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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम

विदेह नूतन अंक गद्य  

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(c)२००४-१०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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.-राज नाथ मिश्र- कथा- मस्ती

.कुमार मनोज कश्यप- कथा-नोरक दू ठोप

 

 

 

राज नाथ मिश्र

 

 कथा- मस्ती 

रातिक पहिल पहर बीत गेल छल। अलसाएल मदमातलि राजकुमारी रौशनआरा मसनद पर लुढ़कलि पड़ल छलि।  चिन्ताग्रस्त प्रतीत होइत छलि। मुदा कामोत्तेजित  वासनाक तीब्र चमकसँ ओकर आँखिमे एक विशिष्ट रंगत स्पष्ट परिलक्षित भऽ रहल छल। उत्तेजनाक पराकाष्ठाक कारणे ओकर गौर-वर्णीय चेहरा असाधारण ढंग सँ रक्ताभ भऽ उठल  छल । केराक बीर सनक धानी रंगक मलमलक पोषाकमे ओकर मांसलता झिलमिला रहल छल, जना कि शीषाक स्वच्छ आ पारदर्शी बोतलमे मदिरा देखि पड़ैछ । ई पोशाक ओकर यौवनक मनोरम छटाकेँ बहुगुणित कए किछु अधिके कमनीय बना रहल छल । कामसुन्दरि रौशनआरा अप्रतीम यौवनक मलकानि छलि । ओकर रूपसागरमे किछु एहन माधुर्य छल जे देखए बलाक मन अनायासे उन्मत्त भऽ उठैत छल । अंग-प्रत्यंग साँचमे ढलल-कोमलताक पराकाष्ठा  कमनीयताक   उत्तुंगता। मुख-माधुर्य  विलाससँ परिपूर्ण कारी कारी केश, मदमातलि रतनार नयन। गौरवर्ण चेहराक रंग जना दूधमे सिन्दूर घोरल । ठोर लालटेस, डाँर पातरि, उन्नत उरोज, पुष्ट नितम्ब, कामाग्नि दहकाबएबला । ओकर सुषमा ओ लावण्य ककरहु मुर्छित करबा हेतुए पर्याप्त ।    धानी वस्त्र पर सोनहुला जरी बड्ड फबि रहल छल ।  केश-पाश बड़ सुरूचिपूर्ण रूपेँ गाँथल छल, जाहिमे सँ निकलैत फुलेलक मधुर सुगंधि वातावरणकेँ मादक बना रहल छल आ ताहिमे चोटीमे गाँथल सुविकसित बेला फूलक माला सँ निकलैत सुवास ताहि मादकताकेँ अभिवृद्धि कए रहल छल । माथ पर कनेक लापरवाहीसँ राखल फिरोजी रंगक जरीयुक्त मलमलक ओढ़नी । गरामे लालरंगक मणिमालाक संगहि श्वेत मोतीमाल आपसमे ओझराकक उन्नत उरोजसं टकरा-टकराकक खेल कए रहल छल । दुहू कानमे बेस भरिगर सोनाक कर्णफूल आ ताहिमे जड़ल हरित पन्ना । छाती पर चित्रमय विचित्र हार ताहिमे अनेक हीरा जड़ल छल । नीलम जड़ल पहुँची हाथक शोभा बढ़ा रहल छल । अँगुठा छोड़ि सभ आँगुरमे  अँगुठी जाहिमे  रंग-बिरंगा जवाहरात चमकि रहल छल । डाँरामे तीन आँगुर चाकर सोनाक डरकस । कोमल पएरमे चानीक पाजेब जाहिमे लटकल छोट-छोट घुंघरूक संग श्वेत मोतीक लड़ी । संपूर्ण पोषाक अतरसँ सराबोर ।

सल्तनते मुगलियाक शाही मुगल खानदानक दू गोट विशेषता खानदानक स्त्रीगणक दृष्टिएँ अति विशिष्ट रहल अछि । प्रथम ई जे शाही खानदानक स्त्रीगण लोकनि परदाक अभ्यन्तर रहैत छलि । मुदा सात परदाक तरमे रहितो राजनीति ओ कूटनीति सतरंजक माहिर खेलाड़िन सभ छलि । आ एहि खेलमे पूर्ण दक्षता ओ चातुरीसँ हिस्सा लैत छलि । आ द्वितीयतः मुगल राजकुमारी--शाहजादी--- लोकनिक विवाह नहि होइत छल । यद्यपि शाहजादी लोकनिक  अभिसार आ अनुचित गुप्त प्रेम प्रसंगक कथा कतेको बेर चर्चित होइत रहल छल मुदा मुगल बादशाह कहियेा ककरहु अपन जमाए नहि बनबथि । ई नियम शहंसाह अकबर बनौलनि आ एकर अनुपालन सभ केओ परवर्ती मुगल बादशाह लोकनि कएलनि ।

...

