प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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परमानन्द लाल कर्ण                                                                         

बुढ़क दर्द 

रश्मिक जिनगी मे ओ दिन कखनहु भूलऽ वाला नहि छल, जखन हुनकर पतिदेव एहि दुनिया सँ विदा भऽ गेल छलाह । ओ एक साधारण किसान छलाह, मुदा मेहनत आ दूरदृष्टि परिवार के एकटा मजबूत नींव देने छल । गामक  पुरान घर जाहि मे दुई  टा  झोपड़ी छल, ताहि मे अपन चारु बेटाक लालन पालन केने छलाह । रश्मि एक मजबूत महिला छलीह । हुनका चेहरा पर सदिखन मुस्कान रहैत छल, जे हुनकर सहनशक्ति के देखवैत छल । मुदा घरवालाक देहावसान हुनका अंदर सँ तोड़ि देने छल । रश्मिक अनंत दुःखक शुरुआत भऽ गेल छल । चारु बेटा मे मनमुटाव आ बिखराव भऽ गेल छल । श्राद्ध कर्मक  बाद चारु बेटा जिनकर नाम मोहन, सोहन,अमित आ रवि छल गामक  हवेली मे एलेथि । मोहन सबसँ पैघ छल, ओ हाई कोर्ट मे वकील छलाह । दोसर बालक मोहन प्रखंड विकास अधिकारी छलाह, तेसर बालक अमित प्रोफेसर छलाह आ सबसँ छोट रवि सरकारी स्कूल मे मास्टर छलाह । चारुक  विआह भऽ गेल छल । चारु दियादनीक  लालन पालन नीक शहर मे भेल छल । सव गोटे चाय पी रहल छलाह तखन रवि जे सबसँ छोट छल, ओ कहलनि, “भैया, आव माय के की करव ?” अमित कहलनि, “ गाम मे माय असगरे कोना रहथिन ? हमरा सव के ड्यूटी पर जाय पड़त । एहि ठाम खेत अछि सभटा विलटि  जायत । किएक  नहि जमीन  बेच कऽ पाई हम सव बाँटि ली आ माय के हमसव अपना पास राखी । सोहन एहि बात पर सहमति दैत कहलनि, “ हाँ , ई  ठीक अछि मुदा माय किनका पास रहत ? हम तऽ दूनु आदमी काज करैत छी । हमरा रखवा मे दिक्कत अछि । माय के देखभाल कोना होयत ?” मोहन कहलनि, “हम चारि गोटे छी चारुक जिम्मेदारी अछि जे माय के राखी । एक-एक महीना सव गोटे राखू । एहि सँ किनको पर बोझ नहि पड़त ।” रश्मिजी ई सभटा बात किवाड़क पाछु ठाढ़ भऽ सुनि रहल छलीह । बोझ शब्द सुनि रश्मिजीक  दिल टूटि गेल, मुदा ओ चुप रहलीह । चारु भाई मे सबसँ छोट भाय रवि कहलनि, “ हम सबसँ छोट छी पहिले हमही माय के अपना पास राखि लैत छी । दोसर दिन रवि माय के अपना साथ लऽ आनलथि । छोट छीन घर छल जाहि मे दु टा  बेड रूम एक किचन आ एकटा हाॅल छल । एक  घर मे चौकी राखल छल  । चौकी पर विछौना बिछा कऽ माय के बैसेलथि आ हुनकर कपड़ा सव आलमीरा मे राखि देलखिन। रविक घरवाली खाना बनेलथि आ सभगोटे खाना खेलथि । राति मे रवि माय लग थोड़े देर बैसलथि किछु गप्प-सप्प केलथि तहन ओ सुतऽ चलि गेलथि।