हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१२

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
सनातन धर्म ओ संस्कार
'प्रभात'मे
निबन्धक संख्या बेसी अछि। निबन्धोमे साहित्यिक विषयसँ बेसी सामाजिक-सांस्कृतिक
विषयपर विशेष ध्यान देल गेल अछि। भाषा सेहो मैथिलीक अतिरिक्त हिन्दी आ
अंग्रेजी अछि,
मुदा मैथिलीक प्रमुखता अछि। अनेक अंकमे सम्पादक द्वारा रचनाकार लोकनिसँ
निवेदन कयल गेल अछि जे मैथिलीकेँ प्रमुखता देथि। सनातन धर्मपर अनेक
अंकमे मैथिली एवं हिन्दीमे विद्वत्तापूर्ण आलेख अछि। ओहि आलेखमेसँ किछु
मैथिलीक आलेख एतय प्रस्तुत क’रहल
छी आ किछु अग्रिम अंकमे प्रस्तुत करब। वर्तनी रचनाकारक जे अछि ओकरा हू-बहू
रखबाक प्रयास कयल गेल अछि।
सनातन-धर्म्म
केदारमणि झा मंगरौनी
जे धर्म्म परम्परा सँ चलल अबैत अछि सैह धर्म्म
सनातन धर्म्म थीक। एहिमे सन्देह नहि जे सनातनधर्मावलम्बी अपन धर्म्ममे
पूर्ण विश्वास कए एहि पर कट्टर छथि और यैह कारण थीक जे ई धर्म्म अनादि
कालसँ अनेकान्य धर्म सँ प्रतिवाधित होइतहुँ संख्यामे कम नहि भेल अछि।
जाहि दिन बौद्ध धर्म्मक भयंकर धूआँ समस्त संसार केँ झाँपि देने छल,
जैन धर्म्मक प्रकोप सँ सभ धर्म्म कम्पायमान होइत छल और इसलामक घण्टा
भूमंडलक कोण-कोण
मे आसमर्द कए रहल छल ताहू दिन ई सनातन धर्म अपन प्रतिष्ठा पर अटल रहि
संसार काँ विमुग्ध
कैल। संसारक एहि प्रलयकालमे जखन कि क्रिश्चियन धर्म काठक घून जकाँ बड़े-बड़े
प्राचीन धर्म काँ धक्का दए खसा रहल अछि,
मुसलमान हिन्दूक मार्मिक विरोधी,
आर्य्य समाज हिन्दू धर्मक प्रतिष्ठा काँ माँटि मे मिला रहल अछि तथापि ई
सनातन धर्म अपन रास्ता सँ कनेको विचलित नहि भेल। जेहो किछु ह्रास बुझना
जाइछ से मुसलिम धर्मक कारणे नहि,
इसाई धर्म्मक कारणे नहि,
ई थीक--घरक
भेदिया आर्य्य समाजी धर्म
!
ई बूझब परम् मूर्खता थीक जे बाबू अँग्रेजी पढ़ि कोट-कमीज
पहिरनहि खाइत छथि
!
ई अँग्रेजी भाषाक दोष नहि,
अंग्रेजक संसर्गक दोष नहि,
ई थीक---
बाबूक अंग्रेज बनबाक इच्छाक दोष। कारणे यैह थीक जे केहन-केहन
महामहो उपाध्याय लोकनि जूता पहिरिने पानि पिबैत छथि यद्यपि हुनका मे
अंग्रेजीक
"अ
आ इ ई
"क
लेश नहि
!
यदि हुनका संग एहन प्रश्न उठौल जाय जे अपने पनही पहिरिने पानि कियैक
पील तँ मनुक,याज्ञवल्क्यक
श्लोक सँ कान तोड़ि देताह।
ततेक प्रमाणो देताह जे अवाक भए जायब। वस्तुतः विषय की थिकैक कोना बुझू
?
सत्यदेव मिश्र ओहि पंक्तिक अर्थ किछु कहताह और लूटी झा किछु
?
हमरा लोकनिक मोट बुद्धि तँ वीचहि मे गैव भए जाइत अछि। धर्मशास्त्र अपार
अछि। ओइ मे की नहि छैक
?
जे जेहन पंडित तकरा तेहन स्वाद। तखन करक वैह चाही जे सभ दिनसँ कए आएल
छी। किन्तु करै छी कहाँ
?
बिना स्नाने नहि खाइ,
अछूत सँ छूत हो तँ स्नान कए ली
!
मगर एहि अछूतोद्धारक समयमे जखन कि एक डोम साक्षात विश्वनाथकेँ छूबक
हेतु तत्पर अछि,
कैक बेर स्नान करब
?
उत्तम थीक जे जले मे डूबि रही।
बड़े दुःखक संग लिख पड़ैत अछि जे एखन हमरा लोकनिक धर्मक नेता महात्मा
गाँधी,
प.
