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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 डॉ कैलाश कुमार मिश्र

फकड़ाक संग यात्रा करैत मैथिलानीकमनोदशाक: मानवशास्त्रीय विवेचना

डॉ कैलाश कुमार मिश्र[1]

लोकक सँसार अनंत महासागर जकाँ अछि। लोक जखन मिथिलाक लोक हो अथवा मैथिलिक लोक हो तऽ एकर विस्तार कल्पना सँ बाहर भऽ जाइत छैक। मिथिलाक लोकक जड़ि छथि मैथिलानी। हुनक जीवन आइओ लोक सँ छनि, लोक सँगे छनि। आजुक भौतिक आ वैश्विक समाज मे सेहो मैथिलानी लोक केँ धेने छथि: लोक मैथिलानी सँ बढैत अछि, मैथिलानी लोकक गति सँग गतिमान छथि। गति मुदा दिशाहीन नहि अछि। गति एहेन अछि जे जड़िसँ जुड़ल अछि। ओकरा उड़ब, घुमब, दौड़ब, बाहर-भीतर करब नीक लगैत छैक मुदा ओ अन्ततः अपन जड़ि लग बेर-बेर आबि जाइत अछि। ठीक ओहिना जेना प्रवासी चिरै एक वर्ष मे 40,000 किलोमीटर अपन पारिस्थितिकी सँ दूर उड़ला, घुमला आ प्रवास केलाक बाद पुनः अपन भूमि अर्थात मूल पारिस्थितिकी मे आबि जाइत अछि।ओहिना जेना सूरदास (1478 – 1573) केर जहाजक चिरै बेर-बेर उड़लाक बाद जहाज पर अबैत रहैत अछि:

“जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आबै”

मिथिलाक अथवा आजुक वैश्विक युग मे मैथिलक लोकक प्रथा, परम्परा, खान-पान, बिध-बेबहार, गीत-नाद, अनुष्ठान, पूजा-पाठ, व्रत-पाबनि, खिस्सा-पिहानी, फकड़ा, सब किछु अधिकांशतया मैथिलानी बचा कऽ रखने छथि। ताहू समय मे जहिया हुनका पढबाक स्वतंत्रता पुरुष जकाँ नहि छलनि अथवा नाम मात्र महिला केँ छलनि तहियो इ सब लोक परम्परा केँ अपन भावना – प्रेम, विरह, वेदना, कष्ट, यातना, ज्ञान, उद्वेग, शोषण, दोहन, आर्थिक बिपन्नता, पुरुषक उत्पात, आदि – व्यक्त करबाक पब्लिक स्पेस केर रूप मे व्यवहार करैत छलीह। ओ स्पेस एहेन स्पेस छल जाहि मे हिनकालोकनि केँ अपन कथ्य व्यक्त करबाक स्वछंदता छलनि, बल्कि एखनो छनि। पुरुषक कोनो दखलन्दाज़ी ओहि स्पेस पर नहि छलैक आ ने आइओ छैक।इ बात कनि गंभीर लिखा गेल आ मानवाधिकार सँ शुरू होइत नारी स्वतंत्रता, नारीवाद आ स्त्री विषयक अध्ययन, विवेचन दिस टघरि गेल। बात अनेड़े बहुत पैघ स्वरुप लऽ सकैत अछि। ओना एहि बात पर मंथन आ घमर्थन केर जरुरत अपन मैथिल समाज मे अछि लेकिन ताहिलेल इ प्लेटफार्म हमरा उचित नहि लागि रहल अछि। तखन की हो? किछु नहि, बात केँ लोकक जाग्रत मनःस्थिति मे राखि आगा बढ़ि जाइ। जखन अर्धजाग्रति सँ पूर्ण जाग्रति दिस ध्यान जेतनि तऽ अहि पर विचार शुरू हएत। विचारक घमर्थन असगरे नारी नहि करती, पुरुष सेहो ओहि भाव, इतिहास, पितृसत्तात्मक समाजक सँरचना आ ओहि सँरचना मे कालक अनुरूप परिवर्तन आदि लेल उदार हेताह आ स्त्री-पुरुख दूनू मिलि जीवनक गाड़ीक दू पहिया बनि एकर सम्यक निदान दिस अग्रसर हेताह।

बात पर अबैत छी जे कोना लोकक एक विधा फकड़ाक माध्यम सँ मैथिलानी अपन सब तरहक मनोभाव केँ अदौ सँ व्यक्त करैत आबि रहल छथि। फकड़ा केँ  ‘कहबी’, ‘लोकोक्ति’ सेहो कहल जाइत छैक। सबसँ पहिने इहो जानब आवश्यक जे फकड़ा’क अर्थ की भेल? एकर कोनो सर्वमान्य परिभाषा सेहो भऽ सकैत अछि की? सर्वमान्य परिभाषा अछि तऽ मैथिली लोक सँसारक फकड़ा ओहि वैश्विक परिभाषा सँग कतऽ धरि चलि पेबा मे सक्षम अछि?

फकड़ा खांटी लोकक वस्तु थिक – लोकक उक्ति अर्थात “लोकोक्ति”। लोकक कहब अर्थात “कहबी”। लोक पुरान फकड़ा केँ सहेजने रहैत अछि आ नवक निर्माण करैत ओकरा ठोसगर आधार दैत रहैत अछि जाहि सँ आजुक गढ़ल फकड़ा भविष्य मे सार्वभौमिक बनि सकय।सँस्कृत मे “लोकोक्ति” अलंकारक एक भेद सेहो मानल गेल अछि। अंग्रेजी मे फकड़ा अथवा लोकोक्ति केँ Proverb कहल जाइत छैक। ताहि ज्ञाने अंग्रजी Proverb केर परिभाषा किछु अहि तरहें करैत अछि:

“A proverb is a saying without an author.”

एकर अर्थ भेल फकड़ा एहेन उक्ति अछि जकर कोनो रचनाकार नहि होइत छथि। मैथिली लोक मे व्याप्त फकड़ा केँ देखला सँ इ ज्ञात होइत अछि जे मैथिलिक फकड़ा अपन स्वरुप मे एहि सँ अधिक व्यापक अछि। हमरालोकनि अनेक एहनो फकड़ाक प्रयोग करैत छी जकर रचनाकारक नाम हमरा सबकेँ ज्ञात रहैत अछि: गोनू झा, विद्यापति (1352-1448), तुलसीदास (1511-1623), मीराबाई (1498-1557), कबीरदास (1398- ?) आदि। रामचरितमानस सँ अनेक दोहा कें मिथिला आ मिथिला सँ बाहर फकड़ा’क रूप मे व्यवहार होइत अछि। जेना कि

“यहाँ न लागै राउर माया”

अथवा

“लंका निसिचर निकर निवासा

यहाँ कहाँ सज्जन केर बासा”

इ दूनू तुलसीदासक रामचरितमानससँ लेल गेल अछि।

अहि तरहें

“पुरुखक नहि विश्वासे”

“एकसर तारा कियो नहि देख

लिखल कुमास अमंगल लेख”

“भनहि विद्यापति सुनू हे सुनयना

सब बेटी सासुर जाथि”

महाकवि विद्यापतिक रचित पद सँ लेल गेल अछि।

किछु फकड़ा गाम विशेष आ स्थान विशेष मे प्रचलित होइत अछि। ओहि फकड़ाक निर्माण मे गामक कोनो विशेष घटना अथवा ओहि घटना सँग व्यक्ति विशेषक नाम जुड़ल रहैत अछि। उदाहरण लेल मधुबनी जिलाक अरेड़ गाम मे 55 वर्ष पहिने नाथ बाबू नामक एक आशु कवि आ सभालोचन भेलाह। ओ अपन प्रत्युत्पन्नमति लेल विख्यात छलाह। ओ किछु-किछु एहेन पदक रचना केलनि जे फकड़ा बनि गेल। सब फकड़ा हुनक नाम सँ जानल जाइत अछि। नाथ बाबू केँ तीन बीघा खेत छलनि। एकबेर ओ अपना खेत मे मौथा घास उखाड़ैत छलाह। बाट चलैत गामक लोक पुछि देलकन्हि:

गामक लोक: “नाथ! की करैत छी?”