रविक घरवाली सेहो नौकरी करैत छलीह। भिनसरे उठि दिनक खाना बना कऽ राखि देलखिन आ अपना सासु माँ  सँ कहलनि, “ माँ जी, हम ड्यूटी पर जा रहल छी अहाँ खाना खा लेव। भानस बनल अछि।” रश्मिजी हाँ मे जवाव देलखिन । रश्मिजी अकेले घर पर टीवी देखैत छलीह व पुरान बात सोचैत दिन गुजारैत छलीह। एक दिनक  बात अछि रविक घरवाली कहलनि, “माँ जी अहाँ भनसा घर मे नहि जाउ । हम साँझ मे सव किछु बना लैत छी ।” रश्मिजी सोचलथि जे कनिया व्यस्त रहैत छथिन तें  कहलथि  अछि। एक दिनक बात अछि रश्मिजी के चारि बजेक बाद चाय पीवाक इच्छा भेल, तहन ओ भनसा घर मे चाय बना कऽ पी  लेलथि । साँझ मे जखन रविक घरवाली एलीह तहन भनसा घर गेला पर देखैत छथिन जे रश्मिजी चाय बना कऽ पीने छलथि। एहि पर ओ आगि बबूला भऽ गेलीह। ओ कहलनि, “माँ जी अहाँ के मना केने छलहुँ जे भनसा घर नहि जायव । मुदा फेर आई भनसा घर जा के गैस बर्बाद केलहुँ अछि। शहर मे सव किछु महँगा अछि, अहाँ नहि जानैत छी । ई सुनि रश्मिजीक दिल मे बड्ड चोट लगलनि । धीरे -धीरे समय बीतल महीनाक अंतिम सप्ताह मे रविक कनिया अमितक घरवाली सँ फोन पर बात करैत छलखिन जे दीदी महीना खत्म भऽ रहल अछि भैया के भेज देवै माँ के एहि ठाम सँ लऽ जेथिन। ओहि पर ओ कहलनि, “ठीक अछि, ई चलि जेताह आ माँ के एहि ठाम लऽ आनथिन । ई बात रश्मिजी सुनैत छलीह। सप्ताहक अंतिम दिन रश्मिजी अपन सव नुआ समेट  लेने छलथि मुदा अमित हुनका लेव’क  लेल नहि एलाह। रवि साँझ मे घर एलाह तहन हुनकर कनिया कहलनि, “आई भैया माँ के नहि लऽ गेलखिन। अहाँ हुनका लग माँ के पहुँचा दियोन ।” रवि अपना भाई अमित के फोन केलखिन  भैया माय के नहि लऽ गेलीयै । अमित कहलनि हम आई  व्यस्त भऽ गेल छी या तऽ अहाँ माय के हमरा एहि ठाम पहुँचा दियौ नहि तऽ काल्हि भिनसरे हम माय के  एहि ठाम लऽ आनव। ई  बात सुनि  रविक कनिया कहलनि, “भैया के छुट्टी नहि छैन तऽ अहीं माँ के पहुँचा दियौ।” रवि कहलनि, “ राति भरिक  बात अछि काल्हि भिनसर भैया हम पुछि लेव नहि एताह तहन हम माँ के भैया लग पहुँचा देव।” मुदा हुनकर कनिया ई  बात नहि मानलथि। हारि के माँ के अमितक  घर पहुँचा देलखिन। तहन ओ राहतक  साँस लेलथि। मने मन सोचलथि जे आव तीन मासक  छुट्टी भेल।

रश्मिजी अमितक घर एलीह तहन हुनकर कनिया घर खोललखिन माँ के देख हुनका गोर लागलखिन। गोर लागि हुनकर सामान सव एक घर मे राखि देलखिन। फेर चाय बना कऽ चाय आ बिस्कुट रश्मिजी के देलखिन। रवि अपना घर चली गेलाह। रातिक १० बजि  रहल छल। अमित कालेज से आवि सुति  रहल छलाह । अमित के पाँच सालक  एकटा बच्चा छल। ओकरा लऽ के अमितक घरवाली ई  कहि चलि गेलखिन जे माँ जी हम बौआ  के सुतावऽ जा रहल छी। अहाँ एहि घर मे सुति रहव। रश्मिजीक भूख लागल छल। ओ कहलनि, “कनिया, हमरा भूख लागल अछि, दुपहर मे खाना खेने छलहुँ सएह खेने छी। खायक  लेल किछु अछि तऽ हमरा दऽ दिअ।” एहि पर ओ कहलनि माँजी हम सव तऽ खाना खा लेलहुँ अछि। हम बौआ के सुतावऽ जा रहल छी । अहाँ फ्रिज खोलि के देखव जे राखल होयत से अहाँ खा लेव नहि तऽ हम बौआ  के सुता के आवि रहल छी। ई  कहि ओ चलि गेलीह । रश्मिजी बिछौना पर थोड़ेक देर इंतजार केलखिन, मुदा ओ नहि एलथि । तहन रश्मिजी भनसा घर मे जा के देखलखिन जे किछु खाना अछि कि नहि ? फ्रिज खोललखिन तऽ देखलनि के दुई टा रोटी राखल अछि, मुदा सब्जी नहि छल । रश्मिजी रोटी खा कऽ पानि पी लेलथि आ जा के सुति रहलीह। राति भरि गर्मी आ मच्छर सँ परेशान भऽ गेल छलीह। भिनसर पाँच बजे अमित के उठ’क  लेल आवाज देलखिन तऽ हुनकर घरवाली गुस्सा सँ बाहर आवि कहलनि, “माँ जी, भिनसरे नीन खराव नहि करु। काल्हि सँ सात बजे के बाद घर सँ बाहर आयव। हम सव देर राति मे सुतैत छी ।” एहि पर रश्मिजी कहलनि, “कनिया हमरा तऽ आदत अछि जे भिनसरे उठी। पाँच बजे के बाद तऽ हमरा नीन नहि आवैत अछि । कतेक करवट बदलैत रहु । ओहुना आई मच्छर बड्ड काटलक अछि ताहि सँ नीन सेहो नहि भेल अछि।” दिन बीतैत गेल पुतोहुक  व्यवहार कड़वा होयत गेल। रश्मिजी के लागैत छल जे अपने बच्चाक घर मे अजनबी भऽ गेल छी । रश्मिजी एहि ठाम एकटा नव चुनौतीक  सामना करैत छलीह। एक दिनक बात अछि रश्मिजी भनसा घर मे गेलीह तहन हुनकर पुतोहु कहलनि, “माँ जी अहाँ एहि ठाम की करव? हम भानस बना रहल छी।” एहि पर रश्मिजी कहलनि, “कनिया आई  तरकारी मे की बना रहल छी? कोनो तरकारी कम तेल मे बनायव ताकि पेट मे गैस नहि बने।अमितक घरवाली चुपचाप सुनि लेलेथि आ तरकारी मसालेदार बना रहल छलीह । दोसर तरकारी नहि बनेलथि।खानाक समय मे वएह मसालेदार तरकारी खेलथि जाहि सँ रश्मिजीक तबियत खराव भऽ गेल । रश्मिजी अमित सँ कहलनि, “ बौआ आई  पेट मे दर्द भऽ रहल अछि। कोनो दवाई अछि तऽ दऽ दिअ ।” एहि पर अमित किछु नहि बजलाह ।ओ चुपचाप काॅलेज चलि गेलाह । रश्मिजी सोचैत छलीह जे एहि बेटाक लेल हम सव कतेक जान दैत छलहुँ । कतेक कठिन सँ पालने छलहुँ, बेटा सभ के पढ़ेलहुँ ताकि सव बच्चा अपना पाइर पर ठाढ़ भऽ जाय आ आश छल जे बुढ़ापाक सहारा बनत, मुदा आई हम हिनका सवहक लेल किछु नहि छी। वएह बेटा हमरा बोझ मानैत छथि। रश्मिजी भरि दिन अकेले घर मे बैसल रहैत छलीह व समय काटवाक लेल टीवी देखैत छलीह । साँझ मे जखन अमित काॅलेज सँ आवैत छलाह तहन थोड़ेक देर बात करैत छल। फेर ओ अपन दुनिया मे रमि जायत छलाह । धीरे-धीरे एक माह बीत गेल। अमितक घरवाली अपना जेठानी सँ कहलखिन,“दीदी,माँजी के  एहि ठाम एक माह भऽ गेल अछि। आव अहाँ हिनका लऽ जाउ ।” एहि पर ओ कहलनि जे अमित के कहु जे माँ जी के एहि ठाम पहुँचा देथिन। अमित रश्मि जी के जेठ भाय सोहन लग पहुँचा देलखिन।

