प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक सम्पादकीय- गजेन्द्र ठाकुर/ विदेह ई-लर्निङ्ग
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१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय १.२.विदेह ई-लर्निङ्ग

१.१.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय

(विदेह शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक सम्पादकीय)

    शिवशंकर श्रीनिवासक कथा मे चरित्र सभक अपूर्ण विकास रहैत अछि । भाषामे स्थानीय शब्दावली आ कहबीक प्रचुर उपयोग ओ नै करैत छथि, जखन कि हुनकर लेखन गाम घरक प्लॉट पर आधारित रहैत अछि। अतिरंजना सम्वादमे रहैत अछि।

    सामाजिक परिवर्तनक अभाव, स्त्रीक आत्मसम्मान आदि नीक-नीक कथ्य आ प्लॉट हुनका लग छन्हि मुदा ओइ छोट-छोट क्रान्तिक (लोक आ परिवार विशेष धरि सीमित) पाछाँ कोन बड़का धार बहैत अछि से ओ फरिछा नै पबैत छथि। से संजय सन ओ पर्यवेक्षक बनि जाइत छथि आ कथाक अन्त ओइ छोट-छोट क्रान्तिसँ भऽ जाइत अछि।

    कथानक अस्पष्ट रहैत अछि, चरित्र एक-आयामी रहैत अछि। शिवशंकर श्रीनिवासक कथा सिनुरहार [हमरा द्वारा कएल एकर अंग्रेजी अनुवाद विदेहक २१म अंकमे (दिनांक ०१ नवम्बर २००८) ई-प्रकाशित भेल छल जे नीचाँ देल जा रहल अछि], जमुनिया धारक सम्बन्धमे ई लक्षण सभ आर बेसी प्रखर लगैत अछि।

शिवशंकर श्रीनिवासक कथा

सिनुरहार
रामभद्र झा सपरिवार हैदराबाद सँ गाँव आएल छलथि अपन पुत्रक उपनयन संस्कार लेल। कल्याणी,बेटी, सेहो आयल अछि।कल्याणी अपन पहिल पतिक मरलाक बाद पुनर्विवाह कयने छल। लोक सभ प्रश्न कय रहल छल, जमायक विषयमे, ओकर जाति, पेशा आदि। प्रीता ओकर सहपाठी आ ओकर परिवारक प्रोत्साहन पर कल्याणी अपन दोसर विवाह कयलक। कल्याणीक माय ओलबा-दोलबाक डरे ओकरा समारोहमे भाग लेबय सँ रोकय चाहैत छलीह, मुदा पिता रामभद्र झा ओकरा सहजतापूर्वक लेबाक पक्षमे छथि। उपनयन संस्कारक समय कल्याणी सिनुरहारमे शामिल होमय चाहैत छलीह। सिनुरहार बिधमे, जतय सुहागिन स्त्रीक माथ पर तेल-सिंदूर लगाओल जाइत अछि, मे कल्याणीक माय ओकरा नै बजेलकै। कल्याणी एकटा खिड़की सँ ई सभ दुखी भऽ देखैत छलि, कारण ओकर माय ओकरा अशुभ मानैत छलि। पिता ओकर समर्थन मे छला मुदा माय क्रोधमे बजली जे कल्याणीक उपस्थिति सँ बेटाक अमंगल हएत। कल्याणी पहिने तँ गाम छोड़बाक सोचलक, मुदा भाईक प्रेम ओकरा रोकलकै। मुदा फेर कल्याणी हिम्मत केलक सिनुरहार मे शामिल होइले खीर-पूड़ीक थारी उठा लेलक आ भौजीकेँ देलक, ओकर पितयौत बहिन ललिता ओकर मायक हाथसँ सिन्दूर लऽ कऽ ओकर माथ पर सिंदूर लगेलकै। सभ अचंभित भेल, मुदा कल्याणीक आभा देखि सभ प्रसन्न भेल।

जमुनिया धार
सूत्रधार दालान पर बइसल लिखि रहल छथि। ओत्तै सलमा नामक युवतीक संग भेंट होइत अछि, ओ खड़-पात बहारैले आयल अछि। फातिमाक बेटी सलमा रूप-सौन्दर्यसँ पूर्ण। ओ ओकरा घुरा दै छथि, पत्नी बजा लै छथिन्ह कारण तिलाठवाली गाम गेल अछि। सलमाक दुःखक कथा- पति आवारा सन। सलमा दुस्साहसपूर्वक कहैत अछि जे ओ "खुल्ला" कऽ फेरो विवाह कऽ सकैत अछि। सलमाक पतिक साँप काटलासँ मृत्यु होइत अछि। सलमा कानैत अछि। सूत्रधारकेँ आश्चर्य लगै छन्हि, खुल्ला कऽ दोसर बियाक सोचि रहल छलि, तखन ओकर मरलापर कननी किए? मुदा सूत्रधारक पत्नी ओकर पीड़ाकेँ बुझै छथि, तामसमे लोक की नै बजैत अछि? अंतमे सूत्रधारक पत्नी कहै छथि जे सूत्रधार नारी नै छथि से ओकर दुःख की बुझता?


शिवशंकर श्रीनिवास मैथिली साहित्यक एक प्रमुख लेखक छथि, हिनकर कथा सभ गाम-घरक जीवन (व्यक्ति विशेष आ परिवार धरि सीमित सामाजिक परिवर्तन आ स्त्रीक आत्मसम्मान) पर मुख्य रूपसँ आधारित रहैत अछि। हुनकर कथामे गामक लोक आ समाजक जीवंत चित्रण अछि, मुदा तकर अछैत हुनकर लेखनमे किछु मूल कमी साफ देखाइत अछि, खास कऽ चरित्र सभक विकास, भाषिक शैली आ कथानकक संरचना, जे हिनकर कथा सभक प्रभावकेँ कम करैत छै।

    श्रीनिवासक कथामे चरित्र सभक विकास अपूर्ण रहैत अछि। भय, अंतर्द्वंद्व आ सामाजिक प्रतिक्रिया सन तत्वक कारण स्पष्ट नै रहैत अछि। उदाहरण लेल सिनुरहारमे कल्याणीक विधवा-विवाह आ ओकर सामाजिक संघर्षक चित्रण छै, मुदा से ओतेक गहींर रूपसँ नै। आरो तँ छोड़ू ओकर मनोदशाक सेहो पूर्ण विवरण नै भेटैत अछि। जेना ओ अनचोक्के कोनो निर्णय लेलक आ ओकर पिता प्रसन्न भऽ गेला, तकरा हुनकर मौन समर्थन कहल गेल अछि। चरित्र सभ जमुनिया धारमे एकाकी आ दुखी भऽ फिरि रहल अछि, मुदा आंतरिक द्वंद्व सतही रहै छै। चरित्र एक-आयामी लगैत छै - नीक तँ नीके-नीक, अधला तँ अधले-अधला। एहि सऽ कथाक वास्तविकता केँ गहींर लऽ जेबामे ओ असफल रहै छथि, से पाठककेँ संतुष्ट नै करैत अछि।

