हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-09

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-09
स्त्री विमर्श ओ नारी सशक्तिकरण
प्रभातक उपलब्ध
18
अंकमे मैथिलीक रचनामे निबन्धक संख्या सभसँ अधिक अछि आ सभसँ कम कथा।
निबन्धक संख्या
84,
कविताक
46 ,
कथाक
13
आ अन्य सामग्रीक संख्या
72
अछि।
एहि प्रसंग प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाजक कहब छनि-"
हमरा जनैत निबन्धक संख्याक अधिकताक कारण थिक तत्कालीन सामाजिक-
राजनीतिक परिघटनाक प्रभाव।
चारिम दशक मिथिलाक लेल संक्रमण काल छल।
एक दिस छल प्राचीन शिक्षा-संस्कार,
मूल्य-मर्यादा
आ शील-स्वभाव तँ दोसर दिस छल अंगरेज शिक्षा एवं पाश्चात्य जीवन-शैली।
प्राचीनताक आग्रह बनाम नवीनताक आकर्षण ओहि समयक बहसक प्रमुख
विषय छल।
निबन्धमे एहि सभ विषयपर विचार करब सुलभ होइत अछि,
तेँ प्रभातमे निबन्धक संख्या बेसी अछि।
निबन्धोमे साहित्यिक विषयकेँ कम,
सामाजिक-सांस्कृतिक विषयकेँ वैचारिक
स्तरपर प्रमुखता देल गेल अछि।
(सन्दर्भ
: एकल पाठ-मोहन भारद्वाज)।
प्रभातमे प्रकाशित स्त्री-विमर्श ओ नारी-सशक्तिकरणक जे निबन्ध अछि
ओहिमेसँ
किछु निबन्ध आ किछु निबन्धक अंश
प्रस्तुत क'
रहल छी-
स्त्री कर्त्तव्य
जनकदेव झा,
कोइलख।
स्त्री के कोन रूपे जीवन व्यतीत करक चाही
?
यद्यपि एहि सम्बन्धी लेख कतेक अनुभवी लेखकलोकनि लिखि चुकल छथि।
(दुर्भाग्य जे एहिसँ पूर्वक प्रभातक सभ अंक नष्ट भ
'
गेल अछि।
-हितनाथ झा) तथापि हमहुँ अपन अल्प बुद्धिसँ किछु एहि विषयपर
साहस कैल अछि,
एकर जे त्रुटि होइक से विज्ञलोकनि क्षमा करथि।
स्त्री लोकनिक प्रथम कर्तव्य पतिव्रत धर्म पालन करब थिकैन्ह।
पातिव्रत धर्म की
?
पतिक आज्ञाक पालन तथा पतिसेवा।
यद्यपि सम्प्रति पति सेवा अत्यन्त कठोर कर्म भ'
गेल अछि,
कारण जे अशिक्षिता स्त्री द्वारा पति
कहौनिहार लोकनि क्लेश पबैत छथि।
ताहि संस्थाक अनुगामिनी स्त्री लोकनि प्रत्येक गृहस्थक घर-घर पूजा पाबि
रहलीह अछि।
किन्तु ताहिमे हमरा जनैत पुरुष लोकनिक दोष थिकैन्ह।
कहब जे की
?
पुरुषक दोष की।
पुरुषक दोष यैह जे शिक्षाक अर्थ बहुतो जन बुझै छथि जे अक्षर
लिखय अथवा पढ़य,
सैह थीक शिक्षिता।
ताहू ठाम हमर कथ्य भिन्ने प्रकारक होयत।
केवल लिखा-पढ़ा देवे मात्र शिक्षा नहि थीक।
शिक्षाक अर्थ थीक उपदेश।
उपदेश धर्म-कथाक
देमक चाही।
यथा सीता,
सावित्री,
पतिपरायण पतिव्रता सबहिमे अग्रगण्य
कोना भेलाह,
से सभ चरित्र विन पढ़लो स्ट्री के बुझा देने बुझि सकै अछि।
तेँ हेतु प्रत्येक गृहस्थ स्त्री लोकनिके दोहावली नहि पढ़ाबथि।
धर्मोपदेशे पढबथिन्ह।
अंध परम्परामे पड़लि महिला सब व्यवहार बदलथि।
तथा अशिक्षित समाजक सुधार हो।
(वर्ष-01,
अंक-04,
अप्रैल
1933
ई.)
