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देवशंकर नवीन (संपर्क-9868110994)

उठ जाग मोसाफिर भोर भयो (निसभेर नीनमे सूतल समाज पहरू कथाकार)

शिवशंकर श्रीनिवासक समस्त कथाक अवगाहन जँ मिथिलाक अर्द्धांशो नागरिक केने रहतथि, आइ धरि मिथिलासँ श्रम प्रतिभाक पलायन बन्द गेल रहितए। समस्त मैथिल समाज स्वार्थपरतासँ बहरा कए सामुदायिक हितमे लीन गेल रहितथि।कृषि-कर्म पशुपालन-वृत्ति सन सामुदायिक उद्यमकें मैथिल-जन, सम्मानित दृष्टिएँ देखए लागल रहितथि। भविष्यक प्रति निराशा नकारात्मकता मैथिल नौजवान चिन्तनसँ मेटा गेल रहितए। उन्नत आत्म-बल स्वामी नौजवानसँ भरल मिथिला सरिपहुँ शस्य-श्यामला बनि लहलहाइत रहितए। मातृभाषा मैथिली तथा मिथिलाक संस्कृतिक नाम पर मैथिल लोकनि जतए-ततए उटपटांग आचरण नइँ करितथि।...मुदा से नइँ भेल, नइँ होइए। मैथिल लोकनिकें मातृभाषाक प्रति तेहनो कोनो अनुराग नइँ छनि, जै लेल मैथिल भाषाक साहित्य पढ़थि। हुनकर अध्यवसायक सूचीमे मातृभाषाक साहित्य नइँ अछि। मातृभाषाक माध्यमे मैथिल लोकनि आइयो धरि अपन पहिचान सुनिश्चित नइँ सकलाह अछि।

विदित अछि जे बिहारक[1] अड़तीस गोट जिलामेसँ उत्तरी भागक उनैस[2] गोट जिलाक आबादी[3] मैथिलीभाषीक क्षेत्र थिक। किछु भूगोलशास्त्री पश्चिमी चम्पारण (बेतिया)कें सेहो मैथिलीभाषी क्षेत्र मानै छथि। तदनुसार बेतियाक[4] जनसंख्या जोड़ला पर मैथिलीभाषीक संख्या-बल[5] पाँच करोड़सँ बेसी होइत अछि। दुनिया भरिक 223 देशमेसँ 104 देशक संख्या-बल अइसँ कम अछि।        

भारतक छत्तीस गोट राज्य केन्द्र शासित राज्यमेसँ मात्र दसे टा राज्यक जनसंख्या मैथिलीभाषीक संख्या-बलसँ बेसी अछि। एन.सी.आर. दिल्लीक संख्याक तीन गुणासँ बेसी। तथापि मैथिलीक पचासो टा स्तरीय पोथीक अवगाहन मैथिल-जन अनुरागसँ नइँ करै छथि। बात हुनकर भाषा-बोध परांग्मुखताक द्योतक थिक। किनकहु उलहन मान्य नइँ हएत जे मैथिलीक पोथीमे हुनका सुख नइँ भेटै छनि, जे आन भाषामे भेटै छनि। कारण मैथिलीक जमापूजी गोट चर्चित प्रकाशक द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित लगभग दू-अढ़ाइ सए पोथीमेसँ पचासक लगाइत पोथी एहेन अवश्य होइत अछि, जकरा पढ़लासँ निकेनाँ पाठकक चित्त-विरेचन सकैत अछि।

आनहु भाषा-साहित्यक सम्मान अवश्य हएबाक चाही; मुदा से मातृभाषाक गरिमा-बोधक संगहि। भाषा, केवल सम्प्रेषणक साधने टा नइँ होइत अछि। , मनुष्यक राष्ट्रीयताक पहिचान मनुष्यक सोच-विचार आधार सेहो होइत अछि। मनुष्य जे किछु सोचैत अछि, कोनो ने कोनो भाषामे सोचैत अछि। अइ सोच-विचार काज जै भाषामे करैत अछि, सएह ओकर प्रथम भाषा होइत अछि।

विदित अछि जे भारतक समग्र राष्ट्रीयता कोनो एसगरुआ राष्ट्रीयता नइँ थिक; प्रान्तीय स्तरक भिन्न-भिन्न भाषिक-सांस्कृतिक राष्ट्रीयताक समन्वयनसँ समृद्ध भेल अछि। भौगोलिक भिन्नता विस्तारक कारणें एतए भिन्नता अवश्यम्भाविए छल; मुदा अनेकताक अछैत एकताक विलक्षण राष्ट्रीय पहचान अइ देशक विशेषता थिक। अइ देशमे 1652 मातृभाषाक प्रचलन अछि, मुदा भारतीय संविधान द्वारा एखन धरि मात्र बाइसे टा भाषाकें राजभाषाक मान्यता देल गेल अछि। मैथिली ओही बाइस भाषामेसँ एक थिक। मैथिलीकें राजभाषाक मान्यता तँ भेटलै सन् 2003हिमे, मुदा आइयो धरि मैथिल-जन अपन मातृभाषाक महत्त्व बूझि नइँ सकलाह अछि। हुनका लोकनि लेल भाषा एखनहुँ उपयोगी साधन थिक। किछु उद्योगी लोकनि लेल तँ आत्म-स्थापन, राजनीतिक हितसाधन धनार्जनक उपस्कर थिक। मिथिलांचलक बजार-व्यवस्थाक भाषा तँ मैथिली नहिएँ अछि, साधन-सम्पन्न अधिकांश मैथिल परिवारक पारिवारिक भाषा सेहो आब मैथिली नइँ रहि गेल अछि।

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (सन् 1851-1941)[6] बिहारक तीन टा भाषाई राष्ट्रीयता--मैथिली, मगही भोजपुरी मानलनि। जाहिमे भोजपुरीभाषीकें उद्यमी, मुदा मैथिलीभाषीकें डरपोक एवं गृह-व्यसनी मानलनि। भोजपुरीभाषी सरिपहुँ स्वभावसँ उद्यमी होइ छथि। धनार्जन लेल परदेश की, विदेश (मॉरीशस आदि) धरि जाइत रहलाह अछि; मुदा मैथिल-जन अपन निवास छोड़ि कहिओ मोरंग, वाराहक्षेत्र, ढाका, कलकत्ता, कामरूप-कामख्यासँ आगू भरिसके टसकलाह। अइ समस्त परदेशी वातावरणमे मैथिल लोकनिकें कहिओ भाषा सम्बन्धी असुविधा नहिएँ जकाँ भेलनि। अइ ठाम भाषा-विधानमे हुनका लोकनिकें कोनो ने कोनो रूपें मैथिलीक ध्वनिबोध होइत रहलनि। मातृभाषाक निकटतर भाषाभाषी क्षेत्रमे रहिकए हिनका लोकनिकें कहिओ मातृभाषा सम्बन्धी असुविधा नइँ भेलनि। परिणामस्वरूप मातृभाषाक महत्त्व लेल चिन्तित नइँ हएबहिनका लोकनिक सहजे आचरण छल।

शिवशंकर श्रीनिवास एहने उदासीन लोक मातृभाषाक विशिष्ट कथाकार छथि। हिनकर गनती मैथिली साहित्यक ओहेन गनल-गूथल कथाकारमे होइ छनि, जे सदैव निष्कलुष नागरिककें आधुनिकताक बिहाड़िमे उधिअएबाक जोखिमसँ सावधान करैत रहलाह अछि। सातत्यमूलक गुणकारी परम्परासँ विमुख हएबाक अनिष्टकारी परिणामक चेतौनी दैत रहलाह अछि। सामुदायिक चेतनाकें उन्नत करैत, जन-जनमे मनुष्यताक गुणसूत्र तकबा लेल प्रवृत्त रहलाह अछि। साहित्य-सृजनकें कहियो आत्म-स्थापन अथवा आत्म-प्रचारक माध्यम नइँ बनौलनि। मैथिलीक सुबुद्ध पाठककें एहेन खिसक्कड़ कथाकारक सहयात्री हएबाक गुमान छनि।...

कथा बहुत गोटए लिखै, मुदा खिसक्कड़ नइँ होइए। शिवशंकर श्रीनिवास खिसक्कड़ छथि। दर्शन-शास्त्रो प्रसंग खिस्सा जकाँ सुना देताह अथवा लिख देताह।...हुनकर कथा-कौशल सदैव वाचिक आचरणसँ निर्देशित रहैत छनि। तें प्रायः घटनाविहीन प्रसंगहु पर लिखल हुनकर कथा मनोरम उद्बोधक होइत छनि। उदाहरणक खगता हो, हुनकर अनेक कथामे सँअपन बुत्ता’, ‘पिजराक सुग्गा’, ‘चिन्ता सन-सन किछु कथा पर नजरि देल जा सकैत अछि। भारतीय समाजमे खिस्सा ओहुना वाचिक परम्पराक वस्तु शुरुअहिसँ रहल अछि। मिथिलांचलमे तँ विशेष रूपें!

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शिवशंकर श्रीनिवास, बीसम शताब्दीक आठम दशकमे ठाढ़ भेल मैथिली कथाकारक झमटगर पीढ़ीक विशिष्ट रचनाकार छथि। अइ पीढ़ी सोझाँ दायित्वक विकराल ढेरी लागल छल। समकालीन सामुदायिक जीवनक क्रूर यथार्थ राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पराभवसँ परांग्मुख मैथिली साहित्यक जबदाह रचावकें किरण-यात्री ललित-राजकमल-मायानन्द पीढ़ी जतबा गतिशील बनौलनि; गुंजन-प्रभास-जीवकान्तक पीढ़ी तकर त्वराकें आओर पुष्ट केलनि। आठम दशक कथाकारक सोझाँ एक दिश अइ पूर्ववर्ती ध्वजवाहक ऊँच कृतिकर्मकें आओर ऊँच करबाक कर्तव्यबोध छलनि; दोसर दिश समकाल चुनौतीसँ जनसामान्यकें चेतौनी देबाक दायित्वबोध; तेसर दिश परवर्ती पीढ़ी लेल बाट फरीछ करबाक दायित्व ठाढ़ करबाक ऋणबोध। अइ लेल देश-दुनियाक साहित्यिक-सांस्कृतिक हवा-पानि, आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक हलचल समकालीनताक बोध अनिवार्य छल; तें अइ पीढ़ीक अधिकांश कथाकार अपन क्षेत्रीय अस्मिता भाषिक अनुराग संग-संग देश-दुनियाँक गति-अधोगतिक प्रति खूबे सजग रहै छलाह।