कामवासनामे दहकैत रौशनआरा किछुकाल मसनद पर ओङठल   रहलि । फेर थपड़ी बजाए नौरिनिकेँ बजौलनि । राजकुमारीक इशारा पाबि नौड़िनि मदिराक सुराही ओ स्वर्ण प्याली प्रस्तुत कएलक । कामरसक पांच-सात प्याली जखन कंठक नीचा उतरबाक छल कि राजकुमारी मदमस्त भए उठलि आ नौड़िनिकेँ गीत गौनिहारि के बजएबाक आदेश देलनि । किछुए कालक पछाति स्वर लहरीक पंचम चतुर्दिक अपन साम्राज्य पसारि लेलक । मुदा मनक अशान्ति बढ़ैत गेल । उष्ण होइत शरीरकेँ शीतलता प्रदान करबामे मदिराक मादकता ओ संगीतक सरगम दुहू निष्फल रहल ।  उनटे उद्दीपन ओ उताप्ततामे आओरो जुआरि आबि गेल । कामाग्निक बाढ़ि जखन हदक बान्ह तोड़बा हेतु आतुर भ गेल तखन ओ हाथक इशारासँ  गीतगाइन लोकनिकें  जएबाक आदेश देलनि । कामत्तेजनासँ मुखाकृति आओरो अधिक रक्ताभ भए उठल छल । श्वास-प्रश्वास तीब्र सँ तीब्रतर होइत होइत बिड़ड़ो जना आबि गेल रहय ।

 

खासमखास नौड़िनि नसीमबानूक बजौहटि भेल । ओ उपस्थित भए चुपचाप मूड़ी झुकौने आदर भावें ठाढ़ि छलि ।

 

                -------बादशाह सलामत अखन की कऽ रहल छथि।

                --------हुजूर  !  अखन ओ दरबार-ए-खासमे आबि गेल छथि।

                --------की वाकयानबीस अपन रोजनामचा  सुना देलक।

                ---------अखन नहि । अखन बादशाह सलामत बड़ी बेगम साहिबाक संग किछु अंतरंग बिचार-विमर्शमे लागल छथि।

                --------सुन तों जो । आ सुनने अबै । वाकयानवीस किछु नब  खबरि सुनबैत छथि कि नहि।

                --------बेस  सरकार, जे हुकुम।

 

खास नौड़िनि नसीमाबानूक गेलाक उपरान्त राजकुमारी अपनहि हाथें मदिरा ढारि ओहिमे गुलाबजल फेंटि पीबए लागलि । किछु क्षण टकटकी लगौने जरैत मोमबत्ती देखलनि आ फेर नौड़िनि बजएबाक हेतुए थपड़ी बजौलनि । पहरेदारिन नौड़िनि उपस्थित भेल ।

 

                --------रज़िया कतए अछि।

                -------सरकारक आज्ञाक प्रतीक्षामे बैसल छथि ।

                 ------ओकरा पठा दही आ देख एहि बीचमे केओ भीतर नहि आबए।

                -------- आदेश।

 

माथ झुकबैत पहरेदारिन बाहर भेल। रज़िया  आबि सलामी देलक। अलसाएल नजरिए ओकरा दिस तकैत राजकुमारी पूछलनि-

                ---------काज भेलौ ।

                ---------जी सरकार ।

        ---------ज्योतिषीजी भेटलखुन।

                -------जी, जी हं।

                --------सभ बात हुनका नीक जकां बुझा देलहुन।

       -------जी सरकार, आज्ञाक अपुरूपें सभ ठीक ठाक भऽ गेल।

       ----------तोरा बुझेलाक अनुरूपें  दारा शिकोह कें भ्रमित करबामे की ओ सफल रहलाह।

        ---------जी सरकार। सोलहो आना  राजकुमारीजीक इच्छानुसारें सभ किछु रहल ।

 

राजकुमारी देह परसँ ओढ़नी उतारि फेकैत पुनः मसनद पर ओलरि गेलि । किछु क्षण सोचलनि । पुनः मदिराक प्याली उठबैत चुस्की लेलनि ।

 