किरण देवीक पतिव्रता
श्याम सुन्दर,
कोइलख।
हमर भारत वर्ष एक अपूर्व देश अछि।
एहि ठाम एहन-एहन सत्य घटीत घटना भेल अछि,
जकरा पढ़ि शरीर रोमांचित भय उठैछ।
आइ ओहि भारतवर्षक स्त्री-पुरुष बाल-बच्चा युवक-युवती अपन अपन
कर्तव्यक तिलांजलि दय अकर्मण्य बनि संसारमे अपन हँसी करा रहल छी।
एहि दृष्टान्त काँ पाठक-पाठिका पढ़ि अपना काँ कर्तव्य पथपर अनबाक
चेष्टा करथि।
अकबर भारत वर्षक बड़ प्रसिद्ध मुगल सम्राट भय गेल छथि।
हुनक कूटनीति और विलास-प्रियता समूचा संसारमे विदित अछि।
ओ राजपूत कन्या सभसँ विवाह कय हिन्दू क्षत्रियक नाम मेटेबाक
भरिसक प्रयत्न केने छलाह।
परन्तु महाराणा प्रतापक आगू किछु नहि चलल और अकबर केँ नाकोदम कय देने
छलाह।
अकबर पूर्ण बगुला भगत छलाह।
अकबर हिन्दू काँ मिलेबाक हेतु कौखन हिन्दू वेश धारण कय लैत छलाह
और कराठी माला धारण कय हिन्दू बनि जाइत छलाह।
भीतरसँ ओ बड़ा भारी कपटी और व्यभिचारी छलाह।
अकबर प्रतिवर्ष स्त्रीक वास्ते नौरोज नामक मेला लगबैत छलाह।
ओहि मेला देखबाक निमित्त अपन मोसाहेबक बहु- बेटी काँ बजाय ओकरा
सभकेँ धोखा देबाक हेतु अपन स्त्रीअहुँ काँ मेला मे पठबैत छलाह।
एतबै नहि मेला मे अपन कुटनी रखैत छलाह जे शुद्ध साध्वी पतिव्रता
महिला के फुसलाय पहुँचबैत छल और ओकरा पर बलात्कार और अत्याचार करैत छल।
अकबरक दरबारमे बहुत खुशामदी और देशद्रोही राजपूत छलाह।
ओही खुशामदीमे मान सिंह और बीकानेर राजा छलाह।
बीकानेर नरेशक छोट भाइक नाम पृथ्वी सिंह और हुनक पत्नी किरण
देवी बड़ि पति भक्ता छलीह।
पृथ्वी सिंहक स्वभाव भाइ सँ एकदम विपरीत छलैन।
वो सत्य बात कहबा मे ककरहुसँ नहि चूकैत छलाह।
हुनका देशहित और स्वाभिमान कूट-कूट क
'
भरल छल।
तेँ अकबर हुनका सँ नाराज भय सपत्नी नजरबंद कयने छल और एक कारण
छल जे अकबर सर्वदा संदेश पठबैत छल।
अन्तमे किरण देवीकें नहि रहल गेलैन राजपूती रक्त खलबला उठलनि और अपन
स्त्रीत्वक रक्षा हेतु मरबा मारबा लै दृढ़ प्रतिज्ञ भय गेलीह।
ओ सर्वदा अपना लग खंग राख'
लगलीह।
ओ प्रण केलनि- हम बादशाह के सत्य मार्ग पर लायब अथवा हमही एहि
संसार मे रही कि अकबरे रहथि।
नौरोजक मेला लागल अछि।
अकबरक कूटनी एम्हर-ओम्हर घुमि रहल अछि।
भारी-भारी राजा-महाराजाक बहु-बेटी मेलाक शोभा बढ़ा रहल छथि।
अकबर सेहो स्त्री वेश मे एम्हर-ओम्हर घुमि रहल छथि।
किरण देवी अपना दासीक संग मेलामे पहुँचलीह।
थोड़ेक एम्हर-ओम्हर घुमलाक बाद पाछू देखथि तँ दासीक कतहु पता नहि,
ओ मार्गहिमे कतौ छुटि गेलनि।
आब किरण देवीक दशा विचित्र भय गेलनि।
हुनक ई दशा देखि एक कुटनी आबि कहल घबराउ नहि राजमहल मे चलि
राजरानी संग वार्तालाप करू हम अहाँक दासीकेँ ताकि आनि दैत छी।
किरण देवी कुटनीक बातमे पड़ि महलमे पहुँचलीह।
ओहि ठामक रास्ता बड़ विचित्र,