नाथ:

“नाथ बाबू छथि काल गिरहस्त

तीन बीघा केर जोता

सबहक खेत मे धान उपजैत अछि

नाथक खेत मे मौथा”

तहिया सँ इ फकड़ा प्रसिद्ध भऽ गेल:

“सबहक खेत मे धान उपजैत अछि

नाथक खेत मे मौथा”

अहि तरहें मिथिलाक अधिकांश गाम मे किछु ने किछु लोक भेल छथि जे फकड़ा निर्माण केने छथि आ ओ फकड़ा गाम मे प्रचलितं अछि। ओहि फकड़ा सँग ओकर निर्माता सेहो गामक लोकक कंठ मे रचल बसल छथि। उदाहरण हमरा लग अनंत अछि मुदा विषय सँ विषयांतर नहि होई ताहिं आगा बढब जरुरी।

वृहद् हिंदी कोश मे लोकोक्ति केर परिभाषा कनि विस्तार सँ भेटैत अछि:

“विभिन्न प्रकार के अनुभवों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों एवं कथाओं, प्राकृतिक नियमों और लोक विश्वासों आदि पर आधारित चुटीली, सारगर्भित, सँक्षिप्त, लोकप्रचलित ऐसी उक्तियों को लोकोक्ति कहते हैं, जिनका प्रयोग किसी बात कि पुष्टि, विरोध, सीख तथा भविष्य-कथन आदि के लिए किया जाता है।”

एहि सँ एक बात दिस स्पष्ट सँकेत इ भेटैत अछि जे हमरा लोकनि अपन मिथिला मे उपलब्ध फकड़ा के देखैत एक स्थानीय अथवा काजक परिभाषा बना ली। इ परिभाषा हम अपन ज्ञान, मानवशास्त्र, लोकविद्या (फोकलोर) मे प्रशिक्षण आ मिथिला सँ प्राप्त फकड़ाक सँचयन आ ओकर सँरचना के आधार पर गढ़बाक यत्न कऽ रहल छी:

“मैथिली फकड़ा जकरा लोकोक्ति सेहो कहल जा सकैत अछि, लोकक द्वारा प्रचलित एहेन कथन अछि जे पौराणिक कथा, ग्रन्थ, धर्मशास्त्रक दृष्टान्त, घटना विशेष सँ विकसित शिक्षा, हास, परिहास, मनोभाव, दुःख-दर्द, प्रेम, अपनत्व, लिंग भेद, जातीय अथवा सामुदायिक स्वाभाव आ गुण, छोभ, वैराग्य, उदासी भाव, प्रकृति सँ तारतम्य, जड़िसँ जुड़ाव, पूर्वज सँ सिनेह, ज्ञानक सँचरण, आदि भाव व्यक्त कएल जाइत अछि।”

फकड़ा केँ स्वरुप केँ अगर गंभीर बनि देखी तऽ स्पष्ट हएत जे फकड़ा’क उद्धरण देमय बला लोक ओहि सँग व्यक्ति अथवा परिस्थिति केँओहिना सीब लैत अछि जेना कोनो महिला सुई मे ताग घुसा ओहि सँ कोनो वस्तु अथवा कलाक निर्माण करैत अछि। तीनू – सुई, ताग आ वस्त्र – आपस मे एना गुथा जाइत अछि जे तीनूक अलग-अलग अस्तित्व ताकब दुष्कर। तीनूक समग्र अस्तित्व सँ कला बनैत छैक। सएह भेल फकड़ा। फकड़ा कें एकाएक उमडल मनोदशाक सम्प्रेषण सेहो कहल जा सकैत अछि जाहि मे सम्प्रेषण केँ अधिक प्रमाणिक आ प्रभावोत्पादक बनेबा लेल उद्धरणक मदति लेल जाइत छैक।

कनि फकड़ा केर स्वरुप आ ओकर अनेक रूप पर विचार सेहो करक चाही। मिथिला मे व्याप्त फकड़ा केँ स्वरुप आ उपलब्धता देखैत कहल जा सकैत अछि जे फकड़ा केँ चारि भाग मे विभक्त कएल जा सकैत अछि:

(क) वैश्विक फकड़ा

(ख)                        अखिल भारतीय स्वरुपक फकड़ा

(ग)  मिथिलाक फकड़ा

(घ)  स्थानीय फकड़ा

आब कनि उपर्वर्णित फकड़ाक स्वरुप पर विचार करैत छी।

(क)वैश्विक फकड़ा

वैश्विक फकड़ा, जेना कि नाम सँ स्पष्ट अछि, एहेन फकड़ा भेल जे समस्त विश्व मे प्रचलित अछि। अहि तरहक फकड़ाक प्रयोग मैथिली मे मूल फकड़ा केँ अनुवाद कए होइत अछि। उदाहरण हेतु:

Rome was not built in a day  -“रोमक निर्माण एक दिन मे नहि भेल”

Child is the father of a man बच्चा पैघ लोकक पिता होइत अछि

Necessity is the mother of invention।- “आवश्यकता अविष्कारक जननी होइत अछि”।

वैश्विक फकड़ा अपन वैश्विक स्वभावक कारणे आ सांस्कृतिक आदान-प्रदानक कारणे मैथिली आ आन भाषा आ सँस्कृति मे सदैव प्रयुक्त होइत रहल अछि। लोकक विभिन्न देश मे भ्रमण, दोसर देश आ सँस्कृतिक मध्य आदान-प्रदान, साहित्य आ भाषाक अध्ययन आदि एकर फैलाव आ व्यवहारक कारण बनैत छैक।

(ख)                       अखिल भारतीय स्वरुपक फकड़ा

अहि तरहक फकड़ा समस्त भारत आ ताहू मे हिंदी बहुल क्षेत्र मे प्रयुक्त होइत अछि। मिथिला मे सेहो ओकर मूल रूप मे एकर प्रयोग होइत अछि। कखनोकल भाषाक अनुवाद सेहो कऽ देल जाइत छैक। किछु उदाहरण देखैत छी आ ओकर विवेचना करैत छी:

ना राधा को नौ मन घी होगा ना राधा नाचेगी – नहि राधा के नौ मोन घी हेतनि ने राधा नचती।

ऊंट के मुँह मे जीरा – “ऊंटक मुँह मे जीरक फोड़न”

ऊपर के उदाहरण मे मूल हिंदी फकड़ा के मैथिली मे अनुदित कए कहल गेल अछि।

आब दोसर देखू:

“लेना देना कुछ नही मुहब्बत एक चीज़ है।”

“का वर्षा जब नदी सुखाने/ समय चुक पुनि क्या पछताने”

“कबिरा खरा बाजार मे लिए लुकाठी हाथ/ जो घर ज़ारे आपना चले हमारे साथ”

“ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय”

“बड़े मिया तो बड़े मिया/ छोटे मिया सुभानअल्लाह”

“मिया की जुत्ती मिया का सर”

उपरोक्त सब फकड़ा अपन भाषा आ ओकर सँस्कार सँग मिथिला मे अबैत अछि। मैथिली भाषी एकर प्रयोग अपन भाषा आ व्यवहार मे एकर मूल रूप मे बिना कोनो जोड़-तोर केने, बिना कोनो अनुवाद केँ करैत छथि आ एकर भाव सेहो बिना कोनो झंझट केँ स्पष्ट होइत जाइत छैक। अखिल भारतीय फकड़ा मे कोनो भाषा जेना मगही, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली, अवधी, उर्दू आदिक फकड़ा आबि सकैत अछि। अखिल भारतीय कहक अर्थ हिंदी मात्र नहि लागक चाही।

 

