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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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डॉ. शिवकुमार प्रसादक

किछु अनुदित काव्य (रजनी छाबड़ाक मूल हिन्दीसँ)

(PAGHALAIT HIMKHAND

Maithili translation of ‘PaighalteHimkhand’

An Anthology of Hindi Poems by Rajni Chhabra from Hindi into Maithili by Dr. Sheo Kumar Prasad.)

आजुक नारी

आजुक जनानी

अबला नहि

जे बिपैत पड़लापर

टुटलाहा माला जकाँ

छिड़िया जाइ छै।

 

आजुक जनानी सबला अछि 

जकरा टुटियो कऽ 

जुड़ब आ जोड़बाक

कला बूझल छै। q


 

 

 

हम केतए छेलौं

हम जखन ओहिठाम रही 

तखनो

ओतए नहि रही।

 

अपनहि संसारक मेलामे

हम हेरागेल रही

नहि जानि केतए रही।

 

पैघक गुणक

नकल करैत छल

हमर व्यक्तित्वक अपहरण,

हमर निजत्व

पपड़ी दर पपड़ी

कब्बरमे झँपाएत रहए

आ हम अपन छीण होइत

स्वसँ फिरसान रही।

 

काँच उमेड़मे

कनहाक

बेगरता रहै छै।

 

अपन पैरपर

ठाढ़ भेला पछाइत

कनहा धऽ चलब

अपन बेकूफी छैक।

 

सोनजूही सन

पुनकब

अपन क्षमता रहितहुँ

दोसराक बले चलब

किए मानि लेने छल

भाग्य हमर।

 

निःशब्द बेथा 

आ नोरसँ

धैरज रखनिहार जगतीक

छाती पटा कऽ

बरखो-बर्खक पछाइत

हम अँकुरलौं अछि आब

मनमे संजोगने

पुनकबाक इच्छा ।

 

झौंखरा जकाँ नहि,

हम चाहै छी

नीर-निधि सन पसार।

 

नहि जीबए चाहै छी

गुड्डीक जिनगी,

लेने अकासक पसार,

जुड़ि कऽ साँचक धरासँ

बनए चाहै छी

अपन जिनगीक अपनहि अधार। q


 

 

 

बिसबास

अहाँ अपनापर बिसबास राखू

संसार अहाँपर बिसबास करत

पकड़ने रहू आसाक डोरि

अहाँक आस निरास नहि करत।

 

रौदसँ सुनगैत होए जे आँगन

कहियो ने कहियो इसरक किरपाक मेघ,

छाँह बनि एबे करतै।

 

कारी सियाह रातिकेँ

छाती चिरबाक तागैत

जइ दियारीमे छै

ओइ दियारीकेँ अन्हरो 

निरास नहिएँ करतै।

 

अन्हरकेँ मुकैबला

जे कऽ लइ छै मलाह

हुनका जिबाक ढंग

अपने आबि जाइ छै।

 

आस, बिसबास आ

हिम्मतक जखन

होइए छै मिलान

तँ दुनियाँक कोनो कलेस

नहि रहै छै कलेस।

 

बिसरा जाइ छै पैछला

झंझैटक समय।

 

बैस जाइ छै फेनसँ

खुशीक घर।

 

जिनगी गाबए लगै छै

राग आ मलार। q


 

 

 

मनक कनकौआ

कनकौआ सन सौखीन मन

लेने चुलबुलीक पहाड़

छूबए चाहैत अछि 

सौंसे अकासक बिस्तार।

 

पहाड़, समुद्र, अटारिक बिस्तार सन 

सभ झंझैटकेँ

अन्ठियाबैत

आगुए आगू पएर बढ़बैत अछि।

 

जिनगीक थकाबैटकेँ

मेटेबा लेल चाही

मनक कनकौआ आ

सपनाक अकास

जाहिमे मन भरि सकै

निधोख सतरंगा उड़ान।

 

मुदा किए दी दोसराक हाथमे

अपन डोइर?

छण छण लागल रहत शंकाक परेत

कखन हम कटि जाय

कखन हम लुटि जाय?

 

चुलबुलाहैट, चपलता 

नेने देखए मन

कल्पनाक एना,

साँचक जमीनपर

टिकल पएरे ने

दइ छै जिनगीक अर्थ। q

 


 

 

 

घर

सिनेह आ आतमीयता

जखन देबालक चार

बनि जाइ छै।

 

वएह घर

घर कहाइ छै। q


 

 

 

सुनसान

जे छुटि जाइ छथि

एहि जिनगीक जेहलसँ 

पाबि जाइ छथि

एकटा नब जिनगी।

 

बेजान तँ ओ रहै छथि

जे ओकर बादो जिबैत छथि।

 

ने रहै छै कोनो उत्साह

ने उमंग

रहि जाइ छै

बस सुनसान,

हरेक खुशीक छण

सेहो कऽ जाइ छै उदास।

 

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