मदन मोहन मालवीय प्रभृति छथि जनिका लोकनिक शोणित विलायतक दूषित वायु सँ
अपरिष्कृत भए चुकल छैन्हि। जे स्वयं यूरपक यात्रा कैक बेरि कए आयल अछि,
जकर मलेक्षक अन्नपानि सँ शोणित,
हड्डी,मांस
बनि चुकल छैक तकरा की अधिकार हमरा लोकनिक निरामिष धर्ममे हाथ ले
?
राजनीति द्वारा हमरा धर्ममे कियैक दवाब पहुँचत
?
ई आर्य्य समाजी लोकनि जे हारमोनियम बन्हने शहरे-शहर
नाच कैने फिरै छथि तनिका ई ज्ञान नहि जे हिनका लोकनिक आदि गुरू
दयानंदेकेँ स्वामी शंकराचार्य
केहन केँ मूँह कारी कैने छलथीन्ह?वर्माश्रम
संस्था बहुत दिनसँ अछि। और की,
वेदमे पर्यन्त एकर चर्चा आएल अछि। वैदिक भारत,
जखन समस्त संसार अंधकारमय छल,
वर्माश्रमक प्रतापसँ की नहि कैलक?
एतबो तँ पश्चिमीयो विद्वान मानैत छथि जे ई संस्था नीक थीक और यैह एक
प्रधान कारण छल जे भारत वर्षक सूर्य्य एक दिन आकाश मे उठि पड़ल छलाह।
वर्माश्रम प्रथा सँ कर्तव्याकर्तव्यक ज्ञान तँ दिव्य रूपेँ होइते छैक,
जे एहिसँ सामाजिक,
राजनैतिक एवं धार्मिको उन्नति पूर्ण रूपेण होइछ। नियम छल ब्राह्मण
मानसिक,क्षत्रिय
शारीरिक,
वैश्य आर्थिक उन्नति करथि और शूद्र तीनूक सेवा। पाश्चात्य भाषाक
विद्वान लोकनि यद्यपि ई संस्था तोड़ि शूद्रो काँ शास्त्राध्ययनक भाग
देवामे संकोच नहि कैलन्हि अछि और अनेको नीच जाति यद्यपि दिग्गज जकाँ
अपन विद्वताक मदसँ माँति रहल अछि,
किन्तु संस्कार कहाँ?
अस्पृश्य जाति सँ छूति भेने हड्डी पर्यन्त छूतल जायत संस्कार लुप्त भए
जायत। एहि भयसँ एखनो एहन बहूत महात्मा छथि जे गाड़ी सँ उतरतहि स्नान कए
लैत छथि। एतबे नहि,
स्नानोत्तर गंगाजल छीटि तज्जन्य पापक प्रायश्चित करैत छथि। गाड़ीमे
खैताह नहि--भूखे
बरु काँकोड़ भए जैताह,
कलक पानि सँ लघी नहि करताह,अंग
बरु टूटि जाय। पुनः एखनो कतेक व्यक्ति छथि जे’संध्या’
ई शब्द कदाचिते सुनने हैताह। की कहू बाबू,
समय तँ तेहने आबि गेल अछि जे,
जे यज्ञोंपवीत,
बाप-माय
भिक्षा माँगि-माँगि
कए वैदिक मन्त्र सँ होम करैत अग्नि ब्राह्मणकेँ साक्षी कए देलैन्हि अछि
तकरा स्थानमे एलेक्जेंडर गोलीताग
पहिरि,
दहीक घोर केँ छोड़ि विलायती चर्बी और घोड़ाक लिट्टीक बनल भिनोलिया साबून
सँ साफ करैत छी।
कहाँ तक हुनक संस्कार दिव्य हेतैन्ह
?
कलियुगमे चारू वर्ण एक भय जायत एहि श्रुतिवाक्यकेँ कैक घड़ी हम अहाँ
रोकबैक?
यदि यथार्थ रूपेँ देखल जाय तँ ककरो धर्म बाँचल नहि अछि। बाजारक लड्डू
जे कि दोबाड़े चीनीक बनैत छैक,
अपने तँ खाइते छी,
अलभ्य बुझै छी जे घरक गोसाउनियों केँ बड़े प्रसन्न चित्त भए
उत्सर्ग करबा में कनेको मन मलीन नहि होइत अछि। संसर्गासंसर्ग जन्य
पापसँ वंचित हजारमे गोटेको भेटब दुर्लभ। जे हो,
सनातन धर्म परम प्राचीन अछु और एकर उद्देश्यो बड़े महत्वपूर्ण एवं उदार।
सनातन धर्मक संतान लोकनिक यैह कर्तव्य थीक जे दत्तचित्त सँ एकर
रक्षणार्थ लागि पड़ी और साम्प्रतिक अछूत-महार्णव
सँ रक्षा करी। सनातन धर्मक पैर एखनहुँ टुटलैक नहि। प.राजेश्वर
शास्त्री सदृश खम्भ एखनहुँ एहिमे वर्तमान छथि।
मिथिला सभ दिनसँ धर्मक केन्द्र मानल गेल। गौतम,शंकर,
वाचस्पति प्रभृति धर्मशास्त्रक कीड़ा लोकनि एतैक छला। हुनका लोकनिक
सन्तान होइतहुँ यदि हमरालोकनि धर्म रक्षार्थ नहि ठाढ़ होइ तँ एहेन अधम
के
?
