'असमंजसी मध्यममार्गी'कथाशिल्पी शिवशंकर श्रीनिवास (सेनुरहार'कथा केर संदर्भमे)
शिवशंकर श्रीनिवाससँ हमर एकमात्र साहित्यिक भेंट नीक नहि रहल। नवटोलमे २० दिसम्बर २०१५क आयोजित अन्तरराष्ट्रिय मैथिली परिषदक दोसर 'कथा कुम्भ' मे ओ आएल छलाह। मैथिलीक नामी कथाकार किन्तु कथा गोष्ठीक सामान्य नियम जे अप्रकाशित कथा पढ़ल जाए केर जगह ओ अपन पोथीसँ एक प्रकाशित कथा पढ़ि देलाह किन्तु अध्यक्ष डा. कमलकांत झा आपत्ति नहि केलखिन्ह तऽ अनुशासनक कारण हमहूँ चुप रहलहुँ (जेना एखन किनकहुँ हिन्दीक पोथीक लोकार्पण १२२म सगर राति दीप जरयमे जलवारमे सेहो भेल)।
किन्तु श्रीनिवासजीक कथा सुनितहि हम हिन्दीक छत्तीसगढ़मे २०१५ क एक हिन्दी समाचारपत्रमे छपल कथाक संग भावसाम्यता ओ कथासाम्यताक आरोप लगा देलिएन्हि। दूनू कथामे कुमारि भोजन लेल कोनहुँ दम्भी व्यक्तिकेँ किनकहुँ आगाँ याचना करऽ पड़ल छलन्हि जिनक घर कुमारि बेटी छल जिनका ओ दम्भी हमेशा दूसैत रहैत छल। हम अपन मुँहफटीमे राजकमलक प्रसिद्ध 'ललका पाग' मैथिली कथा पर सेहो शरदचन्द्रक एक कथासँ भावचोरीक आरोप लगाओल जाहिमे एक विवाहिता अपन पतिकेँ दोसर बिआह लेल जाइत काल शंखध्वनि करक लेल बाध्य करैत अछि।
शिवशंकर श्रीनिवासक एक कथाक पीडीएफ 2005 मे प्रकाशित 'सिनुरहार' क कथा विधवा विवाह बल्कि पुनर्विवाहक बादक मानसिकताक ऊपर एक प्रगतिशील कथा 2025 ईस्वीमे ओतेक प्रासंगिक नहि लागैए कारण विधवा विवाह नहि तलाकक बाद पुनर्विवाहक कथा अधिक समाजमे आब भए रहल अछि।
उक्त कथामे कल्याणी नामक एक बेटी विवाहक चारि मासक बाद रेल दुर्घटना चलते विधवा भए गेलीह। हैदराबादक महानगरीमे अपन पिताक नौकरीस्थल पर अपन सहपाठिनी द्वारा अपन भाइक प्रति हुनक झुकाव करबा उत्तर प्रदेशक एक आधुनिक कथित जाति-पाति नहि मानएबला ब्राह्मण परिवारमे विवाह भए गेलैन्हि।
एकर पाँच वर्षक बाद कल्याणीकेँ एक भाइ भेलन्हि जकर उपनयनक समय सधवा लोकनिक सेनुरहार प्रथा पर ई कथा अछि जाहिमे विधवाक विवाहक बाद ऐहब नहि मानि या ओकरा अमंगली मानकक संशय कल्याणीक मोनमें अन्त तक रहि जाइत छन्हि।
कल्याणीकेँ विवाहक पाँच वर्ष भाइक जन्म जाकर बूझू 8 वर्षक बाद ओकर उपनयन यानी 13 वर्षमे कल्याणीकेँ कोनहुँ सन्तानक चर्चा नहि कथामे एक कमी देखाइत अछि। कल्याणीक माए गाममे विधवाक पुनर्विवाहसँ यज्ञमे विघ्नसँ डरैत छथि किंतु पतिकेँ अन्तमे बेटीक घर जा गाम लेल नोतए कहैत छथिन्ह। जमाए सेहो संग गेलाह से हुनका नीक नहि लगलन्हि जे गाममे किछु गड़बड़ नहि भ जाएत। जखन कि पिता जमाएक गाम संग गेलासँ प्रसन्न छथि। एहि अन्तरालमे गामक बदलबाक चर्चा नहि भेनाइ कथाक कमी अछि। ओतए बारि देबाक कोन कथा सहयोग भेटैत छन्हि।
