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१.
अरविन्द
ठाकुर १. लोकदेव
भीम केवट २.लोकदेव लोरिक २.
बिपिन कुमार झा-
विषवेलक सिञ्चन
१.लोकदेव भीम केवट-
अरविन्द
ठाकुर
आठम सदीक मध्य धरि गुप्त-वंशक शासन नरभराइत-नरभराइत चलल। हर्षवर्धनक बाद सम्पूर्ण शासन-क्षेत्रमे अराजकता आ अव्यवस्था पसरि गेल। मत्स्य-न्यायसँ त्रस्त प्रजा अपन रक्षाक लेल सर्वसम्मतिसँ शस्त्र, शास्त्र आ कृषिमे निष्णात अयाचक-ब्राह्मण गोपालकेँ अपन राजा चुनलक। हुनकेसँ पाल वंशक प्रारम्भ भेल। गोपाल बिहार आ बंगालकेँ एकसूत्रमे बान्हि जनसहयोगसँ शासनकेँ सुव्यवस्थित केलनि। गोपाल परम लोकप्रिय राजा भेलाह आ हुनकासँ प्रारम्भ पाल शासन कालमे शिक्षा-संस्कृतिक चतुर्दिक विकास भेल।
एगारहम शताब्दी आएल। तखन पालवंशी राजा विग्रहपाल तृतीयक शासन छल। ओहो अपन पूर्वज सभ जकाँ प्रजापालक आ न्यायपरायण छलाह। मुदा हुनक ज्येष्ठ पुत्र महिपाल-द्वितीय सत्तालोलुप छल। पिताक मृत्युक उपरान्त ओ अपन दुनू छोट भाए शूरपाल आ रामपालकेँ बन्दी बनाए कारागारमे ढाठि देलक आ शासनक मनमाना संचालन करए लागल।
गुप्तकालमे पूर्वी मिथिला आ पश्चिमी बंगालकेँ मिलाकए एकटा राज्य बनाओल गेल छल- पौन्ड्रवर्धन। एहि क्षेत्रान्तर्गत छल भेरियारीगढ़। ई अजुका अररिया जिला मुख्यालयसँ प्रायः १६ किलोमीटर दूर नेपाल सीमापर अवस्थित अछि। एहि भेरियारीगढ़मे दिब्बोक नामक पालशासकक एकटा प्रभावशाली सामन्त अपन भातिज भीम केवटक संग रहै छलाह। ओ अपन प्रजाक कल्याण लेल तँ तत्पर रहिते छलाह, हुनका अनेक सिद्धि सेहो प्राप्त छलनि। ओ भेरियारीगढ़सँ शासन आ पनार नदीक मनोरम तीरपर भागनगर गामस्थित एक गुफामे योग साधना करैत छलाह। मोरंगक राजा भीमदेवक संग हुनक प्रगाढ़ मैत्री छल।
महिपाल द्वारा अपन भाए सभक संग कएल कुकृत्य आ अराजक शासन पद्धतिसँ सामन्त दिब्बोक क्षुब्ध भए गेलाह। ओ अपन राजाक निन्दनीय कृत्यक विरोध करए लगलाह। ओ केवट सभक २२ (बाइस) उपजातिकेँ संगठित केलनि आ तकर नेतृत्व लेल अपन भातिज भीम केवटकेँ नियुक्त केलनि। संघर्षक योजना बनए लागल। क्षेत्रक अन्य अनेक छोट-बड़ सामन्त सभ भीम केवटक झंडाक नीचाँ एकजुट होबए लागल।
महिपालकेँ एकर भनक लागल तँ ओ एक भाए शूरपालकेँ मुक्त कए शासनमे हिस्सेदार बला लेलक। मुदा एहिसँ स्थिति नञि सम्हरलै। जनाक्रोश अप्[अन चरमपर आबि गेल छलै। भीम केवटक नेतृत्वबला जन-सेना आक्रामक भए गेल। राजा महिपाल शक्तिशाली सेनाक संग-संग ग्राम्य रक्षादल वाहिनीसँ सम्पन्न छल मुदा प्रजाक विश्वास ओकरा संग नञि छलै। भयंकर युद्ध भेलै जाहिमे महिपाल हारि गेल आ क्रुद्ध प्रजा ओकर वध कए देलकै। शूरपाल आ रामपाल मुक्त कए देल गेलाह आ दुनू भाए बंगाल दिस चलि गेलाह। विजयोपरान्त दिब्बोकेँ राजा बनाएल गेल। हुनका कोनो पुत्र नञि छलनि तेँ हुनक मृत्युक उपरान्त भीम केवट राजा भेलाह।