ओहिमे पहुँचैत कुटनी अलोपित भय गेल।
आब किरण देवीक नेत्र खूजल।
बहुत अछता-पछता बहरेबाक रास्ता ताकय लगलीह।
मार्ग अन्वेषण काल एक दासी आबि आदरपूर्वक कहल- अय सखी घबराउ नहि।
हम बुझैत छी अहाँ रास्ता बिसरि गेलौं।
चलू हम राजरानी सँ भेट करा दिअ।
घबराउ नहि।
हँसू,
बाजू और भय काँ कात करू।
दासीक शब्द सूनि अकचकेली।
दासीक बाजब मे पुरुषक बाजब बूझि पड़लैन।
परन्तु ओ वीरा छलीह,
साहस केलनि।
आ बुधियारीक साथ बिदा भेलीह।
थोड़ेक कालमे दुनू गोटे महलमे पहुँचलीह।
ओत पहुँचैत दासी अपन छद्म वेश कात केलक।
किरण देवी दासीक बदलामे अकबर काँ देखल।
परन्तु किरण देवी पूर्वहि सँ सचेत छलीह।
ओ अपना डाड़सँ खङ्ग खींचि ठाढ़ भय गेलीह।
एहि समय एहन बूझि पड़ैत छल जे साक्षात दुर्गा चंडीक रूप धय
अत्याचारी काँ निहन्त करबाक निमित्त अवतीर्ण भेल छथि।
किछु कालोपरांत गरजैत शब्दमे बजलीह- दुष्ट हम पहिने बुझल जे तों
दासी नहि अकबर छें।
और तों जाहि हेतु एहि ठाम अनलेहें सेहो जनैत छी।
परन्तु स्मरण राख जे हम क्षत्राणी छी और हमर पिता चित्तौड़क राणा प्रताप
सिंहक भाइ शक्ति सिंह थिकाह।
रे नराधम!
तोहर मुँह देखब पाप थिक।
आ तोरा एहि पिपासित खङ्ग सँ यमपुरी पठाय एहि वसुन्धरा काँ पवित्र करब।
अकबर ई रूप देखि भयभीत भय विनती करैत कहल धन्य!
किरण देवी अहाँ यथार्थ वीरमाता
,
वीरपत्नी और वीरकन्या छी।
अहाँ पर हमर चालाकी नहि चलल।
किरण देवी फेर कहल- अरे दुष्ट!
कपटी!!
राजा प्रजाक धर्म पिता थीक।
तों कियैक एना अनाचार अत्याचार करै छें।
हम ई निश्चय क चुकल छी अपना हाथ सँ तोरा मारि एहि पृथ्वीक भार काँ
हल्लुक करब।
अकबर हाथ जोड़ि विनती कय कहल- अहाँकेँ रामचन्द्रक सपथ थीक हमरा
अहाँ नहि मारू हम अहाँक भाइ छी ओ अहाँ हमर बहीन छी।
किरण देवी कहल- तुरत तों हमर देवता- हमर पतिदेव काँ मुक्त कय
दे और नौरोजक मेला उठा दे और आइ ईश्वरक सपथ खो आइ दिनसँ स्त्रीक सतीत्व
रक्षा करब।
अकबर किरण देवीक सब बात मानल और भविष्य मे धर्म सहित राज्य करबाक प्रतिज्ञा
कयल।
एहि तरहेँ भारतक वीर क्षत्राणी किरण देवी अपन
शौर्य और साहसिक कार्य कय देखौलनि जाहिसँ एखन तक एहि संसारमे जीवित छथि।
यावत काल धरि एहि संसारमे धर्म रहत जीवित रहती।
(वर्ष-01,
अंक
09 ,
सितम्बर
1933)
मिथिलामे स्त्री-शिक्षाक अभाव
केदार मणि झा,
मंगरौनी।
शिक्षा की थीक
?
कोनो विषयमे दक्ष होयब,
ओहि विषयक मर्म पर्यन्त बूझबाक नाम
शिक्षा थीक!
ई दू भागमे विभक्त भए सकैछ
?
उत्तम और नीच।
उत्तम शिक्षा वैह थीक जाहिसँ लोक ज्ञानी बनैत छथि,
वस्तु बुझै छथि और नीक-नीक कार्य करैत
छथि।
नीच शिक्षा ठीक एकरे विपरीत थीक अथच त्याज्य।
कोनो-,
कोनो विद्वानक मत छैन्हि जे नीचो
शिक्षा सर्वथा त्याज्य नहि।
कौखन एहन अवसर अबैत अछि जाहिमे ओकरे प्रयोजन पड़ैत अछि!
खैर
,
एकर ई माने नहि जे नीचे शिक्षासँ
शिक्षित रही।
हँ नीचो शिक्षासँ शिक्षित रही तँ अधलाह नहि।
स्त्री- शिक्षाक ई माने नहि जे स्त्री एम.ए.क डिप्लोमा प्राप्त कए
कोनो कॉलेजक प्रोफेसरे बनथि
,
बी.एल. पास कए इजलास पर विरोधीक प्रतिवाद करथि
?
हँ,
अन्यान्य स्त्री उपयोगी गुण सँ युक्त
रहितहुँ ई होइन्हि तँ सोना मे सुगंध थीक।
किन्तु हुनका M. E.
स्कूलमे भर्ती होयबाक पूर्व एतवा देखि लेब
जरूरी छैन्हि जे हम जाहि संसारमे प्रवेश करब तेकर हम उपयुक्त छी वा नहि
?
पति-परायणता,
गृहकार्य-चातुर्य
इत्यादि गुण हमरा मे अछि वा नहि
?
दुखक तँ विषय ई जे
,
जे स्त्री केँ टटका
'क'
लिखै एलैन्हि ओ भानस करबे नहि करतीह यदि करतीह तँ नहिएँ करबाक बराबरि।
"पति विहीना नाहम चाण्डाल गामिनी " वाला पिहानी प्रायः ककरो
अविदित नहि
?
की से लखिमा ठकुराइन मे केवल व्याकरणेक सूत्र
टा निविष्ट छल
?
की हुनक सदृश सती शिरोमणि अथच विदुषी भेल वा
नहि
?
टीकाकार गोकुल नाथ अपना स्त्रीक संग श्लोक श्लोकबद्धे बातचीत करैत छलाह और
हुनक स्त्रीयो श्लोके मे जबाबो दैत छलथीन्ह।
की हुनका भानस करबाक लूरि नहि छलैन्हि
?
पतिव्रता नहि छलीह
?
आइ काल्हुक समयमे जखन कि सस्कृत लुप्त प्रायः भेल जाइत अछि,
अँग्रेजी में वहुतो विदुषी देख'मे
अबैत छथि सेहो हमरा देशक नहि।
बंगाल मद्रास इत्यादिक।
किछु दिन पूर्व सुनै छी लोक (स्त्री ) गनब पर्यन्त नहि जनैत छलीह।
ककरो दश तक ककरो बीस तक।
बस ताही सँ समस्त आश्रमक भार चला लैत छलीह।
शिक्षा मे तँ प्रधान चीज थीक पर्दा!
हमरा लोकनिक घर स्त्रीगण केँ ततेक पर्दा जे पुरुषक कोन कथा कोनो
स्त्रीगणोंसँ अकस्माते बजतीह।
आइयो- काल्हि एकदम शिक्षाक ह्रास नहि भए गेल अछि।
हँ तखन एहनो सब छथि जे ककहराकेँ भूतक मन्त्र बुझि पड़ाइत छथि।
(वर्ष-01,
अंक-11,
नवम्बर
1933
ई.)
स्त्री समाजक पतन
दिगम्बर नाथ झा
स्त्रीजाति प्राचीन समयमे पुरुष जातिकेँ असीम सहायता पहुँचबै छल।
एकर अतिरिक्त स्त्रीजातिकेँ गृह कार्य मे पूर्ण अधिकार छलैक।
हुनका लोकनिकेँ यथायोग्य स्वाधीनता छलनि।
परा-प्रथा अज्ञात छल।
विधवा स्त्री स्वेच्छानुसार पुनर्विवाह क'
सकैत छल।
सती-प्रथा बिलकुल प्रचलित नहि छल।
बहुतो बालिका सब विद्याध्ययन करैत छल तथा अनेक प्रकारक सुन्दर
प्रशंसनीय कविता करैत छल।
गर्वक साथ लिख'पड़ैत
अछि जे एक समय भारत वर्ष विशेषतः मिथिलाक सभ्यता उच्चतम छल।
प्राचीन मिथिलाक स्त्रीक स्थानक दिग्दर्शन सँ ज्ञात होइत अछि जे
ई स्त्रीक माताक सम्मानहिक फल छल जे विदेह,
गौतम,
याज्ञवल्क्यक मिथिला संसारक
'
अध्यापिका'
बुझल जाइत छलि।
हजारो दृष्टान्त अछि जाहि सँ पता लगैत अछि
,
प्राचीन समय मे मैथिल समाजमे स्त्रीक
स्थान की छल
?