      ----------आ दोसर काजक की भेलौ।

     -----------ओ हो भऽ गेल सरकार।

     ----------सुभीता सँ।

     ----------जी हुजूर।

    ----------के छौ।

     -----------एकटा अफीमची अछि हुजूर । बहुत   दिनस जनैत छियैक ओकरा।

    ----------काज संवेदनशील छौक से बुझै छही।

    -----------सरकार हुजूर अपने बेफिकिर रहियौ ने। सभटा नीक जकां हेतै ।

        ---------बेस त ठीक छौ। बनो एक प्याली ।

आज्ञा पाबि रज़िया प्यालामे मदिरा ढारलक ताहिमे गुलाबजल फेंटलक आ सेवामे प्रस्तुत कएलक । मातलि राजकुमारी किछु विहुंसैत

    --------- बेस आ तेसर काज।

    --------सेहो भऽगेल हुजूर।

         ------कतए छौक।

    ----------सरकारक खास कोठरीमे ।

 

मुगल शाहजादी राजकुमारी रौशनआरा अपन गरास मोतीमाल उतारि रज़िया पर फेंकलनि । आ मुस्कीदैत मदिरा दिस इशारा कएलनि । रज़िया देमए लागलि ।

 

ताबतहि नसीमबानू उपस्थित भेलि । झुकि-झुकि कोर्निस करैत आदाब बजौलनि । राजकुमारी आँखिक इशारासँ रज़ियाके बाहर जएबाक आदेश देलनि । मातलि रौशनआरा नसीमा दिस तकलनि ।

 

        ---------बादशाह सलामत ख्वाबगाह गेलाह।

        --------जी नहि सरकार। अखन धरि त नहि ।

        --------खबरनबीस रोजनामचा सुनौलनि।

        --------जी हुजूर ।

        --------कोनो खास विन्दु ।

        --------जी राजकुमार दारा शिकोह ओहि चालीस कैदीक हाथ कटबा देलनि अछि जे शहजादा शुज़ाक संग लड़ाईमे बन्दी बनाओल गेल छल ।

        --------आओर।

        --------पछाति सरकारे औलिया आ शाहजादा दारा मे  खूब थुक्कम फजीहत भेल ।

        --------कोन बात पर।

        --------बादशाह सलामतक कथनी छलनि जे तुरत सुलेमानके आपस बजबालेबाक चाही मुदा दारा एहि बात पर अड़ल रहथि जे सुलेमान  शहजादा शुजा के बंगाल धरि खिहारथि ।

रौशनआरा बिहुंसि उठलि --------दिव्य, बड़ सुन्दर। नसीमा तों बादशाह सलामतकेँ ख्वाबगाह जेबाकाल धरि ओतहि उपस्थित रहि सब देख सुन ।

        --------बड़ बेस सरकार ।

कहैत नसीमबानू चलि गेलि । थपड़ी पड़ल, रज़िया आएलि ।

        -------अच्छा त तों ई बतो जे ज्योतषी शाहजादा दाराकेँ की कहलकैक।

        --------सरकार, शाहजादा दाराकेँ ज्योतिषी नीक जकाँ बुझा देलनि अछि जे सुलेमान शिकोह एहि अभियानमे विजयी भए लौटताह । अखनुक ग्रह-गोचर स्थिति पूर्णतया अनुकूल अछि ।तहि अखनहि बंगाल, बिहार, उड़ीसा पर दखल क लेल जाए ।

        --------वाह, वाह बेजोड़।

        -------जी सरकार। सभ त हुजूरेक उर्वरा मस्तिष्कक उपजा थिक।

        --------रज़िया ।

        -------सरकार ।

        --------तों कहलें जे ओ बहुत मनभावन अछि ।

        --------जी सरकार, खनदानी थिक हुजूर ।

        --------अच्छा एक प्याली पिओ ।

रज़िया प्याली भरलक । शाहजादी रौशनआरा ओकरा एकहि साँसमे गटकि गेलि । प्याली ओंघरा देलनि । उठलि । ऊपरसँ नीचा धरि ऐंचैत, देह तोडै़त उठलि । बाजलि-- श्चल लऽ चल खास कोठरीमे, देखी आजुक रातिक शिकार केहन चुनलंे अछि ।

 

नौड़िन रज़िया सहारा दैत उठौलक शाहजादी रौशनआरा डगमगाइत खास कोठरीमे

चलि गेलि...............

