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लाल देव कामत

श्री मिथिला : एक पोथी समीक्षा


कविवर श्री राज किशोर मिश्रके नव मैथिली पोथी 'श्री मिथिला ' संक्षिप्त इतिहास काव्य थीक। श्री मिथिलामे कविताक पाँति एवं लयक क्रम गेयताभावक विपुलता, कल्पना सूक्ष्मता, माधुर्य रस , भाषा आ अभिव्यंजनाक सौन्दर्य अछि। श्री मिश्र जीके मैथिली भाषा मेँ २१ गोट पोथी पहिले सँ प्रकाशित छन्हि। राज किशोर जी हिन्दीमे सेहो एगारहटा पुस्तक लिख चुकल छथि। जाहिमे सँ खण्ड काव्य -ऊर्जा वर्णन एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स तथा वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स एवं हिन्दी'क प्रथम काव्य ऊर्जा बावत घोषित कयल गेल रहनि। संगहि सन् २०२० मे प्रदूषण खंड काव्य केँ इण्डिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स हिंदीक पहिल काव्य पोल्यूशन बावत घोषित कयल गेल रहनि। हिनक रचनात्मक कार्य बेसीतर कविता विधामे भेल छन्हि। सद्यप्रकाशित श्री मिथिला म कविवर मिश्रजी खूब मेहनत कयने छथि। एहि पोथिक सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैशिष्ट्य संक्षिप्त इतिहासिक परिपेक्ष्य लए अछि। पोथीक चर्चा सँ पूर्व हिनक पूर्ण परिचय जानबाक परियास करैत छी। मधुबनी जिलाक अरेड़ डीह गाममे टीचर्स ट्रेनिंग कालेजके प्राध्यापक श्री शशिभूषण मिश्र आ धर्मपरायण श्रीमती जीवेश्वरी देवीक घर २७ जनवरी १९६० ई० केँ एक होनहार बालकके जन्म भेल रहनि,जिनक नाम राजकिशोर पड़लनि। राज किशोर मिश्र जीक प्रारम्भिक शिक्षा अपने गामक सरकारी मिडिल स्कूलमे सातमाधरि भेल रहनि। ओ गामेक सरकारी हाईस्कूलमे अष्टम वर्खमे नामांकित भेलाह,आ वार्षिक परीक्षामे फस्ट डिविजन सँ पास केलाह। ७० केर दशकमे ऐ सफलता पर अपार हर्ष चहुँदिश सहपाठीमे पसरलैक,मुदा श्रीमिश्र जीक जेठभायजी कौशल किशोर मिश्र कहलकैन " अपना स्कूलमे प्रथम तँ बहुतो विद्यार्थी सब साल करैते रहल अछि,जौं बिहार वार्ड परीक्षामे प्रथम आबि तहन ने बड़का बात हैत।" ई बात मोनमे बैस गेलनि राज किशोर जीकेँ आ सोचय लगलाह एखनधरि तँ नेतरहाट सन -सन स्कूलक मेधावी विद्यार्थिगण केँ वन टू टेनमे स्थान भेटैत रहलैक हेन। जौँ हमहूँ खूब परिश्रम करब तँ लक्ष्यधरि पहुँच सकैत छी। ओहि समय बिहार आ झारखंड संयुक्त राज्य छल। मनोयोग पूर्वक पढ़य लेल बाबूजीक कठोर अनुशासन आ ममतामयी मायके ताकुत, शिर पर हाथ धयल छलनि। सन् १९७६ केर मैट्रिक बोर्ड परीक्षाक रिजल्ट घोषित भेलैक तँ १० म् स्थान पर हिनक नाम देख सबकेओ प्रशन्न होइत गेलाह। श्री मिश्र जीकेँ अपनों मेहनत पर संतुष्टि आ गर्व भेल रहनि। हुनक बाबा स्व० कलाधर मिश्र मूलतः कृषक आ पहलवान छलाह, ओ जिलाके पैग क्षेत्र बुझैत सगतर लोक