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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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रबीन्द्र नारायण मिश्र- धारावाहिक उपन्यास-लजकोटर

लजकोटर

(प्रवासीक जीवनपर आधारित) 

 (८म खेप)

-8-

 

दोसरदिन साँझमे गाम पहुँचलहुँ । मोनमे बहुत चिंता रहए जे पता नहि माएक की हाल होएत? बहुत दिनक बाद गाम आएल रही मुदा किछु बदलल नहि छल। सभकिछु ओहिनाक -ओहिना छल । हमरसभक घर गामक शुरुएमे अछि । टेम्पु सोझे हमर दनानपर ठाढ़ भेल । दनानपर किओ नहि छल । आगा बढ़लहुँ ।घरक ओसारापर सेहो किओ नहि छल । घरमे  गेलहुँ तँ माए चौकीपर पड़ल छलि । हमरा देखितहि उठबाक प्रयास केलीह मुदा उठि नहि सकलीह। बहुत कमजोर लगैत छलीह । मुदा होशमे छलीह । हाल-चाल पुछैत-पुछैत कानए लगलीह । हम पुछलिऐक-"की होइत छौक?"

" की कहिअह? असगर रहैत-रहैत मोन औँट भए गेल । बोखार से लगैत अछि ।"

"दबाइ नहि खाइत छही?"

" दबाइ के आनि दैत? किओ नहि फटकै छैक । आब गाम ओ गाम नहि अछि ।सभ अपन घरे-घरे बंद रहैत अछि । ककरोसँ कोनो मतलब नहि । पाबनि तिहारोमे सभ अपनेधरि सीमित रहैत अछि ।"

हम  चोट्टे बैदकेँ बजा अनलहुँ । गामक सभरोगीक इलाज ओएह करैत छलाह । माएक नारी देखिते कहलखिन –“हिनका कोनो बिमारी नहि छनि । एसगर रहैत-रहैत ई हाल भए गेलनि। किछु दबाइसभ दैत छी । दूसँ तीन दिनमे ठीक भए जेतीह ।"

बैद जी जाइत-जाइत कहि गेलाह-" हिनका आब असगर नहि छोड़बनि ।"

माएकआधा बिमारी तँ हमरा अएलेसँ ठीक भए गेलैक ।बैदजीक दबाइ सेहोबहुत फएदा केलकैक । माएक हालत क्रमशः ठीक होइत गेल । हमरा संगे रहलासँ ओकरा बहुत उसास भेलैक। लगबे नहि करैक जे  ओ एतेक दुखित छलि ।

हम कतेक दिन गाममे रहितहुँ । ओहिठाम किछु जोगार नहि रहैक । जथापात बिका गेल छल । जे कनीमनी बाँचल छल से दिआदबादसभ तेहन ओझरमे देने छलाह जे  कहिओ तफसिआनहि भए सकैत छल । तेँ दिल्ली तँ आपस जेबेक छल ,जहिआ जाइ । मुदा माएक की होएत? एहि चिंतासँ निन्न नहि होइत छल। गामक हालत  आब ओहन नहि छल । फगुआक समय छल । कतहुँ फाग नहि,किओ ककरोसँ भेंटघाँट नहि करैत देखाइत । सभ अपन-अपन दरबाजा पर बैसल समय बितबैत छलाह ।

एकटा समय छल जे फगुआसँ पन्द्रह दिन पहिनहि गीतनाद शुरु भए जाइत छल । फगुआ दिनक तँ बाते छोड़ू । रंग-अबीरसँ सौंसे गामक लोक सराबोर रहैत छल । डाफपर नचैत -गबैत लोकसभ भेदभाव बिसरि घरे-घर घुमि जाइत छल । मुदा ई समय थिकैक। बदलैत रहब एकर स्वभावछैक । बहुत किछु बदलल तहिना इहोसभ बदलि गेल । गामोसभ शहरक नकलमे लागि गेल । परिणाम ने ई गाम रहल ने शहर बनि सकल ।

माएकेँ गाममे एसगर छोड़ब उचित नहि छल ।तखन तँ ओकरो संगे लेने चली सएहटा समाधान बुझाइत छल मुदा ताहि हेतु ओकरा मनाएब मोसकिल काज छल । तथापि प्रयास करए लगलहुँ । माएकेँ कहलिऐक-" गामक हालत देखिए रहल छिही । एहिठाम गुजर होएब संभव नहि अछि ।शहर जाए पड़त । एहन हालतमे तोरा एसगर कोना छोड़ि दिऔक? "

" से किएक, गाममे एतेक लोक अछि, तकर गुजर कोना होइत छैक? तोरो भए जेतह । गामे रहह ।"