कुमार मनोज कश्यप

 

कथा-नोरक दू ठोप

 

कोट के उतारि कऽ सोफा पर पेक जकाँ देलियै आ पैर टेबुल पर राखि कऽ हम आँखि बन्न कऽ लेने रही । थाकल-ठेहियायल कतहु सँ आबि कऽ टेबुल पर पैर राखि कऽ बैसनाई हमर प््रिाय आदति रहल अछि शुरूहे सँ । एहन उमस मे दिन भरिक भाग-दौड़़़क़ंोर्टक एहि रूम-सँ-ओहि रूम, कखनो पुस्तकालय तऽ कखनो मुवक्किंल सभ सँ किंछु बुझैत वा ओकरा सभ कें किंछु बुझबैत़़ भरि दिन यैह करैत-करैत मोन असोथकिंत भऽ जाईत अछि आ शरीर बेजान । एहने मे कखन आँखि लागि गेल से बुझबो ने केलियै। कनियाँ जगओलनि - 'जा निन्न पड़ि गेलियै ! चाह सेरा रहल अछि । ' हम हड़बड़ा कऽ उठलहुँ आ जल्दी-जल्दी चाह सुड़किं गेलहुँ । गरम-गरम चाह पीयब हमरा नीक लगैत अछि  जतबा काल केयो एक-दू घोंट चाह पिबैत अछि ततबा काल हमर कप खाली भऽ कऽ नीचा रखा गेल रहैत अछि ।

 

हम प्रेश भऽ लॉन मे आबि गेल रही। कनियाँ पहिनहिं सँ ओतऽ हमर बाट जोहि रहल छलीह । एम्हर-ओम्हरक गप्पक बाद बात केस-मोकदमा के एलै । 'भने मोन पाड़लहुँआई एकटा बुढ़ी आहाँक ठेकान पुछैत-पुछैत आयल छल़़ बड़ अभागलि अछि ओ ! अपने जनमाओल बेटा  अपडेर देने छै बेचारी के ! हे हम नेहोरा करैत छी़ओकर केस लड़ियौ आहाँ देखला सँ तऽ ओ बड़ निर्धन बुझायल हमरा । फीस तऽ साईत नहियें दऽ सकत़़मुदा एकटा सामाजिक सरोकार बुझि मदति कऽ दियौ बेचारी के़। ' कनियाँ नेहोरा-पर-नेहोरा केने जा रहल छलीह ।

 

'मुदा केस की छै से तऽ पहिने बुझियै? '

 

'केस की छै, एकटा भावनात्मक अत्याचार छै ओहि अबला मसोम्माति पर । हे हमरा सद्यः विश्वास अछि आहाँ ई केस जीतबे करब ! खाली आहाँ  'हँ ' कहि दियौ़ज़ीवन भरि ओ आशीर्वाद दैत रहत बाल-बच्चा के । '

 

'पहिने केस तऽ बताऊ़़ओहिना बुझौआल बुझेने जा रहल छी । ' हमर स्वर मे कनेक खौंझाहटि आबि गेल छल ।

 

'केस तऽ मामूलिये छै़ओहि बुढ़ी के एक्के टा बेटा छै़ओकर बेटा जखन दूईये साल के रहै तखने ओकर घरवला मरि गेलै । कहुना-कहुना कऽ बुढ़ी ओहि बेटा के पढ़ा-लिखा कऽ समर्थ बनेलकै़एखन बेटा बैंक मे कोनो नीक पद पर काज कऽ रहल छै । बेटा पुतोहु के कहल मे आबि कऽ बुढ़ माय के अपना संगे नहिं राखय चाहि रहल छै । बुढ़ी के कहब छै जे जाहि बेटा के लेल हम अपन सभ किंछु गमा लेलहुँ ओहि करेजा के टुक़ंडा सऽ हम मरबा काल कोना दूर रहि सकैत छी । ओना ओकर बेटा ओकरा अपना सँ दूर घर दऽ नीक-सँ-नीक  सुख-सुविधा देबाक हेतु तैयार छै । मुदा बुढ़ी अपन बेटा सँ दूर नहिं रहऽ चाहि रहल छै । '

 