    दोसर कमी हुनकर भाषिक शैलीमे अछि। हुनकर लेखन मुख्यतः गामक प्लॉट पर आधारित रहैत अछि, मुदा भाषामे स्थानीय शब्दावली आ कहबीक प्रचुर उपयोग नै रहैत अछि, धूमकेतुक कथाक मोन बेर-बेर पड़ैत अछि जे ऐ दोषसँ रहित अछि। गामक जीवनक चित्रण लेल स्थानीय तत्व आवश्यक छै, जे कथाकेँ जीवंत बनबैत छै, केशव रेड्डीक तेलुगु लघु उपन्यास सभ पढ़ू आ तइसँ तुलना करू। श्रीनिवासक कथामे संवाद अतिरंजित रहैत अछि, जइसँ संवाद स्वाभाविक नै लगैत अछि, आ पाठकक कथासँ जुड़ाव कम होइत अछि।

    तेसर ई जे सामाजिक परिवर्तन आ स्त्रीक आत्मसम्मान सन नीक कथ्य हुनका लग छन्हि, मुदा ओइमे अस्पष्टता, छोट-छोट क्रांति जेना परिवार विशेषक लोक-जीवनक चित्रण भऽ पबैत अछि, मुदा ऐ सभक पाछाँक बड़का सामाजिक धार जे बहल छै, से ओ स्पष्ट नै कऽ पबै छथि। लेखक पर्यवेक्षक बनि जाइत छथि, संजय सन, आ कथाक अंत ओइ छोट क्रांति सभसँ भऽ जाइ छै, बिना ओकर गहींर विश्लेषणक। श्रीनिवासक एकटा कथा पढ़लापर नीक लागत मुदा दोसर-तेसर पढ़लापर ई सभ दोष सोझाँ आबि ठाढ़ भऽ जायत।

    से ई कथा सभ सामाजिक परिवर्तनक सशक्त माध्यम नै बनि सकल अछि। कथानक अस्पष्ट आ चरित्रक विकास सीमित रहबाक कारण ढेर रास समस्या कथा सभमे आबिये जाइ छै।
    समग्र रूपसँ शिवशंकर श्रीनिवासक कथामे संभावना छै, छोट-छोट क्रान्तिक सफलताक कामना छै। से कथा मनोरंजनक संगे समाजक तँ नै मुदा कथेमे, कथा कहबाक शैलीमे, परिवर्तनक माध्यम बनि सकल अछि। श्रीनिवास मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध केने छथि।

    श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर" [विदेह ई पत्रिका पेटार- विदेह सदेह ३६ सँ]

    श्रीनिवास जीक "बदलैत स्वर"मे कोनो कमी नै अछि, बशर्ते ओकर टाइटल जँ रहितै "बदलैत स्वर-मैथिली कथा श्रीनिवास-अशोक-विभूति-बिहारी-वियोगी-नवीनक विशेष सन्दर्भमे"; मुदा ई पोथी  सम्पूर्ण मैथिली कथा साहित्यक स्वर हेबाक दावा करैत अछि। से एकर सीमामे ने बिसाँढ़ आबि सकत, आ ने पइठ। जै ग्रुप/ गोधिंयावाद हेबाक बातसँ देवशंकर नवीनजी बेर-बेर अपन विदेहमे देल साक्षात्कार [विदेह ई पत्रिका पेटार विदेह सदेह ३३]मे मना केलन्हि अछि, तइ ग्रुप/ गोधिंयावादक स्वर "बदलैत स्वर"क स्वर अछि।

    जगदानन्द झा मनुक माटिक बासन [सन्दर्भ जगदानन्द झा मनुक चोनहा आ शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र" विदेह ई पत्रिका पेटार अंक ३५३]


कथाक धनात्मक पक्ष   

    बेटा माटिक ढाकन-बसनीक बदलामे मूर्ति बनबय लगैत अछि। दोसर जे माटिक बासन बनेबापर सरकार कोनो प्रतिबन्ध नै लगेलकै, उनटे अहाँकेँ मोन हएत जे रेलगाड़ीमे माटिक कुल्हड़मे चाह बेचबाक आ ओइमे पीबाक फैशन छै, सरकार ओइमे मदति केलकै। मुदा ओइ गौण संस्कृतिक स्मृति तँ हमरो अछि, अहूँकेँ हएत आ कथाकारोकेँ छन्हि। मुदा ओ ऐ कथाकेँ आगाँ लऽ गेलाह आ लोककथाक सन्दर्भसँ जोड़लन्हि जइमे नैतिक उपदेश बाल साहित्यक उद्देश्य रहैत छै। अहाँकेँ मोन हएत शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र"(मिथिलाक लोककथापर आधारित बालकथा), जे विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह ४ मे (पृ. १३८-१४१) आ उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर https://videha.co.in/archive.htm मुदा श्रीनिवास जीक बालकथा घोषित रूपमे लोककथापर आधारित अछि, मुदा "माटिक बासन" केर अन्तिम भाग मात्र लोककथासँ प्रेरित अछि आ गौण-संस्कृतिक आधुनिकीकरणक प्रयासक ऐ कथाक उद्देश्य नै अछि, उद्देश्य वएह श्रीनिवासजी बला अछि, जे ओ लोककथाक पुनर्लेखनक माध्यमसँ केलन्हि आ जगदानन्द जी गौण-संस्कृतिक आधुनिककरणक प्रयास मध्य मूल कथा-प्लॉट छोड़ि वएह टॉपिक आगाँ बढ़ेलन्हि।
कथाक ऋणात्मक पक्ष
    जगदानन्द जीक बाल-उपन्यासक हम चर्चा पहिनहियो केने छी, आ ओ छी हुनकर "चोनहा"।
विदेहमे जगदानन्द झा "मनु"क एकटा दीर्घ बाल कथा कहि लिअ बा उपन्यास प्रकाशित भेल, नाम छल चोनहा। बादमे ई रचना विदेह:सदेह ९ (विदेह शिशु उत्सव पृ. १०९-१२६) मे संकलित भेल, आ उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर https://videha.co.in/archive.htm ई रचना बाल मनोविज्ञानपर आधारित मैथिलीक पहिल रचना छी, मैथिली बाल साहित्य कोना लिखी तकर ट्रेनिंग कोर्समे ऐ उपन्यासकेँ राखल जेबाक चाही। कोना मॉडर्न उपन्यास आगाँ बढ़ै छै, स्टेप बाइ स्टेप आ सेहो बाल उपन्यास। पढ़बे टा करू से आग्रह।
मुदा "माटिक बासन"मे जगदानन्द जी निराश केलन्हि, हुनकासँ हमरा चाही छल "पेडिण्ती अशोक कुमार"क "जिगरी" सन बौस्तु मुदा भेटल साधारण सन शिवशंकर श्रीनिवासक "पण्डित ओ हुनक पुत्र"।
ई सत्य जे "माटिक बासन" बाल बीहनि-कथा अछि, मुदा जकरा लग प्लॉट रहतै-
"माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।"-
से ओइ कथाक अन्त करथि-
"मुदा हमर सपना ------- आब नहि पूरा होएत । ई कहि ओ ओहि कक्षसँ बाहर भऽ गेला ।"
ई हमरा स्वीकार्य नै। आ तेँ एकटा अद्भुत प्लॉट एकटा नीक मुदा मेडियोकर कथा बनि कऽ रहि गेल।
विश्लेषण
    ऐ कथाकेँ विस्तृत करबाक आवश्यकता अछि, शब्दमे विस्तारो दऽ कऽ ई भऽ सकैए, आ अही शब्द-संख्याक अन्तर्गत रहि कऽ कथ्यकेँ विस्तार देल जा सकैए। मुदा लक्ष्यसँ जेना ओ भटकि गेला- "माटिक बासनक जगह स्टील आ आन-आन धातु लेबए लागल।" केँ विस्तार नै दऽ सकला से "चोनहा"क लेखकसँ हम आशा नै केने छलौं। ऐ कथाक पुनर्लेखन लेखककेँ करैए पड़तन्हि आ तइमे ई बीहनि कथा रहत बा लघुकथा बा दीर्घकथा बा उपन्यासो बनि जायत।
 