रश्मिजी सोहनक घर पर राति के १० बजे पहुँचलीह। अमित हुनका एहि ठाम छोड़ि अपना घर चलि गेलाह। सोहनक कनिया रश्मि जी के गोर लागि कहलनि, “आऊ  माँजी तबियत ठीक अछि ने?” एहि पर रश्मिजी कहलनि, “हाँ कनिया, अहाँ सव ठीक छी ने?” एहि पर ओ कहलनि, “हाँ माँजी, हम सव एहि ठाम ठीक छी।” रोहनक कनिया एक कप चाय बना कऽ रश्मिजी के देलखिन । ओ चाय पीव पुतोहु सँ कहलनि जे कनिया हम चाय पी  लेत छी, मुदा हमरा भूख लागल अछि। आई दुपरहक खेने छी, किछु अछि तऽ हमरा दऽ देव तहन अहाँ सुतऽ जायव। एहि पर ओ कहलनि, “माँ जी हम सव तऽ खाना खा लेलहुँ अछि, मुदा फ्रिज के देखव जे होयत सा अहाँ खा लेव। हम रोहन के सुतावऽ जा रहल छी। हम रोहन के सुता कऽ आवि रहल छी।” सोहनक  घर एक पैघ एपार्टमेंट मे छल । जाहि मे चारि टा बेड रूम छल,तीन टा बाथरूम छल आ एकटा हाॅल छल । रश्मिजी थोड़े देर विश्राम केलाक  बाद फ्रिज खोललथि तहन ओ देखैत छथिन जे एकटा बाटी मे खीर राखल अछि। ओ खीर खा के फेर ओहि सोफा पर बैसि गेलीह। रोहन सुति  रहल तहन हुनकर पुतोहु एलखिन । ओ कहलनि, “ माँजी, किछु खेलहुँ की नहि?” ओहि पर रश्मि जी कहलनि, “ हाँ कनिया, फ्रिज मे एकटा बाटी मे खीर छल, से हम खा लेलहुँ अछि। आव हम किछु नहि खायव।” तकर बाद रश्मिजी बगलक एकटा घर खोलि देलखिन आ कहलनि, “माँजी, एहि घर मे सुति  रहु।” घर मे पंखा तऽ छल मुदा पंखा सँ हवा नहि लागि रहल छल । नव जगह भेलाक  कारण रश्मिजी के नीन नहि एलनि। राति भरि कछ-मछ करैत रहलीह । भिनसरे रश्मिजी घर सँ उठि सोफा पर बैसि रहलीह । रश्मिजी सोहन के आवाज देलखिन, “बौआ,चाय बना दी?” ई  सुनि हुनकर पुतोहु घर सँ बाहर आवि कहलनि, “माँजी, एतेक भिनसर हमरा सव के नहि उठावु । हम सव सात बजेक  बाद उठैत  छी । अहाँक इच्छा अछि तऽ भनसा घर मे अहाँ अपना लेल  चाय बना लिअ । अखन रोहन आ रोहनक पापा सुतल छथि।” रश्मि जी भनसा घर मे गेलीह चाय बना कऽ सोफा पर बैसि चाय पिलथि । सोहन दूनु प्राणी सात बजेक बाद उठलथि चाय पीव रोहन के नाश्ता बना कऽ स्कूल भेज देलखिन । तकर बाद जल्दी जल्दी खाना बना कऽ तैयार भेलीह आ दूनु प्राणी ऑफिस चलि गेलथि। रश्मि जी अकेले घर मे नहा धो के खाना खेलथि । भरि दिन कखनहु खिड़की सँ बाहर देखैत छलखिन तऽ कखनहु टीवी देखैत छलीह ।एक दिनक बात अछि रश्मिजी के पुरान बात एलनि । ओ सोचलथि जे आई बैगनक भरवा बनायव। पुतोहु सँ कहलनि, “दुलहिन, आई अहाँ सवहक ऑफिस बंद अछि। अहाँ कहि तऽ आई  हम बैगनक भरवा बना दी ? एहि पर ओ कहलनि, “नहि माँ जी, हमरा सव के बैगनक भरवा नीक नहि लागैत अछि। रोहन सेहो बैगन देख नाक भौं सुकड़ैत रहैत अछि । ओना अखन बैगन घर नहि अछि जे अहाँ बनायव।”  