प्रणव कुमार झा
रंगा सियार रिटर्न
एहि बेर रंगा सियार फेर बस्ती सँ जंगल घूरि आयल छल। मुदा ई ओ पुरान, अकस्मात् रंग में रंगा गेल आ भेद खुलिते हुलकैत भागि जाय बला सियार नै छल। समय बहुत किछु सिखा दैत अछि। अपन पुरखा के गलती पर रंगा सियार अपन टीम संग गहन शोध कयने छल। ओकरा लग जंगल विश्वविद्यालय सँ डिग्री नै, मुदा अनुभव आ चालाकी के एंटायर शोध अवश्य छल।
घुरबा सँ पहिनेहे ओ किछु परबा के मोटगर दाना दऽ कऽ अपन “पीआर” पर लगा देने छल। ओ सभ दिन-रात उड़ि-उड़ि कऽ जंगल के सभटा गाछक डाढ़ि पर दू गो बात के बीया छिटकैत फिरैत छल। “जंगल संकट में अछि। वर्तमान राजा आ ओकर कोटरी जानवर सभ के खा रहल अछि। ई अंतिम मौका अछि। एकटा असाधारण जीव आबि रहल अछि जकरा लग समाधान अछि। ई संकट साधारण जीव सँ नै टुटत। एकटा ‘विशेष जीव’ आबि रहल अछि जकरा में चमत्कारिक क्षमता अछि, जे युग परिवर्तन कऽ सकैत अछि।”
जंगल के भोला हिरण, श्रमजीवी भैंस, डरायल खरहा, आ एत्त तक कि गम्भीर हाथी सेहो धीरे-धीरे एहि कथा पर विश्वास करय लगल। जे बात बार-बार कहल जाय, ओ अंततः सत्य जकाँ प्रतीत होइत अछि। येन-केन प्रकारेण रंगा सियार के पुनः जंगल में एंट्री भेल। प्रवेश साधारण नै छल। जंगल के सीमा पर स्वागत-ध्वनि, पत्ताक बिछौना, परबा सभक लाइव-चहकाहट। ओही दिन जंगल में रौदो कनी बेसी चमकैत बुझाइत छल - कम से कम परबा सभ त एहनहि चित्र बनौने छल।
जल्दिए अपन तंत्र के बल पर रंगा सियार “युग-परिवर्तक” घोषित भऽ गेल छल। कखनो ओकरा “जंगल-पुरुष” कहल गेल, कखनो “अवतारी जीव”, कखनो “नॉनबायोलोजिकल सत्ता”।
गद्दी पर स्थापित होइतहि ओ अपन मनमाफिक राज करय लगल। निर्णय ओकर, नीति ओकर, दिशा ओकर। शौख मनोरथ सभटा पुरबय मे कोनो कमी नै। मुदा एहि बेर ओ पुरान गलती नै दोहराबैत छल। कखनो यदि किछु जानवर के चेतना में प्रश्न उठैत: “एहन जीव कखनो हमरा जंगल में देखायल नै छल, ई आखिर के अछि?” त तुरंत परबा सभ इंटरभ्यू लऽ कऽ प्रचारक आकाश भरि दै - ई ‘नॉनबायोलोजिकल’ नेतृत्व अछि।”
रंगा सियार के कखनो “हुआ-हुआ” कऽ नाचय-गाबय के मोन होइत छल। पुरखा के स्मृति कनी-कनी भीतर सँ फुँफकारैत छल। मुदा ओ सावधान छल। जखन उत्साह अधिक भऽ जाय तऽ ओ विश्वविजय के नाम पर दोसर जंगल के प्रवास पर निकलि जाय छल। ओतय की-की करैत छल - केकरा संग हुआ हुआ, केकरा संग की समझौता ई सब त वैह जानय छल आ आन जंगल के ओकर संगी सब। मुदा परबा सभ हर बेर मधुर आ गर्मजोशी बला तस्वीर, म्यूटेड वीडियो, स्लो-मोशन में हाथ हिलैत दृश्य प्रसारित करैत गर्वक इंजेक्शन डोज़ भरय - “देखू! दुनिया भरि के जंगल में अपन डंका बाजि रहल अछि!” जंगल के भोला जीव सभ ताली बजाबय। जकर पेट अंतरी मे लागल छल ओहो सब जंगल-गौरव के गीत गाबय लगैत छल।
धीरे-धीरे रंगा सियार के ट्रिक जंगल के किछु आर चलाक जीव सेहो सीखि नेने छल। कोनो भालू अपन इलाका में, कोनो बानर अपन डाढ़ि पर, कोनो लोमड़ी अपन घाटी में - छोट-छोट रंगा सियार पैदा होबय लगल। “रंगा सियार” सौंसे जंगल मे एकटा संस्कृति के रूप लेबय लागल छल। लोकल लेवेल पर सब अपन-अपन हिसाब सँ ऐ प्रवृत्ति के लाभ उठाबय लगल। सभके अपन परबा सभके अपन साम्राज्य।
जंगल में अजगुते स्थिति बनि गेल। ऊपर सँ फिटफाट, भीतर सँ मोकामा घाट। बाहर विकास, भीतर अवसाद। बाहर जयघोष, भीतर कराह। समस्या के चर्चा जंगलसंस्कृति के विरोध घोषित भऽ गेल। प्रश्न पूछनिहार खरहा के “नकारात्मक” कहल जाय लगल। आ जे सियार के रंग पर सवाल उठाबय, ओकरा “जंगल-विरोधी तत्व” ठहरायल जाय।
रंगा सियार के मेहनत, शोध आ तंत्र के प्रभाव एहन प्रबल छल जे ई सब अनवरत चलैत रहल। सत्य धीरे-धीरे पत्ता जकाँ सूखैत रहल, आ प्रचार वटवृक्ष जकाँ पसरैत रहल। जंगल के इतिहास मे एकटा नव अध्याय लिखा रहल छल जतय तथ्य असली नै, कथा असली बनि गेल। जतय एकटा परबा गाल फुला के कहय “facts are not facts”।
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
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