पीढ़ी अध्यवसाय चिन्तन-मनन द्वारा विभाजनक त्रासदी (सन् 1947), भारत-चीन राजनयिक सम्बन्ध (सन् 1950), पारस्परिक सम्प्रभुसत्ता प्रादेशिक अखण्डताक सम्मानार्थ चीन-भारत सम्बन्ध (सन् 1954), भारत पर धोखेबाज चीनक आक्रमण (सन् 1962), जवाहरलाल नेहरूक मोहभंग मृत्यु (सन् 1964), भारत-पाकिस्तान सीमा-संघर्ष (सन् 1965), लाल बहादुर शास्त्रीक रहस्यमय निधन (सन् 1966), भारत-पाकिस्तानक ताशकन्द समझौता (सन् 1966), थोड़बे दिन बाद पुनः भारत-पाकिस्तान युद्ध (सन् 1971), अकालमे दाना-दानाकें तरसैत लोक (सन् 1957, 1966), नक्सलबाड़ी आन्दोलन (सन् 1967) मर्म-भेद जानि चुकल छल। आपातकाल (सन् 1974), चुनाव-पर्वमे निरंकुश काँग्रेसी सत्ताक पराभव (सन् 1977), मध्यावधि चुनाव (सन् 1980); राजनीतिक अपराधीकरण अपराधक राजनीतिकरण, इन्दिरा गाँधीक हत्या (सन् 1984); बेहिसाब बाढ़िक प्रकोपसँ मजदूर-किसान दुर्दशा; अफसरी क्रूरता अकर्मण्यता; लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलमक आत्मघाती हमलावर द्वारा चुनाव अभियानमे श्रीपेरम्बदूर (तमिलनाडु)मे राजीव गाँधीक हत्या (सन् 1991); ओही बर्ख घनघोर आर्थिक संकटसँ जूझैत भारत देशकें उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण (एल.पी.जी) नीति द्वारा उबारबाक प्रयासमे प्रमुख सुधारवादी अर्थशास्त्री वित्त-मन्त्राी मनमोहन सिंहक सुबुद्ध उद्यम; बाबरी-मस्जिदक ध्वंस (सन् 1992), दीर्घकाल धरि सामाजिक-राजनीतिक विवाद राजनीतिक रैलीक हिंसक आचरण; भारत-पाकिस्तान शिमला समझौता (सन् 1972) अछैत कारगिल युद्ध (सन् 1999); सुविधापरक राजनीतिक अभिक्रिया दिश साहित्यिक सामन्तक लोलुपता, छोटभैया चमचा लोकनिक चालबाजी...अइ समस्त स्थितिकें पीढ़ी रसँ देखैत-भोगैत आबि रहल छल। पूर्ववर्ती पीढ़ीक त्वराकें देखैत पीढ़ी स्वयं अपन दायित्व अइ सगरो दिशामे बढ़ा नेने छल। कारण, पर्याप्त सजगताक अछैत, पूर्ववर्ती पीढ़ीसँ किछु-किछु बिन्दु छूटि गेल छल। पूर्ववर्ती पीढ़ी अपन भाषिक गौरव साहित्यिक विरासतकें अप्पन पूर्ववर्तीक जड़तासँ मुक्त करेबामे ततेक ने संघर्ष केलनि, जे किछु बिन्दुक छूटि जाएब सहजे छल।

आठम दशक शुरुआतहिसँ विश्वविद्यालयीय शिक्षाक अध्यापकीय मानस अपन अज्ञान-दुर्गकें बन्द चुकल छल; मिथिलाक युवा अध्येता कोनो तरहें मातृभाषा मैथिली-साहित्यमे अपन भविष्य नइँ ताकि पाबि रहल छल। से तकबाक दृष्टि अध्यापक लोकनि तूरमे नइँ भरि पबै छलखिन। कृषि-कर्मक निस्सहाय स्थिति रोजगारविहीन अराजक शैक्षिक वातावरणसँ ग्रामीण श्रमिक शिक्षित नौजवानमे निरर्थकताबोध भरि गेल छल। फलस्वरूप शहरोन्मुख पलायन बेहिसाब बढ़ि गेल। एकरा संगहि अनेक अनुषंगी विकृति समाजमे पसरए लागल। श्रम-मूल्य, सम्बन्ध-मूल्य, नीति-मूल्यक पराभव एना होअए लागल जे आर्थिकताक अलावा किछु निर्मूल्य गेल। संवेदनाहीन समाजक संस्कृति भकरार गेल। मूल्यविहीन बजारक वातावरणसँ समाज-व्यवहार चल लागल। एहेन दारुण स्थितिक चित्र अपन रचनामे निरूपित करैत, समाजकें चेतन परवर्ती पीढ़ीकें दिशा-संकेत देबाक दायित्व सेहो अइ पीढ़ीक कान्ह पर बैसल रहल। शिवशंकर श्रीनिवास अही पीढ़ीक सम्मानित, व्यवस्थित, नैष्ठिक, प्रतिबद्ध जिम्मेदार रचनाकार छथि।

मैथिली कथा-सृजनमे हुनकर सबल पदार्पण अही पीढ़ीमे भेल। आइ मैथिली कथाकारक अइ झमटगर पीढ़ीमे हुनकर नाम आदरसँ लेल जाइत अछि, तकर कारण हुनकर एकनिष्ठ प्रतिबद्ध सृजन-दृष्टिए थिक, जे अपन लेखन आचरण--दुन्नूमे विज्ञान-प्रौद्योगिकी आधुनिकताक सम्मान केलनि, मुदा आधुनिकताक प्रति अमंगलकारी सम्मोहनक कहियो सराहना नइँ केलनि। मंगलमय मनुष्यता लेल उपादेय परम्पराक प्रशंसा केलनि, मुदा रूढ़िग्रस्त परम्पराक तिरस्कार अपन कर्तव्य बुझलनि।

हुनकर लेखनारम्भ भेलनि सन् 1966 लगाति, मुदा हुनकर पहिल प्रकाशित कथा थिकइजोत’, जे सन् 1973मेमैथिली दर्शन पत्रिकामे प्रकाशित भेल। एखन धरि हुनकर लिखल कथाक संख्या लगभग एक सय अछि, जाहिमे कतोक कथा अद्यावधि असंकलित अप्रकाशितो अछि।

त्रिकोण शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 1986) एकटा सहयोगी संकलनमे हुनकर पाँच गोट कथा प्रकाशित भेल। अइ संकलनक त्रयी कथाकार छथि--अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास शैलेन्द्र आनन्द। उर्वशी प्रकाशन, पटनासँ प्रकाशित अइ तीनू कथाकारक पाँच-पाँच गोट कथाक संकलनत्रिकोणकें पाठक समुदायक पर्याप्त सम्मान भेटलैक। अइ संकलनक बादअदहन शीर्षकसँ भाखा प्रकाशन, पटनासँ हुनकर पन्द्रह गोट मैथिली कथाक संकलन प्रकाशित (सन् 1991) भेल। सुशील स्मृति प्रकाशन, लोहनासँ हुनकर सतरह गोट कथाक संकलनगामक लोक शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 2005) भेल। हुनकर तेरह गोट कथाक संकलन नवारम्भ प्रकाशन, पटनासँगुण-कथा शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 2014) भेल। नवारम्भ प्रकाशन, पटना/मधुबनीसँ हुनकर सोलह गोट कथाक संकलनमाटि शीर्षकसँ प्रकाशित (सन् 2021) भेल। एकर अलावा हुनकर आलोचनात्मक निबन्धक संग्रहबदलैत स्वर’ (सन् 2008), आलोचनात्मक पोथीमैथिली उपन्यासक आलोचना’ (सन 2021), आलोचनात्मक निबन्धक संग्रहविश्लेषण’ (सन् 2022) सेहो प्रकाशित भेल।

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सन् 1973मे जखन शिवशंकर श्रीनिवास अपन कथा-लेखन शुरुह केलनि, ओहि समय धरि भारतीय स्वाधीनताक रजत जयन्ती मनाओल जा चुकल छल। छब्बीस वर्षीय स्वाधीन भारतक परिवेशमे जीवन-यापन करैत जनसमुदायकें एहेन किछुओ टा नइँ देखा रहल छलनि, जै लेल अपन स्वाधीनता पर गर्व करितथि। लोकतन्त्राी सरकारसँ शासित देश सामन्ती समाज-व्यवस्थाक चाँगुरमे कछमछाइत जनसामान्यकें जेहन स्वाधीनता देखाइ छलै, तेहेन कोनो अर्थ ओहि काल धरिक कोनहु कोशमे नइँ भेटै छलै। शासकीय शिकंजा, धार्मिक पाखण्ड, सामाजिक दबाव, आर्थिक जर्जरता, चिकित्सकीय अराजकता, शैक्षिक पराभव, राजनीतिक उत्पीड़न, साम्प्रदायिक द्वेष, जातीय भेद-भाव, पदक्रमेणक वर्चस्व, भूखक ताण्डव क्रूर शोषणक आबामे समस्त नागरिक पटपटा रहल छल। पूर्ववर्ती रचनाकार लोकनि भारतीय परिदृश्य मैथिल समाजक चिन्ताकें अपना ढंगें रेखांकित चुकल छलाह। भारतीय राजनीतिक परिदृश्यमे किछु महत्त्वपूर्ण घटनावली जाहि तरहक स्थिति समाजमे उत्पन्न केने छल, तकर क्रूर चित्र पूर्ववर्ती कथा साहित्यमे आबि चुकल छल। काँचीनाथ झा किरणसँ पूर्वक कथाधारासँ प्रेरणा लेबाक कोनहु टा खगता अइ पीढ़ीक ऊर्जस्वित कथाकार लोकनिकें नइँ भेलनि। हँ, किरण-राजकमल-गुंजन-प्रभासक सृजन-सरोकार निश्चये अइ पीढ़ी लेल उपादेय भेलनि। अनुकरण लेल नइँ, प्रेरणा लेल; स्थानीय प्रसंगक विडम्बना, सामुदायिक जीवनक जटिलता राष्ट्रीय समस्याक प्रति ओइ पीढ़ीक चिन्ताकें आगू बढ़ेबा लेल। अइ पीढ़ीक कथाकार लोकनि अपन अभिगृहीत दायित्वकें निरन्तर विस्तार दैत रहलाह। अइसँ मैथिली कथा-धाराक भावी दिशा सेहो प्रशस्त भेल।

नवम दशकमे सक्रिय भेल किछु आओर कथाकारक योगदानसँ आठम दशकमे निर्मित शिवशंकर श्रीनिवासक पीढ़ी मैथिली कथा-धारा पुष्ट भेल। मुदा शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-कौशल तँ फुट्टे अपन सुपुष्ट सृजन-दृष्टिक परिचय दैत रहल। लगभग साढ़े पाँच दशकक एकनिष्ठ कथा-साधनाक बाद, आइ आलोचक लोकनिकें हुनकर कथा-प्रविधि पर गम्भीरतासँ विचार करबाक प्रयोजन भेलनि अछि, तकर मूल कारण हुनकर कथा-दृष्टिए थिक।