'केस मनलग्गू छैक भावनात्मक  छैक  ओकर 'मास अपील' छैक ओकर निर्णय के दूरगामी प््राभाव समाज पर पड़ि सकैत छैक  ।' हम मामला मे अपना के विभोर केने जाईत रही । कनियाँ हमरा सोच मे पड़ल देखि कहलनि -' काल्हि रविये छै, भोरके पहर मे ओकरा बजेने छियै । अपने सभटा पुछि लेबै। बेचारी के आँखिक नोर नहिं सुखाईत छलै । झाँट धरू एहन बेटा के जे माय ओकरा परवरिस कऽ कऽ एतेक टा बनेलकै़मनुक्ख बनेलकै़ओ अपन माय के नहिं डेब सकलै। हे हम पैर पक़ंडैत छी़आहाँ नामी ओकील छी़बुढ़ी के न्याय दिया दियौ । ' कनियाँ पेर अनुनय-विनय पर उतरि गेल छलीह।

 

केस हमरो रोचक लागल रहै । दोसर, कतेको मामला मे कोर्टक निर्णय आयल छै जे संतानक दायित्व बनैत छै जे ओ अपन माय-बाप के परवरिस करय, तैं केस साधारने छलै । साँच पुछी तऽ कोनो बुड़िबको ओकिंल ई केस जीत सकैत छल ।

 

छुट्‌टी के दिन हम अपन निन्नक सभटा बैकलॉग कोटा पूरा करैत छी । दिन माथक उपर आबि गेल छलैक । कनियाँ सिरमा मे बैसि कऽ हमर केस मे अपन आँगुर पेरैत हमरा जगौलनि - 'ओ बुढ़ी आबि कऽ कखन सँ ने बैसलि अछि । आब उठि जाऊ । पेर दिन मे सुति रहब । एहि प््राचंड रौद मे बुढ़ी के पैरे दू कोस गाम जाई के छै । '

 

चाय के चुस्कंी संग हम ओहि बुढ़ी के सभटा बात ध्यान सँ सुनैत रहलहुँ । अपन जुनियर सिन्हा के कहलियै - 'ड्रापत्ट अप्लीकेशन बना कऽ लऽ आऊ। काल्हि केस फाईल कऽ देबै । ' कनियाँ बुढ़ी के किंछु पानि पीबय देने रहथिन । हम आन केस सभ मे व्यस्त भऽ गेल रही ।

 

केस मे उम्मीद सँ बेसी जीरह चलि रहल छै । हमर कहब रहय जे एकमात्र संतान हेबाक कारणे बुढ़ीक बेटा के पूरा-पूरा जिम्मेदारी छै जे ओ अपन बुढ़ माय के देखभाल करय । हम अपन बात पर जोर दैत बजलहुँ - ' मी लॉर्ड ! मेंटीनेंस एंड वेलपेयर ऑफ पीरेंट्‌स एंड सिनियर सीटीजन एक्ट, २००७ के पारित भेला सँ संतान अपन बुढ़ माय-बाप के पालन-पोषण के जिम्मेदारी सँ भागि नहिं सकैत अछि । एहि सम्बंध मे कतेको  न्यायाधिकरण आ न्यायालय के रूलिंग उपलब्ध अछि ।  हमर मुवक्किंल के ओकर एकमात्र बेटा जे ओकर जायदाद के एकमात्र वारिस सेहो छैक, के पूर्ण जिम्मेदारी बनैत छैक जे अपन बूढ़ माय के उचित देखभाल करय । अहू सभ सँ पैघ बात 'मी लॉर्ड' जे जे माय कोना-कोना अपन पेट काटि बेटा के पालि-पोसि आई लायक बनेलकै, ओहि माय के जँ बेटा पेट नहिं भरि सकय, ओकरा दू हाथ वस्त्र नहिं दऽ सकय, ओकर दवाई-विरो नहिं करा सकय तऽ ओ बेटा  बेटा कहेबाक कथमपि योग्य नहिं । '

 

'ऑब्जेक्शन मी लॉर्ड ! ई आरोप सरासर फुसि अछि जे हमर मुव्वकील  बुढ़ माय के परवरिश नहिं कऽ रहलाह अछि । सत्य तऽ ई अछि माई लॉर्ड जे ई अपन माय के नीक-सँ-नीक सुख-सुविधा दऽ रहल छथि आ भविष्यो मे दैत रहबाक वचन दैत छथि । हुनका कोनो तरहक असुविधा वा कष्ट नहिं होनि ताहि लेल एकटा फुल टाईम नोकरनी राखि देल गेल छनि़नियमित डॉक्टरी जँाच आ दवाई-विरो के व्यवस्था कयल गेल छनि़घर मे सभ सुख-सुविधा उपलब्ध कराओल गेल छनि । केवल हमर मुवक्कंील अपन माय के अपना संगे नहिं राखि रहल छथि तकर कारण छैक सासु-पुतोहु मे दिन-राति झगड़ा़दुनू सासु-पुतोहु एक दोसरा के फुटलियो आँखि नहिं देखऽ चाहैत छथि । एना मे घर के नर्क बनेबा सँ तऽ नीक जे बुढ़ी अलग रहथि । एहि सँ ओहो शाँति सँ रहतीह आ हुनकर बेटा - माने हमर मुवक्कंील सेहो । '