रश्मिजी कहलनि, “ठीक अछि, जौं ओ नहि अछि तहन सादा खाना बना लिअ।” मुदा ओ किछु नहि बजलीह । ओ अपना हिसाव सँ भानस बनेलथि । जखन रश्मिजी के खाना देलखिन तऽ थारी मे राजमा आ भात छल ।ओ भात खा लेलथि मुदा थोड़े देर बाद हुनका पेट मे दर्द होमय लागल । पेटक दर्द सँ परेशान भऽ गेलीह राति मे नीन नहि भेलनि । भिनसरे सोहन के कहलखिन, “बौआ, हमर मन खराव लागैत अछि। पेट मे दर्द भऽ रहल अछि, दवाई लेने आयव ।” सोहन मायक बात सुनि अनठिया देलखिन आ दवाई सेहो नहि आनलखिन । धीरे-धीरे समय बीत रहल छल । दिन मे अकेलापन, साँझ मे बेमनक भोजन, राति मे गर्मी आ मच्छर सँ रश्मिजी परेशान छलीह । महीना मे दुई दिन बाकी छल तहन मोहन अपना भाई सँ कहलखिन, “छोटे, हमरा सासुर मे विआह अछि से हम सव जा रहल छी। एहि महीना अहाँ माय के अपने पास राखि लेव । अगिला मास मे माय के दुई मास राखि लेव ।” ई सुनि सोहन दूनु प्राणी चिंतित भऽ गेलथि। सोहन अपना भाई सँ कहलखिन, “भैया बच्चा के छुट्टी भऽ रहल अछि तें हम सव घुमऽ जा रहल छी। टिकट कटि गेल अछि आव माय के किनका लग राखू ?  रश्मिजी ई सभटा बात सुनैत छलीह। हुनकर दिल टूटि रहल छल। साँझ मे बिछौना पर लेटल ढ़व-ढ़व नोर गिर रहल छल। ओ सोचैत छलीह जे चारु बेटा हमरा फुटबाॅल बना देलक अछि । हुनका पुरान बात सभ यादि आवि रहल छल । कोना चारु के पढ़ाई लिखाई करेलहुँ। चारु के विआह केलहुँ । सोचैत छलहुँ जे बेटा नीक शहर मे रहत तहन समय नीक सँ कटत । मुदा एहि ठाम अकेलापन छोड़ि किछु नहि अछि । आव बर्दाश्त सँ बाहर भऽ गेल अछि, कहवाक लेल किछु नहि अछि । हम अपन फैसला खुद लेव ।

रश्मिजी सोचलथि जे किएक  नहि हम गाम चलि जाय। ओहि ठाम अपन खेत पथार  देखव बटायदार सव की देत नहि देत तकर कोनो ठेकान नहि अछि।सोझा मे रहव तहन खेतक जे उपजा होयत ओकरा जरूरत भरि राखि बेच लेव । एहि ठाम डगराक बैगन बनल छी । ई  सोचि सोहन सँ कहलनि - “बौआ, आव तऽ अहाँ लग एक मास बीतऽ वाला अछि। मोहनक सासुर मे विआह अछि तें ओ सासुर जा रहल छथि ।” एहि पर सोहन कहलनि -”माँ की होयत अहाँ एहि ठाम दिक्कत होयत अछि तहन हम रवि आ अमित सँ बात करैत छी, ओ लोकनि अपना घर पर रहताह तहन हम हुनका लग अहाँ के पहुँचा देव।” रश्मि जी कहलनि - नहि बौआ, हम सोचि रहल छी जे किछु दिनक लेल गाम चलि जाय । अहु ठाम खेत पथार अछि, की उपजा होयत से देख लेव। जे अन्न  बेचऽ वाला होयत ओकर बेच लेव। तें अहाँ हमरा गाम पहुँचा दिअ । सोहनक  कनिया कहलनि - “ हाँ माँ जी, ई चारु भाई खेत बेचऽ चाहैत छलाह, मुदा छुट्टी नहि भेलनि जे गहकी ठीक कऽ बेचताह ।