कुटिल-बुद्धि समालोचक मनोरंजन-प्रेमी पाठककें हुनकर कथामे एहेन किछुओ टा नइँ भेटतनि, जाहिसँ अपन मनोरंजक भाव भावुकताकें सोहरौताह अथवा मनोविकारक शमन करताह। तकर कारण नइँ, जे कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासकें अपन सामान्य पाठक चिन्ता नइँ रहै छनि; खूबे रहै छनि। मुदा हुनकर कथा-लेखन उद्देश्य आत्म-विलास अथवा तात्कालिकता नइँ होइ छनि। शाश्वत मूल्य मात्रक कथा लिखब अपन कर्तव्य मानै छथि। गाममे रहै छथि, ग्राम्य वातावरणमे नागरिक-जीवनक -मनोरथ, सुख-सुविधा, दुख-दुविधाकें रसँ देखैत रहलाह अछि। जीवन-संघर्षक दुख-दुविधासँ उबरबा लेल विवेकी नागरिक नैतिक उद्यम -मनोरथक पूर्ति लेल नागरिक जघन्यताक एक सँ एक उपक्रमक प्रत्यक्षदर्शी रहल छथि। ग्राम्य वातावरणमे अस्तित्व-रक्षा अस्मिता-निर्माणक जैविक क्रिया एतेक जटिल होइ छै, जे वार्तिक रचैमे बड़का-बड़का भाष्यकार दार्शनिक दिग्भ्रान्त जेताह। मोहनदास करमचन्द गाँधी कोनो समयमे जाहि गाममे देशक आत्माक निवासक गप करै छलाह; गाम आब से नइँ रहि गेल अछि। शहरुआ वातावरण समस्त कुटिलता कनेक बेसिए घनत्वक संग आब गाममे क्रियाशील रहैत अछि। जे किओ ग्राम्य समाज गहन ज्ञान रखै छथि, से बात निकेनाँ जनैत हेताह। मुदा शिवशंकर श्रीनिवासकें तकरा बूझैमे कहिओ कोनो भ्रम नइँ भेलनि। कारण अइ समग्र क्रियाक अनुशीलन अभिग्रहण, कोनो पूर्व आचार्यक प्रतिपादित सिद्धान्तसँ नइँ केलनि। क्रियाक पूर्णतामे सहायक समस्त कारक लिप्सा विवशताकें सूक्ष्मतासँ विश्लेषित केलनि।

भाषा-विश्लेषक नीक जकाँ तय करताह जे मैथिली भाषाक क्रियापद बहुस्तरीयताक मूल कारण वस्तुतः मैथिल-जन जीवन-व्यवहारक बहुस्तरीयता थिक; जतए मनुष्य सोचै- किछु, बजै किछु, करै किछु। किछु अपवादक क्षण छोड़ि, बेसी काल मैथिल निर्णय स्वार्थहिमे ओझराएल रहै छनि। माइ, मातृभूमि मातृभाषाकें विद्वत्समाज समान महत्त्व दैत रहलाह अछि; मुदा मैथिल परिवेशमे आब माइओक प्रति प्रदर्शित अनुराग कोनो नाटकीय आचरणक हिस्सा गेल अछि! स्वभावतः मातृभूमि मातृभाषाक प्रति कोनो सघन अनुराग मैथिल परिवेशमे नइँ अछि। रहितए, पाँच करोड़हुसँ बेसीक संख्या-बल भूखण्डमे भाषिक चेतनाक अलोपित हएब नइँ देखबितए। अपन सांस्कृतिक मूल्यक विपर्यय प्रति न्यूनांशो मैथिलकें कोनो चिन्ता नइँ छनि। अराजक अत्याधुनिकताक अन्धानुकरणमे हुनका भने अपन पतन नइँ देखाउन, संस्कृतिक मूल्य-रक्षामे हुनका रूढ़ि अनेरे देखा जाइ छनि।

जें कि शिवशंकर श्रीनिवासक कथा-लेखन समाज-परिस्करण नागरिक-चेतना निर्माणक अतिरिक्त दायित्वसँ संचालित होइ छनि; हुनकर कथाक रचाव अइ बहुस्तरीय मिजाजसँ विरत नइँ पबै छनि। ने तँ दर्शन-शास्त्री छथि, ने मनोविज्ञानी; मुदा शोध-प्रविधिक व्यवहार कहै जे जीवन-संचालनक जटिलता सोझरएबाक उद्योगमे अपन मेधाक बलें किओ, दर्शन मनोविज्ञान पढ़नहि बिना थोड़े-थोड़े दार्शनिक मनोविज्ञानी जाइए। मिथिला ओहुना दर्शन मनोविज्ञानक केन्द्र प्रारम्भिक कालहिसँ रहल अछि। प्रमाणस्वरूप--‘सिनुरहार’, ‘चिन्ता’, ‘गाछ-पात’, ‘पिजराक सुग्गा’...आदि किछु कथामे चरित-निरूपण हुनकर कौशल देखल जा सकैत अछि।सिनुरहार कथामे एसगरे कल्याणीक माइक दुविधा अथवाचिन्ता कथामे मेंहीक दुविधा अथवागाछ-पात कथामे बुरहीक दुविधा देखि स्पष्ट होइत अछि जे जीवनक यथार्थ सिद्धान्तक यथार्थमे कतेक भेद होइत अछि। तें विहंगम दृष्टिएँ शिवशंकर श्रीनिवासक कथा पढ़ब कथाक मर्मसँ अपरिचित रहि जाएब हएत। हिनकर कथा पढ़बा लेल, कथाक मूल-तत्त्व ग्रहण करबा लेल सजग पाठकीय दृष्टि अनिवार्य अछि; देश-दुनियाँ मनुष्यता-सामाजिकताक प्रति सूक्ष्म सावधानी अपरिहार्य अछि। ओना आजुक समस्त सशक्त कथा-पाठ लेल सुबोध सचेत पाठकीय मानसिकता राखब अनिवार्य अछिए।

विश्व-साहित्यक कोनहुँ भाषाक कथा जकाँ मैथिली कथा-लेखनमे सेहो कथावस्तुक फलक बहुत पहिनहि टूट गेल छल। मैथिली कथा प्राचीन परिपाटीक घसल-घसाएल प्रक्रियासँ बहराकए, राजा-रानीक कथा घटना-प्रधान, चरित्र-प्रधान कथाक मोह त्यागिकए शैली-प्रधान कथामे राजकमलेक पीढ़ीमे प्रविष्ट गेल छल। आजुक मैथिली कथा देश-दुनियाक साहित्यिक रचनाक समानान्तर अपन रचना-प्रक्रियासँ परिचय देब शुरुह केलक अछि। आठम-नवम दशकमे तैयार भेल मैथिली कथाकारक चिन्तामे अपन शंका अपन समकालीन समाजक चिन्ताक अलावा भविष्य लेल एकटा मार्ग प्रशस्त करबाक चिन्ता सेहो आएल। पूर्ववर्ती रचनाकार द्वारा उठाओल महत्त्वपूर्ण चिन्ताकें रेखांकित करबाक दबाव सेहो अइ पीढ़ीक कथाकार पर छलनि। स्पष्टतः अइ पीढ़ीक कथाकार अपन समाजक नागरिक-जीवनक विडम्बनाकें रेखांकित करैत आगन्तुक समय लेल लिखल जाइवला कथाक एकटा शृंखला तैयार करबाक प्रविधि निर्माण रहल छलाह। शिवशंकर श्रीनिवास एहने कथाकारमे अग्रणी छथि, जे ने केवल अपन समकालीन समाजक जीवन-दशाकें विलक्षण दृष्टिएँ आरेखित केलनि, बल्कि समकालीन समाजक जीवन-संघर्षक मर्मकें बुझबाक चेष्टा केलनि; परवर्ती पीढ़ी लेल एकटा कठिन मानदण्ड ठाढ़ केलनि।

हुनकर विशिष्ट कथाअपन बुत्ता बेरोजगारीक संकटसँ जूझैत एकटा सभ्य, सुशिक्षित, स्वावलम्बी, स्वाभिमानी नायकक कथा थिक, जैमे कोनहुँ टा कथानक नइँ अछि। बेरोजगार नायकक कुण्ठा, सन्त्रास जिजीविषा एतए देखाइत अछि अवश्य; मुदा नायक कतहु टूटैत नइँ देखाइ छथि। लाख प्रतिकूल परिस्थितिक अछैतहु हुनकर कोनहुँ कथाक नायक कोनहुँ परिस्थितिमे टूटल-हारल नइँ देखाइ छथि। वस्तुतः अपन नायकक जीवन-संघर्षक विज्ञापनसँ कथाकार अपन समाजकें संघर्षशील मनुष्यक विजय देखेबाक आग्रही छथि। से, अहू कथाक नायककें सदैव अप्पन बुत्ता पर, अप्पन कार्यशैली पर अटूट आस्था छनि।

कथा वस्तुतः मानसिक उद्वेगक कथा थिक। प्रथम पुरुषमे लिखल गेल अइ कथाक वाचक बेरोजगार रहैतो, अपन मित्र सुरेशक असंगत सफलताकें देखितहु, अपनाकें विफल नइँ मानै छथि। अइ कथामे आपातकालक चर्चा अछि। आपातकालक बाद भारतमे जाहि तरहें अपराधक राजनीतिकरण राजनीतिक अपराधीकरण उदग्र रूपें विकसित भेल छल, तकरहि गम्भीर रेखांकन एतए देखाइत अछि। अही क्रममे कथावाचक मित्र सुरेश, जे अध्यवसायक समय नितान्त भुसकौल छल, राजनीतिक संरक्षण पाबि मुँहपुरुख गेल। कथावाचक पत्नी तकरहि सहयोगसँ पतिकें नोकरी प्राप्त करबाक सलाह दै छथिन। मुदा वाचककें अपन योग्यता पर भरोस छनि, पत्नीक लाख प्रेरणाक अछैत, राजनीतिक मदतिसँ नोकरी लेबाक इच्छा नइँ केलनि। हुनकर दिढ़ मान्यता छनि जे नैतिकताक लोप नइँ सकैत अछि। चारू भर समाजमे नैतिकताक लोपक स्थिति देखाइ छल, मुदा कथावाचकक आस्था छलनि जे नैतिकताक लोप नइँ सकैत अछि। नैतिकता घटि सकैत अछि, ओकर क्षरण सकैत अछि, मुदा नैतिकताक बिना मनुक्ख किन्नहुँ नइँ रहि सकैत अछि। मानै छथि जे एखन मनुक्ख सूतल-सन अछि। एक दिन अवश्य जागत। मनुक्खकें मनुक्ख जगौतै। मनुक्ख अपन मनुक्ख लेल जागत।...दिग्भ्रान्त, स्वार्थमे आन्हर परिस्थितिवश पराजित नायककें मनुष्यताक क्षमता पर एहेन आस्था इजोतक दर्शन करबैत अछि।