हमरा जोरसँ हँसी लागि गेल । माएक लगमे ओकर बेटा रहैक एहिसँ नीकबात आओर की भए सकैत छैक? मुदा जीवन मात्र भावनासँ नहि चलि सकैत छैक । गाममे आबछैहे की? ककरा लए कए रहत ? मुदा दिल्ली जेबाक हेतु माए तैयार नहि होथि । ई समस्याक समाधान नहि भए रहल छल ।

हम अपन माए-बापक असगर संतान छलहुँ । जे करक छल से हमरे । ककरोपर टारि नहि सकैत छलहुँ। माए तँ माए होइत अछि । जखन बहुतबेर बहुत आग्रह केलिऐक तँ ओ मानि गेल । फेर बिचार केलहुँ जे गाममे जे किछु जमीन बाँचल अछि से जौँ बिका जाइत तँ दिल्लीमे छोटोछीन घर लए लितहुँ जाहिसँ मासिक किराया देबएसँ पिंड छुटिजाइत ।

ककरो-ककरोसँ एहि विषयमे गप्प केलिऐक । एकाधगोटे कनीमनी बातो केलाह । मुदा गाम तँ गामे होइत अछि। केना-ने-केना हमर कक्का केँ ई बात पता लगलनि । ओ दौड़ले हमरा दलानपर अएलाह आ चिकरि-चिकरि कहए लगलाह-"हमर बाप-पितामहक चीज दोसर कीनत। भए नहि सकैत अछि । हम आइए,एहीठाम मटिआतेल ढ़ारि कए मरि जाएब ।औ बाबू! आब की होएत ? हमर माए बाहर अएलीह -"अहाँकेँ ई बातसभके कहलक अछि? एकर कोनो चर्चो नहि छैक। अपन कान देखब कि कौवाके खिहारब ।'

"से सभ हम नहि जानी । एक तँ आब अहाँक हिस्सा बाँचले कहाँ अछि?आ जौँ हेबो करत से पहिने हमर  होएत कि गौँआक? अहीं कहू?’’

एकटा दोसरे झंझट शुरु भए गेल । हम ओहि समय घरमे नहि रही । कनीकालक बाद  अएलहुँ तँ माए सभटा बात कहलक। आब की कएल जाए? मोने-मोन ई सबाल घुमए लागल।

गामक बात बुझि गेलिऐक । एहिठामसँ किछु  निकालब मोसकिल काज थिक । दोसरदिन भोरे बिना ककरो किछु कहने माएकेँ संग केलहुँ आ अन्हरौके रिक्सासँ दरभंगाबिदा भए गेलहुँ। दरभंगासँ  बिहार संपर्क क्रांतिमे आरक्षण छल । दुनूगोटे समयसँ अपन जगहपर बैसि गेलहुँ ।माएक मोन बहुत उदास छलैक । ओ दिन मोन पड़ि रहल छल जहिआ हमरा माए पहिलबेर दिल्ली बिदा केने रहए ।आइ हम ओकरो लए कए दिल्ली जा रहल छी। तथापि ओ उदास अछि । अपन लोकवेद,गाम-घर छुटबाक कष्ट ओकरा बौक बना देने रहैक । किछु बाजि नहि रहल छलि । ताबे रेल सीटी मारलकैक । प्लेटफार्मपरसँ ट्रेन सड़कि रहल छल । माए चुपचाप अपन नोर पोछि रहल छलि ।

जहिना -जहिना ट्रेनक पहिआघुमिरहल छल तहिना-तहिना माएक मोन दुखी होइत गेल। ककरा की कहितिऐक ? गप्प-सप्पमे ओकराओझरेबाक प्रयास करैत रहलहुँ । मुदा ओ गप्पो गामे घरक करैक? बातो सही छैक । भरि जिनगी गाममे रहलैक ,गप्प कथीक करतैक? ट्रेन सिमरिआसँ गुजरि रहल छल। माएकेँ से कहलिऐक ।ओ मोनहि मोन गंगाकेँ प्रणाम केलक आ एकटा सिक्का जोरसँ गंगामे फेकि देलक । ट्रेन आगा ससरि गेल ।ट्रेनक पहिआ गुड़कैत गेल । हमसभ आगा बढ़ैत रहलहुँ ।