अन्यान्य धर्मकेँ प्रचार करबाक निमित्ते प्रत्यह कोटियो टाका कहि रहल
अछि किन्तु हमरा लोकनि देहि ल क ठाढ़ होयबामे अपन अपमाने बुझै छी,
वाह रे बुद्धि
?
केदार मणि झा
(वर्ष-01,
अंक-05
मइ
1933
ई.)
सनातन धर्मक अनुसन्धान
तुलानन्द मिश्र,
नाहर।
बहुत आश्चर्यक विषय थीक जे हमरा लोकनि अपन-अपन
धर्म केँ त्यागि अन्य धर्मक अनुकरण क रहल छी।
प्रायः कइ हजार वर्ष गत भ गेल जे ई धर्मक प्रचार भारत के प्रत्येक कोन
मे पूर्ण तरहेँ छल लेकिन आइ इहो समय आबि गेल अछि जे प्रत्येक घरमे एकर
विरुद्ध षड़यंत्र भय रहल अछि।
आधुनिक विद्याक कोनो दोष नहि छैक परन्तु शोक सँ कहक पड़ैत अछि जे नवयुवक
लोकनि केवल भारत वर्षक इतिहास पर निर्भर भय पूर्वक आचार-विचारकेँ
केवल दोष लगाय नवीन सुधार करबाक हेतु पूर्ण यत्न करैत छथि। भारत वर्षक
इतिहास जे प्रत्येक वर्गमे पढ़ाओल जाइत अछि,
एकदम कल्पना थीक। प्रत्येक व्यक्ति केँ उचित थीक जे वेद के ऊपर पूर्ण
विचार करी जे वर्ण-विभागक
व्यवस्था केने
अछि। ऐतिहासिक लोकनि कहैत छथि जे पूर्वमे वर्ण-विभाग
नहि छल केवल
Epic periodक
बाद ई व्यवस्था भेल अछि लेकिन वेदानुसार ई एकदम झूठ थीक। कारण पुरुष
सूक्तमे जे ई अछि--”ब्राह्मणोsस्यमुखमासीद्वाहू
राजन्य:कृतः।
उरू तदस्य यद्वैष:
पद्भ्यां शूद्रोsजायतः।
“एहि
सँ स्पष्ट बुझि पड़ैत अछि जे वर्ण विभाग वैदिक समयमे पूर्ण तरहे छल। अपन-अपन
धर्म के एकदम बिसरब केवल अपन-अपन
कर्मक लोप हेबाक कारण बुझि पड़ैत अछि। ब्राह्मण लोकनि अपन-अपन
कर्म एकदम छोड़ि देलैन्हि जेकर उदाहरण ई थीक जे प्रत्येक गाँव मे आठ
अंशमे एक अंश ब्राह्मण संध्या-तर्पण
करैत छथि अन्य कर्मक बात दूर रह। ब्राह्मणक कर्तव्य थीक जे गायत्रीक जप
खूब करी लेकिन आइ-काल्हि
गायत्री शुद्ध पूर्वक जानब सेहो कठिन भ गेल अछि तेँ हेतु हमरा लोकनि के
बार-बार
ईश्वर सेहो पूर्ण तरहे दण्डित कय रहल छथि। जखन ब्राह्मण लोकनि अपन-अपन
कर्म छोड़ि
देलन्हि तखन अन्य वर्णक कोन कथा कहू,
पाठक लोकनि के स्वयं विदित हैत। केवल वर्ण-संकर
लोकनि एकर अनुकरण कय रहल छथि यद्यपि एहि वर्ण के एकर आग्रह नहि छैन्ह,
लेकिन हमरालोकनि एकर भार देबाक कोशिश कय रहल छी जेकरा हेतु महात्मा
गाँधी एकर बीड़ा उठा लेने छथि। हमरोलोकनिमे अधिकांश हुनके सहायक बनैत
छी। बड़ा शोक के विषय थीक जे हमरोलोकनि अपना-अपना
पूर्वजक कर्मकाण्ड के ऊपर लांक्षणो लगाय नूतन हेर फेर चाहैत छी। “कर्मण्येवाधिकारस्ते
मा फलेषु कदाचन”एहि