कथा संसाधनविहीन गाममे शिक्षित बेरोजगार नौजवान लेल गामक उदासीन दृष्टि पर व्यंग्यात्मक प्रहार करैत अछि। गाममे चाह-पानक दोकानक बढ़ैत संख्याकें गामक लोकक रोजी-रोटीक साधन रूपमे नइँ देखै छथि, आपदाकें अवसर बना लेबाक पतित-दृष्टिसँ घृणा करै छथि। देखै छथि जे दोकानक बाढ़ि गामक लोकककें व्यसनी बना देने अछि। ओकर जीवन-यापनक खर्च बढ़ा रहल अछि। लोककें ज्ञान-विमुख रहल अछि। चाह-पानक दोकान पर भीड़ जुटल रहैत अछि, मुदा लगीचेक पुस्तकालयसँ राताराती पोथी चोराकए रद्दीक भावें लोक बेचि अबैत अछि। पुस्तकालय खण्डहर बनि गेल अछि। गाम श्रीविहीन रहल अछि। चाह-पानक दोकान पर निरर्थक विषय पर बहस होइत अछि। सार्थक सृजनात्मक किओ नइँ करै छथि। कथावाचककें चिन्ता छनि जे लोकक खोराक बढ़ि रहल अछि, माथ पर कर्जा बढ़ि रहल अछि; बाल-बच्चाक पढ़ाइ-लिखाइ चैपट भेल जा रहल अछि; आमदनीक स्रोत मात्र खेती अछि, जे संसाधनक अभावमे नष्ट भेल जा रहल अछि। लगले सुरमे कहि देब उचित होएत जे गाम कृषि-जीवनक बदहालीक चिन्ता शिवशंकर श्रीनिवासक अनेक कथामे गम्भीरतासँ आरेखित भेल अछि। सूत्र-निर्माणक अनुमति हो, जँ कथा-लेखनकें सामाजिक रूपें उपादेय बनेबाक सदीच्छा हो, आसानीसँ कहल जा सकैत अछि जे हिनकर कथाासोन्मुखता दिश तेजीसँ बढ़ैत समाज पर नियन्त्राण रखबाक लगाम थिक।

अइ कथाक वाचक भरण-पोषण लेल एकटा महींस पोसने छथि, ओहीसँ पारिवारिक बेवस्था चलै छनि। मुदा हुनकर अइ आचरणकें समाजक लोक हेय दृष्टिएँ देखै छनि। खिधांस करै छनि। ग्रामीण समाजक एहेन घृणित सोच-विचार, श्रमशील काजुल लोक लेल एहेन विकृत मानसिकता पर अइ कथामे घनघोर व्यंग्य देखाइत अछि। कथावाचक पत्नी अत्यन्त सुघर सुगढ़ स्त्री छथि, जिनका परिवारक चिन्ता छनि, पतिक मानसिक शान्ति आत्मविकासक चिन्ता सदैव सतबै छनि। तें अपन पतिकें सलाह दै छथि, जे संसार बदलि रहल अछि, अहूँ बदलू। मुदा कथावाचक नइँ बदलै छथि।...एहेन की अछि जे नइँ बदलै छथि? अइ बदलबाक अर्थ की थिक?...पत्नी बेर-बेर आग्रह करै छनि जे राजनीतिक रूपें सबल गेल अपन मित्र सुरेशक सहयोगसँ कोनो नौकरी पाबि लेथु, मुदा विवेकशील समाजक प्रतिनिधि अइ कथाक वाचक स्वयंकें बदलए नइँ चाहै छथि, कारण हुनका अप्पन बुत्ता पर आस्था छनि। हुनका मोनमे कृषि-कर्मक चिन्ता छनि। ग्रामीण समाजक एकजुटता पर भरोस छनि सरकारी नीतिक विधान पर शंका छनि। कथाक अन्तिम अंशमे सरकारी योजनाकें निरस्त करैत जाति-धर्मसँ निर्लिप्त सहकारी उद्यमक सलाह देल गेल अछि।

आत्मबल केन्द्रित अइ कथाक शीर्षके कथाक मर्मकें उजागर करैत अछि, जाहिमे मनोरंजनक तत्त्व भने किछु नइँ हो, मुदा पाठककें रोकि रखबाक पर्याप्त गुण अछि। मनोरंजन करब कहिओ कोनो साहित्यक उद्देश्य नइँ रहल अछि। पाठककें बिलमएबाक एकटा छोटा सन तत्त्व थिक, जकरा बलें भावक रचनासँ जुड़ल रहै छथि। साहित्यक उद्देश्य अही बाटें पूर्ण होइत अछि। मनोरंजनक प्रलोभनसँ जुड़ल पाठक रचनाक अवगाहनक बाद उद्वेलित होइ छथि, जे हुनका आत्मपरिचयक स्थितिमे अनैत अछि अपन चेतनाकें उद्बुद्ध करै छथि।अपन बुत्ता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथा अछि, जाहिमे जनशक्ति पर भरोस देखाओल गेल अछि। गामक श्रमिक समाज एकजुट कए बान्ह बान्हि लैत अछि। आश्वस्त जाइत अछि जे अइ बेर निकेनाँ पटौनी हएत बढ़ियाँ उपजा हएत। उपजाक कल्पनाक उत्साहसँ पूरा समाज प्रसन्न अछि, गामक उत्साह देखि हुनकर पत्नियो उत्साहित छनि। घोषणा करै छथि जे गृहस्थ लोकनि एकजुट कए काज करथि, किनकहु नोकरी-चाकरी लेल बाहर जएबाक प्रयोजन नइँ हेतनि। गामसँ नीक ठाम की हएत? शिवशंकर श्रीनिवासक कथा वस्तुतः कृषि-कर्मक प्रति आस्थाक कथा थिक।

आइ जखन सगरो समाजमे भ्रान्ति पसरल अछि जे गाम-गाममे सड़क जाएब समाज-विकासक लक्षण थिक, ओतए क्रियाधर्मी रचनाकारक चिन्तित हएब उचित अछि, जे सड़क-निर्माण गामक विकासक लक्षण नइँ थिक। गामसँ श्रम-संसाधनकें खेहारि जएबाक, पूँजीपति बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा किसानक उपजाओल अन्न गामसँ बाहर जएबाक अपन उत्पाद घरे-घरे बेचि लेबाक साधन थिक। गामक विकासक असली लक्षण थिक--गाममे कर्म-निष्ठाक प्रसार, अध्यवसायक प्रवृत्ति जगाएब, जाति-धर्मसँ मुक्त मनुष्यवादी सहकार, मानव-प्रेमसँ भरल एकजुटता, कृषि-कर्ममे सहकारिता... विकासक असली चेहरा कृषिक विकास थिक। सामुदायिक सहयोगहिसँ कोनहु समाजक कृषि समृद्ध सकैत अछि। अइ कथाक माध्यमे शिवशंकर श्रीनिवास एकटा विराट सन्देश प्रतिपादित केलनि अछि, जे आजुक समाजसँ लुप्त भेल जा रहल अछि। वस्तुतः प्रेमेक विकास मानवीयताक विकास थिक!

हुनकर अत्यन्त लाक्षणिक व्यंजनापरक कथासिनुरहारमे कथावस्तु एतबहि टा अछि जे परदेसमे नोकरी जीवन-यापन करैत रामभद्र झा अपन छोट बालक उपनयन करबए सपरिवार गाम आएल छथि। संगमे बेटी-जमाए सेहो आएल छथिन। बेटी कल्याणी अल्पायुमे विधवा गेल छलखिन, माता-पिताक सद्भावनाक कारणें सुयोग्य रसँ हुनकर पुनर्विवाह भेलनि। से जानि, गामक लोक घरे-घर कनपुफसकी करैए। उपनयन संस्कारक विधि-विधान चलि रहल, मुदा अनेरबा अन्धविश्वासक कारणें रामभद्रक समाजभीरु पत्नी कल्याणीकें विधि-विधानसँ अलग राखए चाहै छथि।

शिवशंकर श्रीनिवास ने स्त्री-विमर्शक अतिवादक पक्षधर छथि, ने रूढ़ मान्यताक पोषक। जाहि सामाजिक परिस्थितिक कारणें स्त्री-जीवनक दुर्दशा बढ़ैत चल जा रहल अछि, तकरा प्रति सदैव चिन्तित रहै छथि। हुनकर लगभग कथामे स्त्री-जीवनक दारुण पीड़ा उजागर भेल अछि। माटि-पानिक सरोकार, पारम्परिक सम्बन्धक निर्वाह सामाजिकतासँ जुड़ल वस्तुक प्रति चिन्ता हुनकर कथामे रक्षित होइत अछि। हुनकर कथा-दृष्टि सदैव मनुष्य-विरोधी दुष्कृति पर कुपित रहै छनि।

बेटाक उपनयन संस्कारमे पुनर्विवाहित बेटीक सहभागितासँ सम्भावित व्यवधानक प्रति रामभद्रक पत्नीक आशंका सगरो कथामे मँड़राइत रहैत अछि। विलक्षण कौशलसँ सृजित अइ कथामे कथाकारक विलक्षण कथा-दृष्टिक परिचय भेटैत अछि, जे एक दिश सामाजिक यथार्थक परिचय दैत अछि, दोसर दिश मानवीय व्यवहारक परीक्षण करैत, स्थापित सिद्धान्तक सूत्र प्रमाणकें निरुपाय साबित करैत अछि। तखनहि आबि कए प्रमाणित होइत अछि जे सामुदायिक व्यवस्थामे जीवन-यापन सूत्रक कोनो एकटा सिद्धान्त नइँ सकैत अछि। स्थान-काल-पात्रक पर्यवस्थितिक अनुसार ओहिमे विचलन आएब स्वभाभाविक थिक। मनुष्य कोनो रासायनिक पदार्थ नइँ थिक, तें सिद्धान्तहि टासँ नइँ चलत, परिस्थितिवश बदलैत रहत।

कल्याणीक माइक मानसिक द्वन्द्वकें आरेखित करबामे ततेक कौशल लगा देने छथि, जे पैघ सँ पैघ मनोविज्ञानी विफल जा सकै छथि। स्त्री प्रगतिशील छथि कि रूढ़िवादी, तय करब कठिन अछि। प्रगतिशील एतबा जे विधवा बेटीक विवाह करबैमे कनेको इत-उत नइँ केलनि; सन्तान-मोह एहेन जे बेटाक उपनयनमे बेटी-जमाएकें संग नेनहि गाम अएलीह; समाजभीरु एहेन जे खिलखिलाकए बेटीक हँसला पर धोपि देलनि, जे एना जुनि हँसू; धर्मभीरु एतेक जे शुभ-कार्यमे विधवाक सहभागिता वर्जित अछि, तें उपनयनक विधानमे कल्याणी उपस्थित नइँ रहतीह; स्वीकार-भाव एतेक जे कल्याणीक पितिऔत बहिन कल्याणीकें विधि-विधानमे अनलखिन, माइ मुदित गेलीह...सरिपहुँ मनुष्यक मनोजगत कतेक द्वन्द्व सहैत अछि!... बलिहारी कथाकारकें जे यथार्थवादक प्रचलित परिभाषाक सीमा तोड़ि एमिल जोलाक प्रकृतवाद सात्र्राक अस्तित्ववादकें सूक्ष्मतासँ बेकछा देलनि।

एतए कनेक यथार्थवाद प्रकृतवादक गुणसूत्र पर विचार करब उचित लागि रहल अछि। प्रकृतवाद वस्तुतः यथार्थवादेक विस्तृत आयाम अतियथार्थवाद थिक; जतए सामूहिकता समग्रताक स्थान पर सामुदायिक जीवन जिबैत एक-एक नागरिक क्षणिक मनोवेग, दुख-दुविधा, सुख-सुविधा, -मनोरथक संज्ञान लेल जाइत अछि। समग्र संज्ञानमे वैयक्तिक जीवन दशा कतोक बेर दबि जाइत अछि।सर्व मंगल मांगल्ये धारणामे बात यद्यपि भारत खास मिथिलामे शुरुअहिसँ छल, मुदा आधुनिक साहित्यिक धारामे बात नुका गेल छल। ललित-राजकमल-मायानन्द पीढ़ीसँ पूर्वक मैथिली साहित्यमे अइ बात संज्ञान किरण यात्रीक अलावा कतहु देखाइ नइँ छल।

