछित्त भऽ गेलैन‍। छँहोछित्त होइते जहिना खोंइचा-कमरी एक दिस होइत कोह उड़ि कऽ कौआ आगू पहुँच‍‍ जाइत, आँठी छड़ैप-छड़ैप बोन-झारमे बच्‍चा दइ दुआरे जान बँचबैत आ नेरहा उत्तर-दछिने सिरहाना दऽ पड़ल-पड़ल सोचए लगैत जे जेते पकबह तेते सक्कत हेबह तँए समए रहैत भक्ष बना लएह नहि तँ दुइर भऽ जेबह तहिना रविकान्‍त सोचैत-सौचैत जेना अलिसाए लगला तहिना हाफी-पर-हाफी हुअ लगलैन।

पतिकेँ हाफी होइत देख रश्‍मि‍क मनमे उठलैन‍ जे हाफी तँ निनियाँ देवीक पहिल सिंह-दुआरिक घन्‍टी छी। भने नीक हेतैन जे सुति रहता, नहि तँ ऐ उमेरमे जँ नीन उड़लैन‍ तँ अनेरे सालो-महिनेमे बदैल‍‍ जेतैन। फटकैत रश्‍मि बजली-

जेते माथ धुनैक हुअए वा देह धुनैक हुअए अपन धुनू। हमर जे काज अछि तइमे हम बिथूत नै हुअ देब। हमरा लिये तँ अहीं ने सभ किछु छी।

तीन साए घरक बस्‍ती बसन्‍तपुर। छोट-नमहर चालीसटा किसान परिवार गाममे शेष सभ खेत-बोनिहारसँ लऽ कऽ आनो-आनो रोजगार कऽ जीवन-बसर करैबला। अनेको जाति गाममे, जइमे मझोलका किसान बेसी। ओकरो सबहक दशा-दिशा भिन्न-भिन्न। तेकर अनेको कारणमे दूटा प्रमुख। जइसँ विधि-बेवहारमे सेहो अन्‍तर। किछु जातिक लोक अपने हाथे हरो जोइत लैत आ खेतक काजो करैत, जइसँ आमदनीक बँचतो होइत आ किछु एहनो जे अपने हाथसँ काज-उदम नै करैत तँए बँचत कम। कम बँचत भेने परिवार दिनानुदिन सिकुड़ैत गेल। ओना गामक बुनाबट सेहो भिन्न अछि। एक तँ ओहुना दू गामक बुनाबट एक रंग नहि, तेकर अनेको कारणमे प्रमुख अछि, खेतक बुनाबट, जनसंख्‍या आ जाति इत्‍यादि। बसन्‍तपुर गामक बुनाबट आरो भिन्न। ऊँचगर जमीन बेसी आ निचरस कम जइसँ गाछी-बिरछी सेहो बेसी अछि आ घर-घराड़ी, रस्‍ता-पेरा सेहो ऐल-फइल अछि।

बसन्‍तपुरमे दूटा नमहर किसान अछि। नमहर किसान परिवार रहने गामोक आ अगल-बगलक आनो गामक लोक जेठरैयती परिवारो बुझैत आ जेठरैयत कहबो करैए। राजक जमीन्‍दार तँ नहि, मुदा गमैया जमीन्‍दार सेहो किछु गोरे बुझैत। तेकर कारण जे दुनूक महाजनियोँ चलैत आ गामक झड़-झंझटक पनचैतियो करैत। कनी-मनी अनचितो काजकेँ गामक लोक अनठा दइत। तइमे राधाकान्‍त आ कुसुमलालक जमीनक बुनाबट सेहो भिन्न। चौबगली टोल सभ बसल अछि आ बीचक जे तीस-पैंतीस बीघाक प्‍लॉट छै ओ मध्‍यम गहींर अछि। जइसँ अधिक बर्खा भेने नाला होइत पानिक निकासी कऽ लैत आ कम भेने चौबगलीक ओहासीसँ रौदियाहो समैमे जमीन उपजिये जाइत। ओना दुनू गोरे बोरिंग सेहो गड़ौने छैथ तँए रौदियाहो समए भेने खेतक लाभ उठाइए लइ छैथ। पच्‍चीस-तीस बीघाक बीचक दुनू किसान छैथ। दुआरपर बखारियो आ पोखैरक महारपर दू-सलिया-तीन-सलिया नारोक टाल रहिते छैन।

