
कुमार मनोज कश्यप
लघुकथा- टीस
कक्का के मुईला उपरांत काकी के बेटा-पुतोहू लग शहर मे रहबाक अतिरिक्त आन कोनो टा उपाय नहिं रहलैन।
काकी के नुआँ ठाम-ठाम सs मसकि गेल रहैन। गाम-घर रहल तs लोक फाटलो-पुरान कि चेफड़ियो लगा कs पहिरने रहल; मुदा शहर-बाजार मे तs एना नहिं ने चलतै! अड़ोस-पड़ोस के लोक देखतै तs खिधांसे करतै! काकी के अपन बीतल दिन मोन पड़ि एलैन तs आँखि सs अश्रु-धार बहि गेलैन .... कक्का अपन जीबैत-जी चाहे जाहि धरानिये होईन; कोनो वस्तुक खगता कहियो होमय नहिं देलखिन। अपना अछैत फाटल की; पुरानो नुआँ-वस्त्र कहियो नहिं पहिरने देने हेथिन! पेटी कपड़ा सs हरदम भरले! अपने नजरि रखथिन … रंग जहाँ कनिये मलिन भेलै की खबासिन के दिया देथिन।
कैक बेर जाँतले स्वर मे नुआँ फटबाक चर्चो के आयास काकी केलनि; मुदा केयो कान-बात नहिं देलकैन। हारि-थाकि कs पोती सs सूईया-ताग मँगलैन जे सीबि लेती। समय पर नहिं सीने फाट तs बढ़िते जेतै! एक तs वृद्धावस्था के कारणे थड़थड़ाईत हाथ आ दोसर एहन काजक अनुभवहीनता, सूईया आँगुर मे भोंका गेलैन। पीड़ा सs मुँह सs 'माय गे माय’ के तेहन जोर सs स्वर बहरेलनि जे पुतोहू-पोती सभ दौड़ल जे की भs गेलै! काकी बिषविषाईत आँगुर के पकड़ने .... शोणितक बुन्न चुबैत! अश्रुपूर्ण कातर दृष्टिये सभ दिस तकैत जे केयो कोनो दवाई लगा देत .... पट्टी बान्हि देत! से तs भेलैन नहिं; उनटे शोणितक किछु बुन्न सोफा पर खसि पड़ल देखिते पुतोहू के तामस सभ सीमा पार कs गेलैन - 'दुर्र जो! ....... केहन अलबटाहि छैथ! नुआँ सीबs बैसली तs आँगुरे मे भोंकि लेली। देखथुन तs सोफा मे दाग कोना लगा देलखिन? आब ई दाग ओना छुटतै बिनु ड्राईक्लीन करेने? ओनाहे घर-खर्चा मोश्किल सs चलै छै तै पर सs ई बैसल-बैसायल जबर्दस्ती के खर्चा!....... सभटा हमरे कपाड़ पर बथायल छल।' भनभनाईत पैर पटकैत मुँह चमकबैत ओ दोसर घर चलि गेली।
हत्प्रभ काकी किछु बाजि नहिं सकल रहथि। केवल आँखि सs अश्रुधारा बरसाती नदी जकाँ सभटा बान्ह-कछेर तोड़ने अनवरत बहल जा रहल छल। सूईया के टीस त कहुना सहियो लेलनि, मुदा......!!!
-कुमार मनोज कश्यप, निदेशक, भारत सरकार , संपर्क : सी-11, टावर-4, टाइप-5, किदवई नगर पूर्व (दिल्ली हाट के सामने), नई दिल्ली-110023; # 9810811850; ईमेल: writetokmanoj@gmail.com
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