एक बेर मोरंग राजा भीमदेवक बहिन तिरफूल सुन्नरि एक सए नाहमे सनेस आ दहेजक संग अपन सासुर जाइ छलीह। सिरीपुर चौरमे किराँत डकैत सभ सइयो नाह लूटि लेलक आ तिरफूल सुन्नरिक हरण कए व्पतालक एहिठाम राखि देलक। हाहाकार मचि गेलै। राजा भीमदेव अपन मित्र भीम केवटसँ गोहार कए मदति माँगलनि। भीम केवट भागनगर गुफामे भगवतीक ध्यान लगौलनि। भगवती परगट भए हुनका तिरफूल सुन्नरिक पता देलथिन। भीम केवट अपन बलशाली हाथमे अढ़ाय मोनक खण्डा लेने बनहौटा घोड़ापर सवार भए किरांत सभक उन्मूलन लेल अग्रसर भेलाह। किरांत सभक सभटा मंतरकेँ अपन साधनाक बलपर काटैत भीम केवट पताल-लोक धरि पहुँचि गेलाह। अपन खंडासँ किरात डकैत सभक वध कए ओ तिरफूल सुन्नरिकेँ मुक्त करैलनि।
ताहि काल धरि बौद्ध धर्म कलुषित होअए लागल छल। वज्रयानी सभ विकृत गुह्य साधनामे लागि गेल छल। भीम केवट अपन शासन क्षेत्रमे एहि दुराचारकेँ प्रतिबन्धित केलनि। वज्रयानी बौद्ध मठ सभकेँ उजाड़ि ओकरा शिव मन्दिरक रूप देल गेल।
अत्यन्त लोकोपकारी काज सभ करैत भीम केवट अपन शासनकालमे जननायक बनल रहलाह। आइयो भीम केवट लोकदेव रूपमे स्मरण कएल जाइत छथि आ हुनक वीर गाथा लोकगीत बनि लोक कंठमे बसल अछि।
२.लोकदेव लोरिक-
अरविन्द
ठाकुर
सौँसे इलाकामे उघरा पंवारक आतंक पसरल छल। ओ परम अत्याचारी आ दिश्चरित्र छल। ककतो धन-सम्पत्ति लूटि लेब आ मनपसिन्न युवतीक अपहरण कए लेब ओकर दिनचर्या बनल छल। उघरा गामक अपन गढ़सँ कज्जलगिरि हाथीपर चढ़ि एकसँ एक अड़िजंग पट्ठा आ पहलमान सभक संग जखन उघरा पंवार बहराबै तँ लोककेँ अदंक धए लए। युवती लोकनि पतनुकान लए लिअए आ संपन्नसँ संपन्न आ प्रभावशाली लोक ओकरा आगाँ नतमस्तक रहै।
कमला नदीक कछेरपर गोठ गौरा गाम। एहि गामक मांजरि परम सुन्दरी छलीह। उघरा पंवार मांजरिकेँ अपन अंकशायिनी बनबय छाहैत छल। मांजरि हाबी पत्तनक भगवती मंदिरमे प्रतिदिन पूजा करथि आ अपन सतीत्व रक्षा लेल गोहारि करथि। मांजरिक पिता महरकेँ एक लाख गाय छलनि आ पत्नीक नाम छलनि पद्मा मौहरि। दुनू प्राणीकेँ उघरा पंवारक मोनक बात बूझल रहनि तेँ दुनू चिन्तामग्न भए मांजरिक माम सेवाचनकेँ बजयलनि। मांजरिक लेल निर्भीक आ प्रचण्ड योद्धा वर खोजबाक भार सेवाचनकेँ देल गेलनि।
एहि क्रममे अगौरा गामक सिलहट अखाड़ाक ख्याति सेवाचनक कानमे सेहो पड़लनि। एहि अखाड़ाक प्रधान मल्ल छलाह लोरिक। लोरिक अपन अस्सी मोनक विशाल भारी खण्डाक प्रबल वेगसँ संचालन करथि तँ बिजली चमकै। हुनक छोट भाय सावर तेहने मस्त पहलमान। ओहि अखाड़ामे लोरिकक अन्य मल्ल-संगी छल- राजल धोबी, बारू दुसाध आ बंठा चमार।
