logo   

वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

Home ]

 

India Flag Nepal Flag

(c)२००४-२०२०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

आशीष अनचिन्हार

घर

घर तीन प्रकारक होइत छैक। उच्च, मध्यम आ निम्न। एकर आरो भेद उपभेद भए सकैत छैक मुदा ताहिसँ हमरा कोनो बहस नहि। ओहिठाम हम जाहि घरक खेरहा कहब से भेल मध्यम। तँ आगा सुनू खेरहा मध्यम घरक। घरक मतलब मध्यम घर बुझल जाए।

प्रत्येक घर ओ जीव होइत छैक जे मनमानी कए सकए। तुच्छ आर्दशक संग। तानाशाहीक बिना कोनो घर, घर नहि होइत छैक, चाहे ओ हमर घर हो वा कि अहाँक। सत्त इएह थिक। घर काठ अथवा ईंटासँ नहि, हुक्मसँ बनैत छैक। घर भूकंप अथवा तोड़लासँ नहि, हुक्म तोड़लापर टुटैत छैक। घर ओ नहि जाहिमे केओ फरमाइश कए सकल। घर ओ छैक जाहिमे हाथ उठा कए दए दिऔक। जकरा भागमे जे होएतैक से भेटतैक।

घर अपना मोने किछु नहि होइत छैक। होइत छैक सभक मर्जीसँ मुदा ई घरे थिक जे अपन मर्जी के सभहक मर्जी बुझए लगैत अछि। ओकरा ईहो मोन नहि रहैत छैक जे हमर अस्तित्व कतएसँ अछि। ई घरे थिक जे जानि बुझि कए कोतबालक पदवी लैए प्रचुर योग्यता आ संभावनाक अछैतो प्रत्येक समय ओ कोतवालीक रुतबा देखबैत छैक अनेरो। ई घरे थिक जे कोतवाल बनि सूति रहैत अछि आ निन्नमे गबैत रहैए-'जगले रहिअह हो भाए। आ चोर चुप्पचाप माल निकालि लैत अछि ।घरकेँ दसटा आँखि होइत छैक दसटा दिशाक रूपें जे सदिखन लाल टरेस रहैत छैक। आ ई आँखि देखिते दोसरक आँखि झुकि जाइत छैक अनायास। घरक एकटा गरदनिमे एक लाख हाथीक आवाज रहैत छैक। कनिकतो खखसलापर लोकक पएर थकमका जाइत छैक। कान फाटि जाइत छैक। माथ दुखाए लगैत छैक अपने मने। लगही-नदी बंद भए जाइत छैक।

प्रारंभिक वाक्य-: घर हिटलर अछि वा हिटलरे घर अछि एकर खोज करब आवश्यक।

घर ओ जगह थिक जाहि ठामक घैलमे नोर भरल रहैत छैक आ चूल्हापर चढ़ाओल रहैत छैक हँसी। पिआस लगलापर लोक नोर पिबैत छैक आ भूख लगलापर हँसी चिबबैत छैक से अहाँ सभ बिनु लिखने बूझि गेल होएबैक। घरक लोक जखन लगही करैत होएतैक तखन नोर निकलेत होएतैक पोखरि दिस जाए कालमे हँसी। आ लोक जतए लगही करैत छैक ओहिठाम फुटि जाइत छैक मोनि। दिसा फिरलाहा जगहपर जनमि जाइत छैक गाछ। कथीक से सोचि लिअ। आ मोनि जतेक गहींर भेल चल जाइत छैक ओहि महक पानि ततबे सुखाएल जाइत छैक। गाछ जतेक नमहर होइत छैक, मनहूसी ओतबे नमहर भए जाइत छैक। गाछक डारि -पात नमरि जाइत छैक, सांसारिक समस्या जकाँ।

हँ, एकटा गप्प आरो होइत छैक। पाहुन-परक अएलापर घैलक नोर नहि देल जाइत छैक। रान्हल हँसी जरूर भेटैत छैक। पाहुनक जखन लगही करैत छथि तखन मोनि नहि फुटैत छैक। हँ, दिसा फिरलापर गाछ जरूर जनमि जाइत छैक। आ सहयोग देबए लगैत छैक पहिनेसँ जनमल गाछकें। मोनि फुटैत अछि, गाछ जनमि जाइत अछि घरो-चलैत रहैए।