(ग) मिथिलाक फकड़ा

मिथिलाक फकड़ा कहब केँ तात्पर्य भेल जे कोनो फकड़ा जे समस्त मिथिला क्षेत्र मे बाजल जाइत अछि (ओ देवघर, सँथाल परगना, दुमका, भागलपुर, मुंगेर सँ लऽ कऽ नेपालक मैथिली भाषी क्षेत्र धरि पसरल लोकक फकड़ा), व्यवहरित होइत अछि से फकड़ा। इ फकड़ा सब कमोवेश एक स्वरुपक अछि। अहिमे यद्यपि एक बातक सम्भावना भऽ सकैत अछि जे किछु फकड़ा जे अखिल मिथिलाक स्वभावक अथवा प्रकृति केँ अछि तकर सँचयन सब मैथिली भाषी क्षेत्र सँ लोक परम्परा सँ लिखित परम्परा मे नहि भेल हो। अगर से नहि भेल अछि तऽ मैथिली साहित्य आ सँस्कृति के शोधकर्मी एवं साहित्यजीवी लोकनि एहि बात केँ गंभीरता सँ लेथि आ समस्त मिथिला क्षेत्र सँ लोक परम्परा मे व्याप्त फकड़ा सबहक सँचयन कए ओकर सँरचना आ व्यवहार पर शोध करथि।

(घ) स्थानीय फकड़ा

स्थानीय फकड़ा ओ फकड़ा भेल जे कोनो विशेष गाम अथवा ओकर अगल-बगल मे कोनो घटना विशेष, अथवा कोनो व्यक्ति विशेष द्वारा रचल गेल हो आ ओहि परोपट्टा मे लोक व्यवहार मे प्रचलित हो। स्थानीय फकड़ा के सम्बन्ध मे एक बात कहब अनिवार्य जे कालक यात्रा सँग नहु-नहु महत्वपूर्ण फकड़ा किछु समयक बाद अखिल मिथिला आ बाद मे अखिल भारतीय आ कखनो काल अंतिम डेग फानैत वैश्विक फकड़ा सेहो बनि जाइत अछि। स्थानीय फकड़ा केर उदाहरण शुरू मे देल गेल अछि ताहि एकरा फेरो सँ देमाक दरकार नहि अछि।

अहि तरहें दू बात एक सामान्य पाठक लेल स्पष्ट भऽ गेल:

·         पहिल, फकड़ा की अछि, एकर परिभाषा विशेषरूप सँ मैथिली भाषा आ सँस्कृतिक सन्दर्भ मे की होबक चाही।

·         दोसर, मैथिली सँस्कृति मे प्रचलित फकड़ा के कतेक श्रेणी मे बांटी देखल जा सकैत अछि।

आब अहि प्रारम्भिक जानकारीक बाद अहि लेख केँ आत्मा अर्थात फकड़ा द्वारा मानवी या मैथिलानी के मनोदशाक सम्प्रेषण कोना होइत अछि। कोना ओ सब अपन मोनक भाव, उतार-चढ़ाव, नीक-अधलाह, प्रेम, वेदना, विरह, सामाजिक स्थिति, उमंग, दुःख, आर्थिक बिपन्नता, आदि कें व्यक्त करैत छथि। व्यक्त करब एक बात भेल आ ओहि अभिव्यक्ति कें बुझब आ ओकरा सँग आत्मसात करब दोसर बात। इ दूनू बात अगर मैथिली फकड़ा आ नारी मनोदशा के देखब तऽ भेटत। भाव अधिकांश अवस्था मे एकक अथवा व्यक्ति विशेषक नहि अपितु समस्त नारी समाज लेल, तऽ कखनोकाल एक वर्ग विशेषक नारी समाज लेल होइत अछि। समाजक सँरचना जे आइ तीव्र गति सँ बदलि रहल अछि ताहि मे सामाजिक-सांस्कृतिक-इतिहासिक आ जेंडर डिस्कोर्स केँ ध्यान मे रखैत अहि विषय पर गहन शोधक दरकार अछि। हम अपन सीमित ज्ञान आ साधन केँ हिसाब सँ अहि पर किछु लिखबाक यत्न कऽ रहल छी।

लिखबा सँ पहिने इ स्पष्ट कऽ देनाइ आवश्यक जे समाज बदलि रहल अछि। परिवर्तन अपन गति पकड़ि रहल अछि। परिवर्तन सँग मैथिल मानशिकता सेहो बदलि रहल अछि। लोक बेटा बेटीक विभेद कम कऽ रहल छथि। सब क्षेत्र मे आन समाज जकाँ मिथिलाक धिया सेहो प्रगतिक पथ पर साधल डेग दऽ रहलि छथि। हालहि मे मिथिलाक एक बेटी भारतीय वायु सेना मे पायलट केँ रूप मे चयनित भेलीह अछि। हुनकर चयन पर समस्त मैथिल समाज अपना आपकेँ गर्वान्वित अनुभव कऽ रहल अछि। ओहि धिया केँचारू दिस सँ शुभकामना भेटि रहल छनि। इ घटना बदलैत मनःस्थितिक परिचायक अछि। एकर अर्थ इहो नहि जे सब किछु ठीक भऽ गेल अछि। विश्व समुदायक बाते छोड़ी दी, भारतवर्ष मे सेहो हम सब बहुत समुदाय, समाज, वर्ग आ राज्य सँ नारी सँचेतना, विकास मे एखनो बहुत पछुआएल छी।

समाजक सँरचना देखला सँ एहेन सन लगैत अछि जे समाज मात्र बेटा लेल बनल अछि। ककरो अनेक बेटा भेलैक तऽ ओ भागवंत आ एकर बिपरीत किनको अनेक बेटी भेलनि तऽ बड्ड अधलाह। अहि स्थिति मे समाज ओहि बेटी सभक तुलना पिलुआ सँ करैत कहैत अछि जे फलां स्त्रिगन अथवा पुरुख केँ “खद-खद बेटी” छनि।स्मरणीय तथ्य इ अछि जे खद-खद शब्द पिलुआ लेल कएल जाइत अछि।

बातक अंत अतए नहि होइत अछि। सम्मर गीत जे बेटीक बिआह सँ पहिने गाएल जाइत अछि मे माय अपन व्यथा बतबैत कहैत छथि, ‘बहुत भऽ गेल कोनो ढंगक बर नहि भेट रहल अछि। बेटीक जन्म पहाड़ भऽ गेल! की करी कि नहि?’ बेटी  मायक दुःख सँ द्रवित होइत अपन नारी होबाक अवस्था सँ पश्चाताप करैत गीत आ फकड़ा केँ मादे कहैत छथि ‘माय, अनेड़े हमरा जन्म कथिलेल देलहुँ? अहि सँ बढियाँ तऽ इ रहैत जे हमरा अर्थात बेटीक जन्म सँ पहिने चालीस पचास मरीच बुकि कऽ खा लितहुँ जकर झांस सँ बेटी गर्भहि मे तुबि जाइत आ जिनगी भरि लेल धियाक सँताप सँ मुक्ति अहाँकेँ भेट जाइत!

“कथि लए आहे अम्मा धियाक जनम देल

खैतहुँमरिच पचास

मरिचक झाँस सँ धिया दूरि जैतय

छुटि जाइत धियाक सँताप”

 

समाज एहि मानशिकता मे जीबैत अछि जे बेटी घर मे अधिक भेलाक अर्थ भेल धनक क्षय आ लक्ष्मीक प्रस्थान। एक फकड़ा मे अहि बातक स्पष्ट प्रमाण भेटैत अछि:

“विप्र टहलुआ मेष धन

या बेटीके बाढ़ी

ताहू सँ धन नहि घटए

करू पैघ सँ राडि”

इ फकड़ा प्रमाणक सँग डंकाक चोट पर कहैत अछि जे ब्राम्हणक बालक केँ नौकर टहल टिकोरा करक हेतु राखब सँ, छागर-बकरी पोसला सँ आ बेटीक सँख्या बढ़ला सँ धनक क्षति होइत अछि; तकर बादो अगर सम्पति बांचि गेल तऽ अपना सँ पैघ हैसियत केर लोक सँ लड़ाई ठानि लिय, सम्पति बरबाद भऽ जेबे टा करत।

फकड़ाक विवेचना सँ लगैत अछि जे बेटी केँ लोक सिनेह करैत अछि, मुदा बेटी कोखि मे अबैक तकर कामना नहि करैत अछि। भले बेटीक सुरक्षा घिबही घैल जकाँ कएल गेल होइक मुदा ओकर प्यार आ दुलार बेटा जकाँ केल जाइत छैक। अर्थ भेल, बेटा अधिक महत्वपूर्ण। अन्यथा, बेटी केँ बेटी जकाँ दुलार किएक नहि?