सेवाचन अगौरा एलाह तँ हुनका अगौराक राजा सहदेवक शतखंडा महल देखि पड़लनि। ओतए गेलाह तँ हुनक खूब आवभगत भेल आ ओ राजकुमार महादेवकेँ देखलनि। एहन सुकोमल युवक हुनका मांजरि लेल नञि जँचलनि। ओ महलसँ निराश भए घुरैत छलाह तँ डगरपर राजल धोबीक पत्नी फुलिया हुनका लोरिकक मादे बतैलकनि। सेवाचन कुब्बेक दलानपर एलाह। लोरिकक आ सावरक पिता कुब्बे राजा सहदेवक हरबाह छलाह आ हुनक पत्नीक नाम छलनि- खुलैन। सेवाचन खुब्बेक विपन्नतासँ व्यथित तँ भेलाह, मुदा सिलहट अखाड़ापर लोरिकक पौरुष देखि हुनका लगलनि जेना साक्षात भैरव वीर-वेशमे ठाढ़ छथि। हुनका भरोस भए गेलनि जे इएह तरुण अपन वीरतासँ मांजरिक सतीत्व-रक्षा कए सकैत अछि। ओ कुब्बेक एहिठाम भोजन कयलनि आ विवाह तय भए गेल।
उघरा पंवारक प्रचण्ड शक्तिसँ आतंकित साअमान्य जनकेँ बरियात जयबाक साहस नञि भेलनि। बरियातमे मात्र निर्भीक परिजन आ चुनौटा वीर सभ चलल। रस्तामे एकटा नदीक कातमे सात सय धोबी कोनो राजाक कपड़ा धोइत रहए। राजल ओहि धोबी सभसँ आग्रह केलकनि जे सभ बरियातीकेँ कपड़ा दिअओ जे फिरती काल घुराए देल जाएत। धोबी प्रधान प्रत्युत्तरमे राजलक अपमान कए देलकनि। फेर की छल। बरियाती सभ सभटा वस्त्र लूटि लेलक आ पहिरिकेँ आगाँ बढ़ल। दोसर दिन ओ सभ बगड़ा-बजार पहुँचल। भुखायल बरियातीकेँ बजारबला सभ भोजन देब अस्वीकार कए देलक। बस पहर भरिमे बरियाती बगड़ा-बजारकेँ लूटि लेलक आ खा-पी कए आगाँ बढ़ल।
गौरा गामक एकटा फैलगर गाछीमे बरियातीक डेरा खसलै। महर दिससँ भोजन सामग्रीक अमार लागि गेल। कुब्बे असगरे सत्ताइस मोन दूध पीबि गेलाह, सात सए तोला दही चाटि गेलाह, सत्तरि माठ सकरौरी चाभि देलथिन आ विशेष आग्रहपर सए हाँड़ी छाल्ही सेहो उदरस्थ कए गेलाह। आनो-आन बरियाती तहिना कएलक।
उघरा पंवार विवाहकेँ बाधित करए लेल पहलमान सभकेँ स्त्री-वेशमे पठयलक। बूढ़ कुब्बे अपन ताड़क छौंकीसँ सभकेँ झँटिआबय लगलाह। बहुत मरल, बहुत पड़ायल। फेर पंवार अपन कज्जलगिरि हाथीकेँ पठैलक। सभ बरियाती मिलि ओकरो बेहाल कए देलकै। ओहो पड़ायल।
कन्या पक्ष दिससँ एक गोटय पद्मा मौहरिक समाद लए कए आएल जे जाधरि किरण-छबि-मौर, माने चौकक आकाश-तारा-पटोर आ बिजुवनक माणिक चोली नञि देल जेतैक ताधरि कन्यादान संभव नञि। ई सभ अनबाक भार लैत राजल धोबी बाजल- “एतएसँ पचीसे कोसपर बिजुवन छै। ओहिठामक बड़का भारी योगिन कोसा मालिन ई तीनू चीज एक्के संग बेचैत अछि। ओकरासँ ई सभ उधार लए लेबै आ नञि देत तँ घरसुरक मैल छोड़ाए देबै।” सावर सेहो ओकर संग भेल। ओ सभ बाटमे किछु लताम तोड़ि कए आ किछु पोठी माछ पकड़ि कए राखि लेलक। गोंगा बानरकेँ लताममे आ कनही बिलाइकेँ पोठी माछमे ओझरा कए ओ दुनू कोसा मालिन लग पहुँचल जे मंडपमे बैसलि बारह बरषसँ खीर रान्हि रहल छलि। ओकर विभिन्न प्रलोभनसँ बचैत आ धमकीक संग ओकर वस्तुजातक मोल दए देबाक वचन दैत दुनू गोटय सभ वस्तु लए आनल। तखन जाकए सिनुरदान भेल।