पहिलबेर दिल्ली जाइतकाल ट्रेनमे बिना आरक्षणकेँ पैसि गेल रही । तकर दुखद अनुभव अखनो मोन पड़ैत रहैत छल । ट्रेनमे यात्रीसँ बेसी हेम- छेमक फल सेहो भोगने रही । मालतीक प्रति व्यर्थ सहानुभूतिक कारण कतेको परेसानीमे पड़ि गेल रही । तेँ एहिबेर अपनाभरि बहुतसतर्क रही । टिकट आरक्षण करओने रही। ककरोसँ गप्प-सप्प नहि करी । मुदा ताहिसँ की होएत? रेल तँ रेल थिक । कनीके कालमे एकटा नेताजी अपन सिपहसलारक संग आरक्षित डिब्बामे पैसि गेलाह । निरंतरपान चबा रहल छलाह तेँ किछु बाजल नहि होनि । सभटा काज चेला-चपाटीसभ करथि। बेस मोट-सोट छलाह । हुनकालेल नीचका शायिका चाही। जेनातेनाक एकटा यात्रीकेँ मनाओल गेल आ नेताजी निचुका शायिकापर बैसलाह । चेला-चपाटीसभ पानि अनलक,चाह अनलक ,तरह-तरहसँ हुनकर सेवा करए लागल । ककरो सीट नहि रहैक । तेँ दोसर यात्रीसभक जगह धकिअओने जा रहल छल । के बाजत आ के सुनत? सभ किछुकबाद नेताजी सुतबाक दबाइ खेलथि आ शायिकापर पसरि गेलाह ।

नेताजीक मुँहमे थूकभरि गेल छल । ओ पच दए पीक  फेकलाह । डिब्बामे त्रहिमाम मचि गेल ।सभटा  थूक एकटा  बूढ यात्रीक माथपर जा कए खसल । तकरबाद जे भेल से की कहू ?चारूकातसँ ओकर लोकबेद नेताजीकेँ गरिआबएलागल । ओकर चेला-चपाटीसभ फोंफ काटि रहल छल । जाबे-जाबे किओ किछु बुझितए सभ नेताजीकेँ  धै मारलक। नेताजी बाप-बाप कए रहल छलाह । उपरका शायिकापर फोंफ काटि रहल हुनकर चेलासभक निन्न टुटलैक । मुदा ताबे तँ नेताजीक सभगति भए गेल छल ।  चलैत ट्रेनमे एहन घटना नहि देखने छलहुँ । बहुत मोसकिलसँ मामला सम्हरल । दोसर दिन दूपहरमे ट्रेन दिल्ली टीसन पर पहुँचल ।दिल्ली टीसन पर नेताजीक चेलाचपाटीसभ ओहि बुढ़बा आ ओकर लोकवेदसभकेँ घेरि लेलक आ गारि-मारि करए लागल। हम माएकेँ लेने कहुनाकए जान बचा कए ओतएसँ घसकि गेलहुँ ।

 

रबीन्द्र नारायण मिश्र, पिताक नाम : स्वर्गीय सूर्य नारायण मिश्र, माताक नाम : स्वर्गीया दयाकाशी देवी, बएस : ६६ बर्ख, पैतृक ग्राम : अड़ेर डीह, मातृक : सिन्घिआ ड्योढ़ी, वृति : भारत सरकारक उप सचिव (सेवा निवृत्त)/ स्पेशल मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेटदिल्ली(सेवा निवृत्त), शिक्षा : चन्द्रधारी मिथिला महाविद्यालयसँ बी.एस-सी. भौतिक विज्ञानमे प्रतिष्ठा : दिल्ली विश्वविद्यालयसँ विधि स्नातक
प्रकाशित कृति : मैथिलीमे:-
१. ‘भोरसँ साँझ धरि’ (आत्म कथा)२. ‘प्रसंगवश’ (निवंध)३. ‘स्वर्ग एतहि अछि’ (यात्रा प्रसंग)४. ‘फसाद’ (कथा संग्रह) ५. `नमस्तस्यै’ (उपन्यास) ६. विविध प्रसंग (निवंध ) ७.महराज(उपन्यास) ८.लजकोटर(उपन्यास)९.सीमाक ओहि पार(उपन्यास)१०.समाधान(निवंध संग्रह) ११.मातृभूमि(उपन्यास)१२.स्वप्नलोक(उपन्यास)१३.शंखनाद(उपन्यास)१४.इएह थिक जीवन(संस्मरण)

In English:-
1.The Lost House (Collection of short stories)
2.Life is an art
हिन्दी में 
१.न्याय की गुहार(उपन्यास)
(
उपरोक्त पोथीसभ pothi.com, amazon.com आओर www.flipkart.com पर सँ कीनल जा सकैत अछि)
इमेल : mishrarn@gmail.com ब्लोग : mishrarn.blogspot.com 
एमजोनक लेखक पृष्ठ : amazon.com/author/rnmishra

 

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