जा धरि खेत नहि बेचल जायत अछि ता धरि ओकर देखभाल करनाई आवश्यक अछि ।” सोहन कहलनि -”ठीक अछि माँ, हम अहाँ  दुई दिन बाद अहाँ के गाम पहुँचा देव। रश्मिजी कहलनि, “काल्हि तऽ अहाँक  छुट्टी होयत किएक  नहि काल्हि हमरा गाम पहुँचा दैत छी।” सोहन अपना गाड़ी सँ भिनसरे रश्मिजी के गाम पहुँचा देलखिन । रश्मिजी गाड़ी सँ उतरि अपन पुरान झोपड़ी देखलथि, जेकर दिवार जर्जर भऽ गेल छल । आँगन मे घास-फूस जमि गेल छल, मुदा रश्मिजीक मन प्रसन्न छल । अपन बैग राखि घरक किवाड़ खोललथि । घरक अंदर धूलक मोट परत जमल छल । कुर्सी निकालि घरक बाहर बैसि गेलीह आ राहतक  साँस लेलथि । ओ सोचि रहल छलीह जे सुकून शहरक चमचमाईत घर मे नहि मिलैत अछि जे सुकून एहि कच्चा मकान मे अछि । घरक सफाई कऽ बिछौना सव ठीक केलनि आ भानस बना के खाना खेलथि । राति मे खाना खा कऽ सुति रहलीह । बाहर तारा चमकि रहल छल । चानक  रोशनी खिड़की सँ आवि रहल छल । मच्छर तऽ छल मुदा मच्छरदानी लगा लेला पर मच्छरक  प्रकोप कम छल । शहरक गरम हवा आ उमस सँ दूर एहि ठाम रश्मिजी सुकून सँ सुति रहलीह । दोसर दिन भिनसरे पाँच बजे उठलीह हाथ-मुँह धो कऽ पानि गरम केलीह आ कुर्सी पर बैसि पानि पिबैत मने मन सोचि रहल छलीह जे आई सँ हम अपन जिनगी खुद जीयव । ककरो पर आश्रित नहि रहव । भिनसर सँ घर-आँगन साफ केलथि तकर नहा-धो के भानस बनेलथि । साँझ मे किछु सामान लेवक लेल बाजार जायत छलथि तहन पड़ोसक किछु लोकनि रश्मिजी के मिललनि तऽ आश्चर्य सँ ओ कहलनि, “रश्मिजी अकेले आयल छी कि बालक सभ आयल छथि।” एहि पर रश्मिजी कहलनि, “बेटा सभ के नौकरी मे छुट्टी कहाँ मिलैत अछि, तें ओ सव नहि एलथि ।” रश्मिजी बाजार सँ चाउर,दालि  आ  हरियर तरकारी सव खरीद के आनलथि । साँझ मे अपना चूल्हा पर मनपसंद सादा खाना बनेलथि आ मन भरि खाना खेलथि । हुनका आई भोजन सँ संतोष मिललनि । धीरे-धीरे समय बीतल, रश्मिजीक  मन स्थिर भऽ रहल छल ।                

एक समयक बात अछि रश्मि जी अपन पुरान घर के तोड़ि पक्का मकान बनावऽ चाहलथि तहन बेटा सव मना कऽ देने छल। हुनकर घरवाला सहो कहैत छलाह जे मकान लऽ के की  करव ? बेटा सव शहर मे रहत एहि ठाम के रहत ? ई  सोचि गाम मे कच्चा मकान रहऽ देने छलथि । रश्मिजी सोचलथि जे आव एहि कच्चा मकान के बग़ल मे दुई कमराक पक्का मकान बनावी । रश्मिजी एक बटायदार के बजा कऽ कहलनि, “हम किछु जमीन बेचऽ चाहैत छी । कोनो खरीददार होय तहन कहव ।” गामक  पुरान वकील के बजा कऽ जमीनक पेपर सव देखेलखिन आ हुनका सँ राय लेलथि जे हम कोन जमीन बेच सकैत छी । जमीनक कागज देखि वकील साहेब कहलनि जे सभटा जमीन अहींक  नाम सँ अछि । जे जमीन चाहव से बेच सकैत छी । एक सप्ताह मे जमीनक सौदा पक्का भऽ गेल । कोनो बेटा सँ राय लेने बिना जमीन बेच के बैंक मे पाई राखि लेलनि । रश्मिजी एकटा ठेकेदार के बजेलथि । पुरान घरक दोसर भाग मे दुईटा मकान, भनसा घर आ बाथरूम बनेलथि । घर मे सव सुविधा- पंखा,कूलर,एसी आ इन्वर्टर लगा लेलथि  । बिजलीक ओतेक समस्या गाम मे नहि छल तें एक कमरा में एसी सेहो लगा लेलथि, दोसर कमराक लेल कूलर खरीद लेलथि ।