[From Videha, Maithili eJournal Issue No 21, November 01, 2008]

Author: Sri Shivshankar Srinivas (b. 02.07.1953), village Lohana, Madhubani | Famous story writer | Published works: Trikona, Adahan, Gaachh Paatha (story collections).

Translated by: Gajendra Thakur

SINURHAR (Putting Vermilion on Married Women by the Host)

It was the occasion of the investiture ceremony (sacred thread ritual) of Rambhadra Jha's son. The family had come to their native village from Hyderabad. Kalyani also came with them. She was Rambhadra Jha's only daughter. Ten years younger than her was the son, whose sacred thread ceremony was now being performed.

"Kalyani has come!"-this was the talk all over the tola (hamlet). The reason was striking: this Brahmin daughter had remarried after being widowed. She had come to the village, and that too, to participate in the sacred thread ceremony! That was enough to cause amazement. Even those in the tola whose communities permitted widow remarriage were astonished.

Different kinds of gossip were in the air, especially among the women. Along with arguments and speculations, most of the discussion revolved around her new husband.

Someone said:
- "The groom is excellent. Such a smiling face!"
Another asked:
- "But to which caste does he belong?"
A third replied:
- "Whatever his caste, once he married a widow, that says everything."
Then came further questions:
- "What type of job does he do?"
- "He works in a bank."
- "Then it is good. Whatever it is, Kalyani will remain happy."

Thus, all sorts of gossip and chatter spread through society.

For this lineage, Kalyani's remarriage was not an impossible event, but it was certainly unprecedented.

The marriage had not taken place in the village, but in Hyderabad, where Rambhadra worked and lived with his family.

Kalyani's first marriage had been solemnised five years earlier, in the village itself, with great pomp and gaiety. She had been married into a respectable family, with a good groom. But fate was cruel-only four months later, her husband died instantly in a railway accident. At that time, Rambhadra and his family were still in the village. The news threw the household into chaos and mourning. The entire village wept with them.

Rambhadra Jha decided not to leave Kalyani in the village. Three days after the incident, the entire family left for Hyderabad-though they were much criticised by society for doing so.

In Hyderabad, Kalyani's mother slowly created an environment to help her daughter forget the tragedy, urging her to think of the marriage as if it had never happened, as though it were just a dream. But Kalyani could not easily steady herself. She lived in shock and trembling for quite some time. Yet Hyderabad, with its city life and fresh environment, began to breathe new life into her.

At that time, Kalyani was pursuing her B.A. and attending college. One day, her classmate Preeta introduced her to her elder brother. Kalyani hesitated at first, but with Preeta's gentle encouragement, she began to come out of her shell. Preeta's family was originally from Uttar Pradesh; though Brahmins, they no longer followed caste restrictions. They consented happily to a love marriage. Kalyani's mother, who had always wanted her to remarry, welcomed the proposal joyfully. Enthusiasm filled the household, and soon Kalyani was married again.

The news travelled back to the village without delay. Some villagers, living in Hyderabad, carried the news home. In no time, it spread throughout the village and the surrounding area. At first, there was intense discussion, but gradually things calmed down. Some criticised, others approved, but most eventually accepted it in good spirit.

Now, with the sacred thread ceremony of Rambhadra's son, the same matter resurfaced.

When the date was fixed in Hyderabad, the question of inviting Kalyani arose. Surprisingly, her mother did not want her to go. She feared the villagers, dreading that people might ostracise them during the ceremony, where community participation was necessary-not only for the rituals, but also for the feast. She expressed her fears to her husband, Rambhadra.

But Rambhadra disagreed:
- "Even if Kalyani does not come, people will still outcaste us if they wish. The more we fear, the more they will oppress us."

Though unconvinced, his wife remained silent.

A few days before the ceremony, she softened. Sitting beside her husband in the morning, she requested tearfully:
- "When you go to the office today, return via Kalyani's house. Tell her about Bauwa's ceremony and ask her to come with us. She is our child. Bauwa is her only sibling. How can she stay behind?"

That evening, Rambhadra returned and told her cheerfully:
- "The moment Kalyani heard the news, she began dancing with excitement and making plans."
- "And... him?" asked his wife with hesitation.
- "Who?"
- "The son-in-law!"
- "On his face, I saw a quiet contentment. He is truly a gem," Rambhadra replied.

His wife's expression changed. He realised she had wished only for her daughter's presence, not her son-in-law's. But he said nothing.

When the family arrived in the village, both Kalyani and her husband were with them. People saw this, and gossip began. Yet no one openly opposed them. All the arrangements for the feast and rituals went smoothly with the villagers' cooperation. Outwardly, there was social harmony. But inwardly, Kalyani's mother remained restless. She felt everyone's eyes were fixed on her daughter and son-in-law. She wished she could make them invisible, yet powerless; she only grew anxious.

