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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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ज्ञानवर्द्धन कंठ

दूटा बीहनि कथा

दाबा

 

लखनकाका बड्ड खिसियायल रहथिन।कहलथिन- "आँय यौ बुचकुन?हमर दाबा पर अहाँक कोन दाबा?कोदारिक छौ सँ हमर दाबा ढाहिक' अहाँ अपन डाबा टाँगि देलियैक,तँ अहींक दाबी भ' गेल? एक्के दाबि अपन दबिया ल' ' अहाँ अनकर हक कपचि लेबैक,से नहि हैत!कथी पर एतेक दाबा अछि यौ?जोरगर छी,तँ कमजोरकेँ दाबि देबैक?चलू,पंचायतमे! दबाड़ पड़त, ' सभटा दाबी घोसरि जायत।चलू,अहाँक दबाइ करबै छी हम!"पंचायतमे दबदबाबला दबंग सभ अयलाह।हिनके पर दबाव पड़ि गेलनि,दाबी छोड़बाक लेल।दाब सँ दबि ओतय सँ विदा भेलाह।साँझमे देखलनि- पंच लोकनि बुचकुनक दोकान पर मधुर दबाक' दाबि रहल छलाह।

पराश्रित

 

-"आँय यै, आइ अपन बुच्ची कंपनीमे काजो करय लागलि।कोना दिन बीति गेलैक, से पते नहि चलल।आब तँ नीक बर-घर ताकि....."

-"से त' छैके!"

-"अपन घर चलि जायत बुच्ची।नञ यै?अपना सभक लेल त' ओ पाहुने भ' जायत!आब अहीं अपने सँ मिलान क' ' देखू।अहाँ कतेक दिन अपन माय-बाप लग रहि सेवा करैत छियनि?हुनका लोकनिकेँ कतेक आर्थिक मदति क' पबैत छियनि?तहिना त' अपनो बुच्ची किने?"

-"किएक?ओ कोनो हमरे जकाँ पराश्रित छैक?"

 

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