हमर आदर्श,
विदुषी रमणी वेदक ऋचाक रचना करैत छलीहि।
गार्गी विदेहसँ वेदान्त पर वाद-विवाद कयने
छलीह।
भगवान शंकराचार्यसँ मिथिलाक दिग्गज विद्वान
मण्डन मिश्रक धर्मपत्नी भारतीक शास्त्रार्थ संसार प्रसिद्ध अछि।
जन्मदात्री,
शिक्षिता,
बुद्धिमती,
विदुषी,
वीर-प्रसवा एवं स्वस्थ छलीह।
अतएव सन्तानो विद्वान,
बुद्धिमान एवं स्वस्थवान होइत छलन्हि।
सारांश ई जे मिथिलाक सौभाग्यतारा चमकैत छल।
हिन्दू-समाजक पतनक साथ-साथ शूद्र तथा स्त्रीक स्थानक एकदम पतन भ'
गेलैक।
एक समय छल जखनि स्त्री लोकनि अध्ययन करै छलीह,
अपन पति चुनै छलीह तथा अपन-अपन पिता-पितामहक सम्पत्तिक
उत्तराधिकारिणी होइत छलीह,
इत्यादि।
संसार परिवर्तनशील अछि।
सभ वस्तुक परिवर्तन होइत छैक।
अतः क्रमशः बाल्यविवाह जारी रहल और स्त्रीक स्वाधीनताक चन्द्रमा क्रमशः
अस्त भ'
गेल।
विधवा विवाह जे एक समय प्रचलित छल,
रोकल गेल और एकर अतिरिक्त स्त्री जाति
के शिक्षा देव सेहो।
बन्द क
'
देल गेल।
क्रमशः सतीप्रथा जारी भेल इत्यादि।।
(ई आलेख प्राचीन भारत विषय पर अछि
,
जाहिमे सामाजिक अवस्था,
हिन्दू-समाजक पतन एवं स्त्रीसमाजक पतन छल,
जाहिमे एतय मात्र स्त्रीसमाजक पतन लेल
गेल अछि।
-हितनाथ झा)
(वर्ष-2,
अंक-08,
अगस्त
1934ई.)
निमन्त्रण
श्री श्रीनन्दन झा साहित्य तीर्थ
कोइलख,
पुबारिटोल।
सम्प्रति मिथिला पतनक गर्तमे अछि।
ई प्रायः सभक अनुभवक विषय आब भेल जाइछ।
अनुदार-सँ-अनुदार अंधपरम्परा तथा रूढ़िक उपासक हृदय अवश्य उपर्युक्त
धारणाक स्वीकार करत।
एहि स्थितिमे विना अप्रिय-सत्य कहने उपायो नहि।
संसार वाहिकाक सुन्दर पुष्प-लता-सम्पन्न मिथिला प्रदेशक भौतिक
किम्बा मानसिक सत्यानाश केवल अनुदार-वृद्धि-समुदाय तथा अश्वपरम्परा
(धार्मिक भेड़िया धसान) कयने अछि।
प्राचीन-गौरवक उल्लेख करैत निष्क्रिय भेल,
केवल रूढ़िपर लड़बाक चाह रखैत परम प्रसिद्ध सुवर्ण भूमि मिथिलाकेँ धर्म
रहित,
धन-रहित,
मर्यादा-रहित तथा बल-रहित कय पुनश्च
सर्वनाशी ताही जटिल विचारक उपांशुक छी,
धन्य विवेक!!
किन्तु औ मिथिलाक युवक पुत्र
?
की-अहाँक शरीर मिथिला भूमिमे उत्पन्न नहि भेल अछि
?
की अहाँ मैथिल नहि कहबै छी
?
आह!
कनेक दृष्टिपात तँ करू,
देखू मिथिलातिरिक्त अन्य देशमे तत्रस्थ युवक-समाजक
बलिदान तथा उत्सर्ग केँ।
केहन-केहन पतित-समाजकेँ हुनका लोकनि बात-क-बातमे सुधारि लेबाक सामर्थ्य
रखै छथि,
किन्तु अहाँक तँ जनु स्थितिये नहि हो!
की अहाँ मिथिलाक पुनरुत्थानकेँ असाध्य मानने छी
?