वर-वधु कोहबर प्रवेश कएलनि। रातिमे पंवारक पठाओल प्रसिद्ध चोर-मल्ल सोनिका आ मनिका चार अलगाकए तरुआरि लेने कोहबरमे घुसि गेल। लोरिक अपन खंडासँ दुनूक मूड़ी छोपि लेलनि।
मांजरि तीनटा अनाथक पालन कएने छलीह। प्रथम छल बाजिल कौआ। दोसर छलीह परम बलशालिनी आ महाकाय लुरकी। तेसर छल नांगर छौड़ा नन्हुआँ, जे गाय सभक चरबाही करैत छल।
सोनिका आ मनिका मारले गेल छल कि नन्हुआँ चिकरल- “पाहुन, दौगू। उघरा पंवार खरिका बथानक गोथरसँ महरक सभटा गाय हाँकने जाए रहल अछि।” एहि हाकपर लोरिक अपन हाथमे खंडा लेने कोहबरसँ निकलि दौगि गेलाह। ओम्हर खरिका बथान लग पंवार अपन सैनिक सभक संग तैयार छल। लोरिकपर अगिनियाँ बाण चलए लगलैक। ओहिसँ बचए लेल लोरिक धारक कछेरपर एकटा फाटमे धसिकए बैसि गेल। पंवार अपन कज्जलगिरी हाथीपर चढ़ल ओकरा दिस बढ़ल। ओ लग अलए कि लोरिक लपकि कए अपन खंडासँ हाथीक सूँढ़ छोपटि लेलक। हथी अरराकए खसल आ पंवार ओहिपरसँ कुदकिकए एक दिस भागल। लोरिक फाटसँ बहराएल आ सैनिक सभक मूड़ी छोपए लागल। पंवारलग एकटा तीर च्बचल छलै। ओ भूमिपर सूतिकए लोरिकक जांघमे तीर मारलक। जाँघसँ शोणित फुहार देबए लगलैक मुदा लोरिक कहाँ थम्हयबला। ओकर खंडा चलिते रहल आ सैनिक सभ मुंडविहीन होइत गेल। अंततः उघरा पंवार अपन बचल सैनिक संग भागि गेल। लोरिक घुरिकए कोहबर एलाह।
बरियाती विदाइ बेर पंवार अपन बचल योद्धा सभक संग फेर जुमि गेल। भीषण युद्ध भेल। लुरकी अपन व्रज-समाठ लेने पंवारेसँ भीड़ि गेल। ओ समाठसँ पंवारक माथपर चोट करैत छलीह, मुदा पंवार अपन रत्न-जड़ित अभेद किरीटक कारणेँबचि-बचि जाइ। एहिपर लोरिकक दृष्टि पड़ल। ओ अपन खंडाक नोकसँ किरीटकेँ नीचाँ खसाए देलक। पंवार प्राण लए कए अपन गढ़ दिस भागल। खसल किरीट उठाकए लुरकी ओकरा लोरिकक माथपर राखि देलकै। किरीट पहिरने लोरिक पंवारक पछोर धेलनि। गढ़क फाटक तक अबैत-अबैत लोरिक पंवारक मूड़ी छोपि लेलनि। गढ़मे हाहाकार मचि गेल। गढ़मे घूसि लोरिक बाल-बच्चा आ रानीकेँ अभय-दान देलनि। रनिवासक काराक फाटक खोलबाए ओहिमे ढ़ाठलि सात तूर सुन्नरिकेँ कारामुक्त कए देल गेल। जन-जनमे जय-जयकार भए उठल। महा-अत्याचारी उघरा पंवारसँ लोककेँ मुक्ति भेटल।
लोरिक सभ गोटयसँ विदा लेलनि आ बरियाती संग आगाँ बढ़लाह। आगू-आगू रक्तरंजित वज्र-समाठ लेने लुरकी, ओकर कन्हापर बैसल विशाल कौआ बाजिल आ तकरा पाछू छलै रतन ओहारबला पालकीमे मांजरि। तकरा पाछू चलैत छलाह हाथमे अस्सी मोनक खंडा लेने सिंह जकाँ झुमैत वीर लोरिक। हुनक खंडासँ तखनो पंवारक रक्त चुबिए रहल छल।