साहित्यिक आन्दोलन रूपमे उनैसम शताब्दीक अन्तिम चरणमे धारणा सर्वप्रथम प्रफांसमे प्रसिद्ध प्रकृतवादी प्रफेंच उपन्यासकार, पत्रकार एमिल जोला (सन् 1840-1902) माध्यमे आएल। सन् 1880मे अपन एकटा आलेखदी एक्सपेरिमेण्टल नॉवेलमे जे यथार्थवादी शैली प्रस्तावित केलनि, तकरहि प्रकृतवाद कहल गेल। तदनुसार रचनामे क्रूर जीवन-यथार्थक अंकन अनिवार्य मानल गेल। अइ धारणाक अनुसार साहित्य एवं कलाक दृष्टिएँ कोनहु टा सत्य वर्जित गर्हित नइँ रहल। एकटा असंगठित साहित्यिक प्रवृत्तिक रूपमे प्रफांसीसी साहित्य-चिन्तनमे प्रचलित अइ प्रकृतवादकें बीसम शताब्दीक प्राथमिक चरण अबैत-अबैत भारतीय साहित्यमे सेहो पर्याप्त प्रतिष्ठा भेटए लगलै। स्वातन्त्रयोत्तरकालीन भारतीय समुदायमे तँ खूबे भेटलै। रचनामे जीवनक क्रूर-कठोर यथार्थकें निर्ममतासँ अनावृत करबाक यथेष्ट प्रयास भारतीय साहित्यमे होअए लागल। पात्र-प्रसंग-पर्यावरणक विश्वसनीयता, सहजता एवं जीवनक जैविक प्रयोजन पर अइ धारणामे बल देल जा लागल। समाजक लघुत्तम एकाइ, अर्थात् प्रत्येक मनुष्यक निजी जीवनक छोट-छोट अनुभूतिक संज्ञान लेल जाए लागल। तथ्यतः संसारक श्रेष्ठतम रचना मनुष्य थिक। जकर जन्मजात वृत्ति जिजीविषा थिक, तें हरेक प्राणी जीबा लेल संघर्ष करैत अछि, परिस्थितिकें अनुकूल बना कए स्वयंकें सुरक्षित करैत अछि। अइ प्रक्रियामे जीवनक क्रूर यथार्थसँ मुठभेड़ करैत अपना लेल कैक परिस्थितिक निर्माण सेहो करैत अछि। एहने स्थितिमे किरण-यात्री ललित-राजकमल-मायानन्द पीढ़ीक रचनाकार लोकनि यथास्थितिक-सम्पोषक बनि गेल मैथिल समाजक पिछड़ल मानसिकताकें बदलब शुरुह केने छलाह। यथार्थसँ मुँह नुकबैबला पाठकक सोझाँ क्षमतासँ ठाढ़ हएबाक प्रविधि तकने छलाह। समकालीन सामाजिक प्रवृत्तिक व्याधिकें उजागर करब अपन प्राथमिक दायित्व मानि चुकल छलाह।

कृति-प्रसंगक पूर्णता लेल पात्र-प्रसंग युक्तियुक्त वर्णन रचनाकारक कर्तव्य होइत अछि, एक सीमा धरि विवशतो। कथामे सृजित चरित्रक विस्तार, प्रामाणिकता, घटना-प्रसंगक विश्वसनीयता अनेक आनुषंगिक सूचना लेल नगर, प्रकृति, पारम्परिकता, रीति-रिवाज, चैपाल-संवाद, लोक-परलोक, इतिहास-दर्शन, राजनीति, जाति-धर्म-सम्प्रदाय, वर्चस्व-पराभव, शोषण-विद्रोह, युद्ध-क्रान्ति, यथास्थिति, मनोवेग, उमंग-उत्साह, प्रेम-घृणा, ईष्र्या-अनुराग, अतीतावलोकन, स्मृति-खण्ड, भविष्य-चिन्तन ...आदिक वर्णन अनिवार्य होइ छै। कोनहु श्रेष्ठ रचनामे वर्णन निष्प्रयोजनीय नइँ होइत अछि। किऐक तँ साहित्यमे चित्रित जीवन-सत्ये टा पर्याप्त नइँ होइ छै, ओकर सत्य लागब सेहो अनिवार्य होइ छै। अविश्वसनीय यथार्थ साहित्यकें निष्प्रभ निर्मूल्य करैत अछि। रस-सिद्ध भावककें अइ तथ्यक गहन समझ रहै छनि, से रहबाको चाही।

कल्याणीक माइक जीवनक एहने छोट-छोट अनुभूतिक संज्ञानसिनुरहार कथामे कथाकार लेलनि अछि। मुदा विचारणीय अछि जे जीवनक एहेन दुर्वह दुविधा मेटाओल जाए कि झाँपि-तोपि कए व्यूहसँ निकलि जएबाक उपाय ताकल जाए। जाहि सामाजिक वातावरणमे बेटाक उपनयन करए आएल छलीह, ओही समुदायक आतंकमे जीबि रहल छलीह। अइ पराभवक स्थितिमे मनुष्य यथासाध्य समस्यासँ बचि निकलबाक बाट तकै; आवश्यकतानुसार टकराइतो अए; अस्तित्व-रक्षाक अइ दुविधाग्रस्त परिस्थितिमे मनुष्य कखन ईश्वरवादी जाइ, कखन अनीश्वरवादी...बूझब कठिन अछि। तें अस्तित्ववादक अइ दुनू धारा--ईश्वरवादी अनीश्वरवादी...पर करब प्रयोजनीय अछि!

युगक लेखनमे अस्तित्ववादक प्रतिपादन सन् 1843मे प्रसिद्ध डैनिश चिन्तक सोरेन किर्केगार्द (सन् 1813-1855) केलनि; मुदा अस्तित्ववाद शब्दक प्रयोग नइँ केलनि। साहित्य-चर्चामे अस्तित्ववादक ख्याति प्रसिद्ध प्रफांसीसी विचारक ज्याँ पाल सात्र्रा (सन् 1905-1980) सत्प्रयाससँ भेल। एकरा अधीन कोनो स्थापित शक्तिसँ मोहभंग भेला पर मनुष्य अस्तित्ववाद दिश उन्मुख होइत अछि।सिनुरहार कथामे कल्याणी कल्याणीक माइ-बापक मनोदशामे अइ दुनूक दर्शन होइत अछि।

कथाक बुनावटिमे समस्त अनिष्ट सम्भावना कल्याणीक पुनर्विवाहसँ बनैत देखाइत अछि। मुदा रोचक प्रसंग थिक जे अइ सम्पूर्ण प्रकरणमे रामभद्र कखनहुँ कोनो बात लेल समाज-व्यवहारक प्रति ओतेक भयभीत नइँ छथि, जतेक हुनकर पत्नी। बेटीक पुनर्विवाहक प्रति बेटीकें बेटिए जकाँ स्वीकार करबाक प्रति रामभद्रकें कखनहुँ कोनो तरद्दुत नइँ होइ छनि; जखन कि रामभद्रक पत्नीकें डेगे-डेग पर चिन्ता सतबैत रहै छनि, जे अन्तर्जातीय पुनर्विवाहक मामिलाकें जानि नइँ, कखन गामक लोक कन्नी काटि जाए; उपनयनक विधि-विधानमे कोन वितण्डा उपस्थित जाए। सोहागिन स्त्रीक विचित्र परिभाषा रामभद्रक पत्नीक मोनमे बसल छनि। पुनर्विवाहित गेलाक बादहु कल्याणीकें सोहागिन मान लेल तैयार नइँ छथि। मुदा जेना अपन विरहाकुल पदमे महाकवि विद्यापति अन्त अबैत-अबैत समस्त विरह-दशा मेटाकए संजोगमय सुखमय वातावरण आनि दै छथि; ठीक तहिनासिनुरहार कथामे शिवशंकर श्रीनिवास, अन्त अबैत-अबैत समस्त प्रतिकूल परिस्थितिकें निपटा सुखमय वातावरण निर्मित दै छथि। अहूसँ रोचक प्रसंग थिक जे अइ सुखद वातावरणक निर्माणक अगुआ कल्याणीक पितिऔत बहिन ललिता होइ छथि; एकटा नवयुवती; अर्थात् नवांकुर प्रतीक।...जै कल्याणीकें अपने सहोदर भाइक उपनयन संस्कारक विधि-विधानसँ अलग राखल जाइत अछि, ओही कल्याणीकें ललिता बाँहि पकड़िकए अबैत अछि आह्लादक संग विधि-विधानमे शामिल करबै छथि। अन्ततः कल्याणीक माइक हृदय सेहो परिवर्तित होइत छनि प्रमुदित मुस्कानक संग एकटा मुदित वातावरणमे कथाक अन्त होइत अछि।

ग्रामीण नागरिकक निरर्थक निकृष्ट चिन्ताकें कथामे सूक्ष्मतासँ रेखांकित कएल गेल अछि; जैमे किनकहु रुचि कोनो सार्थक प्रसंगक चिन्तामे नइँ छनि; उपनयन संस्कारक सफलतामे नइँ छनि; अधिकांश लोक अइ सुँघानीमे लीन छथि जे अकालमे विधवा भेल युवती कल्याणीक विवाह कोन जातिक पुरुखसँ भेलनि? कोन नोकरी करै छनि, कतेक पाइ कमबै छनि, हँसमुख अछि की खड़ूस?...सब किओ तइ चिन्तामे लिप्त छथि, जकर कोनो सम्बन्ध हुनका लोकनिक निजी जीवन कि सामाजिक आचारसँ दूर-दूर धरि नइँ अछि।

जीवनक सहजता विरोधी समाजक असली स्वरूपकें नाँगट केनिहार दार्शनिक कथाकार शिवशंकर श्रीनिवासक अइ अत्यन्त प्रभावी कथामे रामभद्रक पत्नीक परिवार सुलभ चिन्ता अछि। मुदा समाजक आतंकक विचित्र प्रश्न अछि। रामभद्रक सम्पूर्ण परिवार पर जै समाजक आतंक बरमहल मँड़राइत रहैत अछि, रामभद्र ओही समाजमे पुनः आबिकए अपन बेटाक उपनयन किऐ करए चाहै छथि? एहेन दुर्मुख समाजक आतंकमे जीबाक विवशता आइयो लोककें सम्मोहित करै छै।

