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लालदेव कामत

बाँकी जीवन : अनुभव, जिम्मेदारी, आ अर्थक खोज


मधुबनी जिलाक बेरमा ग्रामवासी वरेण्य साहित्यकार श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीके 'ठुठ गाछ' मैथिली उपन्यास तँ २०१५ ई० मे मुद्रीत भऽ गेल रहय,जकर पाँचम संस्करण सन् २०२४ मे पल्लवी प्रकाशन निर्मली सँ निकलल छल। एहिके आई एस बी एन ९७८९३८७६७५२५४ छै। ऐ पोथिक लोकार्पण श्री कमलेश झा जीक कर कमल सँ भेल अछि। संशोधित ई- पोथी संस्करण - २०२६ ई०मे बहराए गेल हेन। सद्यप्रकाशित उपन्यासमे एकमात्र स्त्री पात्रक नाम छैक -: सुभद्रा आ पुरुष पात्रमे प्रो० रामकृष्ण, साहित्यसेवी- धीरेन्द्र,सिनुरिया उर्फ़ श्याम सुंदर - मशाला भौरीबाला, अच्छेलाल - नामी चाहबाला, फोंचाई दास एक पितमरू जौन आर राधाचरण काका- पड़ोसी, सीबीआई सँ सेवानिवृत्त । कथाक्रम सुखान्त आरंभ म रहैछ तँ आखरिमे दुखान्तक खबेर दूरदेश सँ पड़ोसी माध्यम वार्ता सँ परिलक्षित होईछ।
२८,४७४ शव्दमाल सँ गंथल " ठूठ गाछमे " कोनो असाधारण नायकके कथा नै छै। ई एकटा एहन साधारण आदमीके कथा छै जे अपन जीवनक बेसीरास समय अपन जिम्मेदारीके निर्वहनमे बिता देने छै । आब जीवनक बादक अवस्थामे सोचय लगैत छथि जे हुनका जे समय बचल छनि तकर असली अर्थ की छनि ।
ई उपन्यास जीवनकेँ उपलब्धि वा उत्कृष्टताक दौड़ नहि बुझैत अछि । ई जीवनके विराम, धक्का, आत्मनिरीक्षण, आरू नया अर्थक खोजके प्रक्रियाक रूपमे प्रस्तुत करैत छैक ।
उपन्यासक आरम्भ गोधूलि बेला गहींर होइत अन्हार आ ठूठ भेल गाछक दर्शनसँ होइत अछि । एहनेके वैद्यनाथ मिश्र " यात्रीजी" पत्र हीन नग्न गाछ धरि कहने रहथि। ई दृश्य मात्रे वातावरण बनेबा सँ आगूए नै बढ़ि गेल अछि ; वरन् ई समस्त रचनाक केंद्रीय प्रतीक बनि जाइत अछि । ठूठहा गाछ जीवित अछि, तइयो सक्रिय अछि। ई समयक मौन गवाह अछि, बहुत किछु देखि चुकल अछि, से आब काज करबा मे असमर्थ अछि । ई प्रतीक वृद्ध रामकृष्ण बाबूक जीवन सँ गहींरतल धरि जुड़ल अछि । ओकर देह एखनो सक्रिय अछि, चेतना सतर्क रहैत छैक, तइयो ओ धीरे-धीरे जीवनक मुख्यधारा सँ विरक्त भ' रहल अछि । एतय ठूठ भेल गाछ मृत्युक संकेत नहि दैत अछि; ई ओहि जीवन दिस इशारा करैत अछि जे एखनो बाँचि गेल अछि।