२
विषवेलक सिञ्चन
कखनहुँ- कखनहुँ ई निराशाजनक अनुभूति होइत अछि जे भारत 28 राज्य के नहिं अपितु 6000 जातिक संघमात्र अछि। अपन सभक पहचान भारतीयता नहिं बल्कि जाति विशेषमात्र अछि। भारत में दुर्भाग्यक शाश्वत-कालरात्रि के आननिहार ई जातिप्रथा आई अपन वैधानिक स्वरूप सँऽ उपद्रवी भूमिका निभेबाक उद्योग कय रहल अछि। जाति जनगणना ओ विष-बेल अछि जकर जहर आगामी पीढी कें रग-रग में प्रवाहित भय राष्ट्रजीवन कें विषाक्त करत।
आखिर स्वाधीनता केर 64 वर्ष बाद, जखनि एकमात्र पहचान राष्ट्रीयता हेबाक चाही , जखनि राष्ट्रजीवन सँ जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रजनित पहचान गौण भय जेबाक चाही, जखनि ई घृणित जातिगत विरासत समाप्त भय जेबाक चाही तखनि हम सब ई विनाशकारी संस्था (जातिगत पहचान) सँ नबका आशाक किरण ताकि रहल छी। इतिहास केर ई मोड पर सरकार द्वारा जाति जनगणना क लेल गेल ई निर्णय वर्तमान नेतृत्व कें कहियो भविष्य में जबाब देबाक हेतु बाध्य करतन्हि जे ई रक्तबीज केर पोषण कियाक कयल गेल छल।
अतीत में जातिप्रथा कें कोनो उपयोग भेल हो अथवा वर्तमान में ई एकटा वास्तविकता छी तथापि ई तर्क जातिप्रथा कें सम्पोषण कें न्यायसंगत नहिं ठहरा सकैत छियैक। यदि एक शब्द में कहल जाय त ई भारतवर्ष कें विद्यमान अनेंक दुष्प्रवृत्ति केर जनक छी। वोट बैंक केर भूखल नेतागण द्वारा जातिगणना कऽ अनेंकानेक लाभदायक पहलू व्यक्त कयल जा रहल छैक। सामाजिक न्याय केर पूर्तिक हेतु एकरा एकटा प्रमुख माध्य सिद्ध कयल जा रहल छै। वास्तविकता त ई अछि जे ई सब व्यक्ति समाज में जाति जनित संघर्ष उत्पन्न कय जनभावना कें उभारि पोलीटीकल इंश्योरेंश प्राप्त करय चाहि रहल छथि। एहि कारण देश में नितनूतन आरकक्षण केर मांग, अव्यवस्थाजनक आन्दोलन एवं सामाजिक कटुता जे उत्पन्न होयत ओकर नियन्त्रण अपन शासनतन्त्र सँऽ कदाचत् संभव नहि होयत
ई स्वार्थी नेतागण द्वारा अपन मानस पिता अंग्रेजक विभाजनकारी ढर्रा अपनेनाई देश कें बड्ड महग पडत।
ई समयक मांग आ युग के आह्वान अछि जे जाति धर्म-लिंग-क्षेत्रविषयक पहचान स ऊपर एकात्मकता क आत्मसात कय जाय। आश्चर्य होइत अछि जे बुद्धजीवी आ युवा समाज केहि तरहक विभाजनकारी क्रिया कलाप पर प्रतिक्रिया शून्य च्थि एहि वर्गक चेतना हीनता केर मूल्य राष्ट्र के भविष्य में अवश्य चुकबय पडत।
ई दायित्त्व अपन प्रबुद्ध समाज पर अछि जे ओ ई विनाशक जाति-प्रथा कें पोषित करय बला कोनों प्रयास पर अपन प्रभावी विरोध प्रकट करथि। अन्यथा भविष्यक भीषण दुष्परिणाम के प्रतीक्षा करथि।
जय हिन्द जय भारत
बिपिन कुमार झा