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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

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मैथिली साहित्य आन्दोलन

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राजेश मोहन झा 'गुंजन'

 धन रूप आ गुण (दहेजक पसाही)
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गुण देखू, नै रूप निहारू।

जखन सद्य: लक्ष्मी घर औती
लाख कोटि धन किए बिचारू
भूख लोभ केर कोनो अंत नहि
मोल मनुक्खक हृदय उतारू,
गुण देखू, नै रूप निहारू।

मुंह सुरसा सन बढ़ि रहल
कुरीति रीति पर चढ़ि रहल
दहेजक माया के धूलि उड़ैए
मान बचाबू पाग सम्हारू,
गुण देखू, नै रूप निहारू।

गानिते गुणिते दिन बीताओल
कतेक लगाओल पूत पर
लगा पसाही दहेजक व्यापार
बेचब मोल बिनु दाँतक पर्रू,
गुण देखू, नै रूप निहारू।

कारी आखर महीष बूझै छथि
मुदा कनियाँ बीए एमए चाही
बाबा दलानक पगहा ल' घूमथि
एहन बरद की मोल बिचारू,
गुण देखू, नै रूप निहारू।

जे दहेजक पीटै छथि डंका
परधन लोभक महल बना क'
कुटिल भाव बैसल छथि लंका
ओहि लंका कें मिलि जराबू,
गुण देखू, नै रूप निहारू।

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