सन् 1925 सँ शुरू भेल रामकृष्ण बाबू 'क जीवन स्वतंत्रता आन्दोलन, जमींदारी व्यवस्था, भूमि संघर्ष, आ स्वतंत्र भारत 'क सामाजिक विडंबना' क बीच आकार लैत अछि । उपन्यासकार श्री मंडलजी अपन व्यक्तिगत जीवन केँ इतिहासक व्यापक धाराक भीतर स्थापित करैत छथि । एकरे परिणाम ई छै जे कथा ग्रामीण भारत केर सामूहिक यात्रा सँ कम नहिं,एक व्यक्तिके विषयमे कम अवश्य होय छै ।
भारतके किसान आ गाम आधारित समाजके रूपमे चित्रित करब ,लेखक स्थापित करैत छथि जे गामक उपेक्षा राष्ट्र केँ भीतर सँ क्षीण करैत अछि । जमीन आ जमींदारिता मात्र राजनीतिक संरचनाके समस्या नहिं थिक; ई सब मानव विघटनके संरचना सेहो छैक।
रामकृष्ण केरऽ जन्म जमीन मालिक परिवारमे होय छै, परंच परिवार केरऽ विघटन जल्दीमे खुजि जाय छै । सम्पत्तिक क्षरण, आ पिताक मृत्यु आओर भाय - बहिनक बँटबारा हुनका समय सँ पहिने जिम्मेदारीमे धकेलि देलकनि । पूरा परिवारक भार हुनके कान्ह पर पड़ैत छनि । एहिठाम उपन्यास संयुक्त परिवार सँ व्यक्तिगत जिम्मेदारीमे संक्रमणके आत्मीयता सँ दस्तावेजीकरण करै छै । रामकृष्ण नै विद्रोह करैत छथि आ नै परिस्थिति सँ भागैत छथि । ओ परम्परागत रूपेँ चुपचाप जिम्मेदारी लैत छथि-ई हुनकर संघर्ष छनि, आ ई हुनकर नैतिकता छनि।
रामकृष्णके लेल शिक्षा आत्म-विकासके साधन आरू पारिवारिक जिम्मेदारीके निर्वहनके साधनो छै । ओना उपन्यासमे ई स्पष्ट कयल गेल अछि जे शिक्षा अपने आपमे मुक्ति नहि थिक । सामाजिक संरचना असंतुलित रहैत अछि त शिक्षित व्यक्ति सेहो बान्हले भ' जाइत अछि ।
खेती-बारीके अछैत रामकृष्णके एहि सँ दूरी बदलैत सामाजिक मानसिकताक दिश इशारा करैत अछि, जतय शिक्षा आ कृषिके बीचक अंतर लगातार बढ़ैत जा रहलैक अछि । ई अन्तर खाली पेशे केर नै छै, बल्कि मनोवृत्तिके सेहो छै ।
रामकृष्ण कोसी क्षेत्रमे शिक्षक बनि सीमित आय, जोखिम, आ त्यागक जीवन स्वीकार करैत छथि | हुनका महापुरुषक रूपमे चित्रित नहि कयल गेल अछि । ईमानदार आ कर्तव्यनिष्ठ छथि, मुदा साधारण आदमी। ओकर विधवा माय ओकर जीवनक नैतिक केन्द्र बनि जाइत छैक ।
भूख आ संकल्पक विपरीतता उपन्यासक एकटा मार्मिक बिन्दु अछि । भूख सहनाइ आ संकल्प पूरा करब एक समान नहि अछि, आ लेखक एहि भेद केँ गहींर संवेदनशीलताक संग प्रस्तुत कयलाह अछि ।
रामकृष्णक आत्मसंवाद जीवनक विविधता, दिशाहीनता, आ आन्तरिक खोजकेँ उजागर करैत अछि । एतय जीवन संघर्ष केर घोषणाके रूपमे नै अपितु जिम्मेदारीके मौन स्वीकारके रूपमे उभरैत अछि |आओर कर्मके प्रवचनके रूपमे प्रस्तुत नै कयल जाइत अछि, ओकर अर्थ रोजमर्राके श्रम, ईमानदारी आ आत्मसंयममे भेटैत अछि |
उपन्यासकार शुरूए सँ स्पष्ट क' दैत छथि जे ई वीरताक नहि अपितु स्थायित्वक ​​कथा थिक; उदात्तताक बात नहि अपितु स्थिरताक विषय मे। एतयके जीवनके अपन जड़िके परीक्षाके रूपमे देखल जाइत अछि।
दोसर चरणमे रामकृष्णक सबसँ पैघ आन्तरिक संघर्ष स्पष्ट भ' जाइत अछि । एम.ए. करबाक इच्छा सालों सँ अछि, मुदा एकरा व्यवहारमे उतारबाक साहस देरी सँ विकसित होइत अछि। साहित्य आ अर्थशास्त्रक बीच सदिखन फाटल रहैत छथि । समय बढ़ैत अछि, आ निर्णय बेर-बेर स्थगित भ' जाइत अछि। अंतमे ओकरा ई अहसास होय छै कि लक्ष्य खाली इच्छाके माध्यम सँ नै, बल्कि अनुशासन आरू समयके सही उपयोगके माध्यम सँ प्राप्त होय छै । संकल्प बनैत छैक, मुदा तखने एकर माय आ छोट भाइ-बहिनक जिम्मेदारी स्पष्ट भ' जाइत छैक। आत्म-विकास आ पारिवारिक दायित्वक ​​बीचक ई द्वंद्व ओकर सम्पूर्ण जीवनक क्रम निर्धारित करैत अछि ।