सभकेँ कहथिन " हमर पौत्र जिला फर्स्ट केलक हय!" हुनक बाबूजी प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी रहथिन,अपन चारू पुत्रकेँ अनुशासन पूर्वक पढ़ेबाक लेल आतुर रहैत छलथिन। ओहि सालके बोर्डमे सर्वोच्च अंक पौनिहार छात्र सब पटना साइंस कालेजमे पढथि। हुनक बाबूजी सेहो ओतयहि हिनक नामांकन करा देने रहथिन। मुदा गाम सँ बाहर कतौह नहिं गेल रहथि कहियो से अनभुआर लागनि। दुर्गा पूजा छुट्टीमे जहन गाम अयलाह तँ दरभंगेमे पढबाक अपन मंशा परिवारमे उजागर करितहिं बबाबूजी बुझबैत तर्क देलथिन " ककरो ओहिठाम एडमिशन नहिं होय छैक, आ तों एहन विचार रखैत छह!" पिताजी केँ तमसाइत देखि मोन मारिकेँ पटना होस्टलमे रहि अन्तर स्नातक (विज्ञान) विषय मनोयोग पूर्वक पढ़य लगलाह। प्रथमे वर्षमे आई आई टी प्रतियोगिता प्रवेश परीक्षा पास कयलाह। प्रशन्नता पूर्वक बाबूजी बाहर रहैक खर्च दैत रहलनि। बाबूजीक कठोर अनुशासन वरदान साबित भेलनि। हुनक आई आई टी .- बी एच यू . वाराणसीमे आह्लादित भऽ अभिभावक नाऊ लिखा देलकनि। जेठ भायके सेहो एडमिशन मोतीलाल इंजिनियरींग कालेज इलाहाबादमे भेलनि। तेसर भाय आनन्द किशोर मिश्र बी आई टी . सिन्द्री सँ इंजिनियरिंग केर पढाए केलाह। छोट भाय डॉ० पवन किशोर मिश्र डीएमसीएच. सँ मेडिकलके पढ़ायमे लागलनि। माय- बाबू चारु बालकके व्यवस्थित पढ़ाय सँ अति आनन्दित रहथि। ताहि समय गामक मेधावी छात्रकेँ ग्रामीण गौरव बूझथि,नीक वातावरण सामाजिक परिवेशमे रहैक। श्री मिश्र जीक मातृक कोंकण , पुपरी(सितामढी) आ सासुर मनपौर (बेनीपट्टी) छैन्ह।आदरणीय श्री रविन्द्र नारायण मिश्र जी हुनक काका छथिन,जे वरेण्य साहित्यकार आ प्रख्यात उपन्यासकार छथि । हुनका सं सदैत विज्ञान विषय केर त्रुटि सुधारमे मदैत भेटैत रहनि। मार्गदर्शनक प्रयोजन भेलापर गलति सुधारि दैत रहलन्हि।
बी. टेक. कयलावाद यूपीएससी. द्वारा आयोजित भारतीय इंजीनियरिंग सेवा १९८२ के प्रतियोगिता परीक्षामे उत्तीर्ण भऽ दूर संचार विभागमे सहायक कार्यपालक अभियंता (विद्युत) क्लास १ पद पर योगदान देलनि। विभागीय पत्रिकामे राजकिशोर जी मैथिली मातृभाषामे अपन कविता छपौलनि। छात्र जीवने सँ लेखनके प्रति अभिरुचि रखने रहथि। से सेवा निवृत्त भेलासन्ता बहुत रास मैथिली कविता'क पोथी प्रकाशित करौलनि। यथा -: टेमी,जँ जग जल नहिं होईत,सभ्यताक भ्रम, अष्टदल, मंथन , उगरास ,नै रहतै आब गाम , प्रलय पाश ,कनक कदली, ऊर्जस्विता, आचार्य चाणक्य पर हम पाठकीय प्रतिक्रिया द' चुकल छी,जे विभिन्न पत्र-पत्रिकामे समय- समय पर प्रमुखता'क सँग छपल रहय। हिनक कविता संग्रह मेघ पुष्प,चाननि, नव पात - नव बात, उपायन, सप्तपर्ण,नव घर उठय - पुरान घर खसय, जिनगीक सोन सन पाँखि, उबेर, ई संसार ओ सप्त रश्मि प्रकाशित कृति छन्हि।