For Kalyani, however, everything was normal. She laughed freely with visiting women, while her husband mingled cheerfully. But her mother, startled by her loud laughter, feared it might provoke disapproval. Eventually, she scolded her:
- "This is the village, not the city. People may object at any time. You should remain calm and disciplined here."

Kalyani, shocked at her mother's changed face, lost her enthusiasm.

Preparations for the sacred thread ceremony began in earnest. The marba (ritual platform) was erected, plastered with clay and dung, and decorated. The day before the ceremony was the sacred bathing ritual, with drums, pipes, and songs of auspiciousness filling the air.

That was also the day of the Sinurhar ritual-when the host applies vermilion to the partings of married women's hair, symbolising the well-being of their husbands. Gifts of sarees, kheer, and fried chapatis were to be given. Rambhadra's wife, the boy's mother, invited all the clan's married women. But Kalyani's name was not on the list. She was not invited.

Kalyani sat by a window in the southern wing, watching and listening. Women lined up joyfully for the ritual. She trembled with disbelief-at her own brother's sacred thread ceremony, she was excluded from Sinurhar!

Memories of her grandmother's rigid rituals flooded her mind. She recalled how widows were treated as inauspicious, while widowers faced no such stigma. "Women are hawks hunting other women," she thought bitterly.

Her mother had excluded her, considering her a bad omen.

Just then, her father noticed her absence and asked his wife:
- "Why isn't Kalyani in the Sinurhar?"
His wife snapped:
- "She is my daughter, but her fate was ill. This is a ritual for married women whose husbands are alive. Because of her, I will not allow harm to come to my son."

Silence fell. Many disliked her mother's attitude, but none protested aloud.

Kalyani, though shaken, soon gathered strength. She looked at her brother's innocent face, filled with affection. How could she leave? Her father's quiet support and her husband's loving glance gave her courage.

She walked into the courtyard. Taking the ritual plate, she handed kheer and chapatis to a sister-in-law in line. Cousin Lalita quickly pulled her into the line. Taking the vermilion plate from her mother, Lalita applied sindur to Kalyani's hair.

The mother froze, uneasy. But the crowd admired Kalyani's radiant face. Rambhadra, watching, smiled quietly with pride. Her husband's eyes glowed with affection.

And thus, in that moment, Kalyani claimed her place.

 

गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि

गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणि चारि खण्डमे विभाजित अछि- १. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, (३) उपमान (तुलना केनाइ) आ (४) शब्द (मौखिक गवाही)। वैध ज्ञान प्राप्त करबाक ई चारिटा साधन ऐ चारि खण्डमे अछि।

खण्ड एक
प्रत्यक्ष

गङ्गेशक आह्वान: त्रिमूर्ति शिवक आह्वानसँ ई खण्ड शुरू होइत अछि।आ तेँ आह्वानक विषयपर चर्चा शुरू होइत अछि। ई मानल जाइत अछि जे कोनो परियोजनाक प्रारम्भमे भगवानक आह्वानसँ ई कार्य पूर्ण होइत अछि।

आपत्तिः जे कोनो आह्वान कोनो काज पूरा करबाक कारण अछि, से सकारात्मक बा नकारात्मक संगतिक माध्यम सँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि, किएक तँ एहनो भेल अछि जे कोनो आह्वानक बिना सेहो कोनो काज पूरा कएल गेल।
आपत्तिक उत्तर: एकर कारण ई अछि जे ई आह्वान पूर्व जन्ममे कयल गेल छल/ हएत।

आपत्तिः नै, ई तँ घुमघुमौआ तर्क अछि, आ ओनाहितो कोनो काज पूरा केना होइत अछि तकर अनुभवजन्य कारण सभ आह्वानकेँ अनावश्यक सिद्ध करैत अछि।
आपत्तिक उत्तर: ई प्रमाण जे आह्वान कार्य पूर्ण हेबाक कारण छै, तइमे दू चरणक अनुमान शामिल अछि। पहिल, ई जे ई शिष्ट लोक द्वारा निन्दित नै अछि वरन हुनका सभ द्वारा सेहो आह्वानसँ कार्य प्रारम्भ कएल जाइत अछि। तखन ई अनुमान लगाओल जा सकैत अछि जे काज पूरा भेनाइ फल अछि किएक तँ ई नियमित रूप सँ इच्छित अछि, आ आन कोनो फल उपलब्ध नै अछि।

आपत्ति: ई तर्क काज नै करत कारण ई पहिनेसँ ज्ञात अछि जे आह्वानक अछैतो काज पूर्ण भऽ सकैत अछि, कारण-सम्बन्ध कोनो तर्कसँ स्थापित नै कएल जा सकैत अछि।
आपत्तिक उत्तर: हम सभ ऐ तर्क (जे आह्वान कार्य पूर्ण करबैत अछि) क समर्थन लेल वैदिक आदेशक आह्वान करैत छी। मुदा कोनो एहन वैदिक कथन नै भेटैत अछि। से अनुमान कएल जा सकैत अछि जे ऐ तरहक आह्वान सुसंस्कृत लोक सभ द्वारा शुरू कएल गेल आ कएल जाइत अछि।

प्रार्थना देह (जेना प्रणाम), वाणी (गायन) आ मस्तिष्क (ध्यान) सँ होइत अछि। मुदा कोनो ईश्वरमे विश्वास केनिहार सेहो कार्य सम्पन्न कऽ लैत अछि, तँ की ओ पूर्व जन्ममे आह्वान/ प्रार्थना  केने हएत? आ आह्वानक बादो कखनो काल कार्य सम्पन्न नै होइत अछि, से की ढेर रास बाधा ओइ साधारण आह्वानसँ दूर नै भेल हएत?

ऐ तरहक तर्कसँ प्रारम्भ भेल छल ई ग्रन्थ, ७-८ सय बर्ख पहिने!

 

(सन्दर्भ: कार्ल एच पॉटर: एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इण्डियन फिलोसोफी, १९९३; सतीश चन्द्र विद्याभूषण: अ हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लॉजिक, १९२१)

स्टीफन एच. फिलिप्स लिखै छथि:

मिथिलामे राखल गेल पञ्जी वंशावली अभिलेखसँ पता चलैत अछि जे हुनक पत्नी आ तीनटा बेटा आ एकटा बेटी छल। एकटा बेटा छलन्हि प्रसिद्ध न्याय लेखक, वर्धमान। गङ्गेश स्पष्ट रूपसँ अपन जीवनकालमे प्रसिद्धि प्राप्त कयलनि, जकरा "जगद-गुरु" कहल जाइत अछि, जे हुनक समयक शैक्षणिक संस्थानक लेल "प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय प्रोफेसर" क लगभग समकक्ष हएत।

Genealogical records kept in Mithila suggest that he had a wife and three sons and a daughter. One child was the famous Nyaya author, Vardhamana. Gangesa apparently achieved quite some fame during his lifetime, referred to as "jagad-guru," which would be the rough equivalent of "Distinguished University Professor" for the educational institutions of his time.

