
जगदानन्द झा ‘मनु’
तीनटा गजल
1
की बनब चाहै छलौं हम कि बनि गेलौं
प्रेममे प्रियतम अहीँ केर सनि गेलौं
आश जे परिवारकेँ आब नहि रहलै
जेब खाली देख सब हीन जनि गेलै
सुधि रहल नै बोझ लदने अपन हमरा
प्रेम कनिको भेटते हम तँ कनि गेलौं
गाम सदिखन खूनमे अछि बसल हम्मर
छल लिखल परदेशके गाम मनि गेलौं
नेह अप्पन आब नै नेह टा रहलै
मोनमे बसि ‘मनु’ हमर साँस गनि गेलौं
(बहरे कलीब, मात्राक्रम 2122-2122-1222)
2
पोथीक तर दबि पढ़ुआ सगर मरि गेल
जे प्रेममे डूबल जीविते तरि गेल
सदिखन जतय मनमे छल डरक आतंक
अबिते अहाँके नव फूल फल फरि गेल
धरती तपल छल जे पानि बिन तरसैत
हथियाक हँसिते बरखा निमन परि गेल
आनक सुखक चिंता बेस अप्पन दुखसँ
डाहसँ कतेको घर तेल बिन जरि गेल
पाथरसँ ‘मनु’ शाइर बनि रहल अछि आब
तोरासँ जे मृगनयनी नजरि लरि गेल
(बहरे सलीम, मात्राक्रम - 2212-2221-2221)
3
ताड़ीमे कतए मद जे चाही जीबै लेल
माहुरमे कुन जीवन चाही जे चीखै लेल
बाँकी नै ताड़ीएटा टूटल मोनक लेल
जीवनमे एकर बादो बड़ छै पीबै लेल
सिस्टममे फाटल छै मेघसँ धरती धरि कोढ़
एतै कतयसँ दरजी ई सिस्टम सीबै लेल
जीतब हारब सदिखन लगले छै जीवन संग
फेरसँ उठि कोशिश नमहर हेतै जीतै लेल
मोनसँ करबै ‘मनु’ अप्पन जीवनकेँ तैयार
कर्मक बीया सगरो बहुते अछि छीटै लेल
(बहरे विदेह, मात्राक्रम 2222-2222-222-21)
-जगदानन्द झा ‘मनु’ मो० न० 9212-46-1006
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