श्री मिथिला इतिहासिक संक्षिप्त काव्य नवारम्भ प्रकाशन सँ २०२५ मे छपलनि, जाहिक दाम ३०० टाका छैक। ओहि पोथीमे १३६ पृष्ठ छै,जे समर्पण अपन स्व० पिताजी केँ केने छथि। ऐ मैथिली पोथी'क आई एस बीएन ९७८-९३-४९८६७-०३-१ अछि। ऐ पोथीके सुन्दर सन् प्रिन्ट - आर के आफसेट प्रोसेस नवीन शाहदरा, दिल्ली सँ भेल अछि। एहि पोथिमे मिथिलाक विविध आयामकेँ संक्षिप्त, समेकित ओ समग्रता सँ पद्य विधामे प्रस्तुत करैत रचनाकार श्री मिश्रजी भुमिकामे सम्माननीय पाठक लोकनिकेँ चाउ सँ पढ़बाक आश रखने छथि। पौराणिक परिवेशमे कथावृत्तक अवंतारण भेलहुँ जाहि रसबत्ता ओ स्वाभाविकताक संग भारत भूमिक मानचित्रक मध्य वर्णन घटनाक्रमके भेल अछि से खूब नीक छैक। कविजी प्राचीन काल केर नऊ अध्यायमे वृतांत देने छथि,यथा- विदेह, गार्गी - याज्ञवल्क्य सम्वाद, मैत्रेई - याज्ञवल्क्य सम्वाद, अष्टावक्र, अष्टावक्र जनक -सम्वाद, वैदेही, दर्शन समाज संस्कृति ओ अर्थतंत्र, वज्जिमहाजनपद मौर्य वंश गुप्तकाल, पाल वंश, गुर्जर -प्रतिहार चन्देल, आओर मंडन शंकराचार्य -शास्त्रार्थ । प्राचीन काल जे ३०००ई.पू. सँ ६०० ई- पू० धरि विदेह राजक कार्यकाल रहल होयत। ओहू समयमे पर्यावरण सँ आच्छादित गाछ जीवनदायिनी रहय। पाँ दैत कवि कहैत छथि-:
बाँस , लवंग, पीपर - पाकड़ि ,
कदम , अशोक , नीम, बेल, साल,
केदली- बदरी, गमकैत महुआ,
सघन बोन छल अति विकराल।
मिथिला ताहू समयमे अध्यात्मवादके राजधानी छल ,जनक कूलमे सीरध्वज ब्रह्मज्ञानी रहथि। चेतना सँ भरल लोक सब सबहक हितैषिये रहथि - तपश्चर्यामे लीन मुनिगन
राजा ब्रह्मज्ञानी
शास्त्र पुराणक ज्ञान रखैत छल
मिथिला केँ हर प्राणी।
इक्ष्वाकु वंशक निमिक पुत्र मिथि राज्य स्थापित कयने छलाह। आर्यावर्त देशमे मिथिला लालित्य सँ भरल - पड़ल सभ्यता ओ संस्कृति से पूर्ण रहय। धन - धान्य सँ भरल मिथिला'क महिमा मण्डन पर पाठककेँ नीक जनतब पौराणिक कालमे होइछ :-
विदेह भेल निमि काननम्
यज्ञक्षेत्र , नित्य मंगला,
वैजयंती, विकल्पषा ,
स्वर्ण लागल,से मिथिला ।
मध्य काल केँ सात अध्यायमे बाँटने छथि,यथा -: कणार्ट -वंश, ओइनवार -वंश, विद्यापति, लोकगाथा, खण्डवला - वंश, मध्यकालमे लोकजीवन, आ मैथिली भाषाक मध्य - कालधरिक संक्षिप्त इतिहास। आधुनिक कालके चर्चा धरि ऐ पोथीमे करय सँ अपनाकेँ नहिं रोकि सकलाह। पोथी पठनीय छन्हि,काव्य बढ़ सौष्ठव भेल छैक। एक पाँति देखू -:
पँच हैन्दव हर्ष वन्धन अधिन
मिथिला सेहो लेलनि ओ छीन।
एकटा दोसर पाँति द्रष्टव्य -:
एहिना चलैत रहलै किछु दिन,
तँ अयला बंगाल गोपाल,
पाल वंशकेँ संस्थापक सँ
शासनक बदलि गेल सुर-ताल।
गोपाल'क वाद हुनक पुत्र धर्मपाल विशाल साम्राज्य बनेबामे सक्षम भेला। ओ कन्नौज,भोज, कुरु , मत्स्य धरि जीत लेने रहथि। पालवंशक लगधक साढ़े तीन सय वरखक शासनमे विग्रहपाल खूब प्रखर व्यक्तित्व भेलाह। आगू बढ़ि कविजी पाँति गढ़लनि -:
तत्पश्चात आयल चन्देल,
अत्यल्प अवधि वाद चलि गेल।
बुकानन हेमिल्टन अपन पूर्णियाँ वृतांत (१८०८- १८१० ई०) मे लिखने छथि " ८ म् सँ ११ हम् शताब्दी धरि पालवंशक पाशवंशी राजा प्रवल शक्तिक रूपमे उभरल छलाह। दरशन १० म् शताब्दीमे बंगालके महिपाल (द्वितीय) नामक पालवंशी राजा सँ लोहा लेनहार मिथिला केवट परिवारके सपूत ऐतिहासिक जननायक भीम कैवर्त छलाह। १०५१ ई० मे भीमा केवटके नि:संतान काका सामंत दिव्योक स्थानीय केवट ,धानुक ,पौण्डरीक, राजवंशी, कोच नागर आ दूसाध जातीक लड़ाकू सेना रखने रहथि आ पुण्ड्रीक भु औरक्ति प्रदेश केर सामीप्य राजा सबकेँ समर्थन लैत पालवंशक शासक पर चढ़ाए कय महिपाल केँ पराजित करैत खतम कय देलकै। " आक्रोशित जनता राज मुकुट दैत शान्तिप्रद रहय लागल। भीम कैवर्त तामके भुरही पाई- छेदाम चलौलनि। ओ देवघर वैद्यनाथ धाम मंडिलके जिर्णोद्धार कयल। जेठ भाय द्वारा जहल देल गेल सूरपाल आ रामपाल केँ बंदी मुक्त कयल जे दक्षिण गंगाकात दिश चलि गेल। सन् १०७७ मे पुनः भीम कैवर्त पर ओयह दूनू भाय द्वारा चढ़ाई आ संघर्षमे मारल गेला। विराट राजाके सीमा लगीच भोरियारीगढ़़ ,अररीया जिलाक गाम- म कैवर्त दिव्योक राजाके जन्मभूमि रहनि। एतेक पैघ घटनाक्रम लेल कविजी दू पांति सिरैज नै सकला आ आगू बढ़ि मिथिला लेल उपेक्षित अध्याय राखि देलनि।
अतिशय असुरक्षित रहल ई काल खंड,
भयाक्रांत जन-गण भोगथि अराज दण्ड।
आर्ष काव्य रामायणमे १२ वरखक लेल रामकेँ वनवास आ अस्ति काव्य महाभारतमे १२ वर्षक वनबास व एक शालके अज्ञात वास पाण्डवकेँ देल गेलक चर्चा छैक। तहिना विद्यापतिक मित्र आ मिथिलाक राजा अज्ञात वास पर राताराति बनौली (सप्तरी)नेपाल पराए गेला। हुनक गजरथपुर केँ यवन विदेशी सेना तहस-नहस कय देलकनि। राजा शिव सिंहके अलोपित भेलाक १२ साल वाद प्रेत घोषित कयल गेलैन। रानी लखिमा हुनक वियोगमे रहय लगलीह। पटनाक सूबेदार बैजलदेव एक प्रस्ताव दिल्ली पठाय रानी लखिमा केँ राजपाट चलेबाक माँग राखलक। रानी नेपाल सँ अपन दिवोर पद्म सिंह आ आप्त सचिव विद्यापति जीके माध्यम सँ राज करैत गुजैर गेलीह। हुनक देवरक दूई साल राज्य शासन चलेलाक वाद निधन भेलापर हुनक पत्नी रानी विश्वास देवी कतेको शालधरि राज्य केलीह। से बात पाँतिमे विस्तार नै पौलक। कविजी अपन रचनामे विद्यापति जीक मैथिली,अवहट, संस्कृत आ प्राकृत भाषा मेँ प्रकाशित पोथीके चर्च अवश्य कयलनि अछि।
मिथिलाकेँ हर घर - आंगनमे,
विद्यापतिक गीत, नचारी
हुनकहि रचित मनोहर सोहर,
शुभ अवसर पर गाबय नारी।