सूत्र के ऊपर किछु विचार नहि करैत छी।
सम्प्रति मे सनातन धर्मक ऊपर बड़ा आघात पहुँचि गेल अछि जेकरा हेतु बहुतो
पंडित तथा महान व्यक्ति मिथिला मे घरे-घरे
घूमि प्रत्येक व्यक्ति के सूचित कय रहल छथि जे आबो अपने लोकनि
कुम्भकरणीय निद्रा सँ च्युत भय जाउ। यद्यपि भावी जे हेतैक से हेवे करत
तथापि अपन भरि पूर्ण यत्न कय रहल छथि। हमरा लोकनिकेँ ई विश्वास
अछि जे ई सनातन धर्मक नीव बहुत मजबूत तथा पक्का छैक। एकरा मे एहि तरहक
उपद्रव कैक बेर भेल अछि लेकिन ई डोलबो टा नहि कैल। श्री
108
जगदम्बा एकरा एहि तरहे बचबैत रहतीह। हिन्दू राज्यक समयमे बौद्ध धर्म
पूर्ण तरहे जाग्रत भय एहि धर्म के दवा क हेतु पूर्ण यत्न केलक तथा जैन-धर्म
सेहो अपना सीमान्त तक पहुँचि गेल परन्तु ई सनातन धर्म कहियो विनष्ट नहि
भेल। मुसलमानी राज्यक समय एकरा ऊपर कैक तरहे आघात पहुँचलैक परन्तु एकर
जड़ि तेहन पक्का छलैक जे अन्य धर्म के किछु नहि टेरलक। तेँ हेतु आशा
करैत छी जे सम्प्रति मे जे अछूतोद्धारक आघात
छैक ताहि सँ अवश्ये उबरि जैत। हमरलोकनिक परम् कर्तव्य थीक जे अपना-अपना
पथपर आरूढ़ भय’मन्दिर
प्रवेश बिल'क
पूर्ण विरोधी भय जाइ।
गत भूकंप हमरालोकनि के पूर्ण चेतना देलक जे धर्म की वस्तु थीक तथा हमरा
लोकनि के की कर्तव्य थीक। यदि धर्मक अभाव नहि रहैत त पृथ्वी एहि तरहे
अपना बोझ नहि पटैक दितथि। माय कतौ अपना बेटा के छोड़ैक। एहि तरहक समस्या
उपस्थित भय गेल तथापि हमरा लोकनि काहिल भय गेलौं। कर्म-धर्म
सभगोटा के बिसरि गेल। तेकर ई फल थीक। आबहु दृढ़ प्रतिज्ञ भय जाउ,
जाहि सँ अपन-अपन
धर्म बचि जाय तथा एहिमे कोनो तरहक धब्बा नहि लगैक।
ई विचार करब हमरा लोकनि के उचित थीक।
आधुनिक संस्था एहि तरहक अछि जे ककरो धर्म नहि बचत,
परंतु हमरा लोकनि यथासाध्य चेष्टा करी जाहिसँ सनातन धर्मक ह्रास नहि
होइक। एकरा हेतु हमरलोकनि तन-मन-धन
सँ यथासाध्य अपना केँ बलिदान करबाक पूर्ण यत्न करी। जखन-जखन
बात स्वयं
सिद्ध अछि जे ई शरीर अवश्य नष्ट हैत तखन धर्मक हेतु नष्ट हो सैह उचित
थीक।
विशेष हमरा सदृश अल्पज्ञ सनातन धर्मक अनुसंधान कहाँ तक कय सकैत अछि,
तथापि आशा करैत छी जे पाठकगण एतबैक सँ पूर्ण तरहे संतुष्ट भय जेताह तथा
हमरा लोकनि एहि धर्म-युद्धमे
अवश्य विजय प्राप्त
करब।
"यत्र
योगेश्वर:
कृष्ण
:
यत्र पार्थो धनुर्धर:
तत्र श्री विजयोर्भू
तिर्ध्रुवानीति मतिमम।
"
तुलानन्द मिश्र,नाहर।
(वर्ष-02,अंक-04,अप्रैल1934ई.)