[Phillips, Stephen, "Gangesa", The Stanford Encyclopedia of Philosophy (Summer 2020 Edition), Edward N. Zalta (ed.), URL = https://plato.stanford.edu/archives/sum2020/entries/gangesa/ ]

गंगेश जगदगुरु तँ रहथि परमगुरु सेहो रहथि आ परमगुरुक उपाधि हिनका अतिरिक्त मात्र नूतन वाचस्पति (वृद्ध वाचस्पतिक परवर्ती) केँ पछाति जा कऽ प्राप्त भेलन्हि।

मुदा गंगेशक संगे जे अन्याय रमानाथ झा आ उदयनाथ झा अशोक केलन्हि से बीसम आ एक्कैसम शताब्दीमे भेल आ तकर दुष्परिणाम स्टीफन फिलिप्स सन नैय्यायिक उठेबा लेल अभिशप्त भेला। एतऽ अहाँकेँ सूचित करी जे स्टीफन फिलिप्स तत्त्वचिन्तामणिक चारू खण्डक सम्पूर्ण अंग्रेजी अनुवाद केनिहार पहिल व्यक्ति छथि [Jewel of Reflection on the Truth about Epistemology: A Complete and Annotated Translation of the Tattva-cinta-mani, Bloomsbury Academic (2020)]। हुनका अलाबी वी.पी. भट्ट सेहो तत्त्व चिन्तामणिक चारिमेसँ ३ खण्डक सम्पूर्ण अनुवाद २०२१ धरि कऽ लेने छथि [१. प्रत्यक्ष (सोझाँ-सोझी), (२) अनुमान, आ (४) शब्द (मौखिक गवाही); (३) उपमान (तुलना केनाइ)बाँकी छन्हि [Word The Sabdakhanda of Tattvacintamani- With Introduction, Sanskrit Text, Translation And Explanation (2 Vols Set) 2005; Perception The Pratyaksa Khanda of The Tattvacintamani 2012 (2 Vols Set); Inference the Anumana Khanda of the Tattva Chintamani ( With Introduction, Sanskrit text, Translation & Explanation ) (2 Vols Set) 2021 Published by Eastern Book Linkers, Delhi]।

HONOUR KILLING OF GANGESH UPADHYAYA (FIRST BY RAMANATH JHA, THEN BY UDAYANATH JHA 'ASHOK' (A PARALLEL HISTORY OF MITHILA AND MAITHILI LITERATURE, WHY TODAY ITS NEED BEING FELT MORE INTENSELY?)

I was not surprised, though I must have been when I saw a monograph on Gangesh Upadhyaya, whose copyright is being held by Sahitya Akademi, the author of the monograph is Udayanath Jha ' Ashok'. I thought that Udayanath Jha ' Ashok', who has been given Bhasha Samman also, by the same Sahitya Akademi, would do some justice. But truth and research seem elusive in Sahitya Akademi monographs, at least that I found in this monograph.

I searched and searched through chapters, that now the author will show courage. But the author like Ramanath Jha seems ashamed of the roots and offspring of Gangesh Upadhyaya. He tries to confuse the issue, but there is no confusion now at least since 2009. But in 2016 Sahitya Akademi seems to carry out the casteist agenda. Udayanath Jha mockingly pretends to search his name, lineage etc, where nothing is there to search for, yet he could not muster the courage, to tell the truth, and ends up just repeating the facts in 2016 that Dineshchandra Bhattacharya already has published way back in 1958.

The honour killing of Gangesh Upadhyaya by Prof. Ramanath Jha is being taken forward by Sahitya Akademi, Delhi in a most hypocritical way.

Ramanath Jha's obscurantism vis-a-vis Panji is evident from one example. The inter-caste marriage in Panji was well known to him (but he chose to keep the Dooshan Panji secret- which has been released by us in 2009), and it was apparent that the great navya-nyaya philosopher Gangesh Upadhyaya married a "Charmkarini" and was born five years after the death of his father (see our Panji Books Vol I & II available at http://videha.co.in/pothi.htm ). Sh. Dinesh Chandra Bhattacharya writes in the "History of Navya-Nyaya in Mithila". (1958)

"The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila----- Gangesha's family is completely ignored and we are not expected to know even his father's name-----...As there is no other reference to Gangesa we can assume that the family dwindled into insignificance again and became extinct soon after his son's death." [1958, Chapter III pages 96-99), which is a total falsehood. He writes further that all this information was given to him by Prof. R. Jha, and he seemed thankful to him.

The following excerpt from Our Panji Prabandh (parts I&II) is being reproduced below for ready reference:

 -

महाराज हरसिंहदेव- मिथिलाक कर्णाट वंशक। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्ण-रत्नाकरमे हरसिंहदेव नायक आकि राजा छलाह। 1294 ई. मे जन्म आ 1307 ई. मे राजसिंहासन। घियासुद्दीन तुगलकसँ 1324-25 ई. मे हारिक बाद नेपाल पलायन। मिथिलाक पञ्जी-प्रबन्धक ब्राह्मण, कायस्थ आ क्षत्रिय मध्य आधिकारिक स्थापक, मैथिल ब्राह्मणक हेतु गुणाकर झा, कर्ण कायस्थक लेल शंकरदत्त, आ क्षत्रियक हेतु विजयदत्त एहि हेतु प्रथमतया नियुक्त्त भेलाह। हरसिंहदेवक प्रेरणासँ- आ ई हरसिंहदेव नान्यदेवक वंशज छलाह, जे नान्यदेव कार्णाट वंशक १००९ शाकेमे स्थापना केने रहथि- नन्दैद शुन्यं शशि शाक वर्षे (१०१९ शाके)... मिथिलाक पण्डित लोकनि शाके १२४८ तदनुसार १३२६ ई. मे पञ्जी-प्रबन्धक वर्तमान स्वरूपक प्रारम्भक निर्णय कएलन्हि। पुनः वर्तमान स्वरूपमे थोडे बुद्धि विलासी लोकनि मिथिलेश महाराज माधव सिंहसँ १७६० ई. मे आदेश करबाए पञ्जीकारसँ शाखा पुस्तकक प्रणयन करबओलन्हि। ओकर बाद पाँजिमे (कखनो काल वर्णित १६०० शाके माने १६७८ ई. वास्तवमे माधव सिंहक बादमे १८०० ई.क आसपास) श्रोत्रिय नामक एकटा नव ब्राह्मण उपजातिक मिथिलामे उत्पत्ति भेल।