मनोरथ भय द्वन्द्व अइ कथामे विचित्र तरहें दर्शाओल गेल अछि। पीढ़ीक जीवन-दर्शन एना अछि जे रामभद्र अपन बेटीक मनोभावक चिन्तामे परेशान छथि; रामभद्रक पत्नी सामाजिक आचार-व्यवहार-अनुशासनक आतंकसँ परेशान छथि; मुदा पीढ़ीक प्रतिनिधि कल्याणी लेखें धन्न सन। निश्चिन्त छथि, एकदम सहज। हुनकर पति सेहो तहिना सहज। कल्याणी खिलखिलाइत रहै छथि। बेटीक हँसीक ऊँच स्वरसँ माइ परेशान छथि। -पुरान पीढ़ीक भेद थिक। गाम अएलाक बाद कल्याणीकें अपन प्रगतिकामी माइक दोसरे रूप देखाइ छनि। गाम शहर अइ अतार्किक भेदकें, दोसर पारिवारिक व्यवस्थामे जबर्दश्ती नाक डुबएबाक ग्रामीण आचरणकें अपन माइक अइ निरर्थक समाजभीरुताकें कल्याणी चाहिओ नइँ बूझि पबै छथि; नइँ बूझि पओतीह। स्त्री-जीवनक परिस्थितिकें शिवशंकर श्रीनिवास अइ कथामे विलक्षण ढंगें प्रस्तुत केलनि अछि।

सन् 1942मे प्रकाशित अपन पोथीशृंखला कड़ियाँमे स्त्रीक मनोविज्ञान जीवन-क्रिया पर महादेवी वर्मा सूक्ष्मतासँ विचार केलनि अछि। हुनका मतें पवित्र गृहस्थीक नींव पुरुखक शत्तिफक बलें नइँ स्त्रीक बुद्धिक बलें राखल जाइत अछि। हुनकर मानब सही छनि जेपुरुष गृह कोनो स्त्रीक जीवन होइत अछि, जखन किस्त्री गृह पुरुखक जीवनक कोनो एकटा आवश्यकता। समाज परिवार लेल क्षमतासँ बेसी योगदान त्याग करैत स्वविहीन भेल जाइत स्त्री सरिपहुँ पोसुआ सुग्गा भेल जा रहल छथि; पिजराक सुग्गा। अवसर अएलहु पर विहग नइँ होअए चाहै छथि।पिजराक सुग्गा शीर्षक शिवशंकर श्रीनिवासक कथा महादेवी वर्माक अही धारणाक व्याख्या करैत अछि। प्रतीकार्थमे कथा एक दिश स्त्री जातिक शौर्यशाली पराक्रमक स्वरूप ठाढ़ करैत अछि, दोसर दिश जीवन सम्बन्धी हुनकर पराश्रयी सुखलीनता। अइ कथामे वाचक, अपन विधवा माइक जीवन-संग्रामक कथा कहै छथि; जे परिवारक नीड़-निर्माणमे सम्पूर्ण जीवन अर्पित दै छथि। ओइ परिवारकमझिला घरक खाम्ह छथि; मुदा जइ बेटाकें पोसि-पालि कए दुनियाँ देखबाक दृष्टि देलनि अछि; आब ओही बेटाकें अपन अभिभावक मानै छथि। वाचककें बात कोनहुना पचि नइँ पबै छनि। माइकें अप्पन माइक श्राद्धमे नैहर जेबाक छनि। तइ लेल कथावाचक माम अनुनय करै छनि जे कनेक अगतरे जाए दहक! वाचक छुबुधिमे छथि जे जै माइकें पूछि कए हम स्वयं कतहु जाइ-अबै छी, तइ माइकें हम कोना आदेश देबै जे कहिआ जाए, कहिआ नइँ जाए? वाचक दृष्टिमे पिताक मृत्युक बाद माइए हुनका लोकनिक पिताक भूमिकामे रहलखिन! माइएसँ जीवन भरि दिशा-संकेत पओलनि। से माइ कहिआ नैहर जेतीह, तकर निर्णय हम कोना लेब?...अपन द्वन्द्वक परीक्षा लेल वाचक माइक मोनक टोह लेब दलानसँ आँगन अएलाह माइ, बहिन पत्नीक बीच अही विषय पर चर्चा सुनलनि। जखन वाचकक बहिन कहलखिनकाल्हि चल जो!’, माइ कहलकनि, ‘से बौआ कहतै तखन ने!’...वाचकक दिग्भ्रान्त हएब स्वाभाविक छल।

सामाजिक व्यवहार पारिवारिक वातावरणक विचित्र ओझराहटिसँ भरल कथा एक अर्थें रांगेय राघवक कथागदल स्मरण करबैत अछि। कथानायिका गदल सेहो एहने पराक्रमी पारिवारिक छथि। केहनो प्रतिकूल परिस्थितिमे मान-मर्यादा-स्वाभिमान परिवारक रक्षा लेल तैनात। मुदा एकटा पुरुखक अभिभावकत्वमे रहबाक अनुरागसँ भरल।पिजराक सुग्गा कथाक वाचकक माइ अपन बेटाक अभिभावकत्वमे अन्तिम समयक जीवन बितबए चाहै छथि। वाचक देखै छथि जे हुनका रक तीन स्त्री--पत्नी, जेठ बहिन जन्मदात्री माइ--तीनू, नारी हएबाक कारणें पुरुखक अधीन रहि, पुरुखसँ अपनाकें बचा रखबामे सहमत छथि। हठात् हुनका पिंजरामे बन्न आन्हर सुग्गाक संग खेलौड़ करैत अपन पित्तीक सुनाओल कथा मोन पड़लनि। हुनकर लालकाका पिंजराक द्वार खोलि कए सुग्गाकें बाहर जएबा लेल प्रेरित करै छलखिन, मुदा सुग्गा बाहर जाइक बदला पिजराक देबालमे सटि जाइ। क्रिया देखि लालकाकाकें कौतुक होइन्ह। बूझथि, जे आन्हर पक्षी गगनबिहारी नइँ हएत। तैइओ खेलौड़ करथि...

कथावाचककें अपन पित्तीक सुनाओल कथा पर तामस उठनि। आब हुनका बूझिमे अएलनि। लालकाकाक ओइ आचरणकें नारी स्वातन्त्रयक मिथ्या धूम मचैनिहार पुरुखक रूपमे स्मरण केलनि। मुदा स्त्री जाति स्वयंकें पिंजरामे बन्न किऐ राखए चाहै छथि? हुनकर माइ अइ पिंजरासँ किऐ नइँ निकलि सकलथि? पुरुखक बनाओल पिंजरा हुनका सोझाँ कहिओ प्रकट नइँ भेलनि। सम्पूर्ण परिवार लेल सदैव स्वयं अभिभाविका रहलीह! आइ हुनका अभिभावक खगता किऐ भेलनि? कथावाचक कान लगै छथि। हुनका आँखिमे नोर देखि, माइ तत्काल आलिंगन करैत कहै छनि --अधीर जुनि होउ, अहाँक पिता ने चल गेलाह, हम संग छी!...माइक संरक्षक रूप फेरसँ देखिकए वाचक अपराधबोधसँ मुक्तिक अनुभव करै छथि।...सरिपहुँ सामाजिक यथार्थक जटिलता अगोचर अछि। समाजमे लोक क्रिया सदति काल देखै, मुदा कथाक रूपमे उपस्थित भेला पर एकर मर्म तकबाक सहज बेगरता बकें होइत हेतनि।

रोजगारक फेरमे गामक श्रमिक प्रतिभाक पलायनसँ ने केवल गाम खाली भेल अछि किसानीक अवहेलना भेल अछि; बल्कि आर्थिकताक अइ घनघोर दबावसँ मानवीय सम्बन्ध परिवारक अनुराग पर घातक असर पड़ल अछि। सम्बन्ध-मूल्यक संवेदना नष्ट भेल अछि। शिवशंकर श्रीनिवास अइ जोखिमकें सूक्ष्मतासँ आरेखित करैत रहलाह अछि।गाछ-पात शीर्षक अपन कथामे अइ मूल्यगतास पर गम्भीरतासँ विचार केलनि अछि। अइ समस्त आचरणकें विलक्षण कौशलसँ रेखांकित केलनि अछि।

धनार्जनक लोभमे गाम छोड़ि शहर गेनिहार लोक अपन जड़िसँ विच्छिन्न होइते छथि, अन्धानुकरणक फेरमे प्रयासपूर्वक अपन सांस्कृतिक मूल्यकें सेहो ताख पर राखि दै छथि। मूल्यबोध अइ परांग्मुखताक कारणें मूलोच्छिन्न जाइ छथि। अपन माटिक हवा-पानिसँ हुनका कोनहुँटा संवेदना नइँ रहि जाइ छनि। अही चसकमे परवर्ती कालमे गाम ग्राम्य आचरण हुनका लेल निरर्थक, निष्प्रयोजनीय जाइ छनि। एतएमाटि शब्दक प्रयुक्ति हिन्दी शब्दमिट्टी जकाँ नइँ भेल अछि। मैथिलीमे माटि अपन विराट अर्थबोध संग प्रयुक्त होइत अछि, जाहिमे माटि अपन पर्यावरण, रीति-रेवाज, संरचना, गढ़नि... किछुक संग अबैत अछि। सौभाग्यवश अइ शीर्षकसँ शिवशंकर श्रीनिवासक एक गोट कथा सेहो अछि, जकर पाठ-विश्लेषणसँमाटि असली तत्त्वबोध सम्भव अछि।

गाछ-पात कथा गामक डीह पर शेष जीवन बितबैत एकटा वृद्ध माइक अही संवेदनाक कथा थिक। बेटा बोकारोमे इंजीनियर छनि, पुतौह ओतहि उच्च विद्यालयमे शिक्षिका। पोता-पोतीसँ भरल-पुरल परिवार छनि, मुदा गाममे एसगरे दिवंगत पतिक लगाओल बाड़ी-झाड़ीक गाछ-पात संग फदकैत आनन्दित रहै छथि। पति जीवित छलखिन लत्ती-फत्ती लगबथिन, मुदा तोड़थिन बुरहिए। पतिकें केवल लगेबा धरिसँ मतलब रहै छलनि। एतएकर्ता सम्प्रदान भेद स्पष्ट करैमे, असली स्त्री-विमर्शक संकेत दैत कथाकारक विलक्षण चतुराइ व्याख्येय अछि।

विवरणसँ भरल अइ सम्पूर्ण कथामे विवरण कतहु निरर्थक नइँ प्रतीत होइत अछि। अइ विवरणकें एमिल जोलाक प्रकृतवादसँ जोड़िकए देखब उपादेय लगैत अछि तखन स्पष्ट होइत अछि शिवशंकर श्रीनिवासक विवरणक जादू समस्त कथामे कोना उच्चासन चढ़ि बैसैत अछि।