तेसर चरणमे उपलब्धि भेटैत अछि, मुदा ओकर संग नव जटिलता सेहो अबैत अछि। एम.ए. स्वतंत्रताक बादक सामाजिक परिदृश्य, संस्थाक निर्माण, आ गामक स्थिरता सब किछु ध्यानमे अबैत अछि । रामकृष्णजी राम कृष्ण कॉलेजमे पढ़ेबाक आकांक्षा आ आर्थिक सीमाक बीच संघर्ष करैत रहैत छथि । पंडौल कॉलेजमे हुनकर नियुक्ति हुनकर जीवनमे एकटा मोड़ अछि, मुदा एकर पूर्ण समाधान नहि अछि। लेखक ई दर्शाबै छैथ कि व्यक्तिगत यात्रा शिक्षा व्यवस्था, अवसरके असमानता, आरू राष्ट्रीय यथार्थ केर संग गहराई सँ जुड़ल छै ।
चारिम चरणमे प्रोफेसरक जीवन बेसी स्थिर भ' जाइत छनि. दरमाहा बढ़ैत अछि, सम्मान भेटैत अछि, आ पढ़ाई आ पुस्तकालयक दुनिया खुजि जाइत अछि। मुदा एकर संग-संग सामाजिक अलगाव सेहो बढ़ैत अछि । रामकृष्ण धीरे-धीरे गामक जनजीवनसँ हटि जाइत छथि । ओकर दुनियाँ किताबमे सिकुड़ि जाइत छैक। एतय उपन्यास एकटा मौन प्रश्न ठाढ़ करैत अछि जे समाज सँ कटल विद्वानक लेल कोन सामाजिक भूमिका रहि जाइत छैक ?
पाँचम चरण मे रामकृष्णक साहित्यिक साधना उभरैत अछि । कविता, गीत, डायरी, संगीत हुनका भीतर बहैत अछि । अपन संग्रह प्रकाशित करैत छथि आ एकरा अपन जीवनक विशेष उपलब्धि मानैत छथि । मुदा समाजक प्रतिक्रिया हुनक अपेक्षासँ कम अछि । पोथी नहि बिकाइत अछि, आ ओकरा कोनो सराहना नहि भेटैत छैक। ई क्षण गहींर मार्मिक अछि। लेखक स्पष्ट करैत छथि जे लेखन एकटा व्यक्तिगत साधना थिक, मुदा एकर टूटब सामाजिक उपेक्षा सँ सेहो जुड़ल अछि । एतहि रामकृष्ण आलोचना आ अनुवाद दिस मुड़ैत छथि । ठूठ बनब खाली उम्रके परिणाम नै छै, सामाजिक निराशाके परिणाम सेहो खूब छै।
छठम चरण उपन्यासक सांस्कृतिक विस्तार अछि । गामक मंच, साहित्यिक आयोजन, आ विभिन्न क्षेत्रक विद्वानक उपस्थिति गामक बौद्धिक जीवन केँ जीवंत करैत अछि | धीरेन्द्र आ रामकृष्णक वर्षोंक दूरी संवादमे परिणत भ' जाइत अछि । ई भाग ई दर्शाबै छै जे संबंधके गहराई समय सँ नै, संवाद सँ बनल होय छै ।
सातम चरण सेवानिवृत्ति अछि। ई खाली कैरियर केर अंत नै छै, ई पहचानके संकटो छै। पेंशन अछि, घर अछि, मुदा काज नहि। रामकृष्ण सवाल उठबैत छथि जे बिना श्रमके मर्यादा आ अर्थ कोना जीवित रहत। सुभद्रा संग हुनक वैवाहिक तनाव एहि शून्यता सँ निकलैत अछि । एहि खंडमे घरेलू जीवनक सूक्ष्म मनोविज्ञान केँ बिना कोनो मेलोड्रामाक संवेदनशीलता पूर्वक प्रस्तुत कयल गेल अछि |
आठम चरणमे जीवनक शेष भागक दिशा स्पष्ट होइत अछि । तीन बेटा, तीन अलग-अलग जिबिका संसार, आ रसे-रसे टुटैत पारिवारिक संरचना उभरैत अछि। सुभद्राक व्यावहारिक बुद्धि आ आत्मसम्मान कथ्यक संतुलन बना दैत अछि । अंततः सृष्टिक विचार निर्णायक रूप लैत अछि । गीताके अनुवादक प्रकल्प केवल एक कार्य तक सीमित नै छै; हेरायल अर्थक पुर्नप्राप्तिक साधन बनि जाइत अछि । "अपन कर्तव्य करू" एतय प्रवचनक रूपमे नहि देखाइत अछि; जीवनके समझै आओर जीबैके दृष्टि बनि जाय छै।
ठूठ गाछ अर्थात "शेष जीवन" ई दर्शाबै छै जे जीवनक अंतिमो चरण निरर्थक नै छै । चेतना जागि गेल तऽ जीवनक शेष भाग सेहो सृष्टिक अवसर बनि सकैत अछि ।
रामकृष्ण बाबू ठूठ जकाँ छथि, मुदा हुनकर जड़ि एखनो जीवित अछि । ओ जड़ि ओकरा जीवनसँ जोड़ने रहैत छैक । आखरि क्षणमे मिथिलाक रामपुर- कृष्णपुर,पण्डौल- झंझारपुर क्षेत्र सँ बाहर दूर देशमे छथि।
एहि उपन्यासमे कोनो सहज निष्कर्ष नहि भेटैत अछि । ई जीवन केर ऐहन सवालके ताकि संबोधित करैत छै जे निठाहे अनुत्तरित रहै छै । ठूठ गाछ कहू वा "जीवन'क शेष" हमरा सब पाठकके ई विचार करय लेल बाध्य करैत अछि जे ,जे बचल अछि जीवन ओ भरिसक सबसँ बेसी मूल्यवान छैक।

रामकृष्ण बाबूक जीवनमे जे विराम आ आत्म निरीक्षण होइत छैक से एहि रचनाक सार थिक ।
- लाल देव कामत
, नौआबखर मो० ७६३१३९०७६१

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