आव घर मे शहरक सव सुख सुविधा उपलब्ध भऽ गेल । रश्मिजी अपना मनोनुकूल भिनसरे पाँच बजे उठि पूजा पाठ करैत छलीह तकर बाद चाय बना कऽ पीवैत छलीह । दुपहरिया मे भनसा घर मे मनोनुकूल भानस बना कऽ खायत छलीह । साँझ मे बाहर लॉन मे बैसैत  छलीह । जमीन सवहक देखभाल करवाक लेल एकटा नौकर राखि लेने छलीह । राति मे गहींर नीन सँ सुतैत छलीह । किछु दिनक बाद मोहन के ख्याल आयल जे माँ के एहि ठाम लऽ आवि कारण सव भाई माय के एक-एक मास राखने छलथि,मुदा ओ नहि राखने छलाह तें ओ माँ के शहर लऽ जेवाक लेल एलाह । एहि ठाम आवि ओ स्तब्ध रहि  गेलाह । ओ देखलथि जे एहि ठाम कच्चा मकानक  संग एकटा  पक्का मकान बनि गेल अछि । मोहन माय के गोर लागलखिन आ माय सँ कहलनि जे माय अकेले अहाँ एहि ठाम की करव चलु शहर हमरा एहि ठाम रहव । रश्मिजी साफ मना करैत कहलनि जे नहि बौआ  हम आव कतहुँ नहि जायव । जखन धरि हाथ पाइर मे दम अछि ता धरि हम कतहुँ नहि जायव ।

एक दिनक बात अछि चारु भाई गाम एलाह तहन रश्मिजीक  ठाठ बाट  देखि आश्चर्य चकित भऽ गेलाह । ओ अपना माय सँ कहलनि, “ माय एतेक पाई अहाँ किएक बर्बाद केलहुँ । एहि ठाम के रहत ? अहाँक  तबीयत  खराव होयत तहन के देखत ।शहर चलु हम सव अहाँ के राखव आ एहि ठामक  जमीन बेच लैत छी ।” रश्मिजी कहलनि, “ अहाँ सव अपन -अपन देखू ,इएह जमीन सँ अहाँ सवके एहि लायक़ बनेने छी ।अहाँ सवके जखन इच्छा होय एहि ठाम आवि सकैत छी, मुदा जमीन नहि  बीकत ।जहाँ  धरि ज़मीन बेचवाक प्रश्न अछि अहाँ हमरा रहने जमीन नहि बेच सकैत छी । हम मिश्रजी वकील साहेब के जमीनक  सभटा कागज देखा लेने छी । तें अहाँ सवके अखन कोनो हक नहि अछि ।” अपन मायक बात सुनि सव अचंभित रही गेलाह आ दुई दिनक बाद आव किओ अपना - अपना ड्यूटी पर चलि गेलाह । शहर जायत खन बेटा के रश्मिजी कहलनि जे अहाँ सव जमीन मे हक चाहैत छी तहन मास मे कोनो ने कोनो भाय  एहि ठाम आवैत रहव अन्यथा हम जमीन कोनो ट्रस्ट के दऽ देव । चारु भाई विचार केलथि जे जौं हम सव गाम नहि आयव तहन करोड़ोक धन माय केकरो दान कऽ देथिन तें सव मास कोनो एक गोटे आवि माय के हाल चाल लऽ लेल जाय । एकर बाद जमीनक  लोभ सँ प्रत्येक मास कोनो ने कोनो भाय गाम आवि मायक हाल चाल लैत रहैत छलाह । रश्मिजी आराम सँ अपना घर मे जीवन बसर करऽ लागलीह ।

 

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