खण्ड-खण्ड जिनगीक पलछिनक अनुभूतिक रेखांकन कथामे आबिकए विशिष्ट गेल अछि।...बुरहीक बेटा-पुतौह अइ बेर हुनका संग जेबा लेल जिदिआएल छथिन; मुदा बुरही द्वन्द्वमे छथि। बेटा-पुतौह, पोता-पोतीक संग जेतीह आकि बाड़ीमे दिवंगत पतिक लगाओल गाछ-पातक संग मुदित हेतीह। सम्बन्ध-मूल्यक एक-एक तन्तुकें कथाकार एतेक सूक्ष्मतासँ आरेखित केलनि अछि, जे बुरहीक जीवनक रोम-रोम उजागर गेल अछि। प्रतीकार्थमे प्रतीत होइत अछि जे सरिपहुँ उपवनक मालीसँ गाछ-बिरिछक सान्निध्य छीनब पैघ अपराध थिक। माइ-बाप अपन परिवारक माली होइ छथि। गाछ-पात मालीकें छोड़िकए जा सकै, सुखाइओ सकै, माली मुदा गाछ-पातकें छोड़िकए नइँ जा सकै! कथाक अन्तिम अंशमे बेटाक संग बुरहीक जाएब तय भेला पर जखन बुरहीकें बाड़ीक गाछ-पात स्मरण अएलनि, गाछ-पातसँ अनुमति लै लेल बाड़ी गेलीह, तखन मन्द-मन्द बसात बहि रहल छल, गाछ-पात प्रसन्नतासँ झूमि रहल छल। मुदा बुरहीकें लगलनि जेना बो टा गाछ-पात उदास रहलए। बुरही गाछ-पातकें कहलखिन--आब हम जा रहल छी। अहाँ सबकें के देखत?... एतबा कहैत बुरही विह्वल गेलीह। आँखि नोरा गेलनि। मोन भेलनि जे बेटाकें कोंढ़सँ लगा ली।...ध्यातव्य थिक जे समस्त प्रकरण अपन रूपकार्थ प्रकट रहल अछि। बजलीह--बच्चा, आब हमरा एत्तै रह दैह। अही गाछ-पातक बीच! एकर सभक सेवामे। हम कत्तौ जाएब, मोन एतै टाँगल रहत। तहन फेर जाकए हेबे की करत?...प्रतीकार्थक आश्रयमे लिखल एकटा विलक्षण कथा थिक।

चिन्ता शीर्षक कथा वस्तुतः शिवशंकर श्रीनिवासे नइँ, पूरे देशक ग्राम्य परिवेश लेल सजग समाजक चिन्ता कथा थिक। कृषि-कर्मक सूक्ष्म विवरणसँ भरल कथा एक दिश कथाकारक मोनमे कृषि-कर्मक पुरोधा लोकनि जकाँ वशीकरणकजन्य अनुराग उत्पन्न करैत अछि, दोसर दिश देश-दुनियाँक दशासँ अवगत हएबाक अभिलाषासँ सेहो भरल देखाइत अछि। अइ कथाक बहुस्तरीय मर्म एकर संवादमे जगमग करैत रहैत अछि। कथा पल-प्रतिपल अपन नायक मेंहीक चारू भर मँड़राइत रहैत अछि। मुदा थोड़ेक आगू अएला पर श्रेष्ठ कृषकक रूपमे मेंहीक नायकत्वकें पुष्ट करबा लेल किछु आओर पात्र जुटै छथि।

कृषि-कर्मसँ जुड़ल समस्त प्रसंगक ज्ञाता मेंही एतए कोनो ऋषि जकाँ प्रस्तुत भेल छथि। मेंही कृषि-कर्मक पुरोधा छथि, मुदा निरक्षर नइँ। थोड़-बहुत पढ़लो-लिखल छथि। समाजक बात-विचारमे सदैव अग्रसर रहै छथि। अखबार पढ़ैमे खूब मोन लगै छनि। चर्चा छल जे अखबार पढ़िकए बातकें स्मरणमे रखै छलाह। साँझुक पहर प्रतिदिन मास्टर साहेबक ओतए जाकए अखबार पढ़थि। शिवशंकर श्रीनिवास अपन नायकक एहेन चरित्र सोद्देश्य गढ़ने छथि। हुनकर इशारा छनि जे कृषि-कर्मक पुरोधा हएबे टा पर्याप्त नइँ अछि। परिवेशक हाल-समाचारक प्रति सावधान रहब सेहो जरूरी अछि। देश-दुनियासँ परिचित रहब सेहो आजुक किसान लेल अनिवार्य अछि। से मेंही आद्रा नक्षत्रक भरि पोख बरसलासँ प्रसन्न छथि। मुदा श्रम कौशलक समस्त कलासँ सम्पन्न रहनहुँ संसाधनक अभावमे हुनकर कृषि लाचार छनि। थोड़बे दिन पहिने हुनकर बर मरि गेलनि। आब बरदक बिना रोपनी होअए नइँ! तें आश्रित छथि, किओ बर देथिन रोपनी हेतनि। एहने विकट समयमे हुनकर बेटा गाम छोड़ि शहर जएबाक जिद पर अड़ल छलनि। हुनकर लाख विरोधक कोनो प्रभाव बेटाक निर्णयकें बदलि नइँ पबै छनि। गामसँ श्रमिकक पलायन हुनकर अनेक कथामे आएल अछि।

पलायनक प्रति पीढ़ीक आकर्षण पुरान पीढ़ीक क्रोध अइ कथामे मुखर रूपें आएल अछि। आधुनिकताक कारण समाजमे पसरल विकृति अन्धानुकरणक कारणें नासमझीसँ उत्पन्न दिशाहीनता पर शिवशंकर श्रीनिवासक कुपित दृष्टि जतए-ततए देखाइत रहैत अछि; से हुनकर व्यंग्यात्मक स्वरमे प्रकट होइत अछि। मुदा तें नइँ मानबाक थिक जे हुनका आधुनिकताक प्रति कोनो कुण्ठा छनि। आधुनिकताक बिहाड़ि तँ ठीक सकै, मुदा तै कारण सम्बन्धक अनुराग-सूत्र टूटि जाए, से सरिपहुँ विकृति थिक।

अइ बातकें अत्यन्त मार्मिक ढंगें अइ कथामे एकटा आनुषंगिक प्रसंगसँ रेखांकित केलनि अछि। मेंहीक एकटा वृद्ध मित्र अपन बेटा-पोता पर अइ लेल व्यथित नइँ छथि जे हुनकर जेठ पोताक विवाह परदेसेमे गेलनि। दुखी छथि जे मुदैया सब हुनका पोतपुतौहुक मुँह धरि नइँ देखए देलकनि, कनियाँकें कहिओ अपन डीह पर नइँ अनलकनि। देखितथि, नैन जुड़बितनि। मेंहीक मित्रक मान्यता छनि जे कनियाँक पैर डीह पर पड़ए, स्वर्गलोकसँ पूर्वज लोकनि आशीर्वाद दै छथिन। से डीह पर वंशक पुतौहुक नइँ अएलासँ हुनकर पितर लोकनिक आत्मा नइँ जुड़ेलनि।...आजुक अतिक्रान्तिकारी लोकनिकें अन्धविश्वास लागि जाए सकै छनि; लागनु; मुदा जीवन शास्त्रासँ नइँ, व्यवहार अनुरागसँ चलैत अछि! मेंहीक मित्रक मामूली सन अभिलाषा पूर करबामे पीढ़ीकें कोनो असुविधा नइँ हएबाक चाही छल। अनुराग छल! आधुनिकता बेशक आबए, लोक खूब प्रगति करए, मनोनुकूल काज करए, मुदा पुरना पीढ़ीक एहेन छोट-छोट अभिलाषाक रक्षासँ जँ सम्बन्धजन्य अनुराग बचल रहए, तकरा बचाकए रखबाक यत्न पीढ़ीकें अवश्य करबाक चाही।

आधुनिकताक होड़मे आब सम्बन्ध-मूल्य तेना तहस-नहस भेल जा रहल अछि, जे पिता आब जन्मदाता नइँ रहि गेल छथि, कुटुम गेल छथि। जिनकर सन्तान आब अपन जीवन-प्रसंग सूचना मात्र देब पसिन करै छथि। हुनकर सलाह-विचार आब सन्तान लेल अनिवार्य नइँ रहि गेल अछि। आजुक समाजमे एना रहल अछि, शीघ्रहि एकर विस्तार हएत। शिवशंकर श्रीनिवास अपन रचनात्मक-सूत्रमे अइ बातक पुरजोर संज्ञान लेलनि अछि।

छोट-छोट प्रसंग, क्षणिक मनोवेग प्रासंगिक कथाक समन्वयनसँ निर्मित कथा रसे-रसे पसरैत रहैत अछि। अही क्रममे मेंहीकें जनतब होइ छनि जे हुनकर अपने बेटा कमएबा लेल गाम छोड़ि दिल्ली चल गेलनि। जखन कि मेंहीक धारणा छनि जे जँ अहिना गामसँ श्रमिकक पलायन होइत रहल खेती समाप्त जाएत। फेर मनुष्य कोना जीयत? खेतक प्रति ममता उमरैत देरी हुनका धरतीक उर्वरता मोन पड़लनि। धरतीक प्रति अद्भुत अनुराग स्वावलम्बनक संकेत थिक, अइ सृष्टिमे मात्र खेतिहरे टा स्वाबलम्बी मानल जा सकै छथि। अही स्वाबलम्बनक अनुरागमे मेंही सपना देखए लगलाह। सपनामे पृथ्वीसँ भेंट संवाद भेलनि। धरती धरतीपुत्रक संवादक सपना एकटा विलक्षण दृश्य उपस्थित करैत अछि, जतए खेती-बारीक नष्ट हएबाक सम्भावित संकेत अछि।...अही क्रममे बड़बड़ाए लगै छथि--हँ, आबि गेल। जे माइक उदास मुँह देखि घुरि आबि सकै, पृथ्वीकें सेहो उदास नइँ छोड़ि सकैए। संगहि संग धान रोपैत पत्नी अकचकाकए पुछलखिन--की बड़बड़ाइ छिअइ?... मेंही अपरतिब भेनहि बिना कहलखिन--बौआ आएलए! पत्नी पुछलखिन--कहाँ आएल?... मेंही कहलखिन--नइँ आएलए आएत...! एतबा कहि मेंही मगन भेल धान रोपए लगलाह। मेंहीक आत्मविश्वास धरती मानवताक पारस्परिक आस्थाक प्रतीक थिक।

एतए नोबेल पुरस्कार (सन् 1954)सँ सम्मानित प्रसिद्ध अमेरिकी रचनाकार, अर्नेस्ट मिलर हेमिंग्वे (सन् 1899-1961) सुविख्यात उपन्यासओल्ड मैन एण्ड सी’ (सन् 1952) नायक सैण्टियागो (पृ. 93) बहुचर्चित उक्तिक स्मरण आएब स्वाभाविक थिक--‘मनुष्य टूटि जाएत, मुदा हारत नइँ ( मैन कैन बी डिस्ट्रवायड बट नॉट डिफिटेड) सैण्टियागो भरि जीवन यातना सहैत रहलाह, सौंसे उपन्यासमे बेर-बेर हताशा नायककें नाभरोस करैत रहै, मुदा हुनकर आत्मबल पराक्रम कत्तौ हारि मानै लेल राजी नइँ छथि। सर्वत्र अदम्य उत्साह ऊर्जासँ भरल रहै छथि। उल्लेख सुसंगत हएत जे हेमिंग्वे स्वयं दुर्दान्त साहसक स्वामी रहथि। अपन रचल पात्रक जीवनमे श्रेष्ठ रचनाकार अपने वैचरिकताक संग जीबैत रहै छथि। हेमिंग्वेक ओएह साहसिक जीवन-शैली सार्वजनिक छवि परवर्ती पीढ़ीक हृदयमे हुनका पूजनीय स्थान दिऔलकनि।

