
संतोष कुमार राय 'बटोही'
समीक्षा-
पोथी
: गामक सुख ( कविता-संग्रह )
पोथी : गामक सुख ( कविता-संग्रह )
कवि : राम विलास साहु
प्रकाशन : पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल)
कवि राम विलास साहु जी केर ई चारिम प्रकाशित पोथी छियैन्ह । हम संपूर्ण
पोथीक समीक्षा नहि कऽ रहल छी , परञ्च अइ पोथीक कविताक रसास्वादन केलाक पछैत
लागल मे अइ पोथीक लेल किछु लिखल जेवाक चाही । ई पोथी कवि हमरा 'सगर राति
दीप जरय' कथा गोष्ठी मे सहुरिया- नवटोली गाम मे भेंट स्वरूप देने रहैत ।
इस्कूलक पठन-पाठन आओर घरक जिम्मेदारीक धियान राखैत पोथी के नहि पढ़ि
सकलहुँ, परञ्च फुरसत मिलला पर अइ पोथी केँ पढ़लहुँ अछि ।
'गामक सुख' कविता-संग्रह केँ पहिल कविता अछि - 'मनक मोलि' । कवि मोनक मोलि
धोवाक परयास करैत छथि । एकटा आम मानस मे ई प्रचलित अछि जे गंगा (नदी) आओर
कुण्ड मे नहेला सँ पाप धुलि जाएत छै । तीर्थाटन केला सँ पुण्य होएत छै । तन
रंगेला सँ यानी तिलक-चानन कएला सँ मोन संमार्ग पर चलअ लगैत छै । मोन भक्ति
रस मे डुबेला सँ देहक खरकटल मोलि धुलि जाएत छै। परञ्च कवि लिखैत छथि -
" तीर्थक पुण्य बहुत कमेलौं
नदी, कुण्डमे स्नानो भेल
तन रंगेलौं मन रमेलौं
तैयो ने छुटल मनक मोलि ।"
कवि साहु जी केर ई पाँति पढ़ि कऽ कबीर साहबक पाँति याद आबि रहल अछि -
" माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का नमका डार दे, मन का मनका फेर ।"
कवि साहु जी आओर कबीर साहब मे भावसाम्य देखा रहल अछि । कवि कबीर साहब सँ
आओर संसारक अनुभव सँ प्रेरित भऽ लिखलाह अछि जे साहित्यिक गतिविधि सँ
जुड़लाक बाद आओर विद्वानक सत्संगति केलाक बाद तन-मन निर्मल भऽ गेल -
" बिनु जप-तप केनहि हमरा
तन-मन निर्मल भऽ गेल
तखने छुटि गेल मनक मोलि ।"
ओना तँ अइ कलियुग मे मोनक मोलि छुटनै बड़ गप्प छियैय, परञ्च कवि साहुजी अइ
संसार केँ मोलि छोड़वाक लेल प्रेरित करवाक परयास करैत छथि ।
कवि राम विलास साहु जीक ई कविता 'केकरा लेल बनल' केर शीर्षक ' ई देश केकरा
लेल बनल' रहला सँ नीक लगतै । 1947 सँ पहिने देश गुलाम छल । गुलामी की होएत
छै से ओई समयक लोकनि भोगने हेताह । परञ्च पन्द्रह अगस्त, 1947 केँ देश आजाद
भेलाक अतेक साल बितलाक बादो देश मे समस्या सभ किछु पहिने जकाँ छेबे करै ।
देश मे योजना केर की हाल छै से कवि साहुजी लिखैत छथि -
" गरीबक नाओंपर योजना बनल
शिक्षा स्वास्थमे घुन लगल
माटि-पानि दवाइमे जहर घोरल
धरासँ अम्बर धरि इंसान बदलल
ई देश केकरा लेल बनल ।"
देश मे लूट, हत्या, अपहरण बढ़ि गेल छै। धरम केर नाओं पर देश केँ बँटवाक
परयास भ रहल छै । नेता आओर अधिकारी सभ मालामाल भऽ रहल छथि।
किसान अपन खेत छोड़ि परदेश खटि रहल छथि । देश सभ बेवस्था चरमरा गेल छै ।
कवि लिखैत छथि -
" महगी घुसखोरी सँ चैन उड़ल