“घीबक घैला जकाँ पोसलहु गे बेटी

बेटा जकाँ कएल दुलार”

मिथिला मे कोनो महिला लेल बेटाक कामना अतेक प्रबल होइत छैक, तकर उत्तर देब कठिन। एक चिरै बहुत कारुणिक स्वर उत्पन्न करैत रहैत अछि। ओहि चिरै केँ सम्बन्ध मे प्रचलित मान्यता इ छैक जे कोनो जन्म मे ओ चिरै एक मानवी छलि। ओकरा अनेक बेटा होइत गेलैक आ सब मरल गेलैक जखन कि जतेक बेटी भेलैक सब जिल गेलैक। जखन ओ महिला मरलितऽ बहुत दिन धरि ओकर आत्मा बेटा लेल भटकैत रहलैक बाद मे ओकर स्वरुप बदलि गेलैक आ ओ चिरै बनि जनम लेलक। एखनो ओकरा पूर्व जन्मक बात सब स्मरण छैक ताहिं ओ कारुणिक स्वर मे अपन व्यथा कथा कहैत रहैत अछि:

“टी टी टी तिसी तेल

बेटा भेल मरि मरि गेल

बेटी भेल जीब जीब गेल”

 

अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ उपलब्ध फकड़ा सबहक विवेचन कएल जाय तऽ पता चलैत अछि जे फकड़ा तत्कालीन समाजक दर्पण अछि; समाजक ऐतिहासिक दस्तावेज अछि। अहिबातक पुष्टि निम्नलिखित फकड़ा सँ होइत अछि:

“जनक नगर सँ चलली हे सीता

अम्मा देलनि रोदना पसार

के मोरा सीता लए बसिया जोगेतै

के मुख करत दुलार”

इ फकड़ा जेना भक्क सँ लोकक आँखि खोलैत हो! इ कहैत अछि जे ताज़ा, तप्पत भोजन खेबाक अधिकारी बेटा अछि, आँठि, बसिया भोजन बेटीक भाग मे लिखल रहैत अछि। बेटी जखन बिआह केँ बाद सासुर जा रहलि अछि तऽ माय कनैत सोचैत छथि, ‘आब सासुर मे हमर बेटी लेल इ बसियो अन्न केँ जोगा’क राखत आ के एकर गाल पकड़ि दुलार करतैक?’ इ फकड़ा बहुत पैघ यात्रा लेल चलि पड़ैत अछि। लड़की मायक चिंता एहि फकड़ा मादे देखू। ओ कहैत छथि जे आब हुनका बेटी लेल इ बसियो भोजन ओकर सासुर मे केँ रखतैक? केँ ओकरा सँ प्रेम सँ बजतैक? यएह सब सोचि-सोचि मायक छाती बेर-बेर फाटि रहल छनि।इ फकड़ा बतबैत अछि जे कोना लड़की सासुर जाइते देरी उत्तरदायित्वक भार सँ दबा जाइत अछि। इ फकड़ा देखन मे छोटन लगे/ घाव करे गंभीर जकाँ अछि।

एक आर फकड़ा ऊपर वर्णित फकड़ाक अर्थ स्पस्ट करैत अछि आ बेटीक बिआह भेलाक बाद सासुर गेला पर की स्थिति होइत छैक तकर खाका खीचैत छैक:

“जब डारि चलल ससुर घर देस

घरक चालनि होयबो हे”

अर्थ इ भेल जे आइ धरि जे धिया नैहर मे सुकुमारि छलीह से आब दोसर देस दोसर लोक मे जा रहलि छथि, ओतय हिनकर की गति हएत! काज करैत-करैत आ लोकक बात सुनैत-सुनैत अपसियात रहतीह। मोन चालनि जकाँ अनेक खंड मे विखन्डित भऽ जेतनि। मतलब, इ फकड़ा भविष्यक यातना दिस इशारा करैत अछि।

मिथिलाक नारी एक विचित्र मनोदशा आ परिवेश मे जीबैत छलीह। किछुके जीवन मे परिवर्तन आबि रहल छनि अधिकांश एखनो पिता, ज्येष्ठ भ्राता, श्रेष्ठ एवं अभिभावक पर आश्रित छथि अथवा हुनक निर्णय केँ बलधकेल स्वीकार करबा लेल विवश छथि। आश्चर्यक बात इ छैक जे लड़की केँ कहेन लड़का चाही आ ओकरा मोन मे की बात घुमि रहल छैक तकर वर्णन सेहो गीतगाइन सब अपन गीत आ फकड़ाक माध्यम सँ बजैत छथि:

“जखन चलला बाबा वर ताकय

आगा भए रुक्मिणी ठारि हे

कर जोड़ि मिनती करै छी यौ बाबा

सुनू बाबा मिनती हमार यौ

जुनि बाबा ताकब चोर चंडाल के

जुनि आनब तपसी भिखारि यौ”

नायिका अपना लेल अपन श्रेष्ठ सँ एक सामान्य बर जे सिनेहक अर्थ जनैत होथि केँ आकांक्षा रखैत छथि। हुनका चोर, चंडाल, लुच्चा- लफंगा अथवा कोनो नंग धरंग साधू सन्यासी नहि चाहियनि।इ फकड़ा एक महिलाक दासताक जीबैत साक्षी अछि।

फकड़ा पढ़ैत चलू आ समाजक गढ़नि देखैत चलू। फकड़ा एक-एक तह खोलैत चलत। स्थिति इ भऽ जाइत अछि जे कोनो महिला अगिला जनम मे फेरो महिला नहि बनए चाहैत छथि। दिनकर दीनानाथ सँ निहोरा करैत कहैत छथि जे आब कहियो हुनका तिरिया अर्थात नारी रूप मे जन्म नहि देथि:

“बेर-बेर अरजलौं हे दीनानाथ

दीनानाथ तिरिया जनम जुनि देहु”

पित्रसत्तात्मक समाज अपन मायाजाल मे तेना ने स्त्रिगन केँ फंसा लेने अछि जे ओ सब छरपट- छरपट तऽ करैत रहैत छथि, मुदा ओहि मायाजाल के तोड़ि कहाँ पबैत छथि! समाज सुग्गा जकाँ रटा देने छनि, रटि लेने छथि:

“बेटी ससुरे नीक की सरगे नीक”

फेर की सब मैथिलानी इ मानि लैत छथि जे कोनो विषम परिस्थिति हो, प्रताड़ना हो, शोषण हो, पति सौतिन लऽ अबैथ, भोजन सम्मान भले ने भेटए, कोनो स्थिति मे सासुर नहि छोड़ी आ नैहर के तऽ चर्चे बेकार! बेटीक डाला नैहर सँ सासुर लेल उठैत अछि आ सासुर सँ बेटीक लाशक डोली उठक चाही। फेरो एकरा समाजिक सँरचना सँगे जोड़ि देल जाइत अछि। बिआह होइते देरी नैहर मे बेटीक अधिकार समाप्त आ भाउजक वर्चस्व प्रारम्भ। अगर बिआहलि आ सासुर बसैत बेटी नैहर मे किछु दखल देलनि तऽ इ अमान्य। फकड़ा एकरा एहि तरहें प्रमाणित करैत अछि:

“घर आँगन भौजी के

छल छल करथि ननदो”

अर्थ स्पष्ट भेल आब जे बेटी बिआह सँ पूर्व पिताक घर पर अपन अधिकार बुझैत रहैत छलीह से हुनकर नहि अपितु हुनक भाउजक भऽ चुकल छनि। ओ अधिकारहीन भऽ चुकलि छथि। कोनो पुरुख ज अहि बातक अनुभव करए चाहैत छथि तऽ एकबेर इ कल्पना मात्र कऽ लेथि जे बिआहक बाद एकाएक हुनका सम्पति सँ बेदखली कऽ देल जाइत छनि, सामाजिक व्यवहार मे ओ निष्कासित भऽ जाइत छथि। फेर कहेन अवस्था मे रहि सकैत छथि। इ कल्पना मात्र हमरा सबके कष्टकारी लगैत अछि आ तकरा एखनो धरि मैथिलानी जीब रहलि छथि से कतेक दुखक बात! आ अहि बातक भान फकड़ा कोना खोलिकऽ स्पष्ट करैत कहैत अछि।