मेंही सेहोचिन्ता शीर्षक कथामे सैण्टियागो जकाँ मानसिक यातना सहै छथि, मुदा पराजित नइँ होइ छथि। अपन आस्था पर डटल रहै छथि। हुनकर जाग्रतावस्थाक सपना घोषणामे परदेस चल गेल अपन बेटाक पुनरागमनक आस्था भरल छनि। आस्था कृषि संरक्षणक चिन्तामे एकटा महावाणी सन प्रसंग अछि। माइक उदास मुँह देखिकए परदेश गेनिहार बेटा शीघ्रे घुरि आओत, सम्बन्ध-मूल्यक रक्षाक पक्षमे आस्थाक वाणी थिक। शिवशंकर श्रीनिवास घनघोर निराशाक क्षणहुँमे आस्थाक रचनाकार छथि।

चिड़ै नइँ मनुक्ख थिक शीर्षक शिवशंकर श्रीनिवासक कथा जीवन-संचालन व्यवस्था-नियन्त्राणक अनेक चिन्तनानुशासनक गुरुतर दायित्वसँ भरल एकटा श्रेष्ठ कथा थिक। आकारमे नइँ, प्रभावमे। ओना अइ कथाक आकारो कोनो तेहेन छोट नइँ अछि। मुदा प्रभावक तुलनामे आकार तेहेन पैघो नइँ अछि। वामदेव सन नैष्ठिक श्रमिकक प्रशंसासँ शुरुह भेल कथा, इन्द्रनाथ ठाकुरक एकटा चाटुकार कुबेर झाक तीख बात सुनिकए वामदेवक उपहासपूर्ण उक्तिअहाँ चिड़ै मनुक्खमे अन्तर नइँ बुझै छिएै, तँ हम की करी?’सँ समाप्त होइत अछि। बीच-बीचमे आओरो पात्रक जोग अइ कथाकें भैटै छै। मुदा वामदेवक विलक्षण चरित्रक कारणें थोड़बे कालक उपस्थितिक अछैत भरि कथामे चर्चित रहै छथि। वामदेव अपना गामक एकटा कर्मनिष्ठ, मेहनती, ईमानदार, उचितवक्ता, मानवीय, मुँहफट, ग्राम्य-प्रेमी अकड़ू व्यक्ति छथि। हुनका किनकहु -भय नइँ होइ छनि। अप्पन आत्मबलसँ जीवन-यापन केनिहार व्यक्तिकें कहिओ किनकहु भय कहाँ भेलै अछि!

वामदेवक समग्र चिन्ता अपना गामक विकास कृषि-संस्कृतिक पारम्परिक धरोहरक उत्थान दिश लागल रहैत अछि। मुदा कथा तीन स्तर पर विकसित होइत अछि। एक दिश वामदेवक नैष्ठिक मेहनतिक प्रशंसा गामक हरेक व्यक्ति करै छथि; मुदा हुनकर अकड़सँ गामक व्यक्ति कोनो ने कोने रूपें व्यथित रहै छथि। दोसर दिश इन्द्रनाथ ठाकुर जे गरीबीक कारण कोनो समयमे दूध बेचबाक अपन पिताक काजमे सहयोग करै छलाह। मुदा किशोरावस्थहिमे हरिदेवक पिटाइक भयसँ गाम छोड़ि पड़ा गेलाह; एकट्ठे अपन हैसियत बनाकए गाम घुरलाह। गामसँ भागल इन्द्रनाथ हरियाणा जाकए एकटा फार्म हाउस किनलनि। ओतए उन्नत कृषिक विकासमे लागि गेलाह। मूलोच्छिन्न हएबाक कोनो टा ग्लानि हुनका व्यथित नइँ करै छनि। गामक कैक गोटएक मदति केने छथिन। अइ बेर गाम आएल छथि खेती-बारी करएबा लेल कोनो निपुण श्रमिक ताकमे। गामसँ किसान जाकए ओतुक्का कृषि-कर्मकें उन्नत करए चाहै छथि। जेना अंग्रेज सब भारतसँ कारीगर जा इंग्लैण्डमे सामान तैयार करबै छल, तथापि भारतकें पछिलग्गू बूझै छल। तही लेल इन्द्रनाथकें एकटा निपुण व्यक्तिक खगता छनि।

एहने समयमे गामक अनेक चाटुकार वामदेव सन श्रमिक प्रशंसा कए इन्द्रनाथ सन सुखी-सम्पन्न व्यक्तिक कृपा-पात्र बनए चाहै छथि, विभिन्न तरहें प्रशंसा करैत हुनकर लिप्सापूर्तिसँ हुनकर भावनाकें सोहरबै छथि। काजुल वामदेवक हुनरक प्रशंसा सुनि इन्द्रनाथकें प्रतीत होइ छनि जे व्यक्ति हमर काजक योग्य सकैत अछि। एतए अर्थ-विस्तारसँ कथाकारक चतुराइ प्रकट होइत अछि जे समय कर्म-निष्ठा ज्ञान-कौशलक प्रशंसाक समय नइँ थिक; काजुल नैष्ठिक व्यक्तिकें उपभोक्ता-सामग्री बनएबाक उद्योगक समय थिक। इन्द्रनाथ अही उद्योगमे तल्लीन छथि। इन्द्रनाथक चाटुकार हुनकर लिप्साकें दिनाइ जकाँ कुरिया रहल छनि। कथाकार अइ धृष्टता दुष्टताकें कौशलसँ रेखांकित केलनि अछि।

इन्द्रनाथक चाटुकारितामे बैसल क्रियाशील लोक जखन वामदेवक प्रशंसामे की-कहाँ बजै छथि, तखन लोकनि ओकर खोराक सेहो करै छथि। एतबहिमे इन्द्रनाथक पिता अपन जाप रोकि कए बाहर अबै छथि अपन बात राख लगै छथि। गामक बुजुर्ग लोकनिकें सही बात कहबाक, अनुभूत सत्य कहबाक हिस्सक रहै छनि। कथाक अइ अंशमे कथाकार स्पष्ट देखौलनि अछि जे वृद्ध लोकनिकें आत्मज्ञानक अहंकार अनुभव सुनएबाक लालसा हरदम सवारे रहै छनि। विवरणमे अइ बातक स्पष्ट संकेत कथामे गम्भीरतासँ भेल अछि। कुबेर झा वामदेवकें इन्द्रनाथक संग हरियाणा जाकए हुनकर खेती-बारी सँभारबाक लालच दैत सहमत करबामे तत्पर होइ छथि। वामदेव हुनका लोकनिक हँसी उड़बैत कस्तूरी कक्काक उक्ति कहै छनि--पहिने चिड़ैकें जत जत सुविधा भेटै, तत तत उड़ि जाइ। मनुक्ख जकाँ चिड़ैक घर नइँ होइ छै। ने रौदी वा बाढ़िसँ लड़ि सकैए ने पालाकें फाड़ि सकैए, तें अनुकूल स्थिति तकैत उड़ैत रहैए। आब अपना ओहिठाम मनुक्खे उड़ि रहल, तँ आनठामसँ चिड़ै की आाएत।...लोक जखन कहलकनि जे बेतूकक किऐ करै छह, वामदेव उठिकए अपन गमछा झारैत चलि देलक।

वामदेवक स्वभाव एकटा काजुल व्यक्तिक आत्मविश्वासक प्रतीक थिक। लोक हुनका रोकलकनि, बजलाह जे लखनदइक बान्ह टूटि गलै अछि, गामक लोकक विचार भेलै अछि ओकरा बन्हबाक। हमहूँ कोदारि कए ओतहि जाएब। लोक प्रतिप्रश्न केलकनि जे तोहर ओतए कोनो जमीन नइँ छौ।...वामदेव कहलकनि--हमर जमीन नइँ अछि, मुदा ओहो हमरे गामक बाध छी ने!...

आत्मबोधसँ भरल वामदेवक उतारासार्थक जीवन सफल जीवन भेद स्पष्ट करैत अछि।सफल जीवन सम्बन्ध हरदमव्यष्टिसँ रहैत अछि जखन किसार्थक जीवन सम्बन्ध हरदमसमष्टिसँ, समाजसँ, सामाजिक सरोकारसँ।

गुण-कथा शीर्षक कथा तीन पीढ़ीक पारस्परिक व्यवहारक तानी-भरनीसँ बुनल गेल अछि। समाज-सेविका अंजनी देवी अपन बेटा-पुतौहुक संग जै घरमे रहै छथि, ओतए लगेमे एकटा मजदूर-कॉलोनी अछि, जैमे मजदूरक बीच रहिकए अपन जीवन सार्थक करए चाहै छथि। मुदा अंजनी देवीक बेटा-पुतौहुक वर्चस्वकें अइसँ ठेस लगै छनि? अंजनी देवीक पोता विदेशमे पढ़ै छनि। तीन पीढ़ीक अइ त्रिकोणमे सम्बन्धक एहेन वृत्त वृत्तान्त अइ कथामे बनैत अछि जे एकटा दार्शनिक शृंखला तैयार जाइत अछि। मजदूर संगें समय बिताएब ओकरा उत्थानक मार्ग दिश प्रेरित करब, अंजनी देवी लेल जीवन थिक; हुनका सन समाज-सेविकाक पोता हएबाक गौरवक संग विदेशी पत्रिकामे लेख छपाकए श्रेष्ठ कहाएब पोता लेल एकटा व्यापार; मुदा अंजनी देवीक बेटा-पुतौहु लेल हुनकर वर्चस्व खण्डित करबाक उद्यम। कथा फेरसँ सफल जीवन सार्थक जीवनक मर्मकें सूक्ष्मतासँ रेखांकित करैत अछि।

शिवशंकर श्रीनिवासक कथा पढ़ब एकटा रोचक काज थिक। हुनका मुँहें सुनब विरेचक आह्लादक; मुदा पाठ-विश्लेषण करैत हुनकर कथाक अनुशीलन श्रमसाध्य काज थिक; श्रमसाध्य थिक, तें फलदायी सेहो। मुदा कोनो एकटा निबन्धमे हुनकर लिखल सैकड़ा भरि कथा पर विचार करब सम्भव नइँ अछि। एतेक मूल्य-बोधित (वैल्यू-लोडेड) कथाक अवगाहन समय मिसियो भरि चूक भेलासँ कोनो पैघ संकेत अलक्षित रहि जेबाक खतरा हरदम बनल रहैत अछि। शेष कथा पर विचार हएब बाकी अछि। से फेर कहिओ...

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देवशंकर नवीन


[1]
आबादी : दस करोड़ चालीस लाख निनानबे हजार चारि सए बाबन

[2]
शिवहर, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा, सहरसा, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, भागलपुर, बाँका, मुंगेर

[3]
सन् 2011 जनगणनाक अनुसार कुल आबादी 4.9171685 करोड़ (चारि करोड़ एकानबे लाख एकहत्तरि हजार सए पचासी)

[4]
बेतियाक जनसंख्या 39.35042 लाख

[5]
कुल 5.3106727 करोड़ (पाँच करोड़ एकतीस लाख हजार सात सए सत्ताइस)

 

[6] ‘
लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया पाँचम खण्ड, ‘इण्डो-आर्यन भाषा समूह दोसर उपखण्ड, सन् 1903मे गवर्नमेण्ट प्रिण्टिंग इण्डिया, कलकत्तासँ प्रकाशित (पृ. 16)

 

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