यदि हँ,
तँ मिथिलाक प्रति कृतघ्नता कय रहल छी-
युवक-समान संसारहुक परिवर्तन कय सकै छथि- एहि पवित्र-,
कथाक उन्मर्याद कय रहल छी।
अपना समाजमे धार्मिक-
अन्धता एकमात्र सकल अवनतिक कारण थिक।
अतः अविलम्ब-बद्ध परिकर होउ,
ताहि धार्मिक रूढ़िक निराकरणक हेतु क्रान्ति तँ करू।
क्रान्ति कहियो करहिक हयत।
आह सहृदय युवक,
वीर युवक समाज।
कनेक ज्ञान दृष्टिसँ देखू जे केवल अन्ध-
परम्परापनक कारणो संसार-व्यापी सुधार- वर्षणक एको जलबुन्द हमरा पर नहि
पड़ैछ।
कृपाकय सङ्ग-सङ्ग ई-टा धरि अवश्य ध्यानमे राखू जे आनक हितक
धारण तथा अपन अहितक निराकरण हमर कर्तव्य तथा पवित्र धर्म थीक।
एक पंचवर्षीया कन्याक दृष्टान्त समक्ष राखू।
ओ कोन प्रकारेँ व्यर्थ-व्यर्थ रभस दुलार तथा आलसमे समयकेँ
व्यतीत करैत हानिकारक रीति-रेवाज सिखैत,
काल-यापन करैछ।
बहुतोक एहनि शिशुकन्याक तँ हत्या समान विषाक्त विधि-विवाहो करा
देल जाइ छैक।
निरक्षरा रहैत से बालबधू कोन प्रकारेँ अपूर्ण ब्रह्मचर्यक पालन करैत
,
शीघ्र अल्पजीवी संतानक माता बनैत
,
काल कवलित होइछ।
अशिक्षिता रहैत ओ शिशु-कन्या प्रेमक रहस्यसँ अपरिचित दिन-राति
कलह किम्बा आलसमे जीवन व्यतीत करैछ।
नव-वधू अथवा ई कही स्त्री-समाजक जूताक चामहुसँ कतेक हेय अछि।
वधूकेँ मूर्खा रहलय पति-समाजक मनोवेदनाक अनुभव तँ करू।
असूर्यमपश्या पुत्रबधू नहिरा जाय तीर्थस्थानमे सर्वांगपश्या
कन्यका भय जाथि,
ई मिथिले मे दृश्य
?
औ मित्र
?
अन्तरात्मासँ पूछू,
कतेक पुरुष नारी-ब्रत रखबाक योग्यता
रखैत छथि,
तखन यदि मूर्खा एवं धर्माधर्मक यथार्थ रहस्यसँ अनभिज्ञ कामोद्दीपनक
कारणे स्त्री एक पुरुषव्रतक उल्लंघन कयलनि तँ की ओ पुरुष जकाँ क्षम्या
नहि
?
धन्य हमर विवेक
?
किन्तु मैथिल विधवाक समाज,
जकर एक मात्र कारण बाल तथा वृद्ध-विवाह थिक,
हमरा सभसँ कतेक अनादृता होइछ।
ओकर स्वाभाविक मनोवेदनाअधिकाधिक प्रज्ज्वलित करबाक प्रयास हमरा
सभकेँ रहितहि अछि।
पुनश्च वनिता समाजक स्वास्थ्य तथा मानसिक प्रगति दिशि दृष्टपात करू-,
हुनक विषमय जीवनक विवेचना करू।
की ओ जगन्माता जानकी,
गौरी,
लक्ष्मी,
सरस्वती नहि,
को ओ महाशक्तिशालिनी दुर्गा नहि
?
युवक समाज
?
सनातन धर्मक एक मात्र यैह अभिप्राय जे धर्मक
एहन नियम जे सदैव समान भावें स्थिर रहय,
कदापि देश काल पात्रानुसार सँ विकृत नहि हो
?
अतः चोरी करब
,
निन्दा करब,
हिंसा करब,
परदार गमन,
परपुरुष-गमन,
भ्रूण-हत्या,
असत्य-बाजब,
दुष्टकेँ आश्रय देब प्रभृति
सनातन-धर्मक शक्तिशाली स्तम्भ थिक जे सदैव सभ धर्ममे समान भावें समादृत
अछि।
असमान इतर नियम स्वकपोलकल्पित थीक,
जकरा अपन यथासाध्य मौलिकता रखैत देश
काल पात्रानुसार सुधारमे परिवर्तन करब कर्तव्य हयत।
उदाहरणार्थ यदि हम हिन्दू भय भारतारिक्त विदेश यात्रा करी,
ओ हिन्दूभाव रखैत
,
तकर प्रचार करैत प्रत्यागत होइ,
मातृभूमिकेँ संसारसँ पैघ बूझि
,
मातृभाषाकेँ अपन प्राण बुझी तँ एहिसँ बढ़ि कय धर्मो नहि।
औ समाजक एकमात्र आशास्तम्भ
?