-------------------------------------
भेदभावक बीच जिनगी मरल
लूट हत्या अपहरण होइत रहल
ई देश केकरा लेल बनल ।"
कवि राम विलास साहुजी धर्मक पाखण्डी सभ पर अपन कविता 'धर्मक उपदेश की भेल'
मे चोट करैत लिखैत छथि -
"सूर तुलसी कबीर मीराकेँ बिसैर गेल
नीति उपदेश वेद पुराण शास्त्र
जेना कलियुगमे तर पड़ि गेल-ए
जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए
तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए ।
कलियुग मे धर्मी सभ विधर्मी भऽ चुकल अछि । नारी संग बेभचार कऽ रहल अछि।
गुरमित सिंह रामरहिम, रामपाल, आशाराम वगैरह धार्मिक गुरु जनीजाति संग
बेभचार कऽ रहल अछि। एहेन वेक्ति उपदेश देनिहार बनल अछि। कवि साहुजी लिखैत
छथि -
"रावण रामपाल, गुरमित सिंह राम रहिम
नारी संग अत्याचारक रास नचैए
चारू युगमे कलियुग भारी पड़ल-ए
धर्मक आड़िक पाछू इंसानो शैतान
जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए
तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए ।"
समय तेतेक खराब भऽ चुकल छै जे धर्मक चोला पहिर कऽ किछु बाबाजी साधुक खाल मे
शैतान बनि गेल घुमि रहल छथि । ओही बाबाजीक लेल कवि साहुजी लिखैत छथि -
"सज्जन, संत, महंथ, तपसी बनि कऽ
वन पर्वतमे नुकाएल फिरैए
× × × × × × ×
जेतए इंसानक कातिल इंसाने होइए
तेतए धर्मक उपदेश की भेल-ए ।"
समय तऽ एहेन आबि गेल छै जे ककरो कियो नहि चिन्हैत छै । समाज आओर परिवार
टुटि रहल छै । मनुक्ख मनुक्ख नहि रहि गेल छै । जिनगी केँ आपाधापी मे लोक
माय-बाप केँ भुलि रहल छथि। कवि चिंचित छथि आओर लिखैत छथि -
" माए-बाप हक्कन कनैए
अछैते औरुदे घरमे मरैए
पुत्र-कुपुत्र बनि ऐंठैए
एक-दोसर केँ देख जरैए ।"
कवि राम विलास साहुजी केँ जिनगी केर ढेर रास अनुभव छन्हि । अइ
कविता-संग्रहक सभ कविता कविजीक वृहद अनुभव सँ सिक्त छन्हि । परञ्च विराम
चिह्न केर प्रयोग कम केने छथि जाहि कारणे पढ़वाक गति मे वा सस्वर वाचन मे
किछु बेवधान होएत छै ।
अइ संग्रह मे विरही नायिकाक चित्रण सेहो हिया केँ छु दैत छै आओर पूरा देह
के झकझोरि दैत छै । कवि अपन कविता ' जीबिते जी मरै छी' मे विरही नायिकाक
मुँह सँ कहावैत छथि -
"केकरा देख जीअब
दुनियाँ अन्हार लगैए
की कहू सखी
कहल नहि जाइए
जुआनी जरबै छी
जीबिते जी मरै छी ।"
'छिड़िया गेल गाम-समाज' मे गामक यथार्थ स्थितिक मार्मिक चित्रण करैत छथि ।
बिहार सँ पलायन भऽ रहल छै ताही दुआरे गाम तहस-नहस भऽ रहल छै । कवि साहुजी
लिखैत छथि -
"गामक भैयारी-दियादी सभ टुटल
चिन्ह-परचित सेहो उठि गेल
परिवार छुटल समाजो टुटल
पलायनसँ सभ किछु छिड़ियाएल "
'गामक सुख' कविता-संग्रह मे कवि अपन जिनगी केर सभ अनुभव केँ लिख देने छथि ।
समीक्षक : संतोष कुमार राय 'बटोही'
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