So, the Srotriyas as a sub-caste arose around 1800 CE as per authentic panji files. Sh. Anshuman Pandey [Gajendra Thakur of New Delhi provided me with digitized copies of the genealogical records of the Maithil Brahmins. The panjikara-s whose families have maintained these records for generations are often reluctant to allow others to pursue their records. It is a matter of 'intellectual property' to them. I was fortunate enough to receive a complete digitized set of panji records from Gajendra Thakur of New Delhi in 2007. [Recasting the Brahmin in Medieval Mithila: Origins of Caste Identity among the Maithil Brahmins of North Bihar by Anshuman Pandey, A dissertation submitted in partial fulfilment of the requirements for the degree of Doctor of Philosophy (History) in the University of Michigan 2014].

Later these Panji Manuscripts were uploaded to Videha Pothi at www.videha.co.in and google books in 2009).

The so-called Maharajas of Darbhanga were permanent settlement zamindars of Cornwallis, and there were so many in British India, but in Nepal there were none. In the annexure of our book (Panji Prabandh vol I&II), we have attached copies of genealogy-based upgradation orders (proof of upgradation for cash). So, before 1800   CE, there was no srotriya sub-caste in British India and there is no such sub-caste within Maithil Brahmins in Nepal part of Mithila even today. Srotriya before that referred to following some education stream in British India, in Nepal it still has that meaning.

ORIGINAL PANJI REFERENCES ARE PLACED BELOW:

DOOSHAN PANJI- THE BLACKBOOK

४९.

१८८/२

चर्मकारिणी

माण्डर

वभनियाम

छादन

तत्त्वचिंतामणि कारकगंगेश

छादनगंगेशक

नाँई

रत्नाकरक-मातृक (अज्ञात)

गंगेश

 

वल्लभा

भवाइ

माहेश्वर

 

 

 

 

जीवे

 

 

२१//१० छादनसँ तत्व चिन्तामणि कारक जगद्गुरु गंगेश

छादनसँ तत्‍व चिन्‍तामणि कारक

गंगेशक वल्‍लभा चर्मकारिणी पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्‍यतीते तत्‍व चिन्‍तामणि कारक गंगेशोत्‍पत्ति- चर्मकारिणी मेधाक सन्‍तानक लागिमे छलन्हि

छादन सँ तत्व चिन्तामणि कारक मōō गंगेश

"तत्व चिन्तामणि कारक म. म. पा. गंगेशक विषयक लेख प्राचीन पञ्जीसँ उपलब्ध"।।

पितृ परोक्षे पंच वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्तिः इति प्राचीन लेखनीय: कुत्रापि

देवानन्द पञ्जी ३९-२ छादनसँ जगदगुरू गुंरू गंगेश सुताय वभनियामसँ जयादित्य सुत साधुकर पत्नी

देवानन्द पञ्जी ३३९-३ जगदगुरू गंगेश सुत सुपन दौ भण्डारिसमसँ हरादित्य दौ.।। पुत्र सुताच गोरा जजिवाल सँ जीवे पत्नी ए सुत सन्दगहि भवेश्वर। अत्रस्थाने सुपनभ्रातृ हरिशर्म्म दारिति क्वचित् जजिवाल ग्राम

देवानन्द पञ्जी ३०=५ छादनसँ उपायकारक म.म. पा. वर्द्धमान सुताच खण्डवलासँ विश्वनाथ सुत शिवनाथ पत्नी गंगेश- म.म. वर्द्वमान/ सुपन/ हरिशर्म्म

Gangesh, the author of the Tattvachintamani, wrote one text equivalent to 12,000 texts. Now come to the fact mentioned in the Panji- it clearly states that Gangesh of Tattvachintamani was born five years after the death of his father and he married a tanner, so why did Ramanath Jha hide this from Dinesh Chandra Bhattacharya? Vardhamana, son of Gangesh, calls Gangesh sukavikairavakananenduh. But the conspiracy under which the poems of a famous scholar like Gangesh are not available today is clear from the example given above. Vasudev of Bengal was a classmate of Pakshadhar Mishra of Mithila, he came to study in Mithila, passed the shalaka examination and received the title of sarvabhaum. Vasudeva memorised the tattvachintamani of Gangesh and the nyayakusumanjali karika of Udayana. Pakshadhar and other Mithila teachers did not allow writing (copying) tattvachintamani. Raghunath Shiromani, a disciple of Vasudeva, took the right of certification after he defeated his guru Pakshadhar Mishra in a scriptural debate (shastrartha). The Navya Nyaya school was founded in Navadvipa by Vasudeva-Raghunath. Pakshadhar Mishra was a contemporary of Vidyapati (distinct from the Padavali writer who was of the pre-Jyotirishwar period) who wrote in Sanskrit and Avahatta. And the arrival of Mithila students of Bengal from Bengal stopped after Raghunath Shiromani. Gangesh Upadhyaya enjoyed 'param guru' as well as 'jagad guru' titles, the highest titles of the time and as per Panji only Vacaspati Mishra II was the other person who enjoyed the title of 'param guru'. The extinction of Navya-Nyaya School from Mithila, as described above, was a revenge of nature against the honour killing of Gangesh Upadhyaya and his family.

[Translation of the Maithili Short Story, 'Shabdashastram' (based on the true Panji records of Gangesh Upadhyaya) was done by the author Gajendra Thakur himself: published as 'The Science of Words'  Indian Literature Vol. 58, No. 2 (280) (March/April 2014), pp. 78-93 (16 pages) Published By: Sahitya Akademi]

 

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१.२.विदेह ई-लर्निङ्ग

[संघ लोक सेवा आयोग/ बिहार लोक सेवा आयोगक परीक्षा लेल  मैथिली (अनिवार्य आ ऐच्छिक) आ आन ऐच्छिक विषय आ सामान्य ज्ञान (अंग्रेजी माध्यम) हेतु सामिग्री] [एन.टी.ए.- यू.जी.सी.-नेट-मैथिली लेल सेहो]

.................