सिनुरहार प्रक्रियामे माए बेटी कल्याणीकेँ नहि कहैत छै जे बेटाकेँ अमंगल नहि हो। कल्याणीकेँ मोन होइत छै वापस चलि जाए किन्तु अबोध भाइकेँ मुँह देखि असमंजसमे ओकर मनोदशाक नीक वर्णन कथाकार श्रीनिवास करैत छथि। हुनक प्रगतिशील लेखकत्व कल्याणीकेँ उत्प्रेरित कए स़धवा पंक्तिमे ठाढ़ करैत अछि। ओ एक भौजीकेँ खीर-पूआ दैत छथि तऽ एक पितियौत बहिन कल्याणीक माएक हाथसँ तेल-सेनूरलए कल्याणीक सिउँथिमे लगा दैत छथि। कल्याणी प्रसन्न, ओकर पति प्रसन्न (नेपथ्यमे पिता सेहो प्रसन्न भेल होथि) किन्तु माएकेँ 'असमंजसी कथाकार' शिवशंकर श्रीनिवास अवाक् मुद्रामे राखि दैत छथि।
हम कहैत छी कथाकर शिवशंकर श्रीनिवास उच्च जातिबोधक मानसिकतामे फँसल एक आधुनिक पढ़ल-लिखल, आधुनिक सोचक कथाकर छथि किन्तु शत प्रतिशत आधुनिकताक नहि। ओ विधवा विवाह सेहो करबैत छथि तऽ दोसर भाषी किन्तु स्वजातीयहिमे। कथानक हमेशा असमंजसमे ओ द्वंद एवं आधुनिकीकरणक दिशि किछुए।
ई पूर्ण वैज्ञानिक सापेक्षक पक्षधर नहि नहिए पुरातनपंथी वरन् असमंजसी स्थितिमे जाहिमे वैह नहि अधिकांश उच्च सामाजिक वर्गक लोक एखन धरि अछि। एखनहुँ पुरुषकेँ प्रगतिशील ओ महिलाकेँ दकियानूसी देखेबाक आदति जेना एहि कथामे माता दकियानूसी पिता प्रगतिशील जखन कि अगिला पीढ़ीमे लड़की कल्याणीक भाउजि ओ पितियौत बहिनक प्रगतिशीलताक बिना प्रशंसा केने विवरण अछि।
ई दकियानूसी जाएमे एक-दू पीढ़ी आओर लगतै वा फेर 'यू टर्न' हैत जे परिणामफल देखल जा रहल अछि एहन विवाहक परिणति बहुत तलाक या विवाह टूटनमे। की परिवार संस्था समाप्त हैत? के जानए किन्तु ई कथा 20 साल पहिले लिखल संभवतः आब प्रासंगिक नहि जखन 2005 मे लिखल गेल तखन एक तरहसँ प्रगतिशील प्रगतिगामी कथा लेखकक रूपमे शिवशंकर श्रीनिवासकँ मानल जएबाक चाही छल वा मानल गेल होएत। एखन 2025 मे निश्चितरूपसँ समाजमे वैज्ञानिक दृष्टिकोण आओर बढ़ि रहल अछि।
किन्तु 2005 मे ई प्रगतिशील कहाओल गेल होएत यद्यपि तखनहि मिथिला समाज तलाकसँ आक्रान्त भए चुकल छल ओ 60+ वर्षक औसत आयु यानी 1947-57क हैजा-मलेरियाजन्य अल्पजीवी औसत आयु 21 वर्ष छल जखन विधवा बहुत होइत छलथि आओर ओ कलंकिनीसँ आगाँ मिथिलामे सेहो उठि गेल होएतीह। तथापि कथा शैली नीक शिवशंकर श्रीनिवासकेँ छनि। हमरा हुनक 'य' केर मैथिलीमे अधिकांश मैथिली लेखकजकाँ हिन्दीजकाँ हरसठ्ठहि प्रयोग नहि लागल जखन 'ए' उपयुक्त ओ उचित।
एहि कथा लेल हम आरो लीखि सकैत छी मुदा एखन अतबे।
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