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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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नन्द विलासराय-

 

हमर होली

फगुआक उमंग

सभपर चढ़ल रंग

कियो पीबै दारू

कियो पीबै भंग

मुनसाकेँ की कही

मौगी सभकेँ

रंग खेलाइत देख हम

रहि गेलौं दंग।

 

चारूकात मचल छल हूरदंग

कियो पीटैत डम्फा

कियो पीटैत मृदंग

सभ अपनेमे मतंग

लोक सभकेँ होली खेलाइत देख

हमरो मनमे उठल तरंग

मनमे आएल

हमहूँ खेलितौं होली

अपन संगी सबहक संग

मुदा आब केतए पाबी

सभ संगी गाम छोड़ि शहर जा

लगेने अछि अपन-अपन डाली

छी बुड़बक तँए गाममे रहि

ताकए चाहै छी होली आ दिवाली

अपन बचपनक यारी...।

 

केना खेलब होली

किनका लगाएब रंग

कियो कहि ने दिअए

एना किए भऽ

गेल छी उदंड

रंगक खातिर भऽ नै जाए

केकरोसँ जंग।

 

मनमे आएल

होली खेलब

अपन पत्नियेँक संग

ओकरे रंगब

अंग-अंग।

 

यएह सोचैत हम

अँगना गेलौं

पत्नीकेँ लगमे बजेलौं

ओ बजली-

की यौ

अहॉंक रंग लगैए

आइ बड़ बेढ़ग

दारू पीलौं हेन

आकि पीलौं अछि भंग?

 

कहलयैन-

आइ होली खेलब

अहींक संग

अहींकेँ लगाएब रंग।

 

पत्नी बजली-

टोला-पड़ोसाक

छौंड़ासभ

हमरा कऽ देने छल

अपचंग

आब अहॉं हमरा

जुनि करू तंग।

हमर राखले रहि गेल

लाल-हरियर

सभटा रंग।

फेर मनमे आएल

किएक ने बाबाकेँ

पैरमे अबीर लगा

हुनकासँ आशीष पाबी।

 

हम दलानपर गेलौं

बाबाकेँ पैरमे

अबीर लगेलौं

हुनक दुनू पैर छुबि

अपन दुनू हाथसँ

केलौं प्रणाम

ओ बजला-

जीबह

नीके रहअ

रोशन करह

अपन मातृभूमिक नाम।

 

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