मैथिलीक वर्तनी

मैथिलीक वर्तनी- विदेह मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम

भाषापाक

मैथिलीक वर्तनीमे पर्याप्त विविधता अछि। मुदा प्रश्नपत्र देखला उत्तर एकर वर्तनी इग्नू BMAF001 सँ प्रेरित बुझाइत अछि, से एकर एकरा एक उखड़ाहामे उनटा-पुनटा दियौ, ततबे धरि पर्याप्त अछि। यू.पी.एस.सी. क मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेल सेहो ई पर्याप्त अछि, से जे विद्यार्थी मैथिली (कम्पलसरी) पेपर लेने छथि से एकर एकटा आर फास्ट-रीडिंग दोसर-उखड़ाहामे करथि|

IGNOU  इग्नू       BMAF-001

...................

Maithili (Compulsory & Optional)

UPSC Maithili Optional Syllabus

BPSC Maithili Optional Syllabus

मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (ऐच्छिक)

मैथिली प्रश्नपत्र- यू.पी.एस.सी. (अनिवार्य)

मैथिली प्रश्नपत्र- बी.पी.एस.सी.(ऐच्छिक)

..................

यू. पी. एस. सी. (मेन्स) ऑप्शनल: मैथिली साहित्य विषयक टेस्ट सीरीज

यू.पी.एस.सी. क प्रिलिमिनरी परीक्षा सम्पन्न भऽ गेल अछि। जे परीक्षार्थी एहि परीक्षामे उत्तीर्ण करताह आ जँ मेन्समे हुनकर ऑप्शनल विषय मैथिली साहित्य हेतन्हि तँ ओ एहि टेस्ट-सीरीजमे सम्मिलित भऽ सकैत छथि। टेस्ट सीरीजक प्रारम्भ प्रिलिम्सक रिजल्टक तत्काल बाद होयत। टेस्ट-सीरीजक उत्तर विद्यार्थी स्कैन कऽ editorial.staff.videha@gmail.com पर पठा सकैत छथि, जँ मेलसँ पठेबामे असोकर्ज होइन्हि तँ ओ हमर ह्वाट्सएप नम्बर 9560960721 पर सेहो प्रश्नोत्तर पठा सकैत छथि। संगमे ओ अपन प्रिलिम्सक एडमिट कार्डक स्कैन कएल कॉपी सेहो वेरीफिकेशन लेल पठाबथि। परीक्षामे सभ प्रश्नक उत्तर नहि देमय पड़ैत छैक मुदा जँ टेस्ट सीरीजमे विद्यार्थी सभ प्रश्नक उत्तर देताह तँ हुनका लेल श्रेयस्कर रहतन्हि। विदेहक सभ स्कीम जेकाँ ईहो पूर्णतः निःशुल्क अछि।- गजेन्द्र ठाकुर

संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सर्विसेज (मुख्य) परीक्षा, मैथिली (ऐच्छिक) लेल टेस्ट सीरीज/ प्रश्न-पत्र- १ आ २

Test Series-1- गजेन्द्र ठाकुर

Test Series-2- गजेन्द्र ठाकुर

...........................

NTA-UGC/ UPSC/ BPSC Maithili Optional- गजेन्द्र ठाकुर

मैथिली समीक्षाशास्त्र

मैथिली समीक्षाशास्त्र (तिरहुता)

मैथिली समीक्षाशास्त्र (भाग-२, अनुप्रयोग)

मैथिली प्रतियोगिता

[Place of Maithili in Indo-European Language Family/ Origin and development of Maithili language (Sanskrit, Prakrit, Avhatt, Maithili) भारोपीय भाषा परिवार मध्य मैथिलीक स्थान/ मैथिली भाषाक उद्भव ओ विकास (संस्कृत, प्राकृत, अवहट्ट, मैथिली)]

(Criticism- Different Literary Forms in Modern Era/ test of critical ability of the candidates)

(ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददास सिलेबसमे छथि आ रसमय कवि चतुर चतुरभुज विद्यापति कालीन कवि छथि। एतय समीक्षा शृंखलाक प्रारम्भ करबासँ पूर्व चारू गोटेक शब्दावली नव शब्दक पर्याय संग देल जा रहल अछि। नव आ पुरान शब्दावलीक ज्ञानसँ ज्योतिरीश्वर, विद्यापति आ गोविन्ददासक प्रश्नोत्तरमे धार आओत, संगहि शब्दकोष बढ़लासँ खाँटी मैथिलीमे प्रश्नोत्तर लिखबामे धाख आस्ते-आस्ते खतम होयत, लेखनीमे प्रवाह आयत आ सुच्चा भावक अभिव्यक्ति भय सकत।)

(बद्रीनाथ झा शब्दावली आ मिथिलाक कृषि-मत्स्य शब्दावली)

(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- विद्यापति)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- पद्य समीक्षा- बानगी)

(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- लोक गाथा नृत्य नाटक संगीत)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- यात्री)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली रामायण)

(वैल्यू एडीशन- द्वितीय पत्र- मैथिली उपन्यास)

(वैल्यू एडीशन- प्रथम पत्र- शब्द विचार)

(तिरहुता लिपिक उद्भव ओ विकास)

अनुलग्नक-१-२-३    अनुलग्नक- ४-५

(मैथिली आ दोसर पुबरिया भाषाक बीचमे सम्बन्ध (बांग्ला, असमिया आ ओड़िया) [यू.पी.एस.सी. सिलेबस, पत्र-१, भाग-'ए', क्रम-५])

[मैथिली आ हिन्दी/ बांग्ला/ भोजपुरी/ मगही/ संथाली- बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) केर सिविल सेवा परीक्षाक मैथिली (ऐच्छिक) विषय लेल]

मैथिली-हिन्दी वार्तालाप (३ घण्टा)

मैथिली

बांग्ला

असमिया

ओड़िया

हिन्दी

उर्दू

नेपाली

संस्कृत

संथाली

NTA_UGC_NET_Maithili_01

NTA_UGC_NET_Maithili_02

GS (Pre)

Topic 1 

........................

यू.पी.एस.सी. आ आन प्रतियोगिता परीक्षा लेल देखू:

विदेह:सदेह १७

विदेह:सदेह २१

विदेह:सदेह २३

विदेह:सदेह २६

विदेह:सदेह २९

विदेह:सदेह ३०

विदेह:सदेह ३२

विदेह:सदेह ३३

विदेह:सदेह ३४

विदेह:सदेह ३५

 

.......................

General Studies

भारतक संविधान (सौजन्य भारत सरकार)
भारतक संविधान (मैथिली)
भारतक संविधान (अंग्रेजी-हिन्दी)

NCERT-Environment Class XI-XII

NCERT PDF I-XII

Sansad TV

http://prasarbharati.gov.in/

http://newsonair.com/ 

...................

Other Optionals

IGNOU eGyankosh

...................

पेटार (रिसोर्स सेन्टर)

.................