अपने ई जानि लेल जाय जे,
जे जीव परमात्माक सृष्ट थिक
,
तकरापर हमरा अधिकार तावतहि जा धरि हम ओकर नीक करैत रहियैक- जखनहि अयमे
तकर अहितक ध्यानो करब,
तकरापरसँ अधिकार हटि जायत,
अतः अपन,
-अपन
कर्ममे लीन समाजक छोट सँ छोट जाति कर्महीन पैघ सँ पैघ जातिक हेतु उच्च
थिक,
प्रेममात्र सम्बन्ध थिक,
जकरा नैसर्गिक होमक चाही।
तेँ पिताकेँ चाहियैन्हि जे ओ पुत्रक नीक करथि,
पुत्र पिताक रक्षा करथि,
स्वामी-स्त्रीक स्त्री स्वामीक,
राजा रंकक रंक राजाक,
एहिमे उँच-
नीच किम्बा घृणाक लेशमात्र नहि रहक चाही।
किन्तु स्वार्थी अपन समाज तेहन जड़ भेल जाइछ जकर पारावार नहि।
आवश्यकता अछि सामाजिक एक प्रगाढ़ एवं दृढ़ क्रांतिकारीक जे लाखो
हास्य,
उपहास्य,
प्रतिक्रिया,
झंझट,
कष्ट,
उत्सर्ग,
त्याग किंवा प्राण विसर्जनहुक हेतु कटिबद्ध हो।
अतएव आइ हम एहि लेख द्वारा सम्पूर्ण मैथिल-युवक समाजक आमन्त्रण करै छी,
एक वेरिक झटकमे अपने प्राचीन विचारक
अहितकर (हितकरक रक्षा करैत) जंजीर केँ तोड़ि दिअ,
फेर तँ समाजमे तेहन क्रान्ति ने उठत जे
नावकेँ एक भाग लगाइए क राखत।
पृथ्वी कखनहुँ कोनो वस्तु विशेष सँ खाली नहि रहैछ
,
चक्रव्यूह-रचनाकेँ द्रोण बुझलन्हि जे
एकर भेदन कैनिहार क्यो नहि,
परञ्च वीर-अभिमन्यु आविये गेलाह,
दशावतार युवत्वेमे संसारमे अखिल परिवर्तन कैलक,
अन्यान्यो महात्मा जड़-समाजमे उत्पन्न भै कय सुधारिये देलन्हि।
अतः हमरा आशा अछि जे
,
मैथिल-युवक-समाजमे अवश्य वीर तथा विज्ञानी लोक अछि,
एकमात्र अभिनिवेशक चांगुर मे ओ कुहरि रहलाह अछि,
जकरा साहस कय परित्याग कय देव प्रथम कर्तव्य थीक।
सत्य तँ ई थीक जे मिथिलाक सुधार समुचित-उन्नति,
मैथिल युवकक हाथमे अछि,
परन्तु छथि प्रलोभनमे पड़ल अलसायल
?
की हमर ई प्रार्थना अरण्यरोदन तँ ने थीक...।
(वर्ष-02,
अंक-9,
सितम्बर
1934
ई.)
बाल्य विवाह
राधाकान्त मिश्र
7
वां क्लास
दुःखक विषय थीक जे हमर जाति कुप्रथाक भण्डार मानल जाइत अछि।
हा! जे जाति संसार भरिमे प्रतिष्ठा पयने
छल,
जे सभकेँ शिक्षा प्रदान करैत छल,
वैह आइ अधमगतिमे अछि।
आब हमर दशा कियैक नहि सुधरत
?
हम कियैक नहि उन्नतिक रास्तापर अग्रसर होइत छी
?
मातृभूमिक सत्य सेवक पण्डित बालकृष्ण भट्टजी बहुतो ठीक कहि गेल
छथि जे- किनको विचार अछि जे देशक उन्नति स्त्री-शिक्षा सँ होयत,
क्यो कहैत छथि जे विधवा विवाहक प्रचार
भेला सन्ता नीक होयत,
क्यो कहैत छथि जे खैव-पीबाक कुप्रथा जँ उठा देल जाय तँ हिन्दू लोकनि
स्वर्ग जा इन्द्रक आसन छीनि लेताह,
क्यो कहैत छथि जे विलायत गेला सन्ता तरक्की होयत।
परन्तु हमर कहब ई अछि एहि सभसँ किछु नहि होयत।
जा तक बाल्य विवाहक कुप्रथा नहि हटा देल जायत।
सर्वप्रथम हमरा लोकनिकेँ एहिपर विचार करबाक चाही जे ई बाल्य-विवाहक कुप्रथा
हमरा लोकनिमे कियैक प्रचलित भेल
?