भरत वाक्य - : नोर आ हँसीक माँझ घरक  स्थान छैक।

घर ओ जगह थिक, जाहि ठामसँ दू टा बाट फुटैत छैक। एकटा आगू दने आ दोसर पाछू दने। बाम दहिनक प्रश्ने नहि। आगू महँक बाट पकड़ब तँ घंटा भरि लागत चौटिआपर पहुँचबामे। आ चौबटिओ तेहने। केन्द्र बिन्दुसँ चारि टा बाट निकलल आ फेर ओहि एक-एक बाटक शुरूआते में चौबटिआ फुटि गेल छैक आ क्रमश: प्रत्येक बाटमे एहनाहिते चौबटिआ फुटल छैक। आ अहाँ चौबटिआपर पहुँचि, थकमका जाएब। अथ-उथमे पड़ि जाएब। किछु नहि काज देत। कखनो सोचब जे ओहि बाटपर चलल जाए तँ कखने ओहिपर। घनचक्कर। किछु ने फुराएत। आ एहन समयमे बात अहाँ थाकि कए ओहि ठाम बैसि जाएब वा कोनो बाटपर चलि बिला जाएब वा पुनः घर घुरि जाए जहाजक चिड़ै जकाँ। आ जँ पाछूक बाट पकड़ब तँ पाँचो मिनटसँ बेसी नहि लागत चौबटिआपर पहुँचएमे। मुदा ओही चारि मिनटमे पाँच जुगक अनुभव भए जाएत। गोठुल्लासँ आगू बढ़ि पाएब जँ ओहि महँक निकलल बत्तीसँ आँखि माथ सही-सलामत बचि गेल तँ। आगू बढ़लापर दूगो घर बीचक एकटा गली भेटैत छैक। देहोसँ कम्म चौड़ा। कहिओ देबालमे लागि छिला जाएत। कहिओ किछु...। अगत्या पार कए जेबैक अहाँ कोनाहुतो ओहि गलीकेँ। आबि जएब चौबटिआपर। मुदा चौबटिआपर पाछूक बाटसँ पहुँचबाक पछातिओ अहाँक आगू में ओएह सनातन प्रश्न आबि ठाढ़ भए जाएत। कोन बाटपर बढ़ल जाए। निर्णय नहि कए सकब से हमरा बुझल अछि। आओर अंत में ओएह तीनटा उपाय-थाकि कए बैसि रहब वा अनचिन्हार बाटपर पएर बढ़ा देब वा घर घुरि आएब।

ई घरे थिक जे दू-दूटा बाट राखिओ कए ककरो आँगा नहि बढ़ए दैत छैक। बृहस्पतिओ ग्रहसँ बेसी आकर्षण शक्ति छैक एकरामे। जतेक प्रबल शक्तिसँ अहाँ बाटपर बढ़बाक प्रयास करब एकर शक्ति ओतबे बढ़ल जाइत छैक। रामक समकालीन बालि जकाँ। आ अंतमे नुकाइए लेत ओ अपना पेटमे। घोर अन्हरियामे। पटकैत रहू माथ एहि देबालसँ ओहि देबालपर। टूटत नहि। फूटत नहि।

निष्कर्ष वाक्य-: घर दू मूँहा अजगर थिक।

घर ओएह थिक जे युग-युगसँ दुर्गा बनबाक देखैत देखैत मरि जाइत अछि। घर कहिओ ने बनि पबैत अछि दुर्गा। दुर्गाक दसटा हाथ आ एकटा मूँह देखि घर सोचैत रहि जाइत अछि जे दुर्गे जकाँ हमरो दसटा हाथसँ अबितै आ एकटा मूँहमे जाइत से कतेक नीक होइतैक। मुदा ई सपना देखिते-देखिते ओ भए जाइत छैक रावण। अबैत छैक दूटा हाथसँ मुदा जाइत छैक दस टा मूँहमे। कखनो कऽ घर ब्रम्हा आ रावणक रक्तसंबंधक प्रसंगमे सोचए लगैत अछि। सत्ते चतुर्मुखीक संतान दसमुखी केना ने हो।

कहिओ-कहिओ घर सोचैत अछि जे दुर्गा नहि सही गणेश किएक नहि भए जाइत छी। पेट रहत मनुखक मूँह रहत जानवरक। जानवरक मूँहसँ दूभि-पात चिबाइए सकैत छी। सोहारी ओ भात तँ खएबामे कोनो दिक्कत नहि। मुदा घरक ईहो मनोकामना पूरा नहि भए पबैत छैक। आ रहि जाइत छैक ओ पहिनेहे जकाँ। कहिओ कए अधरतिआमे घर बिसुनाए लगैत अछि आ ओही कालमे ओकर बड़बड़ेनाइ चालू भए जाइत छैक। बड़बडेनाइमे ईहो मिलल रहैत छैक प्रार्थनाक रूपमे-हे भगवान वा तँ हमर मूँहे गाएब कए दिआ वा पेटे। ई दूनू बड़का गुंडा अछि। खास कए ई पेट। आ अंतमे ई प्रलाप सेहो बन्न भऽ जाइत छैक आँखिक संगे-संग।