मैथिली मुहावरा एवम् लोकोक्ति प्रकाश- रमानाथ मिश्र मिहिर (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

डॉ. कमला चौधरी-मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

डॉ योगानन्द झा- मैथिलीक पारम्परिक जातीय व्यवसायक शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

डॉ. ललिता झा- मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

मैथिली शब्द संचय- डॉ श्रीरामदेव झा (खाँटी प्रवाहयुक्त मैथिली लिखबामे सहायक)

दत्त-वतीक वस्तु कौशल- डॊ. श्रीरामदेवझा

परिचय निचय- डॊ शैलेन्द्र मोहन झा

English Maithili Computer Dictionary (Complete)- Gajendra Thakur

Maithili English Dictionary- गोविंद झा

राधाकृष्ण चौधरी- A Survey of Maithili Literature

राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास

जयकान्त मिश्र- A History of Maithili Literature Vol. I

राजेश्वर झा- मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (मैथिली साहित्य संस्थान आर्काइव) (यू.पी.एस.सी. सिलेबस)

दत्त-वती (मूल)- श्री सुरेन्द्र झा सुमन (यू.पी.एस.सी. सिलेबस)

प्रबन्ध संग्रह- रमानाथ झा (बी.पी.एस.सी. सिलेबस) CIIL Site

सुभाष चन्द्र यादव-राजकमल चौधरी: मोनोग्राफ

डॉ. रमानन्द झा 'रमण'

दुर्गानन्द मण्डल-चक्षु

फेर एहि मनलग्गू फाइल सभकेँ सेहो पढ़ू:-

रामलोचन ठाकुर- मैथिली लोककथा

कुमार पवन (साभार अंतिका)

पइठ (मैथिलीक सर्वश्रेष्ठ कथा)     

डायरीक खाली पन्ना

अनूदित साहित्य (आन भाषासँ)- गजेन्द्र ठाकुर

विदेह:सदेह २७ (गजेन्द्र ठाकुर आ रवि भूषण पाठकक आन भाषासँ अनूदित गद्य आ पद्य- अंक १-३५० सँ)

बाल साहित्य (अनुवाद- द्विभाषिक- मैथिली-अंग्रेजी)- गजेन्द्र ठाकुर

अनुवाद  (मैथिली):

1. भारतोल्लक राजकुमारी, (बिनु शब्दक), (बाल साहित्य), (2022)

2. मू परियोजना (तिरहुता लिपि), (2023)

3. मू परियोजना (देवनागरी लिपि), (2023)

4. मसाई केर परिवर्तनकारी रेबेका, (बाल साहित्य),  (2022)

5. सुनू , (बाल साहित्य), (2022)

6. घर सभ , (बाल साहित्य), (2022)

7. एकटा नीक दिन, (बाल साहित्य), (2022)

8. चलू हम तँ ठीक छी ने! , (बाल साहित्य) ,(2022)

9. की अहाँ ऐ चिड़ै सभकेँ देखने छी?, (बाल साहित्य), (2022)

10. टोस्ट , (बाल साहित्य), (2022)

11. बड़ीटा! कनियेटा!, (बाल साहित्य), (2022)

12. एतऽ हम सभ रहै छी , (बाल साहित्य), (2022)

13. भारतोल्लक राजकुमारी, (बाल साहित्य), (2022)

14. वुयो , (बाल साहित्य), (2022)

15. कच-कच कचाक, (बाल साहित्य), (2022)

16. चुन्नू-मुन्नूक नहेनाइ, (बाल साहित्य), (2022)

17. नेना जे बैलूनसँ डेराइत छल , (बाल साहित्य) ,(2022)

18. अद्भुत फिबोनाची अंक-शृंखला, (बाल साहित्य), (2022)

19. हारू , (बाल साहित्य), (2022)

20. अखन नै, अखन नै!, (बाल साहित्य), (2022)

21. जन्मदिनक उत्सव भोज, (बाल साहित्य), (2022)

22. मोट राजा पातर-दुब्बड़ कुकुड़, (बाल साहित्य), (2022)

23. बचिया जे अपन हँसी नै रोकि सकैत छलि , (बाल साहित्य), (2022)

24. अंग्रेजी, (बाल साहित्य), (2022)

25. हम सूँघि सकै छी, (बाल साहित्य), (2022)

26. छोट लाल-टुहटुह डोरी, (बाल साहित्य), (2022)

27. करू नीक, भोगू नीक , (बाल साहित्य) , (2022)

28. ई सभटा बिलाड़िक दोख अछि! , (बाल साहित्य) , (2022)

29. चोभा आम!, (बाल साहित्य), (2022)

30. हमर टोलक बाट , (बाल साहित्य) , (2022)

31. जखन इकड़ू स्कूल गेल, (बाल साहित्य),  (2022)

32. माछी फेर आउ टाटा!, (बाल साहित्य),  (2022)

33. अमाचीक जुलुम मशीन सभ , (बाल साहित्य) ,(2022)

34. टिंग टोंग, (बाल साहित्य),  (2022)

35. पाउ-म्याऊ-वाह, (बाल साहित्य),  (2022)

36. कुकुड़क एकटा दिन, (बाल साहित्य), (2022)

37. हमरा नीक लगैए, (बाल साहित्य),  (2022)

38. रीताक नव-स्कूलमे पहिल दिन, (बाल साहित्य), (2022)

39. कनी हँसियौ ने! , (बाल साहित्य) ,(2022)

40. लाल बरसाती, (बाल साहित्य), (2022)

41. भूत-प्रेतक नाट्यशाला, (बाल साहित्य), (2022)

42. आउ पएर गानी, (बाल साहित्य), (2022)

43. कतऽ अछि ई अंक 5?, (बाल साहित्य), (2022)

मैथिली-अंग्रेजी टॉकिंग रीड-अलाउड ऑडियो बुक:

1. https://bloomlibrary.org/player/Wcf6zr5CoF (मसाई केर परिवर्तनकारी रेबेका), (बाल साहित्य), (2022)

2. https://bloomlibrary.org/player/p3sHdYBgiT (चलू हम तँ ठीक छी ने!चलू हम तँ ठीक छी ने!), (बाल साहित्य), (2022)

3. https://bloomlibrary.org/player/f19pSdhGMo (एकटा नीक दिन), (बाल साहित्य), (2022)

4. https://bloomlibrary.org/player/b2l5wesxCp (घर सभ), (बाल साहित्य), (2022)

5. https://bloomlibrary.org/player/dAzC0Fubt7 (की अहाँ ऐ चिड़ै सभकेँ देखने छी?), (बाल साहित्य), (2022),

6. https://www.youtube.com/@videha_ejournal  पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल, (2022)

...

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