संस्कारक शिथिलता
श्री रमानन्द झा,
कोइलख।
मैथिल मण्डली
सदाचार आदि विषयमे
पूर्वकाल सँ सर्वदा अग्रगण्य
बूझल जाइ छलाह,
किन्तु साम्प्रतिको समयमे बहुत समाजक अपेक्षा अग्रगण्य छथि। परञ्च
संस्कारक विषयमे क्रमिक शिथिलता आबि रहल अछि। किछु होइतहुँ अछि तँ
असमयपर और अविधि। शास्त्रानुसार ब्राह्मण कॉ दश टा संस्कार निर्दिष्ट
अछि। गर्भाधान पुंसमन,
सीमन्तोन्नयन कोन समयमे होइ छैक वा ई कोन वस्तु थीक एकर परिभाषा यैह
अछि। जे सीमन्त उन्नीयते यस्मिन कर्मणि तत सीमन्तोन्नयम। सीमन्तीन्तिनी
बधूस्तस्या सीमन्तीन्नयनाख़्य संस्कार स्योत्सवः गर्भिय्यवस्थायाम
चतुर्थे गर्भ मासि कार्य:।
एकर अर्थ अत्यन्त सुगम छैक। तदुत्तर जातकर्म्म संस्कार,
ई संस्कार जन्मकालिक संस्कार थीक। एहि संस्कार मे जन्मक बाद ओही
मुहूर्तमे नार काटल जायब सँ पूर्व मे मन्त्र पढ़ि केँ प्रसूत बालक केँ
सुवर्ण मधु और घृत चटाओल जाइत छैक। तखनि नामकरण,
जन्मदिनसँ ल कए ग्यारहम दिन वा बारहम दिन मे होइ छैक। नाम केहन होमक
चाही तकर पतंजलि कृत महाभाष्यमे निर्णय अछि जे द्वयक्षरं चतुरक्षरंम्वा
नामकरणम कुर्यात,
दु अक्षरक अथवा चारि अक्षरक नाम हो और केहेन होमक चाही तँ मंगलवाचक नाम
ब्राह्मणकेँ,
बल वाचक नाम क्षत्रियकेँ,
धनवाचक नाम वैश्यकेँ और दास भाव वाचक नाम शूद्रकेँ यथा शर्म्म,
वर्म्म,
भूति,
दास,शुभशर्मा
आदि।
एही तरहे स्त्रीयो जातिक नाममे विचार अछि। स्त्रीक नाम एहन होमक चाही
यथा अक्रूर और सरल तथा कल्याण
वाचक,यथा
यशोदा अछि। तदनन्तर षष्ठम मासमे अन्नप्राशन,
प्रथम वा तृतीय वर्षमे चूड़ाकरण और गर्भाष्टमक बाद अर्थात जन्मसँ ल क
6
वर्ष तीन मासक बाद,
उपनयन संस्कार होइ छैक। एही तरहे शास्त्रोक नियम अछि। यथा(प्रथमेs
तृतीयेवा चूड़ाकरणम द्विजन्मनाम। गर्भाष्टमे ब्राह्मण स्योपनायनम एहि
तरहे संस्कार कयलासँ किछु फल छैक की नहि। एहिमे स्मृतिक वचन प्रमाण दैत
छी। यथा-
वैदिके:कर्मभिः
पुण्यै निकिषा दिद्विर्जन्मनाम।
कार्य्य
:
शरीरे संस्कार:पावनः
प्रेत्य चहेच
?
श्री रमानन्द झा,
कोइलख
(वर्ष-02,अंक-05,मइ
1934
ई.)
धर्म
प.
श्री द्वारका नाथ झा,
क्वैलख।
यतो धर्म्मस्ततोजयः।
एहि क्षणभंगुर संसारमे सर्वतो भावे धर्म उपासनीय थीक। कारण धर्महि सँ
प्राणी चिरस्थायी सुखक अनुभव कै सकैछ। परञ्च धर्म ककरा कही,
धर्म्म की वस्तु थीक,
धर्म्मक केहन स्वरूप छैक,
एकर निर्णय करब अत्यन्त क्लिष्ट अछि। कारण धर्मक गति अत्यन्त सूक्ष्म
छैक।’घृ’धारणे
धातु सँ धर्म्मक साधनिका भेल छैक। यद्यपि धर्म्म अनेको अछि तथापि अर्थ
सभक एक्के छैक। अपन-अपन
शास्त्रोक्त जे
कर्तव्य कर्म करब,
प्राणीपर दया राखब सैह धर्म कहै छी तँ यथार्थ कारण जे अहिंसा
परमोधर्मः। परञ्च सांख्य सूत्र प्रणेता महर्षि कपिल मुनिक सूत्र छैन्ह
जे-“यतोभ्युदय
निःश्रेयस सिद्धि:
स धर्म्म
:।
“
इहो सूत्र ओहि अर्थ के पुष्ट करैत अछि। मानव धर्मशास्त्रमे एहि तरहेँ
धर्म्मक लक्षण लिखित अछि। यथा
“विद्वद्भि:
सेवितः साद्भिर्नित्य मद्वेष रागिभिः। हृदयेनाभ्यनुज्ञातोयो धर्म्मस्त
निवोधत।
“अर्थ-
साधु तथा राग द्वेष शून्य विद्वान सभैक द्वारा हृदयसँ अनुज्ञात अर्थात
मनसँ जानल और निरन्तर सेवन कयल जे धर्म ओकरा सुनू। बिना धर्म्म
सँ सुख कदापि नहि भ सकैछ। सुखक अभिलाषा समस्त जीव के होइ छैक। परञ्च