निष्पति वाक्य -: घर बड्ड किछु सोचैत छैक मुदा ओ पूरा नहि भए पबैत छैक।

घरे एकटा एहन जीव होइत अछि जे अपना भीतर बाजल गेल हरेक शब्दकेँ रोकबाक लेल छोटोसँ छोट भुरकी बन्द कए दैत अछि। ई जनितो जे शब्दक दूत बसात होइत छैक। आ घरे तँ छैक जे दोसर ठामक गप्प सुनबाक लेल टाट की चारोकेँ हटा दैत छैक चाहे ओहिमे रहए बलापर पाथर खसौक वा पानि पड़ौक वा रौद लगौक। कोनो असरि नहि घरपर। आ एहन सामर्थ्य तँ घरे के हो जे घर में रहएबाला सभ पाथर, पानि रौदसँ भरि जाइत छैक मुदा ओ अपन काज कइएक निचैन होइए।

छोट वाक्य -: घर मने ओ व्यापारी भेल जे कनेक लाभ लेल बड़का हानि के मोजर नहि दैछ आ बुझैछ जे हमरा पौ बारह अछि।

कहिओ अहाँ सभ सोचलहुँ अछि जे आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे की अंतर होइत छैक। नहि ने। प्रयासो नहि कएने होएबैक। ओना दरबाजापरक घरकेँ घर कहले. नहि जाइत छैक। तइओ...। आङनक घर मने घरबैआ केबाड़ लगा लेताह तँ चारू दिससँ सुरक्षित। दरबज्जाक घरमे अहाँ सुरक्षित भइओ .सकैत छी आ नहिओ भए सकैत छी। कतेको गोटाक घर आ दरबज्जामे मात्र एकटा टाटक अस्तित्व रहैत छैक। टाट हटा दिऔक कोन घर रहत कोन दरबज्जा से बुझि नहि पड़त। मुदा तैओ आङनक घर आ दरबज्जाक घरमे अंतर होइत छैक।

आङनक घरमे अहाँ ककरोपर खिसिआ कए हाथ छोड़ि देबैक मुदा दरबज्जाक घरमे चुप रहबाक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि। कारण जे होइक। आङनक घरमे केओ नोर बहा कए टाटकेँ अपन कथा कहि सकैत छथि। मुदा दरबज्जाक घरमे नोर की बेसी हँसिओ नहि सकैत छी। बेसी हँसब तँ लोक बताहे बूझत। आङनक घरक कोनो कोनमे एकटा कापी आ एकटा कलम रहैत छैक जाहिसँ लिखाइत छैक करेजक गप्प। दरबज्जाक घर महँक काँपीपर लिखाइत छैक नून-तरकारीक हिसाब।

नमहर  वाक्य-: आङनक  घरमे सहजता होइत छैक। दरबज्जाक घरमे कृत्रिमता।

घर मने एकटा ओहन मंच जाहिपर होइत रहैत छैक हर समय रंग-बिरंगी चौकी तोड़ नाच। एही चौकी-तोड़ नाचकेँ लोक गँड़िघुम्मा नाच कहैत जाइ छथि। आ नाचमे नटुआक जे घूमै घरक मूँह जरूर घूमि जाइत छैक। नाच खत्म भेलापर चौकी टूटल ककरो भेटतै की नहि भेटतै। मुदा टूटल मंच, टूटल घर जरूर भेटैत छैक। नाच शुरू होइत छैक चौकीतोड़क नामे मुदा अंतमे ओकर नाम रखबाक इच्छा भए जाइत छैक घरतोड़। मुदा ईहो एकरा अजगुते गप्प छैक जे एहि नाचक नाम हरेक बेर शुरू में चौकीतोड़ आ अंतमे घरतोड़ रहिते छैक। लोककेँ दूनू नाम पसिन्न छैक। एकैटा नामसँ गुजर नहि चलतै। आ ई घरे अछि जे एहि नाचमे ओ स्वयं भूमिका लैए आ दोसरो घरकेँ भूमिका दैए। आ सभ मीलि कए खेलैए चौकीतोड़ उर्फ घरतोड़ नाच।

आप्त वाक्य - : घर एकटा मंच छैक जाहिपर नाच होइत छैक। सभ मीलि नाचैए आ खुश होइए। साँझ होइए, भोर होइए। इजोरिआ जाइए अन्हरिआ अबैए। देबाल ढहैए, चार टुटैए। नेओं पडैए, पीलर गड़ाइए। एस्वेस्टस किनाइए वा छत ठोकाए। सभ किछु होइए। एक घरसँ एकैस घर होइए। होइत जाइए। होइत जएबाक लेल बाध्य होइए।

अन्तिम वाक्य - : घर ओ घर नहि अछि जे पहिने छल। घर ओ घर नहि रहत जे एखन अछि।

(कथा विधाक ई हमर दोसर प्रकाशित लघुकथा अछि जे कि पटनासँ प्रकाशित घर-बाहर नामक पत्रिकामे अक्टूबर-दिसम्बर 2008 अंकमे प्रकाशित भेल छल। विदेहक पाठक एवं आन माध्यमक नव पाठक लेल हम एकरा एहिठाम दऽ रहल छी।- आशीष अनचिन्हार)

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।