एक अवस्था एहेन होइत छैक जखन एक महिला अपना आपकेँ असहाय पबैत अछि आ लगैत छैक जे सब सँस्था, सामाजिक मर्यादा, बिआह-दान, कुल-पलिवार सब किछु बेकार छैक! लोक अनेड़े मायाक बंधन मे बन्हा जाइत अछि! इ सोच कखन होइत छैक? तखन जखन ओ प्रसवक वेदना सँ लहालोट भेल इमहर-ओम्हर ओंघरिया मारैत रहैत अछि। तखन ओकरा लगैत छैक जे अहि सँ बढियाँ ओ बिआह नहि केने रहैत आ पिता-पितामाहक घर मे जीवन भरि कुमारि बनल रहैत:

“कथिलेल बाबा बियाहलनि देलनि ससुर घर रे

ललना रे रहितहुँ बारी कुमारि दरद नहि जनितौं रे”

अनेड़े बाबा हमर बिआह करा ससुर घर भेज देलनि। नीक रहैत जे कुमारि भेल नैहर मे रहितहुँ। कम सँ कम अहि प्रचण्ड दर्द सँ बंचि तऽ जैतहुँ!

मिथिलाक सब स्त्रिगन अपना आपमें सीता देखैत छथि। हुनका सबके लगैत छनि जे सीता सँगे रामक व्यवहार उचित नहि रहलनि। अतेक कोमल सीता केँ कोना कठोर भेल राम नाना तरहक यातना देलाह! एहेन राम सँग बिआहक की लाभ? जिनगी भरि सीता केँ सुख कहाँ भेटलनि:

“राम बियाहने कोन फल भेल

सीता जन्म अकारथ गेल”

आ अन्ततः सीता केँ राम धोबी केँ कहला पर तखन घर सँ भगा देलथिन जखन सीता रघुकुलक कुल दीपक केँ जन्म देबा लेल गर्भ सँ छलीह! एहनो कहीं कतौ भेलैक अछि:

“राम बियाहने कोन फल भेल

सीताक जन्म बियोगे गेल”

बात अतए समाप्त नहि होइत अछि। कहल जाइत अछि जे जखन सीता वेदनाक अधिकता सँ भरि गेलीह आ राम हुनका बाल्मीकि आश्रम सँ लव कुशक सँग अयोध्या चलबा लेल जिद ठानि देलथिन तऽ सीता पुछि देलथिन: “हमर अयोध्या मे आब कि प्रयोजन, हमरा तऽ अहाँ निकालि देने छी?”

एहि बात पर राम उत्तर दैत छथिन: “अहाँक बिना हमर अश्वमेध यज्ञ सँभव नहि अछि।”

सीता: “फेर एखन धरि अहाँ कोना करैत रही अश्वमेध यज्ञ?”

राम: “अहाँक कोनो उदेस हमरा लग नहि छल। हम मानि लेने रही जे अहाँक निधन भऽ चुकल अछि। एहेन अवस्था मे शास्त्र इ विधान दैत अछि जे यजमान सोनाक पत्नी बना यज्ञ पर बैस सकैत अछि। हम सएह कएल। सोनाक सीता बना अश्वमेध यज्ञक वेदी पर बैसल रही।”

रामक इ बात सुनितहि सीताक करेज फाटि गेलनि। आँखी नोरा गेलनि। भेलनि, ‘रामो सन पति अतेक मतलबी भऽ सकैत छथि!’ भावावेश मे अबैत सीता बाजि उठलीह: “एकर मतलब इ भेल जे अहाँ हमरा अपन यज्ञक लोभे अयोध्या लऽ जेबा चाहैत छी?”

राम चुप रहला।

सीता फेरो बजलीह: “एकर अर्थ तखन इ भेल जे अहाँक यज्ञ मे हमही वाधक छी?”

राम एखनो चुपे छलाह।

आब सीता निर्णय दैत बजलीह: “ठीक छैक, हम अहाँक समस्याक तुरत समाधान करैत छी।”

राम कनि गंभीर तऽ भेलाह मुदा मौन भेल रहलाह।

सीता धरती माता दिस हाथ जोड़ि बैस गेलीह आ निवेदन केलनि: “हे धरती माँ! अहिंक कोखि सँ हमर जन्म भेल अछि। हम आब अधिक वेदना नहि बरदाश्त कऽ सकैत छी। अहाँ आब हमर उपाय तत्क्षण करू। फाटू! एखन फाटू! अतए फाटू! हमरा अपन कोरा मे सुता लिय। आब हम अहि लोक सँ उबि गेल छी!”

वनदेवी सीताक गोहार धरती माता तुरत स्वीकार केलनि। धरती मे तुरत दरार परि गेलैक। जाबेत राम सीता केँ रोकैथ तावेत सीता धरती मे प्रवेश कऽ गेलीह। धरतीक पुत्री धरती मे विलीन भऽ गेलीह। धरती पुनः यथावत भऽ गेलीह। एखनो जखन कोनो मैथिलानी कष्ट सँ भरि जाइत छथि तऽ एकाएक हुनका मुँह सँ निकलि पड़ैत छनि: “फाटू हे धरती”। से कहिते ओ सीताक मिनिएचर भऽ जाइत छथि।

फकड़ा प्रकृति सँ उद्धरित सेहो होइत अछि। कखनोकाल जखन स्त्रिगन अपन सँतान आ पति सँ तंग भऽ जाइत छथि तऽ अपन तुलना काकोर सँ करैत छथि। तहिना जेना अनेक बच्चा सबके जन्म दैत काल काकोर अपन जान गमा दैत अछि तहिना मैथिलानी सब बाल-बच्चा, पति आ परिवार लेल अपन शरीर आ इच्छा केँ गला लैत छथि। दुखक भार बढ़ला पर बाजि उठैत छथि:

“क़कोरबा बियान क़कोरबै खाय”

महिला मनक मनोदशा नहुँ-नहुँ अनेक तरहेँ फकड़ा मादें प्रवाहित होइत रहैत अछि। दुख मे, सुख मे, आनंदातिरेक मे, वेदनाक सघनता मे मैथिलानी स्वतःस्फूर्त होइत अपन परिस्थिति केँ कोनो ने कोनो फकड़ा सँ जोड़ि लैत छथि। तथाकथित निम्न जाति अथवा समुदायक लोक सँ ओना तऽ तथाकथित उच्च वर्गक लोक सामाजिक मेल मिलापक दूरी रखैत छथि अथवा सीमित अवस्था मे करैत छथि लेकिन जखन प्रहसन अथवा मजाक प्रदर्शित करबाक होइत छनि तऽ ओहि समाजक स्त्री सँ साम्पियक आकांक्षा रखैत छथि आ मर्यादाक अतिक्रमण करबा मे सेहो सँकोच नहि करैत छथि। महिला सेहो बुईझ लैत छथि जे पुरुखक इच्छा आ आकांक्षा की छनि। जखन पुरुख मर्यादा केँ त्याग करैत छथि तऽहुनका इहो भान नहि रहैत छनि जे ओ महिला हिनका गाम अथवा समाजक प्रचलित मानदण्ड पर भाउज, भावहु, पुतोहु अथवा की हेतनि! अहि क्षण ओ स्त्रिगण हुनका भाऊज सन लगैत छनि जकर बहुत मुंहतोड़ जवाब फकड़ा दैत अछि:

'रारक बहु सबहक भौजी"

 

अहि दशा केँ देखैत विद्यापतिक एक पद श्मरण अबैत अछि जाहि मे अस्पृश्य सुन्नरि युवतीक पति बिदेस गेल छैक, सासु बहिर तऽछैके, ओकर आँखि मे रतौंधी सेहो भेल छैक। ओना तऽसमाजक उच्च जातिक उच्च लोक, पुरुख ओकर देह सँ सटब पाप बुझैत छथि लेकिन राति मे वएह पुरुख ओहि कामिनी सँग अपन काम पिपासा शान्त करबा लेल उताहुल छथि, ओहि क्षण लेल ओ महिला हुनक सजाति भऽजाइत छनि:

"अधियन कर अपराधहुँ साति

पुरुख महते सब हमर सजाति"

 

महाकवि विद्यापति आगा बढ़ैत कहैत छथि:

"भनहि विद्यपति एहि रस गाब

उकितहुँ अबला भाव जगाब"

 

विद्यापति तऽअतेक आगा बढ़ैत ई तक बाजि लैत छथि जे लोक अनेड़े हुनका रसिक कवि कहैत छनि, प्रेमक-श्रृंगार, मिलन-अभिसार आ रतिक्रिया केँ कवि कहैत छनि; असली रस तऽओ शोषित आ अर्थहीन युवतीक दुखक बयान करब छनि। ओ अबलाक भाव केँ प्रदर्शित करए बला कवि छथि:

"भनहि विद्यापति एहि रस गाब

उकितहुँ अबला भाव जगाब"

 

कखनोकाल स्थिति एहेन भऽजाइत अछि जे दर्द आ भावनात्मक शोषण आ दोहन सँ जखन मैथिलानी भरि जाइत छथि, हिम्मत जखन जवाब देमय लगैत छनि, माथ जखन भिन्नाय लगैत छनि, तखन ओ अपन भड़ास निकलैत बजैत छथि:

"नहुँ नहुँ मुती तऽसन्न-सन्न उठय"

 

उपरोक्त फकड़ा प्रदर्शित करैत अछि जे जखन चारु दिस सँ मोनमे नाना तरहक द्वन्द चलैत रहैत छनि, शोषणक अधिकता एकठाम ढ़ेर भेल जाइत छनि, एक निश्चित अवधिक बाद ओ अपन भड़ास निकालि लैत छथि। ओ कतऽकरतीह। लोकपटल पर लोक धारणाक हेतु। सएह करैत छथि।

एक अवस्था एहेन होइत अछि जखन कियोक अपन बैभव केँ बारे मे अनेड़े बखान करैत छथि, ताहि क्षण किछु घोर सत्यवादी महिला केँ अनेड़े फुइसक बड़ाई अथवा पदबड़ाई अनसोहाँत लगैत छनि। बात जखन बहुत आगा बढ़ि जाइत छैक तऽबाजि उठैत छथि:

"गाँरी कहलक पटोर पहिरने रही

आँखि कहलक सङ्गे रही"

 

उपरोक्त फकड़ा यथार्थ आ फेकब मे अंतर स्पष्ट करैत अछि। नारी मानशिकताक यथार्थ आ कल्पित मानशिकता केर द्वन्द स्पष्ट करैत अछि। एक सँ दोसरक परिस्पर्धाक विवेचन करैत अछि, समाजक मानशिकता देखबैत अछि। 

 

कोनो महिला (अथवा विशेष अवस्था मे पुरूष) जखन व्यर्थक शोर आ अनघोल करैत छथि, अपन कृत्य (अथवा कुकृत्य) केँ झपबाक यत्न मे नीक अथवा भद्र महिला केँ दोख तकैत छथि तऽउचितवक्ता स्वभावक मैथिलानी हुनका पर तंज कसैत बाजि उठैत छथि: 

"बट हगनी ने लजाय 

उपराग देमय जाय"

 

गुनमंती मैथिलानी नारीक महत्व नीक जकाँ बुझैत छथि। हुनका ज्ञात छनि जे मायक भूमिका मात्र माय निभा सकैत छथि। पिता अर्थात पुरुष तऽमतलबी होइत अछि, भमरा होइत अछि। पुरुख केँ सँतति सँग पत्नी सेहो चाही। महिला केँ सँतति आगा किछु नहि। कोनो तरहक बात भेला पर पुरुख लेल निम्नलिखित फकड़ा पढ़ल जाइत अछि:

"माय मुइने बाप पितिया"

अर्थ भेल मायक मरैत मातर पिताक व्यवहार सँतानक प्रति बदलि जाइत छनि। पिता दोसर पत्नी केर जोगार मे लागि जाइत छथि। 

पिता कतबो करुणाशील होथि मायक स्थान लेब असँभव छनि। एक फकड़ा देखु तऽअर्थ स्पष्ट भऽजायत:

 

"जे मायक दूध सँ नहि हएत 

से बापक आंड़ चटने कतऽहएत"

 

ई फकड़ा जखन कखनो सुनैत छी तऽ हिंदी सिनेमाक एक गीत स्वतः श्मरण आबि जाइत अछि:

"बाप का जगह माँ ले सकती है

माँ की जगह बाप ले नही सकता 

लोरी दे नहीं सकता

सो जा सो जा"

बेटी सामान्यतया मायक गुण आ बेटा पिताक गुण आ स्वभाव किछु ने किछु स्वतः ग्रहण करैत अछि। एकर प्रमाण निम्नलिखित फकड़ा सँ भेटैत अछि:

"माय गुण धी पिता गुण घोर 

नहि किछुओ तऽथोड़बो थोड़"

 

दोसर फकड़ा माय आ बेटीक बात करैत कहैत अछि जे मायक गुण बेटी सहजे ग्रहण करैत अछि:

 

"भनहि विद्यापति बाँसक टोटी 

जकर जेहन माय तकर तेहेन बेटी"

 

आब पुरुखक बारी अबैत अछि आ फकड़ा कहैत अछि जे जहिना मायक गुण बेटी करैत छथि तहिना बापक गुण बेटा ग्रहण करैत छथि:

"भनहि विद्यापति बाँसक टोटा

जकर जेहन बाप तकर तेहेन बेटा"

 

महिलाक़ेँ जतेक अधिकार अपन पति पर रहैत छनि ततेक पुत्र अथवा पुत्री पर नहि। पतिक सम्पति आ टाका पर हुनका पूर्ण अधिकार, सर्वत्र स्वतंत्रता रहैत छनि, ने रोक ने टोक। लेकिन बेटाक सम्पति आ राशि पर मायक अधिकार एकाएक जेना सीमित भऽजाइत छनि। 

अहि बातक पुष्टि निम्नलिखित फकड़ा सँ होइत अछि:

"सइयां राज अरु राज

बेटा राज मुहतककी"

 

पितृसत्तात्मक समाजक सँरचना लोकक मोन मे ई धारणा स्थापित कऽदेने अछि जे बेटी आ बेटीक लोक -पति आ पुत्र - आन होइत अछि, अपन नहि। यएह बात फकड़ा सेहो स्थापित करैत अछि। निम्नलिखित फकड़ा देखला सँ ई बात नीक जकाँ फ़रिछा जाइत अछि: 

"धी, जमैय्या भगिना

ई तीनू ने अपना"

 

मैथिलानी सेहो सहज मोन सँ एकरा स्वीकार कऽलैत छथि।

वैधवयक जीवन बहुत दुःखद होइत रहल अछि। महादेब बर, भंगिया भिखारी प्रवृत्तिक वर सदैव मैथिलानी केँ विशेष रूप सँ ब्राह्मण बालिका केँ भेटैत रहलथिन्ह अछि। बेमेल बिआह एखनो कतौ-कतौ दृष्टिगोचर होइत अछि। हालहि मे हम एक विवाह मे गेल रही। लड़की बहुत सुन्दरि, देहगरि, कटगर, देखनूत रहैक। लड़का कनि दब। ऊपर सँ एक हाथ मे कनि समस्या। राति भरि कतेक बेर स्त्रिगण सब चारि पंक्ति केर गीत गबैत रहली आ पश्चाताप करैत रहलनि। गीतक दू पंक्ति हमरा जीवन भरि लेल स्मरण भऽगेल जे फकड़ा जकाँ व्यवहरित होइत रहैक: 

"लोहा मे जड़ि गेल सोना

हम जिबै कोना"