 

'मी लॉर्ड ! जे माय बेटा के नान्ही टा सर्दी-बोखार भेला पर भरि-भरि राति जागि कऽ बीता देने होई, जाहि माय के लेल दुनियाँ के सभ सँ प््रिाय वस्तु ओकर करेजा के टुक़ंडा होई , जे माय अपन बेटा के खातिर अपन सर्वस्व लुटा देने होई, आई मरन-काल मे ओहि माय के कहल जाय जे ओ अपन बेटा सँ दूर रहय तऽ ई एकटा मायक ममता पर सरासर कुठाराघात नहिं तऽ आर की भऽ सकैत छैक ? तैं हमर ई हाथ जोड़ि कऽ निवेदन अछि जज साहेब जे हमर मुवक्कंील के मरन काल मे अपन बेटा के संग रहबाक अंतिम ईच्छा के पूरा कऽ दियौ । हमर क्लाईंट के सुख-सुविधा, नोकर-चाकर किंछु नहिं चाहियै़बस एकेटा अंतिम ईच्छा जे अपन करेजा के टुक़ंडा के देखैत प््रााण त्याग करी़। ' बजैत-बजैत हमर गला भरि गेल छल, आँखि मे नोर डबडबा गेल छल । चश्मा निकालि कऽ रूमाल सँ हम अपन आँखि पोछि पेर सँ चश्मा पहिरी लैत छी । कोर्टक महौल भारी भऽ गेल छलैक ।

 

दुनू पक्ष-विपक्ष सँ तर्कक वाण चलैत रहलै़ज़ज साहेब किंछु-किंछु नोट करैत रहलाह़़लोक सभक ज़िग्याशा बढ़ले जाईत रहलै। आब पैसला के घड़ी आबि गेल छलै़सभ साँस रोकने सुनि रहल छल । जज साहेब खखसि कऽ गला साफ केलनि आ पैसला सुना देलनि -'घोड़ा के पानि पियेबाक लेल घाट पर तऽ लऽ कऽ जायल जा सकैत छैक, मुदा ओकरा पानि पीबाक लेल बाध्य नहिं कयल जा सकैत छै । तहिना यदि हम प््रातिवादी के आदेश कईयो दियै जे ओ वादी के अपने संगे अपने घर मे राखै तऽ परिणाम भऽ सकैछ जे वादी-प््रातिवादी दुनूक जीवन अशांत भऽ जाय । एहि स्थिति सँ नीक जे प््रातिवादी स्वयं निर्णय लेथि । तैं हम प््रातिवादीये पर ई मामला छोड़ैत छियनि़ज़न्म देनिहारि माय तऽ आखिर हिनके छियनि । ' कहि कऽ जज साहेब फुर्ती सँ अपन कुर्सी सँ उठि कऽ चलि गेलाह । कोर्ट-रूम मे लोकक बीच घोल-फचक्कंा शुरू भऽ गेलै़ज़तेक मुँह तते तरहक बात । ओ बुढ़ी हमरा निरिह आँखिये ताकैत कोर्ट-रूम सँ बहरा रहल छलीह । हमरा लागल़़हमर ओकालति के ई सभ सँ पैघ हारि अछि । हम झट्‌ट सँ बाहर निकलि कऽ कऽल जोड़ि कऽ बुढ़ी के आगू मे ठाढ़ भऽ गेलहुँ  -'माताजी ! आहाँ चिंता जुनि करू । हम काल्हिये केस फाईल बना कऽ हाई-कोर्ट मे अपील करैत छी़हमर जीत निश्िचते होयत़़। ' ओ बुढ़ी बामा हाथ सँ हमरा कात करैत बिना किंछु बजने आगू बढ़ि गेलीह । ओ अपन रस्ता पर जा रहल छलीह । हम अबाक भेल हुनकर रस्ता दिस तकैत रहि गेल छी़अपलक माटिक मूर्ति जकाँ स्थिर । नोरक दू ठोप टघरि कऽ गाल पर आबि गेल अछि ।

 

 

 

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