मानवीय कलेवर धारी जीव के विशेषतया अभिलाषा होइ छैन्ह। जाहि हेतु पूर्व
कालमे ऋषि महर्षि तथा राजर्षि लोकनि धर्माचरणक प्रभाव सँ असाध्य साधन
कय अन्त मे अक्षय सुख प्राप्त करैत भेलाह।
सर्वप्रिय प्राण थीक जीवमात्रक हेतु परञ्च ताहूसँ श्रेष्ठ धर्म्म थीक।
कारण जे प्राण रहनिहार नहि थीक ओकर आधार शरीर सँ अनित्य छैक। शरीर
अनित्य भेलासँ अत्यन्त कष्ट सँ प्राप्त जे शारीरिक गुण जे विद्या
बुद्धि क्रिया कौशल आदि सभ विनष्ट भ जाइ छैक। तखन शरीरातिरिक्त वस्तुक
कोन कथा। एहन एक मात्र
सहायक मित्र धर्मे टा अछि जे सर्वदा संग रहनिहार थीक। धर्म्म दूत रहे भ
सकैछ अर्थ सँ ओ शरीरो सँ एहि तरहे स्मृतिकारोक्त वचन अछि-
शरीरात एतवते धर्म:
पर्वतात सलिलं यथा
“किंचधनादधर्म:।
प.श्री
द्वारका नाथ झा,
क्वैलख।
वर्ष-02,अंक-07,जुलाइ-1934ई.)
सनातनधर्म
श्री शोभानन्द झा
बी.ए.
सम्पनं
त्रिषु कालेषु सर्वावस्थासु शाश्वतं।
सनातनं मतं सत्यं चीयते नापचीयते।।
सनातन धर्म ककरा कही
?
स्मरणातीत कालसँ जाहि धर्म केँ हमर
पूर्वज लोकनि-
वशिष्ठ,
वत्स,याज्ञवल्क्य
प्रभृति-
मानि ऐलाह जे धर्म अद्यपर्यन्त
हमरा लोकनिक मान्य अछि तकरे नाम थीक सनातन धर्म। सनातनधर्मक प्रधान अंग
थीक वर्णाश्रमधर्म। अतः वर्णाश्रमधर्मक पालन करब सनातनधर्महिक जड़ि सीचब
थीक। वर्णाश्रमधर्म निम्नलिखित अछि
:-
ब्राह्मण क्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
कर्मणि प्रविवक्तानि स्वभाव प्रभवैगुंनैः।।
गीतामे भगवान कृष्ण अर्जुन केँ उपदेश कैने छलाह जे ब्राह्मण,
क्षत्रिय,वैश्य
वो
शूद्रक कर्म स्वभावानरूप पृथक कैल अछि।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जव मेव च।
ज्ञानं विज्ञान मस्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजनं।।
ब्राह्मण स्वभावतः शान्त,
जितेन्द्रिय,
बह्याभ्यंतर पूत,
क्षमासम्पन्न सरल,ज्ञान-विज्ञान
प्रिय वो आस्तिक होइत छथि।
शौर्यं तेजो धृतिरदाक्षयं
युद्धे चाप्यपलायनम।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम।।
क्षत्रिय स्वभावतः शूरवीर,तेजस्वी,धैर्यसम्पन्न,चतुर,युद्धमे
दृढ़,दानपरायण
वो प्रजापालक होइ छथि।
कृषि गौरक्ष्य वाणिज्यम वैश्यकर्म स्वभावजम।
परिचर्चाक्तम कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम।।
(गीता
अध्याय
12)
कृषि,
गौरक्षा,वाणिज्य
ई तीनू टा कर्म बनियांक स्वभावसिद्ध छैक। अन्ततोगत्वा
शूद्रक स्वभाव जन कर्म परिचर्चा थिकैक। सम्प्रति समाजमे स्वभाव विरुद्ध
धर्म वा मिश्रित धर्म प्रचलित अछि। ब्राह्मणक शुद्ध स्वभाव थिकैन्ह जे
क्षमासम्पन्न होथि मुदा अनेको ब्राह्मण सम्प्रति शूरवीर होइ छथि जेना
द्रोणाचार्य पूर्वमे भेल छलाह। ई कोनो तेहन दोष नहि थीक परञ्च क्षात्र
धर्मक निशान थीक। शूद्र ज केओ तपस्वी अछि त बुझक थीक जे ओ ब्राह्मणकर्म
पालन कै रहल अछि। ई तेहन भ्रष्ट युग अछि जे कतिपय ब्राह्मण अव्याहत
रूपसौं वैश्यकर्म ओ कतिपय वैश्य शूद्रकर्म कै रहल अछि। शास्त्रदृष्टया
चाण्डाल त प्रायः सभ वर्णमे देखब। भवभूति निर्मित उत्तर रामचरित
काव्यमे लिखित अछि जे महाराज रामचन्द्र कोनो शूद्र तपस्वीक बध हेतु
शत्रुघ्नकेँ पठौलन्हि। शत्रुघ्न अपना सहोदर भाइक आज्ञा पाबि जम्बूक
?