ज्ञातव्य इ जे अतए लोहा बर आ सोना कनिया छैक।

प्रसँग विधवाक छल। चलू अहि दिशा मे चर्च करैत छी। वैधव्यक स्थिति बहुत खराप होइत छल। अगर इ घटना ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ अथवा आन उच्च वर्ग मे होइत छल तऽ स्थिति भयावह भऽ जाइत छल। बारह, तेरह, पन्द्रह वर्षक लड़की विधवा कतेक ठाम भऽ जाइत छलि। विधवा होइतहि पुनर्विवाहक तऽ कल्पनो नहि कएल जा सकैत छल, उपर सँ ओहि लड़कीक सब सुख-सिंगार, नीक भोजन आदि छीना जाइत छलैक। कतेक ठाम तऽ विधवा केँ अंग्रेजी दबाई तक ग्रहण करबाक आज़ादी नहि छलैक। ओकरा सुगधित तेल, साबुन, आदिक व्यवहार करब पर प्रतिबंध लागि जाइत छैक। ओ केश विन्यास नहि कऽ सकैत अछि, नव व्याहल बर कनियाक चुमान करब तऽ दूर, ओकरा लग ठाढ़ तक नहि भऽ सकैत अछि। जेहिना प्रथम सांझ मे असगर तारा देखब अशुभक लक्ष्ण अछि तहिना तऽ विधवा सेहो आब असगर तारा बनि गेल छथि! समस्त हाहाकार मचल अछि। यएह स्थिति केँ देखैत विद्यापति लिखैत छथि:

“असगर तारा केओ नहि देख

अमंगल लेख”

 

विधबा पर प्रतिबंधक झड़ी लागि जाइत छनि। प्याज-लहसुन, माछ-मांस के पुछैत अछि गरिष्ट भोजन तक करबाक आज़ादी नहि रहैत छनि। हुनक जीवनक ऋतुचक्र जेना एक रंगाह भऽ जाइत छनि जाहि मे सब ठाम दुखक डंका बजैत रहैत छैक! निम्नलिखित फकड़ा के देखला सँ स्थिति स्पष्ट भऽ जाइत छैक:

 

“विधवा घर मे सभ दिन भादब

निरधन घर मे कातिक

राजा घर मे सभदिन अगहन

फागुन घर अहिबातिक”

 

अहि तरहक विपत्तिक सामना करैत विधवाक करेज कराहि उठैत छैक। कुहेस फाटि कानए लगैत अछि। आ भगवान सँ कहैत छनि कोन पापक कष्ट ओ भोगि रहल अछि? ओ अपन वेदना ककरा कहतैक:

“हे भगवान कोन कसूर विधना भेल बाम

कहब दुःख ककरा सँ”

एकर विपरीत पुरुख लेल कोनो प्रतिबंध नहि। पत्नीक निधन भेलाक बाद ओ सब किछु खा सकैत अछि। फेरो बिआह कऽ सकैत अछि। पत्नी मरलैक तऽ की भेलैक! फेर दोसर बिआह भऽ जेतैक। दोसरो पत्नी मरि गेलैक तऽ चिंताक कोनो प्रयोजन नहि, फेरो बिआह भऽ जेतैक! पत्नीक स्थिति अखरा नोनक ढेप सन होइत छैक – खसि पड़ल तऽ उठा लिय:

“नोनक ढेप खसल

उठा लेब”

अति वृष्टि आ अनावृष्टि सँ मिथिला अदौ सँ परेशान रहैत आबि रहल अछि। लोक भूखे रहैत छल। स्त्रिगणक दशा तऽ आरो दयनीय छलनि। ओ बाहर जा नहि सकैत छलीह। भीख कोना मंगती? कखनो कुअन्न, कखनो साग पात, कतेक सांझ उपास करैत जीवन चलबैत छलीह। अहि तरहक स्थितिक विभत्सता दर्शा रहल अछि निम्नलिखित फकड़ा:

“बिपत्ति जानि के आनल बजाय

अरिपन के चाउर गेली चिबाय”

स्थितिक गंभीरता देखू। घर मे स्त्रिगन नाना तरहक कष्ट सहैत रहैत छथि। अतेक खाराप स्थिति भऽ जाइत छनि जे अरिपन लेल जे चाउर राखल छनि सेहो चिबा जाइत छथि।

कोनो महिला केँ अगर कियोक अनेड़े मजाक अथवा तंग करैत छनि आ हुनका लग काजक, मूलरूप सँ गृहकार्यक तऽ ओ बाजि उठैत छथि:

“घरबला सँ फुरसत ने

देओर माँगए चुम्मा”

बाल विवाह एक समय मे बहुत पैघ समस्या बनि गेलैक। बेमेल विवाह जेना पसरि रहल छलैक। तकर विवरण कोना फकड़ा दैत अछि से देखू:

“तिरिया तेरह, मरद अठारह

कन्याक चमकए आँखि, बिआह होअय तमाम

छौड़ी बेर-बेर देखए अएना”

एक फकड़ा इ इंगित करैत अछि जे कोना महिला कुअन्न खा अपन प्राणक रक्षा करैत छथि आ कोना  बूढ़ सँ बिआह कए बिआहक पतिया छोड़ा लैत छथि:

“गुडा-खुद्दी खेलौं उपास भंग भेल

बूढ़ बिआहलक कुमारि पद गेल”

बेमेल विवाहक परिणिति नीक नहि होइत छैक। स्त्रिगन जीवन पर्यन्त ओहि वेदना आ सामाजिक उपहासक पात्र भऽ जाइत छथि। अनेड़े हुनका सँ पैघ उमेरि केँ लोक- स्त्री आ पुरुख सब हुनका जेठ कहि अपमानित करैत छनि।एहने मनोदशाक चित्रण निम्नलिखित फकड़ा मे देखाएल गेल अछि:

“हम नहि बूढि गे हम नहि  बूढि

बूढबा बिआहलक तें हम बूढि”

अर्थ स्पष्ट अछि, ओ महिला बूढि नहि छथि, परिस्थिति जाहि करणे हुनक विवाह बुढ़बा सँ भऽ गेल छनि ताहिं ओ बूढि छथि। उपरोक्त फकड़ा नारी मनोदशाक ओहि विशेष अवस्थाक गूढ़ मनोवैज्ञानिक सम्प्रेषण छैक।

नारी मनोदशाक अनेक परत होइत छैक। अपन कष्टक सम्प्रेषण एक महिला लोक मात्र मे लोक व्यवहार मात्र सँ कऽ सकैत छलीह। लोक व्यवहार हुनका लेल ब्लैकबोर्ड छलनि। ओ मात्र हुनक स्पेस छलनि। महिला लोक आ किछु पुरुष बच्चा मात्र हुनक श्रोता। वेदनाक अधिकता सँ जखन करेजक कुहेस फाटैत छनि तऽ स्त्रीक दग्धल छाती सँ श्राप निकलैत छनि:

“जे मोरा खेलनि खीरिया पुरिया

तिनको होइहनु नाश”

आर ओ की कऽ सकैत छलीह। हुनका लगैत छनि जे पुरुखक एहने कुकृत्य, अहँकार, निरंकुश व्यवहार सँ संसार मे अकाल, महामारी आदि भऽ रहल अछि। इ बात लोक सँ कखनोकाल मैथिली साहित्य मे सेहो अपन स्थान बना लैत अछि। बैद्यनाथ मिश्र “यात्री” आ काशीकांत मिश्र “मधुप”क रचना मे लोक जेना चढ़ि कऽ बजैत हो! लोक भाव साहित्यक प्रबल पक्ष बनि उठैत अछि। यात्रीक कलम नोर आ शोणितक धार बहबए लगैत अछि। नारी आ विधवा मनोदशा मे जेना ओ तह धरि घुइस जाइत छथि। एक-दू-सौ-सैकड़ा केँ पुछैत अछि, हजारक हज़ार विधवा हुनक माथ पर अपन व्यथा लेने सवार भऽ जाइत छनि। “बिलाप” कविता मे यात्री सत्यक अन्वेषण करैत कविता लिखैत छथि। यथार्थ चार चढ़ि बाजय लगैत अछि। केँ नहि कनैत अछि! पाठक, समाज आ कवि सब बहाबैत अछि नोरक धार:

“विधवा हमरे सन हज़ारक हज़ार

बहौने जा रहलि अछि नोरक धार

ओहि मे ई मुलुक डूबि बरु जाय

ओहिमे लोक-वेद भसिया बरु जाय

अगड़ाही लगौबरु बज्र खसौ

एहेन जाति पर बरु धसना धसौ

भूकम्प हौक बरु फटो धरती

माँ मिथिले रहिये क’ की करती!”