इतिहास हमरा ज्ञात करबैत अछि जे जखन जबनक अत्याचार सँ स्त्रीक सतीत्व बाँचब
असम्भव भय गेल तँ हमर आचार्य लोकनि देशकालक विचार कय बाल्य-विवाहक
प्रथा चलौलैन्हि।
यद्यपि एहि प्रथा सँ ओहि समयमे मान मर्यादाक थोड़ बहुत रक्षा भेल
परन्तु ई आब हमर प्राण लेबाक हेतु उद्यत भय रहल अछि।
एकर प्रभाव पड़ैत-पड़ैत हमर संस्कार एहन भय गेल अछि जे हम एकरा
धर्मपुस्तकक आज्ञा बूझय लागल छी।
जाहि घरमे सन्तान किछुओ युवा भेल,
बस,
हमरा लोकैनि ओकरा अपमानित बुझैत छी।
हमरा लोकैनि एतेक नीच भय गेल छी जे जतबो ध्यान वृक्षक दिशि अछि,
-
सन्तानक दिशि ओतबो नहि।
वृक्ष लगयबाक समय एहि बातपर अत्यन्त ध्यान रहैत अछि जे वृक्ष पुष्ट हो,
ओकरा रोपबाक हेतु भूमि तैयार कयल जाइत
अछि।
भूमिसँ कंकड़ तथा पाथर हँटा दैत छी आओर अनेको
प्रकारसँ ओकर रक्षा कयल जाइत अछि।
परन्तु की हम सन्तानक किछुओ रक्षा करैत छी
?
जे चेतन वृक्ष अछि,
जाहिसँ चेतन फलक आशा अछि,
आओर जाहिसँ अपन वंशे नहि,
वल्कि देश उज्वल भय सकैछ-
की ओहि सन्तानकेँ,
विवाहक पूर्व विद्वान आओर पुष्ट बनायबाक हेतु यत्न करैत छी
?
नहि,
कथमपि नहि।
ई कुप्रथा भारी अनर्थ प्रचार कैलक अछि।
समाज आओर जाति जाहि नेनासँ आनन्दित होइत छथि,
ओ स्वयं छोट वयसमे विवाहक कारण वल
बुद्धिकेँ गमा दैत छथि।
आओर ब्रह्मचर्यक कमाप्तक कारण सँ आत्मनिर्भरता हुनका समीप तक नहि आबि
सकैत छैनि।
ब्रह्मचर्य नहि तँ स्वास्थ्य,
बल,
तेज और विद्या हुनका कहाँ
?आओर
जखन यैह सब नहि तँ ओ परावलम्बनक हथकड़ी नहि पहिरथि तँ की करथि
?
बालिका कम वयसमे सन्तानक जन्म देबाक कारण अनेको प्रकारक रोगसँ ग्रसित भय
जाइत छथि आओर गृहस्थाश्रम दुखाश्रम भय जाइत अछि।
ई बाल्य-विवाहेक कारण थीक जे हजारो विधवा-स्त्री हमरालोकनिक
घरमे विलखि-विलखि केँ रुदन करैत दिन व्यतीत कय रहल छथि।
उपर्युक्त बातपर विचार कयला सन्ता ज्ञात होइत अछि जे यदि हम अपन उन्नति
चाहैत छी- यदि देशक उपकार चाहैत छी तँ हमरा एहि कुप्रथा हटेबाक यत्न
करबाक चाही।
आब ओहन अत्याचार नहि अछि जे फेर ई रीत प्रचलिते रहै।
ओहि समय जाहि प्रकारेँ हमर आचार्य लोकनि देशकाल देखि क'
बाल्य-विवाहक नियम बना देने छलाह ओही प्रकारेँ आबो उचित थिकैन्हि जे
'
एहि समयक'
आचार्य नियम बना क'
बाल्य-विवाहकेँ बन्द कय देथि आओर हिन्दू
शास्त्रक नियमानुसार आदर्श विवाहक रीत चलाबथि।
हमर बहुतो भाइ कहताह जे आइ काल्हि ब्रह्मचर्याश्रमक नियम पूर्ण रूपसँ पालन
करबामे बहुतो कठिनता छैक आओर एहि हेतु
25
आओर
163
नियम राखब बहुत कठिन हैत।
हम कठिनताकेँ स्वीकार करैत छी आओर हमर सम्मति अछि जे एहि समय कम सँ कम
19-20
वर्षमे बालकक तथा
13-14
वर्षमे बालिकाक विवाह हो।
यदि अधिक वयसमे विवाह होमय लागि जायत त बाल्य-विधवाक संख्या
एकदम निर्मूल भय जायत।
(वर्ष-02,
अंक-12,
दिसम्बर
1934
ई.)
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