मध्यकाल १३ म् अध्याय 'लोकगाथा ' पृष्ठ सं० ९८-१०५ बढ़ मनलगू बुझायत। ई मिथिलांचल केर लोक देवता १०८ आ लवहर- कुशहर लोक गाथा रामायण सँ जुड़ल य। मैथिली भाषा असलमे पिछड़ल ,दलित तबकाके कंठक वाणी रहय आ एखनो धरि अछि। ओ लोकनि अपन लोक देवताक अभ्यर्थना गेयरूपेँ कयने छथि। लव-कुश मात्रे एकटा लोकगाथा वनवासीक बीच खूब लोकप्रिय भेलैक। मूलनिवासी अपन नायक आ देवताक गहवर गोहारि,भाव - भगैत , महराय आ गाथा गबैत आबि रहल अछि। तहिना अभिजात वर्गमे लव-कुश गाथा सराहल गेल छैक। से चलैन भारत - नेपाल देशके मैथिली भाषा - भाषी बीच पिढि दर पिढि गौरवपूर्ण स्मिताके संरक्षण करैत संतुष्टि म छैक।
गाथा - गायक प्रारंभमे
गबैत छथि ' सुमिरन, बन्हन',
तत्पश्चात,शुरूह होइत अछि
कथाक मनन - विवेचन।
महेश ठाकुर जीक पाठशालमे आन शिष्यक संगहि रघुनंदन सेहो पढैत बढ मेधावी भेल। ओकरा गुरूजी बढ़ मानैत रहथिन। से आवेशमे पत्ति सँ बजलखिन " एतेक जे सिनेह दैत छियै रघुननमाकेँ से की ई अपन पहिल कमाय अहींके देते!" ऐ बातक गीरह चटिया रघुके मोनमे गहिंरपन सँ जमल रहल। जँ समय एलैक तँ मुग़ल दरवारमे विद्वता पर दरभंगा राज देल गेलैक।ओ अपन गुरूवाईन केर समक्ष परबाना कागत सुमझाबैत गुरूवर महेश ठाकुर जीकेँ अपन पहिल अरजल सम्पदा समर्पित कयल। जहन कि श्री ठाकुर जीकेँ झीझक होईन आ गुरूमाता तँ ऐ महात्यागीके मुंह दिश तकैत चकित रहि गेलीह। दान केर धरती पर सन् १५२६ सँ १९४७ ई० धरि हुनक पुत्र गोपाल ठाकुर, तकर उतराधिकारी पुत्र टोडरमल ऐ वंशक महिनाथ ठाकुर आ तकर पुत्र लोचन आ तकरावाद माधव सिंह १७५७ मे अंग्रेजी हुकूमतमे मिथिला राज्य भ' गेल दरिभंगा राज जमिन्दार १८७८ सँ रामेश्वर सिंहके वाद हुनक पुत्र लक्ष्मीश्वर सिंह आ तकर वाद हुनक पौत्र कामेश्वर सिंह बहादुर महराजाधिराज राज चलेला। कवि जीक पांति-:
नहिं राजा , नहिं रहल सामंत ,
आब राजतंत्रक भेल अन्त ।
आधुनिक काल सन् १९४७ में सुराज उपरांत सँ अद्यतन मानल जाईछ। प्रो० रविन्द्र कुमार चौधरी ९०० लगधक मैथिली रचनाकाके डायरेक्टरी गत वर्ष प्रकाशित करौलाह अछि,जाहिमे ५०% गैर सवर्ण लेखक छथि। ओ अपन अहर्निश सेवा सँ मैथिली लेल अभिमानी कोनू ने कोनू रुपमे बनल छथि। मैथिली आरंभ कालमे अभिजात वर्गक बोली -वाणी नहिं रहैक। ओ सभ संस्कृत, प्राकृत आ अवहट केँ मान्य केने रहथि। आई मैथिली सँ सुविधा वंचित समाज पछुआ रहल छैक। एखनो ठेंठी मैथिली रूपेँ ऐ भाषाकेँ जीयाके रखने अछि। मैथिली साहित्य - सृजनमे
ओना लागल कतेको साहित्यकार ,
अपना भरि सभ भरि रहल छथि
अपन मातृभाषक भँडार ।
'श्री मिथिला' पोथी मैथिली भाषा मेँ अद्भुत साहित्य सृजन कयलनि श्री राज किशोर मिश्र जी ,ताहिक टटका प्रकाशित पोथी पढबाक सौभाग्य भेटल हेन। पाठक लोकनिकेँ सुझाव य, ऐ पोथीकेँ मनोयोग पूर्वक पढ़ि स्वयं कृर्तार्थ होय।

- लाल देव कामत , नौआबाखर (मधुबनी)

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