राघाकान्‍तो आ कुसुमलालोक परिवारक बीच तीन पुश्‍तसँ ऊपरेक दोस्‍ती रहल छैन। ओना दुनू दू जातिक छैथ, मुदा अपेक्षा-भाव एहेन छैन जे चालि-ढालिसँ अनठिया कियो नहि ई बुझि पबैत जे दुनू दू जातिक छैथ। किएक तँ कोनो काज-उदेममे एक-दोसराक बाले-बच्‍चे एक-दोसरठाम अबैत-जाइत रहल छैथ। तेतबे नहि, कुटुम-परिवार जकाँ दुनू परिवारक बीच कपड़ा-लत्ताक वर-विदाइक चलैन‍ सेहो अछि। मुदा तैयो सराध-बिआह आदि परिवारिक काजमे दुनूक दू जातिक परिचय भाइये जाइ छैन।

नमहर भुमकम होइसँ पहिने जहिना नहियोँ होइबला बच्‍चा सबहक जन्‍म भऽ जाइ छै‍ जइसँ दोस्‍तियारेक संभावना अनेरो बढ़ि जाइ छै मुदा से नहि, राधाकान्‍त आ कुसुमलाल–दुनू गोरे–केँ एक्के दिन बेटा भेलैन‍। ओना कियो-केकरो ऐठाम जिगेसा करए नै गेला तेकर कारण भेल जे अपने-अपन घर ओझरा गेलैन‍। ओना, पमरिया-हिजरनी महिना दिन तक दुनू परिवारमे  दौग-बड़हा करैत रहल। रवि दिन जन्‍म भेने दाइयो-माइ छठिहारे दिन एकक नाओं रविकान्‍त आ दोसराक नाओं रविशंकर रखि देलखिन। अनेरे किए फूलक बोनमे आकि साँप-कीड़ाक बोनमे टहैलतैथ। बोन तँ बोने छी, दुनूक छी। तँए हरहर-खटखटसँ नीक दिनेकेँ पकैड़‍‍ लेलैन‍। ओना एकटा आरो केलैन‍ जे दुनूमे सँ कियो जातिक पदवी नै लगौलैन‍।

सुभ्‍यस्‍त परिवार रहने तीन बर्खक पछाइतिये स्‍कूल जाइ-जोकर दुनू भऽ गेल मुदा चारिम बर्खमे दुनूक नाओं गामेक स्‍कूलमे लिखौल गेल। ओना जेहने सोझमतिया राधाकान्‍त तेहने कुसुमलालो, मुदा नाओं लिखबै दिन रविकान्‍तक पिता गेलखिन आ राधाकान्‍त अपने नै जा भायकेँ पठौलखिन। पित्ती एक बर्ख घटा कऽ रविशंकरक नाओं लिखा देलखिन। ओना राधाकान्‍तकेँ स्‍कूलपर जेबाक मनो नहियेँ रहैन। किएक तँ स्‍कूल सबहक जे किरदानी भऽ गेल ओ देखै-जोग नै अछि। शिक्षक सभ विद्यार्थीकेँ नहियेँ पढ़ैले प्रेरित करै छैथ आ नहियेँ पढ़ैक जिज्ञासा जगा पबै छथिन, छड़ी हाथे पढ़बए चाहै छथिन।

एक तँ एकरंगाह परिवार तहूमे दोस्‍ती। दुनू गोरे तेहेन चन्‍सगर जे गामेक स्‍कूलसँ पटका-पटकी करैत निकलल। पटका-पटकी ई जे एक साल रविकान्‍त फस्‍ट करैत तँ दोसर साल रविशंकर, ओना हाइ स्‍कूलमे थोड़े गजपट भेलै, स्‍कूलक शिक्षक आँकि लेलैन‍ जे केतबो ऊपरा-ऊपरी छै तैयो सोचन-शक्‍तिमे दुनूक बीच अन्‍तर किछु जरूर छइ। कौलेज तँ बिना माए-बापक होइए, केकरा के देखत। मुदा ऑनर्सक संग दुनू गोरे प्रथम श्रेणीमे निकलल।

आइ.पी.एस. कऽ दुनू गोरेक ट्रेनिंग आ ज्‍वानिंग सेहो भेल। दोस्‍तीमे बढ़ोतरी होइते गेल।

शब्‍द संख्‍या : 2378

उलबा चाउर कथा संग्रहक तेसर संस्‍करणसँ... 

 


 

[1] विचार

[2] भगवतीक आराधनाक नवमी

[3] प्रश्‍नक

[4] उत्तर

[5] विचारक

 

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