यात्री नहि रुकैत छथि दोसर-तेसर-चारिम विवाह करयबला बूढ़बा बर सब पर कलम उठा लैत छथि। अग्गब सामाजिक कुरीति पर प्रहार करैत रहैत छथि। नारी शोषण केँ पाठक हेतु पढबाक सामग्री बनबैत छथि। हुनक दोसर कविता “बूढा वर” सेहो एकर प्रमाण अछि। मुदा स्त्रिगन अपन बात ताबेत धरि लोक पटल मात्र पर करैत रहलनि।

जमिन्दारक शोषण सँ तंग भेल बुचनीक प्रतिनिधि बनि अपन अमर रचना “घसल अठन्नी” मे मधुप बुचनीक मुँह सँ कहा लैत छथि जे शोषण आ अन्याय केँ चलते जगत मे भऽ रहल अछि अकाल। इ लोकक अभिव्यक्ति नहि तऽ की भेल? घसल अठन्नी केर बुचनी डरल जरुर रहैत छैक लेकिन अपन बात आ श्राप दुनू व्यक्त करैत अछि:

आहा! देह तोड़ि क’ कएल काज

सुपथो न बोनि अछि भेटी रहल

तें जगमे ई पड़लै अकाल

उठबितहिं डेग लागए अन्हार

मरि जाएब एतइ

ककरा कहबै?

हित क्यो ने हमर

अनुचितों पैघ जनके शोभा

भगवान आह!”

मधुप नारी शोषण केँ देखैत छथि, अनुभव करैत छथि, अपन ह्रदय मे ओहि परिस्थिति केँ आत्मसात करैत छथि, आ कलम हुनका स्त्रिगणक स्पोकपर्सन बना दैत छनि। कविता बनि पड़ैत अछि।

मैथिली लोक परम्परा मे फकड़ा अनंत अछि – विपुल निधि जकाँ। कतबो ताकि लेब तैओ बहुत रहिये जाएत। लेकिन लोक व्यवहार मे ताकब तऽ कोनो निरर्थक नहि लागत। इ भेल फकड़ाक प्रयोजन आ उपयोगिता। जखन महिला कोनो वेदना सँ द्रवित होइत छथि आ हुनक बात कियोक नहि बुझैत छनि तऽ अनायास बाजि उठैत छथि:

“गुड़क मारि धोकड़े बुझैत अछि”

इ फकड़ा कतेक सार्थक छैक तकर अनुभूति या तऽ महिला कऽ सकैत छथि अन्यथा ओ जे नजदीक सँ ओहि वेदनाक प्रत्यक्षदर्शी रहल अछि।

किछु एहि तरहक भाव निम्नलिखित फकड़ा मे कहल गेल छैक:

“समाठक माइर उखैरे बुझैत छै”

स्मरण इहो राखब जरुरी जे सब भाव अधलाहे नहि होइत छैक। मनोदशा प्रेमक सेहो होइत छैक। लोक जखन अधिक उधियाइत अछि तऽ कहल जाइत छैक:

“टिटही टेकल पहाड़”

अर्थ भेल अपन औकात सँ अधिक ने बाजी ने करी।

कतेकबेर पति पत्नी अथवा कियोक आर अपन स्वयम केँ जीवन आ प्रेम अथवा व्यवस्था मे अतेक लीन भऽ जाइत छथि जे हुनका दोसरक जीवन अथवा सामाजिक मर्यादा केर भान खत्म भऽ जाइत छनि। एहन लोक लेल निम्न फकड़ा कतेक सटीक होइत छैक:

“हम सुनरी की पिया सुनरी

गामक लोक बनरा बनरी”

उदाहरण अनेक अछि – बहुत अज्ञात आ कतेको ज्ञात। सबहक समावेश केनाइ पहाड़ सन लगैत अछि। एहि पर गंभीर काज करक दरकार छैक। इ विषय अनंत महासागर जकाँ अछि। अहि पर साहित्यक अतिरिक्त समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, नारीवाद विज्ञानं, मानवाधिकार, मानवशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास आदिक शोधकर्मी के विभिन्न उदेश्य आ परिकल्पना संग काज करक चाही। इ एक अलग संसारक रचना कऽ सकैत अछि। हमर आलेख केँ अनंत महासागर मे खसल किछु बुंद मात्र मानल जा सकैत अछि जकर समय पड़ला पर अपन उपयोग भऽ सकैत अछि।

 

 

 

सन्दर्भ:

मिश्र, कैलाश कुमार (2017). “मैथिली लोकगीतमे नारी-दुर्दशाक चित्रण”, घर-बाहर, वर्ष 17, अंक 61, जुलाइ-सितम्बर: 11-17.

मिश्र, कैलाश कुमार (2018). “मिथिलाम अर्थात लोक सँस्कृति: एक परिचय” तीरभुक्ति, वर्ष 1, अंक 1, जुलाइ-सितम्बर: 29-35।

मिश्र, पंचानन (2017). “मैथिली लोकोक्तिमे स्त्री-जीवन”, घर-बाहर, वर्ष 17, अंक 61, जुलाइ-सितम्बर: 18-20.

वर्मा, रामचन्द्र (2009). लोकभारती बृहत् प्रामाणिक हिन्दी कोश. दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन.

यात्री, बैद्यनाथ मिश्र (--). “बिलाप”, कविता कोश: kavitakosh.org

यात्री, बैद्यनाथ मिश्र (--). “बूढ़ा वर”, कविता कोश: kavitakosh.org

मधुप, काशीकांत मिश्र (---) “घसल अठन्नी”: गजेन्द्र ठाकुरक सँ कविता भेटल

 

 

 


 

[1]डॉ कैलाश कुमार मिश्र मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, मानवाधिकार, फोकलोर(लोकविद्या) आ कला इतिहास केँ विभिन्न पक्ष पर स्वतंत्र लेखन करैत छथि; अंग्रेजी, मैथिली आ हिंदी तीनू भाषा मे लिखैत छथि। भारत सरकार केँ स्वास्थ्य आ परिवार कल्याण मन्त्रालय[Department of Population Genetics and Human Development (PGHD), National Institute of Health and Family Welfare]; संस्कृति मन्त्रालय [Indira Gandhi National Centre for the Arts], अंतर्राष्ट्रीय संगठन[South-South Solidarity; Society for Health Education and Learning Package (HELP); UNESCO; UNDP; READ Global ] आदि मे 27 वर्ष सँ बिभिन्न शोधपरक आ तथ्यपरक काज करबाक अनुभव छनि। यूनिवर्सिटी ऑफ़ नेब्रास्का (The University of Nebraska), जयपी यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी (Jaypee University of Information Technology), एमिटी यूनिवर्सिटी (Amity University), स्विनबर्न यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी(Swinburne University of Technology),  गुरु गोबिंद सिंह इन्द्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी (Guru Gobind Singh Indraprastha University) केर बहुत रास अकादमिक आशोध काज मे संलग्न छलाह। हिनक लगाव भारतक लोक कला, मूर्त आ अमूर्त कला, ग्राम्य आ आदिवासी जीवन, सामाजिक पारिस्थितिकी आ जीवन तंत्र, जेंडर डिस्कोर्स, मानवाधिकार, सामाजिक विकास, संस्कृति के अनेक पक्ष, इतिहास आ साहित्य सँ छनि।सम्प्रति ब्रैनकोठी आ आर.आइ.आर.के.सी.एल.आर.सी. केर चेयरमैन छथि आ किछु संस्था सभक स्वतंत्र कंसल्टेंसी करैत छथि. डॉ मिश्र मैथिली-भोजपुरी अकादमी दिल्ली केँ सदस्य सेहो छथि। हिनक सम्पर्क: Dr. Kailash Kumar Mishra, Chairman- Brainkothi; B-2/333, Tara Nagar, Old Palam Road, Kakrola, Sector 15, Dwarka, New Delhi 110078. Mob: +918076208498, Email: kailashkmishra@gmail.com

 

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