नाम शूद्र केँ मारि यमपुरी प्रेषित कैलन्हि। आब से काल नहि। आइ अनेको
शूद्र ब्राह्मणकेँ निःशंकोच धर्मोपदेश कै रहल अछि(जन्मना)
ब्राह्मण लोकनि घट्ट-घट्ट
उपदेश पीबि रहलाह अछि। अनेको
क्षत्रिय वैश्यक चाकरीकेँ गुजर कै रहलाह है। कारण
'आपत्काले
मर्यादा नास्ति’अथवा’विनाश
काले विपरीत बुद्धि:'।
अनेकानेक अनाचार आओर कुसंस्कार दृष्टगोचर भै रहल अछि। अपन-अपन
परम्परागत धर्म विसरि गेलय तेँ
ई दशा प्राप्त भेल छी। एखनो धरि जे सनातन धर्मपर वस्तुतः आरूढ़ अछि से
आनन्द अछि। विद्वान कर्मनिष्ठ ब्राह्मण प्रायः सबठाम सुखी छथि।
देशादेशान्तरमे पैर-पूजा
करा रहलाहै। पश्चिममे राजपूत लोकनि बहुसंख्यक अपना धर्मपर आरूढ़ छथि,
फलतः ओ अपना राज्यमे सुयश प्रजापालन कै रहलाहै। अनेको मारवाड़ी ओ
गुजराती बनियाँ वर्ग वाणिज्य वृत्तिसँ दिनानुदिन कोटिध्वज वा लक्षपति
भै रहल अछि। कलकत्ता वो बम्बइ मे बनियाँक शान देखबायोग्य अछि। सनातन
चालिपर दृढ़ रहने सबठाम विजय हैत। इहलोक परलोक दुनू बनत।
कतेक गोटाक भ्रान्तिपूर्ण मत अछि जे सनातन धर्म हमरा लोकनिक सर्वनाशक
जड़ि थीक। परञ्च ई सरासर गल्प थीक। कारण जे वशिष्ठ,
रामचन्द्र,
शुरथ वो हनुमान क्रमशः ब्राह्मण,
क्षत्रिय,
वैश्य वो शूद्रक पद्धति पालन कय प्रातःस्मरणीय भय गेलाहै। सीता,
सावित्री ओ पद्मिनी सनातन पातिबर्त्य कैं पालन कय भारतवर्षक
“एकै
धर्म एक व्रत नेमा,
काय वचन मन पति पद प्रेमा”मूलमंत्रकैं
सन्सार भरिमे उद्घोषित कैलनि अछि। किं वहुना अनेकानेक सनातनधर्मी
शास्त्रत,
राजनीतिज्ञ,
भक्ति,
शूरवीर,
चित्रकार ओ कारीगर भय अपन समाजक मंगल कैलनि अछि। इतिहास-पुराण
एकर साक्षी अछि।
धर्मोरक्षति रक्षितः। सनातनधर्मक रक्षा कोना करी
?
सनातनधर्म की थिक ई विषय अपना बालक ओ कन्याकेँ नेनहि सँ सिखाबी।
पाचमवर्ष सँ नेनालोकनिकेँ अपन मातृभाषामे उपदेश करी। काँच वांशके जाही
गरे नबैब ताही गरे नबत।
नहि पहिने त उपनयन संस्कार भेलापर बालककेँ सनातनी स्कूल वा पाठशाला मे
पढ़क हेतु बइसाबी। संध्योपासना प्रातःकाल ओ संध्याकालक अवश्ये करी ओ
हुनको सँ कराबी। लोअर-अपर
कक्षाक पोथीमे अपूर्व-अपूर्व
दोहा सभ छैक यथा-
"मीठी
बोली बोलिये,
मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करै,
आपहु शीतल होय।।
"
साँच बरोबर तप नहीँ,
झूठ बरोबर पाप
जाके हृदय साँच है वाके हृदय आप।।
दुखमे सुमिरन सब करे
,
सुखमे करे न कोय।
सुखमे जो सुमिरन करे,
दुख काहे को होय।।
"
बच्चा लोकनिकेँ एहि दोहा सभहक अर्थ बुझाबी और अपनहुँ अनुभव करी। केवल
पाठशालाक गुरूजी पर निर्भर भय अभिभावक लोकनिकेँ नहि चाही जे अपन बोझ
पटकि दी। पुत्रवत्सल पिताकेँ अपन कर्तव्य पालनमे कसरि नहि करक चाही।
सन्तानक दायित्व सभसँ बेसी माय-बापकें
छैक। जखन माय-
बाप अपना सन्तानकेँ उचित शिक्षा-दीक्षा
देथि तखने ओ संतानसँ सुखक अभिलाषा करथि। यावत धरि पुत्र
'“पितरि
प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवताः”वा
“नास्ति
मासमो गुरुः”उक्ति
सबहिक अर्थ नहि जानय योग्य हैताह तावत अपना माता-पिताकेँ
कोना संतुष्ट रखताह
?
स्कूलमे बालक-बालिका
लोकनि की पढ़इ छथि तकरा दिशि गुरुवत जिज्ञासा राखी। ब्राह्मण माय-बापकेँ
संकल्प क लेबक चाही जे सन्तानकेँ ता शास्त्रपारंगत बनौने दम नहि लेब।
क्षत्रिय ब्राह्मणहिक आदर्श केँ पालथि से नहि लिखइ अछि। तनिका चाही जे
राजनीति,शस्त्रास्त्र
ज्ञान इत्यादि अनेको क्षत्रियोचित विषय अपना सन्तानकेँ सिखाबी। वैश्य
अपना पुत्रकेँ वाणिज्य व्यवस्थामे चतुर बनाबथि से उत्तम,
कारण केवल वकील-मुख्तार
बना क अपना समाजक कल्याणसाधन करब मृगतृष्णा मात्र थिकन्हि। नीक होइत
यदि पृथक-पृथक
वर्णकेँ अपना कर्तव्य कर्म सिखबा हेतु
पृथक-पृथक
स्कूल होइत। शिक्षा विभागकेँ एहि दिशि ध्यान राखक चाही। वर्णाश्रमधर्म
सिखबा हेतु
,
साधन केर आवश्यकता अछि। म्युनिस्पैलिटी,
डिस्ट्रिक्ट बोर्ड,
कौंसिल तथा असेम्बली मे एकर आन्दोलन होमक चाही। परन्तु याधारि से
व्यवस्था नहि भेलै ताधरि जैह संस्थासभ बनल अछि ताही सँ काज ली। कारण
दिल्ली दूर अछि। वा एहिमे विवाद भै सकैछ।
सनातनधर्म रक्षार्थ एक टा बात और आवश्यक अछि। राजनीतिक जतेक संस्था अछि
यथा कॉउन्सिल,
असेम्बली सभठाम सनातनी सदस्य सनातनी जनता दिशसँ जाथि। अनेकानेक
ब्राह्मो,
आर्य्यसमाजी वा विप्लवकारी सभ एहि संस्था सभमे प्रधान भ बहशलै। सनातनी
टुकुर-टुकुर
तकिते रहि जाय छथि। सनातनधर्मक कर्णधार लोकनिकें सावधान होमक चाही।
अनेकानेक सनातनधर्म विरुद्ध बिल सब असेम्बलीमे पेश हो6इ
अछि तकरा विरोध करक हेतु सनातन धर्मी वक्ताकेँ जैव अनिवार्य अछि।
सनातनी जनताकेँ कदापि ने बिसरक थीक जे राजनीतिक सत्ता एखन सनातनी राजाक
हाथमे नहि अछि। ई बात स्वयंसिद्ध अछि। हमरा लोकनिक संकल्प होमक चाही-
श्रेयां स्वधर्मो विगुणः प्रधर्मातस्व नुष्ठितात।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।
यदि हमरालोकनि शास्त्रोक्त मार्गसँ विहित कर्म करी तखनहि सनातन धर्मक
रक्षा वा अपन रक्षा कय सकै छी अन्यथा भगवाने रक्षा करथि तखने रक्षा भय
सकै अछि। भाइ-भाइमे
प्रेम
(चन्द्र
चुनै वरु अनल कर,
सुधा होइ विष तूल।
सपनहुँ कबहुँ कि आचरहिं भरत राम प्रतिकूल।।)
बसपा-बेटा
मे प्रेम,
कि वहुना’बसुधैव
कुटुम्बकम
'‘सभसँ
प्रेम
...
ई सनातन
धर्महिक आदर्श थीक। अन्तमे चारू वर्णक धर्म निर्देश कय हम अपन
संक्षिप्त लेख समाप्त करइ छी।
अहिंसा सत्यमस्तेम शौचमिन्द्रिय निग्रहः।
एतं सामासिकम धर्मं चतुवर्णएय ब्रवीणमनु।।
लेखक:-
शोभानन्द झा बी.ए.,
भराम।
(वर्ष-02,अंक-11
नवम्बर1934ई.)
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